Class 11 Sociology Solutions Chapter 12 पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (Textual Questions)

I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1-15 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. एक अकादमिक अनुशासन के रूप में समाज का औपचारिक अध्ययन किस देश में तथा किस शताब्दी में प्रारम्भ हुआ ?
उत्तर-एक विषय के रूप में समाज का औपचारिक अध्ययन फ्राँस (यूरोप) में 19वीं शताब्दी में शुरू हुआ।

प्रश्न 2. उन तीन कारकों के नाम बताइये जो एक स्वतन्त्र अनुशासन के रूप में समाजशास्त्र के विकास के लिए उत्तरदायी है।
उत्तर-औद्योगिक क्रान्ति, फ्रांसीसी क्रान्ति तथा नवजागरण के विचारों के फैलाव से समाजशास्त्र का विकास एवं स्वतन्त्र विषय के रूप में हुआ।

प्रश्न 3. नवजागरण से सम्बद्ध दो विचारकों के नाम बताइए।
उत्तर-चार्ल्स मान्टेस्कयू (Charles Montesquieu) तथा जीन जैक्स रूसो (Jean Jacques Rousseau)।

प्रश्न 4. फ्रांसीसी क्रान्ति किस वर्ष अस्तित्व में आयी ?
उत्तर-फ्रॉसीसी क्रान्ति सन् 1789 में हुई थी।

प्रश्न 5. प्रत्यक्षवाद शब्द से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर- यह माना जाता है कि समाज कुछ स्थिर नियमों के अनुसार कार्य करता है, जिन्हें ढूंढा जा सकता है। इसे ही सकारात्मकवाद कहते हैं।

प्रश्न 6. किसने समाजशास्त्र की दो शाखाओं सामाजिक स्थितिकी तथा सामाजिक गतिकी की चर्चा की ?
उत्तर-अगस्ते काम्ते ने यह नाम दिया।

प्रश्न 7. अगस्ते कोंत के तीन चरणों के नियम को चार्ट द्वारा प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर-
im

प्रश्न 8. कार्ल मार्क्स का वर्ग का सिद्धांत किस निर्धारणवाद पर आधारित है ?
उत्तर-कार्ल मार्क्स का वर्ग का सिद्धांत उत्पादन के साधनों की मल्कियत पर आधारित है कि एक समूह के पास उत्पादन के साधन होते हैं तथा एक के पास नहीं होते हैं।

प्रश्न 9. ‘कम्युनिस्ट मैनिफैस्टो’ पुस्तक किसने लिखी है ?
उत्तर-पुस्तक ‘कम्युनिस्ट मैनिफैस्टो’ कार्ल मार्क्स ने लिखी है।

प्रश्न 10. कार्ल मार्क्स द्वारा प्रस्तुत सामाजिक परिवर्तन के चरण कौन-से हैं ?
उत्तर-मार्क्स के अनुसार सामाजिक परिर्वतन के चार मुख्य स्तर हैं–आदिम समुदाय समाज, दासमूलक समाज, सामन्ती समाज तथा पूँजीवादी समाज।

प्रश्न 11. किसने समाज में उपस्थित एकता की प्रकृति के आधार पर समाज को वर्गीकृत है ?
उत्तर-एमिल दुर्शीम ने समाज में मौजूद एकता की प्रकृति के आधार पर समाज को बाँटा है।

प्रश्न 12. एमिल दुर्थीम द्वारा प्रस्तुत एकता के दो प्रकार बताइये।
उत्तर- यान्त्रिक एकता (Mechnical Solidarity) तथा सावयवी एकता (Organic Solidarity)।

प्रश्न 13. मैक्स वैबर द्वारा प्रस्तुत सामाजिक क्रिया के प्रकारों की सूची बताइये।
उत्तर-मैक्स वैबर ने चार प्रकार की सामाजिक क्रिया के बारे में बताया है- Zweekrational, Wertnational, Affeective क्रिया तथा Traditional क्रिया।

प्रश्न 14. मैक्स वैबर द्वारा प्रस्तुत सत्ता के प्रकार बताइये।
उत्तर-मैक्स वैबर ने सत्ता के तीन प्रकार दिए हैं-परंपरागत सत्ता, वैधानिक सत्ता तथा करिश्मई सत्ता।

II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30-35 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. नवजागरण किसे कहते हैं ?
उत्तर-नवजागरण वह समय था जब काफ़ी अधिक बौद्धिक विकास हुआ तथा दार्शनिक विचारों में बहुत परिवर्तन आए। यह समय 17वीं-18वीं शताब्दी के बीच था। इस समय के मशहूर विचारक मान्टेस्क्यू तथा रूसो थे। यह विचारक विज्ञान की सर्वोच्चता तथा विश्वास के ऊपर तर्क को ऊँचा मानते थे। इन विचारों के कारण ही सामाजिक प्रकटन में वैज्ञानिक विधि के प्रयोग पर बल दिया।

प्रश्न 2. धर्मशास्त्रीय तथा तत्वशास्त्रीय चरणों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-कोंत के अनुसार आध्यात्मिक पड़ाव में मनुष्य के विचार काल्पनिक थे। वह सभी चीज़ों को परमात्मा के रूप में समझता था। धारणा यह थी कि चाहे सभी चीज़े निर्जीव हैं परन्तु उनमें सर्वशक्ति व्यापक है। अधिभौतिक पड़ाव 14वीं से 16वीं शताब्दी तक चला। इस समय बेरोक निरीक्षण का अधिकार सामने आया जिसकी कोई सीमा नहीं थी। इस कारण आत्मिकता का पतन हुआ जिसका सांसारिक पक्ष पर भी प्रभाव पड़ा।

प्रश्न 3. जीववाद (Animism) से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर- जीववाद एक विचारधारा है जिनमें लोग विश्वास करते हैं कि परमात्मा केवल चलने वाली या जीने वाली वस्तुओं में मौजूद है। शब्द Anima का अर्थ है आत्मा (Soul) या चाल (Movement)। लोगों ने जानवरों, पंक्षियों, पृथ्वी तथा हवा की भी पूजा करनी शुरू कर दी।

प्रश्न 4. कार्ल मार्क्स की वर्ग की परिभाषा दीजिए।
उत्तर-मार्क्स के अनुसार, “वर्ग लोगों के ऐसे बड़े-बड़े समूहों को कहते हैं जो सामाजिक उत्पादन की इतिहास की तरफ से निर्धारित किसी पद्धति में, अपने-अपने स्थान की दृष्टि से, उत्पादन के साधनों के साथ अपने संबंध की दृष्टि से, परिश्रम के सामाजिक संगठन में अपनी भूमिका की दृष्टि से तथा परिणामस्वरूप सामाजिक सम्पत्ति के जितने हिस्से के वह मालिक होते हैं, उसके परिणाम तथा उसे प्राप्त करने के तौर-तरीके की दृष्टि से एक-दूसरे से अलग होते हैं।

प्रश्न 5. वर्ग चेतना से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-प्रत्येक वर्ग अपने सदस्यों, उनकी सामाजिक स्थिति, रुतबें इत्यादि के बारे में चेतन होता है। इस प्रकार की चेतना को ही वर्ग चेतना कहा जाता है। सभी वर्गों के लोग अपने समूह के प्रति चेतन होते हैं जिस कारण वह साधारण तथा अपने वर्ग के सदस्यों के साथ ही संबंध रखना पसंद करते हैं।

प्रश्न 6. ऐतिहासिक भौतिकवाद को परिभाषित कीजिए।
उत्तर-ऐतिहासिक भौतिकवाद वह दार्शनिक विद्या है जो एक अखण्ड व्यवस्था के रूप में समाज का तथा उस व्यवस्था के कार्य तथा विकास को शामिल करने वाले मुख्य नियमों का अध्ययन करती है। संक्षेप में ऐतिहासिक भौतिकवाद सामाजिक विकास का दार्शनिक सिद्धांत है। इस प्रकार यह मार्क्स का सामाजिक तथा ऐसिहासिक सिद्धांत है।

प्रश्न 7. सामाजिक तथ्य पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-दुर्थीम ने सामाजिक तथ्य का सिद्धांत दिया था तथा अपनी पुस्तक के प्रथम अध्याय के अंत में इसकी परिभाषा दी। दुर्थीम के अनुसार, “एक सामाजिक तथ्य क्रिया करने का प्रत्येक स्थायी, अस्थायी तरीका है जो व्यक्ति के ऊपर बाहरी दबाव डालने में समर्थ होता है अथवा दोबारा क्रिया करने का प्रत्येक तरीका है जो किसी समाज में आम रूप से पाया जाता है परन्तु साथ ही व्यक्तिगत विचारों से स्वतन्त्र अस्तित्व रखता है।

प्रश्न 8. सावयवी एकता (Organic Solidarity) पर चर्चा कीजिए।
उत्तर-सावयवी एकता आधुनिक समाजों में पाई जाती है तथा यह स्तर सदस्यों के बीच मौजूद अंतरों पर आधारित है। यह अधिक जनसंख्या वाले समाजों में पाई जाती है जहाँ पर लोगों के बीच अव्यक्तिगत सामाजिक संबंध पाए जाते हैं। इन समाजों में प्रतिकारी कानून पाए जाते हैं।

प्रश्न 9. ज्वैकरेशनल क्रिया से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर- Zweckrational क्रिया का अर्थ ऐसे सामाजिक व्यवहार से होता है जो उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए कई उद्देश्यों की अधिक-से-अधिक प्राप्ति के लिए तार्किक रूप से निर्देशित हो। इसमें साधनों के चुनाव केवल उनकी विशेष कार्यकुशलता की तरफ ही ध्यान नहीं दिया जाता बल्कि मूल्य में की तरफ भी ध्यान जाता है।

प्रश्न 10. भावनात्मक क्रिया किसे कहते हैं ?
उत्तर-यह वह क्रियाएं हैं जो मानवीय भावनाओं, संवेगों तथा स्थायी अर्थों के कारण होती हैं। समाज में रहते हुए, प्रेम, नफरत, गुस्सा इत्यादि जैसी भावनाओं का सामना करना पड़ता है। इस कारण ही समाज में शान्ति या अशान्ति की अवस्था उत्पन्न हो जाती है। इन व्यवहारों के कारण परंपरा तथा तर्क का थोड़ा सा भी सहारा नहीं लिया जाता।

प्रश्न 11. सत्ता को परिभाषित कीजिए।
उत्तर-वैबर के अनुसार प्रत्येक संगठित समूह में सत्ता में तत्त्व मूल रूप में मौजूद होते हैं। संगठित समूह में कुछ तो साधारण सदस्य होते हैं तथा कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनके पास ज़िम्मेदारी होती है तथा वह अन्य लोगों से वैधानिक तौर पर आदेश देकर अपनी बात मनवाते हैं। इस बात मनवाने की व्यवस्था को ही सत्ता कहते हैं।

III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 75-85 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. अगस्त कोंत द्वारा प्रतिपादित तीन चरणों के नियम की विवेचना कीजिए।
उत्तर-अगस्त कोंत ने समाज के उद्विकास का सिद्धांत दिया तथा कहा कि समाज के विकास के तीन पड़ाव हैं-आध्यात्मिक पड़ाव, अधिभौतिक पड़ाव तथा सकारात्मक पड़ाव। आध्यात्मिक पड़ाव में मनुष्य के सभी विचार काल्पनिक थे तथा वह सभी वस्तुओं को किसी आलौकिक जीव की क्रियाओं के परिणाम के रूप में मानता था। धारणा यह थी कि चाहे सभी वस्तुएं निर्जीव हैं परन्तु उनमें वह शक्ति व्यापक है। दूसरा पड़ाव अधिभौतिकं पडाव था जो 14वीं शताब्दी से 19वीं शताब्दी तक चला। इस पड़ाव में क्रान्तिक आंदोलन शुरू हुआ तथा प्रोटैस्टैंटवाद सामने आया। 16वीं शताब्दी में नकारात्मक सिद्धांत सामने आया जिसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक परिवर्तन था। इसमें बेरोक निरीक्षण का अधिकार था तथा निरीक्षण की कोई सीमा नहीं थी। सकारात्मक पड़ाव में औद्योगिक समाज शुरू हुआ तथा विज्ञान सामने आया। इसमें सामाजिक व्यवस्था तथा प्रगति में कोई द्वन्द नहीं होता है।

प्रश्न 2. यान्त्रिक एकता की विशेषताओं की चर्चा कीजिए।
उत्तर-

  • यान्त्रिक एकता वाले समाज के सदस्यों के व्यवहारों में समरूपता मिलती है तथा उनके व्यवहार एक जैसे होते हैं।
  • समान विश्वास तथा भावनाएं यान्त्रिक एकता के प्रतीक हैं। इस समाज के सदस्यों में सामूहिक चेतना मौजूद होती है।
  • यान्त्रिक समाजों में दमनकारी कानून मिलते हैं जहाँ पर अपराधी को पूर्ण दण्ड देने की व्यवस्था होती है।
  • नैतिकता यान्त्रिक समाजों का मूल आधार होती है जिस कारण समाज में एकता बनी रहती है।
  • धर्म यान्त्रिक समाज में एकता का महत्त्वपूर्ण आधार है तथा धर्म के अनुसार ही आचरण तथा व्यवहार किया जाता है।

प्रश्न 3. सावयवी एकता की विशेषताओं की चर्चा कीजिए।
उत्तर-

  • आंगिक अथवा सावयवी एकता वाले समाजों में विभेदीकरण तथा विशेषीकरण पाया जाता है। समाज में बहत से वर्ग मिलते हैं।
  • इन समाजों में श्रम विभाजन का बोलबाला होता है तथा लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक दूसरे पर निर्भर होते हैं।
  • इन समाजों में बहुत से संगठन तथा समूह मिलते हैं जिस कारण इनमें प्रतिकारी कानूनों की प्रधानता होती
  • सावयवी समाजों में समझौतों पर आधारित संबंध सामाजिक एकता का स्रोत होते हैं तथा नौकरियों में व्यक्तियों को अनुबंध पर रखा जाता है।
  • सावयवी एकता वाले समाजों में धर्म का प्रभाव काफ़ी कम होता है।
  • इस प्रकार के समाज आधुनिक समाज होते हैं।

प्रश्न 4. धर्मशास्त्रीय एवं तत्वशास्त्रीय चरणों में अंतर कीजिए।
उत्तर-

  • धर्मशास्त्रीय पड़ाव-यह पड़ाव मानवता के शुरू होने के समय शुरू होता है जब मनुष्य प्राकृतिक शक्तियों से डरता था। वह सभी चीजों को किसी आलौकिक शक्ति की क्रियाओं के परिणाम के रूप में देखता था। वह सोचता था कि चाहे सभी वस्तुएं निर्जीव हैं परन्तु सब में परमात्मा मौजूद है। यह पड़ाव आगे तीन उप-पड़ावों प्रतीक पूजन, बहु-देवतावाद तथा एक-ईश्वरवाद में विभाजित है।
  • तत्वशास्त्रीय पड़ाव-इस पड़ाव को काम्ते आधुनिक समाज का क्रान्तिक समय भी कहता है। यह पड़ाव 5 शताब्दियों तक 14वीं से 19वीं तक चला। इसे दो भागों में विभाजित किया गया है। प्रथम भाग में क्रान्तिक आंदोलन स्वयं ही चल पड़ा तथा क्रान्तिक फिलास्फी 16वीं शताब्दी में प्रोटैस्टैंटवाद में आने से शुरू हुई। दूसरा भाग 16वीं शताब्दी से शुरू हुआ। इसमें नकारात्मक सिद्धांत शुरू हुआ जिसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक परिवर्तन था। इसमें बेरोक निरीक्षण का अधिकार था।

प्रश्न 5. क्या आप सोचते हैं कि निकट भविष्य में साम्यवादी समाजों द्वारा पूँजीवाद को विस्थापित कर दिया जायेगा ?
उत्तर-जी नहीं, हम नहीं सोचते कि आने वाले भविष्य में पूँजीवादी व्यवस्था को कम्युनिस्ट व्यवस्था बदल देगी। वास्तव में पूँजीवादी व्यवस्था स्वतन्त्र मार्कीट के सिद्धांत पर आधारित है जबकि कम्युनिस्ट अर्थव्यवस्था सरकारी नियन्त्रण के अन्तर्गत होती है तथा आजकल के समय में कोई भी सरकारी नियन्त्रण को पसन्द नहीं करता। 1917 में रूस में राजशाही को कम्युनिस्ट व्यवस्था ने बदल दिया था परन्तु वहां की अर्थव्यवस्था का कुछ ही समय में बुरा हाल हो गया था। इस कारण ही सन् 1990 में U.S.S.R. के टुकड़े हो गए थे तथा वह कई देशों में विभाजित हो गया था। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कम्युनिस्ट पूँजीवादी व्यवस्था को नहीं बदल सकती।

IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 250-300 शब्दों में दें:

प्रश्न 1. क्या समाजशास्त्र एक पूर्ण विज्ञान के रूप में विकसित हुआ है जिसकी कल्पना अगस्ते कोंत ने की थी ?
उत्तर-शब्द समाजशास्त्र (Sociology) का प्रथम बार प्रयोग अगस्ते काम्ते ने 1839 में किया था। काम्ते ने एक पुस्तक लिखी ‘The Course on Positive Philosophy’ जो कि 6 भागों में छपी थी। इस पुस्तक में उन्होंने कहा था कि समाज में अलग-अलग भागों का अध्ययन अलग-अलग सामाजिक विज्ञान करते हैं, उदाहरण के लिए समाज के राजनीतिक हिस्से का अध्ययन राजनीति विज्ञान करता है, आर्थिक हिस्से का अध्ययन अर्थशास्त्र करता है। उस प्रकार एक ऐसा विज्ञान भी होना चाहिए जो समाज का अध्ययन करे। इस प्रकार उन्होंने समाज, सामाजिक संबंधों के अध्ययन की कल्पना की तथा उनकी कल्पना के अनुसार एक नया विज्ञान सामने आया जिसे समाजशास्त्र का नाम दिया गया।

काम्ते के पश्चात् हरबर्ट स्पैंसर ने भी कई संकल्प दिए जिससे समाजशास्त्र का दायरा बढ़ना शुरू हुआ। इमाईल दुर्थीम प्रथम समाज शास्त्री था जिसने समाजशास्त्र को एक विज्ञान के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। उन्होंने अपने अध्ययनों में वैज्ञानिक विधि का प्रयोग किया तथा कहा कि समाज का वैज्ञानिक विधियों, जैसे कि निरीक्षण की सहायता से अध्ययन किया जा सकता है। उनके द्वारा दिए संकल्पों, जैसे कि सामाजिक तथ्य, आत्महत्या का सिद्धांत, श्रम विभाजन का सिद्धांत, धर्म का सिद्धांत इत्यादि में वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग साफ झलकता है। समाजशास्त्र के इतिहास में दुर्थीम पहले प्रोफैसर थे।
समाजशास्त्र को विज्ञान के रूप में स्थापित करने में कार्ल मार्क्स तथा मैक्स वैबर ने भी बहुत बड़ा योगदान दिया। कार्ल मार्क्स ने संघर्ष का सिद्धांत दिया तथा सम्पूर्ण समाजशास्त्र संघर्ष सिद्धांत में इर्द-गिर्द घूमता है।

मार्क्स ने समाज का आर्थिक पक्ष से अध्ययन किया तथा बताया कि समाज का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है। उन्होंने दो प्रकार के वर्गों तथा उनके बीच हमेशा चलने वाले संघर्ष का विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने ऐतिहासिक भौतिकवाद, वर्ग तथा वर्ग संघर्ष का सिद्धांत, अलगाव का सिद्धांत जैसे संकल्प समाजशास्त्र को दिए। मैक्स वैबर ने भी समाजशास्त्र को विज्ञान के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया तथा सामाजिक क्रिया का सिद्धांत दिया। उन्होंने समाजशास्त्र की व्याख्या दी, सामाजिक क्रिया का सिद्धांत दिया, सत्ता तथा प्रभुत्ता का सिद्धांत दिया, धर्म की व्याख्या दी तथा कर्मचारीतन्त्र का सिद्धांत दिया।

इन सभी समाजशास्त्र के संस्थापकों के पश्चात् बहुत से समाजशास्त्री हुए तथा समाजशास्त्र को विज्ञान के रूप में स्थापित करने में उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता। टालक्ट पारसन्ज़, जे० एस० मिल, राबर्ट मर्टन, मैलिनोवस्की, गिलिन व गिलिन, जी० एस० घूर्ये इत्यादि जैसे समाजशास्त्री इनमें से प्रमुख हैं।
अब पिछले कुछ समय से समाजशास्त्र में वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग काफ़ी हद तक किया जा रहा है ताकि अध्ययन को अधिक-से-अधिक वस्तुनिष्ठ तथा निष्पक्ष रखा जा सके। इससे एक क्षेत्र में किए अध्ययनों को दूसरे क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकेगा। उपकल्पना, निरीक्षण, सैंपल विधि, साक्षात्कार, अनुसूची प्रश्नावली, केस स्टडी, वर्गीकरण, सारणीकरण, आँकड़ों के प्रयोग से समाजशास्त्र निश्चित रूप से एक विज्ञान के रूप में स्थापित हो गया है।

प्रश्न 2. मार्क्स का वर्ग संघर्ष का सिद्धांत बताइये।
उत्तर-मार्क्स की उन्नत ‘वैज्ञानिक प्रस्थापना’ में यह बात भी शामिल है कि उन्होंने अलग सामाजिक समूहों पर सर्वप्रथम वर्गों के अस्तित्व की व्याख्या की थी। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मार्क्स ने वर्गों की व्याख्या बहुत अच्छे प्रकार से की है। मार्क्स की विचारक खोज का मुख्य उद्देश्य यह पता करना था कि यह मानव समाज जिसमें हम सभी रहते हैं, और इसका जो रूप या स्वरूप हमें दिखाई देता है वह इस तरह क्यों है ? और इस समाज में परिवर्तन क्यों और किन शक्तियों के द्वारा आते हैं ? इसके साथ ही मार्क्स ने इसकी स्पष्ट व्याख्या और विवेचना की थी और लिखा था कि आने वाले समय में समाज में किस तरह और कैसे परिवर्तन आयेंगे ? अपनी खोजों के द्वारा मार्क्स और उसके निकट सहयोगी ‘ऐंजलस’ इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इस समाज में काफ़ी अमानवीय शोषण फैला हुआ है। इसलिये उन्होंने अपनी खोज का दूसरा उद्देश्य उस समाज का निर्माण करना या स्थापना करनी है जो कि शोषण रहित हो बताया है ।

वर्ग किसे कहते हैं (What is Class) मार्क्स के वर्ग संघर्ष को समझने के लिये यह अति आवश्यक है कि पहले यह जाने कि वर्ग क्या है ? कार्ल मार्क्स ने इतिहास का अध्ययन करने के लिये इस बात की विशेष वकालत की कि हमें यह अध्ययन उस दृष्टिकोण से करना चाहिये जिसके साथ हम उन प्राकृतिक नियमों का पता लगा सकें जो पूरे मानव इतिहास का संचालन करते हैं और ऐसा करने के लिए हमें कुछ विशेष व्यक्तियों के कार्यों और आम व्यक्तियों के कार्यों और व्यवहारों की तरफ ध्यान देना चाहिये। प्रत्येक समाज लगभग कई जनसमूहों में बंटे हुए होते हैं। इस प्रकार भिन्न-भिन्न वर्ग एक विशेष सामाजिक आर्थिक इकाई का निर्माण करते थे। इस इकाई विशेष को हम वर्ग के नाम से जानते हैं।

मार्क्स ने अपने कम्युनिस्ट मैनीफैस्टो किस्से के पहले अध्याय की शुरुआत भी इन्हीं शब्दों से की है कि अभी तक समाज का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है और इतिहास में वर्णित समाजों में हर समाज में विभिन्न प्रकार की श्रेणियां पाई जाती हैं। सामाजिक श्रेणियों की बहरूपी दर्जाबंदी, प्राचीन रोम में पैट्रोशियन, नाई पलेबियन और दास मिलते थे। मध्यकाल में हमें सामन्तवादी अधीन जागीरदारी, उस्ताद, कारीगर, मज़दूर कारीगर, ज़मीनी दास इत्यादि दिखाई पड़ते हैं और लगभग इन सभी में द्वितीय श्रेणियां या वर्ग पाए जाते हैं।

मार्क्स की वर्ग व्यवस्था के आधार पर ही लेनिन ने वर्गों की व्याख्या और परिभाषा पेश की है। लेनिन ने लिखा है कि, “वर्ग लोगों के ऐसे बडे-बडे समूहों को कहते हैं जो सामाजिक उत्पादन की इतिहास की तरफ से निर्धारित किसी पद्धति में अपनी-अपनी जगह की नज़र से उत्पादन के साधनों के साथ अपने सम्बन्धों जो कि अधिकतर मामलों में कानून के द्वारा निश्चित और निरूपित होते हैं की नज़रों से, मेहनत के सामाजिक संगठन में अपनी भूमिका को नज़र से और फलस्वरूप सामाजिक सम्पत्ति के जितने भाग के वह मालिक होते हैं, उसके परिमाण और उसको प्राप्त करने के तौर-तरीकों की नज़र से एक दूसरे से अलग होते हैं।”

मार्क्स के अनुसार, “इतिहास की भौतिकवादी धारणा में यह कहा गया है कि मानव जीवन के विकास के लिये आवश्यक साधनों का उत्पादन और उत्पादन के उपरान्त बनी वस्तुओं का लेन-देन (Exchange) प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था का आधार है। इतिहास में जितनी भी सामाजिक व्यवस्थाएं बनी हैं इसमें जिस तरह धन का बंटवारा हुआ है और समाज का वर्गों और श्रेणियों में बंटवारा हुआ है वह इस बात पर निर्भर है कि इस समाज में क्या उत्पादन हुआ है ? और कैसे हुआ है ? और फिर उपज की Exchange कैसे हुई ? मार्क्स के अनुसार, “किसी भी युग में परिश्रम का बंटवारा और जीवन जीने के साधनों की प्राप्ति के अलग-अलग साधनों के होने के कारण मनुष्य अलग-अलग वर्गों में बंट जाता है और प्रत्येक वर्ग की विशेष वर्ग चेतनता होती है।”

वर्ग से मार्क्स का अर्थ भारत की जातीय व्यवस्था से सम्बन्धित नहीं है बल्कि वर्ग से उनका अर्थ उस जातीय समूह व्यवस्था से है जिसकी परिभाषा उत्पादन की उस प्रक्रिया में उनकी भूमिका के साथ की जा सकती है। आम शब्दों में कहा जाये तो वर्ग लोगों के ऐसे समूहों को कहा जाता है, जो अपनी जीविका केवल एक ही ढंग से कमाते हैं, वर्ग का जन्म उत्पादन के तौर-तरीकों पर आधारित होता है। जैसे किसी उत्पादन व्यवस्था में परिवर्तन आता है, तो पुराने वर्गों के स्थान पर नये स्थान ले लेते हैं।

वर्ग संघर्ष (Class Struggle)-

इस तरह कार्ल मार्क्स ने प्रत्येक समाज में दो-दो वर्गों की विवेचना की है। मार्क्स की वर्ग की धारणाओं को प्रत्येक समाज में ध्यान से समझने के पश्चात् हम अब इस स्थिति में है कि उसकी वर्ग संघर्ष की धारणा को समझें। मार्क्स ने बताया कि समाज के प्रत्येक वर्ग में दो प्रकार के परस्पर विरोधी वर्ग रहे हैं। एक शोषण करने वाला व दूसरा जो शोषण को सहन करता है। इनमें आपस में संघर्ष होता है। इसे मार्क्स ने ‘वर्ग संघर्ष’ का नाम दिया है। कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र में वह कहते हैं कि समाज के अस्तित्व के साथ-साथ ही वर्ग संघर्ष का भी जन्म हो जाता है। मार्क्स का यह वर्ग संघर्ष का सिद्धान्त उसके विचारों से और संसार में भी बहुत महत्त्वपूर्ण है।

उनके प्रभाव के कारण ही ‘स्माल थास्टरीन बैवलीन’ और ‘कूले’ इत्यादि ने भी वर्ग संघर्ष को अपने चिन्तन का एक अंग रूप माना है।
मार्क्स के अनुसार, “उत्पादन की प्रक्रियाओं में अलग-अलग वर्गों की अलग-अलग भूमिकाएं होती हैं। अब वर्गों की आवश्यकताओं और हितों पर संघर्ष की स्थिति पैदा होना आवश्यक है। वही संघर्ष विरोधी विचारधारा में एक ‘आधार’ (Base) पैदा करता है। विकासशील उत्पादित शक्तियों और प्रकृतिवादी स्थिर सम्पत्ति के सम्बन्धों में टकराव पैदा होता है। इससे संघर्ष की गति भी तेजी से बढ़ती है। इतिहास की गति वर्गों की भूमिका के द्वारा ही निर्धारित होती है और सामाजिक एवं आर्थिक वर्ग उन सभी समाजों में पाए जाते हैं जहां श्रम विभाजन का आम सिद्धान्त लागू होता है।

मार्क्स के अनुसार वर्ग संघर्ष एक ऐसी उत्पादित व्यवस्था से जन्म लेता है, जो समाज को भिन्न-भिन्न वर्गों में बांट देती है। इसमें एक वर्ग तो काफ़ी कठोर परिश्रम करके उत्पादन करता है, जैसे दास, अर्द्धदास, किसान और मज़दूर इत्यादि और दूसरा वर्ग ऐसा है जो उत्पादन के लिये कोई परिश्रम किये बिना, बिना कोई काम किये उत्पादन के बड़े-बड़े भाग का उपयोग करता है, जैसे दासों के स्वामी, जागीरदार, ज़मींदार और पूंजीपति इत्यादि। मार्क्स के अनुसार, “इस वर्ग संघर्ष को मनुष्य के उत्पादन की पहली और ऊंची अवस्था तक पहुंचने में मदद करता है। वह मानते हैं कि कोई भी क्रान्ति जब सफल होती है तो उनके साथ नयी आर्थिक सामाजिक व्यवस्था का जन्म होता है।”

इस आधार पर ही मार्क्स ने अब तक के मानवीय इतिहास को चार युगों में विभाजित किया है-

1. पहला युग-इतिहास का पहला युग आदिम साम्यवादी समाज था। इस युग में उत्पादन के साधन अविकसित थे। उत्पादन के साधनों को आवश्यक वस्तुओं को उत्पन्न करने के लिए प्रयोग किया जाता था तथा संयुक्त परिश्रम के साथ इन्हें प्रयोग किया जाता था। इस प्रकार उत्पादन पर सभी का समान अधिकार होता था। आर्थिक शोषण तथा वर्ग भेद नाम की कोई चीज़ मौजूद नहीं थी।

2. दूसरा युग-दूसरा युग दास मूलक समाज का था। कृषि, पशुपालन तथा धातु के औज़ारों के विकसित होने से उत्पादन व्यवस्था के सम्बन्ध बदल गए तथा दास प्रथा शुरू हो गयी। विकसित उत्पादन के साधनों के कारण व्यक्तिगत संपत्ति का संकल्प सामने आया। इस समय दास स्वामी तथा दासों के अलग-अलग वर्ग बन गए तथा वर्ग संघर्ष शुरू हो गया। मार्क्स का कहना था कि इस समाज से ही वर्ग संघर्ष की शुरुआत हुई क्योंकि मालिकों ने अपने दासों का शोषण करना शुरू कर दिया था।

3. तीसरा युग-सामन्ती समाज तीसरा युग था। इस युग में उत्पादन के साधनों पर कुछ सामन्तों तथा भूपतियों का अधिकार हो गया। इस युग में निजी सम्पत्ति की धारणा और सुद्रढ़ हो गई। कई विकासशील तथा अर्द्ध विकसित देशों में इस युग के अवशेष देखने को मिल जाएंगे। इस युग में सामन्तों तथा किसानों के दो वर्ग बन गए तथा वर्ग संघर्ष और तेज़ हो गया।

4. चौथा युग-चौथा युग पूँजीपति समाज था। 15वीं शताब्दी के अंत में विज्ञान का विकास होना शुरू हुआ। इससे उत्पादन व्यवस्था के सम्बन्धों तथा उत्पादन के नए साधनों में विरोध उत्पन्न हो गए। मशीनों का आविष्कार हुआ। बड़े-बड़े उद्योग स्थापित हुए जिससे पूँजीवादी युग शुरू हो गया तथा यह आज भी चल रहा है। इस व्यवस्था में एक तरफ तो उद्योगों के मालिक थे तथा दूसरी तरफ उन उद्योगों में कार्य करने वाले श्रमिक थे। इस प्रकार दो वर्ग पूँजीपति तथा श्रमिक बन गए। इस युग में विज्ञान की प्रगति से, शिक्षा के बढ़ने, बड़े उद्योगों में श्रमिकों के इकट्ठे रहने के कारण आसानी से संगठित होने से वर्ग चेतना का काफ़ी विकास हो गया है। आज का शोषित वर्ग अब शोषण तथा वर्ग विरोधों को और सहन करने को तैयार नहीं हैं। अब वर्ग संघर्ष अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया है। मार्क्स का कहना है कि पूँजीवादी युग का खात्मा आवश्यक है। शोषण पर आधारित यह अन्तिम व्यवस्था होगी। आज पूँजीवाद का खात्मा शुरू हो गया है। मनुष्यों का समाज तेज़ी से समाजवाद की तरफ बढ़ रहा है। रूस तथा चीन की समाजवादी सरकारों की स्थापना इसका प्रमाण है।

मार्क्स के अनुसार, “निजी सम्पत्ति ही शोषण की जड़ है। इसी के कारण ही मूल रूप से आर्थिक उत्पादन के क्षेत्र में समाज में दो मुख्य वर्ग हैं। इनमें एक वर्ग के हाथ में आर्थिक उत्पादन के सभी साधन केन्द्रित हो जाते हैं जिसके आधार पर यह वर्ग शोषित और कमजोर वर्ग का शोषण करता है।” इन वर्गों में आपस में समाज की हर युग (केवल आदिमयुग छोड़कर) में आपस में वर्ग संघर्ष चलता आया है। मार्क्स की मान्यता के अनुसार, सभी उत्पादन साधनों पर अधिकार करके शोषक वर्ग बल के साथ अपने सैद्धान्तिक विचारों एवं जीवन प्रणाली को सारे समाज पर थोपता है। मार्क्स के अनुसार, “वह वर्ग जो समाज की शोषक भौतिक शक्ति होता है, साथ ही समाज की शासक भौतिक शक्ति भी होता है। वह वर्ग जिसके पास भौतिक उत्पादन के साधन मौजूद होते हैं वह सामाजिक उत्पादन के साधनों पर भी नियन्त्रण रखता है। इस प्रकार के नियन्त्रण के लिए शोषक वर्ग बल प्रयोग भी करता है। उसके द्वारा समाज के ऊपर थोपे गये धर्म, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र और नैतिकता के विचार उसके इस प्रभाव को मज़बूत करने के लिये शोषण वर्ग के दास बन जाते हैं। शोषण की इस स्थिति को बरकरार रखने के लिए नये उभरते हुए शोषित वर्ग को बलपूर्वक दबाना आवश्यक हो जाता है। इसलिये मार्क्स ने कहा है बल नये समाज को अपने गर्भ में धारण करने वाले प्रत्येक पुराने समाज की ‘दाई’ (Midwife) है।

समाज का विकास अलग-अलग अवस्थाओं की देन हैं। किसी भी सामाजिक व्यवस्था अथवा ऐतिहासिक युग का मूल्यांकन हालातों, देश तथा काल के ऊपर निर्भर करता है। कोई भी सामाजिक व्यवस्था स्थायी नहीं है। सभी प्रक्रियाएँ द्वन्दात्मक होती है। उत्पादन की नई तथा पुरानी प्रक्रिया में जो अन्दरूनी संघर्ष होता है वह ही इसकी प्रेरक शक्ति होती है। पुरानी के स्थान पर नई पद्धति को अपनाना आवश्यक होता है। धीरे-धीरे होने वाले परिमाणात्मक परिवर्तन तेज़ी से अचानक होने वाले गुणात्मक परिवर्तन में बदल जाते है। इसलिए विकास के नियम के अनुसार क्रान्तिकारी परिवर्तन आवश्यक तथा स्वाभाविक होते हैं।

यह परिवर्तन बल (Force) पर आधारित होते हैं। विकास के रास्ते में उभरने वाली असंगतियों के आधार पर विरोधी शक्तियों में टकराव होता है। अंत में वर्ग संघर्ष तेज़ होता है जिसमें शोषित वर्ग अर्थात् मज़दूर वर्ग का अन्तिम रूप में जीतना आवश्यक है। मार्क्स के अनुसार इन विरोधों के कारण पूंजीवाद स्वयं विनाश की तरफ बढ़ता है।

पूँजीवादी व्यवस्था में दिन प्रतिदिन निर्धनता, बेरोज़गारी, भूखमरी बढ़ जाएगी। सहन करने की एक सीमा के पश्चात श्रमिक वर्ग क्रान्ति शुरू कर देगा। मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद शोषण पर आधारित अन्तिम व्यवस्था होगी। अपने स्वार्थों के साथ घिरे पूंजीवाद संसदीय नियमों के साथ अपने एकाधिकार का कभी भी त्याग नहीं करेंगे। जैसे कि महात्मा गांधी ने अपने ट्रस्टीशिप सिद्धान्त की व्याख्या में कहा था। शांतिपूर्ण तरीके से शोषण को खत्म नहीं किया जा सकता था। इसके लिये क्रान्ति ज़रूरी है। समाज का एक बहुत बड़ा भाग (सर्वहारा) मजबूर हो जायेगा और यही क्रान्तिकारी हरियाली को दर्शायेगा।”

सर्वहारा (मज़दूर) वर्ग की लीडरशिप में वर्ग संघर्ष के द्वारा राज्य के यन्त्र पर अधिकार हो जाने के बाद समाजवाद के युग का आरम्भ होगा। मार्क्स के अनुसार राज्य शोषक वर्ग के हाथ में होने के कारण दमन की नीति एक बहुत बड़ा हथियार होता है। क्रान्ति के बाद भी सामन्तवाद और पूंजीवाद के दलाल प्रति क्रान्ति की कोशिश करते हैं। इसलिए पूंजीवाद के समाजवाद के बीच जाने के समय मज़दूर की सत्ता की अस्थाई अवस्था होगी। समाजवाद की स्थापना के बाद शोषण का अन्त हो जायेगा। इससे वर्ग समाप्त हो जाएंगे। इससे प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मेहनत का पूर्ण भाग मिल सकेगा। समाजवाद की अधिक उन्नतावस्था में प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आवश्यकता अनुसार मिलेगा। धीरे-धीरे राज्य जो शोषक वर्ग का हथियार रहा है, टूट जायेगा और इसके स्थान पर आपसी सहयोग और सहकारिता के आधार पर बनी संस्थाएं ले लेंगी। वर्गों और वर्ग संघर्ष का अन्त हो जायेगा।

सर्वहारा (मज़दूर) और पूंजीपति के बीच चले वर्ग संघर्ष का अन्त पूंजीवाद के अन्त के साथ ही होगा। उत्पादन के साधनों पर समाज का अधिकार हो जाने के साथ उत्पादन पर लगे प्रतिबन्ध हट जायेंगे। उत्पादन की शक्तियां और समय की बर्बादी भी खत्म हो जायेगी। वर्ग संघर्ष के द्वारा वर्गों का अन्त आज केवल एक दुःस्वप्न मात्र बन कर नहीं रह गया। संसार बड़ी तेज़ी से वर्गहीन समाजवादी समाज की स्थापना की तरफ बढ़ रहा है। ‘ऐंजलस’ ने काफ़ी समय पहले ही कहा था “आज इतिहास में पहली बार यह सम्भावना पैदा हो गई है कि सामाजिक उत्पादन के द्वारा समाज के प्रत्येक सदस्य को ऐसा जीवन मिल सके जो भौतिक दृष्टि से अच्छा हो जाये और दिन प्रतिदिन अधिक सुख सम्पन्न हो जाये, ऐसा नहीं एक ऐसे जीवन का निर्माण हो जिसमें व्यक्ति की शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों का उन्मुख विकास संभावित हो। इस बात की सम्भावना पहली बार बनी है परन्तु बनी ज़रूर है।

श्रमिकों की क्रांति के द्वारा इन विरोधों तथा अन्य विरोधों का हल होगा। श्रमिकों की मुक्ति के इस कार्य को पूर्ण करना आधुनिक श्रमिक वर्ग का ऐतिहासिक फर्ज हैं। इसके बाद मनुष्य स्वयं श्रमिक के रूप में अपने इतिहास का निर्माण करेगा।

मार्क्स की एक दृढ़ विचारधारा है इस अन्तिम वर्ग संघर्ष के बाद होने वाले नये सामाजिक आर्थिक ढांचे में वर्ग संरचना में काफ़ी परिवर्तन की स्थिति होती है। जिन देशों में समाजवाद की विजय होती है वहां पर शोषक वर्ग समाप्त हो जाता है। वहां केवल मेहनतकश वर्ग ही रह जाता है। तब समाज का शासन शोषक वर्ग नहीं चलाता। जैसा कि पिछले सभी सामाजिक वर्गों में हुआ करता था, जिसमें भिन्न-भिन्न वर्ग होते थे बल्कि इसे मज़दूर वर्ग चलाता है। ये वर्ग समाज का नेतृत्व स्वतः अपने हाथों में ले लेता है और नये उत्पादन सम्बन्ध पैदा करता है। मजदूर वर्ग सभी मेहनतकश (उद्यमी) लोगों और मेहनतकश किसानों के साथ मिलकर अपना काम चलाते हैं । भिन्न-भिन्न वर्गों में नफरत भरे सम्बन्धों की जगह मित्रता, दोस्ती और आपसी भाईचारा ले लेता है। अन्ततः अमूल परिवर्तन उसको कहा जाता है जबकि समाज का मज़दूर वर्ग एक सहयोग पूर्ण वर्गहीन संरचना की तरफ बढ़ता है। इस तरह मज़दूर वर्ग की नीति का निशाना होता है वर्तमान सामाजिक समूहों के बीच के अन्तर को कम या समाप्त करना और एक वर्गहीन समाज का निर्माण करना।

प्रश्न 3. रूस तथा चीन की साम्यवादी क्रांतियों पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-(i) रूसी क्रान्ति (Russian Revolution)-रूस पर रोमानोव (Romanov) परिवार का राज्य था। प्रथम विश्व युद्ध (1914) के शुरू होने के समय ज़ार निकोलस II का रूस पर राज्य था। मास्को के इर्द-गिर्द के क्षेत्र के अतिरिक्त उस समय के रूसी साम्राज्य में आज के मौजूदा देश फिनलैंड, लाटवीया, लिथुआनिया, ऐसटोनिया, पोलैंड का हिस्सा, यूक्रेन तथा बैलारूस भी शामिल थे। जार्जिया, आर्मीनिया तथा अज़रबाईजान भी इसका हिस्सा थे।

1914 से पहले रूस में राजनीतिक दलों की मनाही थी। 1898 में समाजवादियों ने रूसी लोकतान्त्रिक वर्कज़ पार्टी शुरू की तथा वह कार्ल मार्क्स के विचारों का समर्थन करते थे। परन्तु सरकारी नीतियों के अनुसार, इसे गैरकानूनी ढंग से कार्य शुरू करना पड़ा। इसने अपना अखबार शुरू किया, मज़दूरों को इकट्ठा करना शुरू किया तथा हड़तालें करनी शुरू की।

रूस में तानाशाही शासक था। अन्य यूरोपियन देशों के विपरीत, ज़ार वहाँ की संसद् के प्रति जबावदेह नहीं था। उदारवादियों ने एक आन्दोलन चलाया ताकि इस गलत प्रथा को खत्म किया जा सके। उदारवादियों ने समाजवादी लोकतन्त्रीय तथा सामाजिक क्रान्तिकारियों के साथ मिलकर किसानों तथा मजदूरों को इकट्ठा किया। 1905 की क्रान्ति के दौरान संविधान की मांग की गई। उनके प्रयासों से प्रभावित होकर रूस के वर्कर चेतन हो गए तथा उन्होंने कार्य के घण्टे कम करने तथा तनख्वाह बढ़ाने की मांग की। जब वह क्रान्ति की तैयारी कर रहे थे, पुलिस ने उन पर हमला कर दिया। 100 से अधिक वर्कर मारे गए तथा 300 से अधिक जख्मी हो गए। क्योंकि यह घटना इतवार को हुई थी, इसलिए इसे Bloody Sunday के नाम से जाना जाता है।

1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ तथा ज़ार ने रूस को लड़ाई में धकेल दिया। रूस की स्थिति, जोकि पहले ही खराब चल रही थी, और भी खराब हो गई। रूस लड़ाई में बुरी तरह उलझ गया था। एक तरफ ज़ार संसद् (डुमा) को भंग करने का प्रयास कर रहा था तथा दूसरी तरफ संसद् के सदस्य इस स्थिति से बचने का प्रयास कर रहे थे। इस स्थिति में पेट्रोग्राड में 22 फरवरी, 1917 को एक फैक्ट्री बंद हो गई तथा सभी वर्कर बेरोज़गार हो गए। हमदर्दी के कारण वहां की 50 फैक्ट्रियों के वर्करों ने भी हड़ताल कर दी। इस समय तक कोई भी राजनीतिक दल इस आन्दोलन की अगुवाही नहीं कर रहा था। सरकारी इमारतों को वर्करों ने घेर लिया तथा सरकार ने कयूं लगा दिया। शाम तक वर्कर भाग गए परन्तु 24 व 25 तारीख तक वह फिर इकट्ठे हो गए। सरकार ने सेना को बुला लिया तथा पुलिस को उनकी निगरानी के लिए कहा गया।

25 फरवरी इतवार को सरकार ने संसद् (डुमा) को भंग कर दिया। नेताओं ने इसके विरुद्ध बोलना शुरू कर दिया। प्रदर्शनकारी पूरी शक्ति से 26 तारीख को सड़कों पर वापिस आ गए। 27 तारीख को पुलिस का हैडक्वाटर तबाह कर दिया गया। सड़कों पर लोग बाहर आ गए तथा उन्होंने ब्रैड, तनख्वाह, कार्य में कम घण्टे तथा लोकतन्त्र के नारे लगाने शुरू कर दिए। सरकार ने सेना को वापिस बुला लिया परन्तु सेना ने लोगों पर गोली चलाने से मना कर दिया। जिस अफसर ने गोली चलाने का आदेश दिया था, उसे भी मार दिया गया। सेना के लोग भी आम जनता से मिल गए तथा सोवियत को बनाने के लिए उस इमारत में एकत्र हो गए जहाँ डुमा पिछली बार एकत्र हुई थी।

अगले दिन वर्करों का प्रतिनिधिमण्डल ज़ार को मिलने के लिए गया। सेना के बड़े अधिकारियों ने ज़ार को प्रदर्शनकारियों की बात मानने की सलाह दी। अंत 2 मार्च को ज़ार ने उनकी बात मान ली तथा ज़ार का शासन खत्म हो गया। अक्तूबर में लेनिन (Lenin) ने रूस का शासन संभाल लिया तथा रूसी क्रान्ति पूर्ण हो गई।

(ii) चीनी क्रान्ति (Chinese Revolution)-1 अक्तूबर, 1949 को चीनी कम्यूनिस्ट नेता माओ-त्से-तुंग ने People’s Republic of China को बनाने की घोषणा की। इस घोषणा से चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी तथा राष्ट्रवादी पार्टी के बीच चल रही लड़ाई खत्म हो गई जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद शुरू हुई थी। PRC के बनने के साथ ही चीन में लंबे समय से (1911 की चीनी क्रान्ति) चला आ रहा सरकारी उथल-पुथल का कार्य भी खत्म हो गया। राष्ट्रवादी पार्टी के हारने से अमेरिका ने चीन से सभी राजनीतिक संबंध खत्म कर दिए।

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना 1921 में शंघाई में हुई थी। चीनी कम्यूनिस्टों ने 1926-27 के उत्तरी हमले के समय राष्ट्रवादी पार्टी का समर्थन किया। यह समर्थन 1927 के White Terror तक चला जब राष्ट्रवादियों ने कम्यूनिस्टों को मारना शुरू कर दिया।

1931 में जापान ने मंचुरिया पर कब्जा कर लिया। इस समय Republic of China की सरकार को तीन तरफ से हमले का डर था तथा वह थे जापानी हमला, कम्यूनिस्ट विद्रोह तथा उत्तर वाले लोगों के हमले का डर। चीन की सेना के कुछ उच्चाधिकारी Chiang-Kai-Shek के इस व्यवहार से दुखी हो गए कि वह आन्तरिक खतरों पर अधिक ध्यान दे रहा था न कि जापानी हमले पर। उन्होंने Shek को पकड़ लिया उसे कम्यूनिस्ट सेना से सहयोग करने के लिए कहा। यह राष्ट्रवादी सरकार तथा चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी (CCP) में सहयोग करने की पहली कोशिश थी परन्तु यह कोशिश कम समय के लिए ही थी। राष्ट्रवादियों ने जापान के ऊपर ध्यान करने की बजाए कम्यूनिस्टों को दबाने की तरफ ध्यान दिया जबकि कम्यूनस्टि ग्रामीण क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाने में लगे रहे।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कम्यूनिस्टों के लिए समर्थन काफ़ी बढ़ गया। चीन में अमेरिकी अधिकारियों राष्ट्रवादियों के क्षेत्र में लोगों के समर्थन को दबाने के प्रयास किए। इन अलोकतान्त्रिक नातियों तथा युद्ध के दौरान हो रहे भ्रष्टाचार ने चीन की सरकार को कम्यूनिस्टों के विरुद्ध काफ़ी कमज़ोर कर दिया। कम्यूनिस्ट पार्टी ने ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि सुधार करने शुरू किए जिससे उनका समर्थन बढ़ गया।

1945 में जापान युद्ध हार गया जिससे चीन में गृह युद्ध का खतरा बढ़ गया। Chiang Kai-Shek की सरकार को अमेरिकी समर्थन मिलना जारी रहा क्योंकि कम्यूनिस्टों के बढ़ते खतरे को चीन में केवल वह ही रोक सकता था। 1945 में Chiang-Kai-Shek तथा माओ-त्से-तुंग मिले ताकि लड़ाई के बाद की सरकार के गठन के ऊपर चर्चा की जा सके। दोनों लोकतन्त्र की बहाली, इकट्ठी सेना, चीन के राजनीतिक दलों की स्वतन्त्रता पर हामी भर चुके थे। सन्धि होने वाली थी परन्तु अमेरिका के दखल के कारण वह न हो सकी तथा 1946 में गृह युद्ध शुरू हो गए।

गृह युद्ध में 1947 से 1949 में कम्यूनिस्टों की जीत पक्की लग रही थी क्योंकि उन्हें जनसमर्थन प्राप्त था, उच्च दर्जे की सेना थी तथा मंचुरिया में जापानियों से छीने हुए हथियार भी थे। अक्तूबर 1949 में कई स्थान जीतने के पश्चात् माओ-त्से-तुंग ने People’s Republic of China के गठन की घोषणा की। Chiang-Kai-Shek अपनी सेना के पुनर्गठन के लिए ताईवान भाग गया। इस प्रकार 1949 में चीनी क्रान्ति पूर्ण हो गई।

प्रश्न 4. समाजशास्त्र में दुर्थीम का योगदान बताइये।
उत्तर-प्रसिद्ध समाज शास्त्री और दार्शनिक इमाइल दुर्थीम का जन्म 15 अप्रैल 1858 को उत्तरी-पूर्वी फ्रांस के लॉरेन (Lorraine) क्षेत्र में स्थित एपीनल (Epinal) नामक स्थान में हुआ था। दुर्थीम की आरम्भिक शिक्षा एपीनल की एक संस्था में हुई थी। बचपन से ही दुर्थीम एक मेधावी, प्रतिभाशाली तथा होनहार छात्र के रूप मे जाने जाते थे। दुर्थीम के पूर्वज ‘रेबी शास्त्रकार’ के रूप में प्रसिद्ध हुए थे। इसीलिए प्रतिभा तो दुर्थीम को विरासत से प्राप्त हुई थी। एपीनल में ही ग्रेजुएट तक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए दुर्थीम फ्रांस की राजधानी पैरिस में चले गए।

पैरिस में दुर्थीम की उच्च शिक्षा का आरम्भ हुआ। यहां पर उन्होंने विश्व प्रसिद्ध संस्था इकोल नारमेल अकादमी (Ecol Normale Superieure) में दाखिला लेने की कोशिश की। यहां यह बताना ज़रूरी है कि इस संस्था में बहुत बढ़िया विद्यार्थियों को ही दाखिला मिलता था। दो असफल प्रयासों के बाद 1879 में दुर्थीम को इस संस्था में दाखिला मिल ही गया। यह संस्था फ्रांसीसी, लातिनी और ग्रीक दर्शन विषयों पर शिक्षा प्रदान करती थी और वहां के पूरे पाठ्यक्रम में यही विषय शामिल थे। लेकिन प्रत्यक्षवादी और वैज्ञानिक प्रवृत्ति वाले दुीम इन विषयों में ज्यादा रुचि न ले सकें क्योंकि वो तो समाज की असली, राजनीतिक, बौद्धिक और सामाजिक इत्यादि दिशाओं के अध्ययन में रुचि रखते थे।

दुर्थीम का यह पूर्ण विश्वास था कि ज्ञान में प्रत्यक्षवाद (Positivism) ज़रूर होना चाहिए। उनका मानना था कि अगर किसी भी ज्ञान अथवा दर्शन का अध्ययन करते समय वर्तमान, बौद्धिक और सामाजिक समस्याओं का अध्ययन नहीं किया जाता तो उस ज्ञान का कोई फायदा नहीं हैं। अपने इन विचारों के कारण दुर्थीम इस विश्व प्रसिद्ध संस्था के वातावरण से इतने असंतुष्ट थे कि वह कभी-कभी तो अपने अध्यापकों के विरुद्ध भी हो जाते थे। लेकिन फिर भी दुर्थीम ने इकोल नारमेल को अपने अंदर इतना बसा लिया कि उन्होंने अपने पुत्र आंद्रे को यहां दाखिल करवाया।

प्रसिद्ध प्रत्यक्षवादी और महान् इतिहासकार प्रोफैसर कुलांज (Prof. Fustel de Coulanges) 1880 में इस संस्था के निदेशक बने। वह दुीम के उन अध्यापकों में से एक थे जिनका दुीम से विशेष प्यार था। कुलांज ने वहां के पाठ्यक्रम में बदलाव किया जिससे दुर्थीम बहुत खुश हुए। दुीम कुलांज का इतना आदर करते थे कि लातिनी भाषा में उन्होंने मान्टेस्क्यू (Montesquieu) नामक किताब लिखी जो उन्होने कुलांज को समर्पित किया। वहां ही दुर्थीम इमाइल बोटरोकस (Emile Boutrocus) को भी मिले। यहीं पर ही दुर्थीम और विश्व प्रसिद्ध विद्वानों को मिले और उन प्रतिभावान विद्यार्थियों को मिले जो बाद में प्रमुख समाजशास्त्री बने। इन प्रसिद्ध विद्वानों के सम्पर्क में आने से दुर्थीम के बौद्धिक और मानसिक चिंतन में काफ़ी बढ़ोत्तरी हुई।

1882 में वह इकोल नार्मेल को छोड़ कर 5 वर्षों तक पैरिस के पास स्थित हाई स्कूलों सेनस, सेंट क्युटिंन और ट्राईज़ में दर्शन शास्त्र पढ़ाते रहे। साथ ही साथ अपने प्रभाव से इन स्कूलों में समाजशास्त्र का नया पाठ्यक्रम भी शुरू किया। दुर्थीम बहुत बढ़िया अध्यापक के रूप में प्रसिद्ध हुए। इसके बाद भी दुर्थीम का मन यहां न लगा। 1885-86 में वह उच्च अध्ययन के लिए नौकरी से एक वर्ष की छुट्टी लेकर वर्ष के अंत में जर्मनी चले गए।

जर्मनी में दुर्शीम ने अर्थशास्त्र, लोक मनोविज्ञान, सांस्कृतिक मनोविज्ञान इत्यादि का काफ़ी गहराई से अध्ययन किया । यहाँ दुीम ने काम्ते (Comte) के लेखों का बारीकी से अध्ययन किया और शायद उससे प्रभावित होकर समाजशास्त्रीय प्रत्यक्षवाद (Sociological Positivism) को जन्म दिया।

1887 में दुर्थीम जर्मनी आ गए और बोर्डिक्स विश्वविद्यालय में प्रवेश रूप से सामाजिक शास्त्र का एक नया अलग विभाग स्थापित किया और आप को यहां अध्ययन के लिए बुलाया गया। लगभग 9 वर्षा के निरन्तर अध्ययन के पश्चात् वह 1896 में इसी विभाग के प्रोफेसर बन गए। इस दौरान पैरिस विश्वविद्यालय द्वारा दुर्थीम को 1893 में उनके फ्रांसीसी भाषा में लिखे शोध ग्रंथ Dela Divsion du Travail Social (Division of Labour in Society) पर उनको बहुत डाक्टरेट की उपाधी दी। उनके इस ग्रंथ के छपने के बाद उनको बहुत प्रसिद्धि मिली। 1895 में दुर्शीम ने अपने दूसरे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ Les Regles de ea Methode Sociologique (The rules of Sociological Method) की रचना की। इसकी दो वर्षों के बाद 1897 में दुर्थीम ने तीसरे महान् ग्रंथ Le Suicide : Etude de Sociologie (Suicide A Study of Sociology) की रचना की। इन महान् ग्रंथों की रचना के बाद दुखीम का नाम विश्व के प्रमुख दार्शनिक समाज शास्त्री और महान् लेखक के रूप में जाना जाने लगा।

वर्ष 1898 में दुर्शीम ने ‘L’ Annee Sociologique नाम से समाजशास्त्र सम्बन्धी मैगज़ीन की शुरुआत की और 1910 तक आप इस मैगजीन के सम्पादक रहे। दुर्थीम के इस मैगजीन ने फ्रांस के बौद्धिक वातावरण को बहुत नाम कमाया। इसमें बहुत सारे उच्च कोटि के विचार को जार्जस, डेवी, लेवी स्टार्स, साईमन इत्यादि ने अपने पत्र छपवाए।

इस विश्वविद्यालय में दुर्थीम ने बहुत प्रसिद्धि प्राप्त की और उसके बाद 1902 में पैरिस विश्वविद्यालय में दुर्थीम को शिक्षा शास्त्र के प्रोफैसर पद पर नियुक्त किया गया। यहां एक महत्त्वपूर्ण बात थी कि उस समय तक विश्व में समाज शास्त्र का कोई अलग विभाग नहीं होता था। यह दुर्थीम की कोशिशों का ही नतीजा था कि 1913 में शिक्षा शास्त्र विभाग का नाम बदल कर शिक्षा शास्त्र और समाजशास्त्र रख दिया गया। यहां दुर्थीम ने और विषयों के साथ-साथ विकास और परिवार की शुरुआत, नैतिक शिक्षा, धर्म की उत्पत्ति, काम्ते और सेंट साईमन के सामाजिक दर्शन को बहुत लगन के साथ पढ़ाया। जिन विद्यार्थियों ने दुीम से शिक्षा प्राप्त की वह उनसे बहुत प्रभावित हुए। दुर्शीम ने एक और पुस्तक Les Farmes Elementains delavie Religieuse (Elementary forms of Religious Life) की रचना की।

र्बोडिक्स विश्वविद्यालय में नियुक्त होने के पश्चात् ही उन्होंने विवाह करवा लिए। उनकी पत्नी का नाम लुईस डरेफू (Louise Drefus) था और उनके दो बच्चे थे। उनकी लड़की का नाम मैंरी (Marie) और लड़के का नाम आंद्रे (Andre) था। दुर्शीम की पत्नी सम्पादन के काम से लेकर चैक करना, उसको संशोधित करना, पत्र व्यवहार करने जैसे सभी कार्य को बहुत मेहनत से करके दुर्थीम की सहायता करती थी।

दुर्शीम ने 1914 के पहले विश्व युद्ध में अपने पुत्र आंद्रे को समाज सेवा के लिए पेश किया और स्वयं अपने लेखों और भाषणों से जनता का मनोबल बना रखने के लिए जुट गए। युद्ध ने दुर्शीम जी को मानसिक तौर से काफ़ी कमज़ोर कर दिया क्योंकि वह शांति के समर्थक थे। जब दुर्थीम युद्ध में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे तो उनको अपने पुत्र की मौत का समाचार मिला जिसकी मृत्यु लड़ाई के बुरी तरह जख्मी होने के कारण बुलगारीया के अस्पताल में हुई थी। आंद्रे उनका केवल पुत्र ही नहीं बल्कि सबसे अच्छा विद्यार्थी भी था इसी कारण उसकी मृत्यु ने दुर्थीम को अन्दर से तोड़ दिया।

दुर्थीम 1916 के अंत में एकदम बीमार हो गए लेकिन इसके पश्चात् भी वह 1917 में नीतिशास्त्र पर किताब लिखने के लिए फाऊंट नबलियु स्थान पर गए। 15 नवंबर, 1917 को असाधारण प्रतिभा वाले इस समाजशास्त्री की 59 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई।

दुर्शीम की रचनाएं (Writings of Durkheim) –
दुर्शीम ने अपने जीवनकाल के समय कई महान् ग्रंथों की रचना की जिनके नाम निम्नलिखित हैं-

1. The Division of Labour in Society – 1893
2. The Rules of Sociological Method – 1895
3. Suicide – 1897
4. Elementary Forms of Religious Life – 1912
5. Education and Sociology (After Death) – 1922
6. Sociology and Philosophy (After Death) – 1924
7. Moral Education (After Death) – 1925
8. Sociology and Saint Simon(After Death) – 1924
9. Pragmatism and Sociology (After Death) – 1925

प्रश्न 5. वैबर द्वारा प्रस्तुत सामाजिक क्रिया के प्रकारों की चर्चा कीजिए।
उत्तर-सामाजिक व्यवहार की पूरी व्याख्या करते हुए वैबर ने चार प्रकार के सामाजिक कार्यों की व्याख्या की है।

1. तार्किक उद्देश्यपूर्ण व्यवहार (Zweckrational)-वैबर ने बताया है कि तार्किक उद्देश्यपूर्ण सामाजिक व्यवहार का अर्थ ऐसे सामाजिक व्यवहार से होता है जो उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए अनेक उद्देश्यों की अधिक-से-अधिक प्राप्ति के लिए तार्किक रूप में निर्देशित हो, इसमें साधनों के चुनाव में केवल उनके विशेष प्रकार की कार्यकुशलता की तरफ ध्यान ही नहीं दिया जाता बल्कि भूल पर भी ध्यान दिया जाता है। साध्य और साधनों की अच्छी तरह जांच की जाती है और उसके आधार पर ही क्रिया सम्पादित होती है।

2. मूल्यात्मक व्यवहार (Wertrational)-मूल्यात्मक व्यवहार में किसी विशेष और स्पष्ट मूल को बहुत अधिक प्रभावशाली उपलब्ध साधनों के द्वारा स्थान दिया जाता है। दूसरे मूल्यों की कीमतों पर कुछ ध्यान नहीं दिया जाता है। इसमें तार्किक आधार नहीं हो सकता, बल्कि नैतिकता, धार्मिक या सुन्दरता के आधार पर ही मान ली गई है। नैतिक और धार्मिक मान्यताओं को बनाये रखने के लिए मूल्यात्मक क्रियाएं की जाती हैं। इन क्रियाओं को मानने में किसी भी प्रकार के तर्क की सहायता नहीं ली जाती है। वह इसी तरह ही मान ली जाती है क्योंकि इसके कारण सामाजिक सम्मान भी बढ़ता है और आत्मिक सन्तोष भी बढ़ता है।

3. संवेदात्मक व्यवहार (Assectual Behaviour)-ऐसी क्रियाएं मानवीय भावनाओं, संवेगों और स्थायी भावों के कारण होती हैं। समाज में रहते हुए हमें प्रेम, नफरत, गुस्सा इत्यादि भावनाओं का शिकार होना पड़ता है। इसके कारण ही समाज में शान्ति या अशान्ति की अवस्था पैदा हो जाती है। इन व्यवहारों के कारण परम्परा और तर्क का थोड़ा सा भी सहारा नहीं लिया जाता है।

4. परम्परागत व्यवहार (Traditional Behaviour)-परम्परागत क्रियाएं पहले से निश्चित प्रतिमानों के आधार पर की जाती हैं । सामाजिक जीवन को सरल और शांतमय रखने के लिए परम्परागत क्रियाएं महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं। सम्भव है कभी वह स्थिति पैदा हो जाये, कि इन क्रियाओं द्वारा समाज में संघर्ष पैदा हो जाये कि इन क्रियाओं द्वारा तर्क, कार्यकुशलता और किसी और प्रकार का सहारा लेने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। सामाजिक प्रथाएं ही इन क्रियाओं को संचालित करती हैं ।।

वैबर ने बताया है कि सामाजिक क्रियाएं तीन प्रकार से निर्देशित होती हैं ।

प्रश्न 6. वैबर किस प्रकार धर्म को आर्थिक क्रियाओं से जोड़ते हैं ?
उत्तर-पूंजीवाद का सार (Essence of Capitalism)-वैबर का आरम्भिक अध्ययन एक ऐसी प्रवृत्ति पर केन्द्रित है जो आधुनिक समाज में विशेष रूप में दिखाई देती है। आर्थिक व्यवहारों पर धार्मिक प्रभावों को स्पष्ट करने के लिए 1904 से 1905 में जो लेख लिखे हैं उनके आधार पर उसकी सबसे प्रसिद्ध किताब The Protestant Ethic and the Spirit of Capitalism के नाम से छपी। इस किताब के अधिकतर भाग में वैबर ने इस समस्या पर प्रकाश डाला है कि प्रोटैस्टैंट धर्म के विचारों या नीतियों ने किस प्रकार पूंजीवाद के विकास को प्रभावित किया है। यह विचार मार्क्स के इस सिद्धान्त के लिए एक खुली चुनौती थी कि मानव की सामाजिक व धार्मिक चेतना उसके सामाजिक वर्ग द्वारा निर्धारित होती है।

वैबर के विचारों से आधुनिक औद्योगिक जगत् के मानव की एकता स्पष्ट है कि उसको सख्त मेहनत करनी चाहिए। वैबर के अनुसार, “कठोर काम एक कर्तव्य है व इसका नतीजा इसी के बीच शामिल है।” यह विचार वैबर के दृष्टिकोण से आधुनिक औद्योगिक जगत् के मानव का विशेष गुण है। मानव अपने काम में अच्छी तरह काम इसलिए नहीं करना चाहता क्योंकि उसको काम करना पड़ेगा बल्कि इसलिए कि वह ऐसा करना चाहता है। वैबर के अनुसार यह उसकी व्यक्तिक संतुष्टि का आधार है। वैबर ने स्वयं लिखा है कि एक व्यक्ति से अपनी आजीविका के मूल्य के प्रति होने वाले कर्त्तव्य का अनुभव करने की आशा की जाती है व वह ऐसा करता भी है चाहे वह किसी भी क्षेत्र में क्यों न हो। अमरीका की एक कहावत है कि, “यदि कोई व्यक्ति काम करने के योग्य है तो उसे सबसे बढ़िया ढंग से पूरा करना चाहिए।” यह कहावत वैबर के अनुसार पूंजीवाद का सार भी है क्योंकि इस धारणा का सम्बन्ध किसी आलौकिक उद्देश्य से नहीं बल्कि आर्थिक जीवन में व्यक्ति को प्राप्त होने वाली सफलता से है। चाहे किसी विशेष समय में यह धारणा धार्मिक नैतिकता से सम्बन्धित रही है। पूंजीवाद के सार को स्पष्ट करने के लिए वैबर ने उसकी तुलना एक अन्य आर्थिक क्रिया से की है जिसका नाम उन्होंने परम्परावाद रखा है। आर्थिक क्रियाओं में परम्परावाद वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति अधिक लाभ के बाद भी कम-से-कम काम करना चाहता है।

वह काम के दौरान अधिक-से-अधिक आराम करना पसन्द करता है व काम के नये तरीके से अनुकूलन करने की इच्छा नहीं करते हैं। वह जीवन जीने के लिए साधारण तरीकों से ही खुश हो जाते हैं व एकदम लाभ प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। सिद्धान्तहीन रूप से धन का इकट्ठा करना आर्थिक परम्परावाद का ही एक हिस्सा है तथा ये सारी विशेषताएं पूंजीवाद के सार से पूरी तरह उलट हैं । असल में आधुनिक पूंजीवाद अन्तर्सम्बन्धित संस्थाओं का एक ऐसा बड़ा एकत्र (Complex) है, जिसका आधार आर्थिक कोशिशें हैं न कि स्टोरियों की कोशिशें। पूंजीवाद के अन्तर्गत व्यापारी निगमों का कानूनी रूप, संगठित लेन-देन का केन्द्र, सरकारी कर्जा पत्रों के रूप में सार्वजनिक कर्जा देने की प्रणाली व ऐसे उद्योगों के संगठनों का समूह है जिनका उद्देश्य वस्तुओं के तार्किक आधार पर उत्पादन करना होता है न कि उनका व्यापार करना। वैबर का विचार था कि दक्षिणी यूरोप, रोम अभिजात वर्ग व ओलबी नदी के पूर्व के ज़मींदारों की आर्थिक क्रियाएं अचानक लाभ प्राप्त करने के लिए की गईं जिनमें उन्होंने सारे नैतिक विचारों का त्याग कर दिया। उनकी क्रियाओं में आर्थिक लाभ की तार्किक कोशिशों की कमी थी जिस कारण उन्हें पूंजीवाद के बराबर नहीं रखा जा सकता।

वैबर के अनुसार पूंजीवाद के सार का गुण केवल पश्चिमी समाज का ही गुण नहीं है। अनेकों समाजों में ऐसे व्यक्ति हुए हैं जिन्होंने अपने व्यापार को बढ़िया ढंग से चलाया, जो नौकरों से भी अधिक मेहनत करते हैं, जिनका जीवन सादा था व जो अपनी बचत को भी व्यापार में ही लगा देते थे पर इसके बाद भी इन पंजीवादी विशेषताओं का प्रभाव पश्चिमी समाजों में कहीं ज्यादा मिलता रहा है, इसका कारण यह था कि पश्चिम में यह गुण एक व्यक्तिगत गुण न रहकर जीवन जीने के आम तरीके के रूप में विकसित हुआ। इस तरह लोगों में फैली कठोर मेहनत, व्यापारिक व्यवहार, सार्वजनिक कर्जा व्यवस्था, पूंजी का लगातार व्यापार में लगाते रहना व मेहनत के प्रति इच्छा ही पूंजीवाद का सार है। इसके विपरीत एकदम लाभ पाने की कोशिश, मेहनत को बोझ व श्राप समझकर उसको न करना, धन को इकट्ठा करना व जीवन जीने के साधारण स्तर से ही सन्तुष्ट हो जाना आम आर्थिक आदतें हैं।

प्रोटैस्टैंट नीति (Protestant Ethic) यह स्पष्ट करने के बाद कि उनके अध्ययन का उद्देश्य पूंजीवाद का सार है वैबर ने ऐसे अनेकों कारण बताए हैं जिनके आधार पर सुधार आन्दोलन के धार्मिक विचारों में इसकी उत्पत्ति को ढूंढना है। वैबर ने अपने एक विद्यार्थी बाडेन (Baden) को राज्य में धार्मिक सम्बन्धों व शिक्षा को चयन का अध्ययन करने के लिए कहा। बाडेन ने एक परिणाम यह पेश किया कि कैथोलिक विद्यार्थियों की तुलना में प्रोटैस्टैंट विद्यार्थी उन शिक्षा संस्थाओं में अधिक दाखिला लेते हैं जो औद्योगिक जीवन से सम्बन्धित हैं। एक और कारण यह भी था कि यूरोप में समय-समय पर कम गणना समूहों ने अपनी सामाजिक व राजनीतिक हानि को कठोर आर्थिक मेहनत से पूरा कर लिया जबकि कैथोलिक ऐसा न कर सके। इन हालातों के प्रभाव से वैबर की इस धारणा को बल मिला कि धार्मिक नीति व आर्थिक क्रियाओं में कोई सम्बन्ध ज़रूर है। इसके बाद वैबर ने यह भी देखा कि 16वीं सदी में बहुत सारे अमीर प्रदेशों व शहरों में प्रोटैस्टैंट धर्म स्वीकार कर लिया क्योंकि प्रोटैस्टैंट धर्म अपनी अनेकों नीतियों के कारण आर्थिक लाभ की कोशिशों को आगे बढ़ा रहा है। इसी आधार पर वैबर ने यह पता करने की कोशिश की कि प्रोटैस्टैंट धर्म का प्रचार आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए देशों में हुआ व अंतः पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के बाद भी किसी क्षेत्र में कैथोलिक धर्म प्रभावशाली बना रहा।

The Protestant Ethic and the Spirit of Capitalism लिखने में वैबर का उद्देश्य बहुत कुछ इस विरोध की व्याख्या के कारण आर्थिक जीवन पर धार्मिक नीतियों के प्रभाव को स्पष्ट करना था। वैबर यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि प्रोटैस्टैंट धर्म की नीतियां किस तरह उन लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गईं जो आर्थिक लाभों को तार्किक दृष्टि से प्राप्त करने के हक में थीं। इस तरह वैबर के अनुसार किसी भी धर्म के साथ सम्बन्धित सिद्धान्तों पर इस नज़र से विचार करना चाहिए कि यह सिद्धान्त अपने शिष्यों को किस तरह के व्यवहारों का प्रोत्साहन देता है। इस प्रश्न को ध्यान में रखते हुए वैबर ने प्रोटैस्टैंट धर्म के शुद्ध विचारवादी पादरियों के लेखों को परखा व उनके द्वारा बनाए कालविनवादी सिद्धान्तों का समुदाय के दैनिक व्यवहार पर प्रभाव स्पष्ट किया।

प्रोटैस्टैंट धर्म के नीति के रूप में सेंट पाल के इस आदेश को व्यापक रूप से ग्रहण किया जाने लगा कि, “जो व्यक्ति काम नहीं करेगा वह रोटी नहीं खाएगा व ग़रीब की तरह अमीर भी भगवान के गौरव को बढ़ाने के लिए किसी न किसी समय पर व्यापार को ज़रूर करे।” इस तरह मेहनती जीवन ही प्रोटैस्टैंट धर्म शुद्ध विचारवादी धार्मिक भक्ति के अनुसार है।

रिचर्ड बैक्सटर (Richard Baxter) ने कहा कि, “केवल धर्म के लिए ही भगवान् हमारी क्रियाओं की रक्षा करता है। मेहनत ही शक्ति का नैतिक व प्राकृतिक उद्देश्य है, केवल मेहनत से ही भगवान् की सबसे ज्यादा सेवा हो सकती है।” एक अन्य सन्त जॉन बयिन ने कहा था कि, “यह नहीं कहा जाएगा कि आप क्यों विश्वास करते थे, केवल ये कहा जाएगा कि आप कुछ मेहनत भी करते थे या केवल बातें ही करते थे।” इस तरह प्रोटैस्टैंट धर्म की नीति में काम करते जीवन को ही खुदा की भक्ति के रूप में मान लिया गया। प्रोटैस्टैंट धर्म में मेहनत की प्रशंसा ने नये नियमों को जन्म दिया। इसके अनुसार समय को व्यर्थ नष्ट करना पाप है। जीवन छोटा व मूल्यवान् है, इसलिए मानव को हर समय भगवान् का गौरव बढ़ाने के लिए अपना समय अपने उपयोगी काम में लगाना चाहिए। व्यर्थ की बातचीत, लोगों को ज्यादा मिलना, ज़रूरत से ज्यादा सोना व दैनिक कार्यों को हानि पहुंचा कर धार्मिक कार्यों में लगे रहना पाप है क्योंकि इनके कारण भगवान् के द्वारा दिए आजीविका काम को भगवान् की इच्छा के अनुसार पूरा नहीं किया जा सकता। इस दृष्टिकोण से प्रोटैस्टैंट धर्म की नीतियां व्यक्तिगत नीति के इस आदर्श के विरुद्ध हैं, “अमीर व्यक्ति कोई काम न करे या यह कि धार्मिक ध्यान सांसारिक कार्यों से ज्यादा मूल्यवान् है। यही प्रोटैस्टैंट नीति है।”

पूंजीवाद व प्रोटैस्टैंट नीति का सम्बन्ध (Relationship of Capitalism and Protestant Ethic)पूंजीवाद के सार व प्रोटैस्टैंट नीतियों के अध्ययन से वैबर को इनके अनेकों आधारों में समानता मिलती है। इन समानताओं ने वैबर को इस तथ्य पर विचार करने से प्रेरणा दी है कि आर्थिक व्यवहारों व धार्मिक नीतियों में समानताएं किन परिस्थितियों के कारण समानताओं का वर्णन परिस्थितियों के परिणाम से है। वैबर ने पहले 16वीं व 17वीं सदी में धर्म संघों व उनकी मान्यताओं में होने वाले परिवर्तनों का मानवीय व्यवहारों पर प्रभावों का अध्ययन किया। शुरू में अनेकों धर्म संघों ने भौतिक चीजों की प्राप्ति व उनके इकट्ठा करने पर जोर दिया व कुछ समय के बाद धन के एकत्र को अधार्मिकता की श्रेणी में रखा जाने लगा जिसमें मेहनत के सामने सारी इच्छाओं को समाप्त कर लेना ठीक था। इस धर्म संघ ने इच्छाओं के दमन करने की निष्पक्षता को खत्म करने के रूप में न लेकर श्रम के रास्ते में आने वाली रुकावट को इच्छा खत्म करने के रूप में स्पष्ट किया। वैबर के अनुसार, “जब इच्छा ख़त्म कर लेने की धारणा धर्म केन्द्रों की सीमा से बाहर निकल कर सांसारिक नैतिकता को प्रभावित करने लगी तो इसने आधुनिक अर्थव्यवस्था (पूंजीवाद) की रचना में ही अपना योगदान शुरू कर दिया।” इस परिवर्तन ने वैबर को अध्ययन की एक दिशा प्रदान की। धर्म की नीतियां ही वे मूल कारण हैं जो व्यक्ति के आर्थिक वे धर्म-निरपेक्ष व्यवहारों को प्रभावित करती हैं।

इस तरह वैबर ने अत्यधिक परिणामों द्वारा यह स्पष्ट किया कि किस तरह प्रोटैस्टैंट धर्म की नीतियां योग के अनेकों देशों में आरम्भिक पूंजीवाद के विकास के लिए ठीक हैं। प्रोटैस्टैंट धर्म के सुधार आन्दोलन के शुरू से ही धार्मिक समारोहों में प्रवेश करने का अधिकार उन लोगों को दिया जिनकी इन धर्म की नीतियों में बहुत ज्यादा श्रद्धा थी। धार्मिक परिषदों के सदस्यों को यह सिद्ध करना पड़ता था कि उनमें अपने धर्म की नीतियों को व्यावहारिक रूप देने की पूरी समर्था है। यह परम्परा वैबर के अनुसार साधनों से सम्बन्ध आजीविका को महत्त्व देकर आधुनिक पूंजीवाद के विकास में बहत ज्यादा सहायक सिद्ध हई। धीरे-धीरे प्रोटैस्टैंट धर्म की नैतिक शिक्षाओं को मानने वालों के जीवन की शैली एक व्यवस्थित शैली में बदल गई। वैबर ने इस स्थिति को एक ऐसी घटना के रूप में स्वीकार किया कि जिससे पश्चिमी जीवन के भिन्न-भिन्न पहलुओं में तर्कवाद बढ़ा। यह तर्कवाद पश्चिमी सभ्यता के भिन्नभिन्न रूपों में स्पष्ट हुआ व पूंजीवाद के विकास से इसका प्रत्यक्ष सम्बन्ध है। इस तरह पूंजीवाद के सार व प्रोटैस्टैंट नीति के सम्बन्ध की व्याख्या के आधार पर धर्म को समझाया है।

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