Class 11 Geography Solutions Chapter 3(v) समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य

समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य Textbook Questions and Answers

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1 या 2 शब्दों में दें-

प्रश्न (क) लहरों के ऊँचे भाग को क्या कहते हैं ?
उत्तर-क्रेस्ट (Crest)।

प्रश्न (ख) भारत के समुद्री तट की लंबाई क्या है ?
उत्तर-7516 कि०मी०।

प्रश्न (ग) विश्व के दूसरे नंबर पर बड़ी बीच कौन-सी है ?
उत्तर-मरीना बीच (चेन्नई)।

प्रश्न (घ) जब दो स्पिट आपस में मिल जाते हैं, तो इसको क्या कहा जाता है ?
उत्तर-लूपड बार (Looped Bar)।

2. निम्नलिखित पर नोट लिखें-

(क) स्पिट (Spit)
(ख) समुद्री बीच (Sea Beach)
(ग) समुद्री गुफा (Sea Caves)
(घ) हाईड्रोलिक एक्शन (Hydrolic Action)।
उत्तर-(क) स्पिट-रेत की वह श्रेणी जिसका एक सिरा तट से जुड़ा होता है और दूसरा सिरा समुद्र में डूबा होता है।
(ख) समुद्री बीच-तट के साथ मलबे से बनी श्रेणी को बीच कहते हैं।
(ग) समुद्री गुफा-सागर की लहरों के अपरदन से तट पर चट्टानें टूटकर गुफा का निर्माण करती हैं।
(घ) हाईड्रोलिक एक्शन-जब जल-दबाव के कारण चट्टानें टूटती हैं, तो उन्हें जल-दबाव क्रिया कहते हैं।

3. निम्नलिखित में अंतर स्पष्ट करो-
(i) क्रेस्ट (Crest) और ट्रफ (Trough)
(ii) रेत बार (Sand Bar) और लैगून (lagoon)
उत्तर-
क्रेस्ट (Crest)-

(क) लहर के सबसे ऊँचे उठे हुए भाग को क्रेस्ट (Crest) कहते हैं।
(ख) हवा की शक्ति से लहरों का पानी ऊपर उठ जाता है।

ट्रफ (Trough)-

(क) लहर के सबसे नीचे दबे हुए भाग को ट्रफ (Trough) कहते हैं।
(ख) हवा की शक्ति कम होने से लहरों का पानी नीचे दब जाता है।

(ii) रेत बार (Sand Bar) – जब लहरें मलबे को तट के समानांतर एक श्रेणी के रूप में जमा कर देती हैं, तो इसे रेत बार कहते हैं।
लैगून (Lagoon) – कई तटों पर रेत की श्रेणियों के पीछे दलदले क्षेत्र बन जाते हैं, इनके मध्य पानी की एक झील बनती है, जिसे लैगून कहते हैं।

4. निम्नलिखित के उत्तर विस्तार सहित दो :

प्रश्न (क) समुद्री जल की खुर्चन (अपघर्षण) की क्रिया (Erosional work) क्या है और इससे बनने वाली धरातलीय आकृतियों की व्याख्या करें।
उत्तर-
समुद्री तरंगों के अपरदन द्वारा उत्पन्न भू-आकृतियाँ (Landforms Produced by Sea Wave Erosion)-

समुद्री तरंगें अपरदन द्वारा तटों पर नीचे लिखी भू-आकृतियों की रचना करती हैं-

1. खड़ी चट्टान/समुद्री क्लिफ (Sea Cliffs)—समुद्री लहरें सबसे अधिक प्रभाव तट पर स्थित चट्टानों के निचले भाग पर डालती हैं। नीचे से चट्टानें कट जाती हैं और एक नोच (Notch) बन जाती है। तरंगों के निरंतर हमले के कारण नोच गहरी होती जाती है जिससे ऊपर का भाग आगे को झुका हुआ लगने लगता है। कुछ समय के बाद यह झुका हुआ भाग अपने ही भार के कारण टूटकर नीचे गिर जाता है। इसके फलस्वरूप नोच के ऊपरी भाग फिर से खड़ी ढलान वाले हो जाते हैं। तट पर ऐसी खड़ी ढलान को खड़ी चट्टान/समुद्री क्लिफ कहते हैं।

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2. लहर-कटा चबूतरा (Wave-cut Platform or Bench)—कंधियों अथवा क्लिफों और नोचों (Notches) पर तरंगों के लगातार हमले के कारण वे कटकर स्थल की ओर पीछे को हटते रहते हैं। इसके परिणामस्वरूप अगले भाग में बनी एक नोच का विस्तार होता रहता है, जिसे लहर-कटा चबूतरा (Wave-cut Platform) कहते हैं।

3. समुद्री गुफाएँ (Sea Caves)-कमज़ोर चट्टानों वाली नोचों (Notches) में तरंगों के जल-दबाव (Hydraulic Pressure) के कारण उनमें दरारें उत्पन्न हो जाती हैं। तरंगें इन जोड़ों और दरारों के द्वारा प्रभाव डालकर उन्हें चौड़ा कर देती हैं। तरंगों के अपरदन के समय इन दरारों से भीतरी हवा दबाई जाती है और जब ये तरंगें समुद्र की ओर मुडती हैं तो जल के दबाव से मुक्त यह भीतरी हवा फैलती है और चट्टानों पर दबाव डालती है। इस क्रिया के निरंतर होते रहने से चट्टानें टूटती रहती हैं और कुछ समय के बाद गहरा खड्डा बन जाता है। धीरेधीरे यह खड्ड, गहरी गुफा का रूप धारण कर लेता है। दो पड़ोसी गुफाओं के बीच की दीवार टूट जाने पर
महराब (Arch) बन जाती है, जिसे प्राकृतिक पुल (Natural Bridge) कहते हैं।

4. समुद्री किनारे के सुराख (Spout Horns or Blow Holes)-तट पर हमले के समय तरंगें गुफाओं के मुँह को जल से बंद कर देती हैं, जिससे गुफाओं की अंदर की वायु अंदर ही बंद हो जाती है। यदि गुफा की छत कमज़ोर हो, तो वह वायु उसको फाड़कर ऊपर सुराख कर देती है। इसे समुद्री किनारे के सुराख कहते हैं। यदि तरंगों के हमले के समय वायु सीटी बजाती हुई इन सुराखों से निकलती है, तो गुफा में भरा जल भी वायु के साथ फव्वारे के समान बाहर निकलता है, इसीलिए इसे टोंटीदार सुराख (Spouting horn) कहकर भी पुकारते हैं।

5. खाड़ियाँ (Bays)–जब किसी तट पर कोमल और कठोर चट्टानें लंब रूप में स्थित हों, तो कोमल चट्टानें (Soft Rocks) अंदर की ओर अधिक कट जाती हैं। इस प्रकार कोमल चट्टानों में खाड़ियाँ (Bays) बन जाती हैं।

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6. हैडलैंड या केप या अंतरीप (Headland or Cape)-तट की लंबवर्ती स्थिति में फैली एक कठोर चट्टान के दोनों तरफ से नर्म चट्टानों का अपरदन हो जाता है और वहाँ खाड़ियाँ बन जाती हैं और वह सख्त चट्टान समुद्र में बढ़ी हुई रह जाती है, जिसे अंतरीप कहते हैं।

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7. स्टैक (Stack)-जब महराब की छत तरंगों द्वारा अपरदित हो जाती है अथवा किसी अन्य कारण से टूटकर नष्ट हो जाती है तो मेहराब का अगला भाग पिछले भाग से स्तंभ के रूप में अलग खड़ा रह जाता है। इस स्तंभ को स्टैक कहते हैं। स्कॉटलैंड के उत्तर में ओरकनीज़ (Orkneys) टापूओं में Old man of Hoai इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।

समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-4 शब्दों में दें-

प्रश्न 1. समुद्री जल की गतियाँ बताएँ।
उत्तर-लहरें, धाराएँ और ज्वारभाटा।

प्रश्न 2. तट रेखा से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-जहाँ जल-मंडल, थल-मंडल और वायु-मंडल मिलते हों।

प्रश्न 3. ब्रेकर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-लहरों का वह भाग, जो तट से टकराता है।

प्रश्न 4. सागरीय जल किन चट्टानों पर घुलनशील क्रिया करता है ?
उत्तर-चूने का पत्थर, डोलोमाइट और चॉक।

प्रश्न 5. क्लिफ किसे कहते हैं ?
उत्तर-तट पर खड़ी ढलान वाली चट्टान।

प्रश्न 6. गुफ़ा से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-क्लिफ़ के नीचे बने कटाव।

प्रश्न 7. गुफ़ा कैसे बनती है ?
उत्तर-Notch के बड़ा हो जाने पर।

प्रश्न 8. स्टैक कैसे बनते हैं ?
उत्तर-कठोर चट्टानों के बचे-खुचे भाग।

प्रश्न 9. भारत के पूर्वी तट पर किन्हीं दो लैगून झीलों के नाम बताएँ।
उत्तर-चिलका झील और पुलीकट झील।

प्रश्न 10. भारत के पश्चिमी तट पर किसी एक लैगून झील का नाम बताएँ।
उत्तर-वेंबनाद झील।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-3 वाक्यों में दें-

प्रश्न 1. सागरीय लहरों के तीन प्रकार बताएँ।
उत्तर-

  1. ब्रेकर
  2. स्वैश
  3. कवाश।

प्रश्न 2. Under Tow से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-तट से टकराकर मुड़ती हुई लहर के नीचे के जल को Under Tow कहते हैं।

प्रश्न 3. लहरों के अपरदन की क्रियाएँ बताएँ।
उत्तर-

  • जलीय दबाव क्रिया
  • घर्षण क्रिया
  • सहघर्षण क्रिया
  • घुलनशील क्रिया।

प्रश्न 4. समुद्री क्लिफ (Cliff) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-समुद्र तट पर खड़े ढलान वाले खंड को Cliff कहते हैं।

प्रश्न 5. सागरीय लहरों का अपरदन किन तत्त्वों पर निर्भर करता है ?
उत्तर-

  • तरंग की ऊँचाई
  • चट्टानों का झुकाव
  • चट्टानों की रचना
  • लहरों की दिशा।

प्रश्न 6. समुद्री किनारे के सुराख (Blow-hole) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-तट के निकट गुफाओं की छत पर जल सुराख कर देता है, जिसमें से वायु गुज़रती है, उसे समुद्री किनारे के सुराख कहते हैं।

प्रश्न 7. स्टैक से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-सागरीय तट पर कठोर चट्टानों के बचे-खुचे भाग को स्टैक कहते हैं।

प्रश्न 8. बीच किसे कहते हैं ?
उत्तर-तट के साथ-साथ मलबे के निक्षेप से बनी श्रेणियों को बीच कहते हैं।

प्रश्न 9. रोधक किसे कहते हैं ?
उत्तर-तट के समानांतर रेत की श्रेणी, जो रोकने का काम करती है, रोधक कहलाती है।

प्रश्न 10. लैगून से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-रोधक और तट के बीच बनी झील को लैगून कहते हैं।

प्रश्न 11. स्पिट से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-स्पिट रेत की एक श्रेणी होती है, जिसका एक सिरा तट से जुड़ा होता है और दूसरा सिरा खुले सागर में होता है।

प्रश्न 12. मेहराब कैसे बनती है ?
उत्तर-दो गुफ़ाओं के मिलने से छत एक ढक्कन के समान खड़ी रहती है, जिसे मेहराब (Arch) कहते हैं।

प्रश्न 13. तमबोलो से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-जब कोई रेत, रोधक तट को किसी वायु के साथ जोड़ती है, उसे तमबोलो कहते हैं।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न: (Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 60-80 शब्दों में दें-

प्रश्न 1. लहरों के द्वारा अपरदन के अलग-अलग रूप बताएँ।
उत्तर-अपरदन (Erosion)-तट पर तोड़-फोड़ का काम आमतौर पर सर्फ (Surf), लहरों या तूफ़ानी लहरों द्वारा ही होता है। समुद्री लहरों द्वारा अपरदन अधिक-से-अधिक 200 मीटर की गहराई तक होता है। यह अपरदन चार प्रकार से होता है-

  1. जल-दबाव क्रिया (Water Pressure)-सुराखों में जल के दबाव से चट्टानें टूटने और बिखरने लगती हैं।
  2. अपघर्षण (Abrasion)-बड़े-बड़े पत्थर चट्टानों से टकराकर उन्हें तोड़ते रहते हैं।
  3. टूट-फूट (Attrition)-पत्थरों के टुकड़े आपस में टकराकर टूटते रहते हैं।
  4. घुलनशील क्रिया (Solution)—समुद्री जल चूने वाली चट्टानों को घोलकर अलग कर देता है।

प्रश्न 2. लहरों द्वारा अपरदन किन तत्त्वों पर निर्भर करता है ? उत्तर-लहरों द्वारा अपरदन कई तत्त्वों पर निर्भर करता है- .

  1. चट्टानों की प्रकृति (Nature of Rocks)—तट पर स्थित कठोर चट्टानों की तुलना में कमज़ोर चट्टानें जल्दी ही टूट जाती हैं।
  2. लहरों का वेग और ऊँचाई (Speed and Height of Waves)-बड़ी और ऊँची लहरें अधिक कटाव करती हैं।
  3. तट के सागर की ओर ढलान (Slope) और ऊँचाई-कम ढलान वाले मैदानी तटों पर कटाव कम होता है।
  4. चट्टानों में सुराख (holes) और दरारों (Faults) का होना- यदि तटों की चट्टानों में सुराख और दरारें हों, तो तट का कटाव आसानी से होता है।
  5. जल की गहराई (Depth of water)-लहरें 30 फुट की गहराई तक ही कटाव करती हैं।

प्रश्न 3. समुद्री गुफाएँ कैसे बनती हैं ?
उत्तर-समुद्री गुफाएँ (Sea Caves)-आधार की कोमल चट्टानों के टूटने या घुल जाने पर तट के पास खोखले स्थान बन जाते हैं। लहरों द्वारा हवा के बार-बार घूमने और निकलने की क्रिया से ये स्थान चौड़े हो जाते हैं और गुफाएँ बन जाती हैं। इन गुफाओं की ऊपरी छत कठोर चट्टानों से बनी होती है। दो पड़ोसी गुफ़ाओं के बीच की दीवार टूट जाने से मेहराब (Arch) बन जाती है। इसे प्राकृतिक पुल भी कहते हैं।

प्रश्न 4. भू-जीभ (Spit) और भित्ती (Bar) में अंतर बताएँ।
उत्तर –
भू-जीभ (Spit)-

  1. मलबे के निक्षेप से बनी श्रेणी को भू-जीभ कहते हैं, जिसका एक सिरा तट से जुड़ा होता है और दूसरा सिरा खुले समुद्र में डूबा होता है।
  2. इसकी शक्ल एक जीभ के समान होती है।
  3. यह पानी में डूबी होती है और फिर से हुक (Hook) भी बन जाती है।

भित्ती (Bar)-

  1. लहरों द्वारा तट या खाड़ी के समानांतर निक्षेप से रेत की बनी ऊँची श्रेणी या रोक को भित्ती कहते हैं।
  2. यह रोक तट के समानांतर होती है।
  3. यह पानी से बाहर बनती है और इसके पीछे एक लैगून झील बन जाती है।

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 150-250 शब्दों में दें-

प्रश्न 1. तरंगों के प्रकारों और उनके अपरदन कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर-समुद्र का अपरदन, परिवहन और निक्षेपण कार्य, इसके जल में उत्पन्न होने वाली तीन गतियों – तरंगों या लहरों, ज्वारभाटा और जल-धाराओं द्वारा होता है। इनमें से तरंगें सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।

समुद्री तरंगें (Sea Waves)- पवनों के प्रभाव से सागरीय जल के तल के ऊँचा-नीचा होने को तरंग (Waves) कहते हैं। तरंग में जल अपने मूल स्थान से आगे नहीं बढ़ता, बल्कि अपने स्थान पर ही ऊपर-नीचे होता रहता है। महासागरों में पवनें बड़ी तेज़ी से चलती हैं। इस कारण कई बार 5 से 10 मीटर तक ऊँची तरंगें उठती हैं।

समुद्री तरंगों द्वारा अपरदन को नियंत्रित करने वाले कारक (Factors controlling the Erosion by Sea Waves)-

तरंगों द्वारा अपरदन सभी तटों पर एक समान नहीं होता, क्योंकि इनकी परिस्थितियाँ अलग-अलग स्थानों पर भिन्नभिन्न होती हैं। तरंगों द्वारा अपरदन को नीचे लिखे कारक प्रभावित करते हैं-

  • 1. तरंगों की ऊँचाई (Height of the Waves) तरंगों की ऊँचाई के अनुसार ही तट पर जल आता है। ऊँची तरंगें तट पर ही अधिक जल फेंकती हैं। यह जल अधिक मात्रा में कंकड़, रेत आदि को प्रभावित करता है और तटों से टकराकर अधिक अपरदन करता है।
  • तटीय चट्टानों का झुकाव (Inclination of Coastal Rocks)—जिन तटों पर चट्टानों की परतों का – झुकाव समुद्र की ओर होता है, उन परतों के जोड़ तरंगों के सामने होते हैं, जिसके कारण उनका अपरदन आसान हो जाता है।
  • तटीय चट्टानों की संरचना (Structure of Coastal Rocks) चट्टानों की संरचना अपरदन को बहुत प्रभावित करती है। नर्म चट्टानें जल्दी टूटती हैं। कार्स्ट तटों पर तरंगें तेज़ गति से अपरदन करती हैं।
  • तरंगों की दिशा (Direction of Waves)-तटीय चट्टानों पर सीधी आकर टकराने वाली तरंगें अधिक अपरदन करती हैं।
  • वनस्पति फैलाव (Vegetation Cover)-तटों पर उगे पेड़-पौधों की जड़ें चट्टानों को खोखला कर देती हैं, जिस कारण तरंगों द्वारा तटों पर अपरदन आसान हो जाता है।

6. तरंगों की गहराई (Depth of Waves) तरंगों का अधिक कटाव 10 मीटर की गहराई तक ही होता है।

समुद्री लहरें (Sea Waves)-

समुद्री लहरों का काम समुद्री तटों तक ही सीमित रहता है। हवा के प्रभाव से समुद्र के पानी में लहरें पैदा होती हैं। हवा की शक्ति से समुद्र के पानी का कुछ भाग ऊपर उठ आता है और कुछ भाग नीचे दब जाता है। सबसे ऊँचे उठे हुए भाग को Crest और सबसे नीचे दबे भाग को ट्रफ (Trough) कहते हैं। महासागरों में लहरों की ऊँचाई 10 मीटर तक होती है, पर तूफान के समय लहरों की ऊँचाई 20 मीटर तक ऊँची हो जाती है।

लहरों के प्रकार (Types of Waves) –

  1. ब्रेकर (Breaker)-समुद्र तट पर लहरों का उच्च भाग टूटकर तट की ओर आगे बढ़ता है। इसे ब्रेकर या सर्फ (Surf) या स्वैश (Swash) कहते हैं।
  2. बैकवॉश (Backwash)-तट से टकराकर पानी वापिस जाती हुई लहर के नीचे-नीचे चलता है। इस वापिस जाते हुए जल को (Under Tow) या उतार (backwash) कहते हैं।

Class 11 Geography Solutions Chapter 3(v) समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य 4

समुद्री लहरों का कार्य (Work of Sea Waves)-दूसरे साधनों के समान लहरें भी अपरदन, परिवहन और निक्षेप का कार्य करती हैं।
अपरदन (Erosion)-तट पर तोड़-फोड़ का काम आमतौर पर सर्फ (Surf) लहरों या तूफानी लहरों द्वारा ही होता है। समुद्री लहरों द्वारा अपरदन अधिक-से-अधिक 200 मीटर की गहराई तक होता है। यह अपरदन चार प्रकार से होता है –

  1. जल-दबाव क्रिया (Water Pressure)-सुराखों में जल के दबाव से चट्टानें टूटने और बिखरने लगती हैं।
  2. अपघर्षण (Abrasion)-बड़े-बड़े पत्थर चट्टानों से टकराकर उन्हें तोड़ते रहते हैं।
  3. तोड़-फोड़ (Attrition)—पत्थरों के टुकड़े आपस में टकराकर टूटते रहते हैं।
  4. घुलनशील क्रिया (Solution)-समुद्री जल चूने वाली चट्टानों को घोलकर अलग कर देता है।

प्रश्न 2. समुद्री लहरों के निक्षेप से बनने वाली भू-आकृतियों का वर्णन करें।
उत्तर-
समुद्री तरंगों के निक्षेप द्वारा उत्पन्न भू-आकृतियां (Landforms Produced by Deposition of Sea Waves) – समुद्री तरंगों के निक्षेप द्वारा नीचे लिखी भू-आकृतियों का निर्माण होता है-

1. तरंग-निर्मित चबूतरा (Wave-built Platform)-तटों का अपरदन करके तरंगें, जिन पदार्थों को प्राप्त करती हैं, उनमें से हल्के पदार्थों को दूर ले जाकर पानी में डूबे हुए ढलान वाले तट पर निक्षेप कर देती हैं, जिससे वह भाग एक समतल चबूतरे का रूप धारण कर लेता है। यहाँ निक्षेप के कारण सागर गहरा हो जाता है। कभी-कभी यह चबूतरा पानी से बाहर भी दिखाई देने लग जाता है। इस चबूतरे को तरंग-निर्मित चबूतरा कहते हैं।

Class 11 Geography Solutions Chapter 3(v) समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य 5

2. बीच (Beach)—सागरीय तरंगों द्वारा अपरदन के भारी पदार्थों; जैसे-पत्थर, कंकड़ आदि को तट के पास ही अधिक मात्रा में ढेरी कर दिया जाता है, जिससे यह भाग थोड़ा ऊँचा और ढलान वाला हो जाता है। तट के इस क्षेत्र को बीच कहा जाता है। यहाँ पर ऊँची तरंगों के समय ही जल पहुँचता है। ये प्रदेश बड़े ज्वार (High Tides) और छोटे ज्वार (Low Tides) के मध्य में स्थित होते हैं। तट के पास ये ऊँचे प्रदेश खेलों के उत्तम स्थल बन जाते हैं, जैसे-मुंबई में जुहू बीच और चेन्नई में मरीना बीच।

3. अपतटीय रेत भित्तियाँ (Offshore Sand-bars) तरंगें तट से अपरदित किए पदार्थ विशेष रूप से रेत को तट के समानांतर पानी में डूबे भाग पर एक श्रेणी के रूप में ढेरी कर देती हैं। रेत की इस श्रेणी को अपतटीय रेत भित्ती कहते हैं। इसका ऊपरी भाग पानी के तल से भी ऊपर दिखाई देता है। ये रोधक का काम करती हैं।

4. भू-जीभ या स्पिट (Spits) – कभी-कभी तरंगों द्वारा बनाई किसी रेत भित्ती का एक सिरा स्थल से जुड़ा होता है और दूसरा समुद्र की ओर बढ़ा रहता है। उसे भू-जीभ या स्पिट कहते हैं। कभी-कभी इसका समुद्र की ओर का सिरा नुकीला हो जाता है, तो इसे कस्प (cusp) कहते हैं।

Class 11 Geography Solutions Chapter 3(v) समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य 6

5. हुक (Hook)-स्पिट का सिरा कभी-कभी समुद्री धाराओं या फिर तिरछी तरंगों के प्रभाव के कारण तट की ओर मुड़ जाता है। इसे हुक (Hook) कहते हैं।

6. संयोजक भित्ती या तमबोलो (Connecting bar or Tombolo)—कभी-कभी स्पिट द्वारा दो द्वीप या मुख्य स्थल किसी टापू के साथ जुड़ जाते हैं। ऐसी भित्ती को संयोजक भित्ती कहते हैं । इटली में इन्हें तमबोलो का नाम दिया जाता है। यदि स्पिट का बाहरी सिरा संयोजक भित्ती का रूप ग्रहण करते-करते तट की ओर मुड़कर उसके साथ आकर जुड़ जाए तो उसे Looped bar के नाम से पुकारा जाता है।

7. लैगून झीलें (Lagoons)—कई तटों पर रेत की श्रेणियों के पीछे झीलें बन जाती हैं, जिन्हें लैगून कहते हैं। भारत के पूर्वी तट पर चिल्का (Chilka) और पुलीकट (Pulikat) तथा केरल के तट पर वेबनाद झील. इसके उदाहरण हैं।

Class 11 Geography Solutions Chapter 5(ii) भूचाल या भूकंप

भूचाल या भूकंप Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1. भूचाल (भूकंप) क्या होते हैं ?
उत्तर-धरती पर अचानक झटकों को भूचाल (भूकंप) कहते हैं।

प्रश्न 2. हाईपोसैंटर क्या होता है ?
उत्तर-भूचाल के केंद्र को हाईपोसैंटर कहते हैं।

प्रश्न 3. अधिकेंद्र या ऐपीसैंटर क्या होता है ?
उत्तर-धरती के ऊपर जिस स्थान पर भूचाल पैदा होता है, उसे अधिकेंद्र या एपीसैंटर कहते हैं।

प्रश्न 4. फोकस और अधिकेंद्र क्या होते हैं ? इनके चित्र भी बनाएँ।
उत्तर-भूचाल जिस स्थान से आरंभ होता है, उसे फोकस कहते हैं। धरातल के जिस स्थान पर सबसे पहले भूचाल अनुभव होता है, उसे अधिकेंद्र कहते हैं।
(नोट-चित्र के लिए देखें अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के लघूत्तरात्मक प्रश्न)

प्रश्न 5. भूचाल मापने वाले यंत्र को क्या कहा जाता है ?
उत्तर-सिस्मोग्राफ।

प्रश्न 6. भूचाल आने के कारणों को विस्तार से लिखें।
उत्तर-(उत्तर के लिए देखें-अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के लघूत्तरात्मक प्रश्न-1)

प्रश्न 7. प्लेट टैक्टॉनिक का सिद्धांत क्या है ?
उत्तर-पृथ्वी का क्रस्ट कई प्लेटों में बँटा हुआ है। ये प्लेटें खिसकती रहती हैं। इन्हें प्लेट टैक्टॉनिक कहते हैं।

प्रश्न 8. मानवीय कारण भूचाल के लिए कैसे ज़िम्मेदार हैं ?
उत्तर-खानों को गहरा करने, डैम, सड़कों और रेल पटरियों को बिछाने के लिए ऐटमी धमाके करने से भूचाल आते हैं।

प्रश्न 9. भूचाल की तीव्रता क्या होती है? भूचाल की तीव्रता कैसे मापी जाती है ?
उत्तर- भूचाल की तीव्रता मापने के लिए रिक्टर पैमाने का प्रयोग किया जाता है। भूचाल की तीव्रता उसमें पैदा हुई शक्ति को कहा जाता है।

प्रश्न 10. अग्नि-चक्र क्या है ?
उत्तर-प्रशांत महासागर के इर्द-गिर्द ज्वालामुखियों की श्रृंखला को अग्नि-चक्र कहते हैं।

प्रश्न 11. भूचालों के विश्व-विभाजन का वर्णन करें।
उत्तर-(उत्तर के लिए देखें-अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नों में निबंधात्मक प्रश्न सं.-2)

प्रश्न 12. भारत में भूचाल क्षेत्रों के बारे में लिखें।
उत्तर- भारत में प्रायद्वीप पठार स्थित खंड भूचाल रहित होते हैं। अधिकतर भूचाल हिमालय पर्वत, गंगा के मैदान और पश्चिमी तट पर आते हैं।

प्रश्न 13. सुनामी से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-सागर तल पर आए भूचाल (भूकंप) के कारण उत्पन्न हुई विशाल लहरों को सुनामी कहा जाता है।

प्रश्न 14. क्या भूचालों की भविष्यवाणी की जा सकती है ?
उत्तर- भूचालों की भविष्यवाणी करना भूचाल वैज्ञानिकों के लिए बहुत मुश्किल काम है या यह कह लीजिए कि लगभग असंभव है। केवल आम भूचालों से ग्रस्त क्षेत्र और धरती की पपड़ी पर प्लेट टैक्टॉनिक का नक्शा और प्लेट सीमा का गहन अध्ययन भूचालों के बारे में अनुमान लगाना आसान कर सकता है।

भूचाल या भूकंप Important Questions and Answers

लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 60-80 शब्दों में दें-

प्रश्न 1. भूचाल आने के कारणों को विस्तार से लिखें।
उत्तर-भूचाल के कारण (Causes of Earthquakes)-प्राचीन काल में लोग भूचाल को भगवान का क्रोध मानते थे। धार्मिक विचारों के अनुसार, जब मानवीय पाप बढ़ जाते हैं, तो पापों के भार से धरती काँप उठती है। परंतु वैज्ञानिकों के अनुसार भूचाल के नीचे लिखे कारण हैं-

  • ज्वालामुखी विस्फोट (Volcanic Eruption)–ज्वालामुखी विस्फोट से आस-पास के क्षेत्र काँप उठते हैं और हिलने लगते हैं। अधिक विस्फोटक शक्ति के कारण खतरनाक भूचाल आते हैं। 1883 ई० में काराकटोआ विस्फोट से पैदा हुए भूचाल का प्रभाव ऑस्ट्रेलिया और दक्षिणी अमेरिका तक अनुभव किया गया था।
  • दरारें (Faults)-धरती की हलचल के कारण धरातल पर खिंचाव या दबाव के कारण दरारें पड़ जाती हैं। इन्हीं के सहारे भू-भाग ऊपर या नीचे की ओर सरक जाते हैं और जिससे भूचाल पैदा होते हैं। 1923 में कैलीफोर्निया का भयानक भूचाल ‘सेन ऐंडरीयास-दरार’ (San Andreas Faults) के कारण हुआ था। 11 दिसंबर, 1927 में कोयना (महाराष्ट्र) का भूचाल भी इसी कारण आया था।
  • धरती का सिकुड़ना (Contraction of Earth)-धरती अपनी मूल अवस्था में गर्म थी, परंतु अब धीरे धीरे यह ठंडी हो रही है। तापमान कम होने से धरती सिकुड़ती है और चट्टानों में हलचल होती है।
  • गैसों का फैलना (Expansion of Gases)-धरती के भीतरी भाग से गैसें और भाप बाहर आने का यत्न करती हैं। इनके दबाव से भूचाल आते हैं।
  • चट्टानों की लचक शक्ति (Elasticity of Rocks)-जब किसी चट्टान पर दबाव पड़ता है, तो वह चट्टान उस दबाव को वापस धकेलती है, इससे भू-भाग हिल जाते हैं। .

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 150-250 शब्दों में दें-

प्रश्न 1. भूचाल के अलग-अलग प्रकार बताएँ। भूचाली लहरों का वर्णन करें।
उत्तर-
भूचाल के प्रकार (Types of Earthquakes) –
भूचाल के पैदा होने के कई कारण होते हैं-
गहराई के आधार पर भूचाल के प्रकार (Types of Earthquakes according to Depth)-प्रसिद्ध वैज्ञानिकों गुटनबर्ग (Gutenberg) और रिचर (Ritchter) ने गहराई के आधार पर भूचालों को तीन वर्गों में बाँटा है।
जिन भूचालों की लहरें (Shock) 50 किलोमीटर या इससे कम गहराई पर उत्पन्न होती हैं, उन्हें साधारण भूचाल (Normal Earthquakes) कहते हैं। जब लहरें 70 से 250 किलोमीटर की गहराई से उत्पन्न होती हैं, तो इन्हें मध्यवर्ती भूचाल (Intermediate Earthquakes) कहते हैं। जब लहरों की उत्पत्ति 250 से 700 किलोमीटर की गहराई के बीच होती है तो इन्हें गहरे केंद्रीय भूचाल (Deep Focus earthquakes) कहते हैं।

भूमि-कंपन लहरें (Earthquake Waves) –
भूचाल संबंधी ज्ञान को भूचाल विज्ञान (Semology) कहते हैं। भूचाल की तीव्रता और उत्पत्ति-स्थान की तीव्रता पता करने के लिए भूचाल मापक-यंत्र (Seismograph) की खोज हुई है। इस यंत्र में लगी एक सूई द्वारा ग्राफ पेपर के ऊपर भूचाल के साथ-साथ ऊँची-नीची (लहरों के रूप में) रेखाएँ बनती रहती हैं। जिस स्थान-बिंदु से भूचाल आरंभ होता है, उसे भूचाल उत्पत्ति केंद्र (Seismic Focus) कहते हैं। भू-तल पर जिस स्थान-बिंदु पर भूचाल का अनुभव सबसे पहले होता है, उसे अधिकेंद्र (Epicentre) कहते हैं। यह भूचाल उत्पत्ति केंद्र के ठीक ऊपर से आरंभ होता है। भूचाल लहरें (Earthquake Waves) उत्पत्ति केंद्र में उत्पन्न होकर शैलों में कंपन करती हुई सबसे पहले अधिकेंद्र और इसके निकटवर्ती क्षेत्र में पहुँचती हैं। परंतु भूचाल का सबसे अधिक प्रभाव अधिकेंद्र और इसके निकटवर्ती क्षेत्र पर पड़ता है।

Class 11 Geography Solutions Chapter 5(ii) भूचाल या भूकंप 1

भूचाली लहरों को रेखाओं में लिया जाता है, जोकि अक्सर अंडे के आकार (Elliptical) की होती हैं। इन्हें भूचाल उत्पत्ति रेखाएँ (Homoseismal lines) कहा जाता है। ऐसे स्थानों को, जिन्हें एक जैसी लहरों के पहुँचने के कारण एक जैसी हानि हुई हो, तो मानचित्र पर रेखाओं द्वारा मिला दिया जाता है। इन रेखाओं को सम-भूचाल रेखाएँ (Isoseismal lines) कहते हैं।

भूचाल लहरें-उत्पत्ति केंद्र से उत्पन्न होने वाली भूमि-कंपन लहरें एक जैसी नहीं होती और न ही इनकी गति में समानता होती है। इन तथ्यों को आधार मानकर इन तरंगों को नीचे लिखे तीन भागों में बाँटा गया है-

Class 11 Geography Solutions Chapter 5(ii) भूचाल या भूकंप 2

1. प्राथमिक लहरें (Primary or Push or ‘P’ waves)—ये लहरें ध्वनि लहरों (Sound waves) के समान आगे-पीछे (to and fro) होती हुई आगे बढ़ती हैं। ये ठोस भागों में तीव्र गति से आगे बढ़ती हैं और अन्य प्रकार की लहरों की अपेक्षा तीव्र चलने वाली लहरें होती हैं। इनकी गति 8 से 14 कि०मी० प्रति सैकिंड होती है। प्राथमिक लहरें तरल और ठोस पदार्थों को एक समान रूप में पार करती हैं।

2. गौण लहरें (Secondary or ‘S’ Waves)-ये लहरें ऊपर-नीचे (Up and down) होती हुई आगे बढ़ती _हैं। इनकी गति 4 से 6 किलोमीटर प्रति सैकिंड होती है। ये द्रव्य पदार्थों को पार करने में असमर्थ होती हैं और ये उसमें ही अलोप हो जाती हैं।

3. धरातलीय लहरें (Surface or ‘L’ waves)-इनकी गति 3 से 5 किलोमीटर प्रति सैकिंड होती है। ये धरती की ऊपरी परतों में ही चलती हैं अर्थात् ये भू-गर्भ की गहराइयों में प्रवेश नहीं करतीं। ये अत्यंत ऊँची और नीची होकर चलती हैं जिससे भू-तल पर अपार धन-माल की हानि होती है।

प्रश्न 2. भूचाल किसे कहते हैं ? भूचालों की उत्पत्ति के क्या कारण हैं ? विश्व में भूचाल क्षेत्रों के विभाजन के बारे में बताएँ।
उत्तर-जब धरातल का कोई भाग अचानक काँप उठता है, तो उसे भूचाल कहते हैं। इस हलचल के कारण धरती हिलने लगती है और आगे-पीछे, ऊपर-नीचे सकरती है। इन्हें झटके (Termors) कहते हैं। (An Earthquake is a simple shiver on the skin of our planet.)
भूचाल के कारण (Causes of Earthquakes)—प्राचीन काल में लोग भूचाल को भगवान का क्रोध मानते थे। धार्मिक विचारों के अनुसार जब मानवीय पाप बढ़ जाते हैं, तो पापों के भार से धरती काँप उठती है। परंतु वैज्ञानिकों के अनुसार भूचाल के लिए उत्तरदायी कारण नीचे लिखे हैं-

1. ज्वालामुखी विस्फोट (Volcanic Eruption)-ज्वालामुखी विस्फोट से आस-पास के क्षेत्र काँप उठते हैं
और हिलने लगते हैं। अधिक विस्फोटक शक्ति के कारण खतरनाक भूचाल आते हैं। 1883 में काराकाटोआ विस्फोट से पैदा हुए भूचाल का प्रभाव ऑस्ट्रेलिया और दक्षिणी अमेरिका तक अनुभव किया गया।

2. दरारें (Faults)-धरती की हलचल के कारण धरातल पर खिंचाव या दबाव के कारण दरारें पड़ जाती हैं। इनके सहारे भूमि-भाग ऊपर या नीचे की ओर सरकने से भूचाल पैदा होते हैं। 1923 में कैलीफोर्निया का भयानक भूचाल “सेन ऐंडरीयास-दरार’ (San Andreas Faults) के कारण हुआ था। 11 दिसंबर, 1927 में कोयना (महाराष्ट्र) का भूचाल भी इसी कारण आया था।

3. धरती का सिकुड़ना (Contraction of Earth) धरती अपनी मूल अवस्था में गर्म थी, परन्तु अब धीरे धीरे ठंडी हो रही है। तापमान कम होने से धरती सिकुड़ती है और चट्टानों में हलचल होती है।

4. गैसों का फैलना (Expansion of Gases)-धरती के भीतरी भाग से गैसें और भाप बाहर आने का यत्न करती हैं इनके दबाव से भूचाल आते हैं।

5. चट्टानों की लचक-शक्ति (Elasticity of Rocks)-जब किसी चट्टान पर दबाव पड़ता है, तो वह चट्टान उस दबाव को वापस धकेलती है, इससे भू-भाग हिल जाते हैं।

6. साधारण कारण (General Causes)-हल्के या छोटे भूचाल कई कारणों से पैदा हो जाते हैं-

  • पहाड़ी भागों में भू-स्खलन (Landslide) और हिम-स्खलन (Avalanche) होने से।
  • गुफाओं की छतों के बह जाने से।
  • समुद्री तटों से तूफानी लहरों के टकराने से।
  • धरती के तेज़ घूमने से।
  • अणु-बमों (Atom Bombs) के विस्फोट और परीक्षण से।
  • रेलों, ट्रकों और टैंकों के चलने से।

विश्व के भूचाल-क्षेत्र (Earthquake Zones of the World)-

  1. ज्वालामुखी क्षेत्रों में।
  2. नवीन बलदार पहाड़ों के क्षेत्रों में।
  3. समुद्र तट के क्षेत्र में।

भूचाल कुछ निश्चित पेटियों (Belts) में मिलते हैं-

  • प्रशांत महासागरीय पेटी (Circum Pacific Belt)—यह विशाल भूचाल क्षेत्र प्रशांत महासागर के दोनों तटों (अमेरिकी और एशियाई) के साथ-साथ फैला हुआ है। यहाँ विश्व के 68% भूचाल आते हैं। इसमें कैलीफोर्निया, अलास्का, चिली, जापान, फिलीपाइन प्रमुख क्षेत्र हैं। जापान में तो हर रोज़ लगभग 4 भूचाल आते हैं। हर तीसरे दिन एक बड़ा भूचाल आता है।
  • मध्य-महाद्वीपीय पेटी (Mid-world Belt)—यह पेटी यूरोप और एशिया महाद्वीप के बीच बलदार पर्वतों (अल्पस और हिमालय) के सहारे पूर्व-पश्चिम दिशा में फैली है। यहाँ संसार के 11% भूचाल आते हैं। भारत के भूचाल-क्षेत्र 1. भारत के उत्तरी भाग में अधिक भूचाल आते हैं। 2. मध्यवर्ती मैदानी-क्षेत्र में कम भूचाल अनुभव होते हैं।
  • दक्षिणी भारत एक स्थिर भाग है। यहाँ भूचाल बहुत कम आते हैं।
  • भारत में आए हुए प्रसिद्ध भूचाल हैंकच्छ (1819), असम (1897), कांगड़ा (1903), बिहार (1934)।

प्रश्न 3. मानवीय जीवन पर भूचाल के प्रभाव बताएँ।
उत्तर-भूचाल के प्रभाव (Effects of Earthquakes)-भूचाल पृथ्वी की एक भीतरी शक्ति है, जो अचानक (Sudden) परिवर्तन ले आती है। यह जादू के खेल के समान क्षण-भर में अनेक परिवर्तन ले आती है। भूचाल मनुष्य के लिए लाभदायक और हानिकारक दोनों ही है। विनाशकारी प्रभाव के कारण इसे शाप माना गया है, परंतु इसके कई लाभ भी हैं। भूचालों से होने वाली हानियों व लाभों का वर्णन नीचे दिया गया है-

हानियाँ (Disadvantages)-

  • जान व माल का नाश (Loss of Life and Property)-भूचाल से जान व माल की बहुत हानि होती है। 1935 में क्वेटा के भूचाल से 60,000 लोग मारे गए थे। एक अनुमान के अनुसार पिछले 4000 वर्षों में 1/2 करोड़ आदमी भूचाल के कारण मारे जा चुके हैं।
  • नगरों का नष्ट होना (Distruction of Cities) भूचाल से पूरे के पूरे नगर नष्ट हो जाते हैं। पुल टूट जाते हैं, सड़कें टूट जाती हैं, रेल की पटरियाँ टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं जिससे आवाजाही रुक जाती है।
  • आग का लगना (Fire Incidents)-भूचाल से अचानक आग लग जाती है। 18 अप्रैल, 1906 ई० में सैन फ्रांसिस्को में आग से शहर का काफी बड़ा भाग जल गया था।
  • दरारों का निर्माण (Formation of Faults)-धरातल फटने से दरारें बनती हैं। असम में 1897 ई० के भूचाल के कारण 11 किलोमीटर चौड़ी और 20 किलोमीटर लंबी दरार बन गई थी।
  • भू-स्खलन (Landslide)-पहाड़ी क्षेत्रों के अलग-अलग शिलाखंड और हिमखंड (Avalanche) टूटकर नीचे गिरते रहते हैं। समुद्र में बर्फ के शैल (Iceberge) तैरने लगते हैं।
  • बाढ़ें (Floods)-नदियों के रास्ते बदलने से बाढ़ें आती हैं। 1950 ई० में असम में भूचाल से ब्रह्मपुत्र नदी में बाढ़ आई थी।
  • तूफानी लहरें (Tidal waves)-समुद्र में तूफानी लहरें तटों पर नुकसान करती हैं। इन्हें सुनामी (Tsunami) कहते हैं। 1775 ई० में लिस्बन (पुर्तगाल) में भूचाल से 12 मीटर ऊँची लहरों के कारण वह शहर नष्ट हो गया था।
  • तटीय भाग का धंसना (Sinking of the Coast)-भूचाल से तटीय भाग नीचे धंस जाते हैं। जापान में ____1923 ई० के संगामी खाड़ी के भूचाल से सागर तल का कुछ भाग 300 मीटर नीचे धंस गया था।

लाभ (Advantages)-

  • भूचाल से निचले पठारों, द्वीपों और झीलों की रचना होती है।
  • भूचाल से कई चश्मों का (Springs) का जन्म होता है।
  • तटीय भागों में गहरी खाइयाँ बन जाती हैं, जहाँ प्राकृतिक बंदरगाह बन जाते हैं।
  • भूचाल द्वारा अनेक खनिज पदार्थ धरातल पर आ जाते हैं।
  • कृषि के लिए नवीन उपजाऊ क्षेत्र बन जाते हैं।
  • भूचाली लहरों द्वारा धरती के भू-गर्भ (Interior) के बारे में जानकारी मिलती है।
  • चट्टानों के टूटने से उपजाऊ मिट्टी का निर्माण होता है।

प्रश्न 4. सुनामी से क्या अभिप्राय है ? इसके प्रभाव बताएँ।
उत्तर-सुनामी (Tsunami)—’सुनामी’ जापानी भाषा का एक शब्द है, जिसका अर्थ है-‘तटीय लहरें’। ‘TSU’ , शब्द का अर्थ है-तट और ‘Nami’ शब्द का अर्थ है-तरंगें। इन्हें ज्वारीय लहरें (Tidal waves) या भूचाली तरंगें (Seismic Waves) भी कहा जाता है।

सुनामी अचानक ऊँची उठने वाली विनाशकारी तरंगें हैं। इससे गहरे पानी में हिलजुल होती है। इसकी ऊँचाई आमतौर पर 10 मीटर तक होती है। सुनामी उस हालत में पैदा होती है, जब सागर के तल में भूचाली क्रिया के कारण हिलजुल होती है और महासागर में सतह के पानी का लंब रूप में विस्थापन होता है। हिंद महासागर में सुनामी तरंगें बहुत कम महसूस की गई हैं। अधिकतर सुनामी प्रशांत महासागर में घटित होती है।

सुनामी की उत्पत्ति (Origin of Tsunami)-भीतरी दृष्टि से पृथ्वी एक क्रियाशील ग्रह है। अधिकतर भूचाल टैक्टॉनिक प्लेटों (Tectonic Plates) की सीमाओं पर पैदा होते हैं। सुनामी अधिकतर सबडक्शन जोन (Subduction Zone) के भूचाल के कारण पैदा होती है। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ दो प्लेटें एक-दूसरे में विलीन (Coverage) हो जाती हैं। भारी पदार्थों से बनी प्लेटें हल्की प्लेटों के नीचे खिसक जाती हैं। समुद्र के गहरे तल का विस्तार होता है। यह क्रिया एक कम गहरे भूचाल को पैदा करती है।

26 दिसंबर, 2004 की सुनामी आपदा (Tsunami Disaster of 26th December, 2004)-प्रातः 7.58 बजे, एक काले रविवार (Black Sunday) 26 दिसंबर, 2004 को, क्रिसमस से एक दिन बाद सुनामी दुर्घटना घटी। यह विशाल, विनाशकारी सुनामी लहर हिंद महासागर के तटीय प्रदेश से टकराई। इस लहर के कारण इंडोनेशिया से लेकर भारत तक के देशों में 3 लाख आदमी विनाश के शिकार हुए थे।

महासागरीय तल पर एक भूचाल पैदा हुआ, जिसका अधिकेंद्र सुमात्रा (इंडोनेशिया) के 257 कि०मी० दक्षिण-पूर्व में था। यह भूचाल रिक्टर पैमाने पर 8.9 शक्ति का था। इन लहरों के ऊँचे उठने पर पानी की एक ऊँची दीवार बन गई थी।

आधुनिक युग के इतिहास में यह एक महान् दुर्घटना के रूप में लिखी जाएगी। सन् 1900 के बाद, यह चौथा बड़ा भूचाल था। इस भूचाल के कारण पैदा हुई सुनामी लहरों से हिरोशिमा बम की तुलना में लाखों गुणा अधिक ऊर्जा का विस्फोट हुआ था। इसलिए इसे भूचाल प्रेरित विनाशकारी लहर भी कहा जाता है। यह भारत और म्यांमार के प्लेटों के

मिलन स्थान पर घटी थी, जहाँ लगभग 1000 किलोमीटर प्लेट-सीमा खिसक गई थी। इसके प्रभाव से सागर तल 10 मीटर ऊपर उठ गया और ऊपरी पानी हज़ारों घन मीटर की मात्रा में विस्थापित हो गया था। इसकी गति लगभग 700 कि०मी० प्रति घंटा थी। इसे अपने उत्पत्ति स्थान से भारतीय तट तक पहुँचने में दो घंटे का समय लगा। इस दुर्घटना ने तटीय प्रदेशों के इतिहास और भूगोल को बदलकर रख दिया है।

सुनामी दुर्घटना के प्रभाव (Effects of Tsunami Disaster)-
हिंद महासागर के तटीय देशों इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, म्याँमार, भारत, श्रीलंका और मालदीव में सनामी दुर्घटना के विनाशकारी प्रभाव पड़े। भारत में तमिलनाडु, पांडेचेरी, आंध्र-प्रदेश, केरल आदि राज्य सबसे अधिक प्रभावित हुए। अंडमान और निकोबार द्वीप में इस लहर का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा। इंडोनेशिया में लगभग 1 लाख आदमी, थाईलैंड में 10,000 आदमी, श्रीलंका में 30,000 आदमी तथा भारत में 15,000 आदमी इस विनाश के शिकार हुए।

भारत में सबसे अधिक नुकसान तमिलनाडु के नागापट्नम जिले में हुआ, जहाँ पानी शहर के 1.5 कि०मी० अंदर तक पहुँच गया था। संचार, परिवहन के साधन और बिजली की सप्लाई में भी मुश्किलें पैदा हुईं। अधिकतर श्रद्धालु वेलान कन्नी (Velan Kanni) के तट (Beach) के सागरीय पानी में बह गए। तट की विनाशकारी वापिस लौटती हुई लहरें हज़ारों लोगों को बहाकर ले गईं। मरीना तट (एशिया का सबसे बड़ा तट) पर 3 कि०मी० लंबे क्षेत्र में सैंकड़ों लोग सागर की चपेट में आ गए। यहाँ लाखों रुपयों के चल व अचल संसाधनों की बर्बादी हुई।

Class 11 Geography Solutions Chapter 5(ii) भूचाल या भूकंप 3

कलपक्कम अणु-ऊर्जा केंद्र में पानी प्रवेश करने पर अणु-ऊर्जा के रिएक्टरों को बंद करना पड़ा। मामलापुरम् के विश्व प्रसिद्ध मंदिर को तूफानी लहरों से बहुत नुकसान हुआ। सबसे अधिक मौतें अंडमान-निकोबार द्वीप पर हुईं। ग्रेट निकोबार के दक्षिणी द्वीप पर, जोकि भूचाल के केंद्र से केवल 150 कि०मी० दूर था, सबसे अधिक प्रभाव पड़ा। निकोबार द्वीप पर भारतीय नौसेना का एक अड्डा नष्ट हो गया। ऐसा लगता है कि इन द्वीपों का अधिकांश क्षेत्र समुद्र ने निगल लिया हो। इस प्रकार सुनामी लहरों ने इन द्वीप समूहों के भूगोल को बदल दिया है और यहाँ फिर से मानचित्रण करना पड़ेगा। इस देश की मुसीबतों के शब्दकोश में एक नया शब्द ‘सुनामी मुसीबत’ जुड़ गया है। अमेरिकी वैज्ञानिकों के अनुसार इस कारण पृथ्वी अपनी धुरी से हिल गई और इसका परिभ्रमण तेज़ हो गया है, जिस कारण दिन हमेशा के लिए एक सैकंड कम हो गया है। सुनामी लहरें सचमुच ही प्रकृति का कहर होती हैं।

Class 12 Religion Solutions Chapter 1 सिंधु घाटी के लोगों और प्रारंभिक आर्यों का धार्मिक जीवन

ESSAY TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. हड़प्पा काल के लोगों के धार्मिक जीवन के बारे में संक्षिप्त परंतु भावपूर्ण चर्चा कीजिए।
(Discuss in brief but meaningful the religious life of the people of Harappa Age.)
अथवा
सिंधु घाटी के लोगों के धार्मिक जीवन के बारे आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the religious life of Indus Valley People ? Explain.)
अथवा
हड़प्पा काल में धार्मिक विश्वासों और रीति-रिवाजों का संक्षेप में वर्णन करो।
(Explain in brief the religious faiths and customs of Harappa Age ?)
अथवा
सिंधु घाटी के लोगों के धार्मिक जीवन और विश्वासों के संबंध में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about the life and religious faiths of the people of Indus Valley Civilization ?)
अथवा
सिंधु घाटी की सभ्यता के समय लोगों के धार्मिक विश्वास क्या थे ? चर्चा करो। देवी माता और स्वास्तिक पर संक्षेप में नोट लिखो ।
(What were the religious beliefs of the people in Indus Valley Civilization ? Discuss. Write brief notes on Mother Goddess and Swastik.)
अथवा
सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों के धार्मिक विश्वासों के बारे में जानकारी दें। सप्तऋषि’ तथा ‘पीपल’ पर संक्षेप नोट लिखो।
(Write about the religious beliefs of the people of Indus Valley Civilization. Write brief notes on ‘Saptrishi’ and ‘Peeple’.)
अथवा
सिंध घाटी के लोगों के धार्मिक विश्वासों के बारे में संक्षेप में जानकारी दीजिए। (Give brief information about religious beliefs of the Indus Valley Civilization.)
सिंधु घाटी के लोगों के धार्मिक विश्वासों के बारे में संक्षेप में जानकारी दीजिए।
(Give brief information about religious beliefs of the Indus Valley Civilization.)
अथवा
सिंधु घाटी की सभ्यता के समय लोगों के धार्मिक विश्वास क्या थे ? चर्चा करो। .
(What were the religious beliefs of the people of Indus Valley Civilization ? Discuss.)
अथवा
सिंधु घाटी सभ्यता के समय लोगों के धार्मिक विश्वासों के बारे में विस्तार सहित लिखें।
(Describe the religious beliefs of the people of Indus Valley Civilization.)
अथवा
सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों का धार्मिक जीवन कैसा था ? (What was the religious life of the people of Indus Valley Civilization ?)
उत्तर- सिंधु घाटी की खुदाई से मिली मोहरों, चित्रों और मूर्तियों आदि से सिंधु घाटी के लोगों के धार्मिक जीवन के संबंध में बहुमूल्य जानकारी प्राप्त होती है। इस जानकारी के आधार पर निस्संदेह यह कहा जा सकता है कि सिंधु घाही के लोगों का धार्मिक जीवन काफी उन्नत था। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके बहुत से धार्मिक विश्वास आज के हिंदू धर्म में प्रचलित हैं।—

  1. देवी माँ की पूजा (Worship of Mother Goddess)-सिंधु घाटी के लोग सब से अधिक देवी माँ की पूजा करते थे। इस का अनुमान सिंधु घाटी की खुदाई से मिली देवी माँ की अनेक मूर्तियों, मोहरों और तावीज़ों पर बने उनके चित्रों से लगाया जाता है। कई मूर्तियों पर धुएँ के चिन्ह हैं जिनसे यह परिणाम निकलता है कि लोग देवी माँ की धूप-बाती और तेल से पूजा करते थे। देवी माँ को शक्ति का प्रतीक माना जाता था ।।
  2. शिव की पूजा (Worship of Lord Shiva )-सिंधु घाटी के लोगों में एक देवता की पूजा काफी प्रचलित थी। उस समय की मिली कुछ मोहरों पर एक देव के चित्र अंकित हैं। इस देव को योगी की स्थिति में समाधि लगाये हुए देखा गया है। इस के तीन मुँह दर्शाये गये हैं और सिर पर एक मन को मोह लेने वाला पोश पहना हुआ है। इस योगी के इर्द-गिर्द शेर, हाथी, गैंडे, साँड और हिरण आदि के चित्र अंकित हैं। क्योंकि शिव को त्रिमुखी, पशुपति और योगेश्वर आदि के नामों से जाना जाता है इसलिए इतिहासकारों का विचार है कि यह योगी कोई और नहीं बल्कि शिव ही थे।
  3. पशुओं की पूजा (Worship of Animals)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिलने वाली मोहरों और तावीज़ों आदि से हमें इस बात का संकेत मिलता है कि वे कई तरह के पशुओं की पूजा करते थे । इन पशुओं में मुख्य बैल, हाथी, गैंडा, शेर और मगरमच्छ आदि थे । इनके अतिरिक्त सिंधु घाटी के लोग कुछ पौराणिक प्रकार के पशुओं की भी पूजा करते थे। उदाहरण के लिए हड़प्पा से हमें एक ऐसी मूर्ति मिली है जिस का कुछ भाग हाथी का है और कुछ बैल का है। इन पशुओं को देवी माँ अथवा शिव का वाहन समझा जाता था ।
  4. वृक्षों की पूजा (Worship of Trees)-सिंधु घाटी के लोग वृक्षों की भी पूजा करते थे। इन वृक्षों को वे देवी-देवताओं का निवास स्थान समझते थे। वे वृक्षों को जीवन और ज्ञान देने वाला दाता समझते थे। सिंधु घाटी की खुदाई से हमें जो मोहरें प्राप्त हुई हैं उनमें से अत्यधिक मोहरों पर पीपल के पेड़ के चित्र अंकित हैं जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि वे पीपल के पेड़ को अत्यधिक पवित्र समझते थे। इसके अतिरिक्त वे नीम, खजूर, बबूल और शीशम आदि वृक्षों की भी पूजा करते थे ।
  5. स्वस्तिक की पूजा (Worship of Swastik)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिली अनेक मोहरों पर स्वस्तिक के चिन्ह मिले हैं । इनको अच्छे शगुन वाला समझा जाता था। यह पुजारियों और व्यापारियों में आज भी लोकप्रिय है। व्यापारी कोई भी लेन-देन करते समय सबसे पहले स्वस्तिक चिन्ह को बनाते हैं।
  6. सप्तऋषियों की पूजा (Worship of Sapat-Rishis)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिली मोहरों में से एक पर सात मनुष्य एक वृक्ष के सामने खड़े दिखाये गये हैं। इससे इस बात का अनुमान लगाया जाता है कि शायद सिंधु घाटी के लोग सप्तऋषियों की पूजा करते थे। सप्तऋषियों के नाम पुराणों, हिंदुओं के अन्य धार्मिक ग्रंथों तथा बौद्ध ग्रंथों में मिलते हैं। इन सप्तऋषियों के नाम कश्यप, अतरी, विशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदागनी एवं भारदवाज हैं। उनकी स्वर्ग का प्रतीक समझ कर उपासना की जाती थी।
  7. लिंग और योनि की पूजा (Worship of Linga and Yoni)-सिंधु घाटी की खुदाई से हमें बहुत अधिक मात्रा में नुकीले और छल्लों के आकार के पत्थर मिले हैं । इन्हें देखकर यह बात निश्चित तौर पर कही जा सकती है कि सिंधु घाटी के लोग लिंग और योनि की पूजा करते थे। इनकी पूजा वे संसार की सृजन शक्ति के लिए करते थे।
  8. जल की पूजा (Worship of water)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिले बहुत सारे स्नानागारों से इस बात का अनुमान लगाया गया है कि उस समय के लोगों का जल पूजा में गहरा विश्वास था। उनका विशाल स्तानागार हमें मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुआ है। जल को वे शुद्धता और सफ़ाई का प्रतीक मानते थे ।
  9. साँपों की पूजा (Worship of Snakes)-सिंधु घाटी के लोग साँपों की भी पूजा करते थे । ऐसा अनुमान उस समय की प्राप्त कुछ मोहरों पर अंकित साँपों और फनीअर साँपों के चित्रों से लगाया जाता है। एक मोहर पर एक देवता के सिर पर फन फैलाये नाग को दर्शाया गया है। एक और मोहर पर एक मनुष्य को साँप को दूध पिलाते हुए दिखाया गया है।
  10. जादू-टोनों में विश्वास (Faith in Magic and Charms)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिलने वाले बहुत से तावीज़ों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सिंधु घाटी के लोग जादू-टोनों और भूत-प्रेत में विश्वास रखते थे ।
  11. मृतक संस्कार (The Death Ceremonies)-सिंधु घाटी के लोग आम तौर पर अपने मुर्दो को दफ़ना देते थे। कब्र में मुर्दे का सिर उत्तर की ओर तथा पैर दक्षिण की ओर किये जाते थे। कभी-कभी मुर्दे को खुले स्थान पर पशु-पक्षियों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता था । उस समय मुर्दो का संस्कार करने की प्रथा भी प्रचलित थी।
    उसकी अस्थियों को बड़े बर्तन में डाल कर दफना दिया जाता था। मृतक का अंतिम संस्कार चाहे किसी भी ढंग से किया जाता था पर उसके साथ अथवा उसके पिंजर अथवा अस्थियों के साथ कुछ बर्तनों में खाने-पीने और कुछ आवश्यक वस्तुओं को भी दबाया जाता था । इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु घाटी के लोग मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास रखते थे।
  12. कुछ अन्य धार्मिक विश्वास (Some other Religious Beliefs)-सिंधु घाटी की खुदाई से हमें अनेक अग्निकुण्ड प्राप्त हुए हैं जिस से यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु घाटी के लोग अग्नि की, घुग्घी की और सूर्य आदि की पूजा भी करते थे। सिंधु घाटी के लोगों का आत्मा एवं परमात्मा में भी दृढ़ विश्वास था।

प्रश्न 2.(क) देवी माता और स्वस्तिक के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(ख) हड़प्पा काल के लोगों के मृतक संस्कारों के बारे में जानकारी दो ।
[(a) What do you know about Mother Goddess and Swastik ?
(b) Discuss the death ceremonies of people of Harappa Age.]
उत्तर –
(क)

  1. देवी माँ की पूजा (Worship of Mother Goddess)-सिंधु घाटी के लोग सब से अधिक देवी माँ की पूजा करते थे। इस का अनुमान सिंधु घाटी की खुदाई से मिली देवी माँ की अनेक मूर्तियों, मोहरों और तावीज़ों पर बने उनके चित्रों से लगाया जाता है। कई मूर्तियों पर धुएँ के चिन्ह हैं जिनसे यह परिणाम निकलता है कि लोग देवी माँ की धूप-बाती और तेल से पूजा करते थे। देवी माँ को शक्ति का प्रतीक माना जाता था ।।
  2. स्वस्तिक की पूजा (Worship of Swastik)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिली अनेक मोहरों पर स्वस्तिक के चिन्ह मिले हैं । इनको अच्छे शगुन वाला समझा जाता था। यह पुजारियों और व्यापारियों में आज भी लोकप्रिय है। व्यापारी कोई भी लेन-देन करते समय सबसे पहले स्वस्तिक चिन्ह को बनाते हैं।

(ख)

  1. देवी माँ की पूजा (Worship of Mother Goddess)-सिंधु घाटी के लोग सब से अधिक देवी माँ की पूजा करते थे। इस का अनुमान सिंधु घाटी की खुदाई से मिली देवी माँ की अनेक मूर्तियों, मोहरों और तावीज़ों पर बने उनके चित्रों से लगाया जाता है। कई मूर्तियों पर धुएँ के चिन्ह हैं जिनसे यह परिणाम निकलता है कि लोग देवी माँ की धूप-बाती और तेल से पूजा करते थे। देवी माँ को शक्ति का प्रतीक माना जाता था ।।
  2. मृतक संस्कार (The Death Ceremonies)-सिंधु घाटी के लोग आम तौर पर अपने मुर्दो को दफ़ना देते थे। कब्र में मुर्दे का सिर उत्तर की ओर तथा पैर दक्षिण की ओर किये जाते थे। कभी-कभी मुर्दे को खुले स्थान पर पशु-पक्षियों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता था । उस समय मुर्दो का संस्कार करने की प्रथा भी प्रचलित थी।
    उसकी अस्थियों को बड़े बर्तन में डाल कर दफना दिया जाता था। मृतक का अंतिम संस्कार चाहे किसी भी ढंग से किया जाता था पर उसके साथ अथवा उसके पिंजर अथवा अस्थियों के साथ कुछ बर्तनों में खाने-पीने और कुछ आवश्यक वस्तुओं को भी दबाया जाता था । इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु घाटी के लोग मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास रखते थे।

प्रश्न 3.
(क) हड़प्पा काल के लोगों के मृतक संस्कार क्या थे ?
(ख) पीपल और स्वस्तिक पर नोट लिखें ।
[(a) What were the death ceremonies among the people of Harappa Age ?
(b) Write a note on peepal and Swastik.]
उत्तर-(क)

  1. देवी माँ की पूजा (Worship of Mother Goddess)-सिंधु घाटी के लोग सब से अधिक देवी माँ की पूजा करते थे। इस का अनुमान सिंधु घाटी की खुदाई से मिली देवी माँ की अनेक मूर्तियों, मोहरों और तावीज़ों पर बने उनके चित्रों से लगाया जाता है। कई मूर्तियों पर धुएँ के चिन्ह हैं जिनसे यह परिणाम निकलता है कि लोग देवी माँ की धूप-बाती और तेल से पूजा करते थे। देवी माँ को शक्ति का प्रतीक माना जाता था ।।
  2. मृतक संस्कार (The Death Ceremonies)-सिंधु घाटी के लोग आम तौर पर अपने मुर्दो को दफ़ना देते थे। कब्र में मुर्दे का सिर उत्तर की ओर तथा पैर दक्षिण की ओर किये जाते थे। कभी-कभी मुर्दे को खुले स्थान पर पशु-पक्षियों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता था । उस समय मुर्दो का संस्कार करने की प्रथा भी प्रचलित थी।
    उसकी अस्थियों को बड़े बर्तन में डाल कर दफना दिया जाता था। मृतक का अंतिम संस्कार चाहे किसी भी ढंग से किया जाता था पर उसके साथ अथवा उसके पिंजर अथवा अस्थियों के साथ कुछ बर्तनों में खाने-पीने और कुछ आवश्यक वस्तुओं को भी दबाया जाता था । इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु घाटी के लोग मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास रखते थे।

(ख)

  1. देवी माँ की पूजा (Worship of Mother Goddess)-सिंधु घाटी के लोग सब से अधिक देवी माँ की पूजा करते थे। इस का अनुमान सिंधु घाटी की खुदाई से मिली देवी माँ की अनेक मूर्तियों, मोहरों और तावीज़ों पर बने उनके चित्रों से लगाया जाता है। कई मूर्तियों पर धुएँ के चिन्ह हैं जिनसे यह परिणाम निकलता है कि लोग देवी माँ की धूप-बाती और तेल से पूजा करते थे। देवी माँ को शक्ति का प्रतीक माना जाता था ।।
  2. वृक्षों की पूजा (Worship of Trees)-सिंधु घाटी के लोग वृक्षों की भी पूजा करते थे। इन वृक्षों को वे देवी-देवताओं का निवास स्थान समझते थे। वे वृक्षों को जीवन और ज्ञान देने वाला दाता समझते थे। सिंधु घाटी की खुदाई से हमें जो मोहरें प्राप्त हुई हैं उनमें से अत्यधिक मोहरों पर पीपल के पेड़ के चित्र अंकित हैं जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि वे पीपल के पेड़ को अत्यधिक पवित्र समझते थे। इसके अतिरिक्त वे नीम, खजूर, बबूल और शीशम आदि वृक्षों की भी पूजा करते थे ।
  3. स्वस्तिक की पूजा (Worship of Swastik)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिली अनेक मोहरों पर स्वस्तिक के चिन्ह मिले हैं । इनको अच्छे शगुन वाला समझा जाता था। यह पुजारियों और व्यापारियों में आज भी लोकप्रिय है। व्यापारी कोई भी लेन-देन करते समय सबसे पहले स्वस्तिक चिन्ह को बनाते हैं।

प्रश्न 4. हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ने में मृतक को जलाया या दफनाया जाता था ? बतलाएँ।
(Was the dead buried or burnt in Harappa and Mohenjodaro ? Explain.)
उत्तर-मृतक संस्कार (The Death Ceremonies)-सिंधु घाटी के लोग आम तौर पर अपने मुर्दो को दफ़ना देते थे। कब्र में मुर्दे का सिर उत्तर की ओर तथा पैर दक्षिण की ओर किये जाते थे। कभी-कभी मुर्दे को खुले स्थान पर पशु-पक्षियों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता था । उस समय मुर्दो का संस्कार करने की प्रथा भी प्रचलित थी।
उसकी अस्थियों को बड़े बर्तन में डाल कर दफना दिया जाता था। मृतक का अंतिम संस्कार चाहे किसी भी ढंग से किया जाता था पर उसके साथ अथवा उसके पिंजर अथवा अस्थियों के साथ कुछ बर्तनों में खाने-पीने और कुछ आवश्यक वस्तुओं को भी दबाया जाता था । इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु घाटी के लोग मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास रखते थे।

प्रश्न 5. प्राचीन आर्यों के धार्मिक विश्वासों के बारे में आप क्या जानते हैं ? आर्य लोगों के मृतक संस्कारों के संबंध में जानकारी दो।
(What do you know about the religious beliefs of the Early Aryans ? Also state the method of disposal of the dead Aryans.)
अथवा
आर्य लोगों के धार्मिक संस्कारों के बारे में जानकारी दें।
(Describe the religious ceremonies of Aryan people.)
अथवा आरंभिक आर्यों के धार्मिक जीवन के बारे में बताएँ।
(Explain the religious life of Early Aryans.)
अथवा
पूर्व आर्यों के धार्मिक जीवन का वर्णन करें।
(Describe the religious life of pre-Aryans.)
उत्तर-आरंभिक आर्यों का धार्मिक जीवन कैसा था इसके संबंध में हमें ऋग्वेद से विस्तारपूर्वक जानकारी प्राप्त होती है । निस्संदेह वे बड़ा सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करते थे। उनके धार्मिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:—
1. प्रकृति और प्राकृतिक शक्तियों के पुजारी (Worshippers of Nature and Natural Phenomena)- आरंभिक आर्यों का धार्मिक जीवन बिल्कुल सादा था। वे प्रकृति और प्राकृतिक शक्तियों की पूजा करते थे। वे उन सारी वस्तुओं जो सुंदर विचित्र और भयानक दिखाई देती थीं, को प्राकृतिक शक्तियाँ स्वीकार करते थे। उन्होंने इन प्राकृतिक शक्तियों को अलग-अलग देवी-देवताओं का नाम रखकर उनकी पूजा आरंभ कर दी थी। वे चमकते हुए सूर्य की पूजा करते थे क्योंकि वह पृथ्वी को सजीव रखता था। वे वायु की पूजा करते थे जो संसार भर के मनुष्यों को जीवन देती थी। वे प्रभात की पूजा करते थे जो मनुष्यों को उनकी मीठी नींद से जगाकर उनको उनके कार्यों पर भेजता था। वे नीले आकाश की पूजा करते थे जिसने सारे संसार को घेरा हुआ था।
2. वैदिक देवते (VedicGods) आरंभिक आर्यों के देवताओं की कुल संख्या 33 थी। इन को तीन भागों में बाँटा गया था । ये देवता आकाश, पृथ्वी और आकाश तथा पृथ्वी के मध्य रहते थे । प्रमुख देवी-देवताओं का संक्षेप वर्णन अग्रलिखित है :—

  • वरुण (Varuna)-वरुण आरंभिक आर्यों का सब से बड़ा देवता था । वह सिंहासन पर बैठता था। उसको सत्य और धर्म का स्वामी माना जाता था। उसको आकाश, पृथ्वी, और सूर्य का निर्माता कहा जाता था। वह पापी लोगों को सज़ा देता था। वह जीवन दान दे सकता था और मृत्यु को रद्द कर सकता था। इसलिए पापी लोग उससे क्षमा की याचना करते थे।
  • इंद्र (Indra) -इंद्र आरंभिक आर्यों का दूसरा महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली देवता था। ऋग्वेद में सबसे अधिक (250) मंत्र इस देवता की प्रशंसा में दिये गये हैं। उसको वर्षा और युद्ध का देवता समझा जाता था। आर्य उसकी समय पर वर्षा के लिए और युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करते थे । वह दुश्मनों के दुर्गों को पलक झपकते ही नष्ट कर सकता था ।
  • अग्नि (Agni)-अग्नि आरंभिक आर्यों का एक और प्रमुख देवता था। उसका संबंध विवाह और दाह संस्कारों के साथ था। उसके बिना कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता था। ऋग्वेद में अग्नि देवता की प्रशंसा में 200 मंत्र दिये गये हैं।
  • सूर्य (Sun)-सूर्य भी आरंभिक आर्यों का एक महत्त्वपूर्ण देवता था । वह संसार में से अंधेरे को दूर भगाता था। वह हर रोज़ सात घोड़ों वाले रथ पर सवार होकर आकाश का चक्र काटता था ।
  • रुद्र (Rudra)-रुद्र को आँधी या तूफ़ान का देवता समझा जाता था। वह बहुत ही प्रचंड और विनाशकारी था। लोग उससे बहुत डरते थे और उसको प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते थे।
  • सोम (Soma)-सोम देवता की आरंभिक आर्यों के धार्मिक जीवन में बहुत महत्ता थी। सोम रस को एक ऐसा अमृत समझा जाता था जिसको पीकर देवता अमर हो जाते थे। इस का हवन में प्रयोग किया जाता था और यह देवताओं को भेंट किया जाता था।
  • देवियाँ (Goddesses)-आरंभिक आर्य देवताओं के अतिरिक्त कुछ देवियों की भी पूजा करते थे । परंत देवताओं के मुकाबले इनका महत्त्व कम था । उनके द्वारा पूजी जाने वाली प्रमुख देवियाँ प्रभात की देवी उषा, रात की देवी रात्री, धरती की देवी पृथ्वी, वन देवी आरण्यी, नदी देवी सरस्वती थीं।

3. एक ईश्वर में विश्वास ( Faith in one God) यद्यपि आरंभिक आर्य अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते थे परंतु फिर भी उनका ईश्वर की एकता में दृढ़-विश्वास था। वे सारे देवताओं को महान् समझते थे और किसी को भी छोटा या बड़ा नहीं समझते थे । ऋषि अलग-अलग अवसरों पर अलग-अलग देवी-देवताओं को प्रधान बना देते थे । ऋग्वेद के एक मंत्र में कहा गया है, सब एक ही हैं, केवल ऋषियों ने ही उनका विभिन्न रूपों में वर्णन किया है।” एक और मंत्र में लिखा है, “वह जिसने हमें जीवन बख्शा है, वह जिसने सृष्टि की रचना की है, अनेक देवताओं के नाम के साथ प्रसिद्ध होते हुए भी वह एक है।” स्पष्ट है कि आर्य एक ईश्वर के सिद्धांत को अच्छी तरह जानते
थे।
4. मंदिरों और मूर्ति पूजा का अभाव (Absence of Temples and Idol Worship)-आरंभिक आर्यों ने अपने देवी-देवताओं की याद में न किसी मंदिर का निर्माण किया था और न ही उनकी मूर्तियाँ बनाई गई थीं। मंदिर के निर्माण संबंधी या मूर्तियों के निर्माण संबंधी ऋग्वेद में कहीं भी कोई वर्णन नहीं मिलता। आर्य लोग अपने घरों में खुले वातावरण में चौकड़ी लगा कर बैठ जाते थे और एक मन हो कर अपने देवी-देवताओं की याद में मंत्रों का उच्चारण करते थे और स्तुति करते थे ।
5. यज्ञ और बलियाँ (Yajnas and Sacrifices)-आरंभिक आर्य लोग अपने देवी-देवताओं को खुश करने के लिए कई तरह के यज्ञ करते थे । इन यज्ञों को बड़े ध्यान से किया जाता था, क्योंकि उनको यह डर होता था कि थोड़ीसी गलती से उनके देवता नाराज़ न हो जाएँ। सबसे पहले यज्ञ के लिए वेदी बनाई जाती थी। फिर इसमें पवित्र अग्नि जलाई जाती थी इसमें घी, दूध, चावल और सोमरस डाला जाता था। इन यज्ञों के दौरान कई जानवरों की जैसे भेड़ों, बकरियों और घोड़ों आदि की बलि दी जाती थी। उस समय मनुष्य की बलि देने की प्रथा बिल्कुल नहीं थी। ये यज्ञ कई प्रकार के होते थे । सबसे छोटा यज्ञ पारिवारिक स्तर पर होता था। बड़े-बड़े यज्ञों की तैयारी बहुत पहले ही शुरू हो जाती थी। ऐसे यज्ञ राजाओं और समाज के और अमीर वर्ग द्वारा करवाये जाते थे। इन यज्ञों में बहुत ज्यादा मात्रा में पुरोहित शामिल होते थे। इनको दक्षिणा के तौर पर सोना, पशु या अनाज दिया जाता था। इन यज्ञों और बलियों का प्रमुख उद्देश्य देवताओं को खुश करना था। इनके बदले वे समझते थे कि उनको युद्ध में सफलता प्राप्त होगी, धन प्राप्त होगा, संतान में वृद्धि होगी और लम्बा जीवन मिलेगा। आरंभिक आर्य यह समझते थे कि हर यज्ञ से संसार की नये सिरे से उत्पत्ति होती है और यदि यह यज्ञ न करवाए जायें तो संसार में फिर से अंधकार छा जाएगा । इन यज्ञों के करवाने से गणित, भौतिक ज्ञान और जानवरों की शारीरिक बनावट के ज्ञान में वृद्धि हुई ।
6. पितरों की पूजा (Worship of Forefathers)-आरंभिक आर्य अपने देवी-देवताओं की पूजा के अतिरिक्त अपने पितरों की भी पूजा करते थे । पितर आर्यों के आरंभिक बुर्जुग थे। वे स्वर्गों में निवास करते थे । ऋग्वेद में बहुत से मंत्र पितरों की प्रशंसा में लिखे गये हैं । उनकी पूजा भी अन्य देवी-देवताओं की तरह की जाती थी। पितरों की पूजा इस आशा के साथ की जाती थी कि वे अपने वंश की रक्षा करेंगे, उनका मार्गदर्शन करेंगे, उनके कष्ट दूर करेंगे, उनको धन और शक्ति प्रदान करेंगे तथा अपने बच्चों की दीर्घायु और संतान का वर देंगे।
7. मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास (Belief in Life after Death)-आरंभिक आर्य मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास रखते थे । आवागमन और पुनर्जन्म का सिद्धांत अभी प्रचलित नहीं हुआ था। वैदिक काल के लोगों का विश्वास था कि मृत्यु के समय आत्मा शरीर से अलग हो जाती है। वे आत्मा को अमर समझते थे। स्वर्ग का जीवन खुशियों से भरपूर होता था । यह देवताओं का निवास स्थान था। वे लोग स्वर्ग के अधिकारी समझे जाते थे जो रणभूमि में अपना बलिदान देते थे अथवा भारी तपस्या करते थे अथवा यज्ञ के समय खुले दिल से दान देते थे। ऋग्वेद में नरक का वर्णन कहीं नहीं किया गया है ।
8. मृतक का अंतिम संस्कार (Disposal of Dead)-आरंभिक आर्यों के काल में मृतकों का दाह संस्कार किया जाता था । मृतक को चिता तक ले जाने के लिए उसकी पत्नी और अन्य संबंधी साथ जाते थे। उसके बाद मृतक को चिता पर रख दिया जाता था। यदि मृतक ब्राह्मण होता तो उसके दायें हाथ में एक लाठी पकड़ाई जाती थी, यदि वह क्षत्रिय होता तो उसके हाथ में धनुष और यदि वह वैश्य होता तो उसके हाथ में हल चलाने वाली लकड़ी पकड़ाई जाती थी । उसकी पत्नी तब तक चिता के पास बैठी रहती थी जब तक उसको यह नहीं कहा जाता था ‘अरी महिला उठो और जीवित लोगों में आओ।’ इसके बाद हवन कुंड से लाई गई अग्नि के साथ चिता को आग लगाई जाती थी और वह मंत्र पढ़ा जाता था, “बजुर्गों के मार्ग पर जाओ।” लाश के पूर्ण भस्म हो जाने को बाद अस्थियों को इकट्ठा कर लिया जाता था और उनको एक क्लश में रखकर जमीन में गाढ़ दिया जाता था।
9. रित और धर्मन (Rita and Dharman)-ऋग्वेद और दूसरे वैदिक ग्रंथों में रित और धर्मन शब्दों का बहुत वर्णन मिलता है । रित से भाव उस व्यवस्था से है जिसके अनुसार संसार का प्रबंध चलता है। रित के नियमानुसार ही सुबह पौ फटती है, सूर्य, चाँद और तारे चमकीले नज़र आते हैं। धरती सूर्य के इर्द-गिर्द चक्र लगाती है । सागर में ज्वारभाटे आते हैं। इस तरह रित एक सच्चाई है, इस का विपरीत अनऋत (झूठ) है। ‘धर्मन’ शब्द से भाव कानून है। धर्मन देवताओं द्वारा बनाये जाते हैं । यह भौतिक संसार, मनुष्यों और बलियों पर लागू होता है। वास्तव में धर्मन जीवन और रस्मों रीतों का नियम है। अच्छे मनुष्य अपना जीवन धर्मन अनुसार व्यतीत करते थे।

प्रश्न 6. वरुण तथा अग्नि देवताओं पर एक नोट लिखें । वैदिक बलि की रीति के बारे जानकारी
(Write a brief note on Varuna and Agni. Write about the ritual of Vedic sacrifice.)
उत्तर-(क)

  1. वरुण (Varuna)- वरुण आरंभिक आर्यों का सब से बड़ा देवता था। वह ऊँचे सिंहासन पर बैठता था। उसको सत्य और धर्म का स्वामी माना जाता था। उसको आकाश, पृथ्वी और सूर्य का निर्माता कहा जाता था। उसके आदेशानुसार चाँद चमकता था और तारे टिमटिमाते थे। वह सर्वज्ञापक और सर्व-व्यापक था। वह संसार में घटने वाली हर घटना को जानता था। उसकी सैंकड़ों आँखें थीं। कोई भी पापी उसकी पैनी नज़र से बच नहीं सकता था। वह पापियों को दंड देता था। वह जीवन दान दे सकता था और मृत्यु को रद्द कर सकता था। इसलिए पापी क्षमा के लिए उससे प्रार्थना करते थे।
  2. अग्नि (Agni)- अग्नि आरंभिक आर्यों का एक और प्रमुख देवता था। उसको दो कारणों से अति महत्त्वपूर्ण समझा जाता था। पहला, उसको सब घरों का स्वामी समझा जाता था। उसका संबंध विवाह और दाहसंस्कारों के साथ था। दूसरा, उसके बिना कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता था। वह अपने भक्तों द्वारा दी गई आहुति को देवताओं तक पहुँचाता था। अग्नि देवता की सात जीभे और 1000 आँखें समझी जाती थीं। यदि वह कभी गुस्से में आ जाता तो पल भर में सबको नष्ट कर सकता था। सूखे काष्ठ, घी और मक्खन को इसका मनपसंद भोजन समझा जाता था। ऋग्वेद में अग्नि देवता की प्रशंसा में 200 मंत्र दिये गये हैं।

(ख) यज्ञ और बलियाँ (Yajnas and Sacrifices)-आरंभिक आर्य लोग अपने देवी-देवताओं को खुश करने के लिए कई तरह के यज्ञ करते थे । इन यज्ञों को बड़े ध्यान से किया जाता था, क्योंकि उनको यह डर होता था कि थोड़ीसी गलती से उनके देवता नाराज़ न हो जाएँ। सबसे पहले यज्ञ के लिए वेदी बनाई जाती थी। फिर इसमें पवित्र अग्नि जलाई जाती थी इसमें घी, दूध, चावल और सोमरस डाला जाता था। इन यज्ञों के दौरान कई जानवरों की जैसे भेड़ों, बकरियों और घोड़ों आदि की बलि दी जाती थी। उस समय मनुष्य की बलि देने की प्रथा बिल्कुल नहीं थी। ये यज्ञ कई प्रकार के होते थे । सबसे छोटा यज्ञ पारिवारिक स्तर पर होता था। बड़े-बड़े यज्ञों की तैयारी बहुत पहले ही शुरू हो जाती थी। ऐसे यज्ञ राजाओं और समाज के और अमीर वर्ग द्वारा करवाये जाते थे। इन यज्ञों में बहुत ज्यादा मात्रा में पुरोहित शामिल होते थे। इनको दक्षिणा के तौर पर सोना, पशु या अनाज दिया जाता था। इन यज्ञों और बलियों का प्रमुख उद्देश्य देवताओं को खुश करना था। इनके बदले वे समझते थे कि उनको युद्ध में सफलता प्राप्त होगी, धन प्राप्त होगा, संतान में वृद्धि होगी और लम्बा जीवन मिलेगा। आरंभिक आर्य यह समझते थे कि हर यज्ञ से संसार की नये सिरे से उत्पत्ति होती है और यदि यह यज्ञ न करवाए जायें तो संसार में फिर से अंधकार छा जाएगा । इन यज्ञों के करवाने से गणित, भौतिक ज्ञान और जानवरों की शारीरिक बनावट के ज्ञान में वृद्धि हुई ।

प्रश्न 7. वैदिक देवताओं से क्या भाव है ? इनसे किस प्रकार के वरदान की आशा की जाती थी ?
(What is meant by Vedic gods ? What is expected from them ?)
अथवा
वैदिक देवता कौन थे ? कुछ देवी-देवताओं के नाम लिखो।ये देवता ऐतिहासिक व्यक्ति थे या पौराणिक, स्पष्ट करो।
(Who were Vedic gods ? Write down the names of some gods and goddesses. Whether these gods were historical persons or mythological ? State clearly.)
अथवा
वैदिक देवी-देवताओं के बारे में आप क्या जानते हैं ? वर्णन करो ।
(What do you know about the Vedic gods and goddesses ? Explain.)
अथवा
वैदिक काल में ईश्वर के बारे में बताएँ ।
(Explain about monotheism in Vedic Period.)
अथवा
वैदिक देवी-देवताओं पर एक विस्तृत नोट लिखें ।
(Write a detailed note on Vedic gods and goddesses.)
अथवा
किन्हीं दो वैदिक देवताओं पर संक्षिप्त नोट लिखें।
(Write brief note on any two Vedic gods.)
उत्तर-आरंभिक आर्य बहुत सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करते थे। वे प्रकृति और.उसकी शक्तियों को देवता मान कर उनकी पूजा करते थे। उनके देवताओं की कुल संख्या 33 थी। देवियों की संख्या कम थी और देवताओं के मुकाबले उनका महत्त्व भी कम था। आरंभिक आर्य यद्यपि अपने देवी-देवताओं की पूजा करते थे परंतु वे उनको एक परमेश्वर का रूप समझते थे। वे अपने देवी-देवताओं को खुश करने के लिए और उनसे ज़रूरी वरदान प्राप्त करने के लिए स्तुतियाँ और यज्ञ करते थे और बलियाँ भी देते थे। उस समय मूर्ति पूजा या मंदिर बनवाने की प्रथा प्रचलित नहीं थी।
1. वैदिक देवता (Vedic Gods)—वैदिक देवताओं की नींव कहाँ से रखी गई, उनका स्वभाव क्या था, मनुष्यों के साथ उनके क्या संबंध थे और उनकी संख्या कितनी थी ? इन सारे प्रश्नों के उत्तर हमें ऋग्वेद से प्राप्त होते हैं। ऋग्वेद के मंत्रों (ऋचों) में यह कहा गया है कि देवता संसार की सृजना के बाद पैदा हुए, उनको आम तौर पर आकाश और पृथ्वी की संतान माना जाता था। वे बड़े शक्तिशाली और महान् थे। वे लंबा जीवन व्यतीत करते थे। उन्होंने तपस्या के साथ अथवा सोमरस पी कर अविनाशता प्राप्त कर ली थी। वे अलग-अलग रूप धारण कर सकते थे। ज्यादातर वे मनुष्ययी रूप धारण करते थे। वे अपने दैवीय वाहनों पर चढ़ कर आते थे और घास के आसन पर बैठते थे। वे दुनिया की घटनाओं में अपना हिस्सा डालते थे। वे अपने श्रद्धालुओं की प्रार्थनायें भी सुनते थे और अपने वरदान देते थे। उनकी कुल संख्या 33 थी और उनको तीन भागों में बाँटा गया था। यह बंटन उनके निवास स्थान के आधार पर था जहाँ वे रहते थे। प्रत्येक श्रेणी में 11 देवते शामिल थे। वरुण, सूर्य, विष्णु और उषा आदि आकाश के देवता थे। इंद्र, वायु, रुद्र और मरुत आदि पृथ्वी और आकाश के इर्द-गिर्द रहने वाले देवता थे। अग्नि, पृथ्वी, बृहस्पति, सागर और नदियाँ आदि पृथ्वी के देवता थे। देवियों के मुकाबले देवताओं की संख्या अधिक थी तथा उनको बहुत अधिक महत्त्व प्राप्त था। प्रमुख देवी-देवताओं का संक्षेप वर्णन निम्नलिखित अनुसार है:

  • वरुण (Varuna)- वरुण आरंभिक आर्यों का सब से बड़ा देवता था। वह ऊँचे सिंहासन पर बैठता था। उसको सत्य और धर्म का स्वामी माना जाता था। उसको आकाश, पृथ्वी और सूर्य का निर्माता कहा जाता था। उसके आदेशानुसार चाँद चमकता था और तारे टिमटिमाते थे। वह सर्वज्ञापक और सर्व-व्यापक था। वह संसार में घटने वाली हर घटना को जानता था। उसकी सैंकड़ों आँखें थीं। कोई भी पापी उसकी पैनी नज़र से बच नहीं सकता था। वह पापियों को दंड देता था। वह जीवन दान दे सकता था और मृत्यु को रद्द कर सकता था। इसलिए पापी क्षमा के लिए उससे प्रार्थना करते थे।
  • इंद्र (Indra)- इंद्र आरंभिक आर्यों का दूसरा महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली देवता था। ऋग्वेद में सबसे अधिक (250) मंत्र इस देवता की प्रशंसा में दिये गये हैं। उसका तेज इतना था कि सैंकड़ों सूर्यों का प्रकाश भी उसके आगे मद्धम पड़ जाता था। उसको वर्षा और युद्ध का देवता समझा जाता था। आर्य उसकी समय पर वर्षा के लिए और युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए याचना करते थे। वह इतना बहादुर था कि उसने राक्षसों पर भी विजय प्राप्त की थी। वह दुश्मनों के दुर्गों को पलक झपकते ही नष्ट कर सकता था। वह अंधकार को दूर कर सकता था। वह कई रूप धारण कर सकता था। वह इतना शक्तिशाली था कि सब देवता उस से डरते थे।
  • अग्नि (Agni)- अग्नि आरंभिक आर्यों का एक और प्रमुख देवता था। उसको दो कारणों से अति महत्त्वपूर्ण समझा जाता था। पहला, उसको सब घरों का स्वामी समझा जाता था। उसका संबंध विवाह और दाहसंस्कारों के साथ था। दूसरा, उसके बिना कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता था। वह अपने भक्तों द्वारा दी गई आहुति को देवताओं तक पहुँचाता था। अग्नि देवता की सात जीभे और 1000 आँखें समझी जाती थीं। यदि वह कभी गुस्से में आ जाता तो पल भर में सबको नष्ट कर सकता था। सूखे काष्ठ, घी और मक्खन को इसका मनपसंद भोजन समझा जाता था। ऋग्वेद में अग्नि देवता की प्रशंसा में 200 मंत्र दिये गये हैं।
  • सूर्य (Sun) सूर्य भी आरंभिक आर्यों का एक महत्त्वपूर्ण देवता था। वह संसार में से अंधेरे को दूर भगाता था। उसको आदिति और दिऊस का पुत्र समझा जाता था। वह हर-रोज़ सात घोड़ों के रथ पर सवार होकर आकाश का चक्र काटता था।
  • रुद्र (Rudra)-रुद्र को आँधी या तूफान का देवता समझा जाता था। वह बड़ा प्रचंड और विनाशकारी था। लोग उससे बहुत डरते थे और उसे खुश रखने का प्रयत्न करते थे। उसकी शक्ल राक्षसों जैसी थी और वह पहाड़ों में निवास करता था। उसका पेट काला और पीठ लाल थी।
  • सोम (Soma)-सोम देवता की आरंभिक आर्यों के धार्मिक जीवन में बड़ी महत्ता थी। ऋग्वेद का सारा नवम् मंडल सोम देवता की प्रशंसा में रचा गया है। सोमरस को एक ऐसा अमृत समझा जाता था जिसको पी कर देवता अमर हो जाते थे। इस का हवन में प्रयोग किया जाता था। यह देवताओं को भेंट किया जाता था। सोमरस एक बूटी से प्राप्त किया जाता था जो कि पहाड़ों में मिलती थी।
  • उषा (Usha)-आरंभिक आर्य देवताओं के अतिरिक्त कुछ देवियों की पूजा भी करते थे। परंतु देवताओं के मुकाबले इनका महत्त्व कम था। उनके द्वारा पूजी जाने वाली देवियाँ जैसे रात की देवी रात्री, धरती की देवी पृथ्वी, वन देवी आरण्यी, नदी देवी सरस्वती में से उषा को प्रमुख स्थान प्राप्त था। इस को प्रभात की देवी समझा जाता था। इस का रूप बहुत सुंदर और मन को मोह लेने वाला था। इसको सूर्य की पत्नी समझा जाता था।

2. वैदिक देवते ऐतिहासिक व्यक्ति थे अथवा पौराणिक (Vedic Gods were historical persons or mythological)-आरंभिक आर्य अपने देवी-देवताओं को ऐतिहासिक व्यक्ति समझते थे। इसका कारण यह था कि वे मनुष्यों के समान थे। वे अपने दैवीय वाहनों पर चढ़ कर आते थे और घास के सिंहासन पर बैठते थे। वे अपने श्रद्धालुओं की प्रार्थनायें सुनते थे और उनको वरदान देते थे। वे अपने पुजारियों पर कृपा करते थे। इन देवी-देवताओं को आदिती देवी और दिऊस के पुत्र-पुत्रियाँ समझा जाता था। आरंभ में इन सब को नाशवान् जीव समझा जाता था। अविनाशता उनको बाद में दी गई थी।

प्रश्न 8.
(क) वैदिक काल में बलि की रीति पर प्रकाश डालें।
(ख) वरुण तथा अग्नि देवताओं पर संक्षेप नोट लिखें।
[(a) Throw light on the Vedic ritual sacrifice.
(b) Write brief notes on Varuna and Agni gods.]
उत्तर-(क) बलि की रीति (Sacrifice Ritual)—यज्ञ और बलियाँ (Yajnas and Sacrifices)-आरंभिक आर्य लोग अपने देवी-देवताओं को खुश करने के लिए कई तरह के यज्ञ करते थे । इन यज्ञों को बड़े ध्यान से किया जाता था, क्योंकि उनको यह डर होता था कि थोड़ीसी गलती से उनके देवता नाराज़ न हो जाएँ। सबसे पहले यज्ञ के लिए वेदी बनाई जाती थी। फिर इसमें पवित्र अग्नि जलाई जाती थी इसमें घी, दूध, चावल और सोमरस डाला जाता था। इन यज्ञों के दौरान कई जानवरों की जैसे भेड़ों, बकरियों और घोड़ों आदि की बलि दी जाती थी। उस समय मनुष्य की बलि देने की प्रथा बिल्कुल नहीं थी। ये यज्ञ कई प्रकार के होते थे । सबसे छोटा यज्ञ पारिवारिक स्तर पर होता था। बड़े-बड़े यज्ञों की तैयारी बहुत पहले ही शुरू हो जाती थी। ऐसे यज्ञ राजाओं और समाज के और अमीर वर्ग द्वारा करवाये जाते थे। इन यज्ञों में बहुत ज्यादा मात्रा में पुरोहित शामिल होते थे। इनको दक्षिणा के तौर पर सोना, पशु या अनाज दिया जाता था। इन यज्ञों और बलियों का प्रमुख उद्देश्य देवताओं को खुश करना था। इनके बदले वे समझते थे कि उनको युद्ध में सफलता प्राप्त होगी, धन प्राप्त होगा, संतान में वृद्धि होगी और लम्बा जीवन मिलेगा। आरंभिक आर्य यह समझते थे कि हर यज्ञ से संसार की नये सिरे से उत्पत्ति होती है और यदि यह यज्ञ न करवाए जायें तो संसार में फिर से अंधकार छा जाएगा । इन यज्ञों के करवाने से गणित, भौतिक ज्ञान और जानवरों की शारीरिक बनावट के ज्ञान में वृद्धि हुई ।

(ख) वरुण तथा अग्नि देवता (Varuna and Agni gods)—

  1. वरुण (Varuna)- वरुण आरंभिक आर्यों का सब से बड़ा देवता था। वह ऊँचे सिंहासन पर बैठता था। उसको सत्य और धर्म का स्वामी माना जाता था। उसको आकाश, पृथ्वी और सूर्य का निर्माता कहा जाता था। उसके आदेशानुसार चाँद चमकता था और तारे टिमटिमाते थे। वह सर्वज्ञापक और सर्व-व्यापक था। वह संसार में घटने वाली हर घटना को जानता था। उसकी सैंकड़ों आँखें थीं। कोई भी पापी उसकी पैनी नज़र से बच नहीं सकता था। वह पापियों को दंड देता था। वह जीवन दान दे सकता था और मृत्यु को रद्द कर सकता था। इसलिए पापी क्षमा के लिए उससे प्रार्थना करते थे।
  2. अग्नि (Agni)- अग्नि आरंभिक आर्यों का एक और प्रमुख देवता था। उसको दो कारणों से अति महत्त्वपूर्ण समझा जाता था। पहला, उसको सब घरों का स्वामी समझा जाता था। उसका संबंध विवाह और दाहसंस्कारों के साथ था। दूसरा, उसके बिना कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता था। वह अपने भक्तों द्वारा दी गई आहुति को देवताओं तक पहुँचाता था। अग्नि देवता की सात जीभे और 1000 आँखें समझी जाती थीं। यदि वह कभी गुस्से में आ जाता तो पल भर में सबको नष्ट कर सकता था। सूखे काष्ठ, घी और मक्खन को इसका मनपसंद भोजन समझा जाता था। ऋग्वेद में अग्नि देवता की प्रशंसा में 200 मंत्र दिये गये हैं।

प्रश्न 9. सिंधु घाटी के लोगों तथा आर्य लोगों के धार्मिक जीवन में क्या अंतर था ? स्पष्ट करें।
(Explain the differences of religious life of Indus Valley and Aryan peoples.)
अथवा
सिंधु घाटी के लोगों और आर्य लोगों का धार्मिक जीवन किस तरह का था? जानकारी दीजिए।
(Describe the religious life of the people of Indus Valley and Aryans. Explain.)
उत्तर- सिंधु घाटी की खुदाई से मिली मोहरों, चित्रों और मूर्तियों आदि से सिंधु घाटी के लोगों के धार्मिक जीवन के संबंध में बहुमूल्य जानकारी प्राप्त होती है। इस जानकारी के आधार पर निस्संदेह यह कहा जा सकता है कि सिंधु घाही के लोगों का धार्मिक जीवन काफी उन्नत था। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके बहुत से धार्मिक विश्वास आज के हिंदू धर्म में प्रचलित हैं।—

  1. देवी माँ की पूजा (Worship of Mother Goddess)-सिंधु घाटी के लोग सब से अधिक देवी माँ की पूजा करते थे। इस का अनुमान सिंधु घाटी की खुदाई से मिली देवी माँ की अनेक मूर्तियों, मोहरों और तावीज़ों पर बने उनके चित्रों से लगाया जाता है। कई मूर्तियों पर धुएँ के चिन्ह हैं जिनसे यह परिणाम निकलता है कि लोग देवी माँ की धूप-बाती और तेल से पूजा करते थे। देवी माँ को शक्ति का प्रतीक माना जाता था ।।
  2. शिव की पूजा (Worship of Lord Shiva )-सिंधु घाटी के लोगों में एक देवता की पूजा काफी प्रचलित थी। उस समय की मिली कुछ मोहरों पर एक देव के चित्र अंकित हैं। इस देव को योगी की स्थिति में समाधि लगाये हुए देखा गया है। इस के तीन मुँह दर्शाये गये हैं और सिर पर एक मन को मोह लेने वाला पोश पहना हुआ है। इस योगी के इर्द-गिर्द शेर, हाथी, गैंडे, साँड और हिरण आदि के चित्र अंकित हैं। क्योंकि शिव को त्रिमुखी, पशुपति और योगेश्वर आदि के नामों से जाना जाता है इसलिए इतिहासकारों का विचार है कि यह योगी कोई और नहीं बल्कि शिव ही थे।
  3. पशुओं की पूजा (Worship of Animals)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिलने वाली मोहरों और तावीज़ों आदि से हमें इस बात का संकेत मिलता है कि वे कई तरह के पशुओं की पूजा करते थे । इन पशुओं में मुख्य बैल, हाथी, गैंडा, शेर और मगरमच्छ आदि थे । इनके अतिरिक्त सिंधु घाटी के लोग कुछ पौराणिक प्रकार के पशुओं की भी पूजा करते थे। उदाहरण के लिए हड़प्पा से हमें एक ऐसी मूर्ति मिली है जिस का कुछ भाग हाथी का है और कुछ बैल का है। इन पशुओं को देवी माँ अथवा शिव का वाहन समझा जाता था ।
  4. वृक्षों की पूजा (Worship of Trees)-सिंधु घाटी के लोग वृक्षों की भी पूजा करते थे। इन वृक्षों को वे देवी-देवताओं का निवास स्थान समझते थे। वे वृक्षों को जीवन और ज्ञान देने वाला दाता समझते थे। सिंधु घाटी की खुदाई से हमें जो मोहरें प्राप्त हुई हैं उनमें से अत्यधिक मोहरों पर पीपल के पेड़ के चित्र अंकित हैं जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि वे पीपल के पेड़ को अत्यधिक पवित्र समझते थे। इसके अतिरिक्त वे नीम, खजूर, बबूल और शीशम आदि वृक्षों की भी पूजा करते थे ।
  5. स्वस्तिक की पूजा (Worship of Swastik)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिली अनेक मोहरों पर स्वस्तिक के चिन्ह मिले हैं । इनको अच्छे शगुन वाला समझा जाता था। यह पुजारियों और व्यापारियों में आज भी लोकप्रिय है। व्यापारी कोई भी लेन-देन करते समय सबसे पहले स्वस्तिक चिन्ह को बनाते हैं।
  6. सप्तऋषियों की पूजा (Worship of Sapat-Rishis)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिली मोहरों में से एक पर सात मनुष्य एक वृक्ष के सामने खड़े दिखाये गये हैं। इससे इस बात का अनुमान लगाया जाता है कि शायद सिंधु घाटी के लोग सप्तऋषियों की पूजा करते थे। सप्तऋषियों के नाम पुराणों, हिंदुओं के अन्य धार्मिक ग्रंथों तथा बौद्ध ग्रंथों में मिलते हैं। इन सप्तऋषियों के नाम कश्यप, अतरी, विशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदागनी एवं भारदवाज हैं। उनकी स्वर्ग का प्रतीक समझ कर उपासना की जाती थी।
  7. लिंग और योनि की पूजा (Worship of Linga and Yoni)-सिंधु घाटी की खुदाई से हमें बहुत अधिक मात्रा में नुकीले और छल्लों के आकार के पत्थर मिले हैं । इन्हें देखकर यह बात निश्चित तौर पर कही जा सकती है कि सिंधु घाटी के लोग लिंग और योनि की पूजा करते थे। इनकी पूजा वे संसार की सृजन शक्ति के लिए करते थे।
  8. जल की पूजा (Worship of water)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिले बहुत सारे स्नानागारों से इस बात का अनुमान लगाया गया है कि उस समय के लोगों का जल पूजा में गहरा विश्वास था। उनका विशाल स्तानागार हमें मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुआ है। जल को वे शुद्धता और सफ़ाई का प्रतीक मानते थे ।
  9. साँपों की पूजा (Worship of Snakes)-सिंधु घाटी के लोग साँपों की भी पूजा करते थे । ऐसा अनुमान उस समय की प्राप्त कुछ मोहरों पर अंकित साँपों और फनीअर साँपों के चित्रों से लगाया जाता है। एक मोहर पर एक देवता के सिर पर फन फैलाये नाग को दर्शाया गया है। एक और मोहर पर एक मनुष्य को साँप को दूध पिलाते हुए दिखाया गया है।
  10. जादू-टोनों में विश्वास (Faith in Magic and Charms)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिलने वाले बहुत से तावीज़ों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सिंधु घाटी के लोग जादू-टोनों और भूत-प्रेत में विश्वास रखते थे ।
  11. मृतक संस्कार (The Death Ceremonies)-सिंधु घाटी के लोग आम तौर पर अपने मुर्दो को दफ़ना देते थे। कब्र में मुर्दे का सिर उत्तर की ओर तथा पैर दक्षिण की ओर किये जाते थे। कभी-कभी मुर्दे को खुले स्थान पर पशु-पक्षियों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता था । उस समय मुर्दो का संस्कार करने की प्रथा भी प्रचलित थी।
    उसकी अस्थियों को बड़े बर्तन में डाल कर दफना दिया जाता था। मृतक का अंतिम संस्कार चाहे किसी भी ढंग से किया जाता था पर उसके साथ अथवा उसके पिंजर अथवा अस्थियों के साथ कुछ बर्तनों में खाने-पीने और कुछ आवश्यक वस्तुओं को भी दबाया जाता था । इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु घाटी के लोग मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास रखते थे।
  12. कुछ अन्य धार्मिक विश्वास (Some other Religious Beliefs)-सिंधु घाटी की खुदाई से हमें अनेक अग्निकुण्ड प्राप्त हुए हैं जिस से यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु घाटी के लोग अग्नि की, घुग्घी की और सूर्य आदि की पूजा भी करते थे। सिंधु घाटी के लोगों का आत्मा एवं परमात्मा में भी दृढ़ विश्वास था।

आरंभिक आर्यों का धार्मिक जीवन कैसा था इसके संबंध में हमें ऋग्वेद से विस्तारपूर्वक जानकारी प्राप्त होती है । निस्संदेह वे बड़ा सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करते थे। उनके धार्मिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:—
1. प्रकृति और प्राकृतिक शक्तियों के पुजारी (Worshippers of Nature and Natural Phenomena)- आरंभिक आर्यों का धार्मिक जीवन बिल्कुल सादा था। वे प्रकृति और प्राकृतिक शक्तियों की पूजा करते थे। वे उन सारी वस्तुओं जो सुंदर विचित्र और भयानक दिखाई देती थीं, को प्राकृतिक शक्तियाँ स्वीकार करते थे। उन्होंने इन प्राकृतिक शक्तियों को अलग-अलग देवी-देवताओं का नाम रखकर उनकी पूजा आरंभ कर दी थी। वे चमकते हुए सूर्य की पूजा करते थे क्योंकि वह पृथ्वी को सजीव रखता था। वे वायु की पूजा करते थे जो संसार भर के मनुष्यों को जीवन देती थी। वे प्रभात की पूजा करते थे जो मनुष्यों को उनकी मीठी नींद से जगाकर उनको उनके कार्यों पर भेजता था। वे नीले आकाश की पूजा करते थे जिसने सारे संसार को घेरा हुआ था।
2. वैदिक देवते (VedicGods) आरंभिक आर्यों के देवताओं की कुल संख्या 33 थी। इन को तीन भागों में बाँटा गया था । ये देवता आकाश, पृथ्वी और आकाश तथा पृथ्वी के मध्य रहते थे । प्रमुख देवी-देवताओं का संक्षेप वर्णन अग्रलिखित है :—

  • वरुण (Varuna)-वरुण आरंभिक आर्यों का सब से बड़ा देवता था । वह सिंहासन पर बैठता था। उसको सत्य और धर्म का स्वामी माना जाता था। उसको आकाश, पृथ्वी, और सूर्य का निर्माता कहा जाता था। वह पापी लोगों को सज़ा देता था। वह जीवन दान दे सकता था और मृत्यु को रद्द कर सकता था। इसलिए पापी लोग उससे क्षमा की याचना करते थे।
  • इंद्र (Indra) -इंद्र आरंभिक आर्यों का दूसरा महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली देवता था। ऋग्वेद में सबसे अधिक (250) मंत्र इस देवता की प्रशंसा में दिये गये हैं। उसको वर्षा और युद्ध का देवता समझा जाता था। आर्य उसकी समय पर वर्षा के लिए और युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करते थे । वह दुश्मनों के दुर्गों को पलक झपकते ही नष्ट कर सकता था ।
  • अग्नि (Agni)-अग्नि आरंभिक आर्यों का एक और प्रमुख देवता था। उसका संबंध विवाह और दाह संस्कारों के साथ था। उसके बिना कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता था। ऋग्वेद में अग्नि देवता की प्रशंसा में 200 मंत्र दिये गये हैं।
  • सूर्य (Sun)-सूर्य भी आरंभिक आर्यों का एक महत्त्वपूर्ण देवता था । वह संसार में से अंधेरे को दूर भगाता था। वह हर रोज़ सात घोड़ों वाले रथ पर सवार होकर आकाश का चक्र काटता था ।
  • रुद्र (Rudra)-रुद्र को आँधी या तूफ़ान का देवता समझा जाता था। वह बहुत ही प्रचंड और विनाशकारी था। लोग उससे बहुत डरते थे और उसको प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते थे।
  • सोम (Soma)-सोम देवता की आरंभिक आर्यों के धार्मिक जीवन में बहुत महत्ता थी। सोम रस को एक ऐसा अमृत समझा जाता था जिसको पीकर देवता अमर हो जाते थे। इस का हवन में प्रयोग किया जाता था और यह देवताओं को भेंट किया जाता था।
  • देवियाँ (Goddesses)-आरंभिक आर्य देवताओं के अतिरिक्त कुछ देवियों की भी पूजा करते थे । परंत देवताओं के मुकाबले इनका महत्त्व कम था । उनके द्वारा पूजी जाने वाली प्रमुख देवियाँ प्रभात की देवी उषा, रात की देवी रात्री, धरती की देवी पृथ्वी, वन देवी आरण्यी, नदी देवी सरस्वती थीं।

3. एक ईश्वर में विश्वास ( Faith in one God) यद्यपि आरंभिक आर्य अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते थे परंतु फिर भी उनका ईश्वर की एकता में दृढ़-विश्वास था। वे सारे देवताओं को महान् समझते थे और किसी को भी छोटा या बड़ा नहीं समझते थे । ऋषि अलग-अलग अवसरों पर अलग-अलग देवी-देवताओं को प्रधान बना देते थे । ऋग्वेद के एक मंत्र में कहा गया है, सब एक ही हैं, केवल ऋषियों ने ही उनका विभिन्न रूपों में वर्णन किया है।” एक और मंत्र में लिखा है, “वह जिसने हमें जीवन बख्शा है, वह जिसने सृष्टि की रचना की है, अनेक देवताओं .के नाम के साथ प्रसिद्ध होते हुए भी वह एक है।” स्पष्ट है कि आर्य एक ईश्वर के सिद्धांत को अच्छी तरह जानते
थे।
4. मंदिरों और मूर्ति पूजा का अभाव (Absence of Temples and Idol Worship)-आरंभिक आर्यों ने अपने देवी-देवताओं की याद में न किसी मंदिर का निर्माण किया था और न ही उनकी मूर्तियाँ बनाई गई थीं। मंदिर के निर्माण संबंधी या मूर्तियों के निर्माण संबंधी ऋग्वेद में कहीं भी कोई वर्णन नहीं मिलता। आर्य लोग अपने घरों में खुले वातावरण में चौकड़ी लगा कर बैठ जाते थे और एक मन हो कर अपने देवी-देवताओं की याद में मंत्रों का उच्चारण करते थे और स्तुति करते थे ।
5. यज्ञ और बलियाँ (Yajnas and Sacrifices)-आरंभिक आर्य लोग अपने देवी-देवताओं को खुश करने के लिए कई तरह के यज्ञ करते थे । इन यज्ञों को बड़े ध्यान से किया जाता था, क्योंकि उनको यह डर होता था कि थोड़ीसी गलती से उनके देवता नाराज़ न हो जाएँ। सबसे पहले यज्ञ के लिए वेदी बनाई जाती थी। फिर इसमें पवित्र अग्नि जलाई जाती थी इसमें घी, दूध, चावल और सोमरस डाला जाता था। इन यज्ञों के दौरान कई जानवरों की जैसे भेड़ों, बकरियों और घोड़ों आदि की बलि दी जाती थी। उस समय मनुष्य की बलि देने की प्रथा बिल्कुल नहीं थी। ये यज्ञ कई प्रकार के होते थे । सबसे छोटा यज्ञ पारिवारिक स्तर पर होता था। बड़े-बड़े यज्ञों की तैयारी बहुत पहले ही शुरू हो जाती थी। ऐसे यज्ञ राजाओं और समाज के और अमीर वर्ग द्वारा करवाये जाते थे। इन यज्ञों में बहुत ज्यादा मात्रा में पुरोहित शामिल होते थे। इनको दक्षिणा के तौर पर सोना, पशु या अनाज दिया जाता था। इन यज्ञों और बलियों का प्रमुख उद्देश्य देवताओं को खुश करना था। इनके बदले वे समझते थे कि उनको युद्ध में सफलता प्राप्त होगी, धन प्राप्त होगा, संतान में वृद्धि होगी और लम्बा जीवन मिलेगा। आरंभिक आर्य यह समझते थे कि हर यज्ञ से संसार की नये सिरे से उत्पत्ति होती है और यदि यह यज्ञ न करवाए जायें तो संसार में फिर से अंधकार छा जाएगा । इन यज्ञों के करवाने से गणित, भौतिक ज्ञान और जानवरों की शारीरिक बनावट के ज्ञान में वृद्धि हुई ।
6. पितरों की पूजा (Worship of Forefathers)-आरंभिक आर्य अपने देवी-देवताओं की पूजा के अतिरिक्त अपने पितरों की भी पूजा करते थे । पितर आर्यों के आरंभिक बुर्जुग थे। वे स्वर्गों में निवास करते थे । ऋग्वेद में बहुत से मंत्र पितरों की प्रशंसा में लिखे गये हैं । उनकी पूजा भी अन्य देवी-देवताओं की तरह की जाती थी। पितरों की पूजा इस आशा के साथ की जाती थी कि वे अपने वंश की रक्षा करेंगे, उनका मार्गदर्शन करेंगे, उनके कष्ट दूर करेंगे, उनको धन और शक्ति प्रदान करेंगे तथा अपने बच्चों की दीर्घायु और संतान का वर देंगे।
7. मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास (Belief in Life after Death)-आरंभिक आर्य मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास रखते थे । आवागमन और पुनर्जन्म का सिद्धांत अभी प्रचलित नहीं हुआ था। वैदिक काल के लोगों का विश्वास था कि मृत्यु के समय आत्मा शरीर से अलग हो जाती है। वे आत्मा को अमर समझते थे। स्वर्ग का जीवन खुशियों से भरपूर होता था । यह देवताओं का निवास स्थान था। वे लोग स्वर्ग के अधिकारी समझे जाते थे जो रणभूमि में अपना बलिदान देते थे अथवा भारी तपस्या करते थे अथवा यज्ञ के समय खुले दिल से दान देते थे। ऋग्वेद में नरक का वर्णन कहीं नहीं किया गया है ।
8. मृतक का अंतिम संस्कार (Disposal of Dead)-आरंभिक आर्यों के काल में मृतकों का दाह संस्कार किया जाता था । मृतक को चिता तक ले जाने के लिए उसकी पत्नी और अन्य संबंधी साथ जाते थे। उसके बाद मृतक को चिता पर रख दिया जाता था। यदि मृतक ब्राह्मण होता तो उसके दायें हाथ में एक लाठी पकड़ाई जाती थी, यदि वह क्षत्रिय होता तो उसके हाथ में धनुष और यदि वह वैश्य होता तो उसके हाथ में हल चलाने वाली लकड़ी पकड़ाई जाती थी । उसकी पत्नी तब तक चिता के पास बैठी रहती थी जब तक उसको यह नहीं कहा जाता था ‘अरी महिला उठो और जीवित लोगों में आओ।’ इसके बाद हवन कुंड से लाई गई अग्नि के साथ चिता को आग लगाई जाती थी और वह मंत्र पढ़ा जाता था, “बजुर्गों के मार्ग पर जाओ।” लाश के पूर्ण भस्म हो जाने को बाद अस्थियों को इकट्ठा कर लिया जाता था और उनको एक क्लश में रखकर जमीन में गाढ़ दिया जाता था।
9. रित और धर्मन (Rita and Dharman)-ऋग्वेद और दूसरे वैदिक ग्रंथों में रित और धर्मन शब्दों का बहुत वर्णन मिलता है । रित से भाव उस व्यवस्था से है जिसके अनुसार संसार का प्रबंध चलता है। रित के नियमानुसार ही सुबह पौ फटती है, सूर्य, चाँद और तारे चमकीले नज़र आते हैं। धरती सूर्य के इर्द-गिर्द चक्र लगाती है । सागर में ज्वारभाटे आते हैं। इस तरह रित एक सच्चाई है, इस का विपरीत अनऋत (झूठ) है। ‘धर्मन’ शब्द से भाव कानून है। धर्मन देवताओं द्वारा बनाये जाते हैं । यह भौतिक संसार, मनुष्यों और बलियों पर लागू होता है। वास्तव में धर्मन जीवन और रस्मों रीतों का नियम है। अच्छे मनुष्य अपना जीवन धर्मन अनुसार व्यतीत करते थे।

SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. सिंधु घाटी के लोगों की कोई दो विशेषताएँ बताएँ। (Write any two features of religious life of the Indus Valley People.)
उत्तर-

  1. देवी माँ की पूजा-सिंधु घाटी के लोग सबसे अधिक देवी माँ की पूजा करते थे। इस का अनुमान सिंधु घाटी की खुदाई से मिली देवी माँ की अनेक मूर्तियों, मोहरों और तावीज़ों पर बने उनके चित्रों से लगाया जाता है। कई मूर्तियों पर धुएँ के चिन्ह हैं जिनसे यह परिणाम निकलता है कि लोग देवी माँ की धूप-बाती और तेल से पूजा करते थे। देवी माँ को शक्ति का प्रतीक माना जाता था।
  2. शिव की पूजा-सिंधु घाटी के लोगों में एक देवता की पूजा काफ़ी प्रचलित थी। उस समय की मिली कुछ मोहरों पर एक देव के चित्र अंकित हैं। इस देव को योगी की स्थिति में समाधि लगाये हुए देखा गया है। इस के तीन मुँह दर्शाये गए हैं। इसलिए इतिहासकारों का विचार है कि यह योगी कोई और नहीं बल्कि शिव ही थे।

प्रश्न 2. सिंधु घाटी सभ्यता की धार्मिक विशेषताएँ क्या थी ? (What were the characteristics of the religion of the Indus Valley Civilization ?)
उत्तर-सिंधु घाटी की खुदाई से मिली मूर्तियों और तावीज़ों को देखकर हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि सिंधु घाटी के लोग सर्वाधिक देवी माँ की पूजा करते थे। वह शिव की पूजा भी करते थे। इसके अतिरिक्त वह लिंग, योनि, सूर्य, पीपल, बैल, शेर, हाथी आदि की भी पूजा करते थे। वह मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास रखते थे। वह भूत-प्रेतों में भी विश्वास रखते थे तथा उनसे बचने के लिए जादू-टोनों का प्रयोग करते थे।

प्रश्न 3. सिंधु घाटी के लोग अपने मृतकों का संस्कार किस प्रकार करते थे ? (How the people of Indus Valley Civilization disposed off their dead ?)
अथवा
सिंधु घाटी सभ्यता के लोग अपने मृतकों का संस्कार करने के लिए कौन-से दो तरीके अपनाते थे ?
(Which two methods were adopted by the people of Indus Valley to dispose off their dead ?)
अथवा
हड़प्पा काल के लोगों के मृतक संस्कारों के बारे में जानकारी दीजिए। (Describe the death ceremonies of Harappa age people.)
उत्तर-सिंधु घाटी के लोग आम तौर पर अपने मुर्दो को दफ़ना देते थे। कब्र में मुर्दे का सिर उत्तर की ओर तथा पैर दक्षिण की ओर किये जाते थे। कभी-कभी मुर्दे को खुले स्थान पर पशु-पक्षियों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता था तथा जब पिंजर शेष रह जाता था तब उसे एक ताबूत में डाल कर दफना दिया जाता था। उस समय मर्यों का संस्कार करने की प्रथा भी प्रचलित थी। उसकी अस्थियों को बड़े बर्तन में डाल कर दफना दिया जाता था।

प्रश्न 4. प्रारंभिक आर्यों के धार्मिक विश्वासों के बारे में जानकारी दीजिए। (Describe the religious beliefs of early Aryans.)
अथवा
वैदिक आर्यों के धार्मिक विचारों एवं रीति-रिवाजों के बारे में बताएँ। (Discuss the religious ideas and rituals of Vedic Aryans.)
अथवा
ऋग्वैदिक आर्यों के धार्मिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं ? (What were the main features of the religious life of the Rigvedic Aryans ?)
उत्तर-ऋग्वैदिक काल में आर्यों का धर्म बिल्कुल सादा था। आर्य प्राकृतिक शक्तियों को देवता मानकर उनकी उपासना करते थे। उनके सबसे बड़े देवता का नाम वरुण था। वह आकाश का देवता था। इंद्र को द्वितीय स्थान प्राप्त था। वह वर्षा और युद्ध का देवता था। अग्नि देवता भी बहुत महत्त्वपूर्ण था। क्योंकि उसका विवाह तथा दाहसंस्कार के साथ संबंध था। इसके अतिरिक्त आर्य ऊषा, रात्रि, पृथ्वी तथा आरण्यी आदि की भी पूजा करते थे। परंतु देवताओं की अपेक्षा उनका महत्त्व कम था।

प्रश्न 5. वरुण के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about Varuna ?)
अथवा
आर्यों के वरुण देवते बारे जानकारी दें। (Describe the Lord Varuna of the Aryans.)
उत्तर-वरुण आरंभिक आर्यों का सब से बड़ा देवता था। वह ऊँचे सिंहासन पर बैठता था। उसको सत्य और धर्म का स्वामी माना जाता था। उसको आकाश, पृथ्वी और सूर्य का निर्माता कहा जाता था। उसके आदेशानुसार चाँद चमकता था और तारे टिमटिमाते थे। वह सर्वशक्तिशाली और सर्वव्यापक था। वह संसार में घटने वाली हर घटना को जानता था। उसकी सैंकड़ों आँखें थीं। कोई भी पापी उसकी पैनी नज़र से बच नहीं सकता था। वह पापियों को दंड देता था। वह जीवन दान दे सकता था और मृत्यु को रद्द कर सकता था। इसलिए पापी क्षमा के लिए उससे प्रार्थना करते थे।

प्रश्न 6. आरंभिक आर्यों के देवता इंद्र के बारे में जानकारी दीजिए। (Describe god Indra of early Aryans.)
अथवा
इंद्र देवता के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about god Indra ?)
उत्तर-इंद्र आरंभिक आर्यों का दूसरा महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली देवता था। ऋग्वेद में सबसे अधिक (250) मंत्र इस देवता की प्रशंसा में दिये गये हैं। उसका तेज इतना था कि सैंकड़ों सूर्यों का प्रकाश भी उसके आगे मद्धम पड़ जाता था। उसको वर्षा और युद्ध का देवता समझा जाता था। आर्य उसकी समय पर वर्षा के लिए और युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए याचना करते थे। वह इतना बहादुर था कि उसने राक्षसों पर भी विजय प्राप्त की थी। वह दुश्मनों के दुर्गों को पलक झपकते ही नष्ट कर सकता था। वह अंधकार को दूर कर सकता था। वह कई रूप धारण कर सकता था। वह इतना शक्तिशाली था कि सब देवता उससे डरते थे।

प्रश्न 7. आर्यों के देवता अग्नि का वर्णन अपने शब्दों में करें। (Explain in your words the Aryan god ‘Agni’.)
उत्तर- अग्नि आरंभिक आर्यों का प्रमुख देवता था। उसको दो कारणों से अति महत्त्वपूर्ण समझा जाता था। पहला, उसको सब घरों का स्वामी समझा जाता था। उसका संबंध विवाह और दाह-संस्कारों के साथ था। दूसरा, उसके बिना कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता था। वह अपने भक्तों द्वारा दी गई आहुति को देवताओं तक पहुँचाता था। अग्नि देवता की सात जीभें और 1000 आँखें समझी जाती थीं। यदि वह कभी गुस्से में आ जाता तो पल भर में सबको नष्ट कर सकता था। सूखे काष्ठ, घी और मक्खन को इसका मनपसंद भोजन समझा जाता था।

प्रश्न 8. आर्यों की सामाजिक, धार्मिक व्यवस्था में यज्ञों का क्या महत्त्व था ? (What was the importance of Yajnas in the social and religious life of the Aryans ?)
अथवा
ऋग्वैदिक आर्यों की उपासना विधि के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the mode of worship of the Rigvedic Aryans ?)
उत्तर-ऋग्वैदिक आर्यों की उपासना विधि बहुत सरल थी। वे खुले वायुमंडल में एकाग्रचित होकर मंत्रों का उच्चारण करते थे। वे अपने देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार के यज्ञ करते थे। ये यज्ञ बहुत ध्यानपूर्वक किए जाते थे क्योंकि उन्हें यह भय होता था कि कहीं थोड़ी-सी भूल से उनके देवता रुष्ट न हो जाएँ। सबसे पहले यज्ञ के लिए अग्नि प्रज्वलित की जाती थी। फिर उसमें घी, दूध, चावल और सोमरस डाला जाता था। इन यज्ञों में कई पशुओं की बलि भी दी जाती थी। ये यज्ञ कई प्रकार के होते थे। इन यज्ञों तथा बलियों का मुख्य उद्देश्य देवताओं को प्रसन्न करना था।

प्रश्न 9. आरंभिक आर्य अपने मृतकों का अंतिम संस्कार किस प्रकार करते थे? (How did the early Aryan dispose off their dead ?)
उत्तर-आरंभिक आर्यों के काल में मृतकों का दाह-संस्कार किया जाता था। मृतक को चिता तक ले जाने के लिए उसकी पत्नी अथवा अन्य संबंधी साथ जाते थे। उसके बाद मृतक को चिता पर रख दिया जाता था। उसकी पत्नी तब तक चिता के पास बैठी रहती थी जब तक उसको यह नहीं कहा जाता था ‘अरी महिला उठो और जीवित लोगों में आओ।’ इसके बाद हवन कुंड से लाई गई अग्नि के साथ चिता को आग लगाई जाती थी। लाश के पूर्ण भस्म हो जाने के बाद अस्थियों को इकट्ठा कर लिया जाता था और उनको एक क्लश में रखकर जमीन में गाढ़ दिया जाता था।

प्रश्न 10. रित एवं धर्मन से आपका क्या अभिप्राय है ? (What do you mean by Rita and Dharman ?)
उत्तर-ऋग्वेद और दूसरे वैदिक ग्रंथों में रित और धर्मन शब्दों का बहुत वर्णन मिलता है। रित से भाव उस व्यवस्था से जिसके अनुसार संसार का प्रबंध चलता है। रित के नियमानुसार ही सुबह पौ फटती है, सूर्य, चाँद और तारे चमकीले नज़र आते हैं। ‘धर्मन’ शब्द से भाव कानून है। धर्मन देवताओं द्वारा बनाये जाते हैं। यह भौतिक संसार, मनुष्यों और बलियों पर लागू होते थे। अच्छे मनुष्य अपना जीवन धर्मन अनुसार व्यतीत करते थे।

प्रश्न 11. सिंधु घाटी के लोगों की कोई पाँच विशेषताएँ बताएँ। (Write any five features of religious life of the Indus Valley People.)
अथवा
सिंधु घाटी के लोगों के द्वारा किस-किस वस्तु की पूजा होती है ? (What was worshipped by the Indus Valley People ?)
उत्तर-

  1. देवी माँ की पूजा-सिंधु घाटी के लोग सबसे अधिक देवी माँ की पूजा करते थे। इस का अनुमान सिंधु घाटी की खुदाई से मिली देवी माँ की अनेक मूर्तियों, मोहरों और तावीज़ों पर बने उनके चित्रों से लगाया जाता है। कई मूर्तियों पर धुएँ के चिन्ह हैं जिनसे यह परिणाम निकलता है कि लोग देवी माँ की धूप-बाती और तेल से पूजा करते थे। देवी माँ को शक्ति का प्रतीक माना जाता था।
  2. शिव की पूजा-सिंधु घाटी के लोगों में एक देवता की पूजा काफ़ी प्रचलित थी। उस समय की मिली कुछ मोहरों पर एक देव के चित्र अंकित हैं। इस देव को योगी की स्थिति में समाधि लगाये हुए देखा गया है। इस के तीन मुँह दर्शाये गए हैं। इसलिए इतिहासकारों का विचार है कि यह योगी कोई और नहीं बल्कि शिव ही थे।
  3. वृक्षों की पूजा-सिंधु घाटी के लोग वृक्षों की भी पूजा करते थे। इन वृक्षों को वे देवी-देवताओं का निवास स्थान समझते थे। वे वृक्षों को जीवन और ज्ञान देने वाला दाता समझते थे। वे पीपल के पेड़ को अत्यधिक पवित्र समझते थे। इसके अतिरिक्त वे नीम, खजूर, बबूल और शीशम आदि वृक्षों की भी पूजा करते थे।
  4. स्वस्तिक की पूजा-सिंधु घाटी की खुदाई से मिली अनेक मोहरों पर स्वस्तिक के चिन्ह मिले हैं। इनको अच्छे शगुन वाला समझा जाता था। यह पुजारियों और व्यापारियों में आज भी हरमन प्यारा है। व्यापारी कोई भी लेन-देन करते समय सबसे पहले स्वस्तिक चिन्ह को बनाते हैं।
  5. सप्तऋषियों की पूजा–सिंधु घाटी की खुदाई से मिली मोहरों में से एक पर सात मनुष्य एक वृक्ष के सामने खड़े दिखाये गये हैं। इससे इस बात का अनुमान लगाया जाता है कि शायद सिंधु घाटी के लोग सप्तऋषियों की पूजा करते थे।

प्रश्न 12. सिंधु घाटी के लोग अपने मृतकों का संस्कार किस प्रकार करते थे ?
(How the people of Indus Valley Civilization disposed off their dead ?)
अथवा
सिंधु घाटी सभ्यता के लोग अपने मृतकों का संस्कार करने के लिए कौन-से दो तरीके अपनाते थे ?
(Which two methods were adopted by the people of Indus Valley to dispose off their dead ?)
अथवा
हड़प्पा काल के लोगों के मृतक संस्कारों के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the death ceremonies of Harappa age people.)
उत्तर-सिंधु घाटी के लोग आम तौर पर अपने मुर्दो को दफना देते थे। कब्र में मुर्दे का सिर उत्तर की ओर तथा पैर दक्षिण की ओर किये जाते थे। कभी-कभी मुर्दे को खुले स्थान पर पशु-पक्षियों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता था। उस समय मुर्दो का संस्कार करने की प्रथा भी प्रचलित थी। उसकी अस्थियों को बड़े बर्तन में डाल कर दफना दिया जाता था। मृतक का अंतिम संस्कार चाहे किसी भी ढंग से किया जाता था पर उसके साथ अथवा उसके पिंजर अथवा अस्थियों के साथ कुछ बर्तनों में खाने-पीने और कुछ आवश्यक वस्तुओं को भी दबाया जाता था। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु घाटी के लोग मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास रखते थे।

प्रश्न 13. प्रारंभिक आर्यों के धार्मिक विश्वासों के बारे में जानकारी दीजिए। (Describe the religious beliefs of early Aryans.)
अथवा
वैदिक आर्यों के धार्मिक विचारों एवं रीति-रिवाजों के बारे में बताएँ। (Discuss the religious ideas and rituals of Vedic Aryans.)
अथवा
ऋग्वैदिक आर्यों के धार्मिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं ? (What were the main features of the religious life of the Rigvedic Aryans ?)
अथवा आरंभिक आर्य लोगों के धार्मिक विश्वासों के बारे में लिखें।
(Discuss the religious beliefs of the early Aryan people.)
उत्तर-ऋग्वैदिक काल में आर्यों का धर्म बिल्कुल सादा था। आर्य प्राकृतिक शक्तियों को देवता मानकर उनकी उपासना करते थे। वे कई देवी-देवताओं की पूजा करते थे। उनके सबसे बड़े देवता का नाम वरुण था। वह आकाश का देवता था। वह संसार के सभी रहस्यों को जानता था। आर्य उससे अपनी भूल के लिए क्षमा माँगते थे। इंद्र को द्वितीय स्थान प्राप्त था। वह वर्षा और युद्ध का देवता था। आर्य इस देवता की समय पर वर्षा के लिए और युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करते थे। अग्नि देवता भी बहुत महत्त्वपूर्ण था। वह देवताओं और मनुष्यों के बीच संपर्क का साधन था। विवाह अग्नि की उपस्थिति में होते थे और मृतकों का अग्नि के द्वारा दाह-संस्कार किया जाता था। इसके अतिरिक्त आर्य लोग सूर्य, रुद्र, यम, वायु और त्वस्त्र देवताओं की भी पूजा करते थे। वे कई देवियों जैसे कि-प्रातः की देवी ऊषा, रात की देवी रात्रि, भूमि की देवी पृथ्वी, वन देवी आरण्यी आदि की भी पूजा करते थे। परंतु देवियों की संख्या कम थी और देवताओं की अपेक्षा उनका महत्त्व भी कम था। आर्य अपने देवी-देवताओं को एक ही ईश्वर के भिन्न-भिन्न रूप समझते थे। आर्य आवागमन, मुक्ति तथा कर्म सिद्धांतों में भी विश्वास रखते थे। ये सिद्धांत इस काल में अधिक विकसित नहीं हुए थे।

प्रश्न 14. प्रारंभिक आर्यों के प्रमुख देवताओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। (Give a brief account of the main gods of the Early Aryans.)
उत्तर-

  1. वरुण-वरुण प्रारंभिक आर्यों का सबसे बड़ा देवता था। वह सिंहासन पर बैठता था। उसको सत्य और धर्म का स्वामी माना जाता था। उसको आकाश, पृथ्वी और सूर्य का निर्माता कहा जाता था। वह पापी लोगों को सज़ा देता था। वह जीवन दान दे सकता था और मृत्यु को रद्द कर सकता था। इसलिए पापी लोग उससे क्षमा की याचना करते थे।
  2. इंद्र-इंद्र प्रारंभिक आर्थों का दूसरा महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली देवता था। ऋग्वेद में सबसे अधिक (250) मंत्र इस देवता की प्रशंसा में दिये गये हैं। उसको वर्षा और युद्ध का देवता समझा जाता था। आर्य उसकी समय पर वर्षा के लिए और युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करते थे। वह दुश्मनों के दुर्गों को पलक झपकते ही नष्ट कर सकता था।
  3. अग्नि-अग्नि प्रारंभिक आर्यों का एक और प्रमुख देवता था। उसका संबंध विवाह और दाह संस्कार के साथ था। उसके बिना कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता था। ऋग्वेद में अग्नि देवता की प्रशंसा में 200 मंत्र दिये गये हैं।
  4. सूर्य-सूर्य भी प्रारंभिक आर्यों का एक महत्त्वपूर्ण देवता था। वह संसार में से अंधेरे को दूर भगाता था। वह हर रोज़ सात घोड़ों वाले रथ पर सवार होकर आकाश का चक्र काटता था।
  5. रुद्र-रुद्र को आँधी या तूफ़ान का देवता समझा जाता था। वह बहुत ही प्रचंड और विनाशकारी था। लोग उससे बहुत डरते थे और उसको प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते थे।
  6. सोम-सोम देवता की प्रारंभिक आर्यों के धार्मिक जीवन में बहत महत्ता थी। सोम रस को एक ऐसा अमृत समझा जाता था जिसको पीकर देवता अमर हो जाते थे। इस का हवन में प्रयोग किया जाता था और यह देवताओं को भेंट किया जाता।

प्रश्न 15. वरुण और इंद्र के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about Varuna and Indra ?)
अथवा
वरुण के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about Varuna ?)
अथवा
आर्यों के वरुण देवते बारे जानकारी दें।
(Describe the Lord Varuna of the Aryans.)
अथवा
आरंभिक आर्यों के देवता इंद्र के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe god Indra of early Aryans.)
अथवा
इंद्र देवता के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about God Indra ?)
उत्तर-

  1. वरुण-वरुण आरंभिक आर्यों का सब से बड़ा देवता था। वह ऊँचे सिंहासन पर बैठता था उसको सत्य और धर्म का स्वामी माना जाता था। उसको आकाश, पृथ्वी और सूर्य का निर्माता कहा जाता था। उसके आदेशानुसार चाँद चमकता था और तारे टिमटिमाते थे। वह सर्वशक्तिशाली और सर्वव्यापक था। वह संसार में घटने वाली हर घटना को जानता था। उसकी सैंकड़ों आँखें थीं। कोई भी पापी उसकी पैनी नज़र से बच नहीं सकता था। वह पापियों को दंड देता था। वह जीवन दान दे सकता था और मृत्यु को रद्द कर सकता था। इसलिए पापी क्षमा के लिए उससे प्रार्थना करते थे।
  2. इंद्र-इंद्र आरंभिक आर्यों का दूसरा महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली देवता था। ऋग्वेद में सबसे अधिक (250) मंत्र इस देवता की प्रशंसा में दिये गये हैं। उसका तेज इतना था कि सैंकड़ों सूर्यों का प्रकाश भी उसके आगे मद्धम पड़ जाता था। उसको वर्षा और युद्ध का देवता समझा जाता था। आर्य उसकी समय पर वर्षा के लिए और युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए याचना करते थे। वह इतना बहादुर था कि उसने राक्षसों पर भी विजय प्राप्त की थी। वह दुश्मनों के दुर्गों को पलक झपकते ही नष्ट कर सकता था। वह अंधकार को दूर कर सकता था। वह कई रूप धारण कर सकता था। वह इतना शक्तिशाली था कि सब देवता उससे डरते थे।

प्रश्न 16. आर्यों के देवता अग्नि का वर्णन अपने शब्दों में करें। (Explain in your words the Aryan god ‘Agni’.)
उत्तर-अग्नि आरंभिक आर्यों का एक और प्रमुख देवता था। उसको दो कारणों से अति महत्त्वपूर्ण समझा जाता था। पहला, उसको सब घरों का स्वामी समझा जाता था। उसका संबंध विवाह और दाह-संस्कारों के साथ था। दूसरा, उसके बिना कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता था। वह अपने भक्तों द्वारा दी गई आहुति को देवताओं तक पहुँचाता था। अग्नि देवता की सात जी) और 1000 आँखें समझी जाती थीं। यदि वह कभी गुस्से में आ जाता तो पल भर में सबको नष्ट कर सकता था। सूखे काष्ठ, घी और मक्खन को इसका मनपसंद भोजन समझा जाता था। ऋग्वेद में अग्नि देवता की प्रशंसा में 200 मंत्र दिये गये हैं।

प्रश्न 17. आर्यों की सामाजिक, धार्मिक व्यवस्था में यज्ञों का क्या महत्त्व था ? (What was the importance of Yajnas in the social and religious life of the Aryans ?)
अथवा
ऋग्वैदिक आर्यों की उपासना विधि के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about the mode of worship of the Rigvedic Aryans ?)
उत्तर-ऋवैदिक आर्यों की उपासना विधि बहुत सरल थी। वे खुले वायुमंडल में एकाग्रचित होकर मंत्रों का उच्चारण करते थे। वे अपने देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार के यज्ञ करते थे। ये यज्ञ बहुत ध्यानपूर्वक किए जाते थे क्योंकि उन्हें यह भय होता था कि कहीं थोड़ी-सी भूल से उनके देवता रुष्ट न हो जाएँ। सबसे पहले यज्ञ के लिए अग्नि प्रज्वलित की जाती थी। फिर उसमें घी, दूध, चावल और सोमरस डाला जाता था। इन यज्ञों में कई पशुओं की बलि भी दी जाती थी। ये यज्ञ कई प्रकार के होते थे। सबसे छोटा यज्ञ पारिवारिक स्तर पर होता था। बड़े यज्ञों की तैयारी बहुत पहले से आरंभ कर दी जाती थी। धनवान् लोग इन यज्ञों में भारी दान देते थे। इन यज्ञों तथा बलियों का मुख्य उद्देश्य देवताओं को प्रसन्न करना था। आर्य ये समझते थे कि इनके बदले में उन्हें लड़ाई में विजय प्राप्त होगी, धन प्राप्त होगा, संतान वृद्धि होगी तथा सुखमय दीर्घ जीवन मिलेगा। वे यह समझते थे कि प्रत्येक यज्ञ से संसार की फिर से उत्पत्ति होती है और यदि ये यज्ञ न कराए जाएँ तो संसार में अंधकार फैल जाएगा। इन यज्ञों के कारण गणित, खगोल विद्या तथा जानवरों की शारीरिक संरचना के ज्ञान के संबंध में वृद्धि हुई।

प्रश्न 18. आरंभिक आर्य अपने मृतकों का अंतिम संस्कार किस प्रकार करते थे? (How did the early Aryan dispose off their dead ?)
उत्तर-आरंभिक आर्यों के काल में मृतकों का दाह-संस्कार किया जाता था। मृतक को चिता तक ले जाने के लिए उसकी पत्नी और अन्य संबंधी साथ जाते थे। उसके बाद मृतक को चिता पर रख दिया जाता था। यदि मृतक ब्राह्मण होता तो उसके दायें हाथ में एक लाठी पकड़ाई जाती थी, यदि वह क्षत्रिय होता तो उसके हाथ में धनुष और यदि वह वैश्य होता तो उसके हाथ में हल चलाने वाली लकड़ी पकड़ाई जाती थी। उसकी पत्नी तब तक चिता के पास बैठी रहती थी जब तक उसको यह नहीं कहा जाता था ‘अरी महिला उठो और जीवित लोगों में आओ।’ इसके बाद हवन कुंड से लाई गई अग्नि के साथ चिता को आग लगाई जाती थी और यह मंत्र पढ़ा जाता था, “बजुर्गों के मार्ग पर जाओ”। लाश के पूर्ण भस्म हो जाने के बाद अस्थियों को इकट्ठा कर लिया जाता था और उनको एक क्लश में रखकर ज़मीन में गाढ़ दिया जाता था।

प्रश्न 19. रित एवं धर्मन से आपका क्या अभिप्राय है ? (What do you mean by Rita and Dharman ?)
उत्तर-ऋग्वेद और दूसरे वैदिक ग्रंथों में रित और धर्मन शब्दों का बहुत वर्णन मिलता है। रित से भाव उस व्यवस्था से जिसके अनुसार संसार का प्रबंध चलता है। रित के नियमानुसार ही सुबह पौ फटती है, सूर्य, चाँद और तारे चमकीले नज़र आते हैं। धरती सूर्य के इर्द-गिर्द चक्र लगाती है। सागर में.ज्वारभाटे आते हैं। इस तरह रित एक सच्चाई है। इसका विपरीत अनऋत (झूठ) है। ‘धर्मन’ शब्द से भाव कानून है। धर्मन देवताओं द्वारा बनाये जाते हैं। यह भौतिक संसार, मनुष्यों और बलियों पर लागू होता है। वास्तव में धर्मन जीवन और रस्मों रीतों का नियम है। अच्छे मनुष्य अपना जीवन धर्मन अनुसार व्यतीत करते थे।

OBJECTIVE TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. सिंधु घाटी की सभ्यता कितनी पुरानी है ?
अथवा
सिंधु घाटी की सभ्यता कितनी पुरानी मानी जाती है ?
उत्तर-5000 वर्ष।

प्रश्न 2. सिंधु घाटी सभ्यता की खोज कब हुई थी ?
उत्तर-1921 ई०।

प्रश्न 3. सिंधु घाटी के लोग किस देवी की सबसे अधिक पूजा करते थे ?
उत्तर-मातृदेवी की।

प्रश्न 4. मातृदेवी को किसका प्रतीक समझा जाता था ?
अथवा
सिंधु घाटी के लोग मातृ देवी को किस चीज़ का प्रतीक मानते थे ?
उत्तर-मातृदेवी को शक्ति का प्रतीक समझा जाता था।

प्रश्न 5. सिंधु घाटी के लोग किस देवता की सर्वाधिक उपासना करते थे ?
उत्तर-शिव देवता की।

प्रश्न 6. सिंधु घाटी के लोग कौन-से देवी एवं देवता की ज्यादा पूजा करते थे ?
उत्तर-सिंधु घाटी के लोग मातृदेवी एवं शिव जी की ज्यादा पूजा करते थे।

प्रश्न 7. सिंधु घाटी सभ्यता की शिव जी की योगी के रूप में मिली मूर्ति के कितने मुख हैं ?
उत्तर-तीन।

प्रश्न 8. सिंधु घाटी के लोगों द्वारा पूजा किए जाने वाले जानवरों के नाम बताएँ।
अथवा
सिंधु घाटी के लोग किन जानवरों की अधिक पूजा करते थे ?
उत्तर-सिंधु घाटी के लोगों द्वारा पूजा किए जाने वाले जानवरों के नाम शेर, हाथी, बैल एवं गैंडा थे।

प्रश्न 9. सिंधु घाटी के लोग सर्वाधिक किस जानवर की उपासना करते थे ?
उत्तर-बैल की।

प्रश्न 10. सिंधु घाटी के लोग वक्षों की उपासना क्यों करते थे ?
उत्तर-क्योंकि वे उन्हें देवी-देवताओं का निवास स्थान समझते थे।

प्रश्न 11. सिंधु घाटी के लोग किस वृक्ष को सर्वाधिक पवित्र समझते थे ?
उत्तर-पीपल के वृक्ष को।

प्रश्न 12. सिंधु घाटी के लोग कौन-से दो मुख्य वक्षों की पूजा करते थे ?
अथवा
सिंधु घाटी के लोग कौन-से दो वृक्षों की पूजा करते थे ?
उत्तर-पीपल एवं नीम।

प्रश्न 13. सिंधु घाटी के लोग किस पक्षी को पवित्र मान कर पूजते थे ?
उत्तर-सिंधु घाटी के लोग घुग्घी को पवित्र मान कर पूजते थे।

प्रश्न 14. सिंधु घाटी के लोग किस चिन्ह को बहुत पवित्र मानते थे ?
उत्तर-सिंधु घाटी के लोग स्वास्तिक चिन्ह को बहुत पवित्र मानते थे।

प्रश्न 15. सिंधु घाटी के लोग कितने ऋषियों की उपासना करते थे ?
उत्तर-सप्तऋषि की।

प्रश्न 16. सप्तऋषियों में से किन्हीं दो ऋषियों के नाम लिखें।
उत्तर-

  1. विशिष्ठ
  2. विश्वामित्र।

प्रश्न 17. सिंधु घाटी के लोग जल की उपासना क्यों करते थे ?
उत्तर-सिंधु घाटी के लोग जल को सफाई एवं शुद्धता का प्रतीक समझते थे।

प्रश्न 18. विशाल स्नानागार हमें कहाँ से प्राप्त हुआ है ?
उत्तर-मोहनजोदड़ो से।

प्रश्न 19. सिंधु घाटी के लोग अपने मृतकों का संस्कार कैसे करते थे ?
उत्तर-सिंधु घाटी के लोग अपने मृतकों का संस्कार उन्हें दफना कर करते थे।

प्रश्न 20. हडप्पा से हमें कितनी कबें मिली हैं?
उत्तर-57.

प्रश्न 21. सिंधु घाटी के किस केंद्र से हमें सती प्रथा के प्रचलन के संकेत मिले हैं ?
उत्तर-लोथल।

प्रश्न 22. किस बात से यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु घाटी के लोग मृत्यु के उपरांत जीवन में विश्वास रखते थे ?
उत्तर-वे मुर्दो के साथ खाने-पीने की वस्तुओं को भी दफनाते थे।

प्रश्न 23. प्रारंभिक आर्य किस की उपासना करते थे ?
उत्तर-प्रकृति तथा उसकी शक्तियों की।

प्रश्न 24. वैदिक देवताओं से क्या भाव है ?
उत्तर-वैदिक देवताओं से भाव उन देवताओं से था जो संसार की रचना के पश्चात् अस्तित्व में आए।

प्रश्न 25. प्रारंभिक आर्यों द्वारा पूजे जाने वाले देवताओं की कुल संख्या बताओ।
उत्तर-33.

प्रश्न 26. वैदिक देवताओं को कितनी श्रेणियों में बाँटा गया है?
उत्तर-तीन।

प्रश्न 27. वैदिक देवता कौन थे ?
अथवा
प्रारंभिक आर्यों के मुख्य देवता कौन-कौन है, उन पाँचों के नाम बताएँ ।
अथवा
प्रारंभिक आर्यों के मुख्य देवता कौन थे ?
उत्तर-वैदिक देवता वरुण, इंद्र, अग्नि, सूर्य एवं रुद्र थे।

प्रश्न 28. प्रारंभिक आर्यों के दो प्रमुख देवता कौन थे ?
उत्तर-प्रारंभिक आर्यों के दो प्रमुख देवता वरुण एवं इंद्र थे।

प्रश्न 29. वरुण कौन था ?
उत्तर-वरुण प्रारंभिक आर्यों का सबसे प्रमुख देवता था।

प्रश्न 30. लोगों का वर्षा का देवता कौन है ?
उत्तर-आर्य लोगों का वर्षा का देवता इंद्र है।

प्रश्न 31. प्रारंभिक आर्यों के वर्षा देवता और अग्नि देवता कौन थे ?
उत्तर-प्रारंभिक आर्यों का वर्षा देवता इंद्र और अग्नि देवता को अग्नि देवता कहते थे।

प्रश्न 32. वरुण देवता का कोई एक कार्य बताएँ।
उत्तर-वह पापियों को सज़ा देता था।

प्रश्न 33. इंद्र कौन था ?
उत्तर-इंद्र वैदिक आर्यों का युद्ध एवं वर्षा का देवता था।

प्रश्न 34. ऋग्वेद में इंद्र की प्रशंसा में कितने मंत्र दिए गए थे ?
उत्तर-250.

प्रश्न 35. अग्नि देवता से क्या भाव है ?
उत्तर-अग्नि देवता का संबंध विवाह तथा दाह संस्कारों से था।

प्रश्न 36. आर्य लोग किस देवता को घरों का स्वामी मानते थे ?
उत्तर-आर्य लोग अग्नि देवता को घरों का स्वामी मानते थे।

प्रश्न 37. ऋग्वेद में अग्नि देवता की प्रशंसा में कितने मंत्र दिए गए हैं ?
उत्तर-200.

प्रश्न 38. प्रारंभिक आर्य सूर्य को किसका पुत्र मानते थे ?
उत्तर-प्रारंभिक आर्य सूर्य को आदिती तथा दियोस का पुत्र मानते थे।

प्रश्न 39. रुद्र कौन था ?
उत्तर-वह प्रारंभिक आर्यों का तूफ़ान का देवता था।

प्रश्न 40. प्रारंभिक आर्यों की दो प्रमुख देवियों के नाम बताएँ।
उत्तर-ऊषा तथा पृथ्वी।

प्रश्न 41. प्रारंभिक आर्य लोग ऊषा को किसकी देवी मानते थे ?
उत्तर-प्रारंभिक आर्य लोग ऊषा को सुबह की देवी मानते थे।

प्रश्न 42. वैदिक देवताओं से किस प्रकार के वरदान की आशा की जाती थी ?
उत्तर-सफलता, धन की प्राप्ति, संतान में बढ़ौत्तरी तथा लंबे जीवन के वरदान की।

प्रश्न 43. प्रारंभिक आर्य काल में क्या मानव बलि प्रचलित थी ?
उत्तर-नहीं।

प्रश्न 44. प्रारंभिक आर्य लोग देवताओं को प्रसन्न करने के लिए क्या करते थे ?
उत्तर-यज्ञ।

प्रश्न 45. प्रारंभिक आर्य काल में यज्ञों के समय जिन जानवरों की बलि दी जाती थी, उनमें से किन्हीं दो के नाम बताएँ।
उत्तर-

  1. घोड़े
  2. बकरियाँ ।

प्रश्न 46. यज्ञों के समय मंत्र उच्चारण करने वाले पुरोहित क्या कहलाते थे ?
उत्तर-उदगात्री।

प्रश्न 47. यज्ञों के समय आहूति देने वाले पुरोहित क्या कहलाते थे?
उत्तर-होतरी।

प्रश्न 48. प्रारंभिक आर्य अपने मृतकों का संस्कार कैसे करते थे ?
उत्तर-प्रारंभिक आर्य अपने मृतकों का दाह-संस्कार करते थे।

प्रश्न 49. रित से क्या भाव है ?
उत्तर-रित से भाव उस व्यवस्था से है जिसके अनुसार संसार का प्रबंध चलता है।

प्रश्न 50. धर्मन से क्या भाव है ?
उत्तर-धर्मन से भाव उन कानूनों से है जो देवताओं द्वारा बनाए जाते थे।

नोट-रिक्त स्थानों की पूर्ति करें—

प्रश्न 1. सिंधु घाटी के लोग सर्वाधिक ……… की पूजा करते थे।
उत्तर-देवी माँ

प्रश्न 2. सिंधु घाटी के लोग ………….. नामक देवता की पूजा करते थे।
उत्तर-शिव

प्रश्न 3. सिंधु घाटी के लोग ………….. वृक्ष की सर्वाधिक पूजा करते थे।
उत्तर-पीपल

प्रश्न 4. सिंधु घाटी के लोग सप्त ऋषि को …………… का प्रतीक मानते थे।
उत्तर-स्वर्ग

प्रश्न 5. सिंधु घाटी के लोग जल को ………… का प्रतीक मानते थे।
उत्तर-शुद्धता

प्रश्न 6. सिंधु घाटी के लोग मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास ………… थे।
उत्तर-रखते

प्रश्न 7. प्रारंभिक आर्यों के देवताओं की कुल गिनती ………… थी।
उत्तर-33

प्रश्न 8. प्रारंभिक आर्यों का सबसे बड़ा देवता ……….. था।
उत्तर-वरुण

प्रश्न 9. ऋग्वेद में इंद्र देवता की प्रशंसा में ………. मंत्र दिए गए हैं।
उत्तर-250

प्रश्न 10. ……….. देवता का संबंध विवाह और दाह संस्कार के साथ था।
उत्तर-अग्नि

प्रश्न 11. रुद्र को ………….. का देवता समझा जाता था।
उत्तर-आँधी

प्रश्न 12. प्रारंभिक आर्य नदी देवी को ………… कहते थे।
उत्तर-सरस्वती

प्रश्न 13. उस व्यवस्था को जिसके अनुसार संसार का प्रबंध चलता था ………… कहा जाता था।
उत्तर-रित

प्रश्न 14. धर्मन शब्द से भाव ………….. है।
उत्तर-कानून

प्रश्न 15. प्रारंभिक आर्य अपने देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए ………. करते थे।
उत्तर-यज्ञ

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा ग़लत चुनें—

प्रश्न 1. सिंधु घाटी के लोग देवी माँ को कोई विशेष महत्त्व नहीं देते थे।
उत्तर- ग़लत

प्रश्न 2. सिंधु घाटी के लोग शिव देवता की पूजा करते थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 3. सिंधु घाटी के लोग मगरमच्छ की पूजा करते थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 4. सिंधु घाटी के लोग पीपल वृक्ष को पवित्र नहीं समझते थे।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 5. सिंधु घाटी के लोग सप्त ऋषियों की पूजा करते थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 6. सिंधु घाटी के लोगों का यज्ञ पूजा में गहरा विश्वास था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 7. सिंधु घाटी के लोगों का जादू-टोनों और भूत-प्रेतों में बिल्कुल विश्वास नहीं था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 8. सिंधु घाटी के लोग सामान्यतः अपने मुर्दो को दफना देते थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 9. आरंभिक आर्यों के देवताओं की कुल संख्या 33 करोड़ थी।
उत्तर- ग़लत

प्रश्न 10. प्रारंभिक आर्यों के सबसे बड़े देवता का नाम इंद्र था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 11. ऋग्वेद में अग्नि देवता की प्रशंसा में 200 मंत्र दिए गए हैं।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 12. प्रारंभिक आर्य सुबह की देवी ऊषा में विश्वास रखते थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 13. प्रारंभिक आर्यों का ईश्वर की एकता में पूर्ण विश्वास था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 14. प्रारंभिक आर्य अपने देवी-देवताओं की याद में मंदिरों का निर्माण करते थे।
उत्तर- ग़लत

प्रश्न 15. प्रारंभिक आर्य अपने देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार के यज्ञ करते थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 16. प्रारंभिक आर्य अपने पितरों की पूजा करते थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 17. वैदिक साहित्य में स्वस्विक किसी देवते का नाम है।
उत्तर-ग़लत

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर चुनें—

प्रश्न 1. सिंधु घाटी के लोग सर्वाधिक किसकी पूजा करते थे ?
(i) शिव की
(ii) देवी माँ की
(iii) वृक्षों की
(iv) साँपों की।
उत्तर-(i)

प्रश्न 2. सिंधु घाटी के लोग किस देवता की पूजा करते थे ?
(i) वरुण की
(ii) इंद्र की
(iii) शिव की
(iv) अग्नि की।
उत्तर-(iii)

प्रश्न 3. सिंधु घाटी के लोग निम्नलिखित में से किस पशु की पूजा नहीं करते थे ?
(i) हाथी
(ii) शेर
(iii) बैल
(iv) घोड़ा।
उत्तर-(iv)

प्रश्न 4. सिंधु घाटी के लोग निम्नलिखित में से किस वृक्ष को सर्वाधिक पवित्र मानते थे ?
(i) पीपल
(ii) आम
(iii) नीम
(iv) खजूर।
उत्तर-(i)

प्रश्न 5. निम्नलिखित में से कौन सप्तऋषियों में शामिल नहीं थे ?
(i) विश्वामित्र
(ii) विशिष्ठ
(iii) जमदागनी
(iv) इंद्र।
उत्तर-(iv)

प्रश्न 6. निम्नलिखित में से कौन-सा तथ्य ग़लत है
(i) सिंधु घाटी के लोग स्वास्तिक की पूजा करते थे।
(ii) सिंधु घाटी के लोग लिंग तथा योनि की पूजा करते थे।
(iii) सिंधु घाटी के लोग जादू-टोनों में विश्वास रखते थे।
(iv) सिंधु घाटी के लोग पितरों की पूजा करते थे।
उत्तर-(iv)

प्रश्न 7. सिंधु घाटी के लोग निम्नलिखित में से किसकी पूजा करते थे ?
(i) घुग्गी
(ii) बाज
(iii) कबूतर
(iv) तोता।
उत्तर-(i)

प्रश्न 8. प्रारंभिक आर्य कुल कितने देवताओं की पूजा करते थे ?
(i) 11
(ii) 22
(iii) 33
(iv) 44
उत्तर-(iii)

प्रश्न 9. प्रारंभिक आर्यों का सबसे प्रारंभिक देवता कौन था ?
(i) इंद्र
(ii) वरुण
(iii) अग्नि
(iv) रुद्र।
उत्तर-(ii)

प्रश्न 10. निम्नलिखित में से किस देवता की प्रशंसा में ऋग्वेद में सर्वाधिक मंत्र दिए गए हैं ?
(i) वरुण
(ii) इंद्र
(iii) अग्नि
(iv) रुद्र।
उत्तर-(i)

प्रश्न 11. निम्नलिखित में से कौन-सा देवता वर्षा और युद्ध का देवता माना जाता था ?
(i) सोम
(ii) रुद्र
(iii) सूर्य
(iv) इंद्र।
उत्तर-(iv)

प्रश्न 12. निम्नलिखित में से कौन-सा देवता विवाह और दाह-संस्कार के साथ संबंधित था ?
(i) अग्नि
(ii) सोम
(iii) वरुण
(iv) विष्णु।
उत्तर-(i)

प्रश्न 13. प्रारंभिक आर्यों का निम्नलिखित में से कौन-सा देवता आकाश का देवता नहीं था ?
(i) वरुण
(ii) सूर्य
(iii) इंद्र
(iv) मित्र।
उत्तर-(iii)

प्रश्न 14. निम्नलिखित में से किस देवी को सुबह की देवी कहा जाता था ?
(i) उमा
(ii) ऊषा
(iii) रात्रि
(iv) सरस्वती।
उत्तर-(ii)

Class 12 Political Science Solutions Chapter 13 भारतीय लोकतन्त्र

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. संसदीय शासन प्रणाली से आपका क्या अभिप्राय है ? संसदीय शासन प्रणाली की कोई चार विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
(What is meant by Parliamentary System ? Explain any four features of a parliamentary system of Government.)
उत्तर-कार्यपालिका और विधानपालिका के सम्बन्धों के आधार पर दो प्रकार के शासन होते हैं-संसदीय तथा अध्यक्षात्मक। यदि कार्यपालिका और विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध हों और दोनों एक-दूसरे का अटूट भाग हों तो संसदीय सरकार होती हैं और यदि कार्यपालिका तथा विधानपालिका एक-दूसरे से लगभग स्वतन्त्र हों तो अध्यक्षात्मक सरकार होती है।

संसदीय सरकार का अर्थ (Meaning of Parliamentary Government)-संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। संसदीय सरकार शासन की वह प्रणाली है जिसमें कार्यपालिका (मन्त्रिमण्डल) अपने समस्त कार्यों के लिए संसद् (विधानपालिका) के प्रति उत्तरदायी होती है और जब तक अपने मद पर रहती है जब तक इसको संसद् का विश्वास प्राप्त रहता है। जिस समय कार्यपालिका संसद् का विश्वास खो बैठे तभी कार्यपालिका को त्याग पत्र देना पड़ता है। संसदीय सरकार को उत्तरदायी सरकार (Responsible Government) भी कहा जाता है क्योंकि इसमें सरकार अपने समस्त कार्यों के लिए उत्तरदायी होती है। इस सरकार को कैबिनेट सरकार (Cabinet Government) भी कहा जाता है क्योंकि इसमें कार्यपालिका की शक्तियां कैबिनेट द्वारा प्रयोग की जाती हैं।

1. डॉ० गार्नर (Dr. Garmer) का मत है कि, “संसदीय सरकार वह प्रणाली है जिसमें वास्तविक कार्यपालिका, मन्त्रिमण्डल या मन्त्रिपरिषद् अपनी राजनीतिक नीतियों और कार्यों के लिए प्रत्यक्ष तथा कानूनी रूप से विधानमण्डल या उसके एक सदन (प्रायः लोकप्रिय सदन) के प्रति और राजनीतिक तौर पर मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी हो जबकि राज्य का अध्यक्ष संवैधानिक या नाममात्र कार्यपालिका हो और अनुत्तरदायी हो।”

2. गैटेल (Gettell) के अनुसार, “संसदीय शासन प्रणाली शासन के उस रूप को कहते हैं जिसमें प्रधानमन्त्री तथा मन्त्रिपरिषद् अर्थात् वास्तविक कार्यपालिका अपने कार्यों के लिए कानूनी दृष्टि से विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है। चूंकि विधानपालिका के दो सदन होते हैं अतः मन्त्रिमण्डल वास्तव में उस सदन के नियन्त्रण में होता है जिसे वित्तीय मामलों पर अधिक शक्ति प्राप्त होती है जो मतदाताओं का अधिक सीधे ढंग से प्रतिनिधित्व करता है।”
इस परिभाषा से यह स्पष्ट है कि संसदीय सरकार में मन्त्रिमण्डल अपने समस्त कार्यों के लिए विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी होता है और राज्य का नाममात्र का मुखिया किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होता।
संसदीय सरकार को सर्वप्रथम इंग्लैंड में अपनाया गया था। आजकल इंग्लैंड के अतिरिक्त जापान, कनाडा, नार्वे, स्वीडन, बंगला देश तथा भारत में भी संसदीय सरकारें पाई जाती हैं।

संसदीय सरकार के लक्षण (FEATURES OF PARLIAMENTARY GOVERNMENT)
संसदीय प्रणाली के निम्नलिखित लक्षण होते हैं-

1. राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का सत्ताधारी (Head of the State is Nominal Executive)-संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का सत्ताधारी होता है। सैद्धान्तिक रूप में तो राज्य की सभी कार्यपालिका शक्तियां राज्य के अध्यक्ष के पास होती हैं और उनका प्रयोग भी उनके नाम पर होता है, परन्तु वह उनका प्रयोग अपनी इच्छानुसार नहीं कर सकता। उसकी सहायता के लिए एक मन्त्रिमण्डल होता है, जिसकी सलाह के अनुसार ही उसे अपनी शक्तियों का प्रयोग करना पड़ता है। अध्यक्ष का काम तो केवल हस्ताक्षर करना है।

2. मन्त्रिमण्डल वास्तविक कार्यपालिका होती है (Cabinet is the Real Executive) राज्य के अध्यक्ष के नाम में दी गई शक्तियों का वास्तविक प्रयोग मन्त्रिमण्डल करता है। अध्यक्ष के लिए मन्त्रिमण्डल से सलाह मांगना और मानना अनिवार्य है। मन्त्रिमण्डल ही अन्तिम फैसला करता है और वही देश का वास्तविक शासक है। शासन का प्रत्येक विभाग एक मन्त्री के अधीन होता है और सब कर्मचारी उसके अधीन काम करते हैं । हर मन्त्री अपने विभागों का काम मन्त्रिमण्डल की नीतियों के अनुसार चलाने के लिए उत्तरदायी होता है।

3. कार्यपालिका और व्यवस्थापिका में घनिष्ठ सम्बन्ध (Close Relation between Executive and Legislature) संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका में घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है। मन्त्रिमण्डल वास्तविक कार्यपालिका होती है। इसके सदस्य अर्थात् मन्त्री संसद् में से ही लिए जाते हैं। ये मन्त्री संसद् की बैठकों में भाग लेते हैं, बिल पेश करते हैं, बिलों पर बोलते हैं और यदि सदन के सदस्य हों तो मतदान के समय मत का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार मन्त्री प्रशासक (Administrator) भी हैं, कानून-निर्माता (Legislator) भी।

4. मन्त्रिमण्डल का उत्तरदायित्व (Responsibilty of the Cabinet)-कार्यपालिका अर्थात् मन्त्रिमण्डल अपने सब कार्यों के लिए व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है। संसद् सदस्य मन्त्रियों से प्रश्न पूछ सकते हैं, जिनका उन्हें उत्तर देना पड़ता है। मन्त्रिमण्डल अपनी नीति निश्चित करता है, उसे संसद के सामने रखता है तथा उसका समर्थन प्राप्त करता है। मन्त्रिमण्डल, अपना कार्य संसद् की इच्छानुसार ही करता है।

5. उत्तरदायित्व सामूहिक होता है (Collective Responsibility)-मन्त्रिमण्डल इकाई के रूप में कार्य करता है और मन्त्री सामूहिक रूप से संसद् के प्रति उत्तरदायी होते हैं। यदि संसद् एक मन्त्री के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पास कर दे तो समस्त मन्त्रिमण्डल को अपना पद छोड़ना पड़ता है। किसी विशेष परिस्थिति में एक मन्त्री अकेला भी हटाया जा सकता है।

6. मन्त्रिमण्डल का अनिश्चित कार्यकाल (Tenure of the Cabinet is not Fixed)-मन्त्रिमण्डल की अवधि भी निश्चित नहीं होती। संसद् की इच्छानुसार ही वह अपने पद पर रहते हैं। संसद् जब चाहे मन्त्रिमण्डल को अपदस्थ कर सकती है, अर्थात् यदि निम्न सदन के नेता को ही प्रधानमन्त्री नियुक्त किया जाता है और उसकी इच्छानुसार ही दूसरे मन्त्रियों की नियुक्ति होती है।

7. मन्त्रिमण्डल की राजनीतिक एकरूपता (Political Homogeneity of the Cabinet)-संसदीय सरकार की एक विशेषता यह भी है कि इसमें मन्त्रिमण्डल के सदस्य एक ही राजनीतिक दल से सम्बन्धित होते हैं। यह आवश्यक भी है क्योंकि जब तक मन्त्री एक ही विचारधारा और नीतियों के समर्थक नहीं होंगे, मन्त्रिमण्डल में सामूहिक उत्तदायित्व विकसित नहीं हो सकेगा।

8. गोपनीयता (Secrecy)—संसदीय सरकार में पद सम्भालने से पूर्व मन्त्री संविधान के प्रति वफादार रहने तथा सरकार के रहस्यों को गुप्त रखने की शपथ लेते हैं।

प्रश्न 2. संसदीय शासन प्रणाली क्या है ? भारतीय संसदीय प्रणाली की कोई चार विशेषताओं का विस्तार से वर्णन करें।
(What is Parliamentary form of Government ? Explain any four characteristics of Indian Parliamentary govt. in detail.)
अथवा
भारत में संसदीय शासन की सरकार की विशेषताओं का वर्णन करो। (Discuss the main features of Parliamentary Government in India.)
अथवा
भारत की संसदीय प्रणाली की विशेषताएं लिखिए। (Write about the features of Indian Parliamentary Government.)
उत्तर-आधुनिक युग प्रजातन्त्र का युग है। संसार के अधिकांश देशों में प्रजातन्त्र को अपनाया गया है। भारत में भी स्वतन्त्रता के पश्चात् संविधान के अन्तर्गत प्रजातन्त्र की स्थापना की गई है। भारत संसार का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है। 24 जनवरी, 1950 को संविधान की अन्तिम बैठक में भाषण देते हुए संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था कि, “हमने भारत के लिए लोकतान्त्रिक संविधान का निर्माण किया है।” भारतीय लोकतन्त्र में वे सभी बातें पाई जाती हैं जो एक लोकतान्त्रिक देश में होनी चाहिए। प्रस्तावना से स्पष्ट पता चलता है कि सत्ता का अन्तिम स्रोत जनता है और संविधान का निर्माण करने वाले और उसे अपने ऊपर लागू करने वाले भारत के लोग हैं।

वयस्क मताधिकार की व्यवस्था की गई है। 61वें संशोधन के द्वारा प्रत्येक नागरिक को जिसकी आयु 18 वर्ष या अधिक है, मताधिकार दिया गया है। जाति, धर्म, रंग, लिंग आदि के आधार पर कोई मतभेद नहीं किया गया है। सभी नागरिकों को समान रूप से मौलिक अधिकार दिए गए हैं। इन अधिकारों के द्वारा भारत में राजनीतिक लोकतन्त्र को मजबूत बनाया गया है। संविधान के चौथे अध्याय में राजनीति के निर्देशक तत्त्वों की व्यवस्था की गई है ताकि आर्थिक लोकतन्त्र की व्यवस्था की जा सके। संविधान का निर्माण करते समय इस बात पर काफ़ी विवाद हुआ कि भारत में संसदीय लोकतन्त्र की स्थापना की जाए या अध्यक्षात्मक लोकतन्त्र की। संविधान सभा में सैय्यद काज़ी तथा शिब्बन लाल सक्सेना ने अध्यक्षात्मक लोकतन्त्र की जोरदार वकालत की। के० एम० मुन्शी, अल्लादी कृष्णा स्वामी अय्यर आदि ने संसदीय शासन प्रणाली का समर्थन किया और काफ़ी वाद-विवाद के पश्चात् बहुमत के आधार पर संसदीय लोकतन्त्र की स्थापना की।

संसदीय शासन प्रणाली का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Parliamentary Govt.)इसके लिए प्रश्न नं० 1 देखें।

भारत में संसदीय शासन प्रणाली की विशेषताएं (FEATURES OF PARLIAMENTARY GOVERNMENT IN INDIA)
भारतीय संसदीय प्रणाली की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

1. नाममात्र तथा वास्तविक कार्यपालिका में भेद (Distinction between Nominal and Real Executive)-भारतीय संसदीय प्रणाली की प्रथम विशेषता यह है कि संविधान के अन्तर्गत नाममात्र तथा वास्तविक कार्यपालिका में भेद किया गया है। राष्ट्रपति राज्य का नाममात्र का अध्यक्ष है जबकि वास्तविक कार्यपालिका मन्त्रिमण्डल है। संविधान के अन्दर कार्यपालिका की समस्त शक्तियां राष्ट्रपति को दी गई हैं, परन्तु राष्ट्रपति उन शक्तियों का इस्तेमाल स्वयं अपनी इच्छा से नहीं कर सकता। राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल की सलाह के अनुसार ही अपनी शक्तियों का प्रयोग करता है।

2. कार्यपालिका तथा संसद् में घनिष्ठ सम्बन्ध (Close Relation between the Executive and the Parliament) कार्यपालिका और संसद् में घनिष्ठ सम्बन्ध है। मन्त्रिमण्डल के सभी सदस्य संसद् के सदस्य होते हैं। यदि किसी ऐसे व्यक्ति को मन्त्रिमण्डल में ले लिया जाता है जो संसद् का सदस्य नहीं है तो उसे 6 महीने के अन्दरअन्दर या तो संसद् का सदस्य बनना पड़ता है या फिर मन्त्रिमण्डल से त्याग-पत्र देना पड़ता है। लोकसभा में जिस दल को बहुमत प्राप्त होता है राष्ट्रपति उस दल के नेता को प्रधानमन्त्री नियुक्त करता है। राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की सलाह से अन्य मन्त्रियों को नियुक्त करता है। मन्त्रिमण्डल शासन चलाने का कार्य ही नहीं करता बल्कि कानून निर्माण में भी भाग लेता है। मन्त्रिमण्डल के सदस्य संसद् की बैठकों में भाग लेते हैं, अपने विचार प्रकट करते हैं और बिल पेश करते हैं।

3. राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल से अलग है (President remains outside the Cabinet)–संसदीय प्रणाली की महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल से अलग रहता है। राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल की बैठकों में भाग नहीं लेता। मन्त्रिमण्डल की बैठकों की अध्यक्षता प्रधानमन्त्री करता है, परन्तु मन्त्रिमण्डल के प्रत्येक निर्णय से राष्ट्रपति को सूचित कर दिया जाता है।

4. प्रधानमन्त्री का नेतृत्व (Leadership of the Prime Minister)-मन्त्रिमण्डल अपना समस्त कार्य प्रधानमन्त्री के नेतृत्व में करता है। राष्ट्रपति राज्य का अध्यक्ष है और प्रधानमन्त्री सरकार का अध्यक्ष है। प्रधानमन्त्री की सलाह के अनुसार ही राष्ट्रपति अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है। मन्त्रियों में विभागों का वितरण प्रधानमन्त्री के द्वारा ही किया जाता है और वह जब चाहे मन्त्रियों के विभागों को बदल सकता है। वह मन्त्रिमण्डल की अध्यक्षता करता है। यदि कोई मन्त्री प्रधानमन्त्री से सहमत नहीं होता तो वह त्याग-पत्र दे सकता है। प्रधानमन्त्री राष्ट्रपति को सलाह देकर किसी भी मन्त्री को पद से हटा सकता है। मन्त्रिमण्डल का जीवन तथा मृत्यु प्रधानमन्त्री के हाथों में होती है। प्रधानमन्त्री का इतना महत्त्व है कि उसे सितारों में चमकता हुआ चाँद (Shinning moon among the stars) कहा जाता है।

5. राजनीतिक एकरूपता (Political Homogeneity)—संसदीय शासन प्रणाली की अन्य विशेषता यह है कि इसमें राजनीतिक एकरूपता होती है। लोकसभा में जिस दल का बहुमत होता है उस दल के नेता को प्रधानमन्त्री बनाया जाता है और प्रधानमन्त्री अपने मन्त्रिमण्डल का स्वयं निर्माण करता है। प्रधानमन्त्री अपनी पार्टी के सदस्यों को ही मन्त्रिमण्डल में शामिल करता है। विरोधी दल के सदस्यों को मन्त्रिमण्डल में नियुक्त नहीं किया जाता।

6. एकता (Solidarity)—भारतीय संसदीय शासन प्रणाली की एक और विशेषता यह है कि मन्त्रिमण्डल एक इकाई के समान कार्य करता है। मन्त्री एक साथ बनते हैं और एक साथ ही अपने पद त्यागते हैं। जो निर्णय एक बार मन्त्रिमण्डल के द्वारा कर लिया जाता है, मन्त्रिमण्डल के सभी सदस्य उस निर्णय के अनुसार ही कार्य करते हैं और कोई भी मन्त्री उसका विरोध नहीं कर सकता। मन्त्रिमण्डल में जब कभी भी किसी विषय पर विचार होता है, उस समय प्रत्येक सदस्य स्वतन्त्रता से अपने-अपने विचार दे सकता है, परन्तु जब एक बार निर्णय ले लिया जाता है, चाहे वह निर्णय बहुमत के द्वारा क्यों न लिया गया हो, वह निर्णय समस्त मन्त्रिमण्डल का निर्णय कहलाता है।

7. मन्त्रिमण्डल का उत्तरदायित्व (Ministerial Responsibility)-भारतीय संसदीय शासन प्रणाली की एक विशेषता यह है कि मन्त्रिमण्डल अपने समस्त कार्यों के लिए संसद् के प्रति उत्तरदायी है। मन्त्रिमण्डल को अपनी आंतरिक तथा बाहरी नीति संसद के सामने रखनी पड़ती है और संसद् की स्वीकृति मिलने के बाद ही उसे लागू कर सकता है। संसद् के सदस्य मन्त्रियों से उनके विभागों से सम्बन्धित प्रश्न पूछ सकते हैं और मन्त्रियों को प्रश्नों का उत्तर देना पड़ता है। यदि उत्तर स्पष्ट न हो या प्रश्नों को टालने की कोशिश की जाए तो सदस्य अपने इस अधिकार की रक्षा के लिए सरकार से अपील कर सकते हैं। यदि लोकसभा मन्त्रिमण्डल के कार्यों से सन्तुष्ट न हो तो वह उसके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास कर सकते हैं।

8. गोपनीयता (Secrecy) भारतीय संसदीय शासन प्रणाली की एक अन्य विशेषता यह है कि मन्त्रिमण्डल की बैठकें प्राइवेट और गुप्त होती हैं। मन्त्रिमण्डल की कार्यवाही गुप्त रखी जाती है और मन्त्रिमण्डल की बैठकों में उसके सदस्यों के अतिरिक्त किसी अन्य को उसमें बैठने का अधिकार नहीं होता। संविधान के अनुच्छेद 75 (1) के अनुसार मन्त्रियों को पद ग्रहण करते समय मन्त्रिमण्डल की कार्यवाहियों को गुप्त रखने की शपथ लेनी पड़ती है।

9. प्रधानमन्त्री लोकसभा को भंग करवा सकता है (Prime Minister Can get the Lok Sabha Dissolved) भारतीय संसदीय शासन प्रणाली की एक विशेषता यह है कि प्रधानमन्त्री राष्ट्रपति को सलाह देकर लोकसभा को भंग करवा सकता है। जनवरी, 1977 में राष्ट्रपति अहमद ने प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी की सलाह पर लोकसभा को भंग कर किया। 22 अगस्त, 1979 को राष्ट्रपति संजीवा रेड्डी ने प्रधानमन्त्री चौधरी चरण सिंह की सलाह पर लोकसभा को भंग किया। 6 फरवरी, 2004 को प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति ए० पी० जे० अब्दुल कलाम ने 13वीं लोकसभा भंग कर दी।

10. मन्त्रिमण्डल की अवधि निश्चित नहीं है (The Tenure of the Cabinet is not Fixed)-मन्त्रिमण्डल की अवधि निश्चित नहीं है। मन्त्रिमण्डल तब तक अपने पद पर रह सकता है जब तक उसे लोकसभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त है। इस प्रकार मन्त्रिमण्डल की अवधि लोकसभा पर निर्भर करती है। अत: यदि मन्त्रिमण्डल को लोकसभा में बहुमत का विश्वास प्राप्त रहे तो वह 5 वर्ष तक रह सकता है। लोकसभा अविश्वास प्रस्ताव पास करके मन्त्रिमण्डल को जब चाहे हटा सकती है।

11. लोकसभा की श्रेष्ठता (Superiority of the Lok Sabha)-संसदीय सरकार की एक विशेषता यह होती है कि संसद् का निम्न सदन ऊपरि सदन की अपेक्षा श्रेष्ठ और शक्तिशाली होता है। भारत में भी संसद् का निम्न सदन (लोकसभा) राज्यसभा से श्रेष्ठ और अधिक शक्तिशाली है। मन्त्रिमण्डल के सदस्यों की आलोचना और उनसे प्रश्न पूछने का अधिकार संसद् के दोनों सदनों के सदस्यों को है, परन्तु वास्तव में मन्त्रिमण्डल लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है। लोकसभा ही अविश्वास प्रस्ताव पास करके मन्त्रिमण्डल को हटा सकती है, परन्तु ये अधिकार राज्यसभा के पास नहीं है। 17 अप्रैल, 1999 को प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी ने त्याग-पत्र दे दिया क्योंकि लोकसभा ने वाजपेयी के विश्वास प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।

12. विरोधी दल के नेता को मान्यता (Recognition to the Leader of the Opposition Party)-मार्च, 1977 को लोकसभा के चुनाव के बाद जनता पार्टी की सरकार बनी। जनता सरकार ने संसदीय शासन प्रणाली को दृढ़ बनाने के लिए विरोधी दल के नेता को कैबिनेट स्तर के मन्त्री की मान्यता दी। ब्रिटिश परम्परा का अनुसरण करते हुए भारत में भी अगस्त,1977 में भारतीय संसद् द्वारा पास किए गए कानून के अन्तर्गत संसद् के दोनों सदनों में विरोधी दल के नेताओं को वही वेतन तथा सुविधाएं दी जाती हैं जो कैबिनेट स्तर के मन्त्री को प्राप्त होती हैं। मासिक वेतन और निःशुल्क आवास एवं यात्रा भत्ते की व्यवस्था की गई है। अप्रैल-मई, 2009 में 15वीं लोकसभा के चुनावों के पश्चात् भारतीय जनता पार्टी के नेता श्री लाल कृष्ण अडवानी को विरोधी दल के नेता के रूप में मान्यता दी गई। दिसम्बर, 2009 में भारतीय जनता पार्टी ने श्री लाल कृष्ण आडवाणी के स्थान पर श्रीमती सुषमा स्वराज को लोकसभा में विपक्ष का नेता नियुक्त किया। 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनावों के पश्चात् किसी भी दल को मान्यता प्राप्त विरोधी दल का दर्जा नहीं दिया गया।

प्रश्न 3. भारतीय संसदीय लोकतंत्र के कोई 6 दोषों या कमियों का वर्णन करें। (Explian six weaknesses or defects of Parliamentary democracy in India.)
अथवा
भारतीय संसदीय प्रणाली के अवगुणों का वर्णन कीजिए। (Discuss the demerits of Indian Parliamentary System.)
अथवा
भारतीय संसदीय प्रणाली के दोषों का वर्णन कीजिए। (Explain the defects of Indian Parliamentary System.)
उत्तर-भारत में केन्द्र और प्रांतों में संसदीय शासन प्रणाली को कार्य करते हुए कई वर्ष हो गए हैं। भारतीय संसदीय प्रणाली की कार्यविधि के आलोचनात्मक अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय संसदीय प्रजातन्त्रीय प्रणाली में बहुत-सी त्रुटियां हैं जिनके कारण कई बार यह कहा जाता है कि भारत में संसदीय प्रजातन्त्र का भविष्य उज्ज्वल नहीं है। भारतीय संसदीय प्रजातन्त्र की कार्यविधि के अध्ययन के पश्चात् निम्नलिखित दोष नज़र आते हैं-

1. एक दल की प्रधानता (Dominance of One Party)-भारतीय संसदीय प्रजातन्त्र का महत्त्वपूर्ण दोष यह है कि यहां पर कांग्रेस दल का ही प्रभुत्व छाया रहा है। 1950 से लेकर मार्च, 1977 तक केन्द्र में कांग्रेस की सरकार बनी रही। राज्यों में भी 1967 तक इसी की प्रधानता रही।
जनवरी, 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस (इ) को भारी सफलता मिली। कांग्रेस (इ) को 351 सीटें मिलीं जबकि लोकदल को 41 और जनता पार्टी को केवल 31 स्थान मिले। हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में दल-बदल द्वारा कांग्रेस (इ) की सरकारें स्थापित की गईं। मई, 1980 में 9 राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव में तमिलनाडु को छोड़कर 8 अन्य राज्यों में कांग्रेस को भारी सफलता मिली और कांग्रेस (इ) की सरकारें बनीं। दिसम्बर, 1984 के लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस (इ) को ऐतिहासिक विजय प्राप्त हुई। ऐसा लगता था कि कांग्रेस का एकाधिकार पुनः स्थापित हो जाएगा। परन्तु नवम्बर, 1989 के लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस (इ) की पराजय हुई और राष्ट्रीय मोर्चा को विजय प्राप्त हुई। फरवरी, 1990 में 8 राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव में महाराष्ट्र और अरुणाचल प्रदेश को छोड़कर अन्य राज्यों में गैर-कांग्रेसी दलों को भारी सफलता प्राप्त हुई।

मई, 1991 के लोकसभा के चुनाव और विधानसभाओं के चुनाव से स्पष्ट हो गया है कि अब कांग्रेस (इ) की प्रधानता 1977 से पहले जैसी नहीं रही। मई, 1996 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को केवल 140 सीटें प्राप्त हुईं। पश्चिमी बंगाल, केरल, तमिलनाडु, जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश व पंजाब इत्यादि राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव में कांग्रेस को कोई विशेष सफलता नहीं मिली। इसी प्रकार फरवरी-मार्च, 1998 एवं सितम्बर-अक्तूबर, 1999 के चुनावों में भी कांग्रेस को ऐतिहासिक पराजय का सामना करना पड़ा। अप्रैल-मई, 2004 में हुए 14वीं लोकसभा के चुनावों के पश्चात् यद्यपि कांग्रेस ने केन्द्र में सरकार बनाने में सफलता प्राप्त की, परन्तु इसके लिए अन्य दलों का समर्थन भी लेना पड़ा। अप्रैल-मई 2009 में हुए 15वीं लोकसभा के चुनावों के पश्चात् भी गठबन्धन सरकार का ही निर्माण किया गया। 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ा उसे केवल 44 सीटें ही मिल पाईं, जबकि भाजपा को पहली बार स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ। अतः अब कांग्रेस की प्रधानता समाप्त हो गई है।

2. संगठित विरोधी दल का अभाव (Lack of Effective Opposition)-भारतीय संसदीय प्रजातन्त्र की कार्यविधि सदैव संगठित विरोधी दल के अभाव को अनुभव करती रही है।
लम्बे समय तक संगठित विरोधी दल न होने के कारण कांग्रेस ने विरोधी दलों की बिल्कुल परवाह नहीं की। परन्तु जनता पार्टी की स्थापना के पश्चात् भारतीय राजनीति व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया है। मार्च, 1977 के लोकसभा के चुनाव में जनता पार्टी सत्तारूढ़ दल बनी और कांग्रेस को विरोधी बैंचों पर बैठने का पहली बार सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस प्रकार कांग्रेस की हार से संगठित विरोधी दल का उदय हुआ।

सितम्बर-अक्तूबर 1999 में हुए 13वीं लोकसभा के चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को विपक्षी दल के रूप में और इस दल की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी को विपक्षी दल के नेता के रूप.में मान्यता दी गई है। अप्रैल-मई, 2009 में हुए 15वीं लोकसभा के चुनावों के पश्चात् भारतीय जनता पार्टी को विपक्षी दल के रूप में तथा इस दल के नेता श्री लाल कृष्ण आडवाणी को विपक्षी दल के नेता के रूप में मान्यता दी गई। दिसम्बर, 2009 में भारतीय जनता पार्टी ने श्री लाल कृष्ण आडवाणी के स्थान पर श्रीमती सुषमा स्वराज को लोकसभा में विपक्ष का नेता नियुक्त किया। 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनावों के पश्चात् किसी भी दल को मान्यता प्राप्त विरोधी दल का दर्जा प्राप्त नहीं हुआ।

3. बहुदलीय प्रणाली (Multiple Party System)—संसदीय प्रजातन्त्र की सफलता में एक और बाधा बहुदलीय प्रणाली का होना है। भारत में फ्रांस की तरह बहुत अधिक दल पाए जाते हैं। स्थायी शासन के लिये दो या तीन दल ही होने चाहिए। अधिक दलों के कारण प्रशासन में स्थिरता नहीं रहती। 1967 के चुनाव के पश्चात, बिहार, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा आदि प्रान्तों में सरकारों के गिरने और बनने का पता भी नहीं चलता था। अत: संसदीय प्रजातन्त्र की कामयाबी के लिए दलों की संख्या को कम करना अनिवार्य है। मई, 1991 के लोकसभा के चुनाव के अवसर पर चुनाव आयोग ने 9 राष्ट्रीय दलों को मान्यता दी परन्तु फरवरी, 1992 में चुनाव कमीशन ने 3 राष्ट्रीय दलों की मान्यता रद्द कर दी। चुनाव आयोग ने 7 राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय तथा 58 दलों को राज्य स्तरीय दलों के रूप में मान्यता प्रदान की हुई है।

4. सामूहिक उत्तरदायित्व की कमी (Absence of Collective Responsibility)-संविधान के अनुच्छेद 75 के अनुसार मन्त्रिपरिषद् सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है। इसका अभिप्राय यह है कि एक मन्त्री के विरुद्ध भी निन्दा प्रस्ताव या अविश्वास प्रस्ताव पास कर दिया जाए तो समस्त मन्त्रिपरिषद् को त्याग-पत्र देना पड़ता है। यह एक संवैधानिक व्यवस्था है जबकि व्यवहार में ऐसा होना चाहिए, परन्तु भारत में ऐसी परम्परा की कमी है।

5. अच्छी परम्पराओं की कमी (Absence of Healthy Convention)-संसदीय शासन प्रणाली की सफलता अच्छी परम्पराओं की स्थापना पर निर्भर करती है। इंग्लैण्ड में संसदीय शासन प्रणाली की सफलता अच्छी परम्पराओं के कारण ही है, परन्तु भारत में कांग्रेस शासन में अच्छी परम्पराओं की स्थापना नहीं हो पाई। इसके लिए विरोधी दल भी ज़िम्मेदार है।

6. अध्यादेशों द्वारा प्रशासन (Administration by Ordinances)-संविधान के अनुच्छेद 123 के अनुसार राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति दी गई है। संविधान निर्माताओं का यह उद्देश्य था कि जब संसद् का अधिवेशन न हो रहा हो या असाधारण स्थिति उत्पन्न हो गई हो तो उस समय राष्ट्रपति इस शक्ति का प्रयोग करेगा। परन्तु विशेषकर पिछले 20 वर्षों में कई बार अध्यादेश उस समय जारी किए गए हैं, जब संसद् का अधिवेशन एकदो दिनों में होने वाला होता है। बहुत अधिक अध्यादेश का जारी करना मनोवैज्ञानिक पक्ष में भी बुरा प्रभाव डालता है। लोग अनुभव करने लग जाते हैं कि सरकार अध्यादेशों द्वारा चलाई जाती है। इसके अतिरिक्त बहुत अधिक अध्यादेश जारी करना मनोवैज्ञानिक रूप से बुरा प्रभाव डालता है।

7. जनता के साथ कम सम्पर्क (Less Contact With the Masses)-भारतीय संसदीय प्रजातन्त्र का एक अन्य महत्त्वपूर्ण दोष यह है कि विधायक जनता के साथ सम्पर्क नहीं बनाए रखते हैं। कांग्रेस दल भी चुनाव के समय ही जनता के सम्पर्क में आता है और अन्य दलों की तरह चुनाव के पश्चात् अन्धकार में छिप जाता है। जनता को अपने विधायकों की कार्यविधियों का ज्ञान नहीं होता। .

8. चरित्र का अभाव (Lack of Character)—प्रजातन्त्र की सफलता के लिए मतदाता, शासक तथा आदर्श नागरिकों का चरित्र ऊंचा होना अनिवार्य है। परन्तु हमारे विधायक तथा राजनीतिक दलों के चरित्र का वर्णन करते हुए भी शर्म आती है। विधायक मन्त्री पद के पीछे दौड़ रहे हैं। जनता तथा देश के हित में न सोच कर विधायक अपने स्वार्थ के लिए नैतिकता के नियमों का दिन-दिहाड़े मज़ाक उड़ा रहे हैं। विधायक अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए दल बदलने में बिल्कुल नहीं झिझकते। .

9. दल-बदल (Defection)—भारतीय संसदीय लोकतन्त्र की सफलता में एक महत्त्वपूर्ण बाधा दल-बदल है। चौथे आम चुनाव के पश्चात् दल-बदल चरम सीमा पर पहुंच गया। मार्च, 1967 से दिसम्बर, 1970 तक 4000 विधायकों में से 1400 विधायकों ने दल बदले। सबसे अधिक दल-बदल कांग्रेस में हुआ। 22 जनवरी, 1980 को हरियाणा के मुख्यमन्त्री चौधरी भजन लाल 37 सदस्यों के साथ जनता पार्टी को छोड़कर कांग्रेस (आई) में शामिल हो गए। मई, 1982 को हरियाणा में चौधरी भजन लाल ने दल-बदल के आधार पर मन्त्रिमण्डल का निर्माण किया। अनेक विधायक लोकदल को छोड़ कर कांग्रेस (आई) में शामिल हुए। दल-बदल संसदीय प्रजातन्त्र के लिए बहुत हानिकारक है क्योंकि राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न होती है। अनेक सरकारें दल-बदल के कारण ही गिरती हैं। 1979 में प्रधानमन्त्री मोरारजी देसाई को और 1990 में प्रधानमन्त्री वी० पी० सिंह को दल-बदल के कारण ही त्याग-पत्र देना पड़ा था। 30 दिसम्बर, 1993 को कांग्रेस (इ) को दल-बदल द्वारा ही लोकसभा में बहुमत प्राप्त हुआ। वर्तमान समय में भी दलबदल की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

10. अनुशासनहीनता (Indiscipline)-विधायकों में अनुशासनहीनता भी भारतीय राजनीति में एक नया तत्त्व है। यह भावना भी 1967 के चुनावों के बाद ही विशेष रूप से उत्पन्न हुई है। विरोधी दलों ने राज्यों में अपना मन्त्रिमण्डल बनाने का प्रयत्न किया और कांग्रेस ने इसके विपरीत कार्य किया। शक्ति की इस खींचातानी में दोनों ही दल मर्यादा, नैतिकता और औचित्य की सीमाओं को पार कर गए और विधानमण्डलों में ही शिष्टाचार को भुलाकर आपस में लड़नेझगड़ने तथा गाली-गलोच करने लगे। इस खींचातानी में दलों ने यह सोचना ही छोड़ दिया कि क्या ठीक है, क्या गलत है। एक-दूसरे पर जूते फेंकने की घटनाएं घटने लगीं।

11. लोकसभा अध्यक्ष की निष्पक्षता पर सन्देह (Doubts about the Neutrality of the Speaker)लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) संसदीय प्रणाली की सरकार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अतः अध्यक्ष का निष्पक्ष होना आवश्यक है परन्तु भारत में केन्द्र एवं राज्यों में स्पीकर की निष्पक्षता पर सन्देह व्यक्त किया जाता है।।

12. राजनीतिक अपराधीकरण (Criminalisation of Politics)-भारत में राजनीतिक अपराधीकरण की समस्या निरन्तर गम्भीर होती जा रही है जोकि संसदीय शासन प्रणाली के लिए गम्भीर खतरा है। संसद् तथा राज्य विधानमण्डल अपराधियों के लिए सुरक्षित स्थान एवं आश्रय स्थल बनते जा रहे हैं। चुनाव आयोग के अनुसार 11वीं लोकसभा में 40 एवं विभिन्न राज्यों के विधानमण्डलों में 700 से अधिक सदस्य थे, जिन्हें किसी न किसी अपराध के अंतर्गत सज़ा मिल चुकी थी। इस समस्या से पार पाने के लिए चुनाव आयोग ने 1997 में एक आदेश द्वारा अपराधियों को चुनाव लड़ने के अधिकार पर प्रतिबन्ध लगा दिया। 2014 में निर्वाचित हुई 16वीं लोकसभा में भी अपराधिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति सांसद चुने गए।

13. त्रिशंकु संसद् (Hung Parliament)-भारतीय संसदीय प्रणाली का एक अन्य महत्त्वपूर्ण दोष यह है कि भारत में पिछले कुछ आम चुनावों में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हो पा रहा है। इसीलिए गठबन्धन सरकारों का निर्माण हो रहा है। त्रिशंकु संसद् होने के कारण सरकारें स्थाई नहीं हो पाती तथा क्षेत्रीय दल इसका अनावश्यक लाभ उठाते हैं।

14. डॉ० गजेन्द्र गडकर (Dr. Gajendra Gadkar) ने संसदीय प्रजातन्त्र की आलोचना करते हुए अपने लेख ‘Danger to Parliamentary Government’ में लिखा है कि राजनीतिक दल यह भूल गए हैं कि राजनीतिक सत्ता ध्येय न होकर सामाजिक तथा आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए साधन है। राजनीतिक दल उन सभी साधनों का, जिससे चाहे राष्ट्र के हित को हानि पहुंचती हो, प्रयोग करते झिझकते नहीं है, जिनसे वे राजनीतिक सत्ता प्राप्त करते हों। चौथे आम चुनाव के पश्चात, राष्ट्र की एकता खतरे में पड़ गई थी। हड़ताल, बन्द हिंसात्मक साधनों का प्रयोग दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। साम्प्रदायिक दंगे-फसाद संसदीय प्रजातन्त्र के लिए खतरा उत्पन्न कर रहे हैं।

15. गाडगिल (Gadgil) ने वर्तमान संसदीय प्रजातन्त्र की आलोचना करते हुए लिखा है कि सभी निर्णय जो संसद् में बहुमत से लिए जाते हैं, वे वास्तव में बहुमत के निर्णय न होकर अल्पमत के निर्णय होते हैं। सत्तारूढ़ दल अपने समर्थकों के साथ पक्षपात करते हैं और प्रत्येक साधन से चाहे वे जनता के हित में न हों सस्ती लोकप्रियता (Cheap Popularity) प्राप्त करने के लिए अपनाते हैं । गाडगिल ने यह भी कहा है कि संसदीय सरकार एकमात्र धोखा है क्योंकि वास्तव में निर्णय बहुमत के नेताओं द्वारा लिए जाते हैं जो सभी पर लागू होते हैं।

16. डॉ० जाकिर हुसैन (Dr. Zakir Hussain) के अनुसार, “संसदीय प्रजातन्त्र को सबसे मुख्य खतरा हिंसा के इस्तेमाल से है। भारत में कई राजनीतिक दल यह जानते हुए भी कि बन्द आदि से हिंसा उत्पन्न होती है, जनता को इनका प्रयोग करने के लिए उकसाते रहते हैं।”
निःसन्देह भारतीय संसदीय शासन प्रणाली में अनेक दोष पाए जाते हैं, परन्तु यह कहना ठीक नहीं है कि भारत में संसदीय लोकतन्त्र असफल रहा है। भारत में संसदीय लोकतन्त्र की सफलता के लिए उचित वातावरण है और संसदीय लोकतन्त्र की जड़ें काफ़ी मज़बूत हैं।

प्रश्न 4. भारतीय लोकतन्त्र को प्रभावित करने वाले सामाजिक-आर्थिक तत्त्वों का वर्णन करें।
(Explain the socio-economic factors that influence the Indian Democracy.)
अथवा
लोकतन्त्र को प्रभावित करने वाले सामाजिक तथा आर्थिक तत्त्वों का वर्णन करें।
(Discuss the social and economic factors conditioning Democracy.)
उत्तर-भारत में लोकतन्त्र को अपनाया गया है और संविधान में लोकतन्त्र को सुदृढ़ बनाने के लिए भरसक प्रयत्न किया गया है। संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक ‘सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतन्त्रात्मक गणराज्य’ घोषित किया गया है। प्रस्तावना में यह भी कहा गया है कि संविधान के निर्माण का उद्देश्य भारत के नागरिकों को कई प्रकार की स्वतन्त्रताएं प्रदान करना है और इनमें मुख्य स्वतन्त्रताओं का उल्लेख प्रस्तावना में किया गया है। जैसे-विचार रखने की स्वतन्त्रता, अपने विचारों को प्रकट करने की स्वतन्त्रता, अपनी इच्छा, बुद्धि के अनुसार किसी भी बात में विश्वास रखने की स्वतन्त्रता तथा अपनी इच्छानुसार अपने इष्ट देव की उपासना करने की स्वतन्त्रता आदि प्राप्त है।

प्रस्तावना में नागरिकों को प्रतिष्ठा तथा अवसर की समानता प्रदान की गई है और बन्धुत्व की भावना को विकसित करने पर बल दिया गया है। प्रस्तावना में व्यक्ति के गौरव को बनाए रखने की घोषणा की गई है। संविधान के तीसरे भाग में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है। इन अधिकारों का उद्देश्य भारत में राजनीतिक लोकतन्त्र की स्थापना करना है। संविधान के चौथे भाग में राजनीति के निर्देशक सिद्धान्तों का वर्णन किया गया है, जिनका उद्देश्य आर्थिक लोकतन्त्र की स्थापना करना है। संविधान में सार्वजनिक वयस्क मताधिकार की व्यवस्था की गई है। प्रत्येक नागरिकों को जो 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो वोट डालने का अधिकार है। अप्रैल-मई, 2014 में 16 वीं लोकसभा के चुनाव के अवसर पर मतदाताओं की संख्या 81 करोड़ 40 लाख थी। संविधान में अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन-जातियों और पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा के लिए विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं। निःसन्देह सैद्धान्तिक रूप में प्रजातन्त्र की आदर्श व्यवस्था कायम करने के प्रयास किए गए हैं, परन्तु व्यवहार में भारत में लोकतन्त्रीय प्रणाली को उतनी अधिक सफलता नहीं मिली जितनी कि इंग्लैण्ड, अमेरिका, स्विटज़रलैण्ड आदि देशों में मिली है। इसका कारण यह है कि प्रत्येक देश की सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं और इनका लोकतन्त्रीय प्रणाली पर भी प्रभाव पड़ता है। भारत की सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों ने लोकतन्त्र को बहुत अधिक प्रभावित किया है।

भारतीय प्रजातन्त्र को प्रभावित करने वाले सामाजिक तत्त्व (SOCIAL FACTORS CONDITIONING INDIAN DEMOCRACY)-

1. सामाजिक असमानता (Social Inequality)-लोकतन्त्र की सफलता के लिए सामाजिक समानता का होना आवश्यक है। सामाजिक समानता का अर्थ यह है कि धर्म, जाति, रंग, लिंग, वंश आदि के आधार पर नागरिकों में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। भारत में लोकतन्त्र की स्थापना के इतने वर्षों बाद भी सामाजिक असमानता पाई जाती है। भारत में विभिन्न धर्मों, जातियों व वर्गों के लोग रहते हैं। समाज के सभी नागरिकों को समान नहीं समझा जाता। जाति, धर्म, वंश, रंग, लिंग के आधार पर व्यवहार में आज भी भेदभाव किया जाता है। निम्न जातियों और हरिजनों पर आज भी अत्याचार हो रहे हैं। सामाजिक असमानता ने लोगों में निराशा एवं असंतोष को बढ़ावा दिया है।

2. निरक्षरता (Illiteracy)-20वीं शताब्दी के अन्त में जब विश्व में पर्याप्त वैज्ञानिक व औद्योगिक प्रगति हो चुकी है, भारत जैसे लोकतन्त्रीय देश में अभी भी काफ़ी निरक्षरता है। शिक्षा एक अच्छे जीवन का आधार है, शिक्षा के बिना व्यक्ति अन्धकार में रहता है। अनपढ़ व्यक्ति में आत्म-विश्वास की कमी होती है इसलिए उसमें देश की समस्याओं को समझने व हल करने की क्षमता नहीं होती। अशिक्षित व्यक्ति को न तो अपने अधिकारों का ज्ञान होता है और न ही अपने कर्तव्यों का। वह अपने अधिकारों के अनुचित अतिक्रमण से रक्षा नहीं कर सकता और न ही वह अपने कर्त्तव्यों को ठीक तरह से निभा सकता है। इसके अतिरिक्त अशिक्षित व्यक्ति का दृष्टिकोण संकुचित होता है। वह जातीयता, साम्प्रदायिकता, भाषावाद, क्षेत्रीयवाद आदि के चक्कर में पड़ा रहता है। ___

3. जातिवाद (Casteism)-भारतीय समाज में जातिवाद की प्रथा प्राचीन काल से प्रचलित है। आज भारत में तीन हज़ार से अधिक जातियां और उपजातियां हैं। जातिवाद का भारतीय राजनीति से गहरा सम्बन्ध है। भारतीय राजनीति में जाति एक महत्त्वपूर्ण तथा निर्णायक तत्त्व रहा है और आज भी है। स्वतन्त्रता से पूर्व भी राजनीति में जाति का महत्त्वपूर्ण स्थान था। स्वतन्त्रता के पश्चात् जाति का प्रभाव कम होने की अपेक्षा बढ़ा ही है जो राष्ट्रीय एकता के लिए घातक सिद्ध हुआ है।

4. अस्पृश्यता (Untouchability)-अस्पृश्यता ने भारतीय लोकतन्त्र को अत्यधिक प्रभावित किया है। अस्पृश्यता भारतीय समाज पर एक कलंक है। यह हिन्दू समाज की जाति-प्रथा का प्रत्यक्ष परिणाम है।

यद्यपि भारतीय संविधान के अन्तर्गत छुआछूत को समाप्त कर दिया गया है तथा छुआछूत को मानने वाले को दण्ड दिया जाता है, फिर भी भारत के अनेक भागों में अस्पृश्यता प्रचलित है। अस्पृश्यता ने भारतीय लोकतन्त्र को प्रभावित किया है। अस्पृश्यता के कारण हरिजनों में हीनता की भावना बनी रहती है, जिस कारण वे भारत की राजनीति में सक्रिय भाग नहीं ले पाते। छुआछूत के कारण समाज में उच्च वर्गों और निम्न वर्गों में बन्धुत्व की भावना का विकास नहीं हो पा रहा है। हरिजनों और जन-जातियों का शोषण किया जा रहा है और उन पर उच्च वर्गों द्वारा अत्याचार किए जाते हैं। भारतीय लोकतन्त्र की सफलता के लिए छुआछूत को व्यवहार में समाप्त करना अति आवश्यक है।

5. साम्प्रदायिकता (Communalism)—साम्प्रदायिकता का अभिप्राय है धर्म अथवा जाति के आधार पर एकदूसरे के विरुद्ध भेदभाव की भावना रखना। धर्म का भारतीय राजनीति पर सदैव ही प्रभाव रहा है। धर्म की संकीर्ण भावनाओं ने स्वतन्त्रता से पूर्व भारतीय राजनीति को साम्प्रदायिक झगड़ों का अखाड़ा बना दिया। धर्म के नाम पर हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच झगड़े चलते रहते थे और अन्त में भारत का विभाजन भी हुआ। परन्तु भारत का विभाजन भी साम्प्रदायिकता को समाप्त नहीं कर सका और आज फिर साम्प्रदायिक तत्त्व अपना सिर उठा रहे हैं।

6. सामाजिक तनाव और हिंसा (Social Tension and Violence)-प्रजातन्त्र की सफलता के लिए सामाजिक सहयोग और शान्ति का होना आवश्यक है। परन्तु भारत के किसी-न-किसी भाग में सदैव सामाजिक तनाव बना रहता है और हिंसा की घटनाएं होती रहती हैं। सामाजिक तनाव उत्पन्न होने के कई कारण हैं। सामाजिक तनाव का महत्त्वपूर्ण कारण सामाजिक तथा आर्थिक असमानता है। कई बार क्षेत्रीय भावनाएं सामाजिक तनाव उत्पन्न कर देती हैं। साम्प्रदायिकता सामाजिक तनाव पैदा करने का महत्त्वपूर्ण कारण है। सामाजिक तनावों से हिंसा उत्पन्न होती है। उदाहरणस्वरूप 1983 से 1990 के वर्षों में पंजाब में 1992, 1993 में अयोध्या मुद्दे के कारण उत्तर प्रदेश में तथा 2002 में गुजरात में गोधरा कांड के कारण सामाजिक तनाव और हिंसा की घटनाएं होती रही हैं।

7. भाषावाद (Linguism)-भारत में भिन्न-भिन्न भाषाओं के लोग रहते हैं। भारतीय संविधान में 22 भाषाओं का वर्णन किया गया है और इसमें हिन्दी भी शामिल है। हिन्दी देवनागरी लिपि में लिखित संघ सरकार की सरकारी भाषा घोषित की गई है। भाषावाद ने भारतीय लोकतन्त्र एवं राजनीति को काफी प्रभावित किया है। भाषा के आधार पर लोगों में क्षेत्रीयवाद की भावना का विकास हुआ और सीमा विवाद उत्पन्न हुए हैं। भाषा के विवादों ने आन्दोलनों, हिंसा इत्यादि को जन्म दिया। भाषायी आन्दोलनों से सामाजिक तनाव की वृद्धि हुई है। चुनावों के समय राजनीतिक दल अपने हितों के लिए भाषायी भानवाओं को उकसाते हैं। मतदान के समय मतदाता भाषा से काफी प्रभावित होते हैं। तमिलनाडु के अन्दर डी० एम० के० तथा अन्ना डी० एम० के० ने कई बार हिन्दी विरोधी आन्दोलन चला कर मतदाताओं को प्रभावित किया।

भारतीय लोकतन्त्र को प्रभावित करने वाले आर्थिक तत्त्व
(ECONOMIC FACTORS CONDITIONING INDIAN DEMOCRACY)-

1. आर्थिक असमानता (Economic Inequality) लोकतन्त्र की सफलता के लिए आर्थिक समानता का होना आवश्यक है। आर्थिक समानता का अर्थ है कि समाज में आर्थिक असमानता कम-से-कम होना चाहिए और प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वेतन मिलना चाहिए। परन्तु भारत में स्वतन्त्रता के इतने वर्ष के पश्चात् आर्थिक असमानता बहत अधिक पाई जाती है। भारत में एक तरफ करोड़पति पाए जाते हैं तो दूसरी तरफ करोड़ों लोग ऐसे हैं जिन्हें दो समय का भोजन भी नहीं मिलता। भारत में देश का धन थोड़े-से परिवारों के हाथों में ही केन्द्रित है। भारत में आर्थिक शक्ति का वितरण समान नहीं है। अमीर दिन-प्रतिदिन अधिक अमीर होते जाते हैं और ग़रीब और अधिक ग़रीब होते जाते हैं। आर्थिक असमानता ने लोकतन्त्र को काफी प्रभावित किया है। अमीर लोग राजनीतिक दलों को धन देते हैं और प्रायः धनी व्यक्तियों को पार्टी का टिकट दिया जाता है। चुनावों में धन का अधिक महत्त्व है और धन के आधार पर चुनाव जीते जाते हैं। सत्तारूढ़ दल अमीरों के हितों का ही ध्यान रखते हैं क्योंकि उन्हें अमीरों से धन मिलता है। भारतीय लोकतन्त्र में वास्तव में शक्ति धनी व्यक्तियों के हाथों में है और आम व्यक्ति का विकास नहीं हुआ।

2. ग़रीबी (Poverty)-भारतीय लोकतन्त्र को ग़रीबी ने बहुत प्रभावित किया है। भारत की अधिकांश जनता ग़रीब है। स्वतन्त्रता के इतने वर्ष बाद भी देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनको न तो खाने के लिए भर पेट भोजन मिलता है, न पहनने को कपड़ा और न रहने के लिए मकान। ग़रीबी कई बुराइयों की जड़ है। ग़रीब नागरिक को पेट भर भोजन न मिल सकने के कारण उसका शारीरिक और मानसिक विकास नहीं हो सकता। वह सदा अपना पेट भरने की चिन्ता में लगा रहेगा और उसके पास समाज और देश की समस्याओं पर विचार करने का न तो समय होता है और न ही इच्छा। ग़रीब व्यक्ति के लिए चुनाव लड़ना तो दूर की बात रही, वह चुनाव की बात भी नहीं सोच सकता।

प्रश्न 5. भारतीय लोकतन्त्र की मुख्य समस्याओं का वर्णन करें।
(Discuss the major problems of Indian Democracy.)
अथवा
भारतीय लोकतन्त्र की समस्याओं और चनौतियों के बारे में लिखिए।
(Write down about problems and challenges to Indian democracy.)
उत्तर-निःसन्देह सैद्धान्तिक रूप में भारत में प्रजातन्त्र की आदर्श-व्यवस्था कायम करने के प्रयास किए गये हैं परन्तु व्यवहार में आज भी भारतीय प्रजातन्त्र अनेक सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक बुराइयों से जकड़ा हुआ है और ये बुराइयां भारतीय लोकतन्त्र के लिए अभिशाप बन चुकी हैं। ये बुराइयां निम्नलिखित हैं-

1. सामाजिक तथा आर्थिक असमानता (Social and Economic Inequality)-प्रजातन्त्र की सफलता के लिए सामाजिक व आर्थिक समानता का होना बहुत आवश्यक हैं। भारत में लोकतन्त्र की स्थापना हुए इतने वर्ष हो चुके हैं फिर भी यहां पर सामाजिक व आर्थिक असमानता पाई जाती है। समाज के सभी नागरिकों को समान नहीं समझा जाता। जाति, धर्म, वंश, लिंग के आधार पर व्यवहार में आज भी भेदभाव किया जाता है। स्त्रियों को पुरुषों के समान नहीं समझा जाता। निम्न जातियों और हरिजनों पर आज भी अत्याचार हो रहे हैं। सामाजिक असमानता ने लोगों में निराशा एवं असन्तोष को बढ़ावा दिया है। निम्न वर्ग के लोगों ने कई बार आन्दोलन किए हैं और संरक्षण की मांग की है। सामाजिक असमानता से लोगों का दृष्टिकोण बहुत संकीर्ण हो जाता है। प्रत्येक वर्ग अपने हित की सोचता है, न कि समस्त समाज एवं राष्ट्र के हित में। राजनीतिक दल सामाजिक असमानता का लाभ उठाने का प्रयास करते हैं और सत्ता पर उच्च वर्ग को लोगों का ही नियन्त्रण रहता है। सामाजिक असमानता के कारण समाज का बहुत बड़ा भाग राजनीतिक कार्यों के प्रति उदासीन रहता है।

2. ग़रीबी (Poverty)-भारत की अधिकांश जनता ग़रीब है। ग़रीबी कई बुराइयों की जड़ है। गरीब नागरिक को पेट भर भोजन न मिल सकने के कारण उसका शारीरिक और मानसिक विकास नहीं हो सकता। वह सदा अपने पेट भरने की चिन्ता में लगा रहेगा और उसके पास समाज और देश की समस्याओं पर विचार करने का न तो समय होता है और न ही इच्छा। ग़रीब व्यक्ति चुनाव लड़ना तो दूर की बात वह चुनाव की बात भी नहीं सोच सकता। दीन-दुःखियों से चुनाव लड़ने की आशा करना मूर्खता है। ग़रीब नागरिक अपनी वोट का भी स्वतन्त्रतापूर्वक प्रयोग नहीं कर सकता। अत: यदि हम भारतीय प्रजातन्त्र का भविष्य उज्ज्वल देखना चाहते हैं तो जनता की आर्थिक दशा सुधारनी होगी।

3. अनपढ़ता (Illiteracy) शिक्षा एक अच्छे जीवन का आधार है, शिक्षा के बिना व्यक्ति अन्धकार में रहता है। स्वतन्त्रता के इतने वर्ष बाद भी भारत की लगभग 24 प्रतिशत जनता अनपढ़ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 15 से 35 वर्ष की आयु के बीच लगभग 10 करोड़ व्यक्ति अनपढ़ है। अनपढ़ व्यक्ति में आत्म-विश्वास की कमी होती है और उसमें देश की समस्याओं को समझने तथा हल करने की क्षमता नहीं होती है। अशिक्षित व्यक्ति को न हो तो अपने अधिकारों का ज्ञान होता है और न ही अपने कर्तव्यों का। वह अपने अधिकारों की अनुचित अतिक्रमण से रक्षा नहीं कर सकता और न ही वह अपने कर्तव्यों को ठीक तरह से निभा सकता है। इसके अतिरिक्त अशिक्षित व्यक्ति का दृष्टिकोण संकुचित होता है। वह जातीयता, साम्प्रदायिकता, भाषावाद, क्षेत्रीयवाद आदि के चक्कर में पड़ा रहता है।

4. बेकारी (Unemployment) बेकारी प्रजातन्त्र की सफलता में एक बहुत बड़ी बाधा है। बेकार व्यक्ति की बातें सोचता रहता है। वह देश तथा समाज के हित में सोच ही नहीं सकता।।
बेकार व्यक्ति में हीन भावना आ जाती है और वह अपने आपको समाज पर बोझ समझने लगता है। बेकार व्यक्ति अपनी समस्याओं में ही उलझा रहता है और उसे समाज एवं देश की समस्याओं का कोई ज्ञान नहीं होता। बेरोज़गारी के कारण नागरिकों के चरित्र का पतन हुआ है। इससे बेइमानी, चोरी, ठगी, भ्रष्टाचार की बढ़ोत्तरी हुई है। प्रजातन्त्र को सफल बनाने के लिए बेकारी को जल्दी-से-जल्दी समाप्त करना अति आवश्यक है।

5. एक दल की प्रधानता (Dominance of one Party)-प्रजातन्त्र का महत्त्वपूर्ण दोष यह रहा है कि यहां पर कांग्रेस दल का ही प्रभुत्व छाया रहा है। 1950 से लेकर मार्च, 1977 तक केन्द्र में कांग्रेस की सरकार बनी रही है। राज्यों में भी 1967 तक इसी की प्रधानता रही है और 1971 के मध्यावधि चुनाव के पश्चात् फिर उसी दल के एकाधिकार के कारण अन्य दल विकसित नहीं हो पाए।

6. संगठित विरोधी दल का अभाव (Lack of Organised Opposition)-भारतीय प्रजातन्त्र की कार्यविधि सदैव संगठित विरोधी दल के अभाव को अनुभव करती रही है।

संगठित विरोधी दल न होने के कारण कांग्रेस ने विरोधी दलों की बिल्कुल परवाह नहीं की। विरोधी दलों के नेताओं ने संसद् में सरकार के विरुद्ध कई बार यह आरोप लगाया है कि उन्हें अपने विचार रखने का पूरा अवसर नहीं दिया जाता है। कई बार तो सरकार संसद् में दिए गए वायदों को भी भूल जाती है।

जनता पार्टी की स्थापना के पश्चात् भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया है। मार्च, 1977 के लोकसभा के चुनाव में जनता पार्टी का सत्तारूढ़ दल बना और कांग्रेस को विरोधी बैंचों पर बैठने का पहली बार सौभाग्य प्राप्त हुआ।

अप्रैल-मई, 2004 में हुए 14वीं एवं अप्रैल-मई, 2009 में हुए 15वीं लोकसभा के चुनावों के बाद भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा में विरोधी दल की मान्यता प्रदान की गई। 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनावों के पश्चात् किसी भी दल को मान्यता प्राप्त विरोधी दल का दर्जा प्राप्त नहीं हुआ।

7. बहुदलीय प्रणाली (Multiple Party System)—प्रजातन्त्र की सफलता में एक और बाधा बहुदलीय प्रणाली का होना है। भारत में फ्रांस की तरह बहुत अधिक दल पाए जाते हैं। स्थायी शासन के लिए दो या तीन दल ही होने चाहिएं। अधिक दलों के कारण प्रशासन में स्थिरता नहीं रहती है। 1967 के चुनाव के पश्चात् बिहार, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा आदि प्रान्तों में सरकारों के गिरने और बनने का पता भी नहीं चलता था। अतः संसदीय प्रजातन्त्र की कामयाबी के लिए दलों की संख्या को कम करना अनिवार्य है। संसदीय प्रजातन्त्रीय की सफलता की लिए जनता पार्टी का निर्माण एक महत्त्वपूर्ण कदम था। परन्तु जनता पार्टी का विभाजन हो गया और चरण सिंह के नेतृत्व में जनता पार्टी (स) की स्थापना हुई। चुनाव आयोग ने 7 राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता प्रदान की हुई है।

8. प्रादेशिक दल (Regional Parties)—भारतीय लोकतन्त्र की एक महत्त्वपूर्ण समस्या प्रादेशिक दलों का होना है। चुनाव आयोग ने 58 क्षेत्रीय दलों को राज्य स्तरीय दलों के रूप में मान्यता दी हुई है। प्रादेशिक दलों का महत्त्व दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है, जो प्रजातन्त्र की सफलता के लिए ठीक नहीं। प्रादेशिक दल देश के हित की न सोचकर क्षेत्रीय हितों की सोचते हैं। इससे राष्ट्रीय एकता व अखण्डता को खतरा पैदा हो गया है।

9. सिद्धान्तहीन राजनीति (Non-Principled Politics)-भारत में प्रजातन्त्र की सफलता में एक अन्य बाधा सिद्धान्तहीन राजनीति है। प्रायः सभी राजनीतिक दलों ने सिद्धान्तहीन राजनीति का अनुसरण किया है। 1967 के बाद उनके राज्यों में मिली-जुली सरकारें बनी। सत्ता के लालच में ऐसे दल मिल गए जो आदर्शों की दृष्टि से एक-दूसरे के विरोधी थे। विरोधी दलों का लक्ष्य केवल कांग्रेस को सत्ता से हटाना था। कांग्रेस ने भी प्रजातान्त्रिक परम्पराओं का उल्लंघन किया। गर्वनर के पद का दुरुपयोग किया गया। आपात्काल में तमिलनाडु की सरकार को स्पष्ट बहुमत प्राप्त होने के बावजूद भी हटा दिया गया। श्रीमती गांधी के लिए सफलता प्राप्त करना ही सबसे बड़ा लक्ष्य था चाहे इसके लिए कैसे भी साधन अपनाए गए। लोकसभा एवं विधानसभा के चुनावों के अवसर पर लगभग सभी राजनीतिक दल सिद्धान्तहीन समझौते करते हैं।

10. निम्न स्तर की राजनीतिक सहभागिता (Low level of Political Participation)-लोकतन्त्र की सफलता के लिए लोगों का राजनीति में सक्रिय भाग लेना आवश्यक है, परन्तु भारत में लोगों की राजनीतिक सहभागिता बहुत निम्न स्तर की है। अप्रैल-मई, 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनावों में लगभग 66.38% मतदाताओं ने भाग लिया। अतः लोगों की राजनीतिक उदासीनता लोकतन्त्र की समस्या है।

11. अच्छी परम्पराओं की कमी (Absence of Healthy Conventions)—प्रजातन्त्र की सफलता अच्छी परम्पराओं की स्थापना पर निर्भर करती है। इंग्लैण्ड में संसदीय शासन प्रणाली की सफलता अच्छी परम्पराओं के कारण ही है, परन्तु भारत में कांग्रेस के शासन में अच्छी परम्पराओं की स्थापना नहीं हो पाई है। इसके लिए विरोधी दल भी जिम्मेवार हैं।

12. अध्यादेशों द्वारा शासन (Administration by Ordinance)-संविधान के अनुच्छेद 123 के अनुसार राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति दी गई है। संविधान निर्माताओं का यह उद्देश्य था कि जब संसद् का अधिवेशन न हो रहा हो या असाधारण स्थिति उत्पन्न हो गई तो उस समय राष्ट्रपति इस शक्ति का प्रयोग करेगा। विशेषकर पिछले 20 वर्षों में कई बार अध्यादेश उस समय जारी किए गए जब संसद् का अधिवेशन एक-दो दिन में होने वाला होता है। आन्तरिक आपात्काल की स्थिति में तो ऐसा लगता है जैसे भारत सरकार अध्यादेशों द्वारा ही शासन चला रही है। अधिक अध्यादेशों से संसद् की शक्ति का ह्रास होता है। इसीलिए 25 जनवरी, 2015 को राष्ट्र के नाम दिए, अपने सम्बोधन में राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी ने अध्यादेशों को लागू करने पर अपनी चिन्ता जताई।

13. जनता के साथ कम सम्पर्क (Less Contract with the Masses) भारतीय प्रजातन्त्र का एक अन्य महत्त्वपूर्ण दोष यह है कि विधायक जनता के साथ सम्पर्क नहीं बनाए रखते हैं। कांग्रेस दल भी चुनाव के समय ही जनता के सम्पर्क में आता है और अन्य दलों की तरह चुनाव के पश्चात् अन्धकार में छिप जाता है। जनता को अपने विधायकों की कार्यविधियों का ज्ञान ही नहीं होता।

14. दल बदल (Defection)-भारतीय प्रजातन्त्र की सफलता में एक अन्य बाधा दल बदल की बुराई है। चौथे आम
चुनाव के पश्चात् दल बदल चरम सीमा पर पहुंच गया। मार्च, 1967 से दिसम्बर, 1970 तक 4000 विधायकों में से 1400 विधायकों ने दल बदले। सबसे अधिक दल-बदल कांग्रेस में हुआ। दल-बदल प्रजातन्त्र के लिए बहुत हानिकारक है क्योंकि इसमें से राजनीतिक अस्थिरता आती है और छोटे-छोटे दलों की स्थापना होती है। इससे जनता का अपने प्रतिनिधियों और नेताओं से विश्वास उठने लगता है।

15. विधायकों का निम्न स्तर (Poor Quality of Legislators)-भारतीय लोकतन्त्र की एक महत्त्वपूर्ण समस्या विधायकों का निम्न स्तर है। भारत के अधिकांश मतदाता अशिक्षित और साधारण बुद्धि वाले हैं, जिस कारण वे निम्न स्तर के विधायकों को चुन लेते हैं। अधिकांश विधायक स्वार्थी, हठधर्मी, बेइमान और रूढ़िवादी होते हैं। इसलिए ऐसे विधायकों को अपने कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्व का अहसास नहीं होता। विधानमण्डल में सदस्यों का गाली-गलौच करना, मार-पीट करना, धरना देना, अध्यक्ष का आदेश न मानना इत्यादि सब विधायकों के घटिया स्तर के कारण होता है।

16. विधायकों में अनुशासन की कमी (Lack of Discipline among the Legislators)-भारतीय लोकतन्त्र की एक महत्त्वपूर्ण समस्या विधायकों में बढ़ती हुई अनुशासनहीनता है। विधानसभाओं में और संसद् में हाथापाई तथा मारपीट भी बढ़ती जा रही है।

17. चरित्र का अभाव (Lack of Character)—प्रजातन्त्र की सफलता के लिए मतदाता, शासक तथा आदर्श नागरिकों का चरित्र ऊंचा होना अनिवार्य है। परन्तु भारतीय जनता का तो कहना ही क्या, हमारे विधायक तथा राजनीतिक दलों के चरित्र का वर्णन करते हुए भी शर्म आती है। विधायक मन्त्री पद के पीछे दौड़ रहे हैं। जनता तथा देश के हित में न सोच कर विधायक अपने स्वार्थ के लिए नैतिकता के नियमों का दिन-दिहाड़े मज़ाक उड़ा रहे हैं।

18. दोषपूर्ण निर्वाचन प्रणाली (Defective Electoral System)-भारतीय लोकतन्त्र की एक महत्त्वपूर्ण समस्या चुनाव प्रणाली का दोषपूर्ण होना है। भारत में प्रादेशिक प्रतिनिधित्व चुनाव प्रणाली को अपनाया गया है। लोकसभा राज्य विधानसभाओं के सदस्य एक सदस्यीय चुनाव क्षेत्र से चुने जाते हैं, जिसके अन्तर्गत एक चुनाव क्षेत्र में अधिकतम मत प्राप्त करने वाला उम्मीदवार विजयी घोषित किया जाता है। इस प्रणाली के अन्तर्गत कई बार चुनाव जीतने वाले उम्मीदवार को हारने वाले उम्मीदवारों से कम मत प्राप्त होते हैं।

19. जातिवाद की राजनीति (Politics of Casteism) भारत में न केवल जातिवाद उस रूप में विद्यमान है जिसे सामान्यतः जातिवाद कहा जाता है बल्कि इस रूप में भी कि ऊंची जातियां अब भी यह मानती हैं कि देश का शासन केवल ब्राह्मणों के हाथ में ही रहना चाहिए।” यदि चौधरी चरण सिंह ने मध्य जातियों की जातीय भावना का इस्तेमाल किया और श्रीमती गांधी ने ब्राह्मणों के स्वार्थ और अल्पसंख्यकों के भय से लाभ उठाया, वहीं जनता पार्टी ने भी हरिजन और अन्य कई जातियों को धुरी बनाने के कोशिश की। न केवल पार्टियां उम्मीदवारों का चयन जाति के आधार पर करती हैं बल्कि उम्मीदवारों से भी यह उम्मीद की जाती है कि चुने जाने के बाद अपनी जाति के लोगों के काम निकलवाएंगे। राजनीति ने मरती हुई जात-पात व्यवस्था में नई जान फूंकी है और समाज में जातिवाद का जहर घोला है। जातिवाद पर आधारित भारतीय राजनीति लोकतन्त्र के लिए खतरा है।

20. साम्प्रदायिक राजनीति (Communal Politics)-स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व प्रति वर्ष देश के किसी-न-किसी भाग में साम्प्रदायिक संघर्ष होते रहते थे। मुस्लिम लीग की मांग पर ही पाकिस्तान का निर्माण हुआ था। आज़ादी के बाद विदेशी शासक तो चले गए परन्तु साम्प्रदायिकता की राजनीति आज भी समाप्त नहीं हुई है। वास्तव में लोकतन्त्रीय प्रणाली तथा वोटों को राजनीति ने साम्प्रदायिकता को एक नया रूप दिया है। भारतीय राजनीति में ऐसे तत्त्वों की कमी नहीं है जो साम्प्रदायिक भावनाएं उभार कर मत पेटी की लड़ाई जीतना चाहते हैं।

21. क्षेत्रीय असन्तुलन (Regional Imbalances)-भारत एक विशाल देश है। भारत में विभिन्न धर्मों, जातियों व भाषाओं के लोग रहते हैं। देश के कई प्रदेश एवं क्षेत्र विकसित हैं जबकि कई क्षेत्र अविकसित हैं। हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों, बिहार, असम व नागालैण्ड की जनजातियों तथा आन्ध्र प्रदेश, बिहार, मध्य प्रेदश और उड़ीसा के आदिवासी क्षेत्रों का जीवन-स्तर बहुत नीचा है। क्षेत्रीय भावना और क्षेत्रीय असन्तुलन लोकतन्त्र के लिए बड़ा भारी खतरा है।
क्षेत्रीयवाद से प्रभावित होकर अनेक राजनीतिक दलों का निर्माण हुआ है। मतदाता क्षेत्रीयवाद की भावना से प्रेरित होकर मतदान करते हैं और राष्ट्र हित की परवाह नहीं करते। क्षेत्रीयवाद ने पृथकतावाद को जन्म दिया है।

22. सामाजिक तनाव (Social Tension)-सामाजिक तनाव लोकतन्त्र की सफलता में बाधा है। सामाजिक तनाव का राजनीतिक दलों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। धर्म, प्रान्तीयता और भाषा के आधार पर काम करने वाले राजनीतिक दल केन्द्र में स्थायी सरकार बनाने में अड़चने पैदा करते हैं और राष्ट्रीय दलों से सौदेबाजी करते हैं। जातीय तनाव से ऊंच-नीच की भावना को प्रोत्साहन मिलता है। नवयुवकों में निराशा और असन्तोष बढ़ता जा रहा है जिससे उनका लोकतन्त्र में विश्वास समाप्त होता जा रहा है। आर्थिक हितों के टकराव से मिल मालिकों और मज़दूरों में तनाव बढ़ा है, जिससे उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ा है। अत: लोकतन्त्र को सफल बनाने के लिए सामाजिक तनाव को कम करना बहुत आवश्यक है।

23. चुनाव बहुत खर्चीले हैं (Elections are very Expensive)-भारत में चुनाव बहुत खर्चीले हैं। चुनाव लड़ने के लिए अपार धन की आवश्यकता होती है। केवल धनी व्यक्ति ही चुनाव लड़ सकते हैं। ग़रीब व्यक्ति चुनाव लड़ने की नहीं सोच सकता। चुनाव में खर्च निर्धारित सीमा से ही अधिक होता है। कानून के अनुसार लोकसभा के चुनाव के लिए अधिकतम खर्च सीमा 15 लाख रुपए है जबकि विधानसभा के लिए 6 लाख रुपए है, परन्तु वास्तव में लोकसभा के चुनाव के लिए कम से कम 50 लाख खर्च होता है और महत्त्वपूर्ण प्रतिष्ठा वाली सीट पर एक करोड़ से अधिक खर्च होता है। सितम्बर-अक्तूबर, 1999 के लोकसभा के चुनाव पर लगभग 845 करोड़ रुपए खर्च हुए। अप्रैल-मई, 2004 के लोकसभा के चुनाव पर लगभग 5000 करोड़ रुपये खर्च हुए जबकि अप्रैल-मई, 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनावों में लगभग 30000 करोड़ रु० खर्च हुए।

24. स्वतन्त्र और ईमानदार प्रेस की कमी (Lack of Free and Honest Press)-प्रजातन्त्र में प्रेस का बहुत ही महत्त्वपूर्ण रोल होता है और प्रेस को प्रजातन्त्र का पहरेदार कहा जाता है। प्रेस द्वारा ही जनता को सरकार की नीतियों और समस्याओं का पता चलता है। परन्तु प्रेस का स्वतन्त्र और ईमानदार होना आवश्यक है। भारत में प्रेस पूरी तरह स्वतन्त्र तथा ईमानदार नहीं है। अधिकांश प्रेसों पर पूंजीपतियों का नियन्त्रण है और महत्त्वपूर्ण दलों से सम्बन्धिते हैं। अतः प्रेस लोगों को देश की राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति की सही सूचना नहीं देते, जिसके कारण स्वस्थ जनमत का निर्माण नहीं होता।

25. हिंसा (Violence)-चुनावों में हिंसा की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं, जोकि प्रजातन्त्र की सफलता के मार्ग में एक खतरनाक बाधा भी साबित हो सकती है। दिसम्बर, 1989 में लोकसभा के चुनाव में 100 से अधिक व्यक्ति मारे गए। गुजरात में चुनाव प्रचार के दौरान एक मन्त्री पर छुरे से वार किया गया जिसकी बाद में मृत्यु हो गई। हरियाणा के भिवानी चुनाव क्षेत्र में कई कार्यकर्ता मारे गए। उत्तर प्रदेश में अमेठी विधानसभा क्षेत्र में जनता दल के उम्मीदवार डॉ० संजय सिंह को गोली मारी गई। फरवरी, 1990 में आठ राज्यों की विधान सभाओं के चुनाव में हिंसा की कई घटनाएं हुईं। मार्च, 1990 में हरियाणा में महम उप-चुनाव में हिंसा की घटनाओं के कारण चुनाव को रद्द कर दिया। मई, 1991 को लोकसभा के चुनाव में कई स्थानों पर हिंसक घटनाएं हुईं। इन हिंसक घटनाओं में 100 से अधिक व्यक्ति मारे गए और कांग्रेस (इ) अध्यक्ष श्री राजीव गांधी भी 21 मई, 1991 को बम विस्फोट में मारे गए। 1996 के लोकसभा के चुनाव में अनेक स्थानों पर हिंसक घटनाएँ हुईं। फरवरी, 1998 में 12वीं लोकसभा के चुनाव में कुछ राज्यों में हिंसा की अनेक घटनाएँ हुईं। हिंसा की सबसे अधिक घटनाएँ बिहार में हुईं जहाँ 23 व्यक्ति मारे गए। सितम्बर-अक्तूबर, 1999 में 13वीं लोक सभा के चुनाव में पंजाब, बिहार, जम्मू-कश्मीर, असम, तमिलनाडु एवं आन्ध्र प्रदेश में हिंसात्मक घटनाएँ हुईं, जिनमें लगभग 100 व्यक्ति मारे गए। अप्रैलमई, 2004, 2009 तथा 2014 में हुए 14वीं, 15वीं एवं 16वीं लोकसभा के चुनावों के दौरान भी हुई राजनीतिक हिंसा में सैंकड़ों लोग मारे गए।

प्रश्न 6. क्षेत्रवाद से क्या अभिप्राय है ? भारत में क्षेत्रवाद के क्या कारण हैं ? भारतीय लोकतन्त्र पर क्षेत्रवाद के प्रभाव की व्याख्या करो। क्षेत्रवाद की समस्या को हल करने के लिए सुझाव दें।
(What is meant by Regionalism ? What are the causes of Regionalism is India ? Discuss the impact of Regionalism on Indian Democracy. Give suggestions to solve the problem of regionalism.)
उत्तर- भारत में स्वतन्त्रता के पश्चात् राजनीति में जो नये प्रश्न उभरे हैं, उनमें क्षेत्रवाद (Regionalism) का प्रश्न एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। क्षेत्रवाद से अभिप्राय एक देश के उस छोटे से क्षेत्र से है जो आर्थिक, सामाजिक आदि कारणों से अपने पृथक् अस्तित्व के लिए जागृत है। भारत की राजनीति को क्षेत्रवाद ने बहुत अधिक प्रभावित किया है और यह भारत के लिए एक जटिल समस्या बनी रही है और आज भी विद्यमान है। आज यदि किसी व्यक्ति से पूछा जाए कि वह कौन है तो वह भारतीय कहने के स्थान पर बंगाली, बिहारी, पंजाबी, हरियाणवी आदि कहना पसन्द करेगा। यद्यपि संविधान के अन्तर्गत प्रत्येक नागरिक को भारत की ही नागरिकता दी गई है तथापि लोगों में क्षेत्रीयता व प्रान्तीयता की भावनाएं इतनी पाई जाती हैं कि वे अपने क्षेत्र के हित के लिए राष्ट्र हित को बलिदान करने के लिए तत्पर रहते हैं। 1950 से लेकर आज तक क्षेत्रवाद की समस्या भारत सरकार को घेरे हुए है और विभिन्न क्षेत्रों में आन्दोलन चलते रहते हैं।

क्षेत्रवाद को जन्म देने वाले कारण (CAUSES OF THE ORIGIN OF REGIONALISM)
क्षेत्रवाद की भावना की उत्पत्ति एक कारण से न होकर अनेक कारणों से होती है, जिनमें मुख्य निम्नलिखित हैं-

1. भौगोलिक एवं सांस्कृतिक कारण (Geographical and Cultural Causes)—स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् जब राज्यों का पुनर्गठन किया गया तब राज्यों की पुरानी सीमाओं को भुलाकर नहीं किया गया बल्कि उनके पुनर्गठन का आधार बनाया गया। इसी कारण एक राज्य के रहने वाले लोगों में एकता की भावना नहीं आ पाई। प्राय: भाषा और संस्कृति क्षेत्रवाद की भावनाओं को उत्पन्न करने में बहुमत सहयोग देते हैं। तमिलनाडु के निवासी अपनी भाषा और संस्कृति को भारतीय संस्कृति से श्रेष्ठ मानते हैं। वे राम और रामायण की कड़ी आलोचना करते हैं। 1925 में उन्होंने तमिलनाडु में कई स्थानों पर राम-लक्ष्मण के पुतले जलाए। 1960 में इसी आधार पर उन्होंने भारत से अलग होने के लिए व्यापक आन्दोलन चलाया।

2. ऐतिहासिक कारण (Historical Causes)-क्षेत्रीयवाद की उत्पत्ति में इतिहासकार का दोहरा सहयोग रहा हैसकारात्मक और नकारात्मक। सकारात्मक योगदान के अन्तर्गत शिव सेना का उदाहरण दिया जा सकता है और नकारात्मक के अन्तर्गत द्रविड़ मुनेत्र कड़गम का। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम का कहना है कि प्राचीनकाल से ही उत्तरी राज्य दक्षिण राज्यों पर शासन करते आए हैं।

3. भाषा (Languages)–नार्मर डी पामर का कहना है कि भारत की अधिकांश राजनीति क्षेत्रवाद और भाषा के बहुत से प्रश्नों के चारों ओर घूमती है। इनका विचार है कि क्षेत्रवाद की समस्याएं स्पष्ट रूप से भाषा से सम्बन्धित हैं। भारत में सदैव ही अनेक भाषाएं बोलने वालों ने कई बार राज्य के निर्माण के लिए व्यापक आन्दोलन किए हैं। भारत सरकार ने भाषा के आधार पर राज्यों का गठन करके ऐसी समस्या उत्पन्न कर दी है जिसका अन्तिम समाधान निकालना बड़ा कठिन है।

4. जाति (Caste)—जाति ने भी क्षेत्रीयवाद की उत्पत्ति में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। जिन क्षेत्रों में किसी एक जाति की प्रधानता रही, वहीं पर क्षेत्रवाद का उग्र रूप देखने को मिला। जहां किसी एक जाति की प्रधानता नहीं रही वहां पर एक जाति ने दूसरी जाति को रोके रखा है और क्षेत्रीयता की भावना इतनी नहीं उभरी। यही कारण है कि महाराष्ट्र और हरियाणा में क्षेत्रवाद का उग्र स्वरूप देखने को मिलता है जबकि उत्तर प्रदेश में नहीं मिलता है।

5. धार्मिक कारण (Religious Causes)-धर्म भी कई बार क्षेत्रवाद की भावनाओं को बढ़ाने में सहायता करता है। पंजाब में अकालियों की पंजाबी सूबा की मांग कुछ हद तक धर्म के प्रभाव का परिणाम थी।

6. आर्थिक कारण (Economic Causes) क्षेत्रीयवाद की उत्पत्ति में आर्थिक कारण महत्त्वपूर्ण रोल अदा करते हैं। भारत में जो थोड़ा बहुत आर्थिक विकास हुआ है उसमें बहुत असमानता रही है। कुछ प्रदेशों का आर्थिक विकास हुआ है और कुछ क्षेत्रों का विकास बहुत कम हुआ है। इसका कारण यह रहा है कि जिन व्यक्तियों के हाथों में सत्ता रही है उन्होंने अपने क्षेत्रों के विकास की ओर अधिक ध्यान दिया। उदाहरणस्वरूप 1966 से पूर्व पंजाब में सत्ता पंजाबियों के हाथों में रही जिस कारण हिसार, गुड़गांव, महेन्द्रगढ़, जीन्द आदि क्षेत्रों का विकास न हो पाया। आन्ध्र प्रदेश में सत्ता मुख्य रूप से आन्ध्र के नेताओं के पास रही जिस कारण तेलंगाना पिछड़ा रह गया। उत्तर प्रदेश में पूर्वी उत्तर प्रदेश पिछड़ा रह गया। राजस्थान में पूर्वी राजस्थान अविकसित रहं गया और इसी प्रकार महाराष्ट्र में विदर्भ का विकास नहीं हो पाया। अतः पिछले क्षेत्रों में यह भावना उभरी कि यदि सत्ता उनके पास होती तो उनके क्षेत्र पिछड़े न रह जाते। इसलिए इन क्षेत्रों के लोगों में क्षेत्रवाद की भावना उभरी और उन्होंने अलग राज्यों की मांग की। इसीलिए आगे चलकर सन् 1966 में हरियाणा एवं 2014 में तेलंगाना नाम के दो अलग राज्य भी बन गए।

7. राजनीतिक कारण (Political Causes)-क्षेत्रवाद की भावनाओं को भड़काने में राजनीतिज्ञों का भी हाथ रहा है। कई राजनीतिक यह सोचते हैं कि यदि उनके क्षेत्र को अलग राज्य बना दिया जाएगा तो उनकी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति हो जाएगी अर्थात् उनके हाथ में सत्ता आ जाएगी।
रजनी कोठारी ने क्षेत्रवाद की उत्पत्ति के सम्बन्ध में लिखा है, “पृथक्कता की भावना उनमें अधिक शक्तिशाली और खतरनाक है, जहां ऐसी आर्येतर जातियां हैं जो भारतीय संस्कृति की धारा में पूर्ण रूप में मिल नहीं पाई हैं जैसे उत्तर-पूर्व की आदिम जातियों का क्षेत्र है। यहां भी भारतीय लोकतन्त्रीय व्यवस्था और सरकारी विकास कार्यक्रमों का प्रभाव पड़ा है और धीरे-धीरे इन क्षेत्रों के लोग भी देश की राजनीति में भाग लेने लगे हैं। पर राजनीतिकरण की यह प्रवृत्ति अभी शुरू हुई है। दूसरी ओर आधुनिकता के प्रसार से अपने पृथक् अस्तित्व की भावना भी उभरती है। इसलिए इनको सम्भालने के लिए विशेष व्यवस्था करनी पड़ती है-राजनीतिक गतिविधि बढ़ने और शिक्षा तथा आर्थिक विकास के फलस्वरूप छोटे समूहों में अब तक दबे या पिछड़े हुए समूह थे, अधिकारी और स्वायत्तता की आकांक्षाओं का उठना स्वाभाविक है।”

क्षेत्रवाद का राजनीति में योगदान (ROLE OF REGIONALISM IN POLITICS)
राजनीति में क्षेत्रीयवाद के योगदान को इस प्रकार सिद्ध किया जा सकता है-

  • क्षेत्रवाद के आधार पर राज्य केन्द्रीय सरकार में सौदेबाज़ी करती है। यह सौदेबाजी न केवल आर्थिक विकास के लिए होती है बल्कि कई महत्त्वपूर्ण समस्याओं के समाधान के लिए भी होती है। इस प्रकार के दबावों से हरियाणा राज्य का निर्माण हुआ।
  • राजनीतिक दल अपनी स्थिति को मजबूत बनाने के लिए क्षेत्रवाद का सहारा लेता है। पंजाब में अकाली दल ने और तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम दल ने अपने आपको शक्तिशाली बनाने के लिए क्षेत्रवाद का सहारा लिया।
  • मन्त्रिपरिषद् के सदस्य अपने-अपने क्षेत्रों का अधिक विकास करते हैं ताकि अपनी सीट को पक्का किया जा सके। श्री बंसीलाल ने भिवानी के क्षेत्र को चमका दिया और श्री सुखाड़िया ने उदयपुर क्षेत्र का बहुत अधिक विकास किया।
  • चुनावों के समय भी क्षेत्रवाद का सहारा लिया जाता है। क्षेत्रीयता के आधार पर राजनीतिक दल उम्मीदवारों का चुनाव करते हैं और क्षेत्रीयता की भावनाओं को भड़कार कर वोट प्राप्त करने की चेष्टा की जाती है।
  • क्षेत्रवाद ने कुछ हद तक भारतीय राजनीति में हिंसक गतिविधियों को उभारा है। कुछ राजनीतिक दल इसे अपनी लोकप्रियता का साधन बना लेते हैं।
  • मन्त्रिमण्डल का निर्माण करते समय क्षेत्रवाद की प्रवृत्ति स्पष्ट रूप में देखने को मिलती है। मन्त्रिमण्डल में प्रायः सभी मुख्य क्षेत्रों के प्रतिनिधियों को लिया जाता है। साधारणतया यह शिकायत की जाती थी कि अब तक कोई प्रधानमन्त्री दक्षिणी राज्यों से नहीं बना। प्रधानमन्त्री को अपने मन्त्रिमण्डल में प्रत्येक को उसके महत्त्व के आधार पर प्रतिनिधित्व देना पड़ता है। प्रधानमन्त्री व्यक्ति चुनने में स्वतन्त्र है, परन्तु क्षेत्र चुनने में नहीं।

क्षेत्रवाद की समस्या का समाधान (SOLUTION OF THE PROBLEM OF REGIONALISM)-

क्षेत्रवाद राजनीति की आधुनिक शैली है। क्षेत्रवाद उस समय तक कोई जटिल समस्या उत्पन्न नहीं करता जब तक वह सीमा के अन्दर रहता है, परन्तु जब वह भावना उग्र रूप धारण कर लेती है तब राष्ट्रीय एकता खतरे में पड़ जाती है।

सेलिग एस० हेरीसन ने इस सम्बन्ध में कहा, “यदि क्षेत्रवाद की भावना या किसी विशेष क्षेत्र के लिए अधिकार या स्वायत्तता की मांग बढ़ती चली गई तो इससे या तो देश अनेक छोटे-छोटे स्वतन्त्र राज्यों में बंट जाएगा या तानाशाही कायम हो जाएगी।” अतः क्षेत्रवाद की समस्या को सुलझाना अति आवश्यक है। कुछ विद्वानों ने क्षेत्रवाद की समस्या को सुलझाने के लिए राज्यों के पुनर्गठन की बात कही है। रजनी कोठारी का कहना है कि राज्यों को पुनर्गठित करते समय भाषा को ही एकमात्र आधार न माना जाए। राज्य की रचना के लिए भाषा के अतिरिक्त और भी कई सिद्धान्त हैं जैसे कि आकार, विकास की स्थिति, शासन की सुविधाएं, सामाजिक एकता तथा राजनीतिक व्यावहारिकता। मुम्बई, कोलकाता जैसे महानगर क्षेत्रों में शासन और विकास की स्वायत्त संस्थाएं कायम करने और इनको राज्य के अंश से अलग साधन देने की ओर भी ध्यान नहीं दिया गया है यद्यपि इन नगरों का साइज (आकार) और समस्याएं दिन प्रतिदिन विकट होती जा रही हैं । साधारणतया राज्यों के पुनर्गठन के समर्थक तीन तर्क देते हैं-

  • छोटे-छोटे राज्यों के निर्माण से अधिक उत्तरदायी शासन की स्थापना होगी। प्रशासन और जनता में समीप का सम्पर्क स्थापित होगा और शासन में कार्यकुशलता आ जाएगी।
  • छोटे-छोटे राज्यों से उस क्षेत्र का आर्थिक विकास अधिक होगा। (3) यदि पहले ही राज्य पुनर्गठन आयोग की बातों को मान लिया जाता है तो अलग राज्यों की स्थापना के लिए जो आन्दोलन हुए हैं वे भी न होते।

इन तीनों तर्कों का आलोचनात्मक उत्तर इस प्रकार दिया जा सकता है-

(1) यह अनिवार्य नहीं है कि छोटे राज्यों में ही जनता और प्रशासन में समीप का सम्पर्क स्थापित हो। यह तो इस बात पर निर्भर करता है कि सरकार इस ओर कितना ध्यान देती है। एक बड़े राज्य में यदि प्रशासक चाहें तो जनता से सम्पर्क बनाए रख सकते हैं। इसके अतिरिक्त एक अच्छी सरकार के लिए केवल सम्पर्क स्थापित करना इतना ज़रूरी नहीं होता जितना कि भ्रष्टाचारी को खत्म करना और जनता की भलाई के लिए अधिक-से-अधिक कार्य करना। छोटे-छोटे राज्यों में नियुक्तियां सिफ़ारिशों पर की जाती हैं क्योंकि आम व्यक्ति भी आसानी के साथ रिश्तेदारी निकाल लेता है। इससे प्रशासन में कार्यकुशलता नहीं रहती।

(2) यह कहना कि छोटे राज्यों के कारण आर्थिक विकास अधिक होता है, ठीक प्रतीत नहीं होता है। सारे देश की प्रगति का सम्बन्ध सभी राज्यों की उन्नति से जुड़ा होता है। अतः समस्त देश की उन्नति द्वारा ही राज्यों की प्रगति की जा सकती है न कि राज्यों को टुकड़ों में बांटने से। पिछड़े प्रदेशों की उन्नति करना केन्द्रीय सरकार की जिम्मेवारी है।

(3) यह कहना कि यदि राज्य पुनर्गठन आयोग की सभी सिफ़ारिशों को मान लिया जाता है तो अनेक आन्दोलन न होते, सही प्रतीत नहीं होता है। यदि राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के अनुसार कुछ प्रदेशों को राज्य बना दिया जाता तो हो सकता था अन्य प्रदेश आन्दोलन कर देते।
संक्षेप में, क्षेत्रवाद की समस्या का हल छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना नहीं है बल्कि पिछड़े क्षेत्रों का आर्थिक विकास, भ्रष्टाचार को समाप्त करना, जनता के कल्याण के लिए अधिक कार्य करना इत्यादि।

प्रश्न 7. भारतीय राजनीति में जातिवाद की भूमिका का उल्लेख करो।
(Describe the role of Casteism in Indian Politics.)
अथवा
भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था को जातिवाद ने किस प्रकार प्रभावित किया है ?
(How has Casteism affected the Indian democratic system ?)
उत्तर-भारतीय राजनीति में जाति एक महत्त्वपूर्ण तथा निर्णायक तत्त्व रहा है और आज भी है। स्वतन्त्रता से पूर्व भी राजनीति में जाति का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा था। स्वतन्त्रता के पश्चात् जाति का प्रभाव कम होने की अपेक्षा बढ़ा ही है जो राष्ट्रीय एकता के लिए घातक है। जातिवाद तथा साम्प्रदायिकता के बीज तो ब्रिटिश शासन में साम्प्रदायिक निर्वाचन क्षेत्रों की मांग को स्वीकार करके ही बो दिए थे। 1909 के एक्ट के द्वारा ब्रिटिश सरकार ने मुसलमानों को अपने प्रतिनिधि अलग चुनने का अधिकार दिया और फिर भारत की बहुत-सी जातियों ने इसी प्रकार अलग प्रतिनिधित्व की मांग की। महात्मा गान्धी जब दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में भाग ले रहे थे तो उन्होंने देखा कि भारत से आए विभिन्न जातियों के प्रतिनिधि अपनी जातियों के लिए ही सुविधाएं मांग रहे थे और राष्ट्रीय हित की बात कोई नहीं कर रहा था। इसी निराशा में वे वापस लौट आये। अंग्रेज़ों ने जातिवाद को दिल खोल कर बढ़ावा दिया। स्वतन्त्रता के पश्चात् कांग्रेस सरकार ने ब्रिटिश नीति का अनुसरण करके जातिवाद की भावना को बढ़ावा दिया है।

पिछड़े वर्गों को विशेष सुविधाएं देकर कांग्रेस सरकार ने उसका एक अलग वर्ग बना दिया है। राजनीति के क्षेत्र में नहीं बल्कि सामाजिक, शैक्षणिक तथा अन्य क्षेत्रों में भी जातिवाद का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। प्रो० वी० के० एन० मेनन (V. K. N. Menon) का यह निष्कर्ष ठीक है कि स्वतन्त्रता के पश्चात् राजनीतिक क्षेत्र में जाति का प्रभाव पहले के अपेक्षा बढ़ा है। राजनीतिज्ञों, प्रशासनाधिकारियों तथा विद्वानों ने स्वीकार किया है कि जाति का प्रभाव कम होने की अपेक्षा, दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। प्रो० मोरिस जोन्स (Morris Jones) ने अपनी खोज के आधार पर कहा है कि “राजनीति जाति से अधिक महत्त्वपूर्ण है और जाति पहले से राजनीति से अधिक महत्त्वपूर्ण है। शीर्षस्थ नेता भले ही जाति-रहित समाज के उद्देश्य की पालना करें, परन्तु वह ग्रामीण जनता जिसे मताधिकार प्राप्त किए हुए अधिक दिन नहीं हुए हैं, केवल परम्परागत राजनीति की ही भाषा को समझती है जो जाति के चारों ओर घूमती है और न जाति शहरी सीमाओं से परे हैं।” स्व० जय प्रकाश नारायण ने एक बार कहा था, “भारत में जाति सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक दल है। जगदीश चन्द्र जौहरी ने तो यहां तक कहा है कि, “यदि मनुष्य राजनीति के संसार में ऊपर चढ़ना चाहते हैं तो उन्हें अपने साथ अपनी जाति व धर्म को लेकर चलना चाहिए।”

भारतीय राजनीति अथवा लोकतन्त्र में जाति की भूमिका (ROLE OF CASTE IN INDIAN POLITICS OR DEMOCRACY)

स्वतन्त्रता के पश्चात् जाति का प्रभाव कहीं अधिक बढ़ा है। आज भारत के प्राय: सभी राज्यों में जाति का राजनीति पर बहुत गहरा प्रभाव है। प्रो० मोरिस जोन्स ने ठीक ही लिखा है कि चाहे देश के बड़े-बड़े नेता जाति-रहित समाज का नारा बुलन्द करते रहे परन्तु ग्रामीण समाज के नए मतदाता केवल परम्परागत राजनीति की भाषा को ही जानते हैं। परम्परागत राजनीति की भाषा जाति के ही चारों तरफ चक्कर लगाती है। रजनी कोठारी ने भी ऐसा ही मत प्रकट करते हुए कहा है कि यदि जाति के प्रभाव को अस्वीकार किया जाता है और उसकी उपेक्षा की जाती तो राजनीतिक संगठन में बाधा पड़ती है।

1. जातिवाद के आधार पर उम्मीदवारों का चयन (Selection of Candidates on the basis of Caste)चुनाव के समय उम्मीदवारों का चयन (Selection) करते समय जातिवाद भी अन्य आधारों में से एक महत्त्वपूर्ण आधार होता है। (”Caste considerations are given great weight in the selection of candidates and in the appeals to voters during election campaigns.” — Palmar) पिछले 16 आम चुनावों में सभी राजनीतिक दलों ने अपने-अपने उम्मीदवारों का चयन करते समय जातिवाद को प्रमुख बना दिया है। प्रायः जिस निर्वाचन क्षेत्र में जिस जाति के मतदाता अधिक होते हैं, उसी जाति का उम्मीदवार खड़ा किया जाता है। क्योंकि भारतीय जनता का बड़ा भाग भी अनपढ़ है और पढ़े-लिखे लोगों का दृष्टिकोण भी इंतना व्यापक नहीं है कि जाति के दायरे को छोड़ कर देश के हित में सोच सकें।

2. राजनीतिक नेतृत्व (Political Leadership)-भारतीय राजनीति में जातिवाद ने राजनीतिक नेतृत्व को भी प्रभावित किया है। नेताओं का उत्थान तथा पतन जाति के कारण हुआ है। जाति के समर्थन पर अनेक नेता स्थायी तौर पर अपना महत्त्व बनाए हुए हैं। उदाहरण के लिए हरियाणा में राव वीरेन्द्र सिंह अहीर जाति के समर्थन के कारण बहुत समय से नेता चले आ रहे हैं।

3. राजनीतिक दल (Political Parties)-भारत में राष्ट्रीय दल चाहे प्रत्यक्ष तौर पर जाति का समर्थन न करते हों परन्तु क्षेत्रीय दल खुले तौर पर जाति का समर्थन करते हैं और कई क्षेत्रीय दल जाति पर आधारित हैं। उदाहरण के लिए तमिलनाडु में डी० एम० के० (D.M.K.) तथा अन्ना डी० एम० के० (A.D.M.K.) ब्राह्मण विरोधी या गैर-ब्राह्मणों के दल

4. चुनाव-प्रचार में जाति का.योगदान (Contribution of Caste in Election Propaganda)-कुछ लोगों का कहना है कि चुनाव-प्रचार में जाति का महत्त्वपूर्ण हाथ है। उम्मीदवार का जीतना या हारना काफ़ी हद तक जाति पर आधारित प्रचार पर निर्भर करता है। जिस जाति का बहुमत उस चुनाव क्षेत्र में होता है प्रायः उसी जाति का उम्मीदवार चुनाव में जीत जाता है। अब तो मठों के स्वामी भी चुनाव में भाग लेने लगे हैं।

5. जाति एवं प्रशासन (Caste and Administration)—प्रशासन में भी जातीयता का समावेश हो गया है। संविधान में हरिजनों और पिछड़ी जातियों के लोगों के लिए संसद् तथा राज्य विधानमण्डल में स्थान सुरक्षित रखे गए हैं। सरकारी नौकरियों में भी इनके लिए स्थान सुरक्षित रखे जाते हैं। संविधान के इन अनुच्छेदों के कारण सब जातियों में इन जातियों के प्रति ईर्ष्या की भावना का पैदा होना स्वाभाविक है। कर्नाटक राज्य ने पहले सरकारी नौकरियों में जितने व्यक्ति लिए इनमें लगभग 80 प्रतिशत हरिजन थे जिस कारण जातीय भावना और दृढ़ हो गई। सन् 1962 में सुप्रीम कोर्ट ने नौकरियों में इस प्रकार के जातीय पक्षपात की निन्दा की और इसे संविधान के साथ धोखा कहा।

6. सरकार निर्माण में जाति का प्रभाव (Influence of Caste at the time of Formation of Govt.)जाति की राजनीति चुनाव के साथ ही समाप्त नहीं हो जाती बल्कि सरकार निर्माण में भी बहुत महत्त्वपूर्ण रोल अदा करती है। मन्त्रिमण्डल बनाते समय बहुमत दल में जाति-राजनीति अपना चक्कर चलाए बिना नहीं रहती। राज्य में जिस जाति का ज़ोर होता है उसी जाति का कोई नेता ही मुख्यमन्त्री के रूप में सफल हो सकता है। पंजाब में 2007 एवं 2012 में जब अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी तो सरदार प्रकाश सिंह बादल मुख्यमन्त्री बने।

7. जाति और मतदान व्यवहार (Caste and Voting Behaviour)-चुनाव के समय मतदाता प्रायः जाति के आधार पर मतदान करते हैं । वयस्क मताधिकार ने जातियों को चुनावों को प्रभावित करने के अधिक अवसर प्रदान किए हैं। प्रत्येक जाति अपनी संख्या के आधार पर अपना महत्त्व समझने लगी है। जिसके जितने अधिक मत होते हैं, उसका महत्त्व भी उतना अधिक होता है।

8. पंचायती राज तथा जातिवाद (Panchayati Raj and Casteism)-स्वतन्त्रता के पश्चात् गांवों में पंचायती राज की व्यवस्था की गई। पंचायती राज के तीन स्तरों-पंचायत, पंचायत समिति तथा जिला परिषद् चुनाव में जाति का बहुत महत्त्व है। कई बार चुनाव में जातिवाद की भावना भयानक रूप धारण कर लेती है तथा दंगे-फसाद भी हो जाते हैं। पंचायती राज की असफलता का एक महत्त्वपूर्ण कारण जातिवाद ही है।

श्री हरिसन ने अपनी पुस्तक ‘India, The Most Dangerous Decades’ में भारत के आम चुनावों में जातीय व्यवहार के महत्त्व के सम्बन्ध में लिखा है, “निरपवाद रूप में जब जातीय कारक किसी जातीय विधानसभायी क्षेत्र में प्रकाश में आते हैं जो जटिल से जटिल चुनाव के अप्रत्याशित परिणाम स्पष्ट हो जाते हैं।”

(“Invariably, the most perplexing of election results become crystal clear when the caste factors in the constituency come to light.”_Harrison) उसके विचारानुसार, “चुनावों में जातीय निष्ठा, दलीय भावनाओं तथा दल की विचारधारा से पहले है।”
राजनीति का जातीय भावना से इतना अधिक प्रभावित होना राष्ट्रीय एकता के लिए खतरनाक है। भारत में लोकतन्त्र को सफल बनाने के लिए चुनावों में जातिवाद के आधार को समाप्त करना होगा। इस आधार को समाप्त करने के लिए निम्नलिखित उपाय हैं-

  • जातियों के नाम से चल रही सभी शिक्षा-संस्थाओं से जातियों का नाम हटाया जाए तथा इन संस्थाओं के प्रबन्धक-मण्डलों में विशिष्ट जातियों के प्रतिनिधित्व को समाप्त किया जाए।
  • सभी लोकतान्त्रिक, जाति-निरपेक्ष और धर्म-निरपेक्ष राजनीतिक दलों को मिलकर यह निश्चय करना चाहिए कि वे जातिवाद को प्रोत्साहन नहीं देंगे।
  • जाति पर आधारित राजनीतिक दलों को समाप्त किया जाना चाहिए।
  • विभिन्न जातियों तथा वर्गों द्वारा प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं तथा उन के प्रकाशित होने वाले ऐसे समाचारों पर प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए जो जातिवाद को बढ़ावा देते हैं।
  • जातीय अथवा वर्गीय आधार पर सरकार द्वारा दी जाने वाली सभी सुविधाएं तुरन्त समाप्त कर दी जानी चाहिए।

प्रश्न 8. भारत में बढ़ते हुए साम्प्रदायवाद के पीछे क्या कारण हैं ? इन पर कैसे काबू पाया जा सकता है ? (What are the causes of rising communalism in India ? How can we curb it.)
उत्तर-विदेशी शासन ने साम्प्रदायिकता का जो ज़हर भारतीय जन-मानस में घोला वह आज़ादी के इतने वर्ष बाद भी निकल नहीं पाया है। भारत में राजनीति को साम्प्रदायिक आधार देकर राष्ट्र में अराजकता की स्थिति पैदा करने की कोशिशें की जा रही हैं। साम्प्रदायिकता के खूनी पंजे राष्ट्र को जकड़ते जा रहे हैं और हम सब तमाशबीन बने खड़े हुए हैं। लोकतन्त्र धर्म-निरपेक्षता और समाजवाद के सिद्धान्तों को स्वीकार करने के बाद भी साम्प्रदायिकता की जड़ें मज़बूत होती जा रही हैं।

साम्प्रदायिकता का अर्थ (Meaning of Communalism)-साम्प्रदायिकता से अभिप्राय है धर्म अथवा जाति के आधार पर एक -दूसरे के विरुद्ध भेदभाव की भावना रखना, एक धार्मिक समुदाय को दूसरे समुदायों और राष्ट्र के विरुद्ध उपयोग करना साम्प्रदायिकता है।
ए० एच० मेरियम (A.H. Merriam) के अनुसार, “साम्प्रदायिकता अपने समुदाय के प्रति वफादारी की अभिवृत्ति की ओर संकेत करती है जिसका अर्थ भारत में हिन्दुत्व या इस्लाम के प्रति पूरी वफादारी रखना है।”
डॉ० ई० स्मिथ (Dr. E. Smith) के अनुसार, “साम्प्रदायिकता को आमतौर पर किसी धार्मिक ग्रुप के तंग, स्वार्थी, विभाजकता और आक्रमणशील दृष्टिकोण से जोड़ा जाता है।”

भारत में साम्प्रदायिकता के विकास के कारण (Causes of the growth of Communalism in India)भारत में बढ़ते हुए सम्प्रदायवाद के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं

1. पाकिस्तान की भूमिका (Role of Pakistan)—भारत के दोनों तरफ पाकिस्तान का अस्तित्व भी महत्त्वपूर्ण तत्त्व है जो इस देश में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देता है। जब कभी भी कोई दंगा-फसाद हुआ है, पाकिस्तानी नेताओं ने, रेडियो और समाचार-पत्रों ने वास्तविकता जाने बिना ही हिन्दुओं की मुसलमानों पर अत्याचार की कहानियां बनाई हैं। पिछले कुछ वर्षों से पाकिस्तान उग्रवादियों को हथियारों तथा धन से सहायता दे रहा है ताकि भारत में साम्प्रदायिक दंगे करवाए जा सकें।

2. विभिन्न धर्मों के लोगों में एक-दूसरे के प्रति अविश्वास (Lack of faith among the People of different religions)-भारत में हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, पारसी इत्यादि अनेक धर्मों के लोग रहते हैं। प्रत्येक धर्म में अनेक सम्प्रदाय पाए जाते हैं। एक धर्म के लोगों को दूसरे धर्म के लोगों पर विश्वास नहीं है। अविश्वास की भावना साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देती है।

3. साम्प्रदायिक दल (Communal Parties)—साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने में साम्प्रदायिक दलों का महत्त्वपूर्ण हाथ है। भारत में अनेक साम्प्रदायिक दल पाए जाते हैं। इन दलों की राजनीति धर्म के इर्द-गिर्द ही घूमती है। भूतपूर्व प्रधानमन्त्री मोरारजी देसाई का कहना है कि यह दुर्भाग्य की बात है कि चुनावी सफलता के लिए सभी पार्टियां साम्प्रदायिक दलों से सम्बन्ध बनाए हुए हैं।

4. राजनीति और धर्म (Politics and Religion)-साम्प्रदायिकता का एक महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि राजनीति में धर्म घुसा हुआ है। धार्मिक स्थानों का इस्तेमाल राजनीति के लिए किया जाता है।

5. सरकार की उदासीनता (Government’s Apathy)—साम्प्रदायिकता का एक महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि संघीय और राज्यों की सरकारों ने दृढ़ता से इस समस्या को हल करने का प्रयास नहीं किया है। कभी भी इस समस्या की विवेचना गम्भीरता से नहीं की गई और जब भी दंगे-फसाद हुए हैं तभी कांग्रेस सरकार ने विरोधी दलों पर दंगेफसाद कराने का दोष लगाया है।

6. साम्प्रदायिक शिक्षा (Communal Education)-कई प्राइवेट स्कूल तथा कॉलेजों में धर्म-शिक्षा के नाम पर साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया जाता है।

7. पारिवारिक वातावरण (Family Environment)-कई घरों में साम्प्रदायिकता की बातें होती रहती हैं जिनका बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ता है और बड़े होकर वे साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देते हैं।

साम्प्रदायिकता को कैसे समाप्त किया जा सकता है? (HOW COMMUNALISM CAN BE CURBED ?).

एकता और उन्नति के लिए साम्प्रदायिकता को समाप्त करना अति आवश्यक है। साम्प्रदायिकता एक ऐसी चुनौती है जिसका स्थायी हल आवश्यक है। साम्प्रदायिकता को समाप्त करने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जाते हैं-

1. शिक्षा द्वारा (By Education)-साम्प्रदायिकता को दूर करने का सबसे अच्छा साधन शिक्षा का प्रसार है। जैसे-जैसे शिक्षित व्यक्तियों की संख्या बढ़ती जाएगी, धर्म का प्रभाव भी कम हो जाएगा और साम्प्रदायिकता की बीमारी भी दूर हो जाएगी। शिक्षा में धर्म-निरपेक्ष तत्त्वों का समावेश करने तथा स्कूलों में धार्मिक शिक्षा पर रोक लगाने से साम्प्रदायिकता पर अंकुश लगाने में काफी मदद मिल सकती है। सही शिक्षा से राष्ट्रीय भावना पैदा होती है।

2. साम्प्रदायिक दलों का अन्त करके (By abolishing Communal Parties) सरकार को ऐसे सभी दलों को समाप्त कर देना चाहिए जो साम्प्रदायिकता पर आधारित हों। चुनाव आयोग को साम्प्रदायिक पार्टियों को मान्यता नहीं देनी चाहिए।

3. धर्म और राजनीति को अलग करके-साम्प्रदायिकता को रोकने का एक महत्त्वपूर्ण उपाय यह है कि राजनीति को धर्म से अलग रखा जाए। केन्द्र सरकार ने साम्प्रदायिक मनोवृत्ति को नियन्त्रित करने के लिए धार्मिक स्थलों का राजनीतिक उपयोग कानूनी तौर से प्रतिबन्धित कर दिया है, परन्तु उसका कोई विशेष असर नहीं हुआ है।

4. सामाजिक और आर्थिक विकास-साम्प्रदायिक तत्त्व लोगों के आर्थिक पिछड़ेपन का पूरा फायदा उठाते हैं। अतः ज़रूरत इस बात की है कि जहाँ-कहीं कट्टरपंथी ताकतों का बोलबाला है वहां की ग़रीब बस्तियों के निवासियों की आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं के हल के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं।

5. सुरक्षा बलों में सभी धर्मों को प्रतिनिधित्व-साम्प्रदायिक दंगों को रोकने में सुरक्षा बल महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि सुरक्षा बलों (पुलिस, सी० आर० पी०) में सभी धर्मों व जातियों को, जहां तक हो सकें समान प्रतिनिधित्व देना चाहिए।

6. अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा-सरकार को अल्प-संख्यकों के हितों की रक्षा के लिए विशेष कदम उठाने चाहिए और उनमें सुरक्षा की भावना पैदा करनी चाहिए।

7. अल्पसंख्यक आयोग को संवैधानिक मान्यता-अल्पसंख्यकों की समस्याओं के समाधान के लिए स्थायी तौर पर अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की जानी चाहिए। अल्पसंख्यक आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए।

8. कड़ी सज़ा-साम्प्रदायिकता बढ़ाने वालों को कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए।

9. विशेष अदालतें-साम्प्रदायिकता फैलाने वालों को कड़ी सज़ा देने के लिए विशेष अदालतों की स्थापना की जानी चाहिए। जनवरी, 1990 में सरकार ने साम्प्रदायिक दंगों से सम्बन्धित मामले निपटाने के लिए दिल्ली, मेरठ और भागलपुर में विशेष अदालतें गठित करने का निर्णय किया।

प्रजातन्त्र पर साम्प्रदायिकता का प्रभाव
(IMPACT OF COMMUNALISM ON DEMOCRACY)-

धर्म का भारतीय राजनीति पर सदैव ही प्रभाव रहा है। धर्म की संकीर्ण भावनाओं ने स्वतन्त्रता से पूर्व भारतीय राजनीति को साम्प्रदायिक झगड़ों का अखाड़ा बना दिया है। धर्म के नाम पर हिन्दुओं और मुसलमानों में झगड़े चलते थे और अन्त में भारत का विभाजन भी हुआ। परन्तु भारत का विभाजन भी साम्प्रदायिकता को समाप्त नहीं कर सका और आज फिर साम्प्रदायिक तत्त्व अपना सिर उठा रहे हैं। साम्प्रदायिकता ने निम्नलिखित ढंगों से प्रजातन्त्र को प्रभावित किया है-

  • भारत में अनेक राजनीतिक दलों का निर्माण धर्म के आधार पर हुआ है।
  • चुनावों में साम्प्रदायिकता की भावना महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। प्रायः सभी राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों का चुनाव करते समय साम्प्रदायिकता को महत्त्व देते हैं और जिस चुनाव क्षेत्र में जिस सम्प्रदाय के अधिक मतदाता होते हैं प्रायः उसी सम्प्रदाय का उम्मीदवार उस चुनाव क्षेत्र में खड़ा किया जाता है। प्राय: सभी राजनीतिक दल चुनावों में वोट पाने के लिए साम्प्रदायिक तत्त्वों के साथ समझौता करते हैं।
  • राजनीतिक दल ही नहीं मतदाता भी धर्म से प्रभावित होकर अपने मत का प्रयोग करते हैं।
  • धर्म के नाम पर राजनीतिक संघर्ष और साम्प्रदायिक झगड़े होते रहते हैं। 1979-80 में साम्प्रदायिक दंगों की संख्या 304 थी। 1990 तथा दिसम्बर, 1992 में राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद के मामले पर अनेक स्थानों पर साम्प्रदायिक दंगे-फसाद हुए। मार्च, 2002 में गुजरात में साम्प्रदायिक दंगे हुए।
  • राजनीति को साम्प्रदायिक आधार देकर राष्ट्र में अराजकता की स्थिति पैदा करने की कोशिश की जा रही है। आज आवश्यकता इस बात की है जो ताकतें धर्म-निरपेक्षता को आघात पहुंचाती हैं और साम्प्रदायिक राजनीति चला रही हैं उनके खिलाफ सख्त कदम उठाये जायें। लोकतन्त्र की सफलता और राष्ट्र की एकता के लिए साम्प्रदायिकता के खूनी पंजे को काटना ही होगा।

प्रश्न 9. भारत में लोकतन्त्र की सफलता के लिए आवश्यक शर्तों का वर्णन करो। (Discuss the essential conditions for the success of Democracy in India.)
अथवा
भारतीय लोकतन्त्र की सफलता के लिए आवश्यक शर्तों की व्याख्या करें। (Discuss the conditions essential for the success of Indian democracy.)
उत्तर-आधुनिक युग प्रजातन्त्र का युग है। संसार के अधिकांश देशों में प्रजातन्त्र को अपनाया गया है। इस शासन व्यवस्था को सर्वोत्तम माना गया है। परन्तु प्रजातन्त्र को प्रत्येक देश में एक समान सफलता प्राप्त नहीं हुई। कुछ देशों में प्रजातन्त्र प्रणाली को बहुत सफलता प्राप्त हुई जबकि कई देशों में इसको सफलता प्राप्त नहीं हुई है। प्रजातन्त्र की सफलता के लिए कुछ विशेष वातावरण और मनुष्यों के आचरण में कुछ विशेष गुणों की आवश्यकता रहती है। इंग्लैण्ड, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, स्विट्ज़रलैंड आदि देशों में प्रजातन्त्र शासन प्रणाली को सफलता मिली है क्योंकि इन देशों में उचित वातावरण मौजूद है।
भारतीय प्रजातन्त्र को सफल बनाने के लिए निम्नलिखित शर्तों का होना आवश्यक है-

1. सचेत नागरिक (Enlightened Citizens)—प्रजातन्त्र की सफलता की प्रथम शर्त सचेत नागरिकता है। नागरिक बुद्धिमान, शिक्षित तथा समझदार होने चाहिएं। नागरिकों को अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों के प्रति सचेत होना चाहिए। नागरिकों को देश की समस्याओं में रुचि लेनी चाहिए। एक लेखक का कहना है कि “लगातार सतर्कता ही स्वतन्त्रता का मूल्य है।” (Constant vigilance is the price of liberty.)

2. शिक्षित नागरिक (Educated Citizens)—प्रजातन्त्र जनता की सरकार है और इसका शासन जनता द्वारा ही चलाया जाता है। इसलिए प्रजातन्त्र की सफलता के लिए नागरिकों का शिक्षित होना आवश्यक है। शिक्षित नागरिक प्रजातन्त्र शासन की आधारशिला है । शिक्षा के प्रसार से ही नागरिकों को अपने अधिकारों तथा कर्त्तव्यों का ज्ञान होता है। शिक्षित नागरिक ही अच्छे-बुरे, उचित-अनुचित में भेद कर सकते हैं। शिक्षा नागरिक को शासन में भाग लेने के योग्य बनाती है। देश की समस्याओं को समझने के लिए तथा उनको सुलझाने के लिए शिक्षित नागरिकों का होना आवश्यक है। अत: शिक्षित नागरिक प्रजातन्त्र की सफलता के लिए आवश्यक शर्त है।

3. उच्च नैतिक स्तर (High Moral Standard) ब्राइस के मतानुसार प्रजातन्त्र की सफलता नागरिकों के उच्च नैतिक स्तर पर निर्भर करती है । नागरिकों का ईमानदार, निष्पक्ष तथा स्वार्थरहित होना आवश्यक है। प्रजातन्त्र में जनता को बहुत से अधिकार प्राप्त होते हैं, जिनका ईमानदारी से उपयोग होना प्रजातन्त्र की सफलता के लिए जरूरी होता है। उदाहरण के लिए, प्रजातन्त्र में नागरिकों को वोट देने का अधिकार प्राप्त होता है परन्तु नागरिकों का यह कर्त्तव्य है कि वह अपने इस अधिकार का प्रयोग बुद्धिमता से करें। यदि नागरिक बेइमान हों, जमाखोर हों, चोरबाजारी करते हों, मन्त्री अपने स्वार्थ-हितों की पूर्ति में लगे रहते हों तथा सरकारी कर्मचारी रिश्वतें लेते हों तो वहां प्रजातन्त्र की सफलता का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। अतः प्रजातन्त्र की सफलता के लिए नागरिक का नैतिक स्तर ऊंचा होना अनिवार्य है।

4. प्रजातन्त्र से प्रेम (Love for Democracy)-प्रजातन्त्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि नागरिकों के दिलों में प्रजातन्त्र के लिए प्रेम होना चाहिए। प्रजातन्त्र से प्रेम के बिना प्रजातन्त्र कभी सफल नहीं हो सकता।

5. आर्थिक समानता (Economic Equality)-प्रजातन्त्र की सफलता के लिए आर्थिक समानता का होना आवश्यक है। बिना आर्थिक समानता के राजनीतिक प्रजातन्त्र एक हास्य का विषय बन जाता है। कोल ने ठीक ही कहा है, “बिना आर्थिक स्वतन्त्रता के राजनीतिक स्वतन्त्रता अर्थहीन है।” (“Political democracy is meaningless without economic democracy.”) साम्यवाद के समर्थकों की इस बात में सच्चाई है कि एक भूखे-नंगे व्यक्ति के लिए वोट के अधिकार का कोई महत्त्व नहीं है। मनुष्य को रोटी पहले चाहिए और वोट बाद में है। अतः प्रत्येक मनुष्य की आय इतनी अवश्य होनी चाहिएं कि वह अपना और अपने परिवार का उचित पालन कर सके तथा अपने बच्चों को शिक्षा दे सकें। प्रजातन्त्र तभी सफल हो सकता है जब प्रत्येक व्यक्ति को पेट भर रोटी मिले, कपड़ा मिले तथा रहने को मकान मिले और कार्य करने का अवसर प्राप्त हो।

6. सामाजिक समानता (Social Equality)-प्रजातन्त्र की सफलता के लिए आर्थिक समानता के साथ सामाजिक समानता का होना भी आवश्यक है। यदि समाज में सभी व्यक्तियों को समान नहीं माना जाता और उनमें जाति, धर्म, रंग, वंश, लिंग, धन आदि के आधार पर भेदभाव किया जाता है तो प्रजातन्त्र को सफलता नहीं मिल सकती। समाज में सभी नागरिकों को समान सुविधाएं प्राप्त होनी चाहिएं और किसी व्यक्ति को ऊंचा-नीचा नहीं समझना चाहिए। प्रजातन्त्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि समाज का संगठन समानता तथा न्याय के नियमों पर आधारित हो।

7. स्वस्थ जनमत (Sound Public Opinion)-प्रजातन्त्रात्मक सरकार जनमत पर आधारित होती है, जिस कारण प्रजातन्त्र की सफलता के लिए स्वस्थ जनमत का होना अति आवश्यक है। डॉ० बनी प्रसाद (Dr. Beni Prasad) के शब्दों में, “जनमत नागरिकों के समस्त समूह का मत है। जनता का मत बनने के लिए बहुसंख्या काफ़ी नहीं तथा सर्वसम्मति की आवश्यकता नहीं।”

8. स्वतन्त्र तथा ईमानदार प्रेस (Free and Honest Press)—प्रजातन्त्र का शासन जनमत पर आधारित होता है। इसलिए शुद्ध जनमत के निर्माण के लिए स्वतन्त्र तथा ईमानदार प्रेस का होना बहुत ज़रूरी है। नागरिक को अपने विचार प्रकट करने की भी स्वतन्त्रता होनी चाहिए। यदि प्रेस पर किसी वर्ग अथवा पार्टी का नियन्त्रण होगा तो वह निष्पक्ष नहीं रह सकता जिसके परिणामस्वरूप जनता को झूठी खबरें मिलेंगी और झूठी खबरों के आधार पर बना जनमत शुद्ध नहीं हो सकता। यदि प्रेस पर सरकार का नियन्त्रण होगा तो जनता को वास्तविकता का पता नहीं चलेगा और सरकार की आलोचना करना भी कठिन हो जाएगा।

9. शान्ति और सुरक्षा (Peace and Order)–प्रजातन्त्र की सफलता के लिए यह भी आवश्यक है कि देश में शान्ति और सुरक्षा का वातावरण हो। प्रजातन्त्र शासन ऐसे देशों में अधिक समय तक नहीं रह सकता जहां सदा युद्ध का भय बना रहता है। जिस देश में अशान्ति की व्यवस्था रहती है, वहां पर नागरिक अपने व्यक्तित्व का विकास करने का प्रयत्न नहीं
करते। युद्ध काल में न तो चुनाव हो सकते हैं और न ही नागरिकों को अधिकार तथा स्वतन्त्रता प्राप्त होती है। अतः प्रजातन्त्र ‘ की सफलता के लिए शान्ति व्यवस्था का होना आवश्यक है।

10. स्वतन्त्र चुनाव (Free Election)—प्रजातन्त्र में निश्चित अवधि के पश्चात् चुनाव होते हैं। चुनाव व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि चुनाव स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष हों तथा सत्तारूढ़ दल को कोई ऐसी सुविधा प्राप्त नहीं होनी चाहिए जो विरोधी दल को प्राप्त नहीं है। मतदाताओं को अपने मत को स्वतन्त्रतापूर्वक प्रयोग करने का अधिकार प्राप्त होना चाहिए। मतदाताओं पर दबाव डालकर उन्हें किसी विशेष दल के पक्ष में वोट डालने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।

11. मौलिक अधिकारों की सुरक्षा (Protection of Fundamental Rights)—प्रजातन्त्र में लोगों को कई प्रकार के मौलिक अधिकार प्राप्त होते हैं जिनके द्वारा वे राजनीतिक भागीदार बन पाते हैं और अपने जीवन का विकास कर पाते हैं। प्रजातन्त्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि इन अधिकारों की सुरक्षा संविधान द्वारा की जानी चाहिए ताकि कोई व्यक्ति या शासक उनको कम या समाप्त करके प्रजातन्त्र को हानि न पहुंचा सके।

12. स्थानीय स्वशासन (Local Self-government)—प्रजातन्त्र की सफलता के लिए स्थानीय स्वशासन का होना आवश्यक है क्योंकि स्थानीय संस्थाओं के द्वारा ही नागरिकों को शासन में भाग लेने का अवसर मिलता है। स्थानीय स्वशासन से नागरिकों को राजनीतिक शिक्षा मिलती है और वे वोट का उचित प्रयोग करना सीखते हैं। ब्राइस का कहना है कि स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं के बिना लोगों में स्वतन्त्रता की भावना उत्पन्न नहीं की जा सकती है। स्थानीय शासन को प्रशासनिक शिक्षा की आरम्भिक पाठशाला कहा जाता है। डी० टाक्विल (De Tocqueville) ने स्थानीय संस्थाओं के महत्त्व का वर्णन करते हुए लिखा है, “एक राष्ट्र भले ही स्वतन्त्र सरकार की पद्धति को स्थापित कर ले, परन्तु स्थानीय संस्थाओं के बिना इसमें स्वतन्त्रता की भावना नहीं आ सकती।”

13. लिखित संविधान (Written Constitution)-कुछ विद्वानों के अनुसार प्रजातन्त्र की सफलता के लिए संविधान का लिखित होना आवश्यक है। जिन देशों का संविधान लिखित होता है वहां पर सरकार की शक्तियों को संविधान में लिखा होता है। जिससे सरकार मनमानी नहीं कर सकती। यदि संविधान लिखित न हो तो सरकार अपनी इच्छा से अपनी शक्तियों का विस्तार कर लेगी। हेनरी मेन का कहना है कि अच्छे संविधान के साथ लोकतन्त्र के वेग को रोका जा सकता है तथा उसको एक तालाब के पानी की तरह शान्त बनाया जा सकता है।

14. स्वतन्त्र न्यायपालिका (Independent Judiciary)-प्रजातन्त्र में नागरिकों के मौलिक अधिकारों तथा संविधान की सुरक्षा के लिए स्वतन्त्र न्यायपालिका का होना आवश्यक है। देश की न्यायपालिका विधानपालिका तथा कार्यपालिका से स्वतन्त्र होनी चाहिए। यदि न्यायपालिका स्वतन्त्र नहीं होगी तो वह अपना कार्य निष्पक्षता से नहीं कर सकेगी। जिस देश की न्यायपालिका स्वतन्त्र नहीं वहां पर नागरिकों के मौलिक अधिकार सुरक्षित नहीं रहते। अतः प्रजातन्त्र शासन की सफलता के लिए न्यायपालिका का स्वतन्त्र होना अनिवार्य है।

15. संगठित राजनीतिक दल (Well Organised Political Parties)-प्रजातन्त्र शासन प्रणाली के लिए राजनीतिक दल आवश्यक हैं।
प्रजातन्त्र की सफलता के लिए राजनीतिक दलों का उचित संगठन होना चाहिए। दलों का संगठन जाति, धर्म, प्रान्त आदि के आधार पर न होकर आर्थिक आधार पर होना चाहिए। जो दल आर्थिक सिद्धान्तों पर आधारित होते हैं उनका उद्देश्य देश का हित होता है। यदि देश में संगठित दल हों तो बहुत अच्छा है।

16. नागरिकों में सहयोग, समझौते तथा सहनशीलता की भावना (Spirit of Co-operation, Compromise and Toleration among the Citizens)-प्रजातन्त्र जनता का शासन है तथा जनता के द्वारा ही चलाया जाता है। इसलिए यह आवश्यक है कि नागरिकों में सहयोग, सहनशीलता तथा समझौते की भावना हो। प्रजातन्त्र में एक व्यक्ति को विचार प्रकट करने की स्वतन्त्रता होती है तथा वे सरकार की आलोचना भी कर सकते हैं। दूसरे नागरिकों में इतनी सहनशीलता होनी चाहिए कि वे विरोधी विचारों के नागरिकों के विचारों को ध्यान से सुनें। दूसरे नागरिकों के विचारों को सुनकर लोगों को लड़ना-झगड़ना शुरू नहीं कर देना चाहिए। प्रजातन्त्र में एक दल सरकार बनाता है तथा दूसरे विरोधी दल का कार्य करते हैं। शासन दल के सदस्यों का कर्तव्य है कि वे विरोधी दल की आलोचना को हंसते हुए बरदाश्त करें तथा विरोधी दल को आलोचना करने की पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिए।

17. सेना का अधीनस्थ स्तर (Subordinate status of Army) विश्व के सफल प्रजातन्त्र देशों के अनुभव के अनुसार देश की सेना सरकार के असैनिक अंग (Civil Organ) के अधीन होनी चाहिए। सेना सरकार के अधीनस्थ रहने से ही प्रजातन्त्र की सहायक हो सकती है। यदि ऐसा न हो तो सेना प्रजातन्त्र की सबसे बड़ी विरोधी सिद्ध होगी जैसा कि संसार के अधिनायकवादी देशों का अनुभव है।

18. परिपक्व नेतृत्व (Mature Leadership)-प्रजातन्त्र शासन में जनता का नेतृत्व करने के लिए बुद्धिमान् नेताओं की आवश्यकता होती है। प्रजातन्त्र को सफल बनाने तथा समाप्त करने वाले नेता लोग ही होते हैं। वाशिंगटन तथा लिंकन जैसे महान् नेताओं ने अमेरिका को एक शक्तिशाली राज्य बनाया। इन महान् नेताओं की वजह से ही अमेरिका शक्तिशाली राज्य के साथ-साथ अमीर देश भी है। चर्चिल के नेतृत्व में इंग्लैण्ड ने द्वितीय महायुद्ध में विजय प्राप्त की। जब पाकिस्तान ने भारत पर 1965 ई० में आक्रमण किया तो हमारे प्रधानमन्त्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने देश का बहुत अच्छा नेतृत्व किया और पाकिस्तान के हमले का मुंह तोड़ जबाव दिया। अतः प्रजातन्त्र की सफलता के लिए बुद्धिमान तथा चरित्रवान् नेता होना आवश्यक है।

19. दल-बदल के विरुद्ध बनाए गए कानून को प्रभावी ढंग से लागू करना (Strict Compliance with the Anti Defection Law)-भारतीय लोकतन्त्र को सफल बनाने के लिए यह आवश्यक है कि दल-बदल के विरुद्ध बनाए गए कानून को प्रभावशाली ढंग से लागू किया जाए। 1985 में दल-बदल को रोकने के लिए एक कानून बनाया गया था, परन्तु उस कानून में एक कमी यह थी कि यदि किसी दल के 1/3 सदस्य अलग हो जाते हैं, तो उसे दलबदल नहीं माना जाएगा। अतः इस कानून के बावजूद भी दल-बदल पर कोई प्रभावशाली रोक न लग सकी। अतः दिसम्बर, 2003 में संसद् ने 91वां संवैधानिक संशोधन पास किया। इस संशोधन में यह व्यवस्था की गई कि यदि कोई भी विधायक या सांसद दल-बदल करता है तो उसकी सदन की सदस्यता तुरन्त प्रभाव से समाप्त हो जाएगी और वह सदस्य उस सदन के शेष कार्यकाल के दौरान किसी सरकारी लाभदायक पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकता। इस संवैधानिक संशोधन द्वारा 1/3 सदस्यों द्वारा किए जाने वाले दल-बदल की व्यवस्था को भी समाप्त कर दिया गया। 91वें संवैधानिक संशोधन द्वारा बनाये गए कानून के अनुसार अब किसी भी रूप में दल-बदल नहीं किया जा सकता। अतः यदि इस कानून को प्रभावशाली ढंग से लागू किया जाए तो इससे भारतीय लोकतन्त्र को सफल बनाने में मदद मिलेगी।

यदि ऊपरलिखित शर्ते पूरी हो जाएं तो प्रजातन्त्र शासन को सफलता मिलनी स्वाभाविक है। यदि किसी देश में प्रजातन्त्र के अनुकूल वातावरण नहीं होता तो वहां पर प्रजातन्त्र का स्थान शीघ्र ही कोई दूसरी सरकार ले लेती है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि जिस देश में ये सभी बातें नहीं पाई जाती हैं वहां पर प्रजातन्त्र की स्थापना नहीं की जा सकती है। जे० एस० मिल ने इस बात पर जोर दिया है कि प्रजातन्त्र की सफलता के लिए वहां के लोगों में इस शासन को बनाए रखने की इच्छा होनी चाहिए। प्रजातन्त्र को सफल बनाने के लिए जनता में इच्छा का होना आवश्यक है।

लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. संसदीय शासन प्रणाली से आपका क्या अभिप्राय है?
अथवा
संसदीय सरकार से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। संसदीय सरकार शासन की वह प्रणाली है जिसमें कार्यपालिका (मन्त्रिमण्डल) अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका (संसद्) के प्रति उत्तरदायी होती है और तब तक अपने पद पर रहती है जब तक इसको संसद् का विश्वास प्राप्त रहता है। जिस समय कार्यपालिका संसद् का विश्वास खो बैठे तभी कार्यपालिका को त्याग-पत्र देना पड़ता है। संसदीय सरकार को उत्तरदायी सरकार भी कहा जाता है क्योंकि इसमें सरकार अपने समस्त कार्यों के लिए उत्तरदायी होती है। इस सरकार को कैबिनेट सरकार भी कहा जाता है। क्योंकि इसमें कार्यपालिका की शक्तियां कैबिनेट द्वारा प्रयोग की जाती हैं।

प्रश्न 2. संसदीय शासन प्रणाली की चार विशेषताएं लिखिए।
उत्तर-संसदीय सरकार की विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

  • प्रधानमन्त्री का नेतृत्व-संसदीय सरकार में कार्यपालिका का असली मुखिया प्रधानमन्त्री होता है। प्रधानमन्त्री निम्न सदन का नेता होता है जिस कारण वह सदन का भी नेता होता है। मन्त्रियों में विभागों का वितरण प्रधानमन्त्री द्वारा ही किया जाता है।
  • कार्यपालिका विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी-मन्त्रिमण्डल अपने सभी कार्यों के लिए विधानमण्डल के प्रति संयुक्त रूप से उत्तरदायी होता है। विधानपालिका जब चाहे मन्त्रिमण्डल के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास करके उस मन्त्रिमण्डल को त्याग-पत्र देने के लिए मजबूर कर सकती है।
  • राजनीतिक एकता-संसदीय सरकार में मन्त्रिमण्डल के सदस्य एक ही दल के साथ सम्बन्धित होते हैं। जिस दल को बहुमत प्राप्त होता है, उस दल का मन्त्रिमण्डल बनता है और वही दल सरकार बनाता है। अन्य दल विरोधी दल की भूमिका अदा करते हैं।
  • संसदीय शासन प्रणाली में मन्त्रिमण्डल की बैठकें गुप्त होती हैं।

प्रश्न 3. भारत में संसदीय शासन-प्रणाली की किन्हीं चार विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर- भारतीय संसदीय शासन-प्रणाली की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

  • नाममात्र तथा वास्तविक कार्यपालिका में भेद-राष्ट्रपति राज्य का नाममात्र का अध्यक्ष है जबकि वास्तविक कार्यपालिका मन्त्रिमण्डल है। संविधान में कार्यपालिका की समस्य शक्तियां राष्ट्रपति को दी गई हैं परन्तु राष्ट्रपति उन शक्तियों का इस्तेमाल स्वयं अपनी इच्छा से नहीं कर सकता। राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल की सलाह के अनुसार ही अपनी शक्तियों का प्रयोग करता है।
  • कार्यपालिका तथा संसद् में घनिष्ठ सम्बन्ध-मन्त्रिमण्डल के सभी सदस्य संसद् के सदस्य होते हैं। मन्त्रिमण्डल के सदस्य संसद की बैठकों में भाग लेते हैं, विचार प्रकट करते हैं और बिल पेश करते हैं। मन्त्रिमण्डल की सहायता के बिना कोई बिल पास नहीं हो सकता।
  • राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल से अलग है-राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल का सदस्य नहीं होता और मन्त्रिमण्डल की बैठकों में भाग नहीं लेता। मन्त्रिमण्डल की बैठकों की अध्यक्षता प्रधानमन्त्री करता है, परन्तु मन्त्रिमण्डल के प्रत्येक निर्णय से राष्ट्रपति को सूचित कर दिया जाता है।
  • प्रधानमन्त्री लोकसभा को भंग करवा सकता है।

प्रश्न 4. उत्तरदायी सरकार का क्या अर्थ होता है?
उत्तर-उत्तरदायी सरकार को संसदीय सरकार भी कहा जाता है। उत्तरदायी सरकार में कार्यपालिका (मन्त्रिमण्डल) अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका (संसद्) के प्रति उत्तरदायी होती है। विधानपालिका के सदस्यों को कार्यपालिका की आलोचना करने तथा उनसे प्रश्न पूछने का अधिकार प्राप्त होता है। कार्यपालिका (मन्त्रिमण्डल) तब तक अपने पद पर रहती है जब तक इसको संसद् का विश्वास प्राप्त रहता है। संसद् अविश्वास प्रस्ताव पास करके मन्त्रिमण्डल को हटा सकती है। चूंकि संसदीय सरकार में मन्त्रिमण्डल अपने कार्यों के लिए संसद् के प्रति उत्तरदायी होता है इसलिए उसको उत्तरदायी सरकार कहते हैं।

प्रश्न 5. लोकतन्त्र को कौन-से सामाजिक तत्त्व प्रभावित करते हैं ?
उत्तर-

  • सामाजिक असमानता-सामाजिक असमानता ने लोगों में निराशा तथा असन्तोष को बढ़ावा दिया है। सामाजिक असमानता के कारण समाज का बहुत बड़ा भाग राजनीतिक कार्य के प्रति उदासीन रहता है।
  • अनपढ़ता- भारत में आज भी करोड़ों व्यक्ति अनपढ़ हैं। अनपढ़ व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी होती है इसलिए उसमें देश की समस्याओं को समझने तथा हल करने की क्षमता नहीं होती है।
  • जातिवाद-भारतीय राजनीति में जाति एक महत्त्वपूर्ण तथा निर्णायक तत्त्व रहा है और आज भी है। चुनाव में उम्मीदवारों का चयन प्रायः जाति के आधार पर किया जाता है और मतदाता प्राय: जाति के आधार पर मतदान करते हैं।
  • छूआछूत ने भारतीय लोकतन्त्र को बहुत प्रभावित किया है।

प्रश्न 6. भारतीय लोकतंत्र की चार समस्याओं का वर्णन करो।
उत्तर-भारतीय लोकतन्त्र की मुख्य समस्याएं निम्नलिखित हैं-

  • सामाजिक असमानता–भारतीय लोकतन्त्र की एक महत्त्वपूर्ण समस्या सामाजिक असमानता है। सामाजिक असमानता ने लोगों में निराशा तथा असन्तोष को बढ़ावा दिया है। राजनीतिक दल सामाजिक असमानता का लाभ उठाने का प्रयास करते हैं और सत्ता पर उच्च वर्ग के लोगों का ही नियन्त्रण रहता है।
  • ग़रीबी-भारत की अधिकांश जनता ग़रीब है। ग़रीब व्यक्ति के पास समाज और देश की समस्याओं पर विचार करने का न तो समय होता है और न ही इच्छा। ग़रीब व्यक्ति चुनाव लड़ने की बात तो दूर, ऐसा सोच भी नहीं सकता।
  • अनपढ़ता-भारत की लगभग 24 प्रतिशत जनता अनपढ़ है। भारत में अनपढ़ता के कारण स्वस्थ जनमत का निर्माण नहीं हो पाता। अशिक्षित व्यक्ति को न तो अधिकारों का ज्ञान होता है और न कर्तव्यों का। वह मताधिकार का महत्त्व नहीं समझता। अनपढ़ व्यक्ति राजनीतिक दलों के नेताओं के नारे, जातिवाद, धर्म आदि से प्रभावित होकर अपने वोट का प्रयोग कर बैठता है।
  • भारतीय लोकतन्त्र की एक मुख्य समस्या जातिवाद है।

प्रश्न 7. अनपढ़ता ने भारतीय लोकतंत्र को कैसे प्रभावित किया है ?
अथवा
निरक्षरता भारतीय लोकतन्त्र को किस तरह प्रभावित करती है ?
उत्तर-आज जातिवाद, भाषावाद और प्रान्तीयता आदि के देश में बोलबाला होने का एक महत्त्वपूर्ण कारण भारतीयों का अशिक्षित होना है। प्रजातन्त्र में जनमत ही सरकार की निरंकुशता पर अंकुश लगाता है। जनमत के भय से सरकार जनता के हित में नीतियों का निर्माण करती है, परन्तु भारत में अनपढ़ता के कारण स्वस्थ जनमत का निर्माण नहीं हो पाता। इसलिए सत्तारूढ़ दल चुनाव में किए गए वायदों को लागू कराने की चेष्टा नहीं करता। अनपढ़ व्यक्ति राजनीतिक दलों के नेताओं के नारों, जातिवाद, धर्म, भाषावाद आदि से प्रभावित होकर अपने वोट का प्रयोग कर बैठता है। अतः भारतीय प्रजातन्त्र के सफल होने के लिए अधिक-से-अधिक जनता का शिक्षित एवं सचेत होना अत्यावश्यक है।

प्रश्न 8. भारत ने संसदीय प्रणाली को क्यों अपनाया ?
अथवा
भारत ने संसदीय प्रणाली को क्यों ग्रहण किया?
उत्तर-संविधान सभा में इस बात पर काफ़ी वाद-विवाद हुआ कि भारत के लिए संसदीय अथवा अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली उचित रहेगी, परन्तु अन्त में संसदीय शासन प्रणाली की स्थापना करने का निर्णय निम्नलिखित कारणों से लिया गया-

  • संसदीय परम्पराएं-भारत में संसदीय शासन प्रणाली पहले से प्रचलित थी। 1919 के एक्ट द्वारा प्रान्तों में दोहरी शासन प्रणाली द्वारा आंशिक उत्तरदायी सरकार की स्थापना की गई और 1935 के एक्ट के अन्तर्गत प्रान्तों में प्रान्तीय स्वायत्तता की स्थापना की गई। अत: भारतीयों के लिए संसदीय शासन प्रणाली नई नहीं थी। इसी कारण राजनीतिज्ञों ने इसका समर्थन किया।
  • शक्ति और लचीलापन-श्री० के० एम० मुन्शी का विचार था कि संसदीय शासन प्रणाली में शक्ति तथा लचीलेपन का सम्मिश्रण रहता है।
  • विधानमण्डल तथा कार्यपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध-संसदीय प्रणाली में विधानमण्डल और कार्यपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध होता है और दोनों में तालमेल बना रहता है।
  • संसदीय शासन प्रणाली अधिक उत्तरदायी है।

प्रश्न 9. सामूहिक उत्तरदायित्व से आपका क्या भाव है?
अथवा
संसदीय शासन प्रणाली के अधीन सामूहिक (सांझी) जिम्मेवारी से क्या भाव है ?
अथवा
संसदीय लोकतन्त्र में सामूहिक उत्तरदायित्व का क्या अर्थ है ?
उत्तर-सामूहिक उत्तरदायित्व संसदीय सरकार की मुख्य विशेषता है। भारतीय संविधान की धारा 75 (3) में कहा गया है कि “मन्त्रिमण्डल अपने सभी कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होता है। जब मन्त्रिमण्डल किसी विषय पर कोई नीति निर्धारित करता है तो इस नीति के लिए सामूहिक उत्तरदायित्व का अर्थ है कि यदि विधानपालिका में किसी एक मन्त्री के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास हो जाए तो वह प्रस्ताव पूर्ण मन्त्रिमण्डल के विरुद्ध अविश्वा प्रस्ताव माना जाएगा और सभी मन्त्री सामूहिक रूप से त्याग-पत्र देंगे। सामूहिक उत्तरदायित्व के अतिरिक्त मन्त्री अपने विभाग के लिए विधानपालिका के प्रति व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होते हैं। संक्षेप में मन्त्रिमण्डल अपने सभी कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी है और विधानपालिका जब भी चाहे मन्त्रिमण्डल के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास करके उसको त्याग-पत्र देने के लिए मजबूर कर सकती है। इसीलिए कहा जाता है कि, “मन्त्री इकट्ठे तैरले और इकट्ठे डूबते हैं।”

प्रश्न 10. भारतीय संसदीय प्रणाली के किन्हीं चार दोषों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-भारत में केन्द्र और प्रान्तों में संसदीय शासन प्रणाली को कार्य करते हुए कई वर्ष हो गए हैं। भारतीय संसदीय प्रणाली की कार्य विधि के आलोचनात्मक अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय संसदीय प्रणाली में बहुत-सी त्रुटियां हैं जिनमें मुख्य निम्नलिखित हैं-

  • बहु-दलीय प्रणाली-संसदीय प्रजातन्त्र की सफलता में एक बाधा बहु-दलीय प्रणाली का होना है। स्थायी शासन के लिए दो या तीन दल ही होने चाहिएं। अधिक दलों के कारण प्रशासन में स्थिरता नहीं रहती।
  • अच्छी परम्पराओं की कमी-संसदीय शासन प्रणाली की सफलता अच्छी परम्पराओं की स्थापना पर निर्भर करती है, परन्तु भारत में कांग्रेस शासन में अच्छी परम्पराओं की स्थापना नहीं हो पाई है। इसके लिए विरोधी दल भी ज़िम्मेदार हैं।
  • जनता के साथ कम सम्पर्क-भारतीय संसदीय प्रजातन्त्र का एक अन्य महत्त्वपूर्ण दोष यह है कि विधायक जनता के साथ सम्पर्क नहीं बनाए रखते। कांग्रेस दल भी चुनाव के समय ही जनता के सम्पर्क में आता है और अन्य दलों की तरह चुनाव के पश्चात् अन्धकार में छिप जाता है। जनता को उसके विधायकों की कार्यविधियों का ज्ञान ही नहीं होता।
  • राजनीतिक दल अपने स्वार्थ के लिए अनैतिक गठबन्धन करते हैं।

प्रश्न 11. भारतीय लोकतन्त्र को प्रभावित करने वाले चार आर्थिक तत्त्व लिखो।
उत्तर-

  1. आर्थिक असमानता-लोकतन्त्र की सफलता के लिए आर्थिक समानता का होना आवश्यक है, परन्तु भारत में स्वतन्त्रता के इतने वर्ष पश्चात् भी आर्थिक असमानता बहुत अधिक पाई जाती है। सत्तारूढ़ दल अमीरों के हितों का ही ध्यान रखते हैं क्योंकि उन्हें अमीरों से धन मिलता रहता है। भारतीय लोकतन्त्र में वास्तव में शक्ति धनी व्यक्तियों के हाथ में है और आम व्यक्ति का विकास नहीं हुआ।
  2. ग़रीबी- भारतीय लोकतन्त्र को ग़रीबी ने बहुत प्रभावित किया है। भारत की अधिकांश जनता ग़रीब है। ग़रीब नागरिक अपने वोट का भी स्वतन्त्रतापूर्वक प्रयोग नहीं कर सकता। चुनाव के समय सभी राजनीतिक दल ग़रीबी को हटाने का वायदा करते हैं ताकि ग़रीबों की वोटें प्राप्त की जा सकें परन्तु बाद में सब भूल जाते हैं।
  3. बेरोज़गारी-बेरोज़गारी और ग़रीबी परस्पर सम्बन्धित हैं और बेरोज़गारी ही ग़रीबी का कारण है। भारत में बेरोज़गारी शिक्षित तथा अशिक्षित दोनों प्रकार के लोगों में पाई जाती है। लाखों शिक्षित बेकार फिर रहे हैं। बेकारी की समस्या ने लोकतन्त्र को बहुत प्रभावित किया है।
  4. भारतीय लोकतन्त्र को आर्थिक क्षेत्रीय असन्तुलन ने प्रभावित किया है।

प्रश्न 12. भारतीय लोकतन्त्र पर साम्प्रदायिकता के प्रभाव को लिखिए।
उत्तर-साम्प्रदायिकता भारतीय लोकतन्त्र के लिए एक गम्भीर समस्या है। साम्प्रदायिकता ने निम्नलिखित ढंगों से भारतीय लोकतन्त्र को प्रभावित किया है-

  • भारत में अनेक राजनीतिक दलों का निर्माण धर्म के आधार पर हुआ है।
  • चुनावों में प्रायः सभी राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों का चयन करते समय साम्प्रदायिकता को महत्त्व देते हैं।
  • राजनीतिक दल ही नहीं बल्कि मतदाता भी धर्म से प्रभावित होकर अपने मत का प्रयोग करते हैं। यह प्रायः देखा गया है कि मुस्लिम मतदाता और सिक्ख मतदाता अधिकतर अपने धर्म से सम्बन्धित उम्मीदवार को ही वोट डालते हैं।
  • मन्त्रिमण्डल में भी धर्म के आधार पर प्रतिनिधित्व दिया जाता है।

प्रश्न 13. भारतीय लोकतन्त्र पर जातिवाद का प्रभाव लिखिए।
अथवा
जातिवाद भारतीय लोकतन्त्र को कैसे प्रभावित करता है?
उत्तर- भारतीय समाज में जातिवाद की प्रथा प्राचीन काल से प्रचलित है। जातिवाद ने भारतीय लोकतन्त्र को निम्नलिखित ढंग से प्रभावित किया है-

  • चुनाव के समय उम्मीदवारों का चयन करते समय जातिवाद को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है।
  • राजनीतिक दल विशेषकर क्षेत्रीय दल खुलेआम जाति का समर्थन करते हैं।
  • भारतीय राजनीति में जातिवाद ने राजनीतिक नेतृत्व को भी प्रभावित किया है।
  • मतदाता जातीय आधार पर मतदान करता है।

प्रश्न 14. भारतीय लोकतन्त्र को आर्थिक असमानता किस प्रकार प्रभावित करती है? (P.B. 2002, 2003)
अथवा
आर्थिक असमानता भारतीय लोकतन्त्र को किस तरह प्रभावित करती है ?
उत्तर-लोकतन्त्र की सफलता के लिए आर्थिक समानता का होना आवश्यक है। परन्तु भारत में स्वतन्त्रता के इतने वर्ष पश्चात् भी आर्थिक असमानता बहुत अधिक पाई जाती है। भारत में एक तरफ करोड़पति पाए जाते हैं तो दूसरी तरफ करोड़ों लोग ऐसे हैं जिन्हें दो समय का भोजन भी नहीं मिलता। भारत में देश का धन थोड़े-से परिवारों के हाथों में ही केन्द्रित है। भारत में आर्थिक शक्ति का वितरण समान नहीं है। अमीर दिन-प्रतिदिन अधिक अमीर होते जातें हैं और ग़रीब और अधिक ग़रीब होते जाते हैं। आर्थिक असमानता ने लोकतन्त्र को भी प्रभावित किया है। अमीर लोग राजनीतिक दलों को धन देते हैं। और प्रायः धनी व्यक्तियों को ही पार्टी का टिकट दिया जाता है। चुनावों में धन का बहुत अधिक महत्त्व है और धन के आधार पर चुनाव जीते जाते हैं। सत्तारूढ़ दल अमीरों के हितों का ही ध्यान रखते हैं क्योंकि उन्हें अमीरों से धन मिलता रहता है। भारतीय लोकतन्त्र में वास्तव में शक्ति धनी व्यक्तियों के हाथों में है और आम व्यक्ति का विकास नहीं हुआ।

प्रश्न 15. भारतीय लोकतन्त्र की सफलता के लिए चार ज़रूरी शर्तों का वर्णन करें।
उत्तर- भारतीय लोकतन्त्र की सफलता के लिए निम्नलिखित तत्त्वों का होना आवश्यक है

  • जागरूक नागरिकता-जागरूक नागरिकता भारतीय लोकतन्त्र की सफलता के लिए आवश्यक है। निरन्तर देखरेख ही स्वतन्त्रता की कीमत है।
  • शिक्षित नागरिक-भारतीय लोकतन्त्र की सफलता के लिए नागरिकों का शिक्षित होना अनिवार्य है। शिक्षित नागरिक प्रजातन्त्र शासन की आधारशिला हैं।
  • स्थानीय स्वशासन-भारतीय प्रजातन्त्र की सफलता के लिए स्थानीय स्वशासन का होना अनिवार्य है। 4. नागरिकों के मन में प्रजातन्त्र के प्रति प्रेम होना चाहिए।

प्रश्न 16. भारतीय लोकतन्त्र पर बेरोज़गारी के प्रभावों का वर्णन कीजिए।
अथवा
भारतीय लोकतन्त्र को बेरोज़गारी कैसे प्रभावित करती है ?
उत्तर-बेरोज़गारी युवकों में क्रोध तथा निराशा को जन्म देती है। उनका यह क्रोध समाज विरुद्ध घृणा तथा हिंसा का रूप धारण करता है। भारत के कई भागों में फैली अशान्ति का मुख्य कारण युवकों की बेरोज़गारी है। स्वतन्त्रता के पश्चात् शिक्षित व्यक्तियों की बेरोज़गारी में अधिक वृद्धि हुई है। यह बेरोज़गारी भारतीय लोकतन्त्र के लिए एक गम्भीर चेतावनी है। जहां बेरोज़गारी के कारण लोगों की निर्धनता में वृद्धि हुई है, वहां युवकों का लोकतन्त्रीय सिद्धान्तों अथवा लोकतन्त्रीय नैतिक मूल्यों से विश्वास समाप्त हो गया है। ऐसे अविश्वास के कारण ही भारतीय राजनीति में हिंसक साधनों का प्रयोग बढ़ रहा है। इस तरह बेरोज़गारी भारतीय लोकतन्त्र की सफलता के मार्ग में एक बहुत बड़ी बाधा बनी हुई है।

प्रश्न 17. राजनीतिक एकरूपता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-संसदीय शासन प्रणाली की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता राजनीतिक एकरूपता है। संसदीय सरकार में मन्त्रिपरिषद् के सभी सदस्य प्रायः एक ही राजनीतिक दल से लिए जाते हैं। इसी कारण मन्त्रियों के विचारों में राजनीतिक एकरूपता पाई जाती है। मन्त्रिपरिषद् के सभी सदस्य एक इकाई के रूप में कार्य करते हैं। यदि मन्त्रियों में किसी विषय पर विवाद भी हो जाता है तो उसे सार्वजनिक नहीं किया जाता अपितु मन्त्रिपरिषद् की बैठकों में सरलता से हल कर लिया जाता है। राजनीतिक एकरूपता के कारण शासन संचालन में आसानी रहती है। उल्लेखनीय है कि मिले-जुले मन्त्रिमण्डल में राजनीतिक एकरूपता की स्थापना करना कठिन होता है। परन्तु इस समस्या से निपटने के लिए विभिन्न दल एक न्यूनतम सांझा कार्यक्रम बना लेते हैं। इस कार्यक्रम के प्रति मन्त्रिपरिषद् के सदस्य एकरूप होते हैं।

प्रश्न 18. राष्ट्रपति को नाममात्र का संवैधानिक प्रमुख (Constitutional Head) क्यों कहा जाता है?
अथवा भारत में नाममात्र कार्यपालिका के बारे में लिखो।
उत्तर-भारत में संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया गया है। संसदीय शासन प्रणाली में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का अध्यक्ष होता है, जबकि वास्तविक कार्यपालिका मन्त्रिपरिषद् होती है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 53 के अनुसार संघ की समस्त कार्यपालिका शक्तियां राष्ट्रपति को सौंपी गई हैं। लेकिन व्यावहारिक रूप से इन शक्तियों का प्रयोग मन्त्रिपरिषद् करती है। राष्ट्रपति मन्त्रिपरिषद् की सलाह के अनुसार ही इन शक्तियों का प्रयोग करता है। मन्त्रिपरिषद् की सलाह के बिना और सलाह के विरुद्ध वह किसी भी शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता। संविधान के 42वें संशोधन द्वारा यह कहा गया है कि राष्ट्रपति मन्त्रिपरिषद् की सलाह मानने के लिए बाध्य है। 44वें संशोधन में यह व्यवस्था की गई है कि मन्त्रिपरिषद् द्वारा जो सलाह दी जाएगी राष्ट्रपति उस सलाह को एक बार पुनर्विचार के लिए भेज सकता है। लेकिन यदि पुनर्विचार के बाद उसी सलाह को भेजा जाता है तो राष्ट्रपति उसे मानने के लिए बाध्य है। इस प्रकार राष्ट्रपति केवल एक संवैधानिक मुखिया है।

प्रश्न 19. भारत में वास्तविक कार्यपालिका के बारे में लिखिए।
अथवा
भारत में वास्तविक कार्यपालिका कौन है?
उत्तर-संविधान के अनुच्छेद 53 के अनुसार भारतीय संघ की समस्त कार्यपालिका शक्तियां राष्ट्रपति के पास हैं। परन्तु राष्ट्रपति राज्य का नाममात्र का मुखिया अथवा नाममात्र की कार्यपालिका है। जबकि वास्तविक कार्यपालिका मन्त्रिपरिषद् है। चाहे संवैधानिक रूप से समस्त कार्यपालिका शक्तियां राष्ट्रपति को सौंप दी गई हैं परन्तु राष्ट्रपति इन शक्तियों का प्रयोग अपनी इच्छानुसार नहीं कर सकता। मन्त्रिमण्डल की सलाह के बिना तथा सलाह के विरुद्ध राष्ट्रपति कोई कार्य नहीं कर सकता। राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल की सलाह मानने पर बाध्य है। व्यावहारिक रूप से मन्त्रिमण्डल ही सारे कार्य करता है। नीतियों के निर्माण से लेकर सामान्य प्रशासन तक का समस्त कार्य मन्त्रिमण्डल ही करता है। इसलिए मन्त्रिमण्डल ही वास्तविक कार्यपालिका है।

प्रश्न 20. भारतीय लोकतन्त्र की समस्याओं को हल करने के लिए कोई चार सुझाव दीजिए।
उत्तर-भारतीय लोकतन्त्र की समस्याओं को हल करने के चार सुझाव निम्नलिखित हैं

  • शिक्षा का प्रसार-भारतीय लोकतन्त्र की समस्याओं को हल करने के लिए शिक्षा का प्रसार करना अति आवश्यक है। शिक्षित व्यक्ति हिंसा के स्थान पर शान्तिपूर्ण और संवैधानिक साधनों को अपनाना अधिक पसन्द करता है।
  • आर्थिक समानता-भारतीय लोकतन्त्र की समस्याओं को हल करने के लिए आर्थिक असमानता को दूर करके आर्थिक समानता स्थापित की जानी चाहिए। ग़रीबी को दूर करके हिंसा को कम किया जा सकता है।
  • धर्म-निरपेक्षता-साम्प्रदायिकता हिंसा को बढ़ावा देती है। अतः धर्म-निरपेक्षता की स्थापना करके भारतीय लोकतन्त्र की समस्याओं को कम किया जा सकता है। साम्प्रदायिक राजनीतिक संगठनों पर रोक लगा देनी चाहिए।
  • बेरोज़गारी को दूर करना आवश्यक है।

प्रश्न 21. भारत में संसदीय सरकार के लिए बहुदलीय प्रणाली किस प्रकार का खतरा है ?
उत्तर- बहुदलीय प्रणाली निम्नलिखित प्रकार से भारत में संसदीय सरकार के लिए खतरा है-

  • बहुदलीय प्रणाली में बनी सरकार सदैव कमज़ोर रहती है।
  • बहुदलीय प्रणाली में मज़बूत एवं सुदृढ़ विपक्षी दल का अभाव रहता है।
  • बहुदलीय प्रणाली में कई बार सरकार बनाने में कठिनाई पैदा हो जाती है।
  • बहुदलीय प्रणाली में मज़बूत एवं सुदृढ़ विकल्प का सदैव अभाव रहता है।

प्रश्न 22. साम्प्रदायिकता क्या है?
उत्तर-साम्प्रदायिकता का अभिप्राय है धर्म जाति के आधार पर एक-दूसरे के विरुद्ध भेदभाव की भावना रखना। एक धार्मिक समुदाय को दूसरे समुदायों और राष्ट्रों के विरुद्ध उपयोग करना साम्प्रदायिकता है।

ए० एच० मेरियम के अनुसार, “साम्प्रदायिकता अपने समुदाय के प्रति वफ़ादारी की अभिवृति की ओर सकेत करती है जिसका अर्थ भारत में हिन्दुत्व या इस्लाम के प्रति पूरी वफादारी रखना है।”
के० पी० करुणाकरण के अनुसार, “भारत में साम्प्रदायिकता का अर्थ वह विचारधारा है जो किसी विशेष धार्मिक समुदाय या जाति के सदस्यों के हितों के विकास का समर्थन करती है।”

प्रश्न 23. राजनीतिक हिंसा लोकतन्त्र के लिए खतरा कैसे है?
अथवा
भारतीय लोकतंत्र पर राजनैतिक हिंसा के कोई चार प्रभाव लिखिए।
उत्तर-

  • लोकतन्त्रीय संस्थाएं हिंसा के भय के वातावरण में कार्य करती हैं। ऐसे वातावरण में चुनाव अवश्य होते हैं, परन्तु इसमें मतदाता अपनी इच्छानुसार मतदान नहीं करते हैं।
  • हिंसा को रोकने के लिए सरकार को पुलिस, अर्द्धसैनिक बलों पर बहुत अधिक धन खर्च करना पड़ता है। यह खर्च राष्ट्रीय कोष पर बोझ बनता है जिस कारण सरकार अपनी विकास नीतियों का कार्य पूरा नहीं कर पाती है।
  • हिंसा सत्य की आवाज़ का दुश्मन है। कई राजनीतिक नेता हिंसा के कारण अपनी इच्छा को लोगों के सामने प्रकट नहीं कर पाते हैं जिस कारण सरकार की गतिविधियों की जानकारी लोगों को स्पष्ट रूप से नहीं मिल पाती है।
  • राजनीतिक हिंसा के कारण लोग राजनीति से दूर रहते हैं।

प्रश्न 24. राजनैतिक हिंसा बढ़ने के कोई चार कारण लिखिए।
उत्तर-राजनीतिक हिंसा बढ़ती जा रही है। इसके मुख्य कारण इस प्रकार हैं-

  1. चुनावों के समय की जाने वाली रैलियों, सभाओं आदि में राजनीतिक नेता एक-दूसरे पर गम्भीर आरोप प्रत्यारोप लगाते हैं जिससे हिंसा भड़कती है।
  2. चुनावों के दौरान अल्पसंख्यकों के विरुद्ध उन्मादी नारेबाजी की जाती है जिससे हिंसक घटनाएं होती हैं।
  3. राजनीतिक नेताओं द्वारा चुनाव जीतने के लिए हथियारबंद लोगों और पेशेवर अपराधियों का प्रयोग किया जाता है। ये लोग हिंसा भड़काने का कार्य करते हैं। .
  4. क्षेत्रवादी प्रवृत्तियों के कारण भी राजनीतिक हिंसा बढ़ी है।

प्रश्न 25. जनजीवन में बढ़ रही हिंसा को कैसे रोका जा सकता है ?
अथवा
सार्वजनिक जीवन में बढ़ रही हिंसा को कैसे रोका जा सकता है?
उत्तर-जनजीवन में बढ़ रही हिंसा को निम्नलिखित ढंग से रोका जा सकता है-

  • शिक्षा का प्रसार-हिंसा के न्यूनीकरण के लिए शिक्षा का प्रसार करना अति आवश्यक है। शिक्षित व्यक्ति हिंसा के स्थान पर शान्तिपूर्ण और संवैधानिक साधनों को अपनाना अधिक पसन्द करता है।
  • आर्थिक समानता-हिंसा के न्यूनीकरण के लिए आर्थिक असमानता को दूर करके आर्थिक समानता स्थापित की जानी चाहिए। ग़रीबी को दूर करके हिंसा को कम किया जाता है।
  • धर्म-निरपेक्षता-साम्प्रदायिकता हिंसा को बढ़ावा देती है। अतः धर्म-निरपेक्षता की स्थापना करके राजनीति में हिंसा को कम किया जाता है।
  • क्षेत्रीय असन्तुलन को समाप्त किया जाना चाहिए।

प्रश्न 26. राजनीतिक दल-बदली भारतीय संसदीय सरकार के लिए किस प्रकार से खतरा है ?
उत्तर-

  • राजनीतिक दल-बदली से राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है।
  • राजनीतिक दल-बदली अवसरवाद की राजनीति को बढ़ावा देती है।
  • राजनीतिक दल-बदली से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।
  • राजनीतिक दल-बदली से मतदाताओं का विश्वास संसदीय शासन प्रणाली में कम होता है।

प्रश्न 27. भाषावाद ने भारतीय लोकतंत्र को कैसे प्रभावित किया है ?
उत्तर-

  • भाषावाद ने राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को नुकसान पहुंचाया है।
  • सन् 1956 में राज्यों का भाषा के आधार पर पुनर्गठन किया गया था। ।
  • भाषा के आधार पर ही लोगों में क्षेत्रवाद की भावना का विकास हुआ है।
  • भाषायी आधार पर राजनीतिक दलों का निर्माण हुआ है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. संसदीय शासन प्रणाली का अर्थ लिखें।
उत्तर-संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। संसदीय सरकार शासन की वह प्रणाली है जिसमें कार्यपालिका (मन्त्रिमण्डल) अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका (संसद्) के प्रति उत्तरदायी होती है और तब तक अपने पद पर रहती है जब तक इसको संसद् का विश्वास प्राप्त रहता है। जिस समय कार्यपालिका संसद् का विश्वास खो बैठे तभी कार्यपालिका को त्याग-पत्र देना पड़ता है।

प्रश्न 2. संसदीय सरकार की दो विशेषताएं बताइएं।
उत्तर-

  • प्रधानमन्त्री का नेतृत्व-संसदीय सरकार में कार्यपालिका का असली मुखिया प्रधानमन्त्री होता है। राजा या राष्ट्रपति कार्यपालिका का नाम मात्र का मुखिया होता है। प्रशासन की वास्तविक शक्तियां प्रधानमन्त्री के पास होती हैं।
  • कार्यपालिका विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी-मन्त्रिमण्डल अपने सभी कार्यों के लिए विधानमण्डल के प्रति संयुक्त रूप से उत्तरदायी होता है।

प्रश्न 3. भारतीय संसदीय प्रणाली की दो मुख्य विशेषताएं लिखें।
उत्तर-

  • नाममात्र तथा वास्तविक कार्यपालिका में भेद-राष्ट्रपति राज्य का नाममात्र का अध्यक्ष है जबकि वास्तविक कार्यपालिका मन्त्रिमण्डल है। संविधान में कार्यपालिका की समस्त शक्तियां राष्ट्रपति को दी गई हैं, परन्तु राष्ट्रपति उन शक्तियों का इस्तेमाल स्वयं अपनी इच्छा से नहीं कर सकता। राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल की सलाह के अनुसार ही अपनी शक्तियों का प्रयोग करता है।
  • कार्यपालिका तथा संसद् में घनिष्ठ सम्बन्ध-मन्त्रिमण्डल के सभी सदस्य संसद् के सदस्य होते हैं। मन्त्रिमण्डल के सदस्य संसद् की बैठकों में भाग लेते हैं, विचार प्रकट करते हैं और बिल पेश करते हैं।

प्रश्न 4. भारतीय लोकतन्त्र की दो मुख्य समस्याएं लिखो।
उत्तर-

  1. सामाजिक असमानता- भारतीय लोकतन्त्र की एक महत्त्वपूर्ण समस्या सामाजिक असमानता है। सामाजिक असमानता ने लोगों में निराशा तथा असन्तोष को बढ़ावा दिया है।
  2. ग़रीबी-भारत की अधिकांश जनता ग़रीब है। ग़रीब व्यक्ति के पास समाज और देश की समस्याओं पर विचार करने का न तो समय होता है और न ही इच्छा। ग़रीब व्यक्ति चुनाव लड़ने की बात तो दूर, ऐसा सोच भी नहीं सकता।

प्रश्न 5. ग़रीबी के भारतीय लोकतंत्र पर कोई दो प्रभाव लिखें।
उत्तर-

  1. भारत की अधिकांश जनता ग़रीब है। ग़रीबी कई बुराइयों की जड़ है। ग़रीब व्यक्ति सदा अपना पेट भरने की चिन्ता में लगा रहता है और उसके पास समाज और देश की समस्याओं पर विचार करने का न तो समय होता है और न ही इच्छा।
  2. ग़रीब व्यक्ति चुनाव लड़ना तो दूर की बात, वह चुनाव की बात भी नहीं सोच सकता। ग़रीब नागरिक वोट का भी स्वतन्त्रतापूर्वक प्रयोग नहीं कर सकता। वह अपने मालिकों के विरुद्ध मतदान नहीं कर सकता। ग़रीब व्यक्ति अपने वोट को बेच डालता है।

प्रश्न 6. भ्रष्टाचार के लोकतंत्र पर कोई दो प्रभाव लिखें।
उत्तर-

  1. भ्रष्टाचार ने लोकतंत्र के नैतिक चरित्र पर नकारात्मक प्रभाव डाला है।
  2. भ्रष्टाचार के कारण ईमानदार एवं गरीब व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ पाते।

प्रश्न 7. आर्थिक असमानता भारतीय लोकतन्त्र को कैसे प्रभावित करती है ?
उत्तर-भारत में बहुत अधिक आर्थिक असमानता पायी जाती है। आर्थिक असमानता ने भारतीय लोकतन्त्र को काफ़ी प्रभावित किया है। अमीर लोग राजनीतिक दलों को धन देते हैं और प्रायः धनी व्यक्तियों को ही चुनाव लड़ने के लिए पार्टी के टिकट दिए जाते हैं। चुनावों में धन का बहुत महत्त्व है और धन-बल पर तो चुनाव भी जीते जाते हैं।

प्रश्न 8. जातिवाद लोकतन्त्र को किस तरह प्रभावित करता है ?
उत्तर-

  • चुनाव के समय उम्मीदवारों का चयन करते समय जातिवाद को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है।
  • राजनीतिक दल विशेषकर क्षेत्रीय दल खुलेआम जाति का समर्थन करते हैं।

प्रश्न 9. भारत में लोकतन्त्र की सफलता के लिए किन्हीं दो ज़रूरी शर्तों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-

  1. जागरूक नागरिकता-जागरूक नागरिकता भारतीय लोकतन्त्र की सफलता के लिए आवश्यक है। निरन्तर देख-रेख ही स्वतन्त्रता की कीमत है।
  2. शिक्षित नागरिक-भारतीय लोकतन्त्र की सफलता के लिए नागरिकों का शिक्षित होना अनिवार्य है। शिक्षित नागरिक प्रजातन्त्र शासन की आधारशिला हैं।

प्रश्न 10. साम्प्रदायिकता के भारतीय लोकतंत्र पर कोई दो प्रभाव लिखें।
उत्तर-

  1. भारत में अनेक राजनीतिक दलों का निर्माण धर्म के आधार पर हुआ है।
  2. चुनावों में प्रायः सभी राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों का चयन करते समय साम्प्रदायिकता को महत्त्व देते हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1. भारत में संसदीय सरकार की कोई एक विशेषता लिखो।
अथवा
भारतीय संसदीय प्रणाली की एक विशेषता लिखो।
उत्तर-भारत में कार्यपालिका एवं विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है।

प्रश्न 2. भारत में नाममात्र कार्यपालिका का अध्यक्ष कौन है ?
उत्तर-भारत में नाममात्र कार्यपालिका अध्यक्ष राष्ट्रपति है।

प्रश्न 3. भारत द्वारा संसदीय प्रणाली के चुनाव करने का एक कारण लिखो।
उत्तर भारत में संसदीय प्रणाली पहले से ही प्रचलित थी। इसी कारण राजनीतिज्ञों ने इसका समर्थन किया।

प्रश्न 4. भारतीय संसदीय प्रणाली का एक दोष लिखो।
उत्तर-भारत में अच्छी संसदीय परम्पराओं का अभाव है।

प्रश्न 5. राजनीतिक एकरूपता से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-राजनीतिक एकरूपता से अभिप्राय यह है कि मन्त्रिपरिषद् के सभी सदस्य प्रायः एक ही राजनीतिक दल से लिये जाते हैं।

प्रश्न 6. सामाजिक असमानता भारतीय लोकतन्त्र के लिए किस प्रकार समस्या है?
उत्तर–सामाजिक रूप से दबे लोग राजनीति में क्रियाशील भूमिका नहीं निभाते।

प्रश्न 7. सामूहिक उत्तरदायित्व से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर-मन्त्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है। मन्त्रिपरिषद् एक इकाई की तरह काम करती है और यदि विधानपालिका किसी एक मन्त्रि के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पास कर दे तो सब मन्त्रियों को अपना पद छोड़ना पड़ता है।

प्रश्न 8. भारतीय लोकतन्त्र को गरीबी कैसे प्रभावित करती है ?
अथवा
गरीबी का भारतीय लोकतन्त्र पर क्या प्रभाव है ?
उत्तर-गरीब व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ पाते।

प्रश्न 9. भारत में बेरोज़गारी ने लोकतंत्र को कैसे प्रभावित किया है ?
उत्तर-बेरोज़गार व्यक्ति सफल मतदाता की भूमिका नहीं निभा सकता।

प्रश्न 10. संसदीय शासन प्रणाली में लोकसभा को कौन किसके कहने पर भंग कर सकता है ?
उत्तर-राष्ट्रपति लोकसभा को प्रधानमन्त्री (मन्त्रिपरिषद्) के कहने पर भंग कर सकता है।

प्रश्न 11. संसदीय शासन प्रणाली में मन्त्रिमण्डल को कौन भंग (स्थगित) कर सकता है ?
उत्तर-संसदीय शासन प्रणाली में मन्त्रिमण्डल को प्रधानमन्त्री की सलाह पर राष्ट्रपति भंग कर सकता है।

प्रश्न 12. कानून के शासन से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-कानून के शासन का अर्थ है देश में कानून सर्वोच्च है और कानून से ऊपर कोई नहीं है।

प्रश्न 13. व्यक्तिगत उत्तरदायित्व से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर-व्यक्तिगत उत्तरदायित्व से अभिप्राय यह है, कि प्रत्येक मन्त्री अपने विभाग का व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होता है।

प्रश्न 14. भारत में असली कार्यपालिका कौन है ?
उत्तर-भारत में असली कार्यपालिका प्रधानमन्त्री एवं मन्त्रिमण्डल है।

प्रश्न 15. भ्रष्टाचार का भारतीय लोकतन्त्र पर क्या प्रभाव है ?
उत्तर-भ्रष्टाचार के कारण भारतीय लोकतन्त्र में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी है।

प्रश्न 16. भारत में अब तक कितने लोक सभा चुनाव हो चुके हैं ?
उत्तर-भारत में अब तक लोकसभा के 16 आम चुनाव हो चुके हैं।

प्रश्न 17. आर्थिक असमानता का भारतीय लोकतन्त्र पर क्या प्रभाव है ?
उत्तर-राजनीतिक शक्ति पूंजीपतियों के हाथों में केन्द्रित होकर रह गई है।

प्रश्न 18. भारतीय लोकतन्त्र को जातिवाद कैसे प्रभावित करता है ?
उत्तर-चुनावों में जाति के नाम पर लोगों से वोट मांगें जाते हैं।

प्रश्न 19. भारतीय लोकतन्त्र पर साम्प्रदायिकता का क्या प्रभाव है ?
उत्तर-भारत में साम्प्रदायिक दल पाए जाते हैं।

प्रश्न 20. भारत में निरक्षरता का मुख्य कारण क्या है ?
उत्तर-भारत में निरक्षरता का मुख्य कारण बढ़ती हुई जनसंख्या एवं निर्धनता है।

प्रश्न 21. भारत में लोकतन्त्र का भविष्य क्या है ?
उत्तर-भारत में लोकतन्त्र का भविष्य उज्ज्वल है।

प्रश्न 22. भारत में अनपढ़ता ने लोकतन्त्र को कैसे प्रभावित किया है ?
अथवा
अनपढ़ता का भारतीय लोकतन्त्र पर क्या प्रभाव है ?
उत्तर-अनपढ़ व्यक्ति अपने मत का उचित प्रयोग नहीं कर सकता। प्रश्न 23. भारत में सर्वोच्च शक्ति किसके पास है ? उत्तर-भारत में सर्वोच्च शक्ति जनता के पास है।

प्रश्न 24. क्षेत्रवाद के कौन-से दो पहलू हैं ?
उत्तर-

  1. राजनीतिक पहलू
  2. आर्थिक पहलू।

प्रश्न 25. जाति हिंसा का क्या अर्थ है ?
उत्तर-अन्तर्जातीय हिंसा को जाति हिंसा कहा जाता है।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. भारत में स्वतन्त्रता के पश्चात् ……………. की स्थापना की गई।
2. भारत में …………… शासन प्रणाली पाई जाती है।
3. भारत में ………….. वर्ष के नागरिक को मताधिकार प्राप्त है।
4. भारत में ………….. संशोधन द्वारा मताधिकार की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई।
5. सैय्यद काज़ी एवं शिब्बन लाल सक्सेना ने संविधान सभा में ……………लोकतंत्र की जोरदार वकालत की।
उत्तर-

  1. प्रजातन्त्र
  2. संसदीय
  3. 18
  4. 61वें
  5. अध्यक्षात्मक ।

प्रश्न III. निम्नलिखित वाक्यों में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें

1. संसदीय शासन प्रणाली में उत्तरदायित्व का अभाव पाया जाता है।
2. प्रधानमंत्री लोकसभा को भंग नहीं करवा सकता।
3. संविधान के 86वें संशोधन द्वारा, अनुच्छेद 21-A मुफ्त व ज़रूरी शिक्षा का प्रबन्ध करती है।
4. 2014 के लोकसभा के चुनावों के पश्चात् भारतीय जनता पार्टी को विपक्षी दल की मान्यता प्रदान की गई।
5. भारत में राजनीतिक अपराधीकरण बढ़ता ही जा रहा है।
उत्तर-

  1. ग़लत
  2. ग़लत
  3. सही
  4. ग़लत
  5. सही।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1. भारतीय लोकतंत्र के समक्ष कौन-कौन सी चुनौतियां हैं ?
(क) ग़रीबी
(ख) अनपढ़ता
(ग) बेकारी
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 2. आर्थिक असमानता को कम करने के लिए क्या करना चाहिए ?
(क) पंचवर्षीय योजनाएं लागू की जानी चाहिएं
(ख) आर्थिक सुधार से संबंधित कार्यक्रम लागू किये जाने चाहिएं
(ग) सामुदायिक विकास कार्यक्रम लागू किये जाने चाहिएं
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 3. निम्नलिखित में से एक भारत में ग़रीबी का कारण है-
(क) विशाल जनसंख्या
(ख) शिक्षा
(ग) विकास
(घ) जागरूकता।
उत्तर-(क) विशाल जनसंख्या

प्रश्न 4. यह किसने कहा है, “स्वतंत्रता के पश्चात् राजनीतिक क्षेत्र में जाति का प्रभाव पहले की अपेक्षा बढ़ा है
(क) मोरिस जोन्स
(ख) रजनी कोठारी
(ग) डॉ० बी० आर० अंबेडकर
(घ) वी० के० आर० मेनन।
उत्तर-(घ) वी० के० आर० मेनन।

Class 11 Political Science Solutions Chapter 15 सरकारों के रूप-संसदीय और अध्यक्षात्मक सरकारें

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. संसदात्मक सरकार की मुख्य विशेषताएं बताइए।
(Describe the chief characteristics of the parliamentary form of government.)
अथवा
संसदीय सरकार क्या है ? संसदीय सरकार की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करो।
(What is parliamentary government ? Discuss the main features of parliamentary Government.)
उत्तर-कार्यपालिका और विधानपालिका के सम्बन्धों के आधार पर दो प्रकार के शासन होते हैं-संसदीय तथा अध्यक्षात्मक। यदि कार्यपालिका और विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध हों और दोनों एक-दूसरे का अटूट भाग हों तो संसदीय सरकार होती है और यदि कार्यपालिका तथा विधानपालिका एक-दूसरे से लगभग स्वतन्त्र हों तो अध्यक्षात्मक सरकार होती है।

संसदीय सरकार का अर्थ (Meaning of Parliamentary Government)–संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। संसदीय सरकार शासन की वह प्रणाली है जिसमें कार्यपालिका (मन्त्रिमण्डल) अपने समस्त कार्यों के लिए संसद् (विधानपालिका) के प्रति उत्तरदायी होती है और अब तक अपने पद पर रहती है जब तक इसको संसद् का विश्वास प्राप्त रहता है। जिस समय कार्यपालिका संसद् का विश्वास खो बैठे तभी कार्यपालिका को त्याग-पत्र देना पड़ता है। संसदीय सरकार को उत्तरदायी सरकार (Responsible Government) भी कहा जाता है क्योंकि इसमें सरकार अपने समस्त कार्यों के लिए उत्तरदायी होती है। इस सरकार को कैबिनेट सरकार (Cabinet Government) भी कहा जाता है क्योंकि इसमें कार्यपालिका की शक्तियां कैबिनेट द्वारा प्रयोग की जाती हैं।

1. डॉ० गार्नर (Dr. Garner) का मत है कि, “संसदीय सरकार वह प्रणाली है जिसमें वास्तविक कार्यपालिका, मन्त्रिमण्डल या मन्त्रिपरिषद् अपनी राजनीतिक नीतियों और कार्यों के लिए प्रत्यक्ष तथा कानूनी रूप से विधानमण्डल या उसके एक सदन (प्रायः लोकप्रिय सदन) के प्रति और राजनीतिक तौर पर मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी हो जबकि राज्य का अध्यक्ष संवैधानिक या नाममात्र कार्यपालिका हो और अनुत्तरदायी हो।”

2. गैटेल (Gettell) के अनुसार, “संसदीय शासन प्रणाली शासन के उस रूप को कहते हैं जिसमें प्रधानमन्त्री तथा मन्त्रिपरिषद् अर्थात् वास्तविक कार्यपालिका अपने कार्यों के लिए कानूनी दृष्टि से विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है। चूंकि विधानपालिका के दो सदन होते हैं अतः मन्त्रिमण्डल वास्तव में उस सदन के नियन्त्रण में होता है जिसे वित्तीय मामलों पर अधिक शक्ति प्राप्त होती है जो मतदाताओं का अधिक सीधे ढंग से प्रतिनिधित्व करता है।”
इस परिभाषा से यह स्पष्ट है कि संसदीय सरकार में मन्त्रिमण्डल अपने समस्त कार्यों के लिए विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी होता है और राज्य का नाममात्र का मुखिया किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होता।

संसदीय सरकार को सर्वप्रथम इंग्लैंड में अपनाया गया था। आजकल इंग्लैंड के अतिरिक्त जापान, कनाडा, नार्वे, स्वीडन, बंगला देश तथा भारत में भी संसदीय सरकारें पाई जाती हैं।

संसदीय सरकार के लक्षण
(Features of Parliamentary Government)-

संसदीय प्रणाली के निम्नलिखित लक्षण होते हैं-
1. राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का सत्ताधारी (Head of the State is Nominal Executive)-संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का सत्ताधारी होता है। सैद्धान्तिक रूप में तो राज्य की सभी कार्यपालिका शक्तियां राज्य के अध्यक्ष के पास होती हैं और उनका प्रयोग भी उनके नाम पर होता है, पर वह उनका प्रयोग अपनी इच्छानुसार नहीं कर सकता। उसकी सहायता के लिए एक मन्त्रिमण्डल होता है, जिसकी सलाह के भार ही उस अपनी शक्तियों का प्रयोग करना पड़ता है। अध्यक्ष का काम तो केवल हस्ताक्षर करना है।

2. मन्त्रिमण्डल वास्तविक कार्यपालिका होती है (Cabinet is the Real Executive)-राज्य के अध्यक्ष के नाम में दी गई शक्तियों का वास्तविक प्रयोग मन्त्रिमण्डल करता है। अध्यक्ष के लिए मन्त्रिमण्डल से सलाह मांगना और मानना अनिवार्य है। मन्त्रिमण्डल ही अन्तिम फैसला करता है और वही देश का वास्तविक शासक है। शासन का प्रत्येक विभाग एक मन्त्री के अधीन होता है और सब कर्मचारी उसके अधीन काम करते हैं। हर मन्त्री अपने विभागों का काम मन्त्रिमण्डल की नीतियों के अनुसार चलाने के लिए उत्तरदायी होता है।

3. कार्यपालिका और व्यवस्थापिका में घनिष्ठ सम्बन्ध (Close Relation between Executive and Legislature)-संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका में घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है। मन्त्रिमण्डल वास्तविक कार्यपालिका होती है। इसके सदस्य अर्थात् मन्त्री संसद् में से ही लिए जाते हैं। ये मन्त्री संसद् की बैठकों में भाग लेते हैं, बिल पेश करते हैं, बिलों पर बोलते हैं और यदि सदन के सदस्य हों तो मतदान के समय मत का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार मन्त्री प्रशासक (Administrator) भी हैं, कानून-निर्माता (Legislator) भी।

4. मन्त्रिमण्डल का उत्तरदायित्व (Responsibility of the Cabinet)—कार्यपालिका अर्थात मन्त्रिमा अपने सब कार्यों के लिए व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है। संसद् सदस्य मन्त्रियों से प्रश्न पूट सकते हैं, जिनका उन्हें उत्तर देना पड़ता है। मन्त्रिमण्डल अपनी नीति निश्चित करता है, उसे संसद् के सामने रखता है तथा उसका समर्थन प्राप्त करता है। मन्त्रिमण्डल, अपना कार्य संसद् की इच्छानुसार ही करता है।

5. उत्तरदायित्व सामूहिक होता है (Collective Responsibility)-मन्त्रिमण्डल इकाई के रूप में कार्य करता है और मन्त्री सामूहिक रूप से संसद् के प्रति उत्तरदायी होते हैं। यदि संसद् एक मन्त्री के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पास कर दे तो समस्त मन्त्रिमण्डल को अपना पद छोड़ना पड़ता है। किसी विशेष परिस्थिति में एक मन्त्री अकेला भी हटाया जा सकता है।

6. मन्त्रिमण्डल का अनिश्चित कार्यकाल (Tenure of the Cabinet is not Fixed)-मन्त्रिमण्डल की अवधि भी निश्चित नहीं होती। संसद् की इच्छानुसार ही वह अपने पद पर रहते हैं। संसद् जब चाहे मन्त्रिमण्डल को अपदस्थ कर सकती है, अर्थात् यदि निम्न सदन का बहुमत मन्त्रिमण्डल के विरुद्ध हो तो उसे अपना पद छोड़ना पड़ता है। यही कारण है कि निम्न सदन के नेता को ही प्रधानमन्त्री नियुक्त किया जाता है और उसकी इच्छानुसार ही दूसरे मन्त्रियों की नियुक्ति होती है।

7. मन्त्रिमण्डल की राजनीतिक एकरूपता (Political Homogeneity of the Cabinet)—संसदीय सरकार की एक विशेषता यह भी है कि इसमें मन्त्रिमण्डल के सदस्य एक ही राजनीतिक दल से सम्बन्धित होते हैं। यह आवश्यक भी है क्योंकि जब तक मन्त्री एक ही विचारधारा और नीतियों के समर्थक नहीं होंगे, मन्त्रिमण्डल में सामूहिक उत्तरदायित्व विकसित नहीं हो सकेगा।

8. गोपनीयता (Secrecy)-संसदीय सरकार में पद सम्भालने से पूर्व मन्त्री संविधान के प्रति वफादार रहने तथा सरकार के रहस्यों को गुप्त रखने की शपथ लेते हैं। कोई भी मन्त्री मन्त्रिमण्डल में हुए वाद-विवाद तथा निर्णयों को मन्त्रिमण्डल की स्वीकृति के बिना घोषित नहीं कर सकता। यदि कोई मन्त्रिमण्डल के रहस्यों की सूचना दूसरे लोगों को देता है तो कानून के अनुसार उसे सख्त दण्ड दिया जाता है।

9. प्रधानमन्त्री का नेतृत्व (Leadership of the Prime Minister)-संसदीय शासन प्रणाली में मन्त्रिमण्डल प्रधानमन्त्री के नेतृत्व में कार्य करता है। जिस दल का बहुमत होता है उसके नेता को प्रधानमन्त्री नियुक्त किया जाता है। प्रधानमन्त्री मन्त्रिमण्डल का निर्माण करता है, मन्त्रियों में विभाग बांटता है, मन्त्रिमण्डल की बैठकों की अध्यक्षता करता है और सभी मन्त्री उसके अधीन कार्य करते हैं।

10. प्रधानमन्त्री संसद् के निम्न सदन को भंग कराने का अधिकार रखता है (Right of the Prime Minister to get the Lower House of the Parliament dissolved)–संसदीय शासन प्रणाली में प्रधानमन्त्री की सिफ़ारिश पर ही राष्ट्रपति या राजा संसद् के निम्न सदन को भंग करता है।

प्रश्न 2. संसदीय सरकार के गुणों और दोषों की व्याख्या करें।
(Discuss the merits and demerits of Parliamentary Government.)
उत्तर-
संसदीय सरकार के गुण (Merits of Parliamentary Government)-
संसदीय शासन प्रणाली में बहुत-से गुण हैं-

1. कार्यपालिका तथा विधानपालिका में पूर्ण सहयोग (Complete Harmony between the Executive and Legislature)–संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग बना रहता है। मन्त्रिमण्डल के सदस्य विधानपालिका के सदस्य होते हैं, बैठकों में भाग लेते हैं तथा बिल पास करते हैं। कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग के कारण अच्छे कानूनों का निर्माण होता है तथा शासन में दक्षता आती है।

2. उत्तरदायी सरकार (Responsible Government)—संसदीय सरकार में सरकार अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है। मन्त्रिमण्डल अपनी शक्तियों का प्रयोग अपनी इच्छा से न करके विधानमण्डल की इच्छानुसार कार्य करता है। विधानपालिका के सदस्य मन्त्रियों से प्रश्न पूछते हैं, काम रोको प्रस्ताव पेश करते हैं तथा निन्दा प्रस्ताव पास करते हैं और यदि मन्त्रिमण्डल अपनी मनमानी करता है विधानमण्डल अविश्वास प्रस्ताव पास करके मन्त्रिमण्डल को हटा सकता है।

3. सरकार निरंकुश नहीं बन सकती (Government cannot become Despotic)-मन्त्रिमण्डल अपने कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होने के कारण निरंकुश नहीं बन सकता। यदि मन्त्रिमण्डल अपनी मनमानी करता है तो विधानपालिका अविश्वास प्रस्ताव पास करके उसे हटा सकती है। विरोधी दल सरकार की आलोचना करके जनमत को अपने पक्ष में करने का प्रयत्न करता है। विरोधी दल सरकार को निरंकुश नहीं बनने देता।

4. परिवर्तनशील सरकार (Flexible Government)—संसदीय सरकार का यह भी गुण है कि इसमें सरकार परिवर्तनशील होती है। सरकार को समय के अनुसार बदला जा सकता है। उदाहरणस्वरूप द्वितीय महायुद्ध में जब इंग्लैण्ड में चेम्बरलेन सफल न हो सका तो उसके स्थान पर चर्चिल को प्रधानमन्त्री बनाया गया।

5. सरकार जनमत के अनुसार चलती है (Government is responsive to Public Opinion)–संसदीय शासन प्रणाली में सरकार जनमत की इच्छानुसार शासन को चलाती है। मन्त्री विधानपालिका के सदस्य होते हैं और इस प्रकार वे जनता के प्रतिनिधि होते हैं। बहुमत दल ने चुनाव के समय जनता के साथ कुछ वायदे किए होते हैं। इन वायदों को पूरा करने के लिए मन्त्रिमण्डल अपनी नीतियों का निर्माण करता है। मन्त्री सदा जनमत के अनुसार कार्य करते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि यदि उन्होंने जनता की इच्छाओं को पूरा न किया तो उन्हें अगले चुनाव में बहुमत प्राप्त नहीं होगा।

6. योग्य व्यक्तियों का शासन (Government by Able Men)-संसदीय शासन प्रणाली में योग्य व्यक्तियों का शासन होता है। बहुमत दल उसी व्यक्ति को नेता चुनता है जो दल में सबसे योग्य, बुद्धिमान तथा लोकप्रिय हो। प्रधानमन्त्री उन्हीं व्यक्तियों को मन्त्रिमण्डल में शामिल करता है जो शासन चलाने के योग्य होते हैं। यदि कभी अनजाने में अयोग्य व्यक्ति को मन्त्री बना भी दिया जाए तो बाद में उसे हटाया जा सकता है। मन्त्रियों को अपने विभागों का प्रबन्ध करने के लिए स्वतन्त्रता प्राप्त होती है जिससे मन्त्रियों को अपनी योग्यता दिखाने का अवसर मिलता है।

7. जनता को राजनीतिक शिक्षा मिलती है (Political Education to the People) संसदीय सरकार राजनीतिक दलों पर आधारित होती है। प्रत्येक दल जनमत को अपने पक्ष में करने के लिए अपनी नीतियों का प्रचार करता है और दूसरे दलों की नीतियों की आलोचना करता है। इस तरह जनता को विभिन्न दलों की नीतियों का पता चलता है। चुनाव के पश्चात् भी विरोधी दल सरकार की नीतियों की आलोचना करके जनमत को अपने पक्ष में करने का प्रयत्न करता है और सत्तारूढ़ दल सरकार की नीतियों का समर्थन करता है। इस प्रकार जनता को बहुत राजनीतिक शिक्षा मिलती है जिससे नागरिक राजनीतिक विषयों में रुचि लेने लगता है।

8. राज्य का अध्यक्ष निष्पक्ष सलाह देता है (Head of the State gives Impartial Advice)-राज्य का अध्यक्ष किसी राजनीतिक पार्टी से सम्बन्धित नहीं होता जिस कारण उसकी सलाह निष्पक्ष होती है। राज्य का अध्यक्ष सदा राष्ट्र के हित में सलाह देता है जिसे प्रधानमन्त्री प्रायः मान लेता है।

9. राजतन्त्र को प्रजातन्त्र में बदलना (Monarchy changed into Democracy)–संसदीय शासन प्रणाली का यह भी गुण है कि इसने राजतन्त्र को प्रजातन्त्र में बदल दिया है। संसदीय सरकार में शासन का मुखिया तथा राज्य का मुखिया अलग-अलग होता है। राजा राज्य का मुखिया होता है जबकि प्रधानमन्त्री शासन का मुखिया होता है। यदि आज इंग्लैण्ड में राजतन्त्रीय व्यवस्था होते हुए भी प्रजातन्त्र शासन है तो इसका श्रेय संसदीय शासन प्रणाली को है।

10. वैकल्पिक शासन की व्यवस्था (Provision for Alternative Government)-संसदीय शासन प्रणाली में मन्त्रिमण्डल तब तक अपने पद पर बना रहता है जब तक उसे विधानमण्डल का विश्वास प्राप्त रहता है। अविश्वास प्रस्ताव पास होने की दशा में मन्त्रिमण्डल को त्याग-पत्र देना पड़ता है तब विरोधी दल सरकार बनाता है। इस प्रकार प्रशासन लगातार चलता है और शासन में रुकावट नहीं पड़ती।

संसदीय सरकार के दोष (Demerits of Parliamentary Government)-

1. यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है (It is against the theory of Separation of Powers)–संसदीय सरकार शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है। शक्तियों के केन्द्रीयकरण से व्यक्तियों की निजी स्वतन्त्रता खतरे में पड़ सकती है। संसदीय सरकार में शासन चलाने की शक्ति तथा कानून निर्माण की शक्ति मन्त्रिमण्डल के पास केन्द्रित होती है। मन्त्री विधानपालिका के सदस्य होते हैं, बिल पेश करते हैं तथा पास करवाते हैं। प्रधानमन्त्री राज्य के अध्यक्ष को सलाह देकर विधानपालिका के निम्न सदन को भंग करवा सकता है। इस प्रकार यह शासन प्रणाली शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है।

2. अस्थिर सरकार (Unstable Government)—संसदीय शासन प्रणाली में सरकार अस्थिर होती है क्योंकि मन्त्रिमण्डल की अवधि निश्चित नहीं होती। विधानपालिका किसी भी समय अविश्वास प्रस्ताव पास करके मन्त्रिमण्डल को हटा सकती है। जिन देशों में दो से अधिक राजनीतिक दल होते हैं वहां पर सरकार बहुत अस्थिर होती है। सरकार अस्थिर होने के कारण लम्बे काल की योजनाएं नहीं बनाई जा सकतीं।

3. नीति में निरन्तरता की कम सम्भावना (Less Possibility of Continuity of Policy)—संसदीय शासन प्रणाली में सरकार की स्थिरता की कम सम्भावना रहती है। इसलिए शासन की नीतियों में निरन्तरता नहीं रहती। कार्यपालिका को विधानपालिका जब चाहे पद से हटा सकती है। इस प्रकार कभी एक राजनीतिक दल का शासन होता है तो कभी दूसरा दल सत्ता में आ जाता है। इसी कारण इस प्रणाली में नीति की निरन्तरता की सम्भावना कम रहती है।

4. शासन में दक्षता का अभाव (Administration lacks Efficiency)—इस शासन प्रणाली में शासन में दक्षता का अभाव होता है, क्योंकि इसमें शासन की बागडोर अनाड़ियों के हाथ में होती है। मन्त्रियों की नियुक्ति योग्यता के आधार पर न होकर राजनीतिक आधार पर होती है। कई बार मन्त्री को उस विभाग का अध्यक्ष भी बना दिया जाता है जिसके बारे में बिल्कुल ज्ञान ही नहीं होता।

5. मन्त्रिमण्डल की तानाशाही का भय (Danger of Dictatorship of the Cabinet)—संसदीय शासन प्रणाली में जहां केवल दो दल होते हैं वहां मन्त्रिमण्डल की तानाशाही स्थापित हो जाती है। जिस दल को विधानपालिका में बहुमत प्राप्त होता है उसी दल का मन्त्रिमण्डल बनता है और मन्त्रिमण्डल तब तक अपने पद पर रहता है जब तक उसे बहुमत का समर्थन प्राप्त रहता है। दल में अनुशासन के कारण दल का प्रत्येक सदस्य मन्त्रिमण्डल की नीतियों का समर्थन करता है। विरोधी दल की आलोचना का मन्त्रिमण्डल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और मन्त्रिमण्डल अगले चुनाव तक अपनी मनमानी कर सकता है।

6. संसद् की दुर्बल स्थिति (Weak Position of the Parilament)-जिन देशों में राजनीतिक दल होते हैं वहां पर संसद् मन्त्रिमण्डल के हाथों का खिलौना बन जाती है। संसद् की बैठकों की तिथि तथा समय मन्त्रिमण्डल निश्चित करता है। 95% बिल मन्त्रियों द्वारा पेश किए जाते हैं और मन्त्रिमण्डल का बहुमत प्राप्त होने के कारण सभी बिल पास हो जाते हैं। वास्तव में संसद् स्वयं कानून नहीं बनाती बल्कि मन्त्रिमण्डल की सलाह से कानूनों का निर्माण करती है।

7. यह उग्र दलीय भावना को जन्म देती है (It gives birth to Aggressive Partisan Spirit)—यह शासन प्रणाली राजनीतिक दलों पर आधारित होने के कारण उग्र दलीय भावना को जन्म देती है। बहुमत दल अधिक-से-अधिक समय तक शासन पर नियन्त्रण रखना चाहता है और इसके लिए हर कोशिश करता है। दूसरी ओर विरोधी दल शीघ्रसे-शीघ्र सत्तारूढ़ दल को हटा कर स्वयं शासन पर नियन्त्रण करना चाहता है। विरोधी दल सरकार की आलोचना केवल आलोचना करने के लिए करता है। इस तरह सत्तारूढ़ दल तथा विरोधी दल में खींचातानी चलती रहती है।

8. संकटकाल के समय निर्बल सरकार (Weak in time of Emergency)—संकटकाल में शक्तियों का केन्द्रीयकरण होना चाहिए, परन्तु संसदीय सरकार में सभी निर्णय मन्त्रिमण्डल के द्वारा होते हैं और सभी निर्णय बहुमत से स्वीकृत किए जाते हैं। मन्त्रिमण्डल में वाद- विवाद पर काफ़ी समय बरबाद होता है जिससे निर्णय लेने में देरी हो जाती है। संकटकाल में संकट का सामना करने के लिए निर्णयों का शीघ्रता से होना अति आवश्यक है।

9. आलोचना आलोचना के उद्देश्य से (Criticism for the sake of Criticism)-संसदीय प्रणाली का यह दोष भी है कि विरोधी दल सरकार के हर कार्य की आलोचना करता है, चाहे वह अच्छी और जन-हित में भी क्यों न हो। ऐसा करना अच्छी बात नहीं और इससे विरोधी दल की शक्ति भी नष्ट होती है और जनता को भी उचित शिक्षा नहीं मिलती।

10. योग्य व्यक्तियों की उपेक्षा (Able Persons Neglected)—संसदीय प्रणाली में बहुमत दल के सदस्यों को ही मन्त्रिमण्डल में शामिल किया जाता है। चाहे उनमें बहुत-से अयोग्य ही क्यों हों और विरोधी दल के योग्य व्यक्तियों को भी नहीं पूछा जाता। इनसे देश को हानि होती है।

निष्कर्ष (Conclusion)–संसदीय सरकार अनेक दोषों के बावजूद भी अधिक लोकप्रिय है। आज संसार के अधिकांश देशों में संसदीय सरकार को अपनाया गया है। इस शासन प्रणाली की लोकप्रियता का कारण यह है कि इसमें सरकार जनमत की इच्छानुसार शासन चलाती है तथा अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है और इसमें परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन किया जा सकता है।

प्रश्न 3. अध्यक्षात्मक सरकार की मुख्य विशेषताएं बताइए।
(Describe the chief characteristics of the Presidential form of Government.)
अथवा
अध्यक्षात्मक सरकार से आप क्या समझते हैं ? इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
(What do you understand by Presidential form of Government ? Discuss its main features.)
उत्तर- अध्यक्षात्मक सरकार वह शासन प्रणाली है जिसमें कार्यपालिका विधानपालिका से स्वतन्त्र होती है और उसके प्रति उसका कोई उत्तरदायित्व नहीं होता। राज्य का अध्यक्ष राष्ट्रपति होता है और वह वास्तविक शासक होता है। राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तौर पर चुना जाता है और विधानपालिका जब चाहे राष्ट्रपति को नहीं हटा सकती। राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल का निर्माण स्वयं करता है और जब चाहे मन्त्रिमण्डल को तोड़ सकता है। मन्त्रिमण्डल के सदस्य विधानपालिका के सदस्य नहीं होते। इस प्रकार अध्यक्षात्मक सरकार शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त पर आधारित है।

1. डॉ० गार्नर (Garner) के अनुसार, “अध्यक्षात्मक सरकार वह प्रणाली है जिसमें राज्य का अध्यक्ष और मन्त्री अपने कार्यकाल के लिए संवैधानिक तौर पर व्यवस्थापिका से स्वतन्त्र होते हैं और अपनी नीतियों के लिए उसके प्रति उत्तरदायी नहीं होते। इस प्रणाली में राज्य का अध्यक्ष केवल नाममात्र कार्यपालिका नहीं होता बल्कि वास्तविकता कार्यपालिका होता है और संविधान तथा कानूनों द्वारा दी गई शक्तियों का वास्तव में प्रयोग करता है।”
2. गैटेल (Gettell) के अनुसार, “अध्यक्षात्मक शासन-व्यवस्था उसे कहते हैं जिसमें प्रधान कार्यपालिका अपनी नीति एवं कार्यों के बारे में विधानपालिका से स्वतन्त्र होता है।”

संयुक्त राज्य अमेरिका, चिल्ली, मैक्सिको, श्रीलंका, जर्मन, रूस आदि देशों में अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली पाई जाती है।
अध्यक्षात्मक प्रणाली के लक्षण (Features of the Presidential System)-अध्यक्षात्मक प्रणाली में निम्नलिखित प्रमुख बातें होती हैं-

1. नाममात्र तथा वास्तविक कार्यपालिका में भेद नहीं (No distinction between Nominal and Real Executive)-अध्यक्षात्मक सरकार में नाममात्र तथा वास्तविक कार्यपालिका में भेद नहीं पाया जाता। राष्ट्र का अध्यक्ष राष्ट्रपति होता है। उसे संविधान द्वारा जो शक्तियां प्राप्त होती हैं उनका प्रयोग वह अपनी इच्छानुसार करता है। मन्त्रिमण्डल का निर्माण राष्ट्रपति स्वयं करता है और मन्त्रिमण्डल की सलाह को मानना अथवा न मानना राष्ट्रपति पर निर्भर करता है। राष्ट्रपति जब चाहे मन्त्रियों को हटा सकता है।

2. मन्त्रिमण्डल केवल सलाहकार के रूप में (Cabinet is only an Advisory Body)-अध्यक्षात्मक प्रणाली में भी मन्त्रिमण्डल की व्यवस्था होती है, परन्तु इसकी स्थिति संसदीय प्रणाली के मन्त्रिमण्डल की स्थिति से पूर्णतः भिन्न होती है। अध्यक्ष मन्त्रियों की सलाह के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य नहीं होता। मन्त्री केवल सलाहकार ही होते हैं। उसकी अपनी इच्छा है कि मन्त्रियों से सलाह ले या न ले।

3. Cruiuifcich it alareucht at yerCUT (Separation of Executive and Legislature) अध्यक्षात्मक शासन में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका में कोई सम्बन्ध नहीं होता। अध्यक्ष अपने मन्त्री संसद् में से नहीं लेता। मन्त्री संसद् की बैठकों मे न भाग ले सकते हैं, न बिल पेश कर सकते हैं, न भाषण दे सकते हैं। इस प्रकार व्यवस्थापिका और कार्यपालिका में कोई सम्बन्ध नहीं रहता है।

4. कार्यपालिका का अनुत्तरदायित्व (Irresponsibility of the Executive)-अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका अपने कार्यों तथा नीतियों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती। राष्ट्रपति को अविश्वास प्रस्ताव पास करके नहीं हटाया जा सकता। संसद् सदस्य मन्त्रियों से लिखित रूप में प्रश्न पूछ सकते हैं, परन्तु मन्त्री उनका उत्तर दें या न दें, उनकी इच्छा पर निर्भर है। मन्त्री राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किये जाते हैं और वे राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होते हैं।

5. कार्यपालिका की निश्चित अवधि (Fixed Tenure of the Executive)-अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है। विधानपालिका राष्ट्रपति को केवल महाभियोग द्वारा ही हटा सकती है। अमेरिका में राष्ट्रपति चार वर्ष के लिए चुना जाता है और उसे केवल महाभियोग द्वारा ही हटाया जा सकता है।

6.शक्तियों के पृथक्करण पर आधारित (Based on the theory of Separation of Powers)-अध्यक्षात्मक सरकार शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त पर आधारित होती है। इसमें सरकार के मुख्य कार्य तीन विभिन्न अंगों द्वारा किए जाते हैं जो एक-दूसरे से स्वतन्त्र होते हैं। अमेरिका में शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त को अपनाया गया है।

7. राष्ट्रपति विधानमण्डल को भंग नहीं कर सकता (President cannot dissolve the Parliament)अध्यक्षात्मक सरकार शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त पर आधारित है। इसलिए राष्ट्रपति विधानपालिका के किसी सदन को भंग नहीं कर सकता। विधानपालिका की अवधि संविधान द्वारा निश्चित होती है और यदि राष्ट्रपति चाहे भी तो समय से पहले इसको भंग नहीं कर सकता।

8. राजनीतिक एकरूपता अनावश्यक (Political Homogeneity is Unnecessary)-इस प्रणाली में मन्त्रियों का एक ही राजनीतिक दल से सम्बन्धित होना आवश्यक नहीं होता। यह इसलिए कि मन्त्री केवल अपने व्यक्तिगत रूप में ही अध्यक्ष के प्रति उत्तरदायी होते हैं। इसलिए इस प्रणाली में मन्त्री के सामूहिक उत्तरदायित्व का लक्षण अनुपस्थित होता है। इसलिए उनका राजनीतिक विचारों में पूर्णतः एकमत होना अधिक आवश्यक नहीं होता।

प्रश्न 4. अध्यक्षात्मक शासन के गुणों और दोषों का वर्णन करें।
(Discuss the merits and demerits of Presidential Government.)
उत्तर
अध्यक्षात्मक शासन के गुण (Merits of Presidential Government)-
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के निम्नलिखित गुण हैं-

1. शासन में स्थिरता (Stability in Administration)-अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति की अवधि निश्चित होती है जिससे शासन में स्थिरता आती है। राष्ट्रपति को केवल महाभियोग के द्वारा हटाया जा सकता है। अमेरिका में अभी तक किसी राष्ट्रपति को नहीं हटाया गया। शासन में स्थिरता के कारण लम्बी योजनाएं बनाई जाती हैं और उन्हें दृढ़ता से लागू किया जाता है।

2. संकटकाल के लिए उचित सरकार (Suitable in time of Emergency)-अध्यक्षात्मक सरकार संकटकाल के लिए बहुत उपयुक्त है। शासन की सभी शक्तियां राष्ट्रपति के पास होती हैं जिनका प्रयोग वह अपनी इच्छानुसार करता है। शासन के सभी महत्त्वपूर्ण निर्णय राष्ट्रपति द्वारा लिए जाते हैं । इसलिए राष्ट्रपति संकटकाल में शीघ्र निर्णय लेकर उन्हें दृढ़ता से लागू कर संकट का सामना कर सकता है। युद्ध और आर्थिक संकट का सामना करने के लिए अध्यक्षात्मक सरकार सर्वश्रेष्ठ है।

3. इसमें नीति की एकता बनी रहती है (It ensures Continuity of Policy)-इस शासन प्रणाली में कार्यपालिका एक निश्चित समय तक अपने पद पर रहती है जिससे एक ही नीति निश्चित अवधि तक चलती रहती है। शासन की नीतियों में शीघ्रता से परिवर्तन न होने के कारण एक शक्तिशाली नीति को अपनाया जा सकता है।

4. शासन में दक्षता (Efficiency in Administration)-यह प्रणाली शक्ति विभाजन के सिद्धान्त पर कार्य करती है। मन्त्रियों को न तो चुनाव लड़ना पड़ता है और न ही उन्हें संसद् की बैठकों में ही भाग लेना पड़ता है। उनके पास तो केवल शासन चलाने का ही कार्य रहता है। वे स्वतन्त्रतापूर्वक शासन-कार्य में लगे रहते हैं। इससे शासन में दक्षता आना स्वाभाविक ही है।

5. योग्य व्यक्तियों का शासन (Administration by Able Statesmen)-इस प्रणाली में मन्त्रियों को संसद् का सदस्य होने की आवश्यकता नहीं। इसलिए राष्ट्रपति ऐसे व्यक्तियों को मन्त्रिमण्डल में तथा सरकारी पदों पर नियुक्त करता है जो योग्य प्रशासक और अनुभवी राजनीतिज्ञ हों और इस प्रणाली में सभी राजनीतिक दलों से मन्त्री लिए जा सकते हैं।

6. यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त पर आधारित है (It is based on the Theory of Separation of Powers) कार्यपालिका तथा विधानपालिका एक-दूसरे से स्वतन्त्र होती हैं। विधानपालिका कानूनों का निर्माण करती है और कार्यपालिका कानूनों को लागू करती है। कार्यपालिका विधानपालिका को भंग नहीं कर सकती और न ही विधानपालिका अविश्वास प्रस्ताव पास करके कार्यपालिका को हटा सकती है। शक्तियों के विभाजन के कारण सरकार का कोई भाग निरंकुश नहीं बन सकता और नागरिकों की स्वतन्त्रता का खतरा नहीं रहता।।

7. इसमें राजनीतिक दल उग्र नहीं होते (Political Parties are Less Aggressive)-अध्यक्षात्मक सरकार में संसदीय सरकार की अपेक्षा राजनीतिक दलों का प्रभाव कम होता है। संसदीय सरकार में चुनाव के पश्चात् भी विरोधी दल सत्तारूढ़ दल को हटा कर स्वयं शासन पर अधिकार करने के लिए प्रयत्न करते रहते हैं, परन्तु अध्यक्षात्मक सरकार के चुनाव के पश्चात् राजनीतिक दलों की उग्रता समाप्त हो जाती है क्योंकि विरोधी दल को पता होता है कि राष्ट्रपति को अगले चुनाव से पहले नहीं हटाया जा सकता।

8. बहु-दलीय प्रणाली के लिए उपयुक्त (Suitable for a Multiple-Party System)—जिस देश में बहुदल प्रणाली हो अर्थात् कई राजनीतिक दल हों और किसी भी दल को संसद् में बहुमत प्राप्त न होता हो, उस देश में यही प्रणाली अधिक उपयुक्त रहती है। बहुदल प्रणाली में संसदीय सरकार स्थापित हो जाए तो मन्त्रिमण्डल जल्दी-जल्दी बदलता रहता है, परन्तु अध्यक्षात्मक प्रणाली में चुनाव के समय ही दलों का संघर्ष अधिक रहता है और कार्यपालिका जल्दी-जल्दी नहीं बदलती।

अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के दोष (Demerits of Presidential Government)-
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के मुख्य दोष निम्नलिखित हैं-

1. निरंकुशता का भय (Fear of Despotism)-शासन की सभी शक्तियां राष्ट्रपति के पास होती हैं जिससे वह निरंकुश बन सकता है। राष्ट्रपति की अवधि निश्चित होने के कारण अगले चुनाव तक उसे हटाया नहीं जा सकता है। अतः राष्ट्रीय अपनी शक्तियों का प्रयोग मनमाने ढंग से कर सकता है।

2. शासन को परिस्थितियों के अनुसार नहीं बदला जा सकता (Government is not changeable according to Circumstances)–संसदीय सरकार में प्रधानमन्त्री तथा मन्त्रियों में आवश्यकतानुसार परिवर्तन किया जा सकता है, परन्तु अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है और विधानपालिका की अवधि भी निश्चित होती है। राष्ट्रपति यदि शासन को ठीक ढंग से न चलाए तो भी जनता उसे निश्चित अवधि से पहले नहीं हटा सकती।

3. कार्यपालिका और विधानपालिका में गतिरोध की सम्भावना (Possibility of deadlock between the Executive and Legislature)-अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका के एक-दूसरे से स्वतन्त्र होने के कारण दोनों में गतिरोध उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है। विशेषकर यदि राष्ट्रपति एक दल से हो और विधानमण्डल में किसी दूसरे राजनीतिक दल का बहुमत हो तो इन दोनों अंगों में संघर्ष होना अनिवार्य हो जाता है। इससे शासन अच्छी तरह नहीं चलता। विधानपालिका कार्यपालिका की इच्छानुसार कानून नहीं बनाती और न ही कार्यपालिका कानून को उस भावना से लागू करती है जिस भावना से कानूनों को बनाया गया होता है।

4. शक्तियों का विभाजन सम्भव नहीं (Separation of Powers not Possible)-अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त पर आधारित है, परन्तु यह सिद्धान्त व्यावहारिक नहीं है और न ही वांछनीय है। शासन एक इकाई है तथा इसके अंगों को उसी प्रकार बिल्कुल पृथक् नहीं किया जा सकता है जिस प्रकार शरीर के अंगों को। यदि सरकार के तीन अंगों को एक-दूसरे से बिल्कुल पृथक् रखा जाए तो इसका परिणाम यह होगा कि शासन की एकता समाप्त हो जाएगी और तीनों अंगों में क्षेत्राधिकार सम्बन्धी झगड़े उत्पन्न हो जाएंगे। अतः शक्तियों के विभाजन का सिद्धान्त अच्छे शासन के लिए आवश्यक नहीं है।

5. जनमत की अवहेलना (Public Opinion Neglected)—अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में जनमत की अवहेलना होने की बहुत अधिक सम्भावना रहती है। मन्त्री संसद् के सदस्य नहीं होते और न ही विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी होते हैं। इन्हें चुनाव नहीं लड़ना पड़ता है। इसलिए उन्हें जनमत की परवाह नहीं होती।

6. अच्छे कानूनों का निर्माण नहीं होता (Good Laws are not Passed)-अच्छे कानूनों के निर्माण के लिए कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग का होना आवश्यक है, परन्तु अध्यक्षात्मक सरकार में दोनों एक-दूसरे से स्वतन्त्र होते हैं। विधानपालिका को इस बात का पता नहीं होता कि कार्यपालिका को किस तरह के कानूनों की आवश्यकता है। आवश्यकतानुसार कानूनों का निर्माण न होने के कारण शासन में कुशलता नहीं रहती।

7. अनुत्तरदायी सरकार (Irresponsible Government)-अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में सरकार अपने कार्यों के लिए उत्तरदायी नहीं होती। राष्ट्रपति विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होता। इसलिए राष्ट्रपति अपनी मनमानी कर सकता है।

8. संविधान की कठोरता (Rigid Constitution)-अध्यक्षात्मक सरकार में संविधान बहुत कठोर होता है। इसलिए उसमें समयानुसार परिवर्तन नहीं किए जा सकते।

9. विदेशी सम्बन्धों में निर्बलता (Weakness in conduct of Foreign Relations)-अध्यक्षात्मक प्रणाली में कार्यपालिका दूसरे देशों के साथ दृढ़तापूर्वक सम्बन्ध स्थापित नहीं कर सकती। इसका कारण यह है कि युद्ध और शान्ति की घोषणा करने की स्वीकृति संसद् ही दे सकती है। राष्ट्रपति को इस बात का भरोसा नहीं होता कि संसद् उस पर अपनी स्वीकृति देगी या नहीं।

10. दल दोषों से मुक्त नहीं (Not free from Party Evils)—यह कहना ठीक नहीं है कि अध्यक्षात्मक सरकार में राजनीतिक दलों में बुराइयां नहीं पाई जातीं। राष्ट्रपति का चुनाव दलीय व्यवस्था के आधार पर होता है और जिस दल का उम्मीदवार राष्ट्रपति चुना जाता है वह अपने समर्थकों को खुश करने के लिए उन्हें बड़े-बड़े पद देता है। अमेरिका में राष्ट्रपति अपना पद ग्रहण करने के बाद अपने दल के व्यक्तियों को ऊंचे-ऊंचे राजनीतिक पदों पर नियुक्त करता है। इससे शासन में भ्रष्टाचार फैलता है।

निष्कर्ष (Conclusion)-अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के गुण भी हैं और अवगुण भी। अमेरिका में यह प्रणाली सन् 1787 से प्रचलित है और सफलतापूर्वक कार्य कर रही है। भारत में बहुदल प्रणाली को देखकर कुछ एक विद्वान् भारत में संसदीय प्रणाली के स्थान पर अध्यक्षात्मक प्रणाली को स्थापित करने का सुझाव देते हैं, परन्तु सुझाव न तो ठोस है और न ही इसके माने जाने की सम्भावना है। फ्रांस में बहुदल के कारण वहां की संसदीय शासन प्रणाली ठीक प्रकार न चल सकी। इस कारण वहां भी अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के कुछ अंश अपनाए गए हैं।

प्रश्न 5. संसदीय सरकार और अध्यक्षात्मक सरकारों की तुलना करो तथा दोनों में अन्तर का वर्णन करो।
(Compare and contrast the parliamentary and Presidential forms of governments.)
उत्तर-संसदीय शासन प्रणाली और अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में अग्रलिखित अन्तर पाए जाते हैं-

संसदीय सरकार की विशेषताएं-

  1. अध्यक्षात्मक सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का मुखिया न हो कर वास्तविक शासक होता है। संविधान के द्वारा शासन की सभी शक्तियां उसके पास होती हैं और वह उसका प्रयोग अपनी इच्छानुसार करता है।
  2. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका विधानपालिका से स्वतन्त्र होती है। राष्ट्रपति तथा मन्त्रिमण्डल के सदस्य विधानमण्डल के सदस्य नहीं होते। मन्त्री न तो विधानपालिका की बैठकों में भाग ले सकते हैं और न ही बिल पेश कर सकते हैं।
  3. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती। मन्त्री राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होते हैं न कि विधानपालिका के प्रति। विधानपालिका कार्यपालिका को अविश्वास प्रस्ताव पास करके नहीं हटा सकती।
  4. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका की अवधि निश्चित होती है। राष्ट्रपति को केवल महाभियोग के द्वारा हटाया जा सकता है।
  5. संसदीय सरकार में प्रधानमन्त्री राज्य के अध्यक्ष को सलाह देकर विधानपालिका को भंग कर सकता है।

अध्यक्षात्मक सरकार की विशेषताएं-

  1. संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का मुखिया होता है। व्यवहार में उसकी शक्तियों का प्रयोग मन्त्रिमण्डल के द्वारा किया जाता है।
  2. संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। मन्त्रिमण्डल के सभी सदस्य विधानपालिका के सदस्य होते हैं । मन्त्री विधानमण्डल की बैठकों में भाग लेते हैं, बिल पेश करते हैं तथा वोट डालते हैं।
  3. संसदीय सरकार में कार्यपालिका अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है। विधानपालिका के सदस्य मन्त्रियों से प्रश्न पूछ सकते हैं, काम रोको तथा निन्दा प्रस्ताव पास करके मन्त्रिमण्डल को हटा सकते हैं।
  4. संसदीय सरकार में कार्यपालिका की अवधि निश्चित नहीं होती। विधानपालिका जब चाहे अविश्वास प्रस्ताव पास करके मन्त्रिमण्डल को हटा सकती है।
  5. अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति विधानपालिका के किसी सदन को भंग नहीं कर सकता।

प्रश्न 6. दोनों प्रकार की सरकारों में आप किसे श्रेष्ठ मानते हैं और क्यों ?
(Which of the two types do you consider better ? Why ?)
उत्तर- यह एक विवाद का विषय है कि दोनों प्रकार की शासन प्रणालियों में से कौन-सी शासन प्रणाली अच्छी है। यह कहना कठिन है कि कौन-सी शासन प्रणाली पूर्ण रूप से अच्छी है। इसका कारण यह है कि दोनों शासनप्रणालियों के अपने-अपने गुण भी हैं और दोष भी हैं। इंग्लैण्ड में संसदीय सरकार अच्छी तरह चल रही है जबकि अमेरिका में अध्यक्षात्मक सरकार। परन्तु फिर भी आजकल निम्नलिखित कारणों की वजह से संसदीय शासन व्यवस्था को अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था से अच्छा समझा जाता है

1. संसदीय शासन व्यवस्था कार्यपालिका तथा विधानपालिका में पूर्ण सहयोग का विश्वास दिलाती हैसंसदीय शासन व्यवस्था में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग बना रहता है। मन्त्रिमण्डल के सदस्य विधानमण्डल के सदस्य होते हैं, वाद-विवाद में भाग लेते हैं और बिल पेश करते हैं। मन्त्रिमण्डल का विधानमण्डल में बहुमत होता है जिस कारण मन्त्रिमण्डल द्वारा पेश किए गए बिल पास हो जाते हैं। मन्त्रिमण्डल के समर्थन के बिना कोई बिल पास नहीं हो सकता है। मन्त्रिमण्डल तथा विधानपालिका में सहयोग होने के कारण अच्छे कानूनों का निर्माण होता है। सरकार में दक्षता तभी आती है जब सरकार के विभिन्न अंगों में सहयोग हो, क्योंकि सरकार एक इकाई होती है। संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में पूर्ण सहयोग होता है।

अध्यक्षात्मक शासन-व्यवस्था में कार्यपालिका तथा विधानपालिका एक-दूसरे से स्वतन्त्र होती है और मन्त्रियों को विधानपालिका की बैठकों में भाग लेने का अधिकार नहीं होता है। यदि राष्ट्रपति एक दल से हो और विधापालिका में दूसरे दल का बहुमत हो, तो इन दोनों में संघर्ष होना अनिवार्य हो जाता है और गतिरोध उत्पन्न हो जाता है। 1968 से 1976 तक अमेरिका में राष्ट्रपति रिपब्लिकन पार्टी से था जबकि कांग्रेस में डैमोक्रेटिक पार्टी का बहुमत था। जबकि 1992 से 2000 तक अमेरिका में राष्ट्रपति डैमोक्रेटिक पार्टी का था, और कांग्रेस में बहुमत रिपब्लिकन पार्टी का था। विधानपालिका और कार्यपालिका में सहयोग न होने के कारण विधानपालिका कार्यपालिका की इच्छानुसार कानून नहीं बनाती और न ही विधानपालिका के बनाए हुए कानूनों को कार्यपालिका उस भावना से लागू करती है, जिस भावना से कानूनों को बनाया गया होता है।

2. संसदीय शासन व्यवस्था अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था से अधिक प्रजातन्त्रात्मक होती है-संसदीय शासनव्यवस्था को अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली से अच्छा समझा जाता है क्योंकि यह अध्यक्षात्मक शासन-व्यवस्था से अधिक प्रजातन्त्रात्मक होती है। मन्त्रिमण्डल के सदस्य जनता के प्रतिनिधियों की निरन्तर आलोचना के अधीन कार्य करते हैं। निरन्तर आलोचना के कारण मन्त्री सदैव सतर्क रहते हैं और निरंकुश बनने की चेष्टा नहीं करते। ‘अविश्वास प्रस्ताव’ के डर के कारण मन्त्री जनता की इच्छाओं के अनुसार काम करते हैं। अध्यक्षात्मक शासन में राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है और उसे अविश्वास प्रस्ताव पास करके नहीं हटाया जा सकता। निःसन्देह अमेरिका में राष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है, परन्तु महाभियोग का तरीका इतना कठिन है कि अभी तक अमेरिका में एक भी राष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा नहीं हटाया गया है। इसका अभिप्राय यह है कि अमेरिका में राष्ट्रपति को अवधि से पहले नहीं हटाया जा सकता।

3. गृह और विदेश-नीति में दृढ़ता-संसदीय शासन-व्यवस्था में मन्त्रिमण्डल गृह और विदेश नीति को दृढ़ता से लागू करता है क्योंकि उसे यह पता होता है कि विधानपालिका में उसे बहुमत का समर्थन प्राप्त है। इसके विपरीत अध्यक्षात्मक शासन-व्यवस्था में राष्ट्रपति विदेशी नीति को दृढ़ता से नहीं अपना सकता क्योंकि उसको कांग्रेस के समर्थन का विश्वास नहीं होता। इसके अतिरिक्त अमेरिका में राष्ट्रपति सीनेट की स्वीकृति के बिना दूसरे देशों के साथ सन्धिसमझौते नहीं कर सकता। अतः राष्ट्रपति दूसरे देशों के साथ दृढ़ नीति को नहीं अपना सकता।

4. संसदीय शासन-व्यवस्था में वैकल्पिक शासन की व्यवस्था-संसदीय शासन प्रणाली में मन्त्रिमण्डल के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास होने की दशा में वैकल्पिक शासन की स्थापना बिना चुनाव करवाए सम्भव होती है। विशेषकर इंग्लैण्ड में जहां द्वि-दलीय प्रणाली पाई जाती है, सत्तारूढ़ दल के हटने पर विरोधी दल सरकार बनाने के लिए सदैव तैयार रहता है। इस प्रकार प्रशासन लगातार चलता रहता है और शासन में कोई रुकावट नहीं पड़ती है।

संसदीय शासन प्रणाली के विपरीत अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में साधारणतया सरकार नहीं हटती क्योंकि राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है, परन्तु यदि सरकार हटती है तो इससे नए चुनाव करवाने की समस्या उत्पन्न होती है। वास्तव में अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था में दो चुनावों के बीच के काल में नोति में कोई परिवर्तन सम्भव नहीं होता है। नीति में परिवर्तन तभी सम्भव होता है यदि चुनाव के समय दल अपने विभिन्न कार्यक्रम के आधार पर चुना जाए, परन्तु संसदीय शासन-प्रणाली में नीति में परिवर्तन चुनावों के बीच के काल में भी सम्भव होता है।

5. संसदीय शासन-व्यवस्था में सरकार परिवर्तनशील होती है-संसदीय शासन प्रणाली को सरकार की परिस्थितियों के अनुसार बदला जा सकता है। उदाहरणस्वरूप द्वितीय विश्व युद्ध में जब इंग्लैण्ड में चैम्बरलेन सफल न हो सका तो उसके स्थान पर चर्चिल को प्रधानमन्त्री बनाया गया, परन्तु अध्यक्षात्मक सरकार में ऐसा नहीं किया जा सकता क्योंकि इसमें कार्यपालिका के अध्यक्ष की अवधि निश्चित होती है। राष्ट्रपति चाहे ठीक ढंग से शासन न चलाए जनता उसे निश्चित अवधि से पूर्व नहीं हटा सकती।

6. जनमत के प्रति उत्तरदायी-संसदीय शासन प्रणाली में मन्त्रिमण्डल जनमत के प्रति अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली की अपेक्षा अधिक उत्तरदायी होते हैं। मन्त्रिमण्डल सदैव जनमत के अनुसार शासन चलाता है और जनता के साथ किए गए वायदों को पूरा करने के लिए भरसक प्रयत्न करता है। मन्त्रिमण्डल यह जानता है कि उसका बना रहना जनमत के समर्थन पर निर्भर करता है, इसलिए कोई भी मन्त्रिमण्डल आसानी से जनमत के प्रति उदासीन नहीं रह सकता।

इसके विपरीत अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में शक्तियों के पृथक्करण के कारण सरकार जनमत के प्रति इतना अधिक उत्तरदायी नहीं होती। राष्ट्रपति और मन्त्रिमण्डल के सदस्य कांग्रेस के सदस्य नहीं होते, इसलिए उन्हें जनता के प्रतिनिधियों के द्वारा यह जानने का अवसर प्राप्त नहीं होता कि जनमत क्या चाहता है। इसके अतिरिक्त कार्यपालिका इसलिए जनमत की परवाह नहीं करती क्योंकि उसको पता होता है कि उसका पद पर बने रहना जनमत पर निर्भर नहीं करता और अगले चुनाव तक जनता उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। चुनाव आने पर ही कार्यपालिका जनमत की ओर ध्यान देती है।

निष्कर्ष (Conclusion)—संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि संसदीय शासन-प्रणाली अध्यक्षात्मक शासन-प्रणाली की अपेक्षा अधिक अच्छी है।

प्रश्न 7. क्या आप इस मत से सहमत हैं कि भारत के लिए संसदात्मक सरकार ही अधिक उचित है ? कारण सहित स्पष्ट कीजिए।
(Do you agree with the view that the parliamentary form of government is more suitable to India ? Give reasons.)
उत्तर-कुछ विद्वानों एवं राजनीतिज्ञों का विचार है कि भारत के लिए संसदीय शासन प्रणाली की अपेक्षा अध्यक्षात्मक शासन अधिक उपयुक्त है। इन विद्वानों का मुख्य तर्क यह है कि विधानपालिका अविश्वास प्रस्ताव पेश करके कार्यपालिका को नहीं हटा सकती, जिससे शासन में स्थिरता रहती है। देश की प्रगति के लिए कार्यपालिका का विधानपालिका से स्वतन्त्र होना आवश्यक है ताकि कार्यपालिका अपना सारा समय शासन में लगा सके जबकि संसदीय शासन में कार्यपालिका का काफ़ी समय संसद् में बर्बाद हो जाता है। भारत में बहु-दलीय प्रणाली पाई जाती है जोकि संसदीय शासन के लिए उपयुक्त नहीं है। अतः इन विद्वानों के अनुसार भारत के लिए अध्यक्षात्मक शासन अधिक उपयुक्त है।

परन्तु हमारे विचार से भारत के लिए संसदीय शासन ही अधिक उपयुक्त है। संसदीय शासन प्रणाली स्वतन्त्रता प्राप्ति से लेकर अब तक सफलता से कार्य कर रही है। इसमें शासन संसद् के प्रति उत्तरदायी होता है और संसद् के साथ कार्यपालिका का गहरा सम्बन्ध होने के कारण अच्छे कानूनों का निर्माण होता है। संसदीय शासन को परिस्थितियों के अनुसार बदला जा सकता है और एक अच्छे शासन के लिए यह आवश्यक भी है। अत: भारत के लिए संसदीय शासन उपयुक्त है।
नोट- भारत के लिए संसदीय सरकार उचित होने के वही कारण हैं जो संसदीय सरकार के होते हैं। अतः पिछला प्रश्न देखें।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. संसदीय सरकार किसे कहते हैं ? संसदीय सरकार की परिभाषा दें ।
उत्तर-संसदीय सरकार उस शासन प्रणाली को कहते हैं जिसमें कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। कार्यपालिका (मन्त्रिमण्डल) अपने सभी कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है और तब तक अपने पद पर रह सकती है जब तक उसको विधानपालिका का विश्वास प्राप्त रहता है। जिस समय कार्यपालिका विधानपालिका का विश्वास खो देती है तो कार्यपालिका को अपने पद से त्याग-पत्र देना पड़ता है।

डॉ० गार्नर का मत है, “संसदीय सरकार वह प्रणाली है जिसमें वास्तविक कार्यपालिका-मन्त्रिमण्डल या मन्त्रिपरिषद् अपनी राजनीतिक नीतियों और कार्यों के लिए प्रत्यक्ष तथा कानूनी रूप से विधानमण्डल या उसके एक सदन (प्रायः लोकप्रिय सदन) के प्रति और राजनीतिक तौर पर मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी हो जबकि राज्य का अध्यक्ष संवैधानिक या नाममात्र कार्यपालिका हो और उत्तरदायी हो।”

प्रश्न 2. संसदीय सरकार की चार विशेषताएं लिखें।
उत्तर-संसदीय शासन प्रणाली में निम्नलिखित विशेषताएं पाई जाती हैं-

  1. राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का सत्ताधारी-संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का शासक होता है। सैद्धान्तिक रूप में राज्य की सभी शक्तियों उसके नाम पर होती हैं, परन्तु वास्तव में उन शक्तियों का प्रयोग मन्त्रिमण्डल द्वारा किया जाता है।
  2. मन्त्रिमण्डल वास्तविक कार्यपालिका होती है-राज्य के अध्यक्ष को सौंपी गई शक्तियों का प्रयोग वास्तव में मन्त्रिमण्डल द्वारा किया जाता है।
  3. कार्यपालिका और विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध होना-संसदीय शासन प्रणाली में विधानपालिका और कार्यपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। मन्त्रिमण्डल के सदस्यों के लिए संसद् का सदस्य होना अनिवार्य है और वे संसद् की बैठकों में भाग भी लेते हैं, बिल पेश करते हैं और बिलों पर मतदान करते हैं।
  4. मन्त्रिमण्डल का उत्तरदायित्व-कार्यपालिका अर्थात् मन्त्रिमण्डल अपने सब कार्यों के लिए व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है।

प्रश्न 3. संसदीय सरकार के चार गुणों का वर्णन करो।
उत्तर-संसदीय शासन प्रणाली में निम्नलिखित गुण पाए जाते हैं-

  1. कार्यपालिका तथा विधानपालिका में पूर्ण सहयोग-संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग बना रहता है। मन्त्रिमण्डल के सदस्य विधानपालिका के सदस्य होते हैं, बैठकों में भाग लेते हैं तथा बिल पास करते हैं। कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग के कारण अच्छे कानूनों का निर्माण होता है तथा शासन में दक्षता होती
  2. उत्तरदायी सरकार-संसदीय सरकार में सरकार अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है। यदि मन्त्रिमण्डल अपनी मनमानी करता है तो विधानमण्डल अविश्वास प्रस्ताव पास करके मन्त्रिमण्डल को हटा सकता है।
  3. सरकार निरंकुश नहीं बन सकती-मन्त्रिमण्डल अपने कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होने के कारण निरंकुश नहीं बन सकता।
  4. परिवर्तनशील सरकार-संसदीय सरकार का यह भी गुण है, कि इसमें सरकार परिवर्तनशील होती है। सरकार को समय के अनुसार बदला जा सकता है।

प्रश्न 4. संसदीय सरकार के चार अवगुण बताइए।
उत्तर-संसदीय सरकार में निम्नलिखित दोष पाए जाते हैं-

  1. यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है-संसदीय सरकार शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है। इसमें मन्त्रिमण्डल (कार्यपालिका) के सदस्य संसद् के सदस्य भी होते हैं, जिससे कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। शक्तियों के केन्द्रीयकरण के कारण व्यक्तियों की निजी स्वतन्त्रता खतरे में पड़ सकती है।
  2. अस्थिर सरकार-संसदीय शासन प्रणाली में सरकार अस्थिर होती है, क्योंकि मन्त्रिमण्डल की अवधि निश्चित नहीं होती।
  3. नीति में निरन्तरता की कम सम्भावना-संसदीय शासन प्रणाली में नीति की निरन्तरता की कम सम्भावना रहती है क्योंकि विधानपालिका, कार्यपालिका को जब चाहे अविश्वास प्रस्ताव पास करके हटा सकती है।
  4. शासन में दक्षता का अभाव-संसदीय शासन प्रणाली में शासन में दक्षता का अभाव होता है, क्योंकि इसमें शासन की बागडोर अनाड़ियों के हाथ में होती है।

प्रश्न 5. अध्यक्षात्मक सरकार का अर्थ एवं परिभाषा लिखें।
उत्तर- अध्यक्षात्मक सरकार उस शासन प्रणाली को कहते हैं, जिसमें कार्यपालिका संवैधानिक दृष्टि से विधानपालिका से अपनी नीतियों और कार्यों के लिए स्वतन्त्र होती है। कार्यपालिका विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती और दोनों में कोई सम्बन्ध नहीं होता। विधानपालिका मन्त्रियों को उनके पद से हटा नहीं सकती। राज्य का अध्यक्ष वास्तविक कार्यपालिका होता है और संविधान द्वारा दी गई शक्तियों का प्रयोग अपनी इच्छानुसार करता है। अमेरिका में अध्यक्षात्मक सरकार है।

डॉ० गार्नर के शब्दानुसार, “अध्यक्षात्मक सरकार वह प्रणाली है जिसमें राज्य का अध्यक्ष और मन्त्री अपने कार्यकाल के लिए संवैधानिक तौर पर व्यवस्थापिका से स्वतन्त्र होते हैं और अपनी राजनीतिक नीतियों के लिए उसके प्रति उत्तरदायी नहीं होते। इस प्रणाली में राज्य का अध्यक्ष केवल नाममात्र कार्यपालिका नहीं होता बल्कि वास्तविक कार्यपालिका होता है और संविधान तथा कानूनों द्वारा दी गई शक्तियों का वास्तव में प्रयोग करता है।”

प्रश्न 6. अध्यक्षात्मक सरकार की चार विशेषताएं बताओ।
उत्तर- अध्यक्षात्मक प्रणाली में निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएं होती हैं-

  1. नाममात्र तथा वास्तविक कार्यपालिका में भेद नहीं-अध्यक्षात्मक सरकार में नाममात्र तथा वास्तविक कार्यपालिका में भेद नहीं पाया जाता। राष्ट्र का अध्यक्ष राष्ट्रपति होता है। उसे संविधान द्वारा जो शक्तियां प्राप्त होती हैं उनका प्रयोग वह अपनी इच्छानुसार करता है।
  2. मन्त्रिमण्डल केवल सलाहकार के रूप में अध्यक्षात्मक प्रणाली में भी मन्त्रिमण्डल की व्यवस्था होती है, परन्तु इसकी स्थिति संसदीय प्रणाली के मन्त्रिमण्डल की स्थिति में पूर्णत: भिन्न होती है। अध्यक्ष मन्त्रियों की सलाह के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य नहीं होता। मन्त्री केवल सलाहकार ही होते हैं। उसकी अपनी इच्छा है कि मन्त्रियों से सलाह ले या न ले।
  3. कार्यपालिका और व्यवस्थापिका का पृथक्करण-अध्यक्षात्मक शासन में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका में कोई सम्बन्ध नहीं होता। अध्यक्ष अपने मन्त्री संसद् में से नहीं लेता। मन्त्री संसद् की बैठकों में न भाग ले सकते हैं, न बिल पेश कर सकते हैं, न भाषण दे सकते हैं। इस प्रकार व्यवस्थापिका और कार्यपालिका में कोई सम्बन्ध नहीं रहता है।
  4. कार्यपालिका का अनुत्तरदायित्व-अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका अपने कार्यों तथा नीतियों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती।

प्रश्न 7. अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के चार गुण लिखें।
उत्तर- अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में निम्नलिखित चार गुण पाए जाते हैं-

  1. शासन में स्थिरता-अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति की अवधि निश्चित होती है जिससे शासन में स्थिरता आती है।
  2. इसमें नीति की एकता बनी रहती है-इस शासन प्रणाली में कार्यपालिका एक निश्चित समय तक अपने पद पर रहती है जिससे एक ही नीति निश्चित अवधि तक चलती रहती है।
  3. शासन में दक्षता-यह प्रणाली शक्ति विभाजन के सिद्धान्त पर कार्य करती है। मन्त्रियों को न तो चुनाब लड़ना पड़ता है और न ही संसद् की बैठकों में भाग लेना पड़ता है। उनके पास तो केवल शासन चलाने का कार्य होता है। वे स्वतन्त्रतापूर्वक शासन चलाने में लगे रहते हैं, इससे शासन में दक्षता आना स्वाभाविक है।
  4.   संकटकाल के लिए उचित सरकार- अध्यक्षात्मक सरकार संकटकाल के लिए उचित सरकार मानी जाती है।

प्रश्न 8. अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के चार दोष बताइए।
उत्तर-अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के मुख्य चार दोष नीचे दिए गए हैं-

  1. निरंकुशता का भय-शासन की सभी शक्तियां राष्ट्रपति के पास होती हैं जिससे वह निरंकुश बन सकता है।
  2. शासन की परिस्थितियों के अनुसार नहीं बदला जा सकता- अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है और विधानपालिकाओं की अवधि भी निश्चित होती है। राष्ट्रपति यदि शासन ठीक ढंग से न चलाए तो भी जनता उसे निश्चित अवधि से पहले नहीं हटा सकती।
  3. कार्यपालिका और विधानपालिका में गतिरोध की सम्भावना-अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका के एक-दूसरे से स्वतन्त्र होने के कारण दोनों में गतिरोध उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है।
  4. जनमत की अवहेलना-अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में जनमत की अवहेलना होने की बहुत अधिक सम्भावना रहती है।

प्रश्न 9. संसदीय सरकार और अध्यक्षात्मक सरकार में चार अन्तर लिखें।
उत्तर-संसदीय सरकार और अध्यक्षात्मक सरकार में निम्नलिखित मुख्य अन्तर पाए जाते हैं-

संसदीय सरकार-

  1. संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का मुखिया होता है। व्यवहार में उसकी शक्तियों का प्रयोग मन्त्रिमण्डल के द्वारा किया जाता है।
  2. संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध होता है।
  3. संसदीय सरकार में कार्यपालिका अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है।
  4. संसदीय सरकार में कार्यपालिका की अवधि निश्चित नहीं होती।

अध्यक्षात्मक सरकार-

  1. अध्यक्षात्मक सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का मुखिया न हो कर वास्तविक शासक होता है। संविधान के द्वारा शासन की सभी शक्तियां उसके पास होती हैं और वह उसका प्रयोग अपनी इच्छानुसार करता है।
  2. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका एवं विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध नहीं पाया जाता।
  3. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती।
  4. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका की अवधि निश्चित होती है।

प्रश्न 10. संसदीय शासन प्रणाली और अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में कौन-सी अच्छी सरकार है ? कारण दीजिए।
उत्तर-संसदीय और अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में से संसदीय शासन प्रणाली को निम्नलिखित कारणों से अच्छा माना जाता है-

  1. संसदीय सरकार परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तनशील है।
  2. उत्तरदायी सरकार।
  3. विधानपालिका तथा कार्यपालिका में सहयोग।
  4. अच्छे कानूनों का निर्माण।
  5. संसदीय सरकार जनमत पर आधारित है।

संसदीय सरकार अध्यक्षात्मक सरकार से अच्छी है, इसका यह भी प्रमाण है कि आज संसार के अधिकांश देशों में संसदीय सरकार को अपनाया गया है।

प्रश्न 11. क्या अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली भारत के लिए अधिक उपयुक्त है ?
उत्तर-कुछ विद्वानों एवं राजनीतिज्ञों का विचार है कि भारत के लिए संसदीय शासन प्रणाली की अपेक्षा अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली अधिक उपयुक्त है। इन विद्वानों का मुख्य तर्क यह है कि अध्यक्षात्मक शासन में कार्यपालिका का चुनाव निश्चित अवधि के लिए होता है और विधानपालिका अविश्वास-प्रस्ताव पेश करके कार्यपालिका को नहीं हटा सकती, जिससे शासन में स्थिरता बनी रहती है। भारत में बहुदलीय प्रणाली पाई जाती है जो कि संसदीय शासन के लिए उपयुक्त है। अतः इन विद्वानों के मतानुसार भारत के लिए अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली अधिक उपयुक्त है।

परन्तु हमारे विचार में भारत के लिए संसदीय शासन ही अधिक उपयुक्त है । स्वतन्त्रता प्राप्ति से लेकर अब तक संसदीय शासन प्रणाली सफलता से कार्य कर रही है। इसमें शासन संसद् के प्रति उत्तरदायी होता है और संसद् के साथ कार्यपालिका का गहरा सम्बन्ध होने के कारण अच्छे कानूनों का निर्माण होता है। संसदीय शासन को परिस्थितियों के अनुसार बदला जा सकता है और एक अच्छे शासन के लिए यह आवश्यक भी है। अतः भारत के लिए संसदीय शासन प्रणाली उपयुक्त है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. संसदीय सरकार किसे कहते हैं ?
उत्तर-संसदीय सरकार उस शासन प्रणाली को कहते हैं जिसमें कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। कार्यपालिका (मन्त्रिमण्डल) अपने सभी कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है और तब तक अपने पद पर रह सकती है जब तक उसको विधानपालिका का विश्वास प्राप्त रहता है। जिस समय कार्यपालिका विधानपालिका का विश्वास खो देती है तो कार्यपालिका को अपने पद से त्याग-पत्र देना पड़ता है।

प्रश्न 2. संसदीय सरकार की दो विशेषताएं लिखें।
उत्तर-

  1. राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का सत्ताधारी-संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का शासक होता है।
  2. मन्त्रिमण्डल वास्तविक कार्यपालिका होती है-राज्य के अध्यक्ष को सौंपी गई शक्तियों का प्रयोग वास्तव में मन्त्रिमण्डल द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 3. संसदीय सरकार के दो गुणों का वर्णन करो।
उत्तर-

  1. कार्यपालिका तथा विधानपालिका में पूर्ण सहयोग-संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग बना रहता है।
  2. उत्तरदायी सरकार-संसदीय सरकार में सरकार अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है।

प्रश्न 4. संसदीय सरकार के दो अवगुण बताइए।
उत्तर-

  1. यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है-संसदीय सरकार शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है।
  2. अस्थिर सरकार-संसदीय शासन प्रणाली में सरकार अस्थिर होती है, क्योंकि मन्त्रिमण्डल की अवधि निश्चित नहीं होती।

प्रश्न 5. अध्यक्षात्मक सरकार का अर्थ लिखें।
उत्तर-अध्यक्षात्मक सरकार उस शासन प्रणाली को कहते हैं, जिसमें कार्यपालिका संवैधानिक दृष्टि से विधानपालिका से अपनी नीतियों और कार्यों के लिए स्वतन्त्र होती है। कार्यपालिका विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती और दोनों में कोई सम्बन्ध नहीं होता। विधानपालिका मन्त्रियों को उनके पद से हटा नहीं सकती। राज्य का अध्यक्ष वास्तविक कार्यपालिका होता है और संविधान द्वारा दी गई शक्तियों का प्रयोग अपनी इच्छानुसार करता है। अमेरिका में अध्यक्षात्मक सरकार है।

प्रश्न 6. अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के दो गुण लिखें।
उत्तर-

  1. शासन में स्थिरता-अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति की अवधि निश्चित होती है जिससे शासन में स्थिरता आती है।
  2. इसमें नीति की एकता बनी रहती है-इस शासन प्रणाली में कार्यपालिका एक निश्चित समय तक अपने पद पर रहती है जिससे एक ही नीति निश्चित अवधि तक चलती रहती है।

प्रश्न 7. अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के दो दोष बताइए।
उत्तर-

  1. निरंकुशता का भय-शासन की सभी शक्तियां राष्ट्रपति के पास होती हैं जिससे वह निरंकुश बन सकता है।
  2. शासन की परिस्थितियों के अनुसार नहीं बदला जा सकता-अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है। राष्ट्रपति यदि शासन ठीक ढंग से न चलाए तो भी जनता उसे निश्चित अवधि से पहले नहीं हटा सकती।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1. संसदीय सरकार का क्या अर्थ है ?
उत्तर-संसदीय सरकार में कार्यपालिका अपने कार्यों के लिए संसद् के प्रति उत्तरदायी होती है। वह तब तक अपने पद पर रहती है, जब तक इसको संसद का विश्वास प्राप्त रहता है।

प्रश्न 2. संसदीय सरकार की कोई एक विशेषता बताएं।
उत्तर-संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाम-मात्र का सत्ताधारी होता है।

प्रश्न 3. संसदीय सरकार का कोई एक गुण लिखें।
उत्तर-संसदीय सरकार में कार्यपालिका एवं विधानपालिका में पूर्ण सहयोग रहता है।

प्रश्न 4. संसदीय सरकार का कोई एक अवगुण लिखें।
उत्तर-संसदीय सरकार अस्थिर होती है।

प्रश्न 5. सामूहिक उत्तरदायित्व किस सरकार में पाया जाता है ?
उत्तर-संसदीय सरकार में।

प्रश्न 6. अध्यक्षात्मक सरकार किसे कहते हैं ?
उत्तर-अध्यक्षात्मक सरकार उस शासन प्रणाली को कहते हैं जिसमें कार्यपालिका संवैधानिक दृष्टि से विधानपालिका से अपनी नीतियों और कार्यों के लिए स्वतन्त्र होती है।

प्रश्न 7. संसदीय और अध्यक्षात्मक सरकार में कोई एक अन्तर बताओ।
उत्तर-संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का मुखिया होता है जबकि अध्यक्षात्मक सरकार में राज्य का अध्यक्ष वास्तविक अध्यक्ष होता है।

प्रश्न 8. अध्यक्षात्मक सरकार की कोई एक विशेषता बताओ।
उत्तर-अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में कार्यपालिका का अध्यक्ष वास्तविक अध्यक्ष होता है। शासन की शक्तियों का प्रयोग अध्यक्ष द्वारा ही किया जाता है।

प्रश्न 9. अध्यक्षात्मक सरकार का कोई एक गुण बताओ।
उत्तर-इसमें सरकार स्थिर रहती है।

प्रश्न 10. अध्यक्षात्मक सरकार का कोई एक अवगुण बताओ।
उत्तर-अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति के निरंकुश बनने का भय बना रहता है।

प्रश्न 11. भारतीय राष्ट्रपति किस प्रकार की कार्यपालिका है?
उत्तर- भारतीय राष्ट्रपति नाममात्र की कार्यपालिका है।

प्रश्न 12. भारतीय प्रधानमन्त्री किस प्रकार की कार्यपालिका है?
उत्तर-भारतीय प्रधानमन्त्री वास्तविक कार्यपालिका है।

प्रश्न 13. इंग्लैण्ड की रानी या राजा किस प्रकार की कार्यपालिका है?
उत्तर-इंग्लैण्ड की रानी या राजा नाममात्र की कार्यपालिका है।

प्रश्न 14. इंग्लैण्ड का प्रधानमन्त्री किस प्रकार की कार्यपालिका है?
उत्तर-इंग्लैण्ड में प्रधानमन्त्री वास्तविक कार्यपालिका है।

प्रश्न 15. संसदीय एवं अध्यक्षात्मक सरकार में से किसे श्रेष्ठ समझा जाता है?
उत्तर-संसदीय सरकार को श्रेष्ठ समझा जाता है।

प्रश्न 16. अमेरिका में किस प्रकार की शासन प्रणाली है?
उत्तर-अमेरिका में अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली है।

प्रश्न 17. भारत में संसदीय शासन प्रणाली अपनाने का एक कारण लिखें।
उत्तर-संसदीय परम्पराएं।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. संसदीय शासन प्रणाली में सरकार …………….. की इच्छानुसार शासन को चलाती है।
2. संसदीय सरकार शक्तियों के ……………. के सिद्धान्त के विरुद्ध है।
3. संसदीय सरकार में शासन की …………… का अभाव रहता है।
4. संकटकाल के समय संसदीय सरकार …………… साबित होती है।
उत्तर-

  1. जनमत
  2. पृथक्करण
  3. कुशलता
  4. कमज़ोर।

प्रश्न III. निम्नलिखित में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका विधानपालिका से स्वतन्त्र होती है।
2. अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति नाममात्र का शासक होता है।
3. अध्यक्षात्मक सरकार में मन्त्रिमण्डल के सदस्य विधानपालिका के सदस्य नहीं होते।
4. अध्यक्षात्मक सरकार में नाममात्र तथा वास्तविक कार्यपालिका में भेद नहीं पाया जाता।
5. अध्यक्षात्मक सरकार शक्तियों के पृथक्करण पर आधारित है।
उत्तर-

  1. सही
  2. ग़लत
  3. सही
  4. सही
  5. सही।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1. अध्यक्षात्मक शासन में जनमत की अवहेलना हो सकती है, यह कथन-
(क) सही है
(ख) ग़लत है
(ग) उपरोक्त दोनों
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-(क) सही है।

प्रश्न 2. अध्यक्षात्मक शासन में सरकार में राजनीतिक एकरूपता नहीं होती। यह कथन-
(क) सही है
(ख) ग़लत है
(ग) उपरोक्त दोनों
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-(क) सही है।

प्रश्न 3. संसदीय सरकार में मन्त्रिमण्डल को महाभियोग द्वारा हटाया जाता है, यह कथन-
(क) सही है
(ख) ग़लत है
(ग) उपरोक्त दोनों
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-(ख) ग़लत है ।

प्रश्न 4. अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति को अविश्वास प्रस्ताव पास करके हटाया जाता है। यह कथन-
(क) सही है
(ख) ग़लत है
(ग) उपरोक्त दोनों
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-(ख) ग़लत है ।

Class 11 Geography Solutions Chapter 7 पवनें

पवनें Textbook Questions and Answers

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक या दो शब्दों में दो :

प्रश्न (क) ITCZ का पूरा नाम क्या है ?
उत्तर-Inter Tropical Convergence Zone.

प्रश्न (ख) नक्षत्रीय पवनों को अंग्रेजी में क्या कहते हैं ?
उत्तर-Planetary winds.

प्रश्न (ग) मानसून कौन-सी भाषा का शब्द है ?
उत्तर- अरबी भाषा।

प्रश्न (घ) साइबेरिया की कौन-सी झील मानसून सिद्धांत से संबंधित है ?
उत्तर-बैकाल झील।

प्रश्न (ङ) मानसून फटने की क्रिया कब घटित होती है ?
उत्तर-28 से 30 मई के मध्य केरल के तट पर।

प्रश्न (च) पंजाब के दक्षिणी भागों में गर्मियों में बहती हवाओं को क्या कहते हैं ?
उत्तर-लू (loo)।

प्रश्न (छ) ऑस्ट्रेलिया में चक्रवातों को किस नाम से जाना जाता है ?
उत्तर-विल्ली-विल्ली।।

प्रश्न (ज) Tornado का पंजाबी में क्या नाम है ?
उत्तर-वावरोला।

प्रश्न (झ) विपरीत चक्रवात का सिद्धांत किसने दिया ?
उत्तर-फ्रांसिस गैलटन ने।

प्रश्न (ब) यूरोप में फोहेन (Fohen) नाम से जानी जाने वाली पवनों को उत्तरी अमेरिका में कौन-सा नाम दिया जाता है ?
उत्तर-चिनूक पवनें।

2. प्रश्नों के उत्तर दो-चार वाक्यों में दो :

प्रश्न (क) पश्चिमी पवनों को मलाहां की ओर से 40′, 50° और 60° अक्षांश पर क्या-क्या नाम दिए जाते हैं ?
उत्तर-
40° अक्षांश . – गर्जते चालीस
50° अक्षांश – गुस्सैल पचास
60° अक्षांश – कूकते (चीखते) साठ।

प्रश्न (ख) स्थायी पवनों के उदाहरणों के नाम लिखें।
उत्तर-

  1. व्यापारिक पवनें
  2. पश्चिमी पवनें
  3. ध्रुवीय पवनें।

प्रश्न (ग) फैरल के नियमानुसार उत्तरी गोलार्द्ध में क्या प्रभाव पड़ते हैं ?
उत्तर- उत्तरी गोलार्द्ध में पवनें अपने दायीं ओर मुड़ जाती हैं।

प्रश्न (घ) एलनीनो का पता किसने लगाया था ?
उत्तर-लगभग 100 साल पहले मौसम विभाग के डायरैक्टर जनरल गिलबर्ट वाल्कर (Gilbert Walker) ने एलनीनो का पता लगाया था।

प्रश्न (ङ) सांता एना क्या है ?
उत्तर-कैलीफोर्निया राज्य के दक्षिणी भागों में पहाड़ी क्षेत्रों से नीचे उतरती पवनों को सांता एना कहते हैं।

प्रश्न (च) बलिजार्ड (Balizard) क्या है ?
उत्तर-ध्रुवीय क्षेत्रों में चलने वाली ठंडी, शुष्क और बर्फीली पवनों को बलिजार्ड कहते हैं।

प्रश्न (छ) हरीकेन और बाईगुइस में क्या अंतर है ?
उत्तर-खाड़ी मैक्सिको में चलने वाले चक्रवातों को हरीकेन कहते हैं जबकि फिलीपाइन के निकट चलने वाले चक्रवातों को बाईगुइस कहते हैं।

प्रश्न (ज) हुद-हुद, नीलोफर और नानुक का आपस में क्या संबंध है ?
उत्तर-सन् 2014 में, भारत के तट पर चलने वाले चक्रवातों को हुद-हुद, नीलोफर और नानुक नाम दिए गए थे।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 60 और 80 शब्दों में दें-

प्रश्न (क) विपरीत चक्रवातों के रहते गर्मियों और सर्दियों के मौसम कैसे होते हैं ?
उत्तर-विपरीत चक्रवातों का अर्थ है-उच्च हवा के दबाव के क्षेत्र। गर्मियों में विपरीत चक्रवातों के समय मौसम साफ-साफ, नीला आसमान, बादल रहित और शुष्क होता है। सर्दियों के मौसम में कोहरा और धुंध हो सकती है।

प्रश्न (ख) एल-नीनो क्या है ? व्याख्या करें।
उत्तर-एल-नीनो गर्म जल की धारा है, जो दक्षिणी प्रशांत महासागर में पेरु-चिल्ली के तट के साथ-साथ छह से सात वर्षों के अंतराल से बहती है। हम्बोलाट की ठंडी धारा के विपरीत गर्म जल की धारा एल-नीनो बहती है, इसलिए मानसून की वर्षा कम हो जाती है।

प्रश्न (ग) तिब्बत के पठार का मानसून पवनों संबंधी क्या योगदान है ?
उत्तर-तिब्बत का पठार एक विशाल पठार है, जिसका क्षेत्रफल 2000-600000 वर्ग किलोमीटर है। यह पवनों के लिए प्राकृतिक रोक लगाता है और यहाँ गर्मियों के मौसम में तापमान बहुत अधिक हो जाता है, इसलिए पश्चिमी जेट धारा तिब्बत के उत्तर की ओर खिसक जाती है।

प्रश्न (घ) ‘आमों की बौछार’ स्पष्ट करें।
उत्तर-जून के महीने में मानसून पवनें केरल के तट से शुरू होती हैं। इन्हें मानसून का फटना कहते हैं। यह वर्षा केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में आमों की उपज के लिए बहुत लाभदायक होती है। इसलिए इसे ‘आम्रवृष्टि’ (Mango Showers) भी कहा जाता है।

प्रश्न (ङ) पवन-पेटियों के फिसलने की क्रिया स्पष्ट करें।
उत्तर-धरती की परिक्रमा के कारण, धरती के ऊपर सूर्य की स्थिति सारा साल लगातार बदलती रहती है। सूर्य की किरणें कभी भूमध्य रेखा पर, कभी कर्क रेखा पर और कभी मकर रेखा पर लंब रूप में पड़ती हैं। जब सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर लंब रूप में पड़ती हैं, तो पवन-पेटियाँ उत्तर की ओर खिसक जाती हैं। इसके विपरीत जब सूर्य की किरणें मकर रेखा पर लंब रूप में पड़ती हैं, तो पवन-पेटियाँ दक्षिण की ओर खिसक जाती हैं।

प्रश्न (च) कोरिओलिस (Coriolis) प्रभाव क्या है ? पृथ्वी पर इसका क्या प्रभाव है ? संक्षेप में लिखें।
उत्तर-कोरिओलिस प्रभाव (Coriolis effect)-धरातल पर पवनें कभी भी उत्तर से दक्षिण की ओर सीधी नहीं बहतीं। सभी पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में अपने दाएँ ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बाएँ ओर मुड़ जाती हैं। इसे फैरल का नियम कहते हैं। (“All moving bodies are deflected to the right in the Northern Hemisphere and to the left in the Southern Hemisphere.”)

Class 11 Geography Solutions Chapter 7 पवनें 1

हवा की दिशा में परिवर्तन का कारण धरती की दैनिक गति है। जब हवाएँ कम चाल वाले भागों से अधिक चाल वाले भागों की ओर आती हैं, तो पीछे रह जाती हैं। जैसे-उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तरी-पूर्वी व्यापारिक पवनें अपने दाएँ ओर मुड़ जाती हैं तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बाएँ ओर मुड़ जाती हैं। इसे कोरिओलिस प्रभाव कहते हैं।

प्रश्न (छ) शृंकां से क्या भाव है ? इस पर एक स्पष्ट नोट लिखें।
उत्तर-उत्तरी अमेरिका में बसंत ऋतु में पर्वतों के नीचे उत्तर के मैदानों की ओर बहती गर्म शुष्क पवनों को चिनूक पवनें कहते हैं। कनाडा में पंजाबी में इसे ‘शंकां’ भी कहते हैं।

4. प्रश्नों के उत्तर 150 से 250 शब्दों में लिखो-

प्रश्न (क) स्थानीय पवनों के तापमान के आधार पर विभाजन और व्याख्या करें।
उत्तर-स्थानीय पवनें (Local winds)-कुछ पवनें भू-तल के किसी छोटे-से सीमित भाग में चलती हैं, जिन्हें स्थानीय पवनें कहते हैं।

1. थल और जल समीर (Land and Sea Breezes)–थल पर स्थायी पवनों का एक सिलसिला है, पर जल और थल के तापमान की भिन्नता के कारण कुछ स्थानीय पवनें पैदा होती हैं। जल समीर और थल समीर अस्थायी पवनें हैं, जो समुद्र तल के निकट के क्षेत्रों में महसूस की जाती हैं। ये जल और थल की बहुत कम गर्मी के कारण पैदा होती हैं, इसलिए इन्हें छोटे पैमाने की मानसून पवनें (Monsoon on a Small Scale) भी कहते हैं।

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(i) जल समीर (Sea Breeze)—ये वे पवनें हैं, जो दिन के समय समुद्र से थल की ओर चलती हैं। उत्पत्ति का कारण (Origin)—दिन के समय सूर्य की तीखी गर्मी के कारण थल भाग समुद्र की अपेक्षा अधिक और जल्दी गर्म हो जाता है। थल पर हवा गर्म होकर ऊपर उठती है और वायु दबाव कम हो जाता है, परंतु समुद्र पर थल की तुलना में अधिक वायु दबाव रहता है। इस प्रकार थल पर कम दबाव का स्थान लेने के लिए समुद्र की ओर से ठंडी हवाएं चलती हैं। थल की गर्म हवा ऊपर उठकर समुद्र की ओर चली जाती है। इस प्रकार हवा के बहने का एक चक्र बन जाता है।

प्रभाव (Effects)-

  • जल समीर ठंडी और सुहावनी (Cool and fresh) होती है।
  • यह गर्मियों में तटीय क्षेत्रों में तापमान को कम करती है, परंतु सर्दियों में तटीय तापमान को ऊँचा करती है। इस प्रकार मौसम सुहावना और समान हो जाता है।
  • इसके प्रभाव समुद्र तट से 20 मील की दूरी तक सीमित रहते हैं।

(ii) थल समीर (Land Breeze)-ये वे पवनें हैं, जो रात के समय थल से समुद्र की ओर चलती हैं।
उत्पत्ति के कारण (Origin)—रात के समय स्थिति दिन से विपरीत होती है। थल भाग समुद्र की अपेक्षा अधिक और जल्दी ठंडे हो जाते हैं। समुद्र पर वायु दबाव कम हो जाता है, परंतु थल पर वायु दबाव अधिक होता है। इस प्रकार थल की ओर से समुद्र की ओर पवनें चलती हैं। समुद्र की गर्म हवा ऊपर उठकर थल पर उतरती है, जिससे हवा चलने का चक्र बन जाता है।

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प्रभाव (Effects)–

  • इसका थल भागों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
  • इन पवनों का फायदा उठाकर मछुआरे प्रातः थल समीर (Land Breeze) की सहायता से समुद्र की ओर बढ़ जाते हैं और शाम को जल समीर (Sea Breeze) के साथ-साथ तट की ओर वापस आ जाते हैं।
  • इसका प्रभाव तभी अनुभव होता है, जबकि आकाश साफ हो, दैनिक तापमान अधिक हो और तेज़ पवनें न बहती हों।

2. पर्वतीय और घाटी की पवनें (Mountain and Valley Winds)—यह आमतौर पर दैनिक पवनें होती हैं, जो दैनिक तापांतर के फलस्वरूप वायु-दबाव की भिन्नता के कारण चलती हैं।

(i) पर्वतीय पवनें (Mountain Winds)—पर्वतीय प्रदेशों में रात के समय पर्वत के शिखर से घाटी की ओर ठंडी और भारी हवाएँ चलती हैं, जिन्हें पर्वतीय पवनें (Mountain winds) कहा जाता है।।

उत्पत्ति (Origin)-रात के समय तेज विकिरण (Rapid Radiation) के कारण हवा ठंडी और भारी हो जाती है। यह हवा गुरुत्वाकर्षण शक्ति (Gravity) के कारण ढलानों से होकर नीचे उतरती है। इसे वायु प्रवाह (Air Drainage) भी कहते हैं।

प्रभाव (Effects)-इन पवनों के कारण घाटियाँ (Valleys) ठंडी हवा से भर जाती हैं, जिससे घाटी के निचले भागों पर पाला पड़ता है, इसीलिए कैलीफोर्निया (California) में फलों के बाग और ब्राजील में कॉफी (कहवा) के बाग ढलानों पर लगाए जाते हैं।

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(ii) घाटी की पवनें (Valley Winds)-दिन के समय घाटी की गर्म हवा ढलान के ऊपर से होकर चोटी की ओर ऊपर चढ़ती है। इसे घाटी की पवनें कहा जाता है।

उत्पत्ति (Origin)-दिन के समय पर्वत के शिखर पर तेज़ गर्मी और विकिरण के कारण हवा गर्म होकर ऊपर उठती है और कम वायु दबाव हो जाता है। उसका स्थान लेने के लिए घाटी से हवाएँ ऊपर चढ़ती हैं। जैसे-जैसे ये पवनें ऊपर चढ़ती हैं, वे ठंडी होती जाती हैं।

प्रभाव (Effects)-

  • ऊपर चढ़ने के कारण ये पवनें ठंडी होकर भारी वर्षा करती हैं।
  • ये ठंडी पवनें गहरी घाटियों में गर्मी की तेज़ी को कम करती हैं।

3. चिनक और फौहन पवनें (Chinook and Foehn Winds)-

(i) चिनूक पवनें (Chinnok Winds)-अमेरिका में रॉकी (Rocky) पर्वतों को पार करके प्रेरीज़ के मैदान में चलने वाली पवनों को चिनूक (Chinook) पवनें कहते हैं। चिनूक का अर्थ है-बर्फ खाने वाला। चूँकि ये पवनें अधिक तापमान के कारण बर्फ को पिघला देती हैं और कई बार 24 घंटों के समय में 50° F (10° C) तापमान बढ़ जाता है।

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(ii) फोहन पवनें (Foehn Winds)-यूरोप में अल्पस पर्वतों को पार करके स्विट्ज़रलैंड में उतरने वाली पवनों को फोहन (Foehn) पवनें कहते हैं।

प्रभाव (Effects)-

  • ये पवनें तापमान बढ़ा देती हैं और बर्फ पिघल जाती है, जिससे फसलों को पकने में सहायता मिलती है।
  • ये पवनों की कठोरता को कम करती हैं।
  • बर्फ के पिघल जाने से पहाड़ी चरागाह वर्ष-भर खुले रहते हैं और पशु-पालन में आसानी रहती है।

4. बोरा और मिस्ट्रल (Bora and Mistral)—ये दोनों एक ही प्रकार की शीतल और शुष्क पवनें हैं, जिन्हें यूगोस्लाविया के एडरिआटिक सागर (Adriatic Sea) और इटली के तट पर बोरा तथा फ्रांस की रोम घाटी (Rome Valley) में मिस्ट्रल कहते हैं। शीतकाल में मध्य यूरोप अत्यंत ठंड के कारण उच्च वायु दाब के अंतर्गत होता है। इसकी तुलना में भूमध्य सागर में निम्न वायु दाब होता है। परिणामस्वरूप मध्य यूरोप में भूमध्य सागर की ओर से ठंडी और शुष्क पवनें चलने लगती हैं। आम तौर पर ये शक्तिशाली पवनें होती हैं, जिनकी गति तेज़ होती है। रोहन नदी की तंग घाटी में ये पवनें बड़ा भयानक रूप धारण कर लेती हैं और कई बार इनकी तेज़ गति के कारण मकानों की छतें भी उड़ जाती हैं।

5. बवंडर (Tornado)—संयुक्त राज्य अमेरिका के मध्यवर्ती मैदानों में, गर्मी की ऋतु आरंभ होने के साथ ही तेज़ अंधेरियाँ चलनी शुरू हो जाती हैं, जिन्हें ‘बवंडर’ के नाम से पुकारा जाता है। इन मैदानों में, गर्मी की ऋतु आरंभ होते ही गर्मी में तेजी से वृद्धि होनी आरंभ हो जाती है। फलस्वरूप वहाँ निम्न वायु दाब उत्पन्न हो जाता है। निकटवर्ती बर्फ से ढके रॉकी पर्वतों के उच्च वायु दाब से अत्यंत ठंडी शुष्क पवनें तेज़ गति से यहाँ पहुँचती हैं और मैक्सिको की खाड़ी से आती हुई गर्म और नम पवनों के साथ संबंध स्थापित कर लेती हैं। शीतल और शुष्क तथा उष्ण और नम पवनों के मेल से प्रचंड बवंडर की उत्पत्ति होती है। ये बवंडर बहुत विनाशकारी होते हैं।

6. लू (Loo)-भारत के उत्तरी विशाल मैदानों और पाकिस्तान के सिंध और इसकी सहायक नदियों के मैदानों में मई-जून के महीनों में बहुत गर्म पवनें चलती हैं। ये अक्सर शुष्क होती हैं, जो पश्चिमी दिशा की ओर बहती हैं। इन्हें ‘लू’ कहते हैं। इनका तापमान 45°-50° सैल्सियस के बीच होता है। ये बहुत असहनीय होती हैं।

7. हर्मटन (Harmattan)—पश्चिमी अफ्रीका में सहारा मरुस्थल से शुष्क, गर्म और धूल भरी पवनें चलती हैं। पश्चिमी अफ्रीका के पश्चिमी तटों के गर्म व शुष्क वातावरण की नमी शरीर के पसीने को सुखा देती है। इस प्रकार ये पवनें स्वास्थ्य के लिए ठीक समझी जाती हैं। परिणामस्वरूप इन्हें डॉक्टर (Doctor) कह कर पुकारा जाता है।

8. सिरोको (Sirroco)—सहारा मरुस्थल से ही गर्म, शुष्क और धूल भरी पवनें भूमध्य सागर की ओर चलती हैं। इटली में इन्हें सिरोको और सहारा में ‘सिमूम’ कहा जाता है। भूमध्य सागर को पार करते समय ये नमी ग्रहण कर लेती हैं। इटली में ये मौसम को अत्यंत गर्म और चिपचिपा कर देती हैं। इस प्रकार ये दुखदायी होती हैं।

9. बलिजार्ड (Blizard) बर्फ से ढके ध्रुवीय क्षेत्रों में चलने वाली ठंडी, शुष्क और बर्फीली पवनों को बलिजार्ड कहते हैं। इनकी गति 70 से 100 किलोमीटर घंटा होती है। इनमें मुसाफिर मार्ग में भटक जाते हैं, इसे बर्फ का अंधापन (Snow blindness) कहा जाता है।

प्रश्न (ख) स्थायी पवनें क्या हैं ? प्रकार सहित इनकी व्याख्या करें।
उत्तर-पवनें (Winds)-वायु हमेशा उच्च दबाव वाले क्षेत्रों से निम्न दबाव वाले क्षेत्रों की ओर चलती है। इस चलती हुई वायु को पवन (Wind) कहते हैं। वायु-दबाव में अंतर आ जाने के कारण ही भू-तल पर चलने वाली पवनें उत्पन्न होती हैं। पवनों की दिशा (Direction of the wind) वह होती है, जिस दिशा से वे आती हैं।

1. भू-मंडलीय या स्थायी पवनें (Planetary or Permanent Winds)-
धरातल पर उच्च वायु दाब और निम्न वायु दाब की अलग-अलग पेटियाँ (Belts) होती हैं। उच्च वायु दाब और निम्न वायु दाब की ओर से लगातार पवनें चलती हैं। इन्हें स्थायी पवनें कहते हैं। ये सदा एक ही दिशा की ओर चलती हैं। स्थायी पवनें तीन प्रकार की होती हैं-

  1. व्यापारिक पवनें (Trade winds)
  2. पश्चिमी पवनें (Westerlies)
  3. ध्रुवीय पवनें (Polar winds)

1. व्यापारिक पवनें (Trade Winds) विस्तार (Extent) व्यापारिक पवनें वे स्थायी पवनें हैं, जो गर्म कटिबंध (Tropics) के मध्य भूमध्य रेखा की ओर चलती हैं। ये पवनें घोड़ा अक्षांशों (Horse Latitudes) या उपोष्ण कटिबंध के उच्च दबाव (Sub Tropical High Pressure) के क्षेत्र से डोलड्रमज़ (Dol Drums) या भूमध्य रेखा की निम्न वायु दबाव वाली पेटी की ओर चलती हैं। इनका विस्तार आम तौर पर 5°-35° उत्तर और दक्षिण तक चला जाता है।

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दिशा (Direction)-ये दोनों गोलार्डों में पूर्व से आती दिखाई देती हैं, इसलिए इन्हें पूर्वी पवनें (Easterlies) भी कहते हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में इनकी दिशा उत्तर-पूर्वी (North-East) और दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिणी-पूर्वी (South-East) होती है। नाम का कारण (Why so Called ?)—इन पवनों को व्यापारिक पवनें (Trade winds) कहने के दो कारण हैं-

  • प्राचीन काल में यूरोप और अमेरिका के बीच समुद्री जहाजों को इन पवनों से बहुत सहायता मिलती थी। ये पवनें Backing winds के रूप में जहाज़ों की गति बढ़ा देती हैं, इसलिए व्यापार में सहायक होने के कारण इन्हें व्यापारिक पवनें कहा जाता है।
  • अंग्रेज़ी के मुहावरे, To blow trade का अर्थ है-लगातार बहना। ये पवनें लगातार एक ही दिशा की ओर बहती हैं। इसलिए इन्हें Trade winds कहते हैं।

उत्पत्ति का कारण (Why caused ?) भूमध्य रेखा पर बहुत गर्मी के कारण निम्न वायु दाब पेटी मिलती है। भूमध्य रेखा से ऊपर उठने वाली गर्म और हल्की हवा 30° उत्तर और दक्षिण के पास ठंडी और भारी होकर नीचे उतरती रहती है। ध्रुवों से खिसक कर आने वाली हवा भी इन अक्षांशों में नीचे उतरती है। इन नीचे उतरती हुई पवनों के कारण मकर रेखा के निकट उच्च वायु दाब पेटी बन जाती है। इसलिए भूमध्य रेखा के निम्न वायु दाब (Low Pressure) का स्थान ग्रहण करने के लिए 30° उत्तर और दक्षिण के उच्च वायु दाब से भूमध्य रेखा की ओर व्यापारिक पवनें चलती हैं।

दिशा परिवर्तन (Change in Direction)—यदि धरती स्थिर होती तो ये पवनें उत्तर-दक्षिण दिशा में चलतीं, परंतु धरती की दैनिक गति के कारण ये पवनें इस लंबवत् दिशा से हटकर एक तरफ झुक जाती हैं और Deflect हो जाती हैं। फैरल के नियम और कोरोलिस बल के कारण, ये पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में दायीं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बायीं ओर मुड़ जाती हैं।

प्रभाव (Effects)-

  • गर्म प्रदेशों में चलने के कारण ये पवनें आम तौर पर शुष्क होती हैं।
  • ये पवनें महाद्वीपों के पूर्वी भागों में वर्षा करती हैं और पश्चिमी भागों तक पहुँचते-पहुँचते शुष्क हो जाती हैं। यही कारण है कि पश्चिमी भागों में 20°-30° में गर्म मरुस्थल (Hot Deserts) मिलते हैं।
  • ये पवनें उत्तरी भाग में उच्च दाब (High Pressure) के निकट होने के कारण ठंडी (Cool) और शुष्क (Dry) होती हैं, पर भूमध्य रेखा के निकट दक्षिणी भागों में गर्म (Hot) और नम (Wet) होती हैं।
  • ये पवनें समुद्रों से लगातार और धीमी चाल में चलती हैं, पर महाद्वीपों में इनकी दिशा और गति में अंतर आ जाता है।

व्यापारिक पवनों के देश (Areas)-उत्तरी गोलार्द्ध में पूर्वी अमेरिका और मैक्सिको, दक्षिणी गोलार्द्ध में उत्तर-पूर्वी ऑस्ट्रेलिया, पूर्वी अफ्रीका और पूर्वी ब्राज़ील।

2. पश्चिमी पवनें (Westerlies) विस्तार (Extent)-ये पवनें ऐसी स्थायी पवनें हैं जो शीतोष्ण (Temperate) खंड में 30° उच्च वायु दाब से 60° के उप-ध्रुवीय निम्न वायु दाब (Sub-Polar Low Pressure) की ओर चलती हैं। इनका विस्तार आम तौर पर 30° से 65° तक पहुँच जाता है। इन पवनों की उत्तरी सीमा ध्रुवीय सीमांत (Polar Fronts) और चक्रवातों (Cyclones) के कारण सदा बदलती रहती है।

दिशा (Direction)-उत्तरी गोलार्द्ध में इन पवनों की दिशा दक्षिण-पश्चिमी (South-west) होती है। दक्षिणी गोलार्द्ध में इन पवनों की दिशा उत्तर-पश्चिमी (North-west) होती है।

नाम का कारण (Why so Called ?)दोनों गोलार्डों में ये पवनें पश्चिम से आती हुई महसूस होती हैं, इसलिए इन्हें पश्चिमी पवनें कहते हैं। इनकी दिशा व्यापारिक पवनों के विपरीत होती है, इसलिए इन्हें प्रतिकूल व्यापारिक पवनें (Anti-Trade winds) भी कहते हैं।

उत्पत्ति का कारण (Why Caused ?)-कर्क रेखा और मकर रेखा के निकट नीचे उतरती पवनों (Descending winds) के कारण उच्च वायु दाब हो जाता है। भूमध्य रेखा से गर्म और हल्की हवा इन अक्षांशों में नीचे उतरती है। इसी प्रकार ध्रुवों से खिसक कर आने वाली हवा भी नीचे उतरती है, परंतु 60°C अक्षांशों के निकट Antarctic Circle पर धरती की दैनिक गति के कारण निम्न वायु दाब हो जाता है। इसलिए 30° के उच्च वायु दाब की ओर से 60° के निम्न वायु दाब की ओर पश्चिमी पवनें चलती हैं।

दिशा परिवर्तन (Change in Direction)-आम तौर पर पवनों की दिशा उत्तर-दक्षिणी होनी चाहिए, परंतु धरती की दैनिक गति के कारण यह पवनें लंबवत् दिशा से हटकर एक ओर झुक जाती हैं। फैरल के नियम (Ferral’s Law) के अनुसार और कोरोलिस बल के कारण ये पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में दायीं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बायीं ओर मुड़ जाती हैं।

प्रभाव (Effects)-

  • समुद्रों की नमी से भरी होने के कारण यह पवनें अधिक वर्षा करती हैं।
  • यह पवनें पश्चिमी प्रदेशों में बहुत वर्षा करती हैं, परंतु पूर्वी भाग सूखे रह जाते हैं।
  • यह पवनें बहुत अस्थिर होती हैं। इनकी दिशा और शक्ति बदलती रहती है। चक्रवात (Cyclones) और प्रति-चक्रवात (Anti-cyclones) इनके मार्ग में अनिश्चित मौसम ले आते हैं। वर्षा, बादल, कोहरा, बर्फ और तेज़ आँधियों के कारण मौसम लगातार बदलता रहता है।
  • यह दक्षिणी गोलार्द्ध में समुद्रों पर लगातार और तेज़ चाल से चलती हैं। 40°-50° दक्षिण के अक्षांशों में इन्हें गर्जते चालीस (Roaring Forty) कहा जाता है। 50°-60° दक्षिण में इन्हें क्रमशः गुस्सैल पचास (Furious Fifties) और कूकते (चीखते) साठ (Shrieking Sixty) कहते हैं। इन प्रदेशों में ये इतनी तेज़ी से चलती हैं कि दक्षिणी अमेरिका के Cape-Horn पर समुद्री आवाजाही रुक जाती है।
  • व्यापारिक पवनों की तुलना में इनका प्रवाह-क्षेत्र बड़ा होता है।

पश्चिमी पवनों के क्षेत्र (Areas)-इन पवनों के कारण पश्चिमी यूरोप के सभी देशों में आदर्श जलवायु (Ideal Climate) होती है। इसके अतिरिक्त पश्चिमी अमेरिका, पश्चिमी कनाडा, दक्षिणी-पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड तथा दक्षिणी-पश्चिमी अफ्रीका के प्रदेश इन पवनों के प्रभाव में आ जाते हैं।

प्रश्न (ग) निम्नलिखित पर नोट लिखें-
(i) कोरियोलिस प्रभाव
(ii) ऐलनीनो प्रभाव।
उत्तर-
(i) कोरियोलिस प्रभाव (Coriolis Effect)
पवनों की दिशा पर पृथ्वी के घूमने का प्रभाव (Effect of Earth’s Rotation on Wind’s Direction)पवनें उच्च दाब से निम्न दाब की दिशा की ओर चलती हैं। आम तौर पर ये सीधी चलती हैं, परंतु पृथ्वी की दैनिक गति ऐसा नहीं होने देती। इस गति के कारण पवनों की दिशा में विचलन (Deflection) हो जाता है। इस मोड़ने वाली या विचलन वाली शक्ति को विचलन शक्ति (Deflection Force) कहते हैं। इस बल की खोज एक फ्रांसीसी गणित शास्त्री कोरियोलिस (G.G. de Coriolis, 1792-1843) ने की थी। उसके नाम पर ही इस बल को कोरियोलिस बल या प्रभाव (Coriolis Force or Effect) का नाम दिया गया है।

इस प्रभाव के फलस्वरूप भू-तल पर चलने वाली सारी पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में अपने दाएँ हाथ और दक्षिणी गोलार्द्ध में अपने बाएँ हाथ मुड़ जाती हैं। इस प्रकार इस तथ्य की पुष्टि एक अन्य वैज्ञानिक फैरल (Ferral) ने एक प्रयोग द्वारा की थी। इसे फैरल का नियम (Ferral’s Law) भी कहते हैं।

Class 11 Geography Solutions Chapter 7 पवनें 7

(ii) ऐलनीनो प्रभाव (Al-Nino Effect)-
ऐलनीनो गर्म पानी की एक धारा है, जो दक्षिणी महासागर में पेरु तथा चिली के तट के साथ-साथ बहती है। यह 6-7 वर्षों बाद चलती है। इस तट के साथ हंबोलट की ठंडी धारा बहती है, पर ऐलनीनो में स्थिति विपरीत हो जाती है और गर्म पानी की धारा बहती है। इसी कारण पेरु आदि देशों में भारी वर्षा होती है, पर मानसूनी वर्षा कम हो जाती है। भारत आदि देशों में सूखे के हालात बन जाते हैं।

प्रश्न (घ) मानसून की उत्पत्ति संबंधी भिन्न-भिन्न सिद्धांतों का वर्णन करें।
उत्तर-मानसून पवनें (Monsoon Winds)-परिभाषा (Definition)-मानसून वास्तव में अरबी भाषा के शब्द ‘मौसम’ से बना है। सबसे पहले इनका प्रयोग अरब सागर पर चलने वाली हवाओं के लिए किया गया था। मानसून पवनें वे मौसमी पवनें हैं, जिनकी दिशा मौसम के अनुसार बिल्कुल विपरीत होती है। ये पवनें गर्मी की ऋतु में छह महीने समुद्र से थल की ओर तथा सर्दी की ऋतु में छह महीने थल से समुद्र की ओर चलती हैं।

कारण (Causes)-मानसून पवनें वास्तव में एक बड़े पैमाने पर थल समीर (Land Breeze) और जल समीर (Sea Breeze) हैं। इनकी उत्पत्ति का कारण जल और थल के गर्म और ठंडा होने में भिन्नता (Difference in the cooling and Heating of land and water) है। जल और थल असमान रूप से गर्म और ठंडे होते हैं। इस प्रकार मौसम के अनुसार वायु दाब में भी अंतर हो जाता है, जिनसे हवाओं की दिशा विपरीत हो जाती है।

थल भाग समुद्र की अपेक्षा जल्दी गर्म और जल्दी ठंडा हो जाता है। दिन के समय समुद्र के निकट थल पर निम्न दाब (Low Pressure) और समुद्र पर उच्च दाब (High Pressure) होता है। परिणामस्वरूप समुद्र से थल की ओर जल समीर (Sea Breeze) चलती है, पर रात को दिशा विपरीत हो जाती है और थल से समुद्र की ओर थल समीर (Land Breeze) चलती है। इस प्रकार हर दिन वायु की दिशा बदलती रहती है परंतु मानसून पवनों की दिशा मौसम के अनुसार बदलती है। ये पवनें तट के निकट के प्रदेशों में ही नहीं, बल्कि एक पूरे महाद्वीप में चलती हैं। इसलिए मानसून पवनों को थल समीर (Land Breeze) और जल समीर (Sea Breeze) का एक बड़े पैमाने पर दूसरा रूप कह सकते हैं।

मानसून की उत्पत्ति के लिए जरूरी दशाएँ (Necessary Conditions)—मानसून पवनों की उत्पत्ति के लिए इन दशाओं की आवश्यकता होती है-

  • एक विशाल महाद्वीप का होना।
  • एक विशाल महासागर का होना।
  • थल और जल भागों के तापमान में काफी अंतर का होना।
  • एक लंबी तट रेखा का होना।

मानसूनी प्रदेश (Areas)-ये मानसून पवनें सदा उष्ण-कटिबंध में चलती हैं, परंतु एशिया में ये पवनें 60° उत्तरी अक्षांश तक चलती हैं। इसलिए मानसून खंड दो भागों में विभाजित होते हैं। हिमालय पर्वत इन्हें अलग करता है।

(i) पूर्वी एशियाई मानसून (East-Asia Monsoon)-हिंद-चीन (Indo-China), चीन और जापान क्षेत्र।
(ii) भारतीय मानसून (Indian Monsoon)-भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश, बर्मा क्षेत्र।

गर्मी ऋतु की मानसून पवनें (Summer Monsoons)—मानसून पवनों के उत्पन्न होने और इनके प्रभाव के बारे में स्पष्ट करने के लिए एक ही वाक्य कहा जा सकता है-(“The chain of events is from temperature through pressure and winds to rainfall.”)

अथवा

Temp. → Pressure → Winds → Rainfall.
इन मानसून पवनों की तीन विशेषताएँ हैं-

(i) मौसम के साथ दिशा परिवर्तन।
(ii) मौसम के साथ वायु दाब केंद्रों का विपरीत हो जाना।
(iii) गर्मी ऋतु में वर्षा।

तापमान की भिन्नता के कारण वायु भार में अंतर पड़ता है और अधिक वायु भार से कम वायु भार की ओर ही पवनें चलती हैं। समुद्र से आने वाली पवनें वर्षा करती हैं। गर्मी की ऋतु में सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर सीधी पड़ती हैं, इसलिए भारत, चीन और मध्य एशिया के मैदान गर्म हो जाते हैं। इन थल भागों में कम वायु दाब केंद्र (Low Pressure Centres) स्थापित हो जाते हैं और हिंद महासागर तथा शांत महासागर से भारत और चीन की तरफ समुद्र से थल की ओर पवनें (Sea to Land Winds) चलती हैं। भारत में इन्हें दक्षिण-पश्चिमी गर्मी की ऋतु का मानसून (South-west Summer Monsoon) कहते हैं। चीन में इनकी दिशा दक्षिण-पूर्वी होती है। भारत में ये पवनें भारी वर्षा करती हैं, जिसे मानसून का फटना (Burst of Monsoon) भी कहते हैं। भारत में यह वर्षा बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय कृषि इसी वर्षा पर निर्भर करती है। इसीलिए “भारतीय बजट को मानसून का जुआ” (“Indian Budget is a gamble of Monsoon.”) कहा जाता है।

सर्दी की मानसून पवनें (Winter Monsoon)-सर्दी की ऋतु में मानसून पवनों की उत्पत्ति थल भागों पर होती है। सूर्य की किरणें मकर रेखा पर सीधी चमकती हैं, इसलिए उत्तरी गोलार्द्ध के थल भाग आस-पास के सागरों की तुलना. में ठंडे हो जाते हैं। मध्य एशिया में गोबी मरुस्थल (Gobi Desert) और भारत में राजस्थान प्रदेश में उच्च वायु दाब हो जाता है, इसीलिए इन भागों से समुद्र की ओर पवनें (Land to sea winds) चलती हैं। ये पवनें शुष्क और ठंडी होती हैं। भारत में इन्हें उत्तर-पूर्वी सर्दी ऋतु का मानसून (North-East winter Monsoon) कहते हैं। ये पवनें खाड़ी बंगाल को पार करने के बाद तमिलनाडु प्रदेश में वर्षा करती हैं। भू-मध्य रेखा पार करने के बाद ऑस्ट्रेलिया के तटीय भागों में भी इन पवनों से ही वर्षा होती है।

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मानसून पवनों की उत्पत्ति (Origin of Monsoons)-मानसून पवनों की उत्पत्ति के बारे में नीचे लिखी विचारधाराएँ प्रचलित हैं

1. तापीय विचारधारा (Thermal Concept)-इनकी उत्पत्ति का कारण जल और थल के गर्म और ठंडा होने में भिन्नता (Difference in the cooling and Heating of Land and Water) है। जल और थल असमान रूस से गर्म और ठंडे होते हैं। इस प्रकार मौसम के अनुसार वायु दाब में भी अंतर हो जाता है जिससे हवाओं की दिशा विपरीत हो जाती है। गर्मी की ऋतु में ये पवनें समुद्र से थल की ओर चलती हैं और शीत ऋतु में ये पवनें थल से समुद्र की ओर चलती हैं।

2. स्पेट की विचारधारा (Spate’s Concept) स्पेट नाम के विद्वान् के अनुसार मानसून पवनें चक्रवातों और प्रति-चक्रवातों के कारण पैदा होती हैं। इनके मिलने के कारण सीमांत बनते हैं, जिसमें चक्रवातीय हवा को मानसून कहते हैं।

3. फ्लॉन की विचारधारा (Flohn’s Concept)—मानसून पवनों की उत्पत्ति के बारे में सिद्धांतों में कमियों को देखते हुए फ्लॉन (Flohn) नामक विद्वान् ने एक नई विचारधारा को जन्म दिया। इसके अनुसार व्यापारिक पवनों और भूमध्य रेखीय निम्न वायु दाब क्षेत्र के आपसी मिलन स्थल (Inter-tropical convergence Zone-ITCZ) से पैदा हुए चक्रवातों के कारण मानसून पवनों की उत्पत्ति होती है और भारी वर्षा होती है, जिसे मानसून का फटना (Burst of Monsoon) कहते हैं। फ्लॉन के शब्दों में मानसून पवनें भू-मंडलीय पवन-तंत्र का ही रूपांतर हैं। (“The tropical Monsoon is simply a modification of Planetary wind system”.)

4. जेट प्रवाह विचारधारा (Jet Stream Theory)-वायुमंडल में ऊपरी सतहों में तेज़ गति से चलने वाली हवा को जेट प्रवाह कहते हैं। इस प्रवाह की गति 500 कि०मी० प्रति घंटा होती है। यह एक विशाल क्षेत्र को घेरे हुए 20°N-40°N के मध्य मिलती है। हिमालय पर्वत की रुकावट के कारण इसकी दो शाखाएँ हो जाती हैं-उत्तरी जेट प्रवाह और दक्षिणी जेट प्रवाह। दक्षिणी जेट प्रवाह भारत की जलवायु पर प्रभाव डालता है।
इस जेट प्रवाह के कारण दक्षिणी-पश्चिमी मानसून पवनें भारत की ओर चलती हैं।

प्रश्न (ङ) चक्रवात क्या होते हैं ? उष्ण विभाजीय (कटिबंधीय) और शीतोष्ण विभाजीय (कटिबंधीय) चक्रवातों का वर्णन करें।
उत्तर-चक्रवात निम्न वायुदाब का क्षेत्र होता है। चक्रवात में पवनें उत्तरी गोलार्द्ध (Northern Hemisphere) में घड़ी की दिशा के विपरीत तथा दक्षिणी गोलार्द्ध (Southern Hemisphere) में घड़ी की दिशा के साथ चलती हैं। इस प्रकार पवनों के उच्च वायु दाब से निम्न वायु दाब की ओर सुइयों के प्रतिकूल और अनुकूल चलने के कारण पवनों का एक चक्र उत्पन्न हो जाता है, जिसे चक्रवात कहते हैं। चक्रवात को उनकी स्थिति के अनुसार दो भागों में बांटा जाता है-

(1) शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Temperate Cyclones)
(2) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones)

1. शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Temperate Cyclones) – ये चक्रवात शीतोष्ण कटिबंध में मुख्य रूप से 30° से 60° अक्षांशों के मध्य पश्चिमी पवनों की पेटी में उत्पन्न होते हैं, जो आकृति में प्रायः वृत्त-आकार या अंडाकार होते हैं। इन्हें वायुगर्त (Depression) या निम्न (Low) या ट्रफ (Trough) भी कहते हैं।

1. आकृति और विस्तार (Shape and Size)-ये चक्रवात प्राय: वृत्त-आकार या अंडाकार होते हैं। इनका व्यास 1000 से 2000 किलोमीटर तक होता है। कभी-कभी इनका व्यास 3000 किलोमीटर से भी बढ़ जाता है। इनकी दाब-ढलान (Pressure Gradient) कम होती है।
2. उत्पत्ति (Formation)-शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति उष्ण और शीतल वायु-पिंडों (Air Masses) के मिलने से होती है। गर्म प्रदेशों से आने वाली गर्म पश्चिमी पवनें जब ध्रुवों से आने वाली पवनों से शीतोष्ण कटिबंध में मिलती हैं, तो शीतल पवनें गर्म पवनों को चारों ओर से घेर लेती हैं, जिसके फलस्वरूप केंद्र में गर्म पवनों से निम्न वायु दाब और बाहर गर्म पवनों से उच्च दाब बन जाता है। इस प्रकार चक्रवातों की उत्पत्ति होती है। इसे ध्रुवीय सीमांत सिद्धांत (Polar Front Theory) भी कहते हैं।
चक्रवातों के जीवन के इतिहास में अवस्थाओं का एक क्रम देखा जा सकता है-

  • पहली अवस्था-इस अवस्था के अनुसार दो वायु-राशियाँ एक-दूसरे के निकट आती हैं और सीमांत (Front) की रचना होती है। ध्रुवों की वायु-राशि और भूमध्य रेखा से आने वाली गर्म वायु विपरीत दिशाओं से आती है।
  • दूसरी अवस्था-इस अवस्था में उष्ण वायु-राशि में एक उभार उत्पन्न हो जाता है और फ्रंट एक तरंग का
    रूप धारण कर लेता है। फ्रंट (Front) के दो भाग हो जाते हैं-उष्ण फ्रंट और शीत फ्रंट। गर्म वायु-राशि उष्ण फ्रंट (Warm Front) के निकट शीत वायु से टकराती है।
  • तीसरी अवस्था-इस अवस्था में शीत फ्रंट तेज़ी से आगे बढ़ता है। तरंगों की ऊँचाई और वेग में वृद्धि होती है। गर्म वायु-राशि का भाग छोटा हो जाता है।
  • चौथी अवस्था-इस अवस्था में तरंगों की ऊँचाई अधिकतम होती है। दोनों वायु राशियों में धाराएँ चक्राकार गति प्राप्त कर लेती हैं और चक्रवात का विकास होता है।
  • पाँचवी अवस्था-इस अवस्था में शीत फ्रंट उष्ण फ्रंट को पकड़ लेता है। शीतल वायु उष्ण वायु को धरातल पर दबा देती है।
  • अंतिम अवस्था-इस अवस्था में उष्ण वायु अपने स्रोत से हटकर ऊपर उठ जाती है। धरातल पर शीतल वायु की एक भँवर (Whirl) चक्रवात का निर्माण होता है।

Class 11 Geography Solutions Chapter 7 पवनें 9

3. प्रवाह की दिशा (Direction of Movement)-चक्रवात सदा प्रवाहित होते रहते हैं। प्रायः ये प्रचलित पवनों द्वारा प्रवाहित होते हैं। पश्चिमी पवनों के कटिबंध में ये पूर्व दिशा की ओर चलते हैं। इनका क्षेत्र उत्तरी प्रशांत महासागर, उत्तरी संयुक्त राज्य अमेरिका और दक्षिणी कनाडा, उत्तरी अंधमहासागर और उत्तर-पश्चिमी यूरोप है।

4. वेग (Velocity)-इन चक्रवातों का वेग (गति) ऋतु और स्थिति पर निर्भर करता है। गर्म ऋतु की तुलना में शीतकाल में इनका वेग तीव्र होता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में ये गर्मी की ऋतु में 60 कि०मी० प्रति घंटा और सर्दियों की ऋतु में 48 कि०मी० प्रति घंटे की गति से आगे बढ़ते हैं।

5. मौसम की स्थिति (Weather Conditions)—इनमें तापमान ऋतु परिवर्तन के साथ बदलता रहता है। शीतकाल में इसका अगला भाग कुछ उष्ण रहता है और पिछला भाग शीतल। गर्मी की ऋतु में पिछला भाग शीतकाल की तुलना में निम्न रहता है। आम तौर पर चक्रवात का अगला भाग पूरा वर्ष लगभग उष्ण-नम (Muggy) होता है। इन चक्रवातों के आने पर आकाश पर खंभ-आकारी बादल छा जाते हैं। सूर्य और चंद्रमा के आस-पास एक प्रकाश-वृत्त (Halo) बन जाता है। फिर धीरे-धीरे फुहार शुरू हो जाती है, जो जल्दी ही तेज़ वर्षा का रूप धारण कर लेती है। परंतु शीघ्र ही आकाश साफ और सुहावना हो जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि चक्रवात का केंद्र पहुँच गया है। जब यह केंद्र आगे बढ़ जाता है, तो मौसम फिर ठंडा हो जाता है। ठंड बहुत तेजी से बढ़ने लगती है। आकाश में घने बादल छा जाते हैं और वर्षा की झड़ी लग जाती है। वर्षा के साथ ओले भी पड़ने लगते हैं। बहुत तेज़ हवाएँ चलती हैं जिसके परिणामस्वरूप तापमान और भी कम हो जाता है। बादल गर्जते हैं और बिजली चमकती है। चक्रवात के शीत पिंड पर पहुँचने पर वर्षा बंद हो जाती है और इस प्रकार चक्रवात का अंत हो जाता है और आकाश साफ हो जाता है।

2. उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones)-

उष्ण कटिबंध 2372° उत्तर से 2372° दक्षिणी अक्षांशों के बीच उत्पन्न होने वाले चक्रवातों को उष्ण कटिबंधीय चक्रवात कहते हैं। ये चक्रवात अपनी आकृति, वेग और मौसमी स्थिति संबंधी विशेषताओं में अलग हैं।

1. आकृति और विस्तार (Shape and size)-ये चक्रवात प्रायः वृत्ताकार और शीतोष्ण चक्रवातों की तुलना में छोटे व्यास के होते हैं। इनका व्यास 80 से 3000 कि०मी० तक होता है; पर कभी-कभी ये 50 कि०मी० से भी कम व्यास के होते हैं।

2. उत्पत्ति (Formation)-इनकी उत्पत्ति गर्मी के कारण उत्पन्न संवहन धाराओं (Convection Currents) के द्वारा होती है। मुख्य रूप में चक्रवात भूमध्य रेखीय निम्न वायु दाब पेटी में उत्पन्न संवहन धाराओं का प्रतिफल है, विशेष रूप से जब यह पेटी सूर्य के साथ उत्तर की ओर खिसक जाती है। इसकी उत्पत्ति गर्मी की ऋतु के अंतिम भाग में होती है।

3. प्रवाह की दिशा (Direction of Movement)-इन चक्रवातों का मार्ग विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न होता है। प्राय: यह व्यापारिक पवनों के साथ पूर्व से पश्चिम दिशा में प्रवाह करते हैं। जब ये महासागर से स्थल में प्रवेश करते हैं, तो उनकी शक्ति कम हो जाती है और वे जल्दी ही समाप्त हो जाते हैं।

4. वेग (Velocity)–इन चक्रवातों के वेग में भिन्नता पाई जाती है। प्रायः ये 32 कि०मी० प्रति घंटा के वेग से चलते हैं, परंतु इनमें से कुछ अधिक शक्तिशाली, जैसे-हरीकेन (Harricane) और टाईफून (Typhoon) 120 कि०मी० प्रति घंटा से भी अधिक गति से चलते हैं। सागरों में इनकी गति तेज़ हो जाती है, परंतु स्थल पर विभिन्न भू-आकृतियों द्वारा रुकावट होने पर ये कमज़ोर पड़ जाते हैं। ये सदा गतिशील नहीं रहते। कभी-कभी ये एक स्थान पर ही कई दिन तक रुककर भारी वर्षा करते हैं।

5. मौसमी स्थिति (Weather Conditions)-उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के केंद्र को ‘चक्रवात की आँख’ (Eye of the Cyclone) कहा जाता है। इस क्षेत्र में आकाश साफ होता है। केंद्र में पवनें गर्म होकर ऊपर उठती हैं, जिसके परिणामस्वरूप घने बादल बन जाते हैं और तेज़ वर्षा करते हैं। चक्रवात के अगले भाग (Front) में पिछले भाग (Rear) की तुलना में गर्मी अधिक होती है। चक्रवात के दाएँ और अगले भाग में अधिक वर्षा होती है। ये अपनी प्रचंड गति वाली पवनों के कारण अत्यंत विनाशकारी होते हैं। इनमें अलगअलग पिंड (Front) न होने के कारण शीतोष्ण चक्रवातों के समान तापमान की भिन्नता नहीं होती। इन चक्रवातों के आने से पहले पतले सिरस बादल (Cirrus Clouds) की उत्पत्ति होती है। मौसम शांत और गर्म होता है। धीरे-धीरे कपासी (Cumulus) और पतली परत (Stratus) वाले बादल आ जाते हैं। जल्दी ही आकाश बादलों से ढक जाता है। अंधेरी आ जाती है और बादल गर्जते हैं। इसके बाद बड़ी-बड़ी बूंदों वाली वर्षा प्रारंभ हो जाती है। चक्रवात के पिछले भाग में ओले पड़ते हैं और कुछ समय बाद मौसम सुहावना हो जाता है।

प्रभावित प्रदेश (Affected Regions)-विश्व में इनसे प्रभावित होने वाले प्रमुख देश नीचे लिखे हैं-

  • पश्चिमी द्वीप समूह (West Indies)-इन प्रदेशों में इन चक्रवातों को हरीकेन (Hurricane) कहते हैं।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका मैक्सिको (Mexico)—यहाँ इन्हें टोरनैडो (Tornado) कहते हैं।
  • बंगाल की खाड़ी और अरब सागर-यहाँ इन्हें साइक्लोन (Cyclone) या चक्रवात कहते हैं।
  • फिलीपाइन द्वीप समूह (Philippine Island)–चीन और जापान में इन्हें टाईफून (Typhoon) कहते हैं। .
  • पश्चिमी अफ्रीका का गिनी प्रदेश–यहाँ इन चक्रवातों को टोरनैडो (Tornado) कहते हैं।
  • ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पश्चिमी प्रदेश–यहाँ इन्हें विल्ली-विल्ली (Willy-Willy) का नाम दिया जाता है।

उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों का विनाशकारी प्रभाव-उष्ण कटिबंधीय चक्रवात निम्न दाब के केंद्र होते हैं। बाहर से तीव्र हवाएँ अंदर आती हैं। इनकी गति 200 कि०मी० प्रति घंटा होती है। ये चक्रवात महासागर के ऊपर बिना रोकटोक के चलते हैं। समुद्र में ऊँची-ऊँची लहरें उठती हैं, जिनसे समुद्री जहाजों को नुकसान होता है। समुद्री तटों के ऊपर छोटे-छोटे द्वीपों के ऊपर भयानक लहरें जान और माल का नुकसान करती हैं। हजारों लोग समुद्र में डूब जाते हैं। समुद्री यातायात ठप्प हो जाता है। सन् 1970 में बांग्लादेश में इसी प्रकार के चक्रवात आए थे, जिन्होंने जान और माल का बहुत अधिक नुकसान किया था।

प्रश्न (च) निम्नलिखित पर नोट लिखें(i) टोरनैडो (ii) विपरीत चक्रवात।
उत्तर-
(i) टोरनैडो या बवंडर (Tornado)-संयुक्त राज्य अमेरिका के मध्यवर्ती मैदान में गर्मी की ऋतु के प्रारंभ होने के साथ तेज़ आंधियाँ चलनी आरंभ हो जाती हैं, जिन्हें बवंडर के नाम से पुकारा जाता है। इन मैदानों में गर्मी की ऋतु आरंभ होते ही गर्मी में तेजी से वृद्धि होनी आरंभ हो जाती है। फलस्वरूप वहाँ निम्न वायु दाब उत्पन्न हो जाता है। निकटवर्ती बर्फ से ढके रॉकी पर्वत के उच्च वायु दाब से अत्यंत ठंडी और शुष्क पवनें तेज़ गति से यहाँ पहुँचती हैं और मैक्सिको की खाड़ी से आती हुई गर्म और नम पवनों के साथ संबंध स्थापित कर लेती हैं। शीतल और शुष्क तथा उष्ण और नम पवनों के मेल से प्रचंड बवंडर की उत्पत्ति होती है। ये बवंडर बहुत विनाशकारी होते हैं।

(ii) विपरीत चक्रवात (Anti-Cyclones)-विपरीत चक्रवात में वायु दाब की व्यवस्था चक्रवात से बिल्कुल विपरीत होती है। जब मध्य में उच्च वायु दाब और चारों ओर निम्न वायु दाब होता है, तो वायु दाब की इस स्थिति को प्रति चक्रवात कहते हैं। इसमें पवनें केंद्र से बाहर की ओर चलती हैं। फैरल के नियम के अनुसार, उत्तरी गोलार्द्ध में यह घड़ी की सुइयों के समान (Clockwise) और दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सुइयों के विपरीत (Anti-Clock wise) चलती हैं। केंद्र से बाहर की ओर वायु दाब निम्न होता जाता है जिससे प्रति चक्रवात में समदाब रेखाएँ (Isobars) लगभग गोलात्मक होती हैं।

(क) आकृति और विस्तार (Shape and Size)-प्रति चक्रवात प्रायः वृत्त आकार के होते हैं, परंतु कभी-कभी दो चक्रवातों के बीच स्थित होने के कारण ये फलीदार (Wedge-Shaped) होते हैं। ये – बहुत बड़े होते हैं, जिनका व्यास 3000 कि०मी० से भी अधिक होता है। कभी-कभी तो इनका व्यास 9000 कि०मी० तक भी होता है। समूचे यूरोप और साइबेरिया जैसे विशाल भू-खंड को कभी-कभी एक ही प्रतिकूल चक्रवात घेर लेता है।

Class 11 Geography Solutions Chapter 7 पवनें 10

(ख) मार्ग और वेग (Track and Velocity)-प्रतिकूल चक्रवात का अपना कोई निश्चित मार्ग नहीं होता क्योंकि ये प्रायः शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों में रहते हैं और उनका मार्ग ही अपनाते हैं। कभी-कभी ये एक ही स्थान पर निरंतर कई दिनों तक रहते हैं। जब ये चलते हैं, तो इनका वेग 30 से 50 कि०मी० प्रति घंटा होता है। इनकी दिशा और मार्ग अनिश्चित होते हैं। ये अचानक प्रवाह दिशा में परिवर्तन भी कर लेते हैं।

पवनें Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न तु (Objective Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-4 शब्दों में दें-

प्रश्न 1. पूर्वी पवनें किन्हें कहते हैं ?
उत्तर-व्यापारिक पवनों को।

प्रश्न 2. व्यापारिक पवनों की उत्तरी गोलार्द्ध में दिशा बताएँ।
उत्तर-उत्तरी-पूर्वी।

प्रश्न 3. व्यापारिक पवनों के मरुस्थल कहाँ मिलते हैं ?
उत्तर-पश्चिमी भागों में।

प्रश्न 4. पश्चिमी पवनों की उत्तरी गोलार्द्ध में दिशा बताएँ।
उत्तर-दक्षिणी-पश्चिमी।।

प्रश्न 5. उस प्राकृतिक खंड का नाम बताएँ, जहाँ पश्चिमी पवनों के कारण सर्दियों में वर्षा होती है।
उत्तर-भू-मध्य सागरीय खंड।

प्रश्न 6. शीतोष्ण चक्रवात किन पवनों के साथ-साथ चलते हैं ?
उत्तर-पश्चिमी पवनों।

प्रश्न 7. 40°- 50° दक्षिणी अक्षांशों में पश्चिमी पवनों को क्या कहते हैं ?
उत्तर-गर्जता चालीस।

प्रश्न 8. रॉकी पर्वत से नीचे उतर कर प्रेरीज़ में चलने वाली पवनों का नाम बताएँ।
उत्तर-चिनूक पवनें।

प्रश्न 9. अल्पस पर्वत से नीच उतर कर चलने वाली पवनों का नाम बताएँ।
उत्तर-फोहन पवनें।

प्रश्न 10. दिन के समय तटीय क्षेत्रों में चलने वाली पवनों का नाम बताएँ।
उत्तर-जल-समीर।

प्रश्न 11. रात के समय तटीय क्षेत्रों में चलने वाली पवनों का नाम बताएँ।
उत्तर-थल-समीर।

प्रश्न 12. दिन के समय पहाड़ी ढलानों के ऊपर उठने वाली पवनों का नाम बताएँ।
उत्तर-घाटी पवनें।

प्रश्न 13. रात के समय घाटी ढलानों से नीचे उतरने वाली पवनों का नाम बताएँ।
उत्तर-पर्वतीय पवनें।

प्रश्न 14. आरोही पवनों को क्या कहते हैं ?
उत्तर-घाटी पवनें।

प्रश्न 15. अवरोही पवनों को क्या कहते हैं ?
उत्तर-पर्वतीय पवनें।

प्रश्न 16. बर्फ को खाने वाली पवनों का नाम बताएँ।
उत्तर-चिनूक पवनें।

बहुविकल्पीय प्रश्न

नोट-सही उत्तर चुनकर लिखें-

1. उत्तरी गोलार्द्ध में व्यापारिक पवनों की दिशा है
(क) उत्तर-पूर्वी
(ख) दक्षिण-पूर्वी
(ग) पश्चिमी
(घ) दक्षिणी।
उत्तर-उत्तर-पूर्वी।

2. वायु दाब मापने की इकाई है-
(क) बार
(ख) मिलीबार
(ग) कैलोरी
(घ) मीटर।
उत्तर-मिलीबार।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-3 वाक्यों में दें-

प्रश्न 1. नक्षत्रीय पवनों या स्थायी पवनों से क्या अभिप्राय है ? इनके उदाहरण बताएँ।
उत्तर-भू-तल पर सदा एक ही दिशा में लगातार चलने वाली पवनों को स्थायी या नक्षत्रीय पवनें कहते हैं, जैसेव्यापारिक पवनें, पश्चिमी पवनें और ध्रुवीय पवनें।

प्रश्न 2. व्यापारिक पवनों की दिशा बताएँ।
उत्तर-उत्तरीय गोलार्द्ध में व्यापारिक पवनें उत्तर-पूर्व दिशा में और दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण-पूर्व दिशा में चलती हैं।

प्रश्न 3. पश्चिमी पवनों की दिशा बताएँ।
उत्तर- पश्चिमी पवनें उत्तरी-गोलार्द्ध में दक्षिण-पश्चिम दिशा में और दक्षिणी गोलार्द्ध में उत्तर-पश्चिम दिशा में चलती हैं।

प्रश्न 4. व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में पश्चिमी भागों में मरुस्थल क्यों मिलते हैं ?
उत्तर-व्यापारिक पवनें पूर्वी भागों में वर्षा करती हैं और पश्चिमी भाग शुष्क रह जाते हैं। यहाँ सहारा, थार, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया, कालाहारी, ऐटेकामा मरुस्थल मिलते हैं।

प्रश्न 5. दक्षिणी गोलार्द्ध में पश्चिमी पवनों के कोई चार उपनाम बताएँ।
उत्तर-दक्षिणी गोलार्द्ध में थल की कमी के कारण पश्चिमी पवनों के मार्ग में कोई रुकावट नहीं होती। तेज़ गति से चलने के कारण इन्हें वीर पश्चिमी पवनें (Brave Westerlies) कहते हैं। 40°-50° अक्षाशों में गर्जता चालीस (Roaring forties), 50°-60° अक्षाशों में गुस्सैल पचास (Ferocious fifties) और 60° से आगे इन्हें कूकते या चीखते साठ (Shrieking Sixties) कहते हैं।

प्रश्न 6. तटवर्ती भागों में चलने वाली दो स्थानीय पवनों के नाम बताएँ।
उत्तर-थल समीर और जल समीर।

प्रश्न 7. पर्वतीय भागों की दो स्थानीय पवनों के नाम बताएँ।
उत्तर-पर्वतीय समीर और घाटी समीर।

प्रश्न 8. पर्वतीय ढलानों से नीचे उतरती दो स्थानीय पवनों के नाम बताएँ।
उत्तर-चिनूक पवनें (उत्तरी अमेरिका) और फोहन पवनें (अल्पस पर्वत)।

प्रश्न 9. थल समीर और जल समीर में क्या अंतर है ?
उत्तर-तटवर्ती भागों में दिन के समय समुद्र से थल की ओर जल समीर चलती है, परंतु रात के समय थल से समुद्र की ओर थल समीर चलती है।

प्रश्न 10. चिनूक पवनों और फोहन पवनों के बारे में बताएँ।
उत्तर-चिनूक पवनें रॉकी पर्वतीय ढलानों से उतर कर अमेरिका और कनाडा के मैदानी भागों में चलती हैं। ये गर्म पवनें बर्फ को पिघला देती हैं। अल्पस पर्वत को पार करके फोहन पवनें स्विट्ज़रलैंड में चलती हैं।

प्रश्न 11. कुछ स्थानीय पवनों के नाम बताएँ, जो यूरोप और अफ्रीका की ओर चलती हैं।
उत्तर-

  1. बौरा पवनें-इटली
  2. मिस्ट्रल-फ्रांस के तट पर
  3. लू-उत्तरी भारत
  4. हर्मटन-पश्चिमी अफ्रीका
  5. सिरोको-इटली।

प्रश्न 12. पवन पेटियों के खिसकने का क्या कारण है ?
उत्तर-पृथ्वी की वार्षिक गति में 21 जून को सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर और 22 दिसंबर को मकर रेखा पर लंब पड़ती है। परिणामस्वरूप उच्च तापमान के क्षेत्र भी अपना स्थान बदल लेते हैं, इसलिए गर्मियों में सभी पवनों की पेटियाँ कुछ उत्तर की ओर तथा सर्दी की ऋतु में दक्षिण की ओर खिसक जाती हैं।

प्रश्न 13. पवन-पेटियों के खिसकने का रोम सागरीय खंड पर क्या प्रभाव होता है ?
उत्तर-पवन-पेटियों के खिसकने के कारण रोम सागरीय खंड (30°-45°) में गर्मी की ऋतु में उच्च वायु दाब पेटी बन जाती है और शुष्क ऋतु होती है, परंतु सर्दी की ऋतु में यहाँ पश्चिमी पवनें चलती हैं और वर्षा करती हैं। रोम सागरीय खंड को शीतकाल की वर्षा का खंड कहते हैं।

प्रश्न 14. कोरियोलिस बल से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर–पवनें उत्तर-दक्षिण दिशा की ओर चलती है, परंतु पृथ्वी की घूमने की गति के कारण उनमें विक्षेप बल पैदा होता है, जिसके कारण पवनें अपने दायीं या बायीं ओर मुड़ जाती हैं, इस बल को कोरियोलिस बल कहते हैं।

प्रश्न 15. फैरल का सिद्धांत क्या है ?
उत्तर-पृथ्वी के घूमने के प्रभाव के अंतर्गत भू-तल पर चलने वाली पवनें उत्तरी-गोलार्द्ध में अपने दाएँ हाथ और.. दक्षिणी गोलार्द्ध में अपने बाएँ हाथ की ओर मुड़ जाती हैं, इसे फैरल (Ferral) का सिद्धांत कहते हैं।

प्रश्न 16. Buys Ballot का नियम क्या है ?
उत्तर-Buys Ballot नामक वैज्ञानिक के अनुसार उत्तरी गोलार्द्ध में निम्न वायु दाब का क्षेत्र पवन प्रवाह की दिशा के दायीं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में प्रवाह की दिशा के बायीं ओर होता है। इसे Buys Ballot का नियम कहते हैं।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 60-80 शब्दों में दें-

प्रश्न 1. भूमध्य रेखा का शांत खंड कैसे बनता है ?
उत्तर-स्थिति (Location)-यह शांत खंड भूमध्य रेखा के दोनों तरफ 5°N और 5°S के मध्य स्थित है। इसे भूमध्य रेखा का शांत खंड (Equatorial Calms) भी कहते हैं। धरातल पर चलने वाली वायु की मौजूदगी नहीं होती या बहुत ही शांत वायु चलती है। यह शांत खंड भूमध्य रेखा के चारों ओर फैला हुआ है। इस खंड में सूर्य की किरणें पूरा वर्ष सीधी पड़ती हैं और औसत तापमान अधिक रहता है। हवा गर्म और हल्की होकर लगातार संवाहक धाराओं (Convection Currents) के रूप में ऊपर उठती रहती है और धरालत पर वायु दाब कम हो जाता है।

प्रश्न 2. फैरल के नियम का वर्णन करें।
उत्तर-फैरल का नियम (Ferral’s Law)-धरालत पर पवनें कभी भी उत्तर से दक्षिण की ओर सीधी नहीं चलतीं। सभी पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में अपनी दायीं ओर तथा दक्षिण गोलार्द्ध में अपनी बायीं ओर मुड़ जाती हैं। इसे फैरल का नियम कहते हैं । (“All moving bodies are deflected to the right in the Northern Hemisphere and to the left in the Southern Hemisphere.”)

हवा की दिशा में परिवर्तन का कारण धरती की दैनिक गति है। जब हवाएँ धीमी चाल वाले भागों से तेज़ चाल वाले भागों की ओर आती हैं, तो पीछे रह जाती हैं, जैसे-उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवनें अपनी दायीं ओर मुड़ जाती हैं। पश्चिमी पवनें भी मुड़कर उत्तर-पश्चिमी दिशा में चलती हैं। इसी प्रकार दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें अपनी बायीं ओर मुड़ जाती हैं। पश्चिमी पवनें भी मुड़कर दक्षिण-पश्चिमी दिशा में चलती हैं। इस विक्षेप शक्ति को कोरोलिस बल (Corolis Force) भी कहते हैं।

प्रश्न 3. जल समीर और थल समीर में अंतर बताएँ।
उत्तर-1. जल समीर (Sea Breeze)—ये वे पवनें हैं, जो दिन के समय समुद्र से थल की ओर चलती हैं। दिन के समय सूर्य की तीखी गर्मी से थल भाग समुद्र की अपेक्षा अधिक और जल्दी गर्म हो जाता है। थल पर हवा गर्म होकर ऊपर उठती है और निम्न वायु दाब बन जाता है, परंतु समुद्र पर थल की तुलना में अधिक वायु दाब रहता है। इस प्रकार थल पर निम्न दबाव का स्थान लेने के लिए समुद्र की ओर से ठंडी हवाएँ चलती हैं। थल की गर्म हवा ऊपर उठकर समुद्र की ओर चली जाती है, इस प्रकार हवा के बहने का एक चक्र बन
जाता है। जल समीर ठंडी और सुहावनी (Cool and Fresh) होती है।

2. थल समीर (Land Breeze)-ये वे पवनें हैं, जो दिन के समय थल से समुद्र की ओर चलती हैं। रात को स्थिति दिन के विपरीत होती है। थल भाग समुद्र की अपेक्षा अधिक और जल्दी ठंडे हो जाते हैं। समुद्र पर वायु दाब कम हो जाता है, परंतु थल पर अधिक वायु दाब होता है। इस प्रकार थल से समुद्र की ओर पवनें चलती हैं। समुद्र की गर्म हवा ऊपर उठकर थल पर उतरती है, जिससे हवा के बहने का एक चक्र बन जाता है।

प्रश्न 4. पर्वतीय और घाटी की पवनों में अंतर बताएँ।
उत्तर-1. पर्वतीय पवनें (Mountain Winds)-पर्वतीय प्रदेशों में रात के समय पर्वत के शिखर से घाटी की ओर ठंडी और भारी हवाएं चलती हैं, जिन्हें पर्वतीय पवनें (Mountain Winds) कहते हैं। रात के समय तेज़ विकिरण (Rapid Radiation) के कारण हवा ठंडी और भारी हो जाती है। यह हवा गुरुत्वाकर्षण शक्ति (Gravity) के कारण ढलानों से होकर नीचे उतरती है। इसे वायु प्रवाह (Air Drainage) भी कहते हैं। इन पवनों के कारण घाटियाँ (Valleys) ठंडी हवाओं से भर जाती हैं, जिसके फलस्वरूप घाटी के निचले भागों
में पाला पड़ता है।

2. घाटी की पवनें (Valley Winds)-दिन के समय घाटी की गर्म हवाएँ ढलान पर से होकर चोटी की ओर ऊपर चढ़ती हैं, इन्हें घाटी की पवनें (Valley Winds) कहते हैं। दिन के समय पर्वत के शिखर पर तेज़ गर्मी और वायु दाब पेटियों के उत्तर दिशा में खिसकने के फलस्वरूप यह प्रदेश घोड़ा अक्षांशों की उच्च वायु दाब पेटी के प्रभाव में आ जाता है, जिसके कारण पवनें इस प्रदेश की ओर नहीं चलतीं। इसलिए यहाँ गर्मियों में वर्षा नहीं होती। इसके विपरीत सर्दियों में वायु दाब पेटियों के दक्षिणी दिशा में खिसकने के फलस्वरूप यह खंड पश्चिमी पवनों के प्रभाव में आ जाता है और ये पवनें इस खंड में वर्षा करती हैं। इस प्रकार भूमध्य सागरीय प्रदेश में शीतकाल में वर्षा होती है, जबकि गर्मी की ऋतु में यह शुष्क रहता है।

प्रश्न 5. चक्रवात से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-चक्रवात (Cyclones)—वायु दाब में अंतर होने के कारण वायुमंडल गतिशील होता है। जिस क्षेत्र में वायु दाब निम्न होता है, उसके निकटवर्ती चारों ओर के क्षेत्रों में उच्च वायु दाब होता है, जिसके परिणामस्वरूप उच्च वायु दाब क्षेत्र से निम्न वायु क्षेत्र की ओर पवनें चलती हैं। फैरल के नियम अनुसार पृथ्वी की दैनिक गति के कारण पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में अपनी दायीं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बायीं ओर मुड़ जाती हैं। परिणामस्वरूप इन पवनों की गति उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सुइयों के विपरीत (anti-clock wise) और दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सुइयों की समान (clock wise) दिशा में होती है। इस प्रकार पवनों के उच्च वायु दाब से निम्न वायु दाब की ओर सुइयों के विपरीत और अनुकूल चलने के कारण पवनों का एक चक्र उत्पन्न हो जाता है, जिसे चक्रवात कहते हैं।

Class 11 Geography Solutions Chapter 7 पवनें 11

प्रश्न 6. शीतोष्ण चक्रवात की प्रमुख विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर-शीतोष्ण चक्रवात (Temperate Cyclones)-

  • ये चक्रवात पश्चिमी पवनों के क्षेत्र में 35° से 65° के अक्षांशों के बीच पश्चिमी-पूर्वी दिशा में चलते हैं।
  • शीतोष्ण चक्रवात की शक्ल गोलाकार या V आकार जैसी होती है।
  • इस प्रकार के चक्रवातों की मोटाई 9 से 11 किलोमीटर और व्यास 100 किलोमीटर चौड़ा होता है।
  • चक्रवात की अभिसारी पवनें केंद्र की वायु को ऊपर उठा देती हैं, जिसके परिणामस्वरूप बादलों का निर्माण और वर्षा होती है।
  • साधारण रूप में इनकी गति 50 किलोमीटर प्रति घंटा होती है। गर्मी की ऋतु की तुलना में शीतकाल में इनकी गति अधिक होती है।

प्रश्न 7. उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों के प्रमुख गुणों का वर्णन करें।
उत्तर-उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones)-

  • ये चक्रवात 50 से 30° अक्षांशों के बीच व्यापारिक पवनों के साथ-साथ पूर्व से पश्चिम दिशा में चलते हैं।
  • इनके केंद्र में निम्न दाब होता है और समदाब रेखाएँ गोलाकार होती हैं।
  • साधारण रूप में इनका आकार और विस्तार छोटा होता है। इनका व्यास 150 से 500 मीटर तक होता है।
  • चक्रवात के केंद्रीय भाग को ‘तूफान की आँख’ (Eye of the Storm) कहते हैं। ये प्रदेश शांत और वर्षाहीन होते हैं। ये गर्म वायु की धाराओं के रूप में ऊपर से उठने पर बनता है और इसकी ऊर्जा का स्रोत संघनन की गुप्त ऊष्मा है।
  • शीत ऋतु की तुलना में गर्मी की ऋतु में इनका अधिक विकास होता है।
  • इन चक्रवातों में हरीकेन और तूफान बहुत विनाशकारी होते हैं।
  • इन चक्रवातों द्वारा भारी वर्षा होती है।

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 150-250 शब्दों में दें-

प्रश्न 1. वायु पेटियों के खिसकने के कारण और प्रभाव बताएँ।
उत्तर-पृथ्वी की वार्षिक गति और इसका अपनी धुरी पर झुके रहने के कारण पूरा वर्ष सूर्य की किरणें एक समान नहीं पड़तीं। सूर्य की किरणें 21 जून को कर्क रेखा पर लंब पड़ती हैं, तब वायु पेटियाँ उत्तर की ओर खिसक जाती हैं। 22 दिसंबर को सूर्य की किरणें मकर रेखा पर लंब पड़ती हैं, तब वायु पेटियाँ दक्षिण की ओर खिसक जाती हैं।
इस क्रिया को वायु दाब पेटियों का सरकना (Swing of the Pressure Belts) कहते हैं। पवनें वायु दाब की भिन्नता के कारण उत्पन्न होती हैं, इसलिए वायु दाब पेटियों के साथ-साथ पवन पेटियाँ भी सरक जाती हैं।

कारण (Causes)—पृथ्वी की धुरी पर तिरछा स्थित होने के कारण परिक्रमा के समय सूर्य 237°N त 237°S तक (47° क्षेत्र) में अपनी स्थिति बदलता रहता है। इस स्थिति बदलने की क्रिया के कारण उच्च तापमान की पेटियाँ भी उत्तर या दक्षिण की ओर खिसक जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप वायु पेटियाँ भी सरकती हैं।

21 जून की दशा (Summer Solstice)—सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर लंब पड़ती हैं। इस क्षेत्र के उच्च वायु दाब का स्थान निम्न वायु दाब पेटी ले लेती है। उच्च वायु दाब पेटी उत्तर की ओर सरक जाती है।

22 दिसंबर की दशा (Winter Solstice)—सूर्य की किरणें मकर रेखा पर लंब पड़ती हैं। उच्च वायु दाब पेटी कुछ दक्षिण की ओर खिसक जाती है और इसका स्थान निम्न वायु दाब पेटी ले लेती है।

वायु दाब और पवनों के खिसकने से नीचे लिखे प्रभाव पड़ते हैं-

प्रभाव (Effects)-

1. गर्मी की ऋतु में मानसून पवनों की उत्पत्ति (Formation of Summer Monsoons)-गर्म संक्रांति या 21 जून को सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर लंब पड़ती हैं, जिसके फलस्वरूप भूमध्य रेखा पर निम्न वायु दाब पेटी कर्क रेखा की ओर खिसक जाती है। घोड़ा अक्षांशों के दक्षिणी उपोष्ण उच्च वायु दाब पेटी से आने वाली पवनें भूमध्य रेखा को पार करके फैरल के नियम के अनुसार, दक्षिण-पश्चिमी हो जाती हैं, उन्हें गर्मी की ऋतु की मानसून पवनें कहते हैं। इस प्रकार मानसूनी पवनें भूमंडलीय पवन-तंत्र (Planetary Wind System) का ही रूपांतर होती हैं।

2. सर्दी की ऋतु में मानसून पवनों की उत्पत्ति (Formation of Winter Monsoons)-शीत संक्रांति या 22 दिसंबर को सूर्य की लंब किरणें मकर रेखा पर पड़ती हैं, जिसके फलस्वरूप भूमध्य रेखीय निम्न दाब पेटी मकर रेखा की ओर खिसक जाती है। घोड़ा अक्षांशों की उत्तरी उपोष्ण उच्च वायु दाब पेटी की पवनें भूमध्य रेखा को पार करते ही, फैरल के नियम के अनुसार दक्षिणी गोलार्द्ध में अपनी बायीं ओर मुड़ जाती हैं। फलस्वरूप दक्षिणी गोलार्द्ध में इनकी दिशा उत्तर-पश्चिमी हो जाती है। उत्तरी गोलार्द्ध में इन पवनों को शीत काल की मानसूनी पवनों का नाम दिया जाता है।

Class 11 Geography Solutions Chapter 7 पवनें 12

3. सुडान जैसे प्राकृतिक प्रदेशों पर प्रभाव (Effect on Sudan type of Natural Region)-सुडान जैसे प्राकृतिक प्रदेश 5° से 20° अक्षांश पर महाद्वीप के मध्यवर्ती क्षेत्रों में विस्तृत हैं। शीतकाल में वायु दाब पेटियों के दक्षिण दिशा में सरकने के फलस्वरूप यह खंड घोड़ा अक्षांशों की उच्च वायु दाब पेटी के प्रभाव के अंतर्गत आ जाता है, जिसके परिणामस्वरूप पवनें इस प्रदेश की ओर नहीं चलतीं, इसलिए यह क्षेत्र शीतकाल की वर्षा से रहित रहता है। इसके विपरीत गर्मियों में वायु दाब पेटियों के उत्तर दिशा में खिसकने के फलस्वरूप यह प्रदेश भूमध्य रेखीय निम्न वायु दाब पेटी के प्रभाव में आ जाता है, फलस्वरूप पवनें इस प्रदेश की ओर चलती हैं और वर्षा करती हैं। इस प्रकार सुडान प्रदेश में गर्मियों में वर्षा होती है।

4. रोम सागरीय प्राकृतिक प्रदेश पर प्रभाव (Effect on Mediterranean Type of Natural Region) रोम सागरीय प्राकृतिक प्रदेश 30°-45° अक्षांशों के बीच महाद्वीप के पश्चिमी भागों में विस्तृत है। गर्मियों में वायु दाब पेटियों के उत्तर दिशा में खिसकने के फलस्वरूप यह प्रदेश घोड़ा अक्षांशों की उच्च पेटी के प्रभाव में आ जाता है, जिसके परिणामस्वरूप पवनें इस प्रदेश की ओर नहीं चलतीं। इसलिए यह गर्मी की वर्षा से रहित रह जाता है। इसके विपरीत सर्दियों में वायु दाब पेटियों के दक्षिण दिशा में खिसकने के फलस्वरूप यह खंड पश्चिमी पवनों के प्रभाव में आ जाता है और ये पवनें इस खंड में वर्षा करती हैं। इस प्रकार रोम सागरीय प्रदेश में शीतकाल में वर्षा होती है, जबकि गर्मी की ऋतु शुष्क रहती है।

प्रश्न 2. उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों और शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की तुलना करें।
उत्तर-
उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones)-

  1. स्थिति-ये चक्रवात उष्ण कटिबंध में 50°- 30° अक्षांशों तक चलते हैं।
  2. दिशा-ये व्यापारिक पवनों के साथ पूर्व से पश्चिम की ओर चलते हैं।
  3. विस्तार-इनका व्यास 150 से 500 किलोमीटर तक होता है।
  4. आकार-ये गोल आकार के होते हैं।
  5. उत्पत्ति-ये संवाहक धाराओं के कारण जन्म लेते हैं।
  6. गति-इनमें हवा की गति 100 से 200 किलोमीटर प्रति घंटा होती है।
  7. रचना-यह अधिक गर्मी की ऋतु में अस्तित्व में आते हैं। इनके केंद्रीय भाग को ‘तूफान की आँख’ कहा जाता है।
  8. मौसम-इसमें थोड़े समय के लिए तेज़ हवाएँ चलती हैं और भारी वर्षा होती है।

शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Temperate Cyclones)-

  1. ये चक्रवात शीतोष्ण कटिबंध में 35°-65° अक्षांश तक चलते हैं।
  2. ये पश्चिमी पवनों के साथ-साथ पश्चिम से पूर्व की ओर चलते हैं।
  3. इनका व्यास 1000 किलोमीटर से अधिक होता है।
  4. ये ‘V’ आकार के होते हैं।
  5. ये गर्म और ठंडी हवाओं के मिलने से जन्म लेते हैं।
  6. इनमें हवा की गति 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटा होती है।
  7. यह अधिक सर्दी की ऋतु में बनते हैं। इसके दो भाग-उष्ण सीमांत और शीत सीमांत होते हैं।
  8. इसमें शीत लहर चलती है और कई दिनों तक रुक-रुककर वर्षा होती है।

Class 7 Social Notes Chapter 16 राज्य सरकार

हमारी कक्षा की व्यवस्था अच्छी तरह बनी रहे इसके लिए हम मॉनिटर का चुनाव करते हैं। इसके उपरांत कक्षा सफाई समिति, कक्षा सुशोभन समिति, कक्षा व्यवस्था समिति आदि की रचना करते हैं। आप भी कक्षा-सजावट और व्यवस्था के लिए अवश्य कर्तव्य पालन करते होंगे। आपके मन में प्रश्न उत्पन्न होता होगा कि हमारे राज्य का समग्र प्रशासन, व्यवस्था और कारोबार कौन करता होगा?

राज्य का प्रशासन चलाने का कार्य राज्य सरकार करती है। राज्य के मूलभूत उद्देश्यों में एक उद्देश्य कानून और व्यवस्था बनाए रखना, लोगों को सुख-सुविधा और सुरक्षा प्रदान करना है। राज्य के लोगों का चहुमुखी कल्याण करते हुए उनकी स्वतंत्रता और मूलभूत अधिकारों की देखभाल और रक्षा करने का उद्देश्य है। जिसके लिए सरकार के तीन अंग : विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका सतत कार्यरत रहती है। राज्य का विधान मण्डल, विधान सभा के रूप में पहचाना जाता है। इसका कार्य राज्य के प्रभावशाली और कार्यक्षम शासन के लिए कानून बनाना है। जबकि राज्य की कार्यपालिका विधानसभा द्वारा निर्मित कानूनों को लागू करवाती है और इन कानूनों का भंग करने पर सजा देने का कार्य न्यायपालिका करती है।

स्थानीय सरकार

सरकार भी एक ‘संचालक मण्डल’ है। जो सामान्यरूप से लोकतंत्र में जनता की इच्छा अनुसार शासन चलाती है। भारत बहुत ही बड़ा देश है। एक ही स्तर या स्थान पर प्रशासन किया जाए तो अनेक मुश्किलें सर्जित होती हैं और नागरिकों को असुविधा होती है। इसलिए हमारे यहाँ सरकार अलग-अलग स्तर पर कार्य करती है : स्थानीय स्तर, राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर पर। स्थानीय स्तर पर लोग मतदान करके अपने प्रतिनिधि चुनते हैं, और उनके द्वारा ही प्रशासन चले, उसे स्थानीय स्वराज्य कहते हैं। ग्रामपंचायत, तहसील पंचायत और जिला पंचायत ये ग्रामीण स्थानीय स्वराज्य की सरकारें हैं। नगरपालिका और महानगरपालिका ये शहरी स्थानीय स्वराज्य की सरकारें हैं। हम राज्य सरकार के विषय में अध्ययन करेंगे।

राज्य सरकार की रचना और भूमिका

भारत विशाल जनसंख्यावाला देश है। भारत में 28 राज्य और 8 केन्द्रशासित प्रदेश हैं। दिल्ली विशेष राज्य है। देश में समवायी अर्थात् राष्ट्र और राज्य दो स्तर की सरकार हैं। राष्ट्रीय स्तर की सरकार को ‘केन्द्र सरकार’ या ‘संघ सरकार’ कहते हैं। जो समग्र भारत में शासन करती है। राज्य स्तर पर राज्य का प्रशासन चलानेवाली सरकार को राज्य सरकार कहते हैं।

Class 7 Social Notes Chapter 16 राज्य सरकार 1
Class 7 Social Notes Chapter 16 राज्य सरकार 2

विधानपरिषद

राज्य सरकार के मुख्य अंग : विधानमण्डल, कार्यपालिका, न्यायपालिका है। राज्य के विधानमण्डल के ऊपरी सदन को विधानपरिषद कहते हैं। भारत के प्रत्येक राज्य में विधानसभा है। बिहार, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, कर्णाटक, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश राज्यों में ही विधानपरिषद है। गुजरात के विधानमण्डल में विधानपरिषद नहीं है।

विधानपरिषद के सदस्यों को स्थानीय स्वराज्य की संस्थाएँ, दर्ज स्नातक, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षकों का मतदाता मण्डल चुनता है। विधानपरिषद का सदस्य बनने के लिए उम्मीदवार 30 वर्ष या उससे अधिक उम्र का भारतीय नागरिक होना चाहिए। विधानपरिषद एक स्थायी सदन है। विधानपरिषद का प्रत्येक सदस्य 6 वर्ष के लिए चुना जाता है। विधानपरिषद के एक तिहाई सदस्य प्रति दो वर्ष में निवृत्त होते हैं। विधानपरिषद रखना है या नहीं यह राज्य ही निश्चित करता है।

विधानसभा

विधानमण्डल के निचले सदन को विधानसभा कहते हैं। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार विधानसभा के सदस्यों की संख्या 60 से कम और 500 से अधिक नहीं हो सकती।

विधानसभा सदस्य की योग्यताएँ

• वह व्यक्ति भारत का नागरिक होना चाहिए।
उसकी उम्र 25 वर्ष या उससे अधिक होनी चाहिए। ।
वह सरकारी संस्था में सवैतनिक पद पर नहीं होना चाहिए।
• वह व्यक्ति दिवालिया, पागल या सजा प्राप्त अपराधी नहीं होना चाहिए।

भारत के प्रत्येक राज्य में विधानसभा है। राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों को मतक्षेत्रों में बाँटा जाता है। प्रत्येक मतक्षेत्र में से एक-एक व्यक्ति चुना जाता है। गुजरात राज्य की विधानसभा में कुल 182 सीटें हैं। प्रत्येक राज्य की विधानसभा में विधायकों की संख्या अलग-अलग होती है। जिनकी संख्या जनसंख्या के आधार पर निश्चित की जाती है। अधिकांश विधानसभा सदस्य अलग-अलग राजनीतिक दलों के होते हैं। तथा किसी भी दल के न हों, ऐसे निर्दलीय विधायक भी होते हैं। गुजरात का विधानसभा भवन गाँधीनगर में स्थित है। जिसका नाम विठ्ठलभाई पटेल विधानसभा भवन है।

निर्वाचन : राज्य की विधानसभा का सामान्य चुनाव प्रति पाँच वर्षों में होता है। विधानसभा के सदस्यों को विधायक कहते हैं। अंग्रेजी में उन्हें एम.एल.ए. (मेम्बर्स ऑफ लेजिस्लेटिव असेम्बली) के रूप में पहचाना जाता है। एम.एल.ए. का निर्वाचन प्रत्यक्ष चुनाव से लोगों द्वारा होता है। विभिन्न राजनैतिक दल अपने प्रतिनिधियों को विधानसभा के चुनाव में अपने पक्ष के उम्मीदवार के रूप में खड़ा करते हैं। अपने मतविभाग में से बहुमत के आधार पर विधानसभा के सदस्य बनते हैं। जिस दल के सदस्य विधानसभा में बहुमत में हों, वह पक्ष अपनी सरकार बनाता है। विधानसभा के सदस्य लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

क्रिया-कलाप-

अपने विधानसभा क्षेत्र के विधायक का परिचय प्राप्त कीजिए। उसके संपर्क नम्बर और पता प्राप्त कीजिए।
अपने क्षेत्र के लोगों की समस्या जानिए और अपने क्षेत्र के विधायक को पत्र द्वारा जानकारी दीजिए।
बहुमति, शासक दल, विपक्ष, मिश्र सरकार, मतक्षेत्र आदि शब्दों के अर्थ जानें। कक्षा में इस पर चर्चा कीजिए।

समयावधि : विधानसभा स्थायी सदन नहीं है। इसकी कार्य अवधि पाँच वर्ष की है। इसका कार्यकाल पूरा होते ही विसर्जन होता है। कुछ असामान्य परिस्थितियों में संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार सरकार चल सके ऐसा न होने पर राज्यपाल की सिफारिश से राष्ट्रपति राज्य में ‘राष्ट्रपति शासन’ लादता है। इस दौरान राज्यपाल राज्य का प्रशासन संभालते हैं।

विधानसभा का संचालन सरल बने इसके लिए विधानसभा सदस्य अपने में से एक अध्यक्ष (स्पीकर) और उपाध्यक्ष (डेप्युटी स्पीकर) को चुनते हैं। विधानसभा में ही वित्तीय और सामान्य विधेयक पेश हो सकते हैं। विधेयक विविध चरणों में से गुजरकर राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजा जाता है। राज्यपाल की मंजूरी मिलते ही विधेयक कानून बन जाता है।

कार्य :

  • वर्तमान कानूनों में सुधार करती है।
  • आवश्यकता पड़ने पर नये कानून बनाती है।
  • पुराने और अप्रस्तुत कानूनों को रद्द करती है।
  • बजट को मंजूर करती है।
  • कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है।

प्रश्नोत्तरी : विधानसभा में प्रश्नोत्तरी के समय किसी भी दल का विधायक निश्चित हुए विषय पर प्रश्न पूछ सकता है, सूचनाएँ दे सकता है, अपना मत और अभिप्राय दे सकता है। इसके बाद संबंधित विभाग का मंत्री प्रश्नों के उत्तर देता है और आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं, इसकी स्पष्टता करता है। प्रश्नों (समस्याओं) के निराकरण के लिए सदन को विश्वास दिलाता है।

Class 7 Social Notes Chapter 16 राज्य सरकार 3

विधानसभा के अध्यक्ष के माध्यम से सदस्य, मंत्रियों या मुख्यमंत्री से प्रश्न पूछते हैं।

कार्यपालिका :

राज्य की कार्यपालिका राज्य सरकार का महत्त्वपूर्ण अंग है। राज्य की कार्यपालिका में राज्यपाल (गवर्नर), मुख्यमंत्री और मंत्रिमण्डल का समावेश होता है। मंत्रियों के नियंत्रण और मार्गदर्शन के अधीन कार्य करते प्रशासनिक अधिकारियों का भी समावेश कार्यपालिका में होता है। मंत्रिमण्डल को ‘राजनीतिक कार्यपालिका’ और प्रशासनिक अधिकारियों को ‘प्रशासनिक कार्यपालिका’ कहते हैं।

कार्यपालिका के कार्य

  • विधानसभा द्वारा निर्मित कानूनों को लागू करवाती है।
  • राज्य में कानून-व्यवस्था बनी रहे इसके लिए कार्य करती है।
  • राज्य की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को दूर करने का कार्य करती है।
  • राज्य के नागरिकों की गरीबी और बेकारी दूर करने हेतु आयोजन करती है।
  • शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, संचार, बिजली आदि सेवाओं की व्यवस्था करती है।
  • समग्र राज्य का प्रशासन सरलता से चले, इसके लिए कार्य करती है। नागरिकों को जीवन की आवश्यक वस्तुएँ मिलती रहें, इस प्रकार की व्यवस्था करती है।
  • राज्य सरकार प्रजाकल्याण के कार्य करती है।

राज्यपाल (गवर्नर)

भारत के प्रत्येक राज्य में राज्यपाल होता है। वह राज्य का संवैधानिक अध्यक्ष होता है। वह राज्य की कार्यपालिका का भी अध्यक्ष होता है। जिसकी नियुक्ति देश का राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के परामर्श पर 5 वर्षों के लिए करता है। राज्य का पूरा शासन उसके नाम पर ही होता है। 35 वर्ष या उससे अधिक उम्र का भारतीय नागरिक राज्यपाल पद के लायक माना जाता है।

राज्यपाल के कार्य

  • राज्यपाल विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त करता है।
  • मुख्यमंत्री के परामर्श पर मंत्रिमण्डल के मंत्रियों की नियुक्ति करता है।
  • विधानसभा की बैठक बुलाता है और आवश्यकता पड़ने पर विधानसभा को भंग करने की भी सत्ता रखता है। राज्यपाल आवश्यकता पड़ने पर घोषणाएँ भी करता है।
  • राज्य के एड्वोकेट जनरल और राज्य के सार्वजनिक लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति करता है।
  • विधानसभा द्वारा पास किए गए विधेयक पर हस्ताक्षर करके उसे कानून का स्वरूप देता है।
  • वह तटस्थ और निष्पक्ष होकर राज्य के प्रशासन का ध्यान रखता है।

मुख्यमंत्री (चीफ मिनिस्टर)

राज्यपाल विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त करता है। राज्यपाल की अधिकांश सत्ताओं का उपयोग मुख्यमंत्री और मंत्रिमण्डल करता है। गुजरात के मुख्यमंत्री और उसके मंत्रिमण्डल का कार्यालय नया सचिवालय ‘स्वर्णिमभवन’, गांधीनगर में है। मंत्रिमण्डल में तीन स्तर के मंत्री होते हैं : (1) कैबिनेट कक्षा के मंत्री (2) राज्य कक्षा के मंत्री और (3) उपमंत्री।

मुख्यमंत्री के कार्य :

  • मंत्रिमण्डल की बैठक बुलाता है।
  • प्रत्येक मंत्री के कार्यों पर निगरानी रखता है।
  • आवश्यकता पड़ने पर मंत्रियों को मार्गदर्शन देता है।
  • मंत्रिमण्डल द्वारा लिए गए निर्णयों की जानकारी राज्यपाल को देता है।
  • मंत्रिमण्डल के मंत्रियों को भिन्न-भिन्न विभागों का बँटवारा करता है।
  • विधानसभा में वित्तमंत्री से राज्य का बजट प्रस्तुत करवाता है। ।
  • राज्य के नागरिकों के कल्याण, सुविधा और विकास के लिए सतत कार्यशील रहता है।
  • वह सरकार की नीतियों का उद्घोषक, पथप्रदर्शक और कप्तान के रूप में भूमिका निभाता है।

क्रिया-कलाप

  • विधानसभा की यात्रा के लिए शैक्षणिक प्रवास का आयोजन कीजिए।
  • शालापंचायत और मंत्रिमण्डल की रचना कीजिए।
  • अपने विधानसभा मतक्षेत्र का मतविस्तार दर्शानेवाला नक्शा बनाइए।
  • अपने मतविस्तार में विधायक द्वारा किए गए कार्यों की सूची बनाइए।
  • दूरदर्शन पर प्रसारित विधानसभा की कार्यवाही के विषय में जानकारी प्राप्त कीजिए।
  • राज्य सरकार द्वारा किए गए कार्य जो समाचारपत्रों में समाचार के रूप में प्रकाशित हुए हों, उनकी कटिंग काटकर ‘स्क्रेपबुक’ बनाइए।
  • शिक्षक की मदद से मोक विधानसभा का आयोजन कीजिए।

राज्य सरकार के कार्य

भारत में समवायतंत्र की शासन व्यवस्था है अर्थात् केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के बीच कार्य का विभाजन किया गया है। राज्य सरकार का कार्यक्षेत्र अपने राज्य तक सीमित है। जबकि केन्द्र सरकार के कार्यक्षेत्र में सम्पूर्ण देश का समावेश हो जाता है। केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के बीच उनके कार्यों से संबंधित महत्त्वपूर्ण अंतर है। केन्द्र और राज्यों को सौंपे गए कार्य और सत्ताओं का विभाजन तीन सूचियों में किया गया है : (1) संघसूची (2) राज्यसूची (3) समवर्ती सूची।

Class 7 Social Notes Chapter 16 राज्य सरकार 4

  • लोकतंत्र में राज्य सरकार का मुख्य कार्य लोककल्याण करना है।
  • राज्य के लोगों की मूलभूत आवश्यकताएँ बिजली, पक्के मार्ग, पीने का शुद्ध पानी, स्वास्थ्य से संबंधित महत्त्वपूर्ण कार्य करती है।
  • सस्ते अनाज की दुकानों के माध्यम से खाद्यसामग्री का वितरण करती है।
  • बाढ़, अतिवृष्टि, अकाल, भूकंप, चक्रवात आदि प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों की सहायता करती है।
  • न्याय की व्यवस्था, परिवहन साधन, शिक्षण संस्थाएँ, अस्पताल आदि की सुविधाएँ उपलब्ध करवाती है।
  • राज्य में कानून, शांति और व्यवस्था बनी रहे, इसके लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

राज्य का न्यायतंत्र

भारत के प्रत्येक राज्य में उच्च न्यायालय है। गुजरात के उच्च न्यायालय की स्थापना 1 मई, 1960 को हुई थी। गुजरात में उच्च न्यायालय अहमदाबाद में है। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से करता है।

कार्य :

  • नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और देखभाल करना।
  • नागरिकों की अपीलों का समाधान करना।
  • दीवानी और फौजदारी दावों के निर्णयों के विरुद्ध अपीलें सुनना।
  • कानून-व्यवस्था की रक्षा करना।
  • उच्च न्यायालय, नजीरी अदालत (अभिलेख-न्यायालय – court of records) के रूप में कार्य करना।
  • सार्वजनिक हित की याचिकाओं का समाधान लाना।

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इतना जानिए

  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीश राज्यपाल के समक्ष अपने कार्य के लिए प्रतिज्ञा लेते हैं।
  • उच्च न्यायालय में सामान्य रूप से वकील ही दलील करते हैं। आवश्यकता पड़ने पर ही आरोपी-फरियादी को बुलाया जाता है।
  • प्रत्येक जिले में फौजदारी अदालत होती है। चोरी, लूटफाट, मारपीट, खून, शारीरिक चोट या झगड़ों का विवाद फौजदारी मामला माना जाता है।
  • जमीन, मकान तथा सम्पत्ति का विवाद दीवानी मामला माना जाता है।
  • पुलिस को अपराध की प्रथम जानकारी मिले तब पुलिस स्टेशन में एफ.आइ.आर. (फर्स्ट इन्फर्मेशन रिपोर्ट) दर्ज करती है।
  • अदालतों का भार कम करने के लिए राज्य में लोक अदालतें भी कार्यरत हैं।

स्वास्थ्य का अर्थ

स्वास्थ्य को तंदुरस्ती कहते हैं। स्वास्थ्य अर्थात् शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक क्षेमकुशलता (सुखकारी) की संपूर्ण अवस्था। स्वास्थ्य अर्थात् केवल रोग की अनुपस्थिति या शारीरिक दुर्बलता नहीं, स्वास्थ्य शारीरिक क्षेमकुशलता की सिद्धि है। व्यक्ति का पारिवारिक और सामाजिक जीवन उत्तम बने, इसके लिए सबसे पहले उसका स्वास्थ्य अच्छा होना महत्त्वपूर्ण है। तंदुरस्त मानवसंसाधन से ही राष्ट्रों का सर्वांगीण विकास संभव है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ

सार्वजनिक स्वास्थ्य केन्द्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र (PHC), ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य के उपकेन्द्र, बड़े शहरों में स्थित सिविल हॉस्पिटल्स, बालकों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के टीकाकरण कार्यक्रम, स्वच्छता अभियान, पीने के शुद्ध पानी की प्राप्ति, पर्यावरण संरक्षण कार्यक्रम, परिवार कल्याण के कार्यक्रमों द्वारा सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ राष्ट्र के नागरिकों को उपलब्ध करवाई जाती हैं। खाद्य पदार्थों में होनेवाली मिलावट पर अंकुश, नशीली दवाओं पर नियंत्रण, जानलेवा रोगों के सामने रक्षा और उनके निवारण के उपायों के कारण लोगों की सुख-सुविधा बढ़ती है। तात्कालिक उपचार सेवा के लिए 108 की सुविधा उपलब्ध है।

निजी स्वास्थ्य सेवाएँ

निजी अस्पताल, निजी दवाखाना और प्रशिक्षणी तथा सरकार मान्य निजी चिकित्सकों द्वारा नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान की जाती हैं। रोगों का निदान करती निजी लेबोरेटरी भी बड़ी संख्या में कार्यरत हैं। विविध रोगों के निदान और उपचार करनेवाली विशिष्ट प्रकार की निजी हॉस्पिटल स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करती हैं।

स्वास्थ्य और राज्य सरकार

राज्य के नागरिकों को स्वास्थ्य विषयक सेवाएँ मिलती रहें इसके लिए राज्य सरकार विशेष आयोजन और खर्च करती है। राज्य सरकार निम्नानुसार कार्य करती है :

कार्य :

  • सस्ते अनाज की दुकानों द्वारा गरीबों को अनाज का वितरण करना
  • खसरा, छोटी चेचक, पोलियो आदि रोगों के नियंत्रण के लिए टीकाकरण करना
  • शराबबंदी, खाद्यपदार्थों में होनेवाली मिलावट पर नियंत्रण
  • तात्कालिक सेवाओं के लिए 108 की योजना ।
  • स्वच्छता अभियान और शौचालय योजना का संचालन
  • जनऔषधि केन्द्रों के माध्यम से सामान्य दवाओं (Generic drugs) का सस्ते दर पर वितरण
  • मलेरिया, पीलिया, कुष्ठ, अंधत्व, मधुमेह, क्षय, कैन्सर आदि पर नियंत्रण लाने हेतु स्वास्थ्य सेवाओं का आयोजन

स्वास्थ्य और सरकार

राष्ट्र के नागरिकों का स्वास्थ्य बना रहे इसके लिए आयोजन और संचालन राज्य सरकार और केन्द्र सरकार करती है।

स्वास्थ्य की योजनाएँ।

राज्य सरकार की योजनाएँ –

  • मुख्यमंत्री अमृतम् (माँ) योजना
  • शाला-स्वास्थ्य योजना
  • मिशन बलम् सुखम्
  • ममता सखी योजना
  • जननी सुरक्षा योजना
  • जननी शिशुसुरक्षा कार्यक्रम
  • चिरंजीवी योजना
  • बालसखा योजना
  • खिलखिलाट ड्रॉपबेक योजना

केन्द्र सरकार की योजनाएँ –

  • प्रधानमंत्री जन स्वास्थ्य योजना
  • राष्ट्रीय कुष्ठरोग निर्मूलन कार्यक्रम
  • प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान
  • पर्यावरण रक्षण के कार्यक्रम
  • राष्ट्रीय परिवार योजना
  • अटल स्नेह योजना
  • शौचालय एवं स्वच्छता अभियान
  • आयुष्यमान भारत योजना-2018

खिलखिलाट ड्रोपबेक योजना

बालक का जन्म प्रत्येक परिवार में खुशी का अवसर है। स्वस्थ माता और स्वस्थ बालक घर वापस लौटें, यह परिवार के लिए हर्षोल्लास का प्रसंग है। इसीलिए अब सरकारी संस्था में माता और नवजात शिशु को प्रसूति के बाद पिरमिट सरकारी संस्थान में से घर छोड़ने हेतु ‘खिलखिलाट’ वाहन द्वारा नयी व्यवस्था की गई है।

यह ‘खिलखिलाट’ वाहन निश्चित सरकारी अस्पताल के पास है। स्वास्थ्य कार्यकर्ता प्रसूता माता को यह सेवा उपलब्ध करा सकते हैं।
अस्पताल से छुट्टी देने के बाद प्रसूता को ‘माता और बाल स्वास्थ्य’ के लिए स्वास्थ्य शिक्षण तथा सलाह दी जाती है। वाहन के अंदर भी सुरक्षित बाल देखरेख और टीकाकरण संदेश माता और उनके साथ जानेवाले परिवार के सदस्यों को वीडियो के माध्यम से दिया जाता है।

Class 7 Social Notes Chapter 16 राज्य सरकार 6

मुख्यमंत्री अमृतम् (माँ) योजना : गुजरात राज्य के सभी ग्राम्य तथा शहरी क्षेत्रों के गरीबी रेखा के नीचे जीनेवाले परिवार तथा जिस परिवार की वार्षिक आय ₹ 4 लाख या उससे कम हो ऐसे परिवार के (अधिकतम 5 व्यक्ति) सदस्यों का भी समावेश किया गया है। हृदय, मस्तिष्क, किडनी, कैन्सर, बर्न्स, नवजात शिशु के रोग और गंभीर चोट के लिए निश्चित पैकेजिस हैं। करारबद्ध हुए अस्पताल में डॉक्टरी उपचार मिलता है।

इतना जानें

आयुष्मान भारत योजना – 2018 (Ayushman Bharat Programme) (केन्द्र सरकार)
‘आयुष्मान भारत योजना’ अथवा ‘प्रधानमंत्री जनस्वास्थ्य योजना’ यह भारत सरकार की स्वास्थ्य योजना है, जो 1 अप्रैल, 2018 में संपूर्ण भारत में अमल में लाई गई। इस योजना का मुख्य उद्देश्य आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों (बी.पी.एल. धारक) को स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध करवाना है। इस योजना के अंतर्गत आनेवाले प्रत्येक परिवार को पाँच लाख रुपये तक का कैशलेस स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध करवाया जाता है। दस करोड़ बी.पी.एल. परिवार (लगभग 50 करोड़ लोग) इस योजना का लाभ प्राप्त करेंगे। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय इस योजना का अमल करवाएगा।

आयुष्मान भारत योजना में दो बातें महत्त्वपूर्ण हैं :
(1) राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (2) कल्याण केन्द्र

जानने योग्य-

सिविल हॉस्पिटल

  • अहमदाबाद की सिविल हॉस्पिटल एशिया की सबसे बड़ी हॉस्पिटल है।
  • इस हॉस्पिटल की स्थापना ई.स. 1841 में हुई थी।
  • इस हॉस्पिटल में हृदय, किडनी, कैन्सर और अन्य गंभीर रोगों के उपचार के लिए उत्तम सुविधा उपलब्ध है।

Class 7 Social Notes Chapter 18 संचार-माध्यम और विज्ञापन

हम जानते हैं कि मनुष्य एक विचारशील सामाजिक प्राणी है। इसे सबसे महत्त्वपूर्ण भेट ‘बुद्धि’ प्राप्त है। मनुष्य जब भय, सुख, दुःख आदि भाव अनुभव करता है, तब उसे व्यक्त करने का प्रयत्न करता है। वह अपना सुख दूसरों को बाँटकर सुख में वृद्धि करता है, जबकि दुःख को बाँटकर दुःख को हलका करता है।

एक स्थान से दूसरे स्थान पर सूचना अथवा संदेश भेजने अथवा प्राप्त करने की प्रक्रिया (व्यवस्था) को संचार माध्यम अथवा संचारतंत्र कहते हैं। पहले के समय में ढोल बजाकर, पक्षियों द्वारा आग या धुएँ के संकेत द्वारा, झंडा लहराकर, भारी आवाज में चिल्लाकर, चित्र अथवा संकेतों द्वारा संदेश दिया जाता था। इस प्रकार भाषा के साथ चित्रलिपि का विकास शुरू हुआ होगा और इस तरह संदेश पहुँचाया जाता होगा। कई बार पक्षियों और प्राणियों द्वारा भी संदेश भेजा जाता था। शुरुआत में परिवहन के साधन ही संचार के साधन होते थे। समय बीतते प्रिन्टिंग प्रेस, पोस्ट ऑफिस, टेलीफोन, मोबाइल फोन, फैक्स, उपग्रह, इन्टरनेट ने संचार व्यवस्था को खूब ही तीव्र और सरल बनाया है।

विज्ञान और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में विकास करने में संचार ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संचार के माध्यमों के कारण समय की दृष्टि से दुनिया छोटी हो गई है। आधुनिक संचारतंत्र ने पूरे विश्व को एक वैश्विक ग्राम में बदल दिया है। वर्तमान में आर्थिक विकास आधुनिक संचारतंत्र पर आधारित है। हम पृथ्वी के धरातल पर या अवकाश में हो रही घटनाओं का जीवंत प्रसारण करने में सक्षम बने हैं। देश के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक विकास के साथ-साथ संचारतंत्र राष्ट्रीय एकता और अखण्डता बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत जैसे विशाल देश में बाढ़, अकाल, भूकंप, चक्रवात, त्सुनामी आदि प्राकृतिक आपदाएँ और मानव निर्मित आपदा-व्यवस्थापन विकसित संचारतंत्र के बिना संभव नहीं है।

डाक पद्धति

पहले के समय में सांकेतिक या मौखिक संदेश देने का स्थान लिखित संदेशों ने ले लिया है। जिसमें से डाकप्रथा का जन्म हुआ। भारत में आधुनिक डाक-व्यवस्था की शुरुआत 1854 ई. में हुई थी। लोग दूर-दूर रहते अपने रिश्तेदारों, मित्रों या सरकारी कार्यालयों को पत्र भेजने लगे। व्यापारी भी पत्र द्वारा व्यापार करने लगे थे। उसकी सहायता से दुनिया के किसी भी कोने में पत्र, ग्रीटिंग कार्ड भेजने की सुविधा है।

Class 7 Social Notes Chapter 18 संचार-माध्यम और विज्ञापन 1

अपने देश में हम बहुत ही सस्ते दर पर पत्र, आंतरदेशीय पत्र, लिफाफा भेज सकते हैं और बहुत ही कम समय में हम उसका जवाब भी प्राप्त कर सकते हैं। कुछ महत्त्वपूर्ण पत्र रजिस्टर एडी द्वारा, पैसे मनीऑर्डर द्वारा और वस्तुएँ पार्सल द्वारा भेज सकते हैं।

टेलीग्राम (तार)

टेलीग्राम की खोज 1850 ई. में हुई थी। भारत में सर्वप्रथम टेलीग्राम सेवा कोलकाता और डायमण्ड हार्बर के बीच शुरू हुई थी। टेलीग्राम द्वारा छोटे-छोटे संदेश एक स्थान से दूसरे स्थान पर तीव्रता से पहुँचते हैं। इसके बाद एक्सप्रेस तार की सुविधा आई, जिसका खर्च अधिक होता था। यह संदेश तुरंत ही व्यक्ति को मिलता था। यह सुविधा भारत में 13 जुलाई, 2003 से बंद कर दी गई है।

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पुस्तक

पुस्तकें ज्ञान का भण्डार हैं। पुस्तकें एक पीढ़ी का ज्ञान, उसके विचार, उसकी सिद्धियाँ आदि दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाने में सफल रही हैं। पुस्तकें ज्ञान और सूचना का प्रचार-प्रसार करती हैं। वर्तमान समय में ई-बुक का प्रचलन बढ़ा है।

समाचारपत्र

समाचारपत्र दुनिया के किसी भी कोने में घटती घटनाएँ, विज्ञापन, दु:खद संदेश, आज का राशिफल, पंचांग, विशेष दिन, तिथि, चौघड़िया आदि बातें हम तक पहुँचाते हैं। हमारे यहाँ विविध भाषाओं में अनेक दैनिक समाचारपत्र और पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं।

Class 7 Social Notes Chapter 18 संचार-माध्यम और विज्ञापन 3

रेडियो

रेडियो श्राव्य प्रकार का संचार का माध्यम है। रेडियो पर संगीत, लोकगीत, फिल्मी गीत, परिसंवाद, खेद-कूद के समाचार, नाटक, जलवायु/मौसम के समाचार, खोए हुए व्यक्ति के विज्ञापन, भजन, वार्ता जैसे कार्यक्रम सुनने को मिलते हैं। इसके उपरांत बरसात, बाढ़, चक्रवात जैसे संकट के समय की आपदाओं की जानकारी दी जाती है। रेडियो की सुविधा मोबाइल पर भी उपलब्ध है।

इतना जानिए

  • रेडियो की खोज ई.स. 1895 में इटली के मार्कोनी ने की थी।
  • आकाशवाणी का सर्वप्रथम केन्द्र इंग्लैण्ड में स्थापित हुआ था।
  • भारत में मुम्बई और कोलकाता में निजी कंपनी ने ट्रान्समीटर द्वारा सूचना प्रसारण का कार्य शुरू किया था।
  • ई.स. 1930 में मुम्बई और कोलकाता में सरकार ने ट्रान्समीटर अपने हाथ में लेकर उसका नाम ‘इण्डियन ब्रोड कॉस्टिंग सर्विस’ रखा।
  • ई.स. 1957 में इसका नाम आकाशवाणी रखा गया था।
  • प्रसारभारती भारत का सार्वजनिक प्रसारणकर्ता स्वायत्त कॉर्पोरेशन है। जिसकी स्थापना ता. 23-11-1997 को की गई थी। आज ऑल इन्डिया रेडियो और दूरदर्शन नेटवर्क की सेवा प्रसारभारती द्वारा उपलब्ध करवाई जाती है। वर्तमान में FM रेडियो का प्रसारण भी हो रहा है।

सिनेमा (चलचित्र)

सिनेमा भी शिक्षण और मनोरंजन का एक लोकप्रिय साधन है। फिल्म द्वारा सामाजिक, साँस्कृतिक विषयों पर भी शिक्षण दिया जाता है। फिल्म द्वारा भी लोगों के रहन-सहन, विचारधारा में परिवर्तन आया है। कई रीति-रिवाज, मान्यताओं, अंधश्रद्धाओं और वहमों के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए फिल्मों द्वारा सीखने को मिलता है। सबसे अधिक फिल्में भारत में बनती हैं।

टेलीविजन

टेलीविजन वर्तमान में भारत का सबसे लोकप्रिय दृश्य-श्राव्य माध्यम है। आपके घर पर रखी गई टी.वी. समग्र दुनिया के समाचार, फिल्में, सीरियल, शैक्षणिक कार्यक्रम हमारे समक्ष प्रस्तुत करती है। तरोताजा समाचार और खेलों का जीवंत प्रसारण किया जाता है।

इतना जानिए

  • टी.वी. की खोज ज्होन लोगी बायर्ड द्वारा की गई थी।
  • भारत में सर्वप्रथम टेलीविजन प्रसारण केन्द्र का प्रारंभ 15 सितम्बर, 1959 को दिल्ली में पायलोट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू हुआ था।
  • भारत में दूसरे टेलीविजन प्रसारण केन्द्र की शुरुआत ई.स. 1972 में मुम्बई में हुई थी।
  • ई.स. 1976 में दूरदर्शन का विभाग ‘ऑल इण्डिया रेडियो’ से अलग किया गया था।
  • दिनांक 15 मार्च, 1976 में अहमदाबाद में इसरो के माध्यम से प्रसारण केन्द्र शुरू हुआ और दि. 02-10-1987 के दिन अहमदाबाद में डी.डी. गिरनार चैनल शुरू हुआ।
  • दिनांक 26-01-2000 में ‘डीडी ज्ञानदर्शन’ नामक शैक्षणिक चैनल शुरू किया गया।
  • प्राथमिक, माध्यमिक, उच्चतर शिक्षण, स्वास्थ्य, कृषि आदि महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम का प्रसारण ‘वंदे गुजरात’ चैनल द्वारा राज्य सरकार प्रस्तुत करती है।

मोबाइल फोन

संचार माध्यम का वर्तमान में महत्त्वपूर्ण साधन मोबाइल फोन है। मोबाइल फोन के द्वारा एक व्यक्ति किसी भी स्थान से दूसरे व्यक्ति को नंबर लगाकर बात कर सकता है। मोबाइल फोन में घड़ी, वीडियो-ऑडियो प्लेयर, टार्च, कलेन्डर, केल्क्युलेटर, रेडियो आदि की सुविधा होती है। इसके द्वारा हम रेल्वे-बस-सिनेमा की टिकट बुक करवा सकते हैं। मोबाइल फोन के अंदर उपयोग में आनेवाले इन्टरनेट द्वारा कई जानकारी हम प्राप्त कर सकते हैं। अनेक सेवाओं/सुविधाओं के लिए वर्तमान में मोबाइल फोन जरूरी उपकरण बन गया है।

कृत्रिम उपग्रह (सेटेलाइट)

संचार माध्यम के रूप में कृत्रिम उपग्रह अधिक उपयोगी है। यह कृत्रिम उपग्रह मानवसर्जित है। जिसे अवकाश में स्थापित किया जाता है। पृथ्वी पर से अवकाश में दैनिक समाचार, मौसम की जानकारी, विविध कार्यक्रम इस उपग्रह द्वारा पृथ्वी पर स्थित किसी भी स्थान के टेलीविजन, कम्प्यूटर qऔर मोबाइल फोन जैसे साधनों में प्राप्त कर सकते हैं। पृथ्वी के गर्भ में पानी, खनिज भण्डार छिपा है, जिसकी जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं। हमारे घर से दूसरे स्थल के बीच का अंतर और मार्ग जान सकते हैं। कृत्रिम उपग्रह देश के संरक्षण में अधिक उपयोगी है।

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संचार माध्यम और टेक्नोलॉजी

मनुष्य ने अपनी उत्क्रांति के साथ-साथ अनेक आवश्यकताएँ उत्पन्न की हैं। आरंभ में प्राथमिक आवश्यकताएँ जैसे कि भोजन, पानी और अपने अस्तित्व को टिकाए रखने के विषय मुख्य थे। समय के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों की आवश्यकताएँ उत्पन्न हुईं, उनके लिए संचार माध्यम की आवश्यकताएँ बढ़ीं, जिससे उनमें बदलाव होने लगा। पहले के समय में डाक व्यवस्था थी जिनमें से टेलीफोन, पेजर, मोबाइल फोन, फैक्स जैसी सुविधाएँ टेक्नोलॉजी के माध्यम से बढ़ने लगी और उसके कारण नये-नये परिवर्तन होने लगे। वर्तमान समय में भी देखें तो समाचार- पत्रों में भी टेक्नोलॉजी का उपयोग होने लगा है। पहले पेपर छापने के लिए अक्षरों को जमाना पड़ता था। अब उसके स्थान पर कम्प्यूटर के माध्यम से टाइप करके छापने के लिए दे सकते हैं। टेलीफोन में पहले नम्बर गोल-गोल घुमाने पडते थे और अब उसके स्थान पर सीधा नम्बर दबाकर हम दूसरे व्यक्ति से संपर्क साधकर बात कर सकते हैं। नयी खोज वॉकीटॉकी की हुई, इसका उपयोग पुलिस अधिक मात्रा में करती है।

मनुष्य जितनी तीव्रता से विचारता है उतनी तीव्रता से उसका प्रसार या प्रचार कर सकता है। संचार माध्यम के साधन जैसे कि, टी.वी., रेडियो, प्रोजेक्टर, कम्प्यूटर, मोबाइल फोन जैसे साधन टेक्नोलॉजी के माध्यम से आए और उसमें रोजाना परिवर्तन होने लगे हैं। अब व्यक्ति एक दूसरे को मोबाइल फोन या कम्प्यूटर द्वारा प्रत्यक्ष देख सकता है और बातचीत भी कर सकता है। हमारे द्वारा लिखे कागज ई-मेइल या फैक्स द्वारा तुरन्त दूसरी जगह पहुँचा सकते हैं। टेक्नोलॉजी के उपयोग से संचार माध्यमों का विकास अधिक से अधिक हुआ है।

टेलीविजन के कार्यक्रम में भी परिवर्तन होने लगा है। कृत्रिम उपग्रह द्वारा कृषि क्षेत्र की तीव्र एवं सचोट जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। समाचार, फिल्म, सीरियल, शैक्षणिक कार्यक्रम, विज्ञापन के उपरांत बाढ़, भूकंप, चक्रवात जैसी जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं। व्यक्ति संचार माध्यम के साधन के रूप में मोबाइल फोन का उपयोग मात्र बातचीत के लिए ही नहीं परंतु संदेश के आदान-प्रदान के लिए भी है। संदेश के लिए अनेक प्रकार की सोशियल मीडिया एप और कोई जानकारी खोजने के लिए ब्राउज़र का समावेश किया गया है। इस प्रकार की एप आने से समाज में और शिक्षण में अनेक परिवर्तन आए हैं।

लोकतंत्र में संचार-माध्यम

देश में होनेवाली घटनाओं की जानकारी लोगों तक पहुँचाने के लिए संचार माध्यमों का महत्त्व बढ़ रहा है। लोगों के जीवन स्तर में परिवर्तन लाने के लिए सरकार कैसे कार्य करती है उसकी जानकारी आदान-प्रदान कर सकते हैं और आम जनता तक आसानी से पहुँचा सकते हैं। सरकार द्वारा किए जानेवाले शिक्षण, स्वास्थ्य, कृषि जैसे कार्यों की जानकारी संचार माध्यमों द्वारा प्राप्त कर सकते हैं। सरकार द्वारा किए गए कार्य और सामग्री के समक्ष विपक्ष उसकी कमियाँ उजागर करने का प्रयत्न करती है। सरकार संचार माध्यमों पर निगरानी भी रखती है। रेडियो और टी.वी. पर आनेवाले समाचारों का समाज में क्या प्रभाव पड़ेगा, यह देखती है। संचार माध्यम और सोशियल मीडिया सच्ची जानकारी ही प्रस्तुत करती है क्या? यह प्रत्येक नागरिक को जाँचना चाहिए।

संचार-माध्यमों का विवेकपूर्ण उपयोग

हमें संचार माध्यमों का उपयोग योग्य ढंग से करना चाहिए। प्रदूषण, पानी-समस्या, गरीबी, बालमजदूरी, महिलाओं पर अत्याचार जैसी घटनाओं पर ध्यान केन्द्रित करनेवाले विषयों पर अधिक से अधिक चर्चा करनी चाहिए। इसके लिए टेलीविजन, रेडियो, समाचारपत्र आदि माध्यमों का विशेष उपयोग करना चाहिए। कभी-कभी ऐसे विषय पर एक दूसरे पर आक्षेपबाजी होती हो, ऐसे दृश्य भी हमें टेलीविजन पर देखने को मिलते हैं, जिसका समाज पर विपरित असर पड़ता है। मोबाइल फोन पर महिलाएँ, बालक, वृद्ध या गरीब पर अत्याचार होते हैं ऐसे वीडियों नहीं रखने चाहिए। अध्ययन करनेवाले विद्यार्थी द्वारा मोबाइल फोन का उपयोग बातचीत तक ही सीमित होना चाहिए। उसमें उपलब्ध गेम, इन्टरनेट का उपयोग कम और विवेकपूर्ण ही होना चाहिए। मोबाइल फोन के प्रकाश के कारण आँखों को नुकसान होता है तथा समय और शिक्षण पर विपरीत असर पड़ता है। जिससे उसका उपयोग कम करना चाहिए।
इस प्रकार हमारे दैनिक जीवन में संचार माध्यमों का स्थान महत्त्वपूर्ण रहा है। परंतु इनका विवेकपूर्ण उपयोग हो यह जरूरी है।

विज्ञापन

वर्तमान समय में विज्ञापनों का महत्त्व अधिक देखने को मिलता है। हमारे यहाँ त्योहार के आते ही विक्रेता ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए नई-नई स्कीमें रखते हैं। जैसे कि 50 % फ्री, वॉशिंग मशीन के साथ 500 रुपये का गिफ्ट वाउचर फ्री, 1 रुपये में रेफ्रिजरेटर ले जाओ, एक जोड़ी कपड़े के साथ एक जोड़ी फ्री, गेरेंटेड गिफ्ट आदि मिलते हैं। इसके पीछे का कारण देखें तो व्यवसाय में प्रतिस्पर्धा है।

विज्ञापन के माध्यम

व्यापारी, पीढ़ियाँ, संस्थाएँ, विद्यालय अपने द्वारा किए जानेवाले कार्यों को बाज़ार में या व्यवसाय के क्षेत्र तक पहुँचाने में विज्ञापनों का अधिकतम उपयोग करते हैं। बालकों, आप टी.वी. देखते होंगे तब चैनल में आनेवाले प्रोग्रामों के बीच में विज्ञापन आते हैं। सही? भीतचित्र, रेडियो, सिनेमा, टेलीविजन, बैनर, मोबाइल फोन, टेलीफोन, पत्रिका, खरीदी के थैले, बसस्टैण्ड, मैगेजिन, अखबार, बस या ट्रेन की साइट पर संगीत के साधन, लाइटबिल, टैक्सबिल आदि विज्ञापनों के माध्यम हैं।

विज्ञापन के लाभ-हानियाँ

विक्रेताओं को माल की बिक्री बढ़ानी हो तो विज्ञापन करना पड़ता है।

लाभ :

  • वस्तु पर छापी जानेवाली कीमत को जान सकते हैं।
  • वस्तु की सामान्य जानकारी व्यक्ति तक आसानी से पहुँचा सकते हैं।

हानियाँ :

  • विज्ञापन पर बहुत ही धन खर्च होता है और उसका बोझ ग्राहकों को भोगना पड़ता है।
  • विज्ञापन करनेवाला व्यक्ति जिस वस्तु का प्रचार करता है, वह वस्तु शायद स्वयं कभी उपयोग न करता हो, ऐसा भी होता है।
  • विज्ञापन के आधार पर खरीदी करने पर हम कभी ठगे भी जाते हैं।
  • टी.वी. पर दर्शाए जानेवाले विज्ञापनों को देखकर हमारे मन में क्षोभ अनुभव होता है। क्योंकि हम प्रत्येक वस्तु खरीद नहीं सकते। बालकों या बड़ों को दिला नहीं सकते, ऐसा अनुभव होता है।
  • देखा-देखी का चलन बढ़ जाता है।

विज्ञापन से सावधान

  • गलत या लुभावने विज्ञापनों से सावधान रहना चाहिए।
  • चित्र, पोस्टर अथवा वीडियो द्वारा दर्शाई जानेवाली वस्तु की जाँच करके खरीददारी करनी चाहिए।
  • सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक या धार्मिक बातों का निषेधात्मक प्रभाव डालते हों, ऐसे विज्ञापनों को प्रोत्साहन न दें और उसके संदर्भ में सरकार का ध्यान आकर्षित करवाएँ।

विज्ञापन के सामाजिक मूल्य

आज विज्ञापन सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का मुख्य भाग बन गया है। हम जो विज्ञापन देखते हैं उसकी चर्चा समाज में की जाती है। सरकार द्वारा समाज के उत्थान के लिए विज्ञापन किए जाते हैं, जैसे कि बालविवाह न करना, स्वास्थ्य, जनसंख्या नियंत्रण, लड़कियों को शिक्षा देना, बालकों को कुपोषण से बचाने आदि के विज्ञापनों द्वारा इसका विशेष फैलाव करके सामाजिक जागृति ला सकते हैं।

विज्ञापन और लोकजीवन

लोकतांत्रिक देशों में अधिकांशतः संचार माध्यम स्वतंत्रता रखते हैं। लोकतंत्र को मजबूत करने और टिकाए रखने हेतु समूह माध्यमों द्वारा प्रसारित होनेवाले विज्ञापन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जैसे कि,

  • लोकतंत्र में लोककल्याण केन्द्र में है। विज्ञापनों द्वारा सरकार लोककल्याण की योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुँचाती है।
  • लोकोपयोगी सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा अन्य बातों को विज्ञापनों के माध्यमों द्वारा सरकार उनकी जानकारी लोगों तक पहुँचाती है।
  • शिक्षा का प्रचार और प्रसार, कुरिवाज, अंधविश्वास, बालविवाह की प्रथा, गलत मान्यताओं का खण्डन लोकतंत्र में विज्ञापनों के माध्यम से होता है। जिससे लोकतंत्र परिपक्व बनता है।
  • लोकतंत्र में सरकार सांसदों, मंत्रियों, विधायकों आदि द्वारा दी जानेवाली सेवाओं का प्रसार विज्ञापनों द्वारा करती है।
  • सरकार स्वास्थ्य विषयक, जल बचाओ, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, स्वच्छता अभियान आदि लोकतंत्र के पोषक परिबलों को विज्ञापनों के माध्यम से उजागर करती है।
  • लोकतंत्र के तत्त्व जैसे कि समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और एकता का विचार संचार माध्यमों के द्वारा दिए जानेवाले विज्ञापनों से दृढ़ बनते हैं; जिससे लोकतंत्र अधिक मजबूत बनता है।
  • सरकार मतदान की समग्र प्रक्रिया की समझ लोगों को विज्ञापन द्वारा देती है।
  • सरकार अपने कार्यकाल के दौरान किए गए लोकोपयोगी कार्यों को विज्ञापनों के माध्यम से लोगों तक पहुँचाकर दुबारा सत्ता प्राप्त करने का प्रयत्न करती है।

इस प्रकार, संचार माध्यम और विज्ञापन समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। जिसके द्वारा व्यक्ति के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक और व्यक्तिगत जीवन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन होते देखा गया है।

Class 7 Social Notes Chapter 17 लैंगिक भिन्नता

हमारे देश में लड़के और लड़कियों के लालन-पालन में कभी समानता तो कभी असमानता पाई जाती है। पिछले दो दशकों में इस संदर्भ में जागृति फैली है। सरकार भी विभिन्न योजनाओं एवं आयोजनों के माध्यम से लड़के और लड़कियों में कोई भेदभाव न हो, ऐसा प्रयत्न कर रही है। हमारा देश अनेक भिन्नताओंवाला देश है। आधुनिक समय के अनुसार लड़के-लड़कियों को शिक्षा का समान अधिकार दिया गया है। रूढ़िगत मान्यता के अनुसार आज भी कुछ क्षेत्रों में कन्याओं को शिक्षा का अधिकार प्राप्त करने में कई असुविधाएँ होती हैं। समाज में प्रवर्तित भेदभाव का प्रभाव लम्बे समय तक समाज व्यवस्था पर पड़ता है। समाज में कई कुरिवाज प्रचलित होते हैं। आज भी कई स्थानों पर पाए जानेवाले बालविवाह का एक कारण यह भेदभाव है। बालविवाह के कारण अधिकांश महिलाएँ आगे शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकतीं, जिसके कारण उनका विकास रुक जाता है। जिसका एक प्रभाव स्त्रियों के स्वास्थ्य पर भी होता है। यदि लैंगिक भेदभाव दूर हो तो ऐसी अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है।

हमारे आस-पास स्त्री-पुरुष के बीच कुछ भिन्नता स्वीकार की गई है। स्त्री-पुरुषों में समान काम के लिए पुरुषों को अधिक वेतन दिया जाता है। ऐसा भेदभाव अपराध बनता है। आधुनिक समय में महिलाएँ सभी क्षेत्रों में जुड़ी हैं। चिकित्सा, इन्जीनियरिंग, वकालत, विमान चालक जैसी प्रत्येक बात में महिलाएँ समान रूप से काम करती हैं।

लैंगिक भिन्नता का विशेष असर अधिकांश ग्राम्य क्षेत्रों में पाया जाता है। कई बार लड़कियों को उच्च शिक्षण दिलाते समय अभिभावकों में हिचकिचाहट पाई जाती है। सरकार द्वारा सहायता एवं लोगों में आई जागृति के कारण लड़कियों के लिए उच्च शिक्षण सरल और सहज बना है।

भारतीय मान्यता के अनुसार लड़के-लड़कियों का लालन-पालन

सन् 2001 की जनगणना में 0 से 6 वर्ष तक के बालकों में लड़के-लड़कियों की संख्या में बड़ा अंतर पाया जाता है। कुछ समय पहले लड़की को जन्म से पहले ही मार देने के कारण लड़के-लड़कियों की संख्या में अधिक असमानता पाई गई, इसके लिए सरकार द्वारा भ्रूण हत्या विरोधी कानून बनाया गया। गर्भ में लड़के या लड़की का परीक्षण करना भी अपराध है। भारतीय मान्यता के अनुसार अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए संतान में पुत्र को ही महत्त्व दिया गया था। पिछले दशक में सामाजिक रूप से महिलाओं की भागीदारी ने इस मान्यता को खूब ही प्रभावित किया है।

अपने विद्यालय में विविध आयोजनों के समय आप जुड़े होंगे। विद्यालय कार्यक्रमों में लड़कों और लड़कियों द्वारा की गई प्रवृत्तियों को लिखिए।

Class 7 Social Notes Chapter 17 लैंगिक भिन्नता 1

रूढ़िगत मान्यता

लैंगिक भिन्नता के संदर्भ में हमारे देश में अनेक मान्यताएँ प्रवर्तित हैं। लड़कों और लड़कियों के लालन-पालन में इस संदर्भ में कई अंतर पाया जाता है। कुछ क्षेत्रों में प्राथमिक शिक्षण भी कभी पूरा नहीं करवाया जाता था। पिछले दो दशकों में प्राथमिक शिक्षण पूरा हो ऐसे खास प्रयत्न सरकार द्वारा किए गए हैं। सरकार के विशेष प्रयत्नों से आज हमारी सेना और पुलिस में लड़कियों की संख्या बढ़ रही है। लड़कियों को बाहर पढ़ने के लिए या नौकरी करने के लिए शहर भेजने के बदले लोग अपने क्षेत्र में ही नौकरी करवाना पसंद करते हैं। पिछले कुछ दशकों से महिलाएँ विविध कार्यों के साथ जुड़ी हैं। अंतरिक्ष क्षेत्र में भी महिलाएं जुड़ रही हैं। कन्याओं की सुरक्षा और संरक्षण के लिए सरकार सतत प्रयत्न कर रही है। रूढ़िगत मान्यताओं के आधार पर कह सकते हैं कि आज भी कुछ समाजों में कन्याओं के पढ़ने के संदर्भ में अनेक समस्याएँ पाई जाती हैं। उच्च पाठ्यक्रमों में कन्याओं को पढ़ाने के प्रति अभिभावकों में उदासीनता पाई जाती है। इसलिए अब राज्य सरकार द्वारा उच्च-शिक्षण के लिए विशेष सहायता दी जाती है।

गृहकार्य में असमानता

हमने देखा कि छोटी-छोटी बातों में लड़के-लड़की के साथ भेदभाव पाया जाता है। आगे जाकर यह भेदभाव समस्या बन जाता है। घर के छोटे-बड़े काम के लिए साइकल या अन्य वाहन चलाने और सीखने में ऐसा भेदभाव अधिक पाया जाता है। घर, विद्यालय या सार्वजनिक स्थलों में हम ऐसा भेदभाव देख सकते हैं। ऐसी कुछ बातों के संदर्भ में चर्चा करेंगे।

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महिला सशक्तीकरण

एक मकान को घर बनाने का काम महिला द्वारा ही संभव है। घर के साथ बालक और अन्य जिम्मेदारियाँ निभाने में महिलाएँ अग्रसर होती हैं। आधुनिक समय में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में महिलाएँ सफल हुई हैं। आधुनिक समय में महिलाएँ विविध क्षेत्रों में अनोखी पहचान के साथ आगे बढ़ती पाई जाती हैं। खेल-जगत, फिल्म, मनोरंजन, राजनीति, अंतरिक्ष के उपरांत विज्ञान और संशोधन के क्षेत्र में भी महिलाएँ विशेष जुड़ रही हैं। संरक्षण जैसे खतरनाक कार्यों में भी आज महिलाएँ आगे बढ़ रही हैं। हमारे देश में अनेक महिलाओं ने विशेष सिद्धि हासिल की है।

महिलाओं को सशक्त करने के लिए पिछले दो दशकों में सरकार द्वारा अनेक कार्यक्रम और योजनाएँ बनाई गई हैं। पशुपालन, उद्योग और अन्य साहस के लिए सहायता दी जाती है। सरकार द्वारा ‘स्टार्टअप इण्डिया’ और ‘मेक इन इण्डिया’ के अन्तर्गत अनेक योजनाएँ महिला सशक्तीकरण के लिए चलाई जा रही हैं। महिलाओं को उद्योग शुरू करने के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है। नारी सशक्तीकरण के लिए अनेक संस्थाएँ भी कार्य कर रही हैं। सरकार की योजनाएँ, सार्वजनिक संस्थाएँ और अन्य द्वारा ऐसी महिलाओं को सहायता करके आत्मनिर्भर बनने में मदद की जाती है। नारी सशक्तीकरण के लिए योजनाओं के उपरांत शिक्षण में भी कन्याओं के लिए विशेष व्यवस्था और योजनाएँ लागू हैं। हमारे देश के विविध क्षेत्रों की महिलाओं के बारे में जानें।

विशेष क्षेत्रों में महिलाएँ

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लिंगानुपात

समग्र देश में जनगणना करने के लिए लाखों लोग जुड़े होते हैं। जिस वर्ष में इकाई का अंक एक हो उन वर्षों में जनगणना की जाती है। पिछली जनगणना वर्ष 2011 में हुई थी। प्रथम जनगणना 1871 में हुई थी। केन्द्र सरकार द्वारा प्रति 10 वर्ष में जनगणना करवाई जाती है। अब आगे की जनगणना कब होगी?

शहरी और ग्रामीण लिंगानुपात में बड़ा अंतर पाया जाता है। यहाँ हम गुजरात के लिंगानुपात की स्थिति को देखेंगे। यह प्रति हजार पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या दर्शाता है। इस सारणी के आधार पर नीचे दिए गए प्रश्नों की चर्चा कीजिए :

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चर्चा कीजिए

  • इस अंतर के कारण कौन-सी समस्या उत्पन्न होती है?
  • इस समस्या का समाधान किस तरह हो सकता है?
  • शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में अंतर क्यों अधिक है?
  • जनसंख्या वृद्धि के साथ लिंगानुपात क्यों महत्त्वपूर्ण है ?

हमारे आस-पास स्त्रियों और पुरुषों का परस्पर समान अनुपात लगता है। देश में स्त्रियों का अनुपात लगभग आधा माना जाता है। अभी तक की जनगणना के अनुसार कह सकते हैं कि, भारत में स्त्रियों और पुरुषों के लिंगानुपात में असमानता दिखाई देती है। नीचे विविध वर्षों में स्त्रियों का अनुपात निम्नानुसार दर्ज किया गया है :

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सोचकर कहिए

  • किस वर्ष में स्त्रियों का अनुपात सर्वाधिक है?
  • किस वर्ष में स्त्रियों का अनुपात सबसे कम है?
  • स्त्रियों का अनुपात घटता जाए तो क्या समस्याएँ उत्पन्न होंगी?
  • स्त्री-पुरुषों की संख्या की असमानता को दूर करने के लिए सरकार क्या कदम उठाती है?

महिला आंदोलनों का अध्ययन

हमारा देश आजाद हुआ उससे पहले देश पर राज करनेवाले अंग्रेजों के सामने अनेक आंदोलन हुए थे। गाँधी बापू के नेतृत्व में विविध आंदोलन हुए थे। गुजरात सहित देशभर में कस्तूरबा के साथ अनेक महिलाएँ इन आंदोलनों के साथ जुड़ी थीं। बिहार में महिलाओं ने मद्य-निषेध के लिए सरकार के सामने सफल आंदोलन किया था। विशेषकर शहरों में कभी-कभी गरमी में पानी के लिए महिलाएँ आंदोलन करती हैं। ऐसे दूसरे अनेक आंदोलन महत्त्वपूर्ण रूप से महिलाओं के लिए हुए हैं। इन आंदोलनों में महिलाएँ जुड़ती हैं और अपनी समस्याओं के लिए आंदोलन करती हैं।

किसी महिला आंदोलन के विषय में सोचें और लिखें

  • उस महिला आंदोलन के विषय में आप क्या-क्या जानते हैं ?
  • वह आंदोलन क्यों किया गया था?
  • उस आंदोलन से क्या प्रभाव पड़ा?

Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार

आप पेन, नोटबुक, पुस्तकें खरीदने के लिए दुकान जाते होंगे। आपके घर के लिए भी चीज-वस्तुओं की खरीदी की जाती होगी। आपको लगता होगा कि ये सभी चीज-वस्तुएँ कौन बनाता होगा? किस तरह ये वस्तुएँ दुकानों तक पहुँचती होंगी? इन चीज-वस्तुओं को खरीदनेवाले कौन होंगे? इन चीज-वस्तुओं को बेचने वाले कौन होंगे? आइए, मित्रों आज हम इसके विषय में अध्ययन करें।

बाजार

चीज-वस्तुओं की बिक्री करती दुकानें जहाँ हों वह स्थान अर्थात् बाजार। बाजार अर्थात् जहाँ क्रेता और विक्रेता इकट्ठे होते हों, वह स्थल। बाजार में अनेक चीज-वस्तुओं की बिक्री होती है। जैसे कि सब्जियाँ, फल, साबुन, दंतमंजन, मसाले, ब्रेड, बिस्कुट, अनाज, दाल, चावल, कपड़ा, पुस्तकें, नोटबुक, पेन, पेन्सिल, बूट-जुराब, मोबाइल फोन, साइकल, टी.वी., फ्रिज आदि सूची बनाएं तो कितनी लम्बी सूची तैयार होगी। ऐसी अनेक वस्तुएँ हम बाजार में जाकर खरीदते हैं।

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बाजार के प्रकार

हम अपने दैनिक जीवन उपयोगी वस्तुओं की खरीदी अलग-अलग बाजार से करते हैं। जैसे कि, हमारे आसपास मोहल्ला बाजार, साप्ताहिक बाजार अथवा गुजरी बाजार, बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, नियंत्रित बाजार और ऑनलाइन बाजार।

मोहल्ला बाजार : हम दैनिक जीवन की उपयोगी वस्तुएँ अपने आस-पास की दुकानों से खरीदते हैं। जैसे कि डेयरी से दूध, दहीं, छाछ, किराणा की दुकानों से तेल-मसाला और गृह उपयोगी वस्तुएँ, स्टेशनरी की दुकान से पेन, पेन्सिल, नोटबुक, पुस्तकें आदि और दवा की दुकान से दवाइयाँ खरीदते हैं। तथा मार्गों के आस-पास छोटी दुकानें अथवा ठेलों से, सब्जियाँ अथवा वारत्योहार पर खिलौने, पतंग अथवा अन्य वस्तुएँ खरीदते हैं।

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  • ये दुकानें हमारे घर के आस-पास होती हैं।
  • हमारी आवश्यकता के अनुसार दिन के समय चाहे जब खरीदी कर सकते हैं।
  • ये दुकानदार अपने नियमित ग्राहकों को उधार पर भी बिक्री करते हैं।

गुजरी अथवा साप्ताहिक बाजार : साप्ताहिक बाजार किसी एक निश्चित दिन पर ही लगती है। इसलिए इन्हें साप्ताहिक बाजार कहते हैं। कुछ क्षेत्रों में इन्हें ‘हाट’ कहा जाता है। उदाहरण : प्रत्येक शनिवार को यह बाजार लगती हो तो शनिवारी बाजार। व्यापारी दिन के समय अपनी बेचनेवाली चीजवस्तुएँ लाते हैं और शाम तक दुकान समेटकर चले जाते हैं। दूसरे दिन किसी अन्य स्थान पर जाकर वहाँ दुकान लगाते हैं। देश भर में अनेक स्थानों पर ऐसे हजारों बाजार लगते हैं। जिनमें लोग अपनी रोजमर्रा की उपयोगी वस्तुएँ खरीदते हैं।

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  • जरूरी कई वस्तुएँ एक ही स्थान पर मिलती हैं।
  • छोटे व्यापारी और कारीगर रोजगार प्राप्त करते हैं।
  • व्यापारी दुकान का किराया, बिजली, कर, कर्मचारी का वेतन आदि खर्च नहीं होने से चीज वस्तुएँ सस्ते दर पर बेच सकते हैं।

शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और मोल

हमारे आसपास की दुकानों और साप्ताहिक बाजारों के अलावा बड़े शहरों में अन्य बाजार भी होते हैं। एक ही बिल्डिंग में एक साथ अलग-अलग प्रकार की दुकानें होती हैं। जिसे शॉपिंग कॉम्प्लेक्स कहते हैं। जिसमें हमें छोटी-बड़ी कम्पनी की ब्रांडेड और बिना ब्रान्ड की वस्तुएँ मिलती हैं। बड़ी कंपनी सार्वजनिक खबरों द्वारा ऊँची गुणवत्ता के विज्ञापन करके इन ब्रान्डेड वस्तुओं को ऊँचे भाव पर ऐसे बड़े शो-रूमों में बेचती हैं। जिनकी कीमत शॉपिंग मोल अधिक होने से कुछ लोग ही ऐसी वस्तुएँ खरीदते हैं।

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  • ग्राहक को केन्द्र में रखकर दुकानें सजाई जाती हैं।
  • विविध ब्रान्ड की अनेक वस्तुएँ एक साथ बिकती हैं। जिससे ग्राहक को पसंदगी का अवसर मिलता है।
  • वातानुकूलित मोल में ग्राहक पर्याप्त समय देकर विशेष छूट मिलती हो, ऐसी वस्तुएँ खरीद सकता है।
  • ग्राहक को वस्तु की छपी कीमत पर विशेष छूट दी जाती है।
  • ग्राहक काउन्टर पर नगद, क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड, नेट बैंकिंग से कीमत चुका सके, ऐसी व्यवस्था होती है।

नियंत्रित बाजार (मार्केटिंग यार्ड) (APMC)

कृषि की सफलता में अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के उपरांत अच्छी बाजार व्यस्था होना भी जरूरी है। आजादी के बाद के चरण में कृषि उत्पादन की बिक्री की निश्चित व्यवस्था न होने से किसानों का शोषण होता था। इसको रोकने के लिए सरकार ने नियंत्रित बाजार व्यवस्था अर्थात् मार्केटिंग यार्ड (खेती-बाड़ी उत्पादन बाजार समिति) की व्यवस्था की है। किसान फसल – बिक्री में ठगा न जाए और उसकी फसल-उत्पादन का उचित भाव प्राप्त करे और इस तरह वह आर्थिक समृद्ध बने इसके लिए गुजरात की विविध तहसील केन्द्रों पर खेतीबाड़ी उत्पादन बाजार समितियों की स्थापना की गई है। जैसे,

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  • किसानों की कृषि उपजों को सार्वजनिक नीलामी के आधार पर बेचा जाता है।
  • व्यापारियों का नैतिक स्तर बना रहता है।
  • भाव निर्धारण में पारदर्शिता बढ़ती है।
  • किसानों को उनकी कृषि उपजों का अच्छा भाव मिल सकता है।
  • व्यापारियों को अच्छा माल एक ही स्थान पर पर्याप्त मात्रा में मिल सकता है।
  • विविध सेवाएँ जैसे कि बैंकिंग, कर्ज (ऋण), बीमा, गोदाम, अन्य सुविधाओं का निर्माण आदि प्रभावी रूप से होता है।
  • रेडियो, समाचारपत्र, टी.वी. तथा ऑनलाइन मोबाइल फोन पर किसानों को कृषि-उत्पादों का दैनिक बाजार भाव मिल जाता है।
  • किसानों को मार्केटिंग यार्ड में रात्रि में ठहरने की सुविधा, उनकी फसलों का संग्रह करने के लिए गोदाम की सुविधा मिलती है।

ऑनलाइन बाजार

वर्तमान समय में ऑनलाइन शॉपिंग का प्रमाण बढ़ रहा है। बाजार में गए बिना ही हम कम्प्यूटर, मोबाइल फोन या टी.वी. पर डिजिटल पेमेन्ट करके सीधे खरीदी कर सकते हैं। ऑनलाइन शॉपिंग के लिए अनेक कंपनियाँ ग्राहकों को सीधे बिक्री करने से अधिक छूट देकर बाजार से सस्ती दर पर चीजें बेच सकती हैं। ग्राहक के घर तक चीजवस्तुएँ सीधे पहुँच जाती हैं। जिसके कारण इसका उपयोग अधिक से अधिक हो रहा है। आपने भी ऑनलाइन खरीदी की होगी। इस प्रकार अब बाज़ार हमारे घर में ही या हाथ में आ गया है ऐसा कह सकते हैं। ऑनलाइन खरीदी में सावधानी रखनी जरूरी है, अन्यथा धोखा-धड़ी का डर रहता है।

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बाजार के आसपास

हम चीजवस्तुएँ खरीदने जाते हैं ऐसे विविध प्रकार के बाजार के विषय में अध्ययन किया। आपको लगा होगा कि ये सभी दुकानदार अपनी दुकानों के लिए मालसामान कहाँ से खरीदते होंगे? चीजवस्तुओं का उत्पादन कारखाना, गृहउद्योग, घरों और खेतों में होता है, परंतु हम सीधे कारखाने या खेत से चीजवस्तुएँ नहीं खरीदते।

जो व्यापारी खेत या कारखानों, घरों में अधिक मात्रा में उत्पादित मालसामान को खरीदते हैं, उन्हें थोकबंध व्यापारी कहते हैं। वे यह सामान छोटे व्यापारियों या दुकानदारों को बेचते हैं। इस प्रकार ये खरीदी और बिक्री करनेवाले दोनों ही व्यापारी होते हैं। हम जिस दुकानदार या व्यापारी से वस्तुएँ खरीदते हैं, उसे फुटकर व्यापारी कहते हैं।

मोटरकार में उपयोग में आनेवाले विविध भाग छोटे-छोटे कारखानों में बनते हैं। कार की कंपनियाँ उन्हें खरीदकर, उन भागों को जोड़कर कार बनाती हैं, तैयार मोटरकार हम शो-रूम में से खरीदते हैं। इस प्रकार हमारे आसपास अनेक वस्तुएँ बनाकर उनका क्रय-विक्रय होता है। जिनसे हम अनजान होते हैं।

बाजार में समानता

हमने अपने आसपास के बाजार के विषय में जाना। कारखाने या खेत में उत्पादित मालसामान को बेचनेवाले और अंत में उसे खरीदनेवाले ग्राहकों के बीच सभी व्यापारी हैं। हमने साप्ताहिक बाजार से मोल तक की दुकानों और दुकानदारों की जानकारी प्राप्त की। इन दोनों दुकानदारों के बीच एक बड़ा अंतर है। एक कम पैसों से खुला व्यापार करनेवाला छोटा दुकानदार है और दूसरा अपने मोल या कॉम्प्लेक्स में अधिक पूँजी निवेश करनेवाला बड़ा दुकानदार है। छोटे दुकानदार बहुत कम लाभ पाते हैं, जबकि बड़े दुकानदार खूब लाभ प्राप्त करते हैं। ऐसे अनेक लोग हैं जो सस्ता मिलनेवाले माल-सामान भी नहीं खरीद सकते। जबकि कई ऐसे लोग भी होते हैं जो मोल में मिलती महँगी वस्तुओं की खरीदी करते हैं। इस प्रकार हमारी आर्थिक स्थिति के आधार पर हम किस बाजार के क्रेता या विक्रेता बनेंगे यह निश्चित होता है।

ग्राहक के रूप में हम अपने आसपास कई बार बड़ी उम्र के लोगों को छोटी-बड़ी वस्तुएँ बेचते देखते हैं। ऐसे बुजुर्ग पुरुष या महिला की उम्र आराम करने की होने के उपरांत वे गरीबी या मजबूरी के कारण मार्गों के आसपास वस्तुओं की बिक्री करते पाए जाते हैं। ऐसे में हमें दुकान या मोल से वस्तुएँ खरीदने की बजाय ऐसे जरूरतमंद व्यक्तियों से वस्तुएँ खरीदकर उन्हें सहायक बनना चाहिए।

बाजार में ग्राहक

‘ग्राहक अर्थात् जो मूल्य देकर अपने उपयोग के लिए चीजवस्तुएँ खरीदे अथवा सेवा प्राप्त करे वह व्यक्ति।’ आज प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप में ग्राहक है। उदाहरण के रूप में साबुन, तेल, बिस्कुट, अनाज या अन्य वस्तु की खरीदी अथवा मोबाइल फोन रीचार्ज, बीमा, ट्रेन टिकिट बुकिंग आदि सेवा जो प्राप्त करते हैं, वे ग्राहक की व्याख्या में आते हैं। विश्व में सबसे अधिक ग्राहक भारत में हैं। भारत विश्व का सबसे बड़ा बाजार माना जाता है। ग्राहक अपनी दैनिक जीवन उपयोगी और मौज-शौक की वस्तुएँ बाजार से खरीदते हैं। ग्राहक के रूप में उन्हें वस्तु की गुणवत्ता, कीमत, वस्तु की पसंदगी और पैसे का पूरा बदला प्राप्त करने का अधिकार है।

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प्रमाणित चीजवस्तु का चिह्न (लोगो)

ग्राहकों को अच्छी गुणवत्तावाली वस्तुएँ मिलती रहें, इसके लिए सरकार ने विविध वस्तुओं के मापदण्ड निश्चित किए हैं। विशेष चिह्न(मार्क)वाली वस्तुओं की बिक्री की जाती है। गृह उपयोग की और बिजली से चलनेवाली वस्तुओं के लिए ‘आई.एस.आई. – ISI’, सोने-चाँदी के लिए ‘होलमार्क’, ऊन की बनावट के लिए ‘वुलमार्क’, खाद्यपदार्थ के लिए ‘एगमार्क’ तथा ‘एफ.एस.एस.ए.आई-FSSAI’ आदि चिह्न लगाए जाते हैं। जिसके आधार पर ग्राहक अच्छी गुणवत्तावाली वस्तुएँ खरीद सकते हैं।

इसी तरह शाकाहारी खाद्यसामग्री परClass 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 7 निशानी और मांसाहारी खाद्यसामग्री पर Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 8 चिह्न लगाया जाता है।

ग्राहक के अधिकार और कर्तव्य

बाजार में समान लक्षणोंवाली अनेक ब्रांड की असंख्य वस्तुएँ मिलती हैं। ग्राहक को उनकी सम्पूर्ण जानकारी या ज्ञान नहीं होता है। उत्पादक और ग्राहकों के बीच अनेक बिचौलिए होने से ग्राहक का शोषण होने लगा है। ग्राहकों को शोषण से बचाने के लिए ग्राहक सुरक्षा का कानून लागू है। ग्राहक वर्तमान बाजार व्यवस्था के कारण वस्तु की गुणवत्ता, पूर्ति, कीमत और सेवा जैसी प्रत्येक बात में ठगा जाता है। ग्राहक चीज अथवा सेवा के संबंध में अपना अधिकार प्राप्त कर सके ऐसे उद्देश्य के साथ भारत सरकार द्वारा संसद में कानून पास करके ‘ग्राहक सुरक्षा अधिनियम- 1986’ बनाया गया है। इस कानून के आधार पर ग्राहक को निम्नलिखित छः अधिकार मिलते हैं :

  • सुरक्षा का अधिकार : व्यक्ति के जीवन तथा स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक उत्पादों और सेवाओं के संबंध में सम्पूर्ण सुरक्षा का अधिकार अर्थात् आप कोई भी वस्तु या सेवा खरीदते हों, तो उसका उपयोग करने के बाद लम्बे समय में भी आपके स्वास्थ्य या जीवन को कोई नुकसान हो तो आप ग्राहक सुरक्षा कानून के तहत शिकायत कर सकते हैं।
  • सूचना प्राप्त करने का अधिकार : चीजवस्तु या सेवा पसंद करने के लिए वस्तु संबंधी जरूरी सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करना ग्राहक का अधिकार है।पसंदगी करने का अधिकार : विविध प्रकार की अनेक वस्तुओं में से ग्राहक को अपने अनुकूल वस्तु पसंद करने का अधिकार है।
  • प्रस्तुतीकरण का अधिकार : ग्राहक के अधिकार और हितों के रक्षण के लिए ग्राहक सुरक्षा मण्डल में उसकी उचित शिकायत का अधिकार है।
  • शिकायत निवारण का अधिकार : कमीयुक्त माल, क्षतियुक्त सेवा या धोखा-धड़ी की शिकायत से उपभोक्ता को हुए नुकसान का बदला प्राप्त करने का अधिकार है।
  • ग्राहक शिक्षण प्राप्त करने का अधिकार : इस अधिकार से जीवनभर जानकारीयुक्त ग्राहक बनने के लिए सभी जानकारी और ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार है।

ग्राहक के कर्तव्य

  • ग्राहकशिक्षण से ग्राहक धोखाधड़ी से बच सकता है। खरीदी करते समय कुछ बातों के संबंध में सावधानी भी ग्राहक का कर्तव्य बनता है, जो निम्नानुसार है :
  • किसी भी वस्तु को खरीदते समय जी.एस.टी.वाले बिल को लेकर खरीदें तथा उसे लम्बे समय तक संभालकर रखें।
  • बड़ी खरीदी में तथा विशेषकर इलेक्ट्रोनिक्स वस्तुएँ आई.एस.आई. मार्क की ही खरीदनी चाहिए। दुकानदार द्वारा सही-सिक्का किया हुआ गेरन्टी कार्ड, वॉरंटी कार्ड, फ्री सर्विस कूपन आदि ध्यान ध्यान देकर प्राप्त कर लें और संभालकर रखें।
  • सोने-चाँदी जैसी खरीदी में ‘होलमार्क’वाले जेवरात ही खरीदें। व्यापारी की बातों में आकर किसी भी प्रकार के टैक्स बचाने की कोशिश न करें, हमेशा पक्का बिल लें। बिल में शुद्धता, कीमत, घड़ाई आदि सभी सूचनाएँ स्पष्ट और अलग लिखी हुई हैं या नहीं, इसका ध्यान रखें।
  • खाद्य पदार्थ ‘एगमार्क’ ‘fssai’ लोगोवाले ही खरीदने चाहिए। उनकी पैकिंग, कंपनी, ब्रान्डनेम, बैच नम्बर, उत्पादन की तारीख, एक्सपायरी डेट, इनग्रेडियन्ट (समाविष्ट घटक) आदि सभी विगतों को देखना चाहिए और मिलावट के मामलों में अचूक शिकायत करनी चाहिए।
  • दवाएँ प्रिस्क्रिप्शन के साथ खरीदनी चाहिए। उत्पादन की तारीख और एक्सापयरी डेट आदि जाँचनी चाहिए। जेनरिक दवाएँ मिलती हों तो पहले उन्हें खरीदनी चाहिए।
  • कपड़ों में कपड़ा, कलर, सिलाई, जरी, भरत, माप-साइज आदि चेक करके खरीदने चाहिए।
  • पेट्रोल या सी.एन.जी. पंप पर मीटर जीरो होने के बाद ही वाहन में ईंधन भरवाना चाहिए। गैस-वितरण में सिलैण्डर का वजन और सुरक्षा के संबंध में जाँच करनी चाहिए।
  • शैक्षिणक संस्थाओं में सुरक्षा की व्यवस्था, शिक्षकों की योग्यता की जानकारी और फीस भरने के बाद रसीद लेनी चाहिए।
  • जीवन वीमा पॉलिसी या वाहन बीमा के संयोगों में पॉलिसी की शर्ते समझकर असली पॉलिसी का दस्तावेज जरूर प्राप्त कर लें।
  • अनावश्यक और गलत खरीदी से बचें। सेल, भेंटकूपन, इनामी योजना आदि लुभावने विज्ञापनों से बचें और यदि ठगे गए हों, तो समाचारपत्रों द्वारा उसकी जानकारी दूसरों को देनी चाहिए, जिससे वे ठगे जाने से बच सकें।

Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 9

इतना जानिए-

भारत सरकार ने 15 मार्च को ‘विश्व ग्राहक दिवस’ और 24 दिसम्बर को ‘राष्ट्रीय ग्राहक अधिकार दिवस’ के रूप में मनाने का निश्चय किया गया है। ग्राहकों की शिकायतों का तीव्र और बिना खर्च निवारण करने के लिए प्रत्येक जिले, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर ग्राहक सुरक्षा मण्डल और ग्राहक अदालतों की रचना की गई है।
ग्राहक सुरक्षा की शिकायतों के लिए ग्राहक हेल्पलाइन टोल फ्री नं. : 1800 233 0222

उत्पादन से बाजार तक की यात्रा

हमने बाजार, बाजार के प्रकार और अपने आसपास के बाजार के विषय में अध्ययन किया। हमारे आसपास की अनेक प्रक्रियाएँ बाजार व्यवस्था पर प्रभाव डालती हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ खरीदकर बाजार व्यवस्था को चालक बल प्रदान करता है। अब हम शर्ट और पैन्ट बनाने में उपयोग में आनेवाले कपड़े की बात करके बाजार की विशेष जानकारी प्राप्त करेंगे। आप सभी जानते ही हैं कि, कपड़ा बनाने के लिए कपास कच्चा माल है। कपास की बुवाई से शुरू करके शर्ट-पैन्ट की बिक्री तक बाजार की श्रृंखला एक-दूसरे से किस तरह से जुड़ी है, यह जानें। सौराष्ट्र के रामपर गाँव में मगनभाई के पास 5 हेक्टर जमीन है। उसने अपने खेत में खरीफ की फसल की बुवाई बीज करने हेतु कपास के बीज की बिक्री करनेवाली दुकान से कपास के प्रमाणित किए हुए बीज खरीदे। जून महीने में बरसात आए उससे पहले ही हल चलाकर तैयार रखे अपने खेत में कपास की बुवाई कर दी। प्रथम बरसात बोने लायक होने से दो-चार दिनों में जमीन में से कपास के अंकुर फूटकर बाहर आ गए। बरसात के कारण कपास के साथ खर-पतवार भी उग जाते हैं। कपास के पौधे के पास से खर-पतवार दूर करके खेत एकदम खर-पतवार मुक्त कर दिया। खेत में आड़ी-तिरछी मेड़ करके दो-तीन अच्छी बरसात के साथ रासायनिक खाद भी छिड़क दिया। नवरात्रि आने तक तो आपके सिर तक पहुँचे ऐसा कपास खेतों में लहराने लगा। फूल खिलकर उसमें बड़ी-बड़ी गाँठें भी आ गई थी और अब गाँठों में से सफेद कपास बाहर दिखने लगी अर्थात् मगनभाई मजदूरों से यह कपास बिनवाकर बोझ बाँधकर अपने घर में रखने लगे।

Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 10

अंत में मगनभाई उसके खेत में उत्पन्न हुआ कपास बेचने के लिए ट्रैक्टर में भरकर तहसील केन्द्र में स्थित मार्केटिंग यार्ड में ले गए।

Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 11

उनके कपास की व्यापारियों ने बोली लगाई, जिसमें चुनीलाल व्यापारी ने उसका कपास खरीद लिया और मगनभाई को उसका पैसा तुरन्त मिल गया। चुनीलाल ने सारा कपास जीनिंग फैक्ट्री चलानेवाले धनजीभाई के कारखाने को बेच दिया। जीन में इस कपास में से कपास के बीज अलग करके तेल निकालनेवाले व्यापारी को बेच दिया। आप सभी जानते हो कि, कपास का तेल खाद्य तेल के रूप में उपयोग होता है और खोल पशुओं को खिलाने वाले आहार खली के रूप में उपयोगी है। जीनिंग मिल के (कारखाने) मालिक ने कपास की गांठों से धागे बनाने के लिए स्पिनिंग मिल में भेज दिया। इन धागों को अहमदाबाद की एक कपड़े की मिल ने कपड़े बनाने के लिए खरीद लिया। जिनमें से तैयार हुए कपड़े के ताके कलर करती डाइंग मिल में कलर करने के लिए भेज दिए गए। इस कपड़े को वस्त्र बनाती फैक्ट्री में अलग-अलग नाप के कटिंग करके, उसकी सिलाई करके शर्ट और पैन्ट बनाकर, उन्हें लेबल लगाकर बॉक्स में पैक करके विदेश में थोकबंध निर्यात किया गया और बाजार में भी बेचा गया। हमारे शहर के शो रूम के व्यापारी ये पैन्ट-शर्ट शरीद लाते हैं और उनसे हम पैन्ट-शर्ट खरीदते हैं।

कपास में से पैन्ट और शर्ट बनाने तक का सफर हमने देखा। कच्चे माल से तैयार होकर वस्तु कितने सारे लोगों (किसान, उत्पादक, व्यापारी, परिवहन सेवा) से गुजरकर ग्राहक तक पहुँचती है और उसमें जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को थोड़ा-बहुत लाभ मिलता है। हम दैनिक उपयोगी चीज-वस्तुएँ बाजार से प्राप्त करते हैं। यह बाजार कई लोगों को रोजगार देता है। सड़क-मार्ग, परिवहन, बैंकिंग और संचार की सुविधाओं के कारण बाजार व्यवस्था में क्रांति आई है। विश्व के देश परस्पर व्यापार द्वारा जुड़े हैं। हमारे आसपास के बाजार और ऑनलाइन बाजार द्वारा हम वैश्विक बाजार के साथ जुड़े रहते हैं। इस प्रकार वर्तमान समय में समग्र विश्व एक बाजार है।