Class 7 Social Notes Chapter 9 अठारहवीं सदी के राजनीतिक शासक

भारत में 18वीं सदी अनेक राजनैतिक उथल-पुथलवाली थी। 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के बाद भारत छोटे-छोटे राज्यों में बँट गया था। जिसका हम अध्ययन करेंगे।

मुगलवंश का अंतिम शासक

औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल गद्दी पर बहादुरशाह नामक सुलतान आया। उसने राजपूत और मराठा राज्यों के साथ शांतिपूर्ण संबंध स्थापित किया। जबकि मराठों के बीच उत्तराधिकार के मुद्दे पर विग्रह भी करवाया। उसके समय में गुरुगोविंदसिंह की मृत्यु के बाद सिख सरदार बंदा बहादुर ने मुगल साम्राज्य के सामने विद्रोह किया।

1712 ई. में बहादुरशाह की मृत्यु होने पर जहाँदरशाह गद्दी पर आया। किंतु 1713 ई. में ही उसे पदस्त करके फर्रुखसियर गद्दी पर बैठा। इस समय सैयद बंधुओं के रूप में पहचाने जानेवाले दोनों भाई साम्राज्य में खूब वर्चस्व रखते थे। उन्होंने फर्रुखसियर को गद्दी पर से उतारकर मुहम्मदशाह को बादशाह बना दिया। उसने लम्बे समय तक शासन किया। उसके समय में 1739 ई. में ईरान के नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण किया। जिसने मुगल साम्राज्य को भारी क्षति पहुँचाई। 1759 ई. में गद्दी पर बैठनेवाले शाह आलम द्वितीय को अंग्रेजों ने बक्सर के युद्ध में हराकर कंपनी का पेन्शनर बना दिया।

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बंगाल

मुर्शिदकुली खान और अलीवर्दी खान ने बंगाल में स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। 1757 ई. में सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब हैदराबाद बना। ईस्ट इंडिया कंपनी और बंगाल के नवाब के बीच 1757 ई. में प्लासी का युद्ध हुआ। इस युद्ध की जीत से बंगाल में अंग्रेजों को 24 परगना की जागीर मिली। प्लासी के युद्ध के बाद नवाब बने मीरजाफर को हटाकर मीरकासिम को बंगाल का नवाब बनाया। उसने अवध के नवाब और मुगल शहंशाह का सहयोग पाकर अंग्रेजों के समक्ष बक्सर का युद्ध किया, जिसमें उसकी पराजय होने से बंगाल में नवाब के शासन का अंत हुआ।

राजपूत शासन

मुगल साम्राज्य के पतन के बाद राजस्थान में जयपुर सबसे शक्तिशाली राज्य था। राजा सवाई जयसिंह कुशाग्र राजनेता, सुधारक, कानूनविद् और विज्ञानप्रेमी थे। उन्होंने जयपुर शहर की स्थापना की। वे महान खगोलशास्त्री थे। उन्होंने दिल्ली, जयपुर, उज्जैन और मथुरा में आधुनिक वेधशालाओं की स्थापना की थी।
अन्य राजपूत राज्यों में जोधपुर, बीकानेर, कोटा, मेवाड़, बूंदी और शिरोही मुख्य थे।

सिख साम्राज्य

गुरुनानक ने 15वीं सदी में सिख धर्म की स्थापना की थी। सिख धर्म गुरु परंपरा के साथ जुड़ा हुआ है, जिसमें 10 गुरु हुए। दसवें गुरु गोविंदसिंह ने सिखों को एकता के धागे में बाँधकर सिख राज्य की स्थापना की। गुरु गोविंदसिंह के बाद बंदा बहादुर ने मुगल साम्राज्य के विरुद्ध भयंकर विद्रोह किया। सिख 12 समूहों में विभाजित थे, जिनमें से एक समूह सुकरचकिया के शक्तिशाली नेता रणजीत सिंह ने सिख साम्राज्य का विकास किया। उन्होंने लाहौर और अमृतसर पर विजय प्राप्त की। उन्होंने कश्मीर, पेशावर और मुलतान पर विजय प्राप्त करके सिख साम्राज्य के विस्तार को विशाल बनाया। उनकी सेना में यूरोपियन सेनापति और सैनिक थे। उन्होंने अपनी सेना को यूरोपियन सेना की तरह अति आधुनिक बनाया था। लाहौर में उन्होंने तोप बनाने का कारखाना स्थापित किया था। वे धार्मिक दृष्टि से उदार थे। जबकि उनकी मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने 1849 ई. में सिख साम्राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया।

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मराठा साम्राज्य

17वीं सदी के महान शासकों में छत्रपति शिवाजी अग्रगण्य हैं। बीजापुर के सुलतान, मुगल सम्राट औरंगजेब, पुर्तगालियों वगैरह को थका करके शिवाजी ने एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की थी।

छत्रपति शिवाजी महाराज के नेतृत्व में मराठों ने दक्कन में गुरिल्ला युद्ध-पद्धति अपनाई। उन्होंने स्वतंत्र राज्य के लिए कुशल, कार्यक्षम और प्रजाहितकारी शासनतंत्र की स्थापना की। इन सिद्धियों के साथ शिवाजी का उच्च चरित्र और उदार नीतियाँ भी शामिल थीं। छत्रपति शिवाजी के बाद शिवाजी के पौत्र शाहू को औरंगजेब ने कैद कर लिया था। 1707 ई. के बाद जब शाहू मुक्त हुए तो अपनी काकी ताराबाई से उत्तराधिकार के लिए संघर्ष हुआ। शाहू से जुड़े पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने शाहू को विजय दिलवाई। उनके समय से मराठा राज्य में पेशवा प्रथा की शुरुआत हुई।

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बालाजी विश्वनाथ प्रथम पेशवा थे। उन्होंने मराठा राज्य का विकास करके सभी सत्ताएँ अपने हाथ में ले ली। 1720 ई. में उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र बाजीराव प्रथम पेशवा बने। वे कुशल योद्धा और चतुर राजनीतिज्ञ थे। उन्होंने कई मुगल क्षेत्रों को मराठा साम्राज्य में मिलाकर मराठा राज्य का विकास किया। उन्होंने मालवा, गुजरात और बुंदेलखंड भी जीत लिया। इतना ही नहीं उन्होंने हैदराबाद के निज़ाम को भी हराया। उन्होंने महाराष्ट्र को एक महान मराठा साम्राज्य में परिवर्तित कर दिया।
बालाजी विश्वनाथ

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1740 ई. में उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र बालाजी बाजीराव पेशवा बने। उन्होंने बंगाल से लेकर मैसूर तक विजय प्राप्त की।

1761 ई. में ईरान के शाह अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर आक्रमण किया। मराठों और अब्दाली के बीच पानीपत का तृतीय युद्ध हुआ, जिसमें मराठा राज्य की हार हुई। हार का समाचार मिलते ही आघात से बालाजी बाजीराव की मृत्यु हुई। इस युद्ध ने मराठों को निर्बल बनाया। परिणाम स्वरूप भारत में ब्रिटिश सत्ता का उदय हुआ।

Class 7 Social Notes Chapter 14 संसाधनों की देखभाल और संरक्षण

संसाधन

पृथ्वी पर प्राप्त होनेवाले मानव उपयोगी प्राकृतिक पदार्थों को संसाधन कहते हैं। वायु, जल, जमीन, वनस्पति और खनिजों के स्वरूप में हमें प्राप्त प्राकृतिक भेट अर्थात् प्राकृतिक संसाधन। संसाधन राष्ट्रीय अर्थतंत्र की रीड की हड्डी है। वह लोगों की शक्ति और समृद्धि का आधार स्तंभ है। संसाधनों की कुछ निश्चित विशेषताएँ और उपयोगिताएँ हैं। सामान्य रूप से संसाधन मर्यादित मात्रा में उपलब्ध हैं। इन संसाधनों को अधिक उपयोगी बनाने के लिए हमें विविध तकनीकों का उपयोग करना चाहिए।

संसाधनों के प्रकार

संसाधनों का हम विविध रूप से उपयोग करते हैं। कृषि से लेकर उद्योग और परिवहन की प्रवृत्ति तक सभी प्रवृत्तियों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हम प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते हैं। भोजन के रूप में, जमीन और वनस्पति में से प्राप्त होती विविध सामग्री ईंधन और ऊर्जा के रूप में उपयोग करते हैं।

संसाधन सामान्यतः दो भागों में विभाजित किए जाते हैं : प्राकृतिक और मानवनिर्मित। भूमि, जल, खनिज और जंगलों का प्राकृतिक संसाधनों में समावेश होता है। इसमें भी दो प्रकार हैं : जैविक और अजैविक। भूमि, हवा, जल, जमीन अजैविक संसाधन हैं, जबकि जंगल और प्राणी जैविक संसाधन हैं। मानवसर्जित उद्योग, स्मारक, चित्रकला और सामाजिक संस्थाएँ आदि मानवनिर्मित संसाधन हैं। मनुष्य में रहे ज्ञान, बुद्धि, कौशल, स्वास्थ्य और अन्य गुणों का समावेश मानवसंसाधन में होता है। प्राकृतिक संसाधनों के विकास के लिए मानवसंसाधन होना आवश्यक है।

कुछ ऐसे संसाधन हैं जो निश्चित समय में स्वयंनिर्मित होते हैं। वृक्ष-पत्ते, पशु-पक्षी आदि में स्वयं उत्पन्न होने की क्षमता होती है। इस तरह वन और वन्यजीवन निश्चित समय में निर्मित होते हैं।

संसाधनों का संरक्षण

प्राकृतिक संसाधन मर्यादित हैं, जबकि मानव की आवश्यकताएँ असीमित हैं। पिछले कुछ वर्षों से तकनीकि क्षेत्र में हुए असाधारण विकास और जनसंख्या विस्फोट से संसाधनों का उपयोग खूब बढ़ गया है। इस परिस्थिति के संदर्भ में गंभीरता से नहीं विचार करेंगे तो उसके गंभीर परिणाम हमें भोगने पड़ेंगे। इसलिए भविष्य की पीढ़ियों के लिए संसाधनों का संरक्षण करना हम सबका कर्तव्य है। संसाधनों का संरक्षण अर्थात् संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग। कुछ संसाधन स्वयं निश्चित समय में अपनी पूर्ति करते हैं अथवा समाप्त नहीं होते हैं जिन्हें नवीनीकरणीय संसाधन कहते हैं। जैसे कि जंगल, सूर्यप्रकाश। एकबार उपयोग के बाद पुन: उपयोग में नहीं लिए जा सकते या बना नहीं सकते उन्हें अनवीनीकरणीय संसाधन कहते हैं। जैसे पेट्रोलियम, खनिज कोयला, प्राकृतिक गैस।

संसाधन

  • भूमि-संसाधन
  • जल-संसाधन
  • जंगल संसाधन
  • कृषि-संसाधन
  • प्राणी (वन्यजीव) संसाधन
  • खनिज संसाधन

इसके अलावा मनुष्य स्वयं भी एक संसाधन है। खनिजों को मालिकी, पुनःप्राप्यता वितरण क्षेत्र के आधार पर भी वर्गीकृत किया जाता है।

भूमि-संसाधन

जमीन निर्माण : सामान्य रूप से भू-धरातल की ऊपरी परत जिसमें वनस्पति उगती है, उसे हम जमीन कहते हैं। जमीन पृथ्वी की पपड़ी के अनेकविध कणों से बनी एक पतली परत है। चट्टानों के छोटे-बड़े टुकड़ों, कंकड़, मिट्टी के रज कण जो अजैविक हैं, उन्हें ‘रेगोलिथ’ कहते हैं। जिसमें जैविक द्रव्य हवा और पानी मिलने से ‘जमीन’ बनती है। कृषि के संदर्भ में किसी भी देश का आर्थिक विकास उस देश की जमीन की गुणवत्ता और प्रकार पर निर्भर करता है।

मिट्टी (जमीन) के प्रकार : भारतीय कृषि संशोधन परिषद (ICAR) द्वारा भारतीय जमीन को कुल आठ भागों में बाँटा गया है : (1) कांप की जमीन (2) लाल जमीन (3) काली जमीन (4) लैटेराइट जमीन (5) मरुस्थलीय जमीन (6) पर्वतीय जमीन (7) जंगलीय जमीन (8) दलदली जमीन।

मिट्टी का कटाव और संरक्षण : गतिशील पानी या हवा से मिट्टी का कटाव होता है। मिट्टी के ऊपरी कणों का तेजी से प्राकृतिक बलों द्वारा अन्यत्र स्थलांतरण होना मिट्टी का कटाव कहलाता है। ऐसा होने से कृषि की उपज में कमी होती है। जिसे रोकना चाहिए।

मिट्टी के कटाव को रोकने के उपाय : बंजर जमीन में वृक्षारोपण करना चाहिए। जहाँ ढालू जमीन है, वहाँ सीढ़ीनुमा खेत बनाकर कृषि करनी चाहिए। चेक डेम बनाने चाहिए। मिट्टी पर चरागाह प्रवृत्ति को नियंत्रण में लेना चाहिए।

भूमि-संरक्षण

भूमि संरक्षण अर्थात् मिट्टी के कटाव को रोककर, उसकी गुणवत्ता बनाए रखना। नदी की घाटियों और पहाड़ी ढलानों पर वृक्ष लगाना। रेगिस्तान के नज़दीक के क्षेत्रों में बहते पवनों को रोकने के लिए वृक्षों की श्रृंखलाएँ उगाना। अनियंत्रित चरागाह को रोकना चाहिए। उपजाऊपन खो-बैठी जमीन में पुनः सेन्द्रिय पदार्थों को मिलाना चाहिए। इसमें सबको मिलकर सामूहिक प्रयत्न करना चाहिए।

जल-संसाधन

पृथ्वी पर पीने लायक पानी की मात्रा लगभग 3 % है। पृथ्वी के एक तिहाई भाग पर जल क्षेत्र है।
जल प्रकृति से प्राप्त अनमोल भेट है। जल मानव-जीवन के प्राथमिक दैनिक जीवन की प्रवृत्तियों, उद्योगों और कृषि के लिए खूब ही उपयोगी स्रोत है। जल संसाधनों में महासागर, उपसागर, नदी, झील, भूमिगत जल आदि का समावेश होता है। पृथ्वी पर जल संसाधन का मुख्य स्रोत बरसात है। सभी जल स्रोत बरसात के आभारी हैं। पृष्ठीय जलस्रोतों में नदी, सरोवर, तालाब, झरने आदि का समावेश होता है, जिनमें मुख्य स्रोत नदी मानी जाती है।

जलसंकट

पानी प्राकृतिक उपहार है। बढ़ती जनसंख्या के लिए अनाज की बढ़ती माँग, व्यापारिक फसलें उगाने, शहरीकरण और उच्च जीवनशैली के परिणाम स्वरूप पानी की माँग निरंतर बढ़ती जाती है। पानी गंदगी की सफाई के लिए भी जरूरी है। वर्तमान समय में हमारे देश के अनेक भागों में जलसंकट बढ़ता जा रहा है। पेयजल की कमी पाई जाती है। वर्तमान समय में भूमिगतजल ट्यूबवेलों द्वारा बाहर निकालने से भूमिगत जल स्तर नीचे चला गया है। आज देश में पानी की घटती उपलब्धता और बढ़ती कमी जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

जल-संसाधनों की सुरक्षा और व्यवस्थापन

आज उपलब्ध जल मर्यादित मात्रा में है। प्रदूषित जल की विकट समस्या है। जिससे उसका विवेकपूर्ण उपयोग और उसके संरक्षण के उपाय करना अनिवार्य बन गया है। जल हमारी सामूहिक संपत्ति है। जलसंरक्षण के लिए सामान्य उपाय जैसे कि अधिक जलाशयों का निर्माण करना, भूमिगत जल को ऊपर लाने के प्रयत्न करना, नदियों के पानी को रोककर जल-संचय करने की आवश्यकता है। बरसात के पानी को रोककर संग्रह करने के उपाय भी करने चाहिए। जैसेकि बांध बनाना, शोषणकुएँ बनाना, खेत-तालाब बनाना आदि कार्य करने चाहिए। इसके अलावा लोकजागृति लाकर जल-संरक्षण में लोक भागीदारी बढ़ाना। बाग-बगीचे, शौचालयों में पानी का उपयोग मितव्ययितापूर्ण करना चाहिए। जलाशयों, नदियों को प्रदूषण से बचाना। भूमिगत जल का उपयोग करनेवाली इकाइयों पर ध्यान रखना चाहिए।

खनिज संसाधन

वर्षों पहले मनुष्य शिकार करने के लिए पत्थर से बने औजारों का उपयोग करता था। इस प्रकार मनुष्य का खनिज के साथ संबंध खूब ही प्राचीन और गहरा है। मानव-संस्कृति में मानव-विकास के युगों के नाम खनिज पर रखे गये हैं। जैसे पाषाणयुग, ताम्रयुग, कांस्ययुग, लौहयुग, वर्तमान समय को अणुयुग कहते हैं। औद्योगिक क्रांति के बाद खनिजों का महत्त्व अनेक गुना बढ़ गया है। भारत के पास पर्याप्त मात्रा में खनिज सम्पत्ति होने से विश्व के देशों के साथ कदम मिलाने के लिए आगे बढ़ रहा है।

खनिज-संरक्षण

औद्योगिक क्रांति के बाद तकनीकि और बढ़ती जनसंख्या की माँग के कारण प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग चरम सीमा तक पहुँच गया है। जिससे कुछ खनिजों के समाप्त होने का भय उत्पन्न हो गया है। खनिज सम्पत्ति का वर्तमान में खूब उपयोग होने लगा है। पेट्रोलियम जैसे खनिज पदार्थ समाप्त होने के स्तर पर आ गए हैं।
इसलिए खनिज संसाधनों का मितव्ययितापूर्ण उपयोग करना चाहिए। उनका संरक्षण एक प्रकार की बचत है। समाप्त होनेवाले खनिजों का विकल्प खोजना भी जरूरी है। जहाँ तक संभव हो खनिजों का पुन: उपयोग करने की प्रक्रिया करनी चाहिए।

वन और वन्यजीव संसाधन

मानवजीवन का अस्तित्व और प्रगति विविध संसाधनों का आभारी है। प्रकृति से हम विविध चीजें प्राप्त कर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। जिनमें जंगल अति महत्त्वपूर्ण संसाधन हैं। साथ ही वन्यजीवन भी अजीब और वैविध्यपूर्ण है। भारतीय संस्कृति में भी वनों का खूब महत्त्व दर्शाया है।

जंगलों का महत्त्व :
जंगल हमें अनेक तरह से उपयोगी है। जंगलों से प्राप्त होनेवाली साग और साल की लकड़ी इमारती लकड़ी के रूप में उपयोगी होती है। जिससे घर का फर्निचर आदि बनाया जाता है। देवदार और चीड़ की लकड़ी से खेल सामग्री बनती है। बाँस से टोकरा-टोकरी, कागज, रेयॉन आदि बना सकते हैं। जंगल से लाख, गोंद, शहद, औषधियाँ आदि हमें मिलती हैं। जंगलों में रहनेवाली प्रजा को आजीविका देते हैं।

जंगलों के आर्थिक महत्त्व के साथ पर्यावरणीय महत्त्व भी विशेष है। जंगल जलवायु को विषम बनने से रोककर नमी बनाए रखते हैं। वर्षा लाने में सहायक हैं। भूमिगत जल को टिकाए रखने में भी सहायक होते हैं तथा मिट्टी के कटाव को भी रोकते हैं। वातावरण में ऑक्सिजन और कार्बन-डायोक्साइड का संतुलन बनाए रखने में सहायक हैं।

भारत में जंगलों की मात्रा अत्यंत कम है। सबसे अधिक जंगल अंदमान-निकोबार द्वीपसमूह में तथा मिज़ोरम, मणिपुर, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश राज्यों में हैं। उत्तर-पूर्व के पर्वतीय क्षेत्रों में जंगलों की मात्रा 60 % से अधिक है। गुजरात में उसके कुल क्षेत्रफल के (स्टेट फोरेस्ट डिपार्टमेन्ट 2017-18 की रिपोर्ट के अनुसार) 11.18 % क्षेत्र में जंगल हैं। राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार कुल भू-भाग के 33 % भाग में जंगल होने चाहिए। भारत में लगभग 23 % भू-भाग पर जंगल है।

वन-संरक्षण

वर्तमान में जंगल तीव्रता से नष्ट हो रहे हैं। जंगलों की घटती संख्या विश्व की बड़ी समस्या बन गई है। वनों के घटने के अनेक कारण हैं। जैसे कि मानव की जमीन प्राप्त करने की लालसा, उद्योगों के लिए कच्चा माल प्राप्त करना, इमारती लकड़ी प्राप्त करना, शहरीकरण आदि के कारण जंगल तीव्रता से कम हो रहे हैं।

जंगलों के अंधाधुंध विनाश से पर्यावरण को कुछ गंभीर परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं : (1) प्रदूषण में वृद्धि (2) बरसात का प्रमाण घटना (3) अकाल (4) जमीन का कटाव (5) निराश्रित वन्य पशु और उनकी घटती संख्या (6) वैश्विक तापमान में वृद्धि (7) प्राकृतिक सौंदर्य का नष्ट होना आदि। भारतीय संविधान में वनों, झीलों, नदियों, वन्य प्राणियों सहित प्राकृतिक पर्यावरण का रक्षण करना और उनमें सुधार करना तथा जीवों के प्रति अनुकंपा दर्शाना नागरिक का मूलभूत कर्तव्य है। वन और वन्यजीवन को कानून द्वारा भी सुरक्षा प्रदान की गई है, इसमें सजा का भी प्रावधान किया गया है।

वन-संरक्षण के कुछ उपाय निम्नानुसार हैं :-

  • पर्यावरण-शिक्षण और पर्यावरणीय जागृति लाने से वन-संरक्षण कर सकते हैं।
  • विविध स्पर्धाओं, प्रवृत्तियों द्वारा जंगलों का महत्त्व समझाना।
  • जंगल विभाग के कार्यक्षेत्र को गुणवत्तायुक्त बनाना।
  • बंजर भूमि पर वृक्षारोपण करना।।
  • विद्यालय में इको-क्लब की रचना कर विविध प्रवृत्तियाँ करना।
  • वृक्षारोपण, वन-महोत्सव जैसे कार्यक्रमों को महत्त्व देना।

उत्सव के विविध दिन

  • 21 मार्च : विश्व वन दिवस
  • 4 अक्टूबर : वन्य प्राणी दिवस
  • 5 जून : विश्व पर्यावरण दिवस
  • 29 दिसम्बर : जैवविविधता दिवस

वन्यजीव संसाधन

भारत का वन्यजीवन वैविध्यपूर्ण है। विश्व के विविध जंतुओं और अनेक प्राणियों की प्रजातियाँ भारत में पाई जाती हैं। पक्षियों और मछलियों की प्रजाति में भी काफी वैविध्य पाया जाता है। सरीसृपों, स्तनधारियों और उभयजीवी प्राणियों में भी काफी वैविध्य पाया जाता है।

  • जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में कश्मीरी मृग, जंगली बकरी पाई जाती है।
  • उत्तराखण्ड, कर्णाटक, केरल, असम आदि राज्यों में हाथी पाया जाता है।
  • एक सिंगी गैंडा भारत का विशिष्ट प्राणी है। वह असम और पश्चिम बंगाल के दलदलीय क्षेत्रों में बसते हैं।
  • कच्छ के छोटे रेगिस्तान में और उससे लगे क्षेत्रों में घुड़खर (जंगली गधा) पाया जाता है।

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  • भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ सिंह, तेंदुआ और बाघ तीनों पाए जाते हैं। सिंह गुजरात के गीर के जंगलों में बसता है। बाघ पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्णाटक, राजस्थान, हिमालय के क्षेत्रों आदि में पाया जाता है। रोयल बंगाल टाईगर (बंगाल का बाघ) विश्व की आठ जातियों में से एक है।
  • दांता, जेसोर, विजयनगर, गुजरात के डेडियापाड़ा और रतनमहाल क्षेत्रों में भालू (रीछ) पाया जाता है।
  • भारत में बतख, तोता, काबर, कबूतर, मैना आदि जाति के पक्षी बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। गुजरात के नल सरोवर में सर्दियों में ऐसे प्रवासी पक्षी आते हैं। सुरखाब गुजरात का राज्य पक्षी है। भारत के समुद्री किनारे पर मेकरल, झिंगा, बूमला, शार्क, डोल्फिन, सालमन आदि प्रजातियों की मछलियाँ पाई जाती हैं।
  • भारत में विविध प्रकार के हिरण और साँप की अनेक प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
  • हिमालय के शीत वनों में लाल पांडा पाया जाता है।

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लुप्त होता वन्यजीवन

गुजरात के वनों में से बाघ और भारत के वनों में से तेंदुआ लुप्त हो गया है। कुछ पक्षी जिनमें गौरैया, गीध, सारस, उल्लू, घोराड़ (सोहन चिड़िया) और घड़ियाल, गंगेय डॉल्फिन जैसे प्राणी लुप्त होने के कगार पर हैं। गुजरात की नर्मदा, तापी, साबरमती आदि नदियों में पाए जानेवाले ऊदबिलाव संकट में हैं।

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वन्यजीवन संरक्षण

सदियों से वन्यजीवन संरक्षण के लिए कानून बनते रहे हैं। सम्राट अशोक द्वारा वन्यजीवन संरक्षण के लिए कानून बनवाने की जानकारी इतिहास से प्राप्त होती है। आज भी इसके लिए कानून है। अधिकांश राज्यों में ‘स्टेट वाइल्ड लाइफ’ की रचना हुई है। अन्य स्वैच्छिक संस्थाएँ भी इसके लिए कार्य कर रही हैं।

वन्यजीव संरक्षण के लिए निम्नानुसार कानूनी कदम उठाने चाहिए :

  • वन्यजीवों पर होनेवाले अत्याचार और शिकार प्रवृत्ति को रोकने के लिए कड़क अमल करना।
  • जंगल के प्राणियों की गिनती समयांतर करनी चाहिए।
  • जंगल वन्यजीवों को प्राकृतिक संरक्षण देते हैं। इसलिए जंगलों का विनाश रोकना चाहिए।
  • लोगों को वन्यजीवों का महत्त्व समझाकर वन्यजीव संरक्षण की जानकारी देनी चाहिए।
  • जंगलों में लगती आग को रोकने के शीघ्र प्रयत्न करने चाहिए।
  • वन्यजीवों को डॉक्टरी सुविधा मिले, ऐसा प्रयत्न करना चाहिए।
  • वन्यजीवों के लिए संरक्षित क्षेत्रों का विकास करना चाहिए।
  • प्रचार-प्रसार माध्यमों द्वारा जागृति लानी चाहिए।
  • वन्यजीवों के संदर्भ में वन्यजीवों की आवश्यकताएँ जैसे पानी, खुराक, प्राकृतिक आवास पर्याप्त मात्रा में मिले, ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए।

रेगिस्तान का जीवन

(1) सहारा का रेगिस्तान : सहारा का रेगिस्तान विश्व का सबसे बड़ा रेगिस्तान है। यह रेगिस्तान अधिक विशाल है।
सहारा की जलवायु गरम और शुष्क है। बरसात बहुत ही कम पड़ती है। वनस्पति रहित इस प्रदेश में दिन का तापमान 50° से तक पहुँच जाता है, तो रात्रि में 0° से नीचे तक भी हो जाता है।

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वनस्पति और प्राणीजगत

सहारा के रेगिस्तान में कंटीली वनस्पति, खजूर के वृक्ष आदि पाए जाते हैं। रेगिस्तानी प्रदेश होने से बहुत कम वनस्पति देखने को मिलती है। रेगिस्तान में खजूर के वृक्षों से घिरे रेगिस्तानी द्वीप है। लोमड़ी, लकड़बग्धा, रेगिस्तान के बिच्छू, गिरगिट, रेगिस्तानी गोह और साँप जैसे प्राणी रेगिस्तान में पाए जाते हैं।

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लोकजीवन

सहारा की विषम जलवायु में भी लोकजीवन सक्रिय पाया जाता है। जिनमें बेदुईन, तुआरेंग और बर्बर जैसी जनजाति के लोग निवास करते हैं। अधिकांक्ष लोग भेड़-बकरी और ऊँट जैसे प्राणी पालते हैं। जिनसे वे दूध, चमड़ा और ऊन जैसे उत्पाद प्राप्त करके जीवन की आवश्यक चीजवस्तुएँ जैसे कालीन, वस्त्र, गरम कंबल बनाते हैं। रेगिस्तानी क्षेत्र में आई नीलघाटी में जल उपलब्ध होने से यहाँ खजूर और गेहूँ जैसी फसलें ली जाती हैं।
सहारा के रेगिस्तानी क्षेत्र में खनिज तेल मिलता है। इसके उपरांत इन क्षेत्रों में से लोहा, फास्फोरस, मैंगेनीज और युरेनियम जैसे खनिज भी मिलते हैं। खनिजों का अधिकमात्रा में उत्पादन होने से कई क्षेत्रों के लोकजीवन में बड़े परिवर्तन होने लगे हैं। कच्चे मिट्टी के मकानों के बदले पक्के मकान और सड़क मार्ग बनने से शहरीकरण भी हो रहा है। विदेशों से भी कई लोग यहाँ के तेलक्षेत्र में रोजगार के लिए आते हैं।

(2) लद्दाख का रेगिस्तान
भारत के उत्तर में लद्दाख केन्द्रशासित प्रदेश हैं। लद्दाख भारत का ठण्डा रेगिस्तान है। जिसके उत्तर में काराकोरम पर्वत श्रेणी और दक्षिण में जास्कर पर्वत श्रेणी है। इस क्षेत्र की मुख्य नदी सिंधु है। ऊँचाई के कारण यहाँ हवा अत्यंत पतली है। और जलवायु ठण्डी और शुष्क है। यहाँ गरमी में दिन का तापमान 0° से. से ऊपर और रात्रि में –30° से. भी नीचे उतर सकता है। यहाँ बरसात की मात्रा अत्यंत ही कम रहती है।

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वनस्पति और वन्यजीवन

लद्दाख का ठण्डा रेगिस्तान शुष्क वातावरणवाला होने से वहाँ बहुत कम वनस्पति होती है। केवल छोटी घास पाई जाती है। जो पालतू प्राणियों को चराने के लिए उपयोग में ली जाती है। घाटी के प्रदेशों में देवदार और पॉप्लर (चिनार) के वृक्ष हैं। लद्दाख में पक्षियों की विभिन्न प्रजातियाँ जैसे कि देवचिड़िया, रेडस्टार्ट, चुकार, शैला, स्नो पाट्रिज, तिब्बत का स्नोकोक, रैवेन तथा हॉप पाए जाते हैं। जबकि प्राणियों में हिमतेंदुआ, लाल लोमड़ी, मर्मोट (बड़ी गिलहरी), गेरुए रंग का रीछ और हिमालयी ताहर पाए जाते हैं। दूध और माँस प्राप्त करने के लिए जंगली बकरी, भेड़ और याक जैसे प्राणी पाले जाते हैं। याक के दूध से वे पनीर बनाते हैं और भेड़-बकरी तथा याक के ऊन का उपयोग करके गरम कपड़े बनाए जाते हैं।

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लोग (लोकजीवन)

लद्दाख अपने पहाड़ी सौंदर्य और संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ अधिकांश इण्डो आर्यन, तिब्बतियन, लद्दाखी प्रजाति के लोग बसते हैं। जिनमें अधिकांश लोग बौद्ध धर्म का पालन करते हैं। लद्दाख क्षेत्र में अनेक बौद्ध मठ स्थित हैं। जिसमें हेमिस, थिक्से, रॉ आदि हैं।

गरमी की ऋतु में यहाँ जौ, आलू, मटर आदि की खेती करते हैं। महिलाएँ गृहकार्य, कृषि के साथ-साथ छोटे व्यवसाय जैसे की दुकान खोलना, गरम कपड़े बुनना आदि भी करती हैं। यहाँ तिब्बतियन संस्कृति के मोटे तौर पर फैलाव के कारण इसे ‘छोटे तिब्बत’ के रूप में भी पहचाना जाता है।

Class 7 Social Notes Chapter 14 संसाधनों की देखभाल और संरक्षण 9

यहाँ के लोग सादा और सरल जीवन जीते हैं। यहाँ के अधिकांश लोगों के रोजगार का मुख्य साधन पर्यटन है। देश-विदेश के लोग यहाँ घूमने आते हैं। यहाँ मठ, घास के मैदान और हिमनदियाँ देखने लायक हैं। साथ ही यहाँ के लोगों के उत्सव और धार्मिक अनुष्ठान देखने लायक हैं। इस तरह लद्दाख के लोगों का जीवन देखना एक अद्भुत अनुभव है।

Class 7 Social Notes Chapter 14 संसाधनों की देखभाल और संरक्षण 10

लद्दाख का मुख्य शहर लेह है। जो वायु और जमीन मार्ग से जुड़ा है। जहाँ से राष्ट्रीय राजमार्ग नं. 1A गुजरता है।
आधुनिकीकरण से यहाँ, जीवन में भी परिवर्तन आने लगा है। इसके उपरांत यहाँ लोग प्रकृति के साथ कदम मिलाकर चलते हैं। प्राकृतिक वस्तुओं का खूब मितव्ययिता से उपयोग करके अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

Class 7 Social Notes Chapter 14 संसाधनों की देखभाल और संरक्षण 11

(3) कच्छ का रेगिस्तान

गुजरात राज्य के उत्तर-पश्चिम में कच्छ का रेगिस्तान है। कच्छ के रेगिस्तान के पश्चिम में पाकिस्तान देश तथा उत्तर-पूर्व में राजस्थान राज्य है। इसके दो भाग हैं : छोटा और बड़ा रेगिस्तान। ऐसा प्रतीत होता है कि महाद्वीपीय शेल्फ ऊपर उठने से बना है। गुजरात के कच्छ जिला में स्थित रेगिस्तान थार के रेगिस्तान का एक भाग है। यहाँ सफेद रेगिस्तान भी है। यहाँ की जलवायु गरम और शुष्क है।

वनस्पति और प्राणीजीवन

कच्छ के रेगिस्तान में ‘बन्नी’ क्षेत्र है। यहाँ विविध प्रकार के घास और कंटीली झाड़ियाँ पाई जाती हैं। कच्छ के रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकने के लिए बबूल के वृक्ष लगाए गए हैं।

कच्छ के बड़े रेगिस्तान में सुरखाब (फ्लेमिंगो) पाया जाता है। इसके उपरांत लावरी, घोराड़, कुंज, सारस आदि अन्य पक्षी पाए जाते हैं। घोराड़ पक्षी लुप्त होने की कगार पर है। यहाँ घुड़खर (जंगली गधा), नीलगाय, सुनहरी लोमड़ी, जंगली बिल्ली, भेड़िया, बिल्ली, लकड़बग्धा, चिंकारा, कलियार (कृष्णमृग) आदि भी पाए जाते हैं।

लोक जीवन

कच्छ का लोकजीवन वैविध्यपूर्ण है। यहाँ के लोग भेड़-बकरी, ऊँट, गाय-भैंस, गधा जैसे प्राणियों का पालन करते हैं। समुद्री किनारे के लोग जलपरिवहन, मछली पकड़ने, झींगा पकड़ने के व्यवसाय से रोजगारी प्राप्त करते हैं। कई क्षेत्रों में विशिष्ट जलवायु होने से खजूर, अनार, नारियल और कच्छी केसर आम की फसल ली जाती है। यहाँ की मुख्य फसल बाजरी है।

कच्छ के कुछ लोग विशिष्ट भरतकार्य (दस्तकारी) और हस्तकला के व्यवसाय से जुड़े हैं। आधुनिक उद्योगों के विकास से रोजगारी भी बढ़ जाती है। यहाँ पर्यटन उद्योग भी खूब तेजी से विकसित हो रहा है। जिसमें से भी अनेक लोग रोजगार प्राप्त करते हैं। कच्छ की भौगोलिक समतल परिस्थिति होने से पैरा ग्लाइडिंग जैसी साहसिक प्रवृत्तियाँ विकसित हो रही हैं।

Class 7 Social Notes Chapter 12 वातावरण का सजीवों पर प्रभाव

वातावरण का निर्माण

पृथ्वी, सूर्य से अलग हुई है, ऐसा माना जाता है। जब इसका उद्भव हुआ तब आग के गोले के रूप में थी। यह गरम गोला धीरे-धीरे ठण्डा होने लगा। ठण्डा होने पर इसमें रहे तत्त्व द्रव, ठोस और गैस-स्वरूप में रूपांतरित होने लगे। जिन तत्त्वों का ठोस स्वरूप में रूपांतरण हुआ, उन्हें हम मृदावरण के रूप में पहचानते हैं। द्रव तत्त्व को जलावरण के रूप में पहचानते हैं तथा गैस स्वरूप में रूपांतरित हुए, उन्हें वातावरण के रूप में पहचानते हैं।

वातावरण

पृथ्वी के चारों तरफ फैले हवा के आवरण को वातावरण कहते हैं। यह पृथ्वी के धरातल से सैकड़ों किलोमीटर की ऊँचाई तक फैला है। इसकी ऊपरी सीमा कितनी ऊँचाई तक है, यह कहना मुश्किल है। इसके उपरांत अवकाश में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव जहाँ तक है वहाँ तक वातावरण माना जाता है। पृथ्वी के धरातल से 32 किमी की ऊँचाई तक के वातावरण में 99 % जितनी हवा समाई होती है। पृथ्वी के धरातल से जैसे-जैसे ऊँचाई में जाते हैं वैसे-वैसे हवा पतली होती जाती है।

वातावरण की गैसें

वातावरण के बिना पृथ्वी पर जीवसृष्टि का अस्तित्व संभव नहीं है। वातावरण गैस, द्रव और ठोस तत्त्वों का बना है। जिनमें ऑक्सिजन और नाइट्रोजन गैस जीवसृष्टि के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। वातावरण में कोहरा, ओस, बादल आदि वातावरण में रहे पानी के स्वरूप हैं। द्रव तत्त्वों में मुख्यतः बरफ के कण, जीवजंतु आदि है। वातावरण पृथ्वी को दिन में गरमी और रात्रि में अतिशय ठण्डी से बचाता है।

Class 7 Social Notes Chapter 12 वातावरण का सजीवों पर प्रभाव 1

वातावरण में स्थित गैसों की मात्रा पास के कोष्ठक में दर्शाई गई है। नाइट्रोजन लगभग 130 किलोमीटर तक पाई जाती है, जबकि ऑक्सिजन लगभग 110 किलोमीटर और कार्बन डाईऑक्साइड लगभग 20 किलोमीटर तक पाई जाती है। जबकि 130 किलोमीटर की ऊँचाई के बाद के वातावरण में हाइड्रोजन और हिलियम की मात्रा अधिक है।

वातावरण की स्तररचना

वातावरण को पृथ्वी के धरातल से ऊँचाई की तरफ जाने से तापमान और गैसों की संरचना में होनेवाले परिवर्तनों के आधार पर अलग-अलग आवरण अथवा स्तरों में विभाजित किया गया है। इस परिवर्तन के आधार पर उसके चार उपविभाग किए गए हैं : (1) क्षोभ-आवरण (2) समताप-आवरण (3) मध्यावरण (4) उष्मावरण (तापमण्डल)

(1) क्षोभ-आवरण : पृथ्वी से लिपटे वातावरण का प्रथम आवरण क्षोभ-आवरण है। विषुववृत्त पर यह लगभग 16 किमी, समशीतोष्ण कटिबंध प्रदेशों में लगभग 12 किमी और ध्रुवों पर लगभग 8 किमी ऊँचाई तक फैला है। ऋतुओं के अनुसार इसमें परिवर्तन होता है। यह आवरण जीव सृष्टि के लिए अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण है। वातावरण के तूफान, आवाज की तरंगें, वायु की संरचना, बिजली, बरसात, बादल आदि इस आवरण में अनुभव किए जाते हैं। इस आवरण में प्रति 1 किमी की ऊँचाई पर लगभग 6.5° से की दर से तापमान घटता है, जब ऊँचाई बढ़ने पर तापमान घटना बंद हो जाता है तो उस सीमा को ‘क्षोभ-सीमा’ कहते हैं।

(2) समताप-आवरण/मण्डल : क्षोभ सीमा के ऊपर के आवरण को समताप आवरण कहते हैं जो क्षोभ-सीमा से लगभग 50 किमी की ऊँचाई तक फैला है। ऊँचाई के साथ इस आवरण में ऋतुएँ, बादल, बरसात, चक्रवात आदि नहीं पाए जाते। यहाँ वायु स्वच्छ और पतली होती है, जिससे जेट विमानों को कम अवरोध और तेजी से उड़ा सकते हैं। इस आवरण में लगभग 15 से 35 किमी की ऊँचाई पर ओजोन गैस की मात्रा अधिक पाई जाती है, जो सूर्य की अत्यंत गरम पराबैगनी किरणों (Ultra Violet Rays) का शोषण करती हैं।

(3) मध्यावरण : समताप आवरण के ऊपर लगभग 80 किमी ऊँचाई तक के वातावरण के भाग को ‘मध्यावरण’ कहते हैं। जिसमें ऊँचाई पर जाने पर तापमान घटता जाता है।

(4) उष्मावरण : यह आवरण, मध्यावरण के ऊपर स्थित है। 80 किमी से शुरू हो करके जहाँ वातावरण पूरा होता है वहाँ तक फैला है। यहाँ वायु अतिशय पतली होती है। जैसे-जैसे ऊँचाई पर जाते हैं वैसे-वैसे तापमान बढ़ता जाता है। इस आवरण को दो उपविभागों में बाँटा गया है : आयनावरण और बाह्यावरण। आयनावरण में से रेडियोतरंगों का परावर्तन होता है। टी.वी., रेडियो-प्रसारण, इन्टरनेट का लाभ इस आवरण का आभारी है। आयनावरण के ऊपर के आवरण को बाह्यावरण कहते हैं।

Class 7 Social Notes Chapter 12 वातावरण का सजीवों पर प्रभाव 2

मौसम

मौसम अर्थात् अल्प समय की वातावरण की औसत परिस्थितियाँ। किसी भी प्रदेश का मौसम, तापमान, नमी, बरसात, वायु का दबाव, कोहरा तथा बादलों के आधार पर निश्चित होता है। मौसम प्रातः, दोपहर, सायंकाल अथवा रात्रि का अलग हो सकता है। मौसम वातावरण की कम समय की परिस्थिति होता है जिसमें समयांतर परिवर्तन होता रहता है। प्रात:काल ठण्डी, दोपहर में गरमी और शाम को बरसात होना, ऐसा मौसम में संभव है। मौसम से हमारा जीवन और हमारी प्रवृत्तियाँ प्रभावित होती हैं, देश का मौसम विभाग मौसम के समाचार और नक्शे प्रतिदिन प्रकाशित करता है।

जलवायु

सामान्यरूप किसी प्रदेश की 35 वर्ष या उससे अधिक वर्षों की मौसम की औसत दशाओं को जलवायु कहते हैं। जलवायु स्थानीय परिस्थिति (तापमान, नमी, बरसात, वायुदाब, जलवाष्प) को ध्यान में रखकर निश्चित की जाती है। जलवायु किसी प्रदेश की सजीव सृष्टि, प्राणी सृष्टि और मानवजीवन तथा ऐसी प्रवृत्तियों को प्रभावित करती है।

तापमान

हवा में रही गरमी के स्तर को तापमान कहते हैं। वातावरण के तापमान में दिन और रात्रि के दरमियान परिवर्तन होता है। तापमान, ऋतुओं के अनुसार भी बदलता है। सर्दियों की तुलना में गर्मियों में तापमान अधिक होता है।
सूर्यताप (Insolation) तापमान के वितरण को प्रभावित करनेवाला महत्त्वपूर्ण कारक है। सूर्यताप की मात्रा विषुववृत्त से ध्रुवों की तरफ घटती है। इस कारण ध्रुवप्रदेश बर्फ से ढके होते हैं। यदि पृथ्वी पर तापमान बढ़ जाए तो कृषि फसलें उग नहीं सकतीं। शहरों में गाँवों की तुलना में अधिक तापमान होता है। इसका कारण पक्की सड़कें और सीमेन्ट की बनी इमारतें होती हैं।

वायुमण्डलीय दबाव

पृथ्वी के आसपास हवा के स्तर का वजन होता है। हवा का विशाल स्तर उसके वजन के अनुसार पृथ्वी के धरातल पर दबाव डालता है, उसे वायुमण्डलीय दबाव कहते हैं। समुद्रतल पर वातावरण का दबाव सबसे अधिक होता है। पृथ्वी के धरातल से ऊँचाई पर जाने पर वायु दाब घटता है। अधिक तापमानवाले प्रदेशों में वायु गरम होकर ऊपर की तरफ गति करती है और हल्का वायुदाब रचती है। हल्का दबाव बादल और नमीयुक्त ऋतु के साथ जुड़ा है। कम तापमानवाले प्रदेशों में वातावरण ठण्डा होता है इसलिए वहाँ भारी दबाव होता है।

पवन

पृथ्वी के आसपास स्थित गतिशील वायु को पवन कहते हैं। सामान्य रूप से पृथ्वी पर निर्मित होते हवा के हल्के, भारी दबाव हैं, जिसके मुख्य तीन प्रकार है : (1) स्थायी पवन (2) मौसमी पवन (3) दैनिक/स्थानीय पवन।

Class 7 Social Notes Chapter 12 वातावरण का सजीवों पर प्रभाव 3

(1) स्थायी पवन : पृथ्वी के धरातल पर कुछ भागों में बारहों मास निश्चित दिशा में पवन चलती है, जिन्हें स्थायी पवन कहते हैं। स्थायी पवनों में व्यापारिक पवन, पश्चिमीय पवन और ध्रुवीय पवन का समावेश होता है।

(2) मौसमी पवन : पृथ्वी के धरातल पर कुछ पवनें ऋतु के अनुसार चलती हैं और उनकी दिशा ऋतु के अनुसार बदलती है, जिन्हें मौसमी पवन कहते हैं। भारत, म्यानमार, बाँग्लादेश जैसे देशों में ऐसी पवनें चलने से इन्हें मौसमी पवनों का देश कहा जाता है। गरमी में नैऋत्य की पवनें और सर्दी में इशान कोणीय पवनें इस प्रकार की पवनों के उदाहरण हैं।

(3) दैनिक/स्थानीय पवन : पृथ्वी के कुछ प्रदेशों में कम समय के लिए वायु दाब में होनेवाले परिवर्तन के कारण उद्भव होनेवाली पवनों को दैनिक/स्थानीय पवनें कहते हैं। स्थानीय पवनों के उदाहरण के तौर पर समुद्री-जमीन की लहरें, पर्वत और घाटी की लहरें, लू और शीतलहर आदि हैं।

नमी

समुद्रों और जलाशयों में से पानी का वाष्पीभवन होने से उनका जलवाष्प में रूपांतरण होता है, जिसे नमी कहते हैं। नमी पृथ्वी के धरातल से वाष्पीभवन की क्रिया द्वारा वातावरण में मिलती है। वातावरण में रही नमी घनीभवन की प्रक्रिया द्वारा बादल बनकर बरसात के रूप में पृथ्वी के धरातल को पुनःप्राप्त होती है।

जलवायु और मानव जीवन

  • किसी भी प्रदेश की जलवायु का आहार, पोशाक और आवास आदि पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
  • अधिक वर्षावाले क्षेत्रों में घरों की छतें तीव्र ढालवाली होती हैं, जबकि कम वर्षावाले क्षेत्रों में मकान कम ढालवाले समतल छतवाले होते हैं।
  • किसी भी प्रदेश में उत्पन्न होनेवाली कृषि उपज उस प्रदेश के लोगों की मुख्य खुराक होती है। उदा. मैदानी प्रदेश के लोगों की खुराक में गेहूँ और पर्वतीय लोगों की खुराक में मकई का उपयोग अधिक होता है।
  • जिस प्रदेश में ठण्डी अधिक पड़ती है, वहाँ के लोग पूरा शरीर ढके ऐसे गरम ऊनी वस्त्रों का उपयोग करते हैं। उदाहरण, लद्दाख के लोग।
  • गरम प्रदेशों के लोग सूती और खुले (ढीले) वस्त्रों का उपयोग करते हैं। उदाहरण – दक्षिण भारत के लोग।
  • रेगिस्तानी प्रदेश के लोग निरंतर उड़ती रेत से बचने के लिए सिर पर रूमाल अथवा कपड़ा लपेटते हैं। उदा. अरब के लोग।
  • गरम और नमीवाली जलवायु के क्षेत्रों में मानव स्वभाव आलसी, जबकि समशीतोष्ण कटिबंध के प्रदेशों में जलवायु खुशनुमा होने से लोगों की कार्यक्षमता अधिक होती है।
  • मौसमी जलवायु के प्रदेशों में वर्षा ऋतु के अलावा अन्य समय में विविध सामाजिक प्रसंगों का आयोजन अधिक होता है।

प्राकृतिक वनस्पति और प्राणीसृष्टि

प्राकृतिक वनस्पति की वृद्धि का आधार जमीन, तापमान और नमी होती है। इसके उपरांत ढालवाले और मिट्टी की ऊँचाई । मिट्टी के आधार की मोटाई भी प्राकृतिक वनस्पति की वृद्धि को प्रभावित करती है। इन घटकों में रही विभिन्नता के कारण किसी भी प्रदेश की प्राकृतिक वनस्पति की सघनता और प्रकार में अंतर होता है।

प्राकृतिक वनस्पति का मुख्य तीन विभागों में वर्गीकरण किया गया है :

  1. जंगल : वनस्पति अनुकूल तापमान और बरसाती प्रदेशों में उगती है। तापमान और बरसात के आधार पर सघन अथवा छुट-पुट जंगल पाए जाते हैं।
  2. घास के मैदान : ये मध्यम वर्षावाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
  3. कंटीली वनस्पति और झाड़ियाँ : शुष्क और कम बरसातवाले प्रदेशों में ऐसी वनस्पति पाई जाती है।

प्राकृतिक वनस्पति के प्रकारों में इस अंतर का मुख्य कारण जलवायु में अंतर है। अब हम विश्व की प्राकृतिक वनस्पतियों और उनमें पाए जानेवाले मुख्य प्राणियों की जानकारी प्राप्त करेंगे।

जंगलों के प्रकार

(1) उष्णकटिबंधीय बारहमासी हरेभरे जंगल : इन जंगलों को उष्णकटिबंधीय बरसाती जंगल भी कहते हैं। ये घने जंगल विषुववृत्त और उष्णकटिबंध में पाए जाते हैं। इस क्षेत्र की जलवायु गरम और पूरे वर्ष वर्षा के कारण नमीवाली होती है। इस प्रदेश के वृक्षों के पत्ते एक साथ ना गिरकर, पूरे वर्ष हरेभरे रहते हैं, उन्हें बारहमासी हरे जंगल कहते हैं। इन जंगलों में रोज़वुड़, आबनूस, मोहगनी आदि वृक्ष पाए जाते हैं। भारत में अंदमान-निकोबार द्वीपसमूह में इस प्रकार के जंगल पाए जाते हैं।

(2) उष्णकटिबंधीय पतझड़ जंगल : उष्णकटिबंधीय पतझड़ जंगलों को मानसूनी जंगल भी कहते हैं। इस प्रदेश में जलवायु गरम और वर्षा की मात्रा कम होती है। गरमी की ऋतु में 6 से 8 सप्ताह के दरमियान वनस्पति के पत्ते झड़ जाते हैं इसलिए इन्हें पतझड़ या मानसूनी जंगलों के रूप में पहचाना जाता है। इन जंगलों में मजबूत और इमारती लकड़ीवाले वृक्ष जैसे साग, साल, नीम, शीशम आदि होते हैं। ये जंगल भारत में पठारी प्रदेश, पर्वतीय प्रदेश, उत्तर ऑस्ट्रेलिया और मध्य अमेरिका के अधिकांश भाग में इस प्रकार की वनस्पति पाई जाती है। इन जंगलों में बाघ, एशियाई सिंह, हाथी, बंदर, सुनहरे बंदर आदि प्राणी पाए जाते हैं। इस क्षेत्र में मोर, बाज, तोता, काबर (माया), कबूतर, मैना आदि पक्षी बड़ी संख्या में पाए जाते हैं।

(3) समशीतोष्ण सदाबहार जंगल : इस प्रकार के प्रदेश में तापमान सम और वर्षा अधिक मात्रा में पड़ती है। इस प्रदेश में बारहों मास जंगल हरेभरे रहते हैं। ये जंगल दक्षिण-पूर्व अमेरिका, दक्षिण चीन और दक्षिण-पूर्व ब्राजील में तथा भारत के उत्तर-पूर्व पर्वतीय प्रदेशों में पाए जाते हैं। इन जंगलों में बांस, चीड़ और नीलगिरि जैसी मुख्य वनस्पतियाँ होती हैं। इन जंगलों में हाथी, एक सिंगी गैंडा आदि प्राणी पाए जाते हैं।

(4) समशीतोष्ण पतझड़ के जंगल : इस प्रकार के जंगल कर्कवृत्त के उत्तर और मकरवृत्त के दक्षिण के प्रदेशों में पाए जाते हैं। ये जंगल उत्तर-पूर्वी अमेरिका, चीन, न्यूजीलैण्ड, चिली और पश्चिम यूरोप तथा उत्तर भारत में भी पाए जाते हैं। इन जंगलों में ऑक, मेपल जैसी मुख्य वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। इन जंगलों में हिरण, लोमड़ी, भेड़िया जैसे प्राणी पाए जाते हैं।

(5) भूमध्यसागरीय जंगल : ये जंगल भूमध्यसागर के नज़दीक के प्रदेशों में पाए जाते हैं। जो अधिकांश यूरोप, अफ्रीका, एशिया महाद्वीपों में पाए जाते हैं। इस प्रदेश की जलवायु गरमी में गरम-शुष्क, सर्दी में ठण्डी और नमीवाली होती है। इस प्रदेश में खट्टे फलों की वनस्पति संतरा, अंजीर, ऑलिव (जैतून), अंगूर आदि मुख्य पाए जाते हैं।

(6) शंकुद्रुम जंगल : शीत जलवायुवाले प्रदेश लगभग 50° उत्तर से 70° उत्तर अक्षाशों के प्रदेश तथा ऊँचे पर्वतीय प्रदेश में इस प्रकार के जंगल पाए जाते हैं। इन जंगलों की वनस्पति आकार में शंकु जैसी होती है। इन जंगलों में चीड़, देवदार, फर आदि मुख्य वनस्पतियाँ हैं। इन वनस्पतियों की लकड़ी मुलायम और हल्की होती है। ये कागज, दियासलाई तथा पैकिंग के लिए अधिक उपयोगी है। इस प्रदेश में बंदर, ध्रुवीय भालू, कस्तूरी मृग, याक आदि पाए जाते हैं।

Class 7 Social Notes Chapter 12 वातावरण का सजीवों पर प्रभाव 4

घास के मैदान

(1) उष्ण कटिबंधीय घास के मैदान : इस प्रदेश की जलवायु गरम है। यहाँ बरसात मध्यम से कम पड़ती है। यहाँ 3 से 4 मीटर जितनी ऊँची घास होती है। अफ्रीका का सवाना का घास का मैदान विश्वभर में प्रसिद्ध है। इस प्रदेश में सिंह, चीता, हाथी, जेब्रा, जिराफ, हिरण मुख्य प्राणी पाए जाते हैं।

(2) समशीतोष्ण घास के मैदान : सम जलवायुवाले महाद्वीपों के मध्यभाग के प्रदेशों में छोटी और पौष्टिक घास होती है। इस प्रदेश में जंगली भैंस, बायसन और काले हिरन जैसे प्राणी पाए जाते हैं। गुजरात में भावनगर में वेलावदर और कच्छ के बन्नी क्षेत्र में इस प्रकार की घास होती है।

कंटीली वनस्पति और झाड़ियाँ

रेगिस्तानी जलवायु गरम और शुष्क होती है। इस प्रदेश में वनस्पति कम पाई जाती है। जलवायु के साथ अनुकूलता साधने के लिए वनस्पति कंटीली होती है। इस क्षेत्र में बेर, थुअर (नागफनी), बबूल, खेजड़ी आदि वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। इस प्रदेश में ऊँट, लोमड़ी, झरख (लकड़बग्धा) जैसे प्राणी पाए जाते हैं। कच्छ के छोटे रेगिस्तान में पाया जानेवाला प्राणी घुड़खर विश्व में बेजोड़ है। इसके उपरांत बड़े रेगिस्तान में दलदलकीचड़वाले क्षेत्रों में सुरखाव पक्षी पाए जाते हैं। यहाँ प्रवासी पक्षी भी आते हैं। इस प्रदेश में साँप और बिच्छू भी पाए जाते हैं।

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इसके उपरांत ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में ठण्डी और शुष्क जलवायुवाले प्रदेशों में झाड़ियाँ और छोटी घास होती है। हिमालय और लद्दाख में ऐसी वनस्पति पाई जाती है। यहाँ हिमतेंदुआ, चीता, पान्डा आदि प्राणी पाए जाते हैं। कश्मीर में पश्मिनो बकरी पाई जाती है।

Class 7 Social Notes Chapter 10 पृथ्वी की आंतरिक संरचना और भूमि-स्वरूप

हमारी पृथ्वी एक ऐसा ग्रह है कि जिस पर विकसित जीवन देखने को मिलता है। अन्य अवकाशी पिंडों की तरह पृथ्वी का आकार भी गोलाकार है। उसमें अंदर और बाहर निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं। क्या हमने कभी ऐसा सोचा कि पृथ्वी के आंतरिक भाग में क्या होगा? पृथ्वी किन पदार्थों से बनी है?

पृथ्वी का आंतरिक भाग या भूगर्भ (Interior of the Earth)

पृथ्वी प्याज की तरह एक के ऊपर एक व्यविस्थत अनेक स्तरों से बनी है।
पृथ्वी की सतह के सबसे ऊपरी स्तर को ‘भूकवच’ कहते हैं। यह सबसे पतला स्तर होता है। यह भूमिखंड पर लगभग 35 किलोमीटर तक होता है। भूमिखंड की सतह विशेष करके सिलिका और एल्युमिना जैसे खनिजों से बना है, इसीलिए उसे सियाल (सि – सिलिका तथा एल – एल्युमिना) कहा जाता है।
महासागर का कवच मुख्य रूप से सिलिका और मैग्नेशियम से बना है, इसलिए उसे ‘सिमा’ (सि – सिलिका तथा मा – मैग्नेशियम) कहा जाता है।

Class 7 Social Notes Chapter 10 पृथ्वी की आंतरिक संरचना और भूमि-स्वरूप 1

इस कवच के ठीक नीचे मेन्टल होता है, जो लगभग 2900 किलोमीटर की गहराई तक फैला होता पपड़ी है। पृथ्वी का सबसे आंतरिक स्तर भूगर्भ है। जिसकी त्रिज्या लगभग 3500 किलोमीटर है। जो खास करके निकल और फेरस (लोहा) का बना होता है, इसलिए इसे निफे (नि – निकल; फे – फेरस) कहते हैं। केन्द्रीय भूगर्भ में तापमान, दबाव और पदार्थों का घनत्व खूब अधिक होता है।

चट्टान और खनिज (Rocks and Minerals)

चट्टानों के प्रकार अपने गुण, कण के आकार और अपनी निर्माण प्रक्रिया के आधार पर अलग-अलग होती हैं। निर्माण प्रक्रिया की दृष्टि से चट्टानें तीन प्रकार की होती हैं :

(i) अग्निकृत चट्टान (Igneous Rock) :
गरम मैग्मा ठंडा होकर ठोस बन जाता है। इस प्रकार बनी चट्टानों को अग्निकृत चट्टान कहते हैं। अग्निकृत चट्टानें दो प्रकार की होती हैं : आंतरिक चट्टान और बाह्य चट्टान।

क्या आप ज्वालामुखी से निकलनेवाले लावा की कल्पना कर सकते हैं? वास्तव में आग की तरह एकदम लाल तरल मैग्मा ही लावा है, जो पृथ्वी के आंतरिक भाग में से निकलकर धरातल पर फैल जाता है। जब तरल लावा धरातल पर आता है तब तेजी से ठंडा होकर जम जाता है। भूकवच पर दिखाई देनेवाली चट्टानों को बाह्य अग्निकृत चट्टान कहते हैं। उसकी संरचना खूब छोटी दानेदार होती है, जैसे कि बेसाल्ट। तरल मैग्मा कभी-कभी भूकवच के अंदर गहराई में ही ठंडा हो जाता है। इस तरह बनी ठोस चट्टानों को आंतरिक अग्निकृत चट्टान कहते हैं। धीरे-धीरे लावा ठंडा होने के कारण बड़े दाने का स्वरूप धारण करता है। उदाहरण स्वरूप ग्रेनाइट चट्टान। चक्की में अनाज या मसाले को पीसने के लिए ज्यादातर ग्रेनाइट पत्थरों का उपयोग किया जाता है।

(ii) अवसादी (परतदार) चट्टान (Sedimentary Rock) :
चट्टाने घिसकर, टकराकर छोटे-छोटे कणों में बदल जाती हैं। यह अवसाद या मलबा पवन, हवा, पानी आदि के द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पहुँचता है और एकत्रीकरण होता है। यह निक्षेपित चट्टानें दबकर और जमकर चट्टानों की परतें बनाती हैं। इस प्रकार की चट्टानों को परतदार चट्टान कहते हैं। उदाहरण स्वरूप रेतीले पत्थर रेत के कणों से बनते हैं। इन चट्टानों में वनस्पति, प्राणी और सूक्ष्म जीव जो कभी-कभी इन चट्टानों में देखने को मिलते हैं, वे जीवाश्मि भी बनते हैं।

(iii) रूपांतरित चट्टान (Metamorphic Rock) :
अग्निकृत और अवसादी चट्टानें उच्च तापमान और अतिशय दबाव के कारण रूपांतरित चट्टानों में बदल जाती हैं, ऐसी चट्टानों को ‘रूपांतरित चट्टान’ कहते हैं। उदाहरण स्वरूप चिकनी मिट्टी स्लेट में और चूना पत्थर संगमरमर में बदल जाता है।

Class 7 Social Notes Chapter 10 पृथ्वी की आंतरिक संरचना और भूमि-स्वरूप 2

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि कुछ निश्चित परिस्थितियों में एक प्रकार की चट्टान चक्रीय-पद्धति से एक-दूसरे में परिवर्तित हो जाती है। एक चट्टान में से दूसरी चट्टान में परिवर्तित होने की इस क्रिया को चट्टानचक्र कहते हैं। आप जानते हैं कि तरल मैग्मा ठंडा होकर अग्निकृत चट्टान बन जाता है। ये अग्निकृत चट्टानें छोटे-छोटे टुकड़ों के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होकर परतदार (अवसादी) चट्टानों का निर्माण करती हैं। तापमान और दबाव के कारण अग्निकृत और परतदार चट्टान रूपांतरित चट्टान में बदल जाती है। अतिशय तापमान और दबाव के कारण रूपांतरित चट्टानें पुनः पिघलकर तरल मैग्मा बन जाती हैं। यह तरल मैग्मा फिर ठंडा होकर अग्निकृत चट्टानों में बदल जाता है।

हमारे लिए चट्टानें खूब उपयोगी हैं। ठोस चट्टानों का उपयोग सड़क, मकान और ईमारतों को बनाने में किया जाता है।
चट्टानें विविध खनिजों में से बनती हैं। खनिज प्राकृतिक रूप से मिलनेवाला पदार्थ है, जिसमें निश्चित भौतिक गुणधर्म और निश्चित रासायनिक मिश्रण होता है। खनिज मानव के लिए खूब उपयोगी हैं। कुछ का उपयोग ईंधन के रूप में होता है; जैसे कि कोयला, प्राकृतिक गैस, खनिज तेल और पेट्रोलियम। उनका उपयोग विविध उद्योगों और औषधि बनाने में भी होता है; जैसे कि लोहा, एल्यूमिनियम, सोना, यूरेनियम आदि।

भूमि-स्वरूपों का निर्माण

मृदावरण अनेक भूतख्ती में विभाजित है, जिसे मृदावरणीय भूतख्ती (प्लेट) कहते हैं। आप यह जानकर आश्चर्य चकित होंगे कि भूतख्तियाँ (प्लेटें) अलग-अलग दिशा में खिसकती रहती हैं अर्थात् वर्ष दौरान पृथ्वी में मात्र कुछ सेन्टीमीटर पिघले मैग्मा में होनेवाली गति के कारण ऐसा होता है। पृथ्वी के गर्भ में पिघला मैग्मा वृत्ताकार रूप में घूमता रहता है।

प्लेटों की गति के कारण पृथ्वी की सतह में परिवर्तन होते हैं। पृथ्वी की गति को इन बलों के आधार पर विभाजित किया जाता है, जिनके कारण यह गति उत्पन्न होती है। वह बल पृथ्वी के आंतरिक भाग में निर्मित होता है, जिसे आंतरिक बल (इंडोजेनिक फोर्स ) कहते हैं और जो बल पृथ्वी की सतह पर उत्पन्न होता है, उसे बाह्यबल (एक्सोजेनिक फोर्स) कहते हैं।

आंतरिक बल कभी आकस्मिक गति पैदा करता है तो कभी धीमी गति। भूकंप और ज्वालामुखी जैसी आकस्मिक गति के कारण पृथ्वी की सतह पर परिवर्तन होते हैं। भूकवच पर एक छिद्र खुलता है और उसमें से पिघला पदार्थ अचानक निकलने लगता है, उसे ज्वालामुखी कहते हैं।

इस तरह, मृदावरणीय भू-तख्ती (प्लेटों) की गतिशीलता से पृथ्वी की सतह पर कंपन होता है। यह कंपन उसके केन्द्र के चारों ओर होता है, इस कंपन को ‘भूकंप’ कहते हैं। भूकवच के नीचे जिस स्थान से कंपन की शुरुआत होती है, उसे ‘उद्गम केन्द्र’ कहा जाता है। यह कंपन उद्गम केन्द्र के बाहर की तरफ तरंग रूप में गति करता है। उद्गम केन्द्र के निकट की सतह के केन्द्र को ‘अधिकेन्द्र’ कहते हैं। अधिकेन्द्र (निर्गमन केन्द्र) के सबसे निकट के भाग में सबसे अधिक नुकसान होता है और अधिकेन्द्र से अंतर बढ़ने के साथ भूकंप की तीव्रता धीरे-धीरे कम हो जाती है।

फिर भी भूकंप का पूर्वानुमान संभव नहीं है। यदि हम पहले से ही सावधानी रखें तो उसके प्रभाव को निश्चित रूप से कम कर सकते हैं।
स्थानीय लोग कई सामान्य पद्धति से भूकंप की संभावना का अनुमान करते हैं, जैसे कि प्राणियों के व्यवहार का अध्ययन, तालाब की मछलियों का तेजी से इधर-उधर भागना, सरीसृपों का पृथ्वी की सतह पर आना आदि।

मुख्य भूमि-स्वरूप : अपक्षय यह अपरदन (कटाव), परिवहन और निक्षेपण जैसी प्रक्रिया द्वारा भू-सतह निरंतर बदलती रहती है। पृथ्वी की सतह पर चट्टानों के टूटने से अपक्षय की क्रिया होती है। भू-सतह पर जल, पवन और हिम जैसे विभिन्न घटकों द्वारा होनेवाले क्षय को अपक्षय कहते हैं। पवन, जल वगैरह अपक्षय युक्त पदार्थों को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाते हैं, इसे परिवहन कहते हैं और उन पदार्थों का अन्यत्र निक्षेपण (जमा) करते हैं। अपक्षय से निक्षेपण तक की यह प्रक्रिया पृथ्वी की सतह पर विभिन्न भूमि-स्वरूपों का निर्माण करती है।

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नदी का कार्य : नदी के पानी से जमीन का अपक्षय (टूट-फूट) होता है। जब नदी कठोर चट्टान पर से ऊँचाई से खड़े ढाल के सहारे घाटी या निचली भूमि पर गिरती है, तब उसे जलप्रपात या झरना कहते हैं।

जब नदी मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती है तब वह मोड़वाले मार्ग पर बहने लगती है। नदी के इन बड़े मोड़ों को सर्पाकार वहनमार्ग कहते हैं। उसके बाद सर्पाकार वहनमार्ग के किनारों पर निरंतर अपक्षय और निक्षेपण शुरू हो जाता है। सर्पाकार मोड़ धीरे-धीरे अत्यंत नज़दीक आ जाते हैं। जिससे वे लगभग घोड़े की नाल के आकार के या वृत्ताकार दिखाई देते हैं। इस अवस्था में जब नदी में बाढ़ आती है तब निक्षेपण से मोड़ के बीच के भूभाग नदी के प्रवाह से कट जाते हैं। फिर नदी अपने लंबे मार्ग को छोड़कर सीधा मार्ग बना लेती है। नदी द्वारा छोड़े गए नलाकार भाग में पानी रह जाता है, उसे नलाकार सरोवर कहते हैं। कभी-कभी नदी अपने किनारों से बाहर बहने लगती है। परिणाम स्वरूप आसपास के क्षेत्रों में काँप और अन्य पदार्थों का निक्षेपण करती है, उसे बाढ़ का मैदान कहते हैं। इससे समतल उपजाऊ बाढ़ के मैदान का निर्माण होता है। जब नदी के दोनों किनारे अधिक मात्रा में काँप-मिट्टी के

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निक्षेपण से लंबे और कम ऊँचाई के अनेक ढेर बन जाते हैं तब उसे प्राकृतिक तटबंध कहते हैं। समुद्र में गिरने से पहले नदी के बहने की गति एकदम धीमी पड़ जाती है तथा नदी अनेक प्रवाहों में विभाजित हो जाती है, जिसे शाखा/प्रशाखा कहा जाता है। यहाँ नदी की गति धीमी होने से वह अपने साथ लाए काँप, रेती, मिट्टी और अन्य पदार्थों का निक्षेपण करने लगती है। प्रत्येक शाखा/प्रशाखा अपने मुख का निर्माण करती है। सभी मुखों के निक्षेपण से डेल्टा (मुखत्रिकोण) का निर्माण होता है।

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समुद्री लहरों का कार्य : समुद्री लहरों के कटाव और जमाव (निक्षेपण) से तटीय भूमि-स्वरूपों का निर्माण होता है। समुद्र की लहरें सतत चट्टानों के साथ टकराती रहती हैं, जिनसे तट का निचला हिस्सा कट जाता है। समय के साथ-साथ वे बड़े और चौड़े हो जाते हैं, उन्हें समुद्री गुफा कहते हैं। इन गुफाओं के बड़े होते जाने से मात्र छत ही रह जाती है, जिससे तटीय कमान (मेहराब) बनती है। सतत कटाव छत को भी तोड़ देता है और केवल दीवारें रह जाती हैं। दीवार जैसे इस भू-स्वरूप को ‘स्टैक’ कहते हैं। समुद्र जल के ऊपर लगभग ऊर्ध्व बने ऊँचे पथरीले किनारों को समुद्र कमान कहते हैं। समुद्री लहरें किनारों पर निक्षेपण (जमाव) द्वारा समुद्र पुलिन का निर्माण करती हैं।

हिमनदी का कार्य : हिमनदी हिमाच्छादित पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ की नदी बनती है। हिमनदियाँ नीचे की कठोर चट्टानों से गोलाश्म मिट्टी और पत्थरों का कटाव करके विशिष्ट या गोलाश्म भूदृश्य का निर्माण करती हैं। हिमनदी कटाव द्वारा ‘U’ आकार की घाटी का निर्माण करती है। हिमनदी के पिघलने पर पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित खोह (कंदरा) में पानी भरने से सरोवर (टान) का निर्माण होता है। हिमनदी द्वारा लाए पदार्थ जैसे कि छोटे-बड़े पत्थर, रेती और कंकड़ निक्षेपित (जमा) होने से उसके प्रवाह के बीच टीले सदृश्य ‘ड्रमलिन’ (Drumlin) भूमिस्वरूप की रचना होती है।

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पवन का कार्य : रेगिस्तान में पवन यह अपरदन और निक्षेपण का मुख्य परिबल है। पवन चट्टानों के ऊपरी भाग की तुलना में निचले भाग को सरलता से घिसता है। अतः ऐसी चट्टानों का आधार पतला और शीर्ष मोटा हो जाता है। रेगिस्तान में छत्रक आकार की चट्टानें देखने को मिलती हैं, जिसे सामान्य रूप से छत्रक शिला कहा जाता है। ऐसे भूमि स्वरूप को छत्रक शिला कहते हैं। पवन गति से अपने साथ रेत (बालू) को एक स्थान से दूसरे स्थान पहुँचाता है, जब पवन की गति मंद पड़ती है तो वह रेत (बालू) जमीन पर गिरकर छोटे टीले बनाती है। उसे बालुका स्तूप (बारखन) कहते हैं। राजस्थान के रेगिस्तान में इस प्रकार के बालुका स्तूप देखने को मिलते हैं। जब मिट्टी के कण (धूल) विशाल विस्तार में निक्षेपित (जमाव) हो जाते हैं, तो उसे लोयस कहते हैं। चीन में लोयस निर्मित बड़े स्थल देखने को मिलते हैं।

Class 7 Social Notes Chapter 15 लोकतंत्र में समानता

लोकतंत्र में समानता भारत एक लोकतांत्रिक देश है। विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में देश का शासन चलाने के लिए संविधान की रचना की गई है। संविधान देश का शासन चलाने की मार्गदर्शिका कहलाता है। विश्व में सबसे बड़ा लिखित संविधान भारत का है। भाषा, जाति, धर्म और आर्थिक असमानता के बीच देश का सुचारु शासन हो इसके लिए संविधान में अनेक व्यवस्थाएँ की गई हैं। हमारा देश इतना विशाल और विविधतावाला देश है कि जिसके संचालन में विशेष प्रकार की व्यवस्था न हो तो संचालन सही ढंग से नहीं हो पाता।

हमारे देश में आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक भिन्नता होने के उपरांत सबको समान अवसर मिलता रहे इसके लिए हमारे संविधान निर्माताओं ने सब कुछ ध्यान रखा है।

समानता अर्थात् क्या?

भारत के संविधान में सबको समान अवसर देने का प्रावधान किया गया है। यह समानता अर्थात् सभी समान, सबको सम्मान। इस आशय के साथ सरकार संविधान के अनुसार कार्यरत है। सबको समान अधिकार अर्थात् कानून के समक्ष समानता और कानून का समान रक्षण।

कानून के आधार पर समानता

Class 7 Social Notes Chapter 15 लोकतंत्र में समानता 1

किसी एक स्थान पर पहुँचने की स्पर्धा रखी जाए। इस समय एक खिलाड़ी को साइकल, दूसरे को मोटरसाइकल, तीसरे व्यक्ति को दौड़कर पहुँचना हो तो इसे समानता नहीं कह सकते। इसके लिए तीनों को साइकल, मोटरसाइकल या दौड़ता रखा जाए तो ही सबको समान अवसर दिया गया माना जाएगा। दिए गए चित्र को देखें और समानता के संदर्भ में चर्चा करें :

आप सभी सरलता से समानता के बारे में समझ सके होंगे। यहाँ सुविधा उपलब्ध करवाना जिसके साथ इसका योग्य रूप से अमल कर सकें तो ही समानता प्राप्त होती है। इस प्रकार देखें तो समानता अर्थात् सबके लिए समान। सबको समान अवसर। शिक्षा प्राप्त करने, विकसित होने, धंधा-रोजगार अथवा विविध धर्म माननेवाले सभी के लिए भारत देश के संविधान में दिया गया समानता का अधिकार महत्त्वपूर्ण है।

हमारे विकास के साथ, सबके सर्वांगीण विकास द्वारा देश के विकास के लिए दिया जाने वाला समानता का अधिकार अत्यंत महत्त्वपूर्ण है और हमारे स्वाभिमान को बनाए रखने के लिए भी समानता का अधिकार जरूरी है।

Class 7 Social Notes Chapter 15 लोकतंत्र में समानता 2

मताधिकार में समानता

हमने देखा कि संविधान में सभी को विविध प्रकार की समानता दी गई है। ‘लोगों का, लोगों द्वारा और लोगों के लिए चलाया जानेवाला शासन अर्थात् लोकतंत्र।’ लोकतंत्र में सरकार की रचना लोगों के मतदान द्वारा होती है। लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई ग्राम पंचायत से लेकर देश की सबसे बड़ी पंचायत अर्थात् संसद का चुनाव मतदान द्वारा होता है। 18 वर्ष से बड़ी उम्र के प्रत्येक नागरिक को मताधिकार दिया गया है। मताधिकार सूची में दर्ज कोई भी नागरिक मतदान कर सकता है।

Class 7 Social Notes Chapter 15 लोकतंत्र में समानता 3

धर्म, भाषा, लिंग, बोली या धार्मिक असमानता के बीच सबको संवैधानिक समानता दी गई है। प्रत्येक को मतदान करने का अधिकार है। यहाँ मतदान करने के अधिकार के संदर्भ में अनेक रोचक बातें भी सामने आती हैं। कोई धाक, धमकी, जबरदस्ती या डर के अधीन मतदान न करे, इसके लिए मतदाता को जागृत किया जाता है। मत का महत्त्व समझाने और किसी भी प्रकार के डर बिना मतदान हो इसके लिए निर्वाचन आयोग व्यवस्था करता है। चुनाव के समय अधिक से अधिक लोग मतदान कर सकें, इसके लिए विशेष प्रयत्न किए गए हैं। विज्ञापन और विशेष व्यवस्था के अधीन मतदाताओं को जागृत किया जाता है। निर्वाचन आयोग निष्पक्ष रूप से चुनाव करवाता है। भारत देश में दर्ज सभी मतदाता मतदान कर सकें, इसके लिए विशेष व्यवस्था की जाती है। महिलाओं के लिए विशेष मतदान केन्द्र है। दिव्यांग व्यक्तियों के लिए विशेष सुविधा की जाती है।

बाल मजदूरी

समानता के संदर्भ में संविधान में कुछ बातों में स्पष्ट मार्गदर्शन दिया गया है। ऐसा होने के उपरांत कई बार असमानता पाई जाती है। ऐसी असमानता में बाल मजदूरी मुख्य है। बाल मजदूरी शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार का उल्लंघन माना जाता है। हमारे देश में सभी नागरिकों को छ: से चौदह वर्ष तक मुफ्त, अनिवार्य और सार्वत्रिक अध्ययन का अधिकार है। यह अधिकार, समान रूप से दिया गया है। आधुनिक समय में उच्च शिक्षण में लड़कियों को ना पढ़ने देने की भावना कहीं-कहीं पाई जाती है। बालकों को विद्यालय में पढ़ना हो, उस उम्र में वे मजदूरी करें तो वह एक प्रकार का अपराध है। चौदह वर्ष से छोटी उम्र के बालकों को मजदूरी पर रखना कानून के अधीन एक अपराध है।

श्रम और मजदूरी

एक समान कार्य में पुरुष और महिलाओं को मजदूरी चुकाने में भेदभाव रखा जाता है। कम मजदूरी चुकानी पड़े इसके लिए कई जगह बाल मजदूर भी रखे जाते हैं। कई कार्यों में दिव्यांगों से मजदूरी करवाई जाती है। उन्हें इस काम में मजदूरी भी खूब कम चुकाई जाती है। लोकतंत्र में दिव्यांग व्यक्तियों का शोषण न हो, इसके लिए उन्हें प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर करने के लिए सरकार द्वारा अनेक योजनाएं लागू की गई हैं। हमारे आसपास ऐसे दिव्यांग व्यक्ति हों, तो उन्हें सहयोग देना हम सभी का कर्तव्य है। दिव्यांगों, स्त्रियों और छोटे बालकों को कम पैसे चुकाए जाते हैं, यह अन्याय है।

लोकतंत्र में समानता

लोकतांत्रिक देश में समानता को खूब ही महत्त्व दिया जाता है। यहाँ समानता का अधिकार सबके लिए आवश्यक है। हम किसी को सम्मान देते हैं तो वह हमें सम्मान देगा। इसी तरह से संविधान में भी समानता का महत्त्व स्वीकारा गया है। कुछ अवलोकनों के आधार पर जब दया भाव पाया जाए, तब समझना चाहिए कि सामनेवाले व्यक्ति को समान अधिकार नहीं मिला है।

Class 7 Social Notes Chapter 15 लोकतंत्र में समानता 4

ऐसी बातों को समझने के लिए हम स्वयं क्या कर सकते हैं, यह विचार करना जरूरी है। तभी जहाँ-जहाँ समानता नहीं है, वहाँ-वहाँ हम प्रयत्न कर सकेंगे। मैं कुछ नहीं कर सकता ऐसा विचार नहीं करना चाहिए। इसके लिए पहल करना जरूरी है। हम स्वच्छता रखेंगे तो ही किसी को स्वच्छता के लिए कह सकेंगे। ऐसा ही समानता के लिए भी है। यहाँ कुछ जानकारी दी गई है। इस जानकारी के आधार पर आप समानता के संबंध में क्या कर सकेंगे। इसके संदर्भ में लिखें।

Class 7 Social Notes Chapter 15 लोकतंत्र में समानता 5

असमानता एक चुनौती

छोटा गाँव।
गाँव में पानी के दो ही कुएँ।
यहाँ पूरा गाँव दो भाग में पानी भरता है। समय बीतता गया। गाँव के एक कुँए में पानी समाप्त हो गया। अब आधे गाँव के लोगों को पानी भरने की असुविधा उत्पन्न हुई। कुँए में पानी समाप्त हो जाएगा इस डर से किसी एक क्षेत्र के लोग दूसरे क्षेत्र में किसी को पानी भरने नहीं देते। यह तो असमानता कहलाती है। समानता का भंग हो ऐसी एक-दो घटनाओं से सामाजिक समरसता पर विघातक प्रभाव देखने को मिलता है। जैसे कि कई बार गाँव के या व्यक्तिगत अवसरों पर दूल्हे को घोड़े पर बैठाकर बारात निकालना, मंदिर या मस्जिद में लाऊड स्पीकर बजाने से विवाद देखने या सुनने को मिलता है। ऐसी बातें समानता के सामने चुनौती हैं। ऐसे अवसरों पर शांति बनी रहे, ऐसे प्रयत्न करके हमें समानता के भाव के साथ व्यवहार करना चाहिए। समाज में समरसता बनी रहे, इसके लिए सरकार द्वारा खूब प्रयत्न किए जाते हैं। प्रत्येक समाज और प्रत्येक व्यक्ति को, समानता का अधिकार संविधान में दिया गया है। हम अपने अधिकारों का उपयोग कर सकें, इसके लिए जागृत होना जरूरी है।

Class 7 Social Notes Chapter 17 लैंगिक भिन्नता

हमारे देश में लड़के और लड़कियों के लालन-पालन में कभी समानता तो कभी असमानता पाई जाती है। पिछले दो दशकों में इस संदर्भ में जागृति फैली है। सरकार भी विभिन्न योजनाओं एवं आयोजनों के माध्यम से लड़के और लड़कियों में कोई भेदभाव न हो, ऐसा प्रयत्न कर रही है। हमारा देश अनेक भिन्नताओंवाला देश है। आधुनिक समय के अनुसार लड़के-लड़कियों को शिक्षा का समान अधिकार दिया गया है। रूढ़िगत मान्यता के अनुसार आज भी कुछ क्षेत्रों में कन्याओं को शिक्षा का अधिकार प्राप्त करने में कई असुविधाएँ होती हैं। समाज में प्रवर्तित भेदभाव का प्रभाव लम्बे समय तक समाज व्यवस्था पर पड़ता है। समाज में कई कुरिवाज प्रचलित होते हैं। आज भी कई स्थानों पर पाए जानेवाले बालविवाह का एक कारण यह भेदभाव है। बालविवाह के कारण अधिकांश महिलाएँ आगे शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकतीं, जिसके कारण उनका विकास रुक जाता है। जिसका एक प्रभाव स्त्रियों के स्वास्थ्य पर भी होता है। यदि लैंगिक भेदभाव दूर हो तो ऐसी अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है।

हमारे आस-पास स्त्री-पुरुष के बीच कुछ भिन्नता स्वीकार की गई है। स्त्री-पुरुषों में समान काम के लिए पुरुषों को अधिक वेतन दिया जाता है। ऐसा भेदभाव अपराध बनता है। आधुनिक समय में महिलाएँ सभी क्षेत्रों में जुड़ी हैं। चिकित्सा, इन्जीनियरिंग, वकालत, विमान चालक जैसी प्रत्येक बात में महिलाएँ समान रूप से काम करती हैं।

लैंगिक भिन्नता का विशेष असर अधिकांश ग्राम्य क्षेत्रों में पाया जाता है। कई बार लड़कियों को उच्च शिक्षण दिलाते समय अभिभावकों में हिचकिचाहट पाई जाती है। सरकार द्वारा सहायता एवं लोगों में आई जागृति के कारण लड़कियों के लिए उच्च शिक्षण सरल और सहज बना है।

भारतीय मान्यता के अनुसार लड़के-लड़कियों का लालन-पालन

सन् 2001 की जनगणना में 0 से 6 वर्ष तक के बालकों में लड़के-लड़कियों की संख्या में बड़ा अंतर पाया जाता है। कुछ समय पहले लड़की को जन्म से पहले ही मार देने के कारण लड़के-लड़कियों की संख्या में अधिक असमानता पाई गई, इसके लिए सरकार द्वारा भ्रूण हत्या विरोधी कानून बनाया गया। गर्भ में लड़के या लड़की का परीक्षण करना भी अपराध है। भारतीय मान्यता के अनुसार अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए संतान में पुत्र को ही महत्त्व दिया गया था। पिछले दशक में सामाजिक रूप से महिलाओं की भागीदारी ने इस मान्यता को खूब ही प्रभावित किया है।

अपने विद्यालय में विविध आयोजनों के समय आप जुड़े होंगे। विद्यालय कार्यक्रमों में लड़कों और लड़कियों द्वारा की गई प्रवृत्तियों को लिखिए।

Class 7 Social Notes Chapter 17 लैंगिक भिन्नता 1

रूढ़िगत मान्यता

लैंगिक भिन्नता के संदर्भ में हमारे देश में अनेक मान्यताएँ प्रवर्तित हैं। लड़कों और लड़कियों के लालन-पालन में इस संदर्भ में कई अंतर पाया जाता है। कुछ क्षेत्रों में प्राथमिक शिक्षण भी कभी पूरा नहीं करवाया जाता था। पिछले दो दशकों में प्राथमिक शिक्षण पूरा हो ऐसे खास प्रयत्न सरकार द्वारा किए गए हैं। सरकार के विशेष प्रयत्नों से आज हमारी सेना और पुलिस में लड़कियों की संख्या बढ़ रही है। लड़कियों को बाहर पढ़ने के लिए या नौकरी करने के लिए शहर भेजने के बदले लोग अपने क्षेत्र में ही नौकरी करवाना पसंद करते हैं। पिछले कुछ दशकों से महिलाएँ विविध कार्यों के साथ जुड़ी हैं। अंतरिक्ष क्षेत्र में भी महिलाएं जुड़ रही हैं। कन्याओं की सुरक्षा और संरक्षण के लिए सरकार सतत प्रयत्न कर रही है। रूढ़िगत मान्यताओं के आधार पर कह सकते हैं कि आज भी कुछ समाजों में कन्याओं के पढ़ने के संदर्भ में अनेक समस्याएँ पाई जाती हैं। उच्च पाठ्यक्रमों में कन्याओं को पढ़ाने के प्रति अभिभावकों में उदासीनता पाई जाती है। इसलिए अब राज्य सरकार द्वारा उच्च-शिक्षण के लिए विशेष सहायता दी जाती है।

गृहकार्य में असमानता

हमने देखा कि छोटी-छोटी बातों में लड़के-लड़की के साथ भेदभाव पाया जाता है। आगे जाकर यह भेदभाव समस्या बन जाता है। घर के छोटे-बड़े काम के लिए साइकल या अन्य वाहन चलाने और सीखने में ऐसा भेदभाव अधिक पाया जाता है। घर, विद्यालय या सार्वजनिक स्थलों में हम ऐसा भेदभाव देख सकते हैं। ऐसी कुछ बातों के संदर्भ में चर्चा करेंगे।

Class 7 Social Notes Chapter 17 लैंगिक भिन्नता 2

महिला सशक्तीकरण

एक मकान को घर बनाने का काम महिला द्वारा ही संभव है। घर के साथ बालक और अन्य जिम्मेदारियाँ निभाने में महिलाएँ अग्रसर होती हैं। आधुनिक समय में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में महिलाएँ सफल हुई हैं। आधुनिक समय में महिलाएँ विविध क्षेत्रों में अनोखी पहचान के साथ आगे बढ़ती पाई जाती हैं। खेल-जगत, फिल्म, मनोरंजन, राजनीति, अंतरिक्ष के उपरांत विज्ञान और संशोधन के क्षेत्र में भी महिलाएँ विशेष जुड़ रही हैं। संरक्षण जैसे खतरनाक कार्यों में भी आज महिलाएँ आगे बढ़ रही हैं। हमारे देश में अनेक महिलाओं ने विशेष सिद्धि हासिल की है।

महिलाओं को सशक्त करने के लिए पिछले दो दशकों में सरकार द्वारा अनेक कार्यक्रम और योजनाएँ बनाई गई हैं। पशुपालन, उद्योग और अन्य साहस के लिए सहायता दी जाती है। सरकार द्वारा ‘स्टार्टअप इण्डिया’ और ‘मेक इन इण्डिया’ के अन्तर्गत अनेक योजनाएँ महिला सशक्तीकरण के लिए चलाई जा रही हैं। महिलाओं को उद्योग शुरू करने के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है। नारी सशक्तीकरण के लिए अनेक संस्थाएँ भी कार्य कर रही हैं। सरकार की योजनाएँ, सार्वजनिक संस्थाएँ और अन्य द्वारा ऐसी महिलाओं को सहायता करके आत्मनिर्भर बनने में मदद की जाती है। नारी सशक्तीकरण के लिए योजनाओं के उपरांत शिक्षण में भी कन्याओं के लिए विशेष व्यवस्था और योजनाएँ लागू हैं। हमारे देश के विविध क्षेत्रों की महिलाओं के बारे में जानें।

विशेष क्षेत्रों में महिलाएँ

Class 7 Social Notes Chapter 17 लैंगिक भिन्नता 3

लिंगानुपात

समग्र देश में जनगणना करने के लिए लाखों लोग जुड़े होते हैं। जिस वर्ष में इकाई का अंक एक हो उन वर्षों में जनगणना की जाती है। पिछली जनगणना वर्ष 2011 में हुई थी। प्रथम जनगणना 1871 में हुई थी। केन्द्र सरकार द्वारा प्रति 10 वर्ष में जनगणना करवाई जाती है। अब आगे की जनगणना कब होगी?

शहरी और ग्रामीण लिंगानुपात में बड़ा अंतर पाया जाता है। यहाँ हम गुजरात के लिंगानुपात की स्थिति को देखेंगे। यह प्रति हजार पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या दर्शाता है। इस सारणी के आधार पर नीचे दिए गए प्रश्नों की चर्चा कीजिए :

Class 7 Social Notes Chapter 17 लैंगिक भिन्नता 4

चर्चा कीजिए

  • इस अंतर के कारण कौन-सी समस्या उत्पन्न होती है?
  • इस समस्या का समाधान किस तरह हो सकता है?
  • शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में अंतर क्यों अधिक है?
  • जनसंख्या वृद्धि के साथ लिंगानुपात क्यों महत्त्वपूर्ण है ?

हमारे आस-पास स्त्रियों और पुरुषों का परस्पर समान अनुपात लगता है। देश में स्त्रियों का अनुपात लगभग आधा माना जाता है। अभी तक की जनगणना के अनुसार कह सकते हैं कि, भारत में स्त्रियों और पुरुषों के लिंगानुपात में असमानता दिखाई देती है। नीचे विविध वर्षों में स्त्रियों का अनुपात निम्नानुसार दर्ज किया गया है :

Class 7 Social Notes Chapter 17 लैंगिक भिन्नता 5

सोचकर कहिए

  • किस वर्ष में स्त्रियों का अनुपात सर्वाधिक है?
  • किस वर्ष में स्त्रियों का अनुपात सबसे कम है?
  • स्त्रियों का अनुपात घटता जाए तो क्या समस्याएँ उत्पन्न होंगी?
  • स्त्री-पुरुषों की संख्या की असमानता को दूर करने के लिए सरकार क्या कदम उठाती है?

महिला आंदोलनों का अध्ययन

हमारा देश आजाद हुआ उससे पहले देश पर राज करनेवाले अंग्रेजों के सामने अनेक आंदोलन हुए थे। गाँधी बापू के नेतृत्व में विविध आंदोलन हुए थे। गुजरात सहित देशभर में कस्तूरबा के साथ अनेक महिलाएँ इन आंदोलनों के साथ जुड़ी थीं। बिहार में महिलाओं ने मद्य-निषेध के लिए सरकार के सामने सफल आंदोलन किया था। विशेषकर शहरों में कभी-कभी गरमी में पानी के लिए महिलाएँ आंदोलन करती हैं। ऐसे दूसरे अनेक आंदोलन महत्त्वपूर्ण रूप से महिलाओं के लिए हुए हैं। इन आंदोलनों में महिलाएँ जुड़ती हैं और अपनी समस्याओं के लिए आंदोलन करती हैं।

किसी महिला आंदोलन के विषय में सोचें और लिखें

  • उस महिला आंदोलन के विषय में आप क्या-क्या जानते हैं ?
  • वह आंदोलन क्यों किया गया था?
  • उस आंदोलन से क्या प्रभाव पड़ा?

Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार

आप पेन, नोटबुक, पुस्तकें खरीदने के लिए दुकान जाते होंगे। आपके घर के लिए भी चीज-वस्तुओं की खरीदी की जाती होगी। आपको लगता होगा कि ये सभी चीज-वस्तुएँ कौन बनाता होगा? किस तरह ये वस्तुएँ दुकानों तक पहुँचती होंगी? इन चीज-वस्तुओं को खरीदनेवाले कौन होंगे? इन चीज-वस्तुओं को बेचने वाले कौन होंगे? आइए, मित्रों आज हम इसके विषय में अध्ययन करें।

बाजार

चीज-वस्तुओं की बिक्री करती दुकानें जहाँ हों वह स्थान अर्थात् बाजार। बाजार अर्थात् जहाँ क्रेता और विक्रेता इकट्ठे होते हों, वह स्थल। बाजार में अनेक चीज-वस्तुओं की बिक्री होती है। जैसे कि सब्जियाँ, फल, साबुन, दंतमंजन, मसाले, ब्रेड, बिस्कुट, अनाज, दाल, चावल, कपड़ा, पुस्तकें, नोटबुक, पेन, पेन्सिल, बूट-जुराब, मोबाइल फोन, साइकल, टी.वी., फ्रिज आदि सूची बनाएं तो कितनी लम्बी सूची तैयार होगी। ऐसी अनेक वस्तुएँ हम बाजार में जाकर खरीदते हैं।

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बाजार के प्रकार

हम अपने दैनिक जीवन उपयोगी वस्तुओं की खरीदी अलग-अलग बाजार से करते हैं। जैसे कि, हमारे आसपास मोहल्ला बाजार, साप्ताहिक बाजार अथवा गुजरी बाजार, बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, नियंत्रित बाजार और ऑनलाइन बाजार।

मोहल्ला बाजार : हम दैनिक जीवन की उपयोगी वस्तुएँ अपने आस-पास की दुकानों से खरीदते हैं। जैसे कि डेयरी से दूध, दहीं, छाछ, किराणा की दुकानों से तेल-मसाला और गृह उपयोगी वस्तुएँ, स्टेशनरी की दुकान से पेन, पेन्सिल, नोटबुक, पुस्तकें आदि और दवा की दुकान से दवाइयाँ खरीदते हैं। तथा मार्गों के आस-पास छोटी दुकानें अथवा ठेलों से, सब्जियाँ अथवा वारत्योहार पर खिलौने, पतंग अथवा अन्य वस्तुएँ खरीदते हैं।

Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 1

  • ये दुकानें हमारे घर के आस-पास होती हैं।
  • हमारी आवश्यकता के अनुसार दिन के समय चाहे जब खरीदी कर सकते हैं।
  • ये दुकानदार अपने नियमित ग्राहकों को उधार पर भी बिक्री करते हैं।

गुजरी अथवा साप्ताहिक बाजार : साप्ताहिक बाजार किसी एक निश्चित दिन पर ही लगती है। इसलिए इन्हें साप्ताहिक बाजार कहते हैं। कुछ क्षेत्रों में इन्हें ‘हाट’ कहा जाता है। उदाहरण : प्रत्येक शनिवार को यह बाजार लगती हो तो शनिवारी बाजार। व्यापारी दिन के समय अपनी बेचनेवाली चीजवस्तुएँ लाते हैं और शाम तक दुकान समेटकर चले जाते हैं। दूसरे दिन किसी अन्य स्थान पर जाकर वहाँ दुकान लगाते हैं। देश भर में अनेक स्थानों पर ऐसे हजारों बाजार लगते हैं। जिनमें लोग अपनी रोजमर्रा की उपयोगी वस्तुएँ खरीदते हैं।

Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 2

  • जरूरी कई वस्तुएँ एक ही स्थान पर मिलती हैं।
  • छोटे व्यापारी और कारीगर रोजगार प्राप्त करते हैं।
  • व्यापारी दुकान का किराया, बिजली, कर, कर्मचारी का वेतन आदि खर्च नहीं होने से चीज वस्तुएँ सस्ते दर पर बेच सकते हैं।

शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और मोल

हमारे आसपास की दुकानों और साप्ताहिक बाजारों के अलावा बड़े शहरों में अन्य बाजार भी होते हैं। एक ही बिल्डिंग में एक साथ अलग-अलग प्रकार की दुकानें होती हैं। जिसे शॉपिंग कॉम्प्लेक्स कहते हैं। जिसमें हमें छोटी-बड़ी कम्पनी की ब्रांडेड और बिना ब्रान्ड की वस्तुएँ मिलती हैं। बड़ी कंपनी सार्वजनिक खबरों द्वारा ऊँची गुणवत्ता के विज्ञापन करके इन ब्रान्डेड वस्तुओं को ऊँचे भाव पर ऐसे बड़े शो-रूमों में बेचती हैं। जिनकी कीमत शॉपिंग मोल अधिक होने से कुछ लोग ही ऐसी वस्तुएँ खरीदते हैं।

Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 3

  • ग्राहक को केन्द्र में रखकर दुकानें सजाई जाती हैं।
  • विविध ब्रान्ड की अनेक वस्तुएँ एक साथ बिकती हैं। जिससे ग्राहक को पसंदगी का अवसर मिलता है।
  • वातानुकूलित मोल में ग्राहक पर्याप्त समय देकर विशेष छूट मिलती हो, ऐसी वस्तुएँ खरीद सकता है।
  • ग्राहक को वस्तु की छपी कीमत पर विशेष छूट दी जाती है।
  • ग्राहक काउन्टर पर नगद, क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड, नेट बैंकिंग से कीमत चुका सके, ऐसी व्यवस्था होती है।

नियंत्रित बाजार (मार्केटिंग यार्ड) (APMC)

कृषि की सफलता में अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के उपरांत अच्छी बाजार व्यस्था होना भी जरूरी है। आजादी के बाद के चरण में कृषि उत्पादन की बिक्री की निश्चित व्यवस्था न होने से किसानों का शोषण होता था। इसको रोकने के लिए सरकार ने नियंत्रित बाजार व्यवस्था अर्थात् मार्केटिंग यार्ड (खेती-बाड़ी उत्पादन बाजार समिति) की व्यवस्था की है। किसान फसल – बिक्री में ठगा न जाए और उसकी फसल-उत्पादन का उचित भाव प्राप्त करे और इस तरह वह आर्थिक समृद्ध बने इसके लिए गुजरात की विविध तहसील केन्द्रों पर खेतीबाड़ी उत्पादन बाजार समितियों की स्थापना की गई है। जैसे,

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  • किसानों की कृषि उपजों को सार्वजनिक नीलामी के आधार पर बेचा जाता है।
  • व्यापारियों का नैतिक स्तर बना रहता है।
  • भाव निर्धारण में पारदर्शिता बढ़ती है।
  • किसानों को उनकी कृषि उपजों का अच्छा भाव मिल सकता है।
  • व्यापारियों को अच्छा माल एक ही स्थान पर पर्याप्त मात्रा में मिल सकता है।
  • विविध सेवाएँ जैसे कि बैंकिंग, कर्ज (ऋण), बीमा, गोदाम, अन्य सुविधाओं का निर्माण आदि प्रभावी रूप से होता है।
  • रेडियो, समाचारपत्र, टी.वी. तथा ऑनलाइन मोबाइल फोन पर किसानों को कृषि-उत्पादों का दैनिक बाजार भाव मिल जाता है।
  • किसानों को मार्केटिंग यार्ड में रात्रि में ठहरने की सुविधा, उनकी फसलों का संग्रह करने के लिए गोदाम की सुविधा मिलती है।

ऑनलाइन बाजार

वर्तमान समय में ऑनलाइन शॉपिंग का प्रमाण बढ़ रहा है। बाजार में गए बिना ही हम कम्प्यूटर, मोबाइल फोन या टी.वी. पर डिजिटल पेमेन्ट करके सीधे खरीदी कर सकते हैं। ऑनलाइन शॉपिंग के लिए अनेक कंपनियाँ ग्राहकों को सीधे बिक्री करने से अधिक छूट देकर बाजार से सस्ती दर पर चीजें बेच सकती हैं। ग्राहक के घर तक चीजवस्तुएँ सीधे पहुँच जाती हैं। जिसके कारण इसका उपयोग अधिक से अधिक हो रहा है। आपने भी ऑनलाइन खरीदी की होगी। इस प्रकार अब बाज़ार हमारे घर में ही या हाथ में आ गया है ऐसा कह सकते हैं। ऑनलाइन खरीदी में सावधानी रखनी जरूरी है, अन्यथा धोखा-धड़ी का डर रहता है।

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बाजार के आसपास

हम चीजवस्तुएँ खरीदने जाते हैं ऐसे विविध प्रकार के बाजार के विषय में अध्ययन किया। आपको लगा होगा कि ये सभी दुकानदार अपनी दुकानों के लिए मालसामान कहाँ से खरीदते होंगे? चीजवस्तुओं का उत्पादन कारखाना, गृहउद्योग, घरों और खेतों में होता है, परंतु हम सीधे कारखाने या खेत से चीजवस्तुएँ नहीं खरीदते।

जो व्यापारी खेत या कारखानों, घरों में अधिक मात्रा में उत्पादित मालसामान को खरीदते हैं, उन्हें थोकबंध व्यापारी कहते हैं। वे यह सामान छोटे व्यापारियों या दुकानदारों को बेचते हैं। इस प्रकार ये खरीदी और बिक्री करनेवाले दोनों ही व्यापारी होते हैं। हम जिस दुकानदार या व्यापारी से वस्तुएँ खरीदते हैं, उसे फुटकर व्यापारी कहते हैं।

मोटरकार में उपयोग में आनेवाले विविध भाग छोटे-छोटे कारखानों में बनते हैं। कार की कंपनियाँ उन्हें खरीदकर, उन भागों को जोड़कर कार बनाती हैं, तैयार मोटरकार हम शो-रूम में से खरीदते हैं। इस प्रकार हमारे आसपास अनेक वस्तुएँ बनाकर उनका क्रय-विक्रय होता है। जिनसे हम अनजान होते हैं।

बाजार में समानता

हमने अपने आसपास के बाजार के विषय में जाना। कारखाने या खेत में उत्पादित मालसामान को बेचनेवाले और अंत में उसे खरीदनेवाले ग्राहकों के बीच सभी व्यापारी हैं। हमने साप्ताहिक बाजार से मोल तक की दुकानों और दुकानदारों की जानकारी प्राप्त की। इन दोनों दुकानदारों के बीच एक बड़ा अंतर है। एक कम पैसों से खुला व्यापार करनेवाला छोटा दुकानदार है और दूसरा अपने मोल या कॉम्प्लेक्स में अधिक पूँजी निवेश करनेवाला बड़ा दुकानदार है। छोटे दुकानदार बहुत कम लाभ पाते हैं, जबकि बड़े दुकानदार खूब लाभ प्राप्त करते हैं। ऐसे अनेक लोग हैं जो सस्ता मिलनेवाले माल-सामान भी नहीं खरीद सकते। जबकि कई ऐसे लोग भी होते हैं जो मोल में मिलती महँगी वस्तुओं की खरीदी करते हैं। इस प्रकार हमारी आर्थिक स्थिति के आधार पर हम किस बाजार के क्रेता या विक्रेता बनेंगे यह निश्चित होता है।

ग्राहक के रूप में हम अपने आसपास कई बार बड़ी उम्र के लोगों को छोटी-बड़ी वस्तुएँ बेचते देखते हैं। ऐसे बुजुर्ग पुरुष या महिला की उम्र आराम करने की होने के उपरांत वे गरीबी या मजबूरी के कारण मार्गों के आसपास वस्तुओं की बिक्री करते पाए जाते हैं। ऐसे में हमें दुकान या मोल से वस्तुएँ खरीदने की बजाय ऐसे जरूरतमंद व्यक्तियों से वस्तुएँ खरीदकर उन्हें सहायक बनना चाहिए।

बाजार में ग्राहक

‘ग्राहक अर्थात् जो मूल्य देकर अपने उपयोग के लिए चीजवस्तुएँ खरीदे अथवा सेवा प्राप्त करे वह व्यक्ति।’ आज प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप में ग्राहक है। उदाहरण के रूप में साबुन, तेल, बिस्कुट, अनाज या अन्य वस्तु की खरीदी अथवा मोबाइल फोन रीचार्ज, बीमा, ट्रेन टिकिट बुकिंग आदि सेवा जो प्राप्त करते हैं, वे ग्राहक की व्याख्या में आते हैं। विश्व में सबसे अधिक ग्राहक भारत में हैं। भारत विश्व का सबसे बड़ा बाजार माना जाता है। ग्राहक अपनी दैनिक जीवन उपयोगी और मौज-शौक की वस्तुएँ बाजार से खरीदते हैं। ग्राहक के रूप में उन्हें वस्तु की गुणवत्ता, कीमत, वस्तु की पसंदगी और पैसे का पूरा बदला प्राप्त करने का अधिकार है।

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प्रमाणित चीजवस्तु का चिह्न (लोगो)

ग्राहकों को अच्छी गुणवत्तावाली वस्तुएँ मिलती रहें, इसके लिए सरकार ने विविध वस्तुओं के मापदण्ड निश्चित किए हैं। विशेष चिह्न(मार्क)वाली वस्तुओं की बिक्री की जाती है। गृह उपयोग की और बिजली से चलनेवाली वस्तुओं के लिए ‘आई.एस.आई. – ISI’, सोने-चाँदी के लिए ‘होलमार्क’, ऊन की बनावट के लिए ‘वुलमार्क’, खाद्यपदार्थ के लिए ‘एगमार्क’ तथा ‘एफ.एस.एस.ए.आई-FSSAI’ आदि चिह्न लगाए जाते हैं। जिसके आधार पर ग्राहक अच्छी गुणवत्तावाली वस्तुएँ खरीद सकते हैं।

इसी तरह शाकाहारी खाद्यसामग्री परClass 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 7 निशानी और मांसाहारी खाद्यसामग्री पर Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 8 चिह्न लगाया जाता है।

ग्राहक के अधिकार और कर्तव्य

बाजार में समान लक्षणोंवाली अनेक ब्रांड की असंख्य वस्तुएँ मिलती हैं। ग्राहक को उनकी सम्पूर्ण जानकारी या ज्ञान नहीं होता है। उत्पादक और ग्राहकों के बीच अनेक बिचौलिए होने से ग्राहक का शोषण होने लगा है। ग्राहकों को शोषण से बचाने के लिए ग्राहक सुरक्षा का कानून लागू है। ग्राहक वर्तमान बाजार व्यवस्था के कारण वस्तु की गुणवत्ता, पूर्ति, कीमत और सेवा जैसी प्रत्येक बात में ठगा जाता है। ग्राहक चीज अथवा सेवा के संबंध में अपना अधिकार प्राप्त कर सके ऐसे उद्देश्य के साथ भारत सरकार द्वारा संसद में कानून पास करके ‘ग्राहक सुरक्षा अधिनियम- 1986’ बनाया गया है। इस कानून के आधार पर ग्राहक को निम्नलिखित छः अधिकार मिलते हैं :

  • सुरक्षा का अधिकार : व्यक्ति के जीवन तथा स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक उत्पादों और सेवाओं के संबंध में सम्पूर्ण सुरक्षा का अधिकार अर्थात् आप कोई भी वस्तु या सेवा खरीदते हों, तो उसका उपयोग करने के बाद लम्बे समय में भी आपके स्वास्थ्य या जीवन को कोई नुकसान हो तो आप ग्राहक सुरक्षा कानून के तहत शिकायत कर सकते हैं।
  • सूचना प्राप्त करने का अधिकार : चीजवस्तु या सेवा पसंद करने के लिए वस्तु संबंधी जरूरी सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करना ग्राहक का अधिकार है।पसंदगी करने का अधिकार : विविध प्रकार की अनेक वस्तुओं में से ग्राहक को अपने अनुकूल वस्तु पसंद करने का अधिकार है।
  • प्रस्तुतीकरण का अधिकार : ग्राहक के अधिकार और हितों के रक्षण के लिए ग्राहक सुरक्षा मण्डल में उसकी उचित शिकायत का अधिकार है।
  • शिकायत निवारण का अधिकार : कमीयुक्त माल, क्षतियुक्त सेवा या धोखा-धड़ी की शिकायत से उपभोक्ता को हुए नुकसान का बदला प्राप्त करने का अधिकार है।
  • ग्राहक शिक्षण प्राप्त करने का अधिकार : इस अधिकार से जीवनभर जानकारीयुक्त ग्राहक बनने के लिए सभी जानकारी और ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार है।

ग्राहक के कर्तव्य

  • ग्राहकशिक्षण से ग्राहक धोखाधड़ी से बच सकता है। खरीदी करते समय कुछ बातों के संबंध में सावधानी भी ग्राहक का कर्तव्य बनता है, जो निम्नानुसार है :
  • किसी भी वस्तु को खरीदते समय जी.एस.टी.वाले बिल को लेकर खरीदें तथा उसे लम्बे समय तक संभालकर रखें।
  • बड़ी खरीदी में तथा विशेषकर इलेक्ट्रोनिक्स वस्तुएँ आई.एस.आई. मार्क की ही खरीदनी चाहिए। दुकानदार द्वारा सही-सिक्का किया हुआ गेरन्टी कार्ड, वॉरंटी कार्ड, फ्री सर्विस कूपन आदि ध्यान ध्यान देकर प्राप्त कर लें और संभालकर रखें।
  • सोने-चाँदी जैसी खरीदी में ‘होलमार्क’वाले जेवरात ही खरीदें। व्यापारी की बातों में आकर किसी भी प्रकार के टैक्स बचाने की कोशिश न करें, हमेशा पक्का बिल लें। बिल में शुद्धता, कीमत, घड़ाई आदि सभी सूचनाएँ स्पष्ट और अलग लिखी हुई हैं या नहीं, इसका ध्यान रखें।
  • खाद्य पदार्थ ‘एगमार्क’ ‘fssai’ लोगोवाले ही खरीदने चाहिए। उनकी पैकिंग, कंपनी, ब्रान्डनेम, बैच नम्बर, उत्पादन की तारीख, एक्सपायरी डेट, इनग्रेडियन्ट (समाविष्ट घटक) आदि सभी विगतों को देखना चाहिए और मिलावट के मामलों में अचूक शिकायत करनी चाहिए।
  • दवाएँ प्रिस्क्रिप्शन के साथ खरीदनी चाहिए। उत्पादन की तारीख और एक्सापयरी डेट आदि जाँचनी चाहिए। जेनरिक दवाएँ मिलती हों तो पहले उन्हें खरीदनी चाहिए।
  • कपड़ों में कपड़ा, कलर, सिलाई, जरी, भरत, माप-साइज आदि चेक करके खरीदने चाहिए।
  • पेट्रोल या सी.एन.जी. पंप पर मीटर जीरो होने के बाद ही वाहन में ईंधन भरवाना चाहिए। गैस-वितरण में सिलैण्डर का वजन और सुरक्षा के संबंध में जाँच करनी चाहिए।
  • शैक्षिणक संस्थाओं में सुरक्षा की व्यवस्था, शिक्षकों की योग्यता की जानकारी और फीस भरने के बाद रसीद लेनी चाहिए।
  • जीवन वीमा पॉलिसी या वाहन बीमा के संयोगों में पॉलिसी की शर्ते समझकर असली पॉलिसी का दस्तावेज जरूर प्राप्त कर लें।
  • अनावश्यक और गलत खरीदी से बचें। सेल, भेंटकूपन, इनामी योजना आदि लुभावने विज्ञापनों से बचें और यदि ठगे गए हों, तो समाचारपत्रों द्वारा उसकी जानकारी दूसरों को देनी चाहिए, जिससे वे ठगे जाने से बच सकें।

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इतना जानिए-

भारत सरकार ने 15 मार्च को ‘विश्व ग्राहक दिवस’ और 24 दिसम्बर को ‘राष्ट्रीय ग्राहक अधिकार दिवस’ के रूप में मनाने का निश्चय किया गया है। ग्राहकों की शिकायतों का तीव्र और बिना खर्च निवारण करने के लिए प्रत्येक जिले, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर ग्राहक सुरक्षा मण्डल और ग्राहक अदालतों की रचना की गई है।
ग्राहक सुरक्षा की शिकायतों के लिए ग्राहक हेल्पलाइन टोल फ्री नं. : 1800 233 0222

उत्पादन से बाजार तक की यात्रा

हमने बाजार, बाजार के प्रकार और अपने आसपास के बाजार के विषय में अध्ययन किया। हमारे आसपास की अनेक प्रक्रियाएँ बाजार व्यवस्था पर प्रभाव डालती हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ खरीदकर बाजार व्यवस्था को चालक बल प्रदान करता है। अब हम शर्ट और पैन्ट बनाने में उपयोग में आनेवाले कपड़े की बात करके बाजार की विशेष जानकारी प्राप्त करेंगे। आप सभी जानते ही हैं कि, कपड़ा बनाने के लिए कपास कच्चा माल है। कपास की बुवाई से शुरू करके शर्ट-पैन्ट की बिक्री तक बाजार की श्रृंखला एक-दूसरे से किस तरह से जुड़ी है, यह जानें। सौराष्ट्र के रामपर गाँव में मगनभाई के पास 5 हेक्टर जमीन है। उसने अपने खेत में खरीफ की फसल की बुवाई बीज करने हेतु कपास के बीज की बिक्री करनेवाली दुकान से कपास के प्रमाणित किए हुए बीज खरीदे। जून महीने में बरसात आए उससे पहले ही हल चलाकर तैयार रखे अपने खेत में कपास की बुवाई कर दी। प्रथम बरसात बोने लायक होने से दो-चार दिनों में जमीन में से कपास के अंकुर फूटकर बाहर आ गए। बरसात के कारण कपास के साथ खर-पतवार भी उग जाते हैं। कपास के पौधे के पास से खर-पतवार दूर करके खेत एकदम खर-पतवार मुक्त कर दिया। खेत में आड़ी-तिरछी मेड़ करके दो-तीन अच्छी बरसात के साथ रासायनिक खाद भी छिड़क दिया। नवरात्रि आने तक तो आपके सिर तक पहुँचे ऐसा कपास खेतों में लहराने लगा। फूल खिलकर उसमें बड़ी-बड़ी गाँठें भी आ गई थी और अब गाँठों में से सफेद कपास बाहर दिखने लगी अर्थात् मगनभाई मजदूरों से यह कपास बिनवाकर बोझ बाँधकर अपने घर में रखने लगे।

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अंत में मगनभाई उसके खेत में उत्पन्न हुआ कपास बेचने के लिए ट्रैक्टर में भरकर तहसील केन्द्र में स्थित मार्केटिंग यार्ड में ले गए।

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उनके कपास की व्यापारियों ने बोली लगाई, जिसमें चुनीलाल व्यापारी ने उसका कपास खरीद लिया और मगनभाई को उसका पैसा तुरन्त मिल गया। चुनीलाल ने सारा कपास जीनिंग फैक्ट्री चलानेवाले धनजीभाई के कारखाने को बेच दिया। जीन में इस कपास में से कपास के बीज अलग करके तेल निकालनेवाले व्यापारी को बेच दिया। आप सभी जानते हो कि, कपास का तेल खाद्य तेल के रूप में उपयोग होता है और खोल पशुओं को खिलाने वाले आहार खली के रूप में उपयोगी है। जीनिंग मिल के (कारखाने) मालिक ने कपास की गांठों से धागे बनाने के लिए स्पिनिंग मिल में भेज दिया। इन धागों को अहमदाबाद की एक कपड़े की मिल ने कपड़े बनाने के लिए खरीद लिया। जिनमें से तैयार हुए कपड़े के ताके कलर करती डाइंग मिल में कलर करने के लिए भेज दिए गए। इस कपड़े को वस्त्र बनाती फैक्ट्री में अलग-अलग नाप के कटिंग करके, उसकी सिलाई करके शर्ट और पैन्ट बनाकर, उन्हें लेबल लगाकर बॉक्स में पैक करके विदेश में थोकबंध निर्यात किया गया और बाजार में भी बेचा गया। हमारे शहर के शो रूम के व्यापारी ये पैन्ट-शर्ट शरीद लाते हैं और उनसे हम पैन्ट-शर्ट खरीदते हैं।

कपास में से पैन्ट और शर्ट बनाने तक का सफर हमने देखा। कच्चे माल से तैयार होकर वस्तु कितने सारे लोगों (किसान, उत्पादक, व्यापारी, परिवहन सेवा) से गुजरकर ग्राहक तक पहुँचती है और उसमें जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को थोड़ा-बहुत लाभ मिलता है। हम दैनिक उपयोगी चीज-वस्तुएँ बाजार से प्राप्त करते हैं। यह बाजार कई लोगों को रोजगार देता है। सड़क-मार्ग, परिवहन, बैंकिंग और संचार की सुविधाओं के कारण बाजार व्यवस्था में क्रांति आई है। विश्व के देश परस्पर व्यापार द्वारा जुड़े हैं। हमारे आसपास के बाजार और ऑनलाइन बाजार द्वारा हम वैश्विक बाजार के साथ जुड़े रहते हैं। इस प्रकार वर्तमान समय में समग्र विश्व एक बाजार है।

Class 11 Political Science Solutions Chapter 15 सरकारों के रूप-संसदीय और अध्यक्षात्मक सरकारें

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. संसदात्मक सरकार की मुख्य विशेषताएं बताइए।
(Describe the chief characteristics of the parliamentary form of government.)
अथवा
संसदीय सरकार क्या है ? संसदीय सरकार की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करो।
(What is parliamentary government ? Discuss the main features of parliamentary Government.)
उत्तर-कार्यपालिका और विधानपालिका के सम्बन्धों के आधार पर दो प्रकार के शासन होते हैं-संसदीय तथा अध्यक्षात्मक। यदि कार्यपालिका और विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध हों और दोनों एक-दूसरे का अटूट भाग हों तो संसदीय सरकार होती है और यदि कार्यपालिका तथा विधानपालिका एक-दूसरे से लगभग स्वतन्त्र हों तो अध्यक्षात्मक सरकार होती है।

संसदीय सरकार का अर्थ (Meaning of Parliamentary Government)–संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। संसदीय सरकार शासन की वह प्रणाली है जिसमें कार्यपालिका (मन्त्रिमण्डल) अपने समस्त कार्यों के लिए संसद् (विधानपालिका) के प्रति उत्तरदायी होती है और अब तक अपने पद पर रहती है जब तक इसको संसद् का विश्वास प्राप्त रहता है। जिस समय कार्यपालिका संसद् का विश्वास खो बैठे तभी कार्यपालिका को त्याग-पत्र देना पड़ता है। संसदीय सरकार को उत्तरदायी सरकार (Responsible Government) भी कहा जाता है क्योंकि इसमें सरकार अपने समस्त कार्यों के लिए उत्तरदायी होती है। इस सरकार को कैबिनेट सरकार (Cabinet Government) भी कहा जाता है क्योंकि इसमें कार्यपालिका की शक्तियां कैबिनेट द्वारा प्रयोग की जाती हैं।

1. डॉ० गार्नर (Dr. Garner) का मत है कि, “संसदीय सरकार वह प्रणाली है जिसमें वास्तविक कार्यपालिका, मन्त्रिमण्डल या मन्त्रिपरिषद् अपनी राजनीतिक नीतियों और कार्यों के लिए प्रत्यक्ष तथा कानूनी रूप से विधानमण्डल या उसके एक सदन (प्रायः लोकप्रिय सदन) के प्रति और राजनीतिक तौर पर मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी हो जबकि राज्य का अध्यक्ष संवैधानिक या नाममात्र कार्यपालिका हो और अनुत्तरदायी हो।”

2. गैटेल (Gettell) के अनुसार, “संसदीय शासन प्रणाली शासन के उस रूप को कहते हैं जिसमें प्रधानमन्त्री तथा मन्त्रिपरिषद् अर्थात् वास्तविक कार्यपालिका अपने कार्यों के लिए कानूनी दृष्टि से विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है। चूंकि विधानपालिका के दो सदन होते हैं अतः मन्त्रिमण्डल वास्तव में उस सदन के नियन्त्रण में होता है जिसे वित्तीय मामलों पर अधिक शक्ति प्राप्त होती है जो मतदाताओं का अधिक सीधे ढंग से प्रतिनिधित्व करता है।”
इस परिभाषा से यह स्पष्ट है कि संसदीय सरकार में मन्त्रिमण्डल अपने समस्त कार्यों के लिए विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी होता है और राज्य का नाममात्र का मुखिया किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होता।

संसदीय सरकार को सर्वप्रथम इंग्लैंड में अपनाया गया था। आजकल इंग्लैंड के अतिरिक्त जापान, कनाडा, नार्वे, स्वीडन, बंगला देश तथा भारत में भी संसदीय सरकारें पाई जाती हैं।

संसदीय सरकार के लक्षण
(Features of Parliamentary Government)-

संसदीय प्रणाली के निम्नलिखित लक्षण होते हैं-
1. राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का सत्ताधारी (Head of the State is Nominal Executive)-संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का सत्ताधारी होता है। सैद्धान्तिक रूप में तो राज्य की सभी कार्यपालिका शक्तियां राज्य के अध्यक्ष के पास होती हैं और उनका प्रयोग भी उनके नाम पर होता है, पर वह उनका प्रयोग अपनी इच्छानुसार नहीं कर सकता। उसकी सहायता के लिए एक मन्त्रिमण्डल होता है, जिसकी सलाह के भार ही उस अपनी शक्तियों का प्रयोग करना पड़ता है। अध्यक्ष का काम तो केवल हस्ताक्षर करना है।

2. मन्त्रिमण्डल वास्तविक कार्यपालिका होती है (Cabinet is the Real Executive)-राज्य के अध्यक्ष के नाम में दी गई शक्तियों का वास्तविक प्रयोग मन्त्रिमण्डल करता है। अध्यक्ष के लिए मन्त्रिमण्डल से सलाह मांगना और मानना अनिवार्य है। मन्त्रिमण्डल ही अन्तिम फैसला करता है और वही देश का वास्तविक शासक है। शासन का प्रत्येक विभाग एक मन्त्री के अधीन होता है और सब कर्मचारी उसके अधीन काम करते हैं। हर मन्त्री अपने विभागों का काम मन्त्रिमण्डल की नीतियों के अनुसार चलाने के लिए उत्तरदायी होता है।

3. कार्यपालिका और व्यवस्थापिका में घनिष्ठ सम्बन्ध (Close Relation between Executive and Legislature)-संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका में घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है। मन्त्रिमण्डल वास्तविक कार्यपालिका होती है। इसके सदस्य अर्थात् मन्त्री संसद् में से ही लिए जाते हैं। ये मन्त्री संसद् की बैठकों में भाग लेते हैं, बिल पेश करते हैं, बिलों पर बोलते हैं और यदि सदन के सदस्य हों तो मतदान के समय मत का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार मन्त्री प्रशासक (Administrator) भी हैं, कानून-निर्माता (Legislator) भी।

4. मन्त्रिमण्डल का उत्तरदायित्व (Responsibility of the Cabinet)—कार्यपालिका अर्थात मन्त्रिमा अपने सब कार्यों के लिए व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है। संसद् सदस्य मन्त्रियों से प्रश्न पूट सकते हैं, जिनका उन्हें उत्तर देना पड़ता है। मन्त्रिमण्डल अपनी नीति निश्चित करता है, उसे संसद् के सामने रखता है तथा उसका समर्थन प्राप्त करता है। मन्त्रिमण्डल, अपना कार्य संसद् की इच्छानुसार ही करता है।

5. उत्तरदायित्व सामूहिक होता है (Collective Responsibility)-मन्त्रिमण्डल इकाई के रूप में कार्य करता है और मन्त्री सामूहिक रूप से संसद् के प्रति उत्तरदायी होते हैं। यदि संसद् एक मन्त्री के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पास कर दे तो समस्त मन्त्रिमण्डल को अपना पद छोड़ना पड़ता है। किसी विशेष परिस्थिति में एक मन्त्री अकेला भी हटाया जा सकता है।

6. मन्त्रिमण्डल का अनिश्चित कार्यकाल (Tenure of the Cabinet is not Fixed)-मन्त्रिमण्डल की अवधि भी निश्चित नहीं होती। संसद् की इच्छानुसार ही वह अपने पद पर रहते हैं। संसद् जब चाहे मन्त्रिमण्डल को अपदस्थ कर सकती है, अर्थात् यदि निम्न सदन का बहुमत मन्त्रिमण्डल के विरुद्ध हो तो उसे अपना पद छोड़ना पड़ता है। यही कारण है कि निम्न सदन के नेता को ही प्रधानमन्त्री नियुक्त किया जाता है और उसकी इच्छानुसार ही दूसरे मन्त्रियों की नियुक्ति होती है।

7. मन्त्रिमण्डल की राजनीतिक एकरूपता (Political Homogeneity of the Cabinet)—संसदीय सरकार की एक विशेषता यह भी है कि इसमें मन्त्रिमण्डल के सदस्य एक ही राजनीतिक दल से सम्बन्धित होते हैं। यह आवश्यक भी है क्योंकि जब तक मन्त्री एक ही विचारधारा और नीतियों के समर्थक नहीं होंगे, मन्त्रिमण्डल में सामूहिक उत्तरदायित्व विकसित नहीं हो सकेगा।

8. गोपनीयता (Secrecy)-संसदीय सरकार में पद सम्भालने से पूर्व मन्त्री संविधान के प्रति वफादार रहने तथा सरकार के रहस्यों को गुप्त रखने की शपथ लेते हैं। कोई भी मन्त्री मन्त्रिमण्डल में हुए वाद-विवाद तथा निर्णयों को मन्त्रिमण्डल की स्वीकृति के बिना घोषित नहीं कर सकता। यदि कोई मन्त्रिमण्डल के रहस्यों की सूचना दूसरे लोगों को देता है तो कानून के अनुसार उसे सख्त दण्ड दिया जाता है।

9. प्रधानमन्त्री का नेतृत्व (Leadership of the Prime Minister)-संसदीय शासन प्रणाली में मन्त्रिमण्डल प्रधानमन्त्री के नेतृत्व में कार्य करता है। जिस दल का बहुमत होता है उसके नेता को प्रधानमन्त्री नियुक्त किया जाता है। प्रधानमन्त्री मन्त्रिमण्डल का निर्माण करता है, मन्त्रियों में विभाग बांटता है, मन्त्रिमण्डल की बैठकों की अध्यक्षता करता है और सभी मन्त्री उसके अधीन कार्य करते हैं।

10. प्रधानमन्त्री संसद् के निम्न सदन को भंग कराने का अधिकार रखता है (Right of the Prime Minister to get the Lower House of the Parliament dissolved)–संसदीय शासन प्रणाली में प्रधानमन्त्री की सिफ़ारिश पर ही राष्ट्रपति या राजा संसद् के निम्न सदन को भंग करता है।

प्रश्न 2. संसदीय सरकार के गुणों और दोषों की व्याख्या करें।
(Discuss the merits and demerits of Parliamentary Government.)
उत्तर-
संसदीय सरकार के गुण (Merits of Parliamentary Government)-
संसदीय शासन प्रणाली में बहुत-से गुण हैं-

1. कार्यपालिका तथा विधानपालिका में पूर्ण सहयोग (Complete Harmony between the Executive and Legislature)–संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग बना रहता है। मन्त्रिमण्डल के सदस्य विधानपालिका के सदस्य होते हैं, बैठकों में भाग लेते हैं तथा बिल पास करते हैं। कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग के कारण अच्छे कानूनों का निर्माण होता है तथा शासन में दक्षता आती है।

2. उत्तरदायी सरकार (Responsible Government)—संसदीय सरकार में सरकार अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है। मन्त्रिमण्डल अपनी शक्तियों का प्रयोग अपनी इच्छा से न करके विधानमण्डल की इच्छानुसार कार्य करता है। विधानपालिका के सदस्य मन्त्रियों से प्रश्न पूछते हैं, काम रोको प्रस्ताव पेश करते हैं तथा निन्दा प्रस्ताव पास करते हैं और यदि मन्त्रिमण्डल अपनी मनमानी करता है विधानमण्डल अविश्वास प्रस्ताव पास करके मन्त्रिमण्डल को हटा सकता है।

3. सरकार निरंकुश नहीं बन सकती (Government cannot become Despotic)-मन्त्रिमण्डल अपने कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होने के कारण निरंकुश नहीं बन सकता। यदि मन्त्रिमण्डल अपनी मनमानी करता है तो विधानपालिका अविश्वास प्रस्ताव पास करके उसे हटा सकती है। विरोधी दल सरकार की आलोचना करके जनमत को अपने पक्ष में करने का प्रयत्न करता है। विरोधी दल सरकार को निरंकुश नहीं बनने देता।

4. परिवर्तनशील सरकार (Flexible Government)—संसदीय सरकार का यह भी गुण है कि इसमें सरकार परिवर्तनशील होती है। सरकार को समय के अनुसार बदला जा सकता है। उदाहरणस्वरूप द्वितीय महायुद्ध में जब इंग्लैण्ड में चेम्बरलेन सफल न हो सका तो उसके स्थान पर चर्चिल को प्रधानमन्त्री बनाया गया।

5. सरकार जनमत के अनुसार चलती है (Government is responsive to Public Opinion)–संसदीय शासन प्रणाली में सरकार जनमत की इच्छानुसार शासन को चलाती है। मन्त्री विधानपालिका के सदस्य होते हैं और इस प्रकार वे जनता के प्रतिनिधि होते हैं। बहुमत दल ने चुनाव के समय जनता के साथ कुछ वायदे किए होते हैं। इन वायदों को पूरा करने के लिए मन्त्रिमण्डल अपनी नीतियों का निर्माण करता है। मन्त्री सदा जनमत के अनुसार कार्य करते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि यदि उन्होंने जनता की इच्छाओं को पूरा न किया तो उन्हें अगले चुनाव में बहुमत प्राप्त नहीं होगा।

6. योग्य व्यक्तियों का शासन (Government by Able Men)-संसदीय शासन प्रणाली में योग्य व्यक्तियों का शासन होता है। बहुमत दल उसी व्यक्ति को नेता चुनता है जो दल में सबसे योग्य, बुद्धिमान तथा लोकप्रिय हो। प्रधानमन्त्री उन्हीं व्यक्तियों को मन्त्रिमण्डल में शामिल करता है जो शासन चलाने के योग्य होते हैं। यदि कभी अनजाने में अयोग्य व्यक्ति को मन्त्री बना भी दिया जाए तो बाद में उसे हटाया जा सकता है। मन्त्रियों को अपने विभागों का प्रबन्ध करने के लिए स्वतन्त्रता प्राप्त होती है जिससे मन्त्रियों को अपनी योग्यता दिखाने का अवसर मिलता है।

7. जनता को राजनीतिक शिक्षा मिलती है (Political Education to the People) संसदीय सरकार राजनीतिक दलों पर आधारित होती है। प्रत्येक दल जनमत को अपने पक्ष में करने के लिए अपनी नीतियों का प्रचार करता है और दूसरे दलों की नीतियों की आलोचना करता है। इस तरह जनता को विभिन्न दलों की नीतियों का पता चलता है। चुनाव के पश्चात् भी विरोधी दल सरकार की नीतियों की आलोचना करके जनमत को अपने पक्ष में करने का प्रयत्न करता है और सत्तारूढ़ दल सरकार की नीतियों का समर्थन करता है। इस प्रकार जनता को बहुत राजनीतिक शिक्षा मिलती है जिससे नागरिक राजनीतिक विषयों में रुचि लेने लगता है।

8. राज्य का अध्यक्ष निष्पक्ष सलाह देता है (Head of the State gives Impartial Advice)-राज्य का अध्यक्ष किसी राजनीतिक पार्टी से सम्बन्धित नहीं होता जिस कारण उसकी सलाह निष्पक्ष होती है। राज्य का अध्यक्ष सदा राष्ट्र के हित में सलाह देता है जिसे प्रधानमन्त्री प्रायः मान लेता है।

9. राजतन्त्र को प्रजातन्त्र में बदलना (Monarchy changed into Democracy)–संसदीय शासन प्रणाली का यह भी गुण है कि इसने राजतन्त्र को प्रजातन्त्र में बदल दिया है। संसदीय सरकार में शासन का मुखिया तथा राज्य का मुखिया अलग-अलग होता है। राजा राज्य का मुखिया होता है जबकि प्रधानमन्त्री शासन का मुखिया होता है। यदि आज इंग्लैण्ड में राजतन्त्रीय व्यवस्था होते हुए भी प्रजातन्त्र शासन है तो इसका श्रेय संसदीय शासन प्रणाली को है।

10. वैकल्पिक शासन की व्यवस्था (Provision for Alternative Government)-संसदीय शासन प्रणाली में मन्त्रिमण्डल तब तक अपने पद पर बना रहता है जब तक उसे विधानमण्डल का विश्वास प्राप्त रहता है। अविश्वास प्रस्ताव पास होने की दशा में मन्त्रिमण्डल को त्याग-पत्र देना पड़ता है तब विरोधी दल सरकार बनाता है। इस प्रकार प्रशासन लगातार चलता है और शासन में रुकावट नहीं पड़ती।

संसदीय सरकार के दोष (Demerits of Parliamentary Government)-

1. यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है (It is against the theory of Separation of Powers)–संसदीय सरकार शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है। शक्तियों के केन्द्रीयकरण से व्यक्तियों की निजी स्वतन्त्रता खतरे में पड़ सकती है। संसदीय सरकार में शासन चलाने की शक्ति तथा कानून निर्माण की शक्ति मन्त्रिमण्डल के पास केन्द्रित होती है। मन्त्री विधानपालिका के सदस्य होते हैं, बिल पेश करते हैं तथा पास करवाते हैं। प्रधानमन्त्री राज्य के अध्यक्ष को सलाह देकर विधानपालिका के निम्न सदन को भंग करवा सकता है। इस प्रकार यह शासन प्रणाली शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है।

2. अस्थिर सरकार (Unstable Government)—संसदीय शासन प्रणाली में सरकार अस्थिर होती है क्योंकि मन्त्रिमण्डल की अवधि निश्चित नहीं होती। विधानपालिका किसी भी समय अविश्वास प्रस्ताव पास करके मन्त्रिमण्डल को हटा सकती है। जिन देशों में दो से अधिक राजनीतिक दल होते हैं वहां पर सरकार बहुत अस्थिर होती है। सरकार अस्थिर होने के कारण लम्बे काल की योजनाएं नहीं बनाई जा सकतीं।

3. नीति में निरन्तरता की कम सम्भावना (Less Possibility of Continuity of Policy)—संसदीय शासन प्रणाली में सरकार की स्थिरता की कम सम्भावना रहती है। इसलिए शासन की नीतियों में निरन्तरता नहीं रहती। कार्यपालिका को विधानपालिका जब चाहे पद से हटा सकती है। इस प्रकार कभी एक राजनीतिक दल का शासन होता है तो कभी दूसरा दल सत्ता में आ जाता है। इसी कारण इस प्रणाली में नीति की निरन्तरता की सम्भावना कम रहती है।

4. शासन में दक्षता का अभाव (Administration lacks Efficiency)—इस शासन प्रणाली में शासन में दक्षता का अभाव होता है, क्योंकि इसमें शासन की बागडोर अनाड़ियों के हाथ में होती है। मन्त्रियों की नियुक्ति योग्यता के आधार पर न होकर राजनीतिक आधार पर होती है। कई बार मन्त्री को उस विभाग का अध्यक्ष भी बना दिया जाता है जिसके बारे में बिल्कुल ज्ञान ही नहीं होता।

5. मन्त्रिमण्डल की तानाशाही का भय (Danger of Dictatorship of the Cabinet)—संसदीय शासन प्रणाली में जहां केवल दो दल होते हैं वहां मन्त्रिमण्डल की तानाशाही स्थापित हो जाती है। जिस दल को विधानपालिका में बहुमत प्राप्त होता है उसी दल का मन्त्रिमण्डल बनता है और मन्त्रिमण्डल तब तक अपने पद पर रहता है जब तक उसे बहुमत का समर्थन प्राप्त रहता है। दल में अनुशासन के कारण दल का प्रत्येक सदस्य मन्त्रिमण्डल की नीतियों का समर्थन करता है। विरोधी दल की आलोचना का मन्त्रिमण्डल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और मन्त्रिमण्डल अगले चुनाव तक अपनी मनमानी कर सकता है।

6. संसद् की दुर्बल स्थिति (Weak Position of the Parilament)-जिन देशों में राजनीतिक दल होते हैं वहां पर संसद् मन्त्रिमण्डल के हाथों का खिलौना बन जाती है। संसद् की बैठकों की तिथि तथा समय मन्त्रिमण्डल निश्चित करता है। 95% बिल मन्त्रियों द्वारा पेश किए जाते हैं और मन्त्रिमण्डल का बहुमत प्राप्त होने के कारण सभी बिल पास हो जाते हैं। वास्तव में संसद् स्वयं कानून नहीं बनाती बल्कि मन्त्रिमण्डल की सलाह से कानूनों का निर्माण करती है।

7. यह उग्र दलीय भावना को जन्म देती है (It gives birth to Aggressive Partisan Spirit)—यह शासन प्रणाली राजनीतिक दलों पर आधारित होने के कारण उग्र दलीय भावना को जन्म देती है। बहुमत दल अधिक-से-अधिक समय तक शासन पर नियन्त्रण रखना चाहता है और इसके लिए हर कोशिश करता है। दूसरी ओर विरोधी दल शीघ्रसे-शीघ्र सत्तारूढ़ दल को हटा कर स्वयं शासन पर नियन्त्रण करना चाहता है। विरोधी दल सरकार की आलोचना केवल आलोचना करने के लिए करता है। इस तरह सत्तारूढ़ दल तथा विरोधी दल में खींचातानी चलती रहती है।

8. संकटकाल के समय निर्बल सरकार (Weak in time of Emergency)—संकटकाल में शक्तियों का केन्द्रीयकरण होना चाहिए, परन्तु संसदीय सरकार में सभी निर्णय मन्त्रिमण्डल के द्वारा होते हैं और सभी निर्णय बहुमत से स्वीकृत किए जाते हैं। मन्त्रिमण्डल में वाद- विवाद पर काफ़ी समय बरबाद होता है जिससे निर्णय लेने में देरी हो जाती है। संकटकाल में संकट का सामना करने के लिए निर्णयों का शीघ्रता से होना अति आवश्यक है।

9. आलोचना आलोचना के उद्देश्य से (Criticism for the sake of Criticism)-संसदीय प्रणाली का यह दोष भी है कि विरोधी दल सरकार के हर कार्य की आलोचना करता है, चाहे वह अच्छी और जन-हित में भी क्यों न हो। ऐसा करना अच्छी बात नहीं और इससे विरोधी दल की शक्ति भी नष्ट होती है और जनता को भी उचित शिक्षा नहीं मिलती।

10. योग्य व्यक्तियों की उपेक्षा (Able Persons Neglected)—संसदीय प्रणाली में बहुमत दल के सदस्यों को ही मन्त्रिमण्डल में शामिल किया जाता है। चाहे उनमें बहुत-से अयोग्य ही क्यों हों और विरोधी दल के योग्य व्यक्तियों को भी नहीं पूछा जाता। इनसे देश को हानि होती है।

निष्कर्ष (Conclusion)–संसदीय सरकार अनेक दोषों के बावजूद भी अधिक लोकप्रिय है। आज संसार के अधिकांश देशों में संसदीय सरकार को अपनाया गया है। इस शासन प्रणाली की लोकप्रियता का कारण यह है कि इसमें सरकार जनमत की इच्छानुसार शासन चलाती है तथा अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है और इसमें परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन किया जा सकता है।

प्रश्न 3. अध्यक्षात्मक सरकार की मुख्य विशेषताएं बताइए।
(Describe the chief characteristics of the Presidential form of Government.)
अथवा
अध्यक्षात्मक सरकार से आप क्या समझते हैं ? इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
(What do you understand by Presidential form of Government ? Discuss its main features.)
उत्तर- अध्यक्षात्मक सरकार वह शासन प्रणाली है जिसमें कार्यपालिका विधानपालिका से स्वतन्त्र होती है और उसके प्रति उसका कोई उत्तरदायित्व नहीं होता। राज्य का अध्यक्ष राष्ट्रपति होता है और वह वास्तविक शासक होता है। राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तौर पर चुना जाता है और विधानपालिका जब चाहे राष्ट्रपति को नहीं हटा सकती। राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल का निर्माण स्वयं करता है और जब चाहे मन्त्रिमण्डल को तोड़ सकता है। मन्त्रिमण्डल के सदस्य विधानपालिका के सदस्य नहीं होते। इस प्रकार अध्यक्षात्मक सरकार शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त पर आधारित है।

1. डॉ० गार्नर (Garner) के अनुसार, “अध्यक्षात्मक सरकार वह प्रणाली है जिसमें राज्य का अध्यक्ष और मन्त्री अपने कार्यकाल के लिए संवैधानिक तौर पर व्यवस्थापिका से स्वतन्त्र होते हैं और अपनी नीतियों के लिए उसके प्रति उत्तरदायी नहीं होते। इस प्रणाली में राज्य का अध्यक्ष केवल नाममात्र कार्यपालिका नहीं होता बल्कि वास्तविकता कार्यपालिका होता है और संविधान तथा कानूनों द्वारा दी गई शक्तियों का वास्तव में प्रयोग करता है।”
2. गैटेल (Gettell) के अनुसार, “अध्यक्षात्मक शासन-व्यवस्था उसे कहते हैं जिसमें प्रधान कार्यपालिका अपनी नीति एवं कार्यों के बारे में विधानपालिका से स्वतन्त्र होता है।”

संयुक्त राज्य अमेरिका, चिल्ली, मैक्सिको, श्रीलंका, जर्मन, रूस आदि देशों में अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली पाई जाती है।
अध्यक्षात्मक प्रणाली के लक्षण (Features of the Presidential System)-अध्यक्षात्मक प्रणाली में निम्नलिखित प्रमुख बातें होती हैं-

1. नाममात्र तथा वास्तविक कार्यपालिका में भेद नहीं (No distinction between Nominal and Real Executive)-अध्यक्षात्मक सरकार में नाममात्र तथा वास्तविक कार्यपालिका में भेद नहीं पाया जाता। राष्ट्र का अध्यक्ष राष्ट्रपति होता है। उसे संविधान द्वारा जो शक्तियां प्राप्त होती हैं उनका प्रयोग वह अपनी इच्छानुसार करता है। मन्त्रिमण्डल का निर्माण राष्ट्रपति स्वयं करता है और मन्त्रिमण्डल की सलाह को मानना अथवा न मानना राष्ट्रपति पर निर्भर करता है। राष्ट्रपति जब चाहे मन्त्रियों को हटा सकता है।

2. मन्त्रिमण्डल केवल सलाहकार के रूप में (Cabinet is only an Advisory Body)-अध्यक्षात्मक प्रणाली में भी मन्त्रिमण्डल की व्यवस्था होती है, परन्तु इसकी स्थिति संसदीय प्रणाली के मन्त्रिमण्डल की स्थिति से पूर्णतः भिन्न होती है। अध्यक्ष मन्त्रियों की सलाह के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य नहीं होता। मन्त्री केवल सलाहकार ही होते हैं। उसकी अपनी इच्छा है कि मन्त्रियों से सलाह ले या न ले।

3. Cruiuifcich it alareucht at yerCUT (Separation of Executive and Legislature) अध्यक्षात्मक शासन में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका में कोई सम्बन्ध नहीं होता। अध्यक्ष अपने मन्त्री संसद् में से नहीं लेता। मन्त्री संसद् की बैठकों मे न भाग ले सकते हैं, न बिल पेश कर सकते हैं, न भाषण दे सकते हैं। इस प्रकार व्यवस्थापिका और कार्यपालिका में कोई सम्बन्ध नहीं रहता है।

4. कार्यपालिका का अनुत्तरदायित्व (Irresponsibility of the Executive)-अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका अपने कार्यों तथा नीतियों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती। राष्ट्रपति को अविश्वास प्रस्ताव पास करके नहीं हटाया जा सकता। संसद् सदस्य मन्त्रियों से लिखित रूप में प्रश्न पूछ सकते हैं, परन्तु मन्त्री उनका उत्तर दें या न दें, उनकी इच्छा पर निर्भर है। मन्त्री राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किये जाते हैं और वे राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होते हैं।

5. कार्यपालिका की निश्चित अवधि (Fixed Tenure of the Executive)-अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है। विधानपालिका राष्ट्रपति को केवल महाभियोग द्वारा ही हटा सकती है। अमेरिका में राष्ट्रपति चार वर्ष के लिए चुना जाता है और उसे केवल महाभियोग द्वारा ही हटाया जा सकता है।

6.शक्तियों के पृथक्करण पर आधारित (Based on the theory of Separation of Powers)-अध्यक्षात्मक सरकार शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त पर आधारित होती है। इसमें सरकार के मुख्य कार्य तीन विभिन्न अंगों द्वारा किए जाते हैं जो एक-दूसरे से स्वतन्त्र होते हैं। अमेरिका में शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त को अपनाया गया है।

7. राष्ट्रपति विधानमण्डल को भंग नहीं कर सकता (President cannot dissolve the Parliament)अध्यक्षात्मक सरकार शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त पर आधारित है। इसलिए राष्ट्रपति विधानपालिका के किसी सदन को भंग नहीं कर सकता। विधानपालिका की अवधि संविधान द्वारा निश्चित होती है और यदि राष्ट्रपति चाहे भी तो समय से पहले इसको भंग नहीं कर सकता।

8. राजनीतिक एकरूपता अनावश्यक (Political Homogeneity is Unnecessary)-इस प्रणाली में मन्त्रियों का एक ही राजनीतिक दल से सम्बन्धित होना आवश्यक नहीं होता। यह इसलिए कि मन्त्री केवल अपने व्यक्तिगत रूप में ही अध्यक्ष के प्रति उत्तरदायी होते हैं। इसलिए इस प्रणाली में मन्त्री के सामूहिक उत्तरदायित्व का लक्षण अनुपस्थित होता है। इसलिए उनका राजनीतिक विचारों में पूर्णतः एकमत होना अधिक आवश्यक नहीं होता।

प्रश्न 4. अध्यक्षात्मक शासन के गुणों और दोषों का वर्णन करें।
(Discuss the merits and demerits of Presidential Government.)
उत्तर
अध्यक्षात्मक शासन के गुण (Merits of Presidential Government)-
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के निम्नलिखित गुण हैं-

1. शासन में स्थिरता (Stability in Administration)-अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति की अवधि निश्चित होती है जिससे शासन में स्थिरता आती है। राष्ट्रपति को केवल महाभियोग के द्वारा हटाया जा सकता है। अमेरिका में अभी तक किसी राष्ट्रपति को नहीं हटाया गया। शासन में स्थिरता के कारण लम्बी योजनाएं बनाई जाती हैं और उन्हें दृढ़ता से लागू किया जाता है।

2. संकटकाल के लिए उचित सरकार (Suitable in time of Emergency)-अध्यक्षात्मक सरकार संकटकाल के लिए बहुत उपयुक्त है। शासन की सभी शक्तियां राष्ट्रपति के पास होती हैं जिनका प्रयोग वह अपनी इच्छानुसार करता है। शासन के सभी महत्त्वपूर्ण निर्णय राष्ट्रपति द्वारा लिए जाते हैं । इसलिए राष्ट्रपति संकटकाल में शीघ्र निर्णय लेकर उन्हें दृढ़ता से लागू कर संकट का सामना कर सकता है। युद्ध और आर्थिक संकट का सामना करने के लिए अध्यक्षात्मक सरकार सर्वश्रेष्ठ है।

3. इसमें नीति की एकता बनी रहती है (It ensures Continuity of Policy)-इस शासन प्रणाली में कार्यपालिका एक निश्चित समय तक अपने पद पर रहती है जिससे एक ही नीति निश्चित अवधि तक चलती रहती है। शासन की नीतियों में शीघ्रता से परिवर्तन न होने के कारण एक शक्तिशाली नीति को अपनाया जा सकता है।

4. शासन में दक्षता (Efficiency in Administration)-यह प्रणाली शक्ति विभाजन के सिद्धान्त पर कार्य करती है। मन्त्रियों को न तो चुनाव लड़ना पड़ता है और न ही उन्हें संसद् की बैठकों में ही भाग लेना पड़ता है। उनके पास तो केवल शासन चलाने का ही कार्य रहता है। वे स्वतन्त्रतापूर्वक शासन-कार्य में लगे रहते हैं। इससे शासन में दक्षता आना स्वाभाविक ही है।

5. योग्य व्यक्तियों का शासन (Administration by Able Statesmen)-इस प्रणाली में मन्त्रियों को संसद् का सदस्य होने की आवश्यकता नहीं। इसलिए राष्ट्रपति ऐसे व्यक्तियों को मन्त्रिमण्डल में तथा सरकारी पदों पर नियुक्त करता है जो योग्य प्रशासक और अनुभवी राजनीतिज्ञ हों और इस प्रणाली में सभी राजनीतिक दलों से मन्त्री लिए जा सकते हैं।

6. यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त पर आधारित है (It is based on the Theory of Separation of Powers) कार्यपालिका तथा विधानपालिका एक-दूसरे से स्वतन्त्र होती हैं। विधानपालिका कानूनों का निर्माण करती है और कार्यपालिका कानूनों को लागू करती है। कार्यपालिका विधानपालिका को भंग नहीं कर सकती और न ही विधानपालिका अविश्वास प्रस्ताव पास करके कार्यपालिका को हटा सकती है। शक्तियों के विभाजन के कारण सरकार का कोई भाग निरंकुश नहीं बन सकता और नागरिकों की स्वतन्त्रता का खतरा नहीं रहता।।

7. इसमें राजनीतिक दल उग्र नहीं होते (Political Parties are Less Aggressive)-अध्यक्षात्मक सरकार में संसदीय सरकार की अपेक्षा राजनीतिक दलों का प्रभाव कम होता है। संसदीय सरकार में चुनाव के पश्चात् भी विरोधी दल सत्तारूढ़ दल को हटा कर स्वयं शासन पर अधिकार करने के लिए प्रयत्न करते रहते हैं, परन्तु अध्यक्षात्मक सरकार के चुनाव के पश्चात् राजनीतिक दलों की उग्रता समाप्त हो जाती है क्योंकि विरोधी दल को पता होता है कि राष्ट्रपति को अगले चुनाव से पहले नहीं हटाया जा सकता।

8. बहु-दलीय प्रणाली के लिए उपयुक्त (Suitable for a Multiple-Party System)—जिस देश में बहुदल प्रणाली हो अर्थात् कई राजनीतिक दल हों और किसी भी दल को संसद् में बहुमत प्राप्त न होता हो, उस देश में यही प्रणाली अधिक उपयुक्त रहती है। बहुदल प्रणाली में संसदीय सरकार स्थापित हो जाए तो मन्त्रिमण्डल जल्दी-जल्दी बदलता रहता है, परन्तु अध्यक्षात्मक प्रणाली में चुनाव के समय ही दलों का संघर्ष अधिक रहता है और कार्यपालिका जल्दी-जल्दी नहीं बदलती।

अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के दोष (Demerits of Presidential Government)-
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के मुख्य दोष निम्नलिखित हैं-

1. निरंकुशता का भय (Fear of Despotism)-शासन की सभी शक्तियां राष्ट्रपति के पास होती हैं जिससे वह निरंकुश बन सकता है। राष्ट्रपति की अवधि निश्चित होने के कारण अगले चुनाव तक उसे हटाया नहीं जा सकता है। अतः राष्ट्रीय अपनी शक्तियों का प्रयोग मनमाने ढंग से कर सकता है।

2. शासन को परिस्थितियों के अनुसार नहीं बदला जा सकता (Government is not changeable according to Circumstances)–संसदीय सरकार में प्रधानमन्त्री तथा मन्त्रियों में आवश्यकतानुसार परिवर्तन किया जा सकता है, परन्तु अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है और विधानपालिका की अवधि भी निश्चित होती है। राष्ट्रपति यदि शासन को ठीक ढंग से न चलाए तो भी जनता उसे निश्चित अवधि से पहले नहीं हटा सकती।

3. कार्यपालिका और विधानपालिका में गतिरोध की सम्भावना (Possibility of deadlock between the Executive and Legislature)-अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका के एक-दूसरे से स्वतन्त्र होने के कारण दोनों में गतिरोध उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है। विशेषकर यदि राष्ट्रपति एक दल से हो और विधानमण्डल में किसी दूसरे राजनीतिक दल का बहुमत हो तो इन दोनों अंगों में संघर्ष होना अनिवार्य हो जाता है। इससे शासन अच्छी तरह नहीं चलता। विधानपालिका कार्यपालिका की इच्छानुसार कानून नहीं बनाती और न ही कार्यपालिका कानून को उस भावना से लागू करती है जिस भावना से कानूनों को बनाया गया होता है।

4. शक्तियों का विभाजन सम्भव नहीं (Separation of Powers not Possible)-अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त पर आधारित है, परन्तु यह सिद्धान्त व्यावहारिक नहीं है और न ही वांछनीय है। शासन एक इकाई है तथा इसके अंगों को उसी प्रकार बिल्कुल पृथक् नहीं किया जा सकता है जिस प्रकार शरीर के अंगों को। यदि सरकार के तीन अंगों को एक-दूसरे से बिल्कुल पृथक् रखा जाए तो इसका परिणाम यह होगा कि शासन की एकता समाप्त हो जाएगी और तीनों अंगों में क्षेत्राधिकार सम्बन्धी झगड़े उत्पन्न हो जाएंगे। अतः शक्तियों के विभाजन का सिद्धान्त अच्छे शासन के लिए आवश्यक नहीं है।

5. जनमत की अवहेलना (Public Opinion Neglected)—अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में जनमत की अवहेलना होने की बहुत अधिक सम्भावना रहती है। मन्त्री संसद् के सदस्य नहीं होते और न ही विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी होते हैं। इन्हें चुनाव नहीं लड़ना पड़ता है। इसलिए उन्हें जनमत की परवाह नहीं होती।

6. अच्छे कानूनों का निर्माण नहीं होता (Good Laws are not Passed)-अच्छे कानूनों के निर्माण के लिए कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग का होना आवश्यक है, परन्तु अध्यक्षात्मक सरकार में दोनों एक-दूसरे से स्वतन्त्र होते हैं। विधानपालिका को इस बात का पता नहीं होता कि कार्यपालिका को किस तरह के कानूनों की आवश्यकता है। आवश्यकतानुसार कानूनों का निर्माण न होने के कारण शासन में कुशलता नहीं रहती।

7. अनुत्तरदायी सरकार (Irresponsible Government)-अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में सरकार अपने कार्यों के लिए उत्तरदायी नहीं होती। राष्ट्रपति विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होता। इसलिए राष्ट्रपति अपनी मनमानी कर सकता है।

8. संविधान की कठोरता (Rigid Constitution)-अध्यक्षात्मक सरकार में संविधान बहुत कठोर होता है। इसलिए उसमें समयानुसार परिवर्तन नहीं किए जा सकते।

9. विदेशी सम्बन्धों में निर्बलता (Weakness in conduct of Foreign Relations)-अध्यक्षात्मक प्रणाली में कार्यपालिका दूसरे देशों के साथ दृढ़तापूर्वक सम्बन्ध स्थापित नहीं कर सकती। इसका कारण यह है कि युद्ध और शान्ति की घोषणा करने की स्वीकृति संसद् ही दे सकती है। राष्ट्रपति को इस बात का भरोसा नहीं होता कि संसद् उस पर अपनी स्वीकृति देगी या नहीं।

10. दल दोषों से मुक्त नहीं (Not free from Party Evils)—यह कहना ठीक नहीं है कि अध्यक्षात्मक सरकार में राजनीतिक दलों में बुराइयां नहीं पाई जातीं। राष्ट्रपति का चुनाव दलीय व्यवस्था के आधार पर होता है और जिस दल का उम्मीदवार राष्ट्रपति चुना जाता है वह अपने समर्थकों को खुश करने के लिए उन्हें बड़े-बड़े पद देता है। अमेरिका में राष्ट्रपति अपना पद ग्रहण करने के बाद अपने दल के व्यक्तियों को ऊंचे-ऊंचे राजनीतिक पदों पर नियुक्त करता है। इससे शासन में भ्रष्टाचार फैलता है।

निष्कर्ष (Conclusion)-अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के गुण भी हैं और अवगुण भी। अमेरिका में यह प्रणाली सन् 1787 से प्रचलित है और सफलतापूर्वक कार्य कर रही है। भारत में बहुदल प्रणाली को देखकर कुछ एक विद्वान् भारत में संसदीय प्रणाली के स्थान पर अध्यक्षात्मक प्रणाली को स्थापित करने का सुझाव देते हैं, परन्तु सुझाव न तो ठोस है और न ही इसके माने जाने की सम्भावना है। फ्रांस में बहुदल के कारण वहां की संसदीय शासन प्रणाली ठीक प्रकार न चल सकी। इस कारण वहां भी अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के कुछ अंश अपनाए गए हैं।

प्रश्न 5. संसदीय सरकार और अध्यक्षात्मक सरकारों की तुलना करो तथा दोनों में अन्तर का वर्णन करो।
(Compare and contrast the parliamentary and Presidential forms of governments.)
उत्तर-संसदीय शासन प्रणाली और अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में अग्रलिखित अन्तर पाए जाते हैं-

संसदीय सरकार की विशेषताएं-

  1. अध्यक्षात्मक सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का मुखिया न हो कर वास्तविक शासक होता है। संविधान के द्वारा शासन की सभी शक्तियां उसके पास होती हैं और वह उसका प्रयोग अपनी इच्छानुसार करता है।
  2. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका विधानपालिका से स्वतन्त्र होती है। राष्ट्रपति तथा मन्त्रिमण्डल के सदस्य विधानमण्डल के सदस्य नहीं होते। मन्त्री न तो विधानपालिका की बैठकों में भाग ले सकते हैं और न ही बिल पेश कर सकते हैं।
  3. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती। मन्त्री राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होते हैं न कि विधानपालिका के प्रति। विधानपालिका कार्यपालिका को अविश्वास प्रस्ताव पास करके नहीं हटा सकती।
  4. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका की अवधि निश्चित होती है। राष्ट्रपति को केवल महाभियोग के द्वारा हटाया जा सकता है।
  5. संसदीय सरकार में प्रधानमन्त्री राज्य के अध्यक्ष को सलाह देकर विधानपालिका को भंग कर सकता है।

अध्यक्षात्मक सरकार की विशेषताएं-

  1. संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का मुखिया होता है। व्यवहार में उसकी शक्तियों का प्रयोग मन्त्रिमण्डल के द्वारा किया जाता है।
  2. संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। मन्त्रिमण्डल के सभी सदस्य विधानपालिका के सदस्य होते हैं । मन्त्री विधानमण्डल की बैठकों में भाग लेते हैं, बिल पेश करते हैं तथा वोट डालते हैं।
  3. संसदीय सरकार में कार्यपालिका अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है। विधानपालिका के सदस्य मन्त्रियों से प्रश्न पूछ सकते हैं, काम रोको तथा निन्दा प्रस्ताव पास करके मन्त्रिमण्डल को हटा सकते हैं।
  4. संसदीय सरकार में कार्यपालिका की अवधि निश्चित नहीं होती। विधानपालिका जब चाहे अविश्वास प्रस्ताव पास करके मन्त्रिमण्डल को हटा सकती है।
  5. अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति विधानपालिका के किसी सदन को भंग नहीं कर सकता।

प्रश्न 6. दोनों प्रकार की सरकारों में आप किसे श्रेष्ठ मानते हैं और क्यों ?
(Which of the two types do you consider better ? Why ?)
उत्तर- यह एक विवाद का विषय है कि दोनों प्रकार की शासन प्रणालियों में से कौन-सी शासन प्रणाली अच्छी है। यह कहना कठिन है कि कौन-सी शासन प्रणाली पूर्ण रूप से अच्छी है। इसका कारण यह है कि दोनों शासनप्रणालियों के अपने-अपने गुण भी हैं और दोष भी हैं। इंग्लैण्ड में संसदीय सरकार अच्छी तरह चल रही है जबकि अमेरिका में अध्यक्षात्मक सरकार। परन्तु फिर भी आजकल निम्नलिखित कारणों की वजह से संसदीय शासन व्यवस्था को अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था से अच्छा समझा जाता है

1. संसदीय शासन व्यवस्था कार्यपालिका तथा विधानपालिका में पूर्ण सहयोग का विश्वास दिलाती हैसंसदीय शासन व्यवस्था में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग बना रहता है। मन्त्रिमण्डल के सदस्य विधानमण्डल के सदस्य होते हैं, वाद-विवाद में भाग लेते हैं और बिल पेश करते हैं। मन्त्रिमण्डल का विधानमण्डल में बहुमत होता है जिस कारण मन्त्रिमण्डल द्वारा पेश किए गए बिल पास हो जाते हैं। मन्त्रिमण्डल के समर्थन के बिना कोई बिल पास नहीं हो सकता है। मन्त्रिमण्डल तथा विधानपालिका में सहयोग होने के कारण अच्छे कानूनों का निर्माण होता है। सरकार में दक्षता तभी आती है जब सरकार के विभिन्न अंगों में सहयोग हो, क्योंकि सरकार एक इकाई होती है। संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में पूर्ण सहयोग होता है।

अध्यक्षात्मक शासन-व्यवस्था में कार्यपालिका तथा विधानपालिका एक-दूसरे से स्वतन्त्र होती है और मन्त्रियों को विधानपालिका की बैठकों में भाग लेने का अधिकार नहीं होता है। यदि राष्ट्रपति एक दल से हो और विधापालिका में दूसरे दल का बहुमत हो, तो इन दोनों में संघर्ष होना अनिवार्य हो जाता है और गतिरोध उत्पन्न हो जाता है। 1968 से 1976 तक अमेरिका में राष्ट्रपति रिपब्लिकन पार्टी से था जबकि कांग्रेस में डैमोक्रेटिक पार्टी का बहुमत था। जबकि 1992 से 2000 तक अमेरिका में राष्ट्रपति डैमोक्रेटिक पार्टी का था, और कांग्रेस में बहुमत रिपब्लिकन पार्टी का था। विधानपालिका और कार्यपालिका में सहयोग न होने के कारण विधानपालिका कार्यपालिका की इच्छानुसार कानून नहीं बनाती और न ही विधानपालिका के बनाए हुए कानूनों को कार्यपालिका उस भावना से लागू करती है, जिस भावना से कानूनों को बनाया गया होता है।

2. संसदीय शासन व्यवस्था अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था से अधिक प्रजातन्त्रात्मक होती है-संसदीय शासनव्यवस्था को अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली से अच्छा समझा जाता है क्योंकि यह अध्यक्षात्मक शासन-व्यवस्था से अधिक प्रजातन्त्रात्मक होती है। मन्त्रिमण्डल के सदस्य जनता के प्रतिनिधियों की निरन्तर आलोचना के अधीन कार्य करते हैं। निरन्तर आलोचना के कारण मन्त्री सदैव सतर्क रहते हैं और निरंकुश बनने की चेष्टा नहीं करते। ‘अविश्वास प्रस्ताव’ के डर के कारण मन्त्री जनता की इच्छाओं के अनुसार काम करते हैं। अध्यक्षात्मक शासन में राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है और उसे अविश्वास प्रस्ताव पास करके नहीं हटाया जा सकता। निःसन्देह अमेरिका में राष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है, परन्तु महाभियोग का तरीका इतना कठिन है कि अभी तक अमेरिका में एक भी राष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा नहीं हटाया गया है। इसका अभिप्राय यह है कि अमेरिका में राष्ट्रपति को अवधि से पहले नहीं हटाया जा सकता।

3. गृह और विदेश-नीति में दृढ़ता-संसदीय शासन-व्यवस्था में मन्त्रिमण्डल गृह और विदेश नीति को दृढ़ता से लागू करता है क्योंकि उसे यह पता होता है कि विधानपालिका में उसे बहुमत का समर्थन प्राप्त है। इसके विपरीत अध्यक्षात्मक शासन-व्यवस्था में राष्ट्रपति विदेशी नीति को दृढ़ता से नहीं अपना सकता क्योंकि उसको कांग्रेस के समर्थन का विश्वास नहीं होता। इसके अतिरिक्त अमेरिका में राष्ट्रपति सीनेट की स्वीकृति के बिना दूसरे देशों के साथ सन्धिसमझौते नहीं कर सकता। अतः राष्ट्रपति दूसरे देशों के साथ दृढ़ नीति को नहीं अपना सकता।

4. संसदीय शासन-व्यवस्था में वैकल्पिक शासन की व्यवस्था-संसदीय शासन प्रणाली में मन्त्रिमण्डल के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास होने की दशा में वैकल्पिक शासन की स्थापना बिना चुनाव करवाए सम्भव होती है। विशेषकर इंग्लैण्ड में जहां द्वि-दलीय प्रणाली पाई जाती है, सत्तारूढ़ दल के हटने पर विरोधी दल सरकार बनाने के लिए सदैव तैयार रहता है। इस प्रकार प्रशासन लगातार चलता रहता है और शासन में कोई रुकावट नहीं पड़ती है।

संसदीय शासन प्रणाली के विपरीत अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में साधारणतया सरकार नहीं हटती क्योंकि राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है, परन्तु यदि सरकार हटती है तो इससे नए चुनाव करवाने की समस्या उत्पन्न होती है। वास्तव में अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था में दो चुनावों के बीच के काल में नोति में कोई परिवर्तन सम्भव नहीं होता है। नीति में परिवर्तन तभी सम्भव होता है यदि चुनाव के समय दल अपने विभिन्न कार्यक्रम के आधार पर चुना जाए, परन्तु संसदीय शासन-प्रणाली में नीति में परिवर्तन चुनावों के बीच के काल में भी सम्भव होता है।

5. संसदीय शासन-व्यवस्था में सरकार परिवर्तनशील होती है-संसदीय शासन प्रणाली को सरकार की परिस्थितियों के अनुसार बदला जा सकता है। उदाहरणस्वरूप द्वितीय विश्व युद्ध में जब इंग्लैण्ड में चैम्बरलेन सफल न हो सका तो उसके स्थान पर चर्चिल को प्रधानमन्त्री बनाया गया, परन्तु अध्यक्षात्मक सरकार में ऐसा नहीं किया जा सकता क्योंकि इसमें कार्यपालिका के अध्यक्ष की अवधि निश्चित होती है। राष्ट्रपति चाहे ठीक ढंग से शासन न चलाए जनता उसे निश्चित अवधि से पूर्व नहीं हटा सकती।

6. जनमत के प्रति उत्तरदायी-संसदीय शासन प्रणाली में मन्त्रिमण्डल जनमत के प्रति अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली की अपेक्षा अधिक उत्तरदायी होते हैं। मन्त्रिमण्डल सदैव जनमत के अनुसार शासन चलाता है और जनता के साथ किए गए वायदों को पूरा करने के लिए भरसक प्रयत्न करता है। मन्त्रिमण्डल यह जानता है कि उसका बना रहना जनमत के समर्थन पर निर्भर करता है, इसलिए कोई भी मन्त्रिमण्डल आसानी से जनमत के प्रति उदासीन नहीं रह सकता।

इसके विपरीत अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में शक्तियों के पृथक्करण के कारण सरकार जनमत के प्रति इतना अधिक उत्तरदायी नहीं होती। राष्ट्रपति और मन्त्रिमण्डल के सदस्य कांग्रेस के सदस्य नहीं होते, इसलिए उन्हें जनता के प्रतिनिधियों के द्वारा यह जानने का अवसर प्राप्त नहीं होता कि जनमत क्या चाहता है। इसके अतिरिक्त कार्यपालिका इसलिए जनमत की परवाह नहीं करती क्योंकि उसको पता होता है कि उसका पद पर बने रहना जनमत पर निर्भर नहीं करता और अगले चुनाव तक जनता उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। चुनाव आने पर ही कार्यपालिका जनमत की ओर ध्यान देती है।

निष्कर्ष (Conclusion)—संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि संसदीय शासन-प्रणाली अध्यक्षात्मक शासन-प्रणाली की अपेक्षा अधिक अच्छी है।

प्रश्न 7. क्या आप इस मत से सहमत हैं कि भारत के लिए संसदात्मक सरकार ही अधिक उचित है ? कारण सहित स्पष्ट कीजिए।
(Do you agree with the view that the parliamentary form of government is more suitable to India ? Give reasons.)
उत्तर-कुछ विद्वानों एवं राजनीतिज्ञों का विचार है कि भारत के लिए संसदीय शासन प्रणाली की अपेक्षा अध्यक्षात्मक शासन अधिक उपयुक्त है। इन विद्वानों का मुख्य तर्क यह है कि विधानपालिका अविश्वास प्रस्ताव पेश करके कार्यपालिका को नहीं हटा सकती, जिससे शासन में स्थिरता रहती है। देश की प्रगति के लिए कार्यपालिका का विधानपालिका से स्वतन्त्र होना आवश्यक है ताकि कार्यपालिका अपना सारा समय शासन में लगा सके जबकि संसदीय शासन में कार्यपालिका का काफ़ी समय संसद् में बर्बाद हो जाता है। भारत में बहु-दलीय प्रणाली पाई जाती है जोकि संसदीय शासन के लिए उपयुक्त नहीं है। अतः इन विद्वानों के अनुसार भारत के लिए अध्यक्षात्मक शासन अधिक उपयुक्त है।

परन्तु हमारे विचार से भारत के लिए संसदीय शासन ही अधिक उपयुक्त है। संसदीय शासन प्रणाली स्वतन्त्रता प्राप्ति से लेकर अब तक सफलता से कार्य कर रही है। इसमें शासन संसद् के प्रति उत्तरदायी होता है और संसद् के साथ कार्यपालिका का गहरा सम्बन्ध होने के कारण अच्छे कानूनों का निर्माण होता है। संसदीय शासन को परिस्थितियों के अनुसार बदला जा सकता है और एक अच्छे शासन के लिए यह आवश्यक भी है। अत: भारत के लिए संसदीय शासन उपयुक्त है।
नोट- भारत के लिए संसदीय सरकार उचित होने के वही कारण हैं जो संसदीय सरकार के होते हैं। अतः पिछला प्रश्न देखें।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. संसदीय सरकार किसे कहते हैं ? संसदीय सरकार की परिभाषा दें ।
उत्तर-संसदीय सरकार उस शासन प्रणाली को कहते हैं जिसमें कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। कार्यपालिका (मन्त्रिमण्डल) अपने सभी कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है और तब तक अपने पद पर रह सकती है जब तक उसको विधानपालिका का विश्वास प्राप्त रहता है। जिस समय कार्यपालिका विधानपालिका का विश्वास खो देती है तो कार्यपालिका को अपने पद से त्याग-पत्र देना पड़ता है।

डॉ० गार्नर का मत है, “संसदीय सरकार वह प्रणाली है जिसमें वास्तविक कार्यपालिका-मन्त्रिमण्डल या मन्त्रिपरिषद् अपनी राजनीतिक नीतियों और कार्यों के लिए प्रत्यक्ष तथा कानूनी रूप से विधानमण्डल या उसके एक सदन (प्रायः लोकप्रिय सदन) के प्रति और राजनीतिक तौर पर मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी हो जबकि राज्य का अध्यक्ष संवैधानिक या नाममात्र कार्यपालिका हो और उत्तरदायी हो।”

प्रश्न 2. संसदीय सरकार की चार विशेषताएं लिखें।
उत्तर-संसदीय शासन प्रणाली में निम्नलिखित विशेषताएं पाई जाती हैं-

  1. राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का सत्ताधारी-संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का शासक होता है। सैद्धान्तिक रूप में राज्य की सभी शक्तियों उसके नाम पर होती हैं, परन्तु वास्तव में उन शक्तियों का प्रयोग मन्त्रिमण्डल द्वारा किया जाता है।
  2. मन्त्रिमण्डल वास्तविक कार्यपालिका होती है-राज्य के अध्यक्ष को सौंपी गई शक्तियों का प्रयोग वास्तव में मन्त्रिमण्डल द्वारा किया जाता है।
  3. कार्यपालिका और विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध होना-संसदीय शासन प्रणाली में विधानपालिका और कार्यपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। मन्त्रिमण्डल के सदस्यों के लिए संसद् का सदस्य होना अनिवार्य है और वे संसद् की बैठकों में भाग भी लेते हैं, बिल पेश करते हैं और बिलों पर मतदान करते हैं।
  4. मन्त्रिमण्डल का उत्तरदायित्व-कार्यपालिका अर्थात् मन्त्रिमण्डल अपने सब कार्यों के लिए व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है।

प्रश्न 3. संसदीय सरकार के चार गुणों का वर्णन करो।
उत्तर-संसदीय शासन प्रणाली में निम्नलिखित गुण पाए जाते हैं-

  1. कार्यपालिका तथा विधानपालिका में पूर्ण सहयोग-संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग बना रहता है। मन्त्रिमण्डल के सदस्य विधानपालिका के सदस्य होते हैं, बैठकों में भाग लेते हैं तथा बिल पास करते हैं। कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग के कारण अच्छे कानूनों का निर्माण होता है तथा शासन में दक्षता होती
  2. उत्तरदायी सरकार-संसदीय सरकार में सरकार अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है। यदि मन्त्रिमण्डल अपनी मनमानी करता है तो विधानमण्डल अविश्वास प्रस्ताव पास करके मन्त्रिमण्डल को हटा सकता है।
  3. सरकार निरंकुश नहीं बन सकती-मन्त्रिमण्डल अपने कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होने के कारण निरंकुश नहीं बन सकता।
  4. परिवर्तनशील सरकार-संसदीय सरकार का यह भी गुण है, कि इसमें सरकार परिवर्तनशील होती है। सरकार को समय के अनुसार बदला जा सकता है।

प्रश्न 4. संसदीय सरकार के चार अवगुण बताइए।
उत्तर-संसदीय सरकार में निम्नलिखित दोष पाए जाते हैं-

  1. यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है-संसदीय सरकार शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है। इसमें मन्त्रिमण्डल (कार्यपालिका) के सदस्य संसद् के सदस्य भी होते हैं, जिससे कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। शक्तियों के केन्द्रीयकरण के कारण व्यक्तियों की निजी स्वतन्त्रता खतरे में पड़ सकती है।
  2. अस्थिर सरकार-संसदीय शासन प्रणाली में सरकार अस्थिर होती है, क्योंकि मन्त्रिमण्डल की अवधि निश्चित नहीं होती।
  3. नीति में निरन्तरता की कम सम्भावना-संसदीय शासन प्रणाली में नीति की निरन्तरता की कम सम्भावना रहती है क्योंकि विधानपालिका, कार्यपालिका को जब चाहे अविश्वास प्रस्ताव पास करके हटा सकती है।
  4. शासन में दक्षता का अभाव-संसदीय शासन प्रणाली में शासन में दक्षता का अभाव होता है, क्योंकि इसमें शासन की बागडोर अनाड़ियों के हाथ में होती है।

प्रश्न 5. अध्यक्षात्मक सरकार का अर्थ एवं परिभाषा लिखें।
उत्तर- अध्यक्षात्मक सरकार उस शासन प्रणाली को कहते हैं, जिसमें कार्यपालिका संवैधानिक दृष्टि से विधानपालिका से अपनी नीतियों और कार्यों के लिए स्वतन्त्र होती है। कार्यपालिका विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती और दोनों में कोई सम्बन्ध नहीं होता। विधानपालिका मन्त्रियों को उनके पद से हटा नहीं सकती। राज्य का अध्यक्ष वास्तविक कार्यपालिका होता है और संविधान द्वारा दी गई शक्तियों का प्रयोग अपनी इच्छानुसार करता है। अमेरिका में अध्यक्षात्मक सरकार है।

डॉ० गार्नर के शब्दानुसार, “अध्यक्षात्मक सरकार वह प्रणाली है जिसमें राज्य का अध्यक्ष और मन्त्री अपने कार्यकाल के लिए संवैधानिक तौर पर व्यवस्थापिका से स्वतन्त्र होते हैं और अपनी राजनीतिक नीतियों के लिए उसके प्रति उत्तरदायी नहीं होते। इस प्रणाली में राज्य का अध्यक्ष केवल नाममात्र कार्यपालिका नहीं होता बल्कि वास्तविक कार्यपालिका होता है और संविधान तथा कानूनों द्वारा दी गई शक्तियों का वास्तव में प्रयोग करता है।”

प्रश्न 6. अध्यक्षात्मक सरकार की चार विशेषताएं बताओ।
उत्तर- अध्यक्षात्मक प्रणाली में निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएं होती हैं-

  1. नाममात्र तथा वास्तविक कार्यपालिका में भेद नहीं-अध्यक्षात्मक सरकार में नाममात्र तथा वास्तविक कार्यपालिका में भेद नहीं पाया जाता। राष्ट्र का अध्यक्ष राष्ट्रपति होता है। उसे संविधान द्वारा जो शक्तियां प्राप्त होती हैं उनका प्रयोग वह अपनी इच्छानुसार करता है।
  2. मन्त्रिमण्डल केवल सलाहकार के रूप में अध्यक्षात्मक प्रणाली में भी मन्त्रिमण्डल की व्यवस्था होती है, परन्तु इसकी स्थिति संसदीय प्रणाली के मन्त्रिमण्डल की स्थिति में पूर्णत: भिन्न होती है। अध्यक्ष मन्त्रियों की सलाह के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य नहीं होता। मन्त्री केवल सलाहकार ही होते हैं। उसकी अपनी इच्छा है कि मन्त्रियों से सलाह ले या न ले।
  3. कार्यपालिका और व्यवस्थापिका का पृथक्करण-अध्यक्षात्मक शासन में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका में कोई सम्बन्ध नहीं होता। अध्यक्ष अपने मन्त्री संसद् में से नहीं लेता। मन्त्री संसद् की बैठकों में न भाग ले सकते हैं, न बिल पेश कर सकते हैं, न भाषण दे सकते हैं। इस प्रकार व्यवस्थापिका और कार्यपालिका में कोई सम्बन्ध नहीं रहता है।
  4. कार्यपालिका का अनुत्तरदायित्व-अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका अपने कार्यों तथा नीतियों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती।

प्रश्न 7. अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के चार गुण लिखें।
उत्तर- अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में निम्नलिखित चार गुण पाए जाते हैं-

  1. शासन में स्थिरता-अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति की अवधि निश्चित होती है जिससे शासन में स्थिरता आती है।
  2. इसमें नीति की एकता बनी रहती है-इस शासन प्रणाली में कार्यपालिका एक निश्चित समय तक अपने पद पर रहती है जिससे एक ही नीति निश्चित अवधि तक चलती रहती है।
  3. शासन में दक्षता-यह प्रणाली शक्ति विभाजन के सिद्धान्त पर कार्य करती है। मन्त्रियों को न तो चुनाब लड़ना पड़ता है और न ही संसद् की बैठकों में भाग लेना पड़ता है। उनके पास तो केवल शासन चलाने का कार्य होता है। वे स्वतन्त्रतापूर्वक शासन चलाने में लगे रहते हैं, इससे शासन में दक्षता आना स्वाभाविक है।
  4.   संकटकाल के लिए उचित सरकार- अध्यक्षात्मक सरकार संकटकाल के लिए उचित सरकार मानी जाती है।

प्रश्न 8. अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के चार दोष बताइए।
उत्तर-अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के मुख्य चार दोष नीचे दिए गए हैं-

  1. निरंकुशता का भय-शासन की सभी शक्तियां राष्ट्रपति के पास होती हैं जिससे वह निरंकुश बन सकता है।
  2. शासन की परिस्थितियों के अनुसार नहीं बदला जा सकता- अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है और विधानपालिकाओं की अवधि भी निश्चित होती है। राष्ट्रपति यदि शासन ठीक ढंग से न चलाए तो भी जनता उसे निश्चित अवधि से पहले नहीं हटा सकती।
  3. कार्यपालिका और विधानपालिका में गतिरोध की सम्भावना-अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका के एक-दूसरे से स्वतन्त्र होने के कारण दोनों में गतिरोध उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है।
  4. जनमत की अवहेलना-अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में जनमत की अवहेलना होने की बहुत अधिक सम्भावना रहती है।

प्रश्न 9. संसदीय सरकार और अध्यक्षात्मक सरकार में चार अन्तर लिखें।
उत्तर-संसदीय सरकार और अध्यक्षात्मक सरकार में निम्नलिखित मुख्य अन्तर पाए जाते हैं-

संसदीय सरकार-

  1. संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का मुखिया होता है। व्यवहार में उसकी शक्तियों का प्रयोग मन्त्रिमण्डल के द्वारा किया जाता है।
  2. संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध होता है।
  3. संसदीय सरकार में कार्यपालिका अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है।
  4. संसदीय सरकार में कार्यपालिका की अवधि निश्चित नहीं होती।

अध्यक्षात्मक सरकार-

  1. अध्यक्षात्मक सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का मुखिया न हो कर वास्तविक शासक होता है। संविधान के द्वारा शासन की सभी शक्तियां उसके पास होती हैं और वह उसका प्रयोग अपनी इच्छानुसार करता है।
  2. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका एवं विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध नहीं पाया जाता।
  3. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती।
  4. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका की अवधि निश्चित होती है।

प्रश्न 10. संसदीय शासन प्रणाली और अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में कौन-सी अच्छी सरकार है ? कारण दीजिए।
उत्तर-संसदीय और अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में से संसदीय शासन प्रणाली को निम्नलिखित कारणों से अच्छा माना जाता है-

  1. संसदीय सरकार परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तनशील है।
  2. उत्तरदायी सरकार।
  3. विधानपालिका तथा कार्यपालिका में सहयोग।
  4. अच्छे कानूनों का निर्माण।
  5. संसदीय सरकार जनमत पर आधारित है।

संसदीय सरकार अध्यक्षात्मक सरकार से अच्छी है, इसका यह भी प्रमाण है कि आज संसार के अधिकांश देशों में संसदीय सरकार को अपनाया गया है।

प्रश्न 11. क्या अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली भारत के लिए अधिक उपयुक्त है ?
उत्तर-कुछ विद्वानों एवं राजनीतिज्ञों का विचार है कि भारत के लिए संसदीय शासन प्रणाली की अपेक्षा अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली अधिक उपयुक्त है। इन विद्वानों का मुख्य तर्क यह है कि अध्यक्षात्मक शासन में कार्यपालिका का चुनाव निश्चित अवधि के लिए होता है और विधानपालिका अविश्वास-प्रस्ताव पेश करके कार्यपालिका को नहीं हटा सकती, जिससे शासन में स्थिरता बनी रहती है। भारत में बहुदलीय प्रणाली पाई जाती है जो कि संसदीय शासन के लिए उपयुक्त है। अतः इन विद्वानों के मतानुसार भारत के लिए अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली अधिक उपयुक्त है।

परन्तु हमारे विचार में भारत के लिए संसदीय शासन ही अधिक उपयुक्त है । स्वतन्त्रता प्राप्ति से लेकर अब तक संसदीय शासन प्रणाली सफलता से कार्य कर रही है। इसमें शासन संसद् के प्रति उत्तरदायी होता है और संसद् के साथ कार्यपालिका का गहरा सम्बन्ध होने के कारण अच्छे कानूनों का निर्माण होता है। संसदीय शासन को परिस्थितियों के अनुसार बदला जा सकता है और एक अच्छे शासन के लिए यह आवश्यक भी है। अतः भारत के लिए संसदीय शासन प्रणाली उपयुक्त है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. संसदीय सरकार किसे कहते हैं ?
उत्तर-संसदीय सरकार उस शासन प्रणाली को कहते हैं जिसमें कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। कार्यपालिका (मन्त्रिमण्डल) अपने सभी कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है और तब तक अपने पद पर रह सकती है जब तक उसको विधानपालिका का विश्वास प्राप्त रहता है। जिस समय कार्यपालिका विधानपालिका का विश्वास खो देती है तो कार्यपालिका को अपने पद से त्याग-पत्र देना पड़ता है।

प्रश्न 2. संसदीय सरकार की दो विशेषताएं लिखें।
उत्तर-

  1. राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का सत्ताधारी-संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का शासक होता है।
  2. मन्त्रिमण्डल वास्तविक कार्यपालिका होती है-राज्य के अध्यक्ष को सौंपी गई शक्तियों का प्रयोग वास्तव में मन्त्रिमण्डल द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 3. संसदीय सरकार के दो गुणों का वर्णन करो।
उत्तर-

  1. कार्यपालिका तथा विधानपालिका में पूर्ण सहयोग-संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग बना रहता है।
  2. उत्तरदायी सरकार-संसदीय सरकार में सरकार अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है।

प्रश्न 4. संसदीय सरकार के दो अवगुण बताइए।
उत्तर-

  1. यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है-संसदीय सरकार शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है।
  2. अस्थिर सरकार-संसदीय शासन प्रणाली में सरकार अस्थिर होती है, क्योंकि मन्त्रिमण्डल की अवधि निश्चित नहीं होती।

प्रश्न 5. अध्यक्षात्मक सरकार का अर्थ लिखें।
उत्तर-अध्यक्षात्मक सरकार उस शासन प्रणाली को कहते हैं, जिसमें कार्यपालिका संवैधानिक दृष्टि से विधानपालिका से अपनी नीतियों और कार्यों के लिए स्वतन्त्र होती है। कार्यपालिका विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती और दोनों में कोई सम्बन्ध नहीं होता। विधानपालिका मन्त्रियों को उनके पद से हटा नहीं सकती। राज्य का अध्यक्ष वास्तविक कार्यपालिका होता है और संविधान द्वारा दी गई शक्तियों का प्रयोग अपनी इच्छानुसार करता है। अमेरिका में अध्यक्षात्मक सरकार है।

प्रश्न 6. अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के दो गुण लिखें।
उत्तर-

  1. शासन में स्थिरता-अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति की अवधि निश्चित होती है जिससे शासन में स्थिरता आती है।
  2. इसमें नीति की एकता बनी रहती है-इस शासन प्रणाली में कार्यपालिका एक निश्चित समय तक अपने पद पर रहती है जिससे एक ही नीति निश्चित अवधि तक चलती रहती है।

प्रश्न 7. अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के दो दोष बताइए।
उत्तर-

  1. निरंकुशता का भय-शासन की सभी शक्तियां राष्ट्रपति के पास होती हैं जिससे वह निरंकुश बन सकता है।
  2. शासन की परिस्थितियों के अनुसार नहीं बदला जा सकता-अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है। राष्ट्रपति यदि शासन ठीक ढंग से न चलाए तो भी जनता उसे निश्चित अवधि से पहले नहीं हटा सकती।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1. संसदीय सरकार का क्या अर्थ है ?
उत्तर-संसदीय सरकार में कार्यपालिका अपने कार्यों के लिए संसद् के प्रति उत्तरदायी होती है। वह तब तक अपने पद पर रहती है, जब तक इसको संसद का विश्वास प्राप्त रहता है।

प्रश्न 2. संसदीय सरकार की कोई एक विशेषता बताएं।
उत्तर-संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाम-मात्र का सत्ताधारी होता है।

प्रश्न 3. संसदीय सरकार का कोई एक गुण लिखें।
उत्तर-संसदीय सरकार में कार्यपालिका एवं विधानपालिका में पूर्ण सहयोग रहता है।

प्रश्न 4. संसदीय सरकार का कोई एक अवगुण लिखें।
उत्तर-संसदीय सरकार अस्थिर होती है।

प्रश्न 5. सामूहिक उत्तरदायित्व किस सरकार में पाया जाता है ?
उत्तर-संसदीय सरकार में।

प्रश्न 6. अध्यक्षात्मक सरकार किसे कहते हैं ?
उत्तर-अध्यक्षात्मक सरकार उस शासन प्रणाली को कहते हैं जिसमें कार्यपालिका संवैधानिक दृष्टि से विधानपालिका से अपनी नीतियों और कार्यों के लिए स्वतन्त्र होती है।

प्रश्न 7. संसदीय और अध्यक्षात्मक सरकार में कोई एक अन्तर बताओ।
उत्तर-संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का मुखिया होता है जबकि अध्यक्षात्मक सरकार में राज्य का अध्यक्ष वास्तविक अध्यक्ष होता है।

प्रश्न 8. अध्यक्षात्मक सरकार की कोई एक विशेषता बताओ।
उत्तर-अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में कार्यपालिका का अध्यक्ष वास्तविक अध्यक्ष होता है। शासन की शक्तियों का प्रयोग अध्यक्ष द्वारा ही किया जाता है।

प्रश्न 9. अध्यक्षात्मक सरकार का कोई एक गुण बताओ।
उत्तर-इसमें सरकार स्थिर रहती है।

प्रश्न 10. अध्यक्षात्मक सरकार का कोई एक अवगुण बताओ।
उत्तर-अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति के निरंकुश बनने का भय बना रहता है।

प्रश्न 11. भारतीय राष्ट्रपति किस प्रकार की कार्यपालिका है?
उत्तर- भारतीय राष्ट्रपति नाममात्र की कार्यपालिका है।

प्रश्न 12. भारतीय प्रधानमन्त्री किस प्रकार की कार्यपालिका है?
उत्तर-भारतीय प्रधानमन्त्री वास्तविक कार्यपालिका है।

प्रश्न 13. इंग्लैण्ड की रानी या राजा किस प्रकार की कार्यपालिका है?
उत्तर-इंग्लैण्ड की रानी या राजा नाममात्र की कार्यपालिका है।

प्रश्न 14. इंग्लैण्ड का प्रधानमन्त्री किस प्रकार की कार्यपालिका है?
उत्तर-इंग्लैण्ड में प्रधानमन्त्री वास्तविक कार्यपालिका है।

प्रश्न 15. संसदीय एवं अध्यक्षात्मक सरकार में से किसे श्रेष्ठ समझा जाता है?
उत्तर-संसदीय सरकार को श्रेष्ठ समझा जाता है।

प्रश्न 16. अमेरिका में किस प्रकार की शासन प्रणाली है?
उत्तर-अमेरिका में अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली है।

प्रश्न 17. भारत में संसदीय शासन प्रणाली अपनाने का एक कारण लिखें।
उत्तर-संसदीय परम्पराएं।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. संसदीय शासन प्रणाली में सरकार …………….. की इच्छानुसार शासन को चलाती है।
2. संसदीय सरकार शक्तियों के ……………. के सिद्धान्त के विरुद्ध है।
3. संसदीय सरकार में शासन की …………… का अभाव रहता है।
4. संकटकाल के समय संसदीय सरकार …………… साबित होती है।
उत्तर-

  1. जनमत
  2. पृथक्करण
  3. कुशलता
  4. कमज़ोर।

प्रश्न III. निम्नलिखित में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका विधानपालिका से स्वतन्त्र होती है।
2. अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति नाममात्र का शासक होता है।
3. अध्यक्षात्मक सरकार में मन्त्रिमण्डल के सदस्य विधानपालिका के सदस्य नहीं होते।
4. अध्यक्षात्मक सरकार में नाममात्र तथा वास्तविक कार्यपालिका में भेद नहीं पाया जाता।
5. अध्यक्षात्मक सरकार शक्तियों के पृथक्करण पर आधारित है।
उत्तर-

  1. सही
  2. ग़लत
  3. सही
  4. सही
  5. सही।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1. अध्यक्षात्मक शासन में जनमत की अवहेलना हो सकती है, यह कथन-
(क) सही है
(ख) ग़लत है
(ग) उपरोक्त दोनों
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-(क) सही है।

प्रश्न 2. अध्यक्षात्मक शासन में सरकार में राजनीतिक एकरूपता नहीं होती। यह कथन-
(क) सही है
(ख) ग़लत है
(ग) उपरोक्त दोनों
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-(क) सही है।

प्रश्न 3. संसदीय सरकार में मन्त्रिमण्डल को महाभियोग द्वारा हटाया जाता है, यह कथन-
(क) सही है
(ख) ग़लत है
(ग) उपरोक्त दोनों
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-(ख) ग़लत है ।

प्रश्न 4. अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति को अविश्वास प्रस्ताव पास करके हटाया जाता है। यह कथन-
(क) सही है
(ख) ग़लत है
(ग) उपरोक्त दोनों
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-(ख) ग़लत है ।

Class 7 Social Notes Chapter 3 मुगल साम्राज्य

आपने आगरा का ताजमहल देखा है? दिल्ली का लालकिला! फतेहपुर सीकरी का बुलंद दरवाजा! इन सभी स्थापत्यों का निर्माण मुगल शासकों ने करवाया था।
मुगलशासन की स्थापना से पूर्व सल्तनतयुग का शासन था। इसके उपरांत कुछ राजपूत राज्य भी थे।

मुगल सल्तनत की स्थापना

भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना (1526 ई.) बाबर ने की थी। उसका मूल नाम जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर था। बाबर और इब्राहिम लोदी के बीच (20 अप्रैल, 1526) पानीपत का युद्ध हुआ, जिसे पानीपत का प्रथम युद्ध कहते हैं। बाबर ने इस युद्ध में तोप का उपयोग करके इब्राहिम लोदी को हराया और भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना की।

मुगल शासक

मुगल शासकों में बाबर, हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब का समावेश होता है।
बाबर ( 1526 ई. – 1530 ई.) : बाबर कुशाग्र बुद्धिवाला और शक्तिशाली योद्धा था। वह फारसी और अरबी भाषा का जानकार, प्रकृति प्रेमी और लेखक था। उसने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ (बाबरनामा) लिखी थी, जो विश्वसाहित्य की प्रसिद्ध रचना है।

हुमायूँ (1530 ई. – 1540 ई., 1555 ई. – 1556 ई.) : हुमायूँ 1530 ई. में दिल्ली की गद्दी पर बैठा। हुमायूँ का अर्थ नसीबदार होता है, परंतु उसे जीवन में अनेक मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। उसका गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह और बिहार के शक्तिशाली शासक शेरशाह के साथ युद्ध हुआ (1540 ई.में)। कन्नौज युद्ध में शेरशाह ने हुमायूँ को हराकर उसे भारत से बाहर भगा दिया। हुमायूँ बादशाह से बेरोजगार हो गया और ईरान चला गया। परंतु कुछ वर्षों बाद फिर से भारत पर चढ़ाई की। ईरान के शहंशाह की मदद से (1545 ई.में) उसने काबुल और कंधार जीत लिया तथा (1555 ई.में) भारत पर पुनः अपनी सत्ता स्थापित की।

हुमायूँ अपने पिता की तरह ही पठन-लेखन का शौकीन था। उसने दिल्ली के पास दीनपनाह नगर बसाया था। शाम की प्रार्थना का समय हो जाने से वह पुस्तकालय की सीढ़ियों पर से तेजी से उतर रहा था और अचानक गिर जाने से उसकी मृत्यु हो गई।

शेरशाह सूरी (1540 ई. – 1545 ई.) : शेरशाह अफगान वंश का मुस्लिम था। उसका मूल नाम फरीदखाँ था। हुमायूँ को हराकर उसने भारत में सत्ता स्थापित की थी। वह समाजसुधारक और न्यायप्रिय शासक था। डाकू, लुटेरों को अंकुश में रखकर उसने राज्य में शांति की स्थापना की थी। नई डाक-व्यवस्था बनाई। उसने व्यापारियों
और यात्रियों के लिए धर्मशालाएँ बनवाईं। रुपये का चलन शुरू करवाया। विशाल सेना निर्मित की। उसने एक महान राजमार्ग ग्रांड-ट्रक-रोड का निर्माण करवाया था, जो बंगाल और उत्तर भारत तक फैला हुआ था।

शेरशाह 1545 ई. में तोप का निरीक्षण कर रहा था, तब दुर्घटना होने से उसकी मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद उसके जैसा कोई शक्तिशाली शासक गद्दी पर नहीं बैठा। परिणाम स्वरूप (1555 ई.में) हुमायूँ ने दिल्ली और आगरा पर आक्रमण करके अफगानों को हराकर पुनः मुगल साम्राज्य की स्थापना की।

अकबर (1556 ई. – 1605 ई.) : भारत के इतिहास में राजा के रूप में अकबर का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उसका जन्म 1542 ई. में अमरकोट के हिंदू राजपूत राजा के घर हुआ था। हुमायूँ की मृत्यु के बाद मात्र 14 वर्ष की उम्र में वह दिल्ली का बादशाह बना था। हुमायूँ की मृत्यु के बाद अकबर और हेमू के बीच (1556 ई.में) पानीपत का द्वितीय युद्ध हुआ, जिसमें अकबर की विजय हुई।

अकबर ने पंजाब से बंगाल और दिल्ली से गुजरात तक अधिकांश भाग पर राज्य स्थापित किया था। अकबर और मेवाड़ के राणा प्रताप के बीच बहुत प्रसिद्ध हल्दीघाटी का युद्ध हुआ था। अकबर ने काबुल, कश्मीर, बलूचिस्तान से दक्षिण में अहमदनगर तक अपनी विजययात्रा करके विशाल साम्राज्य का सर्जन किया था। अकबर ने फतेहपुर सीकरी को अपनी राजधानी बनाकर अनेक भवनों का निर्माण करवाया था।

अकबर ने हिन्दुओं के प्रति उदार-नीति अपनाई। उसने राजपूतों के साथ सामाजिक संबंधों की शुरुआत की थी। उसने सेना में राजपूतों की नियुक्ति उच्च पदों पर की। राजपूतों ने भी अपनी वीरता और साहस से अकबर को भारत विजय के लिए खूब मदद की।

अकबर असांप्रदायिक राजा था। उसने सभी धर्मों के श्रेष्ठ तत्त्वों को एकत्र करके दीन-ए-इलाही नामक संप्रदाय की स्थापना की। उसने रामायण, महाभारत, अथर्ववेद, पंचतंत्र, बाइबल और कुरान जैसे महान ग्रंथों का अनुवाद फारसी में करवाया था।

अकबर समाजसुधारक भी था। उसने बाल-विवाह और सतीप्रथा का विरोध किया था। उसने यात्रा-कर रद्द कर दिया था और बलपूर्वक होनेवाले धर्मांतरण पर प्रतिबंध लगा दिया था।

अकबर कालीन भारत आर्थिक रूप से समृद्ध था। उसने सामाजिक सहिष्णुता के युग का प्रारंभ करवाया था। 1605 ई.में उसकी मृत्यु हुई तब अधिकांश भारत मुगल साम्राज्य में समाविष्ट था।

Class 7 Social Notes Chapter 3 मुगल साम्राज्य 1

जहाँगीर (1605 ई. – 1627 ई.): अकबर द्वारा स्थापित महान साम्राज्य को संभालने की विरासत जहाँगीर को मिली। उसने अकबर की नीतियों को चालू रखते हुए हिन्दुओं के साथ अच्छे संबंध स्थापित किए। उसने असम और दक्षिण भारत के गोलकुंडा तक विजय प्राप्त की। उसकी पत्नी नूरजहाँ चतुर और प्रतिभाशाली थी। उसने कई कलाओं को प्रोत्साहन दिया था। जहाँगीर के समय में चित्रकला का खूब विकास हुआ था। वह स्वयं भी महान चित्रकार था। (1627 ई.में) जहाँगीर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र जागोलकंडा शाहजहाँ गद्दी पर बैठा।

Class 7 Social Notes Chapter 3 मुगल साम्राज्य 2

शाहजहाँ (1627 ई. – 1658 ई.) :
शाहजहाँ का उपनाम खुर्रम था। उसने दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त की। वह अपने पिता जितना ही शक्तिशाली और कला-स्थापत्य का प्रेमी था। अपनी पत्नी मुमताज-महल की मृत्यु के बाद उसकी याद में विश्व प्रसिद्ध ताजमहल का निर्माण करवाया था। ताजमहल को दुनिया का अजूबा माना जाता है।

औरंगजेब (1658 ई. – 1707 ई.) : शाहजहाँ की बीमारी का लाभ लेकर उसके पुत्रों के बीच साम्राज्य पर आधिपत्य जमाने के लिए भयंकर आंतरिक विग्रह शुरू हुआ। शाहजहाँ के बड़े बेटे दाराशिकोह और औरंगजेब के बीच मुख्य संघर्ष हुआ। औरंगजेब ने अपने तीनों भाइयों को एक-एक करके हरा दिया। दारा की हत्या करके और मुराद को जेल की सजा देकर उसने गद्दी अपने अधिकार में कर ली। अन्य एक भाई सुजा को पराजित करके देश निकाला दे दिया।

Class 7 Social Notes Chapter 3 मुगल साम्राज्य 3

औरंगजेब ने लगभग 50 वर्ष तक राज किया। उसके राज्य में उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में जिंजी तक और पूर्व में चटगाँव से लेकर पश्चिम में हिंदूकुश पर्वतमाला का विस्तार समाविष्ट था।

औरंगजेब सुन्नी मुस्लिम था और अत्यंत सादा जीवन जीता था। उसने अकबर की धार्मिक नीति का त्याग करके धार्मिक असहिष्णुता अपनाई। वह संगीतकला, मूर्तिपूजा और धार्मिक उत्सवों का विरोधी था। उसके समय में कई विद्रोह हुए। वह एक शक्तिशाली बादशाह था। उसने लंबे समय तक भारत के अधिकांश भाग पर शासन किया। उसकी मत्यु 1707 ई. में हुई। उसकी मृत्यु के बाद निर्बल शासक गद्दी पर आए, जिससे मुगल साम्राज्य का पतन शुरू हो गया।

राणा संग्रामसिंह : बाबर के समकालीन मेवाड़ के राणा संग्रामसिंह राणा सांगा के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। वे वीर और साहसी थे। अनेक युद्धों में विजय प्राप्त की थी। जबकि बाबर के सामने खानवा के युद्ध में उनकी हार हुई और उनका साम्राज्य नहिवत् हो गया।

महाराणा प्रताप : मुगल साम्राज्य में अकबर का सामना करनेवाले महाराणा प्रताप मेवाड़ के प्रतापी राजा थे। अकबर ने मेवाड़ पर आक्रमण किया, जिससे दोनों के बीच हल्दीघाटी का युद्ध हुआ। अकबर विजयी हुआ, परंतु राणा प्रताप ने उदयपुर के आसपास के विस्तारों में अपनी सत्ता स्थापित की, संघर्ष चलता ही रहा। दोनों के बीच समझौते के लिए कई प्रयत्न हुए, लेकिन राणा चितौड़ छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने गुरिल्ला युद्ध चालू | रखा। 1576 ई. में हल्दीघाटी की पराजय के बाद राणा प्रताप ने गोगुंदा को राजधानी बनाया और जीवन के अंत तक युद्ध करते रहे। बाद में डुंगरपुर के चावंड में अपनी राजधानी बनाई। 51 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई।

Class 7 Social Notes Chapter 3 मुगल साम्राज्य 4

वीर दुर्गादास राठौड़ : दुर्गादास राठौड़ मारवाड़ के शासक जसवंतसिंह के मंत्री अशकरण राठौड़ के पुत्र थे। उनकी तुलना राणा प्रताप के साथ की जाती है। औरंगजेब के समय में उन्होंने उसका आधिपत्य स्वीकार्य नहीं किया था।

छत्रपति शिवाजी : भारत के महानतम राजाओं में स्थान रखनेवाले छत्रपति शिवाजी मराठा साम्राज्य के स्थापक थे। 1627 ई. में उनका जन्म शिवनेरी (महाराष्ट्र) में हुआ था। माता जीजाबाई और पिता शाहजी की संतान शिवाजी के जीवन पर उनके समर्थ गुरु रामदास और दादा कोंडदेव का व्यापक प्रभाव था। उन्होंने छोटी जागीर में से महान मराठा राज्य का विस्तार करने के लिए 40 से भी अधिक किलों पर विजय प्राप्त की थी। मुगल बादशाह औरंगजेब और बीजापुर के साथ उन्होंने लम्बे समय तक संघर्ष करके विजय प्राप्त की थी।

1665 ई. में मुगल सम्राट से पराजित होने पर उसके साथ संधि करनी पड़ी। औरंगजेब ने उन्हें जेल में भी बंद किया था, परंतु चालाकी-पूर्वक वहाँ से वे निकल गए। पुनः संघर्ष करके उन्होंने विजय प्राप्त की। 1674 ई. में राजगढ़ में उनका राज्याभिषेक हुआ था और उन्हें हिंदू सम्राट के रूप में प्रसिद्धि मिली।

वे महान विजेता होने के उपरांत कुशल प्रशासक और संगठनकर्ता थे। उनके मंत्रिमंडल को अष्टप्रधान मंडल कहा जाता था। 1680 ई. में उनकी मृत्यु हुई।

Class 7 Social Notes Chapter 3 मुगल साम्राज्य 5

मुगल साम्राज्य – राज्यव्यवस्था

मुगल प्रशासनतंत्र की व्यवस्थित स्थापना अकबर द्वारा हुई थी। शासन के केन्द्र में बादशाह रहता था और उसे सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद थी। बादशाह सर्वोच्च सेनापति और न्यायाधीश होता था। बादशाह और प्रशासन तंत्र के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए वजीर की नियुक्ति की जाती थी। वह दीवान-ए-वजीरे-कुल कहलाता था। वह वित्त और राजस्व व्यवस्था का प्रमुख होता था। सेना प्रमुख को मीरबख्श कहा जाता था। जो सैनिकों की भर्ती और सेना के अधिकारियों की नियुक्ति करता था। वह गुप्तचर तंत्र की देखरेख भी करता था। मुगल प्रशासनिकतंत्र के गुप्तचर को वाकयानवीस कहते थे।

सम्राट की व्यक्तिगत जरूरतों का ध्यान रखने के लिए मीर-ए-साँमा नामक विभाग था। जो सरकारी कारखानों का सर्वोच्च था। न्यायालय का सर्वोच्च काज़ी था।

भू-राजस्व व्यवस्था : अकबर ने भारत में एक नई भू-राजस्व व्यवस्था का आरंभ किया। उसे मनसबदारी व्यवस्था कहा जाता था। भू-राजस्व की दर वार्षिक उपज का 1 भाग जितना था। अकबर की भू-राजस्व व्यवस्था का स्थापक टोडरमल था। मनसबदारी पद्धति सेना और भू-राजस्व दोनों के साथ जुड़ी थी। मनसब अर्थात् जागीर और मनसबदार जागीर का सर्वोच्च अधिकारी माना जाता था। जो जागीर में से राजस्व की वसूली करता और उस विस्तार की कानून-व्यवस्था को बनाए रखता था। इसके लिए उसे जागीर के अनुसार सेना दी जाती थी। वह अपने विस्तार का सर्वोच्च न्यायाधीश भी माना जाता था। नियत समय पर उसका तबादला किया जाता था। मुगल मनसबदार की व्यवस्था विश्व में अनोखी थी और विश्व में सबसे अधिक वेतन वाली थी।

मुगलकालीन संस्कृति

मुगलयुग में भारतीय संस्कृति का बहुमुखी विकास हुआ था। हिंदू और मुस्लिम संस्कृति का समन्वय हुआ था। जिसे गंगा-यमुना संस्कृति के रूप में जाना जाता है। मुगलों ने अनेक किलों, महलों, दरवाजों, मस्जिदों और बगीचों का निर्माण करवाया था।

  • बाबर ने आगरा और लाहौर में बगीचों का निर्माण करवाया था।
  • शेरशाह ने सासाराम में मकबरा और दिल्ली में मस्जिद बनवाई थी।
  • अकबर ने आगरा का किला बनवाया था और आगरा से 36 किमी दूर फतेहपुर सीकरी में विशिष्ट निर्माणकार्य करवाया था। जिसमें गुजरात विजय की याद में बने बुलंद दरवाजा, सलीम चिश्ती की दरगाह, मस्जिद और पंचमहल का समावेश होता है।
  • जहाँगीर के समय निर्माण कार्य में संगमरमर का उपयोग बढ़ गया था।
  • शाहजहाँ का समय मुगल साम्राज्य के स्थापत्य का स्वर्णयुग माना जाता है। उसने आगरा में ताजमहल और मोती मस्जिद तथा दिल्ली में प्रसिद्ध लालकिला का निर्माण करवाया था।
  • औरंगजेब ने अपनी पत्नी की याद में औरंगाबाद में राबिया-उद-दौरानी का मकबरा बनवाया था, जो ताजमहल जैसा ही कलात्मक है।

चित्रकला : मुगल चित्रकला विश्वविख्यात थी। जहाँगीर के समय में उसका खूब विकास हुआ था। मुगल शासक श्रेष्ठ चित्रकारों को दिल्ली में आमंत्रित करते थे। अकबर के समय में जशवंत और बसावन नामक महान चित्रकार थे। उन्होंने फारसी कथाओं, महाभारत के अनुवाद की पुस्तकों और अकबरनामा में ढेरों सुंदर चित्र बनाए थे। जहाँगीर का मनसूर नामक चित्रकार विश्वविख्यात था। जहाँगीर ने एक चित्रशाला का निर्माण करवाया था।
इस समय राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हिमाचलप्रदेश और दक्षिण के राज्यों में भी चित्रकला का विकास हुआ था।

साहित्य : मुगल राजा साहित्य के पोषक थे। वे अच्छे लेखक थे। इस समय फारसी, अरबी, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में व्यापक साहित्य की रचना हुई थी।
अबुल फज़ल ने ‘अकबरनामा’ नामक ग्रंथ में अकबर का जीवन-परिचय लिखा था। उसने महाभारत का अनुवाद किया था। भारतीय भाषाओं में श्रीकृष्ण के जीवन पर आधारित खूब साहित्य लिखा गया था। मराठी में एकनाथ, ज्ञानेश्वर और स्वामी रामदास ने भक्तिसाहित्य की रचना की थी।

संगीत : अकबर संगीत का ज्ञाता था। उसके नौ रत्नों में तानसेन महान शास्त्रीय गायक थे। जिन्होंने अनेक रागों पर रचना की थी।

समापन

1526 ई. में स्थापित मुगल साम्राज्य 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के बाद पतन की तरफ बढ़ने लगा। किसी शक्तिशाली शासक के अभाव में भारत छोटे-छोटे राज्यों में बँट गया। जिसमें मुगलवंश के निर्बल शासकों, हैदराबाद के निज़ाम, बंगाल-बिहार के नवाबों, राजस्थान के राजपूत राज्यों, मराठा, पंजाब के सिख राज्य आदि का समावेश होता है। ये सभी राज्य एक-दूसरे से लड़ते रहते थे। परिणाम स्वरूप वे निर्बल होते गए। ऐसी स्थिति में यूरोप से व्यापार करने आईं कंपनियाँ भारत में अपना शासन स्थापित करने का स्वप्न देखने लगीं।

Class 11 Sociology Solutions स्रोत आधारित प्रश्न

प्रश्न 1. निम्नलिखित स्रोत को पढ़ें तथा साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें-
19वीं सदी में प्राकृतिक विज्ञानों ने बहुत प्रगति की। प्राकृतिक विज्ञानों के क्षेत्र में काम कर रहे लोगों द्वारा प्राप्त सफलता ने बड़ी संख्या में समाज, विचारकों को उनका अनुकरण करने के लिए प्रेरित किया। उनका मानना था कि यदि प्राकतिक विज्ञान की पद्धतियों से भौतिक विश्व में भौतिक या प्राकृतिक प्रघटनाओं को सफलतापूर्वक समझा जा सकता है तो उन्हीं पद्धतियों को सामाजिक विश्व की सामाजिक प्रघटनाओं को समझने में भी सफलतापूर्वक प्रयुक्त किया जा सकता है। अगस्त कोंत, हरबर्ट स्पेंसर, एमिल दुर्खाइम, मैक्स वेबर जैसे विद्वानों तथा अन्य समाजशास्त्रियों ने समाज का अध्ययन विज्ञान की पद्धतियों से करने का समर्थन किया क्योंकि वे प्राकृतिक वैज्ञानिकों की खोजों से प्रेरित थे और समान तरीके से ही समाज का अध्ययन करना चाहते थे।

(i) किस कारण सामाजिक विचारक प्राकृतिक विज्ञानों का अनुकरण करने के लिए प्रेरित हुए ?
(ii) किन समाजशास्त्रियों ने समाज का अध्ययन किया ?
(ii) समाजशास्त्रियों का प्राकृतिक विज्ञानों की पद्धतियों के बारे में क्या विचार था ?
उत्तर- (i) 19वीं शताब्दी में प्राकृतिक विज्ञानों के क्षेत्र में कार्य कर रहे लोगों को काफी सफलता प्राप्त हुई। इस कारण सामाजिक विचारक प्राकृतिक विज्ञानों का अनुकरण करने के लिए प्रेरित हुए।
(ii) अगस्त कोंत, हरबर्ट स्पेंसर, एमिल दुर्खाइम, मैक्स वेबर जैसे समाजशास्त्रियों ने समाज का गहनता से अध्ययन किया।
(iii) समाजशास्त्रियों का मानना था कि जैसे प्राकृतिक विज्ञान की पद्धतियों से प्राकृतिक घटनाओं को आसानी से समझा जा सकता है तो उन्हीं पद्धतियों की सहायता से सामाजिक विश्व की सामाजिक प्रघटनाओं को भी सफलतापूर्वक समझा जा सकता है।

प्रश्न 2. निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें
यूरोप और अमेरिका में, 19वीं सदी के बाद समाजशास्त्र एक विषय के रूप में विकसित हुआ। हालांकि, भारत में, यह न केवल थोड़ी देर से उभरा अपितु अध्ययन के एक विषय के रूप में इसे कम महत्त्व दिया गया। तथापि, स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भारत में समाजशास्त्र के महत्त्व में वृद्धि हुई और देश के लगभग सभी विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम मे एक स्वतंत्र विषय के रूप में स्थान प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए एक विषय के रूप मे भी पहचान बनायी। राधा कमल मुखर्जी, जी० एस० धुर्ये, डी० पी० मुखर्जी, डी० एन० मजूमदार, के० एम० कपाडिया, एम० एन० श्रीनिवास, पी० एन० प्रभु, ए० आर० देसाई इत्यादि कुछ महत्त्पूर्ण विद्वान हैं जिन्होंने भारतीय समाजशास्त्र के विकास में योगदान दिया।

(i) एक विषय के रूप में समाजशास्त्र यूरोप में कब विकसित हुआ ?
(ii) कुछ भारतीय समाजशास्त्रियों के नाम बताएं जिन्होंने भारतीय समाजशास्त्र के विकास में योगदान दिया।
(iii) भारत में समाजशास्त्र कैसे विकसित हुआ ?
उत्तर- (i) यूरोप तथा अमेरिका में समाजशास्त्र एक विषय के रूप में 19वीं शताब्दी के पश्चात् काफी तेज़ी से विकसित हुआ।
(ii) राधा कमल मुखर्जी, जी० एस० घुर्ये, डी० पी० मुखर्जी, डी० एन० मजूमदार, के० एम० कपाड़िया, एम० एन० श्रीनिवास, पी० एन० प्रभु, ए० आर० देसाई जैसे भारतीय समाजशास्त्रियों ने भारतीय समाजशास्त्र के विकास में काफी योगदान दिया।
(iii) 1947 से पहले भारत में समाजशास्त्र का विकास तेज़ी से न हो पाया क्योंकि भारत पराधीन था। परन्तु स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत में समाजशास्त्र तेजी से विकसित हुआ तथा देश के लगभग सभी विश्वविद्यालयों में इसे एक स्वतन्त्र विषय के रूप में पढ़ाया जाने लगा। इसके अतिरिक्त, इसे विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में भी प्रयोग किया जाने लगा जिस कारण यह तेजी से विकसित हुआ।

प्रश्न 3. निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें-
मॉरिस गिंसबर्ग के अनुसार, ऐतिहासिक रूप से समाजशास्त्र की जड़ें राजनीति तथा इतिहास के दर्शन में हैं। इस कारण से समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान पर निर्भर करता है। प्रत्येक सामाजिक समस्या का एक राजनीतिक कारण है। राजनीतिक व्यवस्था या शक्ति संरचना की प्रकृति में किसी भी प्रकार का परिवर्तन समाज में भी परिवर्तन लाता है। विभिन्न राजनीतिक घटनाओं को समझने के लिए समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान से मदद लेता है। इसी तरह, राजनीति विज्ञान भी समाजशास्त्र पर पर निर्भर करता है। राज्य अपने नियमों, अधिनियमों और कानूनों का निर्माण सामाजिक प्रथाओं, परम्पराओं तथा मूल्यों के आधार पर करता है। अतः बिना समाजशास्त्रियों पृष्ठभूमि के राजनीति विज्ञान का अध्ययन अधूरा होगा। लगभग सभी राजनीतिक समस्याओं की उत्पत्ति सामाजिक है तथा इन राजनीतिक समस्याओं के समाधान के लिए राजनीति विज्ञान समाजशास्त्र की सहायता लेता है।

(i) मॉरिस गिंसबर्ग के अनुसार समाजशास्त्र राजनीति पर क्यों निर्भर है ?
(ii) गिंसबर्ग के अनुसार बिना समाजशास्त्रीय पृष्ठभूमि के राजनीति विज्ञान का अध्ययन क्यों अधूरा है ?
(ii) किस प्रकार राजनीति विज्ञान समाजशास्त्र की सहायता लेता है ?
उत्तर-(i) गिंसबर्ग के अनुसार ऐतिहासिक रूप से समाजशास्त्र की जड़ें राजनीति व इतिहास के दर्शन में हैं। इसलिए समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान पर निर्भर है।
(ii) गिंसबर्ग के अनुसार राज्य जब भी अपने नियम अथवा कानून बनाता है, उसे सामाजिक मूल्यों, प्रथाओं, परम्पराओं का ध्यान रखना पड़ता है। इस कारण बिना समाजशास्त्रीय पृष्ठभूमि के राजनीति विज्ञान का अध्ययन अधूरा है।
(iii) गिंसबर्ग के अनुसार लगभग सभी राजनीतिक समस्याओं की उत्पत्ति समाज में से ही होती है तथा समाज का अध्ययन समाजशास्त्र करता है। इस लिए जब भी राजनीति विज्ञान को समाज का अध्ययन करना होता है, उसे समाजशास्त्र की सहायता लेनी ही पड़ती है।

प्रश्न 4. निम्न दिए स्त्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें
विभिन्न समाज विज्ञानों में समाज का भिन्न अर्थ लगाया जाता है, परन्तु समाजशास्त्र में इसका प्रयोग विभिन्न प्रकार की सामाजिक इकाइयों के संदर्भ में होता है। समाजशास्त्र का मुख्य ध्यान मानव समाज पर तथा इसमें पाये जाने वाले सम्बन्धों के नेटवर्क/जाल पर होता है। एक समाज में समाजशास्त्री सामाजिक प्राणियों के अन्तः सम्बन्धों का अध्ययन करते हैं तथा यह ज्ञात करते हैं कि एक विशिष्ट स्थिति में एक व्यक्ति कैसे व्यवहार करता है, उसे दूसरों से क्या उम्मीद करनी चाहिए तथा दूसरे उससे क्या उम्मीदें/अपेक्षाएं करते हैं।

(i) समाज शब्द का प्रयोग अलग-अलग समाज विज्ञानों में अलग-अलग क्यों है ?
(ii) समाजशास्त्र में समाज का क्या अर्थ है ?
(iii) समाज व एक समाज में क्या अंतर है ?
उत्तर- (i) अलग-अलग समाज विज्ञान समाज के एक विशेष भाग का अध्ययन करते हैं। जैसे अर्थशास्त्र पैसे से संबंधित विषय का अध्ययन करता है। इस कारण वह समाज शब्द का अर्थ भी अलग-अलग ही लेते हैं।
(ii) समाजशास्त्र में सम्बन्धों के जाल को समाज कहा जाता है। जब लोगों के बीच सम्बन्ध स्थापित हो जाते हैं तो समाज का निर्माण होना शुरू हो जाता है। इस प्रकार सामाजिक सम्बन्धों के जाल को समाज कहते हैं।
(iii) जब हम समाज की बात करते हैं तो यह सभी समाजों को इक्ट्ठे लेते हैं तथा अमूर्त रूप से उसका अध्ययन करते हैं परन्तु एक समाज में हम किसी विशेष समाज की बात कर रहे होते हैं जैसे कि भारतीय समाज या अमेरिकी समाज। इस कारण यह मूर्त समाज हो जाता है।

प्रश्न 5. निम्न दिए स्त्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें-
समुदाय किसी भी आकार का एक सामाजिक समूह है जिसके सदस्य एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में निवास करते हैं, अक्सर एक सरकार तथा एक सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक विरासत को सांझा करते हैं। समुदाय से अभिप्राय लोगों के एक समुच्चय से भी लिया जाता है जो समान प्रकार के कार्य या गतिविधियों में संलग्न रहते हैं जैसे प्रजातीय समुदाय, धार्मिक समुदाय, एक राष्ट्रीय समुदाय, एक जाति समुदाय या एक भाषायी समुदाय इत्यादि। इस अर्थ में यह समान विशेषताओं या पक्षों वाले एक सामाजिक, धार्मिक या व्यावसायिक समूह का प्रतिनिधित्व करता है तथा वहद समाज जिसमें यह रहता है, से स्वयं को कुछ अर्थों में भिन्न प्रदर्शित करता है। अत: समुदाय का अभिप्राय एक विशाल क्षेत्र में फैले लोगों से है जो एक या अन्य किसी प्रकार से समानताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। उदाहरण के लिए, ‘अन्तर्राष्ट्रीय समदाय’ या ‘एन० आर० आई० समुदाय’ जैसे शब्द समान विशेषताओं से निर्मित कुछ सुसंगत समूहों के रूप में साहित्य में प्रयुक्त किये जाते हैं।

(i) समुदाय का क्या अर्थ है ?
(ii) समुदाय की कुछ उदाहरण दीजिए।
(iii) समुदाय तथा समिति में दो अंतर बताएं।
उत्तर- (i) समुदाय किसी भी आकार का एक सामाजिक समूह है जिसके सदस्य एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में निवास करते हैं, अक्सर एक सरकार तथा एक सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक विरासत को सांझा करते हैं।
(ii) अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, भारतीय समुदाय, पंजाबी समुदाय इत्यादि समुदाय के कुछ उदाहरण हैं।
(iii) (a) समुदाय स्वयं ही निर्मित हो जाता है परन्तु समिति को जानबूझ कर किसी विशेष उद्देश्य से निर्मित किया जाता है।
(b) सभी लोग स्वत: ही किसी न किसी समुदाय का सदस्य बन जाते हैं परन्तु समिति की सदस्यता ऐच्छिक होती है अर्थात् व्यक्ति जब चाहे किसी समिति की सदस्यता ले तथा छोड़ सकता है।

प्रश्न 6. निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें
सामाजिक समूह व्यक्तियों का संगठन है जिसमें दो या दो से अधिक व्यक्तियों के मध्य अंतः क्रियाएँ पाई जाती हैं। इसमें वे व्यक्ति आते हैं, जो एक दूसरे के साथ अंतःक्रिया करते हैं, और अपने को अलग सामाजिक इकाई मानते हैं। समूह में सदस्यों की संख्या को दो से सौ व्यक्तियों की श्रेणी में रखा जा सकता है। इसके साथ, सामाजिक समूह की प्रकृति गतिशील होती है, इसकी गतिविधियों में समय-समय पर परिवर्तन आता रहता है। सामाजिक समूह के अन्तर्गत व्यक्तियों में अंतक्रियाएँ व्यक्तियों को अन्यों से पहचान के लिए भी प्रेरित करती हैं। समूह, आमतौर पर स्थिर तथा सामाजिक इकाई है। उदाहरण के लिए, परिवार, समुदाय, गाँव आदि, समूह विभिन्न संगठित क्रियाएँ करते हैं, जोकि समाज के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

(i) सामाजिक समूह का क्या अर्थ है ?
(ii) क्या भीड़ को समूह कहा जा सकता है ? यदि नहीं तो क्यों ?
(iii) प्राथमिक व द्वितीय समूह का क्या अर्थ है ?
उत्तर-(i) व्यक्तियों के उस संगठन को सामाजिक समूह कहा जाता है, जिसमें व्यक्तियों के बीच अन्तक्रियाएँ पाई जाती हैं। जब लोग एक-दूसरे के साथ अन्तक्रियाएं करते हैं तो उनके बीच समूह का निर्माण होता है।
(ii) जी नहीं, भीड़ को समूह नहीं कहा जा सकता क्योंकि भीड में लोगों के बीच अन्तक्रिया नहीं होगी।
अगर अन्तक्रिया नहीं होगी तो उनमें संबंध नहीं बन पाएंगे। जिस कारण समूह का निर्माण नहीं हो पाएगा।
(iii) प्राथमिक समूह-वह समूह जिसके साथ हमारा सीधा, प्रत्यक्ष ब रोज़ाना का संबंध होता है उसे हम प्राथमिक समूह कहते हैं। जैसे-परिवार, मित्र समूह, स्कूल इत्यादि। द्वितीय समूह-वह समूह जिसके साथ हमारा प्रत्यक्ष व रोज़ाना का संबंध नहीं होता उसे हम द्वितीय
समूह कहते हैं। जैसे कि मेरे पिता का ऑफिस।

प्रश्न 7. निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर देंद्वितीय समूह लगभग प्राथमिक समूह के विपरीत होते हैं। कूले ने द्वितीय समूह के बारे में नहीं बताया, जब वह प्राथमिक समूह के सम्बन्ध में बता रहे थे। बाद में, विचारकों ने प्राथमिक समूह से द्वितीय समूह के विचार को समझा। द्वितीय समूह वे समूह हैं, जो आकार में बड़े होते हैं तथा थोड़े समय के लिए होते हैं। सदस्यों में विचारों का आदान-प्रदान औपचारिक, उपयोग-आधारित, विशेष तथा अस्थायी होता है। क्योंकि इसके सदस्य अपनी-अपनी, भूमिकाओं तथा किये जाने वाले कार्यों के कारण ही आपस में जुड़ें होते हैं। दुकान के मालिक एवं ग्राहक, क्रिकेट मैच में इकट्टे हुए लोग तथा औद्योगिक संगठन इसके उत्तम उदाहरण हैं। कारखाने के मजदूर, सेना, कॉलेज का विद्यार्थी-संगठन-विश्व-विद्यालय के विद्यार्थी, एक राजनैतिक दल आदि भी द्वितीय समूह के अन्रा उदाहरण हैं।

(i) द्वितीय समूह का क्या अर्थ है ?
(ii) द्वितीय समूह की कुछ उदाहरण दें।
(iii) प्राथमिक व द्वितीय समूहों में दो अंतर दें।
उत्तर- (i) वह समूह जिनके साथ हमारा सीधा व प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता, जिनकी सदस्यता हम अपनी इच्छा से ग्रहण करके कभी भी छोड़ सकते हैं, उसे द्वितीय समूह कहा जा सकता है।
(ii) पिता का दफ़तर, माता का ऑफिस, पिता का मित्र समूह, राजनीतिक दल, कारखाने के मजदूर इत्यादि द्वितीय समूह की उदाहरण हैं।
(iii) (a) प्राथमिक समूह आकार में काफ़ी छोटे होते हैं परन्तु द्वितीय समूह आकार में काफी बड़े होते हैं।
(b) प्राथमिक समूह के सदस्यों के बीच अनौपचारिक व प्रत्यक्ष संबंध होते हैं परन्तु द्वितीय समूह के सदस्यों के बीच औपचारिक व अप्रत्यक्ष संबंध होते हैं।

प्रश्न 8. निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें-
संस्कृतियां एक समाज से दूसरे समाज तक भिन्नता रखती हैं तथा हर एक संस्कृति के अपने मूल्य तथा मापदण्ड होते हैं। सामाजिक मूल्य समाज द्वारा मान्यता प्राप्त व्यवहारों के नियम हैं जबकि मूल्य से अभिप्राय, उस सामान्य पक्ष से है कि “क्या ठीक है या अभिलाषित व्यवहार है” तथा “क्या नहीं होना चाहिए”मान्य से संबंधित है। उदाहरण के लिए किसी एक संस्कृति में सत्कार को उच्च सामाजिक मूल्य माना जाता है जबकि अन्य समाज मे ऐसा नहीं होता। सामान्यतः कुछ समाजों में बहुपत्नी प्रथा को एक पारम्परिक रूप का विवाह माना जाता है जबकि अन्य समाजों में इसे एक उपयुक्त प्रथा नहीं माना जाता।

(i) संस्कृति का क्या अर्थ है ?
(ii) क्या दो देशों की संस्कृति एक सी हो सकती है?
(iii) संस्कृति के प्रकार बताएं।
उत्तर- (i) आदिकाल से लेकर आज तक जो कुछ भी मनुष्य ने अपने अनुभव से प्राप्त किया है, उसे संस्कृति कहते हैं। हमारे विचार अनुभव, विज्ञान, तकनीक, वस्तुएं, मूल्य, परंपराएं इत्यादि सब कुछ संस्कृति का ही हिस्सा हैं।
(ii) जी नहीं, दो देशों की संस्कृति एक सी नहीं हो सकती। चाहे दोनों देशों के लोग एक ही धर्म से क्यों न संबंध रखते हों, उनके विचारों, आदर्शों, मूल्यों इत्यादि में कुछ न कुछ अंतर अवश्य रहता है। इस कारण उनकी संस्कृति भी अलग होती है।
(iii) संस्कृति के दो प्रकार होते हैं-
(a) भौतिक संस्कृति-संस्कृति का वह भाग जिसे हम देख व स्पर्श कर सकते हैं, भौतिक संस्कृति कहलाता है। उदाहरण के लिए कार, मेज़, कुर्सी, पुस्तकें, पैन, इमारतें इत्यादि। (b) अभौतिक संस्कृति-संस्कृति का वह भाग जिसे हम देख या स्पर्श नहीं कर सकते, उसे अभौतिक संस्कृति कहते हैं। उदाहरण के लिए हमारे मूल्य, परंपराएं, विचार, आदर्श इत्यादि।

प्रश्न 9. निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें-
जीवन के विभिन्न स्तरों के दौरान व्यक्ति भिन्न-भिन्न संस्थाओं, समुदायों तथा व्यक्तियों के संपर्क में आता है। अपने संपूर्ण जीवन के दौरान वे बहुत कुछ सीखता है। व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में विभिन्न अभिकरण तथा संगठन महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं तथा संस्कृति के विभिन्न तत्त्वों का संस्थापन करते हैं। प्रत्येक समाज के समाजीकरण के अभिकरण होते हैं जैसे व्यक्ति, समूह, संगठन तथा संस्थाएं जो कि जीवन क्रम के समाजीकरण के लिए पर्याप्त मात्रा प्रदान करते हैं। अभिकरण वह क्रिया विधि है जिसके द्वारा स्वयं विचारों, विश्वासों एवं संस्कृति के व्यावहारिक प्रारूपों को सीखता है। अभिकरण नए सदस्यों को समाजीकरण की सहायता से अनेक स्थानों को ढूंढ़ने में सहायता करते हैं उसी प्रकार जैसे वे समाज के वृद्धावस्था को नई जिम्मेदारियों के लिए तैयार करते हैं।

(i) समाजीकरण का क्या अर्थ है ?
(ii) समाजीकरण के साधनों के नाम बताएं।
(iii) अभिकरण क्या है ?
उत्तर- (i) समाजीकरण एक सीखने की प्रक्रिया है। पैदा होने से लेकर जीवन के अंत तक मनुष्य कुछ न कुछ सीखता रहता है जिसमें जीवन जीने व व्यवहार करने के तरीके शामिल होते हैं। इस सीखने की प्रक्रिया को हम समाजीकरण कहते हैं।
(ii) परिवार, स्कूल, खेल समूह, राजनीतिक संस्थाएं, मूल्य, परम्पराएं इत्यादि समाजीकरण के साधन अथवा अभिकरण के रूप में कार्य करती हैं।
(iii) अभिकरण वह क्रिया विधि है जिसकी सहायता से व्यक्ति विचारों विश्वास व संस्कृति में व्यावहारिक प्रारूपों को सीखता है। अभिकरण नए सदस्यों को समाजीकरण की सहायता से अनेकों स्थानों को ढूंढने में सहायता करते हैं। इस प्रकार वृद्धावस्था में नए उत्तरदायित्वों को संभालने को तैयार होता है।

प्रश्न 10. निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें
यद्यपि धर्म की महत्ता लोगों में अब कम हो गई है जबकि कुछ पीढ़ियां पहले, यह हमारे विचारों, मूल्यों और व्यवहारों को भी काफी प्रभावित करती थीं। भारत जैसे देश में धर्म हमारे जीवन के हर पक्ष को नियंत्रित करता है और यह समाजीकरण का एक शक्तिशाली अभिकर्ता (एजेंट) होता है।
कई प्रकार के धार्मिक संस्कार एवं कर्मकाण्ड, विश्वास एवं श्रद्धा, मूल्य एवं मापदण्ड धर्म के अनुसार ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होते हैं। धार्मिक त्योहार आमतौर पर सामूहिक रूप से निभाये जाते हैं जोकि समाजीकरण की प्रक्रिया में सहायता करते हैं। धर्म के सहारे ही एक बच्चा एक अलौकिक शक्ति (भगवान) के बारे में सीखता है कि यह हमें बुरी आत्माओं तथा बुराई से बचाती है। यह देखा जाता है कि अगर एक व्यक्ति के माता-पिता धार्मिक होते हैं तो जब एक बच्चा बड़ा होगा वो भी धार्मिक बनता जाएगा।

(i) धर्म क्या है ?
(ii) धर्म की समाजीकरण में क्या भूमिका है ?
(iii) क्या आज धर्म का महत्त्व कम हो रहा है ? यदि हाँ तो क्यों ?
उत्तर- (i) धर्म और कुछ नहीं बल्कि एक अलौकिक शक्ति में विश्वास है जो हमारी पहुँच से बहुत दूर है। यह विश्वासों, मूल्यों, परंपराओं इत्यादि की व्यवस्था है जिसमें इस धर्म के अनुयायी विश्वास करते हैं।
(ii) धर्म का समाजीकरण में काफी महत्त्व है क्योंकि व्यक्ति धर्म के मूल्यों, परंपराओं के विरुद्ध कोई कार्य नहीं करता । बचपन से ही बच्चों को धार्मिक मूल्यों की शिक्षा दी जाती है जिस कारण व्यक्ति शुरू से ही अपने धर्म से जुड़ जाता है। वह कोई ऐसा कार्य नहीं करता जो धार्मिक परंपराओं के विरुद्ध हो। इस प्रकार धर्म व्यक्ति पर नियन्त्रण भी रखता है और उसका समाजीकरण भी करता है।
(iii) यह सत्य है कि आजकल धर्म का महत्त्व कम हो रहा है। लोग आजकल अधिक शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं व विज्ञान की तरफ उनका झुकाव काफी बढ़ रहा है। परन्तु धर्म में तर्क का कोई स्थान नहीं होता जो विज्ञान में सबसे महत्त्वपूर्ण है। इस प्रकार लोग अब धर्म के स्थान पर विज्ञान को महत्त्व दे रहे हैं।

प्रश्न 11. निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें-
विवाह महिलाओं एवं पुरुषों की शारीरिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक आवश्यकताओं को संतुष्ट करने के लिए निर्मित एक संस्था है। यह पुरुष एवं महिला को परिवार निर्मित करने हेतु एक दूसरे से सम्बन्ध स्थापित करने की अनुमति देता है। विवाह का प्राथमिक उद्देश्य स्थायी सम्बन्धों के द्वारा यौनिक क्रियाओं को नियन्त्रित करना है। सरल शब्दों में, विवाह को एक ऐसी संस्था के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो पुरुषों एवं महिलाओं को पारिवारिक जीवन में प्रवेश करने, बच्चों को जन्म देने तथा पति, पत्नी तथा बच्चों से सम्बन्धित विभिन्न अधिकारों और दायित्वों का निर्वाह करने की अनुमति प्रदान करता है। समाज एक पुरुष एवं महिला के मध्य वैवाहिक सम्बन्धों को एक धार्मिक संस्कार के रूप में अपनी अनुमति प्रदान करता है। विवाहित दंपति एक दूसरे के प्रति तथा सामान्य तौर पर समाज के प्रति अनेक दायित्वों का निर्वाह करते हैं। विवाह एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक उद्देश्य को भी पूरा करता है यह उत्तराधिकार से सम्बद्ध सम्पत्ति अधिकार को परिभाषित करता है। इस प्रकार, हम समझ सकते हैं कि विवाह एक पुरुष और महिला के बीच बहु-आयामी सम्बन्धों को व्यक्त करता है।

(i) विवाह का क्या अर्थ है ?
(ii) हिन्दू धर्म में विवाह को क्या कहते हैं ?
(iii) क्या आजकल विवाह का महत्त्व कम हो रहा है ?
उत्तर-
(i) विवाह एक ऐसी संस्था है जो पुरुष-स्त्री को पारिवारिक जीवन में प्रवेश करने, बच्चों को जन्म देना तथा पति-पत्नी व बच्चों से संबंधित विभिन्न अधिकारों और दायित्वों का निर्वाह करने की अनुमति प्रदान करता है।
(ii) हिन्दू धर्म में विवाह को धार्मिक संस्कार माना जाता है क्योंकि विवाह बहुत से धार्मिक अनुष्ठान करके पूर्ण किया जाता है।
(iii) जी हाँ, यह सत्य है कि आजकल धर्म का महत्त्व कम हो रहा है। आजकल विवाह को धार्मिक
संस्कार न मानकर समझौता माना जाता है जिसे कभी भी तोड़ा जा सकता है। आजकल तो बहुत से युवक व युवतियों ने बिना विवाह किए इक्ट्ठे रहना शुरू कर दिया है जिससे विवाह का महत्त्व कम हो रहा है।

प्रश्न 12. निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें
परिवार का अध्ययन इसलिये महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह पुरुषों और स्त्रियों तथा बच्चों को एक स्थाई सम्बन्धों में बांधकर मानव समाज के निर्माण में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संस्कृति का हस्तान्तरण परिवारों के भीतर होता है। सामाजिक प्रतिमानों, प्रथाओं तथा मूल्यों के विषय में सांस्कृतिक समझ तथा ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित होते हैं। एक परिवार जिसमें बच्चा जन्म लेता है उसे जन्म का परिवार’ कहते हैं। दूसरे शब्दों में, ऐसे परिवार को समरक्त परिवार कहते हैं जिसके सदस्य रक्त सम्बन्धों के आधार पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं जैसे भाई एवं बहिन तथा पिता और पुत्र इत्यादि।वह परिवार जो विवाह के बाद निर्मित होता है उसे ‘प्रजनन का परिवार’ या दापत्यमूलक परिवार कहते हैं जो ऐसे व्यस्क सदस्यों से निर्मित होता है जिनके बीच यौनिक सम्बन्ध होते हैं।

(i) परिवार किसे कहते हैं ?
(ii) जन्म का परिवार व दापत्यमूलक परिवार किसे कहते हैं ? ।
(ii) परिवार का अध्ययन क्यों महत्त्वपूर्ण है ?
उत्तर-
(i) परिवार पुरुष व स्त्री के मेल से बनी ऐसी संस्था है जिसमें उन्हें लैंगिक संबंध स्थापित करने, संतान उत्पन्न करने व उनका भरण पोषण करने की आज्ञा होती है।
(ii) एक परिवार जिसमें बच्चा जन्म लेता है उसे जन्म का परिवार कहते हैं। वह परिवार जो विवाह के बाद निर्मित होता है इसे दापत्यमूलक अथवा प्रजनन परिवार कहते हैं।
(iii) परिवार का अध्ययन काफी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह पुरुष, स्त्री व बच्चों को एक स्थायी बंधन में बाँधकर रखता है। इससे परिवार समाज निर्माण मे महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। परिवार ही संस्कृति के हस्तांतरण में सहायता करता है। सामाजिक प्रथाओं, प्रतिमानों, व्यवहार करने के तरीकों में हस्तांतरण में भी परिवार समाज की सहायता करता है। इस प्रकार परिवार हमारे जीवन में व समाज निर्माण में सहायक होता है।