Class 11 Sociology Questions and Answers Chapter 12 पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions):

प्रश्न 1. मार्क्स के अनुसार समाज में कितने वर्ग होते हैं ?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच।
उत्तर-(A) दो।

प्रश्न 2. इनमें से कौन-सा वर्ग का प्रकार मार्क्स ने दिया था जो हरेक समाज में मौजूद होता है ?
(A) पूंजीपति वर्ग
(B) श्रमिक वर्ग
(C) दोनों (A + B)
(D) कोई नहीं।
उत्तर-(C) दोनों (A + B)।

प्रश्न 3. कार्ल मार्क्स ने समाज में वर्ग संघर्ष का कौन-सा कारण दिया है ?
(A) पूंजीपति वर्ग द्वारा श्रमिक वर्ग का शोषण
(B) श्रमिक वर्ग द्वारा पूंजीपति वर्ग का शोषण
(C) दोनों वर्गों में ऐतिहासिक दुश्मनी
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-(A) पूंजीपति वर्ग द्वारा श्रमिक वर्ग का शोषण।

प्रश्न 4. इनमें से कौन-सा संकल्प मार्क्स ने समाजशास्त्र को दिया था ?
(A) वर्ग संघर्ष
(B) ऐतिहासिक भौतिकवाद
(C) अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-(D) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 5. दुर्खीम का जन्म कब हुआ था ?
(A) 1870
(B) 1858
(C) 1864
(D) 1868.
उत्तर- (B) 1858.

प्रश्न 6. फ्रांस में समाजशास्त्र में काम्ते का उत्तराधिकारी किसे कहा जाता है ?
(A) वैबर
(B) मार्क्स
(C) दुखीम
(D) स्पैंसर।
उत्तर-(C) दुर्खीम।

प्रश्न 7. इनमें से कौन-सी पुस्तक दुर्खीम ने लिखी थी ?
(A) Division of Labour in Society
(B) Suicide-A Study of Sociology
(C) The Rules of Sociological Method
(D) All of these.
उत्तर-(D) All of these.

प्रश्न 8. इनमें से कौन-सा सिद्धान्त दुर्खीम ने दिया था ?
(A) श्रम विभाजन
(B) सामाजिक तथ्य
(C) आत्महत्या का सिद्धांत
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-(D) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 9. दुर्खीम ने सामाजिक तथ्य के कितने प्रकार दिए हैं ?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच।
उत्तर-(B) तीन।

प्रश्न 10. दुर्खीम ने इनमें से सामाजिक तथ्य का कौन-सा प्रकार दिया था ?
(A) बाध्यता
(B) बाहरीपन
(C) सर्वव्यापकता
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-(D) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 11. इनमें से कौन-सा संकल्प वैबर ने समाजशास्त्र को दिया है ?
(A) सत्ता
(B) आदर्श प्रारूप
(C) सामाजिक क्रिया
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-(D) उपर्युक्त सभी।

II. रिक्त स्थान भरें (Fill in the blanks) :

1. कार्ल मार्क्स …………… दार्शनिक थे।
2. मैक्स वैबर ने सामाजिक …………. का सिद्धांत दिया था।
3. श्रम विभाजन का सिद्धांत …………. ने दिया था।
4. ऐतिहासिक योगदान का संकल्प …………… ने दिया था।
5. कार्ल मार्क्स ने वर्ग ………….. का सिद्धांत दिया था।
6. वैबर अनुसार ………….. धर्म पूँजीवाद को सामने लाने के लिए उत्तरदायी है।
7. आत्महत्या का सिद्धांत ………….. ने दिया था।
उत्तर-

  1. जर्मन,
  2. क्रिया,
  3. दुर्खीम,
  4. कार्ल मार्क्स,
  5. संघर्ष,
  6. प्रोटैस्टैंट,
  7. दुर्खीम।

III. सही/गलत (True/False) :

1. दुर्खीम फ्रांस में पैदा हुआ था।
2. दुर्खीम ने तीन प्रकार की आत्महत्या के बारे में बताया था।
3. वैबर ने चार प्रकार की सत्ता का वर्णन किया था।
4. मार्क्स के अनुसार समाज में तीन प्रकार के वर्ग होते हैं।’
5. मजदूर वर्ग पूँजीपति वर्ग का शोषण करता है।
6. सामाजिक एकता का सिद्धांत दुर्खीम ने दिया था।
उत्तर-

  1. सही,
  2. सही,
  3. गलत,
  4. गलत,
  5. गलत,
  6. सही।

IV. एक शब्द/पंक्ति वाले प्रश्न उत्तर (One Wordline Question Answers) :

प्रश्न 1. समाजशास्त्र का जन्मदाता किसे कहा जाता है ?
उत्तर- अगस्ते काम्ते को समाजशास्त्र का जन्मदाता कहा जाता है।

प्रश्न 2. समाजशास्त्र शब्द का प्रयोग पहली बार कब किया गया था ?
उत्तर-समाजशास्त्र शब्द का प्रयोग पहली बार 1839 में किया गया था।

प्रश्न 3. कार्ल मार्क्स कब तथा कहाँ पैदा हुए थे ?
उत्तर-कार्ल मार्क्स 5 मई, 1818 को प्रशिया के राईन प्रांत के ट्रियर शहर में पैदा हुए थे।

प्रश्न 4. कार्ल मार्क्स को कब तथा कहां डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त हुई थी ?
उत्तर-कार्ल मार्क्स को 1841 को जेना विश्वविद्यालय से डाक्टरेट की उपाधि मिली थी।

प्रश्न 5. Communist Menifesto कब तथा किसने लिखी थी ?
उत्तर-Communist Menifesto सन् 1848 को मार्क्स तथा ऐंजल्स ने लिखा था।

प्रश्न 6. कार्ल मार्क्स की मृत्यु कब हुई थी ?
उत्तर-कार्ल मार्क्स की मृत्यु 14 मार्च,1883 को हुई थी।

प्रश्न 7. मार्क्स के अनुसार समाज में कितने वर्ग होते हैं ?
उत्तर-मार्क्स के अनुसार समाज में दो प्रमुख वर्ग होते हैं-पूँजीपति वर्ग तथा श्रमिक वर्ग।

प्रश्न 8. मार्क्स ने समाजशास्त्र को कौन-से संकल्प दिए हैं ?
उत्तर-मार्क्स ने समाजशास्त्र को वर्ग संघर्ष, ऐतिहासिक भौतिकवाद, सामाजिक परिवर्तन, अलगाव एवं अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत दिए हैं।

प्रश्न 9. दुीम को फ्रांस में तथा समाजशास्त्र में किसका उत्तराधिकारी माना जाता है ?
उत्तर-दुर्खीम को समाजशास्त्र में काम्ते का उत्तराधिकारी माना जाता है।

प्रश्न 10. दुखीम किस विश्वविद्यालय में प्रोफैसर नियुक्त हए थे ?
उत्तर-दुर्खीम पैरिस विश्वविद्यालय में प्रोफैसर नियुक्त हुए थे।

प्रश्न 11. दुर्जीम ने समाजशास्त्र को कौन-से सिद्धांत दिए थे ?
उत्तर-दुर्खीम ने समाजशास्त्र को सामाजिक तथ्य, आत्महत्या, धर्म, श्रम विभाजन इत्यादि जैसे सिद्धांत दिए थे।

प्रश्न 12. वैबर के अनुसार सत्ता के कितने प्रकार हैं ?
उत्तर-वैबर के अनुसार सत्ता के तीन प्रकार होते हैं-परंपरागत, वैधानिक व करिश्मई।

प्रश्न 13. वैबर के अनुसार कौन-सा धर्म विकास के लिए उत्तरदायी है ?
उत्तर-वैबर के अनुसार पूँजीवाद के विकास के लिए प्रोटैस्टैंट धर्म उत्तरदायी है।

प्रश्न 14. वैबर ने समाजशास्त्र को क्या योगदान दिया है ?
उत्तर-वैबर ने सत्ता के प्रकार, आदर्श प्रारूप, सामाजिक क्रिया, पूँजीवाद, प्रोटैस्टैंट धर्म की व्याख्या इत्यादि जैसे संकल्पों का योगदान दिया है।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. पूँजीवादी वर्ग क्या होता है ?
उत्तर-मार्क्स के अनुसार पूँजीवादी वर्ग ऐसा वर्ग होता है जिसके पास उत्पादन के सभी साधन होते हैं तथा वह सभी उत्पादन के साधनों का मालिक होता है जिनकी सहायता से वह अन्य वर्गों का शोषण करता है। अपने साधनों की सहायता से वह पैसे कमाता है तथा आराम का जीवन व्यतीत करता है। मार्क्स ने अनुसार एक दिन मज़दूर वर्ग इस वर्ग की सत्ता उखाड़ फेंकेगा।

प्रश्न 2. मज़दूर वर्ग क्या होता है ?
उत्तर-मार्क्स के अनुसार मज़दूर वर्ग के पास उत्पादन के साधनों की मल्कियत नहीं होती। उसके पास कोई पूँजी या पैसा नहीं होता। उसके पास रोटी कमाने के लिए अपना परिश्रम बेचने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं होता। वह हमेशा पूँजपति वर्ग के हाथों शोषित होता रहता है। इस शोषण के कारण वह निर्धन होता जाता है।

प्रश्न 3. पूँजीवाद क्या होता है ?
उत्तर-पूँजीवाद एक आर्थिक व्यवस्था है जिसमें निजी सम्पत्ति की प्रधानता होती है तथा बाजार पर सरकारी नियन्त्रण न के बराबर होता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा तथा योग्यता के अनुसार कमाने का अधिकार होता है। पूँजीवाद में पूँजीपति अपने पैसे से और पैसा कमाता है तथा मजदूर वर्ग का शोषण करता है।

प्रश्न 4. सामाजिक एकता क्या है ?
उत्तर-दुर्खीम के अनुसार प्रत्येक समाज के कुछ मूल्य, आदर्श, विश्वास, व्यवहार के तरीके, संस्थाएं तथा कानून प्रचलित होते हैं जो समाज को बाँध कर रखते हैं। ऐसे तत्त्वों के कारण समाज में एकता बनी रहती है। इनके कारण समाज में संबंध बने रहते हैं तथा यह समाज में एकता उत्पन्न करते हैं जिसे हम सामाजिक एकता कहते हैं।

प्रश्न 5. श्रम विभाजन क्या है ?
उत्तर-दुर्खीम के अनुसार श्रम विभाजन का अर्थ अलग-अलग लोगों अथवा वर्गों में उनके सामर्थ्य तथा योग्यता के अनुसार कार्य का विभाजन करना है ताकि कार्य संगठित तरीके से पूर्ण किया जा सके। इसे ही श्रम विभाजन कहा जाता है। यह प्रत्येक समाज में पाया जाता है। इसकी उत्पत्ति नहीं बल्कि विकास होता है।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. आध्यात्मिक पड़ाव।
उत्तर-काम्ते की सैद्धान्तिक स्कीम में आध्यात्मिक पड़ाव बहुत महत्ता रखता है। उसके अनुसार इस अवस्था में मानव के विचार काल्पनिक थे। मानव सब वस्तुओं को परमात्मा के रूप में या किसी आलौकिक जीव की उस समय की क्रियाओं के परिणामस्वरूप में देवता मानता व समझता था। धारणा यह होती थी कि सभी वस्तुएं चाहे निर्जीव हो व सजीव हैं या कार्यरूप अलौकिक शक्तियां हैं अर्थात् सब वस्तुओं में वही शक्ति व्यापक है। धार्मिक पड़ाव में मानव के बारे चर्चा करते काम्ते कहते हैं कि इस अवस्था में सृष्टि के ज़रूरी स्वभाव की खोज करना या प्राकृतिक घटनाओं के होने के अन्तिम कारणों को जानने के यत्न में मानव का दिमाग यह मान लेता है कि सब घटनाएं अलौकिक प्राणियों की तत्कालीन घटनाओं का प्रमाण है। यह आगे तीन उप पड़ावों-प्रतीक पूजन, बहुदेवतावाद व ऐकेश्वरवाद में बांटा है।

प्रश्न 2. अधिभौतिक पड़ाव।
उत्तर- इस पड़ाव को काम्ते आधुनिक समाज का क्रान्तिकाल भी कहते हैं। यह पड़ाव पांच शताब्दियों तक 14वीं से 19वीं तक चला। इसे दो भागों में बाँट सकते हैं। प्रथम भाग में क्रान्तिक आन्दोलन स्वयं ही चल पड़ा। क्रान्तिक फिलासफी 16वीं सदी में प्रोटैस्टैंटवाद के आने से आरम्भ हुई। यहां ध्यान रखने योग्य बात यह है कि रोमन कैथोलिक वाद में आत्मिक व दुनियावी ताकतों के बिछड़ने से आध्यात्मिक सवालों के सामाजिक हालतों पर भी विचार करने का हौसला दिलाया। दूसरा भाग 16वीं सदी से आरम्भ हुआ। इस समय में नकारात्मक सिद्धान्त शुरू हुआ जिसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक परिवर्तन था। इसमें प्रोटैस्टैन्टवाद हमारे सामने आया। इसमें बेरोक निरीक्षण का अधिकार था और यह विचार दिया कि निरीक्षण की कोई सीमा नहीं है जिस कारण आत्मिकता का पतन हुआ जिसका दुनियावी पक्ष पर भी असर हुआ।

प्रश्न 3. सकारात्मक पड़ाव।
उत्तर-इस पड़ाव को काम्ते औद्योगिक समाज के तौर पर देखता है तथा वे इसकी शुरुआत भी 14वीं सदी से ही मानते हैं। इस पड़ाव में सिद्धान्त व उसके प्रयोग में एक अन्तर पैदा हुआ। बौद्धिक कल्पना तीन अवस्थाओं में बांटी गई। ये है औद्योगिक या असली, एस्थैटिक या शाब्दिक व वैज्ञानिक या फिलास्फीकल। यह तीन अवस्थाएं प्रत्येक विषय के प्रत्येक पक्ष से मेल खाती हैं। औद्योगिक योजना का विशेष गुण राजनीतिक आजादी का होना है व इन्कलाबी पात्र का होना है। काम्ते सबसे ज्यादा महत्ता फिलास्फी व विज्ञान को देता है। उसका विचार है कि सकारात्मक पड़ाव में इन दोनों की बढ़त होती है इस पड़ाव की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें सामाजिक व्यवस्था व विकास में कोई द्वन्द नहीं होता है।

प्रश्न 4. सकारात्मकवाद।
उत्तर-काम्ते के अनुसार सकारात्मकवाद का अर्थ वैज्ञानिक विधि है वैज्ञानिक विधि वह विधि है, जिसमें किसी विषय वस्तु के समझने व परिभाषित करने के लिए कल्पना या अनुमान का कोई स्थान नहीं होता। यह तो परीक्षण अनुभव वर्गीकरण व तुलना व ऐतिहासिक विधि की एक व्यवस्थित कार्य प्रणाली होती है। इस तरह परीक्षण, अनुभव, वर्गीकरण तुलना व ऐतिहासिक विधि द्वारा किसी विषय के बारे में सब कुछ समझना व उसके द्वारा ज्ञान प्राप्त करना सकारात्मकवाद है। सकारात्मकवाद का सम्बन्ध वास्तविकता से है कल्पना से नहीं। इसका सम्बन्ध उन निश्चित तथ्यों से है न कि अस्पष्ट विचारों से जिनका पूर्व ध्यान सम्भव है। सकारात्मकवाद वह प्रणाली है जो कि सर्वव्यापक रूप में सब को मान्य है।

प्रश्न 5. सामाजिक स्थैतिकी।
उत्तर-काम्ते ने समाज शास्त्र की इस शाखा की परिभाषा देकर लिखा है, समाज शास्त्र के स्थैतिकी अध्ययन से मेरा अभिप्राय सामाजिक प्रणाली के विभिन्न भागों में होने वाली क्रियाओं व प्रतिक्रियाओं से सम्बन्धित नियमों की खोज करने से है। काम्ते अनुसार सामाजिक स्थैतिकी में हम विभिन्न संस्थाओं व उनके बीच सम्बन्धों की चर्चा करते हैं। कृषि समाज को केवल उसकी विभिन्न संस्थाओं के अन्तर्सम्बन्धों की व्यवस्था के रूप में समझा जा सकता है।

प्रश्न 6. सामाजिक गतियात्मकता।
उत्तर-काम्ते के अनुसार समाज शास्त्र की दूसरी शाखा सामाजिक गतिशीलता में समाज की विभिन्न इकाइयों के विकास व उनमें होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है। काम्ते के विचार में सामाजिक गति आत्मिकता के नियम केवल बड़े समाज में ही स्पष्ट रूप में देखे जा सकते हैं। इस सम्बन्ध में काम्ते का निश्चित विचार था कि सामाजिक परिवर्तन के कुछ निश्चित पड़ावों में से निकलते हैं व उनमें लगातार प्रगति होती है।

प्रश्न 7. वर्ग संघर्ष।
उत्तर-कार्ल मार्क्स ने प्रत्येक समाज में दो वर्गों की विवेचना की है। उसके अनुसार प्रत्येक समाज में दो विरोधी वर्ग एक शोषण करने वाला व दूसरा शोषित होने वाला वर्ग होते हैं, जिनमें संघर्ष होता है इसी को मार्क्स वर्ग संघर्ष कहते हैं । शोषण करने वाला वर्ग जिसको वह पूंजीपति वर्ग या Bourgouisses का नाम देता है उसके पास उत्पादन के साधन होते हैं और वह इन उत्पादन के साधनों से अन्य वर्गों को दबाता है। दूसरा वर्ग जिसके वह मजदूर वर्ग या Proletariats का नाम देता है। उसके पास उत्पादन के कोई साधन नहीं होते। उसके पास रोजी कमाने के लिए केवल अपनी मेहनत बेचने के अलावा कुछ नहीं होता। वह पूंजीपति वर्ग से हमेशा शोषित होता है। इन दोनों में हमेशा एक संघर्ष चलता रहता है। इसी को मार्क्स ने वर्ग संघर्ष का नाम दिया है।

प्रश्न 8. मार्क्स के अनुसार किस समय वर्ग एवं वर्ग संघर्ष का अन्त हो जाएगा?
उत्तर-मजदूर वर्ग के नेतृत्व में वर्ग संघर्ष के द्वारा राज्य पर अधिकार हो जाने के पश्चात् समाजवाद के युग का आरम्भ होगा। मार्क्स के अनुसार, राज्य शोषक ‘वर्ग के हाथों’ में दमन का बहुत बड़ा हाथ होता है। क्रान्ति के बाद भी सामन्तवाद व पूंजीवाद के दलाल प्रति क्रान्ति की कोशिश करते हैं। इसलिए पूंजीवाद के समाजवाद में जान कर संक्रमण काल में मजदूर की सत्ता की अस्थायी अवस्था होगी। समाजवाद की स्थापना के बाद शोषण का अन्त हो जाने पर वर्ग खत्म हो जाएगा व प्रत्येक व्यक्ति को अपने श्रम के अनुसार उत्पादन का लाभ मिलेगा। पर साम्यवाद की अधिक उन्नत अवस्था में प्रत्येक को उसकी ज़रूरत के अनुसार ही मिलने लग जाएगा। धीरे-धीरे राज्य जो शोषक वर्ग का हथियार रहा है, बिखर जाएगा व इसकी जगह आपसी सहयोग व सहकारिता के अनुसार पर आधारित संस्थाएं ले लेंगी। वर्गों व वर्ग संघर्ष का अन्त हो जाएगा।

प्रश्न 9. पूंजीवादी वर्ग।
उत्तर-मार्क्स ने पूंजीवादी वर्ग की धारणा दी है। उस अनुसार, समाज में एक वर्ग ऐसा होता है जिसके पास उत्पादन के साधन होते हैं वह जो सभी उत्पादन के साधनों का मालिक होता है। वह अपने उत्पादन के साधनों की मदद से और वर्गों का शोषण करता है। इन साधनों की मदद से वे और पैसे कमाते हैं और अमीर हुए जाते हैं। इस पैसे व उत्पादन के साधनों की मलकीयत करके आराम की ज़िन्दगी व्यतीत करता है। यह एक प्रगतिशील वर्ग होता है। जो थोड़े समय में ही शक्तिशाली उत्पादन शक्ति का मालिक हो गया है, वह यहां आकर यदि उन्नति को रोकते हैं व मजदूर वर्ग का शोषण करते हैं एक दिन आएगा जब मज़दूर वर्ग, इस वर्ग की सत्ता उखाड़ फेंकेगे व समाजवादी समाज की स्थापना करेंगे।

प्रश्न 10. मज़दूर वर्ग।
उत्तर-मार्क्स के अनुसार, समाज में दो वर्ग होते हैं। पूंजीपति वर्ग व मज़दूर वर्ग। इस मज़दूर वर्ग के पास उत्पादन के साधनों की मलकियत नहीं होती। उसके पास कोई पूंजी (पैसा) नहीं होती। उसके पास अपनी रोजी कमाने के लिए अपनी मेहनत बेचने के अलावा और कोई तरीका नहीं होता। वह हमेशा पूंजीपति वर्ग के हाथों शोषित होता रहता है। पूंजीपति वर्ग हमेशा उनसे अधिक-से-अधिक काम लेता रहता है व कम-से-कम पैसा देता है। उसकी मेहनत ही अतिरिक्त मूल्य का उत्पादन करती है तथा उसको पूंजीपति वर्ग ही रखता है। इस शोषण के कारण ही मज़दूर वर्ग और ग़रीब होता जाता है। एक दिन दोनों में संघर्ष छिड़ जाएगा अन्त में मजदूर वर्ग पूंजीपति वर्ग को उखाड़ गिराएगा व समाजवादी समाज की स्थापना करेगा।

प्रश्न 11. वैधानिक सत्ता।
उत्तर-जहां कहीं भी नियमों की ऐसी प्रणाली है जो निश्चित सिद्धान्तों के अनुसार न्यायिक व प्रशासनिक रूप से की जाती है व जो एक नियमित समूह के सभी सदस्यों के लिए सही व मानने योग्य होती है, वहां व्यापक सत्ता है। जो व्यक्ति आदर्श की शक्ति को चलाते हैं वह विशेष रूप से श्रेष्ठ होते हैं। वह कानून द्वारा सारी विधि के अनुसार नियुक्त होते हैं या चुने जाते हैं और वे वैधानिक व्यवस्था को चलाने के लिए आप निर्देशित रहते हैं।
जो व्यक्ति बिना आदेशों के अधीन हैं वह वैधानिक रूप से समान हैं वह विधान का पालन करते हैं न कि उस विधान में काम करने वालों का। यह नियम उस उपकरण के लिए उपयोग किए जाते हैं जो वैधानिक सत्ता की प्रणाली का उपयोग करते हैं। यह संगठन स्वयं अबाध्य होते हैं। इसके अधिकारी उन नियमों के अधीन होते हैं जो इसकी सत्ता की सीमा निर्धारित करते हैं।

प्रश्न 12. परम्परागत सत्ता।
उत्तर-इस प्रकार की सत्ता में एक व्यक्ति की वैधानिक नियमों के अन्तर्गत एक पद पर बैठे होने के कारण नहीं बल्कि परम्परा के द्वारा माने हुए पदों पर बैठे होने के कारण प्राप्त होती है। चाहे इस पद को परम्परागत व्यवस्था के अनुसार परिभाषित किया जाता है। इस कारण ऐसे पद पर बैठे होने के कारण व्यक्ति को कुछ विशेष सत्ता मिल जाती है। उस प्रकार की सत्ता परम्परागत विश्वासों पर टिकी होने के कारण परम्परागत सत्ता कहलाती है। जैसे क्षेत्रीय युग में भारतीय गाँवों में मिलने वाली पंचायत में पंचों की सत्ता को ही ले लो। इन पंचों की सत्ता की तुलना भगवान् की सत्ता की तुलना से की जाती थी जैसे कि पंच परमेश्वर की धारणा में दिखाई देता था। उसी प्रकार पितृसत्तात्मक परिवार में पिता को परिवार से सम्बन्धित सभी विषयों में जो अधिकार पर सत्ता प्राप्त होती है उसका भी आधार वैधानिक न होकर परम्परा होता है।

प्रश्न 13. चमत्कारी सत्ता।
उत्तर-व्यक्तिगत सत्ता का स्रोत परम्परा से बिल्कुल भिन्न भी हो सकता है। आदेश की शक्ति एक नेता भी प्रयोग कर सकता है चाहे वह एक पैगम्बर हो, नायक हो, या अवसरवादी नेता हो पर ऐसा व्यक्ति तो ही चमत्कारी नेता हो सकता है जब वह सिद्ध कर दे कि तान्त्रिक शक्तियां देवी शक्तियां नायकत्व या अन्य अभूतपूर्व गुणों के कारण उसके पास चमत्कार है।

इस प्रकार यह सत्ता न तो वैधानिक नियमों पर व न ही परम्परा पर बल्कि कुछ करिश्मा या चमत्कार पर आधारित होती हैं। इस प्रकार की शक्ति केवल उन व्यक्तियों के पास सीमित होती है जिनके पास चमत्कारी शक्तियां होती हैं इस प्रकार की सत्ता प्राप्त करने में व्यक्ति को काफ़ी समय लग जाता है व पर्याप्त यानी पूरे साधनों, कोशिशों के बाद ही लोगों द्वारा यह सत्ता स्वीकार की जाती है। दूसरे शब्दों में एक व्यक्ति के द्वारा अपने व्यक्तित्व का विकास इस प्रकार किया जाता है कि लोग यह समझने लगें कि उसने अपने व्यक्तित्व में कोई चमत्कारी शक्ति का विश्वास कर लिया है। इसके बल पर ही वह और लोगों को अपने सामने झुका लेता है। व्यक्तियों द्वारा सत्ता स्वीकार कर ली जाती है। इस तरह करिश्माई नेता अपने प्रति या अपने लक्ष्य या आदर्श के प्रतिनिष्ठा के नाम पर दूसरों से आज्ञापालन करने की माँग करता है। जादूगर, पीर, पैगम्बर, अवतार, धार्मिक नेता, सैनिक योद्धा, दल के नेता इसी तरह की सत्ता सम्पन्न व्यक्ति होते हैं। लोग इसी कारण ऐसे लोगों की सत्ता स्वीकार कर लेते हैं।

प्रश्न 14. सामाजिक क्रिया।
उत्तर-वैबर अनुसार सामाजिक क्रिया व्यक्तिगत क्रिया से भिन्न है। इसकी परिभाषा देते हुए वैबर ने लिखा है कि, “किसी भी क्रिया को करने वाले व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा लिए गए Subjective अर्थ के अनुसार उस क्रिया में दूसरे व्यक्तियों के मन के भावों पर क्रियाओं का समावेश हो तथा उसी के अनुसार गतिविधि निर्धारित हो।” वैबर के अनुसार सामाजिक क्रिया और व्यक्तियों के भूत, वर्तमान या होने वाले व्यवहार द्वारा प्रभावित हो सकती है व हर प्रकार की बाहरी क्रिया सामाजिक क्रिया नहीं हो सकती।

प्रश्न 15. पूंजीवाद के मुख्य लक्षण बताओ।
उत्तर-

  • पूजीवाद में पूंजीपति का कमाए हुए लाभ पर पूरा अधिकार होता है।
  • पूंजीवाद में ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करने की कोशिश की जाती है ताकि अधिक-से-अधिक लाभ उठाया जा सके।
  • व्यापार को वैज्ञानिक तरीके से किया या चलाया जाना चाहिए।
  • उत्पादन हमेशा बाज़ार के सामने रखकर या बेचने के लिए किया जाता है।
  • लेखा-जोखा रखने की उन्नत विधि अपनाई जाती है।

प्रश्न 16. सामाजिक तथ्य क्या है?
उत्तर-विभिन्न प्रकार के समाजों में कुछ ऐसे तथ्य होते हैं, जो भौतिक प्राणीशास्त्री व मनोवैज्ञानिक तथ्यों से अलग होते हैं। दुर्खीम इस प्रकार के तथ्यों को सामाजिक तथ्य मानते हैं। दुर्खीम ने सामाजिक तथ्यों की कुछ परिभाषा दी है। एक जगह दुर्खीम लिखते हैं, “सामाजिक तथ्य काम करने, सोचने व अनुभव करने के वे तरीके हैं जिस में व्यक्तिगत चेतना से बाहर भी अस्तित्व को बनाए रखने की उल्लेखनीय विशेषता होती है।”

एक अन्य स्थान पर दुर्खीम ने लिखा है, “सामाजिक तथ्यों में काम करने, सोचने, अनुभव करने के तरीके शामिल है, जो व्यक्ति के लिए बाहरी होते हैं व जो अपनी दबाव शक्ति के मध्यम से व्यक्ति को निर्धारित करते अपनी किताब के प्रथम Chapter की आखिरी पंक्तियों में इसकी विस्तार सहित परिभाषा पेश करते हुए लिखा है, “एक सामाजिक तथ्य क्रिया करने का प्रत्येक स्थायी, अस्थायी तरीका है, जो आदमी पर बाहरी दबाव डालने में समर्थ होता है या दोबारा क्रिया करने का प्रत्येक तरीका जो किसी समाज में आम रूप से पाया जाता है पर साथ ही साथ व्यक्तिगत विचारों से स्वतन्त्र भिन्न अस्तित्व रखता है।”

प्रश्न 17. बाह्यता।
उत्तर-बाह्यता (Exteriority)—सामाजिक तत्त्व की सबसे पहली व महत्त्वपूर्ण विशेषता उसका बाहरीपन है। बाह्यता का अर्थ है सामाजिक तथ्य का निर्माण तो समाज के सदस्यों की ओर से ही होता है परन्तु सामाजिक तथ्य एक बार विकसित होने के पश्चात् फिर किसी व्यक्ति विशेष के नहीं रहते व वह उस अर्थ में कि इसको एक स्वतन्त्र वास्तविक रूप में अनुभव किया जाता है। वैज्ञानिक का उससे कोई आन्तरिक सम्बन्ध नहीं होता और न ही सामाजिक तथ्यों का व्यक्ति विशेष पर कोई प्रभाव पड़ता है।

इस प्रकार बाह्यता का अर्थ है कि सामाजिक तथ्य व्यक्ति के लिए बाहरी होते हैं। वह किसी व्यक्ति विशेष के नहीं होते बल्कि सम्पूर्ण समाज के होते हैं।

प्रश्न 18. (विवशता) बाध्यता।
उत्तर-बाध्यता या विवशता (Constraint) सामाजिक तथ्यों की दूसरी प्रमुख व महत्त्वपूर्ण विशेषता उसकी विवशता है। दूसरे शब्दों में व्यक्ति पर सामाजिक तथ्यों का एक दबाव या विवशता का प्रभाव पड़ता है। वस्तुतः सामाजिक तथ्यों का निर्माण एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों द्वारा नहीं होता बल्कि अनेकों व्यक्तियों द्वारा होता है। अतः यह बहुत शक्तिशाली होते हैं व किसी व्यक्ति पर इनकी विवशता के कारण प्रभाव पड़ता है।
दुर्खीम का मानना है कि सामाजिक तथ्य केवल व्यक्ति के व्यवहार को नहीं बल्कि उसके सोचने विचारने आदि के तरीके को प्रभावित करते हैं। दुर्खीम बताते हैं कि हम सामाजिक तथ्यों की यह विशेषता इस रूप में देख सकते हैं कि यह सामाजिक तथ्य आदमी की अभिरुचि के अनुरूप नहीं बल्कि व्यक्ति के व्यवहार उनके अनुरूप होता है।

प्रश्न 19. व्यापकता।
उत्तर-सामाजिक तथ्यों की तीसरी विशेषता यह है कि समाज विशेष में यह तथ्य आदि से अन्त तक फैले होते हैं। यह सब के साझे होते हैं। यह किसी व्यक्ति विशेष की व्यक्तिगत विशेषताएं नहीं होती। लेकिन व्यापकता अनेकों वैयक्तिक तथ्यों की केवल एक मात्र परिणाम ही नहीं होती। यह तो शुद्ध रूप में अपने स्वभाव से ही सामूहिक होती है। व्यक्तियों पर इनका प्रभाव इनकी सामूहिक विशेषता का परिणाम होता है।

प्रश्न 20. सामाजिक तथ्य के प्रकार।
उत्तर-दुर्खीम ने दो प्रकार के सामाजिक तथ्यों का वर्णन किया है। साधारण तथ्य (Normal) तथ्य तथा यह वह सामाजिक तथ्य होते हैं, जो पूरी मानव जाति के क्षेत्र में फैले होते हैं, व यदि वह सभी व्यक्तियों में नहीं तो उनमें से अधिकतर में पाए जाते हैं। व्याधिकीय या Pathological सामाजिक तथ्य वह होते हैं जो पूरी मानव जाति में न मिलकर कहीं-कहीं ही फैले होते हैं।

प्रश्न 21. दमनकारी कानून क्या होते हैं ?
उत्तर-दमनकारी कानून (Repressive Law)-दमनकारी कानूनों को एक प्रकार से सार्वजनिक कानून (Public Law) कहा जा सकता है। दुर्खीम के अनुसार, यह दो प्रकार के होते हैं –

(i) दण्ड सम्बन्धी कानून (Penal Laws)-जिनका सम्बन्ध कष्ट देने, हानि पहुंचाने, हत्या करने या स्वतन्त्रता न देने के साथ है। इन्हें संगठित दमनकारी कानून (Organized Repressive Law) कहा जा सकता है।

(ii) व्याप्त कानून (Diffused Laws)-कुछ दमनकारी कानून ऐसे होते हैं जो पूरे समूह में नैतिकता के आधार पर फैले होते हैं। इसलिए दुर्खीम इन्हें व्याप्त कानून कहते हैं। दुर्खीम के अनुसार, दमनकारी कानून का सम्बन्ध आपराधिक कार्यों से होता है। यह कानून अपराध व दण्ड की व्याख्या करते हैं। यह कानून समाज की सामूहिक जीवन की मौलिक दशाओं का वर्णन करते हैं। प्रत्येक समाज के अपने मौलिक हालात होते हैं इसलिए भिन्न-भिन्न समाजों में दमनकारी कानून भिन्न-भिन्न होते हैं। इन दमनकारी कानूनों की शक्ति सामूहिक दमन में होती है, व सामूहिक मन समानताओं से शक्ति प्राप्त करता है।

प्रश्न 22. प्रतिकारी कानून।
उत्तर-प्रतिकारी कानून (Restitutive Laws) कानून का दूसरा प्रकार प्रतिकारी कानून व्यवस्था है। यह कानून व्यक्तियों के सम्बन्धों में पैदा होने वाले असन्तुलन को साधारण स्थिति प्रदान करते हैं। इस वर्ग के अन्तर्गत व्यापारिक कानून, नागरिक कानून, संवैधानिक कानून, प्रशासनिक कानून इत्यादि आ जाते हैं। इनका सम्बन्ध पूरे समाज के सामूहिक स्वरूप से न होकर व्यक्तियों से होता है। यह कानून समाज के सदस्यों के व्यक्तिगत सम्बन्धों में पैदा होने वाले असन्तुलन को दोबारा सन्तुलित व व्यवस्थित करते हैं। दुर्खीम कहते हैं कि प्रतिकारी कानून व्यक्तियों व समाज को कुछ मध्य संस्थाओं से जोड़ता है।

प्रश्न 23. यान्त्रिक एकता क्या होती है?
उत्तर-यान्त्रिक एकता (Mechanical Solidarity)-दुर्खीम के अनुसार, यान्त्रिक एकता समाज की दण्ड संहिता में अर्थात् दमनकारी कानूनों के कारण होती है। समूह के सदस्यों में मिलने वाली समानताएं इस एकता का आधार हैं जिस समाज के सदस्यों में समानताओं से भरपूर जीवन होता है जहां विचारों, विश्वासों, कार्यों व जीवन शैली के साधारण प्रतिमान व आदर्श प्रचलित होते हैं व जो समाज इन समानताओं के परिणामस्वरूप एक सामूहिक इकाई के रूप में सोचता व क्रिया करता है वह यान्त्रिक एकता दिखलाता है। उसके सदस्य मशीन की तरह के भिन्न-भिन्न पुओं की भांति संगठित रहते हैं। दुर्खीम ने आपराधिक कार्यों को दमनकारी कानून व यान्त्रिक एकता की अनुरूपता का माध्यम बताया है।

प्रश्न 24. आंगिक एकता क्या होती है?
उत्तर-आंगिक एकता (Organic Solidarity)-दुर्खीम के अनुसार दूसरी एकता आंगिक एकता है। दमनकारी कानून की शक्ति सामूहिक चेतना में होती है। सामूहिक चेतना समानताओं से शक्ति प्राप्त करती है। आदिम समाज में दमनकारी कानूनों की प्रधानता होती है, क्योंकि उनमें समानताएं सामाजिक जीवन का आधार हैं। दुर्खीम के अनुसार, आधुनिक समाज श्रम विभाजन व विशेषीकरण से प्रभावित है जिसमें समानता की जगह विभिन्नताएं प्रमुख हैं। सामूहिक जीवन की यह विभिन्नता व्यक्तिगत चेतना को प्रमुखता देती है।

आधुनिक समाज में व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से समूह से बन्धा नहीं रहता। इस सम्बन्ध में मानवों के आपसी सम्बन्धों का महत्त्व ज्यादा होता है। यही कारण है कि दुर्खीम ने आधुनिक समाजों में दमनकारी कानून की जगह प्रतिकारी कानून की प्रधानता बताई है। विभिन्नता पूर्ण जीवन में मानवों को एक-दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति केवल एक काम में विशेष योग्यता प्राप्त कर सकता है व बाकी सारे कामों के लिए उसको दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। समूह के मैम्बरों की यह आपसी निर्भरता उनकी व्यक्तिगत असमानता उन्हें एक-दूसरे के नज़दीक आने के लिए मजबूर करती है। जिसके आधार पर समाज में एकता की स्थापना होती है। इस एकता को दुर्खीम ने आंगिक एकता (Organic Solidarity) कहा है। यह प्रतिकारी कानून व्यवस्था में दिखाई देता है।

प्रश्न 25. सामाजिक एकता क्या है?
उत्तर-दुखीम कहते हैं कि प्रत्येक समाज में कुछ मूल आदर्श, विश्वास, व्यवहार के तरीके, संस्थाएं व कानून प्रचलित होते हैं जो कि समाज को एक सूत्र में बांध कर रखते हैं। ऐसे तत्त्वों के कारण समाज में सम्बद्धता बनी रहती है व एकता भी बनी रहती है। यह कारक समाज में सर्वसम्मत्ति पैदा करते हैं व एकता को बढ़ाते हैं। इस प्रकार की एकता को सामाजिक एकता कहते हैं। इन कारणों के नष्ट होने या बिखरने से सामाजिक एकता खतरे में पड़ जाती है। जिस कारण समाज विघटन की ओर जाने लगता है।

बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1. काम्ते के तीन पड़ावों के सिद्धान्त का वर्णन करो।
उत्तर-समाजशास्त्रीय क्षेत्र में काम्ते का एक महत्त्वपूर्ण योगदान उसके द्वारा पेश किया तीन पड़ावों का नियम है। उसने अपनी प्रसिद्ध किताब पाज़ीटिव फिलोस्फी (Positive Philosophy) में इस सिद्धान्त के बारे में बताया। इस सिद्धान्त का निर्माण काम्ते ने 1822 में किया जब कि उसकी उम्र केवल 24 साल की थी। काम्ते ने इस नियम का विचार कोन्डरसेट (Conderect), टुरर्गेट (Turoget) तथा सेन्ट साईमन (Saint Simon) से प्राप्त किया।

काम्ते का कहना है कि मानव के ज्ञान या चिन्तन प्रक्रियाओं का विकास नहीं हुआ है। वह तो कुछ निश्चित पड़ावों में से ही निकला है काम्ते लिखते हैं, “सारे समाजों में व सारे युगों में मानव के बौद्धिक विकास का अध्ययन करने से उस महान् आधार, मौलिक नियम का पता चलता है जिसके अधीन मानव का चिन्तन आवश्यक रूप से होता है व जिसका ठोस परिणाम संगठन के तथ्यों व हमारे ऐतिहासिक अनुभवों, दोनों में शामिल है। यह नियम इस प्रकार है, हमारा प्रत्येक प्रमुख संकल्प हमारे ज्ञान की प्रत्येक शाखा एक के बाद एक तीन भिन्न-भिन्न सैद्धान्तिक अवस्थाओं (Theoretical Conditions) में से होकर निकलती है तथा वह हैं आध्यात्मिक या काल्पनिक (Theological or fictious) अवस्था, अर्द्धभौतिक या अमूर्त (Metaphysical or abstract) अवस्था व वैज्ञानिक या सकारात्मक (Scientific or positive) अवस्था। सरल शब्दों में उपस्थित नियम का अर्थ है कि मानवीय जीवन के आरम्भ में जब लोगों ने किसी विषय के सम्बन्ध में बोध करना या ज्ञान प्राप्त करना होता था, तो वह आध्यात्मिक आधार पर सोच विचार करते थे। समय व्यतीत होने के साथ लोगों ने आध्यात्मिक आधार की जगह अर्द्धभौतिकी आधार के किसी भी विषय के बारे में ज्ञान प्राप्त करना शुरू किया पर समय कुछ आगे बढ़ा तो मानव ने उपरोक्त दोनों आधारों की बजाय किसी प्रपंच के सकारात्मक आधार पर समझना आरम्भ किया। प्रथम अवस्था में कल्पना, दूसरी में भावना व तीसरी में तर्क प्रधान रहता है।

काम्ते ने इस नियम को मानवीय स्वभाव के पहलुओं पर आधारित किया। मानवीय स्वभाव के तीन महत्त्वपूर्ण पहलू निम्नलिखित हैं-

1. भावनाएं (Feelings)—मानव की भावनाएं उसे काम करने के लिए उत्साहित करती हैं तथा इन्हीं कामों की सेवा करता रहता है।
2. सोचशक्ति या विचार (Thought)-मानव इन भावनाओं की तृप्ति करने के बारे में सोचता है और विचार बनाता है। यह विचार इन भावनाओं की तृप्ति करने की ज़िम्मेदारी लेते हैं तथा इन्हें संचालित करने में मदद लेते
3. कार्य (Action)-भावनाओं की तृप्ति या उन्हें पूरा करने के लिए मानव कार्य करता है।
काम्ते का कहना था कि व्यक्ति जीवन तो ही जी सकता है, यदि उसके स्वभाव के इन तीन पहलुओं में तालमेल हो। यदि व्यक्ति की भावनाएं कुछ और हों, सोच कुछ व कार्य कुछ और करे तो ऐसा व्यक्ति साधारण जीवन नहीं जी सकता। इसी प्रकार सामाजिक व्यक्तियों के बीच सांझे व संचालित व्यवहारों की प्रणाली का होना व निरन्तरता के लिए संस्थाएं, ज्ञान कीमतें व विश्वासों की किसी प्रणाली का होना ज़रूरी है जो कि सफलतापूर्वक ढंग से समाज के सदस्यों की भावनाएं, विचारों व कार्यों में सम्बन्ध स्थापित करें।

काम्ते ने मानवता के इतिहास का निरीक्षण किया और कहा कि उपरोक्त समस्या के हल के लिए तीन सामाजिक प्रणालियां विकसित हुई हैं जिनमें उपरोक्त तालमेल था। वह इस प्रकार हैं-

  1. आध्यात्मिक पड़ाव (Theological Stage)
  2. अधिभौतिक पड़ाव (Metaphysical Stage)
  3. सकारात्मक पड़ाव (Positive Stage)

1. आध्यात्मिक पड़ाव (Theological Stage)-काम्ते की सैद्धान्तिक योजना में आध्यात्मिक पड़ाव बहुत महत्त्व रखता है। हमारा विचार है कि इसके अनुसार सामाजिक क्रम विकास का आरम्भ समझने के लिए पहले पड़ाव का अच्छी तरह निरीक्षण करना अनिवार्य है। उसके अनुसार आध्यात्मिक पड़ाव में मानव के विचार काल्पनिक थे। मानव सब वस्तुओं को परमात्मा के रूप में या किसी अलौकिक जीव की उस समय की क्रियाओं के परिणाम के रूप में देखता था, मानता व समझता था। धारणा यह होती थी कि सब वस्तुएं चाहे निर्जीव हैं चाहे सजीव का कार्य रूप, अलौकिक शक्तियां हैं। अर्थात् सब वस्तुओं में वही शक्ति व्यापक है। धार्मिक पड़ाव में मानव के विचारों के बारे में चर्चा करते हुए काम्ते लिखते हैं कि आध्यात्मिक अवस्था में सृष्टि के आवश्यक स्वभाव की ख़ोज करने या प्राकृतिक घटनाओं के होने के अन्तिम कारण को जानने के यत्न में मानव का दिमाग यह मान लेता है कि सब घटनाएं आलौकिक प्राणियों को तत्कालीन घटनाओं का सबूत हैं । काम्ते के अनुसार इस स्तर को नीचे तीन उप-स्तरों में बांटा जा सकता है।

(i)  प्रतीक पूजन (Festishism) सामाजिक गतिशीलता में काम्ते अपनी फ़िलास्फी के मल तत्त्व को स्थापित करके उसका मानव इतिहास के विश्लेषण में उपयोग करता है। उसकी धारणा है कि उसका मूल तत्त्व, सामाजिक विज्ञानों को फिर सजीव करेगा। आध्यात्मिक पड़ाव काम्ते के विचार अनुसार प्रतीक पूजन या फैटिशवाद के सिवाय अन्य किसी तरह भी शुरू नहीं हो सकता था। मानवीय सोच में यह विचार बनना प्राकृतिक था कि सभी बाहरी वस्तुओं में उनकी तरह से ही जीवन है। इस स्थिति में बौद्धिक जीवन से जज्बात अधिक हावी थे। प्रतीक पूजन की फिलास्फी का मूल तत्त्व यह विश्वास है कि लोगों के जीवन पर कई किस्म के अनजाने असर कुछ वस्तुओं के कार्यों के कारण सामने आते हैं जिनको वह जीवित समझते हैं। प्रतीक पूजन आध्यात्मिकता का बिगड़ा स्वरूप नहीं बल्कि इसका स्रोत है।

प्रतीक पूजन का सदाचार, भाषा, बोध व समाज से एक विशेष किस्म का सम्बन्ध था। मानव जाति की आरम्भिक अवस्था में भावुकता हावी थी। जिससे सदाचार व नैतिकता पर अधिक दबाव डाला जाता था। भाषा का चिन्तनात्मक आधार नहीं है। काम्ते का विचार है कि मानवीय भाषा का एक रूपीय आकार है। बौद्धिक स्तर पर फैटिशवाद बहुत जबरदस्त प्रणाली थी। इस अवस्था में मानव केवल आध्यात्मिक संकल्प देख व जान सकता है। बहुत ही कम प्राकृतिक प्रघटन होंगे जिनका उसे निजी अनुभव था जिनमें उसका ज्ञान बढ़ा था। परिणामस्वरूप इस उप-पड़ाव की सभ्यता का सार बहुत ही निम्न था। सामाजिक स्तर पर फैटिशवाद ने एक विशेष प्रकार के पादरीवाद को जन्म दिया। इसमें भविष्य बताने वाले व जादू-टोना करने वाले पादरी पैदा हुए क्योंकि प्रतीक पूजन अवस्था में प्रत्येक वस्तु का मानव से सीधा सम्बन्ध था इसलिए पादरीवाद एक संगठित रूप में विकसित नहीं हुआ। फिर आदमी की ज़िन्दगी पर यह फैटिश देवता बहुत प्रभाव नहीं डालते थे। परिणामस्वरूप चिन्तनशील श्रेणी के जन्म का इस उप-पड़ाव में कोई मौका नहीं था।

यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि मानव की प्रकृति पर विजय इस उप-पडाव से आरम्भ होती है। सबसे विशेष पक्ष इस अवस्था में मानव का पशुओं को अपने बस करके पालतू बनाना है। काम्ते का ख्याल है कि बहुदेवतावाद, जोकि अगला उप-पड़ाव है का आरम्भ प्रतीक पूजन में ही ढूंढ़ा जा सकता है। एक प्रकार से वह इस बात को ऐतिहासिक ज़रूरत के स्तर पर ले जाते हैं। आध्यात्मिक पड़ाव के दूसरे उप-पड़ाव पर पहुँचने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बौद्धिक बदलाव मानव के तारों के बारे में विचार बदलने से शुरू हुए। तारों की पूजा फैटिशवाद में भी होती थी पर उनको देवताओं के दर्जे पर पहुँचने में एक अमूर्त स्थिति ने ठोस रूप दे दिया।

(ii) बहु देवतावाद-बहु देवतावाद की अवस्था सबसे अधिक सजीव रही है। इस उप-पड़ाव को समझने के लिए काम्ते सबसे पहले अपनी विश्लेषण विधि के बारे में प्रकाश डालते हैं। उसका कहना है कि हमारी विधि को बहु-देवतावाद के ज़रूरी गुणों का अमूर्त अध्ययन करना चाहिए। उसके बाद बह देवतावाद का उन गुणों के सन्दर्भ में निरीक्षण करना चाहिए। मानवीय बोध के विकास के आरम्भ में बहुत सी घटनाओं से सुमेल रखते देवताओं की आवश्यकता थी। बहु देवतावाद बुनियादी तौर से हर किस्म की वैज्ञानिक व्याख्या के खिलाफ थे, पर विज्ञान का आरम्भ इसी पड़ाव से हुआ। वास्तव में मानवीय बौद्ध का फैटिशवाद से बहु देवतावाद तक पहुँचना एक महान् प्राप्ति है। बहु देवतावाद की सामाजिक सोच दो पक्षों से कही जा सकती है यह है राजनीतिक व नैतिक।

(क) राजनीतिक आकार-राजनीति के बीज शुरू से ही मानव जाति में कई तरीकों से बीजे गए थे। शुरू में सियासत में सैनिक गुण जैसे कि हिम्मत व हौंसला सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व थे। बाद में समझदारी व कूटनीति ताकत का आधार बने। काम्ते के अनुसार बहु-देवतावाद की अवस्था में राजनीतिक आकार के कई पक्ष थे जैसे कि धर्म युद्ध व सैनिक प्रणाली। इसी उप-पड़ाव में धर्म ने सामाजिक महत्ता ग्रहण की। यूनानी सभ्यता में धार्मिक मेले व अन्य कई घटनाएं इस पक्ष को उजागर करते हैं। इसके सिवा इस अवस्था में सेना का विकास एक आवश्यकता थी। इस सैनिक सभ्याचार के विकास का मुख्य कारण यह था कि इस के बिना राजनीतिक आकार व उसकी तरक्की असम्भव थी। बहु-देवतावाद ने सैनिक अनुशासन को न केवल स्थापित ही किया बल्कि पूरी दृढ़ता से कायम भी रखा। राजनीतिक आकार के बहु देवतावाद के इस उप-पड़ाव में दो विशेष गुण हैं। यह हैं गुलाम प्रथा व आत्मिक व दुनियावी ताकत का केन्द्रीयकरण ।

(ख) नैतिकता-ऊपर दिए राजनीतिक आकार पर दिए वर्णन से स्पष्ट है कि नैतिकता की स्थिति बहुत बढ़िया नहीं थी। काम्ते के अनुसार गुलाम प्रथा में निजी पारिवारिक व सामाजिक सम्बन्ध बुरी तरह भ्रष्ट हो जाते हैं। इसके सिवा नैतिकता राजनीतिक आकार के मुकाबले निम्न स्थिति में होती है। काम्ते के अनुसार बहु-देवतावाद की तीन अवस्थाएं हैं

(1) प्रथम अवस्था को काम्ते ने मिस्त्री या दैव शासकीय अवस्था का नाम दिया है। मध्य अवस्था के बौद्धिक व सामाजिक तत्त्व केवल पुरोहित पक्षों के हाथों में सम्पूर्ण सत्ता आ जाने से ही विकसित हो सकते हैं। इसका व्यापक स्तर पर क्रियाओं व पद्धतियों के योग बनाना व मानना एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। परिणामस्वरूप इस प्रकार की बहु देवतावाद की अवस्था में एक विशेष किस्म की संस्था ने जन्म लिया जिनको जाति कहते हैं। सबसे पहले जाति-प्रथा एशिया के देशों में विकसित हुई। यह जाति-प्रथा चाहे सैनिक सभ्याचार में से निकली थी पर इस ने युद्ध की रुचियों पर काबू पाया व पुरोहितवाद को सत्ता दी। पश्चिमी सभ्यता में जाति-प्रथा विकसित नहीं हुई।

कामते के अनुसार इस सभ्यता में सामाजिक समतावाद मुख्य कीमत रही है। वह मार्क्स से बहुत सहमत लगता है जब वह कहता है कि उपनिवेशवाद इन्हीं एशियाई देशों के लिए बढ़ा है, क्योंकि पश्चिमी देशों के समतावाद ने जाति-प्रथा को तोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पर जाति-प्रथा प्राचीन सभ्यता का व्यापक स्तर पर एक आधार है। इसकी व्यापकता इसकी मानवीय ज़रूरतों के लिए क्रियाशील होने का बहुत बड़ा सबूत है। जाति-प्रथा का बौद्धिक विकास में सब से बड़ी भूमिका इसका सिद्धान्त व अमल को भिन्न करना है। राजनीतिक तौर से इस की महत्ता समाज में शांति व व्यवस्था रखने में भी थी। पर इन सब गुणों के बावजूद दैवी शासकीय अवस्था उन्नति विरोधी थी।

(2) दूसरी अवस्था यूनानी या बौद्धिक थी जिसमें पहली बार बौद्धिक व सामाजिक तरक्की में अन्तर उत्पन्न किया गया। इस अवस्था के दौरान एक ऐसी चिन्तनशील कक्षा ने जन्म लिया जो सैद्धान्तिक सृजनों के अलावा कोई धन्धा नहीं करती थी इसलिए वह पुरोहित या पादरी समाज के विकल्प के रूप में उभर कर सामने आई। इसका असर विज्ञान की तरक्की पर पड़ा। इसमें सबसे विशेष रेखा गणित में हुआ क्रांतिकारी विकास है। विज्ञान के विकास को काम्ते बौद्धिक अवस्था में खोज के लिए तर्कशील स्वीकारात्मक को उपयोग से जोड़ते हैं। फिलासफी की प्रगति सबसे पहले विज्ञान के विकास के प्रभाव से शुरू हुई।

(3) तीसरी अवस्था को काम्ते ने रोमन या सैनिक का नाम दिया है। रोम की बहुत बड़ी प्राप्ति इसका अपने आप को दैवीय शासन से आजाद करवाना था जिसकी वजह से यहां राज्य प्रथा की जगह सीनेट का राज्य स्थापित हुआ। रोमन अवस्था का केन्द्रीय गुण इसकी युद्ध नीति थी। युद्ध का मुख्य उद्देश्य उपनिवेश इलाके स्थापित करना था। आदमी की चरित्र का विकास भी इस युद्ध सभ्याचार पर निर्भर था। उसको शुरू से ही सैनिक अनुशासन में पाला जाता था। अपनी जीत को बढ़ाने की लगातार बढ़ाने की नीति में ही रोम के पतन के कारण ढूंढ़े जा सकते हैं।

बहु-देवतावाद की इन तीन अवस्थाओं की एक व्यापक भूमिका है। काम्ते उन्हें मिस्त्र, यूनान व रोम के नमूनों के तौर पर देखता था। उसका मुख्य उद्देश्य तीन प्रकार के बहु देवतावाद को दर्शाना ही है।

(iii) एक ईश्वरवाद (Monotheism)-जब रोम ने सारे सभ्य जगत को इकट्ठा किया तो सामाजिक जीवन को ऊँचा करने के लिए एक ईश्वरवाद को बौद्धिक स्तर पर काम करने का मौका मिला। आध्यात्मिक फ़िलासफी का बौद्धिक पतन भी ज़रूरी होना था। काम्ते एक ईश्वरवाद की अवस्था की व्याख्या करने के लिए रोमन कैथोलिकवाद को उदाहरण के तौर पर पेश करता है। एक ईश्वरवाद मूलतयाः से एक विश्वास प्रणाली है जिसकी स्थापना राजनीतिक प्रणाली से स्वतन्त्र है। धर्म व राजनीतिक शक्ति में भिन्नता आना आधुनिक काल की महान् प्राप्ति है। रोमन कैथोलिकवाद की एक प्राप्ति नैतिकता को अपने अधिकार में लाना था। इससे पहले सदाचार सियासी ज़रूरतों द्वारा नियन्त्रत किया जाता था। इससे उप-पड़ाव में चिन्तनशील कक्षा का एक आज़ाद व प्रभावशाली अस्तित्व स्थापित हुआ। इसके परिणामस्वरूप सिद्धान्त व उसके अमल में पृथक्कता आई। अब सिद्धान्त बनाने के लिए अनुभव पर आधारित सन्दर्भ की आवश्यकता नहीं थी। राजनीति प्रणाली के बीच सुधार लाने के लिए अमूर्त सिद्धान्त बनाए जा सकते थे। इसी तरह समाज की भविष्य की ज़रूरतों के बारे में एक बात की जा सकती थी।

एक ईश्वरीवाद उप-पड़ाव में जागीरदारी प्रणाली को आधुनिक समाज की आधारशिला माना जा सकता है। नैतिक क्षेत्र में रोमन कैथोलिकवाद एक व्यापक नैतिकता कायम रखने में काफ़ी सफल रहा। नैतिकता की राजनीति से आज़ादी ने इसके विभिन्न स्तरों पर अलग-अलग प्रकारों में पैदा होने में सहायता दी। जैसे निजी नैतिकता, पारिवारिक व सामाजिक नैतिकता परन्तु बौद्धिक गिरावट आई। इसके मुकाबले बहु-देवतावाद बौद्धिक विकास के लिए ज्यादा उचित था।

2. अधिभौतिक पड़ाव (Metaphysical Stage)-इस पड़ाव को काम्ते आधुनिक समाज क्रांति काल भी कहा जाता है। यह पड़ाव पांच सदियों तक चला। यह 14वीं से 19वीं सदी तक चला। इस समय को हम दो भागों में बांट सकते हैं। प्रथम भाग में क्रांतिक आन्दोलन अपने आप व अनजाने में ही शुरू हो गया। दूसरा भाग सोलहवीं सदी से आरम्भ हुआ। इसमें नकारात्मक सिद्धान्त शुरू हुआ, जिसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक बदलाव था। क्रांतिक पड़ाव का आरम्भ एक ईश्वरीवाद का आत्मिक व दुनियावी शक्तियों को भिन्न करने के वक्त से ही माना जा सकता है। क्रान्तिक फिलासफी 16वीं सदी में प्रोटैस्टैंटवाद के आने से शुरू हुआ था। यहां ध्यान देने योग्य यह है कि रोमन कैथोलिकवाद में आत्मिक व दुनियावी शक्तियों में विभिन्नता ने आध्यात्मिक सवालों को सामाजिक मामलों पर ही विचार करने की शक्ति दी है। अधिभौतिक पड़ाव के द्वितीय भाग को हम तीन अवस्थाओं में बांट सकते हैं। प्रथम अवस्था में पुरानी प्रणाली का 15वीं सदी के अन्त तक अपने आप अन्त हो गया था। द्वितीय अवस्था में प्रोटैस्टैंट वाद हमारे सामने आया।

इसमें चाहे काफी निरीक्षण का अधिकार था पर यह ईसाई धर्मशास्त्र तक ही सीमित रहा। तृतीय अवस्था में देववाद (Deism) 18वीं सदी में आगे आया। इस ने निरीक्षण की सीमित सीमाओं को तोड़ कर यह विचार दिया कि इसकी कोई सीमा नहीं है। एक तरह से इस पड़ाव में मध्यकालीन दर्शन व कानूनी विशेषताओं का काल आया। इन्हीं दोनों ने कैथोलिक व्यवस्था को आघात दिया। परिणामस्वरूप आत्मिकता का पतन हुआ जिसका दुनियावी पक्ष पर भी सहजता से असर हुआ। जागीरदार समाज व उच्च श्रेणी का भी पतन हुआ। प्रोटैस्टैंट वाद ने व्यापक आज़ादी का रूझान पैदा किया, जिसके परिणाम से लोग पुरानी व्यवस्था के सामाजिक व बौद्धिक तत्त्वों को नष्ट करने के लिए तैयार हो गए। इस पड़ाव में नकारात्मक फिलासफी स्थापित हुई।

3. सकारात्मक पड़ाव (Positivism Stage)-सकारात्मक पड़ाव का आरम्भ समझने के लिए दो बातें ध्यान देने योग्य हैं। पहली बात यह कि काम्ते इसको औद्योगिक समाज के तौर पर देखते थे। दूसरी बात यह है कि वह इसका आरम्भ भी 14वीं सदी से ही मानते हैं जिसका अर्थ यह है कि आध्यात्मिक या क्रांतिक पड़ाव के साथसाथ ही सकारात्मक पड़ाव का आरम्भ हुआ, पर यह 19वीं सदी में आकर हावी होना प्रारम्भ हुआ। – सकारात्मक पड़ाव में सिद्धान्त व उसके प्रयोग में एक अन्तर पैदा हुआ। बौद्धिक कल्पना तीन अवस्थाओं में बांटी गई। ये थीं औद्योगिक या अमली, एस्थैटिक या काविक तथा वैज्ञानिक या फिलास्फीकल। यह तीन अवस्थाएं हर विषय के तीन पक्षों से मेल खाती हैं जैसे कि अच्छा या फायदेमन्द, सुन्दर और सच्चा। इनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण औद्योगिक पक्ष है जिसके आधार पर हम प्राचीन समाज से आधुनिक अवस्था की तुलना कर सकते हैं। औद्योगिक पक्ष में महत्त्वपूर्ण गुण राजनीतिक आज़ादी का पैदा होना है।

अन्त में काम्ते सबसे अधिक महत्ता फिलासफी व विज्ञान को देता है। उसका विचार है कि सकारात्मक पड़ाव में इन दोनों की सब से अधिक प्रभाव होता है। इस पड़ाव की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें सामाजिक व्यवस्था व उन्नति में कोई द्वन्द्व नहीं होता।

प्रश्न 2. काम्ते के सकारात्मक (Positivism) के सिद्धान्त का वर्णन करो।
उत्तर-काम्ते ने अपनी पुस्तक ‘पॉजटिव फिलास्फी’ में जिस प्रकार संकल्प ‘सकारात्मक’ का उपयोग किया है, स्पष्ट रूप में विवादात्मक है। इसने सही में इस संकल्प का उपयोग विचारधारक हथियार के तौर से क्रान्ति के साथ-साथ संघर्ष करने के लिए किया।

काम्ते का मुख्य उद्देश्य सामाजिक प्रपंच के समझने के लिए नकारात्मक फिलास्फी के आलोचनात्मक व विनाशकारी सिद्धान्तों को रद्द करना व उनकी जगह सकारात्मक फिलास्फी के रचनात्मक तथा उजागर सिद्धान्तों को स्थापित करना था। दूसरे शब्दों में काम्ते का मुख्य आदर्श सामाजिक अध्ययन व खोज के वैज्ञानिक स्तर पर लाना था। सकारात्मकवाद प्राकृतिक विज्ञानों की विधि को सामाजिक अध्ययन में उपयोग के सामाजिक विज्ञान को भी उन्होंने यथार्थ बनाता है जितना कि भौतिकवाद रासायनिक विज्ञान आदि हैं। उसका विश्वास था कि सकारात्मकवाद द्वारा वास्तविक व सकारात्मक विधि द्वारा ज्ञान प्राप्त होगा व उसकी व्यवहारिक उपयोग द्वारा सामाजिक उन्नति को सम्भव बनाया जा सकेगा। वास्तविक या सकारात्मक ज्ञान सामाजिक पुनर्संगठन की भी ठोस बुनियाद होगी। सकारात्मकवाद का अन्तिम उद्देश्य सामाजिक पुनर्निर्माण या पुनर्संगठन है।

अब प्रश्न उठता है कि संकल्प सकारात्मकवाद से काम्ते का क्या अर्थ था।
संक्षेप शब्दों में सामाजिक प्रपंच का अध्ययन करने के लिए काम्ते द्वारा प्रयोग की गई वैज्ञानिक विधि ही सकारात्मकवाद है। काम्ते ने यह विधि ह्युम, कान्त व गाल से अध्ययन विधि के रूप में ग्रहण की। इसने अपने सिद्धान्तों का निर्माण करते हुए सकारात्मकवाद का उपयोग किया परन्तु अपनी पुस्तकों में सकारात्मकवाद की स्पष्ट व्याख्या नहीं की व न ही इसके नियमों की उचितता को सबित करने का यत्न किया। ऐसा काम्ते ने जानबूझ कर किया क्योंकि उसका विश्वास था कि विद्या की चर्चा उस प्रपंच के अध्ययन से भिन्न करके नहीं की जा सकती, जिसकी इस विद्या द्वारा खोज की जाए।

काम्ते का सकारात्मकवाद से क्या अर्थ था। यह जानने का एक ही तरीका है कि हम उसके इस संक्षेप सम्बन्धी कथनों को एकत्र करें जो उसकी लेखनी में बिखरे हुए हैं।

काम्ते के सकारात्मकवाद के बारे में कथनों के विश्लेषणात्मक अध्ययन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि काम्ते अनुसार सकारात्मकवाद का अर्थ वैज्ञानिक विधि है। वैज्ञानिक विधि वह विधि है जिस में किसी विषयवस्तु को समझने व प्रभावित करने के लिए कल्पना या अनुमान का कोई स्थान नहीं होता। यह तो (1) परीक्षण (2) तर्जुबा (3) वर्गीकरण, तुलना तथा ऐतिहासिक विधि की एक व्यवस्थित कार्य प्रणाली होती है। इस तरह परीक्षण, तजुर्बे, वर्गीकरण, तुलना व ऐतिहासिक विधि पर आधारित वैज्ञानिक विधि द्वारा किसी विषय के बारे में सब कुछ समझना और उसके द्वारा ज्ञान प्राप्त करना सकारात्मकवाद है।

चैम्बलिन ने काम्ते के सकारात्मकवाद के अर्थों को इन शब्दों में स्पष्ट किया है कि काम्ते ने यह अस्वीकार किया था कि सकारात्मकवाद अनीश्वरवादी है क्योंकि वह किसी भी रूप में पर्याप्त श्रमिकता से सम्बन्ध नहीं है। उसका यह भी दावा था कि सकारात्मकवाद किस्मतवादी नहीं है क्योंकि वह यह स्वीकार करता है कि बाहरी अवस्था में परिवर्तन हो सकता है। वह आशावादी भी नहीं है क्योंकि इसमें आशावाद के आध्यात्मिक आधार का अभाव है। यह भौतिकवादी भी नहीं क्योंकि यह भौतिक शक्तियों को बौद्धिक शक्तियों के अधीन करता है। सकारात्मकवाद का सम्बन्ध वास्तविकता से है कल्पना से नहीं, उपयोगी ज्ञान से है नाकि पूर्ण ज्ञान से, इसका सम्बन्ध उन निश्चित तथ्यों से है जिसका कि पूर्व-ध्यान सम्भव है। इसका सम्बन्ध यथार्थ ज्ञान से है न कि अस्पष्ट विचारों से आंगिक सच्चाई से है न कि दैवी सच्चाई से, सापेक्ष से है न कि निष्पक्ष से। अन्त में सकारात्मकवाद इस अर्थ में हमदर्दीपूर्ण है कि यह उन सब लोगों को एक भाईचारे में बांध देता है जो कि इसके मूल सिद्धान्तों तथा अध्ययन प्रणालियों पर विश्वास करते हैं। संक्षेप में सकारात्मकवाद विचार की वह प्रणाली है जो कि सर्वव्यापक रूप में सब को मान्य है।

उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट है कि सकारात्मकवाद परीक्षण, निरीक्षण वर्णन, वर्गीकरण, तुलना, तजुर्बे व ऐतिहासिक विधि पर आधारित वैज्ञानिक विधि है जिससे किसी भी विषय-सम्बन्धी वास्तविक व सकारात्मक ज्ञान प्राप्त किया जाता है।

कान्त व ह्यूम के विचारों का अनुसरण करते हुए काम्ते इस बात को स्पष्ट थे कि विज्ञान को क्या प्राप्त करना चाहिए तथा इसको प्राप्त करने के लिए यत्न करना चाहिए। वैज्ञानिक ज्ञान का अध्ययन-क्षेत्र सीमित है। वैज्ञानिक ज्ञान में ऐसे तर्क-वाक्य शामिल हैं जोकि परम्परा में सम्बन्धों के बारे में व जिनकी जांच की जा सकती है। यह तर्कवाद दो किस्मों के हैं-

1. सहयोग की समानताएं (Uniformities of co-existence) अध्ययन किए जा रहे प्रपंच बीच भागों की अन्तर्निर्भरता के बारे में।

2. अनुक्रमण की समानताएं (Uniformities of succession)

काम्ते के समय प्रकृति विज्ञान जैसे कि गणित, तारा विज्ञान, भौतिक विज्ञान, रासायन विज्ञान व जीव विज्ञान विकसित हो चुके थे और इनके विषय-वस्तु का अध्ययन वैज्ञानिक विधि द्वारा किया जाता था। काम्ते अपने समय की प्रचलित तात्विक तथा धार्मिक विधियों द्वारा सामाजिक प्रपंचों की अध्ययन प्रणाली से सन्तुष्ट नहीं थे। इसने तो वैज्ञानिक विधि को सर्वोच्च प्रधानता प्रदान की थी इसलिए यह सामाजिक अध्ययन कार्य को भी परीक्षण, निरीक्षण व वर्गीकरण को वैज्ञानिक कार्य प्रणाली के घेरे में लाने के पक्ष में हैं। काम्ते का कहना था कि अनुभव, निरीक्षण, तजुर्बा वर्गीकरण की व्यवस्थित कार्य प्रणालियों द्वारा न केवल प्राकृतिक प्रपंचों का ही अध्ययन सम्भव है बल्कि समाज का भी क्योंकि समाज भी प्रकृति का अंग है।

जिस प्रकार प्राकृतिक प्रपंच कुछ निश्चित नियमों पर आधारित होते हैं उसी तरह प्रकृति के अंग के रूप में सामाजिक प्रपंच भी कुछ निश्चित नियमों के अनुसार प्रतीत होते हैं। जैसे धरती की गति, सूर्य व चांद का उदय होना व छिपना आदि प्राकृतिक प्रपंच अवास्तविक नहीं हैं उसी तरह सामाजिक प्रपंच भी अवास्तविक नहीं होते, बल्कि पूर्व निश्चित नियमों अनुसार प्रतीत होते हैं। वैसे सामाजिक प्रपंच कैसे प्रतीत होते हैं ? इनकी गति व कर्म क्या हैं ? अर्थात् सामूहिक जीवन उस से सम्बन्धित मौलिक नियमों का अध्ययन यथार्थ रूप में सम्भव है। यह भी सकारात्मकवाद का बुनियादी सिद्धान्त है। स्पष्ट है कि काम्ते का सकारात्मकवाद कल्पना के आधार पर नहीं बल्कि निरीक्षण, परीक्षण, तजुर्बे, तुलना, ऐतिहासिक विधि को व्यवस्थित कार्य प्रणाली के आधार पर सामाजिक प्रपंचों की व्याख्या करता है। पहले कारण ढूंढ़ने की जगह कारण सम्बन्धों की खोज पर अधिक दबाव देता है।

उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट है कि काम्ते अनुसार सकारात्मवादी प्रणाली के अन्तर्गत सब से पहले हम अध्ययन विषय को चुनते हैं फिर परीक्षण द्वारा उस विषय से सम्बन्धित प्रकट होने वाले सब तथ्यों को एकत्र करते हैं। उसके किसी भी विषय के बारे, चाहे वह भौतिक है या सामाजिक, तथ्यों या सामग्री एकत्र करने के लिए प्रमुख विधि परीक्षण है। इसके बाद उसका वर्णन किया जाता है। फिर विश्लेषण करके सामान्य विशेषताओं के आधार पर इनका वर्गीकरण किया जाता है। अन्त में उस विषय से सम्बन्धित परिणाम निकाला जाता है फिर उसकी प्रामाणिकता की जांच तथा तुलना ऐतिहासिक विधि के उपयोग से की जाती है।

प्रश्न 3. मैक्स वैबर द्वारा दिये गये सत्ता के प्रकारों का वर्णन करो ।
उत्तर-मनुष्य की क्रियाएं मानवीय संरचना के अनुसार ही होती हैं। प्रत्येक संगठित समूह में सत्ता के तत्त्व मूल रूप में विद्यमान रहते हैं। संगठित संग्रह में कुछ तो आम (साधारण) सदस्य होते हैं और कुछ ऐसे व्यक्ति या सदस्य होते हैं जिनके पास जिम्मेवारी होती है। उन्हीं के पास ही सत्ता भी होती है। कुछ लोग प्रधान प्रशासक के रूप में होते हैं, सत्ता की दृष्टि से समूह की रचना इसी प्रकार की होती है और उसमें सत्ता के तत्त्व मौजूद रहते हैं।

मैक्स वैबर के अनुसार, “समाज में सत्ता विशेष रूप से आर्थिक आधारों पर ही आधारित होती है। यद्यपि आर्थिक कारक सत्ता के निर्माण में एक मात्र कारक नहीं कहा जाता है। आर्थिक जीवन में यह आसानी से स्पष्ट है कि एक तरफ मालिक वर्ग, उत्पादन के साधनों एवं मजदूरों की सेवाओं के ऊपर अधिकार डालने की कोशिश करते हैं और दूसरी तरफ मज़दूर वर्ग अपनी मज़दूरी (सेवाओं) के एवज़ में मजदूरों के लिए अधिक-से-अधिक अधिकार प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। सत्ता का केन्द्र उनके हाथ में रहता है जिनकी सम्पत्ति के ऊपर उत्पादन के साधन केन्द्रित हैं । इसी सत्ता के आधार पर ही मज़दूरों की आजादी खरीद ली जाती है और मालिकों को मजदूरों के ऊपर एक विशेष अधिकार प्राप्त हो जाता है।”

यद्यपि इस प्रकार की सत्ता अब कम होती जा रही है और काफ़ी कम भी हो गयी है। परन्तु फिर भी आर्थिक क्षेत्रों में निजी सम्पत्ति और उत्पादन के साधन किसी भी वर्ग के लिए सत्ता के निर्धारण में कारक सिद्ध होते हैं। संक्षेप में आर्थिक जीवन में एक स्थिर या संस्थागत अर्थव्यवस्था समाज के कुछ विशेष वर्गों को अधिकार या सत्ता प्रदान करती है। यह वर्ग अपनी उस सत्ता के बल पर दूसरे वर्ग के ऊपर काबू (Control) रखते हैं या उनसे ऊंची स्थिति पर विराजमान रहते हैं। संत्ता के संस्थागत होने के विषय में वैबर का विश्लेषण बहुत कुछ इसी दिशा में ही है। फिर भी वैबर ने तीन मुख्य सत्ताओं का वर्णन किया है, ये तीन प्रकार की सत्ता निम्नलिखित हैं-

  1. वैधानिक सत्ता (Legal Authority)
  2. परम्परागत सत्ता (Traditional Authority)
  3. करिश्माई सत्ता (Charismatic Authority)

1. वैधानिक सत्ता (Legal Authority)-जहां कहीं भी नियमों की ऐसी व्यवस्था है जो निश्चित सिद्धान्तों के अनुसार न्यायिक व प्रशासनिक रूप से प्रयोग की जाती है और जोकि एक निश्चित समूह के सभी सदस्यों के लिए सही व मानने योग्य हो वह वैधानिक सत्ता है। जो व्यक्ति आदर्श रूपी शक्ति को चलाते हैं वह निश्चित रूप से श्रेष्ठ होते हैं। वह व्यक्ति कानून की सभी विधियों के अनुसार ही नियुक्त होते हैं या चुने जाते हैं और वह स्वयं वैधानिक व्यवस्था को चलाने के लिए निर्देशित रहते हैं। जो व्यक्ति इन आदेशों के अधीन हैं वे विधान के रूप में समान होते हैं। वह विधान का पालन करते हैं न कि विधान के काम करने वालों का ये नियम के लिए उनके द्वारा प्रयोग किये जाते हैं जो विधान की सत्ता की व्यवस्था का प्रयोग करते हैं। इस संगठन के अपने नियम होते हैं । इसके अधिकारी उन नियमों के अधीन होते हैं जो इसकी सत्ता की सीमा को निर्धारित करते हैं।

यह नियम सत्ता का कार्य करने वालों के ऊपर प्रतिबन्ध लगाते हैं, अधिकारी के व्यक्तिक रूप को उसके अधिकारी के रूप में करने वाले कार्य के सम्पादन से अलग करते हैं और यह आशा रखते हैं कि सम्पूर्ण कार्यवाही वैध होने के लिए लिखित में होनी चाहिए। इस प्रकार राज्य की ओर से बनाए कुछ साधारण नियमों के अनुसार पैदा अनेकों पद ऐसे हैं जिनके साथ एक विशेष प्रकार की सत्ता जुड़ी होती है। इस कारण जो भी व्यक्ति उन पदों पर बैठ जाता है उनके हाथों में उन पदों से सम्बन्धित सत्ता भी चली जाती है।

इसमें सत्ता का स्रोत किसी व्यक्ति की निजी प्रसिद्धि नहीं होता बल्कि जिन नियमों के अन्तर्गत वह इस विशेष पद पर बैठा है वह उन नियमों की सत्ता के अन्दर रहता है। इसलिए उसका कार्य क्षेत्र वहां तक सीमित है जहां तक विधान से सम्बन्धित नियम उसे विशेष अधिकार प्रदान करते हैं। एक व्यक्ति को विधान के नियमों के अनुसार जितना अधिकार प्राप्त हुआ है वह उससे बाहर जाकर या उसके अधिक सत्ता का प्रयोग नहीं कर सकता। इस तरह व्यक्ति को वैधानिक सत्ता के क्षेत्र और उससे बाहर के क्षेत्र में आधारभूत अन्तर होता है। जैसे जो व्यक्ति किसी अधिकारी पद पर कार्य कर रहा है वह अपने दफ्तर में जिन अधिकारों का अधिकारी है वह उसके घर के क्षेत्र से बिल्कुल भिन्न होता है। घर में वह कोई अधिकारी न होकर बल्कि पिता या पति के रूप में सत्ता में है। एक जटिल समाज में सत्ता प्रत्येक व्यक्ति के हाथों में समान नहीं होती बल्कि इसमें एक ऊंच-नीच का भेदभाव भी होता है अर्थात् वैधानिक अधिकार के समाज में उच्च-निम्न सताएं विराजमान हैं।।

2. परम्परागत सत्ता (Traditional Authority)-परम्परागत सत्ता उस सत्ता की वैधता के विश्वास पर आधारित है, जो हमेशा बनी रहती है। आदेश की शक्ति को पूर्ण करने वाले व्यक्ति आम रूप से प्रभु के समान होते हैं। वह अपनी स्थिति के कारण व्यक्तिगत सत्ता का उपयोग करते हैं और उनके पास स्वतन्त्र रूप से व्यक्तिगत निर्णयों के विशेषाधिकार भी प्राप्त होते हैं। इस प्रथा की नकल और व्यक्तिगत निरंकुशता ही तो ऐसे नियमों की विशेषताएं होती हैं। जो व्यक्ति इस प्रभु के आदेशों के अधीन होते हैं वह शाब्दिक अर्थों में उसके शिष्य होते हैं। वह प्रभु के लिए व्यक्तिगत रूप से शिष्य होने के कारण उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। भूतकाल से बने हुए पद के लिए उनकी पवित्र श्रद्धा होती है। इसलिए वह उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। इस प्रकार की व्यवस्था या प्रथा के लिए दो प्रकार के उदाहरण हैं। पैतृक (Ancestral) शासन में इस उपकर्म में व्यक्तिगत अनुगामी होते हैं।

जैसे कि घर का अधिकारी, सम्बन्धी या कृपा पात्र व्यक्ति। एक सामन्तवादी समाज में इस उपकर्म के अन्तर्गत व्यक्तिगत रूप से शिष्य मित्र होते हैं जिसके अधीन जगीरदार या करदाता सरकार होती है। यह व्यक्तिगत नीचे वाले अधिकारी ही अपने प्रभु सत्ता के निरंकुश आदेशों या परम्परागत आदेशों के अधीन होते हैं तथा उनकी क्रियाओं का क्षेत्र या आदेश की शक्ति एक निम्न स्तर पर उसके प्रभु की Mirror Image होती है। इसके विपरीत एक सामन्तवादी समाज के पदाधिकारी व्यक्तिगत रूप से निर्भर नहीं होते। बल्कि सामाजिक रूप से प्रमुख मित्र होते हैं। जिन्होंने प्रभु भक्ति की कसमें खाई होती हैं और Grant या Contract के आधार पर जिनका स्वतन्त्र रूप से क्षेत्र होता है। सामन्तवादी और पितृनामी शासन का भेद और दोनों व्यवस्थाओं में परम्परात्मक और निरंकुश आदेशों की निकटता सभी प्रकार की परम्परात्मक प्रभुता में छाई रहती है।

इस प्रकार की सत्ता में एक व्यक्ति को विधि के नियमों के अनुसार एक पद पर बैठे होने के कारण नहीं बल्कि परम्परा के कारण बने हुए पदों पर बैठने के कारण प्राप्त होती है। यद्यपि इस पद को परम्परानुसार परिभाषित किया जाता है। इस कारण ऐसे पदों पर बैठे होने के कारण व्यक्ति को कुछ विशेष प्रकार की सत्ता प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार की सत्ता परम्परात्मक विश्वासों पर टिकी होती है। इसलिए यह परम्परात्मक सत्ता कहलाती है। जिस तरह खेती-बाड़ी युग में भारतीय गांवों में मिलने वाली पंचायतों में पंचों की सत्ता को ही ले लीजिए। पहले इन पंचों की सत्ता विधिनुसार नहीं आती थी बल्कि परम्परागत रूप में ही उन्हें सत्ता प्राप्त हो जाती थी। यहां तक कि पंचों की सत्ता को ईश्वरीय सत्ता के समान तक समझा जाता था।

जैसे कि ‘पंच परमेश्वर’ की धारणा में दिखता था। उसी प्रकार पितृसत्तात्मक परिवार में पिता को ही परिवार के साथ सम्बन्धित सभी विषयों में जो अधिकार और सत्ता प्राप्त होती है, उसका भी आधार वैधानिक न होकर परम्परा होती है। पिता के आदेश का पालन हम इसलिए नहीं करते कि उनको कोई वैधानिक सत्ता प्राप्त होती है बल्कि इसलिए करते हैं कि परम्परागत रूप में ऐसा होता रहा है। वैधानिक सत्ता वैधानिक नियमों के अनुसार निश्चित और सीमित होती है क्योंकि वैधानिक नियम निश्चित और स्पष्ट रूप से परिभाषित होते हैं। लेकिन परम्परा और सामाजिक नियमों में इतनी स्पष्टता और निश्चितता नहीं होती। इस कारण परम्परागत सत्ता की वैधानिक सत्ता की तरह कोई निश्चित सीमा नहीं होती है। उदाहरण के लिए किसी अधिकारी की सत्ता कहाँ से शुरू होकर कहां पर खत्म होती है, के बारे में कुछ सीमा तक निश्चित तौर पर कहा जा सकता है लेकिन उस व्यक्ति के घर में पति तथा पिता के रूप में सत्ता की क्या सीमाएँ हैं कहना कठिन है।

3. करिश्माई सत्ता (Charismatic Authority)—व्यक्तिगत सत्ता का स्रोत परम्परा से सर्वथा भिन्न भी हो सकता है। आदेश की शक्ति एक नेता भी प्रयोग कर सकता है। चाहे वह कोई पैगम्बर हो, या नायक हो, या अवसरवादी नेता हो परन्तु ऐसा नेता तभी चमत्कारी नेता हो सकता है, जब वह सिद्ध कर दे कि तान्त्रिक शक्तियां, दैवी शक्तियां या अन्य अभूतपूर्व गुणों के कारण उसके पास चमत्कार है। जो व्यक्ति इस प्रकार के नेता की आज्ञा का पालन करते हैं, वह शिष्य होते हैं। जो निश्चित नियमों या परम्परा से पवित्र पद की गरिमा की जगह उसके अभूतपूर्व गुणों में एक चमत्कारी नेता के अन्तर्गत पदाधिकारियों को उनके चमत्कार एवं व्यक्तिगत निर्भरता के आधार पर विश्वास करते हैं। उन शिष्य पदाधिकारियों को बड़ी मुश्किल से ही एक संगठन के रूप में माना जाता है और उनकी क्रियाओं का क्षेत्र और आदेश की शक्ति एवं दैवी सन्देश नकल करने वाले के आचरण पर निर्भर करती है। पदाधिकारियों का चुनाव इनमें से किसी एक आधार पर हो सकता है। परन्तु इनमें से कोई भी पदाधिकारी न तो नियमों से बंधा हुआ है न ही परम्परा के साथ बल्कि केवल नेता के निर्णय के साथ ही बंधा हुआ है।

इस प्रकार यह सत्ता न तो वैधानिक नियमों पर और न ही परम्परा पर, बल्कि करिश्मा या चमत्कार पर निर्भर करती है। इस प्रकार की शक्ति केवल उन व्यक्तियों तक सीमित होती है (आधारित होती), जिनके पास केवल चमत्कारी शक्तियां होती हैं। इस प्रकार की सत्ता प्राप्त करने में व्यक्ति को काफ़ी समय लग जाता है और पर्याप्त यानि पूरे साधनों के विचार के बाद लोगों द्वारा इस प्रकार की सत्ता स्वीकार की जाती है। दूसरे शब्दों में एक व्यक्ति के द्वारा अपने व्यक्तित्व का विकास इस तरह किया जाता है कि लोग ये समझने लगे कि उसने अपने व्यक्तित्व में कोई चमत्कारी शक्ति का विकास कर लिया है। इसी के बल पर ही वह लोगों को अपनी तरफ झुका लेता है और लोगों द्वारा उसकी सत्ता स्वीकार कर ली जाती है। इस तरह करिश्माई नेता अपने प्रति या अपने लक्ष्य के प्रति या आदर्शों के प्रति दूसरों से आज्ञा का पालन करवाने के लिए मांग करता है। जादूगर, पीर, पैगम्बर, अवतार, धार्मिक नेता, सैनिक, यौद्धा या किसी दल के नेता, इसी प्रकार की सत्ता सम्पन्न व्यक्ति माने जाते हैं।

लोग इस कारण ऐसे लोगों की सत्ता स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि उनमें कुछ चमत्कारी गुण होते हैं जो साधारण व्यक्तियों में देखने को नहीं मिलते। इसी कारण प्रत्येक व्यक्ति के दिल में इन विशेष गुणों के प्रति श्रद्धा स्वाभाविक होती है। इन गुणों को ज्यादातर दैवीय गुणों के समान अथवा उनके अंश के रूप में माना जाता है। इस कारण इस प्रकार की सत्ता से सम्पन्न व्यक्ति की आज्ञा लोग श्रद्धा और भक्ति के साथ पूर्ण करते हैं। इस सत्ता की भी परम्परात्मक सत्ता के जैसी कोई निश्चित सीमा नहीं होती। इस सत्ता की एक विशेषता यह है कि हालात के अनुसार यह सत्ता वैधानिक अथवा परम्परात्मक सत्ता में बदल जाती है।

प्रश्न 4. वैबर की सामाजिक क्रिया के सिद्धान्त के बारे आप क्या जानते हैं ? व्याख्या करो।
उत्तर-मैक्स वैबर की सामाजिक क्रिया (Max Weber’s Social-Action)-सामाजिक क्रिया के सिद्धान्त की स्थापना में मैक्स वैबर का नाम काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। वैबर ने सामाजिक क्रिया के सिद्धान्त की बड़ी ही खुली और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी व्याख्या की है। मैक्स वैबर सामाजिक क्रिया के सिद्धान्त के द्वारा ही समाजशास्त्र की वैज्ञानिक प्रकृति को स्पष्ट करता है। अनेक समाजशास्त्री रेमण्ड, इरविंग, जैटलिन, बोगार्डस और रैक्स इत्यादि ने वैबर की आलोचना का काम उसके इस सामाज शास्त्र से ही आरम्भ किया है। इससे पहले कि हम वैबर के सामाजिक क्रिया के सिद्धान्त को समझने की कोशिश करें हम यह जान लें कि क्रिया और व्यवहार में कोई तकनीकी अन्तर नहीं मानना चाहिए।

समाज के सदस्यों के लिए यह ज़रूरी है कि वह सम्बन्धों के निर्माण के लिए अन्तर क्रिया करे। इन अन्तर क्रियाओं के आधार पर ही सामाजिक सम्बन्धों का जन्म होता है और व्यक्ति का जीवन इन सम्बन्धों के साथ ही बंधा हुआ होता है। व्यक्ति की प्रत्येक प्रकार की क्रिया के पीछे कोई न कोई उद्देश्य अवश्य होता है। इस उद्देश्य पूर्ति हेतु उसे क्रिया करनी पड़ती है। समाजशास्त्रीय रूप में सभी क्रियाएं सामाजिक क्रियाओं के दायरे में नहीं आती हैं बल्कि वही क्रियाएं सामाजिक क्रियाएं कही जाती हैं जिनको कर्ता अर्थात् क्रिया करने वाला कोई न कोई अर्थ देता है। व्यक्तियों की यह क्रिया बाहरी, अन्दरूनी, मानसिक एवं भौतिक हो सकती है। साथ ही काल या समय के नजरिये से क्रिया का सम्बन्ध वर्तमान, भूत, भविष्य तीनों में से किसी के साथ भी हो सकता है अर्थात् इसका सम्बन्ध किसी एक काल के साथ भी हो सकता है।

सामाजिक क्रिया के सिद्धान्त को पेश करने का सेहरा सबसे पहले ‘अल्फ्रेड मार्शल’ को जाता है। मार्शल ने उपयोगितावादी धारणा की विवेचना करके ‘गतिविधि’ की धारणा को विकसित किया। गतिविधि को मार्शल ने मूल्य की एक विशेष श्रेणी माना है। इसी श्रेणी में दुर्खीम ने ‘सामाजिक तथ्य’ को प्रकट किया।

आधुनिक काल में सामाजिक क्रिया धारणा के प्रमुख प्रवर्तक मैक्स वैबर थे, जिन्होंने अर्थपूर्ण सिद्धान्त को सामने रखा। इस तरह वैबलीन, मैकाइवर, कार्ल मैनहाईम, पारसंस और मर्टन के नाम महत्त्वपूर्ण हैं। हम इसी श्रेणी में विलियम वैट, डेविड काईजमैन और सी० राईट मिल्स को भी रख सकते हैं। मैक्स वैबर ने अपनी ‘सामाजिक क्रिया’ की धारणा को अपनी पुस्तक “The Theory of Social & Economic Organisation” में पेश (प्रस्तुत) किया।

मैक्स वैबर के अनुसार, “सामाजिक क्रिया व्यक्तिक क्रिया से अलग है। वैबर ने इसको परिभाषित करते हुए लिखा है कि किसी भी क्रिया को हम तभी ही सामाजिक क्रिया मान सकते हैं, जब उस क्रिया को करने वाले व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा लाये गये Subjective अर्थ के अनुसार उस क्रिया में दूसरे व्यक्तियों के सम्मान और भावों पर क्रियाएं इकट्ठी हों और उसी के अनुसार गतिविधि निर्धारित हो।”

मैक्स वैबर ने अपनी सामाजिक क्रिया की धारणा को समझाने के लिए इसको चार भागों में बांट कर समझाया है। वैबर ने लिखा है कि क्रियाओं का यह वर्गीकरण वस्तुओं के साथ सम्बन्धों पर आधारित है। पारसंस ने इसकी अभिमुखता का प्रारूप माना है। गरथ और मिल्स इसको प्रेरणा की दिशा कहते हैं।

वैबर के क्रिया के वर्गीकरण को समझने से पहले हम सामाजिक क्रिया की धारणा को पूरी तरह समझ लें। वैबर के अनुसार किसी भी क्रिया को सामाजिक क्रिया मानने से पहले हमें चार बातों का ध्यान रखना चाहिए।

(1) मैक्स वैबर का मानना है कि सामाजिक क्रिया दूसरे या अन्य व्यक्तियों के भूत, वर्तमान या होने वाले व्यवहार द्वारा प्रभावित हो सकती है। यदि हम अपने पहले किये हुए किसी काम के लिए क्रिया करते हैं, तो वह भूतकालीन क्रिया होगी। यदि वर्तमान समय में कोई क्रिया करते हैं तो वह वर्तमान और यदि भविष्य को ध्यान में रखते हुए कोई क्रिया करते हैं तो वह भविष्य वाली क्रिया कहलायेगी।

(2) वैबर का कहना है कि हर प्रकार की बाहरी क्रिया सामाजिक क्रिया नहीं हो सकती। बाहरी क्रिया असामाजिक है जो पूरी तरह जड़ और बेज़ानदार वस्तुओं द्वारा प्रभावित और उसकी क्रिया स्वरूप की जाती है। उदाहरण के लिए ईश्वर की अराधना, नमाज पढ़ना या अकेले ही समाधि लगाना, सामाजिक क्रिया नहीं है, परन्तु ब्राह्मणों के कहने पर पूजा अर्चना करना, मुल्लाओं के कहने पर नमाज पढ़ना इत्यादि सामाजिक क्रिया है।

(3) मनुष्य के कुछ सम्पर्क उस सीमा तक सामाजिक क्रिया में आते हैं जहां तक वह दूसरों के व्यवहार के साथ अर्थपूर्ण ढंग के साथ सम्बन्धित और प्रभावित होते हैं। हर प्रकार के सम्पर्क सामाजिक नहीं कहे जा सकते।

उदाहरण के लिए अगर सिनेमा की सीढ़ियां उतरते समय दो व्यक्ति आपस में टकरा जाएं तो यह सामाजिक क्रिया नहीं होगी, अगर वह आपस में संघर्ष पर उतर आए अथवा माफी मांगने लगे तो यह सामाजिक क्रिया होगी क्योंकि ऐसा करने से दोनों के व्यवहार आपस में सम्बन्धित और प्रभावित होते हैं।

(4) सामाजिक क्रिया न तो अनेक व्यक्तियों द्वारा की जाने वाली एक जैसी क्रिया को कहा जाता है और न ही उस क्रिया को कहा जाता है जो कि केवल दूसरे व्यक्तियों द्वारा प्रभावित होती है।

उदाहरण के लिए बारिश होने पर सड़क पर अनेकों व्यक्तियों द्वारा छाता खोल लेने की क्रिया सामाजिक क्रिया नहीं होती क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की क्रिया का दूसरे अथवा और व्यक्तियों से कोई सम्बन्ध नहीं होता। वैबर कहते हैं कि दूसरे की क्रिया की नकल करना सामाजिक क्रिया नहीं है, जब तक कि वह और व्यक्ति जिसकी कि नकल की जा रही है, की क्रिया साथ अर्थपूर्ण सम्बन्ध न रखता हो अथवा उसकी क्रिया द्वारा अर्थपूर्ण रूप से प्रभावित न होता हो।

मैक्स वैबर के अनुसार सामाजिक क्रिया को समझने के लिए उसकी अर्थ मूलक व्याख्या की आवश्यकता होती है। इस व्याख्या को दो भागों में विभक्त करके समझाया जा सकता है।

  1. औसत प्रकार की अर्थ मूलक व्याख्या
  2. विशुद्ध प्रकार की अर्थ मूलक व्याख्या

वैबर ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि सामाजिक क्रिया का अध्ययन विशुद्ध अर्थ मूलक की व्याख्या के लिए करना चाहिए परन्तु इनको समझने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण विधियों का भी वर्णन किया गया है जिनके आधार पर समाज की धारणाओं को सही तरह समझा गया है। इसमें वैबर ने तर्कपूर्ण और अर्थपूर्ण व्याख्या पर जोर दिया है।

इस सम्बन्ध में वैबर ने यह बताया है कि सभी सामाजिक क्रियाओं के कुछ निश्चित अर्थ होते हैं और एक प्रेरक शक्ति भी होती है। यह दोनों ही दूसरे व्यक्तियों की प्रेरक शक्तियों और क्रियाओं में बदलते रहते हैं।

यहाँ एक बात बहुत महत्त्व की है कि समाज शास्त्री किसी सामाजिक क्रिया की व्याख्या उसके अर्थ के आधार पर करता है जो कि दूसरे की क्रियाओं द्वारा निर्देशित होता है। इस प्रकार समाज शास्त्र प्राकृतिक विज्ञानों से पूरी तरह अलग हो जाता है।

सामाजिक क्रिया के प्रकार (Types of Social Action)-देखें पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न IV (5)

वैबर ने बताया है कि सामाजिक क्रियाएं तीन प्रकार से निर्देशित होती हैं-

  1. परम्परागत प्रयोग-इसका अर्थ यह है कि जो क्रियाएं परम्परा के आधार पर सम्पादित की जायें। सामाजिक प्रथाएं मनुष्य की क्रियाओं को प्रभावित करती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि लोगों की क्रियाएं परम्परा से हटकर बाहर नहीं जाती हैं और सामाजिक मर्यादा पूरी तरह बनी रहती है।
  2. हित-हित का अर्थ उन समरूपताओं से है जिसमें क्रियाओं को विवेकपूर्ण निर्देशन के रूप में समझा जा सके।
  3. न्यायसंगत व्याख्या-इससे सम्बन्धित व्यवहार क्रियाएं, कर्ता के किसी आदर्श के निश्चित होने की नज़र से निर्देशित होती हैं। ये ऐसे आदर्शों से भी निर्देशित होती हैं जोकि किसी विशेष निर्देश को पाने के लिए तार्किक समझे जाये।

सामाजिक क्रिया के सम्बन्ध में वैबर ने बताया कि सामाजिक सम्बन्धों के आधार पर ही क्रिया निश्चित होती है।

वैबर ने आगे कहा है कि सामाजिक सम्बन्धों की पहली और आवश्यक कसौटी यह है कि उसमें प्रत्येक व्यक्ति की क्रिया का दूसरे की कोशिश की तरह परस्पर रूप से निर्देशन हो। इसके Contents की प्रकृति चाहे अलगअलग प्रकार की क्यों न हो जैसे कि संघर्ष विरोध, यौन आकर्षण, मित्रता, अनुराग या आर्थिक लेन-देन इत्यादि।

इस सम्बन्ध में अर्थ का बड़ा ही महत्त्व है, अर्थ का मतलब उस अर्थ से है जो किसी विशेष दशा में लिया जाता है। यह अर्थ औसत रूप या सैद्धान्तिक रूप से बनाकर, विशुद्ध रूप में लाया जाता है।

वैबर ने यह भी बताया कि सामाजिक सम्बन्धों में पारम्परिक रूप के साथ निर्देशित बल के Subjective अर्थ एक समान ही है।

“सामाजिक क्रिया को अभिमुखता की प्राकृतिक के आधार पर दोबारा विवेक अभिमुख, अविवेक अभिमुख, सहानुभूति अभिमुख और आपसी अभिमुख क्रिया के रूप में रखा जा सकता है।” मानव के ज्ञान पर ही कुछ व्यवहार आधारित होते हैं तथा यह ज्ञान ही साधन के लक्ष्य का आधार होता है, लेकिन साथ ही कुछ ऐसे व्यवहार भी होते हैं जिसमें ज्ञान की प्रधानता ना होकर सामाजिक मूल्यों को प्रधानता दी जाती है। इन व्यवहारों को विवेकपूर्ण माना जाता है। कुछ व्यवहार उस श्रेणी में आते हैं जहां अपनापन और हमदर्दी को मानव द्वारा महत्त्व दिया जाता है। चाहे वह व्यवहार अविवेकपूर्ण हो और कुछ व्यवहार विवेकपूर्ण इसलिए भी हो जाते हैं क्योंकि मानव परम्परा को महत्त्व दे बैठता है। मानव सम्बन्धी तथ्य प्रत्यक्षवादी परिप्रेक्ष्य से विवेकपूर्ण क्रिया के अन्तर्गत परिभाषित किए जाते हैं।

इस स्थिति में पैरेटो और वैबर के एक-दूसरे के विचारों में भिन्नता आ जाती है कि अविवेकपूर्ण क्रिया, विवेकपूर्ण क्रिया से सही अलग क्रिया है। आपसी क्रिया ऐसी क्रिया है जिसमें परम्परागत तथ्य प्रधानता रखते हैं, औसत श्रेणी में संवेगात्मक अथवा हमदर्दी अभिमुख क्रिया को लेते हैं। मानवीय क्रियाओं की अभिमुखता, प्रचलन रुचि और सही आज्ञा से भी हो सकती है। विद्वानों की राय है कि वैबर की क्रिया के सिद्धान्त को अपनी इच्छा तथा आधारित क्रिया के सिद्धान्त से कुछ हद तक जाना जा सकता है। पारसंस के क्रिया के सिद्धान्त पर वैबर का प्रभाव देखा जा सकता है। विवेक की धारणा को वैबर ने 6 प्रकार से प्रयोग में लिया है।

मैक्स वैबर ने जिस क्रिया के सिद्धान्त को दिया है वह मार्क्स के सिद्धान्त से बिल्कुल अलग है। साधनयुक्त विवेक को वैबर ने अपने विचारों में प्रमुख स्थान दिया है। कर्ता की तरफ से उद्देश्य की प्राप्ति के मूल्य और उद्देश्य दोनों का मूल्यांकन इस प्रकार के व्यवहार में किया जाता है। कर्ता के द्वारा एक उद्देश्य की प्राप्ति से दूसरे उद्देश्य की प्राप्ति के लिए साधन के बारे में कल्पना की जाती है। इस तरह की भावना वैबर के विचारों में थी। विवेक शब्द का प्रयोग वैबर ने व्यवहार और विश्वास दोनों के लिए किया है। यानि विवेकपूर्ण व्यवहार वही है जिसमें कर्ता के द्वारा विवेक को स्थान दिया जाता है और उसी के अनुरूप विश्वास के स्तर पर भी विवेक को महत्त्व दिया गया है। सामाजिक व्यवहार के रूप में अनेक विद्वानों ने ऊपरलिखित विवेचनाओं से नतीजा निकाला है कि जिसमें संवेगात्मक और सहानुभूति के तत्त्व मौजूद होते हैं ऐसे व्यवहारों को विवेकपूर्ण व्यवहार कहा गया है।

विवेक वैबर के लिए एक आदर्श रहा है। आपसी सामाजिक रचना के टूटने का एक मुख्य कारण वो बढ़ता हुआ विवेकीकरण है। विशेष तौर पर हम विवेकीकरण की बढ़ती हुई मात्रा को बाज़ार के सम्बन्धों में देख सकते हैं।

प्रश्न 5. दुर्खीम के सामाजिक तथ्य की विवेचना करो।
अथवा दुर्खीम के सामाजिक तथ्य के बारे में चर्चा करो।
उत्तर-इमाइल दुर्खीम द्वारा दी गई “सामाजिक तथ्य” की विवेचना बहुत महत्त्वपूर्ण है। दुर्खीम के सामाजिक तथ्यों सम्बन्धी विचार उसकी दूसरी प्रमुख पुस्तक “दि रूलस ऑफ़ सोशोलोजीकल मैथड’ में दिखाई पड़ते हैं। दुर्खीम की 1895 में प्रकाशित ये पुस्तक समाजशास्त्र के शास्त्रीय ग्रन्थ के रूप में पहचानी जाती है।

दुर्खीम ने यह अनुभव किया कि समाज शास्त्र को एक स्वतन्त्र विज्ञान के रूप में तब तक स्थापित नहीं किया जा सकता जब तक कि उसका अध्ययन वस्तु की विशेषता स्पष्ट न हो और इसकी खोज के लिये एक व्यवस्थित पद्धति शास्त्र का विकास न हो। इन दो उद्देश्यों के लिये दुर्खीम ने The Rules of Sociological Method की रचना की।

दुर्खीम ने काम्ते, स्पैंसर, मिल इत्यादि समाजशास्त्रियों की खामियों का अनुभव किया, और स्पष्ट लिखा है कि, “यह समाजशास्त्री जिनकी चर्चा हमने अभी की है, वह समाजों की प्रवृत्ति और समाजिक जैविकीय क्षेत्रों के मध्य सम्बन्धों के विषय में अस्पष्ट समाजीकरण से बहुत आगे चले गए थे।”

दुर्खीम ने अपने उद्देश्य के अनुरूप इस पुस्तक में दो प्रमुख कठिनाइयों का वर्णन किया।

  1. उन्होंने समाज शास्त्र के अध्ययन के लिये विद्यार्थियों के लिए सारी विषय सामग्री का निर्धारण किया। इस तरह करने के साथ उसने समाज-शास्त्र को मनोवैज्ञानिक और जीव संसार से मुक्त करवा कर उसे एक अलग स्वतन्त्र अस्तित्व प्रदान किया।
  2. प्राकृतिक विज्ञान की प्रत्यक्षयवादी, तथ्यात्मक अध्ययन पद्धति के रूप में देखा और इस पद्धति के सफल प्रयोग के लिये पालने योग्य नियमों का निर्माण किया।

दुर्खीम ने अपनी पुस्तक में सामाजिक तथ्य की विवेचना के लिए 6 मुख्य बातों की विवेचना की जिसको उसने 6 मुख्य (chapters) में पेश किया, जो कि निम्नलिखित हैं-

  1. सामाजिक तथ्य क्या है?
  2. सामाजिक तथ्यों के निरीक्षण और नियम।
  3. Normal और Pathological तथ्यों में भेद करने के नियम
  4. सामाजिक रूपों के वर्गीकरण के नियम
  5. सामाजिक तथ्यों की व्याख्या के नियम
  6. समाज शास्त्रीय प्रमाणों की स्थापना के साथ सम्बन्धित नियम।

सामाजिक तथ्य क्या हैं ?
(What are Social Facts ?)

दुर्खीम ने विषय सामग्री और अध्ययन पद्धति दोनों ही नज़रियों से समाज-शास्त्र को एक स्वतन्त्र सामाजिक विज्ञान के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है। दुर्खीम ने समाज-शास्त्र की विषय सामग्री के रूप में सामाजिक तथ्यों को पेश किया है। दुर्खीम का स्पष्ट मानना है कि समाज-शास्त्र सभी मानवीय गतिविधियों का अध्ययन नहीं करता बल्कि अपने आपको केवल सामाजिक तथ्यों के अध्ययन तक ही सीमित रखता है।

दुर्खीम ने अपने इस अध्याय में यह बात स्पष्ट करने की कोशिश की है कि वास्तव में किन तथ्यों को सामाजिक तथ्य कहा जायेगा? सामाजिक तथ्यों की क्या विशेषताएं हैं और उनका अध्ययन किस प्रकार किया जायेगा? सामाजिक तथ्यों के अर्थ स्पष्ट करते हुए दुर्खीम कहते हैं कि सामाजिक तथ्यों के बारे में अनेक प्रकार की शंकाएं प्रचलित हैं और यही कारण है कि मनोविज्ञान, प्राणी शास्त्र और समाज शास्त्र के विषय वस्तु के सम्बन्धों में कई प्रकार की भ्रान्तियां भी मन में पड़ जाती हैं। स्वयं दुर्खीम ने लिखा है सामाजिक तथ्यों की पद्धति के बारे में जानने से पूर्व यह जानना ज़रूरी है कि कब तथ्यों को आमतौर पर ‘सामाजिक’ कहा जाता है। यह सूचना और भी अधिक आवश्यक है, क्योंकि ‘सामाजिक’ शब्द का प्रयोग अधिक अनिश्चित रूप में होता है। वर्तमान में इस शब्द का प्रयोग समाज में होने वाली किसी भी घटना के लिए किया जाता है चाहे उसकी सामाजिक रुचि कितनी ही कम क्यों न हो। परन्तु ऐसी कोई भी मानवीय घटना नहीं है जिसको सामाजिक न कहा जा सके। प्रत्येक व्यक्ति सोता है, खाता है, पीता है और विचार करता है और यह सामाजिक हित में होता है कि यह सभी कार्य सही व्यवस्थित ढंग से हों। यदि इन सबको सामाजिक तथ्य मान लिया जाये तो समाज शास्त्र की भिन्न रूप से कोई विषय वस्तु नहीं होगी। इससे समाज-शास्त्र, प्राणी शास्त्र और मनोविज्ञान शास्त्र में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

सामाजिक तथ्य के अर्थ की विवेचना करते हुए दुर्खीम ने सर्वप्रथम यह कहा कि सामाजिक तथ्यों को वस्तुओं के समान समझना चाहिए। यद्यपि दुर्खीम ने वस्तु शब्द का वास्तविक अर्थ कहीं भी स्पष्ट नहीं किया। दुर्खीम ने वस्तु शब्द को चार अलग-अलग अर्थों में प्रयोग किया है। यह हैं-

(1) सामाजिक तथ्य एक ऐसी वस्तु है, जिसमें कुछ विशेष गुण होते हैं जिसको बाहरी रूप में देखा जा सकता
है।
(2) सामाजिक तथ्य एक ऐसी वस्तु है, जिसको केवल अनुभव द्वारा ही जाना जा सकता है।
(3) सामाजिक तथ्य एक ऐसी वस्तु है, जिसका अस्तित्व मनुष्य के ऊपर बिल्कुल निर्भर नहीं।
(4) सामाजिक तथ्य एक ऐसी वस्तु है, जिसको केवल बाहरी तौर पर देखते हुए जाना जा सकता है। परन्तु क्योंकि सामाजिक तथ्य वस्तु के समान है, अतः यह कोई स्थिर धारणाएं नहीं हैं बल्कि गतिशील धारणा के रूप में जानने योग्य है। इस तरह हम देखते हैं कि समाज में कुछ ऐसे तथ्य होते हैं जो कि भौतिक प्राणी शास्त्र और मनोवैज्ञानिक तथ्यों से अलग होते हैं। दुर्खीम इस प्रकार के तथ्यों को सामाजिक तथ्य मानते हैं। दुर्खीम ने सामाजिक तथ्यों की कुछ परिभाषाएं पेश की हैं, एक स्थान पर दुर्खीम लिखते हैं, “सामाजिक तथ्य कार्य करने, सोचने और अनुभव करने के वह तरीके हैं, जिसमें व्यक्तिगत चेतना से बाहर ही अस्तित्व को बनाये रखने की उल्लेखनीय विशेषता होती है।”

एक अन्य स्थान पर दुर्खीम ने लिखा है कि, “सामाजिक तथ्यों में कार्य करने सोचने, अनुभव करने के वह तरीके हैं जिसमें व्यक्तिगत चेतना से बाहर भी अस्तित्व को बनाये रखने को उल्लेखनीय विशेषता होती है।” अपनी पुस्तक के पहले chapter की अन्तिम पंक्तियों में इसकी विस्तार के साथ परिभाषा पेश करते हुए लिखा है, “एक सामाजिक तथ्य क्रिया करने का हर स्थायी और अस्थायी तरीका है जो व्यक्ति पर बाहरी दबाव डालने में समर्थ होता है या फिर कृपा करने का हर तरीका जो किसी समाज में आम रूप में पाया जाता है परन्तु साथ ही साथ व्यक्तिगत विचारों से स्वतन्त्र अलग अस्तित्व रखता है।”

दुर्खीम की उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि “क्रिया करने के तरीके” सामाजिक तथ्य हैं। क्रिया करने के तरीकों में मानवीय व्यवहार के सभी पहलू शामिल हैं, जो उसके विचार, अनुभव और क्रिया के साथ सम्बन्ध रखते हैं। यह सामाजिक वास्तविकता के अंग हैं। ऐसी सामाजिक घटना स्थायी भी हो सकती है, और अस्थायी भी हो सकती है। उदाहरणार्थ किसी समाज में आत्महत्याओं की, विवाहों की, मृत व्यक्तियों की संख्या में बहुत कम अन्तर होता है। अर्थात् इनकी वार्षिक दर आमतौर पर स्थित रहती है। अतः इसको सामाजिक तथ्य कहा जाता है।

इस तरह ‘भगवान्’ को सामाजिक तथ्य नहीं कहा जाता है क्योंकि वह वास्तविक निरीक्षण से दूर है। इस तरह मनही-मन सोचा गया, कोई विचार भी सामाजिक तथ्य की श्रेणी में नहीं आयेगा क्योंकि उनका कोई स्पष्ट रूप नहीं है। परन्तु किसी विद्वान् द्वारा दिया गया कोई भी सिद्धान्त, या नियम या ईश्वरीय सम्बन्धी पूजा, प्रार्थना या आराधना, जिसमें टोटमवाद भी शामिल है, को सामाजिक तथ्य माना जायेगा क्योंकि उनका साफ निरीक्षण सम्भव है। भाषा, लोक कथा, धार्मिक विश्वास, क्रियाएं, Business के नियम, नैतिक नियम इत्यादि सामाजिक तथ्यों की कितनी ही अनुपम उदाहरणे हैं क्योंकि इन सभी का निरीक्षण एवं परीक्षण सम्भव है और यह व्यक्ति के साथ जुड़े होते हैं। यह व्यक्ति के ऊपर दबाव डालने की शक्ति रखते हैं।

इस प्रकार दुर्खीम ने सामाजिक तथ्यों की विवेचना दो प्रमुख यथार्थक मापदंडों के माध्यम से बहुत ही स्पष्ट रूप से हमारे सामने पेश की है, वह मापदंड है

  1. वह वैज्ञानिक के दिमाग से बाहर होने चाहिए और
  2. उसका वैज्ञानिक पर ज़रूरी अथवा मजबूरी का प्रभाव होना चाहिए।

सामाजिक तथ्यों की विशेषताएं (Characteristics of Social Facts) –

दुर्खीम की विवेचना के आधार पर हम देखते हैं कि दुर्खीम ने सामाजिक तथ्यों की धारणा को समझने के लिए दो शब्दों बाहरीपन (Exteriority) और बाध्यता (Constraint) का सहारा लिया गया है। इन दोनों को सामाजिक तथ्यों की विशेषता के रूप में पेश किया जा सकता है।

1. बाहरीपन (Exteriority)-सामाजिक तथ्य की सबसे पहली और महत्त्वपूर्ण विशेषता उसका बाहरीपन है। बाहरीपन का अर्थ है सामाजिक तत्त्वों का निर्माण लो समाज के सदस्यों के द्वारा ही होता है। परन्तु सामाजिक तथ्य एक बार विकसित होने के बाद फिर किसी व्यक्ति विशेष के नहीं रहते हैं और वह इस अर्थ में कि इसको एक स्वतन्त्र वास्तविकता के रूप में अनुभव किया जा सकता है अर्थात् विज्ञान का उसके साथ अन्दरूनी सम्बन्ध नहीं होता है और न ही सामाजिक तथ्यों का व्यक्ति विशेष पर कोई प्रभाव पड़ता है।

सामाजिक तथ्यों के बाहरीपन को स्पष्ट करने के लिए दुर्खीम ने इसको व्यक्तिगत चेतना,सामूहिक चेतना के अन्तर अथवा भेद के आधार पर स्पष्ट किया है। दुर्खीम ने व्यक्तिगत चेतना के स्वरूप और संगठन के अध्ययन से यह स्पष्ट किया है कि व्यक्तिगत चेतनाओं का मूल आधार भावनाएँ हैं। संवेदनाएं अलग-अलग सैलों की अंतर क्रियाओं का प्रतिफल है लेकिन अलग-अलग सैलों द्वारा पैदा होने वाली संवेदनाओं की अपनी खास विशेषता होती है, जो संगठन अथवा उत्पत्ति से पहले सोलां सैलों में से किसी में भी मौजूद नहीं थी। Synthesis and Suigeneris के इस सिद्धांत में दुर्खीम ने यह बताया है कि इकट्ठा होने से एक नई वस्तु का जन्म होता है। अर्थात् प्रसार और संयोग की क्रिया द्वारा तथ्य का रूप ही बदल जाता है। जैसे व्यक्तिगत विचारों का आधार स्नायुमंडल के अलग है। उसी प्रकार दुर्खीम कहते हैं कि सामाजिक विचारों का मूल आधार समाज के सदस्य होते हैं। सामूहिक चेतना का विकास व्यक्तिगत चेतना में मिलने से संगठन के विकास से होता है। इसी प्रकार दुर्खीम के शब्दों में, “यह व्यक्तिगत चेतना से बाहर रहने वाले विशेष तथ्यों को पेश करता है।”

एक उदाहरण से इसे और भी स्पष्ट किया जा सकता है। ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के एक निश्चित योग के साथ पानी बनता है। पानी की अपनी कुछ विशेषताएं हैं। ये विशेषताएं न ऑक्सीजन की हैं और न ही हाइड्रोजन की हैं। पानी को अलग करके फिर पुनः ऑक्सीजन और हाइड्रोजन को नहीं बनाया जा सकता। इस तरह व्यक्ति चेतनाओं के योग के साथ सामूहिक चेतना का निर्माण होता है। जो व्यक्तिगत तथ्यों से अलग अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रखता है। अतः वह प्रत्येक व्यक्ति के लिए बाहरी होती है।

2. विवशता (Constraint)-सामाजिक तथ्यों की दूसरी प्रमुख और महत्त्वपूर्ण विशेषता उसकी विवशता है। दूसरे शब्दों में व्यक्ति के ऊपर सामाजिक तथ्यों का एक दबाव या विवशता का एक प्रभाव पड़ता है। वस्तुतः सामाजिक तथ्यों का निर्माण एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों के द्वारा नहीं होता बल्कि अनेकों व्यक्तियों के द्वारा होता है। अतः ये बहुत शक्तिशाली होते हैं और किसी व्यक्ति के ऊपर इस विवशता के कारण प्रभाव पड़ता है।

दुर्खीम का मानना है कि सामाजिक तथ्य केवल व्यक्ति के व्यवहार को नहीं बल्कि उसके सोचने, विचार करने इत्यादि के तरीकों को भी प्रभावित करते हैं। दुर्खीम बताते हैं कि इन सामाजिक तथ्यों की यह विशेषता इस रूप में देख सकते हैं कि ये सामाजिक तथ्य व्यक्ति की अनुभूति के अनुरूप नहीं, बल्कि व्यक्ति का व्यवहार उनके
अनुरूप होता है।

दुर्खीम सामाजिक तथ्यों की इस विशेषता के विवेचन में अनेक उदाहरण पेश करते हैं। आपके अनुसार समाज में प्रचलित अनेक सामाजिक तथ्य जैसे कि नैतिक नियम, धार्मिक विश्वास, वित्तीय व्यवस्था, आदि सभी मनुष्य के व्यवहार और तरीकों को प्रभावित करते हैं। स्वयं दुर्खीम लिखते हैं कि यदि यह दबाव इन तथ्यों की अन्दरूनी विशेषताएं होती हैं और इसका सबूत यह है कि जब मैं इनका विरोध करने की कोशिश करता हूं तो यह और भी अधिक दबाव डाल देते हैं। वह आगे लिखते हैं” यदि मैं समाज के नियमों को नहीं मानता हूं तो जिस हंसी का पात्र मुझे बनाया जाता है और जिस तरह मुझे समाज से अलग रखा जाता है, और यह असली अर्थों में एक प्रकार के दण्ड या सज़ा की तरह प्रभाव डालने वाला होता है। यद्यपि ये विवशता तथा दबाव अप्रत्यक्ष होते हुए भी प्रभावकारी होते हैं।”

विवशता की एक और उदाहरण में दुर्खीम इसको स्पष्ट करते हैं, “मेरे लिए यह जरूरी नहीं कि मैं अपने देशवासियों से फ्रांसीसी अथवा किसी और भाषा में ही बात करूँ और प्रचलित मुद्रा का प्रयोग करूँ, लेकिन ये सब इससे विपरीत कार्य करना मेरे लिए संभव नहीं होगा। एक उद्योगपति के रूप में मैं बीत गई सदियों की तकनीकी विधियों को अपनाने में पूरी तरह स्वतन्त्र हैं लेकिन ऐसा करने से मैं अपने आपकी बरबादी को बुलावा दूंगा। लेकिन अगर मैं ज़रूरी तथ्यों से बचने की कोशिश करूंगा तो पूरी तरह असफल रह जाऊंगा। अगर मैं इन नियमों से अपने आप को स्वतन्त्र कर लेता हूँ तो सफलता से उनका विरोध करता हूँ तो भी मुझे हमेशा इनसे संघर्ष करने के लिए मज़बूर किया जाता है, और अंत में वह अपने बदले द्वारा अपने दबाव का अनुभव हमें करा देते हैं।”

दुर्खीम कहते हैं कि “कभी-कभी इस विवशता को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख सकते। वह समाजीकरण की एक उदाहरण दे कर इसको स्पष्ट करते हैं कि जीवन के आरम्भिक काल में हमें बच्चे को खाने, पीने, व सोने के लिए विवश करते हैं। हम उसे सफ़ाई, शान्ति और कहना मानने के लिए भी विवश करते हैं। बाद में हम उसे दूसरों के प्रति उचित भाव, प्रथा, रीति रिवाजों, प्रति सम्मान करना और काम करने की आवश्यकता आदि के बारे में सिखाते हैं। विवशता अनुभव न होने के कारण यह होता है कि धीरे-धीरे यह विवशता आदतों में तबदील हो जाती है।”

सामूहिक चेतना व्यक्तिगत चेतना से उत्तम रूप है क्योंकि सामूहिक चेतना व्यक्तिगत चेतनाओं के अस्तित्व से विशेषताओं की संगठित (मिली-जुली) हुई चेतना है। दुर्खीम लिखते है, “एक सामाजिक तथ्य ‘विश्व दबाव’ की शक्ति से पहचाना जाता है जो कि व्यक्ति पर प्रयोग किया जाता है अथवा व्यक्ति पर प्रयोग करने योग्य हो।” दुर्खीम के अनुसार सामाजिक तथ्य ‘सामूहिक चेतना’ की श्रेणी में आते है इसीलिए यह चेतनाओं की चेतना है।

3. व्यापकता (Generality)—यह समाज विशेष में सांझे और आदि अंत तक फैले होते हैं। लेकिन यह विलक्षण विशेषता नहीं हो तो और न ही व्यापकता अनेकों व्यक्तिगत तथ्यों के केवल जोड़फल मात्र का परिणाम नहीं होते बल्कि यह तो शुद्ध रूप में अपने स्वभाव से ही सामूहिक होते हैं और व्यक्तियों पर इनका प्रभाव इनकी सामूहिक विशेषता का ही नतीजा है। इसीलिए इसको सामाजिक तथ्यों की तीसरी विशेषता कहा जाता है।
दुर्खीम के ऊपर लिखे सामाजिक तथ्यों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि सामाजिक तथ्यों की दो महत्त्वपूर्ण विशेषताएं होती हैं।

  1. सामाजिक तथ्य व्यक्तिगत विचारों से स्वतन्त्र अपना अलग स्वतन्त्र अस्तित्व रखते हैं। अर्थ यह कि व्यक्ति से अलग होते हैं।
  2. सामाजिक तथ्यों का व्यक्ति पर एक मज़बूरी का प्रभाव पड़ता है अर्थात् यह व्यक्ति पर दबाव डालने की शक्ति से भरे होते हैं।

ऊपर दी गई विवेचना के आधार पर दुर्खीम ने अपने पहले अध्याय की अंतिम लाईनों में सामाजिक तथ्य को पेश करते हुए लिखा है कि, “एक सामाजिक तथ्य काम करने का वह तरीका है, जो चाहे निश्चित हो अथवा नहीं, जो कि व्यक्ति पर बाहरी दबाव डालने की शक्ति रखता है अथवा काम करने का वह हर तरीका जो एक दिए हुए समाज में सभी तरफ सामान्य है और साथ ही व्यक्तिगत विचारों से स्वतन्त्र उसकी अपनी अलग स्थिति बनी रहती
संक्षेप में दुर्खीम के अनुसार सामाजिक तथ्य कार्य करने का वह तरीका है, जो व्यक्तियों से बाहर है तथा व्यक्ति पर दबाव डालने की शक्ति रखता है।

प्रश्न 6. दुर्खीम के श्रम विभाजन के सिद्धान्त की व्याख्या करो और इसके उत्तरदायक कारकों का स्पष्टीकरण करो।
अथवा
दुर्खीम के श्रम विभाजन के सिद्धान्त की विवेचना करो।
उत्तर-दुर्खीम ने 1893 में फ्रैंच भाषा में अपनी पहली किताब De la Division du Trovail social के नाम से प्रकाशित की। चाहे यह दुर्खीम का पहला ग्रन्थ था पर उसकी प्रसिद्धि की यह एक आधार-शिला थी। इसी ग्रन्थ पर दुर्खीम को 1893 में पैरिस विश्वविद्यालय में डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई थी। इस महान् ग्रन्थ में दुर्खीम ने सामाजिक श्रम विभाजन का प्रत्यक्ष सिद्धान्त पेश किया है। दुर्खीम की यह किताब तीन भागों में बांटी हुई है हर भाग में दुर्खीम ने श्रम विभाजन के भिन्न-भिन्न पक्षों की विवेचना की है। ये तीन खण्ड हैं-

  1. श्रम विभाजन के प्रकार्य (The functions of Division of Labour)
  2. कारण व दशाएं (Causes and Conditions)
  3. श्रम विभाजन के असाधारण स्वरूप (Abnormal forms of Division of Labour)

दुर्खीम ने अपनी किताब के पहले भाग ‘श्रम विभाजन के प्रकार्य’ में श्रम विभाजन को सामाजिक एकता (Social solidarity) का आधार सिद्ध करने की कोशिश की है। साथ ही उसके वैज्ञानिक अध्ययन की नज़र से कानूनों के स्वरूप, एकता के रूप, मानवीय सम्बन्धों के स्वरूप, अपराध, दण्ड, सामाजिक विकास आदि अनेकों मुश्किलों व धारणाओं की व्याख्या पेश की है। दूसरे हिस्से में श्रम विभाजन के कारणों व परिणामों का विस्तृत विश्लेषण पेश किया है। तीसरे खण्ड में दुर्खीम ने श्रम विभाजन के असाधारण स्वरूपों की विवेचना दी है।
अब हम दुर्खीम के पहले दोनों भागों की विवेचना की मदद से सामाजिक श्रम-विभाजन के सिद्धान्त की विवेचना करेंगे।

श्रम विभाजन के प्रकार्य (Functions of Division of Labour) –

दुर्खीम प्रत्येक सामाजिक तथ्य को एक नैतिक तथ्य के रूप में स्वीकार करते हैं। कोई भी सामाजिक प्रतिमान नैतिक आधार पर ही सुरक्षित रहता है। एक कार्यवादी के रूप में सबसे पहले दुीम ने श्रम विभाजन के कार्य की खोज की है। दुर्खीम ने सबसे पहले ‘प्रकार्य’ शब्द का अर्थ स्पष्ट किया है प्रकार्य के उन्होंने दो अर्थ बताए हैं।

(1) प्रकार्य का मतलब गति व्यवस्था से है अर्थात् क्रिया से है।
missing
क्रिया के द्वारा पूरी होने वाली ज़रूरत से है।

दुर्खीम ‘प्रकार्य’ का प्रयोग दूसरे शब्दों में करते हैं इस प्रकार श्रम विभाजन के प्रकार्य से उनका अर्थ यह है कि श्रम विभाजन की प्रक्रिया समाज के अस्तित्व के लिए कौन-सी मौलिक ज़रूरत को पूरा करती है। प्रकार्य तो वह है जिसकी अनावश्यकता में उसके तत्त्वों की मौलिक ज़रूरत की पूर्ति नहीं हो सकती।

आमतौर से यह कहा जाता है कि श्रम विभाजन का प्रकार्य सभ्यता का विकास करना है क्योंकि यह स्पष्ट सच है कि श्रम विभाजन के विकास के साथ-साथ विशेषीकरण के नतीजे के तौर पर समाज में सभ्यता बढ़ती है। श्रम विभाजन के परिणाम के तौर पर उत्पादन शक्ति में बढ़ावा होता है, भौतिक व बौधिक विकास होता है व साधारण जीवन में सुख के उपभोग व ज्ञान का प्रसार होता है इसलिए आमतौर पर श्रम विभाजन को सभ्यता का स्रोत कहा जाता है।

दुर्खीम355 missing
अनुसार स्रोत का काम नहीं है। सुखों में बढ़ोत्तरी या बौद्धिक व भौतिक विकास प्रकार्य विभाजन के परिणाम से उत्पन्न होते हैं। इसलिए यह इस प्रक्रिया के परिणाम हैं, काम नहीं। काम का अर्थ परिणाम नहीं होता।

सभ्यता के विकास में तीन प्रकार के विकास शामिल हैं और यह तीन प्रकार निम्नलिखित हैं-

  1. औद्योगिक अथवा आर्थिक पक्ष
  2. कलात्मक पक्ष
  3. वैज्ञानिक पक्ष।

दुर्खीम ने सभ्यता के इन तीनों ही पक्षों के विकास को नैतिक तत्त्वों से विहीन बताया है। उसके विचार में औद्योगिक, कलात्मक तथा वैज्ञानिक विकास के साथ-साथ समाजों में अपराध, आत्महत्या इत्यादि अनैतिक घटनाओं में बढ़ोत्तरी होती है। अंत दुर्खीम के श्रम विभाजन का कार्य सभ्यता का विकास नहीं है।

परन्तु दुर्खीम के अनुसार श्रम विभाजन का प्रकार्य क्या है ? दुर्खीम के अनुसार नये समूहों का निर्माण व उनकी एकता ही श्रम विभाजन के काम हैं। दुर्खीम ने समाज के अस्तित्व से सम्बन्धित किसी नैतिक ज़रूरत को ही श्रम विभाजन के काम के रूप में खोजने की कोशिश की है। उसके विचार अनुसार समाज के सदस्यों की गणना व उनके आपसी सम्बन्धों में अधिकता होने से धीरे-धीरे श्रम विभाजन की प्रक्रिया का विकास हुआ है। इस प्रक्रिया में बहुत सारे नए-नए व्यावसायिक व सामाजिक समूहों का निर्माण हुआ। इन भिन्न-भिन्न समूहों की एकता का प्रश्न समाज के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है। इनकी आपसी एकता की अनावश्यकता में सामाजिक व्यवस्था न सन्तुलन की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए इन भिन्न-भिन्न समूहों में एकता एक नैतिक ज़रूरत है।

दुर्खीम के अनुसार समाज की इसी ज़रूरत की पूर्ति श्रम-विभाजन की ओर से की जाती है। जहां एक ओर श्रम विभाजन से नए सामाजिक समूहों का निर्माण होता है, वहां दूसरी ओर इन समूहों की आपसी एकता व सामूहिकता बनी रहती है।

अन्त दुीम के अनुसार श्रम विभाजन का काम समाज में एकता स्थापित करना है। श्रम-विभाजन मानवों की क्रियाओं की भिन्नता से सम्बन्धित है पर यह भिन्नता भी समाज की एकता का आधार है। इस सामाजिक तथ्य के बारे दुर्खीम ने तथ्यात्मक आधार पर बताया है। उन्होंने कहा कि आपसी आकर्षण के दो विरोधी आधार हो सकते हैं। हम उन व्यक्तियों के प्रति ही नज़दीकी अनुभव करते हैं जो हमारी तरह हैं व उनकी ओर ही खिंचे जा सकते हैं। जो हमसे भिन्न हैं पर पूरी तरह की भिन्नता एक-दूसरे को अपनी ओर नहीं खींचती। ईमानदार बेइमानों को व खर्चीले कंजूसों को पसन्द नहीं करते। केवल यह भिन्नता इन दोनों को एक दूसरे के नज़दीक लाती है जो एक दूसरे की पूरक हैं। एक दोस्त में कोई कमी होती है, व वही चीज़ दूसरे में होती है जिस कारण दोनों के सम्बन्ध बनते हैं व एक दूसरे की ओर खिंचे जाते हैं।

दुर्खीम कहते हैं श्रम-विभाजन का सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम यह नहीं कि यह बांटे हुए काम से उत्पादन में बढ़ोत्तरी करता है बल्कि यह है कि यह उनको संगठित करता है। अतः दुर्खीम के अनुसार श्रम-विभाजन समूहों का निर्माण करता है व उनमें एकता पैदा करता है।

कानून और एकता (Law and Solidarity) -दुर्खीम ने श्रम-विभाजन का काम समाज में एकता पैदा करना बताया है। सामाजिक एकता एक नैतिक तथ्य है। दुर्खीम श्रम-विभाजन से पैदा सामाजिक एकता को स्पष्ट करने के लिए कानून का वर्गीकरण करते हैं। किसी कानून के वर्गीकरण के अनुरूप उन्होंने सामाजिक एकता के प्रकार निर्धारित करते हैं। दुर्जीम ने दो प्रकारों के कानूनों के बारे में बताया है वे हैं-

(a) दमनकारी कानून (Repressive Law)
(b) प्रतिकारी कानून (Restitutive Law)

(a) दमनकारी कानून (Repressive Law)-दमनकारी कानूनों को एक प्रकार से सार्वजनिक कानून (Public Law) कहा जा सकता है। दुर्खीम के अनुसार यह दो प्रकार के होते हैं

(i) दण्ड सम्बन्धी कानून (Penal Law)-जिनका सम्बन्ध कष्ट देने, हानि पहुंचाने, हत्या करने या स्वतन्त्रता न देने से है। इनको संगठित दमनकारी कानून (Organized Repressive Law) कहा जाता है।

(ii) व्याप्त कानून (Diffused Law)-कुछ दमनकारी कानून ऐसे होते हैं जो पूरे समूह में नैतिकता के आधार पर फैले होते हैं। इसलिए दुर्खीम इनको व्याप्त कानून कहते हैं। दुर्खीम के अनुसार दमनकारी कानून का सम्बन्ध आपराधिक कार्यों से होता है। यह कानून अपराध व दण्ड की व्याख्या करते हैं। यह कानून समाज के सामूहिक जीवन की मौलिक दशाओं का वर्णन करते हैं। प्रत्येक समाज के अपने मौलिक हालात होते हैं। इसलिए भिन्नभिन्न समाजों में दमनकारी कानून भिन्न-भिन्न होते हैं। इन दमनकारी कानूनों की शक्ति सामूहिक दमन में होती है व सामूहिक मन समानताओं से शक्ति प्राप्त करता है।

(b) प्रतिकारी कानून (Restitutive Law) कानून का दूसरा भाग प्रतिकारी कानून व्यवस्था है। यह कानून व्यक्तियों के सम्बन्धों में पैदा होने वाले असन्तुलन को साधारण स्थिति प्रदान करते हैं। इस वर्ग के अन्तर्गत दीवानी (civil) कानून, व्यापारिक कानून, संवैधानिक कानून, प्रशासनिक कानून आदि आ जाते हैं। इनका सम्बन्ध पूरे समाज के सामूहिक स्वरूप से न होकर व्यक्तियों से होता है। यह कानून समाज के सदस्यों के व्यक्तिगत सम्बन्धों से पैदा होने वाले असन्तुलन के द्वारा सन्तुलित व व्यवस्थित होते हैं। दुर्खीम कहते हैं कि प्रतिकारी कानून व्यक्तियों व समाज के कुछ बीच की संस्थाओं से जोड़ते हैं।

कानून के उपरोक्त दो प्रकार के आधार पर दुर्खीम के अनुसार दो भिन्न-भिन्न प्रकार की सामाजिक एकताओं (Social Solidarity) का निर्माण होता है। यह दो प्रकार समाज की दो भिन्न-भिन्न जीवन-शैलियों के परिणाम हैं। दमनकारी-कानून का सम्बन्ध व्यक्तियों की साधारण प्रवृत्ति से है, समानताओं से है, जबकि प्रतिकारी कानून का सम्बन्ध विभिन्नताओं से या श्रम-विभाजन से है। दमनकारी कानून के द्वारा जिस प्रकार की सामाजिक एकता बनती है उसको दुर्खीम यान्त्रिक एकता (Mechanical Solidarity) कहते हैं। प्रतिकारी कानून आंगिक एकता (Organic Solidarity) के प्रतीक है जिसका आधार श्रम-विभाजन है। अतः दुर्खीम के अनुसार समाज में दो प्रकार की सामाजिक एकता मिलती है।

(i) यान्त्रिक एकता (Mechanical Solidarity)-दुर्खीम के अनुसार यान्त्रिक एकता समाज की दण्ड संहिता में अर्थात् दमनकारी कानूनों के कारण होती है। समूह के सदस्यों में मिलने वाली समानताएं इस एकता का आधार हैं। जिस समाज के सदस्यों में समानताओं से भरपूर जीवन होता है, जहां विचारों, विश्वासों, कार्यों व जीवन इकाई के रूप में सोचता व क्रिया करता है, वह यान्त्रिक एकता दिखाता है अर्थात् उसके सदस्य मशीन के औज़ार भिन्न पुों की तरह संगठित रहते हैं। दुर्खीम ने अपराधी कार्यों के दमनकारी एकता कानून व यान्त्रिक एकता की अनुरूपता का माध्यम बताया है।

(ii) आंगिक एकता (Organic Solidarity)-दुर्खीम के अनुसार दूसरी एकता आंगिक एकता है। दमनकारी कानून की शक्ति सामूहिक चेतना में होती है। सामूहिक चेतना समानताओं से शक्ति प्राप्त करती है। आदिम समाज में दमनकारी कानूनों की प्रधानता होती है क्योंकि उनमें समानताएं सामाजिक जीवन का आधार हैं। दुर्खीम के अनुसार आधुनिक समाज श्रम-विभाजन व विशेषीकरण से प्रभावित है जिसमें समानता की जगह विभिन्नताएं प्रमुख हैं। सामूहिक जीवन को यह विभिन्नता व्यक्तिगत चेतना को प्रमुखता देती है।

आधुनिक समाज में व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से समूह से बंधा नहीं रहता। इस समाज में मानवों के आपसी सम्बन्धों का महत्त्व अधिक होता है। यही कारण है कि दुर्खीम ने आधुनिक समाजों में दमनकारी कानून की जगह प्रतिकारी कानून की प्रधानता बताई है। विभिन्नतापूर्ण जीवन में मानवों को एक-दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति केवल एक काम में विशेष योग्यता प्राप्त कर सकता है व बाकी सभी कामों के लिए उसके अन्य लोगों पर निर्भर रहना पड़ता है। समूह के सदस्यों को यह आपसी निर्भरता, उनकी व्यक्तिगत असमानता, उनके एक-दूसरे के नज़दीक आने के लिए मजबूर करती है जिसके आधार पर समाज में एकता की स्थापना होती है। इस एकता को दुर्खीम ने आंगिक एकता (Organic Solidarity) कहा है। यह प्रतिकारी कानून व्यवस्था में दिखाई देता है।

दुर्खीम के अनुसार यह एकता शारीरिक एकता के समान है। हाथ, पैर, नाक, कान, आँख आदि अपने-अपने विशेष कामों के आधार पर स्वतन्त्र अंगों के रूप में हाजिर रहते हैं पर उनके काम तो ही सम्भव हैं जब तक एकदूसरे से मिले (जुड़े) हुए हैं, हाथ शरीर से भिन्न होकर कोई काम नहीं कर सकता। दूसरे शब्दों में शरीर के भिन्नभिन्न अंगों में एकता तो है पर वह आपसी निर्भरता पर टिकी हुई है।

दुीम के अनुसार जनसंख्या के बढ़ने से समाज की ज़रूरतें भी बढ़ती जाती है। इन बढ़ती हुई ज़रुरतों को पूरा करने के लिए श्रम विभाजन तथा विशेषीकरण हो जाता है। इसी कारण ही आधुनिक समाजों में आंगिक एकता दिखाई देती है। हम दुर्खीम के कानून, सामूहिक चेतना, एकता तथा समाजों को निम्न बने चित्र में से समझ सकते है। समाज को बनाए रखने के लिए सामाजिक एकता का होना बहुत ज़रूरी है। आदिम समाजों में समूह के सदस्यों में पूरी समानता होती है जिस कारण उनमें सामूहिक चेतना अधिक प्रबल होती है। वह एक-दूसरे पर कार्यात्मक दृष्टि से ही निर्भर नहीं होते बल्कि इतने जुड़े होते हैं कि उनमें हमेशा स्वाभाविक एकता बनी रहती है। यह एकता दुर्खीम के शब्दों में ठीक वैसी ही होती है जैसी कि किसी यन्त्र की एकता होती है। जिस प्रकार यन्त्र के किसी एक भाग को हिलाने से पूरा यन्त्र हरकत में आता है ठीक उसी प्रकार समानताओं पर आधारित इस एकता को दुर्खीम यान्त्रिक एकता कहते हैं।

दूसरी तरफ आधुनिक समाजों में विशेषीकरण बढ़ने से कार्यों का विभाजन हो गया है जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक विभिन्नताएं बढ़ गई है। इस श्रम विभाजन के नतीजे के कारण समूह के सभी एक-दूसरे पर निर्भर हो गए हैं। किसी प्राणी की शारीरिक एकता की तरह, सामाजिक एकता के भिन्न-भिन्न अंगों में कार्यात्मक से उत्पन्न ज़रूरी सहयोग इस पूरी एकता की क्रियाशीलता का आधार है। इसीलिए दुर्खीम श्रम विभाजन से उत्पन्न जो एकता समाज को मिलती है उसे आंगिक एकता कहते हैं।

(iii) संविदात्मक एकता (Contractual Solildarity)-आंगिक व यान्त्रिक एकता के अध्ययन के बाद दुर्खीम ने एक और एकता के बारे में बताया है, जिसको उसने संविदात्मक एकता (Contractual Solidarity) या समझौते वाली एकता कहा है।

दुर्खीम के अनुसार श्रम-विभाजन की प्रक्रिया समझौते पर आधारित सम्बन्धों को जन्म देती है। समूह के लोग आपसी समझौते के आधार पर एक-दूसरे की सेवाओं को प्राप्त करते हैं व परस्पर सहयोग करते हैं। यह सच है कि आधुनिक समाजों में समझौतों के आधार पर लोगों में सहयोग व एकता स्थापित होती है पर श्रम-विभाजन का काम संविदात्मक एकता की उत्पत्ति करना ही नहीं है। दुर्खीम के विचार से संविदात्मक एकता एक व्यक्तिगत तथ्य है चाहे यह समाज द्वारा ही चलती है।

कारण तथा दशाएं (Causes and Conditions)-दुर्खीम की पुस्तक The division of Labour in Society का दूसरा भाग श्रम विभाजन के कारणों, दशाओं तथा परिणामों से सम्बन्धित है। दुर्खीम श्रम विभाजन के कारणों तथा दिशाओं की व्याख्या पेश करते हुए लिखते हैं कि श्रम विभाजन के विकास के प्रेरक तथा सुख में बढ़ौत्तरी की इच्छा अथवा ‘आनन्द प्राप्ति’ नहीं है क्योंकि सुख में व्यक्तिगत तथ्य मौजूद हैं तथा सुख की इच्छा मनोवैज्ञोनिक का विषय है। समाजशास्त्रीय विवेचना का नहीं चाहे श्रम विभाजन को दुर्खीम ने सामाजिक तथ्य माना है।

श्रम-विभाजन के कारण (Causes of Division of Labour)-दुीम ने श्रम-विभाजन की व्याख्या समाजशास्त्रीय आधार पर की है। उसने श्रम विभाजन के कारणों की खोज सामाजिक जीवन की दशाओं व उनसे पैदा सामाजिक ज़रूरतों से की है। इस नज़र से उसने श्रम-विभाजन के कारणों को दो भागों में बांटा है। पहला • है प्राथमिक कारक व दूसरा है द्वितीय कारक। प्राथमिक कारक के रूप में दुर्खीम ने जनसंख्या में बढ़ोत्तरी व उससे उत्पन्न परिणामों को माना है। जबकिं द्वितीय कारकों को वह दो भागों में रखता है। वह है आम चेतना की बढ़ती हुई अस्पष्टता व पैतृकता का घटता हुआ प्रभाव।

अब हम इनके कारकों की विस्तार से व्याख्या करेंगे-

(i) जनसंख्या के आकार व घनत्व में बढ़ोत्तरी (Increase in Density and size of Population)दुर्खीम के अनुसार जनसंख्या के आकार व घनत्व में बढ़ोत्तरी ही श्रम-विभाजन का केन्द्रीय व प्राथमिक कारक है। दुर्खीम के अनुसार, “श्रम-विभाजन समाज में जटिलता व घनत्व के साथ सीधे अनुपात में रहता है व यदि सामाजिक विकास के दौरान यह लगातार बढ़ता है तो इसका कारण यह है कि समाज लगातार अधिक घनत्व व अधिक जटिल हो जाते हैं।” दुर्खीम के अनुसार जनसंख्या में बढ़ोत्तरी के दो पक्ष हैं-जनसंख्या के आकार में अधिकता व जनसंख्या के घनत्व में अधिकता। यह दोनों पक्ष श्रम-विभाजन को जन्म देते हैं। जनसंख्या में बढ़ोत्तरी होने से सरल समाज समाप्त हो जाते हैं और मिश्रित समाज बनने लग जाते हैं। जनसंख्या विशेष केन्द्रों पर एकत्र होने लगती है। जनसंख्या के घनत्व को भी दुर्खीम ने दो भागों में बांटा है-

(a) भौतिक घनत्व (Material Density)-शारीरिक नज़र से लोगों का एक ही स्थान पर एकत्र होना घनत्व है।
(b) नैतिक घनत्व (Moral Density)-भौतिक घनत्व के परिणाम से लोगों के आपसी सम्बन्ध बढ़ते हैं जिससे उनकी क्रियाओं व प्रतिक्रियाओं में बढ़ोत्तरी होती है। इन आपसी सम्बन्धों व अन्तर क्रियाओं में बढ़ोत्तरी से उत्पन्न जटिलता को दुर्खीम ने नैतिक घनत्व कहा है।

(ii) सामूहिक चेतना का कम होना या पतन-दुर्खीम ने श्रम-विभाजन को द्वितीय कारकों के बारे में बताया है। इसमें उसने सामूहिक चेतना के पतन को सबसे पहले रखा है। समानताओं पर आधारित समाज में सामूहिक चेतना प्रबल या ताकतवर होती है जिस कारण समूह के सदस्य व्यक्तिगत भावनाओं से प्रेरित होते हैं। सामूहिक भावना ही उनको रास्ता दिखाती है। दुर्खीम के अनुसार श्रम-विभाजन तब ही सम्भव है जब सामूहिक दृष्टिकोण की जगह व्यक्तिगत दृष्टिकोण का विकास हो जाए व व्यक्तिगत चेतना सामूहिक चेतना को नष्ट कर दे। अतः दुर्खीम के अनुसार, “चेतना निश्चित व मज़बूत होगी इसके विपरीत यह उतनी ही अधिक तेज़ होगी, जितना व्यक्ति अपने व्यक्तिगत वातावरण से समझौता करने में असमर्थ होगा।

(iii) पैतृकता व श्रम-विभाजन-दुीम ने द्वितीय कारक के दूसरे प्रकार को पैतृकता के घटते प्रभाव को कारण माना है। चाहे दुर्खीम ने सामाजिक घटनाओं की व्याख्या के लिए सामाजिक कारकों को ही प्राथमिकता दी है पर श्रम-विभाजन के विकास में पैतृकता का प्रभाव जितना अधिक होता है परिवर्तन के मौके उतने ही कम होते हैं।

अन्य शब्दों में श्रम विभाजन के विकास के लिए यह ज़रूरी है कि पैतृक गुणों को महत्त्व न दिया जाए। श्रम विभाजन का विकास तभी सम्भव है जब लोगों में प्रकृति तथा स्वभाव में भिन्नता हो, पैतृकता से प्राप्त योग्यताओं के आधार पर व्यक्तियों का वर्गीकरण करके उनको विशेष जातियों से सम्बन्धित करके, उनके पूर्वजों तथा अतीत से कठोरता से बांध देने की प्रक्रिया के फलस्वरूप यह होता है कि हम अपनी विशेष रुचिओं का विकास नहीं कर सकते तथा परिवर्तन नहीं कर सकते। इस प्रकार कहा जा सकता है कि पैतृकता के आधार पर कार्यों का विभाजन भी श्रम विभाजन में रुकावट है। दुर्खीम के अनुसार समय की गति तथा सामाजिक विकास के साथ लगातार होने वाले परिवर्तन पैतृकता में लचकीला पन पैदा करते हैं अर्थात् पैतृकता के गुण कमजोर होने लग जाते हैं। परिणामस्वरूप व्यक्तियों की विभिन्नताएं विकसित हो जाती है तथा श्रम विभाजन में बढ़ोत्तरी होती है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि दुर्खीम ने जनसंख्या में बढ़ोत्तरी, सामूहिक चेतना का पतन तथा पैतृकता के घटते प्रभाव को श्रम विभाजन का कारक माना है।

श्रम-विभाजन के परिणाम (Consequences of Division of Labour)-श्रम-विभाजन के प्राथमिक व द्वितीय कारणों के पश्चात् दुर्खीम इसके विकास के परिणामस्वरूप होने वाले परिणामों पर रोशनी डालते हैं। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि ‘कार्य’ व ‘परिणाम’ दो भिन्न-भिन्न शब्द हैं। ऐसे बहत से तथ्य जो आम आदमी की नज़र से श्रम-विभाजन से कार्य दिखाई देते हैं। वह सच्चाई में उसके परिणाम है। दुर्खीम ने श्रम-विभाजन के बहुत सारे परिणामों की ओर हमारा ध्यान केन्द्रित किया है। उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं

1. कार्यात्मक स्वतन्त्रता व विशेषीकरण-दुर्खीम ने शारीरिक श्रम-विभाजन व सामाजिक श्रम-विभाजन में अन्तर बताया है व सामाजिक श्रम-विभाजन के परिणाम बताए हैं। दुीम के अनुसार श्रम-विभाजन का एक परिणाम यह होता है कि जैसे ही काम अधिक बांटा जाता है उसी प्रकार काम करने की स्वतन्त्रता व गतिशीलता में बढ़ोत्तरी होती है। श्रम-विभाजन के कारण मानव अपनी कुछ विशेष योग्यताओं को विशेष काम में लगा देता है। दुीम के अनुसार श्रम-विभाजन के विकास का एक परिणाम यह भी होता है कि व्यक्तियों के काम उनके शारीरिक लक्षणों से स्वतन्त्र हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में मानव की संरचनात्मक विशेषताएं उनकी कार्यात्मक प्रवृत्तियों को अधिक प्रभावित नहीं करतीं।

2. सभ्यता का विकास-दुर्खीम ने शुरू में ही यह स्पष्ट किया है कि सभ्यता का विकास करना श्रम-विभाजन का काम नहीं है क्योंकि श्रम-विभाजन एक नैतिक तथ्य है व सभ्यता के तीन अंग, औद्योगिक या आर्थिक, कलात्मक व वैज्ञानिक विकास नैतिक विकास से सम्बन्ध नहीं रखते।
दुर्खीम ने श्रम-विभाजन के परिणाम के रूप में सभ्यता के विकास की व्याख्या की है। आपका कहना था कि जनसंख्या के आकार व घनता में अधिकता होने के साथ सभ्यता का विकास भी ज़रूरी हो जाता है। श्रम-विभाजन व सभ्यता दोनों साथ-साथ प्रगति करते हैं। परन्तु श्रम-विभाजन का विकास पहले होता है व उसके परिणामस्वरूप सभ्यता विकसित होती है। इसलिए दुर्खीम का मानना है कि सभ्यता न तो श्रम-विभाजन का लक्ष्य है व न ही उसका कार्य है बल्कि एक ज़रूरी परिणाम है।

3. सामाजिक प्रगति-प्रगति परिवर्तन का परिणाम है। श्रम-विभाजन भी परिवर्तन को जन्म देता है। परिवर्तन समाज में एक निरन्तर प्रक्रिया है। इसलिए प्रगति भी समाज में निरन्तर होती रहती है। दुर्खीम के अनुसार इस परिवर्तन का मुख्य कारण श्रम-विभाजन है। श्रम-विभाजन के कारण परिवर्तन होता है व परिवर्तन के कारण प्रगति होती है। इस तरह सामाजिक प्रगति श्रम-विभाजन का एक परिणाम है। दुर्खीम के विचार से प्रगति का प्रमुख कारक समाज है। हम इसलिए बदल जाते हैं क्योंकि समाज बदल जाता है। प्रगति तो रुक ही सकती है जब समाज रुक जाए पर वैज्ञानिक नज़र से यह सम्भव नहीं है। इसलिए दुर्खीम के अनुसार प्रगति भी सामाजिक जीवन का परिणाम है।

4. सामाजिक परिवर्तन व व्यक्तिगत परिवर्तन-दुर्खीम ने सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या श्रम-विभाजन के आधार पर की है। व्यक्तियों में होने वाले परिवर्तन समाज में होने वाले परिवर्तन का परिणाम हैं। दुर्खीम का मानना है कि समाज में होने वाले परिवर्तन मूल कारक हैं। जनसंख्या के आकार, वितरण व घनत्व में होने वाला परिवर्तन है जो मानवों में श्रम-विभाजन कर देता है व सारे व्यक्तिगत परिवर्तन इसी सामाजिक परिवर्तन के परिणामस्वरूप होते हैं।

5. नवीन समूहों की उत्पत्ति व अन्तर्निर्भरता-दुर्खीम के अनुसार श्रम-विभाजन का एक परिणाम यह होता है कि विशेष कार्यों में लगे व्यक्तियों के विशेष हितों का विकास हो जाता है। इस प्रकार जितना अधिक श्रमविभाजन होता है उतनी ही अधिक अन्तर्निर्भरता बढ़ती है। अन्तर्निर्भरता सहयोग को जन्म देती है। इसलिए श्रमविभाजन सहयोग की प्रक्रिया को सामाजिक जीवन के लिए ज़रूरी बना देता है।

6. व्यक्तिवादी विचारधारा-दुर्खीम के अनुसार श्रम-विभाजन के परिणामस्वरूप व्यक्तिगत चेतना बढ़ती है। सामूहिक चेतना का नियन्त्रण कम हो जाता है। व्यक्तिगत स्वतन्त्रता व विशेषता व्यक्तिवादी विचारधारा को जन्म देती है। इस तरह श्रम-विभाजन के परिणामस्वरूप व्यक्तिवादी विचारधारा को बल मिलता है।

7. प्रतिकारी कानून व नैतिक दबाव-दुर्खीम के अनुसार श्रम-विभाजन कानूनी व्यवस्था में ही बदलाव कर देता है। श्रम-विभाजन के परिणामस्वरूप आपसी सम्बन्धों का विस्तार होता है व जटिलता व कार्यात्मक सम्बन्धों के कारण व्यक्तिगत समझौते का महत्त्व कम हो जाता है। मानवों के संविदात्मक या समझौते वाले सम्बन्धों को सन्तुलित करने के लिए प्रतिकारी या सहकारी कानूनों का विकास हो जाता है। श्रम-विभाजन जहां एक ओर व्यक्तिवाद को प्रोत्साहन देता है, वहां दूसरी ओर यह व्यक्तियों में विशेष आचरण से सम्बन्धित व सामूहिक कल्याण से सम्बन्धित नैतिक जागरूकता का भी निर्माण करता है। दुर्खीम के विचार से व्यक्तिवाद मानवों की इच्छा पर फल नहीं बल्कि श्रम-विभाजन से उत्पन्न सामाजिक परिस्थिति का आवश्यक परिणाम है।

Class 11 Sociology Solutions Chapter 12 पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (Textual Questions)

I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1-15 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. एक अकादमिक अनुशासन के रूप में समाज का औपचारिक अध्ययन किस देश में तथा किस शताब्दी में प्रारम्भ हुआ ?
उत्तर-एक विषय के रूप में समाज का औपचारिक अध्ययन फ्राँस (यूरोप) में 19वीं शताब्दी में शुरू हुआ।

प्रश्न 2. उन तीन कारकों के नाम बताइये जो एक स्वतन्त्र अनुशासन के रूप में समाजशास्त्र के विकास के लिए उत्तरदायी है।
उत्तर-औद्योगिक क्रान्ति, फ्रांसीसी क्रान्ति तथा नवजागरण के विचारों के फैलाव से समाजशास्त्र का विकास एवं स्वतन्त्र विषय के रूप में हुआ।

प्रश्न 3. नवजागरण से सम्बद्ध दो विचारकों के नाम बताइए।
उत्तर-चार्ल्स मान्टेस्कयू (Charles Montesquieu) तथा जीन जैक्स रूसो (Jean Jacques Rousseau)।

प्रश्न 4. फ्रांसीसी क्रान्ति किस वर्ष अस्तित्व में आयी ?
उत्तर-फ्रॉसीसी क्रान्ति सन् 1789 में हुई थी।

प्रश्न 5. प्रत्यक्षवाद शब्द से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर- यह माना जाता है कि समाज कुछ स्थिर नियमों के अनुसार कार्य करता है, जिन्हें ढूंढा जा सकता है। इसे ही सकारात्मकवाद कहते हैं।

प्रश्न 6. किसने समाजशास्त्र की दो शाखाओं सामाजिक स्थितिकी तथा सामाजिक गतिकी की चर्चा की ?
उत्तर-अगस्ते काम्ते ने यह नाम दिया।

प्रश्न 7. अगस्ते कोंत के तीन चरणों के नियम को चार्ट द्वारा प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर-
im

प्रश्न 8. कार्ल मार्क्स का वर्ग का सिद्धांत किस निर्धारणवाद पर आधारित है ?
उत्तर-कार्ल मार्क्स का वर्ग का सिद्धांत उत्पादन के साधनों की मल्कियत पर आधारित है कि एक समूह के पास उत्पादन के साधन होते हैं तथा एक के पास नहीं होते हैं।

प्रश्न 9. ‘कम्युनिस्ट मैनिफैस्टो’ पुस्तक किसने लिखी है ?
उत्तर-पुस्तक ‘कम्युनिस्ट मैनिफैस्टो’ कार्ल मार्क्स ने लिखी है।

प्रश्न 10. कार्ल मार्क्स द्वारा प्रस्तुत सामाजिक परिवर्तन के चरण कौन-से हैं ?
उत्तर-मार्क्स के अनुसार सामाजिक परिर्वतन के चार मुख्य स्तर हैं–आदिम समुदाय समाज, दासमूलक समाज, सामन्ती समाज तथा पूँजीवादी समाज।

प्रश्न 11. किसने समाज में उपस्थित एकता की प्रकृति के आधार पर समाज को वर्गीकृत है ?
उत्तर-एमिल दुर्शीम ने समाज में मौजूद एकता की प्रकृति के आधार पर समाज को बाँटा है।

प्रश्न 12. एमिल दुर्थीम द्वारा प्रस्तुत एकता के दो प्रकार बताइये।
उत्तर- यान्त्रिक एकता (Mechnical Solidarity) तथा सावयवी एकता (Organic Solidarity)।

प्रश्न 13. मैक्स वैबर द्वारा प्रस्तुत सामाजिक क्रिया के प्रकारों की सूची बताइये।
उत्तर-मैक्स वैबर ने चार प्रकार की सामाजिक क्रिया के बारे में बताया है- Zweekrational, Wertnational, Affeective क्रिया तथा Traditional क्रिया।

प्रश्न 14. मैक्स वैबर द्वारा प्रस्तुत सत्ता के प्रकार बताइये।
उत्तर-मैक्स वैबर ने सत्ता के तीन प्रकार दिए हैं-परंपरागत सत्ता, वैधानिक सत्ता तथा करिश्मई सत्ता।

II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30-35 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. नवजागरण किसे कहते हैं ?
उत्तर-नवजागरण वह समय था जब काफ़ी अधिक बौद्धिक विकास हुआ तथा दार्शनिक विचारों में बहुत परिवर्तन आए। यह समय 17वीं-18वीं शताब्दी के बीच था। इस समय के मशहूर विचारक मान्टेस्क्यू तथा रूसो थे। यह विचारक विज्ञान की सर्वोच्चता तथा विश्वास के ऊपर तर्क को ऊँचा मानते थे। इन विचारों के कारण ही सामाजिक प्रकटन में वैज्ञानिक विधि के प्रयोग पर बल दिया।

प्रश्न 2. धर्मशास्त्रीय तथा तत्वशास्त्रीय चरणों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-कोंत के अनुसार आध्यात्मिक पड़ाव में मनुष्य के विचार काल्पनिक थे। वह सभी चीज़ों को परमात्मा के रूप में समझता था। धारणा यह थी कि चाहे सभी चीज़े निर्जीव हैं परन्तु उनमें सर्वशक्ति व्यापक है। अधिभौतिक पड़ाव 14वीं से 16वीं शताब्दी तक चला। इस समय बेरोक निरीक्षण का अधिकार सामने आया जिसकी कोई सीमा नहीं थी। इस कारण आत्मिकता का पतन हुआ जिसका सांसारिक पक्ष पर भी प्रभाव पड़ा।

प्रश्न 3. जीववाद (Animism) से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर- जीववाद एक विचारधारा है जिनमें लोग विश्वास करते हैं कि परमात्मा केवल चलने वाली या जीने वाली वस्तुओं में मौजूद है। शब्द Anima का अर्थ है आत्मा (Soul) या चाल (Movement)। लोगों ने जानवरों, पंक्षियों, पृथ्वी तथा हवा की भी पूजा करनी शुरू कर दी।

प्रश्न 4. कार्ल मार्क्स की वर्ग की परिभाषा दीजिए।
उत्तर-मार्क्स के अनुसार, “वर्ग लोगों के ऐसे बड़े-बड़े समूहों को कहते हैं जो सामाजिक उत्पादन की इतिहास की तरफ से निर्धारित किसी पद्धति में, अपने-अपने स्थान की दृष्टि से, उत्पादन के साधनों के साथ अपने संबंध की दृष्टि से, परिश्रम के सामाजिक संगठन में अपनी भूमिका की दृष्टि से तथा परिणामस्वरूप सामाजिक सम्पत्ति के जितने हिस्से के वह मालिक होते हैं, उसके परिणाम तथा उसे प्राप्त करने के तौर-तरीके की दृष्टि से एक-दूसरे से अलग होते हैं।

प्रश्न 5. वर्ग चेतना से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-प्रत्येक वर्ग अपने सदस्यों, उनकी सामाजिक स्थिति, रुतबें इत्यादि के बारे में चेतन होता है। इस प्रकार की चेतना को ही वर्ग चेतना कहा जाता है। सभी वर्गों के लोग अपने समूह के प्रति चेतन होते हैं जिस कारण वह साधारण तथा अपने वर्ग के सदस्यों के साथ ही संबंध रखना पसंद करते हैं।

प्रश्न 6. ऐतिहासिक भौतिकवाद को परिभाषित कीजिए।
उत्तर-ऐतिहासिक भौतिकवाद वह दार्शनिक विद्या है जो एक अखण्ड व्यवस्था के रूप में समाज का तथा उस व्यवस्था के कार्य तथा विकास को शामिल करने वाले मुख्य नियमों का अध्ययन करती है। संक्षेप में ऐतिहासिक भौतिकवाद सामाजिक विकास का दार्शनिक सिद्धांत है। इस प्रकार यह मार्क्स का सामाजिक तथा ऐसिहासिक सिद्धांत है।

प्रश्न 7. सामाजिक तथ्य पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-दुर्थीम ने सामाजिक तथ्य का सिद्धांत दिया था तथा अपनी पुस्तक के प्रथम अध्याय के अंत में इसकी परिभाषा दी। दुर्थीम के अनुसार, “एक सामाजिक तथ्य क्रिया करने का प्रत्येक स्थायी, अस्थायी तरीका है जो व्यक्ति के ऊपर बाहरी दबाव डालने में समर्थ होता है अथवा दोबारा क्रिया करने का प्रत्येक तरीका है जो किसी समाज में आम रूप से पाया जाता है परन्तु साथ ही व्यक्तिगत विचारों से स्वतन्त्र अस्तित्व रखता है।

प्रश्न 8. सावयवी एकता (Organic Solidarity) पर चर्चा कीजिए।
उत्तर-सावयवी एकता आधुनिक समाजों में पाई जाती है तथा यह स्तर सदस्यों के बीच मौजूद अंतरों पर आधारित है। यह अधिक जनसंख्या वाले समाजों में पाई जाती है जहाँ पर लोगों के बीच अव्यक्तिगत सामाजिक संबंध पाए जाते हैं। इन समाजों में प्रतिकारी कानून पाए जाते हैं।

प्रश्न 9. ज्वैकरेशनल क्रिया से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर- Zweckrational क्रिया का अर्थ ऐसे सामाजिक व्यवहार से होता है जो उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए कई उद्देश्यों की अधिक-से-अधिक प्राप्ति के लिए तार्किक रूप से निर्देशित हो। इसमें साधनों के चुनाव केवल उनकी विशेष कार्यकुशलता की तरफ ही ध्यान नहीं दिया जाता बल्कि मूल्य में की तरफ भी ध्यान जाता है।

प्रश्न 10. भावनात्मक क्रिया किसे कहते हैं ?
उत्तर-यह वह क्रियाएं हैं जो मानवीय भावनाओं, संवेगों तथा स्थायी अर्थों के कारण होती हैं। समाज में रहते हुए, प्रेम, नफरत, गुस्सा इत्यादि जैसी भावनाओं का सामना करना पड़ता है। इस कारण ही समाज में शान्ति या अशान्ति की अवस्था उत्पन्न हो जाती है। इन व्यवहारों के कारण परंपरा तथा तर्क का थोड़ा सा भी सहारा नहीं लिया जाता।

प्रश्न 11. सत्ता को परिभाषित कीजिए।
उत्तर-वैबर के अनुसार प्रत्येक संगठित समूह में सत्ता में तत्त्व मूल रूप में मौजूद होते हैं। संगठित समूह में कुछ तो साधारण सदस्य होते हैं तथा कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनके पास ज़िम्मेदारी होती है तथा वह अन्य लोगों से वैधानिक तौर पर आदेश देकर अपनी बात मनवाते हैं। इस बात मनवाने की व्यवस्था को ही सत्ता कहते हैं।

III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 75-85 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. अगस्त कोंत द्वारा प्रतिपादित तीन चरणों के नियम की विवेचना कीजिए।
उत्तर-अगस्त कोंत ने समाज के उद्विकास का सिद्धांत दिया तथा कहा कि समाज के विकास के तीन पड़ाव हैं-आध्यात्मिक पड़ाव, अधिभौतिक पड़ाव तथा सकारात्मक पड़ाव। आध्यात्मिक पड़ाव में मनुष्य के सभी विचार काल्पनिक थे तथा वह सभी वस्तुओं को किसी आलौकिक जीव की क्रियाओं के परिणाम के रूप में मानता था। धारणा यह थी कि चाहे सभी वस्तुएं निर्जीव हैं परन्तु उनमें वह शक्ति व्यापक है। दूसरा पड़ाव अधिभौतिकं पडाव था जो 14वीं शताब्दी से 19वीं शताब्दी तक चला। इस पड़ाव में क्रान्तिक आंदोलन शुरू हुआ तथा प्रोटैस्टैंटवाद सामने आया। 16वीं शताब्दी में नकारात्मक सिद्धांत सामने आया जिसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक परिवर्तन था। इसमें बेरोक निरीक्षण का अधिकार था तथा निरीक्षण की कोई सीमा नहीं थी। सकारात्मक पड़ाव में औद्योगिक समाज शुरू हुआ तथा विज्ञान सामने आया। इसमें सामाजिक व्यवस्था तथा प्रगति में कोई द्वन्द नहीं होता है।

प्रश्न 2. यान्त्रिक एकता की विशेषताओं की चर्चा कीजिए।
उत्तर-

  • यान्त्रिक एकता वाले समाज के सदस्यों के व्यवहारों में समरूपता मिलती है तथा उनके व्यवहार एक जैसे होते हैं।
  • समान विश्वास तथा भावनाएं यान्त्रिक एकता के प्रतीक हैं। इस समाज के सदस्यों में सामूहिक चेतना मौजूद होती है।
  • यान्त्रिक समाजों में दमनकारी कानून मिलते हैं जहाँ पर अपराधी को पूर्ण दण्ड देने की व्यवस्था होती है।
  • नैतिकता यान्त्रिक समाजों का मूल आधार होती है जिस कारण समाज में एकता बनी रहती है।
  • धर्म यान्त्रिक समाज में एकता का महत्त्वपूर्ण आधार है तथा धर्म के अनुसार ही आचरण तथा व्यवहार किया जाता है।

प्रश्न 3. सावयवी एकता की विशेषताओं की चर्चा कीजिए।
उत्तर-

  • आंगिक अथवा सावयवी एकता वाले समाजों में विभेदीकरण तथा विशेषीकरण पाया जाता है। समाज में बहत से वर्ग मिलते हैं।
  • इन समाजों में श्रम विभाजन का बोलबाला होता है तथा लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक दूसरे पर निर्भर होते हैं।
  • इन समाजों में बहुत से संगठन तथा समूह मिलते हैं जिस कारण इनमें प्रतिकारी कानूनों की प्रधानता होती
  • सावयवी समाजों में समझौतों पर आधारित संबंध सामाजिक एकता का स्रोत होते हैं तथा नौकरियों में व्यक्तियों को अनुबंध पर रखा जाता है।
  • सावयवी एकता वाले समाजों में धर्म का प्रभाव काफ़ी कम होता है।
  • इस प्रकार के समाज आधुनिक समाज होते हैं।

प्रश्न 4. धर्मशास्त्रीय एवं तत्वशास्त्रीय चरणों में अंतर कीजिए।
उत्तर-

  • धर्मशास्त्रीय पड़ाव-यह पड़ाव मानवता के शुरू होने के समय शुरू होता है जब मनुष्य प्राकृतिक शक्तियों से डरता था। वह सभी चीजों को किसी आलौकिक शक्ति की क्रियाओं के परिणाम के रूप में देखता था। वह सोचता था कि चाहे सभी वस्तुएं निर्जीव हैं परन्तु सब में परमात्मा मौजूद है। यह पड़ाव आगे तीन उप-पड़ावों प्रतीक पूजन, बहु-देवतावाद तथा एक-ईश्वरवाद में विभाजित है।
  • तत्वशास्त्रीय पड़ाव-इस पड़ाव को काम्ते आधुनिक समाज का क्रान्तिक समय भी कहता है। यह पड़ाव 5 शताब्दियों तक 14वीं से 19वीं तक चला। इसे दो भागों में विभाजित किया गया है। प्रथम भाग में क्रान्तिक आंदोलन स्वयं ही चल पड़ा तथा क्रान्तिक फिलास्फी 16वीं शताब्दी में प्रोटैस्टैंटवाद में आने से शुरू हुई। दूसरा भाग 16वीं शताब्दी से शुरू हुआ। इसमें नकारात्मक सिद्धांत शुरू हुआ जिसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक परिवर्तन था। इसमें बेरोक निरीक्षण का अधिकार था।

प्रश्न 5. क्या आप सोचते हैं कि निकट भविष्य में साम्यवादी समाजों द्वारा पूँजीवाद को विस्थापित कर दिया जायेगा ?
उत्तर-जी नहीं, हम नहीं सोचते कि आने वाले भविष्य में पूँजीवादी व्यवस्था को कम्युनिस्ट व्यवस्था बदल देगी। वास्तव में पूँजीवादी व्यवस्था स्वतन्त्र मार्कीट के सिद्धांत पर आधारित है जबकि कम्युनिस्ट अर्थव्यवस्था सरकारी नियन्त्रण के अन्तर्गत होती है तथा आजकल के समय में कोई भी सरकारी नियन्त्रण को पसन्द नहीं करता। 1917 में रूस में राजशाही को कम्युनिस्ट व्यवस्था ने बदल दिया था परन्तु वहां की अर्थव्यवस्था का कुछ ही समय में बुरा हाल हो गया था। इस कारण ही सन् 1990 में U.S.S.R. के टुकड़े हो गए थे तथा वह कई देशों में विभाजित हो गया था। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कम्युनिस्ट पूँजीवादी व्यवस्था को नहीं बदल सकती।

IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 250-300 शब्दों में दें:

प्रश्न 1. क्या समाजशास्त्र एक पूर्ण विज्ञान के रूप में विकसित हुआ है जिसकी कल्पना अगस्ते कोंत ने की थी ?
उत्तर-शब्द समाजशास्त्र (Sociology) का प्रथम बार प्रयोग अगस्ते काम्ते ने 1839 में किया था। काम्ते ने एक पुस्तक लिखी ‘The Course on Positive Philosophy’ जो कि 6 भागों में छपी थी। इस पुस्तक में उन्होंने कहा था कि समाज में अलग-अलग भागों का अध्ययन अलग-अलग सामाजिक विज्ञान करते हैं, उदाहरण के लिए समाज के राजनीतिक हिस्से का अध्ययन राजनीति विज्ञान करता है, आर्थिक हिस्से का अध्ययन अर्थशास्त्र करता है। उस प्रकार एक ऐसा विज्ञान भी होना चाहिए जो समाज का अध्ययन करे। इस प्रकार उन्होंने समाज, सामाजिक संबंधों के अध्ययन की कल्पना की तथा उनकी कल्पना के अनुसार एक नया विज्ञान सामने आया जिसे समाजशास्त्र का नाम दिया गया।

काम्ते के पश्चात् हरबर्ट स्पैंसर ने भी कई संकल्प दिए जिससे समाजशास्त्र का दायरा बढ़ना शुरू हुआ। इमाईल दुर्थीम प्रथम समाज शास्त्री था जिसने समाजशास्त्र को एक विज्ञान के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। उन्होंने अपने अध्ययनों में वैज्ञानिक विधि का प्रयोग किया तथा कहा कि समाज का वैज्ञानिक विधियों, जैसे कि निरीक्षण की सहायता से अध्ययन किया जा सकता है। उनके द्वारा दिए संकल्पों, जैसे कि सामाजिक तथ्य, आत्महत्या का सिद्धांत, श्रम विभाजन का सिद्धांत, धर्म का सिद्धांत इत्यादि में वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग साफ झलकता है। समाजशास्त्र के इतिहास में दुर्थीम पहले प्रोफैसर थे।
समाजशास्त्र को विज्ञान के रूप में स्थापित करने में कार्ल मार्क्स तथा मैक्स वैबर ने भी बहुत बड़ा योगदान दिया। कार्ल मार्क्स ने संघर्ष का सिद्धांत दिया तथा सम्पूर्ण समाजशास्त्र संघर्ष सिद्धांत में इर्द-गिर्द घूमता है।

मार्क्स ने समाज का आर्थिक पक्ष से अध्ययन किया तथा बताया कि समाज का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है। उन्होंने दो प्रकार के वर्गों तथा उनके बीच हमेशा चलने वाले संघर्ष का विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने ऐतिहासिक भौतिकवाद, वर्ग तथा वर्ग संघर्ष का सिद्धांत, अलगाव का सिद्धांत जैसे संकल्प समाजशास्त्र को दिए। मैक्स वैबर ने भी समाजशास्त्र को विज्ञान के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया तथा सामाजिक क्रिया का सिद्धांत दिया। उन्होंने समाजशास्त्र की व्याख्या दी, सामाजिक क्रिया का सिद्धांत दिया, सत्ता तथा प्रभुत्ता का सिद्धांत दिया, धर्म की व्याख्या दी तथा कर्मचारीतन्त्र का सिद्धांत दिया।

इन सभी समाजशास्त्र के संस्थापकों के पश्चात् बहुत से समाजशास्त्री हुए तथा समाजशास्त्र को विज्ञान के रूप में स्थापित करने में उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता। टालक्ट पारसन्ज़, जे० एस० मिल, राबर्ट मर्टन, मैलिनोवस्की, गिलिन व गिलिन, जी० एस० घूर्ये इत्यादि जैसे समाजशास्त्री इनमें से प्रमुख हैं।
अब पिछले कुछ समय से समाजशास्त्र में वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग काफ़ी हद तक किया जा रहा है ताकि अध्ययन को अधिक-से-अधिक वस्तुनिष्ठ तथा निष्पक्ष रखा जा सके। इससे एक क्षेत्र में किए अध्ययनों को दूसरे क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकेगा। उपकल्पना, निरीक्षण, सैंपल विधि, साक्षात्कार, अनुसूची प्रश्नावली, केस स्टडी, वर्गीकरण, सारणीकरण, आँकड़ों के प्रयोग से समाजशास्त्र निश्चित रूप से एक विज्ञान के रूप में स्थापित हो गया है।

प्रश्न 2. मार्क्स का वर्ग संघर्ष का सिद्धांत बताइये।
उत्तर-मार्क्स की उन्नत ‘वैज्ञानिक प्रस्थापना’ में यह बात भी शामिल है कि उन्होंने अलग सामाजिक समूहों पर सर्वप्रथम वर्गों के अस्तित्व की व्याख्या की थी। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मार्क्स ने वर्गों की व्याख्या बहुत अच्छे प्रकार से की है। मार्क्स की विचारक खोज का मुख्य उद्देश्य यह पता करना था कि यह मानव समाज जिसमें हम सभी रहते हैं, और इसका जो रूप या स्वरूप हमें दिखाई देता है वह इस तरह क्यों है ? और इस समाज में परिवर्तन क्यों और किन शक्तियों के द्वारा आते हैं ? इसके साथ ही मार्क्स ने इसकी स्पष्ट व्याख्या और विवेचना की थी और लिखा था कि आने वाले समय में समाज में किस तरह और कैसे परिवर्तन आयेंगे ? अपनी खोजों के द्वारा मार्क्स और उसके निकट सहयोगी ‘ऐंजलस’ इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इस समाज में काफ़ी अमानवीय शोषण फैला हुआ है। इसलिये उन्होंने अपनी खोज का दूसरा उद्देश्य उस समाज का निर्माण करना या स्थापना करनी है जो कि शोषण रहित हो बताया है ।

वर्ग किसे कहते हैं (What is Class) मार्क्स के वर्ग संघर्ष को समझने के लिये यह अति आवश्यक है कि पहले यह जाने कि वर्ग क्या है ? कार्ल मार्क्स ने इतिहास का अध्ययन करने के लिये इस बात की विशेष वकालत की कि हमें यह अध्ययन उस दृष्टिकोण से करना चाहिये जिसके साथ हम उन प्राकृतिक नियमों का पता लगा सकें जो पूरे मानव इतिहास का संचालन करते हैं और ऐसा करने के लिए हमें कुछ विशेष व्यक्तियों के कार्यों और आम व्यक्तियों के कार्यों और व्यवहारों की तरफ ध्यान देना चाहिये। प्रत्येक समाज लगभग कई जनसमूहों में बंटे हुए होते हैं। इस प्रकार भिन्न-भिन्न वर्ग एक विशेष सामाजिक आर्थिक इकाई का निर्माण करते थे। इस इकाई विशेष को हम वर्ग के नाम से जानते हैं।

मार्क्स ने अपने कम्युनिस्ट मैनीफैस्टो किस्से के पहले अध्याय की शुरुआत भी इन्हीं शब्दों से की है कि अभी तक समाज का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है और इतिहास में वर्णित समाजों में हर समाज में विभिन्न प्रकार की श्रेणियां पाई जाती हैं। सामाजिक श्रेणियों की बहरूपी दर्जाबंदी, प्राचीन रोम में पैट्रोशियन, नाई पलेबियन और दास मिलते थे। मध्यकाल में हमें सामन्तवादी अधीन जागीरदारी, उस्ताद, कारीगर, मज़दूर कारीगर, ज़मीनी दास इत्यादि दिखाई पड़ते हैं और लगभग इन सभी में द्वितीय श्रेणियां या वर्ग पाए जाते हैं।

मार्क्स की वर्ग व्यवस्था के आधार पर ही लेनिन ने वर्गों की व्याख्या और परिभाषा पेश की है। लेनिन ने लिखा है कि, “वर्ग लोगों के ऐसे बडे-बडे समूहों को कहते हैं जो सामाजिक उत्पादन की इतिहास की तरफ से निर्धारित किसी पद्धति में अपनी-अपनी जगह की नज़र से उत्पादन के साधनों के साथ अपने सम्बन्धों जो कि अधिकतर मामलों में कानून के द्वारा निश्चित और निरूपित होते हैं की नज़रों से, मेहनत के सामाजिक संगठन में अपनी भूमिका को नज़र से और फलस्वरूप सामाजिक सम्पत्ति के जितने भाग के वह मालिक होते हैं, उसके परिमाण और उसको प्राप्त करने के तौर-तरीकों की नज़र से एक दूसरे से अलग होते हैं।”

मार्क्स के अनुसार, “इतिहास की भौतिकवादी धारणा में यह कहा गया है कि मानव जीवन के विकास के लिये आवश्यक साधनों का उत्पादन और उत्पादन के उपरान्त बनी वस्तुओं का लेन-देन (Exchange) प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था का आधार है। इतिहास में जितनी भी सामाजिक व्यवस्थाएं बनी हैं इसमें जिस तरह धन का बंटवारा हुआ है और समाज का वर्गों और श्रेणियों में बंटवारा हुआ है वह इस बात पर निर्भर है कि इस समाज में क्या उत्पादन हुआ है ? और कैसे हुआ है ? और फिर उपज की Exchange कैसे हुई ? मार्क्स के अनुसार, “किसी भी युग में परिश्रम का बंटवारा और जीवन जीने के साधनों की प्राप्ति के अलग-अलग साधनों के होने के कारण मनुष्य अलग-अलग वर्गों में बंट जाता है और प्रत्येक वर्ग की विशेष वर्ग चेतनता होती है।”

वर्ग से मार्क्स का अर्थ भारत की जातीय व्यवस्था से सम्बन्धित नहीं है बल्कि वर्ग से उनका अर्थ उस जातीय समूह व्यवस्था से है जिसकी परिभाषा उत्पादन की उस प्रक्रिया में उनकी भूमिका के साथ की जा सकती है। आम शब्दों में कहा जाये तो वर्ग लोगों के ऐसे समूहों को कहा जाता है, जो अपनी जीविका केवल एक ही ढंग से कमाते हैं, वर्ग का जन्म उत्पादन के तौर-तरीकों पर आधारित होता है। जैसे किसी उत्पादन व्यवस्था में परिवर्तन आता है, तो पुराने वर्गों के स्थान पर नये स्थान ले लेते हैं।

वर्ग संघर्ष (Class Struggle)-

इस तरह कार्ल मार्क्स ने प्रत्येक समाज में दो-दो वर्गों की विवेचना की है। मार्क्स की वर्ग की धारणाओं को प्रत्येक समाज में ध्यान से समझने के पश्चात् हम अब इस स्थिति में है कि उसकी वर्ग संघर्ष की धारणा को समझें। मार्क्स ने बताया कि समाज के प्रत्येक वर्ग में दो प्रकार के परस्पर विरोधी वर्ग रहे हैं। एक शोषण करने वाला व दूसरा जो शोषण को सहन करता है। इनमें आपस में संघर्ष होता है। इसे मार्क्स ने ‘वर्ग संघर्ष’ का नाम दिया है। कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र में वह कहते हैं कि समाज के अस्तित्व के साथ-साथ ही वर्ग संघर्ष का भी जन्म हो जाता है। मार्क्स का यह वर्ग संघर्ष का सिद्धान्त उसके विचारों से और संसार में भी बहुत महत्त्वपूर्ण है।

उनके प्रभाव के कारण ही ‘स्माल थास्टरीन बैवलीन’ और ‘कूले’ इत्यादि ने भी वर्ग संघर्ष को अपने चिन्तन का एक अंग रूप माना है।
मार्क्स के अनुसार, “उत्पादन की प्रक्रियाओं में अलग-अलग वर्गों की अलग-अलग भूमिकाएं होती हैं। अब वर्गों की आवश्यकताओं और हितों पर संघर्ष की स्थिति पैदा होना आवश्यक है। वही संघर्ष विरोधी विचारधारा में एक ‘आधार’ (Base) पैदा करता है। विकासशील उत्पादित शक्तियों और प्रकृतिवादी स्थिर सम्पत्ति के सम्बन्धों में टकराव पैदा होता है। इससे संघर्ष की गति भी तेजी से बढ़ती है। इतिहास की गति वर्गों की भूमिका के द्वारा ही निर्धारित होती है और सामाजिक एवं आर्थिक वर्ग उन सभी समाजों में पाए जाते हैं जहां श्रम विभाजन का आम सिद्धान्त लागू होता है।

मार्क्स के अनुसार वर्ग संघर्ष एक ऐसी उत्पादित व्यवस्था से जन्म लेता है, जो समाज को भिन्न-भिन्न वर्गों में बांट देती है। इसमें एक वर्ग तो काफ़ी कठोर परिश्रम करके उत्पादन करता है, जैसे दास, अर्द्धदास, किसान और मज़दूर इत्यादि और दूसरा वर्ग ऐसा है जो उत्पादन के लिये कोई परिश्रम किये बिना, बिना कोई काम किये उत्पादन के बड़े-बड़े भाग का उपयोग करता है, जैसे दासों के स्वामी, जागीरदार, ज़मींदार और पूंजीपति इत्यादि। मार्क्स के अनुसार, “इस वर्ग संघर्ष को मनुष्य के उत्पादन की पहली और ऊंची अवस्था तक पहुंचने में मदद करता है। वह मानते हैं कि कोई भी क्रान्ति जब सफल होती है तो उनके साथ नयी आर्थिक सामाजिक व्यवस्था का जन्म होता है।”

इस आधार पर ही मार्क्स ने अब तक के मानवीय इतिहास को चार युगों में विभाजित किया है-

1. पहला युग-इतिहास का पहला युग आदिम साम्यवादी समाज था। इस युग में उत्पादन के साधन अविकसित थे। उत्पादन के साधनों को आवश्यक वस्तुओं को उत्पन्न करने के लिए प्रयोग किया जाता था तथा संयुक्त परिश्रम के साथ इन्हें प्रयोग किया जाता था। इस प्रकार उत्पादन पर सभी का समान अधिकार होता था। आर्थिक शोषण तथा वर्ग भेद नाम की कोई चीज़ मौजूद नहीं थी।

2. दूसरा युग-दूसरा युग दास मूलक समाज का था। कृषि, पशुपालन तथा धातु के औज़ारों के विकसित होने से उत्पादन व्यवस्था के सम्बन्ध बदल गए तथा दास प्रथा शुरू हो गयी। विकसित उत्पादन के साधनों के कारण व्यक्तिगत संपत्ति का संकल्प सामने आया। इस समय दास स्वामी तथा दासों के अलग-अलग वर्ग बन गए तथा वर्ग संघर्ष शुरू हो गया। मार्क्स का कहना था कि इस समाज से ही वर्ग संघर्ष की शुरुआत हुई क्योंकि मालिकों ने अपने दासों का शोषण करना शुरू कर दिया था।

3. तीसरा युग-सामन्ती समाज तीसरा युग था। इस युग में उत्पादन के साधनों पर कुछ सामन्तों तथा भूपतियों का अधिकार हो गया। इस युग में निजी सम्पत्ति की धारणा और सुद्रढ़ हो गई। कई विकासशील तथा अर्द्ध विकसित देशों में इस युग के अवशेष देखने को मिल जाएंगे। इस युग में सामन्तों तथा किसानों के दो वर्ग बन गए तथा वर्ग संघर्ष और तेज़ हो गया।

4. चौथा युग-चौथा युग पूँजीपति समाज था। 15वीं शताब्दी के अंत में विज्ञान का विकास होना शुरू हुआ। इससे उत्पादन व्यवस्था के सम्बन्धों तथा उत्पादन के नए साधनों में विरोध उत्पन्न हो गए। मशीनों का आविष्कार हुआ। बड़े-बड़े उद्योग स्थापित हुए जिससे पूँजीवादी युग शुरू हो गया तथा यह आज भी चल रहा है। इस व्यवस्था में एक तरफ तो उद्योगों के मालिक थे तथा दूसरी तरफ उन उद्योगों में कार्य करने वाले श्रमिक थे। इस प्रकार दो वर्ग पूँजीपति तथा श्रमिक बन गए। इस युग में विज्ञान की प्रगति से, शिक्षा के बढ़ने, बड़े उद्योगों में श्रमिकों के इकट्ठे रहने के कारण आसानी से संगठित होने से वर्ग चेतना का काफ़ी विकास हो गया है। आज का शोषित वर्ग अब शोषण तथा वर्ग विरोधों को और सहन करने को तैयार नहीं हैं। अब वर्ग संघर्ष अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया है। मार्क्स का कहना है कि पूँजीवादी युग का खात्मा आवश्यक है। शोषण पर आधारित यह अन्तिम व्यवस्था होगी। आज पूँजीवाद का खात्मा शुरू हो गया है। मनुष्यों का समाज तेज़ी से समाजवाद की तरफ बढ़ रहा है। रूस तथा चीन की समाजवादी सरकारों की स्थापना इसका प्रमाण है।

मार्क्स के अनुसार, “निजी सम्पत्ति ही शोषण की जड़ है। इसी के कारण ही मूल रूप से आर्थिक उत्पादन के क्षेत्र में समाज में दो मुख्य वर्ग हैं। इनमें एक वर्ग के हाथ में आर्थिक उत्पादन के सभी साधन केन्द्रित हो जाते हैं जिसके आधार पर यह वर्ग शोषित और कमजोर वर्ग का शोषण करता है।” इन वर्गों में आपस में समाज की हर युग (केवल आदिमयुग छोड़कर) में आपस में वर्ग संघर्ष चलता आया है। मार्क्स की मान्यता के अनुसार, सभी उत्पादन साधनों पर अधिकार करके शोषक वर्ग बल के साथ अपने सैद्धान्तिक विचारों एवं जीवन प्रणाली को सारे समाज पर थोपता है। मार्क्स के अनुसार, “वह वर्ग जो समाज की शोषक भौतिक शक्ति होता है, साथ ही समाज की शासक भौतिक शक्ति भी होता है। वह वर्ग जिसके पास भौतिक उत्पादन के साधन मौजूद होते हैं वह सामाजिक उत्पादन के साधनों पर भी नियन्त्रण रखता है। इस प्रकार के नियन्त्रण के लिए शोषक वर्ग बल प्रयोग भी करता है। उसके द्वारा समाज के ऊपर थोपे गये धर्म, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र और नैतिकता के विचार उसके इस प्रभाव को मज़बूत करने के लिये शोषण वर्ग के दास बन जाते हैं। शोषण की इस स्थिति को बरकरार रखने के लिए नये उभरते हुए शोषित वर्ग को बलपूर्वक दबाना आवश्यक हो जाता है। इसलिये मार्क्स ने कहा है बल नये समाज को अपने गर्भ में धारण करने वाले प्रत्येक पुराने समाज की ‘दाई’ (Midwife) है।

समाज का विकास अलग-अलग अवस्थाओं की देन हैं। किसी भी सामाजिक व्यवस्था अथवा ऐतिहासिक युग का मूल्यांकन हालातों, देश तथा काल के ऊपर निर्भर करता है। कोई भी सामाजिक व्यवस्था स्थायी नहीं है। सभी प्रक्रियाएँ द्वन्दात्मक होती है। उत्पादन की नई तथा पुरानी प्रक्रिया में जो अन्दरूनी संघर्ष होता है वह ही इसकी प्रेरक शक्ति होती है। पुरानी के स्थान पर नई पद्धति को अपनाना आवश्यक होता है। धीरे-धीरे होने वाले परिमाणात्मक परिवर्तन तेज़ी से अचानक होने वाले गुणात्मक परिवर्तन में बदल जाते है। इसलिए विकास के नियम के अनुसार क्रान्तिकारी परिवर्तन आवश्यक तथा स्वाभाविक होते हैं।

यह परिवर्तन बल (Force) पर आधारित होते हैं। विकास के रास्ते में उभरने वाली असंगतियों के आधार पर विरोधी शक्तियों में टकराव होता है। अंत में वर्ग संघर्ष तेज़ होता है जिसमें शोषित वर्ग अर्थात् मज़दूर वर्ग का अन्तिम रूप में जीतना आवश्यक है। मार्क्स के अनुसार इन विरोधों के कारण पूंजीवाद स्वयं विनाश की तरफ बढ़ता है।

पूँजीवादी व्यवस्था में दिन प्रतिदिन निर्धनता, बेरोज़गारी, भूखमरी बढ़ जाएगी। सहन करने की एक सीमा के पश्चात श्रमिक वर्ग क्रान्ति शुरू कर देगा। मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद शोषण पर आधारित अन्तिम व्यवस्था होगी। अपने स्वार्थों के साथ घिरे पूंजीवाद संसदीय नियमों के साथ अपने एकाधिकार का कभी भी त्याग नहीं करेंगे। जैसे कि महात्मा गांधी ने अपने ट्रस्टीशिप सिद्धान्त की व्याख्या में कहा था। शांतिपूर्ण तरीके से शोषण को खत्म नहीं किया जा सकता था। इसके लिये क्रान्ति ज़रूरी है। समाज का एक बहुत बड़ा भाग (सर्वहारा) मजबूर हो जायेगा और यही क्रान्तिकारी हरियाली को दर्शायेगा।”

सर्वहारा (मज़दूर) वर्ग की लीडरशिप में वर्ग संघर्ष के द्वारा राज्य के यन्त्र पर अधिकार हो जाने के बाद समाजवाद के युग का आरम्भ होगा। मार्क्स के अनुसार राज्य शोषक वर्ग के हाथ में होने के कारण दमन की नीति एक बहुत बड़ा हथियार होता है। क्रान्ति के बाद भी सामन्तवाद और पूंजीवाद के दलाल प्रति क्रान्ति की कोशिश करते हैं। इसलिए पूंजीवाद के समाजवाद के बीच जाने के समय मज़दूर की सत्ता की अस्थाई अवस्था होगी। समाजवाद की स्थापना के बाद शोषण का अन्त हो जायेगा। इससे वर्ग समाप्त हो जाएंगे। इससे प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मेहनत का पूर्ण भाग मिल सकेगा। समाजवाद की अधिक उन्नतावस्था में प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आवश्यकता अनुसार मिलेगा। धीरे-धीरे राज्य जो शोषक वर्ग का हथियार रहा है, टूट जायेगा और इसके स्थान पर आपसी सहयोग और सहकारिता के आधार पर बनी संस्थाएं ले लेंगी। वर्गों और वर्ग संघर्ष का अन्त हो जायेगा।

सर्वहारा (मज़दूर) और पूंजीपति के बीच चले वर्ग संघर्ष का अन्त पूंजीवाद के अन्त के साथ ही होगा। उत्पादन के साधनों पर समाज का अधिकार हो जाने के साथ उत्पादन पर लगे प्रतिबन्ध हट जायेंगे। उत्पादन की शक्तियां और समय की बर्बादी भी खत्म हो जायेगी। वर्ग संघर्ष के द्वारा वर्गों का अन्त आज केवल एक दुःस्वप्न मात्र बन कर नहीं रह गया। संसार बड़ी तेज़ी से वर्गहीन समाजवादी समाज की स्थापना की तरफ बढ़ रहा है। ‘ऐंजलस’ ने काफ़ी समय पहले ही कहा था “आज इतिहास में पहली बार यह सम्भावना पैदा हो गई है कि सामाजिक उत्पादन के द्वारा समाज के प्रत्येक सदस्य को ऐसा जीवन मिल सके जो भौतिक दृष्टि से अच्छा हो जाये और दिन प्रतिदिन अधिक सुख सम्पन्न हो जाये, ऐसा नहीं एक ऐसे जीवन का निर्माण हो जिसमें व्यक्ति की शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों का उन्मुख विकास संभावित हो। इस बात की सम्भावना पहली बार बनी है परन्तु बनी ज़रूर है।

श्रमिकों की क्रांति के द्वारा इन विरोधों तथा अन्य विरोधों का हल होगा। श्रमिकों की मुक्ति के इस कार्य को पूर्ण करना आधुनिक श्रमिक वर्ग का ऐतिहासिक फर्ज हैं। इसके बाद मनुष्य स्वयं श्रमिक के रूप में अपने इतिहास का निर्माण करेगा।

मार्क्स की एक दृढ़ विचारधारा है इस अन्तिम वर्ग संघर्ष के बाद होने वाले नये सामाजिक आर्थिक ढांचे में वर्ग संरचना में काफ़ी परिवर्तन की स्थिति होती है। जिन देशों में समाजवाद की विजय होती है वहां पर शोषक वर्ग समाप्त हो जाता है। वहां केवल मेहनतकश वर्ग ही रह जाता है। तब समाज का शासन शोषक वर्ग नहीं चलाता। जैसा कि पिछले सभी सामाजिक वर्गों में हुआ करता था, जिसमें भिन्न-भिन्न वर्ग होते थे बल्कि इसे मज़दूर वर्ग चलाता है। ये वर्ग समाज का नेतृत्व स्वतः अपने हाथों में ले लेता है और नये उत्पादन सम्बन्ध पैदा करता है। मजदूर वर्ग सभी मेहनतकश (उद्यमी) लोगों और मेहनतकश किसानों के साथ मिलकर अपना काम चलाते हैं । भिन्न-भिन्न वर्गों में नफरत भरे सम्बन्धों की जगह मित्रता, दोस्ती और आपसी भाईचारा ले लेता है। अन्ततः अमूल परिवर्तन उसको कहा जाता है जबकि समाज का मज़दूर वर्ग एक सहयोग पूर्ण वर्गहीन संरचना की तरफ बढ़ता है। इस तरह मज़दूर वर्ग की नीति का निशाना होता है वर्तमान सामाजिक समूहों के बीच के अन्तर को कम या समाप्त करना और एक वर्गहीन समाज का निर्माण करना।

प्रश्न 3. रूस तथा चीन की साम्यवादी क्रांतियों पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-(i) रूसी क्रान्ति (Russian Revolution)-रूस पर रोमानोव (Romanov) परिवार का राज्य था। प्रथम विश्व युद्ध (1914) के शुरू होने के समय ज़ार निकोलस II का रूस पर राज्य था। मास्को के इर्द-गिर्द के क्षेत्र के अतिरिक्त उस समय के रूसी साम्राज्य में आज के मौजूदा देश फिनलैंड, लाटवीया, लिथुआनिया, ऐसटोनिया, पोलैंड का हिस्सा, यूक्रेन तथा बैलारूस भी शामिल थे। जार्जिया, आर्मीनिया तथा अज़रबाईजान भी इसका हिस्सा थे।

1914 से पहले रूस में राजनीतिक दलों की मनाही थी। 1898 में समाजवादियों ने रूसी लोकतान्त्रिक वर्कज़ पार्टी शुरू की तथा वह कार्ल मार्क्स के विचारों का समर्थन करते थे। परन्तु सरकारी नीतियों के अनुसार, इसे गैरकानूनी ढंग से कार्य शुरू करना पड़ा। इसने अपना अखबार शुरू किया, मज़दूरों को इकट्ठा करना शुरू किया तथा हड़तालें करनी शुरू की।

रूस में तानाशाही शासक था। अन्य यूरोपियन देशों के विपरीत, ज़ार वहाँ की संसद् के प्रति जबावदेह नहीं था। उदारवादियों ने एक आन्दोलन चलाया ताकि इस गलत प्रथा को खत्म किया जा सके। उदारवादियों ने समाजवादी लोकतन्त्रीय तथा सामाजिक क्रान्तिकारियों के साथ मिलकर किसानों तथा मजदूरों को इकट्ठा किया। 1905 की क्रान्ति के दौरान संविधान की मांग की गई। उनके प्रयासों से प्रभावित होकर रूस के वर्कर चेतन हो गए तथा उन्होंने कार्य के घण्टे कम करने तथा तनख्वाह बढ़ाने की मांग की। जब वह क्रान्ति की तैयारी कर रहे थे, पुलिस ने उन पर हमला कर दिया। 100 से अधिक वर्कर मारे गए तथा 300 से अधिक जख्मी हो गए। क्योंकि यह घटना इतवार को हुई थी, इसलिए इसे Bloody Sunday के नाम से जाना जाता है।

1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ तथा ज़ार ने रूस को लड़ाई में धकेल दिया। रूस की स्थिति, जोकि पहले ही खराब चल रही थी, और भी खराब हो गई। रूस लड़ाई में बुरी तरह उलझ गया था। एक तरफ ज़ार संसद् (डुमा) को भंग करने का प्रयास कर रहा था तथा दूसरी तरफ संसद् के सदस्य इस स्थिति से बचने का प्रयास कर रहे थे। इस स्थिति में पेट्रोग्राड में 22 फरवरी, 1917 को एक फैक्ट्री बंद हो गई तथा सभी वर्कर बेरोज़गार हो गए। हमदर्दी के कारण वहां की 50 फैक्ट्रियों के वर्करों ने भी हड़ताल कर दी। इस समय तक कोई भी राजनीतिक दल इस आन्दोलन की अगुवाही नहीं कर रहा था। सरकारी इमारतों को वर्करों ने घेर लिया तथा सरकार ने कयूं लगा दिया। शाम तक वर्कर भाग गए परन्तु 24 व 25 तारीख तक वह फिर इकट्ठे हो गए। सरकार ने सेना को बुला लिया तथा पुलिस को उनकी निगरानी के लिए कहा गया।

25 फरवरी इतवार को सरकार ने संसद् (डुमा) को भंग कर दिया। नेताओं ने इसके विरुद्ध बोलना शुरू कर दिया। प्रदर्शनकारी पूरी शक्ति से 26 तारीख को सड़कों पर वापिस आ गए। 27 तारीख को पुलिस का हैडक्वाटर तबाह कर दिया गया। सड़कों पर लोग बाहर आ गए तथा उन्होंने ब्रैड, तनख्वाह, कार्य में कम घण्टे तथा लोकतन्त्र के नारे लगाने शुरू कर दिए। सरकार ने सेना को वापिस बुला लिया परन्तु सेना ने लोगों पर गोली चलाने से मना कर दिया। जिस अफसर ने गोली चलाने का आदेश दिया था, उसे भी मार दिया गया। सेना के लोग भी आम जनता से मिल गए तथा सोवियत को बनाने के लिए उस इमारत में एकत्र हो गए जहाँ डुमा पिछली बार एकत्र हुई थी।

अगले दिन वर्करों का प्रतिनिधिमण्डल ज़ार को मिलने के लिए गया। सेना के बड़े अधिकारियों ने ज़ार को प्रदर्शनकारियों की बात मानने की सलाह दी। अंत 2 मार्च को ज़ार ने उनकी बात मान ली तथा ज़ार का शासन खत्म हो गया। अक्तूबर में लेनिन (Lenin) ने रूस का शासन संभाल लिया तथा रूसी क्रान्ति पूर्ण हो गई।

(ii) चीनी क्रान्ति (Chinese Revolution)-1 अक्तूबर, 1949 को चीनी कम्यूनिस्ट नेता माओ-त्से-तुंग ने People’s Republic of China को बनाने की घोषणा की। इस घोषणा से चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी तथा राष्ट्रवादी पार्टी के बीच चल रही लड़ाई खत्म हो गई जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद शुरू हुई थी। PRC के बनने के साथ ही चीन में लंबे समय से (1911 की चीनी क्रान्ति) चला आ रहा सरकारी उथल-पुथल का कार्य भी खत्म हो गया। राष्ट्रवादी पार्टी के हारने से अमेरिका ने चीन से सभी राजनीतिक संबंध खत्म कर दिए।

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना 1921 में शंघाई में हुई थी। चीनी कम्यूनिस्टों ने 1926-27 के उत्तरी हमले के समय राष्ट्रवादी पार्टी का समर्थन किया। यह समर्थन 1927 के White Terror तक चला जब राष्ट्रवादियों ने कम्यूनिस्टों को मारना शुरू कर दिया।

1931 में जापान ने मंचुरिया पर कब्जा कर लिया। इस समय Republic of China की सरकार को तीन तरफ से हमले का डर था तथा वह थे जापानी हमला, कम्यूनिस्ट विद्रोह तथा उत्तर वाले लोगों के हमले का डर। चीन की सेना के कुछ उच्चाधिकारी Chiang-Kai-Shek के इस व्यवहार से दुखी हो गए कि वह आन्तरिक खतरों पर अधिक ध्यान दे रहा था न कि जापानी हमले पर। उन्होंने Shek को पकड़ लिया उसे कम्यूनिस्ट सेना से सहयोग करने के लिए कहा। यह राष्ट्रवादी सरकार तथा चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी (CCP) में सहयोग करने की पहली कोशिश थी परन्तु यह कोशिश कम समय के लिए ही थी। राष्ट्रवादियों ने जापान के ऊपर ध्यान करने की बजाए कम्यूनिस्टों को दबाने की तरफ ध्यान दिया जबकि कम्यूनस्टि ग्रामीण क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाने में लगे रहे।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कम्यूनिस्टों के लिए समर्थन काफ़ी बढ़ गया। चीन में अमेरिकी अधिकारियों राष्ट्रवादियों के क्षेत्र में लोगों के समर्थन को दबाने के प्रयास किए। इन अलोकतान्त्रिक नातियों तथा युद्ध के दौरान हो रहे भ्रष्टाचार ने चीन की सरकार को कम्यूनिस्टों के विरुद्ध काफ़ी कमज़ोर कर दिया। कम्यूनिस्ट पार्टी ने ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि सुधार करने शुरू किए जिससे उनका समर्थन बढ़ गया।

1945 में जापान युद्ध हार गया जिससे चीन में गृह युद्ध का खतरा बढ़ गया। Chiang Kai-Shek की सरकार को अमेरिकी समर्थन मिलना जारी रहा क्योंकि कम्यूनिस्टों के बढ़ते खतरे को चीन में केवल वह ही रोक सकता था। 1945 में Chiang-Kai-Shek तथा माओ-त्से-तुंग मिले ताकि लड़ाई के बाद की सरकार के गठन के ऊपर चर्चा की जा सके। दोनों लोकतन्त्र की बहाली, इकट्ठी सेना, चीन के राजनीतिक दलों की स्वतन्त्रता पर हामी भर चुके थे। सन्धि होने वाली थी परन्तु अमेरिका के दखल के कारण वह न हो सकी तथा 1946 में गृह युद्ध शुरू हो गए।

गृह युद्ध में 1947 से 1949 में कम्यूनिस्टों की जीत पक्की लग रही थी क्योंकि उन्हें जनसमर्थन प्राप्त था, उच्च दर्जे की सेना थी तथा मंचुरिया में जापानियों से छीने हुए हथियार भी थे। अक्तूबर 1949 में कई स्थान जीतने के पश्चात् माओ-त्से-तुंग ने People’s Republic of China के गठन की घोषणा की। Chiang-Kai-Shek अपनी सेना के पुनर्गठन के लिए ताईवान भाग गया। इस प्रकार 1949 में चीनी क्रान्ति पूर्ण हो गई।

प्रश्न 4. समाजशास्त्र में दुर्थीम का योगदान बताइये।
उत्तर-प्रसिद्ध समाज शास्त्री और दार्शनिक इमाइल दुर्थीम का जन्म 15 अप्रैल 1858 को उत्तरी-पूर्वी फ्रांस के लॉरेन (Lorraine) क्षेत्र में स्थित एपीनल (Epinal) नामक स्थान में हुआ था। दुर्थीम की आरम्भिक शिक्षा एपीनल की एक संस्था में हुई थी। बचपन से ही दुर्थीम एक मेधावी, प्रतिभाशाली तथा होनहार छात्र के रूप मे जाने जाते थे। दुर्थीम के पूर्वज ‘रेबी शास्त्रकार’ के रूप में प्रसिद्ध हुए थे। इसीलिए प्रतिभा तो दुर्थीम को विरासत से प्राप्त हुई थी। एपीनल में ही ग्रेजुएट तक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए दुर्थीम फ्रांस की राजधानी पैरिस में चले गए।

पैरिस में दुर्थीम की उच्च शिक्षा का आरम्भ हुआ। यहां पर उन्होंने विश्व प्रसिद्ध संस्था इकोल नारमेल अकादमी (Ecol Normale Superieure) में दाखिला लेने की कोशिश की। यहां यह बताना ज़रूरी है कि इस संस्था में बहुत बढ़िया विद्यार्थियों को ही दाखिला मिलता था। दो असफल प्रयासों के बाद 1879 में दुर्थीम को इस संस्था में दाखिला मिल ही गया। यह संस्था फ्रांसीसी, लातिनी और ग्रीक दर्शन विषयों पर शिक्षा प्रदान करती थी और वहां के पूरे पाठ्यक्रम में यही विषय शामिल थे। लेकिन प्रत्यक्षवादी और वैज्ञानिक प्रवृत्ति वाले दुीम इन विषयों में ज्यादा रुचि न ले सकें क्योंकि वो तो समाज की असली, राजनीतिक, बौद्धिक और सामाजिक इत्यादि दिशाओं के अध्ययन में रुचि रखते थे।

दुर्थीम का यह पूर्ण विश्वास था कि ज्ञान में प्रत्यक्षवाद (Positivism) ज़रूर होना चाहिए। उनका मानना था कि अगर किसी भी ज्ञान अथवा दर्शन का अध्ययन करते समय वर्तमान, बौद्धिक और सामाजिक समस्याओं का अध्ययन नहीं किया जाता तो उस ज्ञान का कोई फायदा नहीं हैं। अपने इन विचारों के कारण दुर्थीम इस विश्व प्रसिद्ध संस्था के वातावरण से इतने असंतुष्ट थे कि वह कभी-कभी तो अपने अध्यापकों के विरुद्ध भी हो जाते थे। लेकिन फिर भी दुर्थीम ने इकोल नारमेल को अपने अंदर इतना बसा लिया कि उन्होंने अपने पुत्र आंद्रे को यहां दाखिल करवाया।

प्रसिद्ध प्रत्यक्षवादी और महान् इतिहासकार प्रोफैसर कुलांज (Prof. Fustel de Coulanges) 1880 में इस संस्था के निदेशक बने। वह दुीम के उन अध्यापकों में से एक थे जिनका दुीम से विशेष प्यार था। कुलांज ने वहां के पाठ्यक्रम में बदलाव किया जिससे दुर्थीम बहुत खुश हुए। दुीम कुलांज का इतना आदर करते थे कि लातिनी भाषा में उन्होंने मान्टेस्क्यू (Montesquieu) नामक किताब लिखी जो उन्होने कुलांज को समर्पित किया। वहां ही दुर्थीम इमाइल बोटरोकस (Emile Boutrocus) को भी मिले। यहीं पर ही दुर्थीम और विश्व प्रसिद्ध विद्वानों को मिले और उन प्रतिभावान विद्यार्थियों को मिले जो बाद में प्रमुख समाजशास्त्री बने। इन प्रसिद्ध विद्वानों के सम्पर्क में आने से दुर्थीम के बौद्धिक और मानसिक चिंतन में काफ़ी बढ़ोत्तरी हुई।

1882 में वह इकोल नार्मेल को छोड़ कर 5 वर्षों तक पैरिस के पास स्थित हाई स्कूलों सेनस, सेंट क्युटिंन और ट्राईज़ में दर्शन शास्त्र पढ़ाते रहे। साथ ही साथ अपने प्रभाव से इन स्कूलों में समाजशास्त्र का नया पाठ्यक्रम भी शुरू किया। दुर्थीम बहुत बढ़िया अध्यापक के रूप में प्रसिद्ध हुए। इसके बाद भी दुर्थीम का मन यहां न लगा। 1885-86 में वह उच्च अध्ययन के लिए नौकरी से एक वर्ष की छुट्टी लेकर वर्ष के अंत में जर्मनी चले गए।

जर्मनी में दुर्शीम ने अर्थशास्त्र, लोक मनोविज्ञान, सांस्कृतिक मनोविज्ञान इत्यादि का काफ़ी गहराई से अध्ययन किया । यहाँ दुीम ने काम्ते (Comte) के लेखों का बारीकी से अध्ययन किया और शायद उससे प्रभावित होकर समाजशास्त्रीय प्रत्यक्षवाद (Sociological Positivism) को जन्म दिया।

1887 में दुर्थीम जर्मनी आ गए और बोर्डिक्स विश्वविद्यालय में प्रवेश रूप से सामाजिक शास्त्र का एक नया अलग विभाग स्थापित किया और आप को यहां अध्ययन के लिए बुलाया गया। लगभग 9 वर्षा के निरन्तर अध्ययन के पश्चात् वह 1896 में इसी विभाग के प्रोफेसर बन गए। इस दौरान पैरिस विश्वविद्यालय द्वारा दुर्थीम को 1893 में उनके फ्रांसीसी भाषा में लिखे शोध ग्रंथ Dela Divsion du Travail Social (Division of Labour in Society) पर उनको बहुत डाक्टरेट की उपाधी दी। उनके इस ग्रंथ के छपने के बाद उनको बहुत प्रसिद्धि मिली। 1895 में दुर्शीम ने अपने दूसरे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ Les Regles de ea Methode Sociologique (The rules of Sociological Method) की रचना की। इसकी दो वर्षों के बाद 1897 में दुर्थीम ने तीसरे महान् ग्रंथ Le Suicide : Etude de Sociologie (Suicide A Study of Sociology) की रचना की। इन महान् ग्रंथों की रचना के बाद दुखीम का नाम विश्व के प्रमुख दार्शनिक समाज शास्त्री और महान् लेखक के रूप में जाना जाने लगा।

वर्ष 1898 में दुर्शीम ने ‘L’ Annee Sociologique नाम से समाजशास्त्र सम्बन्धी मैगज़ीन की शुरुआत की और 1910 तक आप इस मैगजीन के सम्पादक रहे। दुर्थीम के इस मैगजीन ने फ्रांस के बौद्धिक वातावरण को बहुत नाम कमाया। इसमें बहुत सारे उच्च कोटि के विचार को जार्जस, डेवी, लेवी स्टार्स, साईमन इत्यादि ने अपने पत्र छपवाए।

इस विश्वविद्यालय में दुर्थीम ने बहुत प्रसिद्धि प्राप्त की और उसके बाद 1902 में पैरिस विश्वविद्यालय में दुर्थीम को शिक्षा शास्त्र के प्रोफैसर पद पर नियुक्त किया गया। यहां एक महत्त्वपूर्ण बात थी कि उस समय तक विश्व में समाज शास्त्र का कोई अलग विभाग नहीं होता था। यह दुर्थीम की कोशिशों का ही नतीजा था कि 1913 में शिक्षा शास्त्र विभाग का नाम बदल कर शिक्षा शास्त्र और समाजशास्त्र रख दिया गया। यहां दुर्थीम ने और विषयों के साथ-साथ विकास और परिवार की शुरुआत, नैतिक शिक्षा, धर्म की उत्पत्ति, काम्ते और सेंट साईमन के सामाजिक दर्शन को बहुत लगन के साथ पढ़ाया। जिन विद्यार्थियों ने दुीम से शिक्षा प्राप्त की वह उनसे बहुत प्रभावित हुए। दुर्शीम ने एक और पुस्तक Les Farmes Elementains delavie Religieuse (Elementary forms of Religious Life) की रचना की।

र्बोडिक्स विश्वविद्यालय में नियुक्त होने के पश्चात् ही उन्होंने विवाह करवा लिए। उनकी पत्नी का नाम लुईस डरेफू (Louise Drefus) था और उनके दो बच्चे थे। उनकी लड़की का नाम मैंरी (Marie) और लड़के का नाम आंद्रे (Andre) था। दुर्शीम की पत्नी सम्पादन के काम से लेकर चैक करना, उसको संशोधित करना, पत्र व्यवहार करने जैसे सभी कार्य को बहुत मेहनत से करके दुर्थीम की सहायता करती थी।

दुर्शीम ने 1914 के पहले विश्व युद्ध में अपने पुत्र आंद्रे को समाज सेवा के लिए पेश किया और स्वयं अपने लेखों और भाषणों से जनता का मनोबल बना रखने के लिए जुट गए। युद्ध ने दुर्शीम जी को मानसिक तौर से काफ़ी कमज़ोर कर दिया क्योंकि वह शांति के समर्थक थे। जब दुर्थीम युद्ध में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे तो उनको अपने पुत्र की मौत का समाचार मिला जिसकी मृत्यु लड़ाई के बुरी तरह जख्मी होने के कारण बुलगारीया के अस्पताल में हुई थी। आंद्रे उनका केवल पुत्र ही नहीं बल्कि सबसे अच्छा विद्यार्थी भी था इसी कारण उसकी मृत्यु ने दुर्थीम को अन्दर से तोड़ दिया।

दुर्थीम 1916 के अंत में एकदम बीमार हो गए लेकिन इसके पश्चात् भी वह 1917 में नीतिशास्त्र पर किताब लिखने के लिए फाऊंट नबलियु स्थान पर गए। 15 नवंबर, 1917 को असाधारण प्रतिभा वाले इस समाजशास्त्री की 59 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई।

दुर्शीम की रचनाएं (Writings of Durkheim) –
दुर्शीम ने अपने जीवनकाल के समय कई महान् ग्रंथों की रचना की जिनके नाम निम्नलिखित हैं-

1. The Division of Labour in Society – 1893
2. The Rules of Sociological Method – 1895
3. Suicide – 1897
4. Elementary Forms of Religious Life – 1912
5. Education and Sociology (After Death) – 1922
6. Sociology and Philosophy (After Death) – 1924
7. Moral Education (After Death) – 1925
8. Sociology and Saint Simon(After Death) – 1924
9. Pragmatism and Sociology (After Death) – 1925

प्रश्न 5. वैबर द्वारा प्रस्तुत सामाजिक क्रिया के प्रकारों की चर्चा कीजिए।
उत्तर-सामाजिक व्यवहार की पूरी व्याख्या करते हुए वैबर ने चार प्रकार के सामाजिक कार्यों की व्याख्या की है।

1. तार्किक उद्देश्यपूर्ण व्यवहार (Zweckrational)-वैबर ने बताया है कि तार्किक उद्देश्यपूर्ण सामाजिक व्यवहार का अर्थ ऐसे सामाजिक व्यवहार से होता है जो उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए अनेक उद्देश्यों की अधिक-से-अधिक प्राप्ति के लिए तार्किक रूप में निर्देशित हो, इसमें साधनों के चुनाव में केवल उनके विशेष प्रकार की कार्यकुशलता की तरफ ध्यान ही नहीं दिया जाता बल्कि भूल पर भी ध्यान दिया जाता है। साध्य और साधनों की अच्छी तरह जांच की जाती है और उसके आधार पर ही क्रिया सम्पादित होती है।

2. मूल्यात्मक व्यवहार (Wertrational)-मूल्यात्मक व्यवहार में किसी विशेष और स्पष्ट मूल को बहुत अधिक प्रभावशाली उपलब्ध साधनों के द्वारा स्थान दिया जाता है। दूसरे मूल्यों की कीमतों पर कुछ ध्यान नहीं दिया जाता है। इसमें तार्किक आधार नहीं हो सकता, बल्कि नैतिकता, धार्मिक या सुन्दरता के आधार पर ही मान ली गई है। नैतिक और धार्मिक मान्यताओं को बनाये रखने के लिए मूल्यात्मक क्रियाएं की जाती हैं। इन क्रियाओं को मानने में किसी भी प्रकार के तर्क की सहायता नहीं ली जाती है। वह इसी तरह ही मान ली जाती है क्योंकि इसके कारण सामाजिक सम्मान भी बढ़ता है और आत्मिक सन्तोष भी बढ़ता है।

3. संवेदात्मक व्यवहार (Assectual Behaviour)-ऐसी क्रियाएं मानवीय भावनाओं, संवेगों और स्थायी भावों के कारण होती हैं। समाज में रहते हुए हमें प्रेम, नफरत, गुस्सा इत्यादि भावनाओं का शिकार होना पड़ता है। इसके कारण ही समाज में शान्ति या अशान्ति की अवस्था पैदा हो जाती है। इन व्यवहारों के कारण परम्परा और तर्क का थोड़ा सा भी सहारा नहीं लिया जाता है।

4. परम्परागत व्यवहार (Traditional Behaviour)-परम्परागत क्रियाएं पहले से निश्चित प्रतिमानों के आधार पर की जाती हैं । सामाजिक जीवन को सरल और शांतमय रखने के लिए परम्परागत क्रियाएं महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं। सम्भव है कभी वह स्थिति पैदा हो जाये, कि इन क्रियाओं द्वारा समाज में संघर्ष पैदा हो जाये कि इन क्रियाओं द्वारा तर्क, कार्यकुशलता और किसी और प्रकार का सहारा लेने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। सामाजिक प्रथाएं ही इन क्रियाओं को संचालित करती हैं ।।

वैबर ने बताया है कि सामाजिक क्रियाएं तीन प्रकार से निर्देशित होती हैं ।

प्रश्न 6. वैबर किस प्रकार धर्म को आर्थिक क्रियाओं से जोड़ते हैं ?
उत्तर-पूंजीवाद का सार (Essence of Capitalism)-वैबर का आरम्भिक अध्ययन एक ऐसी प्रवृत्ति पर केन्द्रित है जो आधुनिक समाज में विशेष रूप में दिखाई देती है। आर्थिक व्यवहारों पर धार्मिक प्रभावों को स्पष्ट करने के लिए 1904 से 1905 में जो लेख लिखे हैं उनके आधार पर उसकी सबसे प्रसिद्ध किताब The Protestant Ethic and the Spirit of Capitalism के नाम से छपी। इस किताब के अधिकतर भाग में वैबर ने इस समस्या पर प्रकाश डाला है कि प्रोटैस्टैंट धर्म के विचारों या नीतियों ने किस प्रकार पूंजीवाद के विकास को प्रभावित किया है। यह विचार मार्क्स के इस सिद्धान्त के लिए एक खुली चुनौती थी कि मानव की सामाजिक व धार्मिक चेतना उसके सामाजिक वर्ग द्वारा निर्धारित होती है।

वैबर के विचारों से आधुनिक औद्योगिक जगत् के मानव की एकता स्पष्ट है कि उसको सख्त मेहनत करनी चाहिए। वैबर के अनुसार, “कठोर काम एक कर्तव्य है व इसका नतीजा इसी के बीच शामिल है।” यह विचार वैबर के दृष्टिकोण से आधुनिक औद्योगिक जगत् के मानव का विशेष गुण है। मानव अपने काम में अच्छी तरह काम इसलिए नहीं करना चाहता क्योंकि उसको काम करना पड़ेगा बल्कि इसलिए कि वह ऐसा करना चाहता है। वैबर के अनुसार यह उसकी व्यक्तिक संतुष्टि का आधार है। वैबर ने स्वयं लिखा है कि एक व्यक्ति से अपनी आजीविका के मूल्य के प्रति होने वाले कर्त्तव्य का अनुभव करने की आशा की जाती है व वह ऐसा करता भी है चाहे वह किसी भी क्षेत्र में क्यों न हो। अमरीका की एक कहावत है कि, “यदि कोई व्यक्ति काम करने के योग्य है तो उसे सबसे बढ़िया ढंग से पूरा करना चाहिए।” यह कहावत वैबर के अनुसार पूंजीवाद का सार भी है क्योंकि इस धारणा का सम्बन्ध किसी आलौकिक उद्देश्य से नहीं बल्कि आर्थिक जीवन में व्यक्ति को प्राप्त होने वाली सफलता से है। चाहे किसी विशेष समय में यह धारणा धार्मिक नैतिकता से सम्बन्धित रही है। पूंजीवाद के सार को स्पष्ट करने के लिए वैबर ने उसकी तुलना एक अन्य आर्थिक क्रिया से की है जिसका नाम उन्होंने परम्परावाद रखा है। आर्थिक क्रियाओं में परम्परावाद वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति अधिक लाभ के बाद भी कम-से-कम काम करना चाहता है।

वह काम के दौरान अधिक-से-अधिक आराम करना पसन्द करता है व काम के नये तरीके से अनुकूलन करने की इच्छा नहीं करते हैं। वह जीवन जीने के लिए साधारण तरीकों से ही खुश हो जाते हैं व एकदम लाभ प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। सिद्धान्तहीन रूप से धन का इकट्ठा करना आर्थिक परम्परावाद का ही एक हिस्सा है तथा ये सारी विशेषताएं पूंजीवाद के सार से पूरी तरह उलट हैं । असल में आधुनिक पूंजीवाद अन्तर्सम्बन्धित संस्थाओं का एक ऐसा बड़ा एकत्र (Complex) है, जिसका आधार आर्थिक कोशिशें हैं न कि स्टोरियों की कोशिशें। पूंजीवाद के अन्तर्गत व्यापारी निगमों का कानूनी रूप, संगठित लेन-देन का केन्द्र, सरकारी कर्जा पत्रों के रूप में सार्वजनिक कर्जा देने की प्रणाली व ऐसे उद्योगों के संगठनों का समूह है जिनका उद्देश्य वस्तुओं के तार्किक आधार पर उत्पादन करना होता है न कि उनका व्यापार करना। वैबर का विचार था कि दक्षिणी यूरोप, रोम अभिजात वर्ग व ओलबी नदी के पूर्व के ज़मींदारों की आर्थिक क्रियाएं अचानक लाभ प्राप्त करने के लिए की गईं जिनमें उन्होंने सारे नैतिक विचारों का त्याग कर दिया। उनकी क्रियाओं में आर्थिक लाभ की तार्किक कोशिशों की कमी थी जिस कारण उन्हें पूंजीवाद के बराबर नहीं रखा जा सकता।

वैबर के अनुसार पूंजीवाद के सार का गुण केवल पश्चिमी समाज का ही गुण नहीं है। अनेकों समाजों में ऐसे व्यक्ति हुए हैं जिन्होंने अपने व्यापार को बढ़िया ढंग से चलाया, जो नौकरों से भी अधिक मेहनत करते हैं, जिनका जीवन सादा था व जो अपनी बचत को भी व्यापार में ही लगा देते थे पर इसके बाद भी इन पंजीवादी विशेषताओं का प्रभाव पश्चिमी समाजों में कहीं ज्यादा मिलता रहा है, इसका कारण यह था कि पश्चिम में यह गुण एक व्यक्तिगत गुण न रहकर जीवन जीने के आम तरीके के रूप में विकसित हुआ। इस तरह लोगों में फैली कठोर मेहनत, व्यापारिक व्यवहार, सार्वजनिक कर्जा व्यवस्था, पूंजी का लगातार व्यापार में लगाते रहना व मेहनत के प्रति इच्छा ही पूंजीवाद का सार है। इसके विपरीत एकदम लाभ पाने की कोशिश, मेहनत को बोझ व श्राप समझकर उसको न करना, धन को इकट्ठा करना व जीवन जीने के साधारण स्तर से ही सन्तुष्ट हो जाना आम आर्थिक आदतें हैं।

प्रोटैस्टैंट नीति (Protestant Ethic) यह स्पष्ट करने के बाद कि उनके अध्ययन का उद्देश्य पूंजीवाद का सार है वैबर ने ऐसे अनेकों कारण बताए हैं जिनके आधार पर सुधार आन्दोलन के धार्मिक विचारों में इसकी उत्पत्ति को ढूंढना है। वैबर ने अपने एक विद्यार्थी बाडेन (Baden) को राज्य में धार्मिक सम्बन्धों व शिक्षा को चयन का अध्ययन करने के लिए कहा। बाडेन ने एक परिणाम यह पेश किया कि कैथोलिक विद्यार्थियों की तुलना में प्रोटैस्टैंट विद्यार्थी उन शिक्षा संस्थाओं में अधिक दाखिला लेते हैं जो औद्योगिक जीवन से सम्बन्धित हैं। एक और कारण यह भी था कि यूरोप में समय-समय पर कम गणना समूहों ने अपनी सामाजिक व राजनीतिक हानि को कठोर आर्थिक मेहनत से पूरा कर लिया जबकि कैथोलिक ऐसा न कर सके। इन हालातों के प्रभाव से वैबर की इस धारणा को बल मिला कि धार्मिक नीति व आर्थिक क्रियाओं में कोई सम्बन्ध ज़रूर है। इसके बाद वैबर ने यह भी देखा कि 16वीं सदी में बहुत सारे अमीर प्रदेशों व शहरों में प्रोटैस्टैंट धर्म स्वीकार कर लिया क्योंकि प्रोटैस्टैंट धर्म अपनी अनेकों नीतियों के कारण आर्थिक लाभ की कोशिशों को आगे बढ़ा रहा है। इसी आधार पर वैबर ने यह पता करने की कोशिश की कि प्रोटैस्टैंट धर्म का प्रचार आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए देशों में हुआ व अंतः पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के बाद भी किसी क्षेत्र में कैथोलिक धर्म प्रभावशाली बना रहा।

The Protestant Ethic and the Spirit of Capitalism लिखने में वैबर का उद्देश्य बहुत कुछ इस विरोध की व्याख्या के कारण आर्थिक जीवन पर धार्मिक नीतियों के प्रभाव को स्पष्ट करना था। वैबर यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि प्रोटैस्टैंट धर्म की नीतियां किस तरह उन लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गईं जो आर्थिक लाभों को तार्किक दृष्टि से प्राप्त करने के हक में थीं। इस तरह वैबर के अनुसार किसी भी धर्म के साथ सम्बन्धित सिद्धान्तों पर इस नज़र से विचार करना चाहिए कि यह सिद्धान्त अपने शिष्यों को किस तरह के व्यवहारों का प्रोत्साहन देता है। इस प्रश्न को ध्यान में रखते हुए वैबर ने प्रोटैस्टैंट धर्म के शुद्ध विचारवादी पादरियों के लेखों को परखा व उनके द्वारा बनाए कालविनवादी सिद्धान्तों का समुदाय के दैनिक व्यवहार पर प्रभाव स्पष्ट किया।

प्रोटैस्टैंट धर्म के नीति के रूप में सेंट पाल के इस आदेश को व्यापक रूप से ग्रहण किया जाने लगा कि, “जो व्यक्ति काम नहीं करेगा वह रोटी नहीं खाएगा व ग़रीब की तरह अमीर भी भगवान के गौरव को बढ़ाने के लिए किसी न किसी समय पर व्यापार को ज़रूर करे।” इस तरह मेहनती जीवन ही प्रोटैस्टैंट धर्म शुद्ध विचारवादी धार्मिक भक्ति के अनुसार है।

रिचर्ड बैक्सटर (Richard Baxter) ने कहा कि, “केवल धर्म के लिए ही भगवान् हमारी क्रियाओं की रक्षा करता है। मेहनत ही शक्ति का नैतिक व प्राकृतिक उद्देश्य है, केवल मेहनत से ही भगवान् की सबसे ज्यादा सेवा हो सकती है।” एक अन्य सन्त जॉन बयिन ने कहा था कि, “यह नहीं कहा जाएगा कि आप क्यों विश्वास करते थे, केवल ये कहा जाएगा कि आप कुछ मेहनत भी करते थे या केवल बातें ही करते थे।” इस तरह प्रोटैस्टैंट धर्म की नीति में काम करते जीवन को ही खुदा की भक्ति के रूप में मान लिया गया। प्रोटैस्टैंट धर्म में मेहनत की प्रशंसा ने नये नियमों को जन्म दिया। इसके अनुसार समय को व्यर्थ नष्ट करना पाप है। जीवन छोटा व मूल्यवान् है, इसलिए मानव को हर समय भगवान् का गौरव बढ़ाने के लिए अपना समय अपने उपयोगी काम में लगाना चाहिए। व्यर्थ की बातचीत, लोगों को ज्यादा मिलना, ज़रूरत से ज्यादा सोना व दैनिक कार्यों को हानि पहुंचा कर धार्मिक कार्यों में लगे रहना पाप है क्योंकि इनके कारण भगवान् के द्वारा दिए आजीविका काम को भगवान् की इच्छा के अनुसार पूरा नहीं किया जा सकता। इस दृष्टिकोण से प्रोटैस्टैंट धर्म की नीतियां व्यक्तिगत नीति के इस आदर्श के विरुद्ध हैं, “अमीर व्यक्ति कोई काम न करे या यह कि धार्मिक ध्यान सांसारिक कार्यों से ज्यादा मूल्यवान् है। यही प्रोटैस्टैंट नीति है।”

पूंजीवाद व प्रोटैस्टैंट नीति का सम्बन्ध (Relationship of Capitalism and Protestant Ethic)पूंजीवाद के सार व प्रोटैस्टैंट नीतियों के अध्ययन से वैबर को इनके अनेकों आधारों में समानता मिलती है। इन समानताओं ने वैबर को इस तथ्य पर विचार करने से प्रेरणा दी है कि आर्थिक व्यवहारों व धार्मिक नीतियों में समानताएं किन परिस्थितियों के कारण समानताओं का वर्णन परिस्थितियों के परिणाम से है। वैबर ने पहले 16वीं व 17वीं सदी में धर्म संघों व उनकी मान्यताओं में होने वाले परिवर्तनों का मानवीय व्यवहारों पर प्रभावों का अध्ययन किया। शुरू में अनेकों धर्म संघों ने भौतिक चीजों की प्राप्ति व उनके इकट्ठा करने पर जोर दिया व कुछ समय के बाद धन के एकत्र को अधार्मिकता की श्रेणी में रखा जाने लगा जिसमें मेहनत के सामने सारी इच्छाओं को समाप्त कर लेना ठीक था। इस धर्म संघ ने इच्छाओं के दमन करने की निष्पक्षता को खत्म करने के रूप में न लेकर श्रम के रास्ते में आने वाली रुकावट को इच्छा खत्म करने के रूप में स्पष्ट किया। वैबर के अनुसार, “जब इच्छा ख़त्म कर लेने की धारणा धर्म केन्द्रों की सीमा से बाहर निकल कर सांसारिक नैतिकता को प्रभावित करने लगी तो इसने आधुनिक अर्थव्यवस्था (पूंजीवाद) की रचना में ही अपना योगदान शुरू कर दिया।” इस परिवर्तन ने वैबर को अध्ययन की एक दिशा प्रदान की। धर्म की नीतियां ही वे मूल कारण हैं जो व्यक्ति के आर्थिक वे धर्म-निरपेक्ष व्यवहारों को प्रभावित करती हैं।

इस तरह वैबर ने अत्यधिक परिणामों द्वारा यह स्पष्ट किया कि किस तरह प्रोटैस्टैंट धर्म की नीतियां योग के अनेकों देशों में आरम्भिक पूंजीवाद के विकास के लिए ठीक हैं। प्रोटैस्टैंट धर्म के सुधार आन्दोलन के शुरू से ही धार्मिक समारोहों में प्रवेश करने का अधिकार उन लोगों को दिया जिनकी इन धर्म की नीतियों में बहुत ज्यादा श्रद्धा थी। धार्मिक परिषदों के सदस्यों को यह सिद्ध करना पड़ता था कि उनमें अपने धर्म की नीतियों को व्यावहारिक रूप देने की पूरी समर्था है। यह परम्परा वैबर के अनुसार साधनों से सम्बन्ध आजीविका को महत्त्व देकर आधुनिक पूंजीवाद के विकास में बहत ज्यादा सहायक सिद्ध हई। धीरे-धीरे प्रोटैस्टैंट धर्म की नैतिक शिक्षाओं को मानने वालों के जीवन की शैली एक व्यवस्थित शैली में बदल गई। वैबर ने इस स्थिति को एक ऐसी घटना के रूप में स्वीकार किया कि जिससे पश्चिमी जीवन के भिन्न-भिन्न पहलुओं में तर्कवाद बढ़ा। यह तर्कवाद पश्चिमी सभ्यता के भिन्नभिन्न रूपों में स्पष्ट हुआ व पूंजीवाद के विकास से इसका प्रत्यक्ष सम्बन्ध है। इस तरह पूंजीवाद के सार व प्रोटैस्टैंट नीति के सम्बन्ध की व्याख्या के आधार पर धर्म को समझाया है।

Class 11 Political Science Solutions

Does it go Bad

Class 11 Sociology Notes Chapter 12 पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक

→ 19वीं तथा 20वीं शताब्दी के दौरान यूरोप के समाज में बहुत से परिवर्तन आए तथा यह कहा जाता है कि इन परिवर्तनों के अध्ययन के लिए ही समाजशास्त्र का जन्म हुआ।

→ 17वीं, 18वीं तथा 19वीं शताब्दी में बहुत से विचारकों ने पुस्तकें लिखीं जिन्होंने समाजशास्त्र के उद्भव में काफ़ी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया तथा इनमें मान्टेस्कयू (Montesquieu), रूसो (Rousseau) इत्यादि प्रमुख

→ अगस्ते कोंत, जोकि एक फ्रांसीसी दार्शनिक थे, को समाजशास्त्र का पितामह माना जाता है। उसने अपनी पुस्तक ‘The Course on Postitive Philosophy’ लिखी जिसमें उन्होंने 1839 में पहली बार शब्द Sociology का प्रयोग किया तथा इसे समाजशास्त्र का नाम दिया।

→ कोंत ने सकारात्मकवाद का सिद्धांत दिया तथा कहा कि सामाजिक घटनाओं को भी वैज्ञानिक व्याख्या से समझा जा सकता है तथा सकारात्मकवाद वह विधि है। इस प्रकार सकारात्मकवाद प्रेक्षण, तजुर्बे, तुलना तथा ऐतिहासिक विधि की एक व्यवस्थित कार्य प्रणाली है जिससे समाज का वैज्ञानिक अध्ययन किया जा सकता है।

→ कोंत ने अलग-अलग समाजों का अध्ययन किया तथा कहा कि वर्तमान अवस्था में पहुँचने के लिए समाज को तीन पड़ावों से गुजरना पड़ता है तथा वह पड़ाव हैं-आध्यात्मिक पड़ाव, अधिभौतिक पड़ाव तथा सकारात्मक पड़ाव। यह ही कोंत का तीन पड़ावों का सिद्धांत है।

→ कार्ल मार्क्स एक जर्मन दार्शनिक थे जिन्हें संसार में उनके वर्ग तथा वर्ग संघर्ष पर दिए विचारों के लिए जाना जाता है। समाजवाद तथा साम्यवाद की धारणा भी मार्क्स ने ही दी है।

→ मार्क्स के अनुसार शुरू से लेकर अब तक का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है। सभी समाजों में दो प्रकार के वर्ग होते हैं। प्रथम है पूँजीपति वर्ग जिसके पास उत्पादन के सभी साधन मौजूद हैं तथा दूसरा है मज़दूर वर्ग जिसके पास अपना श्रम बेचने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। दोनों के बीच अधिक प्राप्त करने के लिए संघर्ष चलता रहता है तथा इसको ही वर्ग संघर्ष कहते हैं।

→ इमाईल दुर्थीम भी समाजशास्त्र के संस्थापकों में से एक है। उन्होंने समाजशास्त्र को एक विज्ञापन के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। वह समाजशास्त्र के प्रथम प्रोफेसर भी थे।

→ वैसे तो समाजशास्त्र को दुर्थीम का काफ़ी योगदान है परन्तु उनके कुछ महत्त्वपूर्ण सिद्धांत हैं-सामाजिक तथ्य का सिद्धांत, आत्महत्या का सिद्धांत, श्रम विभाजन का सिद्धांत, धर्म का सिद्धांत इत्यादि।

10. दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन का सिद्धांत हमारे समाज में प्राचीन समय से ही मौजूद है। श्रम विभाजन के कारण ही समाज की प्रवृत्ति निश्चित होती है तथा इसमें मौजूद कानूनों की प्रकृति भी निश्चित होती है।

→ मैक्स वैबर भी एक प्रमुख समाजशास्त्री थे। मार्क्स की तरह वह भी जर्मनी के दाशनिक थे। उन्होंने भी समाजशास्त्र को बहत से सिद्धांत दिए जिनमें से प्रमुख हैं-सामजिक क्रिया का सिद्धांत, सत्ता तथा उसके प्रकार, प्रोटैस्टैंट एथिक्स तथा पूँजीवाद की आत्मा इत्यादि।

→ वर्ग (Class)–लोगों का समूह जिनके उत्पादन के साधन समान होते हैं।

→ सत्ता (Authority)-शक्ति का वह विशेष रूप जिसे सामाजिक व्यवस्था के नियमों, परिमापों का समर्थन प्राप्त होता है तथा साधारणतया इसे उन सभी की तरफ से वैध माना जाता है जो इसमें भाग लेते हैं।

→ सामाजिक क्रिया (Social Action)—वह क्रिया जिसमें अन्य व्यक्तियों की क्रियाओं तथा प्रतिक्रियाओं को सामने रखा जाता है। इसे सामाजिक उस समय कहा जाता है जब क्रिया करने वाला व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के व्यवहारों को सामने रखता है।

→ वर्ग चेतना (Class Consciousness)-एक वर्ग के सदस्यों के बीच अपने समूह के साधारण हितों की चेतना की मौजूदगी।

→ वर्ग संघर्ष (Class Struggle)-पूँजीपति तथा मजदूर वर्ग के बीच हमेशा हितों का संघर्ष होता है। यह हितों का संघर्ष दोनों वर्ग के बीच संघर्ष का कारण बनता है। जब लोगों में वर्ग चेतना बढ़ जाती है तो वर्ग संघर्ष भी बढ़ जाता है।

→ सकारात्मवाद (Positivism)-सकारात्मकवाद में माना जाता है कि समाज कुछ नियमों के अनुसार कार्य करता है जिन्हें ढूंढ़ा जा सकता है।

→ यान्त्रिक एकता (Mechanical Solidarity)-समानताओं पर आधारित समाजों के सदस्यों के बीच एकता की एकता को यान्त्रिक एकता कहते हैं।

→ सावयवी एकता (Organic Solidarity)-कई समाजों में लोगों के बीच अंतर होते हैं जिस कारण वह एक दूसरे पर निर्भर होते हैं। इन समाजों में लोगों के बीच मौजूद एकता को सावयवी एकता कहते हैं।

Class 11 Sociology Questions and Answers Chapter 11 सामाजिक परिवर्तन

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions):

प्रश्न 1. शब्द Progress लातीनी भाषा के किस शब्द से लिया गया है ?
(A) Progressor
(B) Progred
(C) Progredior
(D) Pregrodoir.
उत्तर-(C) Progredior.

प्रश्न 2. क्रान्ति की कोई विशेषता बताएं।
(A) अप्रत्याशित परिणाम
(B) शक्ति का प्रतीक
(C) तेज़ परिवर्तन
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-(D) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 3. सांस्कृतिक विडम्बना का सिद्धान्त किसने दिया था ?
(A) मैकाइवर
(B) जिन्सबर्ग
(C) ऑगबन
(D) वैबर।
उत्तर-(C) ऑगबर्न।

प्रश्न 4. रेखीय परिवर्तन को रेखीय परिवर्तन क्यों कहते हैं ?
(A) क्योंकि यह परिवर्तन चक्र में होता है
(B) क्योंकि यह परिवर्तन घूम कर होता है
(C) क्योंकि यह एक रेखा की तरह सीधी रेखा में होता है
(D) क्योंकि यह कुछ समय के लिए चक्र की तरह घूमता है तथा कुछ समय रेखा की तरह चलता है।
उत्तर-(C) क्योंकि यह एक रेखा की तरह सीधी रेखा में होता है।

प्रश्न 5. जब परिवर्तन एक निश्चित दिशा में हो तथा तथ्य में गुणों तथा रचना में भी परिवर्तन हो तो उसे क्या कहते हैं ?
(A) उद्विकास
(B) क्रान्ति
(C) विकास
(D) प्रगति।
उत्तर-(A) उद्विकास।

प्रश्न 6. उस परिवर्तन को क्या कहते हैं जो हमारी इच्छाओं तथा लक्ष्यों के अनुरूप हो तथा हमेशा जो लाभदायक स्थिति उत्पन्न करे।
(A) उद्विकास
(B) प्रगति
(C) क्रान्ति
(D) विकास।
उत्तर-(B) प्रगति।

प्रश्न 7. उस परिवर्तन को क्या कहते हैं जो सामाजिक व्यवस्था को बदलने के लिए एकदम तथा अचनचेत हो जाए।
(A) प्रगति
(B) विकास
(C) क्रान्ति
(D) उद्विकास।
उत्तर-(C) क्रान्ति।

प्रश्न 8. सोरोकिन के अनुसार किस चीज़ में होने वाला परिवर्तन सामाजिक होता है ?
(A) सांस्कृतिक विशेषताओं
(B) समाज
(C) समुदाय
(D) सामाजिक सम्बन्धों।
उत्तर-(A) सांस्कृतिक विशेषताओं।

प्रश्न 9. किसी समाज विशेष की संस्कृति में होने वाले परिवर्तन को क्या कहते हैं ?
(A) सामाजिक परिवर्तन
(B) सामूहिक परिवर्तन
(C) सांस्कृतिक परिवर्तन
(D) कोई नहीं।
उत्तर-(C) सांस्कृतिक परिवर्तन।

प्रश्न 10. सामाजिक परिवर्तन की प्रकृति किस प्रकार की होती है ?
(A) व्यक्तिगत
(B) सामूहिक
(C) सामाजिक
(D) सांस्कृतिक।
उत्तर-(C) सामाजिक।

II. रिक्त स्थान भरें (Fill in the blanks) :

1. …………. प्रकृति का नियम है।
2. ………….. का अर्थ है आंतरिक तौर पर क्रमवार परिवर्तन।
3. ………. से समाज में अचानक तथा तेज़ परिवर्तन आते हैं।
4. …………. , …………. तथा ………….. सामाजिक परिवर्तन के प्राथमिक स्रोत हैं।
5. ………… वह प्रक्रिया है जिससे सांस्कृतिक तत्त्व एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति में फैल जाते हैं।
6. जब हम अपने ऐच्छिक उद्देश्य की प्राप्ति के रास्ते की तरफ बढ़ते हैं तो इसे ……….. कहते हैं।
उत्तर-

  1. परिवर्तन,
  2. उद्विकास,
  3. क्रान्ति,
  4. Innovation, discovery, diffusion,
  5. प्रसार,
  6. प्रगति।

III. सही/गलत (True/False) :

1. क्रान्ति तेज़ परिवर्तन लाती है।
2. प्रसार से सांस्कृतिक तत्त्व नहीं फैलते।
4. जनसंख्या के बढ़ने या कम होने से सामाजिक परिवर्तन आता है।
5. क्रान्ति सामाजिक परिवर्तन का प्रकार नहीं है।
6. क्रान्ति से संपूर्ण सामाजिक संरचना बदल जाती है।
उत्तर-

  1. सही,
  2. गलत,
  3. गलत,
  4. सही,
  5. गलत,
  6. सही।

IV. एक शब्द/पंक्ति वाले प्रश्न उत्तर (One Wordline Question Answers) :

प्रश्न 1. सामाजिक परिवर्तन क्या होता है ?
उत्तर-सामाजिक संबंधों में होने वाला परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन होता है।

प्रश्न 2. सामाजिक परिवर्तन का कोई कारण बताएं।
उत्तर-भौगोलिक कारक जैसे कि भूकम्प, बाढ़ इत्यादि से सामाजिक परिवर्तन हो जाता है।

प्रश्न 3. क्या सामाजिक परिवर्तन के बारे में पहले बताया जा सकता है ?
उत्तर-जी नहीं, समाजिक परिवर्तन के बारे में पहले नहीं बताया जा सकता।

प्रश्न 4. सामाजिक परिवर्तन के कारकों को कितने भागों में बांटा जा सकता है ?
उत्तर-सामाजिक परिवर्तन के कारकों को दो भागों-प्राकृतिक कारक तथा मानवीय कारक में बाँटा जा सकता

प्रश्न 5. सामाजिक परिवर्तन की प्रकृति किस प्रकार की होती है ?
उत्तर-सामाजिक परिवर्तन की प्रकृति सामाजिक होती है।

प्रश्न 6. सांस्कृतिक परिवर्तन क्या होता है ?
उत्तर-किसी विशेष समाज की संस्कृति में होने वाले परिवर्तन को सांस्कृतिक परिवर्तन कहते हैं।

प्रश्न 7. उद्विकास किसे कहते हैं ?
उत्तर-जब परिवर्तन एक निश्चित दिशा में हो तथा तथ्य के गुणों व रचना में भी परिवर्तन आए तो उसे उद्विकास कहते हैं।

प्रश्न 8. प्रगति क्या है ?
उत्तर-ऐसे परिवर्तन जो हमारी इच्छाओं तथा लक्षणों के अनुसार हों तथा हमेशा लाभदायक स्थिति उत्पन्न करें उसे प्रगति कहते हैं।

प्रश्न 9. क्रान्ति क्या है ?
उत्तर-जब सामाजिक व्यवस्था को बदलने के लिए अचानक परिवर्तन हो जाए तो इसे क्रान्ति कहते हैं।

प्रश्न 10. मार्क्स के अनुसार सामाजिक परिवर्तन का क्या कारण है ?
उत्तर-मार्क्स के अनुसार सामाजिक परिवर्तन का कारण आर्थिक होता है।

प्रश्न 11. क्रान्ति की एक विशेषता बताएं।
उत्तर-क्रान्ति से तेज़ परिवर्तन आता है जिसके अचानक परिणाम निकलते हैं।

प्रश्न 12. सामाजिक परिवर्तन के कौन-से कारक होते हैं ?
उत्तर-भौगोलिक कारक, जनसंख्यात्मक कारक, जैविक कारक, तकनीकी कारक इत्यादि।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. सामाजिक परिवर्तन की परिभाषा दें।
उत्तर-जोंस (Jones) के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन वह शब्द है जिसे हम सामाजिक प्रक्रियाओं, सामाजिक ढंगों, सामाजिक अन्तक्रियाओं अथवा सामाजिक संगठन इत्यादि में पाए गए परिवर्तनों के वर्णन करने के लिए है।”

प्रश्न 2. सामाजिक परिवर्तन की दो विशेषताएं बताएं।
उत्तर-

  1. सामाजिक परिवर्तन सर्वव्यापक होता है क्योंकि कोई भी समाज पूर्णतया स्थिर नहीं होता तथा परिवर्तन प्रकृति का नियम है।
  2. सामाजिक परिवर्तन में किसी प्रकार की निश्चित भविष्यवाणी नहीं हो सकती क्योंकि सामाजिक संबंधों में कोई भी निश्चितता नहीं होती।

प्रश्न 3. सामाजिक परिवर्तन तुलनात्मक कैसे है ?
उत्तर-जब हम किसी परिवर्तन की बात करते हैं तो हम वर्तमान स्थिति की तुलना प्राचीन स्थिति से करते हैं कि प्राचीन स्थिति व वर्तमान स्थिति में क्या अंतर है। यह अंतर केवल दो स्थितियों की तुलना करके ही पता किया जा सकता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सामाजिक परिवर्तन तुलनात्मक होता है।

प्रश्न 4. उद्विकास को समझने का सूत्र बताएं।।
उत्तर-उद्विकास को हम निम्नलिखित सूत्र की सहायता से समझ सकते हैंउविकास = गुणात्मक परिवर्तन + रचना में परिवर्तन + निरन्तरता + दिशा।

प्रश्न 5. सामाजिक परिवर्तन के कौन-से कारक होते हैं ?
उत्तर-

  • भौगोलिक कारकों के कारण सामाजिक परिवर्तन आता है।
  • जैविक कारक भी सामाजिक परिवर्तन लाते हैं।
  • जनसंख्यात्मक कारकों की वजह से भी सामाजिक परिवर्तन आता है।
  • सांस्कृतिक तथा तकनीकी कारक भी सामाजिक परिवर्तन का कारण बनते हैं।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. सामाजिक परिवर्तन।
उत्तर-सामाजिक सम्बन्धों, सामाजिक संगठन, सामाजिक संरचना, सामाजिक अन्तक्रिया में होने वाले किसी भी प्रकार के परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन का नाम दिया जाता है। समाज में होने वाला हरेक प्रकार का परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन नहीं होता। केवल सामाजिक सम्बन्धों, सामाजिक क्रियाओं इत्यादि में पाया जाना वाला परिवर्तन ही सामाजिक परिवर्तन होता है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि लोगों के जीवन जीने के ढंगों में पाया जाने वाला परिवर्तन ही सामाजिक परिवर्तन होता है। यह हमेशा सामूहिक तथा सांस्कृतिक होता है। जब भी मनुष्यों के व्यवहार में परिवर्तन आता है तो हम कह सकते हैं कि सामाजिक परिवर्तन हो रहा है।

प्रश्न 2. सामाजिक परिवर्तन की विशेषताएं।
उत्तर-

  • सामाजिक परिवर्तन एक सर्वव्यापक प्रक्रिया है क्योंकि समाज के किसी न किसी हिस्से में परिवर्तन आता ही रहता है। कोई भी समाज ऐसा नहीं है जिसमें परिवर्तन न आया हो, क्योंकि परिवर्तन प्रकृति का नियम है।
  • सामाजिक परिवर्तन के बारे में निश्चित तौर पर भविष्यवाणी नहीं कर सकते कि यह कब तथा कैसे होगा क्योंकि व्यक्तियों के बीच मिलने वाले सामाजिक सम्बन्ध निश्चित नहीं होते तथा सम्बन्धों में हमेशा परिवर्तन आते रहते हैं।
  • सामाजिक परिवर्तन की गति असमान होती है क्योंकि यह किसी समाज में तो काफ़ी तेज़ी से आता है तथा किसी समाज में यह काफ़ी धीमी गति से आता है। परन्तु समाज में होता ज़रूर है।
  • सामाजिक परिवर्तन कई कारकों के आकर्षण का परिणाम होती है। इसके पीछे केवल एक ही कारक.नहीं होता क्योंकि हमारा समाज जटिल प्रवृत्ति का है।

प्रश्न 3. सामाजिक परिवर्तन में भविष्यवाणी नहीं कर सकते।
उत्तर-हम किसी भी प्रकार के सामाजिक परिवर्तन के बारे में निश्चित तौर पर भविष्यवाणी नहीं कर सकते कि यह कब तथा कैसे होगा। क्योंकि व्यक्तियों के बीच मिलने वाले सामाजिक सम्बन्ध निश्चित नहीं होते। सम्बन्धों में हमेशा परिवर्तन आते रहते हैं जिस कारण हम इनके बारे में निश्चित रूप से कुछ कह नहीं सकते। हम किसी भी व्यक्ति के व्यवहार के बारे में निश्चित अनुमान नहीं लगा सकते कि यह किसी विशेष स्थिति में किस प्रकार का व्यवहार करेगा। इसलिए हम इसके बारे में निश्चित रूप से भविष्यवाणी नहीं कर सकते।

प्रश्न 4. सामाजिक परिवर्तन के मुख्य कारक।
उत्तर-सामाजिक परिवर्तन के मुख्य कारक निम्नलिखित हैं-

  • सांस्कृतिक कारक (Cultural factor)
  • जनसंख्यात्मक कारक (Demographical factor)
  • शैक्षिक कारक (Educational factor)
  • आर्थिक कारक (Economic factor)
  • तकनीकी कारक (Technological factor)
  • जैविक कारक (Biological factor)
  • मनोवैज्ञानिक कारक (Psychological factor).

प्रश्न 5. सामाजिक उदविकास।
उत्तर- सामाजिक उदविकास सामाजिक परिवर्तन के प्रकारों में से एक है। शब्द उदविकास अंग्रेजी भाषा के शब्द Evolution से निकला है जोकि लातिनी भाषा के शब्द Evolvere से निकला है जिसका अर्थ है बाहर की तरफ फैलना। क्रम विकासीय परिवर्तन से न सिर्फ बढ़ौत्तरी होती है बल्कि उस परिवर्तन से संरचनात्मक बढौत्तरी का ज्ञान होता है। इस तरह क्रम विकासीय परिवर्तन ऐसा परिवर्तन होता है जिसमें निरन्तर क्रम परिवर्तन निश्चित दिशा की तरफ होता है। यह साधारण से जटिल की तरफ जाने की प्रक्रिया है।

प्रश्न 6. उद्विकास की तीन विशेषताएं। (Three Characteristics of Evolution.)
उत्तर-

  1. सामाजिक उद्विकास निरन्तर पाया जाने वाला परिवर्तन होता है तथा यह परिवर्तन लगातार होता रहता है।
  2. निरन्तरता के साथ सामाजिक उद्विकासीय परिवर्तन में निश्चित दिशा भी पायी जाती है क्योंकि यह सिर्फ आकार में नहीं बल्कि संरचना में भी पायी जाती है।
  3. सामाजिक उद्विकास के ऊपर किसी प्रकार का कोई बाहरी दबाव नहीं होता बल्कि इसमें भीतरी गुण बाहर निकलते हैं।
  4. उद्विकासीय परिवर्तन हमेशा साधारण से जटिलता की तरफ पाया जाता है तथा निश्चित दिशा में पाया जाता है।

प्रश्न 7. क्रान्ति।
उत्तर-क्रान्ति भी सामाजिक परिवर्तन का एक प्रकार है। इसके द्वारा समाज में इस तरह का परिवर्तन होता है कि जिसका प्रभाव वर्तमान समय पर तो पड़ता ही है परन्तु भविष्य तक भी इसका असर रहता है। वास्तव में समाज में कई बार ऐसे हालात पैदा हो जाते हैं जिसके द्वारा समाज विघटन के रास्ते पर चल पड़ता है। ऐसे हालातों को खत्म करने के लिए समाज में क्रान्तिकारी परिवर्तन पैदा हो जाते हैं। यह क्रान्तिक परिवर्तन एकदम तथा अचानक होता है। इस पर बाहरी शक्तियों का भी प्रभाव पड़ता है। क्रान्ति से एकदम परिवर्तन आता है जिससे समाज का ढांचा ही बदल जाता है।

प्रश्न 8. क्रान्ति की तीन विशेषताएं।
उत्तर-

  1. क्रान्ति में सामाजिक व्यवस्था में एकदम परिवर्तन आ जाता है जिस कारण अचानक परिणाम निकलते हैं।
  2. क्रान्ति से संस्कृति के दोनों भाग, चाहे वह भौतिक हो या अभौतिक, में तेजी से परिवर्तन आता है जिससे समाज पूरी तरह बदल जाता है।
  3. क्रान्ति एक चेतन प्रक्रिया है अचेतन नहीं जिसमें चेतन रूप से काफ़ी समय से प्रयास चलते हैं तथा राज्य सत्ता को बदला जाता है।
  4. क्रान्ति में हिंसक तथा अहिंसक तरीके से पुरानी व्यवस्था को उखाड़ फेंका जाता है तथा नई व्यवस्था को कायम किया जाता है।

प्रश्न 9. क्रान्ति शक्ति की प्रतीक कैसे होती है ?
उत्तर-क्रान्ति में शक्ति का प्रयोग ज़रूरी होता है। राजनीतिक क्रान्ति तो खून-खराबे तथा कत्ले-आम पर आधारित होती है जैसे 1789 की फ्रांस की क्रान्ति तथा 1917 की रूसी क्रान्ति। राज्य की सत्ता को पलटने के लिए हिंसा को साधन बनाया जाता है जिस कारण लूट-मार, कत्ले-आम तो होता ही है। क्रान्ति के सफल या असफल होने में भी शक्ति का ही हाथ होता है। यदि क्रान्ति करने वालों की शक्ति अधिक है तो वह राज्य सत्ता को पलट देते हैं नहीं तो राज्य उनकी क्रान्ति को असफल कर देता है। इस तरह क्रान्ति शक्ति का प्रतीक है क्योंकि यह तो होती ही शक्ति से है।

प्रश्न 10. क्रान्ति का सामाजिक कारण।
उत्तर-बहुत-से सामाजिक कारण क्रान्ति के लिए जिम्मेदार होते हैं। समाजशास्त्रियों के अनुसार यदि समाज में प्रचलित रीति-रिवाज, परम्पराएं ठीक नहीं हैं तो वह क्रान्ति का कारण बन सकते हैं। प्रत्येक समाज में कुछ प्रथाएं, परम्पराएं होती हैं जो समाज की एकता तथा अखण्डता के विरुद्ध होती हैं। क्रान्ति कई बार इन परम्पराओं को खत्म करने के लिए भी की जाती है। कई बार इन परम्पराओं के कारण समाज में विघटन पैदा हो जाता है जिस कारण इस विघटन को खत्म करने के लिए क्रान्ति करनी पड़ती है। जैसे 20वीं सदी में भारत में कई बुराइयों के कारण सामाजिक विघटन पैदा होता था।

प्रश्न 11. क्रान्ति का राजनीतिक कारण।
उत्तर-यदि हम इतिहास पर दृष्टि डालें तो हमें पता चलता है कि साधारणतः सभी ही क्रान्तियों के कारण राजनीतिक रहे हैं तथा यह कारण वर्तमान राज्य की सत्ता के विरुद्ध होते हैं। बहुत बार राज्य की सत्ता इतनी अधिक निरंकुश हो जाती है कि अपनी मनमर्जी करने लग जाती है। उसको लोगों की इच्छाओं का ध्यान भी नहीं रहता। आम जनता की इच्छाओं को दबा दिया जाता है। इच्छाओं के दबने के कारण जनता में असन्तोष फैल जाता है। धीरे-धीरे यह असन्तोष सम्पूर्ण समाज में फैल जाता है तथा यह असन्तोष समय आने पर क्रान्ति बन जाता है।

प्रश्न 12. विकास।
उत्तर-सामाजिक विकास एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें कई चीजें अपने बड़े तथा विस्तृत आकार की तरफ बढ़ती हैं। इसका अर्थ है कि विकास ऐसा परिवर्तन है जिसमें विशेषीकरण तथा विभेदीकरण में बढ़ोत्तरी होती है तथा वह चीज़, जिसका हम मूल्यांकन कर रहे हैं, हमेशा उन्नति की तरफ बढ़ती है।

प्रश्न 13. विकास की विशेषताएं।
उत्तर-

  • विकास एक सर्वव्यापक प्रक्रिया है।
  • विकास में एक चीज़ एक स्थिति से दूसरी स्थिति में परिर्वतन हो जाती है।
  • विकास सरलता से जटिलता की तरफ बढ़ने की प्रक्रिया है।
  • विकास जीवन के सभी पक्षों में होता है।
  • विकास करने की कोशिशें हमेशा चलती रहती हैं।

प्रश्न 14. सामाजिक विकास के तीन मापदण्ड।
उत्तर-

  • जब कानून की दृष्टि में समानता बढ़ जाती है तो यह विकास का प्रतीक होता है।
  • जब देश के सभी बालिगों को वोट देने का अधिकार प्राप्त हो जाए तथा देश में लोकतन्त्र स्थापित हो जाए तो यह राजनीतिक विकास का सूचक है।
  • जब स्त्रियों तथा सभी लोगों को समाज में समान अधिकार प्राप्त हो जाएं तो यह सामाजिक विकास का सूचक है।
  • जब समाज में पैसे या पूँजी का समान विभाजन हो तो यह आर्थिक प्रगति का सूचक माना जाता है।

प्रश्न 15. विकास की दो परिभाषाएं।
उत्तर-हाबहाऊस (Hobhouse) के अनुसार, “समुदाय का विकास उस समय माना जाता है जब किसी वस्तु की मात्रा, कार्य सामर्थ्य तथा सेवा की नज़दीकी में बढ़ोत्तरी होती है।”
Oxford Dictionary के अनुसार, “आम प्रयोग में विकास का अर्थ है भूमिका प्रकटन, किसी वस्तु का अधिक-से-अधिक ज्ञान तथा जीवन का विकास।”

प्रश्न 16. तकनीकी कारक की वजह से आए दो परिवर्तन।
उत्तर-

  • शहरीकरण-उद्योगों के विकास होने के साथ दूर-दूर स्थानों पर रहने वाले लोग रोज़गार को प्राप्त करने के लिए औद्योगिक स्थानों पर इकट्ठे होते हैं। बाद में वह वहीं जाकर रहना शुरू कर देते हैं। इस तरह शहरों का विकास होता जाता है।
  • कृषि के नए तरीकों का विकास-नए आविष्कारों की वजह से कृषि में नए तरीकों का निर्माण हुआ तथा इससे कृषि के उत्पादन में भी बढ़ोत्तरी हुई। लोगों के जीवन में भी सुधार हुआ।

प्रश्न 17. तकनीक तथा शहरीकरण।
उत्तर-तकनीक की वजह से बड़े-बड़े उद्योग शुरू हो गए तथा देश का औद्योगीकरण हो गया है। औद्योगीकरण के कारण बड़े-बड़े शहर उन उद्योगों के आसपास बस गए। शुरू में गांवों से कारखानों में काम करने के लिए आने वाले मजदूरों के लिए उद्योगों के आसपास बस्तियां बस गईं। फिर उन बस्तियों में जीवन जीने के लिए चीजें देने के लिए दुकानें तथा बाज़ार खुल गए। फिर लोगों के लिए होटल, स्कूल, व्यापारिक कम्पनियां खुल गईं तथा दफ़्तर बन गए। इस तरह धीरे-धीरे इनकी वजह से शहरों का विकास हुआ तथा शहरीकरण बढ़ गया। इस तरह शहरीकरण को बढ़ाने में तकनीक का सबसे बड़ा हाथ है।

प्रश्न 18. तकनीक का औरतों की दशा में परिवर्तन पर प्रभाव।
उत्तर-तकनीक ने औरतों की दशा सुधारने में काफ़ी बड़ा योगदान डाला है। तकनीक के बढ़ने के कारण विद्या का प्रसार हुआ तथा औरतों ने शिक्षा लेनी शुरू कर दी। शिक्षा लेकर वह आर्थिक क्षेत्र में मर्दो से कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही है। वह दफ्तरों, फैक्टरियों में जाकर काम कर रही है तथा पैसे कमा रही है। मशीनों के बढ़ने की वजह से औरतों के ऊपर परिवार के कार्य करने का बोझ काफ़ी कम हो गया है। आजकल प्रत्येक कार्य के लिए मशीनों का प्रयोग हो रहा है जैसे कपड़े धोने, सफ़ाई करने, बर्तन धोने इत्यादि। इससे औरतों का कार्य काफ़ी कम हो गया है। यह सब तकनीक की वजह से मुमकिन हुआ है।

प्रश्न 19. तकनीक का विवाह पर प्रभाव।
उत्तर-पुराने समय में विवाह एक धार्मिक संस्कार होता था परन्तु तकनीक के बढ़ने की वजह से आधुनिक समाज आगे आए जहां विवाह एक धार्मिक संस्कार रहकर एक सामाजिक समझौता माना जाने लग गया। विवाह का आधार समझौता होता है तथा समझौता न होने की सूरत में विवाह टूट भी जाता है। अब विवाह के चुनाव का क्षेत्र काफ़ी बढ़ गया है। व्यक्ति अपनी इच्छा से किसी भी जाति में विवाह करवा सकता है। यदि पति पत्नी के विचार नहीं मिलते तो वह अलग भी हो सकते हैं। औरतें आर्थिक क्षेत्र में भी आगे आ गई हैं तथा अपने आपको मर्दो से कम नहीं समझती हैं। वह अब मर्दो पर बिल्कुल भी निर्भर नहीं है तथा यह सब कुछ तकनीक की वजह से हुआ है।

प्रश्न 20. जनसंख्यात्मक कारक के दो प्रभाव।
उत्तर-(i) आर्थिक हालातों पर प्रभाव (Effect on EconomicLife)-जनसंख्यात्मक कारक का उत्पादन के तरीकों, जायदाद की मलकीयत, आर्थिक प्रगति के ऊपर भी प्रभाव पड़ता है। जैसे जनसंख्या के बढ़ने के कारण कृषि के उत्पादन को बढ़ाना ज़रूरी हो जाता है। ___ (ii) सामाजिक जीवन पर प्रभाव (Effect on Social Life)-बढ़ रही जनसंख्या, बेरोज़गारी, भूखमरी की स्थिति पैदा करती है जिससे समाज में अशान्ति, भ्रष्टाचार बढ़ता है।

प्रश्न 21. शिक्षात्मक कारक।
उत्तर-शिक्षा के द्वारा व्यक्ति का समाजीकरण भी होता है तथा उसके विचारों, आदर्शों, कीमतों इत्यादि के ऊपर भी प्रभाव पड़ता है। मनुष्य की प्रगति भी शिक्षा के ऊपर ही आधारित होती है। यह व्यक्ति को वहमों, भ्रमों, अज्ञानता से छुटकारा दिलाता है। व्यक्ति के प्रत्येक पक्ष में परिवर्तन लाने में शिक्षात्मक कारक महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 22. शिक्षात्मक कारक के दो प्रभाव।
उत्तर-

  • जाति प्रथा पर प्रभाव-अनपढ़ता व्यक्ति को गतिहीन बना देती है तथा व्यक्ति भ्रमों, परम्पराओं में फंसे रहते हैं। आधुनिक शिक्षा के द्वारा जाति प्रथा को काफ़ी कमजोर कर दिया गया है। यह शिक्षा धर्म निरपेक्ष होती है। इसके द्वारा आज़ादी, समानता, भाईचारा इत्यादि जैसी कीमतों पर जोर दिया जाता है।
  • औरतों की स्थिति पर प्रभाव-शिक्षात्मक कारकों के द्वारा औरतों की दशा में काफी सुधार हुआ है। वह घर की चार दीवारी से बाहर निकल कर अपने अधिकारों तथा फों के प्रति जागरूक हुई है। आर्थिक रूप से वह स्वैः निर्भर हो गई है।

प्रश्न 23. शिक्षा का शाब्दिक अर्थ।
उत्तर-शिक्षा अंग्रेज़ी के शब्द Education का हिन्दी रूपान्तर है। Education लातिनी भाषा के शब्द Educere से निकला है जिसका अर्थ होता है to bring up : शिक्षा का अर्थ व्यक्ति को सिर्फ किताबी ज्ञान देने से ही सम्बन्धित नहीं बल्कि व्यक्ति में अच्छी आदतों का निर्माण करके उस को भविष्य के लिए तैयार करना भी होता है। ऐंडरसन के अनुसार, “शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है जिस के द्वारा व्यक्ति उन चीज़ों की सिखलाई प्राप्त करता है जो उसको ज़िन्दगी जीने के लिए तैयार करती है।”

प्रश्न 24. शिक्षा का परिवार पर प्रभाव।
उत्तर-शैक्षिक कारक का परिवार पर गहरा प्रभाव पड़ा है। शिक्षा में प्रगति से लोगों में जागृति आयी है तथा उन्होंने नई कीमतों के अनुसार रहना शुरू कर दिया। अब वह अपनी इच्छा तथा योग्यता के अनुसार अलग-अलग कार्य करने लग गए जिससे संयुक्त परिवारों की जगह केन्द्रीय परिवार अस्तित्व में आए। अब व्यक्ति गांवों से निकल कर शहरों में नौकरी करने के लिए जाने लग गए। लोग अब व्यक्तिवादी तथा पदार्थवादी हो गए हैं। बच्चों ने रस्मी शिक्षा लेनी शुरू कर दी जिस वजह से उन्होंने स्कूल, कॉलेज इत्यादि में जाना शुरू कर दिया। अब शिक्षा की वजह से ही छोटे परिवार को ठीक माना जाने लग गया है। अब बच्चे के समाजीकरण में शिक्षा का काफ़ी प्रभाव है क्योंकि बच्चा अपने जीवन का आरम्भिक समय शैक्षिक संस्थाओं में बिताता है। …

प्रश्न 25. शैक्षिक कारकों का जाति प्रथा पर प्रभाव।
उत्तर-पुराने समय में शिक्षा सिर्फ उच्च जाति के लोगों तक ही सीमित थी परन्तु अंग्रेज़ी शिक्षा के आने से अब प्रत्येक जाति का व्यक्ति शिक्षा ले सकता है। पश्चिमी शिक्षा को महत्त्व दिया गया है जिस वजह से शिक्षा धर्म निरपेक्ष हो गई है। आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने समानता, स्वतन्त्रता तथा भाईचारे वाली कीमतों पर जोर दिया है। शिक्षा की वजह से ही सभी व्यक्ति स्कूल में पढ़ने लग गए जिससे अस्पृश्यता का भेदभाव खत्म हो गया है। अब व्यक्ति अपनी शिक्षा तथा योग्यता के अनुसार कोई भी कार्य कर करता है। शिक्षा प्राप्त करके व्यक्ति अपने परिश्रम से समाज में कोई भी स्थिति प्राप्त कर सकता है। अन्तः जाति विवाह भी शिक्षा की वजह से बढ़ गए हैं। हमारे समाज में से जाति प्रथा को खत्म करने में शैक्षिक कार्य महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

प्रश्न 26. शिक्षा का सामाजिक स्तरीकरण पर प्रभाव।
उत्तर-शिक्षा सामाजिक स्तरीकरण का एक प्रमुख आधार है। इसने समाज को दो भागों पढ़े-लिखे तथा अनपढ़ में बांट देता है। व्यक्ति समाज में ऊंची स्थिति प्राप्त करने के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करता है। जिस तरह की शैक्षिक योग्यता व्यक्ति के पास होती है, वह उसी तरह की समाज में पदवी प्राप्त करता है। इस तरह समाज की जनसंख्या को शिक्षा के आधार पर स्तरीकृत किया जाता है। पढ़े-लिखे व्यक्ति को समाज में आदर प्राप्त होता है। वर्तमान समाज में व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार अपनी मेहनत तथा योग्यता से ऊंचा पद प्राप्त कर सकता है।

बड़े उतारों वाले प्रश्न

प्रश्न 1. सामाजिक उद्विकास के बारे में आप क्या जानते हैं ? विस्तार से लिखें।
उत्तर-सामाजिक उद्विकास सामाजिक परिवर्तन के प्रकारों में से एक है। उदविकास अंग्रेजी भाषा में शब्द EVOLUTION का हिन्दी रूपांतर है जो कि लातिनी भाषा के शब्द Evolvere में से निकला है। उदविकासीय परिवर्तन में न सिर्फ बढ़ोत्तरी होती है बल्कि उस परिवर्तन से संरचनात्मक ज्ञान की भी बढ़ोत्तरी होती है। इस तरह उद्विकास एक ऐसा परिवर्तन होता है जिस में निरन्तर परिवर्तन निश्चित दिशा की तरह पाया जाता है। मैकाइवर तथा पेज (MacIver and Page) का कहना है कि “परिवर्तन में गतिशीलता नहीं होती बल्कि परिवर्तन की एक दिशा होती है तो ऐसे परिवर्तन को विकास में बढ़ोत्तरी कहते हैं।”

मैकाइवर (MacIver) ने एक और स्थान पर लिखा है कि, “जैसे-जैसे व्यक्ति की ज़रूरतें बढती हैं उसी तरह सामाजिक संरचना भी उस के अनुसार बदलती रहती है जिस से इन ज़रूरतों की पूर्ति होती है तथा यह ही उद्विकास का अर्थ होता है।”

हरबर्ट स्पैंसर (Herbert Spencer) के अनुसार, “विकास में बढ़ोत्तरी तत्त्वों का एकीकरण तथा उस से सम्बन्धित वह गति जिस के दौरान कोई तत्त्व एक अनिश्चित तथा असम्बन्धित समानता से निश्चित सम्बन्धित भिन्नता में बदल जाती है।”

इस तरह इन परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक उविकास बाहरी दबाव के कारण नहीं बल्कि आन्तरिक शक्तियों के कारण होने वाले परिवर्तन हैं। अगस्ते काम्ते के अनुसार प्रत्येक समाज उद्विकास के तीन स्तरों में से होकर गुजरता है तथा वह हैं-

  1. धार्मिक स्तर (Theological Stage)
  2. अर्द्धभौतिक स्तर (Metaphysical Stage)
  3. वैज्ञानिक स्तर (Scientific Stage)

मार्गन का कहना था कि, “सभ्यता तथा समाज का विकास एक क्रम में हुआ है। सामाजिक उद्विकास को समझने के लिए हमें सामाजिक संस्थाओं, संगठनों के विभिन्न विकास में बढ़ोत्तरी के स्तरों को जानना ज़रूरी होता

हरबर्ट स्पैंसर (Spencer) के अनुसार, “सामाजिक जनसमूह की आम बढ़ोत्तरी तथा उसको मिलाने तथा दोबारा मिलाने की मदद से एकीकरण को प्रदर्शित करता है। समाज जाति का गैर जातियों में परिवर्तन, आम जनजातियों से लेकर पढ़े-लिखे राष्ट्रों जिन में सभी अंगों में काफ़ी प्रक्रियात्मक विभिन्नता है, को कई उदाहरणों से स्पष्ट किया जा सकता है। जैसे-जैसे विभेदीकरण तथा एकीकरण बढ़ते जाते हैं उसी तरह सामाजिक इकट्ठ अस्पष्ट होता है। उद्विकास निश्चित व्यवस्था को जन्म देता है जो धीरे-धीरे स्पष्ट होता है। प्रथाओं की जगह कानून ले लेते हैं जो स्थिरता प्राप्ति के कार्यों तथा संस्थाओं में लागू किए जाने पर ज्यादा विशिष्ट हो जाते हैं। सामाजिक इकट्ठ धीरेधीरे अपने विभिन्न अंगों की संरचना को एक-दूसरे से ज्यादा स्पष्ट रूप में अलग कर लेते हैं। बड़ा विशाल आकार निश्चितता की तरफ तरक्की होती है।”

स्पैंसर ने उद्विकास के चार निम्नलिखित नियम बताए हैं-

  • सामाजिक उद्विकास ब्रह्माण्ड (Universe) के विकास के नियम का एक सांस्कृतिक तथा मानवीय रूप होता है।
  • सामाजिक उद्विकास उसी तरह ही घटित होता है जैसे संसार की ओर बढोत्तरियां। (3) सामाजिक उद्विकास की प्रक्रिया बहुत ही धीमी होती है। (4) सामाजिक उद्विकास उन्नति वाला होता है।

मैकाइवर का कहना है कि, “जहां कहीं भी समाज के इतिहास में समाज के अंगों में बढ़ते हुए विशेषीकरण को देखते हैं उसे हम सामाजिक उद्विकास कहते हैं।”
(“Where ever in the history of society, we can see increasing specialization in different parts of society, we call it social evolution.”) ।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि आन्तरिक छुपी हुई वस्तुओं के द्वारा पाया गया परिवर्तन उद्विकास होता है।

विशेषताएं (Characteristics) –

  •  उद्विकास का सम्बन्ध जीवित वस्तु या मनुष्यों में होने वाले परिवर्तन से होता है। स्पैंसर ने इसे जैविक उद्विकास कहा है। यह विकास सभी समाजों में समान रूप से विकसित रहता है। उदाहरणतः अमीबा (Amoeba) एक जीव है जिस के शरीर के सभी कार्य केवल सैल (cell) द्वारा पूरे किए जाते हैं। मनुष्य का शरीर जीव का ज्यादा विकसित रूप होता है जिसके विभिन्न कार्य विभिन्न अंगों द्वारा पूर्ण किए जाते हैं। जैविक विकास में जैसे जैसे बढ़ोत्तरी होती है, उसी तरह उस की प्रकृति भी जटिल होती जाती है।
  • सामाजिक उद्विकास निरंतर पाया जाने वाला परिवर्तन होता है। यह परिवर्तन लगातार चलता रहता है।
  • निरन्तरता के साथ सामाजिक उद्विकासीय परिवर्तन में निश्चित दिशा भी पायी जाती है क्योंकि यह केवल आकार में ही नहीं बल्कि संरचना में भी पाया जाता है। यह विकास निश्चित दिशा की तरफ इशारा करता है।
  • सामाजिक उद्विकास के ऊपर किसी प्रकार का बाहरी दबाव नहीं होता है बल्कि इस के अन्दरूनी गुण बाहर निकल आते हैं। परिवर्तन वस्तु में कई तत्त्व मौजूद होते हैं। इसलिए परिवर्तन इन के परिणामस्वरूप पाया जाता
  • अन्दर मौजूद तत्त्वों के द्वारा होने वाला परिवर्तन हमेशा बहुत ही धीमी गति से होता है। इस का कारण यह है कि अन्दर छूपे हुए तत्त्वों का हमें आसानी से पता नहीं लग सकता। प्रत्येक परिवर्तनशील वस्तु में आन्तरिक गुण मौजूद होते हैं।
  • उदविकासीय परिवर्तन साधारणत: से जटिलता की तरफ पाया जाता है। जैसे शुरू में मनुष्यों का समाज सरल था, धीरे-धीरे श्रम विभाजन तथा विशेषीकरण विकसित हुआ जिस ने मनुष्यों के समाज को जटिल अवस्था की तरफ परिवर्तित कर दिया।

इस तरह हम कह सकते हैं कि सामाजिक उद्विकास अस्पष्टता से स्पष्टता की तरफ परिवर्तन होता है। जैसे मनुष्यों के अंगों में परिवर्तन कुछ समय बाद स्पष्ट रूप से दिखाई देने लग जाता है। परिवर्तन की इस प्रकार की दिशा निश्चित होती है। यह वस्तु में पाए जाने वाले आन्तरिक तत्त्वों के कारण होती है।

प्रश्न 2. क्रान्ति की परिभाषाएं दें। इसकी विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर-क्रान्ति भी सामाजिक परिवर्तन की ही एक प्रकार है। इसके द्वारा समाज में इस तरह परिवर्तन होता है कि जिसका प्रभाव वर्तमान समय पर तो पड़ता है परन्तु भविष्य तक भी इसका प्रभाव रहता है। वास्तव में समाज में कई बार ऐसे हालात पैदा हो जाते हैं जिसके द्वारा समाज विघटन के रास्ते पर चल पड़ता है। ऐसे हालातों को खत्म करने के लिए समाज में क्रान्तिकारी परिवर्तन पैदा हो जाते हैं। यह क्रान्तिकारी परिवर्तन अचानक तथा एकदम होता है। इसके ऊपर बाहरी शक्तियों का भी प्रभाव पड़ता है।

क्रान्ति के द्वारा अचानक ही परिवर्तन हो जाता है जिससे समाज की संरचना ही बदल जाती है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री कार्ल मार्क्स के अनुसार समाज अलग-अलग अवस्थाओं में से क्रान्तिकारी परिवर्तन की प्रक्रिया के परिणामों में से होकर गुजरता है। इस कारण एक सामाजिक अवस्था की जगह दूसरी सामाजिक अवस्था पैदा हो जाती है।

परिभाषाएं (Definitions)-

  • आगबर्न तथा निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार, “क्रान्ति संस्कृति में महत्त्वपूर्ण तथा तेज़ परिवर्तन को कहते हैं।”
  • गाए रोशर (Guy Rochar) के अनुसार, “क्रान्ति एक खतरनाक तथा ज़बरदस्त लोगों की बगावत होती है जिसका उद्देश्य सत्ता या शासन को उखाड़ देना तथा स्थिति विशेष में परिवर्तन करना होता है।”
  • किम्बल यंग (Kimball Young) के अनुसार, “राज्य शक्ति का राष्ट्रीय राज्य के अधीन नए ढंगों से सत्ता हथिया लेना ही क्रान्ति है।”

इस तरह इन परिभाषाओं को देखकर हम कह सकते हैं कि क्रान्ति सामाजिक संरचना में होने वाली अचनचेत प्रक्रिया तथा तेजी से होने वाला परिवर्तन है। इसमें वर्तमान सत्ता को उखाड़ कर फेंक दिया जाता है तथा नई सत्ता को बिठाया जाता है। क्रान्ति खून-खराबे वाली भी हो सकती है तथा इसमें हिंसा का प्रयोग ज़रूरी है। जो शक्ति हिंसा से प्राप्त की जाती है वह कई बार हिंसा से खत्म भी हो जाती है।

क्रान्ति की विशेषताएं (Characteristics of Revolution) –

  • अचानक परिणाम (Contingency Results)-क्रान्ति एक ऐसा साधन हैं जिसमें हिंसा का प्रयोग किया जाता है। यह किसी भी स्वरूप चाहे वह धार्मिक आर्थिक या राजनीतिक को धारण कर सकती है। इस क्रान्ति का परिणाम यह निकलता है कि सामाजिक व्यवस्था तथा संरचना में एकदम परिवर्तन आ जाता है। इस कारण सामाजिक क्रान्ति सामाजिक कद्रों-कीमतों में परिवर्तन करने का प्रमुख साधन है।
  • तेज़ परिवर्तन (Rapid Change)-क्रान्ति की एक विशेषता यह होती है कि इसके परिणामस्वरूप संस्कृति में दोनों हिस्सों, चाहे वह भौतिक हो या अभौतिक में परिवर्तन आ जाता है तथा क्रान्ति के कारण जो भी परिवर्तन होते हैं वह बहुत ही तेज़ गति से होते हैं। इस कारण समाज पूरी तरह बदल जाता है।
  • आविष्कार का साधन (Means of invention)-क्रान्ति एक ऐसा साधन है जिससे सामाजिक व्यवस्था को तोड़ दिया जाता है। इस सामाजिक व्यवस्था के टूटने के कारण बहुत-से नए वर्ग अस्तित्व में आ जाते हैं। इन नए वर्गों के अस्तित्व को कायम रखने के लिए बहुत-से नए नियम बनाए जाते हैं। इस तरह क्रान्ति के कारण बहुत-से नए वर्ग तथा नियम अस्तित्व में आ जाते हैं।
  • शक्ति का प्रतीक (Symbol of power)-क्रान्ति में शक्ति का प्रयोग ज़रूरी तौर पर होता है। राजनीतिक क्रान्ति तो खून-खराबे तथा कत्लेआम पर आधारित होती है जैसे कि 1789 की फ्रांस की क्रान्ति तथा 1917 की रूसी क्रान्ति। राज्य की सत्ता को पलटने के लिए हिंसा को साधन बनाया जाता है जिस कारण लूट-मार, कत्लेआम इत्यादि होते हैं। क्रान्ति के सफल या असफल होने में शक्ति का सबसे बड़ा हाथ होता है। यदि क्रान्ति करने वालों की शक्ति ज़्यादा होगी तो वह राज्य की सत्ता को पलट देंगे नहीं तो राज्य उनकी क्रान्ति को असफल कर देगा।
  • क्रान्ति एक चेतन प्रक्रिया है (Revolution is a conscious process)-क्रान्ति एक अचेतन नहीं बल्कि चेतन प्रक्रिया है। इसमें चेतन तौर पर प्रयास होते हैं तथा राज्य की सत्ता को पलटा जाता है। क्रान्ति के प्रयास काफ़ी समय से शुरू हो जाते हैं तथा वह पूरे वेग से क्रान्ति कर देते हैं। क्रान्तिकारियों को इस बात का पता होता है कि उनकी क्रान्ति के क्या परिणाम होंगे।
  • क्रान्ति सामाजिक असन्तोष के कारण होती है (Revolution is because of Social dissatisfaction)-क्रान्ति सामाजिक असन्तोष का परिणाम होती है। जब समाज में असन्तोष शुरू होता है तो शुरू में यह धीरे-धीरे उबलता है। समय के साथ-साथ यह तेज़ हो जाता है तथा जब यह असन्तोष बेकाबू हो जाता है तो यह क्रान्ति का रूप धारण कर लेता है। समाज का बड़ा हिस्सा वर्तमान सत्ता के विरुद्ध हो जाता है तथा यह असन्तोष क्रान्ति का रूप धारण करके सत्ता को उखाड़ देता है।
  • नई व्यवस्था की स्थापना (Establishment of new system) क्रान्ति में हिंसक या अहिंसक तरीके से पुरानी व्यवस्था को उखाड़ कर फेंक दिया जाता है तथा नई व्यवस्था को कायम किया जाता है। इसकी हम कई उदाहरणे देख सकते हैं जैसे कि 1799 की फ्रांस की क्रान्ति में लुई 16वें की सत्ता को उखाड़ कर नेशनल असैम्बली की सरकार बनाई गई थी तथा 1917 की रूसो क्रान्ति में ज़ार की सत्ता को उखाड़ कर बोल्शेविक पार्टी की सत्ता स्थापित की गई थी। इस तरह क्रान्ति से पुरानी व्यवस्था खत्म हो जाती है तथा नई व्यवस्था बन जाती है।
  • क्रान्ति की दिशा निश्चित नहीं होती (No definite direction of revolution) क्रान्ति की दिशा निश्चित नहीं होती। उदविकास में परिवर्तन की दिशा निश्चित होती है परन्तु क्रान्ति में परिवर्तन की दिशा निश्चित नहीं होती। यह परिवर्तन उन्नति की जगह पतन की तरफ भी जा सकता है तथा समाज की प्रगति उलट दिशा में भी जा सकती है।

प्रश्न 3. क्रान्ति के कारणों का वर्णन करो।
अथवा क्रान्ति कौन-से कारणों की वजह से आती है ? .
उत्तर-1. सामाजिक कारण (Social Causes)-बहुत-से सामाजिक कारण क्रान्ति के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। समाजशास्त्रियों के अनुसार यदि समाज में प्रचलित रीति-रिवाज, परम्पराएं इत्यादि ठीक नहीं है तो वह क्रान्ति का कारण बन सकती है। प्रत्येक समाज में कुछ ऐसी प्रथाएं, परम्पराएं प्रचिलत होती हैं जो समाज की एकता तथा अखण्डता के विरुद्ध होती हैं जैसे भारत में 19वीं शताब्दी में सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह न होना तथा 20वीं शताब्दी में दहेज प्रथा इत्यादि। कई बार क्रान्ति का उद्देश्य ही समाज में से इन प्रथाओं को खत्म करना होता है। इस तरह समाज में फैली कुछ प्रथाएं विघटन को उत्पन्न करती हैं। वेश्यावृत्ति जुआ, शराब इत्यादि के कारण व्यक्ति की नैतिकता खत्म हो जाती है। उसको इनके बीच समाज की मान्यताओं, कद्रों-कीमतों, नैतिकता इत्यादि का ध्यान ही नहीं रहता। इस तरह इनसे धीरे-धीरे समाज में विघटन फैल जाता है। जब यह विघटन अपनी सीमाएं पार कर जाता है तो समाज में क्रान्ति आ जाती है। इस तरह बहुत-से सामाजिक कारण होते हैं जिनके कारण समाज में क्रान्ति आ जाती है।

2. मनोवैज्ञानिक कारण (Psychological causes)-कई बार मनोवैज्ञानिक कारण भी क्रान्ति का मुख्य कारण बनते हैं। कई बार व्यक्ति या व्यक्तियों की मौलिक इच्छाओं की पूर्ति नहीं होती। वह इन इच्छाओं को अपने अन्दर ही खत्म कर लेते हैं परन्तु इच्छा की एक विशेषता होती है कि यह कभी भी ख़त्म नहीं होती। यह व्यक्ति के मन में सुलगती हुई चिंगारी के जैसी सुलगती रहती है। कुछ समय बाद किसी के इस चिंगारी को हवा देने से यह आग की तरह जल पड़ती है तथा आग का रूप धारण कर लेती है। इस तरह यह दबी हुई इच्छाएं क्रान्ति को उत्पन्न करती हैं। । कुछ समाजशास्त्रियों का कहना है कि व्यक्तियों में आवेग इकट्ठे होते रहे हैं अर्थात् व्यक्ति की सभी इच्छाएं कभी भी सम्पूर्ण नहीं होती हैं। वे व्यक्ति के मन में इकट्ठी होती रहती हैं। समय के साथ ये आवेग बन जाती हैं। अंत में ये आवेग इकट्ठे हो कर क्रान्ति का कारण बनते हैं।

इनके अतिरिक्त व्यक्तियों के अन्दर कुछ दोष, कुछ समस्याएं अचेतन रूप में पैदा हो जाती हैं तथा समय आने पर यह दोष अपना प्रभाव दिखाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति में हिंसा की प्रवृत्ति होती है जो अचेतन रूप में ही व्यक्ति के मन के अन्दर पनपती रहती है। जब समय आता है तो यह हिंसा धमाके के साथ व्यक्ति में से निकलती है। जब क्रान्ति होती है तो लोग हिंसा पर उतर आते हैं। इस तरह व्यक्ति के अचेतन मन में भी क्रान्ति के कारण पैदा हो सकते हैं।

3. राजनीतिक कारण (Political Causes)-यदि हम इतिहास पर दृष्टि डालें तो हमें पता चलेगा कि साधारणतः सभी ही क्रान्तियों के कारण राजनीतिक रहे हैं तथा विशेषकर यह कारण वर्तमान राज्य की सत्ता के विरुद्ध होते हैं। बहुत बार राज्य की सत्ता इतनी ज्यादा निरंकुश हो जाती है कि अपनी मनमर्जी करने लग जाती है। वह लोगों की इच्छाओं का ध्यान भी नहीं रखती। आम जनता की इच्छाओं को दबा दिया जाता है। इच्छाओं के दबने के कारण जनता में असन्तोष फैल जाता है। धीरे-धीरे यह असन्तोष सम्पूर्ण समाज में फैल जाता है तथा यही असन्तोष समय आने से क्रान्ति बन जाता है।

इस तरह बहुत बार ऐसा होता है कि सरकारी अधिकारियों में भ्रष्टाचार फैल जाता है। वह अपने पद का फायदा अपनी जेबों को भरने में लगाते हैं तथा आम जनता की तकलीफों की तरफ कोई ध्यान नहीं देते हैं। आम जनता में उन सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध असन्तोष फैल जाता है तथा वह इन अधिकारियों को उनके पदों से उतारने की कोशिश करते हैं तथा यह प्रयास क्रान्ति का रूप धारण कर लेते हैं।

कई देशों में सरकार किसी विशेष धर्म पर आधारित होती है तथा उस धर्म के लोगों को विशेषाधिकार देती है। कई बार इस कारण और धर्मों के लोगों में असन्तोष पैदा हो जाता है जिस कारण लोग ऐसी सरकार से मुक्ति प्राप्त करने के बारे में सोचने लग जाते हैं। उन का यह सोचना ही क्रान्ति का रूप धारण कर लेता है। इसके साथ ही यदि सरकार आम जनता के रीति-रिवाजों, परम्पराओं में दखल देने लग जाए तो लोग अपनी परम्पराओं को बचाने की खातिर सरकार के विरुद्ध विद्रोह कर देते हैं। 1857 का विद्रोह इन्हीं कुछ कारणों पर आधारित था।

आजकल के समाज में लोकतन्त्र का युग है। लोकतन्त्र में एक दल सत्ता में होता है तथा दूसरा सत्ता से बाहर। जो दल सत्ता से बाहर होता है वह आम जनता को सत्ताधारी दल के विरुद्ध भड़काता है तथा कई बार यह भड़काना ही क्रान्ति का रूप धारण कर लेता है।

4. आर्थिक कारण (Economic Causes)-कई बार आर्थिक कारण भी क्रान्ति के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। मार्क्सवादी विचारधारा के अनुसार मनुष्यों के समाज का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है। मार्क्स के अनुसार हरेक समाज में दो वर्ग रहे हैं-पूँजीवादी वर्ग अर्थात् शोषक वर्ग तथा मजदूर वर्ग अर्थात् शोषित वर्ग। पूँजीपति वर्ग अपने पैसे तथा राजनीतिक सत्ता के बल पर हमेशा मजदूर वर्ग का शोषण करता आया है। इस शोषण के कारण मज़दूर वर्ग को दो समय का खाना भी मुश्किल से मिल पाता है। मज़दूरों तथा पूंजीपतियों में बहुत ज़्यादा आर्थिक अन्तर आ जाता है। शोषक अर्थात् पूँजीपति वर्ग ऐशो ईशरत का जीवन व्यतीत करता है तथा मजदूर वर्ग को मुश्किल से रोटी ही मिल पाती है। वह इस जीवन से छुटकारा पाना चाहता है। इस कारण धीरे-धीरे मज़दूर वर्ग में असन्तोष फैल जाता है जिस कारण वह क्रान्ति कर देते हैं तथा पूँजीपति वर्ग को उखाड़ देते हैं। इस तरह आर्थिक कारण भी लोगों को क्रान्ति के लिए मजबूर करते हैं।

इस तरह हम देखते हैं कि क्रान्ति एकदम होने वाली प्रक्रिया है जिससे समाज की संरचना तथा व्यवस्था एकदम ही बदल जाते हैं। क्रान्ति सिर्फ एक कारण के कारण नहीं होती बल्कि बहत-से कारणों की वजह से होती है। साधारणतः राजनीतिक कारण ही क्रान्ति के लिए ज़िम्मेदार होते हैं परन्तु और कारणों का भी इसमें महत्त्वपूर्ण हिस्सा होता है।

प्रश्न 4. सामाजिक विकास क्या होता है ? विस्तार सहित लिखो।
उत्तर-सामाजिक परिवर्तन के अनेक रूप होते हैं। जैसे क्रम-विकास, प्रगति, क्रान्ति, विकास आदि। इस प्रकार विकास भी परिवर्तन के अनेकों रूपों में से एक है। ये सभी प्रक्रियाएं आपस में इतनी जुड़ी होती हैं कि इन्हें अलग करना बहुत कठिन है।

आजकल के समय में विकास शब्द को आर्थिक विकास के लिए उपयोग किया जाता है। व्यक्ति की आमदनी में बढ़ोत्तरी, पूंजी में बढ़ोत्तरी, प्राकृतिक साधनों का उपयोग, उत्पादन में बढ़ोत्तरी, उद्योग में बढ़ोत्तरी आदि कुछ ऐसे संकल्प हैं, जिनके बढ़ने को पूरे विकास के लिए उपयोग किया जाता है। परन्तु केवल इन संकल्पों में अधिकता को ही हम विकास नहीं कह सकते। समाज में परम्पराएं, संस्थाएं, धर्म, संस्कृति इत्यादि भी होते हैं। इनमें भी विकास होता है। यदि सामाजिक सम्बन्धों में विस्तार होता है पुरानी सामाजिक संरचना, आदतें, कद्रों-कीमतों विचारों में भी परिवर्तन आदि में भी विकास होता है। व्यक्ति की स्वतन्त्रता, समूह की आमदनी, नैतिकता, सहयोग इत्यादि में भी अधिकता होती है। इस तरह आर्थिक विकास को ही सामाजिक विकास माना जाता है व इस आधार पर अलग-अलग आधारों को देखना आसान होता है।

बोटोमोर (Botomore) के अनुसार, “आधुनिक युग में विकास शब्द का उपयोग दो प्रकार के समाजों में अन्तर दर्शाने की नज़र से किया जाता है। एक ओर तो ऐसे औद्योगिक समाज हैं, व दूसरी ओर वह समाज हैं जो पूरी तरह ग्रामीण हैं व जिनकी आय काफ़ी कम है।”

हॉबहाऊस (Hobhouse) के अनुसार, “समुदाय का विकास उस समय माना जाता है, जब किसी वस्तु की । मात्रा, कार्य सामर्थ्य व सेवा की नज़दीकी में अधिकता होती है।”

चाहे इन परिभाषाओं में विकास शब्द के अस्पष्ट अर्थ दिए हैं, परन्तु समाज शास्त्र में विकास ऐसी स्थिति को दर्शाता है जिसमें मनुष्य अपने लगातार बढ़ते ज्ञान तथा तकनीकी कुशलता से प्राकृतिक वातावरण के ऊपर नियन्त्रण करता जाता है तथा सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ता जाता है। विकास की

विशेषताएं (Characteristics of Development)-

  • विकास एक सर्वव्यापक प्रक्रिया है, जो कि प्रत्येक समाज में व्याप्त है। विकास नाम की प्रक्रिया आधुनिक समाजों में भी चल रही है। आज का आधुनिक समाज, पुरातन काल में होने वाले विकास का ही परिणाम है। पुरातन समाज के विकास के परिणामस्वरूप ही आधुनिक समाज हमारे सामने है। ज़मींदारी समाज से औद्योगिक समाज में आना विकास के कारण ही सम्भव हुआ।
  • विकास में एक वस्तु एक स्थिति से दूसरी स्थिति में परिवर्तित हो जाती है। यह परिवर्तन सही या गलत भी हो सकता है। इसलिए कहते हैं कि मानवीय विकास का सम्बन्ध दिन-प्रतिदिन परिवर्तन करने से एक स्थिति से दूसरी स्थिति की तरफ़ बढ़ना है।
  • विकास में केवल अच्छाई नहीं होती है बल्कि बुराई भी हो सकती है। इस तरह विकास में बुराई एवं अच्छाई दोनों का अस्तित्व होता है।
  • विकास सरलता से जटिलता की तरफ़ बढ़ने की प्रक्रिया है। यदि किसी भी वस्तु का विकास होगा तो वह सरलता से जटिलता की तरफ़ बढ़ेगी। इस प्रकार विकास एक जटिल प्रक्रिया है।
  • विकास में एक बदली हुई रूपरेखा को बनाना पड़ता है। इसमें उन सभी साधनों का ध्यान रखना पड़ता है, जो विकास की प्रक्रिया में सहायता करते हैं। इसलिए रूप-रेखा के निर्माण के लिए विकास के कार्यक्रम को निर्धारित करना पड़ता है। यदि हम कार्यक्रम को निर्धारित नहीं करेंगे तो विकास उल्टी दिशा की तरफ़ जा सकता है।
  • विकास केवल आर्थिक विकास ही नहीं होता, बल्कि वह प्रत्येक पक्ष चाहे वह सामाजिक, राजनैतिक, नैतिक पक्ष हो, सभी में होता है।
  • विकास की प्रक्रिया ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें सामाजिक एवं लैंगिक परिवर्तनों की पूरी जानकारी होना आवश्यक है।
  • विकास करने की कोशिशें हमेशा चलती रहती हैं। परन्तु कई बार ऐसा भी होता है, इस प्रक्रिया के कारण समाज के विकास के साथ-साथ व्यक्तियों का अपना विकास यानि आत्मविकास भी हो जाता है।

सामाजिक विकास के मापदण्ड (Measurement of Development) – कई समाज शास्त्रियों ने सामाजिक विकास के कई मापदण्ड दिये हैं, इनका मिला-जुला रूप इस प्रकार का होगा-

  • जब कानून की नज़रों में लोगों की समानता या बराबरी हो तो यह विकास का प्रतीक होता है।
  • जब लोगों को पढ़ाने-लिखाने या अनपढ़ता दूर करने के लिए कोई आन्दोलन चलाया जाये, तो यह सांस्कृतिक विकास का मापदण्ड है।
  • जब देश के सभी बालिगों को वोट देने का अधिकार प्राप्त हो जाये और देश में लोकतन्त्र की स्थापना हो जाये तो यह विकास का सूचक है।
  • यदि स्त्रियों को समान अधिकार दिये जाएं, और सभी लोगों को समान समझा जाये तो यह सामाजिक विकास का ही सूचक है।
  • जब समाज में धन या पूंजी का समान बंटवारा हो, तो यह आर्थिक विकास का सूचक माना जाता है।
  • जब समूह या समुदाय के प्रत्येक सदस्य को अपने विचार प्रकट करने, और कोई भी कार्य करने का अधिकार प्राप्त हो तो यह सामाजिक स्वतन्त्रता का सूचक है।
  • जब लोगों में सेवा की भावना या सहयोग की भावना बढ़े, तो यह सामाजिक नैतिकता का सूचक है।

प्रश्न 5. प्रगति के बारे में आप क्या जानते हैं ? इसकी विशेषताओं का वर्णन करो।
उत्तर-प्रगति एक तरफ तो भौतिक विकास से सम्बन्धित है तथा दूसरी तरफ ज्ञान के नए विचारों से सम्बन्धित हैं। प्रगति अंग्रेजी भाषा के शब्द Progress का हिन्दी रूपान्तर है जोकि लातिनी भाषा के शब्द Progredior से लिया गया है। इस का अर्थ है आगे बढ़ना। प्रगति शब्द का अर्थ तुलनात्मक अर्थों में प्रयोग किया जाता है। जब हम यह कहते हैं कि परिवार आगे बढ़ रहा है तो इस बात का अर्थ हमें उस समय पता चलेगा जब हमें यह पता चलेगा कि वह किस दिशा में आगे बढ़ रहा है। यदि वह गरीबी से अमीरी की तरफ बढ़ रहा है तो इस की दिशा से हमें पता चलेगा कि यह परिवार प्रगति कर रहा है। यहां एक बात ध्यान देने योग्य है कि यदि हम किसी कि गिरावट देखें तो यह प्रगति नहीं होगी। उदाहरणत: जब एक अमीर व्यक्ति व्यापार में हानि हो जाने से गरीब हो जाता है तो उसे हम प्रगति नहीं कहेंगे। इसका कारण यह है कि प्रगति हमेशा किसी उद्देश्य की प्राप्ति से सम्बन्धित होती है। जब हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेते हैं तो हम कहते हैं कि हमने प्रगति की है। इस प्रकार इच्छुक उद्देश्यों को ही प्राप्ति को प्रगति का नाम दिया जाता है जैसे शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति, आर्थिक क्षेत्र में प्रगति इत्यादि।

इस तरह हम कह सकते हैं कि प्रगति परिवर्तन तो ज़रूर होता है परन्तु यह किसी भी दिशा की तरफ नहीं हो सकता। इस का अर्थ यह है कि इसके द्वारा परिवर्तन सिर्फ इच्छुक दिशा की तरफ पाया जाता है। अलग-अलग समाजशास्त्रियों ने प्रगति की परिभाषाएं दी हैं जिनका वर्णन इस प्रकार है-

(1) ग्रूवज़ तथा मूर (Groves and Moore) के अनुसार, “प्रगति स्वीकृत कीमतों के आधार पर इच्छुक दिशा की तरफ गतिशील होने को कहते हैं।” ___ (2) आगबर्न तथा निमकॉफ (Ogburm and Nimkoff) के अनुसार, “उन्नति का अर्थ भलाई के लिए होने वाला परिवर्तन है, जिसमें मूल निर्धारण का आवश्यक तत्त्व है।”
(3) पार्क तथा बर्जस (Park and Burges) के अनुसार, “वर्तमान वातावरण में कोई परिवर्तन या अनुकूलन जो किसी व्यक्ति, समूह, संस्था या जीवन के किसी और संगठित स्वरूप के लिए जीवित रहना ज्यादा आसान कर दे, प्रगति का प्रतिनिधित्व करता है।” ___ इस तरह इन विशेषताओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि प्रगति इच्छुक या स्वीकृत दिशा में पाया जाने वाला परिवर्तन होता है। इस परिवर्तन के बारे में हम पहले से ही अनुमान लगा सकते हैं।

प्रगति की विशेषताएं (Characteristics of Progress) –

1. प्रगति ऐच्छिक परिवर्तन होता है (Progress is desired change)-प्रगति ऐच्छिक परिवर्तन होता है क्योंकि हम जब चाहते हैं तो ही परिवर्तन लाया जा सकता है। इस परिवर्तन से समाज की भी प्रगति होती है। प्रगति में हमारा ऐच्छिक उद्देश्य कुछ भी हो सकता है तथा प्रगति द्वारा पाया गया परिवर्तन हमेशा लाभदायक होता है। वास्तव में हम कभी भी अपनी हानि करना नहीं चाहेंगे। इसलिए यह परिवर्तन समाज कल्याण के लिए होता है।

2. प्रगति तुलनात्मक होती है (Progress is comparative)—प्रत्येक समाज में प्रगति का अर्थ विभिन्नता वाला होता है। यदि एक समाज में हुई प्रगति से समाज का लाभ होता है तो यह आवश्यक नहीं है कि किसी दूसरे समाज को भी उसी तरह का ही लाभ प्राप्त होगा। वास्तव में प्रत्येक समाज के ऐच्छिक उद्देश्य अलग-अलग होते हैं क्योंकि प्रत्येक समाज की आवश्यकताएं अलग-अलग होती हैं। पहाड़ी इलाके के लोगों की आवश्यकताएं मैदानी इलाके की ज़रूरतों से अलग होती हैं। इस कारण इन के उद्देश्यों में भी भिन्नता पाई जाती है। इस तरह प्रगति का अर्थ तुलनात्मक अर्थों में प्रयोग किया जाता है। विभिन्न ऐतिहासिक कालों, स्थानों तथा इसको विभिन्न अर्थों में परिभाषित किया जाता है।

3. प्रगति परिवर्तनशील होती है (Progress is changeable)-प्रगति हमेशा अलग-अलग देशों तथा कालों से सम्बन्धित होती है परन्तु इस की धारणा हमेशा एक-सी ही नहीं रहती। इसका कारण यह है कि जिसको हम आजकल प्रगति का संकेत समझते हैं उसको दूसरे देशों में गिरावट का संकेत समझते हैं। इसका अर्थ यह है कि प्रगति हमेशा एक-सी ही नहीं रहती। यह समय, काल, देश, हालात इत्यादि के अनुसार बदलती रहती है। हो सकता है कि जो चीज़ पर प्राचीन समय में प्रगति का संकेत समझी जाती हो उसका आजकल कोई महत्त्व ही न हो। इस तरह प्रगति हमेशा परिवर्तनशील होती है तथा बदलती रहती है।

4. प्रगति सामूहिक होती है (Progress is concerned with group)-प्रगति कभी भी व्यक्तिगत नहीं होती। यदि समाज में कुछ व्यक्ति ऐच्छिक लक्ष्यों की प्राप्ति करते हैं तो ऐसी प्रक्रिया को प्रगति नहीं कहते। असल में प्रगति ऐसी धारणा है जिसमें बहुसंख्या में व्यक्ति के जीवन में पाया जाने वाला परिवर्तन प्रगति नहीं होता। इस तरह समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से जब सम्पूर्ण समूह किसी भी ऐच्छिक दिशा की तरफ आगे बढ़ता है तो उसे प्रगति कहते हैं।

5. प्रगति में लाभ की प्राप्ति ज्यादा होती है (More advantages are there in progress)-प्रगति में चाहे हम फायदा या हानि दोनों को ही देख सकते हैं परन्तु इसमें ज्यादातर लाभ की प्राप्ति होती है। यदि नुकसान की मात्रा अधिक हो तो उस को हम प्रगति नहीं कहते। उदाहरणत: जब हम सती प्रथा की बुराई को समाज में से खत्म करना चाहते थे तो हमें नुकसान उठाना पड़ा क्योंकि लोग इस प्रथा को खत्म नहीं करना चाहते थे। परन्तु सरकार ने ज़ोर लगाकर लोगों के आन्दोलन का मुकाबला करके इस बुराई को खत्म करने की पूरी कोशिश की। सरकार ने यह मुकाबला सामाजिक प्रगति को प्राप्त करने के लिए ही किया।

6. प्रगति में चेतन प्रयास होते हैं (Conscious efforts are there in progress)-प्रगति अपने आप नहीं पायी जाती बल्कि व्यक्ति प्रगति प्राप्त करने के लिए चेतन अवस्था में प्रयास करता है। इस कारण वह निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति कर लेता है। जैसे भारत में जनसंख्या की दर को कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं ताकि देश प्रगति कर सके। यह सभी प्रयास चेतन अवस्था में ही किए जा रहे हैं। इनमें निर्धारित लक्ष्य होता है। उनको प्राप्त करने के लिए हम प्रत्येक तरह से प्रयास करते हैं। प्रगति की सफलता परिश्रम के ऊपर निर्भर करती है। इसमें कोई आन्तरिक गुण नहीं होते। जब हम परिश्रम करके सफलता प्राप्त कर लेते हैं तो हम कह सकते हैं कि प्रगति हुई है।

प्रगति में सहायक दशाएं (Conditions Conducive to Social Progress) –

बोगार्डस ने प्रगति के निम्नलिखित आधार बताए हैं-

  1. स्वस्थ वातावरण का बढ़ना।
  2. ज्यादा से ज्यादा लोगों का मानसिक तथा शारीरिक अरोग्य होना।
  3. सामूहिक कल्याण के लिए प्राकृतिक साधनों का ज्यादा प्रयोग।
  4. मनोरंजन तथा सेहत के साधनों में बढ़ोत्तरी।
  5. पारिवारिक इकट्ठ की मात्रा में बढ़ोत्तरी।
  6. रचनात्मक कार्यों में लगे व्यक्तियों को ज्यादा सुविधाएं।
  7. व्यापार तथा उद्योग में बढोत्तरी।
  8. सरकारी जीवन में बढ़ोत्तरी।
  9. ज्यादातर व्यक्तियों के जीवन स्तर में उन्नति।
  10. विभिन्न कलाओं का प्रसार।
  11. पेशेवर शिक्षा का प्रसार।
  12. जीवन के आध्यात्मिक पक्ष का विकास।

प्रत्येक परिवर्तन को हम प्रगति नहीं कह सकते। केवल विशेष दिशा में होने वाला परिवर्तन ही प्रगति होता है। वास्तव में प्रगति में सहायक दशाओं में भी परिवर्तन आते रहते हैं क्योंकि प्रत्येक समाज की समस्याएं समय के साथ-साथ बदलती रहती हैं। जैसे जब एक आदमी तथा औरत का विवाह होता है तो उनकी इच्छाएं सीमित होती हैं तथा वह उनको प्राप्त करने में व्यस्त हो जाते हैं। जब बच्चे पैदा हो जाते हैं तो वह नई समस्याओं का सामना करने को जुट जाते हैं। इस तरह प्रगति की सहायक दशाएं निश्चित नहीं होतीं। कुछ एक सहायक दशाओं का वर्णन निम्नलिखित है-

  • प्रगति के लिए समाज के सभी सदस्यों को समान मौके प्राप्त होने चाहिएं। यदि हम समाज के सदस्यों के साथ किसी भी आधार पर भेदभाव करेंगे तो प्रगति की जगह समाज में संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है।
  • प्रगति के लिए जनसंख्या भी सीमित होनी चाहिए क्योंकि ज्यादा जनसंख्या के साथ जितनी मर्जी कोशिश की जाए तो भी हम उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफलता हासिल नहीं कर सकते।
  • सामाजिक प्रगति के लिए शिक्षा का प्रसार भी सहायक होता है क्योंकि यदि समाज में साक्षर लोगों की संख्या ज्यादा होगी तो वह प्रगति को जल्दी अपनाएंगे। इसलिए शिक्षा के प्रसार को बढ़ाना ज़रूरी होता है।
  • स्वस्थ व्यक्तियों का होना भी प्रगति के लिए सहायक होता है क्योंकि अगर व्यक्ति शारीरिक तथा मानसिक पक्ष से स्वस्थ होंगे तो चेतन प्रयत्नों के साथ वह समाज के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पूरा जोर लगाएंगे। स्वस्थ व्यक्तियों के लिए उनकी ज़रूरतों का पूरा होना भी ज़रूरी होता है क्योंकि गरीबी, बेरोज़गारी इत्यादि के समय प्रगति करना मुश्किल होता है।

समाज में यदि शान्तमयी वातावरण होगा तो समाज ज्यादा प्रगति करेगा क्योंकि प्रगति के रास्ते में कोई रुकावट नहीं आएगी। तकनीकी तथा औद्योगिक उन्नति का होना भी प्रगति के लिए जरूरी होता है। व्यक्तियों में आत्म विश्वास भी प्रगति के लिए ज़रूरी होता है। हाबहाऊस ने जनसंख्या, कार्य कुशलता, स्वतन्त्रता तथा आपसी सेवा की भावना को सामाजिक प्रगति का आधार बताया है।

Class 11 Sociology Solutions Chapter 11 सामाजिक परिवर्तन

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (Textual Questions)

I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1-15 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. सामाजिक परिवर्तन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर-सामाजिक संबंधों में कई प्रकार के परिवर्तन आते रहते हैं तथा इसे ही सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।

प्रश्न 2. सामाजिक परिवर्तन के मूल स्त्रोतों के नाम लिखिए।
उत्तर-सामाजिक परिवर्तन के तीन मूल स्रोत हैं-Innovation, Discovery and Diffusion.

प्रश्न 3. सामाजिक परिवर्तन की दो विशेषताएं बताइए।
उत्तर-

  1. सामाजिक परिवर्तन सर्वव्यापक प्रक्रिया है जो प्रत्येक समाज में आता है।
  2. सामाजिक परिवर्तन में तुलना आवश्यक है।

प्रश्न 4. आन्तरिक परिवर्तन क्या है ?
उत्तर-वह परिवर्तन जो समाज के अन्दर ही विकसित होते हैं, आन्तरिक परिवर्तन होते हैं।

प्रश्न 5. सामाजिक परिवर्तन के लिए जिम्मेदार कुछ कारकों के नाम लिखो।
उत्तर-प्राकृतिक कारक, विश्वास तथा मूल्य, समाज सुधारक, जनसंख्यात्मक कारक, तकनीकी कारक, शैक्षिक कारक इत्यादि।

प्रश्न 6. प्रगति क्या है ?
उत्तर-जब हम अपने किसी ऐच्छिक उद्देश्य की प्राप्ति के रास्ते की तरफ बढ़ते हैं तो इस परिवर्तन को प्रगति कहते हैं।

प्रश्न 7. नियोजित परिवर्तन के उदाहरण लिखो।
उत्तर-लोगों को पढ़ाना लिखाना, ट्रेनिंग देना नियोजित परिवर्तन की उदाहरण हैं।

प्रश्न 8. अनियोजित परिवर्तन के दो उदाहरण लिखो।
उत्तर–प्राकृतिक आपदा जैसे कि बाढ़, भूकम्प इत्यादि से समाज पूर्णतया बदल जाता है।

II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30-35 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. सामाजिक परिवर्तन का अर्थ बताइए।
उत्तर-जब समाज के अलग-अलग भागों में परिवर्तन आए तथा वह परिवर्तन अगर सभी नहीं तो समाज के अधिकतर लोगों के जीवन को प्रभावित करे तो उसे सामाजिक परिवर्तन कहा जाता है। इसका अर्थ है कि समाज के लोगों के जीवन जीने के तरीकों में संरचनात्मक परिवर्तन आ जाता है।

प्रश्न 2. प्रसार (Diffusion) क्या है ?
उत्तर-प्रसार का अर्थ है किसी वस्तु को बहुत अधिक फैलाना। उदाहरण के लिए जब सांस्कृतिक विचार एक समूह से दूसरे समूह तक फैल जाते हैं तो इसे प्रसार कहा जाता है। सभी समाजों में सामाजिक परिवर्तन आमतौर पर प्रसार के कारण ही आता है।

प्रश्न 3. उद्भव तथा क्रान्ति को संक्षिप्त रूप में लिखो।
उत्तर-

  • उद्भव-जब परिवर्तन एक निश्चित दिशा में हो तथा तथ्य के गुणों तथा रचना में परिवर्तन हो तो उसे उद्भव कहते हैं।
  • क्रान्ति-वह परिवर्तन जो अचनचेत तथा अचानक हो जाए, क्रान्ति होता है। इससे मौजूदा व्यवस्था खत्म हो जाती है तथा नई व्यवस्था कायम हो जाती है।

प्रश्न 4. तीन मुख्य तरीकों की सूची बनाएं जिसमें सामाजिक परिवर्तन होता है।
उत्तर-समाज में तीन मूल चीजों में परिवर्तन से परिवर्तन आता है-

  1. समूह का व्यवहार
  2. सामाजिक संरचना
  3. सांस्कृतिक गुण।

प्रश्न 5. वह तीन स्त्रोत क्या हैं जिनसे परिवर्तन आता है ?
उत्तर-

  1. Innovation मौजूदा वस्तुओं की सहायता से कुछ नया तैयार करना Innovation होता है। इसमें मौजूदा तकनीकों का प्रयोग करके नई तकनीक का इजाद किया जाता है।
  2. Discovery-इसका अर्थ है कुछ नया पहली बार सामने आना या सीखना। इसका अर्थ है कुछ नया इजाद जिसके बारे में हमें कुछ पता नहीं है।
  3. Diffusion-इसका अर्थ है किसी वस्तु का फैलना। जैसे सांस्कृतिक विचारक समूह से दूसरे तक फैल जाना फैलाव होता है।

प्रश्न 6. सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिवर्तन के मध्य संक्षिप्त रूप में अन्तर कीजिए।
उत्तर-

  • सामाजिक परिवर्तन चेतन या अचेतन रूप में आ सकता है परन्तु सांस्कृतिक परिवर्तन हमेशा चेतन रूप से आता है।
  • सामाजिक परिवर्तन वह परिवर्तन है जो केवल सामाजिक संबंधों में आता है परन्तु सांस्कृतिक परिवर्तन वह परिवर्तन है जो धर्म, विचारों, मूल्यों, विज्ञान इत्यादि में आता है।

III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 75-85 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. सामाजिक परिवर्तन के मुख्य प्रकार क्या हैं ? संक्षिप्त रूप में इन पर विचार-विमर्श करें।
उत्तर-उद्विकास, प्रगति, विकास तथा क्रान्ति सामाजिक परिवर्तन के मुख्य प्रकार हैं। जब परिवर्तन आन्तरिक तौर पर क्रमवार, धीरे-धीरे हों तथा सामाजिक संस्थाएं साधारण से जटिल हो जाएं तो वह उद्विकास होता है। जब किसी चीज़ में परिवर्तन आए तथा यह किसी ऐच्छिक दिशा में आए तो इसे विकास कहते हैं। जब लोग किसी निश्चित उद्देश्य को प्राप्त करने के रास्ते की तरफ बढ़े तथा उद्देश्य को प्राप्त कर लें तो इसे प्रगति कहते हैं। जब परिवर्तन अचनचेत तथा अचानक आए व मौजूदा व्यवस्था बदल जाए तो इसे क्रान्ति कहते हैं।

प्रश्न 2. सामाजिक परिवर्तन के जनसंख्यात्मक परिवर्तन का संक्षिप्त रूप वर्णन करो।
उत्तर-जनसंख्यात्मक परिवर्तन का भी सामाजिक परिवर्तन पर प्रभाव पड़ता है। सामाजिक संगठन, परम्पराएं, संस्थाएं, प्रथाएं इत्यादि के ऊपर जनसंख्यात्मक कारकों का प्रभाव पड़ता है। जनसंख्या का घटना-बढ़ना, स्त्री-पुरुष अनुपात में आए परिवर्तन का सामाजिक संबंधों पर प्रभाव पड़ता है। जनसंख्या में आया परिवर्तन समाज की आर्थिक प्रगति में रुकावट का कारण भी बनता है तथा कई प्रकार की सामाजिक समस्याओं का कारण बनता है। बढ़ रही जनसंख्या, बेरोज़गारी, भुखमरी की स्थिति उत्पन्न करती है जिससे समाज में अशांति, भ्रष्टाचार इत्यादि बढ़ता है।

प्रश्न 3. सामाजिक परिवर्तन के लिए ज़िम्मेदार चार कारकों को लिखो।
उत्तर-

  • प्राकृतिक कारक-प्राकृतिक कारक जैसे कि बाढ़, भूकम्प इत्यादि के कारण समाज में परिवर्तन आ जाता है तथा इसका स्वरूप ही बदल जाता है।
  • जनसंख्यात्मक कारक-जनसंख्या के घटने-बढ़ने से स्त्री और पुरुष के अनुपात के घटने-बढ़ने से भी सामाजिक परिवर्तन आ जाता है।
  • तकनीकी कारक-समाज में अगर मौजूदा तकनीकों में अगर काफ़ी अधिक परिवर्तन आ जाए तो भी सामाजिक परिवर्तन आ जाता है।
  • शिक्षात्मक कारक-जब समाज की अधिकतर जनसंख्या शिक्षा ग्रहण करने लग जाए तो भी सामाजिक परिवर्तन आना शुरू हो जाता है।

प्रश्न 4. शैक्षिक कारक तथा तकनीकी कारक के मध्य कुछ अंतरों को दर्शाइए।
उत्तर-

  • शैक्षिक कारक तकनीकी कारक का कारण बन सकते हैं परन्तु तकनीकी कारकों के कारण शैक्षिक कारक प्रभावित नहीं होता।
  • शिक्षा के बढ़ने के साथ जनता का प्रत्येक सदस्य प्रभावित हो सकता है परन्तु तकनीकी कारकों का जनता पर प्रभाव धीरे-धीरे पड़ता है। (iii) शिक्षा से नियोजित परिवर्तन लाया जा सकता है परन्तु तकनीकी कारकों की वजह से नियोजित तथा अनियोजित परिवर्तन दोनों आ सकते हैं।

IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 250-300 शब्दों में दें :

प्रश्न 1. सामाजिक परिवर्तन को परिभाषित कीजिए । इसकी विशेषताओं पर विस्तृत रूप से विचार विमर्श करें।
उत्तर-सामाजिक परिवर्तन का अर्थ (Meaning of Social Change)-परिवर्तन शब्द एक मूल्य रहित शब्द है। यह हमें अच्छे-बुरे या किसी नियम के बारे में नहीं बताता है। आम भाषा में परिवर्तन वह अन्तर होता है जो किसी वस्तु की वर्तमान स्थिति में व पिछली स्थिति में होता है। जैसे आज किसी के पास पैसा है कल नहीं था। पैसे से उसकी स्थिति में परिवर्तन आया है। परिवर्तन में तुलना अनिवार्य है क्योंकि यदि हमें किसी परिवर्तन को स्पष्ट करना है तो वह तुलना करके स्पष्ट किया जा सकता है। इस तरह सामाजिक परिवर्तन समाज से सम्बन्धित होता है। जब समाज या सामाजिक सम्बन्धों में परिवर्तन आता है तो उसको सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।

मानवीय समाज में मिलने वाले प्रत्येक तरह के परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन नहीं होते। सामाजिक परिवर्तन का सम्बन्ध सामाजिक सम्बन्धों में मिलने वाले परिवर्तनों से है। इन सामाजिक सम्बन्धों में हम समाज के भिन्न-भिन्न भागों में पाए गए सम्बन्ध व आपसी क्रियाओं को शामिल करते हैं। परिवर्तन के अर्थ असल में किसी भी चीज़ में उसके पिछले व वर्तमान आकार से तुलना करें तो हमें कुछ अन्तर नज़र आने लगता है। यह पाया गया अन्तर ही सामाजिक परिवर्तन होता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सामाजिक परिवर्तन सामाजिक क्रियाओं, आकार, सम्बन्धों, संगठनों आदि में पाए जाने वाले अन्तर से सम्बन्धित होता है। मानव स्वभाव द्वारा ही परिवर्तनशील प्रकृति वाला होता है। इसी कारण कोई समाज स्थिर नहीं रह सकता।

परिभाषाएं (Definitions) –

  • गिलिन व गिलिन (Gillin & Gillin) के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन जीवन के प्रचलित तरीकों में पाए गए अन्तर को कहते हैं, चाहे यह परिवर्तन भौगोलिक स्थिति के परिवर्तन से हों या सांस्कृतिक साधनों, जनसंख्या के आकार या विचारधाराओं के परिवर्तन से व चाहे प्रसार द्वारा सम्भव हो सकते हों या समूह में हुई नई खोजों के परिणामस्वरूप हों।”
  • किंगस्ले डेविस (Kingsley Davis) के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन का अर्थ केवल उन परिवर्तनों से है जो सामाजिक संगठन भाव सामाजिक संरचना व कार्यों में होते हैं।”
  • जोंस (Jones) के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन वह शब्द है जिस को हम सामाजिक प्रक्रियाओं, सामाजिक तरीकों, सामाजिक अन्तक्रियाओं या सामाजिक संगठन इत्यादि में पाए गए परिवर्तनों के वर्णन करने के लिए हैं।”

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि सभी समाजशास्त्रियों ने सामाजिक अन्तक्रियाओं, सामाजिक संगठन, सामाजिक सम्बन्धों, सामाजिक प्रक्रियाओं इत्यादि में किसी एक पक्ष में जब कोई भी भिन्नता या अन्तर पैदा होता है तो वह सामाजिक परिवर्तन कहलाता है। इस प्रकार हम यह भी कहते हैं कि प्रत्येक परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन नहीं होता। सामाजिक परिवर्तन समाज के सामाजिक सम्बन्धों या संगठनों या क्रियाओं में पाया जाता है।

सामाजिक परिवर्तन की प्रकृति या विशेषताएँ (Nature or Characteristics of Social Change) –

1. सामाजिक परिवर्तन सर्वव्यापक होता है (Social Change is Universal)—सामाजिक परिवर्तन ऐसा परिवर्तन है जो सभी समाज में पाया जाता है। कोई भी समाज पूरी तरह स्थिर नहीं होता क्योंकि परिवर्तन प्रकृति का नियम होता है। चाहे कोई समाज आदिम हो या चाहे आधुनिक, परिवर्तन प्रत्येक समाज से सम्बन्धित रहा है। समाज में जनसंख्यात्मक परिवर्तन, अनुसन्धान व खोजों के कारण परिवर्तन, आदर्शों व कद्रों-कीमतों में परिवर्तन हमेशा आते रहते हैं। यह ठीक है कि सामाजिक परिवर्तन की गति प्रत्येक समाज में अलग-अलग होती है परन्तु परिवर्तन हमेशा सर्वव्यापक ही होता है।

2. सामाजिक परिवर्तन में निश्चित भविष्यवाणी नहीं हो सकती (Definite prediction is not possible in Social Change) सामाजिक परिवर्तन में किसी प्रकार की भी निश्चित भविष्यवाणी करनी असम्भव होती है। इसका कारण यह है कि समाज में पाए गए सामाजिक सम्बन्धों में कोई भी निश्चितता नहीं होती। इनमें परिवर्तन होता रहता है। सामाजिक परिवर्तन समुदायक परिवर्तन होता है। इस का अर्थ यह नहीं है कि सामाजिक परिवर्तन का कोई नियम नहीं होता या हम इसके बारे में कोई अनुमान नहीं लगा सकते। इस का अर्थ सिर्फ इतना है कि कई बार किसी कारण एकदम परिवर्तन हो जाता है जिनके बारे में हमने सोचा भी नहीं होता।

3. सामाजिक परिवर्तन की गति एक समान नहीं होती (Speed of Social Change is not uniform)सामाजिक परिवर्तन चाहे सर्वव्यापक होता है परन्तु उसकी गति भिन्न-भिन्न समाज में भिन्न-भिन्न होती है। किसी समाज में यह बहुत तेजी से पाई जाती है व किसी समाज में इसकी रफतार बहुत धीमी होती है। उदाहरणत: यदि हम प्राचीन समाज व आधुनिक समाज की तुलना करें तो हम क्या देखते हैं कि आधुनिक समाज में इसकी रफ्तार, प्राचीन समाज की तुलना बहुत ही तेज़ होती है।

4. सामाजिक परिवर्तन सामुदायिक परिवर्तन होता है (Social Change is Community Change)जब भी समाज में हम परिवर्तन अकेले व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों के जीवन में देखें तो इस प्रकार का परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन नहीं कहलाता क्योंकि सामाजिक परिवर्तन व्यक्तिगत नहीं होता। यह वह परिवर्तन होता है जो विशाल समुदाय में रहते हुए व्यक्तियों के जीवन जीने के तरीके (Life Patterns) में आता है। इस विवरण के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि समाज में जिस परिवर्तन के आने से एक व्यक्ति या कुछ लोग ही परिवर्तित हों तो वह व्यक्तिगत परिवर्तन कहलाता है तथा जिस परिवर्तन के आने से सम्पूर्ण समुदाय प्रभावित हो ऐसे परिवर्तन को ही हम सामाजिक परिवर्तन कहते हैं। इसी कारण ही यह व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक होता है।

5. सामाजिक परिवर्तन कई कारणों की अन्तक्रिया के परिणामस्वरूप होता है (Social Change Results from Interactions of number of Factors) सामाजिक परिवर्तन में पाए जाने वाले कारकों में कोई भी एक कारक उत्तरदायी नहीं होता। हमारा समाज उलझी हुई प्रकृति का है। इसके प्रत्येक क्षेत्र में किसी-न-किसी कारण परिवर्तन होता रहता है। साधारणतः हम देखते हैं कि समाज में अधिक प्रगति, तकनीकी क्षेत्र में विकास, वातावरण में परिवर्तन या जनसंख्या इत्यादि में परिवर्तन होता ही रहता है। चाहे यह ठीक है कि एक विशेष कारक का प्रभाव भी परिवर्तन के लिए उत्तरदायी होता है परन्तु उस अकेले कारक के ऊपर ही दूसरे कारकों का प्रभाव होता है या वह उससे जुड़े होते हैं। वास्तव में सामाजिक प्रकटन में आपसी निर्भरता पाई जाती है।

6. सामाजिक परिवर्तन प्रकृति का नियम होता है (Change is law of nature)-सामाजिक परिवर्तन का पाया जाना प्रकृति का नियम है। यदि हम न भी चाहें परिवर्तन तो भी समाज में होना ही होता है। प्राकृतिक शक्तियां जिन पर हम पूरी तरह नियन्त्रण नहीं रख सकते यह परिवर्तन अपने आप ही ले आती है। मानव स्वभाव द्वारा ही परिवर्तनशील होता है। समाज में परिवर्तन या तो प्राकृतिक शक्तियों से आता है या फिर व्यक्ति के योजनाबद्ध तरीकों के द्वारा। समाज में व्यक्तियों की आवश्यकताएं, इच्छाएँ इत्यादि परिवर्तित होती रहती हैं। हम हमेशा नई वस्तु की इच्छा करते रहते हैं व उसको प्राप्त करने के लिए यत्न करने शुरू कर देते हैं इसलिए व्यक्ति की परिवर्तनशील प्रकृति भी सामाजिक परिवर्तन के लिए उत्तरदायी होती है। इस प्रकार जैसे-जैसे व्यक्ति को किसी चीज़ की ज़रूरत पैदा होती है उसी तरह परिवर्तन आना शुरू हो जाता है। इस तरह परिवर्तन प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा भी होती है।

7. सामाजिक परिवर्तन की रफ़्तार में एकरूपता नहीं होती (Social Change is not Uniform)-चाहे हम देखते हैं परिवर्तन सब समाजों में पाया जाता है परन्तु इसकी रफ़्तार समाज में एक जैसी नहीं होती। कुछ समाजों में इसकी रफ़्तार बहुत तेज़ होती है व कुछ में बहुत ही धीमी। जो व्यक्ति जिस समाज में रह रहा होता है उसको उस समाज में हो रहे परिवर्तन की जानकारी होती है। पहले परिवर्तन कैसा था व अब इसकी गति किस प्रकार की है। यदि हम आधुनिक समय में नज़र डालें तो भी हम देखते हैं कि परिवर्तन की गति कुछ क्षेत्रों में बहुत तेज़ है व कुछ में बहुत धीमी। जैसे छोटे शहरों में बड़े शहरों की तुलना में परिवर्तन की गति बहुत ही धीमी पाई गई है।

प्रश्न 2. सामाजिक परिवर्तन के स्त्रोतों को विस्तृत रूप में दर्शाइए।
उत्तर-सामाजिक परिवर्तन के स्रोतों के बारे में डब्ल्यू० जी० आगबर्न (W.G. Ogburn) ने विस्तार सहित वर्णन किया है। आगबर्न के अनुसार सामाजिक परिवर्तन मुख्य रूप से निम्नलिखित तीन स्रोतों में से एक अधिक स्रोतों के अनुसार आता है तथा वे तीन स्रोत हैं

(i) Innovation
(ii) Discovery
(iii) प्रसार Diffusion

(i) Innovation-Innovation का अर्थ है मौजूदा तत्त्वों का प्रयोग करके कुछ नया तैयार करना। उदाहरण के लिए पुरानी कार की तकनीक का प्रयोग करके कार की नई तकनीक तैयार करके उसके तेज़ भागने की तकनीक ढूंढ़ना तथा उसके ईंधन की खपत को कम करने के तरीके ढूंढ़ना। Innovation भौतिक (तकनीकी) भी हो सकती है तथा सामाजिक भी। यह रूप (Form) में कार्य (Function) में, अर्थ (Meaning) अथवा सिद्धान्त (Principle) में भी परिवर्तन हो सकता है। नए आविष्कारों के साथ सामाजिक संरचना में भी परिवर्तन आ जाते हैं जिस कारण सम्पूर्ण समाज ही बदल जाता है।

(ii) Discovery-जब किसी वस्तु को पहली बार ढूंढ़ा जाता है अथवा किसी वस्तु के बारे में पहली बार पता चलता है तो इसे Discovery कहा जाता है। उदाहरण के लिए पहली बार किसी ने कार बनाई होगी अथवा स्कूटर बनाया होगा अथवा किसी वैज्ञानिक ने कोई नया पौधा ढूंढ़ा होगा। इसे हम Discovery का नाम दे सकते हैं। इसका अर्थ है कि वस्तुएं तो संसार में पहले से ही मौजूद हैं परन्तु हमें उनके बारे में कुछ पता नहीं है। इससे संस्कृति में काफ़ी कुछ जुड़ जाता है। चाहे इसे बनाने वाली वस्तुएं पहले ही संसार में मौजूद थीं परन्तु इसके सामने आने के पश्चात् यह हमारी संस्कृति का हिस्सा बन गईं। परन्तु यह सामाजिक परिवर्तन का कारक उस समय बनता है जब इसे प्रयोग में लाया जाता है न कि जब इसके बारे में पता चलता है। सामाजिक तथा सांस्कृतिक स्थितियाँ Discovery के सामर्थ्य को बढ़ा या फिर घटा देते हैं।

(iii) प्रसार Diffusion-फैलाव का अर्थ है किसी वस्तु का अधिक-से-अधिक फैलना। उदाहरण के लिए जब एक समूह के सांस्कृतिक विचार दूसरे समूह तक फैल जाते हैं तो इसे फैलाव कहा जाता है। लगभग सभी समाजों में सामाजिक परिवर्तन फैलाव के कारण आता है। यह समाज के बीच तथा समाजों के बीच कार्य करता है। जब समाजों के बीच संबंध बनते हैं तो फैलाव होता है। यह द्वि-पक्षीय प्रक्रिया है। फैलाव के कारण जब एक संस्कृति के तत्व दूसरे समाज में जाते हैं तो उसमें परिवर्तन आ जाते हैं तथा फिर दूसरी संस्कृति उन्हें अपना लेती है। उदाहरण के लिए इंग्लैंड की अंग्रेज़ी तथा भारतीयों की अंग्रेज़ी में काफी अंतर होता है। जब भारत पर अंग्रेजों का कब्जा था तो ब्रिटिश तत्व भारतीय संस्कृति में मिल गए परन्तु उनके सभी तत्वों को भारतीयों ने नहीं अपनाया था। इस प्रकार फैलाव होते समय तत्वों में परिवर्तन भी आ जाता है।

प्रश्न 3. सामाजिक परिवर्तन को प्रभावित करने वाले कारक लिखो।
उत्तर-1. भौतिक वातावरण (Physical Environment)- भौतिक वातावरण में उन प्रक्रियाओं द्वारा परिवर्तन होते हैं जिन के ऊपर मनुष्यों का कोई नियन्त्रण नहीं होता। इन परिवर्तनों की वजह से मनुष्य के लिए नई दिशाएं पैदा होती हैं जो मनुष्यों की संस्कृति को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। भौगोलिक वातावरण में वह सभी निर्जीव घटनाएं आती हैं जो किसी-न-किसी तरीके से सामाजिक जीवन को प्रभावित करती हैं। मौसम में परिवर्तन जैसे वर्षा, गर्मी, सर्दी ऋतु का बदलना, भूचाल, बिजली का गिरना, टोपोग्राफी सम्बन्धी परिवर्तन जैसे मिट्टी में खनिज पदार्थों का होना, नहरों का होना, चट्टानों का होना इत्यादि गहरे रूप से सामाजिक जीवन को प्रभावित करते हैं। भौतिक परिवर्तन व्यक्ति के शरीर की कार्य करने की योग्यता को प्रभावित करते हैं। व्यक्ति का व्यवहार गर्मी तथा सर्दी के दिनों में अलग-अलग होता है। मौसम के बदलने से शरीर के कार्य करने के तरीके में फर्क पड़ता है। सर्दी में लोग तेज़ी से कार्य करते हैं। गर्मी में लोगों को ज़्यादा गुस्सा आता है।

व्यक्ति उन भौगोलिक हालातों में रहना पसन्द करते हैं जहां जीवन आसानी से व्यतीत हो सके। व्यक्ति वहां रहना पसंद नहीं करता जहां प्राकृतिक आपदाएं जैसे कि बाढ़, भूकम्प इत्यादि हमेशा आते रहते हों। इसके विपरीत व्यक्ति वहां रहने लगते हैं जहां जीवन जीने की सभी सुविधाएं उपलब्ध हों। भौगोलिक वातावरण में परिवर्तनों के कारण जनसंख्या का सन्तुलन बिगड़ जाता है जिस कारण कई समस्याएं पैदा हो जाती हैं। भौगोलिक वातावरण संस्कृति को भी प्रभावित करता है। जहां भूमि उपजाऊ होगी, वहां लोग ज्यादातर कृषि करेंगे तथा समुद्र के नजदीक रहने वाले लोग मछलियां पकड़ेंगे।

2. जैविक कारक (Biological Factor)-कई समाज शास्त्रियों के अनुसार जीव वैज्ञानिक कारक सामाजिक परिवर्तन का महत्त्वपूर्ण कारक है। जीव वैज्ञानिक कारक सामाजिक परिवर्तन का महत्त्वपूर्ण कारक है। जैविक कारक का अर्थ है जनसंख्या के वह गुणात्मक पक्ष जो वंश परम्परा (Heredity) के कारण पैदा होते हैं। जैसे मनुष्य का लिंग जन्म के समय ही निश्चित हो जाता है तथा इस आधार पर ही आदमी तथा औरतों के बीच अलग-अलग शारीरिक अन्तर मिलते हैं। इस अन्तर के कारण उनका सामाजिक व्यवहार भी अलग होता है। औरतें घर को संभालती हैं, बच्चे पालती हैं जबकि आदमी पैसे कमाने का कार्य करता है। यदि किसी समाज में आदमी तथा औरतों में समान अनुपात नहीं होता तो कई सामाजिक मुश्किलें पैदा हो जाती हैं।

शारीरिक लक्षण पैतृकता द्वारा निश्चित होते हैं तथा यह लक्षण समानता तथा अन्तरों को पैदा करते हैं जैसे कोई गोरा है या काला है। अमेरिका में यह गोरे-काले का अन्तर ईर्ष्या का कारण होता है। गोरी स्त्री को सुन्दर समझते हैं तथा काली स्त्री को वह सम्मान नहीं मिलता जो गोरी स्त्री को मिलता है। व्यक्ति का स्वभाव भी पैतृकता के लक्षणों से सम्बन्धित होता है। बच्चे का स्वभाव माता-पिता के स्वभाव के अनुसार होता है। व्यक्तियों में ज्यादा या कम गुस्सा होता है। ग्रन्थियों में दोष व्यक्तियों में सन्तुलन स्थापित करने नहीं देता। पैतृकता तथा बुद्धि का सम्बन्ध भी माना जाता है। मनुष्य का स्वभाव तथा दिमाग सामाजिक जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि मनुष्य को विरासत में मिले गुण उसके व्यक्तिगत गुणों को निर्धारित करते हैं। यह गुण मनुष्य की अन्तक्रियाओं को प्रभावित करते हैं। अन्तक्रियाओं के कारण मानवीय सम्बन्ध पैदा होते हैं जिन के आधार पर सामाजिक व्यवस्था तथा संरचना निर्धारित होती है। यदि इनमें कोई परिवर्तन होता है तो वह सामाजिक परिवर्तन होता है।

3. जनसंख्यात्मक कारक (Demographic Factor)-जनसंख्या की बनावट आकार, वितरण इत्यादि भी सामाजिक संगठन पर प्रभाव डालते हैं। जिन देशों की जनसंख्या ज्यादा होती है वहां कई प्रकार की सामाजिक समस्याएं जैसे कि निर्धनता, अनपढ़ता, बेरोज़गारी, निम्न जीवन स्तर इत्यादि पैदा हो जाती हैं। जैसे भारत तथा चीन में ज़्यादा जनसंख्या के कारण कई प्रकार की समस्याएं तथा निम्न जीवन स्तर पाया जाता है। वह देश जहां जनसंख्या कम है-जैसे कि ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया इत्यादि में कम समस्याएं तथा उच्च जीवन स्तर है। जिन देशों की जनसंख्या ज़्यादा होती है वहां जन्म दर कम करने की कई प्रथाएं प्रचलित होती हैं। जैसे भारत में परिवार नियोजन का प्रचार किया जा रहा है। परिवार नियोजन के कारण छोटे परिवार सामने आते हैं तथा छोटे परिवारों के कारण सामाजिक सम्बन्धों में परिवर्तन आ जाते हैं।

जिन देशों में जनसंख्या कम होती है वहां अलग प्रकार के सम्बन्ध पाए जाते हैं। वहां औरतों की स्थिति उच्च होती है तथा परिवार नियोजन की कोई धारणा नहीं होती है। संक्षेप में, जनसंख्या के आकार के कारण लोगों के बीच की अन्तक्रिया के प्रतिमानों में निश्चित रूप से परिवर्तन आ जाता है।
इस तरह जनसंख्या की बनावट के कारण भी परिवर्तन आ जाते हैं। जनसंख्या की बनावट में आम उम्र विभाजन, जनसंख्या का क्षेत्रीय विभाजन, लिंग अनुपात, नस्ली बनावट, ग्रामीण शहरी अनुपात, तकनीकी स्तर पर जनसंख्या का अनुपात, आवास-प्रवास के कारण परिवर्तन पाया जाता है। जनसंख्या के यह गुण सामाजिक संरचना पर बहुत प्रभाव डालते हैं तथा इन तथ्यों को ध्यान में रखे बिना कोई समस्या हल नहीं हो सकती। जैसे बूढ़ों की अपेक्षा जवान परिवर्तन को जल्दी स्वीकार करते हैं तथा ज्यादा उत्साह दिखाते हैं।

4. सांस्कृतिक कारक (Cultural Factors) संस्कृति के भौतिक तथा अभौतिक हिस्से में परिवर्तन सामाजिक सम्बन्धों पर गहरा प्रभाव डालते हैं। परिवार नियोजन की धारणा ने पारिवारिक संस्था पर प्रभाव डाला है। कम बच्चों के कारण उनकी अच्छी देखभाल, उच्च शिक्षा तथा उच्च व्यक्तित्व का विकास होता है। सांस्कृतिक कारणों के कारण सामाजिक परिवर्तन की दिशा भी निश्चित हो जाती है। यह न सिर्फ सामाजिक परिवर्तन की दिशा निश्चित करती है बल्कि गति प्रदान करके उसकी सीमा भी निर्धारित करती है।

5. तकनीकी कारक (Technological Factor)–चाहे तकनीकी कारक संस्कृति के भौतिक हिस्से के अंग हैं परन्तु इसका अपना ही बहुत ज्यादा महत्त्व है। सामाजिक परिवर्तन में तकनीकी कारक बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। तकनीक हमारे समाज को परिवर्तित कर देती है। यह परिवर्तन चाहे भौतिक वातावरण में होता है परन्तु इससे समाज की प्रथाओं, परम्पराओं, संस्थाओं में परिवर्तन आ जाता है। बिजली से चलने वाले यन्त्रों, संचार के साधनों, रोज़ाना जीवन में प्रयोग होने वाली मशीनों ने हमारे जीवन तथा समाज को बदल कर रख दिया है। मशीनों के आविष्कार से उत्पादन बड़े पैमाने पर शुरू हुआ, श्रम विभाजन तथा विशेषीकरण बढ़ गया। शहरों का तेजी से विकास हुआ, जीवन स्तर उच्च हुआ, उद्योग बढ़े परन्तु झगड़े, बीमारियां, दुर्घटनाएं बढ़ीं, गांव शहरों तथा कस्बों में बदलने लग गए, धर्म का प्रभाव कम हुआ, संघर्ष बढ़ गया। इस जैसे कुछ सामाजिक जीवन के पक्ष हैं जिन पर तकनीक का बहुत असर हुआ। आजकल के समय में तकनीकी कारक सामाजिक परिवर्तन का बहुत बड़ा कारक

6. विचारात्मक कारक (Ideological Factor)-इन कारकों के अतिरिक्त अलग-अलग विचारधाराओं का आगे आना भी परिवर्तन का कारण बनता है। उदाहरणत: परिवार की संस्था में परिवर्तन, दहेज प्रथा का आगे आना, औरतों की शिक्षा का बढ़ना, जाति प्रथा का प्रभाव कम होना, लैंगिक सम्बन्धों में परिवर्तन आने से सामाजिक परिवर्तन आए हैं। नई विचारधाराओं के कारण व्यक्तिगत सम्बन्धों तथा सामाजिक सम्बन्धों में बहुत परिवर्तन आए संक्षेप में, नए विचार तथा सिद्धान्त, आविष्कारों तथा आर्थिक दशाओं को प्रभावित करते हैं। वह सीधे रूप से प्राचीन परम्पराओं, विश्वासों, व्यवहारों, आदर्शों के विरुद्ध खड़े होते हैं। वास्तव में समाज में क्रान्ति ही नई विचारधारा लेकर आती है।

प्रश्न 4. सामाजिक परिवर्तन से आपका क्या अर्थ है ? सामाजिक परिवर्तन का जनसंख्यात्मक कारक बताओ।
उत्तर-सामाजिक परिवर्तन का अर्थ-देखें पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न IV (1)

जनसंख्यात्मक कारक (Demographic Factor)-यदि हम समाज को ध्यान से देखें तो हम देखते हैं कि जनसंख्या हमारे समाज में सदैव कम या अधिक होती रहती है। समाज में बहुत-सी समस्याओं का सम्बन्ध जनसंख्या से ही सम्बन्धित होता है। यदि हम 19वीं शताब्दी की तरफ नजर डालें तो हम देखते हैं कि जनसंख्यात्मक कारक काफी सीमा तक सामाजिक परिवर्तन के लिए जिम्मेदार हैं। जनसंख्यात्मक कारकों का प्रभाव केवल भारत देश के साथ ही सम्बन्धित नहीं रहा बल्कि इसका प्रभाव प्रत्येक देश में रहा है। यह ठीक है कि हमारे भारत देश में बढ़ती हुई जनसंख्या कई प्रकार की समस्याएं पैदा कर रही है जैसे आर्थिक दृष्टिकोण से देश को कमज़ोर करना। सामाजिक बुराइयां पैदा करना इत्यादि। परन्तु इसका प्रभाव भिन्न-भिन्न देशों में अलग-अलग रहा है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि जनसंख्यात्मक कारक हमारे सामाजिक ढांचे, संगठनों, कार्यों, क्रियाओं, आदर्शों इत्यादि में काफ़ी परिवर्तन लाता है। सामाजिक परिवर्तन इसके साथ सम्बन्धित रहता है। जनसंख्यात्मक कारकों के बारे में विचार पेश करने से पहले हमारे लिए यह समझना आवश्यक हो जाता है कि जनसंख्यात्मक कारकों का क्या अर्थ है।

जनसंख्यात्मक कारकों का अर्थ (Meaning of Demographic Factors)-जनसंख्यात्मक कारकों का सम्बन्ध जनसंख्या के कम या अधिक होने से होता है अर्थात् इसमें हम जनसंख्या का आकार, घनत्व और विभाजन इत्यादि को शामिल करते हैं। जनसंख्यात्मक कारक सामाजिक परिवर्तन का एक ऐसा कारक है जो हमारे समाज के ऊपर सीधा प्रभाव डालता है। किसी भी समाज का अमीर या ग़रीब होना भी जनसंख्यात्मक कारकों के ऊपर निर्भर करता है अर्थात् जिन देशों की जनसंख्या अधिक होती है उन देशों के लोगों का जीवन स्तर निम्न होता है और जिन देशों की जनसंख्या कम होती है, उन समाजों या देशों में लोगों के रहने-सहने का स्तर काफ़ी ऊंचा होता है। उदाहरणत: हम देखते हैं कि भारत व चीन जैसे देशों की जनसंख्या अधिक होने के कारण दिन-प्रतिदिन समस्याएं बढ़ती रहती हैं। दूसरी तरफ़ ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, अमेरिका आदि देशों की जनसंख्या कम होने की वजह से वहां के लोगों का रहन-सहन व जीवन स्तर काफ़ी ऊंचा होता है। इस प्रकार उपरोक्त दोनों उदाहरणों से हम कह सकते हैं कि जनसंख्या का हमारे समाज में सामाजिक परिवर्तन के लिये बहुत बड़ा हाथ होता है।

जनसंख्यात्मक कारकों के बीच जन्म दर और मृत्यु दर बढ़ने एवं कम होने का प्रभाव भी हमारे समाज के ऊपर पड़ता है। उपरोक्त विवरण से हम इस परिणाम पर पहुंचते हैं कि समाज में कई प्रकार के परिवर्तन केवल जनसंख्या के बढ़ने व कमी से ही सम्बन्धित होते हैं। किसी भी देश की बढ़ती जनसंख्या उसके लिये कई प्रकार की समस्याएं खड़ी कर देती है।

अब हम यह देखेंगे कि जनसंख्यात्मक कारक कैसे हमारे समाज के बीच सामाजिक परिवर्तन लाने के लिये ज़िम्मेदार होता है। सर्वप्रथम हम वह प्रभाव देखेंगे जो जनसंख्या की वृद्धि की वजह से पाये जाते हैं अर्थात् जन्म दर की वृद्धि के साथ पाये जाने वाले प्रभाव। इस प्रकार हम अब यह वर्णन करेंगे कि जनसंख्यात्मक कारण हमारे जीवन को कैसे प्रभावित करते हैं ?

1.ग़रीबी (Poverty) तेजी के साथ बढ़ती हुई जनसंख्या लोगों को उनकी रोजाना की रोटी की आवश्यकताओं को पूरा करने से भी बाधित कर देती है। मालथस के सिद्धान्त के अनुसार जनसंख्या में वृद्धि रेखा गणित के अनुसार होती है अर्थात् 6×6 = 36 परन्तु आर्थिक स्त्रोतों के उत्पादन में वृद्धि अंक गणित की तरह ही होती है अर्थात् 6 + 6 = 12 । कहने का अर्थ यह है कि यदि देश में 36 व्यक्ति अनाज खाने वाले होते हैं तो उत्पादन केवल 12 व्यक्तियों की आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है। इस कारण ही ग़रीबी या भूखमरी की समस्याओं में वृद्धि होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि आर्थिक स्रोतों में विकास काफ़ी मन्द गति के साथ होता है और जब भी जन्म दर में वृद्धि होगी तो उसका सीधा प्रभाव देश की आर्थिक स्थिति पर ही पड़ता है।

2. पैतृक व्यवसाय या कृषि (Hereditary occupation of Agriculture)-भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहां की अधिकतर जनसंख्या कृषि व्यवसाय से ही सम्बन्धित है अर्थात् कृषि व्यवसाय केवल एक व्यक्ति से सम्बन्धित न होकर बहुत सारे व्यक्तियों से मिल-जुल कर होने वाला व्यवसाय है। इस कारण बच्चों की अधिक संख्या भी आवश्यक हो जाती है क्योंकि यदि परिवार बड़ा होगा तो ही कृषि सम्भव है।

3. अनपढ़ता (Illiteracy)-भारतवर्ष में अनपढ़ता भी जनसंख्या वृद्धि का एक बड़ा कारण है। यहां की अधिकतर जनसंख्या अनपढ़ ही है। अनपढ़ लोग कुछ अंधविश्वासों में अधिक फंस जाते हैं जैसे पुत्र का होना आवश्यक समझना, बच्चे परमात्मा की देन इत्यादि या फिर उनमें छोटे परिवार प्रति चेतनता ही नहीं होती है। उनको छोटे परिवार के कोई लाभ भी नज़र नहीं आते हैं। इसी कारण ही उनका स्तर बिल्कुल निम्न हो जाता है। वह शिक्षा ग्रहण सम्बन्धी, अपना जीवन स्तर ऊपर करने सम्बन्धी, बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति चेतन नहीं होते हैं। यह सब अनपढ़ता के कारण ही होता है।

4. सांस्कृतिक पाबन्दियां (Cultural Restrictions) भारतीयों पर संस्कृति का इतना गहरा प्रभाव पड़ा होता है कि वह अपने आप को इन सांस्कृतिक पाबन्दियों से मुक्त नहीं कर पाते हैं। परन्तु यदि कोई व्यक्ति इन पाबन्दियों को तोड़ता है तो सभी व्यक्ति उसके साथ बातचीत तक करनी बन्द कर देते हैं। उदाहरण के लिये भारत में पिता की मृत्यु के पश्चात् मुक्ति तब प्राप्त होती है यदि उसका पुत्र उसको अग्नि देगा। इस कारण उसके लिये पुत्र प्राप्ति आवश्यक हो जाती है। यहां तक कि उसको समाज में भी पुत्र प्राप्ति पश्चात् ही सत्कार मिलता है। इस प्रकार उपरोक्त सांस्कृतिक पाबन्दियों के कारण वह प्रगति भी नहीं कर पाता।

5. सुरक्षा (Safety)-वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति यह सोचना आरम्भ कर देता है, कि वह जब बूढ़ा होगा और उसके बच्चे ही उसकी सुरक्षा करेंगे। बच्चों की अधिक संख्या ही उसे तसल्ली देती है कि उसके बुढ़ापे का सहारा रहेगा। .

6. बेरोज़गारी (Unemployment)-जैसे-जैसे समाज में औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण का विकास हुआ तो, उसके साथ बेरोज़गारी में भी वृद्धि हो गई। लोगों को रोजगार ढूंढ़ने के लिये अपने घरों से बाहर निकलना पड़ा। गांवों के लोग अधिकतर शहरों में जाकर रहने लग पड़े। इसी कारण शहरों में जनसंख्या की वृद्धि हो गई और जिस कारण रहने-सहने के लिये मकानों की कमी हो गई और महंगाई हो गई। घरेलू उत्पादन का कार्य कारखानों में चला गया। मशीनों के साथ कार्य पहले से बढ़िया एवं कम समय में होने लग गया। इस कारण जब मशीनों ने कई __ व्यक्तियों की जगह ले ली तो इस कारण बेरोज़गारी का होना स्वाभाविक सा हो गया।

7. रहने-सहने का निम्न स्तर (Low Standard of Living)-जनसंख्या के बढ़ने के साथ जब ग़रीबी एवं बेरोज़गारी भी उस रफ्तार से बढ़ने लगी, तो उसके साथ लोगों के रहने के स्तर में भी कमी आई। कमाने वाले सदस्यों की संख्या कम हो गई, खाने वाले सदस्यों की संख्या में वृद्धि हो गई। दिन-प्रतिदिन बढ़ती महंगाई की वजह से लोगों को अपने बच्चों को सुविधाएं प्रदान करना कठिन हो गया। रहने-सहने की कीमतों में वृद्धि होने से लोगों के रहने-सहने के स्तर में कमी आई।

जनसंख्या सम्बन्धी आई समस्याओं को देखते हुए भारतीय सरकार ने भी कई कदम उठाये। सर्वप्रथम ग़रीबी का कारण बढ़ती हुई जनसंख्या ही माना गया। इसके हल के लिये परिवार नियोजन से सम्बन्धित कार्यों को आरम्भ किया गया। इसके अन्तर्गत कॉपर-टी, गर्भ निरोधक गोलियों का प्रयोग एवं नसबन्दी आप्रेशन इत्यादि नये आधुनिक प्रयोग आरम्भ किये गये। इस के अतिरिक्त लोगों में लड़का पैदा होने सम्बन्धी दृष्टिकोण में परिवर्तन लाने के लिये, फिल्मों, टी० वी० इत्यादि की सहायता ली गई ताकि लोग लड़के एवं लड़की में अन्तर न समझें। इसके साथ ही बढ़ती जनसंख्या पर काबू पाया जायेगा। बड़े परिवारों के स्थान पर छोटे परिवारों को सरकार की तरफ़ से सहायता मिली।

8. आवास (Immigration)-जनसंख्या के ऊपर आवास एवं प्रवास का भी काफ़ी प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के तौर पर हम देखते हैं कि भारत में बाहर के देशों जैसे-बांग्लादेश, तिब्बत, नेपाल, श्रीलंका आदि के लोग काफ़ी संख्या में आकर रहने लग गये हैं। इनके आवास के कारण हमारी जनसंख्या में भी वृद्धि हो जाती है। ग़रीबी, भुखमरी, महंगाई और कई प्रकार की समस्याएं इसी परिणामस्वरूप पैदा होती हैं। .

9. प्रवास (Emigration)-जैसे भारत में आवास पाया जाता है वैसे ही प्रवास पाया जाता है। प्रवास का अर्थ यह है कि भारत के लोग यहां से बाहर जाकर बसने लग गये हैं। बड़ी बात तो इस सम्बन्ध में यह है कि भारत में अच्छी शिक्षा प्राप्त करने वाले इन्जीनीयर, डॉक्टर इत्यादि बाहर जाकर बसने में दिलचस्पी दिखाते हैं। भारत देश उनकी शिक्षा प्राप्ति हेतु काफ़ी धन भी लगाता है परन्तु उनके द्वारा प्राप्त शिक्षा का लाभ दूसरे देश के लोग ही उठाते हैं। एक कारण यह भी है कि हमारा देश उनको उनकी योग्यतानुसार धन नहीं देता है। यहां तक कि कई बार उनको बेरोज़गारी का सामना भी करना पड़ता है क्योंकि पढ़े-लिखे लोग जो देश को सुधारने में सहायता कर सकते हैं वह अपनी योग्यता का प्रयोग दूसरे देशों में करते हैं। यहां तक कि उनके विदेश जाने से उनका अपना परिवार तक भी टूट जाता है। उनकी देखभाल करने वाला भी कोई नहीं होता। इसका प्रभाव हमारी सम्पूर्ण संरचना पर पड़ता है।

प्रश्न 5. सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में शैक्षिक कारक की भूमिका पर विचार-विमर्श करो।
उत्तर-सामाजिक परिवर्तनों को लाने में शिक्षा भी एक महत्त्वपूर्ण कारक है। वास्तव में शिक्षा प्रगति का मुख्य आधार है। इसको प्राप्त करके व्यक्ति के ज्ञान में वृद्धि होती है। इस कारण इसको प्राप्त करके ही व्यक्ति मानवीय समाज में पाई जाने वाली समस्याओं का भी हल ढूंढ लेता है। जिन देशों में पढ़े-लिखे लोगों की संख्या अधिक होती है वह देश दूसरे देशों के मुकाबले अधिक विकासशील एवं प्रगतिशील होते हैं। इसका कारण यह है कि पढ़ालिखा व्यक्ति समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में अपना पूर्ण सहयोग देता है। भारतीय समाज में अनपढ़ लोगों की प्रतिशतता अधिक पाई जाती है। इस कारण लोग अत्यधिक अन्ध विश्वासी, वहम से भरे एवं बुरी परम्पराओं में पूर्णत: जकड़े रहते हैं। इनसे व्यक्ति को बाहर निकालने के लिए यह आवश्यक होता है कि उसके मन को उचित रूप से शिक्षित किया जाये। शैक्षिक कारणों के सामाजिक प्रभावों को जानने से पूर्व इस शिक्षा के अर्थ के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे।

शब्द ‘Education’ लातीनी भाषा के शब्द ‘Educere’ से निकला है जिसका अर्थ होता है “To bring up”। शिक्षा का अर्थ व्यक्ति को केवल पुस्तकों का ज्ञान देना ही नहीं होता बल्कि व्यक्ति के बीच अच्छी आदतों का निर्माण करके उसको भविष्य के लिए तैयार करने से भी होता है। ऐण्डरसन (Anderson) के अनुसार, “शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति उन वस्तुओं की शिक्षा प्राप्त करता है, जो उसको समाज के बीच ज़िन्दगी व्यतीत करने के लिए तैयार करती हैं।”

इस प्रकार हम इस विवरण के आधार पर कह सकते हैं कि शिक्षा के द्वारा समाज की परम्पराएं, रीति-रिवाज, रूढ़ियां, आदि अगली पीढ़ी तक पहुंचाये जाते हैं। यह औपचारिक एवं अनौपचारिक दोनों तरीकों से प्रदान की जाती हैं। रस्मी शिक्षा प्रणाली, व्यक्ति शिक्षण संस्थाओं जैसे स्कूल, कॉलेज एवं यूनिवर्सिटी में से प्राप्त करता है।

शैक्षिक कारक एवं परिवार (Educational Factors and Social Changes)-

1. शैक्षिक कारक एवं परिवार (Educational Factor and Family) शैक्षिक कारकों का परिवार की संस्था के ऊपर गहरा प्रभाव पड़ा है। प्राचीन समाजों के बीच व्यक्ति केवल अपनी ज़िन्दगी व्यतीत करने के लिए ही रोजी-रोटी का प्रबन्ध करता था। परिवार के सभी सदस्य एक प्रकार के ही व्यवसाय में लगे रहते थे। रहनेसहने का स्तर काफ़ी नीचा था, क्योंकि लोगों में प्रगति करने की चेतनता ही नहीं होती थी। जैसे-जैसे शिक्षा सम्बन्धी चेतनता आई तो धीरे-धीरे नई परम्पराओं एवं कीमतों का विकास हुआ। लोगों के जीवन स्तर-शैली में भी परिवर्तन आया।

जैसे-जैसे पहले-पहले वह एक ही व्यवसाय में लगे रहते थे लेकिन धीरे-धीरे जागृति आयी और अपनी इच्छा व योग्यतानुसार वह अलग-अलग कार्य करने लग गए। इस प्रकार प्राचीन समाज से चली आ रही संयुक्त पारिवारिक प्रणाली की जगह केन्द्रीय परिवार ने ले ली। आधुनिक विचारों के बीच यदि व्यक्ति मेहनत करता है तो वह अपना गुजारा चला सकता है और अपने रहने-सहने के स्तर को भी उठा सकता है। अतः उसको अपनी स्थिति योग्यतानुसार मिलने लगी है न कि नैतिकता के अनुसार। इस प्रकार शैक्षिक कारकों के प्रभाव के साथ परिवारों की संरचना और कार्यों में भी परिवर्तन आया। ऐसे परिवार जिनमें पति-पत्नी दोनों कार्यों में व्यस्त हों तो बच्चों की पढ़ाई व देखभाल करैचों में होने लग पड़ी। इस कारण परिवार का अपने सदस्यों पर नियन्त्रण भी कम हो गया।

2. शैक्षिक कारकों का जाति प्रथा पर प्रभाव (Effect of educational factors on Caste System) भारतीय समाज में जाति प्रथा एक ऐसी सामाजिक बुराई है जिसने प्रगति के रास्ते में कई रुकावटें डाली हैं। जाति प्रथा में शिक्षा केवल उच्च जाति तक ही सीमित थी, और शिक्षा की प्रकार भी धार्मिक ही थी। अंग्रेज़ी सरकार के आने के पश्चात् ही जाति-प्रथा कमजोर होनी आरम्भ हुई क्योंकि उनके लिये सभी जातियों के लोग भारतीय थे। उन्होंने सभी जाति-धर्मों के व्यक्तियों से समान व्यवहार किया। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने पश्चिमी शिक्षा को महत्त्व दिया। इस कारण ही शिक्षा धर्म-निरपेक्ष हो गई। आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने समानता, स्वतन्त्रता एवं भाईचारे जैसे सिद्धान्तों पर जोर दिया। औपचारिक शिक्षा के लिये स्कूल एवं कॉलेज खोले गये। इनमें प्रत्येक जाति से सम्बन्धित व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करने लग गये। सभी जातियों के लोग एक साथ पढ़ने से अस्पृश्यता की बुराई समाप्त हुई।

3. शैक्षिक कारकों का विवाह पर प्रभाव (Effect of Educational Factor on Marriage)-विवाह की संस्था में भी शिक्षा के कारण काफ़ी परिवर्तन आया। पढ़े-लिखे लोगों का विवाह सम्बन्धी नज़रिया ही बदल गया। आरम्भ में विवाह पारिवारिक सहमति के बिना सम्भव नहीं थे। परिवार के बुजुर्ग ही अपने लड़के या लड़की के विवाह को तय करते थे और वह समान परिवार में ही विवाह करने का विचार रखते थे। वह लड़की-लड़के के गुणों की बजाय खानदान की तरफ अधिक ध्यान देते थे परन्तु अब लड़के एवं लड़की के व्यक्तिगत गुणों की तरफ ध्यान दिया जाता है। अब विवाह को धार्मिक संस्कार न मानकर एक सामाजिक समझौता माना गया है जोकि कभी भी तोड़ा जा सकता है। आजकल प्रेम विवाह एवं अदालती (Court) विवाह भी प्रचलित हैं। प्राचीन काल में छोटी आयु में ही विवाह कर दिया जाता था जिसके काफ़ी नुकसान होते थे। अब कानून पास करके विवाह की एक आयु निश्चित कर दी गई है। अब एक निश्चित आयु के पश्चात् ही विवाह सम्भव हो सकता है।

4. शिक्षा का सामाजिक स्तरीकरण पर प्रभाव (Effect of Education on Social Stratification)शिक्षा सामाजिक स्तरीकरण के आधारों में एक प्रमुख आधार है। (1) पढ़े-लिखे तथा अनपढ़ व्यक्ति को समाज में स्थिति शिक्षा के द्वारा ही प्राप्त होती है। व्यक्ति समाज में ऊंचा पद प्राप्त करने हेतु ऊंची शिक्षा ग्रहण करता है। जिस प्रकार की शैक्षणिक योग्यता व्यक्ति के पास होती है उसी प्रकार का पद वह प्राप्त करने योग्य हो जाता है। इस प्रकार आधुनिक समाज की जनसंख्या का शिक्षा के आधार पर स्तरीकरण किया जाता है। पढ़े-लिखे व्यक्तियों को समाज में सम्मान की भी प्राप्ति होती है।

प्राचीन समाज में व्यक्ति की स्थिति प्रदत्त होती थी अर्थात् वह जिस परिवार में जन्म लेता था, उसको उसी प्रकार की स्थिति की प्राप्ति होती थी लेकिन शिक्षा को ग्रहण करने के पश्चात् व्यक्ति की स्थिति अर्जित पद की होती है। वर्तमान समाज में व्यक्ति को अपनी स्थिति योग्यतानुसार ही प्राप्त होती है। व्यक्ति अपनी इच्छानुसार, मेहनत के साथ, योग्यता के साथ ऊंचे से ऊंचा पद प्राप्त कर सकता है।

5. शैक्षिक कारकों के कुछ अन्य प्रभाव (Some other effects of Educational Factors) शैक्षिक कारकों के प्रभावों के साथ स्त्रियों की स्थिति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया है। आधुनिक समाज की शिक्षित स्त्री देश के प्रत्येक क्षेत्र में बढ़-चढ़ कर भाग ले रही है। भारत की प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने काफ़ी लम्बा समय राजनीति में बिताया और देश के ऊपर राज किया। शिक्षा के प्रसार के साथ स्त्रियों की वैवाहिक आयु में भी वृद्धि हो गई। वह अपना जीवन साथी चुनने के लिये पूर्ण तौर पर स्वतन्त्र हो गई है। प्रेम विवाह को महत्त्व दिया गया है और तलाकों की संख्या में भी वृद्धि हो गई है। शिक्षा के प्रभाव से स्त्रियों की दशा में परिवर्तन आया है। वह अपना जीवन साथी चुनने के लिए पूर्णता स्वतन्त्र हो गई है। शिक्षा के प्रभाव के कारण ही परिवारों का आकार छोटा हो गया है। पढ़ी-लिखी औरतें अधिक सन्तान उत्पत्ति की नीति को अच्छा नहीं समझती हैं। बच्चों की परवरिश तो पहले से ही बाहर से ही होती है। दूसरा रहने-सहने के स्तर को ऊँचा उठाने की इच्छा ने आर्थिक दबाव भी डाल दिया। एक या दो बच्चों को पढ़ाना-लिखाना सम्भव है। भारतीय समाज में अब स्त्रियां, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक इत्यादि क्षेत्रों में पुरुषों की बराबरी कर रही हैं। अब वह पुरुषों की गुलामी न करके, ज़िन्दगी व्यतीत करने में उसके मित्र स्वरूप खड़ी हो रही हैं।

6. सामाजिक कंद्रों एवं कीमतों पर प्रभाव (Effect on Social Values) शिक्षा न केवल व्यक्तिगत कद्रों-कीमतों को उत्पन्न करती है बल्कि सामाजिक कद्रों-कीमतों जैसे लोकतन्त्र, समानता इत्यादि को भी बढ़ाती है। यही शिक्षा के कारण ही कानून के आगे सभी व्यक्ति एक समान समझे जाते हैं। शिक्षा के प्रभाव के कारण ही कई सामाजिक कुरीतियों जैसे-जाति-प्रथा, सती प्रथा, बाल-विवाह, विधवा विवाह का न होना इत्यादि समाप्त हुए हैं। शिक्षा के कारण ही विधवा विवाह तथा अन्तर्जातीय विवाह इत्यादि आगे आये हैं। अब शिक्षा के प्रभाव में ही भेदभाव समाप्त हो गया है। स्त्रियों की दशा में काफ़ी सुधार हो गया है और हो रहा है। आधुनिक समाज एवं आधुनिक समाज की कद्रों-कीमतें शिक्षा की ही देन हैं।

7. शिक्षा का व्यवसायों पर प्रभाव (Effect of Education on Occupations)—प्राचीनकाल में व्यवसायों का आधार शिक्षा न होकर जाति व्यवस्था थी। व्यक्ति जिस किसी जाति विशेष में जन्म लेता था, उन्हीं से सम्बन्धित व्यवसायों को ही अपनाना पड़ता था। उस समय शिक्षा का कोई प्रभाव नहीं था, परन्तु आधुनिक समय में शिक्षा को ही महत्त्व दिया जाता है जिस कारण जाति विशेष के स्थान पर व्यक्तिगत योग्यता को ही केवल महत्त्व दिया जाने लगा है। अब व्यक्ति का व्यवसाय इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह किस जाति से सम्बन्धित है ? बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि वह क्या है ? उसकी शैक्षिक योग्यता क्या है ? आजकल यदि व्यक्ति को अपनी योग्यता में वृद्धि करनी है तो उसके लिए शिक्षा अनिवार्य है। यदि व्यक्ति ने उच्च पद प्राप्त करना है तो उसके लिए पढ़ना-लिखना आवश्यक है। पढ़ाई-लिखाई ने जाति की महत्त्वता को काफ़ी कम कर दिया है। अब कोई भी शिक्षा प्राप्त करके ऊंची पदवी प्राप्त कर सकता है।

प्रश्न 6. सामाजिक परिवर्तन की प्रौद्योगिकी (तकनीकी) कारक को विस्तृत रूप में लिखो।
उत्तर-सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए तकनीकी कारक भी भारतीय समाज में काफ़ी प्रबल हैं। समाज में दिन-प्रतिदिन नये-नये आविष्कार एवं खोजें होती रहती हैं जिनका प्रभाव सम्पूर्ण समाज के ऊपर पड़ता है। आधुनिक समय में आविष्कारों में काफ़ी तेजी आई है जिस कारण आधुनिक शताब्दी को वैज्ञानिक युग कहा गया है। तकनीकी में लगातार विकास होता रहता है जिस कारण समाज का विकास होता रहता है और उसमें परिवर्तन आता रहता है। किसी भी समाज की प्रगति वहां की तकनीकी पर निर्भर करती है। आजकल यातायात के साधन, संचार के साधन, डाकतार विभाग इत्यादि में तकनीकी पक्ष से बहुत ही परिवर्तन और प्रगति हुई है।

ऐसा युग मशीनी युग कहा जाता है जिसमें समाज में प्रत्येक क्षेत्र में मशीनों का प्रभाव देखने को मिलता है। कई समाजशास्त्रियों ने तकनीकी कारणों को ही सामाजिक परिवर्तन का मुख्य कारण बताया है।

वास्तव में तकनीकी कारणों में मशीनें, हथियार और उन सभी वस्तुओं को शामिल किया जाता है जिसमें मानवीय शक्ति का प्रयोग किया जाता है। ।

तकनीकी कारण एवं सामाजिक परिवर्तन (Technology & Social Change)-यहां पर हम विचार करेंगे कि कैसे तकनीकी कारणों ने समाज को परिवर्तित किया और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में परिवर्तन लाने में योगदान दिया है।

1. उत्पादन के क्षेत्र में परिवर्तन (Change in area of production) तकनीक ने उत्पादन के क्षेत्र को तो अपने अधीन ही कर लिया है। कारखानों के खुलने के साथ घरेलू उत्पादन काफ़ी प्रभावित हुए। सबसे महत्त्वपूर्ण परिवर्तन यह आया है कि मशीनों के आने के कारण घरेलू या व्यक्तिगत उत्पादन कारखानों की तरफ चला गया। प्रत्येक क्षेत्र में नई-नई तकनीकों का विकास होने लगा। इसके साथ ही औद्योगीकरण का भी विकास हुआ। घरेलू उत्पादन के समाप्त होने के कारण स्त्रियां भी घर से बाहर निकल आईं। इस कारण स्त्रियों की सामाजिक ज़िन्दगी में काफ़ी परिवर्तन आया। आधुनिक तकनीक का ही बोलबाला होने लग गया। इससे उत्पादन पर खर्च भी कम होने लगा और कम-से-कम समय में अधिक और अच्छा उत्पादन होने लग गया। इन बड़े-बड़े कारखानों में स्त्रियां भी रोज़गार के क्षेत्र में आ गईं। प्राचीन काल में भारत में कपड़े का घरेलू उत्पादन होता था। इसके अतिरिक्त चीनी का निर्माण भी लोग घर में रह कर ही कर लेते थे। परन्तु कारखानों के खुलने के साथ यह उद्योग भी कारखानों में चला गया। आजकल भारतवर्ष में कपड़े एवं चीनी के कई कारखानों के निर्माण के कारण हज़ारों लोग कारखानों में कार्य करने लग गये हैं।

2. संचार के साधनों में विकास (Development in means of communication)-कारखानों में मशीनीकरण होने के साथ बड़े स्तर पर उत्पादन का विकास जिसके साथ संचार का विकास होना भी आवश्यक हो गया था। संचार के साधनों में हुए विकास के साथ, समय एवं स्थान में सम्बन्ध स्थापित हुआ। आधुनिक संचार की तकनीकों जैसे टेलीफोन, रेडियो, टेलीविज़न, पुस्तकें, प्रिंटिंग प्रेस की सहायता के साथ आपसी सम्बन्धों में निर्भरता पैदा हुई।

आरम्भिक काल में संचार केवल बोलचाल, संकेतों की सहायता के साथ पाया जाता था। परन्तु जब बोलचाल के स्थान पर लिखित प्रयोग किया जाने लगा तो उसके साथ व्यक्तियों में निजीपन पाया गया और भिन्न-भिन्न समूहों के लोग एक-दूसरे को समझने लग गये। इसके साथ हमारी ज़िन्दगी के दैनिक समय में बहुत तेजी आई। हम दूर बैठे विदेशों में भी व्यक्तियों के साथ सम्बन्ध स्थापित करने में सफल हुए। आजकल के समय में व्यक्ति अपने कार्य को योग्यता के अनुसार फैला रहा है जिससे उसकी प्रगति भी हई है, और रहन-सहन के स्तर में भी वृद्धि हई।

3. कृषि में नयी तकनीकें (New Techniques of Argiculture)-ऐसे युग में कृषि व्यवसाय के क्षेत्र में नयी तकनीकों का प्रयोग होने लग पड़ा। जैसे कृषि से सम्बन्धित औज़ार में, रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग, नयी मशीनें आदि के प्रयोग के साथ ग्रामीण क्षेत्रों के रहने वालों के स्तर में भी वृद्धि हुई। रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग के साथ कृषि के उत्पादन में भी वृद्धि हुई। नये प्रकार के बीजों का उत्पादन भी आरम्भ हो गया। प्राचीन काल में सम्पूर्ण परिवार ही कृषि के व्यवसाय में लगा रहता था। मशीनों के प्रयोग के साथ कम व्यक्ति भी अधिक कार्य करने लग पड़े। इस कारण सम्पूर्ण भारत की प्रगति हुई।

4. यातायात के साधनों का विकास (Development of means of transportation)-विकास के साथ-साथ यातायात के साधनों का भी विकास हआ। यह विकास व्यक्तियों के एक-दूसरे के सम्पर्क में आने की वजह से सम्भव हुआ। हवाई जहाज़, बसें, कारें, सड़कें, रेलगाड़ियां, समुद्री जहाज़ इत्यादि की खोज के साथ एक देश से दूसरे देश तक जाना आसान हो गया। व्यक्ति अपने घर से दूर जाकर भी कार्य करने के लिए जाने लग पड़ा क्योंकि एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए हर प्रकार की सुविधा प्राप्त है। इस कारण व्यक्ति की गतिशीलता में वृद्धि भी हुई।

भारत में पुरातन काल से चला आ रहा अस्पृश्यता का भेदभाव भी यातायात के साधनों के विकास के साथ कम हो गया। बस व रेलगाड़ियों में भिन्न-भिन्न जाति के लोग मिलकर सफर करने लग गये। इसके साथ विभिन्न जातियों के लोगों में भी समानता के सम्बन्ध पैदा हो गए।

यातायात के साधनों में वृद्धि से व्यापार के क्षेत्र में भी काफ़ी विकास हुआ। विभिन्न जातियों एवं विभिन्न देशों के लोगों में आपस में नफरत व ईर्ष्या, दुःख को छोड़कर, प्यार, हमदर्दी एवं सहयोग वाले सम्बन्ध स्थापित किये। व्यक्तियों को अपनी ज़िन्दगी बढ़िया ढंग से जीने का अवसर प्राप्त हुआ। यातायात के साधनों के विकास के कारण हज़ारों मील की यात्रा कुछ घण्टों में ही सम्भव हो गई।

5. तकनीकी कारणों का परिवार की संस्था पर पड़ा प्रभाव (Change in Family) सबसे पहले हम यह देखते हैं कि तकनीकी कारणों के प्रभाव के कारण परिवार की संस्था को बिल्कुल बदल दिया है।

आधुनिक परिवार का तो नक्शा ही बदल गया है। परिवार के सदस्यों को रोजी रोटी कमाने हेतु घर से बाहर जाना पड़ता है। इस कारण वह कार्य (पुराने समय में) जो परिवार के सदस्य स्वयं करते थे, वह दूसरी संस्थाओं के पास चला गया है। बच्चों की देख भाल घर से बाहर करैचों में चली गई है। स्वास्थ्य के कार्य अस्पतालों में चले गये हैं। व्यक्ति अपना मनोरंजन भी घर से बाहर या. देखने एवं सुनने वाले साधनों की सहायता के साथ करता है। उसका नज़रिया (दृष्टिकोण) भी व्यक्तिगत हो गया है। पारिवारिक संगठन का स्वरूप ही बदल गया है। बड़े परिवारों के स्थान पर छोटे एवं सीमित परिवार विकसित हो गये हैं। परिवार को प्राचीन समय में प्राइमरी समूह के फलस्वरूप जो मान्यता प्राप्त थी, वह अब नहीं रही है।

6. तकनीकी कारणों का विवाह की संस्था के ऊपर पड़ा प्रभाव (Effect on institution of marriage)प्राचीन समाज में विवाह को एक धार्मिक बन्धन का नाम दिया जाता था। व्यक्ति का विवाह उसके पूर्वजों की सहमति के साथ होता था। इस संस्था के बीच प्रवेश करके व्यक्ति गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर जाता था, लेकिन तकनीकी कारणों के प्रभाव के साथ विवाह की संस्था के प्रति लोगों का दृष्टिकोण भी बदल गया है।

सबसे पहली बात यह है कि आजकल के समय में विवाह की संस्था एक धार्मिक बन्धन न रह कर एक सामाजिक समझौता बनकर रह गई है। विवाह की नींव समझौते के ऊपर आधारित है और समझौता न होने की अवस्था में यह टूट भी जाती है।
विवाह की संस्था का नक्शा ही बदल गया है। विवाह के चुनाव का क्षेत्र बढ़ गया है। व्यक्ति अपनी इच्छा से किसी भी जाति में विवाह करवा सकता है। यदि पति-पत्नी के विचार नहीं मिलते तो वह एक-दूसरे से अलग हो सकते हैं। औरतों ने जब से उत्पादन के क्षेत्र में हिस्सा लेना शुरू किया है तब से ही वह अपने आपको आदमियों से कम नहीं समझती है। आर्थिक पक्ष से वह आदमी पर अब निर्भर नहीं है। इस कारण उसकी स्थिति आदमी के बराबर समझी जाने लग गई है।

7. सामाजिक जीवन पर प्रभाव (Impact on Social Life) आधुनिक संचार के साधनों, यातायात के साधनों, नये-नये उद्योगों, काम धन्धों के सामने आने से हमारे समाज के ऊपर काफ़ी गहरा प्रभाव पड़ा है। शहरों में बड़े-बड़े उद्योग स्थापित हो गये हैं, जिस कारण गांवों का कुटीर एवं लघु उद्योग लगभग समाप्त हो गया है। गांवों के लोग कार्यों को करने के लिए शहरों की तरफ जाने लग गए। इस कारण गांवों के संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और उनकी जगह केन्द्रीय परिवार ले रहे हैं। लोग गांवों से शहरों की तरफ बढ़ रहे हैं जिस कारण उनके रहनेसहने के स्तर, खाने-पीने, विचार, व्यवहार एवं तौर-तरीकों में काफ़ी परिवर्तन आ रहा है।

Class 12 History Solutions

Is It okay to Eat Expired Food

Class 11 Sociology Notes Chapter 11 सामाजिक परिवर्तन

→ परिवर्तन प्रकृति का नियम है। इस संसार में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जिसमें परिवर्तन न आया हो। प्रकृति भी स्वयं में समय-समय पर परिवर्तन लाती रहती है।

→ जब समाज के अलग-अलग भागों में परिवर्तन आए तथा वह परिवर्तन अगर सभी नहीं तो समाज के अधिकतर लोगों के जीवन को प्रभावित करे तो उसे सामाजिक परिवर्तन कहा जाता है। इसका अर्थ है कि समाज के लोगों के जीवन जीने के तरीकों में संरचनात्मक परिवर्तन आ जाता है।

→ सामाजिक परिवर्तन की बहुत सी विशेषताएं होती हैं जैसे कि यह सर्वव्यापक प्रक्रिया है, अलग-अलग समाजों में परिवर्तन की गति अलग होती है, यह समुदायक परिवर्तन है, इसके बारे में निश्चित भविष्यवाणी नहीं की जा सकती, यह बहुत सी अन्तक्रियाओं का परिणाम होता है, यह नियोजित भी हो सकता है तथा अनियोजित भी इत्यादि।

→ सामाजिक परिवर्तन में बहुत से प्रकार होते हैं जैसे कि उद्विकास, विकास, प्रगति तथा क्रान्ति। बहुत बार इन शब्दों को एक-दूसरे के लिए प्रयोग कर लिया जाता है परन्तु समाजशास्त्र में यह सभी एक-दूसरे के बहुत ही अलग होते हैं।

→ उद्विकास का अर्थ है आन्तरिक तौर पर क्रमवार परिवर्तन। इस प्रकार का परिवर्तन काफ़ी धीरे-धीरे होता है जिससे सामाजिक संस्थाएं साधारण से जटिल हो जाती हैं।

→ विकास भी सामाजिक परिवर्तन का ही एक पक्ष है। जब किसी वस्तु में परिवर्तन आए तथा वह परिवर्तन ऐच्छिक दिशा में हो तो इसे विकास कहते हैं। अलग-अलग समाजशास्त्रियों ने विकास के अलग-अलग आधार दिए हैं।

→ प्रगति सामाजिक परिवर्तन का एक अन्य प्रकार है। इसका अर्थ है अपने उद्देश्य की प्राप्ति की तरफ बढ़ना।
प्रगति अपने उद्देश्यों की प्राप्ति करने वाले यत्नों को कहते हैं। जो निश्चित है तथा जिसे सामाजिक कीमतों की तरफ से भी सहयोग मिलता है।

→ क्रान्ति सामाजिक परिवर्तन का एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रकार है। क्रान्ति से समाज में अचानक तथा तेज़ गति से परिवर्तन आते हैं जिससे समाज की प्राचीन संरचना खत्म हो जाती है तथा नई संरचना सामने आती है। कई बार मौजूदा संरचना के विरुद्ध जनता में इतना असंतोष बढ़ जाता है कि वह व्यवस्था के विरुद्ध अचानक खड़े हो जाते हैं। इसे क्रान्ति कहते हैं। सन् 1789 में फ्रांस में ऐसा ही परिवर्तन आया था।

→ सामाजिक परिवर्तन की दिशा तथा गति को बहुत से कारक प्रभावित करते हैं जैसे कि प्राकृतिक कारक, विश्वास तथा मूल्य, समाज सुधारक, जनसंख्यात्मक कारक, तकनीकी कारक, शैक्षिक कारक इत्यादि।

→ प्रसार (Diffusion)-वह प्रक्रिया जिससे सांस्कृतिक तत्व एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति तक फैल जाते हैं।

→ आविष्कार (Innovation)-नए विचारों, तकनीक का सामने आना तथा मौजूदा विचारों तथा तकनीकों का बेहतर इस्तेमाल।

→ सामाजिक परिवर्तन (Social Change)—सामाजिक संरचना तथा सामाजिक व्यवस्था के कार्यों में आए परिवर्तन।

→ प्रगति (Progress)—वह परिवर्तन जिससे हम अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए ऐच्छिक दिशा की तरफ बढ़ते हैं।

Class 11 Sociology Questions and Answers Chapter 10 सामाजिक स्तरीकरण Notes

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions):

प्रश्न 1. यह शब्द किसके हैं ? “एक सामाजिक वर्ग समुदाय का वह भाग होता है जो सामाजिक स्थिति के आधार पर दूसरों से भिन्न किया जा सकता है।”
(A) मार्क्स
(B) मैकाइवर
(C) वैबर
(D) आगबर्न।
उत्तर-(B) मैकाइवर।

प्रश्न 2. वर्ग व्यवस्था का समाज पर क्या प्रभाव पड़ रहा है ?
(A) जाति प्रथा कमजोर हो रही है
(B) निम्न जातियों के लोग उच्च स्तर पर पहुंच रहे हैं।
(C) व्यक्ति को अपनी योग्यता दिखाने का मौका मिलता है
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-(D) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 3. इनमें से कौन-सी वर्ग की विशेषता नहीं है ?
(A) पूर्णतया अर्जित
(B) खुलापन
(C) जन्म पर आधारित सदस्यता
(D) समूहों की स्थिति में उतार-चढ़ाव।
उत्तर-(C) जन्म पर आधारित सदस्यता।

प्रश्न 4. वर्ग तथा जाति में क्या अन्तर है ?
(A) जाति जन्म पर तथा वर्ग योग्यता पर आधारित होता है
(B) व्यक्ति वर्ग को बदल सकता है पर जाति को नहीं
(C) जाति में कई प्रकार के प्रतिबन्ध होते हैं पर वर्ग में नहीं
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-(D) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 5. वर्ग की विशेषता क्या है ?
(A) उच्च निम्न की भावना
(B) सामाजिक गतिशीलता
(C) उपवर्गों का विकास
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-(D) उपर्युक्त सभी।।

प्रश्न 6. उस व्यवस्था को क्या कहते हैं जिसमें समाज में व्यक्तियों को अलग-अलग आधारों पर विशेष सामाजिक स्थिति प्राप्त होती है ?
(A) जाति व्यवस्था
(B) वर्ग व्यवस्था
(C) सामुदायिक व्यवस्था
(D) सामाजिक व्यवस्था।
उत्तर-(B) वर्ग व्यवस्था।

प्रश्न 7. जातियों के स्तरीकरण से क्या अर्थ है ?
(A) समाज का अलग-अलग हिस्सों में विभाजन
(B) समाज को इकट्ठा करना
(C) समाज को अलग करना
(D) समाज को कभी अलग कभी इकट्ठा करना।
उत्तर-(A) समाज का अलग-अलग हिस्सों में विभाजन।

प्रश्न 8. जाति प्रथा से हमारे समाज को क्या हानि हुई है ?
(A) समाज को बांट दिया गया
(B) समाज के विकास में रुकावट
(C) समाज सुधार में बाधक
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(D) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 9. इनमें से जाति व्यवस्था क्या है ?
(A) राज्य
(B) सामाजिक संस्था
(C) सम्पत्ति
(D) सरकार।
उत्तर-(B) सामाजिक संस्था।

प्रश्न 10. पुरातन भारतीय समाज कितने भागों में विभाजित था ?
(A) चार
(B) पांच
(C) छः
(D) सात।
उत्तर-(A) चार।

प्रश्न 11. जाति प्रथा का क्या कार्य है ?
(A) व्यवहार पर नियन्त्रण
(B) कार्य प्रदान करना
(C) सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-(D) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 12. भारतीय समाज में श्रम विभाजन किस पर आधारित था ?
(A) श्रम
(B) जाति व्यवस्था
(C) व्यक्तिगत योग्यता
(D) सामाजिक व्यवस्था।
उत्तर-(B) जाति व्यवस्था।

II. रिक्त स्थान भरें (Fill in the blanks) :

1. समाज को अलग-अलग स्तरों में विभाजित करने की प्रक्रिया को ………….
2. जाति एक …………… वैवाहिक समूह है।
3. घूर्ये ने जाति के ……….. लक्षण दिए हैं।
4. वर्ण व्यवस्था …………. पर आधारित होती थी।
5. जाति व्यवस्था ………………… पर आधारित होती है।
6. ………….. ने पूँजीपति तथा मज़दूर वर्ग के बारे में बताया था।
7. जाति प्रथा में …………… प्रमुख जातियां होती थीं।
उत्तर-

  1. सामाजिक स्तरीकरण,
  2. अंतः,
  3. छ:,
  4. पेशे,
  5. जन्म,
  6. कार्ल मार्क्स,
  7. चार ।

III. सही/गलत (True/False) :

1. जाति बहिर्वैवाहिक समूह है।।
2. घूर्ये ने जाति की छः विशेषताएं दी थीं।
3. जाति व्यवस्था के कारण अस्पृश्यता की धारणा सामने आई।
4. ज्योतिबा फूले ने जाति व्यवस्था में सुधार लाने का कार्य किया।
उत्तर-

  1. गलत,
  2. सही,
  3. सही,
  4. सही।

IV. एक शब्द/पंक्ति वाले प्रश्न उत्तर (One Wordline Question Answers) :

प्रश्न 1. ……………. व्यवस्था ने हमारे समाज को बाँट दिया है।
उत्तर-जाति व्यवस्था ने हमारे समाज को बाँट दिया है।

प्रश्न 2. शब्द Caste किस भाषा के शब्द से निकला है ?
उत्तर-शब्द Caste पुर्तगाली भाषा के शब्द से निकला है।

प्रश्न 3. जाति किस प्रकार का वर्ग है ?
उत्तर-बन्द वर्ग।

प्रश्न 4. जाति प्रथा में किसे अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त थी ?
उत्तर-जाति प्रथा में प्रथम वर्ण को अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त थी।

प्रश्न 5. जाति प्रथा में किस जाति का शोषण होता था ?
उत्तर-जाति प्रथा में निम्न जातियों का शोषण होता था।

प्रश्न 6. अन्तर्विवाह का क्या अर्थ है ?
उत्तर-जब व्यक्ति को अपनी ही जाति में विवाह करवाना पड़ता है तो उसे अन्तर्विवाह कहते हैं।

प्रश्न 7. जाति में व्यक्ति का पेशा किस प्रकार का होता है ?
उत्तर-जाति में व्यक्ति का पेशा जन्म पर आधारित होता है अर्थात् व्यक्ति को अपने परिवार का परम्परागत पेशा अपनाना पड़ता है।

प्रश्न 8. अस्पृश्यता अपराध अधिनियम कब पास हुआ था ?
उत्तर-अस्पृश्यता अपराध अधिनियम 1955 में पास हुआ था।

प्रश्न 9. नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम कब पास हुआ था ?
उत्तर- नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1976 में पास हुआ था।

प्रश्न 10. हिन्दू विवाह अधिनियम ……………… में पास हुआ था।
उत्तर-हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 में पास हुआ था।

प्रश्न 11. अस्पृश्यता अपराध अधिनियम, 1955 में किस बात पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था ?
उत्तर- इस अधिनियम में किसी भी व्यक्ति को अस्पृश्य कहने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। यह 1955 में पास हुआ था।

प्रश्न 12. सामाजिक स्तरीकरण का क्या अर्थ है ?
उत्तर-समाज को उच्च तथा निम्न वर्गों में विभाजित करने की प्रक्रिया को सामाजिक स्तरीकरण कहते हैं।

प्रश्न 13. जाति किस प्रकार के विवाह को मान्यता देती है ?
उत्तर-जाति अन्तर्विवाह को मान्यता देती है।

प्रश्न 14. प्राचीन भारतीय समाज कितने भागों में विभाजित था ?
उत्तर-प्राचीन भारतीय समाज चार भागों में विभाजित था।

प्रश्न 15. जाति व्यवस्था का क्या लाभ था ?
उत्तर- इसने हिन्दू समाज का बचाव किया, समाज को स्थिरता प्रदान की तथा लोगों को एक निश्चित व्यवसाय प्रदान किया था।

प्रश्न 16. जाति प्रथा में किस प्रकार का परिवर्तन आ रहा है ?
उत्तर-जाति प्रथा में ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा खत्म हो रही है, अस्पृश्यता खत्म हो रही है तथा परम्परागत पेशे खत्म हो रहे हैं।

प्रश्न 17. जाति की मुख्य विशेषता क्या है ?
उत्तर-जाति को जन्मजात सदस्यता होती है, समाज का खण्डात्मक विभाजन होता है तथा व्यक्ति को परम्परागत पेशा प्राप्त होता है।

प्रश्न 18. जाति प्रथा से क्या हानि होती है ?
उत्तर-जाति प्रथा से निम्न जातियों का शोषण होता है, अस्पृश्यता बढ़ती है तथा व्यक्तित्व का विकास नहीं होता है।

प्रश्न 19. जाति की सदस्यता का आधार क्या है ?
उत्तर-जाति की सदस्यता का आधार जन्म है।

प्रश्न 20. स्तरीकरण का स्थायी रूप क्या है ?
उत्तर-स्तरीकरण का स्थायी रूप जाति है।

प्रश्न 21. किस संस्था ने भारतीय समाज को बुरी तरह विघटित किया है ?
उत्तर-जाति व्यवस्था ने भारतीय समाज को बुरी तरह विघटित किया है।

प्रश्न 22. जाति शब्द किस भाषा से उत्पन्न हुआ है ?
उत्तर-जाति शब्द अंग्रेजी भाषा के Caste शब्द का हिन्दी रूपान्तर है जो कि पुर्तगाली शब्द Casta से बना

प्रश्न 23. जाति के कौन-से मुख्य आधार हैं ?
उत्तर-जाति एक बड़ा समूह होता है जिसका आधार जातीय भिन्नता तथा जन्मजात भिन्नता होता है।

प्रश्न 24. जाति में आपसी सम्बन्ध किस पर आधारित होते हैं ?
उत्तर-जाति में आपसी सम्बन्ध उच्चता और निम्नता पर आधारित होते हैं।

प्रश्न 25. जाति में किसकी सबसे ज्यादा प्रतिष्ठा होती है ?
उत्तर-जाति प्रथा में ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा सबसे ज़्यादा थी तथा ब्राह्मणों का स्थान सबसे ऊंचा था।

प्रश्न 26. जाति प्रथा में प्रतिबन्ध क्यों लगाए जाते थे ?
उत्तर-

  1. इसलिए ताकि विभिन्न जातियां एक-दूसरे के सम्पर्क में न आएं।
  2.  इसलिए ताकि जाति श्रेष्ठता तथा निम्नता बनाई रखी जा सके।

प्रश्न 27. जाति प्रथा में व्यवसाय कैसे निश्चित होता था ?
उत्तर-जाति प्रथा में व्यवसाय परम्परागत होता था अर्थात् परिवार का व्यवसाय ही अपनाना पड़ता था।

प्रश्न 28. अन्तर्विवाह क्या होता है ?
उत्तर- इस नियम के अन्तर्गत व्यक्ति को अपनी जाति के अन्दर ही विवाह करवाना पड़ता था अर्थात् वह . अपनी जाति के बाहर विवाह नहीं करवा सकता।

प्रश्न 29. औद्योगीकरण ने जाति प्रथा को किस प्रकार प्रभावित किया है ?
उत्तर-उद्योगों में अलग-अलग जातियों के लोग मिलकर कार्य करने लग गए जिससे उच्चता निम्नता के सम्बन्ध खत्म होने शुरू हो गए।

प्रश्न 30. क्या वर्ग अन्तर्वैवाहिक है?
उत्तर-जी हां, वर्ग अन्तर्वैवाहिक भी होता है तथा बर्हिविवाही भी।

प्रश्न 31. जाति में पदक्रम।
उत्तर-जाति प्रथा में चार मुख्य जातियां होती थी तथा वह थी-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा निम्न जाति। यह ही जाति का पदक्रम होता था।

प्रश्न 32. वर्ग का आधार क्या है?
उत्तर-वर्ग का आधार पैसा, प्रतिष्ठा, शिक्षा, पेशा इत्यादि होते हैं।

प्रश्न 33. जाति व्यवस्था का मुख्य आधार क्या है?
उत्तर-जाति व्यवस्था का मूल आधार कुछ जातियों की उच्चता तथा कुछ जातियों की निम्नता थी।

प्रश्न 34. जाति में खाने-पीने तथा सामाजिक संबंधों पर प्रतिबन्ध।
उत्तर-जाति प्रथा में अलग-अलग जातियों में खाने-पीने तथा उनमें सामाजिक संबंध रखने की भी मनाही होती

प्रश्न 35. वर्ग का आधार क्या है ?
उत्तर-आजकल वर्ग का आधार पैसा, व्यापार, पेशा इत्यादि है।

प्रश्न 36. अब तक कौन-से वर्ग अस्तित्व में आए हैं ?
उत्तर-अब तक अलग-अलग आधारों पर हजारों वर्ग अस्तित्व में आए हैं।

प्रश्न 37. वर्ग की सदस्यता किस पर निर्भर करती है ?
उत्तर-वर्ग की सदस्यता व्यक्ति की योग्यता पर निर्भर करती है।

प्रश्न 38. आजकल वर्ग अंतर का निर्धारण किस आधार पर होता है ?
उत्तर-शिक्षा, पैसा, पेशा, रिश्तेदारी इत्यादि के आधार पर।

प्रश्न 39. वर्ग संघर्ष का सिद्धांत किसने किया था ?
उत्तर-वर्ग संघर्ष का सिद्धांत कार्ल मार्क्स ने दिया था।

प्रश्न 40. पैसे के आधार पर हम लोगों को कितने वर्गों में विभाजित कर सकते हैं ?
उत्तर-पैसे के आधार पर हम लोगों को उच्च वर्ग, मध्य वर्ग तथा निम्न वर्ग में विभाजित कर सकते हैं।

प्रश्न 41. वर्ग में किस प्रकार के संबंध पाए जाते हैं ?
उत्तर-वर्ग में औपचारिक तथा अस्थाई संबंध पाए जाते हैं।

प्रश्न 42. स्तरीकरण क्या होता है ?
उत्तर-समाज को उच्च तथा निम्न वर्गों में विभाजित किए जाने की प्रक्रिया को स्तरीकरण कहा जाता है।

प्रश्न 43. मार्क्स के अनुसार वर्ग का आधार क्या होता है ?
उत्तर-मार्क्स के अनुसार वर्ग का आधार आर्थिक अर्थात् पैसा होता है।

प्रश्न 44. क्या जाति बदल रही है ?
उत्तर-जी हां, जाति वर्ग में बदल रही है।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. जाति में पदक्रम।
उत्तर-समाज अलग-अलग जातियों में विभाजित हुआ था तथा समाज में इस कारण उच्च-निम्न की एक निश्चित व्यवस्था तथा भावना होती थी। इस निश्चित व्यवस्था को ही जाति में पदक्रम कहते हैं।

प्रश्न 2. व्यक्ति की सामाजिक स्थिति कैसे निर्धारित होती है?
उत्तर-जाति व्यवस्था में व्यक्ति की सामाजिक स्थिति उसकी जाति पर निर्भर करती है जबकि वर्ग व्यवस्था में उसकी सामाजिक स्थिति उसकी व्यक्तिगत योग्यता के ऊपर निर्भर करती है।

प्रश्न 3. जाति सहयोग की भावना विकसित करती है।
उत्तर-यह सच है कि जाति सहयोग की भावना विकसित करती है। एक ही जाति के सदस्यों का एक ही पेशा होने के कारण वह आपस में मिल-जुल कर कार्य करते हैं तथा सहयोग करते हैं।

प्रश्न 4. कच्चा भोजन क्या है ?
उत्तर-जिस भोजन को बनाने में पानी का प्रयोग हो उसे कच्चा भोजन कहा जाता है। जाति व्यवस्था में कई जातियों से कच्चा भोजन कर लिया जाता था तथा कई जातियों से पक्का भोजन।

प्रश्न 5. पक्का भोजन क्या है ?
उत्तर-जिस भोजन को बनाने में घी अथवा तेल का प्रयोग किया जाता है इसे पक्का भोजन कहा जाता है। जाति व्यवस्था में किसी विशेष जाति से ही पक्का भोजन ग्रहण किया जाता है।

प्रश्न 6. आधुनिक शिक्षा तथा जाति।
उत्तर-लोग आधुनिक शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं जिस कारण धीरे-धीरे उन्हें जाति व्यवस्था के अवगुणों का पता चल रहा है। इस कारण अब उन्होंने जाति की पाबन्दियों को मानना बंद कर दिया है।

प्रश्न 7. जाति में सामाजिक सुरक्षा।
उत्तर-अगर किसी व्यक्ति के सामने कोई समस्या आती है तो जाति के सभी सदस्य इकट्ठे होकर उस समस्या को हल करते हैं। इस प्रकार जाति में व्यक्ति को सामाजिक सुरक्षा मिलती है।

प्रश्न 8. जाति की सदस्यता जन्म पर आधारित।
उत्तर-यह सच है कि व्यक्ति की सदस्यता जन्म पर आधारित होती है क्योंकि व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता है। वह योग्यता होने पर भी उसकी सदस्यता को छोड़ नहीं सकता है।

प्रश्न 9. रक्त की शुद्धता बनाए रखना।
उत्तर-जब व्यक्ति अपनी ही जाति में विवाह करवाता है तो इससे जाति की रक्त की शुद्धता बनी रहती है तथा अन्य जाति में विवाह न करवाने से उनका रक्त अपनी जाति में शामिल नहीं होता।

प्रश्न 10. जाति की एक परिभाषा दें।
उत्तर-राबर्ट बीयरस्टेड (Robert Bierstd) के अनुसार, “जब वर्ग व्यवस्था की संरचना एक तथा एक से अधिक विषयों के ऊपर पूर्णतया बंद होती है तो उसे जाति व्यवस्था कहते हैं।”

प्रश्न 11. निम्न जाति का शोषण।
उत्तर-जाति व्यवस्था में उच्च जातियों द्वारा निम्न जातियों का काफ़ी शोषण किया जाता था। उनके साथ काफ़ी बुरा व्यवहार किया जाता था तथा उन्हें किसी प्रकार के अधिकार नहीं दिए जाते थे।

प्रश्न.12. जाति व्यवस्था में दो परिवर्तनों का वर्णन करें।
उत्तर-

  1. अलग-अलग कानूनों के पास होने से जाति प्रथा में अस्पृश्यता के भेदभाव का खात्मा हो रहा है।
  2. अलग-अलग पेशों के आगे आने के कारण अलग-अलग जातियों के पदक्रम तथा उनकी उच्चता में परिवर्तन आ रहा है।

प्रश्न 13. जातीय समाज का खण्डात्मक विभाजन।
उत्तर-जाति व्यवस्था में समाज चार भागों में विभाजित होता था पहले भाग में ब्राह्मण आते थे, दूसरे भाग में क्षत्रिय, तीसरे भाग में वैश्य तथा चतुर्थ भाग में निम्न जातियों के व्यक्ति आते थे।

प्रश्न 14. विवाह संबंधी जाति में परिवर्तन।
उत्तर-अब लोग इकट्ठे कार्य करते हैं तथा नज़दीक आते हैं। इससे अन्तर्जातीय विवाह बढ़ रहे हैं। लोग अपनी इच्छा से विवाह करवाने लग गए हैं। बाल विवाह खत्म हो रहे हैं, विधवा विवाह बढ़ रहे हैं तथा विवाह संबंधी प्रतिबन्ध खत्म हो गए हैं।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. मार्क्स ने मनुष्यों के इतिहास को कितने भागों में बाँटा है ?
उत्तर-मार्क्स ने मनुष्यों के इतिहास को चार भागों में बाँटा है-

  1. प्राचीन साम्यवादी युग
  2. प्राचीन समाज
  3. सामन्तवादी समाज
  4. पूंजीवादी समाज।

प्रश्न 2. मार्क्स के अनुसार स्तरीकरण का परिणाम क्या है ?
उत्तर-मार्क्स का कहना है कि समाज में दो वर्ग होते हैं। पहला वर्ग उत्पादन के साधनों का मालिक होता है तथा दूसरा वर्ग उत्पादन के साधनों का मालिक नहीं होता। इस मलकीयत के आधार पर ही मालिक वर्ग की स्थिति उच्च तथा गैर-मालिक वर्ग की स्थिति निम्न होती है। मालिक वर्ग को मार्क्स पूंजीपति वर्ग तथा गैर-मालिक वर्ग को मजदूर वर्ग कहता है। पूंजीपति वर्ग मजदूर वर्ग का आर्थिक रूप से शोषण करता है तथा मजदूर वर्ग अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए पूंजीपति वर्ग से संघर्ष करता है। यह ही स्तरीकरण का परिणाम है।

प्रश्न 3. वर्गों में आपसी सम्बन्ध किस तरह के होते हैं ?
उत्तर-मार्क्स के अनुसार वर्गों में आपसी सम्बन्ध, आपसी निर्भरता तथा संघर्ष वाले होते हैं। पूंजीपति तथा मज़दूर दोनों अपने अस्तित्व के लिए एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। मजदूर वर्ग को रोटी कमाने के लिए अपना परिश्रम बेचना पड़ता है। वह पूंजीपति को अपना परिश्रम बेचते हैं तथा रोटी कमाने के लिए उस पर निर्भर करते हैं। उसकी मज़दूरी के एवज में पूंजीपति उनको मजदूरी का किराया देते हैं। पूंजीपति भी मज़दूरों पर निर्भर करता है, क्योंकि मजदूर के कार्य किए बिना उसका न तो उत्पादन हो सकता है तथा न ही उसके पास पूंजी इकट्ठी हो सकती है। परन्तु निर्भरता के साथ संघर्ष भी चलता रहता है क्योंकि मज़दूर अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए उससे संघर्ष करता रहता है।

प्रश्न 4. मार्क्स के स्तरीकरण के सिद्धान्त में कौन-सी बातें मख्य हैं ?
उत्तर-

  1. सबसे पहले प्रत्येक प्रकार के समाज में मुख्य तौर पर दो वर्ग होते हैं। एक वर्ग के पास उत्पादन के साधन होते हैं तथा दूसरे के पास नहीं होते हैं।
  2. मार्क्स के अनुसार समाज में स्तरीकरण उत्पादन के साधनों पर अधिकार के आधार पर होता है। जिस वर्ग के पास उत्पादन के साधन होते हैं उसकी स्थिति उच्च होती है तथा जिस के पास साधन नहीं होते उसकी स्थिति निम्न होती है।
  3. सामाजिक स्तरीकरण का स्वरूप उत्पादन की व्यवस्था पर निर्भर करता है।
  4. मार्क्स के अनुसार मनुष्यों के समाज का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है। वर्ग संघर्ष किसी-न-किसी रूप में प्रत्येक समाज में मौजूद रहा है।

प्रश्न 5. वर्ग संघर्ष।
उत्तर-कार्ल मार्क्स ने प्रत्येक समाज में दो वर्गों की विवेचना की है। उसके अनुसार, प्रत्येक समाज में दो विरोधी वर्ग-एक शोषण करने वाला तथा दूसरा शोषित होने वाला वर्ग होते हैं। इनमें संघर्ष होता है जिसे मार्क्स ने वर्ग संघर्ष का नाम दिया है। शोषण करने वाला पूंजीपति वर्ग होता है जिसके पास उत्पादन के साधन होते हैं तथा वह इन उत्पादन के साधनों के साथ अन्य वर्गों को दबाता है। दूसरा वर्ग मजदूर वर्ग होता है जिसके पास उत्पादन के कोई साधन नहीं होते हैं। इसके पास रोटी कमाने के लिए अपना परिश्रम बेचने के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं होता है। यह वर्ग पहले वर्ग से हमेशा शोषित होता है जिस कारण दोनों वर्गों के बीच संघर्ष चलता रहता है। इस संघर्ष को ही मार्क्स ने वर्ग संघर्ष का नाम दिया है।

प्रश्न 6. जाति का अर्थ।
अथवा जाति।
उत्तर-हिन्दू सामाजिक प्रणाली में एक उलझी हुई एवं दिलचस्प संस्था है जिसका नाम ‘जाति प्रणाली’ है। यह शब्द पुर्तगाली शब्द ‘Casta’ से लिया गया है जिसका अर्थ है ‘जन्म’। इस प्रकार यह एक अन्तर-वैवाहिक समूह होता है, जिसकी सदस्यता जन्म के ऊपर आधारित है, इसमें कार्य (धन्धा) पैतृक एवं परम्परागत होता है। रहना-सहना, खाना-पीना, सम्बन्धों पर कई प्रकार के नियम (बन्धन) होते हैं। इसमें कई प्रकार की पाबन्दियां भी होती हैं, जिनका पालन उन सदस्यों को करना ज़रूरी होता है।

प्रश्न 7. जाति व्यवस्था की कोई चार विशेषताएं बतायें।
उत्तर-

  1. जाति की सदस्यता जन्म के आधार द्वारा होती है।
  2. जाति में सामाजिक सम्बन्धों पर प्रतिबन्ध होते हैं।
  3. जाति में खाने-पीने के बारे में प्रतिबन्ध होते हैं।
  4. जाति में अपना कार्य पैतृक आधार पर मिलता है।
  5. जाति एक अन्तर-वैवाहिक समूह है, विवाह सम्बन्धी बन्दिशें हैं।
  6. जाति में समाज अलग-अलग हिस्सों में विभाजित होता है।
  7. जाति प्रणाली एक निश्चित पदक्रम है।

प्रश्न 8. पदक्रम क्या होता है ?
उत्तर-जाति प्रणाली में एक निश्चित पदक्रम होता था, अभी भी भारत वर्ष में ज्यादातर भागों में ब्राह्मण वर्ण की जातियों को समाज में ऊंचा स्थान प्राप्त था। इसी प्रकार दूसरे क्रम में क्षत्रिय आते थे। वर्ण व्यवस्था के अनुसार तीसरा स्थान ‘वैश्यों’ का था, उसी प्रकार ही समाज में वैसा ही आज माना जाता था। इसी क्रम के अनुसार सबसे बाद वाले क्रम में चौथा स्थान निम्न जातियों का था। समाज में किसी भी व्यक्ति की स्थिति आज भी भारत के ज्यादा भागों में उसी प्रकार से ही निश्चित की जाती थी।

प्रश्न 9. सदस्यता जन्म पर आधारित।
अथवा जाति की सदस्यता कैसे निर्धारित होती है ?
उत्तर-जाति की सदस्यता जन्म के आधार पर मानी जाती थी। इस व्यवस्था में कोई भी व्यक्ति अपनी जाति का फैसला अथवा निर्धारण स्वयं नहीं कर सकता। जिस जाति में वह जन्म लेता है उसका सामाजिक दर्जा भी उसी के आधार पर ही निश्चित होता है। इस व्यवस्था में व्यक्ति चाहे कितना भी योग्य क्यों न हो, वह अपनी जाति को अपनी मर्जी से बदल नहीं सकता था। जाति की सदस्यता यदि जन्म के आधार पर मानी जाती थी तो उसकी सामाजिक स्थिति उसके जन्म के आधार पर होती थी न कि उसकी व्यक्तिगत योग्यता के आधार पर।

प्रश्न 10. जाति में खाने-पीने सम्बन्धी किस तरह के प्रतिबन्ध हैं ?
उत्तर-जाति व्यवस्था में कुछ इस तरह के नियम बताये गये हैं जिनमें यह स्पष्ट होता है कि कौन-कौन सी जातियों अथवा वर्गों में कौन-कौन से खाने-पीने के बारे में बताया गया था। इस तरह खाने-पीने की वस्तुओं को दो भागों में बांटा गया था। सारे भोजन को तो एक कच्चा भोजन माना जाता था और दूसरा पक्का भोजन। इसमें कच्चे भोजन को पानी द्वारा तैयार किया जाता था और पक्के भोजन को घी (Ghee) द्वारा तैयार किया जाता था। आम नियम यह था कि कच्चा भोजन कोई भी व्यक्ति तब तक नहीं खाता था जब तक कि वह उसी जाति के ही व्यक्ति द्वारा तैयार न किया जाये। परन्तु दूसरी श्रेणी वाली व्यवस्था में यदि क्षत्रिय एवं वैश्य भी तैयार करते थे, तो ब्राह्मण उसको ग्रहण कर लेते थे।

प्रश्न 11. जाति से सम्बन्धित व्यवसाय।
उत्तर-जाति व्यवस्था के नियमों के आधार पर व्यक्ति का व्यवसाय निश्चित किया जाता था। उसमें उसे परम्परा के अनुसार अपने पैतृक धन्धे को ही अपनाना पड़ता था। जैसे ब्राह्मणों का काम समाज को शिक्षित करना था और क्षत्रियों के ऊपर सुरक्षा का दायित्व था और कृषि के कार्य वैश्यों में विभाजित थे। इसी प्रकार निम्न जातियों का कार्य बाकी तीनों समुदायों की सेवा करने का कार्य था। इसी प्रकार जिस बच्चे का जन्म जिस जाति विशेष में होता था उसे व्यवसाय के रूप में भी वही काम करना होता था। इस प्रणाली में व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार कोई व्यवसाय नहीं कर सकता था। इस जाति प्रकारों में सभी चारों वर्ग अपने कार्य को अपना धर्म समझ कर करते थे।

प्रश्न 12. जाति के कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर-जाति व्यवस्था की प्रथा में जाति भिन्न तरह से अपने सदस्यों की सहायता करती है, उसमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं-

  1. जाति व्यक्ति के व्यवसाय का निर्धारण करती है।
  2. व्यक्ति को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करती है।
  3. हर व्यक्ति को मानसिक सुरक्षा प्रदान करती है।
  4. व्यक्ति एवं जाति के रक्त की शुद्धता बरकरार रखती है।
  5. जाति राजनीतिक स्थिरता प्रदान करती है।
  6. जाति अपने तकनीकी रहस्यों को गुप्त रखती है!
  7. जाति शिक्षा सम्बन्धी नियमों का निर्धारण करती है।
  8. जाति विशेष व्यक्ति के कर्त्तव्यों एवं अधिकारों का ध्यान करवाती है।

प्रश्न 13. जाति एक बन्द समूह है।
उत्तर-जाति एक बन्द समूह है, जब हम इस बात का अच्छी तरह से विश्लेषण करेंगे तो जवाब ‘हां’ में ही आयेगा। इससे यही अर्थ है कि बन्द समूह की जिस जाति में व्यक्ति का जन्म होता था, उसी के अनुसार उसकी सामाजिक स्थिति तय होती थी। व्यक्ति अपनी जाति को छोड़कर, दूसरी जाति में भी नहीं जा सकता। न ही वह अपनी जाति को बदल सकता है। इस तरह इस व्यवस्था में हम देखते हैं कि चाहे व्यक्ति में अपनी कितनी भी योग्यता हो, वह उसे प्रदर्शित नहीं कर पाता था क्यों जो उसे अपनी जाति समूह के नियमों के अनुसार कार्य करना होता था क्योंकि इसका निर्धारण ही व्यक्ति के जन्म के आधार पर था न कि उसकी व्यक्तिगत योग्यता के आधार पर। इस प्रकार जाति एक बन्द समूह ही था जिससे व्यक्ति अपनी इच्छा के आधार पर बाहर नहीं निकल सकता।

प्रश्न 14. जाति के गुण बतायें।
उत्तर-

  1. जाति व्यवसाय का विभाजन करती है।
  2. जाति सामाजिक एकता को बनाये रखती है।
  3. जाति रक्त शुद्धता को बनाये रखती है।
  4. जाति शिक्षा के नियमों को बनाती है।
  5. जाति समाज में सहयोग से रहना सिखाती है।
  6. मानसिक एवं सामाजिक सुरक्षा प्रदान करती है।

प्रश्न 15. जाति चेतनता।
उत्तर-जाति व्यवस्था की यह सबसे बड़ी त्रुटि थी कि उसमें कोई भी व्यक्ति अपनी जाति के प्रति ज़्यादा सचेत नहीं होता था और यह कमी हर व्यवस्था में भी पाई जाती थी। क्योंकि इस व्यवस्था में व्यक्ति की स्थिति उसकी जाति के आधार पर निश्चित होती थी, इसलिए व्यक्तिगत रूप से उतना जागरूक ही नहीं होता था। जब कि उसकी स्थिति एवं पहचान उनके जन्म के अनुसार ही होनी थी, तो उसे पता होता था कि उसे कौन-कौन से कार्य और कैसे करने हैं। यदि कोई व्यक्ति उच्च जाति में जन्म ले लेता था तो उसे पता होता था कि उसके क्या कर्त्तव्य हैं, यदि उसका जन्म निम्न जाति में हो जाता था, तो उसे पता ही होता था कि उसे सारे समाज की सेवा करनी है और इस स्वाभाविक प्रक्रिया में दखल अन्दाजी नहीं करता था और उसी को दैवी कारण मानकर अपना जीवन-यापन करता जाता था।

प्रश्न 16. जाति में बदलाव के कारणों के बारे में लिखें।
उत्तर-19वीं शताब्दी में कई समाज सुधारकों एवं धार्मिक विद्वानों की कोशिशों ने समाज में काफ़ी बदलाव की कोशिशें की और कई सामाजिक कुरीतियों का जमकर खण्डन किया। इन्हीं कारणों को हम संक्षेप में इस तरह बता सकते हैं-

  1. समाज सुधार आंदोलनों के कारण।
  2. भारत सरकार की कोशिशें एवं कानूनों का बनना।
  3. अंग्रेज़ी साम्राज्य का इसमें योगदान।
  4. औद्योगीकरण के कारणों से आई तबदीली।
  5. शिक्षा के प्रसार के कारण।
  6. यातायात एवं संचार व्यवस्था के कारण।
  7. आपसी मेल-जोल की वजह से।

प्रश्न 17. जाति के अवगुण।
उत्तर-स्त्रियों की दशा खराब होती है।

  1. यह प्रथा अस्पृश्यता को बढ़ावा देती है।
  2. यह जातिवाद को बढ़ाती है।
  3. इससे सांस्कृतिक संघर्ष को बढ़ावा मिलता है।
  4. सामाजिक एकता एवं गतिशीलता को रोकती है।
  5. सामाजिक संतुलन को भी खराब करती है।
  6. व्यक्तियों की कार्य-कुशलता में भी कमी आती है।
  7. सामाजिक शोषण के कारण गिरावट आती है।

प्रश्न 18. जाति एवं वर्ग में क्या अन्तर हैं ?
उत्तर-जाति धर्म पर आधारित है परन्तु वर्ग पैसे के ऊपर आधारित है।

  1. जाति समुदाय का हित है, वर्ग में व्यक्तिगत हितों की बात है।
  2. जाति को बदला नहीं जा सकता, वर्ग को बदला जा सकता है।
  3. जाति बन्द व्यवस्था है परन्तु वर्ग खुली व्यवस्था का हिस्सा है।
  4. जाति लोकतन्त्र के विरुद्ध है पर वर्ग लोकतान्त्रिक क्रिया है।
  5. जाति में कई तरह के प्रतिबन्ध हैं, वर्ग में ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं।
  6. जाति में चेतना की कमी होती है परन्तु वर्ग में व्यक्ति चेतन होता है।

प्रश्न 19. श्रेणी व्यवस्था या वर्ग व्यवस्था।
उत्तर-श्रेणी व्यवस्था ऐसे व्यक्तियों का समूह है जो एक-दूसरे को समान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेणी की स्थिति समाज में अपनी ही होती है। इसके अनुसार श्रेणी के प्रत्येक सदस्य को कुछ विशेष कर्त्तव्य, अधिकार तथा शक्तियां प्राप्त होती हैं। श्रेणी चेतनता ही श्रेणी की मुख्य ज़रूरत होती है। श्रेणी के बीच व्यक्ति अपने आप को कुछ सदस्यों से उच्च तथा कुछ से निम्न समझता है।

प्रश्न 20. वर्ग की दो विशेषताएं।
उत्तर-

  1. वर्ग चेतनता–प्रत्येक वर्ग में इस बात की चेतनता होती है कि उसका पद या आदर दूसरी श्रेणी की तुलना में अधिक है। अर्थात् व्यक्ति को उच्च, निम्न या समानता के बारे में पूरी चेतनता होती है।
  2. सीमित सामाजिक सम्बन्ध-वर्ग व्यवस्था में लोग अपने ही वर्ग के सदस्यों से गहरे सम्बन्ध रखता है तथा दूसरी श्रेणी के लोगों के साथ उसके सम्बन्ध सीमित होते हैं।

प्रश्न 21. धन तथा आय-वर्ग व्यवस्था के निर्धारक।
उत्तर-समाज के बीच उच्च श्रेणी की स्थिति का सदस्य बनने के लिए पैसे की ज़रूरत होती है। परन्तु पैसे के साथ व्यक्ति आप ही उच्च स्थिति प्राप्त नहीं कर सकता परन्तु उसकी अगली पीढ़ी के लिए उच्च स्थिति निश्चित हो जाती है। आय के साथ भी व्यक्ति को समाज में उच्च स्थिति प्राप्त होती है क्योंकि ज्यादा आमदनी से ज्यादा पैसा आता है। परन्तु इसके लिए यह देखना ज़रूरी है कि व्यक्ति की आमदनी ईमानदारी की है या काले धन्धे द्वारा प्राप्त है।

बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1. सामाजिक स्तरीकरण के प्रमुख आधारों का वर्णन करो।
उत्तर-प्रत्येक समाज में स्तरीकरण के अलग-अलग लक्षण होते हैं क्योंकि यह सामाजिक कीमतों तथा प्रमुख विचारधाराओं पर आधारित होती हैं, इसलिए स्तरीकरण के आधार भी अलग-अलग होते हैं।
सामाजिक स्तरीकरण की प्रक्रिया का स्वरूप अलग-अलग समाजों में अलग-अलग पाया जाता है। यह प्रत्येक समाज में पाई जाने वाली सामाजिक कीमतों से सम्बन्धित होता है। इसलिए सामाजिक स्तरीकरण के आधार भी कई होते हैं। परन्तु सभी आधारों को हम दो भागों में बाँट सकते हैं-

  1. जैविक अथवा प्राणी शास्त्रीय आधार (Biological Basis)
  2. सामाजिक-सांस्कृतिक आधार (Socio-Cultural Basis) अब हम स्तरीकरण के इन दोनों प्रमुख आधारों का विस्तार से वर्णन करेंगे।

1. जैविक आधार (Biological Basis)—जैविक आधार पर समाज में व्यक्तियों को उनके जन्म के आधार पर उच्च तथा निम्न स्थान दिए जाते हैं। उनकी व्यक्तिगत योग्यता का कोई महत्त्व नहीं होता है। आम शब्दों में, समाज के अलग-अलग व्यक्तियों तथा समूहों में मिलने वाले उच्च निम्न के सम्बन्ध जैविक आधारों पर निर्धारित हो सकते हैं।

सामाजिक स्तरीकरण के जैविक आधारों का सम्बन्ध व्यक्ति के जन्म से होता है। व्यक्ति को समाज में कई बार उच्च तथा निम्न स्थिति जन्म के आधार पर प्राप्त होती है। निम्नलिखित कुछ जैविक आधारों का वर्णन इस प्रकार है।

(i) जन्म (Birth)-समाज में व्यक्ति के जन्म के आधार पर भी स्तरीकरण पाया जाता है। यदि हम प्राचीन भारतीय हिन्दू समाज की सामाजिक व्यवस्था को ध्यान से देखें तो हमें पता चलता है कि जन्म के आधार पर ही समाज में व्यक्ति को उच्च या निम्न स्थिति प्राप्त होती थी।

जो व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता था, उसको उसी जाति से जोड़ दिया जाता था तथा इस जन्म के आधार पर ही व्यक्ति को स्थिति प्राप्त होती थी। व्यक्ति अपनी योग्यता तथा परिश्रम से भी अपनी जाति बदल नहीं सकता था। इस प्रकार जाति प्रथा में एक पदक्रम बना रहता था। इस विवरण के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि व्यक्ति को समाज में स्थिति उसकी इच्छा तथा योग्यता के अनुसार नहीं प्राप्त होती थी। जाति प्रथा में सामाजिक स्तरीकरण की व्यवस्था का मुख्य आधार जन्म होता था। जन्म के आधार पर ही व्यक्ति को समाज में उच्च या निम्न स्थान प्राप्त होता था।

इसमें व्यक्ति की निजी योग्यता का कोई महत्त्व नहीं होता था। निजी योग्यता न तो जाति बदलने में मददगार थी तथा न ही अपनी स्थिति को ऊँचा उठाने के लिए मददगार थी। ज्यादा से ज्यादा निजी योग्यता व्यक्ति को अपनी ही जाति में ऊँचा कर सकती थी। अपनी जाति में ऊँचा होने के बावजूद भी वह अपने से उच्च जाति से निम्न ही रहेगा। जातीय स्तरीकरण में व्यक्ति की सामाजिक स्थिति उसकी योग्यता के ऊपर निर्धारित नहीं होती थी बल्कि व्यक्ति के जन्म के आधार पर निर्धारित होती थी।

(ii) आयु (Age)-जन्म के बाद आयु के आधार पर सामाजिक स्तरीकरण पाया जाता है। कई अन्य समाजशास्त्रियों ने भी आयु के आधार पर व्यक्ति की अलग-अलग अवस्थाएं बताई हैं। किसी भी समाज में छोटे बच्चे की स्थिति उच्च नहीं होती क्योंकि उसकी बुद्धि का विकास नहीं हुआ होता। बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता है उस तरह उसकी बुद्धि का विकास होता है। बुद्धि के विकास के साथ वह परिपक्व हो जाता है। इसलिए उसको प्राथमिकता दी जाती है। भारत सरकार में भी ज्यादा संख्या बड़ी आयु के लोगों की है। राष्ट्रपति बनने के लिए भी सरकार ने आयु निश्चित की होती है। भारत में यह उम्र 35 साल की है। यदि हम प्राचीन भारतीय समाज की पारिवारिक प्रणाली को ध्यान से देखें तो हमें पता चलता है कि बड़ी आयु के व्यक्तियों का ही परिवार पर नियन्त्रण होता था। भारत में वोट डालने का अधिकार 18 साल के व्यक्ति को ही प्राप्त है।

राजनीति को चलाने के लिए बुजुर्ग व्यक्ति एक स्तम्भ का कार्य करते हैं। यह ही जवान पीढ़ी को तैयार करते हैं। इस प्रकार सरकार ने विवाह की संस्था में प्रवेश करने के लिए व्यक्ति की आयु निश्चित कर दी है ताकि बाल विवाह की प्रथा को रोका जा सके। संसार के सभी समाजों में बड़ी आयु के लोगों की इज्जत होती है। कई कबीलों में तो बडी आयु के लोगों की कौंसिल बनाई जाती है जिसके द्वारा समाज में महत्त्वपूर्ण फैसले लिए जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया के कबीलों के बीच प्रशासकीय अधिकार बड़ी आयु के व्यक्तियों को ही स्वीकार किया जाता है।

(iii) लिंग (Sex)-लिंग भी स्तरीकरण का आधार होता है। लिंग के आधार पर भेद आदमी तथा औरत का ही होता है। यदि हम प्राचीन समाजों पर नजर डालें तो उन समाजों में लिंग के आधार पर ही विभाजित होती थी। औरतें घर का कार्य करती थीं तथा आदमी घर से बाहर जा कर खाने-पीने की चीजें इकट्ठी करते थे।

सत्ता के आधार पर परिवार को दो हिस्सों में विभाजित किया गया है –

  1. पितृ सत्तात्मक परिवार (Patriarchal Family)
  2. मातृ सत्तात्मक परिवार (Matriarchal Family)

इन दोनों तरह के परिवारों के प्रकार लिंग के आधार पर पाए जाते हैं। पितृसत्तात्मक परिवार में पिता की सत्ता महत्त्वपूर्ण थी तथा परिवार पिता की सत्ता में रहता था। परन्तु मातृसत्तात्मक परिवार में परिवार के ऊपर नियन्त्रण माता का ही होता था। यदि हम प्राचीन हिन्दू समाज को देखें तो लिंग के आधार पर आदमी की स्थिति समाज में उच्च थी। लिंग के आधार पर आदमी तथा औरतों के कार्यों में भिन्नता पायी जाती थी। लिंग के आधार पर पाई जाने वाली भिन्नता अभी भी आधुनिक समाजों में कुछ हद तक विकसित है। चाहे सरकार ने प्रयत्न करके औरतों को आगे बढ़ाने की कोशिशें भी की हैं। शिक्षा के क्षेत्र में औरतों को कुछ राज्यों में मुफ्त शिक्षा प्राप्त हो रही है। परन्तु आज भी कुछ फ़र्क नज़र आता है। पश्चिमी देशों में चाहे औरत तथा आदमी को प्रत्येक क्षेत्र में बराबर समझा जाता रहा है परन्तु अमेरिका में राष्ट्रपति का पद औरत नहीं सम्भाल सकती। आदमी तथा औरत की कुछ भूमिकाएं तो प्राकृतिक रूप से ही अलग होती हैं जैसे बच्चे को जन्म देने का कार्य औरत का ही होता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि लिंग भी स्तरीकरण का बहुत ही पुराना आधार रहा है जिसके द्वारा समाज में आदमी तथा औरत की स्थिति को निश्चित किया जाता है।

(iv) नस्ल (Race)-सामाजिक स्तरीकरण की प्रक्रिया का आधार नस्ल भी रही है। नस्ल के आधार पर समाज को विभिन्न समूहों में विभाजित होता है। मुख्यतः मनुष्य जाति की तीन नस्लें पाई जाती हैं-

(a) काकेशियन (Caucasion)
(b) मंगोलाइड (Mangoloid)
(c) नीग्रोआइड (Negroid)

इन तीनों नस्लों में पदक्रम की व्यवस्था पाई जाती है। सफेद नस्ल काकेशियन को समाज में सबसे उच्च स्थान प्राप्त होता है। पीली नस्ल मंगोलाइड को बीच का स्थान तथा काली नस्ल नीग्रोआइड की समाज में सबसे निम्न स्थिति होती है। अमेरिका में आज भी काली नस्ल की तुलना में सफेद नस्ल को उत्तम समझा जाता है। सफेद नस्ल के व्यक्ति अपने बच्चों को अलग स्कूल में पढ़ने के लिए भेजते हैं। यहां तक कि यह आपस में विवाह तक नहीं करते। आधुनिक समाज में विभिन्न नस्लों में पाई जाने वाली भिन्नता में कुछ परिवर्तन आ गए हैं परन्तु फिर भी नस्ल सामाजिक स्तरीकरण का एक आधार बनी हुई है। नस्ल श्रेष्ठता के आधार पर गोरे कालों से विवाह नहीं करवाते। काले व्यक्तियों के साथ गोरे बहुत भेदभाव करते हैं। कोई काला व्यक्ति अमेरिका का राष्ट्रपति नहीं बन सकता है। इस तरह स्पष्ट है कि नस्ल के आधार पर गोरे तथा काले लोगों के रहने के स्तर, सुविधाओं तथा विशेष अधिकारों में भेद पाया जाता है। आज भी हम पश्चिमी देशों में इस आधार पर भेद देख सकते हैं। गोरे लोग एशिया के लोगों के साथ इस आधार पर भेद रखते हैं क्योंकि वह अपने आपको पीले तथा काले लोगों से उच्च समझते

2. सामाजिक-सांस्कृतिक आधार (Socio-cultural basis) केवल जैविक आधार पर ही नहीं बल्कि सामाजिक आधारों पर भी समाज में स्तरीकरण पाया जाता है। सामाजिक-सांस्कृतिक आधार कई तरह के होते हैं जिनका वर्णन इस प्रकार है-

(i) पेशे के आधार पर (Occupational basis)-पेशे के आधार पर समाज को विभिन्न भागों में बाँटा जाता है। कुछ पेशे समाज में ज्यादा महत्त्वपूर्ण समझे जाते हैं तथा कुछ कम। वर्ण व्यवस्था में समाज में स्तरीकरण पेशे के आधार पर ही होता था। व्यक्ति जिस पेशे को अपनाता था उसको उसी पेशे के अनुसार समाज में स्थिति प्राप्त हो जाती थी। जैसे जो व्यक्ति वेदों इत्यादि की शिक्षा प्राप्त करके लोगों को शिक्षित करने का पेशा अपना लेता था तो उसको ब्राह्मण वर्ण में शामिल कर लिया जाता था। पेशा अपनाने की इच्छा व्यक्ति की अपनी होती थी। डेविस के अनुसार विशेष पेशे के लिए योग्य व्यक्तियों की प्राप्ति उस पेशे की स्थिति को प्रभावित करती है। कई समाज वैज्ञानिकों ने पेशे को सामाजिक स्तरीकरण का मुख्य आधार माना है।

आधुनिक समाज में व्यक्ति जिस प्रकार की योग्यता रखता है वह उसी तरह का पेशा अपना लेता है। उदाहरण के तौर पर आधुनिक भारतीय समाज में डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफैसर इत्यादि के पेशे को क्लर्क, चपड़ासी इत्यादि के पेशे से ज्यादा उत्तम स्थान प्राप्त होता है। जो पेशे समाज के लिए नियन्त्रण रखने के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण समझे जाते हैं, उन पेशों को भी समाज में उच्च सामाजिक स्थिति प्राप्त होती है। इस प्रकार विभिन्न पेशों, गुणों, अवगुणों इत्यादि को परख कर समाज में उनको स्थिति प्राप्त होती है।

चाहे पुराने समाजों में पेशे भी जाति पर आधारित होते थे तथा व्यक्ति की स्थिति जाति के अनुसार निर्धारित होती थी परन्तु आधुनिक समाजों में जाति की जगह व्यवसाय को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। एक I.A.S. अफसर की स्थिति एक चपड़ासी से निश्चित रूप से उच्च होती है। उसी तरह अफसरों, जजों इत्यादि का पेशा तथा नाम एक होने के बावजूद उनका स्तर समान नहीं है। संक्षेप में अलग-अलग कार्यों तथा पेशों के आधार पर समाज में स्तरीकरण होता है। उदाहरणतः चाहे कोई वेश्या जितना मर्जी चाहे पैसा कमा ले परन्तु उसके कार्य के आधार पर समाज में उसका स्थान हमेशा निम्न ही रहता है।

(ii) राजनीतिक आधार (Political base)-राजनीतिक आधार पर तो प्रत्येक समाज में अलग-अलग स्तरीकरण पाया जाता है। भारतीय समाज में भी राजनीतिक स्तरीकरण का आधार पाया जाता है। भारत में वंश के आधार पर राजनीतिक व्यवस्था महत्त्वपूर्ण रही है। भारत एक लोकतान्त्रिक समाज है। इसमें राजनीति की मुख्य शक्ति राष्ट्रपति के पास होती है। उपराष्ट्रपति की स्थिति उससे निम्न होती है। प्रत्येक समाज में दो वर्ग पाए जाते हैं तथा वह है शासक वर्ग व शासित वर्ग शासक वर्ग की स्थिति शासित वर्ग से उच्च होती है। प्रशासनिक व्यवस्था में विभिन्न अफसरों को उनकी नौकरी के स्वरूप के अनुसार ही स्थिति प्राप्त होती है। सोरोकिन के अनुसार, “यदि राजनीतिक संगठन में विस्तार होता है तो राजनीतिक स्तरीकरण बढ़ जाता है।”

राजनीतिक व्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक स्तरीकरण में भी complexity बढ़ती जाती है। यदि किसी क्रान्ति के कारण राजनीतिक व्यवस्था में एक दम परिवर्तन आ जाता है तो राजनीतिक स्तरीकरण भी बदल जाता है। भारत में वैसे तो कई राजनीतिक पार्टियां पाई जाती हैं परन्तु जिस पार्टी की स्थिति उच्च होती है वह ही देश पर राज करती है। प्राचीन कबाइली समाज में प्रत्येक कबीले का एक मुखिया होता था जो अपने कबीले की समस्याएं दूर करता था तथा अपने कबीले के प्रति वफ़ादार होता था। राजाओं महाराजाओं के समय राजा के हाथ में शासन होता था, वह जिस तरह चाहता था उस तरह ही अपने राज्य को चलाता था।

परिवार में राजनीति होती है। पिता की स्थिति सब से उच्च होती है। देश के प्रशासन में सब से उच्च स्थिति राष्ट्रपति की होती है। फिर उप-राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, कैबिनेट मन्त्री, राज्य मन्त्री, उप-मन्त्री इत्यादि की बारी आती है। प्रत्येक राजनीतिक पार्टी में कुछ नेता ऊँचे कद के होते हैं तथा कुछ निम्न कद के। कुछ नेता राष्ट्रीय स्तर के होते हैं तथा कुछ प्रादेशिक स्तर के होते हैं। कुछ राजनीतिक पार्टियां भी राष्ट्रीय स्तर की तथा कुछ प्रादेशिक स्तर की होती हैं। उस पार्टी की स्थिति उच्च होगी जिसके हाथ में राजनीतिक सत्ता होती है तथा उस पार्टी की स्थिति निम्न रहेगी जिसके पास सत्ता नहीं होती। उदाहरणतः आज बी० जे० पी० की केन्द्र सरकार होने के कारण उसकी स्थिति उच्च है तथा कांग्रेस की स्थिति निम्न है।

(iii) आर्थिक आधार (Economic basis)-कार्ल मार्क्स के अनुसार आर्थिक आधार ही सामाजिक स्तरीकरण का मुख्य आधार है। उनके अनुसार समाज में हमेशा दो ही वर्ग पाए जाते हैं
(a) उत्पादन के साधनों के मालिक (Owners of means of production)
(b) उत्पादन के साधनों से दूर (Those who don’t have means of production)

जो व्यक्ति उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं, उनकी स्थिति समाज में उच्च होती है। इनको कार्ल मार्क्स ने पूंजीपति का नाम दिया है। दूसरी तरफ मजदूर वर्ग होता है जो पूंजीपति लोगों के अधीन कार्य करता है। पूंजीपति वर्ग, मजदूर वर्ग का पूर्ण शोषण करता है। समाज में पैसे के आधार पर समाज को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा जाता है-

  1. उच्च वर्ग (Higher Class)
  2. मध्यम वर्ग (Middlwe Class)
  3. निम्न वर्ग (Lower Class)

इस प्रकार इन वर्गों में श्रेष्ठता तथा हीनता वाले सम्बन्ध पाए जाते हैं। सोरोकिन के अनुसार, स्तरीकरण के आधार के रूप में आर्थिक तत्त्वों में उतार-चढ़ाव आता रहता है। मुख्य उतार-चढ़ाव दो तरह का होता है-आर्थिक क्षेत्र में किसी भी समूह की उन्नति तथा गिरावट तथा स्तरीकरण की प्रक्रिया में आर्थिक तत्त्वों की महता का कम या ज्यादा होना। इसके परिणामस्वरूप आर्थिक पिरामिड की ऊँचाई की तरफ बढ़ना तथा एक स्तर पर पहुँच कर चौड़ाई में बढ़ना तथा ऊँचाई की तरफ बढ़ने से रुकना।

संक्षेप में हम आधुनिक समाज को औद्योगिक समाज का नाम देते हैं। इस समाज में व्यक्ति का सम्पत्ति पर अधिकार होना या न होना स्तरीकरण का आधार होता है। इस प्रकार आर्थिक आधार भी स्तरीकरण के आधारों में से मुख्य माना गया है।

(iv) शिक्षा के आधार पर (On the basis of education) शिक्षा के आधार पर भी हम समाज को स्तरीकृत कर सकते हैं। शिक्षा के आधार पर समाज को दो भागों में स्तरीकृत किया जाता है-एक तो है पढ़ा-लिखा वर्ग तथा दूसरा है अनपढ़ वर्ग। इस प्रकार पढ़े-लिखे वर्ग की स्थिति अनपढ़ वर्ग से उच्च होती है। जो व्यक्ति परिश्रम करके उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेते हैं तो समाज में उनको ज्यादा इज्जत प्राप्त हो जाती है। आधुनिक समाज में स्तरीकरण का यह आधार भी महत्त्वपूर्ण होता है। समाज में पढ़े-लिखे व्यक्ति की इज्जत अनपढ़ से ज्यादा होती है। अब एक प्रोफैसर की स्थिति, जिसने पी० एच० डी० की है, निश्चित रूप से मौट्रिक पास व्यक्ति से उच्च होगी। एक इंजीनियर, डॉक्टर, अध्यापक की स्थिति चपड़ासी से उच्च होगी क्योंकि उन्होंने चपड़ासी से ज्यादा शिक्षा प्राप्त की है। इस तरह शिक्षा के आधार पर भी समाजों में स्तरीकरण होता है।

(v) धार्मिक आधार (Religious basis)-धार्मिक आधार पर भी समाज को स्तरीकृत किया जाता है। प्राचीन हिन्दू भारतीय समाज में धार्मिक व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मणों को समाज में उच्च स्थिति प्राप्त होती थी क्योंकि वह धार्मिक वेदों का ज्ञान प्राप्त करते थे तथा उस ज्ञान को आगे पहुंचाते थे। भारतीय समाज में कई प्रकार के धर्म पाए जाते हैं। प्रत्येक धर्म को मानने वाला व्यक्ति अपने आपको दूसरे धार्मिक समूहों से ऊंचा समझने लग जाता है। इस प्रकार धर्म के आधार पर भी सामाजिक स्तरीकरण पाया जाता है। भारत में बहुत सारे धर्म हैं जो अपने आपको और धर्मों से श्रेष्ठ समझते हैं। प्रत्येक धर्म के व्यक्ति यह कहते हैं कि उनका धर्म और धर्मों से अच्छा है। एक धर्म, जिसके सदस्यों की संख्या ज्यादा है, निश्चित रूप से दूसरे धर्मों से उच्च कहलवाया जाएगा। हम भारत में हिन्दू तथा इसाई धर्म की उदाहरण ले सकते हैं। इस तरह धर्म के आधार पर भी स्तरीकरण पाया जाता है।

(vi) रक्त सम्बन्धी आधार (On the basis of blood relations) व्यक्ति जिस वंश में जन्म लेता है, उसके आधार पर भी समाज में उसको उच्च या निम्न स्थान प्राप्त होता है। जैसे राजा का पुत्र बड़ा होकर राजा के पद पर विराजमान हो जाता था। इस प्रकार व्यक्ति को समाज में कई बार सामाजिक स्थिति परिवार के आधार पर भी प्राप्त होती है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि सामाजिक स्तरीकरण के अलग-अलग महत्त्वपूर्ण आधार हैं। इसके बहुत सारे भेद होते हैं जिनके आधार पर समाज में असमानताएं पाई जाती हैं।

प्रश्न 3. जाति व्यवस्था क्या होती है ? घूर्ये द्वारा दी गई विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर-शब्द जाति अंग्रेजी भाषा के शब्द Caste का हिन्दी रूपांतर है। शब्द Caste पुर्तगाली भाषा के शब्द Casta में से निकला है जिसका अर्थ नस्ल अथवा प्रजाति है। शब्द Caste लातिनी भाषा के शब्द Castus से भी सम्बन्धित है जिसका अर्थ शुद्ध नस्ल है। प्राचीन समय में चली आ रही जाति व्यवस्था जन्म पर आधारित होती थी तथा व्यक्ति जिस जाति में पैदा होता था वह उसे तमाम आयु परिवर्तित नहीं कर सकता था। प्राचीन समय में तो व्यक्ति के जन्म से ही उसका कार्य, उसकी सामाजिक स्थिति निश्चित हो जाते थे क्योंकि उसे अपनी जाति का परंपरागत पेशा अपनाना पड़ता था तथा उसकी जाति की सामाजिक स्थिति के अनुसार ही उसकी सामाजिक स्थिति निश्चित हो जाती थी। जाति व्यवस्था अपने सदस्यों के जीवन पर बहुत सी पाबन्दियां लगाती थीं तथा प्रत्येक व्यक्ति के लिए इन पाबन्दियों को मानना आवश्यक होता था।

इस प्रकार जाति व्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था थी जिसमें व्यक्ति के ऊपर जाति के नियमों के अनुसार कई पाबंदियां थीं। जाति एक अन्तर्वैवाहिक समूह होता है जो अपने सदस्यों के जीवन सम्बन्धों, पेशे इत्यादि के ऊपर कई प्रकार के प्रतिबंध रखता है। यह व्यवस्था भारतीय समाज के महत्त्वपूर्ण आधारों में से एक थी तथा यह इतनी शक्तिशाली थी कि कोई भी व्यक्ति इसके विरुद्ध कार्य करने का साहस नहीं करता था।

परिभाषाएं (Definitions)-जाति व्यवस्था की कुछ परिभाषाएं प्रमुख समाजशास्त्रियों तथा मानव वैज्ञानिकों द्वारा दी गई हैं जिनका वर्णन इस प्रकार है-

  1. राबर्ट बीयरस्टेड (Robert Bierstdt) के अनुसार, “जब वर्ग व्यवस्था की संरचना एक अथवा अधिक विषयों पर पूर्णतया बंद होती है तो उसे जाति व्यवस्था कहते हैं।”
  2. रिज़ले (Rislay) के अनुसार, “जाति परिवारों अथवा परिवारों के समूह का संकलन है जिसका एक समान नाम होता है तथा जो काल्पनिक पूर्वज-मनुष्य अथवा दैवीय के वंशज होने का दावा करते हैं, जो समान पैतृक कार्य अपनाते हैं तथा वह विचारक जो इस विषय पर राय देने योग्य हैं, इसे समजातीय समूह मानते हैं।”
  3. ब्लंट (Blunt) के अनुसार, “जाति एक अन्तर्वैवाहिक समूह अथवा अन्तर्वैवाहिक समूहों का एकत्र है जिसका एक नाम है, जिसकी सदस्यता वंशानुगत है, जो अपने सदस्यों पर सामाजिक सहवास के सम्बन्ध में कुछ प्रतिबन्ध लगाती है, एक आम परम्परागत पेशे को अपनाती है अथवा एक आम उत्पत्ति की दावा करती है तथा साधारण एक समरूप समुदाय को बनाने वाली समझी जाती है।”
  4. मार्टिनडेल तथा मोना चेसी (Martindale and Mona Chesi) के अनुसार, “जाति व्यक्तियों का एक ऐसा समूह है जिसमें किसी व्यक्ति के कर्त्तव्य तथा विशेषाधिकार जन्म से ही निश्चित होते हैं, जिसे संस्कारों तथा धर्म की तरफ से मान्यता तथा स्वीकृति प्राप्त होती है।”

जाति व्यवस्था के कुछ लक्षण जी० एस० घर्ये ने दिए हैं:-

(i) समाज का अलग-अलग हिस्सों में विभाजन
(ii) अलग-अलग हिस्सों में पदक्रम
(iii) सामाजिक मेल-जोल तथा खाने-पीने सम्बन्धी पाबन्दियां
(iv) भिन्न-भिन्न जातियों की नागरिक तथा धार्मिक असमर्थाएं तथा विशेषाधिकार
(v) मनमर्जी का पेशा अपनाने पर पाबन्दी
(vi) विवाह सम्बन्धी पाबन्दी।

अब हम घूर्ये द्वारा दी विशेषताओं का वर्णन विस्तार से करेंगे-

(i) समाज का अलग-अलग हिस्सों में विभाजन (Segmental division of Society) जाति व्यवस्था हिन्दू समाज को कई भागों में बांट देती है जिसमें प्रत्येक हिस्से के सदस्यों का दर्जा, स्थान तथा कार्य निश्चित कर देती है। इस वजह से सदस्यों के बीच किसी विशेष समूह का हिस्सा होने के कारण चेतना होती है तथा इसी वजह से ही वह अपने आप को उस समूह का अटूट अंग समझने लग जाता है। समाज की इस तरह हिस्सों में विभाजन के कारण एक जाति के सदस्यों के अन्तर्कार्यों का दायरा अपनी जाति तक ही सीमित हो जाता है। यह भी देखने में आया है कि अलग-अलग जातियों के रहने-सहने के तरीके तथा रस्मों-रिवाज अलग-अलग होते हैं। एक जाति के लोग अधिकतर अपनी जाति के सदस्यों के साथ ही अन्तक्रिया करते हैं। इस प्रकार घूर्ये के अनुसार प्रत्येक जाति अपने आप में पूर्ण सामाजिक जीवन बिताने वाली सामाजिक इकाई होती है।

(ii) पदक्रम (Hierarchy) भारत के अधिकतर भागों में ब्राह्मण वर्ण को सबसे उच्च दर्जा दिया गया था। जाति व्यवस्था में एक निश्चित पदक्रम देखने को मिलता है। इस व्यवस्था में उच्च तथा निम्न जातियों का दर्जा तो लगभग निश्चित ही होता है परन्तु बीच वाली जातियों में कुछ अस्पष्टता है। परन्तु फिर भी दूसरे स्थान पर क्षत्रिय तथा तीसरे स्थान पर वैश्य आते थे।

(iii) सामाजिक मेल-जोल तथा खाने-पीने सम्बन्धी पाबन्दियां (Restrictions on feeding and social intercourse)-जाति व्यवस्था में कुछ ऐसे स्पष्ट तथा विस्तृत नियम मिलते हैं जो यह बताते हैं कि कोई व्यक्ति किस जाति से सामाजिक मेल-जोल रख सकता है तथा कौन-सी जातियों से खाने-पीने के सम्बन्ध स्थापित कर सकता है। सम्पूर्ण भोजन को कच्चे तथा पक्के भोजन की श्रेणी में रखा जाता है। कच्चे भोजन को पकाने के लिए पानी का प्रयोग तथा पक्के भोजन को पकाने के लिए घी का प्रयोग होता है। जाति प्रथा में अलग-अलग जातियों के साथ खाने-पीने के सम्बन्ध में प्रतिबन्ध लगे होते हैं।

(iv) अलग-अलग जातियों की नागरिक तथा धार्मिक असमर्थाएं तथा विशेषाधिकार (Civil and religious disabilities and priviledges of various castes)—अलग-अलग जातियों के विशेष नागरिक तथा धार्मिक अधिकार तथा निर्योग्यताएं होती थीं। कुछ जातियों के साथ किसी भी प्रकार के मेल-जोल पर पाबन्दी थी। वह मंदिरों में भी नहीं जा सकते थे तथा कुँओं से पानी भी नहीं भर सकते थे। उन्हें धार्मिक ग्रन्थ पढ़ने की आज्ञा नहीं थी। उनके बच्चों को शिक्षा लेने का अधिकार प्राप्त नहीं था। परन्तु कुछ जातियां ऐसी भी थीं जिन्हें अन्य जातियों पर कुछ विशेषाधिकार प्राप्त थे।

(v) मनमर्जी का पेशा अपनाने पर पाबन्दी (Lack of unrestricted choice of occupation)-जाति व्यवस्था के नियमों के अनुसार कुछ जातियों के विशेष, परम्परागत तथा पैतृक पेशे होते थे। जाति के सदस्यों को परम्परागत पेशा अपनाना पड़ता था चाहे अन्य पेशे कितने भी लाभदायक क्यों न हों। परन्तु कुछ पेशे ऐसे भी थे जिन्हें कोई भी कर सकता था। इसके साथ बहुत-सी जातियों के पेशे निश्चित होते थे।

(vi) विवाह सम्बन्धी पाबन्दियां (Restrictions on Marriage)-भारत के बहुत से हिस्सों में जातियों तथा उपजातियों में विभाजन मिलता है। यह उपजाति समूह अपने सदस्यों को बाहर वाले व्यक्तियों के साथ विवाह करने से रोकते थे। जाति व्यवस्था की विशेषता उसका अन्तर्वैवाहिक होना है। व्यक्ति को अपनी उपजाति से बाहर ही विवाह करवाना पड़ता था। विवाह सम्बन्धी नियम को तोड़ने वाले व्यक्ति को उसकी जाति से बाहर निकाल दिया जाता था।

प्रश्न 4. जाति प्रथा की विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर-1. सदस्यता जन्म पर आधारित होती थी (Membership was based on birth)-जाति व्यवस्था की सबसे पहली विशेषता यह थी कि इसकी सदस्यता व्यक्ति की व्यक्तिगत योग्यता के ऊपर नहीं बल्कि उसके जन्म पर आधारित होती थी। कोई भी व्यक्ति अपनी जाति का निर्धारण नहीं कर सकता। व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता था उसकी स्थिति उसी के अनुसार निश्चित हो जाती थी। व्यक्ति में जितनी चाहे मर्जी योग्यता क्यों न हो वह अपनी जाति परिवर्तित नहीं कर सकता था।

2. सामाजिक सम्बन्धों पर प्रतिबंध (Restrictions on Social relations)-प्राचीन समय में समाज को अलग-अलग वर्गों के बीच विभाजित किया गया था तथा धीरे-धीरे इन वर्गों ने जातियों का रूप ले लिया। सामाजिक संस्तरण में किसी वर्ण की स्थिति अन्य वर्गों से अच्छी थी तथा किसी वर्ण की स्थिति अन्य वर्गों से निम्न थी। इस प्रकार सामाजिक संस्तरण के अनुसार उनके बीच सामाजिक सम्बन्ध भी निश्चित हो गए। यही कारण है कि अलग-अलग वर्गों में उच्च निम्न की भावना पाई जाती थी। इन अलग-अलग जातियों के ऊपर एक दूसरे के साथ सामाजिक सम्बन्ध रखने के ऊपर प्रतिबन्ध थे तथा वह एक-दूसरे से दूरी बना कर रखते थे। कुछ जातियों को तो पढ़ने-लिखने कुँओं से पानी भरने तथा मन्दिरों में जाने की भी आज्ञा नहीं थी। प्राचीन समय में ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश करने के लिए उपनयान संस्कार पूर्ण करना पड़ता था। कुछेक वर्गों के लिए तो इस संस्कार को पूर्ण करने के लिए आयु निश्चित की गई थी, परन्तु कुछ को तो वह संस्कार पूर्ण करने की आज्ञा ही नहीं थी। इस प्रकार अलग-अलग जातियों के बीच सामाजिक सम्बन्धों को रखने पर कई प्रकार के प्रतिबन्ध थे।

3. खाने-पीने पर प्रतिबन्ध (Restrictions on Eatables) जाति व्यवस्था में कुछ ऐसे स्पष्ट नियम मिलते थे जो यह बताते थे कि किस व्यक्ति ने किसके साथ सम्बन्ध रखने थे अथवा नहीं तथा वह किन जातियों के साथ खाने-पीने के सम्बन्ध स्थापित कर सकते थे। सम्पूर्ण भोजन को दो भागों में विभाजित किया गया था तथा वह थे कच्चा भोजन तथा पक्का भोजन। कच्चा भोजन वह होता था जिसे बनाने के लिए पानी का प्रयोग होता था तथा पक्का भोजन वह होता था जिसे बनाने के लिए घी का प्रयोग होता था। साधारण नियम यह था कि कोई व्यक्ति कच्चा भोजन उस समय तक नहीं खाता था जब तक कि वह उसकी अपनी ही जाति के व्यक्ति की तरफ से तैयार न किया गया हो। इसलिए बहत-सी जातियां ब्राह्मण द्वारा कच्चा भोजन स्वीकार कर लेती थी परन्तु इसके विपरीत ब्राह्मण किसी अन्य जाति के व्यक्ति से कच्चा भोजन स्वीकार नहीं करते थे। पक्के भोजन को भी किसी विशेष जाति के व्यक्ति की तरफ से ही स्वीकार किया जाता था। इस प्रकार जाति व्यवस्था ने अलग-अलग जातियों के बीच खाने-पीने के सम्बन्धों पर प्रतिबन्ध लगाए हुए थे तथा सभी के लिए इनकी पालना करनी ज़रूरी थी।

4. मनमर्जी का पेशा अपनाने पर पाबंदी (Restriction on Occupation)-जाति व्यवस्था के नियमों के अनुसार प्रत्येक जाति का कोई न कोई पैतृक तथा परंपरागत पेशा होता था तथा व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता था उसे उसी जाति का परम्परागत पेशा अपनाना पड़ता था। व्यक्ति के पास इसके अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं होता था। उसे बचपन से ही अपने परम्परागत पेशे की शिक्षा मिलनी शुरू हो जाती थी तथा जवान होते-होते वह उस कार्य में निपुण हो जाता है। चाहे कुछ कार्य ऐसे भी थे जिन्हें कोई भी व्यक्ति कर सकता था जैसे कि व्यापार, कृषि, मज़दूरी, सेना में नौकरी इत्यादि। परन्तु फिर भी अधिकतर लोग अपनी ही जाति का पेशा अपनाते. थे। इस समय चार मुख्य वर्ण होते थे। पहले वर्ण का कार्य पढ़ना, पढ़ाना तथा धार्मिक कार्यों को पूर्ण करवाना था। दूसरे वर्ण का कार्य देश की रक्षा करना तथा राज्य चलाना था। तीसरे वर्ण का कार्य व्यापार करना, कृषि करना इत्यादि था। चौथे तथा अन्तिम वर्ण का कार्य ऊपर वाले तीनों वर्गों की सेवा करना था तथा इन्हें अपने परम्परागत कार्य ही करने पड़ते थे।

5. जाति अन्तर्वैवाहिक होती है (Caste is endogamous)-जाति व्यवस्था की सबसे प्रमुख विशेषता यह थी कि यह एक अन्तर्वैवाहिक समूह होता था अर्थात् व्यक्ति को अपनी ही जाति में विवाह करवाना पड़ता था। जाति व्यवस्था बहुत-सी जातियों तथा उपजातियों में विभाजित होती थी। यह उपजातियां अपने सदस्यों को अपने समूह से बाहर विवाह करने की आज्ञा नहीं देती। अगर कोई इस नियम को तोड़ता था तो उसे जाति अथवा उपजाति से बाहर निकाल दिया जाता था। परन्तु अन्तर्विवाह के नियम में कुछ छूट भी मौजूद थी। किसी विशेष स्थिति में अपनी जाति से बाहर विवाह करवाने की आज्ञा थी। परन्तु साधारण नियम यह था कि व्यक्ति को अपनी जाति में ही विवाह करवाना पड़ता था। इस प्रकार सभी जातियों के लोग अपने समूहों में ही विवाह करवाते थे।

6. समाज का अलग-अलग हिस्सों में विभाजन (Segmental division of Society)-जाति व्यवस्था द्वारा हिन्दू समाज को कई भागों में विभाजित कर दिया गया था तथा प्रत्येक हिस्से के सदस्यों का दर्जा, स्थान तथा कार्य निश्चित कर दिये गए थे। इस कारण ही सदस्यों में अपने समूह का एक हिस्सा होने की चेतना उत्पन्न होती थी अर्थात् वह अपने आप को उस समूह का अभिन्न अंग समझने लग जाते थे। समाज के इस प्रकार अलग-अलग हिस्सों में विभाजन के कारण एक जाति के सदस्यों की सामाजिक अन्तक्रिया का दायरा अपनी जाति तक ही सीमित हो जाता था। जाति के नियमों को न मानने वालों को जाति पंचायत की तरफ से दण्ड दिया जाता था। अलग-अलग जातियों के रहने-सहने के ढंग तथा रस्मों-रिवाज भी अलग-अलग ही होते थे। प्रत्येक जाति अपने आप में एक सम्पूर्ण सामाजिक जीवन व्यतीत करने वाली सामाजिक इकाई होती थी।

7. पदक्रम (Hierarchy)–जाति व्यवस्था में अलग-अलग जातियों के बीच एक निश्चित पदक्रम मिलता था जिसके अनुसार यह पता चलता था कि किस जाति की सामाजिक स्थिति किस प्रकार की थी तथा उनमें किस प्रकार के सम्बन्ध पाए जाते थे। चारों जातियों की इस व्यवस्था में एक निश्चित स्थिति होती थी तथा उनके कार्य भी उस संस्तरण तथा स्थिति के अनुसार निश्चित होते थे। कोई भी इस व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह नहीं खड़ा कर सकता था क्योंकि यह व्यवस्था तो सदियों से चली आ रही थी।

प्रश्न 5. जाति प्रथा के कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर-अलग-अलग समाजशास्त्रियों तथा मानव वैज्ञानिकों ने भारतीय जाति व्यवस्था का अध्ययन किया तथा अपने-अपने ढंग से इसकी व्याख्या की है। उन्होंने जाति प्रथा के अलग-अलग कार्यों का भी वर्णन किया है। उन सभी के जाति प्रथा के दिए कार्यों के अनुसार जाति प्रथा के कुछ महत्त्वपूर्ण कार्यों का वर्णन इस प्रकार हैं-

1. पेशे का निर्धारण (Fixation of Occupation) जाति व्यवस्था प्रत्येक व्यक्ति के लिए विशेष कार्य का निर्धारण करती थी। यह कार्य उसके वंश के अनुसार होता था तथा पीढ़ी दर पीढ़ी इसका हस्तांतरण होता रहता था। प्रत्येक बच्चे में अपने पैतृक गुणों वाली निपुणता स्वयं ही उत्पन्न हो जाती थी क्योंकि जिस परिवार में वह पैदा होता है उससे पेशे सम्बन्धी वातावरण उसे स्वयं ही प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार बिना कोई औपचारिक शिक्षा लिए उसका विशेषीकरण हो जाता है। इसके अतिरिक्त यह प्रथा समाज में होने वाली प्रतियोगिता को भी रोकती है तथा आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती है इस प्रकार जाति प्रथा व्यक्ति के कार्य का निर्धारण करती है।

2. सामाजिक सुरक्षा (Social Security)-जाति अपने सदस्यों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करती है। प्रत्येक जाति के सदस्य अपनी जाति के अन्य सदस्यों की सहायता करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति को चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि उसे इस बात का पता होता है कि अगर उसके ऊपर किसी प्रकार का आर्थिक या किसी अन्य प्रकार का संकट आएगा तो उसकी जाति हमेशा उसकी सहायता करेगी। जाति प्रथा दो प्रकार से सदस्यों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करती है। पहली तो यह सदस्यों की सामाजिक स्थिति को निश्चित करती है तथा दूसरी यह उनकी प्रत्येक प्रकार के संकट से रक्षा करती है। इस प्रकार जाति अपने सदस्यों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करती है।

3. मानसिक सुरक्षा (Mental Security)-जाति व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति तथा भूमिका निर्धारित होती है। उसने कौन-सा पेशा अपनाना है, कैसी शिक्षा लेनी है, कहां पर वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने हैं तथा किस जाति से किस प्रकार का व्यवहार करना है। यह सब कुछ जाति के नियमों द्वारा ही निश्चित किया जाता है। इससे व्यक्ति को किसी प्रकार की अनिश्चिता का सामना नहीं करना पड़ता। उसके अधिकार तथा कर्त्तव्य अच्छी तरह स्पष्ट होते हैं। जाति ही सभी नियमों का निश्चय करती है। इस प्रकार व्यक्ति के जीवन की जो समस्याएं अथवा मुश्किलें होती हैं उन्हें जाति बहुत ही आसानी से सुलझा लेती है। इससे व्यक्ति को दिमागी तथा मानसिक सुरक्षा प्राप्त हो जाती है।

4. रक्त की शुद्धता (Purity of Blood)-चाहे वैज्ञानिक आधार पर यह मानना मुश्किल है, परन्तु यह कहा जाता है कि जाति रक्त की शुद्धता बना कर रखती है क्योंकि यह एक अन्तर्वैवाहिक समूह होता है। अन्तर्वैवाहिक होने के कारण एक जाति के सदस्य किसी अन्य जाति के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित नहीं करते तथा उनका रक्त उन्हीं में शुद्ध रह जाता है। अन्य समाजों में भी रक्त की शुद्धता बनाकर रखने के प्रयास किए गए हैं, परन्तु इससे कई प्रकार की मुश्किलें तथा संघर्ष उत्पन्न हो गए हैं। फिर भी भारत में यह नियम पूर्ण सफलता के साथ चला था। जाति में विवाह सम्बन्धी कठोर पाबन्दियां थीं। कोई भी अपनी जाति से बाहर विवाह नहीं करवा सकता था। यही कारण है कि जाति के विवाह जाति में ही होते थे। इस नियम को तोड़ने वाले व्यक्ति को जाति में से बाहर निकाल दिया जाता था। इससे रक्त की शुद्धता बनी रहती थी।

5. राजनीतिक स्थायित्व (Political Stability)-जाति व्यवस्था हिन्दू राजनीतिक व्यवस्था का मुख्य आधार थी। राजनीतिक क्षेत्र में प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार तथा कर्त्तव्य उसकी जाति निर्धारित करती थी क्योंकि लोगों का जाति के नियमों पर विश्वास दैवीय शक्तियों से भी अधिक होता था। इस कारण जाति के नियमों को मानना प्रत्येक व्यक्ति का मुख्य कर्त्तव्य था। आजकल तो अलग-अलग जातियों ने अपने-अपने राजनीतिक संगठन बना लिए हैं जो चुनावों के बाद अपने सदस्यों की सहायता करते हैं तथा जीतने के बाद अपनी जाति के लोगों का विशेष ध्यान रखते हैं। इस प्रकार जाति के सदस्यों को लाभ होता है। इस प्रकार यह जाति का राजनीतिक कार्य होता है।

6. शिक्षा सम्बन्धी नियमों का निश्चय (Fixing rules of education)-जाति व्यवस्था अलग-अलग जातियों के लिए विशेष प्रकार की शिक्षा का निर्धारण करती थी। इस प्रकार की शिक्षा का आधार धर्म था। शिक्षा व्यक्ति को आत्म नियन्त्रण तथा अनुशासन में रहना सिखाती है। शिक्षा व्यक्ति को पेशे सम्बन्धी जानकारी भी देती है। शिक्षा व्यक्ति को कार्य सम्बन्धी तथा दैनिक जीवन सम्बन्धी ज्ञान प्रदान करती है। इस प्रकार जाति व्यवस्था व्यक्ति को सैद्धान्तिक तथा दैनिक जीवन सम्बन्धी ज्ञान प्रदान करती थी। जाति व्यवस्था प्रत्येक व्यक्ति के लिए शिक्षा लेने के नियम बनाती थी। जाति ही यह निश्चित करती थी कि किस जाति का व्यक्ति कितने समय के लिए शिक्षा प्राप्त करेगा तथा कौन-कौन से नियमों की पालना करेगा। इस प्रकार जाति व्यवस्था प्रत्येक जाति के सदस्यों के लिए उस जाति की सामाजिक स्थिति के अनुसार उनकी शिक्षा का प्रबन्ध करती थी।

7. तकनीकी रहस्यों को गुप्त रखना (To preserve technical secrets)-प्रत्येक जाति के कुछ परम्परागत कार्य होते थे। उस परम्परागत कार्य के कुछ तकनीकी रहस्य भी होते थे जो केवल उसे करने वालों को ही पता होते हैं। इस प्रकार जब यह कार्य पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होते थे तो यह तकनीकी रहस्य भी अगली पीढ़ी के पास चले जाते थे। क्योंकि यह कार्य केवल उस जाति ने करने होते थे इसलिए यह भेद भी जाति तक ही रहते थे। इनका रहस्य भी नहीं खुलता था। इस प्रकार जाति तकनीकी भेदों को गुप्त रखने का भी कार्य करती थी।

8. सामाजिक एकता (Social Unity) हिन्दू समाज को एकता में बाँधकर रखने में जाति व्यवस्था ने काफ़ी महत्त्वपूर्ण कार्य किया था। जाति व्यवस्था ने समाज को चार भागों में बाँट दिया था तथा प्रत्येक भाग के कार्य भी अलग-अलग ही थे। जैसे श्रम विभाजन में कार्य अलग-अलग होते हैं वैसे ही जाति व्यवस्था ने भी सभी को अलग-अलग कार्य दिए थे। इस प्रकार सभी भाग अलग-अलग कार्य करते हुए एक-दूसरे की सहायता करते तथा अपनी आवश्यकताएं पूर्ण करते थे। इस कारण ही अलग-अलग समूहों में विभाजित होने के बावजूद भी सभी समूह एक-दूसरे के साथ एकता में बंधे रहते थे।

9. व्यवहार पर नियन्त्रण (Control on behaviour)-जाति व्यवस्था ने प्रत्येक जाति तथा उसके सदस्यों के लिए नियम बनाए हुए थे कि किस व्यक्ति ने किस प्रकार का व्यवहार करना है। जाति प्रथा के नियमों के कारण ही व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत भावनाओं को नियन्त्रण में रखता था तथा उन नियमों के अनुसार जीवन व्यतीत करता था। शिक्षा, विवाह, खाने-पीने, सामाजिक सम्बन्धों इत्यादि जैसे पक्षों के लिए जाति प्रथा के नियम होते थे जिस कारण व्यक्तिगत व्यवहार नियन्त्रण में रहते थे।

10. विवाह सम्बन्धी कार्य (Function of Marriage)-प्रत्येक जाति अन्तर्वैवाहिक होती थी अर्थात् व्यक्ति को अपनी ही जाति तथा उपजाति के अन्दर ही विवाह करवाना पड़ता था। जाति प्रथा का यह सबसे महत्त्वपूर्ण नियम था कि व्यक्ति अपने वंश अथवा परिवार से बाहर विवाह करवाएगा परन्तु वह अपनी जाति के अन्दर ही विवाह करवाएगा। यदि कोई अपनी जाति अथवा उपजाति से बाहर विवाह करवाता था तो उसे जाति से बाहर निकाल दिया जाता था। इस प्रकार जाति विवाह सम्बन्धी कार्य भी पूर्ण करती थी।

प्रश्न 6. जाति प्रथा के गुणों तथा अवगुणों का वर्णन करें।
उत्तर-जाति अपने आप में एक ऐसा समूह है जिसने हिन्दू समाज तथा भारत में बहुत महत्त्वपूर्ण रोल अदा किया है। जितना कार्य अकेला जाति व्यवस्था ने किया है उतने कार्य अन्य संस्थाओं ने मिल कर भी नहीं किए होंगे। इससे हम देखते हैं कि जाति व्यवस्था के बहुत से गुण हैं। परन्तु इन गुणों के साथ-साथ कुछ अवगुण भी हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है-

जाति व्यवस्था के गुण अथवा लाभ (Merits or Advantages of Caste System)-

1. सामाजिक सुरक्षा देना (To give social security)—जाति प्रथा का सबसे बड़ा गुण यह है कि यह अपने सदस्यों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करती है। प्रत्येक जाति के सदस्य अपनी जाति के सदस्यों की सहायता करने के लिए सदैव तैयार रहते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति को चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि उन्हें इस बात का पता होता है कि अगर उन्हें किसी प्रकार की समस्या आएगी तो उसकी जाति हमेशा उसकी सहायता करेगी। जाति प्रथा सदस्यों की सामाजिक स्थिति भी निश्चित करती थी तथा प्रतियोगिता की सम्भावना को भी कम करती थी।

2. पेशे का निर्धारण (Fixation of Occupation)-जाति व्यवस्था का एक अन्य गुण यह है कि यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए विशेष पेशे अथवा कार्य का निर्धारण करती थी। यह कार्य उसके वंश के अनुसार होता था तथा पीढ़ी दर पीढ़ी इसका हस्तांतरण होता रहता था। प्रत्येक बच्चे में अपने पारिवारिक कार्य के प्रति गुण स्वयं ही पैदा हो जाते थे। जिस परिवार में बच्चा पैदा होता था उससे कार्य सम्बन्धी वातावरण उसे स्वयं ही प्राप्त हो जाता था। इस प्रकार बिना किसी औपचारिक शिक्षा के विशेषीकरण हो जाता था। इसके साथ ही जाति व्यवस्था समाज में पेशे के लिए होने वाली प्रतियोगिता को भी रोकती थी तथा आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती थी। इस प्रकार जाति व्यवस्था का यह गुण काफ़ी महत्त्वपूर्ण था।

3. रक्त की शुद्धता (Purity of Blood)—जाति प्रथा एक अन्तर्वैवाहिक समूह है। अन्तर्वैवाहिक का अर्थ है कि व्यक्ति को अपनी जाति में ही विवाह करवाना पड़ता था तथा अगर कोई इस नियम को नहीं मानता था तो उसे जाति में से बाहर निकाल दिया जाता था। ऐसा करने का यह लाभ होता था कि बाहर वाली किसी जाति के साथ रक्त सम्बन्ध स्थापित नहीं होते थे तथा अपनी जाति के रक्त की शुद्धता बनी रहती थी। इस प्रकार जाति का एक गुण यह भी था कि यह रक्त की शुद्धता बनाए रखने में सहायता करती थी।

4. श्रम विभाजन (Division of Labour)-जाति व्यवस्था का एक अन्य महत्त्वपूर्ण गुण यह था कि यह सभी व्यक्तियों में अपने कर्त्तव्य के प्रति प्रेम तथा निष्ठा की भावना उत्पन्न करती थी। निम्न प्रकार के कार्य भी व्यक्ति अपना कर्त्तव्य समझ कर अच्छी तरह करते थे। जाति व्यवस्था अपने सदस्यों में यह भावना भर देती थी कि प्रत्येक सदस्य को उसके पिछले जन्म के कर्मों के अनुसार ही इस जन्म में पेशा मिला है। उसे यह भी विश्वास दिलाया जाता था कि वर्तमान कर्त्तव्यों को पूर्ण करने से ही अगले जन्म में उच्च स्थिति प्राप्त होगी। इसका लाभ यह था कि निराशा खत्म हो गई तथा सभी अपना कार्य अच्छी तरह करते थे। जाति व्यवस्था ने समाज को चार भागों में विभाजित किया हुआ था तथा इन चारों भागों को अपने कार्यों का अच्छी तरह से पता था। यह सभी अपना कार्य अच्छे ढंग से करते थे तथा समय के साथ-साथ अपने पेशे के रहस्य अपनी अगली पीढ़ी को सौंप देते थे। इस प्रकार समाज में पेशे के प्रति स्थिरता बनी रही थी तथा श्रम विभाजन के साथ विशेषीकरण भी हो जाता था।

5. शिक्षा के नियम बनाना (To make rules of education)-जाति व्यवस्था का एक अन्य गुण यह था कि इसने शिक्षा लेने के सम्बन्ध में निश्चित नियम बनाए हुए थे तथा धर्म को शिक्षा का आधार बनाया हुआ था। शिक्षा व्यक्ति को आत्म नियन्त्रण, पेशे सम्बन्धी जानकारी तथा अनुशासन में रहना सिखाती है। शिक्षा व्यक्ति को कार्य संबंधी तथा दैनिक जीवन सम्बन्धी जानकारी भी देती है। जाति व्यवस्था ही यह निश्चित करती थी कि किस जाति के व्यक्ति ने कितनी शिक्षा लेनी है तथा कौन-से नियमों का पालन करना है। इस प्रकार जाति व्यवस्था ही प्रत्येक सदस्य के लिए उसकी जाति की सामाजिक स्थिति के अनुसार शिक्षा का प्रबन्ध करती थी।

6. सामाजिक एकता को बना कर रखना (To maintain social unity)—जाति व्यवस्था का एक अन्य गुण यह था कि इसने हिन्दू समाज को एकता में बाँध कर रखा। जाति व्यवस्था ने समाज को चार भागों में विभाजित किया था तथा प्रत्येक भाग को अलग-अलग कार्य भी दिए थे। जिस प्रकार श्रम विभाजन में प्रत्येक का कार्य अलगअलग होता है उसी प्रकार जाति व्यवस्था ने भी समाज में श्रम विभाजन को पैदा किया था। यह सभी भाग अलगअलग कार्य करते थे तथा अपनी आवश्यकताएं पूर्ण करते थे। इस प्रकार अलग-अलग समूहों में विभाजित होने के बावजूद भी सभी समूह एक-दूसरे के साथ एकता में बंधे रहते थे।

जाति व्यवस्था के अवगुण (Demerits of Caste System)-चाहे जाति व्यवस्था के बहुत से गुण थे तथा इसने सामाजिक एकता रखने में काफ़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी, परन्तु फिर भी इस व्यवस्था के कारण समाज में कई बुराइयां भी पैदा हो गई थीं। जाति व्यवस्था के अवगुण निम्नलिखित हैं-

1. स्त्रियों की निम्न स्थिति (Lower Status of Women) जाति व्यवस्था के कारण स्त्रियों की सामाजिक स्थिति निम्न हो गई थी। जाति व्यवस्था के नियन्त्रणों के कारण हिन्दू स्त्रियों की स्थिति परिवार में नौकरानी से अधिक नहीं थी। जाति अन्तर्वैवाहिक समूह था जिस कारण लोगों ने अपनी जाति में वर ढूंढ़ने के लिए बाल विवाह का समर्थन किया। इससे बहुविवाह तथा बेमेल विवाह को समर्थन मिला। कुलीन विवाह की प्रथा ने भी बाल विवाह, बेमेल विवाह, बहुविवाह तथा दहेज प्रथा जैसी समस्याओं को जन्म दिया। स्त्रियां केवल घर पर ही कार्य करती रहती थीं। उन्हें किसी प्रकार के अधिकार नहीं थे। इस प्रकार स्त्रियों से सम्बन्धित सभी समस्याओं की जड़ ही जाति व्यवस्था थी। जाति व्यवस्था ने ही स्त्रियों की प्रगति पर पाबंदी लगा दी तथा बाल विवाह पर बल दिया। विधवा विवाह को मान्यता न दी। स्त्रियां केवल परिवार की सेवा करने के लिए ही रह गई थीं।

2. अस्पृश्यता (Untouchability)-अस्पृश्यता जैसी समस्या का जन्म भी जाति प्रथा की विभाजन की नीति के कारण ही हुआ था। कुल जनसंख्या के एक बहुत बड़े भाग को अपवित्र मान कर इसलिए अपमानित किया जाता था क्योंकि वह जो कार्य करते थे उसे अपवित्र माना जाता था। उनकी काफ़ी दुर्दशा होती थी तथा उनके ऊपर बहुत से प्रतिबंध लगे हुए थे। वह आर्थिक क्षेत्र में भाग नहीं ले सकते थे। इस प्रकार जाति व्यवस्था के कारण जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग समाज के ऊपर बोझ बन कर रह गया था। इस कारण समाज में निर्धनता आ गई। अलगअलग जातियों में एक-दूसरे के प्रति नफ़रत उत्पन्न हो गई तथा जातिवाद जैसी समस्या हमारे सामने आई।

3. जातिवाद (Casteism)—जाति व्यवस्था के कारण ही लोगों की मनोवृत्ति भी सिकुड़ती चली गई। लोग विवाह सम्बन्धों तथा अन्य प्रकार के सामाजिक सम्बन्धों के लिए जाति के नियमों पर निर्भर थे जिस कारण जातिवाद की भावना बढ़ गई। उच्च तथा निम्न स्थिति के कारण लोगों में गर्व तथा हीनता की भावना उत्पन्न हो गई। पवित्रता तथा अपवित्रता की धारणा ने उनके बीच दूरियां पैदा कर दी। इस कारण देश में जातिवाद की समस्या सामने आई। जातिवाद के कारण लोग अपने देश के बारे में नहीं सोचते तथा इस समस्या को बढ़ाते हैं।

4. सांस्कृतिक संघर्ष (Cultural Conflict)-जाति एक बंद समूह है तथा अलग-अलग जातियों में एकदूसरे के साथ सम्बन्ध रखने पर प्रतिबंध होते थे। इन सभी जातियों के रहने-सहने के ढंग अलग-अलग थे। इस सामाजिक पृथक्ता ने सांस्कृतिक संघर्ष की समस्या को जन्म दिया। अलग-अलग जातियां अलग-अलग सांस्कृतिक समूहों में विभाजित हो गईं। इन समूहों में कई प्रकार के संघर्ष देखने को मिलते थे। कुछ जातियां अपनी संस्कृति को उच्च मानती थीं जिस कारण वह अन्य समूहों से दूरी बना कर रखती थी। इस कारण उनमें संघर्ष के मौके पैदा होते रहते थे।

5. सामाजिक गतिशीलता को रोकना (To stop social mobility)-जाति व्यवस्था में स्थिति का विभाजन जन्म के आधार पर होता था। कोई भी व्यक्ति अपनी जाति परिवर्तित नहीं कर सकता था। प्रत्येक सदस्य को अपनी सामाजिक स्थिति के बारे में पता होता था कि यह परिवर्तित नहीं हो सकती, इसी तरह ही रहेगी। इस भावना ने आलस्य को बढ़ाया। इस व्यवस्था में वह प्रेरणा नहीं होती, जिसमें व्यक्ति अधिक परिश्रम करने के लिए प्रेरित होते थे क्योंकि वह परिश्रम करके भी अपनी सामाजिक स्थिति परिवर्तित नहीं कर सकते थे। यह बात आर्थिक प्रगति में भी रुकावट बनती थी। योग्यता होने के बावजूद भी लोग नया आविष्कार नहीं कर सकते थे क्योंकि उन्हें अपना पैतृक कार्य अपनाना पड़ता था। पवित्रता तथा अपवित्रता की धारणा के कारण भारत में कई प्रकार के उद्योग पिछड़े हुए थे क्योंकि जाति व्यवस्था उन्हें ऐसा करने से रोकती थी।

6. कार्य कुशलता में रुकावट (Obstacle in efficiency)—प्राचीन समय में व्यक्तियों में कार्य-कुशलता में कमी होने का प्रमुख कारण जाति व्यवस्था तथा जाति का नियन्त्रण था। सभी जातियों के सदस्य एक-दूसरे के साथ मिलकर कार्य नहीं करते थे बल्कि एक-दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास करते रहते थे। इसके साथ ही जातियां धार्मिक संस्कारों पर इतना बल देती थी कि लोगों का अधिकतर समय तो इन संस्कारों को पूर्ण करने में ही निकल जाता था। जातियों में पेशा वंश के अनुसार होता था तथा लोगों को अपना परम्परागत पेशा ही अपनाना पड़ता था चाहे उनमें उस कार्य के प्रति योग्यता होती थी अथवा नहीं। इस कारण उनमें कार्य के प्रति उदासीनता आ जाती थी।

7. जाति व्यवस्था तथा प्रजातन्त्र (Caste System and Democracy) —जाति व्यवस्था आधुनिक प्रजातन्त्रीय शासन के विरुद्ध है। समानता, स्वतन्त्रता तथा सामाजिक चेतना प्रजातन्त्र के तीन आधार हैं, परन्तु जाति व्यवस्था इन सिद्धान्तों के विरुद्ध जाकर भाग्य के सहारे रहने वाले समाज का निर्माण करती थी। यह व्यवस्था असमानता पर आधारित थी। जाति व्यक्ति को अपने नियमों के अनुसार जीवन व्यतीत करने की आज्ञा देती थी जोकि प्रजातन्त्रीय सिद्धान्तों के विरुद्ध है। कुछ जातियों पर बहुत से प्रतिबंध लगा दिए गए थे जिस कारण योग्यता होते हुए भी वह समाज में ऊपर उठ नहीं सकते थे। इन लोगों की स्थिति नौकरों जैसी होती थी जोकि प्रजातन्त्र के समानता के सिद्धान्त के विरुद्ध है।

प्रश्न 7. वर्ग के विभाजन के अलग-अलग आधारों का वर्णन करो।
उत्तर-वर्ग की व्याख्या व विशेषताओं के आधार पर हम वर्ग के विभाजन के कुछ आधारों का जिक्र कर सकते हैं जिनका वर्णन नीचे दिया गया है
(1) परिवार व रिश्तेदार (2) सम्पत्ति व आय, पैसा (3) व्यापार (4) रहने के स्थान की दिशा (5) शिक्षा (6) शक्ति (7) धर्म (8) नस्ल (9) जाति (10) स्थिति चिन्ह।

1. परिवार व रिश्तेदारी (Family and Kinship)—परिवार व रिश्तेदारी भी वर्ग की स्थिति निर्धारित करने के लिए जिम्मेवार होता है। बीयरस्टेड के अनुसार, “सामाजिक वर्ग की कसौटी के रूप में परिवार व रिश्तेदारी का महत्त्व सारे समाज में बराबर नहीं होता, बल्कि यह तो अनेक आधारों में एक विशेष आधार है जिसका उपयोग सम्पूर्ण व्यवस्था में एक अंग के रूप में किया जा सकता है। परिवार के द्वारा प्राप्त स्थिति पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है। जैसे टाटा बिरला आदि के परिवार में पैदा हुई सन्तान पूंजीपति ही रहती है क्योंकि उनके बुजुर्गों ने इतना पैसा कमाया होता है कि कई पीढ़ियां यदि न भी मेहनत करें तो भी खा सकती हैं। इस प्रकार अमीर परिवार में पैदा हुए व्यक्ति को भी वर्ग व्यवस्था में उच्च स्थिति प्राप्त होती है। इस प्रकार परिवार व रिश्तेदारी की स्थिति के आधार पर भी व्यक्ति को वर्ग व्यवस्था में उच्च स्थिति प्राप्त होती है।

2. सम्पत्ति, आय व पैसा (Property, Income and Money) वर्ग के आधार पर सम्पत्ति, पैसे व आय को प्रत्येक समाज में महत्त्वपूर्ण जगह प्राप्त होती है। आधुनिक समाज को इसी कारण पूंजीवादी समाज कहा गया है। पैसा एक ऐसा स्रोत है जो व्यक्ति को समाज में बहुत तेजी से उच्च सामाजिक स्थिति की ओर ले जाता है। मार्टिनडेल व मोनाचेसी (Martindal and Monachesi) के अनुसार, “उत्पादन के साधनों व उत्पादित पदार्थों पर व्यक्ति का काबू जितना अधिक होगा उसको उतनी ही उच्च वर्ग वाली स्थिति प्राप्त होती है।” प्रसिद्ध समाज वैज्ञानिक कार्ल मार्क्स ने पैसे को ही वर्ग निर्धारण के लिए मुख्य माना। अधिक पैसा होने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति अमीर है। उनकी आय भी अधिक होती है। इस प्रकार धन, सम्पत्ति व आय के आधार पर भी वर्ग निर्धारित होता है।”

3. पेशा (Occupation)-सामाजिक वर्ग का निर्धारक पेशा भी माना जाता है। व्यक्ति समाज में किस तरह का पेशा कर रहा है, यह भी वर्ग व्यवस्था से सम्बन्धित है। क्योंकि हमारी वर्ग व्यवस्था के बीच कुछ पेशा बहुत ही महत्त्वपूर्ण पाए गए हैं व कुछ पेशे कम महत्त्वपूर्ण । इस प्रकार हम देखते हैं कि डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफैसर आदि की पारिवारिक स्थिति चाहे जैसी भी हो परन्तु पेशे के आधार पर उनकी सामाजिक स्थिति उच्च ही रहती है। लोग उनका आदर-सम्मान भी पूरा करते हैं। इस प्रकार कम पढ़े-लिखे व्यक्ति का पेशा समाज में निम्न रहता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि पेशा भी वर्ग व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण निर्धारक होता है। प्रत्येक व्यक्ति को जीवन जीने के लिए कोई-न-कोई काम करना पड़ता है। इस प्रकार यह काम व्यक्ति अपनी योग्यता अनुसार करता है। वह जिस तरह का पेशा करता है समाज में उसे उसी तरह की स्थिति प्राप्त हो जाती है। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति गलत पेशे को अपनाकर पैसा इकट्ठा कर भी लेता है तो उसकी समाज में कोई इज्जत नहीं होती। आधुनिक समाज में शिक्षा से सम्बन्धित पेशे की अधिक महत्ता पाई जाती है।

4. रहने के स्थान की दिशा (Location of residence)—व्यक्ति किस जगह पर रहता है, यह भी उसकी वर्ग स्थिति को निर्धारित करता है। शहरों में हम आम देखते हैं कि लोग अपनी वर्ग स्थिति को देखते हुए, रहने के स्थान का चुनाव करते हैं। जैसे हम समाज में कुछ स्थानों के लिए (Posh areas) शब्द भी प्रयोग करते हैं। वार्नर के अनुसार जो परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी शहर के काल में पुश्तैनी घर में रहते हैं उनकी स्थिति भी उच्च होती है। कहने से भाव यह है कि कुछ लोग पुराने समय से अपने बड़े-बड़े पुश्तैनी घरों में ही रह जाते हैं। इस कारण भी वर्ग व्यवस्था में उनकी स्थिति उच्च ही बनी रहती है। बड़े-बड़े शहरों में व्यक्तियों के निवास स्थान के लिए भिन्न-भिन्न कालोनियां बनी रहती हैं। मज़दूर वर्ग के लोगों के रहने के स्थान अलग होते हैं। वहां अधिक गन्दगी भी पाई जाती है। अमीर लोग बड़े घरों में व साफ़-सुथरी जगह पर रहते हैं जबकि ग़रीब लोग झोंपड़ियों या गन्दी बस्तियों में रहते हैं।

5. शिक्षा (Education)-आधुनिक समाज शिक्षा के आधार पर दो वर्गों में बँटा हुआ होता है-

  1. शिक्षित वर्ग (Literate Class)
  2. अनपढ़ वर्ग (Illiterate Class)

शिक्षा की महत्ता प्रत्येक वर्ग में पाई जाती है। साधारणतः पर हम देखते हैं कि पढ़े-लिखे व्यक्ति को समाज में इज्जत की नज़र से देखा जाता है। चाहे उनके पास पैसा भी न हो। इस कारण प्रत्येक व्यक्ति वर्तमान सामाजिक स्थिति अनुसार शिक्षा की प्राप्ति को ज़रूरी समझने लगा है। शिक्षा की प्रकृति भी व्यक्ति की वर्ग स्थिति के निर्धारण के लिए जिम्मेवार होती है। औद्योगीकृत समाज में तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाले व्यक्तियों की सामाजिक स्थिति काफ़ी ऊँची होती है।

6. शक्ति (Power)-आजकल औद्योगीकरण के विकास के कारण व लोकतन्त्र के आने से शक्ति भी वर्ग संरचना का आधार बन गई है। अधिक शक्ति का होना या न होना व्यक्ति के वर्ग का निर्धारण करती है। शक्ति से व्यक्ति की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक स्थिति का भी निर्धारण होता है। शक्ति कुछ श्रेष्ठ लोगों के हाथ में होती है व वह श्रेष्ठ लोग नेता, अधिकारी, सैनिक अधिकारी, अमीर लोग होते हैं। हमने उदाहरण ली है आज की भारत सरकार की। नरेंद्र मोदी की स्थिति निश्चय ही सोनिया गांधी व मनमोहन सिंह से ऊँची होगी क्योंकि उनके पास शक्ति है, सत्ता उनके हाथ में है, परन्तु मनमोहन सिंह के पास नहीं है। इस प्रकार आज भाजपा की स्थिति कांग्रेस से उच्च है क्योंकि केन्द्र में भाजपा पार्टी की सरकार है।

7. धर्म (Religion)-राबर्ट बियरस्टड ने धर्म को भी सामाजिक स्थिति का महत्त्वपूर्ण निर्धारक माना है। कई समाज ऐसे हैं जहां परम्परावादी रूढ़िवादी विचारों का अधिक प्रभाव पाया जाता है। उच्च धर्म के आधार पर स्थिति निर्धारित होती है। आधुनिक समय में समाज उन्नति के रास्ते पर चल रहा है जिस कारण धर्म की महत्ता उतनी नहीं जितनी पहले होती थी। प्राचीन भारतीय समाज में ब्राह्मणों की स्थिति उच्च होती थी परन्तु आजकल नहीं। पाकिस्तान में मुसलमानों की स्थिति निश्चित रूप से व हिन्दुओं व ईसाइयों से बढ़िया है क्योंकि वहां राज्य का धर्म ही इस्लाम है। इस प्रकार कई बार धर्म भी वर्ग स्थिति निर्धारण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

8. नस्ल (Race)-दुनिया से कई समाज में नस्ल भी वर्ग निर्माण या वर्ग की स्थिति बताने में सहायक होती है। गोरे लोगों को उच्च वर्ग का व काले लोगों को निम्न वर्ग का समझा जाता है। अमेरिका, इंग्लैण्ड आदि देशों में एशिया के देशों के लोगों को बुरी निगाह से देखा जाता है। इन देशों में नस्ली हिंसा आम देखने को मिलती है। दक्षिणी अफ्रीका में रंगभेद की नीति काफ़ी चली है।

9. जाति (Caste)—भारत जैसे देश में जहां जाति प्रथा सदियों से भारतीय समाज में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती आ रही है, जाति वर्ग निर्धारण का बहुत महत्त्वपूर्ण आधार थी। जाति जन्म पर आधारित होती है। जिस जाति में व्यक्ति ने जन्म लिया है वह अपनी योग्यता से भी उसको बदल नहीं सकता।

10. स्थिति चिन्ह (Status symbol) स्थिति चिन्ह लगभग हर एक समाज में व्यक्ति की वर्ग व्यवस्था को निर्धारित करता है। आजकल के समय, कोठी, कार, टी० वी०, टैलीफोन, फ्रिज आदि का होना व्यक्ति की स्थिति को निर्धारित करता है। इस प्रकार किसी व्यक्ति के पास अच्छा जीवन व्यतीत करने वाली कितनी सुविधाएं हैं। यह सब स्थिति चिन्हों में शामिल होती हैं, जो व्यक्ति की स्थिति को निर्धारित करते हैं।

इस विवरण के आधार पर हम इस परिणाम पर पहुँचे हैं कि व्यक्ति के वर्ग के निर्धारण में केवल एक कारक ही उत्तरदायी नहीं होता, बल्कि कई कारक उत्तरदायी होते हैं।

प्रश्न 8. जाति व वर्ग में अन्तर बताओ।
उत्तर-सामाजिक स्तरीकरण के दो मुख्य आधार जाति व वर्ग हैं। जाति को एक बन्द व्यवस्था व वर्ग को एक खुली व्यवस्था कहा जाता है। पर वर्ग अधिक खुली अवस्था नहीं है क्योंकि किसी भी वर्ग को अन्दर जाने के लिए सख्त मेहनत करनी पड़ती है व उस वर्ग के सदस्य रास्ते में काफ़ी रोड़े अटकाते हैं। कई विद्वान् यह कहते हैं कि जाति व वर्ग में कोई विशेष अन्तर नहीं है परन्तु दोनों का यदि गहराई से अध्ययन किया जाए तो यह पता चलेगा कि दोनों में काफ़ी अन्तर है। इनका वर्णन नीचे लिखा है-

1. जाति जन्म पर आधारित होती है पर वर्ग का आधार कर्म होता है (Caste is based on birth but class is based on action)—जाति व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता जन्म पर आधारित होती है। व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता है, वह तमाम आयु उसी से जुड़ा होता है।

वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता शिक्षा, आय, व्यापार योग्यता पर आधारित होती है। व्यक्ति जब चाहे अपनी सदस्यता बदल सकता है। एक ग़रीब वर्ग से सम्बन्धित व्यक्ति मेहनत करके अपनी सदस्यता अमीर वर्ग से ही जोड़ सकता है। वर्ग की सदस्यता योग्यता पर आधारित होती है। यदि व्यक्ति में योग्यता नहीं है व वह कर्म नहीं करता है तो वह उच्च स्थिति से निम्न स्थिति में भी जा सकता है। यदि वह कर्म करता है तो वह निम्न स्थिति से उच्च स्थिति में भी जा सकता है। जिस प्रकार जाति धर्म पर आधारित है पर वर्ग कर्म पर आधारित होता है।

2. जाति का पेशा निश्चित होता है पर वर्ग का नहीं (Occupation of caste is determined but not of Class)-जाति प्रथा में पेशे की व्यवस्था भी व्यक्ति के जन्म पर ही आधारित होती थी अर्थात् विभिन्न जातियों से सम्बन्धित पेशे होते थे। व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता था, उसको जाति से सम्बन्धित पेशा अपनाना होता था। वह सारी उम्र उस पेशे को बदल कर कोई दूसरा कार्य भी नहीं अपना सकता था। इस प्रकार न चाहते हुए भी उसको अपनी जाति के पेशे को ही अपनाना पड़ता था।

वर्ग व्यवस्था में पेशे के चुनाव का क्षेत्र बहुत विशाल है। व्यक्ति की अपनी इच्छा होती है कि वह किसी भी पेशे को अपना ले। विशेष रूप से व्यक्ति जिस पेशे में माहिर होता था कि वह किसी भी पेशे को अपना लेता है। विशेष रूप से पर व्यक्ति जिस पेशे में माहिर होता है वह उसी पेशे को अपनाता है क्योंकि उसका विशेष उद्देश्य लाभ प्राप्ति की ओर होता था व कई बार यदि वह एक पेशे को करते हुए तंग आ जाता है तो वह दूसरे किसी और पेशे को भी अपना सकता है। इस प्रकार पेशे को अपनाना व्यक्ति की योग्यता पर आधारित होता है।

3. जाति की सदस्यता प्रदत्त होती है पर वर्ग की सदस्यता अर्जित होती है (Membership of Caste is ascribed but membership of class is achieved)-जाति व्यवस्था में व्यक्ति की स्थिति उसकी जाति से सम्बन्धित होती थी अर्थात् स्थिति वह स्वयं प्राप्त नहीं करता था बल्कि जन्म से ही सम्बन्धित होती थी। इसी कारण व्यक्ति की स्थिति के लिए ‘प्रदत्त’ (ascribed) शब्द का उपयोग किया जाता था। इसी कारण जाति व्यवस्था में स्थिरता बनी रहती थी। व्यक्ति का पद वह ही होता था जो उसके परिवार का हो। वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति की स्थिति ‘अर्जित’ (achieved) होती है भाव कि उसको समाज में अपनी स्थिति प्राप्त करनी पड़ती है। इसी कारण व्यक्ति शुरू से ही मेहनत करनी शुरू कर देता है। व्यक्ति अपनी योग्यता के आधार पर निम्न स्थिति से उच्च स्थिति भी प्राप्त कर लेता है। इसमें व्यक्ति के जन्म का कोई महत्त्व नहीं होता। व्यक्ति की मेहनत व योग्यता उसके वर्ग व स्थिति के बदलने में महत्त्वपूर्ण होती है।

4. जाति बन्द व्यवस्था है व वर्ग खुली व्यवस्था है (Caste is a closed system but class is an open system)-जाति प्रथा स्तरीकरण का बन्द समूह होता है क्योंकि व्यक्ति को सारी उम्र सीमाओं में बन्ध कर रहना पड़ता है। न तो वह जाति बदल सकता है न ही पेशा। श्रेणी व्यवस्था स्तरीकरण का खुला समूह होता है। इस प्रकार व्यक्ति को हर किस्म की आज़ादी होती है। वह किसी भी क्षेत्र में मेहनत करके आगे बढ़ सकता है। उसको समाज में अपनी निम्न स्थिति से ऊपर की स्थिति की ओर बढ़ने के पूरे मौके भी प्राप्त होते हैं। वर्ग का दरवाज़ा प्रत्येक के लिए खुला होता है। व्यक्ति अपनी योग्यता, सम्पत्ति, मेहनत के अनुसार किसी भी वर्ग का सदस्य बन सकता है व वह अपनी सारी उम्र में कई वर्गों का सदस्य बनता है।

5. जाति व्यवस्था में कई पाबन्दियां होती हैं परन्तु वर्ग में कोई नहीं होती (There are many restrictions in caste system but not in any class)-जाति प्रथा द्वारा अपने सदस्यों पर कई पाबन्दियां लगाई जाती थीं।

खान-पान सम्बन्धी, विवाह, सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करने आदि सम्बन्धी बहत पाबन्दियां थीं। व्यक्ति की ज़िन्दगी पर जाति का पूरा नियन्त्रण होता था। वह उन पाबिन्दयों को तोड़ भी नहीं सकता था। __ वर्ग व्यवस्था में व्यक्तिगत आज़ादी होती थी। भोजन, विवाह आदि सम्बन्धी किसी किस्म का कोई नियन्त्रण नहीं होता था। किसी भी वर्ग का व्यक्ति दूसरे वर्ग के व्यक्ति से सामाजिक सम्बन्ध स्थापित कर सकता था।

6. जाति में चेतनता नहीं होती पर वर्ग में चेतनता होती है (There is no caste consciousness but there is class consciousness)-जाति व्यवस्था में जाति चेतनता नहीं पाई जाती थी। इसका एक कारण तो था कि चाहे निम्न जाति के व्यक्ति को पता था कि उच्च जातियों की स्थिति उच्च है, परन्तु फिर भी वह इस सम्बन्धी कुछ नहीं कर सकता था। इसी कारण वह परिश्रम करना भी बन्द कर देता था। उसको अपनी योग्यता अनुसार समाज में कुछ भी प्राप्त नहीं होता था।

वर्ग के सदस्यों में वर्ग चेतनता पाई जाती थी। इसी चेतनता के आधार पर तो वर्ग का निर्माण होता था। व्यक्ति इस सम्बन्धी पूरा चेतन होता था कि वह कितना परिश्रम करे ताकि उच्च वर्ग स्थिति को प्राप्त कर सके। इसी प्रकार वह हमेशा अपनी योग्यता को बढ़ाने की ओर ही लगा रहता था।

Class 11 Sociology Solutions Chapter 10 सामाजिक स्तरीकरण Notes

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (Textual Questions)

I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1-15 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. सामाजिक स्तरीकरण से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-समाज को अलग-अलग आधारों पर अलग-अलग स्तरों में बांटे जाने की प्रक्रिया को सामाजिक स्तरीकरण कहा जाता है।

प्रश्न 2. सामाजिक स्तरीकरण के रूपों के नाम लिखो।
उत्तर-सामाजिक स्तरीकरण के चार रूप हैं तथा वह हैं-जाति, वर्ग, जागीरदारी व दासता।

प्रश्न 3. सामाजिक स्तरीकरण के तत्त्वों के नाम लिखो।
उत्तर-यह सर्वव्यापक है, यह सामाजिक है, इसमें असमानता होती है तथा प्रत्येक समाज में इसका अलग आधार होता है।

प्रश्न 4. जागीर व्यवस्था क्या है ?
उत्तर-मध्यकालीन यूरोप की वह व्यवस्था जिसमें एक व्यक्ति को बहुत सी भूमि देकर जागीरदार बनाकर उसे लगान एकत्र करने की आज्ञा दी जाती थी।

प्रश्न 5. शब्द ‘जाति’ कहां से लिया गया है ?
उत्तर-शब्द जाति (Caste) स्पैनिश तथा पुर्तगाली शब्द Caste से निकला है जिसका अर्थ है प्रजाति या वंश।

प्रश्न 6. वर्ण व्यवस्था क्या है ?
उत्तर-प्राचीन भारतीय समाज की वह व्यवस्था जिसमें समाज को पेशे के आधार पर चार भागों में विभाजित कर दिया जाता था।

प्रश्न 7. हिन्दू समाज में जाति व्यवस्था की श्रेणीबद्धता स्थितियों के नाम लिखो।
उत्तर-प्राचीन समय के हिन्दू समाज के चार वर्ण थे-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र।

प्रश्न 8. छुआ-छूत से तुम क्या समझते हो ?
उत्तर-जाति व्यवस्था के समय अलग-अलग जातियों को एक-दूसरे को स्पर्श करने की मनाही थी जिसे अस्पृश्यता कहते थे।

प्रश्न 9. कुछ सुधारकों के नाम लिखो जिन्होंने छुआ छूत के खिलाफ विरोध प्रकट किया ।
उत्तर-राजा राम मोहन राय, ज्योतिबा फूले, महात्मा गांधी, डॉ० बी० आर० अंबेदकर इत्यादि।

प्रश्न 10. वर्ग क्या है ?
उत्तर-वर्ग लोगों का वह समूह है जिनमें किसी न किसी आधार पर समानता होती है जैसे कि पैसा, पेशा, सम्पत्ति इत्यादि।

प्रश्न 11. वर्ग व्यवस्था के किस्सों के नाम लिखो।
उत्तर- मुख्य रूप से तीन प्रकार के वर्ग पाए जाते हैं-उच्च वर्ग, मध्य वर्ग तथा निम्न वर्ग।

प्रश्न 12. मार्क्स ने कौन-से वर्गों का वर्णन किया है ?
उत्तर-पूंजीपति वर्ग तथा मजदूर वर्ग।

II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30-35 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. सामाजिक असमानता क्या है ?
उत्तर-जब समाज के सभी व्यक्तियों को अपने व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के मौके प्राप्त न हों, उनमें जाति, जन्म, प्रजाति, रंग, पैसा, पेशे के आधार पर अंतर हो तथा अलग-अलग समूहों में अलग-अलग आधारों पर अंतर पाया जाता हो तो इसे असमानता का नाम दिया जाता है।

प्रश्न 2. सामाजिक स्तरीकरण के रूपों के नाम लिखो।
उत्तर-(i) जाति-जाति स्तरीकरण का एक रूप है जिसमें अलग-अलग जातियों के बीच स्तरीकरण पाया जाता है। (ii) वर्ग-समाज में बहुत से वर्ग पाए जाते हैं तथा उनमें अलग-अलग आधारों पर अंतर पाया जाता है।

प्रश्न 3. जाति व्यवस्था की दो विशेषताएं लिखो।
उत्तर-

  1. जाति की सदस्यता जन्म पर आधारित होती है तथा व्यक्ति योग्यता होते हुए भी इसे बदल नहीं सकता है।
  2. जाति एक अन्तर्वैवाहिक समूह होता था तथा अलग-अलग जातियों के बीच विवाह करवाने की पांबदी थी।

प्रश्न 4. अन्तर्विवाह क्या है ?
उत्तर-अन्तर्विवाह विवाह करवाने का ही एक प्रकार है जिसके अनुसार व्यक्ति को अपने समूह अर्थात् जाति या उपजाति में ही विवाह करवाना पड़ता था। अगर कोई इस नियम को तोड़ता था तो उसे जाति से बाहर निकाल दिया जाता था। इस कारण सभी अपने समूह में ही विवाह करवाते थे।

प्रश्न 5. प्रदूषण तथा शुद्धता से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-जाति व्यवस्था का क्रम पवित्रता तथा अपवित्रता के संकल्प के साथ जुड़ा हुआ था। इसका अर्थ है कि कुछ जातियों को परंपरागत रूप से शुद्ध समझा जाता था तथा उन्हें समाज में उच्च स्थिति प्राप्त थी। कुछ जातियों को प्रदूषित समझा जाता था तथा उन्हें सामाजिक व्यवस्था में उन्हें निम्न स्थान प्राप्त था।

प्रश्न 6. औद्योगीकरण तथा नगरीकरण पर संक्षिप्त रूप में लिखो।
उत्तर-औद्योगीकरण का अर्थ है देश में बड़े-बड़े उद्योगों का बढ़ाना। जब गांवों के लोग नगरों की तरफ जाएं तथा वहां रहने लग जाए तो इस प्रक्रिया को नगरीकरण कहा जाता है। औद्योगीकरण तथा नगरीकरण की प्रक्रिया ने जाति व्यवस्था को खत्म करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

प्रश्न 7. वर्ग व्यवस्था की दो विशेषताएं लिखो।
उत्तर-

  1. प्रत्येक वर्ग में इस बात की चेतना होती है कि उसका पद अथवा सम्मान दूसरी श्रेणी की तुलना में अधिक है।
  2. इसमे लोग अपनी ही श्रेणी के सदस्यों के साथ गहरे संबंध रखते हैं तथा दूसरी श्रेणी के लोगों के साथ उनके संबंध सीमित होते हैं।

प्रश्न 8. नई मध्यम वर्ग पर संक्षिप्त रूप में लिखो।
उत्तर-पिछले कुछ समय से समाज में एक नया मध्य वर्ग सामने आया है। इस वर्ग में डॉक्टर, इंजीनियर, मैनेजर, अध्यापक, छोटे-मोटे व्यापारी, नौकरी पेशा लोग होते हैं। उच्च वर्ग इस मध्य वर्ग की सहायता से निम्न वर्ग का शोषण करता है।

III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 75-85 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. सामाजिक स्तरीकरण की चार विशेषताएं लिखिए।
उत्तर-

  1. स्तरीकरण एक सर्वव्यापक प्रक्रिया है। कोई भी मानवीय समाज ऐसा नहीं जहां स्तरीकरण की प्रक्रिया न पाई जाती हो।
  2. स्तरीकरण में समाज के प्रत्येक सदस्य की स्थिति समान नहीं होती। किसी की स्थिति उच्च तथा किसी
    की निम्न होती है।
  3. स्तरीकरण में समाज का विभाजन विभिन्न स्तरों में होता है जो व्यक्ति की स्थिति को निर्धारित करती है। वर्गों में उच्चता निम्नता के संबंध होते हैं।
  4. चाहे इसमें अलग-अलग स्तरें होती हैं परन्तु उन स्तरों में आपसी निर्भरता भी पाई जाती है।

प्रश्न 2. किस प्रकार वर्ग सामाजिक स्तरीकरण से संबंधित है ?
उत्तर-सामाजिक स्तरीकरण से वर्ग हमेशा ही संबंधित रहा है। अलग-अलग समाजों में अलग-अलग वर्ग पाए जाते हैं। चाहे प्राचीन समाज हों या आधुनिक समाज, इनमें अलग-अलग आधारों पर वर्ग पाए जाते हैं। यह आधार पेशा, पैसा, जाति, धर्म, प्रजाति, भूमि इत्यादि होते हैं। इन आधारों पर कई प्रकार के वर्ग मिलते हैं।

प्रश्न 3. जाति तथा वर्ग व्यवस्था में अंतर बताइए।
उत्तर-

वर्ग- जाति-
(i) वर्ग के सदस्यों की व्यक्तिगत योग्यता से उनकी सामाजिक स्थिति बनती है। (i) जाति में व्यक्तिगत योग्यता का कोई स्थान नहीं होता था तथा सामाजिक स्थिति जन्म के आधार पर होती थी।
(ii) वर्ग की सदस्यता हैसियत, पैसे इत्यादि के आधार पर होती है। (ii) जाति की सदस्यता जन्म पर आधारित होती थी।
(iii) वर्ग में व्यक्ति को अधिक स्वतंत्रता होती है। (iii) जाति में व्यक्ति के ऊपर खाने-पीने, संबंधों इत्यादि का बहुत-सी पाबंदियां होती थीं।
(iv) वर्गों में आपसी दूसरी काफ़ी कम होती है। (iv) जातियों में आपसी दूरी काफ़ी अधिक होती थी।
(v) वर्ग व्यवस्था प्रजातंत्र के सिद्धान्त पर आधारित है। (v) जाति व्यवस्था प्रजातंत्र के सिद्धांत के विरुद्ध है।

प्रश्न 4. जाति व्यवस्था में परिवर्तन के चार कारक लिखो।
उत्तर-

  1. भारत में 19वीं तथा 20वीं शताब्दी के बीच सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन चले जिनके कारण जाति व्यवस्था को काफ़ी धक्का लगा।
  2. भारत सरकार ने स्वतंत्रता के पश्चात् बहुत से कानून पास किए तथा संविधान में कई प्रकार के प्रावधान रखे जिनकी वजह से जाति व्यवस्था में कई परिवर्तन आए।
  3. देश में उद्योगों के बढ़ने से अलग-अलग जातियों के लोग इकट्ठे मिलकर कार्य करने लग गए तथा जाति के प्रतिबंध खत्म हो गए।
  4. नगरों में अलग-अलग जातियों के लोग रहते हैं जिस कारण जाति व्यवस्था की मेलजोल की पाबंदी खत्म हो गई। (v) शिक्षा के प्रसार ने भी जाति व्यवस्था को खत्म करने में काफ़ी योगदान दिया।

प्रश्न 5. सामाजिक स्तरीकरण के प्रमुख रूपों के रूप में जाति तथा वर्ग के बीच अंतर बताइए।
उत्तर-

वर्ग- जाति-
(i) वर्ग के सदस्यों की व्यक्तिगत योग्यता से उनकी सामाजिक स्थिति बनती है। (i) जाति में व्यक्तिगत योग्यता का कोई स्थान नहीं होता था तथा सामाजिक स्थिति जन्म के आधार पर होती थी।
(ii) वर्ग की सदस्यता हैसियत, पैसे इत्यादि के आधार पर होती है। (ii) जाति की सदस्यता जन्म पर आधारित होती थी।
(iii) वर्ग में व्यक्ति को अधिक स्वतंत्रता होती है। (iii) जाति में व्यक्ति के ऊपर खाने-पीने, संबंधों इत्यादि का बहुत-सी पाबंदियां होती थीं।
(iv) वर्गों में आपसी दूसरी काफ़ी कम होती है। (iv) जातियों में आपसी दूरी काफ़ी अधिक होती थी।
(v) वर्ग व्यवस्था प्रजातंत्र के सिद्धान्त पर आधारित है। (v) जाति व्यवस्था प्रजातंत्र के सिद्धांत के विरुद्ध है।

 

IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 250-300 शब्दों में दें :

प्रश्न 1. स्तरीकरण को परिभाषित करो। सामाजिक स्तरीकरण की क्या विशेषताएं हैं ?
उत्तर-जिस प्रक्रिया के द्वारा हम व्यक्तियों तथा समूहों को स्थिति पदक्रम के अनुसार स्तरीकृत करते हैं उसको स्तरीकरण का नाम दिया जाता है। शब्द स्तरीकरण अंग्रेजी भाषा के शब्द Stratification का हिन्दी रूपान्तर है जिसमें strata का अर्थ है स्तरें (Layers) । इस शब्द की उत्पत्ति लातीनी भाषा के शब्द Stratum से हुई है। इस व्यवस्था के द्वारा सामाजिक जीवन को व्यवस्थित करने के लिए अलग-अलग स्तरों में बांटा हुआ है। कोई भी दो व्यक्ति, स्वभाव या किसी और पक्ष से, एक समान नहीं होते हैं। इस असमानता की वजह से उनमें कार्य करने की योग्यता का गुण भी अलग होता है। इस वजह से असमान गुणों वाले व्यक्तियों को अलग-अलग वर्गों में बांटने से हमारा समाज व्यवस्थित रूप से कार्य करने लग जाता है। व्यक्ति को विभिन्न स्तरों में बांट कर उनके बीच उच्च या निम्न सम्बन्धों का वर्णन किया जाता है। चाहे उनकी स्थिति के आधार पर सम्बन्ध उच्च या निम्न होते हैं परन्तु फिर भी वह एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। इस उच्चता तथा निम्नता की अलग-अलग वर्गों में विभाजन को स्तरीकरण कहा जाता है।

अलग-अलग समाजों में स्तरीकरण भी अलग-अलग पाया जाता है। ज्यादातर व्यक्तियों को पैसे, शक्ति, सत्ता के आधार पर अलग किया जाता है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि सामाजिक स्तरीकरण का अर्थ अलग-अलग सामाजिक समूहों को अलग-अलग भागों में बांटने से होता है। सामाजिक स्तरीकरण की परिभाषा अलग-अलग समाजशास्त्रियों ने दी है जिसका वर्णन इस प्रकार है-

1. किंगस्ले डेविस (Kingsley Davis) के अनुसार, “सामाजिक असमानता अचेतन रूप से अपनाया गया एक ऐसा तरीका है जिसके द्वारा विभिन्न समाज यह विश्वास दिलाते हैं कि सबसे ज्यादा पदों को चेतन रूप से सबसे ज्यादा योग्य व्यक्तियों को रखा गया है। इसलिए प्रत्येक समाज में आवश्यक रूप से असमानता तथा सामाजिक स्तरीकरण रहना चाहिए।”

2. सोरोकिन (Sorokin) के अनुसार, “सामाजिक स्तरीकरण का अर्थ समाज की जनसंख्या का उच्च तथा निम्न पदक्रमात्मक तौर पर ऊपर आरोपित वर्गों में विभेदीकरण से है। इसको उच्चतम तथा निम्नतम सामाजिक स्तरों के विद्यमान होने के माध्यम से प्रकट किया जाता है। इस सामाजिक स्तरीकरण का सार तथा आधार समाज विशेष के सदस्यों में अधिकार तथा सुविधाएं, कर्तव्यों तथा ज़िम्मेदारियों, सामाजिक कीमतों तथा अभावों, सामाजिक शक्तियों तथा प्रभावों के असमान वितरण से होता है।”

3. पी० गिज़बर्ट (P.Gisbert) के अनुसार, “सामाजिक स्तरीकरण का अर्थ समाज को कुछ ऐसे स्थायी समूहों या वर्गों में बाँटने की व्यवस्था से है जिसके अन्तर्गत सभी समूह उच्चता तथा अधीनता के सम्बन्धों द्वारा एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।”

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि सामाजिक स्तरीकरण समाज को उच्च तथा निम्न अलग-अलग समूहों तथा व्यक्तियों की भूमिकाओं तथा पदों को निर्धारित करता है। इसमें जन्म, जाति, पैसा, लिंग, शक्ति इत्यादि के आधार पर तथा व्यक्तियों में पाए जाने वाले पदक्रम को दर्शाया जाता है। विभिन्न समूहों में उच्चता तथा निम्नता के सम्बन्ध पाए जाते हैं तथा व्यक्ति की स्थिति का समाज में निश्चित स्थान होता है। इसी के आधार पर व्यक्ति को समाज में सम्मान प्राप्त होता है।

स्तरीकरण की विशेषताएं या लक्षण (Features or Characteristics of Stratification)-

1. स्तरीकरण सामाजिक होता है (Stratification is Social) विभिन्न समाजों में स्तरीकरण के आधार अलग-अलग होते हैं। जब भी हम समाज में पाई जाने वाली चीज़ को दूसरी चीज़ से अलग करते हैं तो जब तक उस अलगपन को समाज के बाकी सदस्य स्वीकार नहीं कर लेते उस समय तक उस विभिन्नता को स्तरीकरण का आधार नहीं माना जाता। कहने का अर्थ है कि जब तक समूह के व्यक्ति स्तरीकरण को निर्धारित न करें उस समय तक स्तरीकरण नहीं पाया जा सकता। हम स्तरीकरण को उस समय मानते हैं जब समाज के सभी सदस्य असमानताओं को मान लेते हैं। इस तरह सभी के मानने के कारण हम कह सकते हैं कि स्तरीकरण सामाजिक होता

2. स्तरीकरण सर्वव्यापक प्रक्रिया है (Stratification is a Universal Process)-सामाजिक स्तरीकरण की प्रक्रिया हरेक समाज में पाई जाती है। यदि हम प्राचीन भारतीय कबाइली या किसी और समाज की तरफ देखें तो हमें पता चलता है कि कुछ न कुछ भिन्नता तो उस समय भी पाई जाती थी। लिंग की भिन्नता तो प्राकृतिक है जिसके आधार पर व्यक्तियों को बाँटा जा सकता है। आधुनिक तथा जटिल समाज में तो स्तरीकरण के कई आधार हैं। कहने का अर्थ यह है कि स्तरीकरण के आधार चाहे अलग-अलग समाजों में अलग-अलग रहे हैं, परन्तु स्तरीकरण प्रत्येक समाज में सर्वव्यापक रहा है। .

3. अलग-अलग वर्गों की असमान स्थिति (Inequality of status of different classes)-सामाजिक स्तरीकरण में व्यक्तियों की स्थिति या भूमिका समान नहीं होती है। किसी की सब से उच्च, किसी की उससे कम तथा किसी की बहुत निम्न होती है। व्यक्ति की स्थिति सदैव एक समान नहीं रहती। उसमें परिवर्तन आते रहते हैं। कभी वह उच्च स्थिति पर पहुंच जाता है तथा कभी निम्न स्थिति पर। कहने का अर्थ है कि व्यक्ति की स्थिति में असमानता पाई जाती है। यदि किसी की स्थिति पैसे के आधार पर उच्च है तो किसी की इस आधार पर निम्न होती है।

4. उच्चता तथा निम्नता का सम्बन्ध (Relation of Upper and Lower Class)-स्तरीकरण में समाज को विभिन्न स्तरों में बांटा होता है जो व्यक्ति की स्थिति को निर्धारित करती हैं। मुख्य रूप से समाज को दो भागों में बांटा होता है-उच्चतम तथा निम्नतम । समाज में एक तरफ वह लोग होते हैं जिनकी स्थिति उच्च होती है तथा दूसरी तरफ वह लोग होते हैं जिनकी स्थिति निम्न होती है। इनके बीच भी कई वर्ग स्थापित हो जाते हैं जैसे कि मध्यम उच्च वर्ग, मध्यम निम्न वर्ग। परन्तु इनमें उच्च तथा निम्न का सम्बन्ध ज़रूर होता है।

5. स्तरीकरण अन्तक्रियाओं को सीमित करती है (Stratification restricts interaction)-स्तरीकरण की प्रक्रिया में अन्तक्रियाएं विशेष स्तर तक ही सीमित होती हैं। साधारणतः हम देखते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्तर के सदस्यों के साथ ही सम्बन्ध स्थापित करता है। इस वजह से वह अपने दिल की बात उनसे share करता है। व्यक्ति की मित्रता भी उसके अपने स्तर के सदस्यों के साथ ही होती है। इस प्रकार व्यक्ति की अन्तक्रिया और स्तरों के सदस्यों के साथ नहीं बल्कि अपनी ही स्तर के सदस्यों के होती है। कई बार व्यक्ति दूसरी स्तर के सदस्यों से सम्पर्क रख कर अपने आप को adjust नहीं कर सकता।

6. स्तरीकरण प्रतियोगिता की भावना को विकसित करती है (It develops the feeling of competition)-स्तरीकरण की प्रक्रिया व्यक्ति में परिश्रम तथा लगन की भावना पैदा करती है। इसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी सामाजिक स्थिति के बारे में चेतन होता है। वह हमेशा आगे बढ़ने की कोशिश करनी शुरू कर देता है क्योंकि उसको अपने से उच्च स्थिति वाले व्यक्ति नज़र आते हैं। व्यक्ति अपनी योग्यता का प्रयोग करके प्रतियोगिता में आगे बढ़ना चाहता है। इस प्रकार व्यक्ति की उच्च स्तर के लिए पाई गई चेतनता व्यक्ति में प्रतियोगिता की भावना पैदा करती है। प्रत्येक व्यक्ति में अपने आप को समाज में ऊँचा उठाने की इच्छा होती है तथा वह अपने परिश्रम के साथ अपनी इच्छा पूर्ण कर सकता है। वह परिश्रम करता है तथा और वर्गों के व्यक्तियों के साथ प्रतियोगिता करता है। इस तरह वह अपने आप को ऊँचा उठा सकता है।

प्रश्न 2. सामाजिक स्तरीकरण के रूपों के बारे में विस्तृत रूप में विचार विमर्श करो।
उत्तर-1. वर्ण स्तरीकरण (Varna Stratification)-वर्ण स्तरीकरण में जातीय भिन्नता तथा व्यक्ति की योग्यता तथा स्वभाव काफ़ी महत्त्वपूर्ण आधार है। शुरू में भारत में आर्य लोगों के आने के बाद भारतीय समाज दो भागों आर्यों तथा दस्यु या original inhabitants में बंट गया था। बाद में आर्य लोग, जिन्हें द्विज भी कहा जाता था, अपने गुणों तथा स्वभाव के आधार पर चार वर्णों में विभाजित हो गए। इस तरह समाज चार वर्णों या चार हिस्सों में बंट गया था तथा स्तरीकरण का यह स्वरूप हमारे सामने आया। इस पदक्रम में ब्राह्मण की स्थिति सबसे उच्च होती थी। इस व्यवस्था में प्रत्येक वर्ण का कार्य निश्चित तथा एक-दूसरे से भिन्न थे। वर्ण व्यवस्था का आरम्भिक रूप जन्म पर आधारित नहीं था बल्कि व्यक्ति के गुणों पर आधारित था जिसमें व्यक्ति अपने गुणों तथा आदतों को बदल कर अपना वर्ण परिवर्तित कर सकता था। परन्तु वर्ण बदलना एक कठिन कार्य था जिसे आसानी से नहीं बदला जा सकता था।

2. दासता या गुलामी का स्तरीकरण (Slavery Stratification)-दास एक मनुष्य होता है जो किसी और मनुष्य के पूरी तरह नियन्त्रण में होता है। वह अपने मालिक की दया पर जीता है जिसे कोई अधिकार भी नहीं होता. है। मालिक कुछ एक मामलों में उसकी सुरक्षा करता है जैसे कि उसे किसी और का दास बनने से रोकना। परन्तु वह अधिकारविहीन व्यक्ति होता है जिसे कोई अधिकार प्राप्त नहीं होता है। वह पूरी तरह अपने मालिक की सम्पत्ति माना जाता है। इस तरह दास प्रथा वाले समाजों में बहुत ज्यादा असमानता पाई जाती है। अमेरिका, अफ्रीका इत्यादि महाद्वीपों में यह प्रथा 19वीं शताब्दी में पाई जाती थी। इसमें दास अपने मालिक के अधीन होता था तथा मालिक उसे किसी और के हाथों बेच भी सकता था। दास एक तरह से मालिक की सम्पत्ति था। दास की इस निम्न स्थिति की वजह से उसे कोई अधिकार प्राप्त नहीं थे जिस वजह से उसे समाज में कोई अधिकार प्राप्त नहीं थे। क्योंकि वह मालिक के अधीन होता था जिस वजह से मालिक उससे कठोर परिश्रम करवाता था तथा वह करने को मजबूर था। दासों को खरीदा तथा बेचा भी जाता था।

आधुनिक समय आते-आते दास प्रथा का विरोध होने लग गया जिस वजह से यह प्रथा धीरे-धीरे खत्म हो गई तथा दासों ने किसानों का रूप ले लिया परन्तु इन समाजों में दास तथा मालिक के रूप में स्तरीकरण पाया जाता था।

3. सामन्तवाद (Feudalism)—दास प्रथा के साथ-साथ सामन्तवाद भी सामने आया। सामन्त लोग बहुत सारी ज़मीन के टुकड़े के मालिक होते थे तथा वह अपनी ज़मीन खेती करने के लिए और लोगों को या तो किराए पर दिया करते थे या पैदावार का बंटवारा करते थे। मध्य काल में तो सामन्त प्रथा को यूरोप में कानूनी तौर पर मान्यता प्राप्त थी। प्रत्येक सामन्त की एक विशेष स्थिति, विशेषाधिकार तथा कर्त्तव्य हुआ करते थे। उस समय में ज़मीन पर कृषि करने वाले लोगों के अधिकार काफ़ी कम हुआ करते थे। वह न्याय प्राप्त नहीं कर सकते थे तथा सामन्तों के रहमोकरम पर निर्भर होते थे। इस समय में श्रम विभाजन भी होता था। सामन्त प्रथा में सरदारों तथा पुजारियों के हाथ में सत्ता होती थी। भारत में ज़मींदार तो थे, परन्तु सामन्त प्रथा के लक्षण जाति प्रथा की वजह से नहीं थे। भारत में पाए जाने वाले ज़मींदार यूरोप में पाए जाने वाले सामन्तों से भिन्न थे। भारत के ज़मींदार प्रजा से राजा के लिए कर उगाहने का कार्य करते थे तथा ज़रूरत पड़ने पर राजा को अपनी सेना भी देते थे। जब राजा कमज़ोर हो गए तो बहुत सारे ज़मींदारों तथा सामन्तों ने अपने अलग-अलग राज्य स्थापित कर लिए। इस तरह ज़मींदारी प्रथा या सामन्तवाद के समय भी सामाजिक स्तरीकरण समाज में पाया जाता था।

4. नस्ली स्तरीकरण अथवा प्रजातीय स्तरीकरण (Racial Stratification)-अलग-अलग समाजों में नस्ल के आधार पर भी स्तरीकरण पाया जाता है। नस्ल के आधार पर समाज को विभिन्न समूहों में बांटा हुआ होता है। मुख्यतः मनुष्य जाति की तीन नस्लें पाई जाती हैं-काकेशियन (सफेद), मंगोलाइड (पीले) तथा नीग्रोआइड (काले) लोग। इन उपरोक्त नस्लों में पदक्रम की व्यवस्था पाई जाती है। सफेद नस्ल काकेशियन को समाज में उच्च स्थान प्राप्त होता है। पीली नस्ल मंगोलाइड को बीच का स्थान तथा काली नस्ल नीग्रोआइड की समाज में सबसे निम्न स्थिति होती है। अमेरिका में आज भी काली नस्ल की तुलना में सफेद नस्ल को उत्तम समझा जाता है। सफेद नस्ल के व्यक्ति अपने बच्चों को अलग स्कूल में पढ़ने भेजते हैं। यहां तक कि आपस में विवाह तक नहीं करते। आधुनिक समाज में चाहे इस प्रकार के स्वरूप में कुछ परिवर्तन आ गए हैं परन्तु फिर भी यह स्तरीकरण का एक स्वरूप है। गोरे काले व्यक्तियों को अपने से निम्न समझते हैं जिस वजह से वह उनसे काफ़ी भेदभाव करते हैं। नस्ल के आधार पर गोरे तथा काले लोगों के रहने के स्तर, सुविधाओं तथा विशेषाधिकारों में फर्क पाया जाता है। आज भी हम पश्चिमी देशों में इस प्रकार का फर्क देख सकते हैं। पश्चिमी समाजों में इस प्रकार का स्तरीकरण देखने को मिलता है।

5. जातिगत स्तरीकरण (Caste Stratification)-जो स्तरीकरण जन्म के आधार पर होता है उसे जातिगत स्तरीकरण का नाम दिया जाता है क्योंकि बच्चे की जाति जन्म के साथ ही निश्चित हो जाती है। प्राचीन तथा परम्परागत भारतीय समाज में हम जातिगत स्तरीकरण के स्वरूप की उदाहरण देख सकते हैं। इसका भारतीय समाज में ज्यादा प्रभाव था कि भारत में विदेशों से आकर रहने लगे लोगों में भी जातिगत स्तरीकरण शुरू हो गया था। उदाहरणतः मुसलमानों में भी कई प्रकार की जातियां या समूह पाए जाते हैं। समय के साथ-साथ इन जातियों में हज़ारों उप-जातियां पैदा हो गईं तथा इन उप-जातियों में भी स्तरीकरण पाया जाता है। यह स्तरीकरण जन्म पर आधारित होता है इसलिए इसे बन्द स्तरीकरण का नाम दिया जाता है। स्तरीकरण का यह स्वरूप और स्वरूपों की तुलना में काफ़ी स्थिर तथा निश्चित था क्योंकि व्यक्ति ने जिस जाति में जन्म लिया होता है वह तमाम उम्र अपनी उस जाति को बदल नहीं सकता था। इस प्रकार के स्तरीकरण में अपनी जाति या समूह बदलना मुमकिन नहीं होता। इस तरह जातिगत आधार पर भी स्तरीकरण पाया जाता है।

6. वर्ग स्तरीकरण (Class Stratification)-इसको सर्वव्यापक स्तरीकरण भी कहते हैं क्योंकि इस प्रकार के स्तरीकरण का स्वरूप प्रत्येक समाज में मिल जाता है। इसको खुला स्तरीकरण भी कहते हैं। वर्ग स्तरीकरण चाहे आधुनिक समाजों में देखने को मिलता है परन्तु प्राचीन समाजों में भी स्तरीकरण का यह स्वरूप मिल जाता था। इस प्रकार का स्तरीकरण जीव वैज्ञानिक आधारों को छोड़कर सामाजिक सांस्कृतिक आधारों जैसे आय, पेशा, सम्पत्ति, सत्ता, धर्म, शिक्षा, कार्य-कुशलता इत्यादि के आधार पर देखने को मिलता है। इसमें व्यक्ति को एक निश्चित स्थान प्राप्त हो जाता है तथा समान स्थिति वाले व्यक्ति इकट्ठे होकर समाज में एक वर्ग या स्तर का निर्माण करते हैं। इस तरह समाज में अलग-अलग प्रकार के वर्ग या स्तर बन जाते हैं तथा उनमें उच्च निम्न के सम्बन्ध सामाजिक स्थिति निश्चित तथा स्पष्ट नहीं होती क्योंकि इसमें व्यक्ति की स्थिति कभी भी बदल सकती है। व्यक्ति परिश्रम करके पैसा कमा कर उच्च वर्ग में भी जा सकता है तथा पैसा खत्म होने की सूरत में निम्न वर्ग में भी आ सकता है। इस समाज में व्यक्ति के पद की महत्ता होती है। किसी समाज में कोई पद महत्त्वपूर्ण है तो किसी समाज में कोई पद। यह अन्तर प्रत्येक समाज की अलग-अलग संस्कृति, परम्पराओं, मूल्यों इत्यादि की वजह से होता है क्योंकि यह प्रत्येक समाज में अलग-अलग होते हैं। इस वजह से प्रत्येक समाज में स्तरीकरण के आधार भी अलगअलग होते हैं। इस तरह हमारे समाजों में वर्ग स्तरीकरण पाया जाता है।

प्रश्न 3. जाति व्यवस्था में परिवर्तन के कौन से कारक हैं ?
उत्तर-1. सामाजिक धार्मिक सुधार आंदोलन (Socio-religious reform movements)-भारत में अंग्रेज़ी साम्राज्य के स्थापित होने से पहले भी कुछ धार्मिक लहरों ने जाति प्रथा की आलोचना की थी। बुद्ध धर्म तथा जैन धर्म से लेकर इस्लाम तथा सिक्ख धर्म ने भी जाति प्रथा का खण्डन किया। इनके साथ-साथ इस्लाम तथा सिक्ख धर्म ने तो जाति प्रथा की जम कर आलोचना की। 19वीं शताब्दी में कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण समाज सुधार लहरों ने भी जाति प्रथा के विरुद्ध आन्दोलन चलाया। राजा राम मोहन राय की तरफ से चलाया गया ब्रह्मो समाज, दयानंद सरस्वती की तरफ से चलाया गया आर्य समाज, राम कृष्ण मिशन इत्यादि इनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण समाज सुधार लहरें थीं। इनके अतिरिक्त ज्योति राव फूले ने 1873 में सत्य शोधक समाज की स्थापना की जिसका मुख्य उद्देश्य समाज में सभी को समानता का दर्जा दिलाना था। जाति प्रथा की विरोधता तो महात्मा गांधी तथा डॉ० बी० आर० अंबेडकर ने भी की थी। महात्मा गांधी ने शोषित जातियों को हरिजन का नाम दिया तथा उन्हें अन्य जातियों की तरह समान अधिकार दिलाने के प्रयास किए। आर्य समाज ने मनुष्य के जन्म के स्थान पर उसके गुणों को अधिक महत्त्व दिया। इन सभी लोगों के प्रयासों से यह स्पष्ट हो गया कि मनुष्य की पहचान उसके गुणों से होनी चाहिए न कि उसके जन्म से।

2. भारत सरकार के प्रयास (Efforts of Indian Government)-अंग्रेजी राज्य के समय तथा भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात् कई महत्त्वपूर्ण कानून पास किए गए जिन्होंने जाति प्रथा को कमज़ोर करने में गहरा प्रभाव डाला। अंग्रेज़ी राज्य से पहले जाति तथा ग्रामीण पंचायतें काफ़ी शक्तिशाली थीं। यह पंचायतें तो अपराधियों को सज़ा तक दे सकती थीं तथा जुर्माने तक लगा सकती थी। अंग्रेजी शासन के दौरान जातीय असमर्थाएं दर करने का कानून (Caste Disabilities Removal Act, 1850) पास किया गया जिसने जाति पंचायतों को काफ़ी कमज़ोर कर दिया। इस प्रकार विशेष विवाह कानून (Special Marriage Act, 1872) ने अलग-अलग जातियों के बीच विवाह को मान्यता दी जिसने परम्परागत जाति प्रथा को गहरे रूप से प्रभावित किया। भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात् Untouchability Offence Act, 1955 7811 Hindu Marriage Act, 1955 À 47 Gila gent at TET 3779116 लगाया। Hindu Marriage Validation Act पास हुआ जिससे अलग-अलग धर्मों, जातियों, उपजातियों इत्यादि के व्यक्तियों के बीच होने वाले विवाह को कानूनी घोषित किया गया।

3. अंग्रेज़ों का योगदान (Contribution of Britishers)-जाति प्रथा के विरुद्ध एक खुला संघर्ष ब्रिटिश काल में शुरू हुआ। अंग्रेजों ने भारत में कानून के आगे सभी की समानता का सिद्धान्त लागू किया। जाति पर आधारित पंचायतों से उनके न्याय करने के अधिकार वापिस ले लिए गए। सरकारी नौकरियां प्रत्येक जाति के लिए खोल दी गईं। अंग्रेजों की शिक्षा व्यवस्था धर्म निष्पक्ष थी। अग्रेजों ने भारत में आधुनिक उद्योगों की स्थापना करके तथा रेलगाड़ियों, बसों इत्यादि की शुरुआत करके जाति प्रथा को करारा झटका दिया। उद्योगों में सभी मिल कर कार्य करते थे तथा रेलगाड़ियों, बसों के सफर ने अलग-अलग जातियों के बीच सम्पर्क स्थापित किया। अंग्रेज़ों की तरफ से भूमि की खुली खरीद-फरोख्त के अधिकार ने गाँवों में जातीय सन्तुलन को काफ़ी मुश्किल कर दिया।

4. औद्योगीकरण (Industrialization)-औद्योगीकरण ने ऐसी स्थितियां पैदा की जो जाति व्यवस्था के विरुद्ध थी। इस कारण उद्योगों में कई ऐसे नए कार्य उत्पन्न हो गए जो तकनीकी थे। इन्हें करने के लिए विशेष योग्यता तथा ट्रेनिंग की आवश्यकता थी। ऐसे कार्य योग्यता के आधार पर मिलते थे। इसके साथ सामाजिक संस्तरण में निम्न स्थानों पर मौजूद जातियों को ऊपर उठने का मौका प्राप्त हुआ। औद्योगीकरण ने भौतिकता में बढ़ोत्तरी करके पैसे के महत्त्व को बढ़ा दिया। पैसे के आधार पर तीन वर्ग-धनी वर्ग, मध्य वर्ग तथा निर्धन वर्ग पैदा हो गए। प्रत्येक वर्ग में अलग-अलग जातियों के लोग पाए जाते थे। औद्योगीकरण से अलग-अलग जातियों के लोग इकट्ठे उद्योगों में कार्य करने लग गए, इकट्ठे सफर करने लगे तथा इकट्ठे ही खाना खाने लगे जिससे अस्पृश्यता की भावना खत्म होनी शुरू हो गई। यातायात के साधनों के विकास के कारण अलग-अलग धर्मों तथा जातियों के बीच उदार दृष्टिकोण का विकास हुआ जोकि जाति व्यवस्था के लिए खतरनाक था। औद्योगीकरण ने द्वितीय सम्बन्धों को बढ़ाया तथा व्यक्तिवादिता को जन्म दिया जिससे सामुदायिक नियमों का प्रभाव बिल्कुल ही खत्म हो गया। सामाजिक प्रथाओं तथा परम्पराओं का महत्त्व खत्म हो गया। सामाजिक प्रथाओं तथा परम्पराओं का महत्त्व खत्म हो गया। सम्बन्ध कानून के अनुसार खत्म होने लग गए। अब सम्बन्ध आर्थिक स्थिति के आधार पर होते हैं। इस प्रकार औद्योगीकरण ने जाति प्रथा को काफ़ी गहरा आघात लगाया।

5. नगरीकरण (Urbanization)–नगरीकरण के कारण ही जाति प्रथा में काफ़ी परिवर्तन आए। अधिक जनसंख्या, व्यक्तिगत भावना, सामाजिक गतिशीलता तथा अधिक पेशों जैसी शहरी विशेषताओं ने जाति प्रथा को काफ़ी कमज़ोर कर दिया। बड़े-बड़े शहरों में लोगों को एक-दूसरे के साथ मिलकर रहना पड़ता है। वह यह नहीं देखते कि उनका पडोसी किस जाति का है। इससे उच्चता निम्नता की भावना खत्म हो गई। नगरीकरण के कारण जब लोग एक-दूसरे के सम्पर्क में आए तो अन्तर्जातीय विवाह होने लग गए। इस प्रकार नगरीकरण ने अस्पृश्यता के अन्तरों को काफ़ी हद तक दूर कर दिया।

6. शिक्षा का प्रसार (Spread of Education)-अंग्रेजों ने भारत में पश्चिमी शिक्षा प्रणाली को लागू किया जिसमें विज्ञान तथा तकनीक पर अधिक बल दिया जाता है। शिक्षा के प्रसार से लोगों में जागति आई तथा इसके साथ परम्परागत कद्रों-कीमतों में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आए। जन्म पर आधारित दर्जे के स्थान पर प्रतियोगिता में प्राप्त दर्जे का महत्त्व बढ़ गया। स्कूल, कॉलेज इत्यादि पश्चिमी तरीके से खुल गए जहां सभी जातियों के बच्चे इकट्ठे मिलकर शिक्षा प्राप्त करते हैं। इसने भी जाति प्रथा को गहरा आघात दिया।

प्रश्न 4. वर्ग व्यवस्था को परिभाषित कीजिए। इनकी विशेषताओं को लिखो।
उत्तर–प्रत्येक समाज कई वर्गों में विभाजित होता है व प्रत्येक वर्ग की समाज में भिन्न-भिन्न स्थिति होती है। इस स्थिति के आधार पर ही व्यक्ति को उच्च या निम्न जाना जाता है। वर्ग की मुख्य विशेषता वर्ग चेतनता होती है। इस प्रकार समाज में जब विभिन्न व्यक्तियों को विशेष सामाजिक स्थिति प्राप्त होती है तो उसको वर्ग व्यवस्था कहते हैं। प्रत्येक वर्ग आर्थिक पक्ष से एक-दूसरे से अलग होता है।

  1. मैकाइवर (MacIver) ने वर्ग को सामाजिक आधार पर बताया है। उस के अनुसार, “सामाजिक वर्ग एकत्रता वह हिस्सा होता है जिसको सामाजिक स्थिति के आधार पर बचे हुए हिस्से से अलग कर दिया जाता है।”
  2. मोरिस जिन्सबर्ग (Morris Ginsberg) के अनुसार, “वर्ग व्यक्तियों का ऐसा समूह है जो सांझे वंशक्रम, व्यापार सम्पत्ति के द्वारा एक सा जीवन ढंग, एक से विचारों का स्टाफ, भावनाएं, व्यवहार के रूप में रखते हों व जो इनमें से कुछ या सारे आधार पर एक-दूसरे से समान रूप में अलग-अलग मात्रा में पाई जाती हो।”
  3. गिलबर्ट (Gilbert) के अनुसार, “एक सामाजिक वर्ग व्यक्तियों की एकत्र विशेष श्रेणी है जिस की समाज में एक विशेष स्थिति होती है, यह विशेष स्थिति ही दूसरे समूहों से उनके सम्बन्ध निर्धारित करती है।”
  4. कार्ल मार्क्स (Karl Marx) के विचार अनुसार, “एक सामाजिक वर्ग को उसके उत्पादन के साधनों व सम्पत्ति के विभाजन से स्थापित होने वाले सम्बन्धों के सन्दर्भ में भी परिभाषित किया जा सकता है।”

उपरोक्त विवरण के आधार पर हम कह सकते हैं कि सामाजिक वर्ग कई व्यक्तियों का वर्ग होता है, जिसको समय विशेष में एक विशेष स्थिति प्राप्त होती है। इसी कारण उनको कुछ विशेष शक्ति, अधिकार व उत्तरदायित्व भी मिलते हैं। वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति की योग्यता महत्त्वपूर्ण होती है। इसी कारण हर व्यक्ति परिश्रम करके सामाजिक वर्ग में अपनी स्थिति को ऊँची करना चाहता है। प्रत्येक समाज विभिन्न वर्गों में विभाजित होता है। वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति की स्थिति निश्चित नहीं होती। उसकी स्थिति में गतिशीलता पाई जाती है। इस कारण यह खुला स्तरीकरण भी कहलाया जाता है। व्यक्ति अपनी वर्ग स्थिति को आप निर्धारित करता है। यह जन्म पर आधारित नहीं होता।

वर्ग की विशेषताएं (Characteristics of Class)-

1. श्रेष्ठता व हीनता की भावना (Feeling of superiority and inferiority)—वर्ग व्यवस्था में भी ऊँच व नीच के सम्बन्ध पाए जाते हैं। उदाहरणतः उच्च वर्ग के लोग निम्न वर्ग के लोगों से अपने आप को अलग व ऊँचा महसूस करते हैं। ऊँचे वर्ग में अमीर लोग आ जाते हैं व निम्न वर्ग में ग़रीब लोग। अमीर लोगों की समाज में उच्च स्थिति होती है व ग़रीब लोग भिन्न-भिन्न निवास स्थान पर रहते हैं। उन निवास स्थानों को देखकर ही पता लग जाता है कि वह अमीर वर्ग से सम्बन्धित हैं या ग़रीब वर्ग से।

2. सामाजिक गतिशीलता (Social mobility)-वर्ग व्यवस्था किसी भी व्यक्ति के लिए निश्चित नहीं होती। वह बदलती रहती है। व्यक्ति अपनी मेहनत से निम्न से उच्च स्थिति को प्राप्त कर लेता है व अपने गलत कार्यों के परिणामस्वरूप ऊंची से निम्न स्थिति पर भी पहुंच जाता है। प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी आधार पर समाज में अपनी इज्जत बढ़ाना चाहता है। इसी कारण वर्ग व्यवस्था व्यक्ति को क्रियाशील भी रखती है।

3. खुलापन (Openness)-वर्ग व्यवस्था में खुलापन पाया जाता है क्योंकि इसमें व्यक्ति को पूरी आजादी होती है कि वह कुछ भी कर सके। वह अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी व्यापार को अपना सकता है। किसी भी जाति का व्यक्ति किसी भी वर्ग का सदस्य अपनी योग्यता के आधार पर बन सकता है। निम्न वर्ग के लोग मेहनत करके उच्च वर्ग में आ सकते हैं। इसमें व्यक्ति के जन्म की कोई महत्ता नहीं होती। व्यक्ति की स्थिति उसकी योग्यता पर निर्भर करती है।

4. सीमित सामाजिक सम्बन्ध (Limited social relations)-वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति के सामाजिक सम्बन्ध सीमित होते हैं। प्रत्येक वर्ग के लोग अपने बराबर के वर्ग के लोगों से सम्बन्ध रखना अधिक ठीक समझते हैं। प्रत्येक वर्ग अपने ही लोगों से नज़दीकी रखना चाहते हैं। वह दूसरे वर्ग से सम्बन्ध नहीं रखना चाहता।

5. उपवर्गों का विकास (Development of Sub-Classes)-आर्थिक दृष्टिकोण से हम वर्ग व्यवस्था को तीन भागों में बाँटते हैं उच्च वर्ग, मध्य वर्ग तथा निम्न वर्ग। परन्तु आगे हर वर्ग कई और उपवर्गों में बाँटा होता है, जैसे एक अमीर वर्ग में भी भिन्नता नज़र आती है। कुछ लोग बहुत अमीर हैं, कुछ उससे कम व कुछ सबसे है। इस प्रकार वर्ग, उप वर्गों से मिल कर बनता है।

6. विभिन्न आधार (Different basis)-वर्ग के भिन्न-भिन्न आधार हैं। प्रसिद्ध समाजशास्त्री कार्ल मार्क्स ने आर्थिक आधार को वर्ग व्यवस्था का मुख्य आधार माना है। उसके अनुसार समाज में केवल दो वर्ग पाए गए हैं। एक तो पूंजीपति वर्ग, दूसरा श्रमिक वर्ग। हर्टन व हंट के अनुसार हमें याद रखना चाहिए कि वर्ग मूल में, विशेष जीवन ढंग है। ऑगबर्न व निमकौफ़, मैकाइवर गिलबर्ट ने वर्ग के लिए सामाजिक आधार को मुख्य माना है। जिन्ज़बर्ग, लेपियर जैसे वैज्ञानिकों ने सांस्कृतिक आधार को ही वर्ग व्यवस्था का मुख्य आधार माना है।

7. वर्ग पहचान (Identification of class)—वर्ग व्यवस्था में बाहरी दृष्टिकोण भी महत्त्वपूर्ण होता है। कई बार हम देख कर यह अनुमान लगा लेते हैं कि यह व्यक्ति उच्च वर्ग का है या निम्न का। हमारे आधुनिक समाज में कोठी, कार, स्कूटर, टी० वी०, वी० सी० आर, फ्रिज आदि व्यक्ति के स्थिति चिन्ह को निर्धारित करते हैं। इस प्रकार बाहरी संकेतों से हमें वर्ग भिन्नता का पता चल जाता है।

8. वर्ग चेतनता (Class Consciousness)—प्रत्येक सदस्य अपनी वर्ग स्थिति के प्रति पूरी तरह चेतन होता है। इसी कारण वर्ग चेतना, वर्ग व्यवस्था की मुख्य विशेषता है। वर्ग चेतना व्यक्ति को आगे बढ़ने के मौके प्रदान करती है क्योंकि चेतना के आधार पर ही हम एक वर्ग को दूसरे वर्ग से अलग करते हैं। व्यक्ति का व्यवहार भी इसके द्वारा ही निश्चित होता है।

प्रश्न 5. भारत में कौन-से नए वर्गों का उद्भव हुआ है ?
उत्तर-पिछले कुछ समय से देश में जाति व्यवस्था के स्थान पर वर्ग व्यवस्था सामने आ रही है। स्वतंत्रता के पश्चात् बहुत से कानून पास हुए, लोगों ने पढ़ना शुरू किया जिस कारण जाति व्यवस्था धीरे-धीरे खत्म हो रही है तथा वर्ग व्यवस्था का दायरा बढ़ रहा है। अब वर्ग व्यवस्था कोई साधारण संकल्प नहीं रहा। आधुनिक समय में अलग-अलग आधारों पर बहुत से वर्ग सामने आ रहे हैं। उदाहरण के लिए स्वतंत्रता के पश्चात् बहुत से भूमि सुधार किए गए जिस कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बहुत से परिवर्तन आए। हरित क्रान्ति ने इस प्रक्रिया में और योगदान दिया। पुराने किसान, जिनके पास काफ़ी भूमि थी, के साथ एक नया कृषक वर्ग सामने आया जिसके पास कृषि करने की तकनीकों की कला तथा तजुर्बा है। यह वह लोग हैं जो सेना या अन्य प्रशासनिक सेवाओं से सेवानिवृत्त होकर अपना पैसा कृषि के कार्यों में लगा रहे हैं तथा काफ़ी पैसा कमा रहे हैं। यह परंपरागत किसानों का उच्च वर्ग नहीं है, परन्तु इन्हें सैंटलमैन किसान (Gentlemen Farmers) कहा जाता है।

इसके साथ-साथ एक अन्य कृषक वर्ग सामने आ रहा है जिसे ‘पूंजीपति किसान’ कहा जाता है। यह वह किसान हैं जिन्होंने नई तकनीकों, अधिक फसल देने वाले बीजों, नई कृषि की तकनीकों, अच्छी सिंचाई सुविधाओं. बैंकों से उधार लेकर तथा यातायात व संचार के साधनों का लाभ उठाकर अच्छा पैसा कमाया है। परन्तु छोटे किसान इन सबका फायदा नहीं उठा सके हैं तथा निर्धन ही रहे हैं। इस प्रकार भूमि सुधारों तथा नई तकनीकों का लाभ सभी किसान समान रूप से नहीं उठा सके हैं। यह तो मध्यवर्गीय किसान हैं जिन्होंने सरकार की तरफ से उत्साहित करने वाली सुविधाओं का लाभ उठाया है। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग जातियों के किसानों ने कृषि की आधुनिक सुविधाओं का लाभ उठाया है। – इसके बाद मध्य वर्ग भी सामने आया जिसे उपभोक्तावाद की संस्कृति ने जन्म दिया है। इस मध्य वर्ग को संभावित मार्किट के रूप में देखा गया जिस कारण बहुत-सी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का वर्ग की तरफ आकर्षित हुई। अलग-अलग कंपनियों के विज्ञापनों में उच्च मध्य वर्ग को एक महत्त्वपूर्ण उपभोक्ता के रूप में देखा जाता है। आजकल यह ऐसा मध्य वर्ग सामने आ रहा है जो अपने स्वाद तथा उपभोग को सबसे अधिक महत्त्व देता है तथा एक सांस्कृतिक आदर्श बन रहा है। इस प्रकार नए मध्य वर्ग के उभार ने देश में आर्थिक उदारवाद के संकल्प को सामने लाया है।

आधुनिक भारत में मौजूद वर्ग व्यवस्था की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि सभी वर्गों ने एक देश के बीच एक राष्ट्रीय आर्थिकता बनाने में सहायता की है। अब मध्य वर्ग में गांवों के लोग भी शामिल हो रहे हैं। अब गांव में रहने वाले अलग-अलग कार्य करने वाले लोग अलग-अलग नहीं रह गए हैं। अब जाति आधारित प्रतिबंधों का खात्मा हो गया है तथा वर्ग आधारित चेतना सामने आ रही है।

प्रश्न 6. भारत में वर्ग व्यवस्था की मुख्य विशेषताएं बताओ।
उत्तर-

  1. भारत में 19वीं तथा 20वीं शताब्दी के बीच सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन चले जिनके कारण जाति व्यवस्था को काफ़ी धक्का लगा।
  2. भारत सरकार ने स्वतंत्रता के पश्चात् बहुत से कानून पास किए तथा संविधान में कई प्रकार के प्रावधान रखे जिनकी वजह से जाति व्यवस्था में कई परिवर्तन आए।
  3. देश में उद्योगों के बढ़ने से अलग-अलग जातियों के लोग इकट्ठे मिलकर कार्य करने लग गए तथा जाति के प्रतिबंध खत्म हो गए।
  4. नगरों में अलग-अलग जातियों के लोग रहते हैं जिस कारण जाति व्यवस्था की मेलजोल की पाबंदी खत्म हो गई। (v) शिक्षा के प्रसार ने भी जाति व्यवस्था को खत्म करने में काफ़ी योगदान दिया।

प्रश्न 7. मार्क्सवादी तथा वेबर का वर्ग परिप्रेक्षय क्या है ?
उत्तर-कार्ल मार्क्स ने सामाजिक स्तरीकरण का संघर्षवाद का सिद्धान्त दिया है और यह सिद्धान्त 19वीं शताब्दी के राजनीतिक और सामाजिक संघर्षों के कारण ही आगे आया है। मार्क्स ने केवल सामाजिक कारकों को ही सामाजिक स्तरीकरण एवं भिन्न-भिन्न वर्गों में संघर्ष का सिद्धान्त माना है।

मार्क्स ने यह सिद्धान्त श्रम विभाजन के आधार पर दिया। उसके अनुसार श्रम दो प्रकार का होता है-शारीरिक एवं बौद्धिक श्रम और यही अन्तर ही सामाजिक वर्गों में संघर्ष का कारण बना।

मार्क्स का कहना है कि समाज में साधारणत: दो वर्ग होते हैं। पहला वर्ग उत्पादन के साधनों का स्वामी होता है। दूसरा वर्ग उत्पादन के साधनों का मालिक नहीं होता है। इस मलकीयत के आधार पर ही पहला वर्ग उच्च स्थिति में एवं दूसरा वर्ग निम्न स्थिति में होता है। मार्क्स पहले (मालिक) वर्ग को पूंजीपति वर्ग और दूसरे (गैर-मालिक) वर्ग को मज़दूर वर्ग कहता है। पूंजीपति वर्ग, मज़दूर वर्ग का आर्थिक रूप से शोषण करता है और मज़दूर वर्ग अपने आर्थिक अधिकारों की प्राप्ति हेतु पूंजीपति वर्ग से संघर्ष करता है। यही स्तरीकरण का परिणाम है।

मार्क्स का कहना है कि स्तरीकरण के आने का कारण ही सम्पत्ति का असमान विभाजन है। स्तरीकरण की प्रकृति उस समाज के वर्गों पर निर्भर करती है और वर्गों की प्रकृति उत्पादन के तरीकों पर उत्पादन का तरीका , तकनीक पर निर्भर करता है। वर्ग एक समूह होता है जिसके सदस्यों के सम्बन्ध उत्पादन की शक्तियों के समान होते हैं, इस तरह वह सभी व्यक्ति जो उत्पादन की शक्तियों पर नियन्त्रण रखते हैं। वह पहला वर्ग यानि कि पूंजीपति वर्ग होता है जो उत्पादन की शक्तियों का मालिक होता है। दूसरा वर्ग वह है तो उत्पादन की शक्तियों का मालिक नहीं है बल्कि वह मजदूरी या मेहनत करके अपना समय व्यतीत करता है यानि कि यह मजदूर वर्ग कहलाता है। भिन्न-भिन्न समाजों में इनके भिन्न-भिन्न नाम हैं जिनमें ज़मींदारी समाज में ज़मींदार और खेतीहर मज़दूर और पूंजीपति समाज में पूंजीपति एवं मज़दूर । पूंजीपति वर्ग के पास उत्पादन की शक्ति होती है और मज़दूर वर्ग के पास केवल मजदूरी होती है जिसकी सहायता के साथ वह अपना गुजारा करता है। इस प्रकार उत्पादन के तरीकों एवं सम्पत्ति के समान विभाजन के आधार पर बने वर्गों को मार्क्स ने सामाजिक वर्ग का नाम दिया है।

मार्क्स के अनुसार “आज का समाज चार युगों में से गुजर कर हमारे सामने आया है।”

(a) प्राचीन समाजवादी युग (Primitive Ancient Society or Communism)
(b) प्राचीन समाज (Ancient Society)
(c) सामन्तवादी युग (Feudal Society)
(d) पूंजीवाद युग (Capitalist Society)

मार्क्स के अनुसार पहले प्रकार के समाज में वर्ग अस्तित्व में नहीं आये थे। परन्तु उसके पश्चात् के समाजों में दो प्रमुख वर्ग हमारे सामने आये। प्राचीन समाज में मालिक एवं दास। सामन्तवादी में सामन्त एवं खेतीहारी मजदूर वर्ग। पूंजीवादी समाज में पूंजीवादी एवं मजदूर वर्ग। प्रायः समाज में मजदूरी का कार्य दूसरे वर्ग के द्वारा ही किया गया। मजदूर वर्ग बहुसंख्यक होता है और पूंजीवादी वर्ग कम संख्या वाला।

मार्क्स ने प्रत्येक समाज में दो प्रकार के वर्गों का अनुभव किया है। परन्तु मार्क्स के फिर भी इस मामले में विचार एक समान नहीं है। मार्क्स कहता है कि पूंजीवादी समाज में तीन वर्ग होते हैं। मज़दूर, सामन्त एवं ज़मीन के मालिक (land owners) मार्क्स ने इन तीनों में से अन्तर आय के साधनों लाभ एवं जमीन के किराये के आधार पर किया है। परन्तु मार्क्स की तीन पक्षीय व्यवस्था इंग्लैण्ड में सामने कभी नहीं आई।

मार्क्स ने कहा था कि पूंजीवाद के विकास के साथ-साथ तीन वर्गीय व्यवस्था दो वर्गीय व्यवस्था में परिवर्तित हो जायेगी एवं मध्यम वर्ग समाप्त हो जायेगा। इस बारे में उसने कम्युनिष्ट घोषणा पत्र में कहा है। मार्क्स ने विशेष समाज के अन्य वर्गों का उल्लेख भी किया है। जैसे बुर्जुआ या पूंजीपति वर्ग को उसने दो उपवर्ग जैसे प्रभावी बुर्जुआ और छोटे बुर्जुआ वर्गों में बांटा है। प्रभावी बुर्जुआ वह होते हैं जो बड़े-बड़े पूंजीपति व उद्योगपति होते हैं और जो हज़ारों की संख्या में मजदूरों को कार्य करने को देते हैं। छोटे बुर्जुआ वह छोटे उद्योगपति या दुकानदार होते हैं जिनके व्यापार छोटे स्तर पर होते हैं और वह बहुत अधिक मज़दूरों को कार्य नहीं दे सकते। वह काफ़ी सीमा तक स्वयं ही कार्य करते हैं। मार्क्स यहां पर फिर कहता है कि पूंजीवाद के विकसित होने के साथ-साथ मध्यम वर्ग व छोटीछोटी बुर्जुआ उप जातियां समाप्त हो जाएंगी या फिर मज़दूर वर्ग में मिल जाएंगे। इस तरह समाज में पूंजीपति व मज़दूर वर्ग रह जाएगा।

वर्गों के बीच सम्बन्ध (Relationship between Classes)—मार्क्स के अनुसार “पूंजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग का आर्थिक शोषण करता रहता है और मज़दूर वर्ग अपने अधिकारों के लिये संघर्ष करता रहता है। इस कारण दोनों वर्गों के बीच के सम्बन्ध विरोध वाले होते हैं। यद्यपि कुछ समय के लिये दोनों वर्गों के बीच का विरोध शान्त हो जाता है परन्तु वह विरोध चलता रहता है। वह आवश्यक नहीं कि यह विरोध ऊपरी तौर पर ही दिखाई दे। परन्तु उनको इस विरोध का अहसास तो होता ही रहता है।”

मार्क्स के अनुसार वर्गों के बीच आपसी सम्बन्ध, आपसी निर्भरता एवं संघर्ष पर आधारित होते हैं। हम उदाहरण ले सकते हैं पूंजीवादी समाज के दो वर्गों का। एक वर्ग पूंजीपति का होता है दूसरा वर्ग मज़दूर का होता है। यह दोनों वर्ग अपने अस्तित्व के लिये एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। मज़दूर वर्ग के पास उत्पादन की शक्तियां एक मलकीयत नहीं होती हैं। उसके पास रोटी कमाने हेतु अपनी मेहनत के अतिरिक्त और कछ नहीं होता। वह रोटी कमाने के लिये पूंजीपति वर्ग के पास अपनी मेहनत बेचते हैं और उन पर ही निर्भर करते हैं। वह अपनी मज़दूरी पूंजीपतियों के पास बेचते हैं जिसके बदले पूंजीपति उनको मेहनत का किराया देता है। इसी किराये के साथ मज़दूर अपना पेट पालता है। पूंजीपति भी मज़दूरों की मेहनत पर ही निर्भर करता है। क्योंकि मजदूरों के बिना कार्य किये न तो उसका उत्पादन हो सकता है और न ही उसके पास पूंजी एकत्रित हो सकती है।

इस प्रकार दोनों वर्ग एक-दूसरे के ऊपर निर्भर हैं। परन्तु इस निर्भरता का अर्थ यह नहीं है कि उनमें सम्बन्ध एक समान होते हैं। पूंजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग का शोषण करता है। वह कम धन खर्च करके अधिक उत्पादन करना चाहता है ताकि उसका स्वयं का लाभ बढ़ सके। मज़दूर अधिक मज़दूरी मांगता है ताकि वह अपना व परिवार का पेट पाल सके। उधर पूंजीपति मज़दूरों को कम मज़दूरी देकर वस्तुओं को ऊँची कीमत पर बेचने की कोशिश करता है ताकि उसका लाभ बढ़ सके। इस प्रकार दोनों वर्गों के भीतर अपने-अपने हितों के लिये संघर्ष (Conflict of Interest) चलता रहता है। यह संघर्ष अन्ततः समतावादी व्यवस्था (Communism) को जन्म देगा जिसमें न तो विरोध होगा न ही किसी का शोषण होगा, न ही किसी के ऊपर अत्याचार होगा न ही हितों का संघर्ष होगा और यह समाज वर्ग रहित समाज होगा।

मनुष्यों का इतिहास-वर्ग संघर्ष का इतिहास (Human history-History of Class struggle)—मार्क्स का कहना है कि मनुष्यों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है। हम किसी भी समाज की उदाहरण ले सकते हैं। प्रत्येक समाज में अलग-अलग वर्गों में किसी-न-किसी रूप में संघर्ष तो चलता ही रहा है।

इस तरह मार्क्स का कहना था कि सभी समाजों में साधारणतः पर दो वर्ग रहे हैं-मजदूर तथा पूंजीपति वर्ग। दोनों में वर्ग संघर्ष चलता ही रहता है। इन में वर्ष संघर्ष के कई कारण होते हैं जैसे कि दोनों वर्गों में बहुत ज्यादा आर्थिक अन्तर होता है जिस कारण वह एक-दूसरे का विरोध करते हैं। पूंजीपति वर्ग बिना परिश्रम किए ही अमीर होता चला जाता है तथा मज़दूर वर्ग सारा दिन परिश्रम करने के बाद भी ग़रीब ही बना रहता है। समय के साथसाथ मज़दूर वर्ग अपने हितों की रक्षा के लिए संगठन बना लेता है तथा यह संगठन पूंजीपतियों से अपने अधिकार लेने के लिए संघर्ष करते हैं। इस संघर्ष का परिणाम यह होता है कि समय आने पर मजदूर वर्ग पूंजीपति वर्ग के विरुद्ध क्रान्ति कर देता है तथा क्रान्ति के बाद पूंजीपतियों का खात्मा करके अपनी सत्ता स्थापित कर लेते हैं। पूंजीपति अपने पैसे की मदद से प्रति क्रान्ति की कोशिश करेंगे परन्तु उनकी प्रति क्रान्ति को दबा दिया जाएगा तथा मजदूरों की सत्ता स्थापित हो जाएगी। पहले साम्यवाद तथा फिर समाजवाद की स्थिति आएगी जिसमें हरेक को उसकी ज़रूरत तथा योग्यता के अनुसार मिलेगा। समाज में कोई वर्ग नहीं होगा तथा यह वर्गहीन समाज होगा जिसमें सभी को बराबर का हिस्सा मिलेगा। कोई भी उच्च या निम्न नहीं होगा तथा मज़दूर वर्ग की सत्ता स्थापित रहेगी। मार्क्स का कहना था कि चाहे यह स्थिति अभी नहीं आयी है परन्तु जल्द ही यह स्थिति आ जाएगी तथा समाज में से स्तरीकरण खत्म हो जाएगा।

मैक्स वैबर का स्तरीकरण का सिद्धान्त-वर्ग, स्थिति समूह तथा दल (Max Weber’s Theory of Stratification-Class, Status, grouped and Party) मैक्स वैबर ने स्तरीकरण का सिद्धान्त दिया था जिसमें उसने वर्ग, स्थिति समूह तथा दल की अलग-अलग व्याख्या की थी। वैबर का स्तरीकरण का सिद्धान्त तर्कसंगत तथा व्यावहारिक माना जाता है। यही कारण है कि अमेरिकी समाजशास्त्रियों ने इस सिद्धान्त को काफ़ी महत्त्व प्रदान किया है। वैबर ने स्तरीकरण को तीन पक्षों से समझाया है तथा वह है वर्ग, स्थिति तथा दल। इन तीनों ही समूहों को एक प्रकार से हित समूह कहा जा सकता है जो न केवल अपने अंदर लड़ सकते हैं बल्कि यह एक दूसरे के विरुद्ध भी लड़ सकते हैं बल्कि यह एक-दूसरे के विरुद्ध भी लड़ सकते हैं। यह एक विशेष सत्ता के बारे में बताते हैं तथा आपस में एक-दूसरे से संबंधित भी होते हैं। अब हम इन तीनों का अलग-अलग विस्तार से वर्णन करेंगे।

वर्ग (Class)—मार्ल मार्क्स ने वर्ग की परिभाषा आर्थिक आधार पर दी थी तथा उसी प्रकार वैबर ने भी वर्ग की धारणा आर्थिक आधार पर दी है। वैबर के अनुसार, “वर्ग ऐसे लोगों का समूह होता है जो किसी समाज के आर्थिक मौकों की संरचना में समान स्थिति में होता है तथा जो समान स्थिति में रहते हैं। “यह स्थितियां उनकी आर्थिक शक्ति के रूप तथा मात्रा पर निर्भर करती है।” इस प्रकार वैबर ऐसे वर्ग की बात करता है जिस में लोगों की एक विशेष संख्या के लिए जीवन के मौके एक समान होते हैं। चाहे वैबर की यह धारणा मार्क्स की वर्ग की धारणा से अलग नहीं है परन्तु वैबर ने वर्ग की कल्पना समान आर्थिक स्थितियों में रहने वाले लोगों के रूप में की है आत्म चेतनता समूह के रूप में नहीं। वैबर ने वर्ग के तीन प्रकार बताए हैं जोकि निम्नलिखित हैं :-

  1. सम्पत्ति वर्ग (A property Class)
  2. अधिग्रहण वर्ग (An Acquisition Class)
  3. सामाजिक वर्ग (A Social class)

1. सम्पत्ति वर्ग (A Property Class)-सम्पत्ति वर्ग वह वर्ग होता है जिस की स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि उनके पास कितनी सम्पत्ति अथवा जायदाद है। यह वर्ग नीचे दो भागों में बांटा गया है-

  • सकारात्मक रूप से विशेष अधिकार प्राप्त सम्पत्ति वर्ग (The Positively Privileged Property Class)-इस वर्ग के पास काफ़ी सम्पत्ति तथा जायदाद होती है तथा यह इस जायदाद से हुई आय पर अपना गुजारा करता है। यह वर्ग उपभोग करने वाली वस्तुओं के खरीदने या बेचने, जायदाद इकट्ठी करके अथवा शिक्षा लेने के ऊपर अपना एकाधिकार कर सकता है।
  • नकारात्मक रूप से विशेष अधिकार प्राप्त सम्पत्ति वर्ग (The Negatively Privileged Property Class)-इस वर्ग के मुख्य सदस्य अनपढ़, निर्धन, सम्पत्तिहीन तथा कर्जे के बोझ नीचे दबे हुए लोग होते हैं। इन दोनों समूहों के साथ एक विशेष अधिकार प्राप्त मध्य वर्ग भी होता है जिसमें ऊपर वाले दोनों वर्गों के लोग शामिल होते हैं। वैबर के अनुसार पूंजीपति अपनी विशेष स्थिति होने के कारण तथा मजदूर अपनी नकारात्मक रूप से विशेष स्थिति होने के कारण इस समूह में शामिल होता है।

2. अधिग्रहण वर्ग (An Acquisition Class)—यह उस प्रकार का समूह होता है जिस की स्थिति बाज़ार में मौजूदा सेवाओं का लाभ उठाने के मौकों के साथ निर्धारित होती है। यह समूह आगे तीन प्रकार का होता है-

  • सकारात्मक रूप से विशेष अधिकार प्राप्त अधिग्रहण वर्ग (The Positively Privileged Acquisition Class)-इस वर्ग का उत्पादक फैक्टरी वालों के प्रबंध पर एकाधिकार होता है। यह फैक्ट्रियों वाले बैंकर, उद्योगपति, फाईनैंसर इत्यादि होते हैं। यह लोग प्रबंधकीय व्यवस्था को नियन्त्रण में रखने के साथ-साथ सरकारी आर्थिक नीतियों पर भीषण प्रभाव डालते हैं।
  • विशेषाधिकार प्राप्त मध्य अधिग्रहण वर्ग (The Middle Privileged Acquisition Class)—यह वर्ग मध्य वर्ग के लोगों का वर्ग होता है जिसमें छोटे पेशेवर लोग, कारीगर, स्वतन्त्र किसान इत्यादि शामिल होते हैं।
  • नकारात्मक रूप से विशेष अधिकार प्राप्त अधिग्रहण वर्ग (The Negatively Privileged Acquisition Class)-इस वर्ग में छोटे वर्गों के लोग विशेषतया कुशल, अर्द्ध कुशल तथा अकुशल मजदूर शामिल होते हैं।

3. सामाजिक वर्ग (Social Class)—इस वर्ग की संख्या काफी अधिक होती है। इसमें अलग-अलग पीढ़ियों की तरक्की के कारण निश्चित रूप से परिवर्तन दिखाई देता है। परन्तु वैबर सामाजिक वर्ग की व्याख्या विशेष अधिकारों के अनुसार नहीं करता। उसके अनुसार मज़दूर वर्ग, निम्न मध्य वर्ग, बुद्धिजीवी वर्ग, सम्पत्ति वाले लोग इत्यादि इसमें शामिल होते हैं।

वैबर के अनुसार किन्हीं विशेष स्थितियों में वर्ग के लोग मिलजुल कर कार्य करते हैं तथा इस कार्य करने की प्रक्रिया को वैबर ने वर्ग क्रिया का नाम दिया है। वैबर के अनुसार अपनी संबंधित होने की भावना से वर्ग क्रिया उत्पन्न होती है। वैबर के अनुसार अपनी संबंधित होने की भावना से वर्ग क्रिया उत्पन्न होती है। वैबर ने इस बात पर विश्वास नहीं किया कि वर्ग क्रिया जैसी बात अक्सर हो सकती है। वैबर का कहना था कि वर्ग में वर्ग चेतनता नहीं होती बल्कि उनकी प्रकृति पूर्णतया आर्थिक होती है। उनमें इस बात की भी संभावना नहीं होती कि वह अपने हितों को प्राप्त करने के लिए इकट्ठे होकर संघर्ष करेंगे। एक वर्ग लोगों का केवल एक समूह होता है जिनकी आर्थिक स्थिति बाज़ार में एक जैसी होती है। वह उन चीज़ों को इकट्ठे करने में जीवन के ऐसे परिवर्तनों को महसूस करते हैं, जिनकी समाज में कोई इज्जत होती है तथा उनमें किसी विशेष स्थिति में वर्ग चेतना विकसित होने की तथा इकट्ठे होकर क्रिया करने की संभावना होती है। वैबर का कहना था कि अगर ऐसा होता है तो वर्ग एक समुदाय का रूप ले लेता है।

स्थिति समूह (Status Group)-स्थिति समूह को साधारणतया आर्थिक वर्ग स्तरीकरण के विपरीत समझा जाता है। वर्ग केवल आर्थिक मान्यताओं पर आधारित होता है जोकि समान बाज़ारी स्थितियों के कारण समान हितों वाला समूह है। परन्तु दूसरी तरफ स्थिति समूह सांस्कृतिक क्षेत्र में पाया जाता है यह केवल संख्यक श्रेणियों के नहीं होते बल्कि यह असल में वह समूह होते हैं जिनकी समान जीवन शैली होती है, संसार के प्रति समान दृष्टिकोण होता है तथा यह लोग आपस में एकता भी रखते हैं।

वैबर के अनुसार वर्ग तथा स्थिति समूह में अंतर होता है। हरेक का अपना ढंग होता है तथा इनमें लोग असमान हो सकते हैं। उदाहरण के लिए किसी स्कूल का अध्यापक। चाहे उसकी आय 8-10 हजार रुपये प्रति माह होगी जोकि आज के समय में कम है परन्तु उसकी स्थिति ऊंची है। परन्तु एक स्मगलर या वेश्या चाहे माह में लाखों कमा रहे हों परन्तु उनका स्थिति समूह निम्न ही रहेगी क्योंकि उनके पेशे को समाज मान्यता नहीं देता। इस प्रकार दोनों के समूहों में अंतर होता है। किसी पेशे समूह को भी स्थिति समूह का नाम दिया जाता है क्योंकि हरेक प्रकार के पेशे में उस पेशे से संबंधित लोगों के लिए पैसा कमाने के समान मौके होते हैं। यही समूह उनकी जीवन शैली को समान भी बनाते हैं। एक पेशा समूह के सदस्य एक-दूसरे के नज़दीक रहते हैं, एक ही प्रकार के कपड़े पहनते हैं तथा उनके मूल्य भी एक जैसे ही होते हैं। यही कारण है कि इसके सदस्यों का दायरा विशाल हो जाता है।

दल (Party)-वैबर के अनसार दल वर्ग स्थिति के साथ निर्धारित हितों का प्रतिनिधित्व करता है। यह दल किसी न किसी स्थिति में उन सदस्यों की भर्ती करता है जिनकी विचारधारा दल की विचारधारा से मिलती हो। परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि उनके लिए दल स्थिति दल ही बने । वैबर का कहना है कि दल हमेशा इस ताक में रहते हैं कि सत्ता उनके हाथ में आए अर्थात् राज्य या सरकार की शक्ति उनके हाथों में हो। वैबर का कहना है कि चाहे दल राजनीतिक सत्ता का एक हिस्सा होते हैं परन्तु फिर भी सत्ता कई प्रकार से प्राप्त की जा सकती है जैसे कि पैसा, अधिकार, प्रभाव, दबाव इत्यादि। दल राज्य की सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं तथा राज्य एक संगठन होता है। दल की हरेक प्रकार की क्रिया इस बात की तरफ ध्यान देती है कि सत्ता किस प्रकार प्राप्त की जाए। वैबर ने राज्य का विश्लेषण किया तथा इससे ही उसने नौकरशाही का सिद्धान्त पेश किया। वैबर के अनुसार दल दो प्रकार के होते हैं।

पहला है सरप्रस्ती का दल (Patronage Party) जिनके लिए कोई स्पष्ट नियम, संकल्प इत्यादि नहीं होते। यह किसी विशेष मौके के लिए बनाए जाते हैं तथा हितों की पूर्ति के बाद इन्हें छोड़ दिया जाता है। दूसरी प्रकार का दल है सिद्धान्तों का दल (Party of Pricniples) जिसमें स्पष्ट या मज़बूत नियम या सिद्धान्त होते हैं। यह दल किसी विशेष अवसर के लिए नहीं बनाए जाते। वैबर के अनुसार चाहे इन तीनों वर्ग, स्थिति समूह तथा दल में काफी अन्तर होता है परन्तु फिर भी इनमें आपसी संबंध भी मौजूद होता है।