Class 11 Political Science Solutions Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. राजनीति शास्त्र का दूसरे सामाजिक विज्ञानों, इतिहास, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और नीतिशास्त्र के साथ सम्बन्ध बताएं।
(Textual Question) (Explain the relationship of Political Science with other Social Sciences i.e. History, Economics, Sociology and Ethics.)
उत्तर-राजनीति शास्त्र का मुख्य विषय राज्य तथा राज्य के अन्दर रहने वाले नागरिक हैं। मनुष्य के जीवन के अनेक पहलू हैं-राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक इत्यादि। इन सब पहलुओं का अध्ययन अनेक शास्त्र करते हैं। जैसे-राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, नीतिशास्त्र, मनोविज्ञान इत्यादि। परन्तु मनुष्य की आर्थिक अवस्था का उसकी राजनीतिक अवस्था पर काफ़ी प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार धर्म का राजनीति पर प्रभाव पड़ता है अर्थात् व्यक्ति की विभिन्न अवस्थाओं का एक-दूसरे से घनिष्ठ सम्बन्ध है। अतः राजनीतिशास्त्र का, जो मानव जीवन से सम्बन्धित है तथा समाजशास्त्र है, अन्य समाजशास्त्रों से सम्बन्ध होना स्वाभाविक है। डॉ० गार्नर के अनुसार, “सम्बन्धित विज्ञानों के बिना राजनीतिशास्त्र को समझना उतना ही कठिन है, जितना रसायन विज्ञान (Chemistry) के बिना जीव विज्ञान (Biology) को समझना या गणित (Mathematics) के बगैर यन्त्र विज्ञान (Mechanics) को।” राजनीति शास्त्र का समाज शास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान इत्यादि शास्त्रों से गहरा सम्बन्ध है। एक लेखक के शब्दों में-“ये सब शास्त्र एक फूल की पंखुड़ियों (Petals of flower) के समान हैं।”

राजनीति विज्ञान तथा इतिहास में बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध है। सीले (Seeley) ने इन दोनों में सम्बन्ध बताते हुए लिखा है, “बिना राजनीति विज्ञान के इतिहास का कोई फल नहीं। बिना इतिहास के राजनीति विज्ञान की कोई जड़ नहीं।”

बर्गेस (Burgess) ने दोनों के सम्बन्ध के बारे में लिखा है, “इन दोनों को अलग कर दो उनमें से एक यदि मृत नहीं तो पंगु अवश्य हो जाएगा और दूसरा केवल आकाश-पुष्प बनकर रह जाएगा।” (“Separate them and the one becomes a cripple, if not a corpse, the other a will of the wisp.”) फ्रीमैन (Freeman) के अनुसार, “इतिहास भूतकालीन राजनीति है और राजनीति वर्तमान इतिहास है।” (“History is nothing but past politics and politics is nothing but present History.”) इन विद्वानों के कथन से राजनीति तथा इतिहास में घनिष्ठ सम्बन्ध का पता लगता है।

इतिहास की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution of History to Political Science)—इतिहास से हमें बीती हुई घटनाओं का ज्ञान होता है। राजनीति विज्ञान में हम राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन करते हैं। राजनीति विज्ञान में राज्य तथा अन्य संस्थाओं के अतीत के अध्ययन के लिए हमें इतिहास पर निर्भर करना पड़ता है। राजनीतिक संस्थाओं को समझने के लिए, उनके अतीत को जानना आवश्यक होता है और इतिहास से ही उनके अतीत को जाना जा सकता है। यदि हम इंग्लैंड की संसद् तथा राजतन्त्र का वर्तमान स्वरूप जानना चाहते हैं तो हमें वहां के इतिहास का गहरा अध्ययन करना पड़ेगा। राजनीति विज्ञान की प्रयोगशाला अथवा पथ-प्रदर्शक इतिहास है। मानवीय इतिहास के विभिन्न समयों पर राजनीति क्षेत्र में अनेक कार्य किए गए, जिनके परिणाम और सफलता-असफलता का वर्णन इतिहास से प्राप्त होता है। राजनीति क्षेत्र के ये भूतकालीन कार्य एक प्रयोग के समान ही होते हैं और ये भूतकालीन प्रयोग भविष्य के लिए मार्ग बतलाने का कार्य करते हैं। भारत के इतिहास से पता चलता है कि वही शासक सफल रहेगा जो धर्म-निरपेक्ष हो। धार्मिक सहिष्णुता की नीति के आधार पर अकबर ने विशाल साम्राज्य की स्थापना की जबकि औरंगज़ेब की धर्मान्ध नीति के कारण मुग़ल साम्राज्य का पतन हो गया। इतिहास के ज्ञान का पूरा लाभ उठाते हुए संविधान निर्माताओं ने भारत को धर्म-निरपेक्ष राज्य बनाया। भारत आजकल धर्म-निरपेक्ष नीति को अपनाए हुए है। अतः राजनीति विज्ञान के अध्ययन का आधार इतिहास है।

इतिहास राजनीति विज्ञान का शिक्षक है। इतिहास मनुष्य की सफलताओं एवं विफलताओं का संग्रह है। अतीत में मानव ने क्या-क्या भूलें कीं, किस नीति को अपनाने से अच्छा और बुरा परिणाम निकला आदि बातों का ज्ञानदाता इतिहास ही है। भारतीय इतिहास में अकबर की सफलता और औरंगज़ेब की विफलता हमें राजनीतिक शिक्षा देती है। इंग्लैंड के चार्ल्स द्वितीय और फ्रांस के लुई चौदहवें के निरंकुश राजतन्त्र हमें यह पाठ पढ़ाते हैं कि निरंकुश राज्य अधिक दिनों तक टिक नहीं सकता। इतिहास द्वारा बतलाई गई भूलों के आधार पर ही राजनीतिज्ञ भविष्य में त्रुटियों में संशोधन लाते हैं।

कोई भी राजनीतिक संस्था अकस्मात् पैदा नहीं होती। उसका वर्तमान रूप शनैः-शनैः होने वाले क्रमिक विकास का फल है। किसी समय किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए संस्था का जन्म होता है और समयानुसार उसमें परिवर्तन भी आते रहते हैं और कई बार यह संस्था नया रूप भी धारण कर लेती है। इस पृष्ठभूमि में यह आवश्यक है कि राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन पर्यवेक्षण (Observation) विधि के द्वारा किया जाए जिसके लिए इतिहास का सहारा लेना अनिवार्य है। यह कहना उचित ही है कि इतिहास की उपेक्षा करने से राजनीति शास्त्र का अध्ययन केवल काल्पनिक और सैद्धान्तिक ही होगा। ऐसे अध्ययन का दोष बताते हुए लॉस्की (Laski) कहता है, “हर प्रकार के काल्पनिक राजनीति शास्त्र का परास्त होना अनिवार्य ही है क्योंकि मनुष्य कभी भी ऐतिहासिक प्रभावों से उन्मुक्त नहीं हो सकते।” विलोबी (Willoughby) के शब्दों में “इतिहास राजनीति शास्त्र को तीसरी दिशा प्रदान करता है।” (“History gives the third dimension to Political Science …………”)

इतिहास को राजनीति शास्त्र की देन (Contribution of Political Science to History)—परन्तु इतिहास का ही राजनीति शास्त्र पर प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि इतिहास भी राजनीति शास्त्र के अध्ययन से बहुत कुछ हासिल करता है। आज की राजनीति कल का इतिहास है। इतिहास में केवल युद्ध, विजयों तथा अन्य घटनाओं का ही वर्णन नहीं आता बल्कि इसमें सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक घटनाओं का भी वर्णन आता है। यदि इतिहास की घटनाओं से राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह रह जाता है। राष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद, व्यक्तिवाद आदि धाराओं की चर्चा के बिना 17वीं शताब्दी का इतिहास अपूर्ण है। भारत के 20वीं शताब्दी के इतिहास से यदि कांग्रेस पार्टी का महत्त्व, असहयोग आन्दोलन, स्वराज्य पार्टी, भारत छोड़ो आन्दोलन, क्रिप्स योजना, केबिनेट मिशन योजना, भारत का विभाजन, चीन का भारत पर आक्रमण तथा पाकिस्तान के आक्रमण आदि राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो भारत का इतिहास महत्त्वहीन रह जाएगा। लॉर्ड एक्टन ने राजनीति शास्त्र तथा इतिहास में गहरा सम्बन्ध बताते हुए लिखा है, “राजनीति इतिहास की धारा में उसी प्रकार इकट्ठी हो जाती है जैसे नदी की रेत में सोने के कण।”

राजनीति की इतिहास को एक महत्त्वपूर्ण देन यह है कि राजनीतिक विचारधाराएं ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म देती हैं। रूसो और मॉण्टेस्क्यू के विचारों का फ्रांस की राज्यक्रान्ति पर, कार्ल मार्क्स के विचारों का सोवियत रूस की राज्यक्रान्ति पर तथा महात्मा गांधी के विचारों का भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन पर निर्णायक प्रभाव पड़ा।

दोनों में अन्तर (Differences between the two)-राजनीतिक विकास तथा इतिहास में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में अन्तर है।
1. इतिहास का क्षेत्र राजनीतिक विज्ञान से व्यापक है (Scope of History is wider than the scope of Political Science)-फ्रीमैन के कथन से समहत होना कठिन है क्योंकि पूर्ण भूतकालीन इतिहास राजनीति नहीं है और वर्तमान राजनीति कल का इतिहास नहीं है। इतिहास में प्रत्येक घटना का वर्णन किया जाता है। इसका क्षेत्र व्यापक है। जब हम 19वीं शताब्दी का इतिहास पढ़ते हैं तो इसमें उस समय की सभी घटनाओं, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक का वर्णन आ जाता है, परन्तु राजनीति शास्त्र का सम्बन्ध केवल राजनीतिक घटनाओं से होता है।

2. राजनीति विज्ञान भूत, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित है, जबकि इतिहास केवल भूतकाल से सम्बन्धित है-राजनीति शास्त्र में राजनीतिक संस्थाओं के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन किया जाता है। राज्य कैसा था, कैसा है और कैसा होना चाहिए, इन तीनों का उत्तर राजनीति शास्त्र से मिलता है, परन्तु इतिहास में केवल बीती घटनाओं का ही वर्णन आता है।

3. इतिहास वर्णनात्मक है जबकि राजनीति विज्ञान विचारशील है- इतिहास में केवल घटनाओं का वर्णन किया जाता है जबकि राजनीति शास्त्र में इन घटनाओं का मूल्यांकन भी किया जाता है और इस मूल्यांकन के आधार पर निश्चित परिणाम निकाले जाते हैं। इस प्रकार इतिहास वर्णनात्मक है परन्तु राजनीति शास्त्र विचारात्मक भी है।

4. इतिहासकार नैतिक निर्णय नहीं देता, परन्तु राजनीति विज्ञान के विद्वानों के लिए नैतिक निर्णय देना आवश्यक है-इतिहासकार केवल बीती हुई घटनाओं का वर्णन करता है। वह घटनाओं की नैतिकता के आधार पर परख करके कोई निर्णय नहीं देता है। उदाहरण के लिए, दिसम्बर 1971 में भारत का पाकिस्तान से युद्ध हुआ। इतिहासकार का कार्य केवल युद्ध की घटनाओं का वर्णन करना है। इतिहासकार का इस बात के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है कि युद्धबन्दियों के साथ कैसा व्यवहार किया गया, असैनिक आबादी पर बम बरसाए गए तो कोई अन्तर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हुआ है या नहीं। परन्तु राजनीति विज्ञान का विद्वान् युद्ध के नैतिक पहलू पर अपना निर्णय अवश्य देगा।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति विज्ञान तथा इतिहास में अन्तर होते हुए भी घनिष्ठ सम्बन्ध है और इस विचार को सब विद्वान् मान्यता प्रदान करते हैं। गार्नर (Garmer) के शब्दों में, ‘अध्ययन विषय के तौर पर यह एक-दूसरे के सहायक व पूरक हैं।’

सीले (Seeley) ने इन दोनों को पूरक सिद्ध करने के लिए कहा है, “इतिहास के उदार प्रभाव के बिना राजनीति अशिष्ट है और राजनीति से अपने सम्बन्ध को भुला देने से इतिहास साहित्य मात्र रह जाता है।”

राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में गहरा सम्बन्ध है। प्राचीन काल में अर्थशास्त्र ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र’ (Political Economy) के नाम से प्रसिद्ध था। विद्वानों ने ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र’ की परिभाषा इस प्रकार की है-“यह राज्य के लिए राजस्व (Revenue) जुटाने की एक कला है।” भारतीय विद्वान् चाणक्य ने अपनी पुस्तक ‘अर्थशास्त्र’ में राजनीतिक समस्याओं का वर्णन किया । इसी प्रकार राजनीति विज्ञान के कई मान्य ग्रन्थों जैसे अरस्तु की ‘Politics’ तथा लॉक की ‘नागरिक प्रशासन पर दो लेख’ (Two Treatises on Civil Government) में उन विषयों का विवेचन मिलता है, जिन्हें आजकल अर्थशास्त्र में शामिल किया जाता है। इस प्रकार प्राचीन काल में दो शास्त्रों को एक माना जाता था, परन्तु 19वीं शताब्दी में एडम स्मिथ ने आर्थिक क्षेत्र में राज्य के हस्तक्षेप को अनुचित बताया। एडम स्मिथ पहला विद्वान् था जिसने अर्थशास्त्र को राजनीति शास्त्र से अलग किया। 20वीं शताब्दी के अर्थशास्त्रियों ने अर्थशास्त्र को एक स्वतन्त्र सामाजिक विषय सिद्ध करने का प्रयत्न किया। अर्थशास्त्र का सम्बन्ध सम्पत्ति के उत्पादन, उपभोग, वितरण तथा विनिमय सम्बन्धी मनुष्य की गतिविधियों से है।

यह ठीक है कि 20वीं शताब्दी के अर्थशास्त्र को एक स्वतन्त्र विज्ञान माना गया है, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में कोई सम्बन्ध नहीं। अब भी दोनों शास्त्रों में घनिष्ठ सम्बन्ध है और आपस में आदानप्रदान करते हैं।

अर्थशास्त्र की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution of Economics to Political Science)-वर्तमान युग में मनुष्य तथा राज्य की मुख्य समस्याएं आर्थिक हैं। इतिहास से पता चलता है कि आर्थिक समस्याएं मनुष्य की राजनीतिक संस्थाओं को प्रभावित करती हैं। राजनीतिक संस्थाओं का उदय व विकास आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम है। जब मनुष्य आखेट अवस्था में से गुज़र रहा था अर्थात् जब मनुष्य का पेशा शिकार करना था तब राज्य के उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं होता था क्योंकि उस समय मनुष्य एक स्थान पर नहीं रहता था। जब मनुष्य ने कृषि करना आरम्भ किया, इसके साथ ही मनुष्य को एक निश्चित स्थान पर रहना पड़ा, जिससे राज्य की उत्पत्ति हुई। पहले सरकार पर बड़ेबड़े ज़मींदारों का प्रभाव होता था, परन्तु यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् सरकार पर उद्योगपतियों का प्रभाव हो गया है। आजकल हमारे देश में भी उद्योगपतियों का ही अधिक प्रभाव है।

व्यक्तिवाद, समाजवाद तथा साम्यवाद मुख्यतः आर्थिक सिद्धान्त हैं परन्तु इनका अध्ययन राजनीतिशास्त्र में भी किया जाता है क्योंकि इन आर्थिक सिद्धान्तों ने राज्य के ढांचे को ही बदल दिया है। चीन में साम्यवाद है। उत्पादन के साधनों पर सरकार का पूर्ण नियन्त्रण है। सरकार की समस्त शक्तियां कम्युनिस्ट पार्टी (Communist Party) के हाथ में ही हैं। अमेरिका में पूंजीवाद है, जिसके कारण वहां की सरकार संगठन तथा सरकार के उद्देश्य चीन की सरकार से भिन्न हैं। अतः आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तन आने पर राजनीतिक क्षेत्र में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। कार्ल मार्क्स (Karl Marx) के अनुसार, उत्पादन के साधनों में परिवर्तन होने पर राजनीतिक परिवर्तन होना अनिवार्य है। कार्ल मार्क्स का यह कथन सर्वथा सत्य तो नहीं है परन्तु इतना अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा कि आर्थिक परिवर्तन ही राजनीतिक परिवर्तन का मुख्य कारण भी होता है।

राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियां मुख्यतः आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम होती हैं। 18वीं शताब्दी में इंग्लैंड और यूरोप के अन्य देशों में जो औद्योगिक क्रान्तियां हुई हैं उनके परिणामस्वरूप ही यूरोप के इन देशों में उपनिवेशवाद और समाजवाद की नीति अपनाई। इस सम्बन्ध में बिस्मार्क और जोज़फ चैम्बरलेन के कथन महत्त्वपूर्ण हैं। बिस्मार्क का कथन था, “मुझे यूरोप के बाहर नए राज्यों की नहीं, बल्कि व्यापारिक केन्द्रों की आवश्यकता है।” (“I want outside Europe…not provinces but commerical enterprises.”)

राजनीतिक क्षेत्र की अनेक मत्त्वपूर्ण घटनाएं आर्थिक गतिविधियों के परिणामस्वरूप ही घटित हुई हैं। भारत में आज लोकतन्त्र को इतनी सफलता नहीं मिली जितनी कि अमेरिका तथा इंग्लैंड में प्राप्त हुई है। भारत में सफलता न मिलने का मुख्य कारण लोगों की आर्थिक दशा है। भारत की अधिकांश जनता ग़रीब है, अधिकारों तथा कर्तव्यों का स्वतन्त्रतापूर्वक प्रयोग नहीं कर पाती। लोगों के वोट खरीद लिए जाते हैं। दूसरे विश्व-युद्ध के पश्चात् बहुत से देशों को अमेरिका से आर्थिक सहायता लेनी पड़ी जिसका परिणाम यह हुआ कि उन देशों की नीतियों पर भी अमेरिका का प्रभाव पड़ा।

अर्थशास्त्र को राजनीति विज्ञान की देन (Contribution of Political Science to Economics)-अर्थशास्त्र के अध्ययन में राजनीति विज्ञान से भी बहुत सहायता मिलती है। राजनीतिक संगठन का देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। शासन-व्यवस्था यदि दृढ़ और शक्तिशाली है तो वहां की जनता की आर्थिक दशा अच्छी होगी। आर्थिक दशाओं का ही नहीं सरकार की नीतियों का भी आर्थिक व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है। सरकार की कर नीति, आयात-निर्यात नीति, विनिमय की दर, बैंक नीति, व्यापार तथा उद्योग सम्बन्धी कानून, सीमा शुल्क नीति आदि का राज्य की अर्थव्यवस्था पर विशेष प्रभाव पड़ता है। सरकार पूंजीवाद तथा साम्यवाद को अपना कर देश की आर्थिक व्यवस्था को बदल सकती है। भारत सरकार ने पंचवर्षीय योजनाएं बनाईं हैं ताकि लोगों के जीवन-स्तर को ऊंचा किया जा सके। सरकार बड़े-बड़े उद्योगों को अपने हाथों में ले रही है। बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया है जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत प्रभाव पड़ा।

युद्ध एक सैनिक और राजनीतिक क्रिया है परन्तु इसका देश की अर्थव्यवस्था पर भारी प्रभाव पड़ता है। अमेरिका की आर्थिक स्थिति में गिरावट होने का एक महत्त्वपूर्ण कारण वियतनाम युद्ध रहा है। इसी प्रकार 1962 में चीन के साथ युद्ध और 1965 तथा 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों ने भारत की अर्थव्यवस्था को बहुत प्रभावित किया है।

अतः इस विवेचना से स्पष्ट हो जाता है कि अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान एक-दूसरे के पूरक हैं। एक का अस्तित्व दूसरे के अस्तित्व पर निर्भर करता है।

अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में समानताएं (Points of Similarity between Economics and Political Science) अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में निम्नलिखित समानताएं पाई जाती हैं-

दोनों का विषय समाज में रह रहा मनुष्य है-समाज में रह रहा मनुष्य दोनों शास्त्रों का विषय है। दोनों का उद्देश्य मानव कल्याण है और उसी के लिए दोनों कार्य करते हैं।

दोनों ही आदर्शात्मक सामाजिक विज्ञान हैं-दोनों ही भूतकाल के आधार पर वर्तमान का विश्लेषण करके भविष्य के लिए आदर्श प्रस्तुत करते हैं। दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में मानव जीवन के लिए ऐसे आदर्श स्थापित करते हैं जिनके द्वारा अधिक-से-अधिक मानव हित हो।

दोनों ही भूतकाल, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित हैं- राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र दोनों ही भूतकाल, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित हैं।

दोनों में अन्तर (Difference between the two) राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में अन्तर है, जो इस प्रकार है

1. विभिन्न विषय-क्षेत्र (Different Subject Matter) राजनीति विज्ञान मनुष्य की राजनीतिक समस्याओं का अध्ययन करता है और इस विज्ञान का मुख्य विषय राज्य तथा सरकार है। परन्तु अर्थशास्त्र मनुष्य की आर्थिक समस्याओं का अध्ययन करता है। मनुष्य धन कैसे कमाता है, कैसे उसका उपयोग करता है इत्यादि प्रश्नों का उत्तर अर्थशास्त्र देता है। इस प्रकार दोनों का विषय-क्षेत्र अलग-अलग है।

2. दृष्टिकोण (Approach)—मिस्टर ब्राऊन (Mr. Brown) ने राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में भेद करते हुए लिखा है, “अर्थशास्त्र का सम्बन्ध वस्तुओं से है जबकि राजनीति विज्ञान का मनुष्यों से। अर्थशास्त्र वस्तुओं की कीमतों का अध्ययन करता है और राजनीति विज्ञान सदाचार सम्बन्धी मूल्यों का।” इस प्रकार अर्थशास्त्र व्याख्यात्मक विज्ञान है जबकि राजनीति विज्ञान आदर्शात्मक विज्ञान है।

3. अध्ययन पद्धति (Method of Study)—दोनों में एक महत्त्वपूर्ण अन्तर यह है कि दोनों तथा अध्ययन पद्धतियां अलग-अलग हैं। अर्थशास्त्र का अध्ययन राजनीति विज्ञान के अध्ययन के अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक ढंग से किया जा सकता है और इसके निष्कर्ष और सिद्धान्त अधिक सही होते हैं। इसका कारण यह है कि अर्थशास्त्र का सम्बन्ध मनुष्य की आर्थिक आवश्यकताओं से है और इन आवश्यकताओं तथा इनकी पूर्ति का उल्लेख अंकों द्वारा दर्शाया जा सकता है। अर्थशास्त्र में मात्रात्मक आंकड़ों का संग्रह राजनीति विज्ञान की अपेक्षा अधिक सम्भव है।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में भिन्नता होने के बावजूद भी यह कहा जा सकता है कि वर्तमान युग में दोनों ही अपने उद्देश्यों की प्राप्ति एक-दूसरे के सहयोग और सहायता के बिना नहीं कर सकते। डॉ० गार्नर (Dr. Garner) ने ठीक ही कहा है, “बहुत-सी आर्थिक समस्याओं का हल राजनीतिक आर्थिक हालतों से आरम्भ होता है।” विलियम एसलिंगर (William Esslinger) के विचारानुसार, “अर्थशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र की एकता का पाठ्यक्रम उपकक्षा में पढ़ाया जाना चाहिए।”

राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र में घनिष्ठ सम्बन्ध है। समाजशास्त्र मनुष्य के सामाजिक जीवन का शास्त्र है। समाज- शास्त्र समाज की उत्पत्ति, विकास, उद्देश्य तथा संगठन का अध्ययन करता है। समाजशास्त्र में मानव जीवन के सभी पहलुओं राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक इत्यादि का अध्ययन किया जाता है जबकि राजनीति शास्त्र में मानव जीवन के राजनीतिक पहलू का अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार राजनीति शास्त्र समाजशास्त्र की एक शाखा है। प्रसिद्ध विद्वान् रेटजनहाफर ने ठीक ही कहा है, “राज्य अपने विकास के प्रारम्भिक चरणों में एक सामाजिक संस्था ही थी।” हम आगस्ट काम्टे (August Comte) के इस कथन से सहमत हैं, “समाजशास्त्र सभी समाजशास्त्रों की जननी है।” राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र परस्पर बहुत कुछ आदान-प्रदान करते हैं। प्रो० कैटलिन (Catline) ने तो यहां तक कहा है, “राजनीति और समाजशास्त्र अखण्ड हैं और वास्तव में एक ही तस्वीर के दो पहलू हैं।”

राजनीति विज्ञान को समाजशास्त्र की देन (Contribution of Sociology to Political Science) समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान के लिए नींव का काम करता है और इसके नियम राजनीति विज्ञान के सिद्धान्तों को समझने के लिए बहुत सहायक हैं। बिना समाजशास्त्र के अध्ययन के राजनीति शास्त्र के सिद्धान्तों को समझना कठिन है। प्रो० गिडिंग्स (Prof. Giddings) ने ठीक ही कहा है, “समाजशास्त्र के मूल सिद्धान्तों से अनभिज्ञ लोगों को राज्य के सिद्धान्त पढ़ाना उसी प्रकार है जिस प्रकार न्यूटन के गति नियमों से अनभिज्ञ व्यक्ति को खगोल विज्ञान अथवा ऊष्मा गति की शिक्षा देना।” (“To teach the theory of the state to men who have not learned the first principles of sciology is like teaching Astronomy or Thermodynamics to men who have not learned Newton’s Laws of Motion.”) दूसरे शब्दों में, जिस प्रकार न्यूटन के गति नियमों को न जानने वाले व्यक्ति को खगोल विज्ञान की शिक्षा देना व्यर्थ है उसी प्रकार बिना समाजशास्त्र के मूल सिद्धान्तों से अनजान व्यक्ति को राज्य के सिद्धान्त पढ़ाना व्यर्थ है। समाजशास्त्रों में समाज के रीति-रिवाजों का अध्ययन किया जाता है। हम जानते हैं कि राज्य के कानून का पालन तभी किया जाता है यदि वह समाज के रीति-रिवाजों के अनुसार हो।

राज्य की उत्पत्ति, राज्य का विकास, जनमत, दल प्रणाली आदि समझने में समाज शास्त्र की बहुत देन है। समाजशास्त्र से पता चलता है कि राज्य मानव की सामाजिक भावना का परिणाम है। समाज के विकास के स्तर के साथसाथ राज्य का विकास हुआ है। राजनीतिक समाजशास्त्र (Political Sociology) राजनीति विज्ञान की एक शाखा पनप रही है, जो इस बात की स्पष्ट सूचक है कि राजनीतिक तथ्यों के विधिवत अध्ययन के लिए समाजशास्त्र की सहायता लेना आवश्यक है। इस प्रकार समाज शास्त्र का राजनीति शास्त्र पर बहुत प्रभाव पड़ा है।

राजनीति विज्ञान की समाजशास्त्र को देन (Contribution of Political Science to Sociology)-परन्तु दूसरी ओर राजनीति शास्त्र का समाजशास्त्र पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। राजनीति विज्ञान का मुख्य विषय राज्य हैराज्य की उत्पत्ति कैसे हुई, राज्य क्या है, राज्य का विकास कैसे हुआ, राज्य का उद्देश्य क्या है इन सब प्रश्नों का उत्तर राजनीति विज्ञान में मिलता है। समाजशास्त्र को राज्य से सम्बन्धित प्रत्येक जानकारी राजनीति शास्त्र से मिलती है। राजनीति विज्ञान समाजशास्त्र का एक अंग है जिसके बिना समाजशास्त्र की विषय सामग्री पूर्ण नहीं हो सकती।

राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र के आपसी सम्बन्ध का एक प्रणाम यह है कि मॉरिस, गिन्सबर्ग, आगस्त काम्टे, लेस्टर वार्ड, समवर आदि समाजशास्त्रियों ने राज्य की प्रकृति और उद्देश्यों में इतनी रुचि दिखाई है, मानो वे समाजशास्त्र की मुख्य समस्याएं हों। इसी प्रकार डेविड ईस्टन, हैरल्ड लासवैल, ग्रेवीज ए० ऑल्मण्ड, पावेल, कोलमेन, मेक्स वेबर और राजनीति शास्त्र के अन्य आधुनिक विद्वानों द्वारा समाज शास्त्र से अधिक-से-अधिक मात्रा में अध्ययन सामग्री और अध्ययन पद्धतियां प्राप्त की गई हैं।

दोनों में अन्तर (Differences between the two) राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में अन्तर है-

दोनों के क्षेत्र अलग हैं-राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र के क्षेत्र एक-दूसरे से पृथक् हैं। राजनीतिक शास्त्र का मुख्य विषय-क्षेत्र राज्य है जबकि समाजशास्त्र का मुख्य क्षेत्र समाज है।

राजनीति विज्ञान का क्षेत्र समाजशास्त्र से संकुचित है-राजनीति विज्ञान का क्षेत्र समाजशास्त्र के क्षेत्र से संकुचित है। राजनीति शास्त्र मनुष्य के राजनीतिक पहलू का ही अध्ययन कराता है जबकि समाजशास्त्र मनुष्य के सभी पहलुओं का अध्ययन कराता है।

राजनीति विज्ञान यह मानकर चलता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इसमें हम यह अध्ययन नहीं करते कि मनुष्य सामाजिक प्राणी क्यों है। परन्तु समाजशास्त्र में इस प्रश्न का भी अध्ययन किया जाता है।

समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान से पहले बना–राजनीति शास्त्र में समाज बनने से पूर्व के मानव का अध्ययन नहीं किया जाता जबकि समाजशास्त्र के विषय का अध्ययन वहीं से शुरू होता है। समाजशास्त्र के अन्तर्गत मानव जाति के दोनों युगों-संगठित तथा असंगठित-का अध्ययन किया जाता है, परन्तु राजनीति शास्त्र केवल संगठित युग का अध्ययन करता है।

समाजशास्त्र केवल भूत और वर्तमान से सम्बन्धित है परन्तु राजनीति विज्ञान भूत, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित है-राजनीति शास्त्र में राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का भी अध्ययन किया जाता है जबकि समाज शास्त्र में समाज के अतीत तथा वर्तमान का ही अध्ययन किया जाता है।

समाजशास्त्र वर्णनात्मक है जबकि राजनीति विज्ञान आदर्शात्मक है-समाजशास्त्र समाज की उत्पत्ति तथा विकास का विस्तृत रूप से अध्ययन करता है, परन्तु इस अध्ययन के पश्चात् कोई परिणाम नहीं निकलता। यह केवल सामाजिक घटनाओं का वर्णन करता है। उन घटनाओं में अच्छी तथा बुरी घटनाओं की पहचान नहीं कराता। राजनति शास्त्र केवल घटनाओं का वर्णन ही नहीं करता बल्कि परिणाम भी निकालता है, क्योंकि राजनीति विज्ञान का उद्देश्य एक आदर्श राज्य की स्थापना करना तथा आदर्श नागरिक पैदा करना है।

समाजशास्त्र में मनुष्य के चेतन (conscious) और अचेतन (unconscious) दोनों प्रकार के कार्यों का अध्ययन किया जाता है परन्तु राजनीति विज्ञान में केवल चेतन प्रकार के कार्यों का ही अध्ययन किया जाता है।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र में अन्तर होते हुए भी यह मानना पड़ेगा कि दोनों एक-दूसरे के विरुद्ध न होकर पूरक हैं। राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र में गहरा सम्बन्ध है। दोनों एक-दूसरे से आदान-प्रदान करते हैं।

राजनीति विज्ञान तथा नीतिशास्त्र में गहरा सम्बन्ध है। नीतिशास्त्र साधारण मनुष्य की भाषा में वह शास्त्र है, जो अच्छे-बुरे में अन्तर स्पष्ट करता है। नीतिशास्त्र वह शास्त्र है जिसके द्वारा धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, पाप-पुण्य, अहिंसा-हिंसा, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य तथा शुभ-अशुभ में अन्तर का पता चलता है। डीवी (Deewey) के अनुसार, “नीतिशास्त्र आचरण का वह विज्ञान है जिसमें मानवीय आचरण के औचित्य तथा अनौचित्य तथा अच्छाई तथा बुराई पर विचार किया जाता है।” नीतिशास्त्र के द्वारा हम निश्चित करते हैं कि मनुष्य का कौन-सा कार्य अच्छा है और कौनसा कार्य बुरा । यह शास्त्र नागरिकको आदर्श नागरिक बनाने में सहायक है। दूसरी ओर राज्य का मुख्य उद्देश्य भी आदर्श नागरिक बनाना है। इस प्रकार दोनों शास्त्रों में घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्राचीन यूनानी लेखकों प्लेटो तथा अरस्तु ने राजनीति शास्त्र को नीतिशास्त्र का ही एक अंग माना है। प्लेटो तथा अरस्तु के अनुसार, “राज्य एक सर्वोच्च नैतिक संस्था है। इसका उद्देश्य नागरिकों के नैतिक स्तर को ऊंचा करना है।” प्लेटो की प्रसिद्ध पुस्तक ‘रिपब्लिक’ (Republic) में राजनीति ही नहीं बल्कि नैतिक दर्शन भी भरा हुआ है। अरस्तु ने कहा था “राज्य जीवन को सम्भव बनाने के लिए उत्पन्न हुआ, परन्तु अब वह जीवन को अच्छा बनाने के लिए विद्यमान है।”

इटली के विद्वान् मैक्यावली ने सर्वप्रथम राजनीति तथा नीतिशास्त्र में भेद किया। इसके अनुसार राजा के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह नैतिकता के नियमों के अनुसार शासन चलाए। आवश्यकता पड़ने पर अनैतिकता का रास्ता भी अपनाया जा सकता है। मैक्यावली के अनुसार-राजा के सामने सबसे बड़ा उद्देश्य राज्य की सुरक्षा है और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसे सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य की परवाह नहीं करनी चाहिए। हाब्स (Hobbes) ने भी मैक्यावली के विचारों का समर्थन किया। बोदीन (Bodin), ग्रोशियस (Grotius) तथा लॉक (Locke) ने भी इन दोनों शास्त्रों को अलग किया, परन्तु रूसो (Rouseau) ने फिर इन दोनों शास्त्रों में घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित किया। कांट (Kant), ग्रीन (Green) ने भी रूसो के मत का समर्थन किया।

नीतिशास्त्र की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution of Ethics to Political Science)-वर्तमान समय में इन दोनों शास्त्रों में गहरा सम्बन्धा समझा जाता है। महात्मा गांधी ने दोनों शास्त्रों को अभिन्न माना है। उनके अनुसारसरकार को अपनी नीति नैतिकता के सिद्धान्तों पर बनानी चाहिए। सरकार की नीतियों में असत्य, अधर्म, कपट तथा पाप इत्यादि की मिलावट नहीं होनी चाहिए। कॉक्स के मतानुसार, “जो बात नैतिक दृष्टि से गलत है, वह राजनीतिक दृष्टि से सही नहीं हो सकती।” कोई भी सरकार ऐसे कानून पास नहीं कर सकती जो नैतिकता के विरुद्ध हों। यदि पास किए जाएंगे तो उनका विरोध होगा। इसके अतिरिक्त नैतिक नियम जो स्थायी और प्रचलित हो जाते हैं, कानून का रूप धारण कर लेते हैं। गैटेल (Gettell) ने लिखा है, “जब नैतिक विचार स्थायी और प्रचलित हो जाते हैं तो वे कानून का रूप ले लेते हैं।” लॉर्ड एक्टन (Lord Acton) ने ठीक ही कहा है, “समस्या यह नहीं है कि सरकार क्या करती है बल्कि यह है कि उन्हें क्या करना चाहिए।” यदि राजनीति विज्ञान को नीतिशास्त्र से पृथक् कर दें तो यह निस्सार और निरर्थक हो जाएगी। उसमें प्रगतिशीलता और आदर्शता नहीं रह पाएगी। इसलिए लॉर्ड एक्टन (Lord Acton) ने भी कहा है, “नीतिशास्त्र के अध्ययन के बिना राजनीति शास्त्र का अध्ययन विफल है।” इसके अतिरिक्त राजनीति विज्ञान की अनेक शाखाएं आचार शास्त्र की नींव पर खड़ी हैं, जैसे अन्तर्राष्ट्रीय कानून का सम्पूर्ण शास्त्र अन्तर्राष्ट्रीय नैतिकता पर आधारित है। आचार शास्त्र से संविधान भी प्रभावित होता है क्योंकि अनेक प्रकार के आदर्शों को संविधान में उचित स्थान देना अनिवार्य है। भारत और आयरलैंड के संविधान में हमें दिए गए राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व’ ही स्पष्ट उदाहरण है।

राजनीति विज्ञान की नीतिशास्त्र को देन (Contribution of Political Science to Ethics)—वर्तमान राज्य कल्याणकारी राज्य है। सरकार लोगों के नैतिक स्तर को ऊंचा करने के लिए कई प्रकार के कानून बनाती है। इसके साथ ही सरकार सामाजिक बुराइयों को दूर करती है। भारत सरकार ने सती-प्रथा, दहेज-प्रथा, छुआछूत आदि बुराइयों को कानून के द्वारा रोकने का प्रयत्न किया है और काफ़ी सफलता भी मिली है। भारत सरकार अहिंसा के सिद्धान्तों पर चल रही है और इन्हीं सिद्धान्तों का प्रचार कर रही है। भारत के प्रधानमन्त्री स्वर्गीय श्री जवाहरलाल नेहरू ने पंचशील की स्थापना की थी ताकि संसार के दूसरे देशों में भी अहिंसा का प्रचार किया जा सके। सरकार राज्य में शान्ति की स्थापना करती है और नैतिकता शान्ति के वातावरण में ही विकसित हो सकती है। यदि राज्य शान्ति का वातावरण उत्पन्न न करे, तो नैतिक जीवन बिताना असम्भव हो जाएगा। इस प्रकार सरकार कानून द्वारा ऐसा वातावरण उत्पन्न करती है जिसमें नैतिकता विकसित हो सके। क्रोशे के मतानुसार, “नैतिकता अपनी पूर्णता और उच्चतम स्पष्टता राजनीति में ही पाती है।”

दोनों में अन्तर (Difference between the two)-राजनीति विज्ञान और नीतिशास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी उन दोनों में अन्तर है, जो इस प्रकार हैं-

नीतिशास्त्र मनुष्य के प्रत्येक कार्य से सम्बन्धित रहता है जब कि राजनीति विज्ञान मनुष्य के जीवन के केवल राजनीतिक पहलू से सम्बन्ध रखता है। नीतिशास्त्र मनुष्य के आन्तरिक तथा बाहरी दोनों कार्यों से सम्बन्धित है, परन्तु राजनीति विज्ञान मनुष्य के केवल बाहरी कार्यों से सम्बन्धित है।

राज्य के नियमों का पालन करवाने के लिए शक्ति का प्रयोग किया जाता है। यदि सरकार के किसी कानून का उल्लंघन कोई मनुष्य करता है तो उसे न्यायालय द्वारा दण्ड दिया जाता है, परन्तु नीतिशास्त्र के नियमों का उल्लंघन करने पर कोई दण्ड नहीं दिया जाता क्योंकि नीतिशास्त्र के नियमों को तोड़ना अपराध नहीं केवल पाप है।

राजनीति विज्ञान मुख्यतः वर्णनात्मक है क्योंकि इसमें राज्य, सरकार की शक्तियां, संविधान इत्यादि का वर्णन करता है जबकि नीतिशास्त्र मुख्यतः आदर्शात्मक है और यह विषय जनता के सामने कुछ आदर्श रखे हुए हैं।

राजनीति विज्ञान का सम्बन्ध सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक सिद्धान्तों से है जबकि नीतिशास्त्र का सम्बन्ध केवल सिद्धान्तों से है। नीतिशास्त्र वास्तविकता से बहुत दूर है। यह केवल काल्पनिक है।

राज्य के नियमों तथा नैतिकता के नियमों में सदैव एकरूपता नहीं होती। सड़क के दाईं ओर चलना राज्य के नियम के विरुद्ध है, परन्तु नैतिकता के विरुद्ध नहीं।

राजनीति विज्ञान में हम राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन करते हैं, परन्तु इस शास्त्र का मुख्य सम्बन्ध इस बात से है कि वे क्या हैं परन्तु नीतिशास्त्र का मुख्य सम्बन्ध इससे है कि वे क्या होने चाहिएं।
राजनीति विज्ञान और नीतिशास्त्र के सम्बन्ध और अन्तर दोनों को स्पष्ट करते हुए कैटलिन ने कहा, “नीतिशास्त्र से एक राजनीतिज्ञ यह सीखता है कि अनेक मार्गों में से कौन-सा मार्ग सही है और राजनीति विज्ञान बतलाता है कि व्यावहारिक दृष्टि से कौन-सा मार्ग अपनाना सम्भव होगा।”

निष्कर्ष (Conclusion)-नीतिशास्त्र और राजनीति विज्ञान में भले ही कई भिन्नताएं हैं, फिर भी इनकी समीपता से इन्कार नहीं किया जा सकता। नीतिशास्त्र राजनीति विज्ञान के अध्ययन को समृद्ध बनाता है और व्यावहारिक राजनीति को उदात्त बनाने (To ennoble) के लिए प्रेरित करता है। आजकल की व्यावहारिक राजनीति में भ्रष्टाचार के उदाहरण सर्वप्रसिद्ध हैं और इन भ्रष्टाचारी तरीकों ने समाज के हर पक्ष को दूषित कर दिया है। इस भ्रष्टाचार से बचने के साधन नीतिशास्त्र ही सुझा सकता है।

प्रश्न 2. राजनीति विज्ञान एवं इतिहास में सम्बन्ध बताएं।
(Discuss the relation between Political Science and History.)
उत्तर-राजनीति विज्ञान तथा इतिहास में बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध है। सीले (Seeley) ने इन दोनों में सम्बन्ध बताते हुए लिखा है, “बिना राजनीति विज्ञान के इतिहास का कोई फल नहीं। बिना इतिहास के राजनीति विज्ञान की कोई जड़ नहीं।”

बर्गेस (Burgess) ने दोनों के सम्बन्ध के बारे में लिखा है, “इन दोनों को अलग कर दो उनमें से एक यदि मृत नहीं तो पंगु अवश्य हो जाएगा और दूसरा केवल आकाश-पुष्प बनकर रह जाएगा।” (“Separate them and the one becomes a cripple, if not a corpse, the other a will of the wisp.”) फ्रीमैन (Freeman) के अनुसार, “इतिहास भूतकालीन राजनीति है और राजनीति वर्तमान इतिहास है।” (“History is nothing but past politics and politics is nothing but present History.”) इन विद्वानों के कथन से राजनीति तथा इतिहास में घनिष्ठ सम्बन्ध का पता लगता है।

इतिहास की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution of History to Political Science)—इतिहास से हमें बीती हुई घटनाओं का ज्ञान होता है। राजनीति विज्ञान में हम राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन करते हैं। राजनीति विज्ञान में राज्य तथा अन्य संस्थाओं के अतीत के अध्ययन के लिए हमें इतिहास पर निर्भर करना पड़ता है। राजनीतिक संस्थाओं को समझने के लिए, उनके अतीत को जानना आवश्यक होता है और इतिहास से ही उनके अतीत को जाना जा सकता है। यदि हम इंग्लैंड की संसद् तथा राजतन्त्र का वर्तमान स्वरूप जानना चाहते हैं तो हमें वहां के इतिहास का गहरा अध्ययन करना पड़ेगा। राजनीति विज्ञान की प्रयोगशाला अथवा पथ-प्रदर्शक इतिहास है। मानवीय इतिहास के विभिन्न समयों पर राजनीति क्षेत्र में अनेक कार्य किए गए, जिनके परिणाम और सफलता-असफलता का वर्णन इतिहास से प्राप्त होता है। राजनीति क्षेत्र के ये भूतकालीन कार्य एक प्रयोग के समान ही होते हैं और ये भूतकालीन प्रयोग भविष्य के लिए मार्ग बतलाने का कार्य करते हैं। भारत के इतिहास से पता चलता है कि वही शासक सफल रहेगा जो धर्म-निरपेक्ष हो। धार्मिक सहिष्णुता की नीति के आधार पर अकबर ने विशाल साम्राज्य की स्थापना की जबकि औरंगज़ेब की धर्मान्ध नीति के कारण मुग़ल साम्राज्य का पतन हो गया। इतिहास के ज्ञान का पूरा लाभ उठाते हुए संविधान निर्माताओं ने भारत को धर्म-निरपेक्ष राज्य बनाया। भारत आजकल धर्म-निरपेक्ष नीति को अपनाए हुए है। अतः राजनीति विज्ञान के अध्ययन का आधार इतिहास है।

इतिहास राजनीति विज्ञान का शिक्षक है। इतिहास मनुष्य की सफलताओं एवं विफलताओं का संग्रह है। अतीत में मानव ने क्या-क्या भूलें कीं, किस नीति को अपनाने से अच्छा और बुरा परिणाम निकला आदि बातों का ज्ञानदाता इतिहास ही है। भारतीय इतिहास में अकबर की सफलता और औरंगज़ेब की विफलता हमें राजनीतिक शिक्षा देती है। इंग्लैंड के चार्ल्स द्वितीय और फ्रांस के लुई चौदहवें के निरंकुश राजतन्त्र हमें यह पाठ पढ़ाते हैं कि निरंकुश राज्य अधिक दिनों तक टिक नहीं सकता। इतिहास द्वारा बतलाई गई भूलों के आधार पर ही राजनीतिज्ञ भविष्य में त्रुटियों में संशोधन लाते हैं।

कोई भी राजनीतिक संस्था अकस्मात् पैदा नहीं होती। उसका वर्तमान रूप शनैः-शनैः होने वाले क्रमिक विकास का फल है। किसी समय किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए संस्था का जन्म होता है और समयानुसार उसमें परिवर्तन भी आते रहते हैं और कई बार यह संस्था नया रूप भी धारण कर लेती है। इस पृष्ठभूमि में यह आवश्यक है कि राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन पर्यवेक्षण (Observation) विधि के द्वारा किया जाए जिसके लिए इतिहास का सहारा लेना अनिवार्य है। यह कहना उचित ही है कि इतिहास की उपेक्षा करने से राजनीति शास्त्र का अध्ययन केवल काल्पनिक और सैद्धान्तिक ही होगा। ऐसे अध्ययन का दोष बताते हुए लॉस्की (Laski) कहता है, “हर प्रकार के काल्पनिक राजनीति शास्त्र का परास्त होना अनिवार्य ही है क्योंकि मनुष्य कभी भी ऐतिहासिक प्रभावों से उन्मुक्त नहीं हो सकते।” विलोबी (Willoughby) के शब्दों में “इतिहास राजनीति शास्त्र को तीसरी दिशा प्रदान करता है।” (“History gives the third dimension to Political Science …………”)

इतिहास को राजनीति शास्त्र की देन (Contribution of Political Science to History)—परन्तु इतिहास का ही राजनीति शास्त्र पर प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि इतिहास भी राजनीति शास्त्र के अध्ययन से बहुत कुछ हासिल करता है। आज की राजनीति कल का इतिहास है। इतिहास में केवल युद्ध, विजयों तथा अन्य घटनाओं का ही वर्णन नहीं आता बल्कि इसमें सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक घटनाओं का भी वर्णन आता है। यदि इतिहास की घटनाओं से राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह रह जाता है। राष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद, व्यक्तिवाद आदि धाराओं की चर्चा के बिना 17वीं शताब्दी का इतिहास अपूर्ण है। भारत के 20वीं शताब्दी के इतिहास से यदि कांग्रेस पार्टी का महत्त्व, असहयोग आन्दोलन, स्वराज्य पार्टी, भारत छोड़ो आन्दोलन, क्रिप्स योजना, केबिनेट मिशन योजना, भारत का विभाजन, चीन का भारत पर आक्रमण तथा पाकिस्तान के आक्रमण आदि राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो भारत का इतिहास महत्त्वहीन रह जाएगा। लॉर्ड एक्टन ने राजनीति शास्त्र तथा इतिहास में गहरा सम्बन्ध बताते हुए लिखा है, “राजनीति इतिहास की धारा में उसी प्रकार इकट्ठी हो जाती है जैसे नदी की रेत में सोने के कण।”

राजनीति की इतिहास को एक महत्त्वपूर्ण देन यह है कि राजनीतिक विचारधाराएं ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म देती हैं। रूसो और मॉण्टेस्क्यू के विचारों का फ्रांस की राज्यक्रान्ति पर, कार्ल मार्क्स के विचारों का सोवियत रूस की राज्यक्रान्ति पर तथा महात्मा गांधी के विचारों का भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन पर निर्णायक प्रभाव पड़ा।

दोनों में अन्तर (Differences between the two)-राजनीतिक विकास तथा इतिहास में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में अन्तर है।
1. इतिहास का क्षेत्र राजनीतिक विज्ञान से व्यापक है (Scope of History is wider than the scope of Political Science)-फ्रीमैन के कथन से समहत होना कठिन है क्योंकि पूर्ण भूतकालीन इतिहास राजनीति नहीं है और वर्तमान राजनीति कल का इतिहास नहीं है। इतिहास में प्रत्येक घटना का वर्णन किया जाता है। इसका क्षेत्र व्यापक है। जब हम 19वीं शताब्दी का इतिहास पढ़ते हैं तो इसमें उस समय की सभी घटनाओं, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक का वर्णन आ जाता है, परन्तु राजनीति शास्त्र का सम्बन्ध केवल राजनीतिक घटनाओं से होता है।

2. राजनीति विज्ञान भूत, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित है, जबकि इतिहास केवल भूतकाल से सम्बन्धित है-राजनीति शास्त्र में राजनीतिक संस्थाओं के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन किया जाता है। राज्य कैसा था, कैसा है और कैसा होना चाहिए, इन तीनों का उत्तर राजनीति शास्त्र से मिलता है, परन्तु इतिहास में केवल बीती घटनाओं का ही वर्णन आता है।

3. इतिहास वर्णनात्मक है जबकि राजनीति विज्ञान विचारशील है- इतिहास में केवल घटनाओं का वर्णन किया जाता है जबकि राजनीति शास्त्र में इन घटनाओं का मूल्यांकन भी किया जाता है और इस मूल्यांकन के आधार पर निश्चित परिणाम निकाले जाते हैं। इस प्रकार इतिहास वर्णनात्मक है परन्तु राजनीति शास्त्र विचारात्मक भी है।

4. इतिहासकार नैतिक निर्णय नहीं देता, परन्तु राजनीति विज्ञान के विद्वानों के लिए नैतिक निर्णय देना आवश्यक है-इतिहासकार केवल बीती हुई घटनाओं का वर्णन करता है। वह घटनाओं की नैतिकता के आधार पर परख करके कोई निर्णय नहीं देता है। उदाहरण के लिए, दिसम्बर 1971 में भारत का पाकिस्तान से युद्ध हुआ। इतिहासकार का कार्य केवल युद्ध की घटनाओं का वर्णन करना है। इतिहासकार का इस बात के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है कि युद्धबन्दियों के साथ कैसा व्यवहार किया गया, असैनिक आबादी पर बम बरसाए गए तो कोई अन्तर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हुआ है या नहीं। परन्तु राजनीति विज्ञान का विद्वान् युद्ध के नैतिक पहलू पर अपना निर्णय अवश्य देगा।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति विज्ञान तथा इतिहास में अन्तर होते हुए भी घनिष्ठ सम्बन्ध है और इस विचार को सब विद्वान् मान्यता प्रदान करते हैं। गार्नर (Garmer) के शब्दों में, ‘अध्ययन विषय के तौर पर यह एक-दूसरे के सहायक व पूरक हैं।’

सीले (Seeley) ने इन दोनों को पूरक सिद्ध करने के लिए कहा है, “इतिहास के उदार प्रभाव के बिना राजनीति अशिष्ट है और राजनीति से अपने सम्बन्ध को भुला देने से इतिहास साहित्य मात्र रह जाता है।”

प्रश्न 3. राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में सम्बन्ध बताएं।
(Discuss the relation between Political Science and Economics.)
उत्तर- राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में गहरा सम्बन्ध है। प्राचीन काल में अर्थशास्त्र ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र’ (Political Economy) के नाम से प्रसिद्ध था। विद्वानों ने ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र’ की परिभाषा इस प्रकार की है-“यह राज्य के लिए राजस्व (Revenue) जुटाने की एक कला है।” भारतीय विद्वान् चाणक्य ने अपनी पुस्तक ‘अर्थशास्त्र’ में राजनीतिक समस्याओं का वर्णन किया । इसी प्रकार राजनीति विज्ञान के कई मान्य ग्रन्थों जैसे अरस्तु की ‘Politics’ तथा लॉक की ‘नागरिक प्रशासन पर दो लेख’ (Two Treatises on Civil Government) में उन विषयों का विवेचन मिलता है, जिन्हें आजकल अर्थशास्त्र में शामिल किया जाता है। इस प्रकार प्राचीन काल में दो शास्त्रों को एक माना जाता था, परन्तु 19वीं शताब्दी में एडम स्मिथ ने आर्थिक क्षेत्र में राज्य के हस्तक्षेप को अनुचित बताया। एडम स्मिथ पहला विद्वान् था जिसने अर्थशास्त्र को राजनीति शास्त्र से अलग किया। 20वीं शताब्दी के अर्थशास्त्रियों ने अर्थशास्त्र को एक स्वतन्त्र सामाजिक विषय सिद्ध करने का प्रयत्न किया। अर्थशास्त्र का सम्बन्ध सम्पत्ति के उत्पादन, उपभोग, वितरण तथा विनिमय सम्बन्धी मनुष्य की गतिविधियों से है।

यह ठीक है कि 20वीं शताब्दी के अर्थशास्त्र को एक स्वतन्त्र विज्ञान माना गया है, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में कोई सम्बन्ध नहीं। अब भी दोनों शास्त्रों में घनिष्ठ सम्बन्ध है और आपस में आदानप्रदान करते हैं।

अर्थशास्त्र की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution of Economics to Political Science)-वर्तमान युग में मनुष्य तथा राज्य की मुख्य समस्याएं आर्थिक हैं। इतिहास से पता चलता है कि आर्थिक समस्याएं मनुष्य की राजनीतिक संस्थाओं को प्रभावित करती हैं। राजनीतिक संस्थाओं का उदय व विकास आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम है। जब मनुष्य आखेट अवस्था में से गुज़र रहा था अर्थात् जब मनुष्य का पेशा शिकार करना था तब राज्य के उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं होता था क्योंकि उस समय मनुष्य एक स्थान पर नहीं रहता था। जब मनुष्य ने कृषि करना आरम्भ किया, इसके साथ ही मनुष्य को एक निश्चित स्थान पर रहना पड़ा, जिससे राज्य की उत्पत्ति हुई। पहले सरकार पर बड़ेबड़े ज़मींदारों का प्रभाव होता था, परन्तु यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् सरकार पर उद्योगपतियों का प्रभाव हो गया है। आजकल हमारे देश में भी उद्योगपतियों का ही अधिक प्रभाव है।

व्यक्तिवाद, समाजवाद तथा साम्यवाद मुख्यतः आर्थिक सिद्धान्त हैं परन्तु इनका अध्ययन राजनीतिशास्त्र में भी किया जाता है क्योंकि इन आर्थिक सिद्धान्तों ने राज्य के ढांचे को ही बदल दिया है। चीन में साम्यवाद है। उत्पादन के साधनों पर सरकार का पूर्ण नियन्त्रण है। सरकार की समस्त शक्तियां कम्युनिस्ट पार्टी (Communist Party) के हाथ में ही हैं। अमेरिका में पूंजीवाद है, जिसके कारण वहां की सरकार संगठन तथा सरकार के उद्देश्य चीन की सरकार से भिन्न हैं। अतः आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तन आने पर राजनीतिक क्षेत्र में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। कार्ल मार्क्स (Karl Marx) के अनुसार, उत्पादन के साधनों में परिवर्तन होने पर राजनीतिक परिवर्तन होना अनिवार्य है। कार्ल मार्क्स का यह कथन सर्वथा सत्य तो नहीं है परन्तु इतना अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा कि आर्थिक परिवर्तन ही राजनीतिक परिवर्तन का मुख्य कारण भी होता है।

राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियां मुख्यतः आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम होती हैं। 18वीं शताब्दी में इंग्लैंड और यूरोप के अन्य देशों में जो औद्योगिक क्रान्तियां हुई हैं उनके परिणामस्वरूप ही यूरोप के इन देशों में उपनिवेशवाद और समाजवाद की नीति अपनाई। इस सम्बन्ध में बिस्मार्क और जोज़फ चैम्बरलेन के कथन महत्त्वपूर्ण हैं। बिस्मार्क का कथन था, “मुझे यूरोप के बाहर नए राज्यों की नहीं, बल्कि व्यापारिक केन्द्रों की आवश्यकता है।” (“I want outside Europe…not provinces but commerical enterprises.”)

राजनीतिक क्षेत्र की अनेक मत्त्वपूर्ण घटनाएं आर्थिक गतिविधियों के परिणामस्वरूप ही घटित हुई हैं। भारत में आज लोकतन्त्र को इतनी सफलता नहीं मिली जितनी कि अमेरिका तथा इंग्लैंड में प्राप्त हुई है। भारत में सफलता न मिलने का मुख्य कारण लोगों की आर्थिक दशा है। भारत की अधिकांश जनता ग़रीब है, अधिकारों तथा कर्तव्यों का स्वतन्त्रतापूर्वक प्रयोग नहीं कर पाती। लोगों के वोट खरीद लिए जाते हैं। दूसरे विश्व-युद्ध के पश्चात् बहुत से देशों को अमेरिका से आर्थिक सहायता लेनी पड़ी जिसका परिणाम यह हुआ कि उन देशों की नीतियों पर भी अमेरिका का प्रभाव पड़ा।

अर्थशास्त्र को राजनीति विज्ञान की देन (Contribution of Political Science to Economics)-अर्थशास्त्र के अध्ययन में राजनीति विज्ञान से भी बहुत सहायता मिलती है। राजनीतिक संगठन का देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। शासन-व्यवस्था यदि दृढ़ और शक्तिशाली है तो वहां की जनता की आर्थिक दशा अच्छी होगी। आर्थिक दशाओं का ही नहीं सरकार की नीतियों का भी आर्थिक व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है। सरकार की कर नीति, आयात-निर्यात नीति, विनिमय की दर, बैंक नीति, व्यापार तथा उद्योग सम्बन्धी कानून, सीमा शुल्क नीति आदि का राज्य की अर्थव्यवस्था पर विशेष प्रभाव पड़ता है। सरकार पूंजीवाद तथा साम्यवाद को अपना कर देश की आर्थिक व्यवस्था को बदल सकती है। भारत सरकार ने पंचवर्षीय योजनाएं बनाईं हैं ताकि लोगों के जीवन-स्तर को ऊंचा किया जा सके। सरकार बड़े-बड़े उद्योगों को अपने हाथों में ले रही है। बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया है जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत प्रभाव पड़ा।

युद्ध एक सैनिक और राजनीतिक क्रिया है परन्तु इसका देश की अर्थव्यवस्था पर भारी प्रभाव पड़ता है। अमेरिका की आर्थिक स्थिति में गिरावट होने का एक महत्त्वपूर्ण कारण वियतनाम युद्ध रहा है। इसी प्रकार 1962 में चीन के साथ युद्ध और 1965 तथा 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों ने भारत की अर्थव्यवस्था को बहुत प्रभावित किया है।

अतः इस विवेचना से स्पष्ट हो जाता है कि अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान एक-दूसरे के पूरक हैं। एक का अस्तित्व दूसरे के अस्तित्व पर निर्भर करता है।

अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में समानताएं (Points of Similarity between Economics and Political Science) अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में निम्नलिखित समानताएं पाई जाती हैं-

  • दोनों का विषय समाज में रह रहा मनुष्य है-समाज में रह रहा मनुष्य दोनों शास्त्रों का विषय है। दोनों का उद्देश्य मानव कल्याण है और उसी के लिए दोनों कार्य करते हैं।
  • दोनों ही आदर्शात्मक सामाजिक विज्ञान हैं-दोनों ही भूतकाल के आधार पर वर्तमान का विश्लेषण करके भविष्य के लिए आदर्श प्रस्तुत करते हैं। दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में मानव जीवन के लिए ऐसे आदर्श स्थापित करते हैं जिनके द्वारा अधिक-से-अधिक मानव हित हो।
  • दोनों ही भूतकाल, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित हैं- राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र दोनों ही भूतकाल, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित हैं।

दोनों में अन्तर (Difference between the two) राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में अन्तर है, जो इस प्रकार है

1. विभिन्न विषय-क्षेत्र (Different Subject Matter) राजनीति विज्ञान मनुष्य की राजनीतिक समस्याओं का अध्ययन करता है और इस विज्ञान का मुख्य विषय राज्य तथा सरकार है। परन्तु अर्थशास्त्र मनुष्य की आर्थिक समस्याओं का अध्ययन करता है। मनुष्य धन कैसे कमाता है, कैसे उसका उपयोग करता है इत्यादि प्रश्नों का उत्तर अर्थशास्त्र देता है। इस प्रकार दोनों का विषय-क्षेत्र अलग-अलग है।

2. दृष्टिकोण (Approach)—मिस्टर ब्राऊन (Mr. Brown) ने राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में भेद करते हुए लिखा है, “अर्थशास्त्र का सम्बन्ध वस्तुओं से है जबकि राजनीति विज्ञान का मनुष्यों से। अर्थशास्त्र वस्तुओं की कीमतों का अध्ययन करता है और राजनीति विज्ञान सदाचार सम्बन्धी मूल्यों का।” इस प्रकार अर्थशास्त्र व्याख्यात्मक विज्ञान है जबकि राजनीति विज्ञान आदर्शात्मक विज्ञान है।

3. अध्ययन पद्धति (Method of Study)—दोनों में एक महत्त्वपूर्ण अन्तर यह है कि दोनों तथा अध्ययन पद्धतियां अलग-अलग हैं। अर्थशास्त्र का अध्ययन राजनीति विज्ञान के अध्ययन के अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक ढंग से किया जा सकता है और इसके निष्कर्ष और सिद्धान्त अधिक सही होते हैं। इसका कारण यह है कि अर्थशास्त्र का सम्बन्ध मनुष्य की आर्थिक आवश्यकताओं से है और इन आवश्यकताओं तथा इनकी पूर्ति का उल्लेख अंकों द्वारा दर्शाया जा सकता है। अर्थशास्त्र में मात्रात्मक आंकड़ों का संग्रह राजनीति विज्ञान की अपेक्षा अधिक सम्भव है।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में भिन्नता होने के बावजूद भी यह कहा जा सकता है कि वर्तमान युग में दोनों ही अपने उद्देश्यों की प्राप्ति एक-दूसरे के सहयोग और सहायता के बिना नहीं कर सकते। डॉ० गार्नर (Dr. Garner) ने ठीक ही कहा है, “बहुत-सी आर्थिक समस्याओं का हल राजनीतिक आर्थिक हालतों से आरम्भ होता है।” विलियम एसलिंगर (William Esslinger) के विचारानुसार, “अर्थशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र की एकता का पाठ्यक्रम उपकक्षा में पढ़ाया जाना चाहिए।”

प्रश्न 4. राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र में सम्बन्ध बताएं।
(Discuss the relations between Political Science and Sociology.)
उत्तर-राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र में घनिष्ठ सम्बन्ध है। समाजशास्त्र मनुष्य के सामाजिक जीवन का शास्त्र है। समाज- शास्त्र समाज की उत्पत्ति, विकास, उद्देश्य तथा संगठन का अध्ययन करता है। समाजशास्त्र में मानव जीवन के सभी पहलुओं राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक इत्यादि का अध्ययन किया जाता है जबकि राजनीति शास्त्र में मानव जीवन के राजनीतिक पहलू का अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार राजनीति शास्त्र समाजशास्त्र की एक शाखा है। प्रसिद्ध विद्वान् रेटजनहाफर ने ठीक ही कहा है, “राज्य अपने विकास के प्रारम्भिक चरणों में एक सामाजिक संस्था ही थी।” हम आगस्ट काम्टे (August Comte) के इस कथन से सहमत हैं, “समाजशास्त्र सभी समाजशास्त्रों की जननी है।” राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र परस्पर बहुत कुछ आदान-प्रदान करते हैं। प्रो० कैटलिन (Catline) ने तो यहां तक कहा है, “राजनीति और समाजशास्त्र अखण्ड हैं और वास्तव में एक ही तस्वीर के दो पहलू हैं।”

राजनीति विज्ञान को समाजशास्त्र की देन (Contribution of Sociology to Political Science) समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान के लिए नींव का काम करता है और इसके नियम राजनीति विज्ञान के सिद्धान्तों को समझने के लिए बहुत सहायक हैं। बिना समाजशास्त्र के अध्ययन के राजनीति शास्त्र के सिद्धान्तों को समझना कठिन है। प्रो० गिडिंग्स (Prof. Giddings) ने ठीक ही कहा है, “समाजशास्त्र के मूल सिद्धान्तों से अनभिज्ञ लोगों को राज्य के सिद्धान्त पढ़ाना उसी प्रकार है जिस प्रकार न्यूटन के गति नियमों से अनभिज्ञ व्यक्ति को खगोल विज्ञान अथवा ऊष्मा गति की शिक्षा देना।” (“To teach the theory of the state to men who have not learned the first principles of sciology is like teaching Astronomy or Thermodynamics to men who have not learned Newton’s Laws of Motion.”) दूसरे शब्दों में, जिस प्रकार न्यूटन के गति नियमों को न जानने वाले व्यक्ति को खगोल विज्ञान की शिक्षा देना व्यर्थ है उसी प्रकार बिना समाजशास्त्र के मूल सिद्धान्तों से अनजान व्यक्ति को राज्य के सिद्धान्त पढ़ाना व्यर्थ है। समाजशास्त्रों में समाज के रीति-रिवाजों का अध्ययन किया जाता है। हम जानते हैं कि राज्य के कानून का पालन तभी किया जाता है यदि वह समाज के रीति-रिवाजों के अनुसार हो।

राज्य की उत्पत्ति, राज्य का विकास, जनमत, दल प्रणाली आदि समझने में समाज शास्त्र की बहुत देन है। समाजशास्त्र से पता चलता है कि राज्य मानव की सामाजिक भावना का परिणाम है। समाज के विकास के स्तर के साथसाथ राज्य का विकास हुआ है। राजनीतिक समाजशास्त्र (Political Sociology) राजनीति विज्ञान की एक शाखा पनप रही है, जो इस बात की स्पष्ट सूचक है कि राजनीतिक तथ्यों के विधिवत अध्ययन के लिए समाजशास्त्र की सहायता लेना आवश्यक है। इस प्रकार समाज शास्त्र का राजनीति शास्त्र पर बहुत प्रभाव पड़ा है।

राजनीति विज्ञान की समाजशास्त्र को देन (Contribution of Political Science to Sociology)-परन्तु दूसरी ओर राजनीति शास्त्र का समाजशास्त्र पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। राजनीति विज्ञान का मुख्य विषय राज्य हैराज्य की उत्पत्ति कैसे हुई, राज्य क्या है, राज्य का विकास कैसे हुआ, राज्य का उद्देश्य क्या है इन सब प्रश्नों का उत्तर राजनीति विज्ञान में मिलता है। समाजशास्त्र को राज्य से सम्बन्धित प्रत्येक जानकारी राजनीति शास्त्र से मिलती है। राजनीति विज्ञान समाजशास्त्र का एक अंग है जिसके बिना समाजशास्त्र की विषय सामग्री पूर्ण नहीं हो सकती।

राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र के आपसी सम्बन्ध का एक प्रणाम यह है कि मॉरिस, गिन्सबर्ग, आगस्त काम्टे, लेस्टर वार्ड, समवर आदि समाजशास्त्रियों ने राज्य की प्रकृति और उद्देश्यों में इतनी रुचि दिखाई है, मानो वे समाजशास्त्र की मुख्य समस्याएं हों। इसी प्रकार डेविड ईस्टन, हैरल्ड लासवैल, ग्रेवीज ए० ऑल्मण्ड, पावेल, कोलमेन, मेक्स वेबर और राजनीति शास्त्र के अन्य आधुनिक विद्वानों द्वारा समाज शास्त्र से अधिक-से-अधिक मात्रा में अध्ययन सामग्री और अध्ययन पद्धतियां प्राप्त की गई हैं।

दोनों में अन्तर (Differences between the two) राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में अन्तर है-

  • दोनों के क्षेत्र अलग हैं-राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र के क्षेत्र एक-दूसरे से पृथक् हैं। राजनीतिक शास्त्र का मुख्य विषय-क्षेत्र राज्य है जबकि समाजशास्त्र का मुख्य क्षेत्र समाज है।
  • राजनीति विज्ञान का क्षेत्र समाजशास्त्र से संकुचित है-राजनीति विज्ञान का क्षेत्र समाजशास्त्र के क्षेत्र से संकुचित है। राजनीति शास्त्र मनुष्य के राजनीतिक पहलू का ही अध्ययन कराता है जबकि समाजशास्त्र मनुष्य के सभी पहलुओं का अध्ययन कराता है।
  • राजनीति विज्ञान यह मानकर चलता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इसमें हम यह अध्ययन नहीं करते कि मनुष्य सामाजिक प्राणी क्यों है। परन्तु समाजशास्त्र में इस प्रश्न का भी अध्ययन किया जाता है।
  • समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान से पहले बना–राजनीति शास्त्र में समाज बनने से पूर्व के मानव का अध्ययन नहीं किया जाता जबकि समाजशास्त्र के विषय का अध्ययन वहीं से शुरू होता है। समाजशास्त्र के अन्तर्गत मानव जाति के दोनों युगों-संगठित तथा असंगठित-का अध्ययन किया जाता है, परन्तु राजनीति शास्त्र केवल संगठित युग का अध्ययन करता है।
  • समाजशास्त्र केवल भूत और वर्तमान से सम्बन्धित है परन्तु राजनीति विज्ञान भूत, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित है-राजनीति शास्त्र में राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का भी अध्ययन किया जाता है जबकि समाज शास्त्र में समाज के अतीत तथा वर्तमान का ही अध्ययन किया जाता है।
  • समाजशास्त्र वर्णनात्मक है जबकि राजनीति विज्ञान आदर्शात्मक है-समाजशास्त्र समाज की उत्पत्ति तथा विकास का विस्तृत रूप से अध्ययन करता है, परन्तु इस अध्ययन के पश्चात् कोई परिणाम नहीं निकलता। यह केवल सामाजिक घटनाओं का वर्णन करता है। उन घटनाओं में अच्छी तथा बुरी घटनाओं की पहचान नहीं कराता। राजनति शास्त्र केवल घटनाओं का वर्णन ही नहीं करता बल्कि परिणाम भी निकालता है, क्योंकि राजनीति विज्ञान का उद्देश्य एक आदर्श राज्य की स्थापना करना तथा आदर्श नागरिक पैदा करना है।
  • समाजशास्त्र में मनुष्य के चेतन (conscious) और अचेतन (unconscious) दोनों प्रकार के कार्यों का अध्ययन किया जाता है परन्तु राजनीति विज्ञान में केवल चेतन प्रकार के कार्यों का ही अध्ययन किया जाता है।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र में अन्तर होते हुए भी यह मानना पड़ेगा कि दोनों एक-दूसरे के विरुद्ध न होकर पूरक हैं। राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र में गहरा सम्बन्ध है। दोनों एक-दूसरे से आदान-प्रदान करते हैं।

प्रश्न 5. राजनीति विज्ञान तथा नीतिशास्त्र में सम्बन्ध बताएं।
(Discuss the relations between Political Science and Ethics.)
उत्तर-राजनीति विज्ञान तथा नीतिशास्त्र में गहरा सम्बन्ध है। नीतिशास्त्र साधारण मनुष्य की भाषा में वह शास्त्र है, जो अच्छे-बुरे में अन्तर स्पष्ट करता है। नीतिशास्त्र वह शास्त्र है जिसके द्वारा धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, पाप-पुण्य, अहिंसा-हिंसा, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य तथा शुभ-अशुभ में अन्तर का पता चलता है। डीवी (Deewey) के अनुसार, “नीतिशास्त्र आचरण का वह विज्ञान है जिसमें मानवीय आचरण के औचित्य तथा अनौचित्य तथा अच्छाई तथा बुराई पर विचार किया जाता है।” नीतिशास्त्र के द्वारा हम निश्चित करते हैं कि मनुष्य का कौन-सा कार्य अच्छा है और कौनसा कार्य बुरा । यह शास्त्र नागरिकको आदर्श नागरिक बनाने में सहायक है। दूसरी ओर राज्य का मुख्य उद्देश्य भी आदर्श नागरिक बनाना है। इस प्रकार दोनों शास्त्रों में घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्राचीन यूनानी लेखकों प्लेटो तथा अरस्तु ने राजनीति शास्त्र को नीतिशास्त्र का ही एक अंग माना है। प्लेटो तथा अरस्तु के अनुसार, “राज्य एक सर्वोच्च नैतिक संस्था है। इसका उद्देश्य नागरिकों के नैतिक स्तर को ऊंचा करना है।” प्लेटो की प्रसिद्ध पुस्तक ‘रिपब्लिक’ (Republic) में राजनीति ही नहीं बल्कि नैतिक दर्शन भी भरा हुआ है। अरस्तु ने कहा था “राज्य जीवन को सम्भव बनाने के लिए उत्पन्न हुआ, परन्तु अब वह जीवन को अच्छा बनाने के लिए विद्यमान है।”

इटली के विद्वान् मैक्यावली ने सर्वप्रथम राजनीति तथा नीतिशास्त्र में भेद किया। इसके अनुसार राजा के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह नैतिकता के नियमों के अनुसार शासन चलाए। आवश्यकता पड़ने पर अनैतिकता का रास्ता भी अपनाया जा सकता है। मैक्यावली के अनुसार-राजा के सामने सबसे बड़ा उद्देश्य राज्य की सुरक्षा है और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसे सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य की परवाह नहीं करनी चाहिए। हाब्स (Hobbes) ने भी मैक्यावली के विचारों का समर्थन किया। बोदीन (Bodin), ग्रोशियस (Grotius) तथा लॉक (Locke) ने भी इन दोनों शास्त्रों को अलग किया, परन्तु रूसो (Rouseau) ने फिर इन दोनों शास्त्रों में घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित किया। कांट (Kant), ग्रीन (Green) ने भी रूसो के मत का समर्थन किया।

नीतिशास्त्र की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution of Ethics to Political Science)-वर्तमान समय में इन दोनों शास्त्रों में गहरा सम्बन्धा समझा जाता है। महात्मा गांधी ने दोनों शास्त्रों को अभिन्न माना है। उनके अनुसारसरकार को अपनी नीति नैतिकता के सिद्धान्तों पर बनानी चाहिए। सरकार की नीतियों में असत्य, अधर्म, कपट तथा पाप इत्यादि की मिलावट नहीं होनी चाहिए। कॉक्स के मतानुसार, “जो बात नैतिक दृष्टि से गलत है, वह राजनीतिक दृष्टि से सही नहीं हो सकती।” कोई भी सरकार ऐसे कानून पास नहीं कर सकती जो नैतिकता के विरुद्ध हों। यदि पास किए जाएंगे तो उनका विरोध होगा। इसके अतिरिक्त नैतिक नियम जो स्थायी और प्रचलित हो जाते हैं, कानून का रूप धारण कर लेते हैं। गैटेल (Gettell) ने लिखा है, “जब नैतिक विचार स्थायी और प्रचलित हो जाते हैं तो वे कानून का रूप ले लेते हैं।” लॉर्ड एक्टन (Lord Acton) ने ठीक ही कहा है, “समस्या यह नहीं है कि सरकार क्या करती है बल्कि यह है कि उन्हें क्या करना चाहिए।” यदि राजनीति विज्ञान को नीतिशास्त्र से पृथक् कर दें तो यह निस्सार और निरर्थक हो जाएगी। उसमें प्रगतिशीलता और आदर्शता नहीं रह पाएगी। इसलिए लॉर्ड एक्टन (Lord Acton) ने भी कहा है, “नीतिशास्त्र के अध्ययन के बिना राजनीति शास्त्र का अध्ययन विफल है।” इसके अतिरिक्त राजनीति विज्ञान की अनेक शाखाएं आचार शास्त्र की नींव पर खड़ी हैं, जैसे अन्तर्राष्ट्रीय कानून का सम्पूर्ण शास्त्र अन्तर्राष्ट्रीय नैतिकता पर आधारित है। आचार शास्त्र से संविधान भी प्रभावित होता है क्योंकि अनेक प्रकार के आदर्शों को संविधान में उचित स्थान देना अनिवार्य है। भारत और आयरलैंड के संविधान में हमें दिए गए राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व’ ही स्पष्ट उदाहरण है।

राजनीति विज्ञान की नीतिशास्त्र को देन (Contribution of Political Science to Ethics)—वर्तमान राज्य कल्याणकारी राज्य है। सरकार लोगों के नैतिक स्तर को ऊंचा करने के लिए कई प्रकार के कानून बनाती है। इसके साथ ही सरकार सामाजिक बुराइयों को दूर करती है। भारत सरकार ने सती-प्रथा, दहेज-प्रथा, छुआछूत आदि बुराइयों को कानून के द्वारा रोकने का प्रयत्न किया है और काफ़ी सफलता भी मिली है। भारत सरकार अहिंसा के सिद्धान्तों पर चल रही है और इन्हीं सिद्धान्तों का प्रचार कर रही है। भारत के प्रधानमन्त्री स्वर्गीय श्री जवाहरलाल नेहरू ने पंचशील की स्थापना की थी ताकि संसार के दूसरे देशों में भी अहिंसा का प्रचार किया जा सके। सरकार राज्य में शान्ति की स्थापना करती है और नैतिकता शान्ति के वातावरण में ही विकसित हो सकती है। यदि राज्य शान्ति का वातावरण उत्पन्न न करे, तो नैतिक जीवन बिताना असम्भव हो जाएगा। इस प्रकार सरकार कानून द्वारा ऐसा वातावरण उत्पन्न करती है जिसमें नैतिकता विकसित हो सके। क्रोशे के मतानुसार, “नैतिकता अपनी पूर्णता और उच्चतम स्पष्टता राजनीति में ही पाती है।”

दोनों में अन्तर (Difference between the two)-राजनीति विज्ञान और नीतिशास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी उन दोनों में अन्तर है, जो इस प्रकार हैं-

  • नीतिशास्त्र मनुष्य के प्रत्येक कार्य से सम्बन्धित रहता है जब कि राजनीति विज्ञान मनुष्य के जीवन के केवल राजनीतिक पहलू से सम्बन्ध रखता है। नीतिशास्त्र मनुष्य के आन्तरिक तथा बाहरी दोनों कार्यों से सम्बन्धित है, परन्तु राजनीति विज्ञान मनुष्य के केवल बाहरी कार्यों से सम्बन्धित है।
  • राज्य के नियमों का पालन करवाने के लिए शक्ति का प्रयोग किया जाता है। यदि सरकार के किसी कानून का उल्लंघन कोई मनुष्य करता है तो उसे न्यायालय द्वारा दण्ड दिया जाता है, परन्तु नीतिशास्त्र के नियमों का उल्लंघन करने पर कोई दण्ड नहीं दिया जाता क्योंकि नीतिशास्त्र के नियमों को तोड़ना अपराध नहीं केवल पाप है।
  • राजनीति विज्ञान मुख्यतः वर्णनात्मक है क्योंकि इसमें राज्य, सरकार की शक्तियां, संविधान इत्यादि का वर्णन करता है जबकि नीतिशास्त्र मुख्यतः आदर्शात्मक है और यह विषय जनता के सामने कुछ आदर्श रखे हुए हैं।
  • राजनीति विज्ञान का सम्बन्ध सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक सिद्धान्तों से है जबकि नीतिशास्त्र का सम्बन्ध केवल सिद्धान्तों से है। नीतिशास्त्र वास्तविकता से बहुत दूर है। यह केवल काल्पनिक है।
  • राज्य के नियमों तथा नैतिकता के नियमों में सदैव एकरूपता नहीं होती। सड़क के दाईं ओर चलना राज्य के नियम के विरुद्ध है, परन्तु नैतिकता के विरुद्ध नहीं।
  • राजनीति विज्ञान में हम राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन करते हैं, परन्तु इस शास्त्र का मुख्य सम्बन्ध इस बात से है कि वे क्या हैं परन्तु नीतिशास्त्र का मुख्य सम्बन्ध इससे है कि वे क्या होने चाहिएं।
    राजनीति विज्ञान और नीतिशास्त्र के सम्बन्ध और अन्तर दोनों को स्पष्ट करते हुए कैटलिन ने कहा, “नीतिशास्त्र से एक राजनीतिज्ञ यह सीखता है कि अनेक मार्गों में से कौन-सा मार्ग सही है और राजनीति विज्ञान बतलाता है कि व्यावहारिक दृष्टि से कौन-सा मार्ग अपनाना सम्भव होगा।”

निष्कर्ष (Conclusion)-नीतिशास्त्र और राजनीति विज्ञान में भले ही कई भिन्नताएं हैं, फिर भी इनकी समीपता से इन्कार नहीं किया जा सकता। नीतिशास्त्र राजनीति विज्ञान के अध्ययन को समृद्ध बनाता है और व्यावहारिक राजनीति को उदात्त बनाने (To ennoble) के लिए प्रेरित करता है। आजकल की व्यावहारिक राजनीति में भ्रष्टाचार के उदाहरण सर्वप्रसिद्ध हैं और इन भ्रष्टाचारी तरीकों ने समाज के हर पक्ष को दूषित कर दिया है। इस भ्रष्टाचार से बचने के साधन नीतिशास्त्र ही सुझा सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. राजनीति शास्त्र, इतिहास के ऊपर निर्भर है ? वर्णन करें।
उत्तर-राजनीति शास्त्र और इतिहास में घनिष्ठ सम्बन्ध है। राजनीति शास्त्र में राज्य तथा अन्य संस्थाओं के अतीत के अध्ययन के लिए राजनीति शास्त्र को इतिहास पर निर्भर करना पड़ता है। निःसन्देह राजनीति विज्ञान की प्रयोगशाला अथवा पथ-प्रदर्शक इतिहास है। भारत के इतिहास से हमें पता चलता है कि वही शासक सफल रहेगा जो धर्म-निरपेक्ष हो। इतिहास के ज्ञान का पूरा लाभ उठाते हुए संविधान निर्माताओं ने भारत को धर्म-निरपेक्ष राज्य बनाया। इतिहास राजनीति विज्ञान का शिक्षक है। इतिहास की उपेक्षा करने से राजनीति शास्त्र का अध्ययन केवल काल्पनिक और सैद्धान्तिक ही होगा।

प्रश्न 2. राजनीति शास्त्र का समाजशास्त्र से सम्बन्ध बताओ।
उत्तर-राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र में घनिष्ठ सम्बन्ध है। समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान के लिए नींव का काम करता है और इसके नियम राजनीति विज्ञान के सिद्धान्तों को समझने के लिए बहुत सहायक हैं। राज्य की उत्पत्ति, राज्य का विकास, जनमत, दल प्रणाली आदि समझने में समाजशास्त्र की बहुत बड़ी देन है।
राजनीति शास्त्र का समाजशास्त्र पर भी गहरा प्रभाव पड़ा है। समाजशास्त्र को राज्य से सम्बन्धित प्रत्येक जानकारी राजनीति शास्त्र से मिलती है। राजनीति शास्त्र समाजशास्त्र का एक अंग है जिसके बिना समाजशास्त्र की विषय सामग्री पूर्ण नहीं हो सकती।

प्रश्न 3. राजनीति शास्त्र का अर्थशास्त्र से सम्बन्ध बताओ।
उत्तर-प्राचीनकाल में अर्थशास्त्र ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र’ के नाम से प्रसिद्ध था। 20वीं शताब्दी में अर्थशास्त्रियों ने अर्थशास्त्र को एक स्वतन्त्र सामाजिक विषय सिद्ध करने का प्रयत्न किया। इतिहास से पता चलता है कि आर्थिक समस्याएं मनुष्य की राजनीतिक संस्थाओं को प्रभावित करती हैं। राजनीतिक संस्थाओं का उदय व विकास आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम है। आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तन आने पर राजनीतिक क्षेत्र में परिवर्तन होना अनिवार्य है। राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियां मुख्यतः आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम होती हैं।

राजनीतिक संगठन का देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। शासन व्यवस्था यदि सुदृढ़ और शक्तिशाली है तो वहां की जनता की आर्थिक दशा अच्छी होगी। सरकार पूंजीवाद तथा साम्यवाद को अपनाकर देश की आर्थिक व्यवस्था को बदल सकती है। निःसन्देह राजनीति शास्त्र और अर्थशास्त्र एक-दूसरे के पूरक हैं।

प्रश्न 4. इतिहास, राजनीति शास्त्र के ऊपर कैसे निर्भर है ?
उत्तर-इतिहास, राजनीति शास्त्र के अध्ययन से बहुत कुछ प्राप्त करता है। आज की राजनीति कल का इतिहास है। यदि इतिहास की घटनाओं से राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह रह जाएगा। राष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद, व्यक्तिवाद जैसी धाराओं की चर्चा के बिना 17वीं शताब्दी का इतिहास अधूरा है। भारत के 20वीं शताब्दी के इतिहास से यदि कांग्रेस पार्टी का महत्त्व, असहयोग आन्दोलन, स्वराज्य दल, भारत छोड़ो आन्दोलन, क्रिप्स योजना, कैबिनेट मिशन योजना, भारत का विभाजन, चीन तथा पाकिस्तान द्वारा आक्रमण आदि राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो भारत का इतिहास महत्त्वहीन रह जाएगा। राजनीति की इतिहास को महत्त्वपूर्ण देन यह है कि राजनीतिक विचारधाराएं ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म देती हैं। रूसो और माण्टेस्क्यू के विचारों का फ्रांस की राज्य क्रान्ति पर, कार्ल मार्क्स के विचारों का रूस की राज्य क्रान्ति पर तथा महात्मा गांधी के विचारों का भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन पर निर्णायक प्रभाव पड़ा।

प्रश्न 5. राजनीति शास्त्र को इतिहास की देन का वर्णन करें।
उत्तर-राजनीति विज्ञान में राज्य तथा अन्य संस्थाओं के अतीत के अध्ययन के लिए हमें इतिहास पर निर्भर रहना पड़ता है। राजनीतिक संस्थाओं को समझने के लिए उनके अतीत को जानना आवश्यक होता है और इतिहास से ही उनके अतीत को जाना जा सकता है। राजनीति विज्ञान की प्रयोगशाला अथवा पथ-प्रदर्शक इतिहास है। मानवीय इतिहास के विभिन्न समयों पर राजनीतिक क्षेत्र में अनेक कार्य किए गए, जिनके परिणाम और सफलता-असफलता का पता इतिहास से ही लगता है। राजनीतिक क्षेत्र के ये प्रयोग एक भूतकालीन प्रयोग के समान ही होते हैं और ये भूतकालीन प्रयोग भविष्य के लिए मार्ग बताने का कार्य करते हैं। इतिहास के ज्ञान का पूरा लाभ उठाते हुए ही संविधान निर्माताओं ने भारत को एक धर्म-निरपेक्ष राज्य बनाया है। इतिहास, राजनीति विज्ञान का शिक्षक है। इतिहास मनुष्य की सफलताओं एवं विफलताओं का संग्रह है। अतीत में मानव ने क्या-क्या भूलें कीं, किस नीति को अपनाने से अच्छा व बुरा परिणाम निकला आदि बातों का ज्ञानदाता इतिहास ही है। इतिहास द्वारा बताई गई भूलों के आधार पर राजनीतिज्ञ भविष्य में त्रुटियों में संशोधन करते हैं।

प्रश्न 6. राजनीति शास्त्र तथा इतिहास में कोई चार अन्तर बताएं।
उत्तर-राजनीति शास्त्र तथा इतिहास में घनिष्ठता होते हुए भी निम्नलिखित अन्तर पाए जाते हैं-

  • इतिहास का क्षेत्र राजनीति विज्ञान से अधिक व्यापक है-इतिहास की विषय-वस्तु का क्षेत्र राजनीति शास्त्र की अपेक्षा अधिक व्यापक है। जब हम 19वीं शताब्दी का इतिहास पढ़ते हैं तो इसमें उस समय की सभी धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक घटनाओं का वर्णन होता है, परन्तु राजनीति शास्त्र केवल राजनीति घटनाओं से सम्बन्धित है।
  • राजनीति शास्त्र भूत, वर्तमान तथा भविष्य से सम्बन्धित है जबकि इतिहास केवल भूतकाल से सम्बन्धित है-राजनीति शास्त्र में राज्य के भूतकाल के अलावा उसके वर्तमान तथा भविष्य का भी अध्ययन किया जाता है जबकि इतिहास में केवल बीती घटनाओं का वर्णन होता है।
  • इतिहास वर्णनात्मक है, जबकि राजनीति शास्त्र विचारशील है-इतिहास में केवल घटनाओं का वर्णन किया जाता है जबकि राजनीति शास्त्र में घटनाओं के वर्णन के साथ-साथ उनका मूल्यांकन करके निश्चित परिणाम निकाले जाते हैं।
  • इतिहास नैतिक निर्णय नहीं देता, परन्तु राजनीति विज्ञान में विद्वानों के लिए नौतिक निर्णय देना आवश्यक है।

प्रश्न 7. अथशास्त्र की राजनीति शास्त्र को देन बताइए।
उत्तर-आर्थिक समस्याएं मनुष्य की राजनीतिक संस्थाओं को प्रभावित करती हैं। राजनीतिक संस्थाओं का उदय व विकास आर्थिक समस्याओं का ही परिणाम है। व्यक्तिवाद, समाजवाद, पूंजीवाद तथा साम्यवाद मुख्यतः आर्थिक सिद्धान्त है परन्तु इनका अध्ययन राजनीति शास्त्र में किया जाता है क्योंकि इन सिद्धान्तों ने राज्य के ढांचे को ही बदल दिया है। आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तन आने पर राजनीतिक क्षेत्र में परिवर्तन होना स्वाभाविक ही है। राजनीतिक परिवर्तनों का मुख्य कारण आर्थिक परिवर्तन होते हैं। राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियां मुख्यतः आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम होती हैं। 18वीं शताब्दी में इंग्लैंड और यूरोप के अन्य देशों में जो औद्योगिक क्रान्तियां हुईं, उनके परिणामस्वरूप ही उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद की नीतियां अपनाई गईं। राजनीतिक क्षेत्र की अनेक महत्त्वपूर्ण घटनाएं, आर्थिक गतिविधियों के फलस्वरूप ही घटित हुई हैं। भारत में लोकतन्त्र को अमेरिका और इंग्लैंड के समान सफलता न मिलने का मुख्य कारण इसकी आर्थिक दशा है।

प्रश्न 8. राजनीति शास्त्र की अर्थशास्त्र को देन का वर्णन करें।
उत्तर-अर्थशास्त्र के अध्ययन में राजनीति शास्त्र से भी बहुत सहायक मिलती है। राजनीतिक संगठन का देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत प्रभाव पड़ता है। शासन व्यवस्था यदि दृढ़ व शक्तिशाली है तो देश की आर्थिक दशा अच्छी होगी। आर्थिक दशाओं का ही नहीं सरकार की नीतियों का भी देश की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ता है। सरकार पूंजीवाद और साम्यवाद जैसी नीतियों को अपनाकर देश की अर्थव्यवस्था को बदल सकती है। सरकार द्वारा बड़े-बड़े उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किए जाने से देश की अर्थव्यवस्था पर विशेष प्रभाव पड़ता है। युद्ध बेशक एक सैनिक और राजनीतिक प्रक्रिया है परन्तु इसका देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 9. राजनीति शास्त्र तथा अर्थशास्त्र में अन्तर बताएं।
उत्तर-अर्थशास्त्र तथा राजनीति शास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी निम्नलिखित अन्तर हैं

  • विभिन्न विषय क्षेत्र-राजनीति विज्ञान मनुष्य की राजनीतिक समस्याओं का अध्ययन करता है और इसका मुख्य विषय राज्य तथा सरकार हैं परन्तु अर्थशास्त्र मनुष्य की आर्थिक समस्याओं का अध्ययन करता है। इस प्रकार दोनों का विषय क्षेत्र अलग-अलग है।
  • दृष्टिकोण-राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण में भी अन्तर पाया जाता है। अर्थशास्त्र व्याख्यात्मक विज्ञान है जबकि राजनीति शास्त्र मुख्यतः आदर्शात्मक विज्ञान है।
  • अध्ययन पद्धति में अन्तर-दोनों में एक महत्त्वपूर्ण अन्तर यह है कि दोनों की अध्ययन पद्धतियां अलग-अलग हैं। अर्थशास्त्र का अध्ययन राजनीति शास्त्र की अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक ढंग से किया जा सकता है।

प्रश्न 10. समाजशास्त्र की राजनीति विज्ञान को देन का वर्णन करें।
उत्तर-समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान के लिए नींव का कार्य करता है। बिना समाजशास्त्र के सिद्धान्तों को समझे राजनीति शास्त्र के नियमों को समझना अति कठिन है। दूसरे शब्दों में जिस प्रकार न्यूटन के गति नियमों से अनभिज्ञ व्यक्ति को खगोल विज्ञान की शिक्षा देना व्यर्थ है उसी प्रकार समाजशास्त्र के मूल सिद्धान्तों से अनभिज्ञ व्यक्ति को राज्य के सिद्धान्त पढ़ाना व्यर्थ है। राज्य के अधिकतर कानून समाज में प्रचलित रीति-रिवाजों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। राज्य की उत्पत्ति, राज्य का विकास, जनमत प्रणाली आदि समझने में समाजशास्त्र की बहुत देन है। समाजशास्त्र से पता चलता है कि राज्य मनुष्य की सामाजिक भावना का परिणाम है। समाज के विकास के स्तर के साथ-साथ राज्य का विकास हुआ है। राजनीतिक समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान की एक शाखा है, जो इस बात की स्पष्ट सूचक है कि राजनीतिक तथ्यों के विधिवत् एवं पूर्ण अध्ययन के लिए समाजशास्त्र की सहायता लेना बहुत आवश्यक है। इस प्रकार समाजशास्त्र राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन में सहायता प्रदान करता है।

प्रश्न 11. राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र में किन्हीं चार अन्तरों का वर्णन करें।
उत्तर-राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र में निम्नलिखित मुख्य अन्तर पाए जाते हैं-

  1. दोनों के विषय क्षेत्र अलग-अलग हैं-राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र दोनों के विषय क्षेत्र एक-दूसरे से पृथक् हैं। राजनीति विज्ञान का मुख्य विषय क्षेत्र राज्य है जबकि समाजशास्त्र समाज से सम्बन्धित है।
  2. समाजशास्त्र का क्षेत्र राजनीति शास्त्र की अपेक्षा व्यापक है-समाजशास्त्र का क्षेत्र राजनीति शास्त्र की अपेक्षा अधिक व्यापक है। राजनीति शास्त्र मनुष्य के जीवन के केवल राजनीतिक पहलू का ही अध्ययन करता है परन्तु समाजशास्त्र में मानव जीवन के सभी पहलुओं का अध्ययन किया जाता है।
  3. समाजशास्त्र की उत्पत्ति राजनीति शास्त्र से पहले हुई-राजनीति शास्त्र में राज्य बनने से पूर्व के मानव का अध्ययन नहीं किया जाता परन्तु समाजशास्त्र के विषय का अध्ययन मानव की उत्पत्ति से शुरू होता है।
  4. समाजशास्त्र वर्णनात्मक है, जबकि राजनीति शास्त्र आदर्शात्मक है।

प्रश्न 12. नीतिशास्त्र की राजनीति शास्त्र को चार देनों का वर्णन करें।
उत्तर-

  1. सरकार नैतिकता के सिद्धान्तों के अनुसार कानून बनाती है। कोई भी सरकार नैतिकता के विरुद्ध कानून नहीं बना सकती।
  2. जब राजनीति शास्त्र में हम यह निर्णय करते हैं कि राज्य कैसा होना चाहिए तब नीति शास्त्र हमारी बहुत सहायता करता है।
  3. नैतिक नियम जो स्थायी और लोकप्रिय हो जाते हैं, कुछ समय कानून का रूप धारण कर लेते हैं।
  4. नीति शास्त्र राजनीति शास्त्र को प्रगतिशीलता और आदर्शता प्रदान करती है।

प्रश्न 13. नीतिशास्त्र किस प्रकार राजनीति शास्त्र से भिन्न है ? चार अन्तर बताइये।
उत्तर-नीतिशास्त्र अग्रलिखित प्रकार से राजनीति शास्त्र से भिन्न है-

  • नीतिशास्त्र मनुष्य के प्रत्येक कार्य से सम्बन्धित है जबकि राजनीति शास्त्र मनुष्य के जीवन के केवल राजनीतिक पहलू से सम्बन्धित है। नीति मनुष्य के आन्तरिक तथा बाहरी दोनों कार्यों से सम्बन्धित है परन्तु राजनीति विज्ञान केवल मनुष्य के बाहरी कार्यों से सम्बन्धित है।
  • राज्य के नियमों का पालन करवाने के लिए शक्ति का प्रयोग किया जाता है। यदि कोई मनुष्य सरकार के किसी कानून का उल्लंघन करता है तो उसे न्यायालय द्वारा दण्ड दिया जाता है, परन्तु नीतिशास्त्र के नियमों का उल्लंघन करने पर कोई दण्ड नहीं दिया जाता क्योंकि नीतिशास्त्र के नियमों को तोड़ना अपराध नहीं केवल पाप है।
  • राजनीति शास्त्र मुख्यतः वर्णनात्मक है क्योंकि इसमें राज्य, सरकार की शक्तियां, संविधान आदि का वर्णन रहता है, जबकि नीतिशास्त्र मुख्यत: आदर्शात्मक है और यह विषय जनता के सामने कुछ आदर्श रखे हुए हैं।
  • राजनीति शास्त्र का सम्बन्ध सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक सिद्धान्तों से है, जबकि नीतिशास्त्र का सम्बन्ध केवल सिद्धान्तों से है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. राजनीति शास्त्र का समाजशास्त्र से सम्बन्ध बताओ।
उत्तर-राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र में घनिष्ठ सम्बन्ध है। समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान के लिए नींव का काम करता है और इसके नियम राजनीति विज्ञान के सिद्धान्तों को समझने के लिए बहुत सहायक हैं। राज्य की उत्पत्ति, राज्य का विकास, जनमत, दल प्रणाली आदि समझने में समाजशास्त्र की बहुत बड़ी देन है।

प्रश्न 2. राजनीति शास्त्र का अर्थशास्त्र से सम्बन्ध बताओ।
उत्तर-राजनीतिक संस्थाओं का उदय व विकास आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम है। आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तन आने पर राजनीतिक क्षेत्र में परिवर्तन होना अनिवार्य है। राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियां मुख्यतः आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम होती हैं।
शासन व्यवस्था यदि सुदृढ़ और शक्तिशाली है तो वहां की जनता की आर्थिक दशा अच्छी होगी। निःसन्देह राजनीति शास्त्र और अर्थशास्त्र एक-दूसरे के पूरक हैं।

प्रश्न 3. इतिहास, राजनीति शास्त्र के ऊपर कैसे निर्भर है ?
उत्तर-इतिहास, राजनीति शास्त्र के अध्ययन से बहुत कुछ प्राप्त करता है। आज की राजनीति कल का इतिहास है। यदि इतिहास की घटनाओं से राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह रह जाएगा।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1. राजनीति शास्त्र को इतिहास की किसी एक देन का वर्णन करें।
उत्तर- इतिहास द्वारा बतलाई गई भूलों के आधार पर ही राजनीतिज्ञ भविष्य में त्रुटियों में संशोधन लाते हैं।

प्रश्न 2. इतिहास को राजनीति शास्त्र की किसी एक देन का वर्णन करें।
उत्तर-राजनीतिक विचारधाराएं ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म देती हैं।

प्रश्न 3. राजनीति विज्ञान एवं इतिहास में कोई एक अन्तर बताएं।
उत्तर-इतिहास का क्षेत्र राजनीतिक विज्ञान से व्यापक है।

प्रश्न 4. किस विद्वान् ने सर्वप्रथम अर्थशास्त्र को राजनीति शास्त्र से अलग किया ?
उत्तर-एडम स्मिथ ने।

प्रश्न 5. अर्थशास्त्र की राजनीति विज्ञान को किसी एक देन का वर्णन करें।
उत्तर-राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियां मुख्यतः आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम होती हैं।

प्रश्न 6. अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में एक समानता बताएं।
उत्तर-अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान दोनों का ही विषय समाज में रह रहा मनुष्य है।

प्रश्न 7. अर्थशास्त्र एवं राजनीति विज्ञान में एक अन्तर बताएं।
उत्तर-अर्थशास्त्र एवं राजनीति विज्ञान की अध्ययन पद्धतियां अलग-अलग हैं।

प्रश्न 8. राजनीति विज्ञान एवं समाज शास्त्र में एक अन्तर बताएं।
उत्तर-राजनीति विज्ञान का क्षेत्र समाजशास्त्र से संकुचित है।

प्रश्न 9. राजनीति विज्ञान एवं नीति शास्त्र में एक अन्तर बताएं।
उत्तर-नीति शास्त्र मनुष्य के प्रत्येक कार्य से सम्बन्धित है, जबकि राजनीति विज्ञान मनुष्य के जीवन के केवल राजनीतिक पहलू से संबंध रखता है।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. शासन व्यवस्था यदि शक्तिशाली है, तो वहां की जनता की आर्थिक दशा ………. होगी।
2. अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान, दोनों ही भूतकाल, वर्तमान और …………… से सम्बन्धित हैं।
3. ………… का सम्बन्ध वस्तुओं से है, जबकि राजनीति विज्ञान का मनुष्यों से।
4. ………… के अनुसार बहुत-सी आर्थिक सम्स्याओं का हल राजनीतिक आर्थिक हालतों से आरम्भ होता है।
5. राजनीति शास्त्र समाज शास्त्र की एक ……….. है।
उत्तर-

  1. अच्छी
  2. भविष्य
  3. अर्थशास्त्र
  4. डॉ० गार्नर
  5. शाखा।

प्रश्न III. निम्नलिखित में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. समाज शास्त्र राजनीति विज्ञान के लिए नींव का काम करता है।
2. राजनीति शास्त्र एवं समाज शास्त्र का मुख्य विषय राज्य है।
3. समाज शास्त्र राजनीति विज्ञान से पहले बना।
4. राजनीति शास्त्र का विषय क्षेत्र समाज शास्त्र से व्यापक है।
5. समाज शास्त्र वर्णनात्मक है, जबकि राजनीति विज्ञान आदर्शात्मक है।
उत्तर-

  1. सही
  2. ग़लत
  3. सही
  4. ग़लत
  5. सही।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न 1. यह कथन किसका है कि, “राज्य जीवन को सम्भव बनाने के लिए उत्पन्न हुआ, परन्तु अब वह जीवन को अच्छा बनाने के लिए विद्यमान है।”
(क) प्लेटो
(ख) अरस्तु
(ग) हॉब्स
(घ) लॉक।
उत्तर-(ख) अरस्तु

प्रश्न 2. नीतिशास्त्र की राजनीति विज्ञान को क्या देन है ?
(क) जो नैतिक नियम स्थायी एवं प्रचलित होते हैं, वे कानून का रूप धारण कर लेते हैं।
(ख) नैतिकता के कारण राजनीति विज्ञान में प्रगतिशीलता एवं आदर्शता बनी रहती है।
(ग) अन्तर्राष्ट्रीय कानून का सम्पूर्ण शास्त्र अन्तर्राष्ट्रीय नैतिकता पर आधारित है।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-(घ) उपरोक्त सभी

प्रश्न 3. राजनीति विज्ञान की नैतिक शास्त्र को क्या देन है ?
(क) सरकार लोगों के नैतिक स्तर को ऊंचा करने के लिए कानून बनाती है।
(ख) सरकार सामाजिक बुराइयों को दूर करती है।
(ग) सरकार राज्य में शान्ति की स्थापना करती है और नैतिकता शान्ति के वातावरण में ही विकसित होती है।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 4. राजनीति शास्त्र एवं नीति शास्त्र में क्या अन्तर पाया जाता है ?
(क) नीति शास्त्र मनुष्य के प्रत्येक कार्य से सम्बन्धित रहता है, जबकि राजनीति विज्ञान मनुष्य के जीवन के केवल राजनीतिक पक्ष से सम्बन्धित रहता है।
(ख) राज्य के कानूनों का पालन न करने वाले को दण्ड दिया जाता है, जबकि नीतिशास्त्र के नियमों को तोड़ना केवल पाप माना जाता है।
(ग) राजनीति विज्ञान मुख्यतः वर्णात्मक है, जबकि नीति शास्त्र आदर्शात्मक है।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-(घ) उपरोक्त सभी।

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