Class 11 History Solutions Chapter 9 दक्षिण के राज्य

अध्याय का विस्तृत अध्ययन

(विषय-सामग्री की पूर्ण जानकारी के लिए)

प्रश्न 1. शासक वर्ग के सन्दर्भ में बाहमनी राज्य की स्थापना, विकास तथा विघटन के बारे में बताएं।
उत्तर-बाहमनी राज्य दक्षिण भारत का एक महत्त्वपूर्ण राज्य था जिसका संस्थापक हसन गंगू था। इस राज्य की स्थापना 11347 ई० में तुग़लक वंश की कमजोरी का परिणाम था। तत्पश्चात् 1526 ई० तक यह राज्य दक्षिण भारत के राजनीतिक भानचित्र का अभिन्न अंग बना रहा। इस सारी अवधि में इस राज्य पर अठारह शासकों ने राज्य किया। 1422 ई० तक इस राज्य की राजधानी गुलबर्गा रही, परन्तु इसके पश्चात् बीदर को बाहमनी राज्य की राजधानी बनने का श्रेय प्राप्त हुआ।

I. स्थापना एवं विकास-

बहमनी राज्य की स्थापना एवं विकास का अध्ययन निम्नलिखित तीन चरणों में किया जा सकता है
पहला चरण-मुहम्मद तुग़लक के शासन काल में दिल्ली सल्तनत का विघटन आरम्भ हो गया था। प्रान्तीय गवर्नर अपने आप को स्वतन्त्र घोषित करने लगे थे। इसी समय दक्षिण में दौलताबाद के दरबारियों ने ‘इस्माइल मख’ को राजगद्दी पर बिठाया। चूंकि इस्माइल खां अब वृद्ध हो चला था, इसलिए उसने 1347 ई० में हसन गंगू नामक एक नवयुवक तथा शक्तिशाली दरबारी को अपना राज्य सौंप दिया। हसन ने “अलाऊद्दीन बहमन शाह” की उपाधि धारण की और बाहमनी राज्य की नींव रखी। उसने अनेक छोटे-छोटे अभियान किए तथा कोटगीर, मोरण, मोहिन्दर तथा कल्याणी के नगर व दुर्ग अपने अधिकार में लिए। इस प्रकार उत्तर-पूर्व में माहूर तक तथा दक्षिण में तेलंगाना तक का सारा प्रदेश उसके राज्य का अंग बन गया।

तत्पश्चात् उसने वारंगल के एक हिन्दू शासक को पराजित करके कौलास के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। अपने राज्यकाल के अन्तिम वर्षों में उसने कोल्हापुर, गोआ, माण्डू, मालवा आदि प्रदेशों पर विजय प्राप्त की। हसन की मृत्यु के बाद उसने पुत्र मुहम्मद शाह प्रथम ने भी अपने पिता के विजय कार्य को जारी रखा। उसने वारंगल और विजयनगर के हिन्दू शासकों को परास्त किया तथा गोलकुण्डा के प्रदेशों को अपने राज्य का अंग बना लिया। उसके शासन काल में बाहमनी राज्य का विजयनगर राज्य के साथ एक लम्बा संघर्ष आरम्भ हो गया।

विस्तार का दूसरा चरण-मुहम्मद शाह प्रथम की मृत्यु के बाद लगभग 20 वर्षों तक बाहमनी राज्य की सीमाओं में कोई विस्तार न हो सका। तत्पश्चात् 1397 ई० में फिर फिरोजशाह बाहमनी साम्राज्य का शासक बना। उसने एक बार फिर से वारंगल तथा विजयनगर के राज्यों पर आक्रमण किया तथा अपने राज्य का राजामुन्द्री तक विस्तार कर लिया। परन्तु 1420 ई० में यह विजयनगर के शासक देवराय द्वितीय से पराजित हुआ और बाहमनी राज्य के पूर्वी तथा दक्षिणी ज़िले विजयनगर राज्य के अंग बन गए। फिरोजशाह की मृत्यु के बाद अहमदशाह बाहमनी ने गुलबर्गा के स्थान पर बीदर को अपनी राजधानी बनाया। उसने वारंगल के राजा पर आक्रमण करके 1425 ई० में उसके राज्य को अपने साम्राज्य में मिला लिया। उसने विजयनगर के बुक्का तृतीय से भी नज़राना प्राप्त किया।

तीसरा चरण तथा सबसे बड़ी सीमाएं-अहमदशाह के पश्चात् अलाऊद्दीन द्वितीय बाहमनी राज्य का शासक बना। उसकी गुजरात तथा मालवा के शासकों से टक्कर हुई। उसने विजयनगर राज्य से मिलने वाला वार्षिक कर भी वसूल किया। उसकी एक अन्य सफलता कोंकण प्रदेश की विजय थी। भले ही उसने कोंकण प्रदेश के कुछ ही भागों को विजय किया था, परन्तु उसके एक उत्तराधिकारी मुहम्मदशाह तृतीय ने यह सारे का सारा प्रदेश बाहमनी राज्य में मिला लिया। मुहम्मदशाह तृतीय ने अपने योग्य प्रधानमन्त्री महमूद गवां की सहायता से वारंगल के पूर्व में स्थित राजामुन्द्री के प्रदेश पर भी विजय प्राप्त की। इस प्रकार 15वीं शताब्दी के अन्त तक बाहमनी राज्य की सीमाएं समुद्र के एक किनारे से दूसरे किनारे तक ताप्ती नदी के ऊपरी प्रदेश से लेकर तुंगभद्रा नदी तक फैल गईं। यही इस राज्य की सबसे बड़ी सीमाएं थीं।

II. बाहमनी राज्य का विघटन

बाहमनी राज्य का पतन महमूदशाह के समय में आरम्भ हुआ। वह बड़ा ही ऐश्वर्य प्रिय राजा था तथा सदा सुरा तथा सुन्दरी के चक्कर में पड़ा रहता था। शासन-कार्यों में उसकी कोई रुचि न थी। अतः शासन की वास्तविक शक्ति उसके मन्त्री बरीद के हाथों में रही। सुल्तान अपने 36 वर्ष (1482 ई० से 1518 ई०) के लम्बे शासन काल में विद्रोहों में उलझे रहने के अतिरिक्त कुछ न कर सका। सारे साम्राज्य में अव्यवस्था फैल गई। प्रान्तीय गवर्नरों ने अपने आप को बाहमनी राज्य से स्वतन्त्र घोषित कर दिया। इनमें से सबसे पहले 1490 ई० में अहमदनगर का शासक मलिक अहमद स्वतन्त्र हुआ। उसका अनुसरण करते हुए बीजापुर के तर्फदार यूसुफ़ आदिल खां तथा बरार के तर्फदार फतेह उल्लाह इमादुलमुल्क ने अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी। तत्पश्चात् गोलकुण्डा का राज्य स्वतन्त्र हुआ। बीदर में बरीद के पुत्र ने अपने आप को स्वतन्त्र घोषित करके बरीदुलमुल्क की उपाधि धारण कर ली। इस प्रकार 16वीं शताब्दी के आरम्भ तक बाहमनी राज्य पांच स्वतन्त्र मुस्लिम रियासतों में बंट गया।

पतन के कारण (शासन-प्रबन्ध तथा शासक वर्ग की भूमिका)-बाहमनी राज्य की पतन की प्रक्रिया में यों तो अनेक कारणों का हाथ रहा, परन्तु शासन-प्रबन्ध के गलत संगठन तथा शासक वर्ग के विवेकहीन कार्यों से इस राज्य का पतन बड़ी तीव्रता से होने लगे। बाहमनी शासक अपनी विवेकपूर्ण नीति के कारण शासन को संगठित एवं स्थायी रूप प्रदान करने में असफल रहे। फलस्वरूप अमीरों के आपसी मतभेद काफ़ी बढ़ गए। दूसरे, सुल्तानों ने हिन्दुओं के प्रति असहनशीलता की नीति अपनाई जिससे राज्य की बहुसंख्यक हिन्दू जनता आरम्भ से ही बाहमनी शासकों के विरुद्ध हो गई। बाहमनी शासकों ने देशी अमीरों की अपेक्षा विदेशी अमीरों पर अधिक विश्वास किया। अतः उन्होंने यहां अनेक विदेशी अमीरों को भर्ती कर लिया। फलस्वरूप एक तो देशी और विदेशी अमीरों में आपसी शत्रुता पैदा हो गई। दूसरे, महमूद गवां को छोड़कर अन्य किसी भी अमीर ने राजभक्ति न दिखाई। अतः बाहमनी सुल्तानों को न तो देशी अमीरों का ही साथ मिल सका और न ही विदेशी अमीरों का। यह बात भी बाहमनी शासकों की असफलता का कारण बनी और बाहमनी राज्य का पतन तीव्रता से होने लगा।

प्रश्न 2. राज्य प्रबन्ध के सन्दर्भ में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना, विकास तथा पतन की चर्चा करें।
उत्तर-विजयनगर का राज्य कृष्णा और कावेरी नदियों के मध्य स्थित था। इस राज्य की नींव संगम वंश के दो भाइयों हरिहर तथा बक्का राय ने रखी। इस राज्य की स्थापना के विषय में दो किंवदन्तियां प्रचलित हैं। पहली किंवदन्ती के अनुसार मुहम्मद तुग़लक ने 1323 ई० में जब वारंगल पर आक्रमण किया तो वह वहाँ से हरिहर तथा बुक्का राय नामक दो भाइयों को बन्दी बना कर अपने साथ दिल्ली ले गया।

ये दोनों भाई वारंगल के शासक प्रताप रुद्रदेव तृतीय के यहां नौकरी करते थे। मुहम्मद तुग़लक ने दक्षिण के विद्रोही राज्यों में कई गर्वनर भेजे। यह बात वहां के हिन्दुओं से सहन न हुई। उन्होंने मुस्लिम साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। स्थिति पर नियन्त्रण पाने के लिए मुहम्मद तुग़लक ने हरिहर तथा बुक्का को दक्षिण में भेजा। उन्होंने रायचूर दोआब में फैली अराजकता का दमन करके शान्ति की स्थापना की। इस कार्य में उनकी सहायता उस समय के प्रकाण्ड पण्डित विद्यारण्य (Vidyaranya) ने की। अपने इसी गुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए उन्होंने तुंगभद्रा नदी के दक्षिणी किनारे पर एक नगर की स्थापना की तथा उसका नाम विद्यानगर अथवा ‘विजयनगर’ रखा। मुहम्मद तुग़लक के शासन के उत्तरार्द्ध (later half) में दिल्ली सल्तनत का पतन आरम्भ हो गया। दक्षिण राज्यों के मुसलमान गवर्नरों ने दिल्ली के सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह शुरू कर दिया। अवसर का लाभ उठा कर इन दोनों भाइयों ने भी अपने आपको स्वतन्त्र घोषित कर दिया। __ इनके द्वारा स्थापित विद्यानगर आगे चलकर एक विशाल साम्राज्य की राजधानी बनी जो विजयनगर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

विजयनगर साम्राज्य तीन शताब्दियों से भी अधिक समय तक स्थापित रहा। इस समय में इस साम्राज्य पर चार राजवंशों ने शासन किया-

  1. संगम वंश, 1336-1485 ई०
  2. सल्लुव वंश, 1485-1505 ई०
  3. तल्लुव वंश, 1505-1570 ई० तक
  4. अरवीदु वंश, 1570-1674 ई०।

साम्राज्य का विकास एवं विघटन-

संगम वंश का प्रथम शासक हरिहर (1336-1357 ई०) था। उसने अपनी शक्ति दृढ़ करने के लिए विजयनगर में एक विशाल दुर्ग का निर्माण करवाया तथा सभी महत्त्वपूर्ण सैनिक स्थानों की किलेबन्दी की। हरिहर की मृत्यु के पश्चात् उसका भाई बुक्का (1357-1377 ई०) विजयनगर का शासक बना। उसने पड़ोसी राज्यों से युद्ध करके अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। उसका अधिकांश समय बाहमनी सुल्तान से युद्ध करने में ही व्यतीत हुआ। बुक्का की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र हरिहर द्वितीय (1377-1404 ई०) विजयनगर राज्य का प्रथम स्वतन्त्र शासक बना जिसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। अपने शासन काल में उसने केरल, त्रिचनापल्ली तथा कांची हिन्दू राज्यों पर विजय पाकर विजयनगर राज्य का विस्तार किया। इस राजवंश का एक अन्य प्रसिद्ध शासक देवराज प्रथम (1406-1422 ई०) था। 1420 ई० में उसने बाहमनी शासक फिरोज़ को पराजित किया। देवराज द्वितीय संगम वंश का एक महान् शासक था। उसने रायचूर दोआब पर विजय प्राप्त की और राजामुन्द्री के सामन्तों को पराजित किया। इस प्रकार विजयनगर साम्राज्य कन्याकुमारी से लेकर कृष्णा नदी तक तथा दक्षिणी उड़ीसा से मलाबार तट तक फैल गया। देवराय द्वितीय के उत्तराधिकारियों के समय में विजयनगर साम्राज्य के बाहमनी शासकों ने बड़ी क्षति पहुंचाई।

विजयनगर साम्राज्य का दूसरा राजवंश सल्लुव वंश था। इसकी नींव नरसिंह वर्धन ने रखी थी। उसने संगम वंश के अन्तिम शासक वीरुपक्ष को गद्दी से उतार कर स्वयं को विजयनगर का शासक घोषित किया तथा विजयनगर में सल्लुव वंश की स्थापना की। नरसिंह वर्धन ने केवल छः वर्ष तक शासन किया। वह बड़ा वीर तथा योग्य शासक था। उसने उड़ीसा के कुछ भाग पर अधिकार करके अपने राज्य की सीमा का विस्तार किया। नरसिंह वर्धन की मृत्यु के पश्चात् उसका अयोग्य पुत्र शासन की बागडोर अधिक देर तक न सम्भाल सका।

शेष भाग पर 1570 ई० में रामराय के भाई तिरुमल ने अपना अधिकार करके वहां अरवीदु वंश की नींव रखी। यह वंश लगभग 1674 ई० तक सत्तारूढ़ रहा। इस वंश के लगभग सभी शासक अयोग्य तथा दुर्बल सिद्ध हुए। वे अपने राज्य की सीमाओं की रक्षा करने में असफल रहे। उनकी दुर्बलता का लाभ उठाकर धीरे-धीरे सभी प्रान्तीय गवर्नर स्वतन्त्र होते गए। कुछ प्रदेश बीजापुर और गोलकुण्डा के राज्यों ने अपने अधिकार में ले लिए। अरवीदु वंश का अन्तिम शासक इंग तृतीय तो बिल्कुल ही निर्बल सिद्ध हुआ। उसके शासनकाल में राज्य का उत्तरी भाग मुसलमानों ने हथिया लिया और दक्षिणी भाग के बचे-खुचे प्रदेशों में नायकों ने अपने स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिए। इस प्रकार 1674 ई० तक विजयनगर राज्य का अस्तित्व ही मिट गया।

पतन के कारण-(1) इस राज्य की सारी शक्ति राजा के हाथ में थी। शासन में प्रजा का कोई योगदान नहीं था। इसलिए संकट के समय प्रजा ने अपने राजा का साथ न दिया। (2) इस राज्य में सिंहासन प्राप्ति के लिए प्रायः गृह युद्ध चलते रहते थे। इन युद्धों ने राज्य की शक्ति नष्ट कर दी। (3) कृष्णदेव राय के पश्चात् इस राज्य के सभी शासक निर्बल थे। (4) विजयनगर के शासकों को बाहमनी राजवंश के साथ युद्ध करने पड़े। इन युद्धों में विजयनगर राज्य की शक्ति को बड़ी क्षति पहुंची। (5) तालीकोटा की लड़ाई में विजयनगर का शासक मारा गया। इस लड़ाई के तुरन्त पश्चात् इस राज्य का पूरी तरह पतन हो गया।

शासन (राज्य) प्रबन्ध-

विजयनगर के केन्द्रीय शासन का मुखिया सम्राट् था। उसके पास असीम शक्तियां तथा अधिकार थे। अपनी सहायता के लिए उसने एक मन्त्रिपरिषद् की व्यवस्था की हुई थी। इसमें मन्त्री, पुरोहित, सेनापति आदि सम्मिलित थे। इनकी नियुक्ति सम्राट् स्वयं करता था। उसका सारा राज्य लगभग 200 प्रान्तों में बंटा हुआ था। प्रत्येक प्रान्त का शासन प्रबन्ध एक प्रान्तपति के हाथ में होता था। ये प्रान्तपति या तो राज घराने से सम्बन्धित होते थे या फिर कोई शक्तिशाली अमीर होते थे। प्रत्येक प्रान्त को जिलों में बांटा गया था। इन्हें नाडू तथा कोट्टम कहा जाता था। जिले परगनों में तथा परगने गांवों में बंटे होते थे। गांव का शासन प्रबन्ध ग्राम पंचायतों को सौंपा हुआ था। इन सभी संस्थाओं के प्रमुख अधिकारी को आयगर कहा जाता था। गांवों में आयगर तथा प्रान्तों में प्रान्तपति अथवा सूबेदार न्याय कार्य करते थे। परन्तु न्याय का मुख्य अधिकारी स्वयं सम्राट् था। दण्ड बड़े कठोर थे। घोर अपराधों के लिए अंग-भंग का दण्ड दिया जाता था, परन्तु साधारण अपराधों पर जुर्माना किया जाता था। राज्य की आय का मुख्य साधन भूमि कर था। किसानों की उपज का 1/6 से 1/4 भाग भूमि कर के रूप में भूमिपति को देना पड़ता था। विजयनगर राज्य के शासकों के पास एक शक्तिशाली सेना भी थी।

प्रश्न 3. विजयनगर तथा बाहमनी साम्राज्यों के प्रशासन काल तथा भवन निर्माण पर लेख लिखें।
उत्तर-विजयनगर तथा बाहमनी दोनों ही साम्राज्य 14वीं शताब्दी से लेकर 16वीं शताब्दी तक दक्षिण भारत के महत्त्वपूर्ण राज्य थे। विजयनगर एक हिन्दू राज्य था परन्तु बाहमनी एक मुस्लिम राज्य था। इन साम्राज्यों के प्रशासन, कला तथा भवन निर्माण का अलग-अलग वर्णन इस प्रकार है

I. विजयनगर साम्राज्य-

1. प्रशासन-विजयनगर के केन्द्रीय शासन का मुखिया सम्राट होता था। शासन की सभी शक्तियां उसके हाथ में होती थीं। राजा की सहायता के लिए मन्त्रिपरिषद् की व्यवस्था भी की हुई थी। विजयनगर राज्य 200 से भी अधिक प्रान्तों में बंटा हुआ था। प्रान्त के मुखिया को प्रान्तपति अथवा नायक कहा जाता था। ये प्रान्तपति या तो राज घराने से सम्बन्ध रखते थे या फिर कोई शक्तिशाली अमीर होते थे। शासन की सुविधा के लिए प्रत्येक प्रान्त को जिलों में बांटा गया था। जिले आगे परगनों में तथा परगने गांवों में बंटे होते थे। राज्य की सुरक्षा के लिए एक शक्तिशाली सेना की व्यवस्था थी। सेना में हाथी, घोड़े तथा पैदल सैनिक होते थे। राज्य का मुख्य न्यायाधीश स्वयं राजा होता था। प्रान्तों में प्रान्तपति अथवा सूबेदार न्याय करते थे। दण्ड बहुत कठोर थे। भूमिकर राज्य की आय का मुख्य साधन था।

2. कला तथा भवन-निर्माण-विजयनगर के शासक बड़े ही कला-प्रेमी थे। उन्होंने मूर्तिकला और भवन निर्माण को विशेष रूप से संरक्षण प्रदान किया। चोल राज्य की भान्ति विजयनगर के मूर्तिकाल भी कांसे की मूर्तियां ढालने में बड़े निपुग थे। राजा कृष्णदेव राय का कांसे का बुत विजयनगर राज्य की मूर्तिकला का सबसे सुन्दर नमूना था। विजयनगर राज्य की भवन निर्माण की झलक हमें उनके बनवाए गए दुर्गों, भव्य महलों और सुन्दर मन्दिरों में दिखाई देती है। यहां के शासकों ने अनेक प्राचीन मन्दिरों को विशाल रूप दिया और कई नए मन्दिरों का निर्माण करवाया। उनके द्वारा बनवाए गए मन्दिर केवल विजयनगर तक ही सीमित नहीं हैं। ये तुंगभद्रा नदी के दक्षिण के सारे प्रदेशों में बने हुए हैं। इन मन्दिरों के उत्कृष्ट नमूने वैलोर, कांचीपुरम तथा श्रीरंगपट्टम में देखे जा सकते हैं। कृष्णदेव राय ने विजयनगर के निकट एक बहुत बड़ा तालाब भी खुदवाया जो सिंचाई के काम आता था।

II. बाहमनी साम्राज्य-

1. प्रशासन-बाहमनी शासकों ने जहां अपने राज्य का विस्तार किया वहां अपने राज्य में एक कुशल शासन प्रणाली स्थापित करने का भी प्रयास किया। इस क्षेत्र में गुलबर्गा से शासन करने वाले बाहमनी शासकों ने विशेष प्रयत्न किए। दूसरी ओर बीदर से शासन करने वाले बाहमनी शासकों ने केवल महमूद गवां की सहायता से ही कुछ आवश्यक सुधार किए। बाहमनी शासकों की सामूहिक शासन-व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार है-

(i) सुल्तान-बाहमनी वंश के प्रथम शासक अलाऊद्दीन बाहमनशाह ने गुलबर्गा को अपनी राजधानी बनाते समय केन्द्रीय सरकार की स्थापना की। केन्द्रीय सरकार का मुखिया सुल्तान था। वह राज्य की सारी शक्तियों को स्रोत था। उसके अधिकार काफ़ी विस्तृत थे। वह राज्य का मुख्य न्यायाधीश था और सेना का मुख्य सेनापति भी था। वास्तव में सुल्तान पूर्ण रूप से निरंकुश था और स्वयं को पृथ्वी पर ईश्वर की छाया मानता था।

(ii) मन्त्री-सुल्तान को शासन कार्यों में परामर्श तथा सहयोग देने के लिए कुछ मन्त्री होते थे। इन मन्त्रियों की संख्या
आठ थी। प्रधानमन्त्री को ‘वकील-उल-सत्तनत’ कहते थे। राज्य के सभी आदेश वही जारी करता था। प्रत्येक सरकारी पत्र पर भी उसकी मोहर होनी आवश्यक थी। न्याय विभाग का मन्त्री ‘सदर-ए-जहां’ कहलाता था। वह धर्मार्थ विभाग का भी अध्यक्ष था। मन्त्री अपने सभी कार्य सुल्तान की आज्ञा से करते थे और अपने कार्यों के लिए उसी के प्रति उत्तरदायी होते थे। इन आठ मन्त्रियों के अतिरिक्त कुछ निम्न स्तर के मन्त्री भी थे जिनमें कोतवाल तथा नाज़िर प्रमुख थे।

(iii) प्रान्तीय शासन-बाहमनी सुल्तानों के शासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए राज्य को भागों तथा उपभागों में विभक्त किया हुआ था। शासन की प्रमुख इकाई प्रान्त अथवा ‘तरफ’ थी। ‘तरफ’ को आगे चलकर सरकारों तथा परगनों में बांटा गया था । प्रत्येक परगने में कुछ गांव सम्मिलित होते थे। प्रारम्भ में बाहमनी राज्य चार तरफों में विभक्त था-गुलबर्गा, दौलताबाद, बरार तथा बीदर। कालान्तर में राज्य विस्तार हो जाने के कारण प्रान्तों की संख्या आठ हो गई। तरफ का मुखिया तरफदार कहलाता था। वह अनेक कार्य करता था। प्रान्त में राजस्व कर एकत्रित करवाना, सैनिक भर्ती करना, सेना का नेतृत्व करना आदि उसके प्रमुख कार्य थे। वह पूर्ण रूप से सुल्तान के अधीन था और सभी कार्य उसी की आज्ञा से करता था। उसके कार्यों का निरीक्षण करने के लिए सुल्तान स्वयं भी समय-समय पर तरफों का दौरा किया करता था। परगनों का शासन प्रबन्ध चलाने के लिए भी कई कर्मचारी नियुक्त थे। वे भी अपने सभी कार्य सुल्तान के आदेश द्वारा करते थे।

2. कला तथा भवन-निर्माण-बाहमनी शासकों ने चित्रकला तथा भवन निर्माण कला के विकास में बड़ी ही योगदान दिया। इस समय की चित्रकारी के सर्वोत्तम नमूने अलाऊद्दीन द्वितीय द्वारा बनवाए गए अहमदशाह के मकबरे की छत और दीवारों पर मिलते हैं। यह चित्रकारी फूलदार है और बड़ी सजीव तथा आकर्षक लगती है। बाहमनी राज्य की भवन निर्माण कला के मुख्य केन्द्र गुलबर्गा तथा बीदर हैं। इन स्थानों पर अनेक आकर्षक मस्जिदें, मकबरे, मदरसे तथा महल मिलते हैं। इनमें से कुछ भवनों को निर्माण में पुरानी शैली का अनुसरण किया गया है। परन्तु कुछ इमारतें फारसी शैली में बनाई गई हैं। गुलबर्गा में फिरोजशाह का मकबरा बाहमनी राज्य की भवन निर्माण कला का एक सुन्दर नमूना है।

महत्त्वपूर्ण परीक्षा-शैली प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. उत्तर एक शब्द से एक वाक्य में

प्रश्न 1. बाहमनी शासकों में सबसे महान् शासक किसे माना जाता है?
उत्तर-फिरोजशाह को।

प्रश्न 2. विजयनगर राज्य की स्थापना करने वाले दो भाइयों के नाम बताओ।
उत्तर-हरिहर तथा बुक्का।

प्रश्न 3. विजयनगर राज्य की स्थापना कब हुई?
उत्तर-विजयनगर राज्य की स्थापना 1336 ई० में हुई।

प्रश्न 4. विजयनगर के दो प्रतापी राजाओं के नाम बताओ।
उत्तर-कृष्णदेव राय तथा हरिहार द्वितीय।

प्रश्न 5. किस युद्ध के परिणामस्वरूप विजयनगर सामाज्य का विघटन हुआ?
उत्तर-तालिकोट का युद्ध।

प्रश्न 6. बाहमनी साम्राज्य राज्य की स्थापना किसने तथा कब की?
उत्तर-बाहमनी साम्राज्य की स्थापना हसन गंगू ने 1347 ई० में की।

प्रश्न 7. बाहमनी साम्राज्य के दो शासकों के नाम बताओ।
उत्तर-मुहम्मद शाह द्वितीय (1387 से 1397 ई०) अहमद शाह (1422 से 1435 ई०)।

प्रश्न 8. बाहमनी साम्राज्य का सबसे योग्य प्रधानमन्त्री कौन था?
उत्तर-बाहमनी साम्राज्य का सबसे योग्य प्रधान मन्त्री महमूद गावाँ था।

2. रिक्त स्थानों की पूर्ति-

(i) महमूद गावाँ………..देश से आया था।
(ii) बाहमनी राज्य की दो राजधानियां गुलबर्गा तथा…………..
(iii) तालिकोट का युद्ध………..ई० में हुआ था।
(iv) अरविंदु वंश का सम्बन्ध……….राज्य से था।
(v) दक्षिण में सामंतों को…………..कहते थे।
उत्तर-
(i) ईरान
(ii) बीदर
(iii) 1565
(iv) विजय नगर
(v) नायक।

3. सही/ग़लत कथन

(i) कृष्णदेव राय बाहमनी वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था।(✗)
(ii) विजयनगर के शासक बड़े कला प्रेमी थे। ( ✓ )
(iii) गुलबर्गा में फ़िरोज़शाह का मकमरा बाहमनी वंश की देन है। ( ✓ )
(iv) गोलकुण्डा के कुतुबशाही शासकों द्वारा बनाई गई प्रसिद्ध इमारत हैदराबाद स्थित चार मीनार है।( ✓ )
(v) महमूद गावाँ विजयनगर के शासक देवराय का प्रधानमन्त्री था। (✗)

4. बहु-विकल्पीय प्रश्न-

(i) गोल गुम्बज स्थित है-
(A) हैदराबाद में
(B) बीजापुर में
(C) बीकानेर में
(D) जयपुर में।
उत्तर-(B) बीजापुर में

(ii) विजयनगर राज्य में प्रचलित कुप्रथा थी
(A) सती प्रथा
(B) वेश्यावृत्ति
(C) पशु बलि
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-(D) उपरोक्त सभी।

(iii) विजयनगर राज्य का राजवंश नहीं था
(A) संगम
(B) सल्लु व
(C) पल्लव
(D) तल्लु व।
उत्तर-(C) पल्लव

(iv) ‘गोल गुम्बज’ मकबरा है
(A) आदिलशाह का
(B) शेरशाह सूरी का
(C) कुतुबशाह का
(D) हुसैन बेग का।
उत्तर-(A) आदिलशाह का

(v) विजयनगर राज्य में सिक्के प्रचलित थे
(A) ताँबे के
(B) सोने-चाँदी के
(C) पीतल के
(D) इस्पात के।
उत्तर-(B) सोने-चाँदी के

II. अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1. 13वीं सदी में दक्षिण के चार प्रमुख राजवंशों के नाम बताएं।
उत्तर-13वीं सदी में दक्षिण के चार प्रमुख राजवंश थे-देवगिरि के यादव, वारंगल के काकतीय, द्वारसमुद्र के होयसाल ल तथा मदुरई के पाण्डेय।

प्रश्न 2. देवगिरि के राजवंश के दो शासकों के नाम बताएं।
उत्तर-देवगिरि पर यादव वंश का राज्य था। इस वंश के दो शासक थे-रामदेव तथा हरपाल देव।

प्रश्न 3. ग्यासुद्दीन तुग़लक के समय वारंगल तथा द्वारसमुद्र के शासकों के नाम बताएं।
उत्तर- ग्यासुद्दीन तुग़लक के समय वारंगल का शासक प्रताप रुद्र द्वितीय तथा द्वारसमुद्र का शासक बल्लाल तृतीय था।

प्रश्न 4. कम्पिली की स्थापना किसने और किस नदी के इर्द-गिर्द के क्षेत्र में की थी ?
उत्तर-कम्पिली की स्थापना कम्पिल देव ने की थी। इसकी स्थापना तुंगभद्रा नदी के इर्द-गिर्द के क्षेत्र में की गई थी।

प्रश्न 5. मुहम्मद-बिन-तुग़लक के समय में दक्षिण में स्वतन्त्र होने वाले दो राज्यों तथा उनके संस्थापकों के नाम बताएं।
उत्तर-मुहम्मद-बिन-तुग़लक के समय में दक्षिण में स्वतन्त्र होने वाले दो राज्य थे- विजयनगर तथा बाहमनी राज्य। विजयनगर राज्य के संस्थापक हरिहर तथा बुक्का और बाहमनी राज्य का संस्थापक हसन गंगू था।

प्रश्न 6. दौलताबाद के अधिकारियों के गिरोह को क्या कहा जाता था और उन्होंने किस वर्ष में एक स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की ?
उत्तर-दौलताबाद के अधिकारियों के गिरोह का नाम ‘अमीरान-ए-सदाह’ था। उन्होंने 1347 ई० में स्वतन्त्र राज्य स्थापित किया।

प्रश्न 7. बाहमनी साम्राज्य की दो राजधानियों के नाम बताएं।
उत्तर-बाहमनी साम्राज्य की दो राजधानियों के नाम क्रमश: गुलबर्गा तथा बीदर थे।

प्रश्न 8. लम्बे समय तक राज्य करने वाले किन्हीं चार बाहमनी सुल्तानों के नाम बताएं। …
उत्तर-लम्बे समय तक राज्य करने वाले चार बाहमनी सुल्तान मुहम्मद प्रथम (1358-77 ई०), मुहम्मद द्वितीय (137897 ई०), फिरोज़शाह (1397-1422 ई) तथा अहमदशाह (1422-35 ई०) थे।

प्रश्न 9. बाहमनी सल्तनत के सबसे योग्य मन्त्री का नाम क्या था और वह किस देश से आया था ?
उत्तर-बाहमनी सल्तनत का सबसे योग्य मन्त्री ‘महमूद गवाँ’ था। वह ईरान से आया था।

प्रश्न 10. बाहमनी सल्तनत के प्रशासनिक भागों तथा उसके प्रशासकों को क्या कहा जाता था ?
उत्तर-बाहमनी सल्तनत के प्रशासनिक भागों को ‘तरफ’ तथा इसके प्रशासकों के ‘तरफदार’ कहा जाता था।

प्रश्न 11. बाहमनी सल्तनत में शासक वर्ग कौन-से दो गुटों में बंट गए थे ?
उत्तर-बाहमनी सल्तनत में शासक वर्ग ‘विदेशी अमीर’ तथा ‘दक्कनी अमीर’ नामक दो गुटों में बंट गए थे।

प्रश्न 12. महमूद शाह के शासन काल में बाहमनी साम्राज्य जिन पांच राज्यों में बंट गया, उनके नाम बताएं।
उत्तर-महमूद शाह के शासनकाल में बाहमनी साम्राज्य बीजापुर, गोलकुण्डा, अहमदनगर, बरार तथा बीदर नामक राज्यों में बंट गया।

प्रश्न 13. बाहमनी साम्राज्य के उत्तराधिकारी सल्तनतों के संस्थापकों के नाम बताएं।
उत्तर-बाहमनी साम्राज्य के उत्तराधिकारी सल्तनतों के संस्थापक थे-मलिक अहमद (अहमद नगर), आदिल खां (बीजापुर), फतहउल्ला इमाद-उल-मुल्क (बरार), कुतुब-उल-मुल्क (गोलकुण्डा) तथा कासिम बरीद (बीदर)।

प्रश्न 14. दक्कन की पांच सल्तनतों में से दो सबसे शक्तिशाली तथा दो सबसे छोटे राज्यों के नाम बताएं।
उत्तर-दक्कन की पाँच सल्तनतों में से दो सबसे शक्तिशाली सल्तनतें ‘बीजापुर’ तथा ‘गोलकुण्डा’ थीं। इनमें से दो सबसे छोटे राज्य ‘बरार’ और ‘बीदर’ थे।

प्रश्न 15. बरार तथा बीदर को किन वर्षों में दक्कन की कौन-सी अन्य दो सल्तनतों ने हड़प लिया ?
उत्तर-1574 ई० में अहमद नगर के सुल्तान ने बरार को अपने अधिकार में ले लिया तथा 1619 ई० में बीजापुर के सुल्तान ने बीदर को हड़प लिया।

प्रश्न 16. औरंगजेब ने किन वर्षों में दक्कन की कौन-सी दो सल्तनतों को मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया ?
उत्तर-औरंगज़ेब ने 1686-87 में दक्षिण की बीजापुर और गोलकुण्डा रियासतों को मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया।

प्रश्न 17. दक्षिण में ‘सामन्तों’ तथा ‘चौधरियों’ के स्थान पर किन नामों का प्रयोग किया जाता था ?
उत्तर-दक्षिण में सामन्तों को ‘नायक’ तथा चौधरियों को ‘देशमुख’ और ‘देसाई’ कहा जाता था।

प्रश्न 18. कौन-से दो नगर बाहमनी भवन निर्माण कला के केन्द्र थे ?
उत्तर-गुलबर्गा और बीदर बाहमनी भवन निर्माण कला के केन्द्र थे ।

प्रश्न 19. बाहमनी सल्तनत के भवनों में किन चार प्रकार के नमूने मिलते हैं ?
उत्तर-बाहमनी सल्तनत के भवनों में पुरानी मस्जिदों, मकबरों, मदरसों और महलों के नमूने मिलते हैं।

प्रश्न 20. गोल गुम्बज कहां हैं और यह कौन-से सुल्तान का मकबरा है तथा यह कितने क्षेत्र में फैला हुआ है ?
उत्तर-गोल गुम्बज बीजापुर में है। यह आदिलशाह का मकबरा है जो 2000 वर्ग गज़ के क्षेत्र में फैला हुआ है।

प्रश्न 21. कुतुबशाही सुल्तानों ने कौन-से चार प्रकार के भवन बनवाए तथा उनके द्वारा बनवाई गई हैदराबाद की सबसे शानदार इमारत कौन-सी है ?
उत्तर-कुतुबशाही सुल्तानों ने किले, महल, पुस्तकालय और मस्जिदें बनवाई। उनके द्वारा बनवाई गई हैदराबाद की शानदार इमारत ‘चारमीनार’ है।।

प्रश्न 22. विजयनगर साम्राज्य के चार राजवंशों के नाम बताएं।
उत्तर-विजयनगर साम्राज्य के चार राजवंश थे-‘संगम’, ‘सल्लुव’, ‘तल्लुव’ तथा ‘अरविंदु’।

प्रश्न 23. विजयनगर शहर किस नदी के किनारे बसाया गया तथा उसका संस्थापक कौन था ?
उत्तर-विजयनगर शहर तुंगभद्रा नदी के किनारे बसाया गया। इसके संस्थापक हरिहर और बुक्का नामक दो भाई थे।

प्रश्न 24. विजयनगर साम्राज्य के विस्तार तथा उन्नति से सम्बन्धित दो राजवंशों के नाम बताएं।
उत्तर-विजयनगर साम्राज्य के विस्तार तथा उन्नति से सम्बन्धित दो राजवंश हैं-‘संगम वंश’ तथा ‘सल्लव वंश’ ।

प्रश्न 25. विजयनगर के पहले राजवंश के चार सबसे योग्य शासकों के नाम बताएं।
उत्तर-पहले राजवंश (संगम वंश) के चार योग्य शासक बुक्का (1357-77 ई०), हरिहर द्वितीय (1377-1404 ई०), देवराय (1406-22 ई०) तथा देवराय द्वितीय (1422-46 ई०) थे।

प्रश्न 26. विजयनगर तथा बाहमनी राज्य में झगड़ा मुख्यतः किस प्रदेश के कारण था और यह कौन-सी नदियों के बीच स्थित है ?
उत्तर-विजयनगर तथा बाहमनी राज्यों में झगड़ा मुख्यत: उसके सीमावर्ती रायचूर दोआब पर अधिकार के कारण था। यह प्रदेश कृष्णा तथा तुंगभद्रा नदियों के बीच स्थित है।

प्रश्न 27. विजयनगर साम्राज्य का पुनर्निर्माण तथा पतन किन दो राजवंशों से सम्बन्धित है ?
उत्तर-विजयनगर साम्राज्य का पुनर्निर्माण तथा पतन तल्लुव वंश तथा अरविंदु वंश से सम्बन्धित है।

प्रश्न 28. विजयनगर राज्य का सबसे प्रसिद्ध शासक कौन था और वह कौन-से वंश से था ?
उत्तर-विजयनगर का सबसे प्रसिद्ध शासक कृष्ण देवराय था। वह तल्लुव राजवंश से सम्बन्धित था।

प्रश्न 29. कृष्णदेव राय का राजकाल क्या था और उसने बाहमनी सल्तनत के किन दो नगरों पर अधिकार कर लिया था ?
उत्तर-कृष्णदेव राय का शासनकाल 1509 से 1529 ई० तक था। उसने गुलबर्गा और बीदर पर अपना अधिकार कर लिया था।

प्रश्न 30. तालीकोटा का युद्ध कब और किन के बीच हुआ ? इसमें हारने वाले राज्य का नाम बताएं।
उत्तर-तालीकोटा का युद्ध 1565 ई० में दक्षिण के सुल्तानों के संगठन तथा विजयनगर के शासक सदाशिव राय के बीच हुआ। इसमें विजयनगर की हार हुई।

प्रश्न 31. अरविंदु वंश के राजकाल में कौन-से तीन प्रदेशों के नायक स्वतन्त्र हो गए थे ?
उत्तर-अरविंदु वंश के राजकाल में मदुरई, तंजौर तथा जिंजी प्रदेशों के नायक स्वतन्त्र हो गए थे।

प्रश्न 32. विजयनगर के प्रशासन में सबसे महत्त्वपूर्ण तीन विभाग कौन-से थे ?
उत्तर-विजयनगर के प्रशासन में सबसे महत्त्वपूर्ण तीन विभाग सेना, राजस्व और धर्मार्थ विभाग थे।

प्रश्न 33. विजयनगर साम्राज्य में नायकों की संख्या क्या थी और वे सम्राट् को अधीनता के प्रतीक के रूप में क्या देते थे ?
उत्तर-विजयनगर साम्राज्य में नायकों की संख्या 200 से भी अधिक थी। वे सम्राट् को अधीनता के प्रतीक के रूप में नज़राना तथा युद्ध के समय सैनिक सहायता देते थे।

प्रश्न 34. विजयनगर साम्राज्य में अधिकारियों को वेतन किस रूप में दिया जाता था ?
उत्तर-विजयनगर साम्राज्य में अधिकारियों को वेतन ‘जागीर’ के रूप में दिया जाता था।

प्रश्न 35. विजयनगर साम्राज्य में भूमि से इकट्ठा किए जाने वाले लगान की अधिकतम तथा न्यूनतम में क्या थीं ?
उत्तर-विजयनगर साम्राज्य में भूमि से कर इकट्ठा किए जाने वाले लगान की न्यूनतम दर उपज का छठा भाग तथा अधिकतम दर उपज का आधा भाग थी।

प्रश्न 36. विजयनगर साम्राज्य से सम्बन्धित मन्दिर किन चार नगरों में देखे जा सकते हैं ?
उत्तर-विजयनगर साम्राज्य से सम्बन्धित मन्दिर वैलोर, विजयनगर शहर, काँचीपुरम तथा श्रीरंगपट्टम में देखे जा सकते

प्रश्न 37. मराठी, कन्नड़, तमिल तथा मलयालम किन चार राज्यों तथा प्रदेशों की मुख्य भाषाएं थीं ? ये प्रदेश वर्तमान के कौन-से चार राज्यों में हैं ?
उत्तर-अहमद नगर में मराठी, बीजापुर में कन्नड़, विजयनगर में तमिल तथा सुदूर दक्षिण में मलयालम भाषाएं बोली जाती थीं। ये प्रदेश वर्तमान भारत में क्रमश: महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु तथा केरल राज्यों में हैं।

III. छोटे उत्तर वाले प्रश्न-

प्रश्न 1. बाहमनी साम्राज्य के विघटन में प्रशासनिक व्यवस्था तथा शासक वर्ग का क्या हाथ था ?
उत्तर-बाहमनी राज्य के पतन की प्रक्रिया में यों तो अनेक कारणों का हाथ रहा, परन्तु प्रशासनिक व्यवस्था के गलत संगठन तथा शासक वर्ग के विवेकहीन कार्यों से इस राज्य का पतन बड़ी तीव्रता से होने लगा। बाहमनी शासक अपनी अविवेकपूर्ण नीति के कारण शासन को संगठित एवं स्थायी रूप प्रदान करने में असफल रहे। फलस्वरूप अमीरों के आपसी मतभेद काफ़ी बढ़ गए। दूसरे, सुल्तानों ने हिन्दुओं के प्रति असहनशीलता की नीति अपनाई जिससे राज्य की बहुसंख्यक हिन्दू जनता आरम्भ से ही बाहमनी शासकों के विरुद्ध हो गई। बाहमनी शासकों ने देशी अमीरों की अपेक्षा विदेशी अमीरों पर अधिक विश्वास किया। अतः उनके अपने यहां अनेक अमीरों में आपसी शत्रुता पैदा हो गई। दूसरे, महमूद गवां को छोड़कर अन्य किसी भी अमीर ने राजभक्ति न दिखाई। अतः बाहमनी सुल्तानों को न तो देशी अमीरों का ही साथ मिल सका और न ही विदेशी अमीरों का। यह बात भी बाहमनी शासकों की असफलता का कारण बनी और बाहमनी राज्य का पतन तीव्रता से होने लगा।

प्रश्न 2. बाहमनी सल्तनत तथा उत्तराधिकारी राज्यों के अधीन कला तथा भवन निर्माण कला की मुख्य विशेषताएं क्या थीं?
उत्तर-बाहमनी शासकों ने चित्रकला तथा भवन निर्माण कला के विकास में बड़ा योगदान दिया। इस समय की चित्रकारी के सर्वोत्तम नमूने अलाऊद्दीन द्वितीय द्वारा बनवाए गए अहमदशाह के मकबरे की छत और दीवारों पर मिलते हैं। बाहमनी राज्य की भवन निर्माण कला के मुख्य केन्द्र गुलबर्गा तथा बीदर हैं। इन स्थानों पर अनेक आकर्षक मस्जिदें, मकबरे, मदरसे तथा महल मिलते हैं। ये इमारतें पुरानी शैली तथा फारसी शैली में बनाई गई हैं। गुलबर्गा में फिरोजशाह का मकबरा बाहमनी राज्य की भवन निर्माण कला का एक सुन्दर नमूना है। बीजापुर के आदिलशाही शासकों के समय में बीजापुर अपनी सुन्दर इमारतों के लिए सारे भारत में प्रसिद्ध हो गया। यहां का गोल गुम्बज और इब्राहीम रोजा भवन निर्माण कला के सबसे सुन्दर नमूने हैं। गोलकुण्डा के कुतुबशाही शासकों ने भी भवन निर्माण कला के विकास में अपना विशेष योगदान दिया। उनकी सबसे प्रसिद्ध इमारत हैदराबाद में स्थित चारमीनार है।

प्रश्न 3. विजयनगर साम्राज्य की उन्नति में कृष्णदेव राय का क्या योगदान था ?
उत्तर-कृष्णदेव राय तुल्लुव वंश का सबसे प्रसिद्ध राजा था। उसने 1509 ई० से 1529 ई० तक शासन किया। वह एक महान् योद्धा था। उसने मैसूर (कर्नाटक) के कुछ भाग को विजित किया तथा उड़ीसा के राजा को हरा कर काफ़ी लूट का माल प्राप्त किया। उसने बीजापुर के आदिलशाह से युद्ध करके रायचूर दोआब छीन लिया। उसके द्वारा बीजापुर की विजय से दक्षिण के मुस्लिम राज्यों के शासक इतने भयभीत हो उठे कि उन्हें उसके जीवन काल में फिर विजयनगर पर आक्रमण करने का कभी साहस न हुआ। कृष्णदेव राय एक महान् शासक प्रबन्धक भी था। उसने धार्मिक सहनशीलता की नीति अपनाई तथा देश की अर्थव्यवस्था में सुधार किया। इस प्रकार विजयनगर एक समृद्ध राज्य बन गया।

प्रश्न 4. विजयनगर के राज्य प्रबन्ध की मुख्य विशेषताएं क्या थी ?
उत्तर-विजयनगर के केन्द्रीय शासन का मुखिया सम्राट् था। उसके पास असीम शक्तियां तथा अधिकार थे। अपनी सहायता के लिए उसने एक मन्त्रिपरिषद् की व्यवस्था की हुई थी। इसमें मन्त्री, पुरोहित, सेनापति आदि सम्मिलित थे। इनकी नियुक्ति सम्राट् स्वयं करता था। उसका सारा राज्य लगभग 200 प्रान्तों में बंटा हुआ था। प्रत्येक प्रान्त का शासन प्रबन्ध एक प्रान्तपति के हाथ में होता था। ये प्रान्तपति या तो राज घराने से सम्बन्धित होते थे या फिर कोई शक्तिशाली अमीर होते थे। प्रत्येक प्रान्त को जिलों में बांटा गया था। इन्हें नाडू तथा कोट्टम कहा जाता था। जिले परगनों में तथा परगने गांवों में बंटे होते थे। गांव का शासन प्रबन्ध ग्राम पंचायतों को सौंपा हुआ था। इन सभी संस्थाओं के प्रमुख अधिकारी को आयगर कहा जाता था। न्याय का मुख्य अधिकारी स्वयं सम्राट् था। दण्ड बड़े कठोर थे। राज्य की आय का मुख्य साधन भूमि कर था। विजयनगर राज्य के शासकों के पास एक शक्तिशाली सेना भी थी।

प्रश्न 5. बाहमनी राज्य के पतन के कारण बताओ।
उत्तर-बाहमनी राज्य के पतन में अनेक तत्त्वों का हाथ था। प्रथम, बाहमनी शासक असहनशील थे। उन्होंने हिन्दुओं के साथ बहुत बुरा व्यवहार किया। दूसरे, बाहमनी शासक सदा अपने पड़ोसी राज्यों के साथ लड़ते-झगड़ते रहते थे। इन युद्धों से बाहमनी वंश की शक्ति कम हो गई। तीसरे, अधिकतर बाहमनी शासक विलासी थे। वे राज कार्यों की ओर कोई ध्यान नहीं देते थे। चौथे, बाहमनी राज्य का अन्तिम शासक महमूदशाह बड़ा ही अयोग्य था। उसकी अयोग्यता का लाभ उठाकर प्रान्तीय गवर्नरों ने अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी। पांचवें, महमूद गावां को फांसी दिए जाने से बाहमनी राज्य को सबसे अधिक क्षति पहुंची और इस राज्य का पतन हो गया।

प्रश्न 6. विजयनगर राज्य के पतन के कारण बताओ।
उत्तर-(1) इस राज्य की सारी शक्ति राजा के हाथ में थी। शासन में प्रजा का कोई योगदान नहीं था। इसलिए संकट के समय प्रजा ने अपने राजा का साथ न दिया। (2) इस राज्य में सिंहासन प्राप्ति के लिए प्रायः गृह-युद्ध चलते रहते थे। इन युद्धों ने राजा की शक्ति नष्ट कर दी। (3) कृष्णदेव राय के पश्चात् ३५ गज्य के सभी शासक निर्बल थे। (4) विजयनगर राज्य को बाहमनी राज्य के शासकों के साथ युद्ध करने पड़े। इन युद्धों में विजयनगर राज्य की शक्ति को बड़ी क्षति पहुंची। (5) तालीकोट की लड़ाई में विजयनगर का शासक मारा गया। इस लड़ाई के तुरन्त पश्चात् इस का पूरी तरह पतन हो गया।

प्रश्न 7. आप विजयनगर राज्य की कला और भवन निर्माण कला के विषय में क्या जानते हैं ? (v. Imp.)
उत्तर-विजयनगर के शासक बड़े ही कला-प्रेमी थे। उन्होंने मूर्ति कला और भवन निर्माण कला को विशेष रूप से संरक्षण प्रदान किया। चोल राज्य की भान्ति विजयनगर के मूर्तिकार भी कांसे की मूर्तियां ढालने में बड़े निपुण थे। राजा कृष्णदेव राय का कांसे का बुत विजयनगर राज्य की मूर्ति कला का सबसे सुन्दर नमूना है। विजयनगर कला भवन निर्माण की झलक हमें उनके द्वारा बनवाये गए दुर्गों, भव्य महलों और सुन्दर मन्दिरों में दिखाई देती है। यहां के शासकों ने अनेक प्राचीन मन्दिरों को विशाल रूप दिया और कई नए मन्दिरों का निर्माण करवाया। उनके द्वारा बनवाए गए मन्दिर केवल विजयनगर तक ही सीमित नहीं हैं। ये तुंगभद्रा नदी के दक्षिण के सारे प्रदेश में बने हुए हैं। इन मन्दिरों के उत्कृष्ट नमूने वैलोर, कांचीपुरम तथा श्रीरंगापट्टम में देखे जा सकते हैं। कृष्णदेव राय ने विजयनगर के निकट एक बहुत बड़ा तालाब भी खुदवाया जो सिंचाई के काम आता था।

प्रश्न 8. 14वीं शताब्दी के अन्त से लेकर 17वीं शताब्दी के आरम्भ तक दक्षिण में कौन-सी नई भाषाओं और साहित्य का विकास हुआ ?
उत्तर-14वीं शताब्दी के अन्त से 17वीं शताब्दी के आरम्भ तक दक्षिण में अनेक प्रादेशिक भाषाओं तथा साहित्य का विकास हुआ। गोलकुण्डा के सुल्तानों ने तेलगू भाषा और तेलगू साहित्य को संरक्षण प्रदान किया। उनके राज्य की सीमाएं लगभग वहीं थीं जो तेलगू-भाषी क्षेत्र की थीं। इसके विपरीत अन्य राज्यों की सीमाएं भले ही उन राज्यों में विकसित भाषाओं से सम्बन्धित क्षेत्र से मेल नहीं खाती थीं तो भी यहां के शासकों ने अलग-अलग भाषाओं के विकास में सहायता पहुंचाई। अहमदनगर में मराठी, बीजापुर में कन्नड़, विजयनगर में तमिल तथा सुदूर दक्षिण में मलयालम भाषा ने खूब उन्नति की। इन प्रादेशिक भाषाओं के साथ-साथ प्रादेशिक साहित्य का विकास भी हुआ। इस साहित्य के विकास में शासकों की अपेक्षा भक्ति लहर के अनुयायियों की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही। इसका कारण यह था कि भक्ति लहर के प्रचारकों ने अपने सन्देश के प्रचार के लिए जन-साधारण की भाषाओं को ही अपनाया।

प्रश्न 9. महमूद गावां पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो।
उत्तर-महमूद गावां बाहमनी शासक मुहम्मद शाह तृतीय का प्रधानमन्त्री था। उसने बाहमनी राज्य को बहुत ही शक्तिशाली बनाया। उसने प्रजा की भलाई के लिए अनेक कार्य किये। उसने कोंकण, संगमेश्वर, उड़ीसा और विजयनगर के शासकों को हराया। उसने सेना को फिर से संगठित किया और किसानों की कई प्रकार से सहायता की। वह विद्वानों तथा कलाकारों का आदर करता था। वह स्वयं भी बड़ा विद्वान् और योग्य व्यक्ति था। इतना कुछ करने पर भी महमूद गावां का अन्त बड़ा दुःखद था। बाहमनी शासक मुहम्मद शाह तृतीय ने उसके शत्रुओं के बहकावे में आकर उसे मृत्यु दण्ड दे दिया।

IV. निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. विजयनगर राज्य के शासन प्रबन्ध की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करो।
उत्तर-विजयनगर राज्य के शासन प्रबन्ध की प्रमुख विशेषताओं का विवरण इस प्रकार है

  • सम्राट्-विजयनगर के केन्द्रीय शासन का मुखिया सम्राट होता था। उसके पास असीम शक्तियाँ तथा अधिकार होते थे। अपनी सहायता के लिए उसने एक मन्त्रिपरिषद् की व्यवस्था की हुई थी। परन्तु उसका कार्य केवल सम्राट को परामर्श देना होता था।
  • मन्त्रिपरिषद्-अपनी सहायता तथा परामर्श के लिए सम्राट ने मन्त्रिपरिषद् की व्यवस्था की हुई थी। इसमें मन्त्री, पुरोहित, सेनापति आदि सम्मिलित होते थे। इन सभी सदस्यों की नियुक्ति सम्राट् स्वयं करता था।
  • प्रान्तीय शासन-विजयनगर राज्य लगभग 200 प्रान्तों में बंटा हुआ था। प्रत्येक प्रान्त का प्रबन्ध एक प्रान्तपति के हाथ में होता था। ये प्रान्तपति या तो राज घराने से सम्बन्धित होते थे या फिर कोई शक्तिशाली अमीर (Nobles) होते थे। इनकी नियुक्ति भी सम्राट् स्वयं करता था।
  • स्थानीय शासन-शासन की सुविधा को ध्यान में रखते हुए पान्द को जिलों में बांटा गया था। ज़िले आगे परगनों में तथा परगने गाँवों में बँटे होते थे। गाँव का शासन प्रबन्ध ग्राम पंचायतों को सौंपा हुआ था। इन सभी संस्थाओं के प्रमुख अधिकारी को आयंगर कहा जाता था।
  • सैनिक संगठन-विजयनगर का बाहमनी सुल्तानों के साथ निरन्तर संघर्ष चलता रहता था। अतः यहाँ के शासकों को अपने सैनिक संगठन की ओर विशेष ध्यान देना पड़ा।
    विजयनगर राज्य की सेना दो प्रकार की थी। प्रान्तीय सेना तथा केन्द्रीय सेना। सेना में हाथी, घोड़े तथा पैदल सैनिक होते थे। अश्वारोही सेना का प्रमुख अंग थे।
  • न्याय-प्रणाली-विजयनगर राज्य में सम्राट् मुख्य न्यायाधीश का कार्य करता था। गाँवों में आयंगर तथा प्रान्तों में प्रान्तपति अथवा सूबेदार न्याय कार्य करते थे। दण्ड बड़े कठोर थे और गम्भीर अपराधों के लिए अंग-भंग का दण्ड दिया जाता था, परन्तु साधारण अपराधों पर जुर्माना किया जाता था।
  • भूमि कर प्रणाली-विजयनगर राज्य की समस्त भूमि का स्वामी सम्राट होता था। वह इसे आगे भूमिपतियों में तथा भूमिपति इसे किसानों में बाँट देते थे। किसानों की उपज का 1/6 से 1/4 भाग कर के रूप में भूमिपति को देना पड़ता था। किसानों की आर्थिक अवस्था बड़ी अच्छी थी। उन्हें जीवन का प्रत्येक सुख प्राप्त था।

प्रश्न 2. विजयनगर राज्य की सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक दशा का वर्णन करो।
उत्तर-विजयनगर की सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक दशा का वर्णन निम्नलिखित है

I. सामाजिक अवस्था-

  • ब्राह्मणों का मान-विजयनगर राज्य में ब्राह्मणों को बड़ा सम्मान प्राप्त था। उन्हें राज्य में उच्च पद प्राप्त थे। अपराधी होने पर भी उन्हें मृत्यु दण्ड नहीं दिया जा सकता था। उनका जीवन बड़ा पवित्र होता था। वे शाकाहारी होते थे तथा माँस, मदिरा आदि को छूते तक न थे। इस प्रकार ब्राह्मण लोग अन्य वर्गों के लोगों के लिए एक आदर्श थे।
  • नारी का स्थान-विजयनगर में नारी का भी बड़ा सम्मान था। योग्यता होने पर वे उच्च शिक्षा भी ग्रहण कर सकती थीं। उनमें पर्दे का रिवाज नहीं था। स्त्रियों को युद्ध-कला और ललित-कलाओं भी भी शिक्षा दी जाती थी।
  • कुप्रथाएँ-विजयनगर का समाज कुप्रथाओं से वंचित नहीं था। उस समय देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पशु बलि दी जाती थी। समाज में सती प्रथा भी जोरों पर थी। यहाँ तक कि तेलगू स्त्रियों को अपने पति की मृत्यु पर धरती में जीवित गाड़ दिया जाता था। इसके अतिरिक्त राज्य में वेश्याओं की भी कमी नहीं थी। देवराज द्वितीय की 12 हज़ार रानियाँ थीं। इनमें से तीन हजार के साथ तो उसने केवल इस शर्त पर विवाह किया था कि वे उसकी मृत्यु के बाद उसके साथ सती होंगी।

II. आर्थिक दशा-

विजयनगर की आर्थिक अवस्था बड़ी उन्नत थी। यहाँ की धरती उपजाऊ थी। परिणामस्वरूप आन्तरिक तथा विदेशी व्यापार खूब विकसित थे। उनके पुर्तगालियों से अच्छे व्यापारिक सम्बन्ध थे। अरबी घोड़ों का भी व्यापार खूब होता था। विजयनगर के समुद्री तटों पर अच्छी-अच्छी बन्दरगाहें थीं। कालीकट यहाँ की प्रमुख बन्दरगाह थी। यहाँ से बर्मा, चीन, ईरान, अरब, पुर्तगाल तथा दक्षिणी अफ्रीका के साथ देश का व्यापार चलता था। इस बन्दरगाह से कपड़ा, चावल, चीनी, लोहा, गर्म मसाले तथा शोरा विदेशों में भेजा जाता था और वहां से घोड़े, हाथी, ताँबा, जवाहरात तथा रेशम आदि का आयात किया जाता था। व्यापारियों ने अपने संघ स्थापित किए हुए थे। लेन-देन की सुविधा के लिए अनेक सोने-चांदी के सिक्के प्रचलित थे। व्यापार के साथ-साथ देश में कृषि तथा अन्य उद्योग-धन्धे भी काफ़ी उन्नत थे। कपड़ा बुनना, खानों से खनिज निकालना, धातुओं की वस्तुएँ बनाना तथा इत्र निकालना उस समय के लोगों के प्रमुख उद्योग थे।

II. सांस्कृतिक जीवन विजयनगर के हिन्दू शासकों ने हिन्दू संस्कृति तथा कला के विकास की ओर भी विशेष ध्यान दिया। कई विद्वानों तथा साहित्यकारों को इन राजाओं ने आश्रय प्रदान कर रखा था। संस्कृत तथा तेलगू के कई विद्वान् इन शासकों के दरबार की शोभा बढ़ाते थे। इन विद्वानों में से सयन का नाम लिया जा सकता था जिसने ऋग्वेद संहिता, ऐतरेय ब्राह्मण तथा आरण्यक आदि ग्रन्थों की टीकाएँ लिखीं। इसके अतिरिक्त तेलगू भाषा का अलसनी कवि भी विजयनगर के राजदरबार की शोभा था। __साहित्य के साथ-साथ विजयनगर के शासकों को कला से भी विशेष प्रेम था। भवन निर्माण कला के प्रति उनके प्रेम के दर्शन हमें विजयनगर की राजधानी में बने भव्य भवनों को देखकर होते हैं जिसके अब अवशेष ही रह गए हैं।
सच तो यह है कि विजयनगर साम्राज्य की शासन व्यवस्था उच्चकोटि की थी। लोगों का जीवन समृद्ध था, समाज उच्च आदर्शों में ढला हुआ था तथा कलाएँ उन्नति की चरम सीमा पर थीं।

प्रश्न 3. बाहमनी राज्य की शासन-व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
उत्तर-बाहमनी शासकों ने अपने राज्य में कुशल शासन प्रणाली स्थापित करने का भी प्रयास किया। उनकी शासनव्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार है

I. केन्द्रीय सरकार-

सुल्तान-बाहमनी वंश के प्रथम शासक अलाउद्दीन बहमनशाह ने गुलबर्गा को अपनी राजधानी बनाते समय केन्द्रीय सरकार की स्थापना की। केन्द्रीय सरकार का मुखिया सुल्तान था। वह राज्य की सारी शक्ति का स्रोत था। उसके अधिकार काफ़ी विस्तृत थे। वह राज्य का मुख्य न्यायाधीश और सेना का मुख्य सेनापति था। वास्तव में, सुल्तान पूर्ण रूप से निरंकुश था और स्वयं को पृथ्वी पर ईश्वर की छाया मानता था।

मन्त्री-सुल्तान को शासन कार्यों में परामर्श तथा सहयोग देने के लिए कुछ मन्त्री होते थे। इन मन्त्रियों की संख्या आठ थी। प्रधानमन्त्री को ‘वकील उल-सुल्तान’ कहते थे। राज्य के सभी आदेश वही जारी करता था। प्रत्येक सरकारी पत्र पर उसकी मोहर का होना आवश्यक था। न्याय विभाग का मन्त्री सदर-ए-जहां’ कहलाता था। वह धर्मार्थ विभाग का भी अध्यक्ष था। मन्त्री अपने सभी कार्य सुल्तान की आज्ञा से करते थे और अपने कार्यों के लिए उसी के प्रति उत्तरदायी होते थे। इन आठ मन्त्रियों के अतिरिक्त कुछ निम्न स्तरों के मन्त्री भी थे जिनमें कोतवाल तथा नाजिर प्रमुख थे।

II. प्रान्तीय शासन-

बाहमनी सुल्तानों ने शासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए राज्य को कई भागों तथा उपभागों में विभक्त किया हुआ था। शासन की प्रमुख इकाई प्रान्त अथवा तर्फ थी। ‘तर्फ’ को आगे चल कर सरकारों तथा परगनों में बांटा गया था। प्रत्येक परगने में कुछ गांव सम्मिलित होते थे।

प्रारम्भ में बाहमनी राज्य चार तर्कों में विभक्त था-गुलबर्गा, दौलताबाद, बरार तथा बीदर। बाद में इनकी संख्या आठ हो गई। तर्क का मुखिया तर्कदार कहलाता था। वह अनेक कार्य करता था। प्रान्त में राजस्व कर एकत्रित करवाना, सैनिक भर्ती करना, सेना का नेतृत्व करना आदि उसके प्रमुख कार्य थे। वह पूर्णरूप से सुल्तान के अधीन था और सभी कार्य उसी की आज्ञा से करता था। उसके कार्यों का निरीक्षण करने के लिए सुल्तान स्वयं भी समय-समय पर तर्कों का दौरा किया करता था।
परगनों का शासन प्रबन्ध चलाने के लिए कई कर्मचारी नियुक्त थे। वे भी अपने सभी कार्य सुल्तान के आदेश द्वारा करते थे।

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