Class 11 Political Science Solutions Chapter 18 सरकार के अंग-व्यवस्थापिका

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. व्यवस्थापिका के कार्यों का वर्णन कीजिए।
(Describe the functions of a legislature.)
अथवा
आधुनिक लोकतन्त्रीय राज्य में विधानमण्डल के कार्यों का वर्णन करें।
(Describe the functions of the legislature in a modern democratic state.)
उत्तर-सरकार के तीनों अंगों में से विधानपालिका सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। विधानपालिका राज्य की इच्छा को कानून के रूप में निर्मित करती है। कार्यपालिका विधानपालिका के बनाए हुए कानूनों को लागू करती है तथा न्यायपालिका इन कानूनों की व्याख्या करती है। इस प्रकार कार्यपालिका तथा न्यायपालिका अपने कार्यों के लिए विधानमण्डल पर निर्भर करती हैं। इसलिए विधानमण्डल का कार्यपालिका तथा न्यायपालिका से महत्त्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि इसी का देश के वित्त पर नियन्त्रण होता है।

विधानमण्डल के कार्य देश की शासन प्रणाली पर निर्भर करते हैं। लोकतन्त्रीय राज्यों में विधानमण्डल को प्रायः निम्नलिखित कार्य करने पड़ते हैं :

1. कानून निर्माण का कार्य (Law Making Functions)—विधानमण्डल का प्रथम कार्य कानूनों का निर्माण करना है। विधानमण्डल देश की परिस्थितियों के अनुसार तथा नागरिकों की आवश्यकताओं के अनुसार कानूनों का निर्माण करता है। विधानमण्डल जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है और जनता की इच्छा विधानमण्डल के कानूनों में ही प्रकट होती है। आधुनिक लोकतन्त्रीय राज्यों में कानून का मुख्य स्रोत विधानमण्डल है।

2. कार्यपालिका पर नियन्त्रण (Control over the Executive)-लोकतन्त्र राज्यों में विधानमण्डल का कार्यपालिका पर थोड़ा बहुत नियन्त्रण अवश्य होता है। संसदीय सरकार में कार्यपालिका अपने समस्त कार्यों के लिए विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी होती है। मन्त्रिमण्डल के सभी सदस्य विधानमण्डल के सदस्य होते हैं और मन्त्रिमण्डल तब तक अपने पद पर रह सकता है जब तक उसे विधानमण्डल का विश्वास प्राप्त हो। अविश्वास प्रस्ताव पास होने की दशा में मन्त्रिमण्डल को त्याग-पत्र देना पड़ता है। विधानमण्डल के सदस्य मन्त्रियों से अनेक प्रश्न पूछ सकते हैं और मन्त्रियों को पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देने पड़ते हैं। अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका प्रत्यक्ष तौर पर विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी नहीं होती। फिर भी विधानमण्डल का कार्यपालिका पर थोड़ा बहुत प्रभाव पड़ता है। अमेरिका में राष्ट्रपति को बड़ी-बड़ी नियुक्तियां करने तथा सन्धियां करने के लिए सीनेट की अनुमति लेनी पड़ती है। सीनेट विधानमण्डल का ऊपरी सदन है।

3. वित्त पर नियन्त्रण (Control over Finance)-संसार के प्रायः सभी लोकतन्त्रीय राज्यों में वित्त पर विधानमण्डल का नियन्त्रण होता है। कार्यपालिका विधानमण्डल की अनुमति के बिना एक पैसा खर्च नहीं कर सकती। विधानमण्डल प्रति वर्ष बजट पास करती है। टैक्स लगाना, टैक्सों में संशोधन करना तथा करों को समाप्त करना विधानमण्डल का ही कार्य है।

4. न्यायिक कार्य (Judicial Functions)-कई देशों में विधानपालिका को न्यायिक कार्य भी करने पड़ते हैं। अमेरिका में विधानमण्डल राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति पर महाभियोग चला कर उन्हें पद से हटा सकता है। भारत में भी संसद् राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति को महाभियोग के द्वारा हटा सकती है। कैनेडा में तलाक के मुकद्दमे विधानमण्डल द्वारा सुने जाते हैं। स्विट्ज़रलैंड में क्षमादान का अधिकार विधानमण्डल के पास है।

5. संविधान में संशोधन (Amendment in the Constitution) सभी लोकतन्त्रीय राज्यों में संविधान में संशोधन करने का अधिकार विधानमण्डल के पास है। कुछ देशों में संविधान में संशोधन साधारण बहुमत से किया जा सकता है। जबकि कुछ देशों में संशोधन करने के लिए विशेष विधि अपनाई जाती है। इंग्लैण्ड में संसद् संविधान में साधारण बहुमत से संशोधन कर सकती है। हमारे देश में संसद् को संविधान की कुछ धाराओं को दो-तिहाई बहुमत से संशोधन करने के लिए आधे राज्यों की अनुमति की भी आवश्यकता होती है।

6. चुनाव-सम्बन्धी कार्य (Electoral Functions)-विधानमण्डल चुनाव सम्बन्धी कार्य भी करती है। भारतवर्ष में राष्ट्रपति का चुनाव संसद् के दोनों सदनों के चुने हुए राष्ट्र तथा प्रान्तों की विधानसभाओं के सदस्य मिलकर करते हैं। उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद् के दोनों सदन मिलकर करते हैं। इंग्लैण्ड में विधानमण्डल का निम्न सदन अपने स्पीकर का चुनाव करता है। स्विट्ज़रलैण्ड में कार्यपालिका के सदस्यों का चुनाव विधानमण्डल के द्वारा ही किया जाता है।

7. जांच-पड़ताल सम्बन्धी कार्य (Investigating Functions)-व्यवस्थापिका महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक मामलों की छानबीन करने के लिए विशेषज्ञों की समितियां नियुक्त करती है। ये समितियां निश्चित समय के अन्दर अपनी रिपोर्ट व्यवस्थापिका के सामने पेश करती हैं। व्यवस्थापिका इन रिपोर्टों पर विचार करती है और व्यवस्थापिका का निर्णय अन्तिम होता है।

8. विदेश नीति पर नियन्त्रण (Control over Foreign Policy)-व्यवस्थापिका राज्य के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की देखभाल भी करती है। मन्त्रिमण्डल को अपनी विदेश नीति विधानमण्डल से पास करानी पड़ती है। गणतन्त्रात्मक राज्यों में कोई भी युद्ध या सन्धि उस समय तक नहीं की जा सकती जब तक विधानमण्डल की उस विषय में राय न ले ली जाए।

9. लोगों की शिकायतें दूर करना (Redressal of the Grievences of the People)-आजकल लोकतन्त्र के युग में विधानमण्डल लोगों की शिकायतों को जोकि प्रशासन के विरुद्ध हों, दूर करने के प्रयत्न भी करता है। विधानमण्डल में जनता के प्रतिनिधि होते हैं। जनता को जो भी शिकायत, कठिनाई या समस्या हो, वह अपने प्रतिनिधियों के पास भेज देते हैं। प्रतिनिधि उन्हें विधानमण्डल में प्रस्तुत करते हैं, उनके बारे में मन्त्रियों से प्रश्न भी पूछते हैं और प्रयत्न करते हैं कि वह कठिनाई या समस्या हल हो या शिकायत दूर हो। जनता के पास सरकार के विरुद्ध आवाज़ उठाने का यह एक बहुत बड़ा प्रभावशाली साधन है।

10. विचारशील कार्य (Deliberative Functions)-व्यवस्थापिका का एक महत्त्वपूर्ण कार्य राजनीतिक मामलों
और शासन सम्बन्धी नीतियों पर विचार-विमर्श और वाद-विवाद करना है। किसी भी विषय पर कानून बनाने से पहले अथवा निर्णय लेने से पूर्व उस पर विभिन्न दृष्टिकोणों से विचार किया जाता है। व्यवस्थापिका में विभिन्न हितों, वर्गों और सम्प्रदायों के प्रतिनिधि होते हैं तथा सभी को अपने विचार प्रकट करने की स्वतन्त्रता होती है।

11. अन्य कार्य (Other Functions) विधानपालिका देश के आर्थिक विकास की योजनाओं की स्वीकृति देती है। सरकारी निगमों की स्थापना के लिए कानून बनाती है। कार्यपालिका के किसी एक सदस्य या समस्त मन्त्रिमण्डल के विरुद्ध लगे आरोपों की जांच-पड़ताल करने के लिए जांच कमीशन नियुक्त करती है।

निष्कर्ष (Conclusion)-इस प्रकार आधुनिक राज्य में व्यवस्थापिका को बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है और इसे कानून बनाने के अतिरिक्त प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से कार्यपालिका पर नियन्त्रण रखने के अधिकार भी दिए जाते हैं। प्रायः सभी देशों में युद्ध और शान्ति की घोषणा व्यवस्थापिका की स्वीकृति से ही की जा सकती है। लोकतन्त्र में इसको सर्वोच्च स्थान मिलना स्वाभाविक ही है।

प्रश्न 2. द्वि-सदनात्मक व्यवस्था के लाभ तथा हानियों की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
(Examine critically advantages and disadvantages of the bicameral system.)
अथवा
द्विसदनीय विधानमण्डल के लाभ तथा हानियों का वर्णन कीजिए। (Explain the merits and demerits of the bicameral system.)
उत्तर-विधानमण्डल सरकार के तीनों अंगों में से सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है। संसार के प्रायः सभी देशों में विधानमण्डल पाया जाता है, परन्तु इसके संगठन पर बहुमत में मतभेद पाया जाता है अर्थात् इस प्रश्न पर कि क्या विधानमण्डल के दो सदन होने चाहिएं अथवा एक सदन होना चाहिए, काफ़ी मतभेद पाया जाता है। जॉन स्टुअर्ट मिल, सर हैनरी मेन तथा लेकी आदि लेखकों ने विधानमण्डल के दो सदनों का समर्थन किया है। परन्तु बेन्थम, अबेसियस तथा बैंजमिन फ्रैंकलिन आदि लेखकों ने विधानमण्डल के एक सदन का समर्थन किया है।

जिस प्रकार लेखकों के विचारों में भिन्नता पाई जाती है, उसी प्रकार व्यवहार में कई देशों में विधानमण्डल के दो सदन हैं जबकि कुछ देशों में एक सदन है। इंग्लैंण्ड, अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, स्विट्ज़रलैण्ड, जापान, स्वीडन, नार्वे तथा भारतवर्ष में विधानमण्डल के दो सदन पाए जाते हैं। पहले सदन को निम्न सदन तथा दूसरे सदन को उपरि सदन कहा जाता है। परन्तु चीन, तुर्की तथा पुर्तगाल में एक सदन पाया जाता है। भारत के कई राज्यों में जैसे कि राजस्थान, नागालैण्ड, उड़ीसा, केरल, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पश्चिमी बंगाल तथा पंजाब में एक सदन पाया जाता है जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, जम्मूकश्मीर आदि राज्यों में द्वि-सदनीय व्यवस्थापिका है। किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले दो सदन के पक्ष में तथा विपक्ष में दिए गए तर्कों का अध्ययन करना आवश्यक है।

द्विसदनात्मक विधानमण्डल के पक्ष में तर्क (Arguments in Favour of Bicameralism)-

द्विसदनात्मक विधानमण्डल के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं :

1. दूसरा सदन पहले सदन की निरंकुशता को रोकता है (Second Chamber checks the Despotism of the Lower House)—जिस देश में एक सदन होता है वहां पर सदन निरंकुश बन जाता है। यह साधारणतः कहा जाता है कि “शक्ति मनुष्य को भ्रष्ट करती है और निरंकुश सत्ता उसे पूर्णतया भ्रष्ट कर देती है।” एक सदन का यही हाल होता है। जिस दल का सदन में बहुमत होता है वह अपनी मनमानी करता है और अल्प-संख्यकों पर अत्याचार करता है। पहले सदन की निरंकुशता को रोकने के लिए दूसरे सदन का होना आवश्यक है। दूसरा सदन पहले सदन को मनमानी करने से रोकता है और इस प्रकार नागरिकों की स्वतन्त्रता की रक्षा करता है।

2. दूसरा सदन अविचारपूर्ण तथा जल्दी में पास किए गए कानूनों को रोकता है (Second Chamber prevents the Hasty and Ill considered Legislation)-दूसरा सदन पहले सदन द्वारा जल्दी में पास किए बिलों को कानून बनने से रोकता है। बहुमत दल जनता से किए गए वायदों को पूरा करने के लिए जोश में आकर विभिन्न कानून पास कर देता है। पहले सदन के पास अधिक समय कम होने के कारण बिल जल्दबाजी में पास कर दिए जाते हैं। दूसरा सदन पहले सदन के द्वारा जल्दबाजी तथा अविचारपूर्ण पास किए गए बिलों को कुछ समय के लिए रोक लेता है जिससे जनता की राय का पता चलता है।

3. यह बिलों को दोहराने वाला सदन है (It is a Revisory Chamber)-दूसरा सदन पहले सदन द्वारा पास हुए बिलों को दोहराता है और विधेयक में रह गई त्रुटियों को दूर करता है। वास्तव में किसी विषय को दोहराना कोई बुरी बात नहीं है। ब्लंटशली (Bluntschli) ने ठीक कहा है कि “दो आंखों की अपेक्षा चार आंखें अच्छी तरह देखती हैं। विशेषतः जब किसी विषय पर विभिन्न दृष्टिकोणों से विचार किया जाना हो।”

4. दूसरा सदन पहले सदन के समय की बचत करता है (Second Chamber Saves the time of the Lower House)-एक सदन के पास इतना अधिक कार्य होता है कि प्रत्येक बिल पर पूर्ण विचार करके पास करना असम्भव है। दूसरे सदन में विवादहीन तथा विरोध-हीन बिलों को पेश किया जाता है, इन बिलों पर पूर्ण रूप से विचार करने के पश्चात् बिल को पहले सदन के पास भेज दिया जाता है। पहला सदन इन बिलों को शीघ्र ही पास कर देता है। इस प्रकार दूसरा सदन पहले सदन के समय की बचत करता है।

5. दूसरा सदन विशेष हितों और अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने के लिए आवश्यक है (Second Chamber is essential for giving Representation to Special Interests and Minorities)-दूसरे सदन का होना आवश्यक है ताकि विशेष वर्गों तथा अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व दिया जा सके। इसके अतिरिक्त प्रत्येक देश में कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं जो चुनाव लड़ना पसन्द नहीं करते पर उनकी योग्यता की देश को आवश्यकता होती है। ऐसे योग्य व्यक्तियों की योग्यता का लाभ तभी उठाया जा सकता है जब विधानमण्डल का दूसरा सदन हो। इन योग्य व्यक्तियों को दूसरे सदन में नामजद किया जाता है।

6. दूसरा सदन संघात्मक राज्यों के लिए अनिवार्य है (Second Chamber is essential in Federal Form of Government) संघात्मक सरकार की सफलता के लिए दूसरा सदन अनिवार्य है ताकि दूसरे सदन में संघ की इकाइयों को समान प्रतिनिधित्व देकर सब इकाइयों के हितों की रक्षा की जा सके। ऐसे सिद्धान्त अमेरिका तथा स्विट्ज़रलैण्ड आदि देशों में हैं। अमेरिका में प्रत्येक इकाई उपरि सदन में दो सदस्य भेजती है।

7. दूसरा सदन अधिक स्थायी (Second Chamber is more Stable)-दूसरा सदन पहले सदन की अपेक्षा अधिक चिरस्थायी होता है। इंग्लैण्ड का लॉज सदन तो पैतृक है। कनाडा के सीनेट के सदस्य जीवन भर के लिए मनोनीत होते हैं और भारत में राज्य सभा के एक-तिहाई (1/3) सदस्य प्रत्येक दो वर्ष के पश्चात् रिटायर होते हैं और निचले सदन की अवधि केवल 5 वर्ष की है इसलिए दूसरे सदन के सदस्य अधिक अनुभवी होते हैं। ऐसे सदस्य अपने अनुभव के आधार पर कानून में अच्छे-अच्छे सुझाव दे सकते हैं।

8. द्वि-सदनीय विधानमण्डल जनमत का अच्छी तरह प्रतिनिधित्व करता है (Bicameral Legislature better reflects the Public Opinion)-विधानमण्डल के दोनों सदन मिलकर जनमत का अच्छी तरह प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। एक सदन जनमत का ठीक प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। निम्न सदन की अवधि प्राय: चार अथवा पांच वर्ष होती है और कई बार सदन को अवधि से पूर्व भी भंग कर दिया जाता है। परन्तु दूसरा सदन अधिक स्थायी होता है। जब निम्न सदन को भंग कर दिया जाता है तब जनता का प्रतिनिधित्व दूसरा सदन करता है। इसके अतिरिक्त निम्न सदन कई बार अपनी अवधि समाप्त होने से पहले ही पुराना हो जाता है और परिवर्तित जनमत का प्रतिनिधित्व ठीक तरह से नहीं करता। परन्तु उपरि सदन के सदस्य कुछ समय पश्चात् रिटायर होते रहते हैं तथा उनके स्थान पर नए सदस्यों का चुनाव किया जाता है जो परिवर्तित जनमत का प्रतिनिधित्व करते हैं।

9. द्वि-सदनीय विधानमण्डल कार्यपालिका को अधिक स्वतन्त्रता प्रदान करता है (Bicameral Legislature gives more Independence to the Executive)-द्वि-सदनीय विधानमण्डल में दोनों सदन एक-दूसरे पर नियन्त्रण करके कार्यपालिका को अधिक स्वतन्त्रता प्रदान करते हैं। कार्यपालिका अपना कार्य तभी कुशलता से कर सकती है जब उसे कार्य करने की स्वतन्त्रता प्राप्त हो। कई बार कार्यपालिका को अपनी नीतियों को एक सदन में समर्थन प्राप्त नहीं होता पर यदि दूसरे सदन में उनका समर्थन प्राप्त हो जाए तो वे अपना कार्य विश्वास से कर सकते हैं। इससे कार्यपालिका की निर्भरता एक सदन पर नहीं रहती। कार्यपालिका दो सदनों के होने से अधिक स्वतन्त्र हो जाती है।

10. दूसरे सदन में उच्च स्तर के भाषण होते हैं (High Quality of Speeches in Second Chamber)दूसरे सदन के भाषणों का स्तर निम्न सदन की अपेक्षा ऊंचा होता है। इसके दो कारण हैं

  • निम्न सदन के सदस्यों के बोलने के ऊपर कई प्रकार के प्रतिबन्ध लगे हुए होते हैं। परन्तु उपरि सदन के सदस्यों के बोलने पर कम प्रतिबन्ध होते हैं और उन्हें बोलने के लिए भी काफ़ी समय मिल जाता है। भाषण की स्वतन्त्रता होने के कारण सदस्य अपने विचारों को स्वतन्त्रतापूर्वक प्रकट करते हैं और उनके भाषण का स्तर काफ़ी ऊंचा होता है।
  • दूसरे सदन में अनुभवी व्यक्ति होते हैं।

11. देरी करने की उपयोगिता (Utility of delaying Power)-दूसरे सदन के बिलों को पास करने में देरी लगाने की अपनी विशेष उपयोगिता है। दूसरा सदन विधेयकों को पास करने में इतनी देरी लगा देता है, जिससे जनता को उस विधेयक पर सोच-विचार करने तथा मत प्रकट करने के लिए समय मिल जाता है।

12. ऐतिहासिक समर्थन (Historical Support)-दूसरे सदन की उपयोगिता का समर्थन इतिहास द्वारा भी किया जाता है। इंग्लैण्ड में 1649 ई० में क्रामवैल (Cromwell) ने लार्ड सदन को समाप्त कर दिया, परन्तु 1660 ई० में लार्ज़ सदन को पुनः स्थापित किया गया। अमेरिका में स्वतन्त्रता के पश्चात् एक सदनीय विधानमण्डल की स्थापना की गई थी, परन्तु वह ठीक कार्य न कर सका जिसके फलस्वरूप 1787 ई० के संविधान के अन्तर्गत में द्वि-सदनीय प्रणाली को अपनाया गया। इंग्लैण्ड, भारत, फ्रांस, अमेरिका, स्विट्ज़रलैण्ड, कनाडा, जापान, ऑस्ट्रेलिया आदि सभी देशों में संसद् के दो-दो सदन हैं। इतिहास दूसरे सदन के पक्ष में है, इसके विरुद्ध नहीं।

दूसरे सदन के विपक्ष में तर्क (Arguments against Second Chamber)-

बहुत से विद्वानों का यह मत है कि दूसरा सदन आवश्यक नहीं। दूसरे सदन के विपक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं-

1. जनता की इच्छा एक है, दो नहीं (People have Only One Will not Two)—एक सदन के समर्थकों के अनुसार किसी विषय पर जनमत केवल एक ही हो सकता है दो नहीं। जनता या तो किसी विषय के पक्ष में होगी या विपक्ष में। जनमत को इसलिए एक सदन ही अधिक अच्छी तरह प्रकट कर सकता है और वह एक सदन निचला सदन है क्योंकि निचले सदन में जनता के चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं।

2. दूसरा सदन या तो व्यर्थ है या शरारती (Second Chamber is either Mischievous or Superfluous)अबेसियस ने कहा है “यदि उपरि सदन निम्न सदन से सहमत हो जाता है तो व्यर्थ है और यदि विरोध करता है तो शरारती है”। कहने का अभिप्राय यह है कि उपरि सदन निम्न सदन के प्रत्येक बिल को पास कर देता है तो उसका लाभ नहीं होता। इस प्रकार उपरि सदन व्यर्थ है। यदि उपरि सदन निम्न सदन के रास्ते में रुकावटें करता है अर्थात् बिल को पास नहीं करता तो वह शरारती है।

3. गतिरोध की सम्भावना (Possibility of Deadlocks)-विधानमण्डल के दूसरे सदन का यह भी दोष होता है कि दोनों सदनों में गतिरोध की सम्भावना रहती है। दोनों सदनों में गतिरोध की सम्भावना उस समय और भी बढ़ जाती है जब एक सदन में एक दल का बहुमत हो और दूसरे सदन में किसी अन्य राजनीतिक दल का।

4. कानून जल्दी में पास नहीं किए जाते (Laws are not passed in Hurry)-दूसरे सदन के समर्थकों का यह कहना है कि एक सदन होने से कानून जल्दी तथा उतावलेपन में पास होते हैं, ठीक नहीं है। एक सदन में बिल पूर्ण सोच-विचार करने के पश्चात् कानून बनाया जाता है। बिल को कई अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है। उदाहरणस्वरूप भारत तथा इंग्लैण्ड में बिल पास होने से पूर्व तीन वाचन (Three Readings) होते हैं। बिल को कमेटी स्टेज से भी गुज़रना पड़ता है। जब बिल को सदन पास कर देता है तब बिल को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है।

5. उपरि सदन निम्न सदन की निरंकुशता को नहीं रोकता (Second Chamber does not check the Despotism of the First Chamber)-द्वि-सदनीय विधान मण्डल के समर्थकों के अनुसार दूसरा सदन पहले सदन की निरंकुशता को रोकता है परन्तु यह ठीक नहीं है। निम्न सदन को बहुत शक्तियां प्राप्त होती हैं जिनकी वजह से निम्न सदन जिस बिल को चाहे, पास कर सकता है। दूसरा सदन पहले सदन को बिल पास करने से नहीं रोकताहां, बिल को पास करने में कुछ देर कर सकता है। इंग्लैण्ड में हाऊस ऑफ लार्ड्स साधारण बिल को एक वर्ष के लिए रोक सकता है जबकि धन बिल को केवल 30 दिन के लिए रोक सकता है। भारत में राज्यसभा धन बिल को 14 दिन के लिए रोक सकती है। साधारण बिलों पर भी राज्यसभा की शक्ति लोक सभा से कम ही है।

6. संघात्मक राज्यों में दूसरा सदन आवश्यक नहीं (Second Chamber is not essential in a Federal Form of Government)—संघात्मक सरकारों में दूसरे सदन का होना आवश्यक नहीं है। दूसरे सदन के सदस्यों का चुनाव पहले सदन की तरह दलों के आधार पर ही होता है। सदस्य अपने राज्यों के हितों को ध्यान में रखकर वोट का प्रयोग नहीं करते बल्कि पार्टी के आदेशों पर चलते हैं।

7. दूसरे सदन के संगठन में कठिनाइयां (Difficulties in Organising the Second Chamber)-दूसरे सदन की आलोचना इसलिए भी की जाती है क्योंकि इसके संगठन की समस्या है। निम्न सदन के सदस्य जनता द्वारा चुने जाते हैं, परन्तु प्रश्न उत्पन्न होता है कि दूसरे सदन के सदस्य किस प्रकार चुने जाएं ? विभिन्न देशों में दूसरे सदन का संगठन विभिन्न आधारों पर किया गया है। अमेरिका में दूसरे सदन के सदस्य पहले सदन की तरह जनता के द्वारा चुने जाते हैं, इसका कोई लाभ नहीं। इंग्लैण्ड में दूसरे सदन के अधिक सदस्य पैतृक आधार पर नियुक्त किए जाते हैं, यह प्रणाली प्रजातन्त्र के विरुद्ध है। भारत में राज्यसभा के सदस्य अप्रत्यक्ष तौर पर चुने जाते हैं तथा कुछ मनोनीत किये जाते हैं। इसलिए दूसरे सदन के संगठन का कोई सन्तोषजनक हल नहीं मिला है।

8. दूसरे सदन को शक्तियां देने में कठिनाइयां (Difficulties in giving Powers to Second Chamber)दूसरे सदन के संगठन की तरह यह भी एक समस्या है कि दूसरे सदन को शक्तियां दी जाएं। यदि दूसरे सदन को पहले सदन से कम शक्तियां दी जाएं तो वह उस पर कोई नियन्त्रण नहीं रखता। पर दूसरी तरफ यदि दूसरे सदन को पहले सदन के समान शक्तियां दी जाएं तो इससे दोनों में गतिरोध उत्पन्न होंगे जिससे शासन ठीक प्रकार से चलाना कठिन हो जाए।

9. दूसरा सदन प्रायः रूढ़िवादी होता है (Second Chamber is generally a Conservative House)दूसरे सदन में विशेष हितों के प्रतिनिधि होते हैं जो प्रायः अपने विचारों में रूढ़िवादी होते हैं। ये सदस्य प्रगतिशील नहीं होते और न ही लोगों के कल्याण के लिए कोई कार्य करना चाहते हैं। ये केवल अपने हितों की रक्षा करना चाहते हैं। इस सदन में बड़े-बड़े पूंजीपति, उद्योगपति, ठेकेदार इत्यादि होते हैं जो निम्न सदन को पसन्द नहीं करते। अतः दूसरा सदन निम्न सदन में पास किए गए प्रगतिशील कानूनों को पास करने में रुकावट डालता है।

10. अधिक खर्च (More Expenditure)-दूसरा सदन लाभदायक नहीं है पर इसका देश के बजट पर बोझ पड़ा रहता है। दूसरे सदन के सदस्यों के वेतन, भत्ते इत्यादि इतने हो जाते हैं कि उस धन राशि को किसी और कार्य पर लगाया जा सकता है।

11. विशेष हितों तथा अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने के लिए दूसरे सदन की आवश्यकता नहीं है-जब दूसरे सदन के सदस्य दलों के आधार पर अपने मत का प्रयोग करते हैं तब इससे विशेष हितों की रक्षा नहीं हो पाती। इसलिए दूसरे सदन की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके अतिरिक्त विशेष हितों तथा अल्पसंख्यकों को पहले सदन में ही प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है। योग्य व्यक्तियों को पहले सदन में भी मनोनीत किया जा सकता है तथा अल्पसंख्यकों को अन्य उपायों के द्वारा प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है।

निष्कर्ष (Conclusion)-द्वितीय सदन के पक्ष तथा विपक्ष में तर्कों का अध्ययन करने के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि द्वितीय सदन की कड़ी आलोचना के बावजूद भी इस सदन के बहुत लाभ हैं। यही कारण है कि कई देशों में जहां एक सदनीय प्रणाली को अपनाया गया, असफल रहने के पश्चात् फिर द्वि-सदनीय प्रणाली की स्थापना की गई। प्रो० लीकॉक ने ठीक ही कहा है, कि एक सदनीय विधानमण्डल की परीक्षा हो चुकी है, और यह असफल रही है। आज संसार के अधिकांश देशों में द्वि-सदनीय विधानमण्डल है। यही इनकी उपयोगिता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

प्रश्न 3. एक-सदनीय विधानमण्डल के तीन लाभ तथा तीन हानियां बताइए।
(Discuss three advantages and three disadvantages of a Unicameral Legislature.)
उत्तर-चीन, बुल्गारिया, नेपाल, तुर्की तथा पुर्तगाल में एक सदनीय विधानमण्डल पाया जाता है जबकि भारत, हालैण्ड, अमेरिका आदि देशों में द्वि-सदनीय विधानमण्डल पाया जाता है। एक सदनीय विधानमण्डल के लाभ भी हैं और हानियां भी। एक सदनीय विधानमण्डल के लाभ-एक सदनीय विधानमण्डल के तीन मुख्य लाभ इस प्रकार हैं-

  • एक सदनीय विधानमण्डल जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है-किसी विषय पर जनमत केवल एक ही हो सकता है दो नहीं। जनता या तो किसी विषय में होगी या विपक्ष में । इसलिए जनमत को एक सदन ही अधिक अच्छी तरह प्रकट कर सकता है।
  • कम खर्चीला-एक सदनीय विधानमण्डल से खर्चा कम होता है और देश के बजट पर अधिक बोझ नहीं पड़ता। दूसरे सदन पर खर्च होने वाले धन को देश के विकास कार्यों में लगाया जा सकता है।
  • एक सदनीय विधानमण्डल में कानून शीघ्र पास होते हैं-एक सदनीय विधानमण्डल में कानून पास करने में अनावश्यक समय बर्बाद नहीं होता। एक सदन दूसरे सदन में बिल भेजने से बिल के पास करने में देरी होती है। जब एक ही सदन में बिल पर पूरा विचार हो जाता है तो उस पर दोबारा विचार करने के लिए दूसरे सदन की कोई आवश्यकता नहीं है।

एक सदनीय विधानमण्डल की हानियां-एक सदनीय विधानमण्डल की मुख्य तीन हानियां इस प्रकार हैं-

  • एक-सदनीय विधानमण्डल निरंकुश बन जाता है-यह आम कहा जाता है कि “शक्ति मनुष्य को भ्रष्ट कर देती है।” एक सदन का भी यही हाल होता है जिस दल का सदन बहुमत में होता है, वह अपनी मनमानी करता है और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करता है।
  • एक-सदनीय विधानमण्डल में बिलों पर पूरा विचार नहीं होता-एक सदनीय विधानमण्डल में बिलों को बिना विचार किए तेज़ी से पास कर दिया जाता है। एक-सदनीय विधानमण्डल में जनता के चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं। चुनाव के समय जनता के साथ बहुत वायदे होते हैं जिसके कारण जनता की वाह-वाह लेने के लिए सत्तारूढ़ दल तेज़ी से कानून पास करते जाते हैं। इस तरह राष्ट्र के हित की कोई परवाह नहीं की जाती।
  • संघात्मक शासन प्रणाली के लिए उचित नहीं-एक सदनीय विधानमण्डल संघीय शासन प्रणाली के लिए ठीक नहीं है क्योंकि राज्यों को प्रतिनिधित्व नहीं मिलता।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. विधानपालिका से क्या अभिप्राय है ? इसकी कितनी किस्में हैं ?
उत्तर-विधानपालिका से हमारा अभिप्राय सरकार के उस अंग से है जो राज्य प्रबन्ध के लिए कानूनों का निर्माण करता है। विधानपालिका सरकार के बाकी दोनों अंगों से अधिक महत्त्वपूर्ण है। लॉस्की के अनुसार, “विधानपालिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की सीमाओं का निर्धारण करती है।” यह प्रचलित कानूनों में संशोधन करती है। यदि यह महसूस करे कि यह कानून ठीक नहीं है तो यह उन कानूनों को रद्द भी कर सकती है। विधानपालिका दो तरह की हो सकती है-एक सदनीय विधानपालिका और दो सदनीय विधानपालिका। इन दोनों का वर्णन इस प्रकार है

  • एक सदनीय विधानपालिका-एक सदनीय विधानपालिका में एक सदन होता है। उदाहरणस्वरूप चीन, टर्की, श्रीलंका आदि में विधानपालिका एक सदनीय है।
  • दो सदनीय विधानपालिका-इस तरह की विधानपालिका में विधानपालिका के दो सदन-ऊपरी सदन व निम्न सदन होते हैं। उदाहरणस्वरूप अमेरिका, ब्रिटेन, भारत, स्विट्ज़रलैण्ड आदि राज्यों में विधानपालिका दो सदनीय है।

प्रश्न 2. व्यवस्थापिका के चार महत्त्वपूर्ण कार्य बताएं।
उत्तर-आधुनिक समय में व्यवस्थापिका के तीन महत्त्वपूर्ण कार्य निम्नलिखित हैं-

  • कानून-निर्माण का कार्य-व्यवस्थापिका का प्रमुख कार्य कानूनों का निर्माण करना है। व्यवस्थापिका जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है और जनता की इच्छा को विधानमण्डल के कानूनों द्वारा प्रकट किया जाता है।
  • कार्यपालिका पर नियन्त्रण-संसदीय सरकार में कार्यपालिका तभी तक अपने पद पर बनी रह सकती है जब उसे विधानमण्डल में बहुमत प्राप्त हो। विधानपालिका अविश्वास प्रस्ताव पास करके उसे हटा सकती है। अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका प्रत्यक्ष तौर पर व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती परन्तु फिर भी विधानमण्डल का थोड़ा-बहुत प्रभाव कार्यपालिका पर पड़ता है।
  • वित्त पर नियन्त्रण-संसार के प्रायः सभी लोकतन्त्रीय राज्यों में वित्त पर विधानमण्डल का नियन्त्रण होता है। कार्यपालिका, विधानमण्डल की अनुमति के बिना धन खर्च नहीं कर सकती। विधानमण्डल प्रतिवर्ष बजट पास करती है। टैक्स लगाना, पुराने टैक्सों में संशोधन करना और करों को समाप्त करना विधानपालिका का ही कार्य है।
  • संविधान में संशोधन-सभी लोकतन्त्रीय राज्यों में संविधान में संशोधन करने का अधिकार विधानमण्डल के पास है।

प्रश्न 3. द्वि-सदनीय विधानपालिका के पक्ष में चार तर्क लिखें।
उत्तर-द्वि-सदनीय विधानमण्डल के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं-

  1. दूसरा सदन पहले सदन की निरंकुशता को रोकता है-दूसरा सदन पहले सदन को मनमानी करने से रोकता है और नागरिकों की स्वतन्त्रता की रक्षा करता है।
  2. दूसरा सदन अविचारपूर्ण तथा जल्दी से पास किए गए कानूनों को रोकता है-दूसरा सदन पहले सदन के द्वारा जल्दबाज़ी तथा अविचारपूर्ण पास किए गए बिलों को कुछ समय के लिए रोक लेता है, जिससे जनता को उन पर विचार करने को समय मिल जाता है।
  3. दूसरा सदन पहले सदन के समय की बचत करता है-दूसरे सदन में विचारहीन तथा विरोधीहीन बिलों को पेश किया जाता है, इन बिलों पर पूर्ण रूप से विचार-विमर्श करने के पश्चात् बिल दूसरे सदन में पेश किया जाता है। पहला सदन इन बिलों को शीघ्र ही पास कर देता है। इस प्रकार दूसरा सदन पहले सदन के समय की बचत करता है।
  4. अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व-दूसरे सदन का होना आवश्यक है, ताकि विशेष वर्गों तथा अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व दिया जा सके।

प्रश्न 4. दूसरे सदन के विपक्ष में चार तर्क दीजिए।
उत्तर-दूसरे सदन के विपक्ष में निम्नलिखित मुख्य तर्क दिए जाते हैं-

  • जनता की इच्छा एक है, दो नहीं-एक सदन के समर्थकों के अनुसार किसी विषय पर जनमत केवल एक ही हो सकता है दो नहीं, क्योंकि निम्न सदन में जनता के चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं अतः वही जनता की इच्छा को अधिक अच्छी तरह प्रकट कर सकते हैं।
  • दूसरा सदन या तो व्यर्थ है या शरारती-कहने का अभिप्राय यह है कि यदि ऊपरि सदन, निम्न सदन के प्रत्येक बिल को पास कर देता है तो वह व्यर्थ है। उसका कोई लाभ नहीं है और यदि वह निम्न सदन के द्वारा पास किए गए बिलों का विरोध करता है तो वह शरारती है।
  • गतिरोध की सम्भावना-विधानमण्डल के दूसरे सदन का एक दोष यह भी होता है कि दोनों सदनों में गतिरोध उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है। दोनों सदनों में गतिरोध की सम्भावना उस समय और भी बढ़ जाती है जब एक सदन में एक दल का बहुमत हो और दूसरे सदन में किसी अन्य राजनीतिक दल का।
  • अधिक खर्च- दूसरा सदन लाभदायक नहीं है, पर इसका देश के बजट पर बोझ पड़ा रहता है।

प्रश्न 5. अविश्वास प्रस्ताव का अर्थ संक्षेप में समझाइए।
उत्तर-संसदीय सरकार में कार्यपालिका अर्थात् मन्त्रिमण्डल अपने कार्यों और नीतियों के संचालन के लिए विधानपालिका के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होता है। मन्त्रिमण्डल का कार्यकाल विधानपालिका के समर्थन पर निर्भर करता है। विधानपालिका मन्त्रियों को अविश्वास प्रस्ताव पास करके अपने पद से हटा सकता है। अविश्वास का प्रस्ताव एक ऐसा प्रस्ताव है जिसके द्वारा विधानपालिका मन्त्रियों को उनके पद से हटा सकता है। यदि विधानपालिका का निम्न सदन किसी एक मन्त्री अथवा समस्त मन्त्रिमण्डल के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास कर देता है तो सभी मन्त्रियों को सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धान्त के अनुसार अपने पदों से त्याग-पत्र देना पड़ता है। इस अविश्वास प्रस्ताव के द्वारा विधानपालिका कार्यपालिका पर अपना नियन्त्रण बनाए रखती है।

प्रश्न 6. निन्दा प्रस्ताव (Censure Motion) का अर्थ बताएं। (Textual Question) (P.B. 1988)
उत्तर-संसदीय सरकार में विधानपालिका निन्दा प्रस्ताव के द्वारा भी कार्यपालिका अर्थात् मन्त्रिमण्डल पर अपना नियन्त्रण बनाए रखती है। निन्दा प्रस्ताव के द्वारा विधानपालिका के सदस्य मन्त्रियों के द्वारा अपनाई गई नीतियों तथा उनके प्रशासनिक कार्यों की निन्दा करते हैं। जब विधानपालिका के निम्न सदन में निन्दा प्रस्ताव पास कर दिया जाता है तब मन्त्रिमण्डल को अपने पद से त्याग-पत्र देना पड़ता है। इस प्रस्ताव की शक्ति अविश्वास प्रस्ताव के समान होती है।

प्रश्न 7. स्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion) का अर्थ बताएं।
उत्तर-विधानपालिका अपना दैनिक कार्य पूर्व निश्चित कार्यक्रम के अनुसार करती है। परन्तु कई बार देश में अचानक कोई विशेष और महत्त्वपूर्ण घटना घट जाती है, जैसे कि कोई रेल दुर्घटना, कहीं पुलिस और जनता में झगड़ा होने से कुछ व्यक्तियों की मौत हो जाए इत्यादि तो ऐसे समय संसद् का कोई भी सदस्य स्थगन प्रस्ताव (काम रोको प्रस्ताव) पेश कर सकता है। इस प्रस्ताव का यह अर्थ है कि सदन का निश्चित कार्यक्रम थोड़े समय के लिए रोक दिया जाए और उस घटना या समस्या पर विचार किया जाए। अध्यक्ष इस पर विचार करता है और यदि उचित समझे तो स्वीकार कर लेता है। अध्यक्ष अपनी स्वीकृति के बाद सदन से पूछता है और यदि सदस्यों की निश्चित संख्या उस प्रस्ताव के शुरू किए जाने के पक्ष में हो तो प्रस्ताव आगे चलता है वरन् नहीं। प्रस्ताव स्वीकार हो जाने पर सदन का निश्चित कार्यक्रम रोक दिया जाता है और उस विशेष घटना पर विचार होता है। इस प्रकार स्थगन प्रस्ताव सरकार का ध्यान किसी महत्त्वपूर्ण घटना या समस्या की ओर आकर्षित करने के लिए पेश किया जाता है।

प्रश्न 8. द्वितीय वाचन (Second Reading) का अर्थ बताएं।
उत्तर-विधानपालिका में कानून बनने से पूर्व बिल को अनेक चरणों से गुज़रना पड़ता है। ये चरण प्रथम वाचन, द्विवीय वाचन, सामति स्तर, रिपोर्ट स्तर तथा तृतीय वाचन होते हैं। इन चरणों में से द्वितीय वाचन का चरण एक विशेष महत्त्वपूर्ण चरण होता है। बिल के द्वितीय वाचन के समय ही सदस्यों को वाद-विवाद का पहला अवसर मिलता है। प्रायः बिल को पेश करने वाला बिल के सिद्धान्तों तथा उद्देश्यों पर प्रकाश डालता है। विधानपालिका के सदस्यों को बिल के मौलिक सिद्धान्तों की आलोचना करने का अवसर मिलता है। इस चरण में बिल पर मतदान भी करवाया जाता है। द्वितीय वाचन ही बिल को जीवन अथवा मृत्यु प्रदान करता है।

प्रश्न 9. द्वि-सदनीय प्रणाली पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-क्या विधानमण्डल के दो सदन होने चाहिए अथवा एक सदन होना चाहिए, इस बारे में काफ़ी मतभेद पाया जाता है। जे० एस० मिल, सर हैनरी मेन आदि लेखकों ने द्वि-सदनीय विधानमण्डल का समर्थन किया है। जब विधानमण्डल के दो सदन हों तो उसे द्वि-सदनीय विधानमण्डल कहा जाता है। इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, स्विट्ज़रलैंड, भारत आदि देशों में विधानमण्डल के दो सदन पाए जाते हैं। पहले सदन को निम्न सदन तथा दूसरे सदन को उपरि सदन कहा जाता है।

प्रश्न 10. व्यवस्थापिका किस भान्ति कार्यपालिका पर नियन्त्रण रखती है ?
उत्तर–संसदीय सरकार में व्यवस्थापिका निम्नलिखित तरीकों से कार्यपालिका पर नियन्त्रण रखती है-

  • व्यवस्थापिका के सदस्य कार्यपालिका (मन्त्रियों) से प्रश्न तथा पूरक प्रश्न पूछ सकते हैं और मन्त्रियों को पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देना पड़ता है।
  • स्थगन अथवा काम रोको प्रस्ताव लाकर व्यवस्थापिका सार्वजनिक महत्त्व के मामलों पर विवाद कर सकती है।
  • बजट अस्वीकार करके या अविश्वास प्रस्ताव पास करके व्यवस्थापिका कार्यपालिका को हटा सकती है।

अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका प्रत्यक्ष तौर पर व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती। परन्तु फिर भी कार्यपालिका का थोड़ा-बहुत काम व्यवस्थापिका पर निर्भर होता है।

प्रश्न 11. विधानपालिका की रचना का वर्णन करें।
उत्तर-आमतौर पर राज्यों में द्वि-सदनीय विधानपालिका पाई जाती है जिसमें एक सदन को निम्न सदन (Lower House) और दूसरे को उच्च सदन (Upper Chamber) कहा जाता है। निम्न सदन के सदस्य प्रायः वयस्क मताधिकार के आधार पर जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं। उच्च सदन के सदस्यों का चुनाव विभिन्न देशों में भिन्न-भिन्न तरीके से किया जाता है। भारत में उच्च सदन के सदस्यों का चुनाव राज्य विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय मत-प्रणाली द्वारा होता है और अमेरिका में प्रत्यक्ष रूप में होता है। इंग्लैण्ड में उच्च सदन के अधिकांश सदस्य पैतृक होते हैं।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. विधानपालिका से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-विधानपालिका से हमारा अभिप्राय सरकार के उस अंग से है जो राज्य प्रबन्ध के लिए कानूनों का निर्माण करता है। विधानपालिका सरकार के बाकी दोनों अंगों से अधिक महत्त्वपूर्ण है। लॉस्की के अनुसार, “विधानपालिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की सीमाओं का निर्धारण करती है।”

प्रश्न 2. व्यवस्थापिका के दो महत्त्वपूर्ण कार्य बताएं।
उत्तर-

  • कानून-निर्माण का कार्य-व्यवस्थापिका का प्रमुख कार्य कानूनों का निर्माण करना है। व्यवस्थापिका जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है और जनता की इच्छा को विधानमण्डल के कानूनों द्वारा प्रकट किया जाता है।
  • कार्यपालिका पर नियन्त्रण-संसदीय सरकार में कार्यपालिका तभी तक अपने पद पर बनी रह सकती है जब तक उसे विधानमण्डल में बहुमत प्राप्त हो। विधानपालिका अविश्वास प्रस्ताव पास करके उसे हटा सकती है।

प्रश्न 3. द्वि-सदनीय विधानपालिका के पक्ष में दो तर्क लिखें।
उत्तर-

  • दूसरा सदन पहले सदन की निरंकुशता को रोकता है-जिस देश में विधानमण्डल में एक सदन होता है वहां पर वह निरंकुश बन जाता है। पहले सदन की निरंकुशता को रोकने के लिए दूसरे सदन का होना आवश्यक है। दूसरा सदन पहले सदन को मनमानी करने से रोकता है और नागरिकों की स्वतन्त्रता की रक्षा करता है।
  • दूसरा सदन अविचारपूर्ण तथा जल्दी से पास किए गए कानूनों को रोकता है-दूसरा सदन पहले सदन के द्वारा जल्दबाज़ी तथा अविचारपूर्ण पास किए गए बिलों को कुछ समय के लिए रोक लेता है, जिस जनता को उन पर विचार करने का समय मिल जाता है।

प्रश्न 4. दूसरे सदन के विपक्ष में दो तर्क दीजिए।
उत्तर-

  • जनता की इच्छा एक है, दो नहीं-एक सदन के समर्थकों के अनुसार किसी विषय पर जनमत केवल एक ही हो सकता है दो नहीं, क्योंकि निम्न सदन में जनता के चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं अतः वही जनता की इच्छा को अधिक अच्छी तरह प्रकट कर सकते हैं।
  • दूसरा सदन या तो व्यर्थ है शरारती-कहने का अभिप्राय यह है कि यदि ऊपरी सदन, निम्न सदन के प्रत्येक बिल को पास कर देता है तो वह व्यर्थ है। उसका कोई लाभ नहीं है और यदि वह निम्न सदन के द्वारा पास किए गए बिलों का विरोध करता है तो वह शरारती है।

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1. संविधान की कोई एक परिभाषा दें।
उत्तर-बुल्जे के अनुसार, “संविधान उन नियमों का समूह है, जिनके अनुसार सरकार की शक्तियां, शासितों के अधिकार तथा इन दोनों के आपसी सम्बन्धों को व्यवस्थित किया जाता है।”

प्रश्न 2. संविधान के कोई दो रूप/प्रकार लिखें।
उत्तर-

  1. विकसित संविधान
  2. निर्मित संविधान।

प्रश्न 3. विकसित संविधान किसे कहते हैं ?
उत्तर-जो संविधान ऐतिहासिक उपज या विकास का परिणाम हो, उसे विकसित संविधान कहा जाता है।

प्रश्न 4. लिखित संविधान किसे कहते हैं ? ।
उत्तर-लिखित संविधान उसे कहा जाता है, जिसके लगभग सभी नियम लिखित रूप में उपलब्ध हों।

प्रश्न 5. अलिखित संविधान किसे कहते हैं ?
उत्तर-अलिखित संविधान उसे कहते हैं, जिसकी धाराएं लिखित रूप में न हों, बल्कि शासन संगठन अधिकतर रीति-रिवाज़ों और परम्पराओं पर आधारित हो।

प्रश्न 6. कठोर एवं लचीले संविधान में एक अन्तर लिखें।
उत्तर-कठोर संविधान की अपेक्षा लचीले संविधान में संशोधन करना अत्यन्त सरल है।

प्रश्न 7. लचीले संविधान का कोई एक गुण लिखें।
उत्तर- लचीला संविधान समयानुसार बदलता रहता है।

प्रश्न 8. किसी एक विद्वान् का नाम लिखें, जो लिखित संविधान का समर्थन करता है?
उत्तर-डॉ० टॉक्विल ने लिखित संविधान का समर्थन किया है।

प्रश्न 9. कठोर संविधान का एक गुण लिखें।
उत्तर-कठोर संविधान राजनीतिक दलों के हाथ में खिलौना नहीं बनता।

प्रश्न 10. एक अच्छे संविधान का एक गुण लिखें।
उत्तर-संविधान स्पष्ट एवं सरल होता है।

प्रश्न 11. अलिखित संविधान का एक गुण लिखें।
उत्तर-यह समयानुसार बदलता रहता है।

प्रश्न 12. अलिखित संविधान का कोई एक दोष लिखें।
उत्तर-अलिखित संविधान में शक्तियों के दुरुपयोग की सम्भावना बनी रहती है।

प्रश्न 13. लिखित संविधान का कोई एक गुण लिखें।
उत्तर-लिखित संविधान निश्चित तथा स्पष्ट होता है।

प्रश्न 14. लिखित संविधान का एक दोष लिखें।
उत्तर-लिखित संविधान समयानुसार नहीं बदलता।

प्रश्न 15. जिस संविधान को आसानी से बदला जा सके, उसे कैसा संविधान कहा जाता है ?
उत्तर-उसे लचीला संविधान कहा जाता है।

प्रश्न 16. जिस संविधान को आसानी से न बदला जा सकता हो, तथा जिसे बदलने के लिए किसी विशेष तरीके को अपनाया जाता हो, उसे कैसा संविधान कहते हैं ?
उत्तर-उसे कठोर संविधान कहते हैं। प्रश्न 17. लचीले संविधान का एक दोष लिखें। उत्तर-यह संविधान पिछड़े हुए देशों के लिए ठीक नहीं।

प्रश्न 18. कठोर संविधान का एक गुण लिखें।
उत्तर-कठोर संविधान निश्चित एवं स्पष्ट होता है।

प्रश्न 19. कठोर संविधान का एक दोष लिखें।
उत्तर-कठोर संविधान क्रान्ति को प्रोत्साहन देता है।

प्रश्न 20. शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Power) का सिद्धान्त किसने प्रस्तुत किया?
उत्तर-शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त मान्टेस्क्यू ने प्रस्तुत किया।

प्रश्न 21. संविधानवाद की साम्यवादी विचारधारा के मुख्य समर्थक कौन हैं ?
उत्तर-संविधानवाद की साम्यवादी विचारधारा के मुख्य समर्थक कार्ल-मार्क्स हैं।

प्रश्न 22. संविधानवाद के मार्ग की एक बड़ी बाधा लिखें।
उत्तर-संविधानवाद के मार्ग की एक बाधा युद्ध है।

प्रश्न 23. अरस्तु ने कितने संविधानों का अध्ययन किया?
उत्तर-अरस्तु ने 158 संविधानों का अध्ययन किया।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. ……………. संविधान उसे कहा जाता है, जिसमें आसानी से संशोधन किया जा सके।
2. जिस संविधान को सरलता से न बदला जा सके, उसे …………… संविधान कहते हैं।
3. लिखित संविधान एक ……………. द्वारा बनाया जाता है।
4. ……………. संविधान समयानुसार बदलता रहता है।
5. ……………. में क्रांति का डर बना रहता है।
उत्तर-

  1. लचीला
  2. कठोर
  3. संविधान सभा
  4. अलिखित
  5. लिखित संविधान।

प्रश्न III. निम्नलिखित में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. अलिखित संविधान अस्पष्ट एवं अनिश्चित होता है।
2. लचीले संविधान में क्रांति की कम संभावनाएं रहती हैं।
3. कठोर संविधान अस्थिर होता है।
4. एक अच्छा संविधान स्पष्ट एवं निश्चित होता है।
5. कठोर संविधान समयानुसार बदलता रहता है।
उत्तर-

  1. सही
  2. सही
  3. ग़लत
  4. सही
  5. ग़लत ।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न 1. कठोर संविधान का गुण है
(क) यह राजनीतिक दलों के हाथ में खिलौना नहीं बनता
(ख) संघात्मक राज्य के लिए उपयुक्त नहीं है
(ग) समयानुसार नहीं बदलता
(घ) संकटकाल में ठीक नहीं रहता।
उत्तर-(क) यह राजनीतिक दलों के हाथ में खिलौना नहीं बनता

प्रश्न 2. एक अच्छे संविधान का गुण है-
(क) संविधान का स्पष्ट न होना
(ख) संविधान का बहुत विस्तृत होना
(ग) व्यापकता तथा संक्षिप्तता में समन्वय
(घ) बहुत कठोर होना।
उत्तर-(ग) व्यापकता तथा संक्षिप्तता में समन्वय

प्रश्न 3. “संविधान उन नियमों का समूह है, जो राज्य के सर्वोच्च अंगों को निर्धारित करते हैं, उनकी रचना, उनके आपसी सम्बन्धों, उनके कार्यक्षेत्र तथा राज्य में उनके वास्तविक स्थान को निश्चित करते हैं।” किसका कथन है ?
(क) सेबाइन
(ख) जैलिनेक
(ग) राबर्ट डाहल
(घ) आल्मण्ड पावेल।
उत्तर-(ख) जैलिनेक

प्रश्न 4. निम्नलिखित में से एक अच्छे संविधान की विशेषता है-
(क) स्पष्ट एवं निश्चित
(ख) अस्पष्टता
(ग) कठोरता
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-(क) स्पष्ट एवं निश्चित

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