Class 11 Political Science Solutions Chapter 27 संघीय कार्यपालिका-राष्ट्रपति

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. भारत के राष्ट्रपति का निर्वाचन किस प्रकार किया जाता है ?
(How is the President of India elected ?)
उत्तर-भारतीय संविधान के अन्तर्गत भारतीय संघ की समस्त कार्यपालिका शक्तियां राष्ट्रपति को दी गई हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 52 के अधीन भारतीय राज्य संगठन में राष्ट्रपति का पद निश्चित किया गया है। वह राज्य का अध्यक्ष है और भारत का समस्त शासन उसी के नाम पर चलता है। वह देश का सर्वोच्च अधिकारी तथा भारत का प्रथम नागरिक भी कहलाता है।

योग्यताएं (Qualifications)—राष्ट्रपति के पद के लिए के पद के लिए चुनाव लड़ सकता है जिसमें निम्नलिखित योग्यताएं हों

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
  3. वह सभी योग्यताएं रखता हो जो संसद् का सदस्य बनने के लिए आवश्यक हैं।
  4. वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार या किसी स्थानीय सरकार के अधीन किसी लाभदायक पद पर आसीन न हो।M
  5. विधानमण्डल का सदस्य नहीं होना चाहिए।

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5 जून, 1997 को राष्ट्रपति ने एक अध्यादेश जारी करके राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के लिए जमानत .. की राशि 2500 से बढ़ा कर 15 हज़ार रुपये कर दी है।
इस अध्यादेश के अनुसार राष्ट्रपति के पद के लिए उम्मीदवार का नाम 50 मतदाताओं द्वारा प्रस्तावित तथा 50 मतदाताओं द्वारा अनुमोदित होना अनिवार्य है।

चुनाव (Election)-भारत के राष्ट्रपति का चुनाव एक चुनाव मण्डल द्वारा होता है जिसमें लोकसभा के निर्वाचित सदस्य, राज्यसभा के निर्वाचित सदस्य तथा राज्य की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य भाग लेते हैं। चुनाव एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation Single Transferable Vote System) के आधार पर होता है। संविधान के अनुसार, जहां तक सम्भव हो सकेगा, राष्ट्रपति के चुनाव में भिन्नभिन्न राज्यों को समान प्रतिनिधित्व दिया जाएगा। इसी तरह जहां तक हो सकेगा, संसद् के सदस्यों तथा राज्यों को समान प्रतिनिधित्व दिया जाएगा तथा संसद् के सदस्यों तथा राज्य की विधानसभाओं के सदस्यों की वोटों में समानता होगी। दूसरे शब्दों में, राष्ट्रपति के चुनाव में एक सदस्य एक मत’ (One Member One Vote) M गई, न ही अपनाई जा सकती थी। वैसे एक मतदाता को केवल एक ही मत मिलता है, परन्तु इसके मत की गणना नहीं होती, बल्कि उसका मूल्यांकन होता है। मतों की संख्या निम्न वर्णित तरीकों से ज्ञात की जाती है-

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पहले राज्य की सारी जनसंख्या को विधानसभा में कुल चुने हुए सदस्यों की संख्या से भाग देकर भजनफल (Quotient) को 1000 से बांट दिया जाए।

(1) राज्य की विधानसभा के प्रत्येक निर्वाचित सदस्य के मतों की संख्या
Class 11 Political Science Solutions Chapter 27 संघीय कार्यपालिका-राष्ट्रपति 3यदि शेष 500 से अधिक हो तो पूरा गिन लिया जाता है और 500 से कम हो तो उसकी गिनती नहीं होती।
उदाहरण के लिए 2017 में पंजाब की जनसंख्या 1,35,51,060 थी और विधानसभा के निर्वाचित सदस्य 117 थे जिस कारण प्रत्येक सदस्य को 117 मत डालने का अधिकार प्राप्त था।

Class 11 Political Science Solutions Chapter 27 संघीय कार्यपालिका-राष्ट्रपति 4लोकसभा तथा राज्यसभा के प्रत्येक सदस्य के राष्ट्रपति के चुनाव में वोट निकालने के लिए दोनों सदनों में चुने हुए सदस्यों की कुल संख्या में राज्यों की विधानसभाओं की सारी वोटों को बांट दिया जाता है।

(2) संसद् के प्रत्येक निर्वाचित सदस्य के मतों की संख्या =
Class 11 Political Science Solutions Chapter 27 संघीय कार्यपालिका-राष्ट्रपति 4समस्त राज्यों की विधानसभाओं के समस्त मतों की संज्या संसद् के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों की संज्या

उदाहरणस्वरूप, यदि समस्त राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा कुल 4,24,856 मत डाले गए हैं और संसद् के निर्वाचित सदस्यों की संख्या 705 हो तो संसद् के प्रत्येक निर्वाचित सदस्य को [latex]\frac{424856}{705}=602 \frac{446}{705}=603[/latex] मत देने का अधिकार होगा।

2017 के राष्ट्रपति के चुनाव में राज्यों की विधानसभाओं में सदस्यों के कुल मतों की संख्या 5,49,495 थी। संसद् के निर्वाचित सदस्यों की संख्या = 776 (लोकसभा 543 + राज्यसभा 233)
प्रत्येक सदस्य के मत =[latex]\frac{5,49,511}{776}[/latex] = 708
संसद् के कुल सदस्यों के मत = 5,49,408
राष्ट्रपति के निर्वाचन मण्डलों के सदस्यों के कुल मत = 10,98,903
जुलाई 2017 में हुए राष्ट्रपति के चुनाव में कुल मतों की संख्या 10,98,903 थी।

राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया (Procedure of Electing President)-राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया का वर्णन संविधान में नहीं किया गया है बल्कि इस सम्बन्ध में कानून बनाने का अधिकार संसद् को दिया गया। भारतीय संसद् ने 1952 में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति निर्वाचन एक्ट पास किया, जिसे 1974 में संशोधित किया गया। राष्ट्रपति के चुनाव की विधि निम्नलिखित हैं-

  • राष्ट्रपति के चुनाव की अधिसूचना (Notification regarding the election of President) राष्ट्रपति का चुनाव कराने की शक्ति निर्वाचन आयोग के पास है। निर्वाचन आयोग राष्ट्रपति के चुनाव के बारे में अधिसूचना जारी करता है जिसमें नामांकन-पत्रों के भरने, उनकी जांच-पड़ताल करने, उन्हें वापस लेने तथा चुनाव की तिथि इत्यादि निर्धारित करने का वर्णन किया जाता है।
  • निर्वाचन अधिकारी की नियुक्ति (Appointment of Returning Officer)—निर्वाचन आयोग केन्द्रीय सरकार से सलाह करके निर्वाचन अधिकारी की नियुक्ति करता है और निर्वाचन अधिकारी की सहायता के लिए सहायक निर्वाचन अधिकारी नियुक्त करता है।
  • नामांकन-पत्रों का प्रवेश करना, उनकी जांच-पड़ताल और उन्हें वापस लेना (Filling of Nomination Papers, their Scrutiny and Withdrawal)—निश्चित तिथि से पहले उम्मीदवार नामांकन-पत्र भरने शुरू कर देते हैं और प्रवेश-पत्रों को भरने की तिथि समाप्त होने के बाद नामांकन-पत्रों की जांच-पड़ताल की जाती है कि उम्मीदवार निश्चित योग्यताओं को पूरा करते हैं या नहीं। जिस उम्मीदवार का नामांकन-पत्र ठीक नहीं होता उसे रद्द कर दिया जाता है।
  • मतदान (Polling)—निश्चित तिथि को राष्ट्रपति के चुनाव के लिए मतदान दिल्ली और राज्यों की राजधानियों में होता है। संसद् के सदस्य दिल्ली में मतदान करते हैं और विधानसभाओं के सदस्य राज्यों की राजधानियों में मतदान करते हैं। संसद् के सदस्य अपने राज्य की राजधानियों में मतदान कर सकते हैं। 1974 के कानून के अनुसार संसद् के सदस्य को अपने राज्य के मतदान केन्द्र पर वोट डालने के लिए कम-से-कम 10 दिन पहले चुनाव आयोग को सूचना देनी पड़ती है। मतदान के पश्चात् मतों की पेटियों को सील करके दिल्ली निर्वाचन अधिकारी के पास भेज दिया जाता है।
  • मतगणना और चुनाव परिणाम (Counting of Votes and Declaration of Results) निश्चित तिथि को निर्वाचन अधिकारी के ऑफिस में मतों की गिनती की जाती है। मतों की गिनती के पश्चात् चुनाव परिणाम घोषित किया जाता है।
    आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के कारण चुनाव जीतने वाले उम्मीदवारों को मतों का निश्चित कोटा प्राप्त करना पड़ता है। कोटा निश्चित करने के लिए अग्रलिखित विधि अपनाई जाती है।

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यदि किसी चुनाव में कुल 8,40,000 मत डाले जाएं तो एक उम्मीदवार को चुनाव जीतने के लिए कम-से-कम [latex]\frac{8,40,000}{1+1}+1=4,20,001[/latex] अवश्य मिलने चाहिए अर्थात् राष्ट्रपति पद पर चुने जाने के लिए यह आवश्यक है कि उम्मीदवार को मतों का पूर्ण बहुमत अवश्य प्राप्त होना चाहिए।

सबसे पहले उम्मीदवारों को प्रथम पसन्द (First Preference) वाले मतों को गिना जाता है। यदि पहले गिनती में किसी उम्मीदवार को कोटा प्राप्त नहीं होता तो सबसे कम वोटों वाले उम्मीदवार को पराजित घोषित कर दिया जाता है और उसकी वोटों को दूसरी पसन्द के अनुसार हस्तांतरित (Transfer) कर दिया जाता है। यदि फिर भी किसी को कोटा प्राप्त न हो सके तो फिर जो सबसे कम वोटों वाला उम्मीदवार होगा उसे पराजित घोषित कर दिया जाएगा और उसकी वोटों को दूसरी पसन्द के अनुसार हस्तांतरित कर दिया जाएगा। यह क्रिया तब तक चलती रहेगी जब तक किसी एक उम्मीदवार को पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं हो जाता।।

अब तक हुए राष्ट्रपति के चुनाव-अब तक राष्ट्रपति सम्बन्धी कुल 15 चुनाव हुए हैं। इनका ब्योरा इस प्रकार है। दो बार डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी का, एक बार डॉ० राधाकृष्णन जी का, एक बार डॉ० जाकिर हुसैन जी का, एक बार डॉ० वी० वी० गिरी जी का, एक बार फखरुद्दीन अली अहमद का, एक बार श्री संजीवा रेड्डी का, एक बार ज्ञानी जैल सिंह का, एक बार डॉ० आर० वेंकटरमण का, एक बार डॉ० शंकर दयाल शर्मा और एक बार श्री के० आर० नारायणन का चुनाव हुआ। पहले चारों चुनावों में पहली मतगणना में ही सफल उम्मीदवार को कोटा प्राप्त हो गया था, परन्तु श्री वी० वी० गिरि के चुनाव के समय उन्हें कोटा दूसरी गणना (Second Count) में ही प्राप्त हो सका। 17 अगस्त, 1974 को हुए राष्ट्रपति चुनाव में श्री फखरुद्दीन अली अहमद को 765587 मत प्राप्त हुए जबकि उनके निकटतम विरोधी श्री त्रिविद कुमार चौधरी को 189196 मत प्राप्त हुए। जुलाई 1977 में श्री संजीवा रेड्डी को सर्वसम्मति से राष्ट्रपति बनाया गया। यह पहला अवसर था जब राष्ट्रपति के पद के लिए चुनाव नहीं हुआ।

जुलाई, 1982 में कांग्रेस (आई) के उम्मीदवार ज्ञानी जैल सिंह अपने एकमात्र प्रतिद्वन्द्वी विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार श्री हंस राज खन्ना को 4,71,428 मूल्य के मतों से पराजित कर देश के सातवें राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। ज्ञानी जैल सिंह को 8,54,113 मूल्य के मत तथा श्री खन्ना को 2,82,685 मूल्य के मत मिले। जुलाई, 1987 में कांग्रेस (इ) के उम्मीदवार आर० वेंकटरमण ने विपक्षी उम्मीदवार न्यायाधीश अय्यर को हराया। जुलाई, 1992 में कांग्रेस (इ) के उम्मीदवार उप-राष्ट्रपति डॉ० शंकर दयाल शर्मा भारत के नौवें राष्ट्रपति चुने गए। उन्होंने विपक्ष के उम्मीदवार जी० जी० स्वैल को 3,29,379 मतों से पराजित किया। जुलाई, 1997 में, राष्ट्रपति के पद के लिए 11वीं बार चुनाव हुआ। संयुक्त मोर्चा, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के सांझा उम्मीदवार उप-राष्ट्रपति के० आर० नारायणन ने शिव सेना के उम्मीदवार भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी० एन० शेषण को 9 लाख से अधिक मतों से पराजित किया। श्री के० आर० नारायणन प्रथम दलित हैं, जो राष्ट्रपति पद के लिए चुने गए। राष्ट्रपति के लिए 12वां चुनाव जुलाई, 2002 में हुआ।

राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन, कांग्रेस एवं समाजवादी पार्टी के सांझा उम्मीदवार डॉ० पी० जे० अब्दुल कलाम ने वाम दलों की उम्मीदवार कैप्टन लक्ष्मी सहगल को हराया। इस चुनाव में डॉ० कलाम को निर्वाचक मण्डल के 4152 मत प्राप्त हुए जबकि श्रीमति सहगल को 459 मत प्राप्त हुए। जुलाई, 2007 में राष्ट्रपति के लिए 13वीं बार चुनाव हुआ। इस चुनाव में संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की उम्मीदवार श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने स्वतन्त्र उम्मीदवार श्री भैरों सिंह शेखावत को हराया। राष्ट्रपति के पद के लिए 14वां चुनाव जुलाई, 2012 में हुआ। इस चुनाव में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के उम्मीदवार श्री प्रणव मुखर्जी ने, जिन्हें समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, शिवसेना एवं जनता दल (यू) का भी समर्थन प्राप्त था, श्री पी० ए० संगमा को हराया। श्री प्रणव मुखर्जी को 713763 (60%) मत प्राप्त हुए, जबकि श्री पी० ए० संगमा को 315987 (31%) मत प्राप्त हुए। राष्ट्रपति के पद के लिए 15वां चुनाव जुलाई, 2017 में हुआ। इस चुनाव में राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन के उम्मीदवार श्री रामनाथ कोविंद राष्ट्रपति चुने गए। उन्होंने संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की उम्मीदवार श्रीमती मीरा कुमार को हराया।

चुनाव प्रणाली की आलोचना (Criticism of the Electoral System) –
राष्ट्रपति की चुनाव प्रणाली की निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की गई है–

1. अप्रजातन्त्रात्मक विधि (Undemocratic Method)-आलोचकों का कहना है कि राष्ट्रपति की चुनाव विधि अप्रजातन्त्रात्मक है क्योंकि राष्ट्रपति का चुनाव प्रत्यक्ष जनता द्वारा नहीं होता, परन्तु हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि भारत जैसे विशाल देश के लिए राष्ट्रपति का प्रत्यक्ष जनता द्वारा चुनाव कराना आसान नहीं है।

2. जटिल विधि (Complex Method)-राष्ट्रपति के चुनाव की विधि बड़ी जटिल है, जिसे समझना आसान नहीं है।

3. यह आनुपातिक प्रतिनिधित्व एकल संक्रमणीय प्रणाली नहीं है (It is not Proportional Representation and Single Transferable Vote System)-आलोचकों का कहना है कि राष्ट्रपति की चुनाव विधि को आनुपातिक प्रतिनिधित्व तथा एकल संक्रमणीय प्रणाली का नाम देना उचित नहीं है क्योंकि आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के लिए चुनाव क्षेत्र बहुसदस्यीय होना चाहिए, परन्तु राष्ट्रपति के चुनाव में में सीट एक होती है। अतः आनुपातिक प्रणाली की एक अनिवार्य आवश्यकता राष्ट्रपति चुनाव प्रणाली पूर्ण नहीं करती।

4. अस्पष्टता (Not Clear)-राष्ट्रपति की चुनाव प्रणाली में कई बातें अस्पष्ट हैं। उदाहरणस्वरूप, यदि उम्मीदवारों की संख्या दो से अधिक हो तथा किसी को भी पहली गिनती में पूर्ण बहुमत न मिले और साथ ही यदि मतदाताओं ने अपनी दूसरी पसन्द न दी हो तो उस अवस्था में चुनाव का निर्णय किस प्रकार किया जाएगा इस विषय में संविधान में कुछ नहीं लिखा गया है।

राष्ट्रपति के चुनाव सम्बन्धी विवाद (Dispute regarding Election of the President)-राष्ट्रपति का चुनाव सम्बन्धी विवाद केवल सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुना जा सकता है। चुनाव में खड़ा कोई भी उम्मीदवार या कम-से-कम दस निर्वाचकों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति के चुनाव को चुनौती दी जा सकती है। रिट का आधार सफल उम्मीदवार द्वारा रिश्वतखोरी, निर्वाचकों पर अनुचित प्रभाव, संविधान और राष्ट्रपति निर्वाचन सम्बन्धी कानून का उल्लंघन हो सकता है। डॉ० जाकिर हुसैन तथा श्री वी० वी० गिरि के चुनाव को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी परन्तु सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव सम्बन्धी रिटों को रद्द कर दिया।

कार्यकाल (Term of Office)-राष्ट्रपति अपने पद पर पांच वर्ष के लिए चुना जाता है और यह समय उस दिन से आरम्भ होता है जिस दिन राष्ट्रपति अपने पद पर आसीन होता है। उसे दोबारा चुने जाने का अधिकार है। भारत में डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने तीसरी बार चुनाव लड़ने से इन्कार कर दिया तो यह आशा की गई थी कि कोई भी राष्ट्रपति तीसरी क्योंकि डॉ० राधाकृष्णन दूसरी बार खड़े नहीं हुए।

पांच वर्ष की अवधि से पहले केवल तीन कारणों से ही उसका पद खाली हो सकता है-(1) यदि वह स्वयं त्यागपत्र दे दे, (2) यदि उसकी मृत्यु हो जाए तथा (3) यदि उसे महाभियोग द्वारा पद से हटा दिया जाए।

वेतन तथा भत्ते (Salary and Allowances)-राष्ट्रपति को 5,00,000 रु० मासिक वेतन मिलता है। राष्ट्रपति को मिलने वाले वेतन पर आय कर देना पड़ता है। राष्ट्रपति को रहने के लिए बिना किराए के निवास स्थान मिलता है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति को कई अन्य भत्ते मिलते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उसे 2,50,000 रुपये मासिक पेंशन मिलती है।

राष्ट्रपति को वेतन तथा भत्ते भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) से मिलते हैं। उनका वेतन, भत्ते तथा दूसरी सुविधाएं उनके कार्यकाल में घटाई नहीं जा सकती।

प्रश्न 2. भारतीय राष्ट्रपति के अधिकारों और कार्यों का उल्लेख कीजिए।
(Describe the powers and duties of the President of India.)
अथवा
संकटकालीन शक्तियों को छोड़ कर भारत के राष्ट्रपति की शक्तियों का उल्लेख करें।
(Explain the powers of the President of India, other than emergency.)
उत्तर- भारत में संसदीय शासन-प्रणाली की व्यवस्था है । संघ की सभी कार्यपालिका शक्तियां संविधान की धारा 53 के अनुसार राष्ट्रपति को दी गई हैं, जिनका प्रयोग वह स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों की सहायता से कर सकता है। परन्तु वास्तव में संसदीय शासन व्यवस्था होने के कारण वह अपनी शक्तियों का प्रयोग अपनी इच्छानुसार न करके मन्त्रिमण्डल की सहायता से ही करता है ।

राष्ट्रपति की शक्तियां (Powers of the President)-राष्ट्रपति को मुख्य रूप से संघ की सभी कार्यपालिका शक्तियां मिली हुई हैं। इनके अतिरिक्त अन्य प्रकार की शक्तियां भी उसके पास हैं । वास्तव में भारत का समस्त शासन उसी ने नाम पर चलता है। उसकी शक्तियां को हम दो भागों में बांट सकते हैं-(क) शान्तिकालीन शक्तियां, तथा (ख) संकटकालीन शक्तियां।

(क) शान्तिकालीन शक्तियां (Powers in Normal Times)-राष्ट्रपति को शान्ति के समय जो शक्तियां मिली हुई हैं, वे भी कई प्रकार की हैं :

(1) कार्यपालिका शक्तियां (Executive Powers)
(2) विधायनी शक्तियां (Legislative Powers)
(3) वित्तीय शक्तियां (Financial Powers)
(4) न्यायिक शक्तियां (Judicial Powers) ।

1. कार्यपालिका शक्तियां (Executive Powers)-राष्ट्रपति को निम्नलिखित कार्यपालिका शक्तियां प्राप्त हैं :

(i) प्रशासकीय शक्तियां (Administrative Powers)-भारत का समस्त प्रशासन उसी के नाम पर चलाया जाता है और भारत सरकार के सभी निर्णय औपचारिक रूप से उसी के नाम पर लिए जाते हैं । देश का सर्वोच्च शासक होने के नाते वह नियम तथा अधिनियम भी बनाता है ।
(ii) मन्त्रिपरिषद् से सम्बन्धित शक्तियां (Powers relating to Council of Ministers)-राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री को नियुक्त करता है और उसके परामर्श से मन्त्रिमण्डल के अन्य मन्त्रियों को नियुक्त करता है । वह मन्त्रियों को पदच्युत कर सकता है परन्तु प्रधानमन्त्री की सलाह पर ही वह यह कार्य कर सकता है ।
(iii) नियुक्तियां करने की शक्तियां (Powers of making Appointments)—सभी महत्त्वपूर्ण नियुक्तियां राष्ट्रपति द्वारा की जाती हैं । अटॉर्नी जनरल, चुनाव कमिश्नर, महालेखा परीक्षक, (Auditor and Comptroller General), संघीय लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा दूसरे सदस्य, यदि राज्यों का सांझा लोक सेवा आयोग हो तो उनका प्रधान तथा दूसरे सदस्य, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य न्यायाधीशों तथा उच्च न्यायाधीशों तथा अन्य न्यायाधीशों, विदेशों को भेजे जाने वाले राजदूतों, राज्य के राज्यपालों तथा संघीय क्षेत्रों का राज्य-प्रबन्ध चलाने के लिए चीफ कमिश्नर तथा उप राज्यपाल आदि की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है । राष्ट्रपति को कई प्रकार के आयोगों जैसे कि भाषा आयोग, वित्त आयोग, चुनाव आयोग, अनुसूचित जातियों, कबीलों तथा पिछड़े हुए वर्गों के सम्बन्ध में आयोग आदि निर्माण करने का भी अधिकार है ।
(iv) सैनिक शक्तियां (Military Powers)-राष्ट्रपति राष्ट्र की सशस्त्र सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति है । वह स्थल सेना, जल सेना और वायु सेनाध्यक्षों को नियुक्त करता है । वह फील्ड मार्शल की उपाधि भी प्रदान करता है । वह राष्ट्रीय रक्षा समिति का अध्यक्ष है ।

(v) विदेशी सम्बन्धों की शक्तियां (Powers relating to Foreign Affairs)-राष्ट्रपति को विदेशी मामलों में भी बहुत-से-अधिकार प्राप्त हैं । अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में वह भारत का प्रतिनिधित्व करता है । दूसरे देशों को भेजे जाने वाले राजदूत उसी के द्वारा नियुक्त किए जाते हैं और अन्य देशों के राजदूतों को भारत में वही स्वीकार करता है। राष्ट्रपति युद्ध और शान्ति की घोषणा कर सकता है ।

(vi) राज्य सरकारों को निर्देश देने की शक्ति (Powers of issuing directions to State Governments)राष्ट्रपति को राज्यों के आपसी सम्बन्धों के बारे में कुछ निर्देश जारी करने और उन पर नियन्त्रण रखने तथा उनमें सहयोग उत्पन्न करने के भी कुछ अधिकार हैं। वह राज्य सरकारों को संघीय कानून के उचित पालन के लिए आदेश दे सकता है । आदिम जन-जाति क्षेत्रों के प्रशासन के लिए असम और नागालैंड के राज्यपाल राष्ट्रपति के एजेन्ट के रूप में काम करते हैं।

(vii) संघीय प्रदेशों का प्रशासन (Administration of Union Territories) केन्द्रीय प्रदेशों (Union Territories) का प्रशासन राष्ट्रपति के नाम पर ही चलता है ।

2. विधायिनी शक्तियां (Legislative Powers)-यद्यपि राष्ट्रपति संसद् का सदस्य नहीं होता फिर भी उसे संसद् का अभिन्न अंग होने के कारण वैधानिक शक्तियां प्राप्त हैं ।
राष्ट्रपति की विधायिनी शक्तियों का उल्लेख निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है :

(i) राष्ट्रपति की संसद् के अधिवेशन बुलाने और सत्रावसान सम्बन्धी शक्तियां-राष्ट्रपति ही संसद् के दोनों सदनों का अधिवेशन बुला सकता है, अधिवेशन का समय बढ़ा सकता है तथा उसे स्थगित कर सकता है । राष्ट्रपति ही अधिवेशन के स्थान और समय को निश्चित करता है। वह जब चाहे अधिवेशन बुला सकता है, परन्तु यह आवश्यक है कि पिछले अधिवेशन की अन्तिम बैठक और अगले अधिवेशन की पहली बैठक में छ: महीने से अधिक अन्तर नहीं होना चाहिए।

(ii) राष्ट्रपति द्वारा संसद् में भाषण-राष्ट्रपति संसद् के दोनों सदनों में अलग-अलग या दोनों के सम्मिलित अधिवेशन को सम्बोधित कर सकता है । नई संसद् का पहला तथा वर्ष का पहला अधिवेशन राष्ट्रपति के भाषण से ही आरम्भ होता है जिसमें राष्ट्रपति संसद् को उन उद्देश्यों की सूचना देता है जिनके लिए कि अधिवेशन बुलाया गया है राष्ट्रपति अपने भाषण में सरकार की गृह-नीति, विदेश-नीति तथा अन्य नीतियों पर प्रकाश डालता है ।

(iii) राज्यसभा के 12 सदस्य मनोनीत करना-राष्ट्रपति राज्यसभा के लिए ऐसे 12 सदस्यों को मनोनीत करता है । जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला या सामाजिक सेवा के बारे में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव होता है ।

(iv) लोकसभा में एंग्लो-इण्डियन को मनोनीत करना-राष्ट्रपति को 2 एंग्लो इण्डियन को लोकसभा का सदस्य मनोनीत करने के अधिकार प्राप्त है बशर्ते कि इस समुदाय को निर्वाचन द्वारा समुचित प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं हो पाया हो ।

(v) संसद् द्वारा पास किए गए बिलों पर स्वीकृति-दोनों सदनों के पास होने के बाद बिल राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए आता है तथा उसकी स्वीकृति के बिना कानून नहीं बन सकता । धन विधेयक (Money Bill) पर उसे स्वीकृति देनी पड़ती है क्योंकि धन-बिल राष्ट्रपति की सिफ़ारिश पर ही पेश होते हैं । साधारण बिलों पर उसे निषेधाधिकार (Veto Power) का अधिकार प्राप्त है अर्थात् वह साधारण बिल पर अपनी स्वीकृति देने से इन्कार कर सकता है, स्वीकृति रोक सकता है तथा बिल को संसद् में वापस भेज सकता है। परन्तु यदि दूसरी बार संसद् साधारण बहुमत से बिल को पास कर देती है तो राष्ट्रपति को अपनी स्वीकृति देनी पड़ती है । 1987 में राष्ट्रपति ज्ञानी जैन सिंह ने भारतीय डाकघर (संशोधन) विधेयक को न तो स्वीकृति दी और न ही संसद् को वापस भेजा ।

(vi) कुछ बिल राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से संसद् में पेश किए जा सकते हैं-धन बिल और कुछ बिल जैसे कि नए राज्यों को बनाने तथा वर्तमान राज्यों के नाम और सीमा में परिवर्तन करने से सम्बन्ध रखने वाले बिल राष्ट्रपति की सिफ़ारिश के बिना संसद् में पेश नहीं किए जा सकते । व्यापार पर प्रतिबन्ध लगाने वाले विधेयक इसी प्रकार का विधेयक है।

(vii) लोकसभा को भंग करने की शक्ति-लोकसभा की अवधि पांच वर्ष है, परन्तु राष्ट्रपति निश्चित अवधि से पहले भी लोकसभा को भंग कर सकता है । राष्ट्रपति अपनी इस शक्ति का प्रयोग प्रधानमन्त्री की सलाह से करता है । 26 अप्रैल, 1999 को राष्ट्रपति के० आर० नारायणन ने प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी की सलाह पर लोक सभा को भंग किया था।

(vii) राज्य विधानमण्डलों द्वारा पास कुछ बिल राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित रखे जाते हैं-गवर्नर राज्य विधानमण्डल द्वारा पास किए गए ऐसे बिलों के जिनका उद्देश्य निजी सम्पत्ति का अनिवार्य अर्जन हो या उच्च न्यायालय की शक्तियां को कम करना हो या संसद् द्वारा घोषित की गई आवश्यक वस्तुओं पर क्रय-विक्रय कर लगाना हो इत्यादि, राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित रख सकता है ।

(ix) अध्यादेश जारी करना-जब संसद् का अधिवेशन न हो रहा हो और परिस्थितियां इस बात को बाध्य करती हों तो राष्ट्रपति को अध्यादेश (Ordinance) जारी करने का अधिकार है । यह अध्यादेश उसी शक्ति और प्रभाव के साथ लागू होते हैं जिस प्रकार कि संसद् द्वारा बनाए गए अधिनियम । परन्तु संसद् का अधिवेशन आरम्भ होते ही ये उसके सामने रखे जाने आवश्यक हैं और अधिवेशन आरम्भ होने की तिथि से लेकर 6 सप्ताह तक वह अध्यादेश जारी रह सकता है । 6 सप्ताह पश्चात् अध्यादेश समाप्त हो जाएगा । इसके पहले भी संसद् अध्यादेश को रद्द कर सकती है और राष्ट्रपति भी जब चाहे उसे वापस ले सकता है। यदि संविधान की धाराओं को अच्छी तरह पढ़ा जाए तो इसका भाव निकलता है कि राष्ट्रपति द्वारा जारी किया गया अध्यादेश पूरे 772 मास तक चल सकता है । राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की पूर्ण छूट है तथा उसके निर्णय को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती ।

(x) सन्देश भेजने का अधिकार-राष्ट्रपति संसद् के किसी भी सदन को सन्देश भेज सकता है । जिस सदन को राष्ट्रपति द्वारा सन्देश भेजा जा सकता है । वह शीघ्र ही उस सन्देश पर विचार करता है । सन्देश किसी ऐसे विधेयक के साथ जो या तो संसद् के समक्ष विचाराधीन हो अथवा जो महत्त्वपूर्ण हो, भेजा जाता है ।

3. वित्तीय शक्तियां (Financial Powers)—राष्ट्रपति को काफ़ी महत्त्वपूर्ण वित्तीय अधिकार प्रदान किए गए हैं:-

  • बजट पेश करना-सरकारी आय-व्यय का वार्षिक बजट राष्ट्रपति ओर से संसद् के समक्ष प्रस्तुत किया जाता
  • वित्त बिल प्रस्तुत करने की अनुमति देता है-राष्ट्रपति की स्वीकृति के बिना कोई वित्त बिल संसद में पेश नहीं किया जा सकता । उसकी अनुमति के बिना किसी वित्तीय अनुदान की मांग नहीं की जा सकती ।
  • आकस्मिक निधि पर नियन्त्रण-भारत की आकस्मिक निधि (Contingency Fund of India) राष्ट्रपति के अधीन है । इस निधि से वह किसी भी आकस्मिक खर्च के लिए संसद् की स्वीकृति से पूर्व ही धनराशि खर्च कर सकता है।
  • आयकर से होने वाली आय तथा पटसन के निर्यात कर से हुई आय का वितरण-राष्ट्रपति आय कर से होने वाली आय में विभिन्न राज्यों के भाग को निर्धारित करता है तथा यह भी निश्चित करता है कि पटसन के निर्यात कर की आय में से कुछ राज्यों को बदले में क्या धनराशि मिलनी चाहिए ।
  • राष्ट्रपति वित्त आयोग की नियुक्ति करता है ।

4. न्यायिक शक्तियां (Judicial Powers)-राष्ट्रपति को बहुत-सी न्यायिक शक्तियां भी प्राप्त हैं-

  • राष्ट्रपति को न्यायालयों द्वारा दण्डित व्यक्तियों के सम्बन्ध में क्षमा प्रदान (Pardon) करने और उनकी सज़ा को कम करने का अधिकार प्राप्त है अर्थात् राष्ट्रपति किसी अपराधी की सज़ा न केवल पूर्ण रूप से क्षमा कर सकता है बल्कि उसे कुछ दिनों के लिए लागू होने से रोक सकता है या उसके स्वरूप को परिवर्तित कर सकता है। 8 नवम्बर, 1997 को राष्ट्रपति के० आर० नारायणन ने निरंकारी संत बाबा गुरबचन सिंह की हत्या में अपराधी ठहराए गए अकाल तख्त के जत्थेदार भाई रणजीत सिंह को माफ़ी दी।
  • राष्ट्रपति राज्यों के उच्च न्यायालयों तथा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्तियां करता है।
  • राष्ट्रपति किसी भी विषय में सर्वोच्च न्यायालय की सलाह ले सकता है । सर्वोच्च न्यायालय को ऐसे विषयों पर सलाह देनी पड़ती है, परन्तु राष्ट्रपति के लिए परामर्श लेना आवश्यक नहीं है ।

(ख) राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियां (Emergency Powers)-राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों का वर्णन संविधान के 18वें भाग में किया गया है । अग्रलिखित तीन प्रकार की अवस्थाओं में राष्ट्रपति को संकटकाल की घोषणा करने का अधिकार प्राप्त हैं :

  1. युद्ध, विदेशी आक्रमण तथा सशस्त्र-विद्रोह से उत्पन्न संकट ।
  2. किसी राज्य में संवैधानिक मशीनरी के फेल हो जाने के कारण उत्पन्न संकट ।
  3. देश में आर्थिक अथवा वित्तीय संकट के कारण उत्पन्न परिस्थिति ।

1. युद्ध, विदेशी आक्रमण तथा सशस्त्र विद्रोह से उत्पन्न संकट (Emergency due to War, External aggression or Armed Rebellion-Act. 352)—संविधान की धारा 352 के अनुसार राष्ट्रपति राष्ट्रीय संकट (National Emergency) की घोषणा कर सकता है । यदि उसको विश्वास हो जाए कि गम्भीर संकट उत्पन्न हो गया है जैसे युद्ध, विदेशी आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह के कारण भारत अथवा उसके राज्य क्षेत्र के किसी भी भाग की सुरक्षा खतरे में है । 59वें संशोधन के अनुसार आन्तरिक गड़बड़ी की स्थिति में पंजाब में आपात्काल को लागू किया जा सकता है । परन्तु राष्ट्रपति राष्ट्रीय संकट की घोषणा मन्त्रिमण्डल की लिखित सलाह से ही कर सकता है ।

2. राज्य में संवैधानिक मशीनरी फेल होने से उत्पन्न संकट (Emergency due to the constitutional breakdown-Art. 356)-जब राष्ट्रपति के राज्यपाल अथवा किसी अन्य स्त्रोत के आधार पर विश्वास हो जाए कि राज्य का शासन संविधान की धाराओं के अनुसार नहीं चलाया जा सकता तो वह इस आशय की घोषणा कर सकता है । संसद् की स्वीकृति के बिना यह घोषणा दो महीने तक लागू रह सकती है । संसद् की स्वीकृति मिलने पर यह घोषणा 6 महीने तक लागू रह सकती है और 6 महीने के बाद यदि संसद् दोबारा प्रस्ताव पास कर दे तो 6 महीने और लागू रह सकती है । 59वें संशोधन के अनुसार पंजाब में राष्ट्रपति शासन अधिकतम 3 वर्षों तक लागू रह सकता है। परन्तु 64वें संशोधन के अनुसार यह अवधि 6 महीने और बढ़ा दी गई और 68वें संशोधन के अनुसार पंजाब में राष्ट्रपति शासन अधिकतम 5 वर्ष तक लागू रह सकता है ।

3. आर्थिक संकट के समय उत्पन्न स्थिति (Emergency due to Financial Crisis-Art. 360)—यदि राष्ट्रपति को विश्वास हो जाए कि भारत या उसके किसी राज्य क्षेत्र के किसी भाग का वित्तीय स्थायित्व संकट में है तो वह वित्तीय आपात् की घोषणा (अनुच्छेद 360) कर सकता है । ऐसी उद्घोषणा पर दो महीने के अन्दर संसद् की स्वीकृति प्राप्त हो जानी चाहिए । ऐसी उद्घोषणा अनिश्चित समय तक जारी रहती है ।

राष्ट्रपति की स्थिति (Position of the President)-भारत में राष्ट्रपति की उचित स्थिति क्या है, इसके बारे शक्तियों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि वह एक शक्तिशाली पद का स्वामी है। यदि वह चाहे तो अपनी इन शक्तियों का प्रयोग करके तानाशाह भी बन सकता है ।

राष्ट्रपति की शक्तियों की कानूनी व्याख्या के आधार पर हम राष्ट्रपति के बारे में कुछ भी कह लें, परन्तु उसकी वास्तविक और व्यावहारिक स्थिति कुछ और ही है । भारत में संसदीय शासन प्रणाली है और राष्ट्रपति राज्य का नाममात्र का संवैधानिक अध्यक्ष है। वह केवल शान्ति के समय में ही नहीं बल्कि संकट के समय भी अपनी शक्तियों का प्रयोग मन्त्रिमण्डल की सलाह के अनुसार ही कर सकता है। मन्त्रिमण्डल की सलाह के बिना और सलाह के विरुद्ध वह किसी शक्ति का प्रयोग नहीं करता । 44वें संशोधन के अन्तर्गत अनुच्छेद 74 में संशोधन करके यह व्यवस्था की गई है कि राष्ट्रपति को मन्त्रिमण्डल द्वारा जो भी सलाह दी जाती है, राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल को उस पर पुनः विचार करने के लिए कह सकता है और पुनर्विचार करने के बाद मन्त्रिमण्डल जो सलाह राष्ट्रपति को देता है, उसे वह सलाह माननी पड़ेगी । उसका पद आदर और सम्मान का पद तो है, परन्तु शक्ति सम्पन्न नहीं । यदि वह अपनी शक्ति का प्रयोग अपनी इच्छा के अनुसार करने का प्रयत्न करे तो एक संवैधानिक संकट उत्पन्न हो सकता है तथा इस बात को मन्त्रिमण्डल व संसद् दोनों में से कोई भी सहन नहीं करेगा और उस पर महाभियोग लगाकर संसद् द्वारा उसे अपदस्थ कर दिया जायगा । 29 अप्रैल, 1977 को मन्त्रिमण्डल ने कार्यवाहक राष्ट्रपति को 9 राज्यों की विधानसभाओं को भंग करके राष्ट्रपति शासन लागू करने की सलाह दी जिस पर कार्यवाहक राष्ट्रपति बी० डी० जत्ती ने 24 घण्टे पश्चात् अर्थात् 30 अप्रैल, 1977 को अमल किया । कार्यवाहक राष्ट्रपति के 24 घण्टे बाद हस्ताक्षर करने की सभी समाचार-पत्रों ने अपने-अपने सम्पादकीय लेख में कड़ी आलोचना की और इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रपति को मन्त्रिमण्डल की सलाह तुरन्त माननी चाहिए थी । डॉ० अम्बेदकर ने संविधान-सभा में भाषण देते हुए कहा था, “हमारे राष्ट्रपति की वही स्थिति है जो कि ब्रिटिश संविधान के अन्तर्गत वहां के सम्राट की। वह राज्य का अध्यक्ष है कार्यपालिका का नहीं। वह राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है, शासन नहीं ।”

राष्ट्रपति निम्नलिखित शक्तियों का प्रयोग अपनी इच्छानुसार कर सकता है :-

  1. सलाह देने का अधिकार (Right to Advice)-राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल को किसी भी विषय पर सलाह दे सकता है । भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने उस समय के प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू को कई बार कई महत्त्वपूर्ण विषयों पर सलाह दी । इसी प्रकार डॉ० राधाकृष्णन ने उस समय की प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी को कई बार सलाह दी ।
  2. उत्साहित करने का अधिकार (Right to Encourage)-जब मन्त्रिमण्डल देश के हित में कार्य कर रहा हो तो राष्ट्रपति उसका उत्साह बढ़ाने के लिए उसकी प्रशंसा कर सकता है । भूतपूर्व राष्ट्रपति वी० वी० गिरी ने भूतपूर्व प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी को उनकी नीतियों के लिए समय-समय पर प्रोत्साहित किया ।
  3. चेतावनी देने का अधिकार (Right to Warn)-यदि मन्त्रिमण्डल देश के हित में कार्य न कर रहा हो तो राष्ट्रपति उसको चेतावनी दे सकता है । .
  4. सूचना प्राप्त करने का अधिकार (Right to be Informed)-राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल व प्रधानमन्त्री से प्रशासन सम्बन्धी कोई भी सूचना प्राप्त कर सकता है ।
  5. संविधान की रक्षा का अधिकार (Right to Protect the Constitution)-राष्ट्रपति संविधान की रक्षा के लिए शपथ-बद्ध होता है । वह संविधान की रक्षा करने के लिए कई प्रकार के कदम उठा सकता है ।
  6. किसी बिल को पुनर्विचार के लिए भेजने का अधिकार (Right to send any bill for Reconsideration)-राष्ट्रपति किसी भी साधारण बिल को पुनर्विचार करने के लिए वापस भेज सकता है ।।

उपर्युक्त सभी कार्यों के लिए राष्ट्रपति को मन्त्रिमण्डल की सलाह लेने की आवश्यकता नहीं होती है । वास्तव में राष्ट्रपति की स्थिति उसके अपने व्यक्तित्व पर निर्भर करती है । यदि एक अच्छे व्यक्तित्व वाला व्यक्ति इस पद पर आसीन हो तो वह शासन पर भी अपना प्रभाव डाल सकता है । पं० जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में, “हमने अपने राष्ट्रपति को वास्तविक शक्ति नहीं दी अपितु उसके पद को बड़ा शक्तिशाली तथा सम्मानजनक बनाया है ।” (“We have not given our President any real power but we have made his position one of great authority and dignity.”’)

प्रश्न 3. भारतीय राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए । क्या भारतीय राष्ट्रपति तानाशाह बन सकता है ?
(Critically examine the emergency powers of the Indian President. Can Indian President become a dictator ?)
उत्तर-जिस प्रकार किसी व्यक्ति के जीवन में कठिनाइयां आ सकती हैं, उसी प्रकार राष्ट्र के जीवन में संकट आ सकते हैं । संकट का सामना करने के लिए सरकार के पास असाधारण शक्तियों का होना आवश्यक है । अतः संविधान के अन्तर्गत संकटकालीन धाराओं का वर्णन कर देना उचित होता है । भारतीय संविधान निर्माताओं ने संकटकाल का सामना करने के लिए संविधान के भाग 18 में संकटकालीन धाराओं का वर्णन किया है अर्थात् इस भाग में राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों का वर्णन किया गया है ताकि देश की सुरक्षा को सुरक्षित रखा जा सके ।
संविधान के अनुच्छेद 352, 356 तथा 360 में तीन प्रकार के संकट का वर्णन किया गया है :

  • युद्ध, विदेशी आक्रमण तथा सशस्त्र-विद्रोह से उत्पन्न संकट ।
  • किसी राज्य में संवैधानिक प्रणाली के फेल हो जाने के कारण बने आकस्मिक संकट।
  • देश में आर्थिक अथवा वित्तीय संकट के कारण उत्पन्न परिस्थिति ।

Mसंविधान की धारा 352 के अनुसार राष्ट्रपति राष्ट्रीय संकट (National Emergency) की घोषणा कर सकता है यदि उसको विश्वास हो जाए कि गम्भीर संकट उत्पन्न हो गया है जैसे युद्ध, विदेशी आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह के कारण भारत अथवा उसके राज्य क्षेत्र के किसी भी भाग की सुरक्षा खतरे में है। 59वें संशोधन के अनुसार पंजाब में आन्तरिक गड़बड़ी (Internal disturbance) के आधार पर भी आपात्काल की घोषणा की जा सकती है। परन्तु राष्ट्रपति संकटकालीन घोषणा तभी कर सकता है यदि मन्त्रिमण्डल संकटकालीन घोषणा करने की लिखित सलाह दे ।

राष्ट्रपति की राष्ट्रीय संकट की घोषणा एक महीने तक लागू रह सकती है । एक महीने के बाद संकटकालीन घोषणा समाप्त हो जाती है । यदि इससे पहले संसद् के दोनों सदन अलग-अलग इसको कुल संख्या के बहुमत और उपस्थित तथा मतदान के दो तिहाई सदस्यों ने पास न कर दिया हो । यह घोषणा 6 महीने तक लागू रह सकती है और संकटकाल की घोषणा को लागू रखने के लिए यह आवश्यक है कि 6 महीने के बाद संसद् के दोनों सदन संकटकाल की घोषणा के प्रस्ताव को पास करें । यदि लोकसभा संकटकाल की घोषणा लागू रहने के विरुद्ध प्रस्ताव को पास कर दे तो संकटकाल की घोषणा लागू नहीं रह सकती । लोकसभा के 10 प्रतिशत सदस्य अथवा अधिक सदस्य घोषणा के अस्वीकृति प्रस्ताव पर विचार करने के लिए लोकसभा की बैठक बुला सकते है ।

इस घोषणा के परिणाम (Effects of Proclamation)-राष्ट्रीय संकटकालीन घोषणा के समय शासन का संघीय रूप एकात्मक हो जाता है । समस्त देश का शासन संघीय सरकार के हाथ में आ जाता है ।

  1. केन्द्रीय सरकार राज्यों की सरकारों को निर्देश दे सकती है कि वे अपनी कार्यपालिका शक्तियों का प्रयोग किस प्रकार करें ? राज्यों के राज्यपाल राष्ट्रपति के आदेशानुसार कार्यकारी शक्ति का प्रयोग करते हैं।
  2. संसद् को राज्य-सूची में दिए गए विषयों पर कानून बनाने का अधिकार मिल जाता है ।
  3. राष्ट्रपति को संघीय सरकार तथा राज्यों में धन विभाजन सम्बन्धी योजना में अपनी इच्छानुसार परिवर्तन करने का अधिकार मिल जाता है ।
  4. संसद् को संकटकाल के समय कानून द्वारा अपनी अवधि को एक बार में एक वर्ष तक बढ़ाने का अधिकार मिल जाता है, परन्तु यह अवधि संकटकालीन घोषणा के समाप्त होने के 6 मास से अधिक नहीं बढ़ाई जा सकती ।
  5. धारा 19 के अन्तर्गत दी गई स्वतन्त्रताओं को स्थगित किया जा सकता है । परन्तु 44वें संशोधन के अनुसार अनुच्छेद 19 में दिए गए अधिकार तभी स्थगित किए जा सकते हैं यदि संकटकाल की घोषणा युद्ध अथवा बाहरी हमले के कारण हो न कि सशस्त्र विद्रोह पर । 59वें संशोधन के अनुसार पंजाब में 19 अनुच्छेद में दी गई स्वतन्त्रताएं सशस्त्र विद्रोह अथवा आन्तरिक गड़बड़ी के कारण घोषित आपात्काल में भी स्थगित की जा सकती है ।
  6. राष्ट्रपति राज्य सूची के विषयों पर भी अध्यादेश जारी कर सकता है ।

7 M का सहारा लेने के अधिकारों को समस्त भारत या उसके किसी भी भाग में स्थगित कर सकता था, परन्तु 44वें संशोधन के अनुसार अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अधिकार को लागू कराने के अधिकार को स्थगित नहीं किया जा सकता । 59वें संशोधन के अन्तर्गत पंजाब में आन्तरिक गड़बड़ी के कारण घोषित आपात्काल में इस अधिकार को भी स्थगित किया जा सकता है ।

चीनी आक्रमण पर राष्ट्रपति ने 20 अक्तूबर, 1962 को संकटकाल की घोषणा की थी । दूसरी बार यह घोषणा 3 दिसम्बर, 1971 को की गई और तीसरी बार 26 जून, 1975 को राष्ट्रपति ने आन्तरिक अशान्ति के कारण आपात्कालीन घोषणा की और इस आन्तरिक आपात्कालीन स्थिति को 21 मार्च, 1977 को समाप्त किया गया और 1971 में लागू की गई आपात्कालीन स्थिति को 27 मार्च, 1977 को समाप्त किया गया ।

2. राज्यों में संवैधानिक मशीनरी फेल होने से पैदा हुए संकट (Emergency due to the Constitutional break down)-Art. (356)-जब राष्ट्रपति को गवर्नर की रिपोर्ट पर अथवा किसी अन्य स्रोत के आधार पर विश्वास हो जाए कि राज्य का शासन संविधान की धाराओं के अनुसार नहीं चलाया जा सकता तो वह इस आशय की संकटकाल की घोषणा कर सकता है। संसद् की स्वीकृति के बिना यह घोषणा 2 महीने तक लागू रह सकती है, संसद् की स्वीकृति मिलने पर यह घोषणा 6 महीने तक लागू रह सकती है और 6 महीने बाद यदि संसद् दोबारा प्रस्ताव पास कर दे तो 6 महीने और लागू रह सकती है। इस प्रकार की घोषणा साधारणतः अधिक-से-अधिक एक वर्ष तक लागू रह सकती है । एक वर्ष से अधिक तभी लागू रह सकती है यदि राष्ट्रीय संकटकालीन घोषणा लागू हो और चुनाव आयोग यह प्रमाण-पत्र दे कि विधानसभा के चुनाव करवाना कठिन है । 59वें संशोधन के अन्तर्गत पंजाब में राष्ट्रपति शासन की अधिकतम अवधि तीन वर्ष की गई और 68वें संशोधन के अनुसार पंजाब में राष्ट्रपति शासन अधिकतम 5 वर्ष तक लागू रह सकता है ।

प्रभाव (Effects) –

  1. राष्ट्रपति राज्य की सरकार के उच्च न्यायालय को छोड़ कर अन्य किसी अधिकारी के सब या कोई कार्य अपने हाथ में ले सकता है ।
  2. राष्ट्रपति घोषणा कर सकता है कि राज्य में विधानमण्डल की शक्तियां संसद् के अधिकार द्वारा या अधीन प्रयुक्त होंगी ।
  3. राज्य का मन्त्रिमण्डल तथा विधानमण्डल स्थगित अथवा भंग किया जा सकता है।
  4. राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति के एजेण्ट के रूप में कार्य करता है तथा उसके नियन्त्रण में रहते हुए उसकी सभी आज्ञाओं का पालन करता है ।
  5. संसद् उन वैधानिक शक्तियों को जो उसे राज्य विधानमण्डल के बदले में प्राप्त होती हैं, राष्ट्रपति को हस्तांतरित कर सकती है जो उसे अन्य किसी अधिकारी को सौंप सकता है ।
  6. जब लोकसभा का अधिवेशन न हो रहा हो तब राष्ट्रपति राज्य की संचित निधि में से संसद् की आज्ञा मिलने तक आवश्यक व्यय को प्राधिकृत कर सकता है ।

1951 मे पंजाब में प्रथम बार इस घोषणा को लागू किया गया था । 1952 में पेप्सू, 1954 में आन्ध्र प्रदेश, 1966 में पंजाब, नवम्बर, 1972 में उत्तर प्रदेश तथा 1976 में गुजरात में इस घोषणा को लागू किया गया । मार्च, 1977 में जम्मू-कश्मीर में भी इस प्रकार की घोषणा को लागू किया गया । 30 अप्रैल, 1977 को कार्यवाहक राष्ट्रपति बी० डी० जत्ती (B. D. Jatti) ने भी नौ राज्यों-उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, पश्चिमी बंगाल, बिहार और उड़ीसा के विधानसभाओं को भंग करके राष्ट्रपति शासन लागू किया। 17 फरवरी, 1980 को राष्ट्रपति संजीवा रेड्डी ने भी नौ राज्यों-उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडू, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र, उड़ीसा और गुजरात की विधानसभाओं को भंग करके राष्ट्रपति शासन लागू किया।

पंजाब के राज्यपाल सिद्धार्थ शंकर रे की सिफ़ारिश पर 11 मई, 1987 को पंजाब में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया और 25 फरवरी, 1992 को समाप्त हुआ । 6 दिसम्बर, 1992 को उत्तर प्रदेश में तथा 15 दिसम्बर, 1992 को मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा हिमाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया ।

3. आर्थिक संकट के समय उत्पन्न स्थिति (Emergency due to Financial Crisis, Art. 360) यदि राष्ट्रपति को विश्वास हो जाए कि भारत या उसके किसी राज्य क्षेत्र के किसी भाग का वित्तीय स्थायित्व संकट में है तो वह वित्तीय आपात् की घोषणा (अनुच्छेद 360) कर सकता है । ऐसी उद्घोषणा पर दो महीने के अन्दर-अन्दर संसद् की स्वीकृति प्राप्त हो जानी चाहिए । वित्तीय संकट की घोषणा भारत में अभी तक एक बार भी नहीं की गई । इस प्रकार की संकट की स्थिति में राष्ट्रपति को निम्नलिखित विशेष शक्तियां मिलती हैं :-

(क) वह राज्यों द्वारा पास किए गए धन बिलों को अपनी स्वीकृति के लिए मंगवा सकता है ।
(ख) वह राज्यों को धन-सम्बन्धी कोई भी आदेश दे सकता है ।
(ग) वह सब सरकारी कर्मचारियों के (केन्द्र और राज्य के जिनमें सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालयों के जज भी सम्मिलित हैं), वेतन और भत्तों में कमी कर सकता है ।
(घ) राष्ट्रपति संघ तथा राज्यों के मध्य आय के साधारण विभाजन में परिवर्तन कर सकता है ।

संकटकालीन शक्तियों की आलोचना (Criticism of Emergency Powers) –

संविधान सभा के अन्दर तथा बाहर दोनों स्थानों पर राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों की बड़ी तीव्र आलोचना की गई थी । यह आलोचना बड़ी गम्भीर तथा आधारपूर्ण थी । संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने यह विचार प्रकट किया कि एक ऐसे शासन अधिकारी को जो न तो जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप में चुना गया हो तथा न ही संसद् के सम्मुख उत्तरदायी हो, इतनी व्यापक शक्तियों का देना उचित नहीं लगता । कुछ अन्य सदस्यों का यह विचार था कि भारत का राष्ट्रपति इन शक्तियों के दुरुपयोग से लोकतन्त्र का अन्त कर सकता है । इसी विचारधारा को लेकर इस डर को प्रकट किया गया कि भारत का राष्ट्रपति अपनी संकटकालीन शक्तियों का सहारा लेकर उसी प्रकार की तानाशाही स्थापित कर सकता है। जैसे कि हिटलर ने वाइमर संविधान की धारा 48 का सहारा लेते हुए की थी । श्री एच० वी० कॉमथ (Shri H.V. Kamth) ने आलोचना करते हुए कहा था, “विश्व के लोकतन्त्रीय देशों के किसी भी संविधान की हमारे संविधान के संकटकाल सम्बन्धी अध्याय से तुलना नहीं की जा सकती ।”

श्री के० टी० शाह (K.T. Shah) ने इसको संविधान के सबसे अधिक अप्रगतिशील अध्याय की अन्तिम तथा सुन्दर झांकी कहा है ।
जिस समय संविधान सभा ने राष्ट्रपति द्वारा मौलिक अधिकारों को निलम्बित (Suspend) करने की व्याख्या को स्वीकार किया तब श्री० एच० वी० कॉमथ ने यह घोषणा की, “यह लज्जा तथा शोक का दिन है, परमात्मा भारतीयों की रक्षा करे ।” (“It is a day of Shame and sorrow, God save Indian people.”)
राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों के विरुद्ध कुछ और भी विचार दिए गए हैं जिस कारण इन शक्तियों की बहुत आलोचना की जाती है । वे विचार निम्नलिखित हैं-

1. आपात्काल की शक्तियों का दुरुपयोग होने की सम्भावना (Possibility of misuse of Emergency Powers)-राष्ट्रपति को यह पूर्ण अधिकार दिया गया है कि यदि वह अनुभव करे तो किसी युद्ध अथवा बाह्य आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह के उत्पन्न होने से पूर्व ही संकटकाल की घोषणा कर सकता है तथा उसकी शक्ति को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। परन्तु 44वें संशोधन के अनुसार राष्ट्रपति संकटकाल की घोषणा तभी कर सकता है यदि ऐसा करने की मन्त्रिमण्डल लिखित सलाह दे ।।

2. मौलिक अधिकारों का स्थगन (Suspension of Fundamental Rights)—संकट के समय राष्ट्रपति लोगों के मौलिक अधिकारों और स्वतन्त्रताओं को भी नष्ट कर सकता है और इससे उसकी स्थिति और भी शक्तिशाली बन जाती है । वह सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के मौलिक अधिकारों से सम्बन्धित अधिकारों को भी समाप्त कर सकता है ।

3. यह संघात्मक सरकार के लिए खतरा है (Danger for Federation)—यह भी बड़े आश्चर्य की बात है कि संकटकाल की घोषणा के समय संघीय ढांचा एकात्मक सरकार में बदला जाता है तथा इकाइयों की सरकारें समाप्त कर दी जाती हैं । इसी कारण संविधान सभा में श्री टी० टी० कृष्णमाचारी (T.T. Krishanamahari) ने कहा था, “भारतीय संविधान साधारण काल में संघात्मक तथा युद्ध एवं अन्य संकटकालीन परिस्थतियों में एकात्मक रूप धारण कर लेता है ।”

4. राष्ट्रपति एक महीने के लिए तानाशाह बन सकता है (President can become despot for one month)—संकटकालीन स्थिति संसद् की स्वीकृति के बिना एक महीने तक लागू रह सकती है। उस समय राष्ट्रपति समस्त देश का शासन अपने हाथों में ले सकता है और अपनी स्थिति बहुत शक्तिशाली बना सकता है।

5. अनुच्छेद 356 का राजनीतिक उद्देश्य के लिए प्रयोग (Use of Article 356 for Political Purposes). केन्द्र में सत्तारूढ़ दल किसी ऐसे राज्य में भी जहां मन्त्रिमण्डल की स्थिति दृढ़ हो, संवैधानिक मशीनरी के फेल होने की घोषणा कर सकता है, केवल इसलिए कि वहां पर कोई अन्य पार्टी शासन चला रही है । अतः संघीय सरकार राष्ट्रपति के माध्यम से राज्य में विरोधी दलों द्वारा निर्मित सरकारों का दमन कर सकती है । व्यवहार में केन्द्र ने सत्तारूढ़ दल के अनुच्छेद 356 का कई बार दुरुपयोग किया है । 15 दिसम्बर, 1992 को केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा हिमाचल प्रदेश की सरकारें भंग करके राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया क्योंकि इन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें थीं । मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य की पूर्व भाजपा सरकार को भंग करने सम्बन्धी राष्ट्रपति की अधिसूचना अप्रैल 1993 को रद्द कर दी । उच्च न्यायालय ने निर्णय देते हुए कहा कि राष्ट्रपति की अधिसूचना संविधान के अनुच्छेद 356 के प्रावधानों की परिधि से बाहर है। सर्वोच्च न्यायालय ने अक्तूबर 1993 को एक फैसले में नागालैण्ड में (1987), कर्नाटक में (1989) को राष्ट्रपति शासन को लागू करने के फैसले को असंवैधानिक बताया ।।

राष्ट्रपति तानाशाह नहीं बन सकता (President cannot become dictator)-राष्ट्रपति को संकटकालीन शक्तियां काफ़ी सोच-विचार के बाद दी गई हैं और इनका प्रयोग करके उसके तानाशाह बनने की कोई सम्भावना नहीं है । राष्ट्रपति को ऐसा करने से रोकने के लिए मन्त्रिमण्डल है जो वास्तव में शक्तियों का प्रयोग करता है :-

  1. राष्ट्रपति संकटकाल की उद्घोषणा मन्त्रिमण्डल की सलाह से ही कर सकता है। 44वें संशोधन के अनुसार राष्ट्रपति संकटकाल की घोषणा तभी कर सकता है यदि ऐसा करने की मन्त्रिमण्डल लिखित सलाह दे।
  2. राष्ट्रपति को संकटकालीन घोषणा पर एक महीने के अन्दर संसद् की स्वीकृति प्राप्त करनी होती है । यदि संसद् स्वीकृति नहीं देती तो वह घोषणा लागू होनी बन्द हो जाती है । यदि लोकसभा भंग हो तो राज्यसभा की स्वीकृति आवश्यक है।
  3. संकट के समय भी राष्ट्रपति संसद् को भंग नहीं कर सकता। राष्ट्रपति लोकसभा को तो भंग कर सकता है, पर राज्यसभा को नहीं । लोकसभा को मन्त्रिमण्डल की सलाह से ही भंग किया जा सकता है।
  4. यदि राष्ट्रपति अपनी शक्तियों का उचित प्रयोग न करे या मनमानी करना चाहे तो संसद् उसके विरुद्ध महाभियोग लगाकर उसे पद से हटा सकती है।

संकटकालीन शक्तियों की औचित्यतता (Justification of Emergency Powers)-निःसन्देह संकटकालीन शक्तियां बहुत व्यापक हैं तथा इनके विरुद्ध दिए गए तर्क ठीक हैं, परन्तु इसके बावजूद भी हमें यह मानना पड़ता है कि इनका संविधान में देना औचित्यपूर्ण है। इनके निम्नलिखित कारण हैं-

  1. भारत ने सदा ही केन्द्रीय सरकार के निर्बल होने पर हानि उठाई है, इसलिए केन्द्रीय सरकार को शक्तिशाली बनाना देश की स्वतन्त्रता बनाए रखने के लिए अति आवश्यक है।
  2. भारत में संघीय सरकार ही देश की सुरक्षा के लिए उत्तरदायी है । संघीय रूप की इतनी महत्ता नहीं जितनी कि राष्ट्रीय सुरक्षा की।
  3. जब संकटकाल की घोषणा लागू होती है तब संविधान को 19वीं धारा द्वारा दी गई स्वतन्त्रताएं भंग की जा सकती हैं। श्री अलादी कृष्णास्वामी अय्यर तथा डॉ० अम्बेदकर ने इस व्यवस्था का बड़ी योग्यता से पक्ष पोषण किया है । श्री अल्लादी के अनुसार देश तथा राष्ट्र का व्यक्तिगत स्वतन्त्रता से पूर्व स्थान है। परन्तु 44वें संशोधन के अनुसार अनुच्छेद 19वें दिए गए अधिकार तभी स्थगित किए जा सकते हैं यदि संकटकाल की घोषणा युद्ध अथवा बाहरी हमले के कारण की हो न कि सशस्त्र विद्रोह पर।
  4. वित्तीय संकट सम्बन्धी उप-धाराओं का होना भी बहुत उचित है।

निष्कर्ष (Conclusion)-ऊपरलिखित तर्कों के आधार पर हम कह सकते हैं कि संविधान निर्माताओं ने संकटकालीन धाराओं का संविधान में वर्णन करके कोई गलती नहीं की। संकटकालीन धाराओं के उचित प्रयोग से नागरिकों की स्वतन्त्रता की रक्षा की जा सकती है। श्री अमर नन्दी (Amar Nandi) ने राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों की तुलना, “एक भरी हुई बन्दूक से की है जिससे नागरिकों की स्वतन्त्रता की रक्षा भी हो सकती है और नाश भी हो सकता है।”

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. राष्ट्रपति के चुनाव का ढंग बताएं। अभी तक राष्ट्रपति के कितने चुनाव हुए हैं ?
उत्तर-राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचन मण्डल द्वारा किया जाता है। निर्वाचन मण्डल में संसद् के दोनों सदनोंराज्यसभा तथा लोकसभा के निर्वाचित सदस्य तथा राज्य-विधान मण्डलों के चुने हुए सदस्य सम्मिलित होते हैं। निर्वाचन मण्डल में संसद् तथा राज्य विधानसभाओं में मनोनीत किए गए सदस्यों को सम्मिलित नहीं किया जाता। राष्ट्रपति का चुनाव एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के अनुसार होता है। राष्ट्रपति के चुनाव में एक सदस्य एक मत वाली विधि नहीं अपनाई गई। वैसे एक मतदाता को केवल एक ही मत मिलता है। परन्तु उसके मत की गणना नहीं होती बल्कि उसका मूल्यांकन होता है। वर्तमान समय तक भारत में राष्ट्रपति पद के लिए पन्द्रह बार चुनाव हो चुके हैं।

प्रश्न 2. ‘राष्ट्रपति राज्य का नाममात्र मुखिया है।’ व्याख्या करें।
उत्तर-समस्त शासन राष्ट्रपति के नाम पर चलता है, परन्तु वह नाममात्र का मुखिया है जबकि अमेरिका का राष्ट्रपति राज्य का वास्तविक मुखिया है। इसका कारण यह है कि अमेरिका में अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली है जबकि भारत में संसदीय शासन प्रणाली है। संसदीय शासन प्रणाली के कारण राष्ट्रपति संवैधानिक मुखिया है। राष्ट्रपति अपनी शक्तियों का प्रयोग मन्त्रिमण्डल की सलाह से करता है। व्यवहार में राष्ट्रपति की शक्तियों का प्रयोग मन्त्रिमण्डल द्वारा किया जाता है। वास्तविक कार्यपालिका मन्त्रिमण्डल है।

प्रश्न 3. राष्ट्रपति की चुनाव प्रणाली की चार आधारों पर आलोचना करें।
उत्तर-राष्ट्रपति की चुनाव प्रणाली की निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की गई है-

  1. अप्रजातन्त्रात्मक विधि-आलोचना का कहना है कि राष्ट्रपति की चुनाव विधि अप्रजातन्त्रात्मक है क्योंकि राष्ट्रपति का चुनाव प्रत्यक्ष जनता द्वारा नहीं होता, परन्तु हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि भारत जैसे विशाल देश के लिए राष्ट्रपति का प्रत्यक्ष चुनाव जनता द्वारा करना आसान नहीं है।
  2. जटिल विधि-राष्ट्रपति के चुनाव की विधि बड़ी जटिल है जिसे समझना आसान नहीं है।
  3. यह आनुपातिक प्रतिनिधित्व एकल संक्रमणीय प्रणाली नहीं है-आलोचकों का कहना है कि राष्ट्रपति की चुनाव विधि को आनुपातिक प्रतिनिधित्व तथा एकल संक्रमणीय प्रणाली का नाम देना उचित नहीं है क्योंकि आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के लिए चुनाव क्षेत्र बहु-सदस्यीय होना चाहिए, परन्तु राष्ट्रपति के चुनाव में सीट एक होती है। अतः आनुपातिक प्रणाली की एक अनिवार्य आवश्यकता राष्ट्रपति चुनाव प्रणाली पूर्ण नहीं करती।
  4. राष्ट्रपति की चुनाव प्रणाली में कई बातें अस्पष्ट हैं।

प्रश्न 4. राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने तथा उसे पद से हटाने के लिए संविधान में कौन-सी प्रक्रिया वर्णित है ?
उत्तर-राष्ट्रपति को पांच वर्ष के लिए चुना जाता है परन्तु यदि कोई राष्ट्रपति अपनी शक्तियों के प्रयोग में संविधान का उल्लंघन करे तो पांच वर्ष से पहले भी उसे अपने पद से महाभियोग द्वारा अपदस्थ किया जा सकता है। एक सदन राष्ट्रपति के विरुद्ध आरोप लगाता है। आरोपों के प्रस्ताव पर सदन में उसी समय विचार हो सकता है जब सदन के 1/4 सदस्यों के हस्ताक्षरों द्वारा इस आशय का नोटिस कम-से-कम 14 दिन पहले दिया जा चुका हो। यदि एक सदन में प्रस्ताव 2/3 बहुमत से पास हो जाए तो दूसरा सदन उन आरोपों की जांच-पड़ताल करता है। दूसरे सदन में आरोपों की जांच-पड़ताल के समय राष्ट्रपति स्वयं उपस्थित होकर या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा अपनी सफाई पेश कर सकता है। यदि दूसरा सदन 2/3 बहुमत से उन आरोपों की पुष्टि कर दे तो राष्ट्रपति को उसी दिन पद छोड़ना पड़ता है। जब तक दूसरा सदन राष्ट्रपति के हटाए जाने का प्रस्ताव पास नहीं करता, उस समय तक राष्ट्रपति अपने पद पर आसीन रहता है।

प्रश्न 5. राष्ट्रपति की चार कार्यपालिका शक्तियां लिखें।
उत्तर-राष्ट्रपति की मुख्य कार्यपालिका शक्तियां निम्नलिखित हैं-

  1. प्रशासकीय शक्तियां-भारत का समस्त प्रशासन राष्ट्रपति के नाम पर चलाया जाता है और भारत सरकार के सभी निर्णय औपचारिक रूप से उसी के नाम पर लिए जाते हैं। देश का सर्वोच्च शासक होने के नाते वह नियम तथा अधिनियम भी बनाता है।
  2. मन्त्रिपरिषद् से सम्बन्धित शक्तियां-राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की नियुक्ति करता है और उसके परामर्श से अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है। वह प्रधानमन्त्री की सलाह से मन्त्रियों को अपदस्थ कर सकता है।
  3. सैनिक शक्तियां-राष्ट्रपति राष्ट्र की सशस्त्र सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति है। वह स्थल, जल तथा वायु सेनाध्यक्षों की नियुक्ति करता है। वह फील्ड मार्शल की उपाधि भी प्रदान करता है। वह राष्ट्रीय रक्षा समिति का अध्यक्ष है।
  4. नियुक्तियां करने की शक्ति-सभी महत्त्वपूर्ण नियुक्तियां राष्ट्रपति द्वारा की जाती हैं।

प्रश्न 6. राष्ट्रपति की चार विधायिनी शक्तियां लिखें।
उत्तर-राष्ट्रपति की मुख्य विधायिनी शक्तियां निम्नलिखित हैं-

  1. राष्ट्रपति की संसद् के अधिवेशन बुलाने और सत्रावसान सम्बन्धी शक्तियां-राष्ट्रपति संसद् के दोनों सदनों का अधिवेशन बुला सकता है। अधिवेशन का समय बढ़ा सकता है तथा उसे स्थगित कर सकता है। राष्ट्रपति ही अधिवेशन का समय और स्थान निश्चित करता है।
  2. राष्ट्रपति द्वारा संसद् में भाषण-राष्ट्रपति संसद् के दोनों सदनों को अलग-अलग या दोनों के सम्मिलित अधिवेशन को सम्बोधित कर सकता है। नई संसद् का तथा वर्ष का पहला अधिवेशन राष्ट्रपति के भाषण से ही आरम्भ होता है।
  3. राज्यसभा के 12 सदस्य मनोनीत करना-राष्ट्रपति राज्यसभा के लिए ऐसे 12 सदस्यों को मनोनीत करता है जिन्हें साहित्य, कला, विज्ञान या सामाजिक सेवा के विषय में विशेष ज्ञान या अनुभव प्राप्त हो।
  4. लोकसभा को भंग करना-राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल की सिफ़ारिश पर लोकसभा को समय से पहले भी भंग कर सकता है

प्रश्न 7. राष्ट्रपति बनने के लिए क्या योग्यताएं होनी चाहिएं ?
उत्तर-राष्ट्रपति बनने के लिए निम्नलिखित योग्यताएं होनी चाहिएं-

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
  3. वह किसी सरकारी पद पर कार्यरत न हो।
  4. वह लोकसभा का सदस्य बनने की योग्यता रखता हो।
  5. अपने चुनाव के बाद राष्ट्रपति, संसद् या राज्य विधानमण्डल के किसी सदन का सदस्य नहीं रह सकता।
  6. 5 जून, 1997 को राष्ट्रपति ने एक अध्यादेश जारी करके राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के लिए ज़मानत की राशि 2500 रु० से बढ़ाकर 15000 रु० कर दी है। इस अध्यादेश के अनुसार राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार का नाम 50 मतदाताओं द्वारा प्रस्तावित तथा 50 मतदाताओं द्वारा अनुमोदित होना अनिवार्य है।

प्रश्न 8. राष्ट्रपति का वेतन तथा सुविधाएं बताएं।
उत्तर-राष्ट्रपति को 5,00,000 रुपए मासिक वेतन मिलता है। इसके अतिरिक्त उसको कई प्रकार के भत्ते तथा विशेष अधिकार भी प्राप्त हैं। उसे रहने के लिए सरकारी निवास मिलता है, जिसे राष्ट्रपति भवन कहा जाता है। अवकाश प्राप्त करने के बाद राष्ट्रपति को 2,50,000 रुपए मासिक पेंशन मिलती है। राष्ट्रपति के कार्यकाल में उसके विरुद्ध कोई फ़ौजदारी मुकद्दमा नहीं चलाया जा सकता। वह अपने किसी भी कार्य के लिए किसी भी न्यायालय के सम्मुख उत्तरदायी नहीं है।

प्रश्न 9. ‘निर्वाचक मण्डल’ का अर्थ समझाइए।
उत्तर-‘निर्वाचक मण्डल’ प्रतिनिधियों का एक ऐसा समूह होता है जिसका निर्माण किसी विशेष पद के चुनाव के लिए किया जाता है। अमेरिका और भारत में राष्ट्रपति का चुनाव निर्वाचक मण्डल के द्वारा किया जाता है। भारत में निर्वाचक मण्डल में संसद् के दोनों सदनों के चुने हुए सदस्य और प्रान्तीय विधानसभाओं के चुने हुए सदस्य सम्मिलित होते हैं। राष्ट्रपति के चुनाव के समय यदि निर्वाचक मण्डल में कुछ स्थान रिक्त हों तो उसका राष्ट्रपति के निर्वाचन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

प्रश्न 10. ‘अध्यादेश’ का अर्थ समझाइए।
उत्तर-जब संसद् का अधिवेशन न हो रहा हो और राष्ट्रपति यह अनुभव करता हो कि परिस्थितियां ऐसी हैं जिनके अनुसार कार्यवाही करनी आवश्यक है तो राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्राप्त है। इस अध्यादेश की शक्ति और प्रभाव वही होता है जो संसद् के द्वारा पास किए गए कानूनों का होता है और अधिवेशन आरम्भ होने की तिथि से लेकर 6 सप्ताह पश्चात् वह अध्यादेश जारी रह सकता है। 6 सप्ताह पश्चात् यह अध्यादेश समाप्त हो जाता है। इससे पहले भी संसद् अध्यादेश रद्द कर सकती है और राष्ट्रपति भी जब चाहे उसे वापस ले सकता है। राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने का पूरा अधिकार है और उसके इस निर्णय को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।

प्रश्न 11. किन परिस्थितियों में राष्ट्रपति अपनी इच्छा से प्रधानमन्त्री को नियुक्त कर सकता है ?
उत्तर-कुछ परिस्थितियों में राष्ट्रपति को अपनी इच्छा से प्रधानमन्त्री को नियुक्त करने का अवसर मिल जाता है। ये परिस्थितियां हैं(1) जब लोकसभा में किसी भी राजनीतिक पार्टी की स्पष्ट बहुसंख्या न हो।
अथवा (2) कुछ दल मिलकर संयुक्त सरकार (Coalition Ministry) का निर्माण न कर सकें।
अथवा
(3) लोकसभा में दोनों दलों को समान प्रतिनिधित्व प्राप्त हो। उपर्युक्त परिस्थितियों में राष्ट्रपति अपनी विवेक, बुद्धि तथा उच्च सूझ-बूझ से काम लेते हुए अपनी इच्छानुसार किसी भी दल के नेता को जिसे वह स्थायी सरकार बनाने के योग्य समझता हो, मन्त्रिमण्डल बनाने के लिए आमन्त्रित कर सकता है।

प्रश्न 12. ‘निषेधाधिकार’ का अर्थ समझाइए।
उत्तर-निषेधाधिकार का अर्थ अपनी असहमति प्रकट करना अथवा प्रस्ताव के विरोध में मतदान कर उस प्रस्ताव को अस्वीकार करना है। भारतीय संसद् द्वारा पास किया गया बिल राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर ही कानून का रूप ले सकता है। राष्ट्रपति संसद् द्वारा पास किए गए बिल पर निषेधाधिकार का प्रयोग कर सकता है परन्तु यदि उस बिल को संसद् दुबारा पास कर दें तब राष्ट्रपति को अपनी स्वीकृति देनी पड़ती है।

प्रश्न 13. किन परिस्थितियों में राष्ट्रपति मन्त्रिपरिषद् की सलाह मानने से इन्कार कर सकता है ?
उत्तर-44वें संशोधन के अनुसार राष्ट्रपति को मन्त्रिपरिषद् द्वारा जो सलाह दी जाती है, राष्ट्रपति मन्त्रिपरिषद् को उस पर पुनः विचार करने के लिए कह सकता है परन्तु पुनर्विचार करने के बाद मन्त्रिमण्डल जो सलाह राष्ट्रपति को देता है वह सलाह उसे माननी पड़ेगी। राष्ट्रपति को मन्त्रिपरिषद् की सलाह, चेतावनी तथा उत्साह देने का अधिकार प्राप्त है। पद ग्रहण करते समय राष्ट्रपति को शपथ लेनी पड़ती है कि वह संविधान की रक्षा करेगा। इसलिए वह मन्त्रिपरिषद् की ऐसी कोई बात मानने के लिए बाध्य नहीं जो संविधान की रक्षा में रुकावट डालती हो। इसी प्रकार लोकसभा को भंग करने, ऐसे प्रधानमन्त्री तथा मन्त्रिमण्डल को पदच्युत करने में जो बहुमत का समर्थन खो बैठा हो, राष्ट्रपति अपने विवेक से काम ले सकता है।

प्रश्न 14. राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर-राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियां तीन प्रकार की हैं-

(क) राष्ट्रपति युद्ध, बाहरी आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह की दशा में मन्त्रिमण्डल की लिखित सलाह पर संकटकाल की घोषणा कर सकता है।
(ख) जब राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा दी गई सूचना से या किसी और सूत्र से यह विश्वास हो जाए कि राज्य का शासन संविधान के अनुसार नहीं चलाया जा सकता तो वह अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत संकटकाल की उद्घोषणा कर सकता है। राष्ट्रपति राज्य के मन्त्रिमण्डल तथा विधान सभा को भंग करके राज्य का प्रशासन अपने हाथों में ले सकता है।
(ग) यदि राष्ट्रपति को विश्वास हो जाए कि देश की आर्थिक स्थिति डांवाडोल है या भारत की साख खतरे में है तो वह वित्तीय संकटकाल की उद्घोषणा जारी कर सकता है। ऐसे समय में राष्ट्रपति सभी कर्मचारियों के वेतन और भत्तों में कमी कर सकता है। वह राज्यों को धन सम्बन्धी कोई भी आदेश दे सकता है।

प्रश्न 15. राष्ट्रपति राष्ट्रीय संकटकाल की घोषणा कब कर सकता है ? इसके प्रभाव का वर्णन करें।
उत्तर-निम्नलिखित परिस्थितियों में राष्ट्रपति राष्ट्रीय संकट की घोषणा कर सकता है-

  1. युद्ध, विदेशी आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह से उत्पन्न संकट।
  2. देश में आर्थिक अथवा वित्तीय संकट के कारण उत्पन्न परिस्थिति।

घोषणा के प्रभाव-राष्ट्रीय संकटकालीन घोषणा के समय शासन का संघीय रूप एकात्मक हो जाता है। समस्त देश का शासन सरकार के हाथ में आ जाता है।

  1. केन्द्रीय सरकार, राज्यों की सरकारों को निर्देश दे सकती है कि वे अपनी कार्यपालिका शक्तियों का प्रयोग किस प्रकार करें। राज्यों के राज्यपाल राष्ट्रपति के आदेशानुसार कार्यकारी शक्ति का प्रयोग करते हैं।
  2. संसद् को राज्य-सूची में दिए गए विषयों पर कानून बनाने का अधिकार मिल जाता है।
  3. राष्ट्रपति को संघीय सरकार तथा राज्यों में धन विभाजन सम्बन्धी योजना में अपनी इच्छानुसार परिवर्तन करने का अधिकार मिल जाता है।

प्रश्न 16. राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों के गलत प्रयोग को रोकने के लिए क्या व्यवस्था की गई
उत्तर-राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों के गलत प्रयोग को रोकने के लिए जनता पार्टी की सरकार ने 1979 में 44वां संवैधानिक संशोधन किया। इस संशोधन के अन्तर्गत निम्नलिखित प्रावधान किए गए-

  1. राष्ट्रपति संकटकाल की घोषणा मन्त्रिमण्डल की लिखित सलाह पर ही कर सकता है।
  2. राष्ट्रपति द्वारा लागू संकटकाल की घोषणा को लागू होने के एक महीने के भीतर संसद् के 2/3 बहुमत द्वारा स्वीकृति मिलनी आवश्यक है। यदि संकटकाल की घोषणा 6 महीने से ज्यादा लागू रखनी है तो उसे 6 महीने बाद पुनः संसद् की स्वीकृति लेनी आवश्यक है।
  3. संसद् कभी भी साधारण बहुमत द्वारा प्रस्ताव पास करके संकटकाल को खत्म कर सकती है।
  4. संविधान की धारा 21 में शामिल जीवन व व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अधिकारों को संकटकाल में स्थगित किया जा सकता है।
  5. संकटकाल की घोषणा न्याय संगत होगी।

प्रश्न 17. क्या राष्ट्रपति तानाशाह बन सकता है ?
उत्तर-राष्ट्रपति तानाशाह नहीं बन सकता और अगर संकटकाल में भी तानाशाह बनना चाहे तो भी नहीं बन सकता। इसका महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि भारत में संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया गया है और इसमें राष्ट्रपति नाममात्र का मुखिया होता है। राष्ट्रपति की शक्तियों का वास्तव में प्रयोग प्रधानमन्त्री और मन्त्रिमण्डल द्वारा किया जाता है। राष्ट्रपति यदि मनमानी करने की कोशिश करे तो उसे संसद् महाभियोग द्वारा हटा सकती है। राष्ट्रपति संकटकाल की घोषणा मन्त्रिपरिषद् की लिखित सलाह से ही कर सकता है। संसद् साधारण बहुमत से प्रस्ताव पास करके राष्ट्रपति को संकटकाल समाप्त करने को कह सकती है।

प्रश्न 18. उप-राष्ट्रपति के लिए क्या योग्यताएं होनी चाहिएं ?
उत्तर-

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. उसकी आयु 35 वर्ष से कम न हो।
  3. वह राज्यसभा का सदस्य होने की योग्यता रखता हो।
  4. वह किसी सरकारी पद पर आसीन न हो।
  5. वह संसद् का सदस्य न हो।
  6. वह विधानमण्डल का सदस्य न हो।

प्रश्न 19. भारत के उप-राष्ट्रपति के कार्य बताएं।
उत्तर-उप-राष्ट्रपति को दो प्रकार के कार्य करने पड़ते हैं-

(1) उप-राष्ट्रपति के रूप में तथा
(2) राज्यसभा के अध्यक्ष के रूप में।

  1. उप-राष्ट्रपति के रूप में जब राष्ट्रपति का पद उसकी अनुपस्थिति, बीमारी तथा अन्य किसी कारण से अस्थायी रूप से खाली हो जाए, तो उप-राष्ट्रपति को राष्ट्रपति पद पर काम करना पड़ता है। राष्ट्रपति पद पर काम करते समय उप-राष्ट्रपति को राष्ट्रपति जैसा वेतन, भत्ता, सुविधाएं तथा शक्तियां प्राप्त होती हैं।
  2. राज्यसभा के अध्यक्ष के रूप में उप-राष्ट्रपति राज्यसभा का सभापति होता है तथा वह अध्यक्ष के सभी कार्य करता है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. राष्ट्रपति का चुनाव कैसे होता है ?
उत्तर-राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचन मण्डल द्वारा किया जाता है। निर्वाचन मण्डल में संसद् के दोनों सदनों का चुनाव एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के अनुसार होता है। वैसे एक मतदाता को केवल एक ही मत मिलता है। परन्तु उसके मत की गणना नहीं होती बल्कि उसका मूल्यांकन होता है।

प्रश्न 2. राष्ट्रपति की कोई दो कार्यपालिका शक्तियां लिखें।
उत्तर-

  1. प्रशासकीय शक्तियां-भारत का समस्त प्रशासन राष्ट्रपति के नाम पर चलाया जाता है और भारत सरकार के सभी निर्णय औपचारिक रूप से उसी के नाम पर लिए जाते हैं। देश का सर्वोच्च शासक होने के नाते वह नियम तथा अधिनियम भी बनाता है।
  2. मन्त्रिपरिषद् से सम्बन्धित शक्तियां-राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की नियुक्ति करता है और उसके परामर्श से अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है। वह प्रधानमन्त्री की सलाह से मन्त्रियों को अपदस्थ कर सकता है।

प्रश्न 3. राष्ट्रपति की कोई दो विधायिनी शक्तियां लिखें।
उत्तर-

  1. राष्ट्रपति की संसद् के अधिवेशन बुलाने और सत्रावसान सम्बन्धी शक्तियां-राष्ट्रपति संसद् के दोनों सदनों का अधिवेशन बुला सकता है। अधिवेशन का समय बढ़ा सकता है तथा उसे स्थगित कर सकता है। राष्ट्रपति ही अधिवेशन का समय और स्थान निश्चित करता है।
  2. राष्ट्रपति द्वारा संसद में भाषण-राष्ट्रपति संसद् के दोनों सदनों को अलग-अलग या दोनों के सम्मिलित अधिवेशन को सम्बोधित कर सकता है। नई संसद् का तथा वर्ष का पहला अधिवेशन राष्ट्रपति के भाषण से ही आरम्भ होता है।

प्रश्न 4. राष्ट्रपति बनने के लिए क्या योग्यताएं होनी चाहिएं ?
उत्तर-

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।

प्रश्न 5. क्या राष्ट्रपति तानाशाह बन सकता है ?
उत्तर-राष्ट्रपति तानाशाह नहीं बन सकता और अगर संकटकाल में भी तानाशाह बनना चाहे तो भी नहीं बन सकता। इसका महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि भारत में संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया गया है और इसमें राष्ट्रपति नाममात्र का मुखिया होता है। राष्ट्रपति की शक्तियों का वास्तव में प्रयोग प्रधानमन्त्री और मन्त्रिमण्डल द्वारा किया जाता है। राष्ट्रपति यदि मनमानी करने की कोशिश करे तो उसे संसद् महाभियोग द्वारा हटा सकती है।

प्रश्न 6. भारत के वर्तमान राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति एवं प्रधानमन्त्री के नाम बताएं।
उत्तर-
पद का नाम — व्यक्ति का नाम
1. राष्ट्रपति – श्री रामनाथ कोविंद
2. उप-राष्ट्रपति – श्री वेंकैया नायडू
3. प्रधानमन्त्री – श्री नरेन्द्र मोदी

प्रश्न 7. राष्ट्रपति एवं उप-राष्ट्रपति का वेतन बताएं।
उत्तर-भारत के राष्ट्रपति का मासिक वेतन पांच लाख रुपये, जबकि उप-राष्ट्रपति का मासिक वेतन चार लाख रुपये है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1. राष्ट्रपति का कार्यकाल कितना है ? उसे क्या दोबारा चुना जा सकता है ?
उत्तर-राष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष का है और उसे दोबारा चुने जाने का अधिकार है।

प्रश्न 2. राष्ट्रपति का मासिक वेतन और रिटायर होने पर कितनी पेंशन मिलती है ?
उत्तर-राष्ट्रपति को 5,00,000 रु० मासिक वेतन और रिटायर होने पर 2,50,000 रु० मासिक पेंशन मिलती है।

प्रश्न 3. राष्ट्रपति कब अध्यादेश जारी कर सकता है ?
उत्तर-जब संसद् का अधिवेशन न हो रहा हो और संकटकालीन परिस्थितियां बाध्य करती हों, तो राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने का अधिकार है।

प्रश्न 4. राष्ट्रपति राज्यसभा और लोकसभा के कितने सदस्य मनोनीत कर सकता है?
उत्तर-राष्ट्रपति राज्यसभा के 12 सदस्य और लोकसभा के 2 एंग्लो इंडियन सदस्य नियुक्त कर सकता है।

प्रश्न 5. भारत के प्रथम राष्ट्रपति कौन थे ?
उत्तर-भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ० राजेन्द्र प्रसाद थे।

प्रश्न 6. राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने हेतु कम-से-कम कितनी आयु होनी चाहिए?
उत्तर-राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने हेतु कम-से-कम 35 वर्ष आयु होनी चाहिए।

प्रश्न 7. भारत के राष्ट्रपति को कौन निर्वाचित करता है?
उत्तर-भारत के राष्ट्रपति को निर्वाचक मण्डल निर्वाचित करता है।

प्रश्न 8. राष्ट्रपति को किस प्रकार हटाया जा सकता है?
उत्तर-राष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है।

प्रश्न 9. राष्ट्रपति राष्ट्रीय संकट की घोषणा कब कर सकता है?
उत्तर-राष्ट्रपति राष्ट्रीय संकट की घोषणा तब करता है, जब मन्त्रिमण्डल संकटकालीन घोषणा करने की लिखित सलाह दे।

प्रश्न 10. जुलाई, 2017 में किसे भारत का राष्ट्रपति चुना गया ?
उत्तर-जुलाई, 2017 में श्री रामनाथ कोंविद को भारत का राष्ट्रपति चुना गया।

प्रश्न 11. भारत की सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति कौन होता है?
उत्तर-भारत की सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति राष्ट्रपति होता है।

प्रश्न 12. राष्ट्रपति किसे अपना त्याग-पत्र सौंपता है?
उत्तर-राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति को अपना त्याग-पत्र सौंपता है।

प्रश्न 13. राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उप-राष्ट्रपति कब तक राष्ट्रपति के पद पर रह सकता है?
उत्तर-छ: महीने तक।

प्रश्न 14. किस राष्ट्रपति का चुनाव सर्वसम्मति से हुआ?
उत्तर-नीलम संजीवा रेड्डी का चुनाव सर्वसम्मति से हुआ।

प्रश्न 15. राष्ट्रपति के पद का वर्णन संविधान के किस अनुच्छेद में किया गया है?
उत्तर-अनुच्छेद 52 में।

प्रश्न 16. अगस्त, 2017 में किसे भारत का उप-राष्ट्रपति चुना गया ?
उत्तर-अगस्त, 2017 में श्री वेंकैया नायडू को भारत का उप-राष्ट्रपति चुना गया।

प्रश्न 17. उप-राष्ट्रपति का मासिक वेतन कितना है ?
उत्तर-उप-राष्ट्रपति का मासिक वेतन चार लाख रु० है।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. उपराष्ट्रपति ………….. की अध्यक्षता करता है।
2. राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार को ………….. की राशि जमानत के रूप में जमा करवानी होती है।
3. राष्ट्रपति अनुच्छेद ……………. के अनुसार राष्ट्रीय आपात्काल की घोषणा कर सकता है।
4. राष्ट्रपति अनुच्छेद ……………….. के अनुसार किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर सकता है।
उत्तर-

  1. राज्यसभा
  2. 15000
  3. 352
  4. 356.

प्रश्न III. निम्नलिखित कथनों में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. पं० जवाहर लाल नेहरू भारत के पहले राष्ट्रपति थे।
2. भारत के तीसरे राष्ट्रपति डॉ. ज़ाकिर हुसैन थे।
3. राष्ट्रपति को शपथ प्रधानमन्त्री दिलाता है।
4. संसद द्वारा पास किए विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजे जाते हैं।
उत्तर-

  1. ग़लत
  2. सही
  3. ग़लत
  4. सही ।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न 1. भारत के राष्ट्रपति की वैसी ही स्थिति है जैसे कि-
(क) अमेरिका के राष्ट्रपति
(ख) चीन के प्रधानमंत्री
(ग) पाकिस्तान के राष्ट्रपति
(घ) इंग्लैंड की रानी।
उत्तर-(घ) इंग्लैंड की रानी।

प्रश्न 2. भारतीय राष्ट्रपति की अवधि कितनी है ?
(क) 4 वर्ष
(ख) 5 वर्ष
(ग) 6 वर्ष
(घ) 10 वर्ष।
उत्तर-(ख) 5 वर्ष

प्रश्न 3. भारत के वर्तमान राष्ट्रपति कौन है ?
(क) पं. जवाहर लाल नेहरू
(ख) पं० शंकर दयाल शर्मा
(ग) डॉ० राधाकृष्णन
(घ) श्री रामनाथ कोंविद।
उत्तर-(घ) श्री रामनाथ कोंविद।

प्रश्न 4. भारत के राष्ट्रपति को कौन निर्वाचित करता है ?
( क) जनता
(ख) प्रधानमन्त्री
(ग) संसद्
(घ) निर्वाचक मंडल।
उत्तर-(घ) निर्वाचक मंडल।

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संघीय कार्यपालिका–प्रधानमन्त्री तथा
मन्त्रिपरिषद्
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प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तरप्रश्न 1. प्रधानमंत्री की नियुक्ति कौन करता है ? उत्तर-प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।

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