Class 11 Sociology Notes Chapter 4 सामाजिक समूह

→ मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अकेला नहीं रह सकता। उसे अपनी आवश्यकताएं पूर्ण करने के लिए अन्य लोगों पर निर्भर रहना पड़ता है। इस प्रकार उसकी लगभग सभी क्रियाओं का केन्द्र समूह होता है।

→ एक सामाजिक समूह उन दो अथवा अधिक व्यक्तियों का एकत्र होता है जिनमें अन्तक्रिया लगातार होती रहनी चाहिए। यह अन्तक्रिया व्यक्ति को समूह के साथ संबंधित होने के लिए प्रेरित करती है।

→ एक सामाजिक समूह की बहुत-सी विशेषताएं होती हैं जैसे कि यह व्यक्तियों का एकत्र होता है, समूह में सदस्यों के बीच अन्तक्रियाएं होती रहती हैं, सदस्य अपनी सदस्यता के प्रति चेतन होते हैं, उनमें हम की भावना होती है, समूह के कुछेक नियम होते हैं इत्यादि।

→ वैसे तो समाज में बहुत से समूह होते हैं तथा कई समाजशास्त्रियों ने इनका वर्गीकरण अलग-अलग आधारों पर दिया है परन्तु जो कूले (Cooley) की तरफ से दिया गया वर्गीकरण प्रत्येक विद्धान् ने किसी न किसी रूप में स्वीकार किया है। कूले के अनुसार शारीरिक नज़दीकी तथा दूरी के अनुसार दो प्रकार के समूह होते हैं-प्राथमिक समूह तथा द्वितीय समूह।

→ प्राथमिक समूह वह होते हैं जिनके साथ शारीरिक रूप से नज़दीकी होती है। हम इस समूह के सदस्यों को रोज़ाना मिलते हैं, उनके साथ बातें करते हैं तथा उनके साथ रहना पसंद करते हैं। उदाहरण के लिए परिवार, पड़ोस, खेल समूह।

→ द्वितीय समूह प्राथमिक समूह से बिल्कुल ही विपरीत होते हैं। वह समूह जिनकी सदस्यता वह अपनी इच्छा या आवश्यकता के अनुसार लेता है द्वितीय समूह होते हैं। व्यक्ति इनकी सदस्यता कभी भी छोड़ सकता है तथा कभी भी ग्रहण कर सकता है। उदाहरण के लिए राजनीतिक दल, ट्रेड युनियन इत्यादि।

→ प्राथमिक समूहों का हमारे जीवन में काफ़ी महत्त्व है क्योंकि इनके बिना व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता है। यह समूह व्यक्ति का समाजीकरण करने में सहायता करते हैं। यह समूह व्यक्ति के व्यवहार के ऊपर नियन्त्रण भी रखते हैं।

→ द्वितीय समूह की कई विशेषताएं होती हैं जैसे कि शारीरिक नज़दीकी का न होना, यह अस्थायी होते हैं, इसमें औपचारिक संबंध होते हैं तथा इनकी सदस्यता ऐच्छिक होती है।

→ समनर (Summer) ने भी समूहों का वर्गीकरण दिया है तथा वह हैं-अन्तर्समूह (In-Group) तथा बहिर्समूह (Out-Group) । अन्तर्समूह वह होता है जिनकी सदस्यता के प्रति व्यक्ति पूर्णतया चेतन होता है। बहिर्समूह वह होता है जिनमें व्यक्ति को अपनेपन की भावना नहीं मिलती है।

→ राबर्ट मर्टन ने एक नए प्रकार के समूह के बारे में बताया है तथा वह है संदर्भ समूह (Reference Group)। व्यक्ति कई बार किसी विशेष समूह के अनुसार अपने व्यवहार को नियन्त्रित तथा केन्द्रित करता है। इस प्रकार के समूह को संदर्भ समूह कहा जाता है।

→ हम भावना (We feeling)—वह भावना जिससे व्यक्ति अपने समूहों के साथ स्वयं को पहचानते हैं कि वे उस समूह के सदस्य हैं।

→ प्राथमिक समूह (Primary Group)-वह समूह जिनके सदस्यों में संबंध काफ़ी नज़दीक के होते हैं तथा जिनके बिना जीवन जीना मुमकिन नहीं है।

→ द्वितीय समूह (Secondary Group)-वे समूह जिनकी सदस्यता आवश्यकता के समय ली जाती है तथा बाद में छोड़ दी जाती है।

→ अन्तः समूह (In-Group)-वह समूह जिनके प्रति व्यक्ति के अन्दर अपनेपन की भावना होती है।

→ बहिर्समूह (Out-Group)—वह समूह जिनके प्रति व्यक्ति के अन्दर अपनेपन की किसी भी प्रकार की भावना नहीं होती।

→ संदर्भ समूह (Reference Group)—वह समूह जिन्हें व्यक्ति एक आदर्श के रूप में स्वीकार करता है।

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