Class 11 Sociology Solutions Chapter 4 सामाजिक समूह

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न । (Textual Questions)

I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1-15 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. किसने समूह की दो किस्मों, अन्तःसमूह और बाह्य समूह का वर्णन किया है ?
उत्तर-डब्ल्यू०जी० समनर (W.G. Sumner) ने अन्तःसमूह तथा बाह्य समूह का जिक्र किया था।

प्रश्न 2. अन्तःसमूह के दो उदाहरण के नाम बताओ।
उत्तर-परिवार तथा खेलसमूह अन्तर्समूहों की उदाहरणें हैं।

प्रश्न 3. बाह्य समूह के दो उदाहरणे के नाम बताओ।
उत्तर-पिता का दफ्तर तथा माता का स्कूल बाह्य समूह की उदाहरणें हैं।

प्रश्न 4. ‘संदर्भ समूह’ की अवधारणा किसने दी है ?
उत्तर-संदर्भ समूह का संकल्प प्रसिद्ध समाजशास्त्री राबर्ट के० मर्टन (Robert K. Merton) ने दिया था।

प्रश्न 5. हम भावना क्या है ?
उत्तर- हम भावना व्यक्ति में वह भावना है जिससे वह अपने समूहों के साथ स्वयं को पहचानता है कि वह उस समूह का सदस्य है।

प्रश्न 6. सी० एच० कूले के द्वारा दिए गए प्राथमिक समूहों के उदाहरणों के नाम बताओ।
उत्तर-परिवार, पड़ोस तथा खेल समूह ।

II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30-35 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. सामाजिक समूहों को परिभाषित करो।
उत्तर-आगबर्न तथा निमकाफ के अनुसार, “जब कभी भी दो या अधिक व्यक्ति एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं तथा एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं तो वह एक सामाजिक समूह का निर्माण करते हैं।”

प्रश्न 2. प्राथमिक समूह से आप क्या समझते हो उदाहरण सहित बताओ ?
उत्तर-वह समूह जिनके साथ हमारी शारीरिक रूप से नज़दीकी होती है, जिनमें हम अपनेपन को महसूस करते हैं तथा जहां हम रहना पसंद करते हैं, प्राथमिक समूह होते हैं। उदाहरण के लिए परिवार, पड़ोस, खेल समूह इत्यादि।

प्रश्न 3. द्वितीय समूह से आप क्या समझते हो उदाहरण सहित बताओ ?
उत्तर-वह समूह जिनकी सदस्यता हम अपनी इच्छा से किसी उद्देश्य के कारण लेते हैं तथा उद्देश्य की पूर्ति होने पर सदस्यता छोड़ देते हैं, द्वितीय समूह होते हैं। यह अस्थायी होते हैं। उदाहरण के लिए राजनीतिक दल।

प्रश्न 4. अन्तःसमूह तथा बाह्य समूह के बीच दो अंतर बताओ।
उत्तर-

  1. अन्तःसमूह में अपनेपन की भावना होती है परन्तु बाह्य समूह में इस भावना की कमी पाई जाती
  2. व्यक्ति अन्त:समूह में रहना पसंद करता है जबकि बाह्य समूह में रहना उसे पसंद नहीं होता।

प्रश्न 5. द्वितीय समूह की विशेषताओं को बताओ।
उत्तर-

  • द्वितीय समूहों की सदस्यता उद्देश्यों पर आधारित होती है।
  • द्वितीय समूहों की सदस्यता अस्थायी होती है तथा व्यक्ति उद्देश्य की पूर्ति होने के पश्चात् इनकी सदस्यता छोड़ देता है।
  • द्वितीय समूहों का औपचारिक संगठन होता है।
  • द्वितीय समूहों के सदस्यों के बीच अप्रत्यक्ष संबंध होते हैं।

प्रश्न 6. प्राथमिक समूहों की विशेषताओं को बताओ।
उत्तर-

  • इनके सदस्यों के बीच शारीरिक नज़दीकी होती है तथा आकार सीमित होता है।
  • यह समूह अस्थायी नहीं बल्कि स्थायी होते हैं।
  • इनके सदस्यों के बीच स्वार्थ वाले संबंध नहीं होते।
  • इनके सदस्यों के बीच संबंधों में निरंतरता होती है।

III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 75-85 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. सामाजिक समूह की विशेषताएं बताओ।
उत्तर-

  • सामाजिक समूह के सदस्यों में आपसी सम्बन्ध पाए जाते हैं। सामाजिक समूह व्यक्तियों की एकत्रता को नहीं कहा जाता बल्कि समूह के सदस्यों में आपसी सम्बन्धों के कारण यह सामाजिक समूह कहलाता है। यह आपसी सम्बन्ध अन्तक्रियाओं के परिणामस्वरूप पाया जाता है।
  • समूह में एकता की भावना भी पाई जाती है। सामाजिक समूह के सदस्यों में एकता की भावना के कारण ही व्यक्ति आपस में एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। इस कारण हमदर्दी व प्यार भी इसके तत्त्व हैं।
  • समूह के सदस्यों में हम भावना पाई जाती है व उनमें अपनत्व की भावना का विकास होता है और वह एक-दूसरे की मदद करते हैं।
  • समूह का अपने सदस्यों के व्यवहारों पर नियन्त्रण होता है व यह नियन्त्रण, परम्पराओं, प्रथाओं, नियमों आदि द्वारा पाया जाता है।
  • समूह के सदस्यों में आपसी सम्बन्धों के कारण अन्तक्रिया होती है, जिस कारण वे आपस में बहुत नज़दीकी से जुड़े होते हैं।
  • समूह के सदस्यों में साझेपन की भावना होती है, जिससे उनके विचार साझे होते हैं।

प्रश्न 2. प्राथमिक समूह का महत्त्व लिखें।
उत्तर-

  • प्राथमिक समूह में व्यक्ति व समाज दोनों का विकास होता है।
  • प्रत्येक व्यक्ति के अनुभवों में से पहला समूह यह ही पाया जाता है।
  • समाजीकरण की प्रक्रिया भी इस समूह से सम्बन्धित है।
  • व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है क्योंकि समूह व्यक्ति में सामाजिक गुण भरता है।
  • व्यक्ति इसके अधीन अपने समाज के परिमापों, मूल्यों, परम्पराओं, रीति-रिवाजों इत्यादि का भी ज्ञान प्राप्त करता है।
  • व्यक्ति सबसे पहले इसका सदस्य बनता है।
  • सामाजिक नियन्त्रण का आधार भी प्राथमिक समूह में होता है जिसमें समूह के हित को अधिक महत्त्व दिया जाता है।

प्रश्न 3. प्राथमिक तथा द्वितीय समूहों के बीच क्या अंतर हैं ?
उत्तर-

  1. प्राथमिक समूह आकार में छोटे होते हैं व द्वितीय समूह आकार में बड़े होते हैं।
  2. प्राथमिक समूह में सम्बन्ध प्रत्यक्ष, निजी व अनौपचारिक होते हैं पर द्वितीय समूहों में सम्बन्ध अप्रत्यक्ष व औपचारिक होते हैं।
  3. प्राथमिक समूहों के सदस्यों में सामूहिक सहयोग की भावना पाई जाती है पर द्वितीय समूहों में सदस्य एकदूसरे से सहयोग केवल अपने विशेष हितों को ध्यान में रख कर करते हैं।
  4. प्राथमिक समूह के सदस्यों में आपसी सम्बन्ध की अवधि बहुत लम्बी होती है पर द्वितीय समूहों में अवधि की कोई सीमा निश्चित नहीं होती यह कम भी हो सकती है व अधिक भी।
  5. प्राथमिक समूह अधिकतर गांवों में पाए जाते हैं पर द्वितीय समूह प्रायः शहरों में पाए जाते हैं।

प्रश्न 4. अन्तर्समूह की विशेषताएं बताओ।
उत्तर-समनर द्वारा वर्गीकृत समूह सांस्कृतिक विकास की सभी अवस्थाओं में पाए जाते हैं क्योंकि इनके द्वारा व्यक्तित्व भी प्रभावित होता है। अन्तर्समूहों को ‘हम समूह’ (We groups) भी कहा जाता है। समूह को व्यक्ति अपना समझता है। व्यक्ति इन समूहों से सम्बन्धित भी होता है। मैकाइवर व पेज (MacIver & Page) ने अपनी पुस्तक ‘समाज’ (Society) में अन्तर्समूहों का अर्थ उन समूहों से लिया है जिनसे व्यक्ति अपने आप मिल लेता है। उदाहरण के तौर पर जाति, धर्म, परिवार, कबीला, लिंग इत्यादि कुछ ऐसे समूह हैं जिनके बारे में व्यक्ति को पूर्ण ज्ञान होता है।

अन्तर्समूहों की प्रकृति शांत होती है व आपसी सहयोग, आपसी मिलनसार, सद्भावना आदि जैसे गुण पाए जाते हैं। अन्तर्समूहों में व्यक्ति का बाहर वालों के प्रति दृष्टिकोण दुश्मनी वाला होता है। इन समूहों में मनाही भी होती है। कई बार लड़ाई करने के समय लोग फिर समूह से जुड़ कर दूसरे समूह का मुकाबला करने लग जाते हैं। अन्तर्समूहों में ‘हम की भावना’ पाई जाती है।

IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 250-300 शब्दों में दें:

प्रश्न 1. सामाजिक समूह से तुम क्या समझते हैं ? विस्तृत रूप में लिखो।
उत्तर-समूह का अर्थ (Meaning of Group)—साधारण व्यक्ति समूह शब्द को रोज़ाना बोल-चाल की भाषा में प्रयोग करते हैं। साधारण मनुष्य समूह शब्द का एक अर्थ नहीं निकालते बल्कि अलग-अलग अर्थ निकालते हैं। जैसे यदि हमें किसी वस्तु का लोगों पर प्रभाव अध्ययन करना है तो हमें उस वस्तु को दो समूहों में रख कर अध्ययन करना पड़ेगा। एक तो वह समूह है जो उस वस्तु का प्रयोग करता है एवं दूसरा वह समूह जो उस वस्तु का प्रयोग नहीं करता है। दोनों समूहों के लोग एक-दूसरे के करीब भी रहते हो सकते हैं व दूर भी, परन्तु हमारे लिए यह महत्त्वपूर्ण नहीं है। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि यदि हमारे उद्देश्य भिन्न हैं तो समूह भी भिन्न हो सकते हैं। इस प्रकार आम शब्दों में व साधारण व्यक्ति के लिए मनुष्यों का एकत्र समूह होता है।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसकी रोज़ाना ज़िन्दगी समूह के बीच भाग लेने से सम्बन्धित होती है। सबसे प्रथम परिवार में, परिवार से बाहर निकल कर दूसरे समूहों के बीच वह शामिल हो जाता है। इस सामाजिक समूह के बीच व्यक्तियों की अर्थपूर्ण क्रियाएं पाई जाती हैं। व्यक्ति केवल इन समूहों के बीच सम्बन्ध स्थापित करने तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि अपनी आवश्यकताओं को भी पूर्ण करता है किन्तु प्रश्न यह है कि समूह के अर्थ क्या हैं ? एक आम आदमी के अर्थों से समाज शास्त्र के अर्थों में अन्तर है। साधारण व्यक्ति के लिए कुछ व्यक्तियों का एकत्र समूह है, पर समाजशास्त्र के लिए नहीं है। समाजशास्त्र में समूह में कुछ व्यक्तियों के बीच निश्चित सम्बन्ध होते हैं एवं उन सम्बन्धों का परिणाम भाईचारे व प्यार की भावना में निकलता है।

समूह की परिभाषाएं (Definitions of Group) –

  • बोगार्डस (Bogardus) के अनुसार, “एक सामाजिक समूह दो या दो से अधिक व्यक्तियों को कहते हैं जिनका ध्यान कुछ साझे लक्ष्यों पर होता है और जो एक-दूसरे को प्रेरणा देते हों, जिनमें साझी भावना हो और जो साझी क्रियाओं में शामिल हों।”
  • सैन्डर्सन (Sanderson) के अनुसार, “समूह दो या दो से अधिक सदस्यों की एकत्रता है जिसमें मनोवैज्ञानिक अन्तर्कार्यों का एक निश्चित ढंग पाया जाता है तथा अपने विशेष प्रकार के सामूहिक व्यवहार के कारण अपने सदस्यों व ज्यादातर दूसरों द्वारा भी इसको वास्तविक समझा जाता है।”
  • गिलिन और गिलिन (Gillin and Gillin) के अनुसार, “सामाजिक समूह की उत्पत्ति के लिए एक ऐसी परिस्थिति का होना अनिवार्य है जिससे सम्बन्धित व्यक्तियों में अर्थपूर्ण अन्तर उत्तेजना व अर्थपूर्ण प्रतिक्रिया हो सके जिसमें सामान्य उत्तेजनाएं व हितों पर सब का ध्यान केन्द्रित हो सके व कुछ सामान्य प्रवृत्तियों, प्रेरणाओं व भावनाओं का विकास हो सके।”

ऊपर दी गई परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि कुछ व्यक्तियों की एकत्रता, जो शारीरिक तौर पर तो नज़दीक हैं परन्तु वह एक-दूसरे के साझे हितों की प्राप्ति के लिए सहयोग नहीं करते व एक-दूसरे के आपसी अन्तक्रिया द्वारा प्रभावित नहीं करते, उन्हें समूह नहीं कह सकते। इसे केवल एकत्र या लोगों की भीड़ कहा जा सकता है। समाजशास्त्र में समूह उन व्यक्तियों के जोड़ या एकत्र को कहते हैं जो एक समान हों व जिसके सदस्यों में आपसी सामाजिक क्रिया-प्रतिक्रिया, सामाजिक सम्बन्ध, चेतनता, सामान्य हित, प्रेरक, स्वार्थ, उत्तेजनाएं व भावनाएं होती हैं।

इस तरह समूह के सदस्य एक-दूसरे से बन्धे रहते हैं व एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। सामाजिक समूह के बीच विचारों का आदान-प्रदान भी पाया जाता है। सामाजिक समूह के बीच शारीरिक नज़दीकी ही नहीं बल्कि साझे आकर्षण की चेतनता भी पाई जाती है। इसमें सामान्य हित व स्वार्थ भी होते हैं।

प्रश्न 2. प्राथमिक तथा द्वितीय समूहों का आप किस प्रकार वर्णन करोगे ?
उत्तर-प्राथमिक समूह (Primary Groups)-चार्ल्स कूले एक अमेरिकी समाजशास्त्री था जिसने प्राथमिक व सैकण्डरी समूहों के बीच सामाजिक समूहों का वर्गीकरण किया। प्रत्येक समाजशास्त्री ने किसी-न-किसी रूप में इस वर्गीकरण को स्वीकार किया है। प्राथमिक समूह में कूले ने बहुत ही नज़दीकी सम्बन्धों को शामिल किया है जैसे, आस-पड़ोस, परिवार, खेल समूह आदि। उसके अनुसार इन समूहों के बीच व्यक्ति के सम्बन्ध बहुत प्यार, आदर, हमदर्दी व सहयोग वाले होते हैं । व्यक्ति इन समूहों के बीच बिना झिझक के काम करता है। यह समूह स्वार्थ की भावना रहित होते हैं। इनमें ईर्ष्या, द्वेष वाले सम्बन्ध नहीं होते। व्यक्तिगत भावना के स्थान पर इनमें सामूहिक भावना होती है। व्यक्ति इन समूहों के बीच प्राथमिक आवश्यकताओं को पूरा करता है। चार्ल्स कूले (Charles Cooley) ने प्राथमिक समूह के बारे अपने निम्नलिखित विचार दिए हैं-

“प्राथमिक समूह से मेरा अर्थ उन समूहों से है जिनमें विशेषकर आमने-सामने के सम्बन्ध पाए जाते हैं। यह प्राथमिक कई अर्थों में हैं परन्तु मुख्य तौर से इस अर्थ में कि व्यक्ति के स्वभाव व आदर्श का निर्माण करने में मौलिक हैं। इन गहरे व सहयोगी सम्बन्धों के परिणामस्वरूप सदस्यों के व्यक्तित्व साझी पूर्णता में घुल-मिल जाते हैं ताकि कम-से-कम कई उद्देश्यों के लिए व्यक्ति का स्वयं ही समूह का साझा जीवन एक उद्देश्य बन जाता है। शायद इस पूर्णता को वर्णन करने का सबसे सरल तरीका है। इसको ‘हम’ समूह भी कहा जाता है। इसमें हमदर्दी व परस्पर पहचान की भावना लुप्त होती है एवं ‘हम’ इसका प्राकृतिक प्रकटीकरण है।”

चार्ल्स कूले के अनुसार प्राथमिक समूह कई अर्थों में प्राथमिक हैं। यह प्राथमिक इसलिए हैं कि यह व्यक्ति की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। व्यक्ति का समाज से सम्बन्ध भी इन्हीं द्वारा होता है। आमने-सामने के सम्बन्ध होने के कारण इनमें हमदर्दी, प्यार, सहयोग व निजीपन पाया जाता है। व्यक्ति आपस में इस प्रकार एकदूसरे से बन्धे होते हैं कि उनमें निजी स्वार्थ की भावना ही खत्म हो जाती है। छोटी-मोटी बातों को तो वह वैसे ही नज़र-अन्दाज़ कर देते हैं। आवश्यकता के समय यह एक-दूसरे की सहायता भी करते हैं। व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास के लिए भी यह महत्त्वपूर्ण है। कूले के अनुसार, “ये समूह लगभग सारे समय व विकास सभी स्तरों पर सर्वव्यापक रहे हैं। ये मानवीय स्वभाव व मानवीय आदर्शों में जो सर्वव्यापक अंश हैं, उसके मुख्य आधार हैं।” • चार्ल्स कूले ने प्राथमिक समूहों में निम्नलिखित तीन समूहों को महत्त्वपूर्ण बताया-

(1) परिवार (2) खेल समूह (3) पड़ोस
कूले के अनुसार यह तीनों समूह सर्वव्यापक हैं व समाज में प्रत्येक समय व प्रत्येक क्षेत्र से सम्बन्धित होते हैं। व्यक्ति जन्म के पश्चात् अपने आप जीवित नहीं रह सकता इसीलिए उसके पालन-पोषण के लिए परिवार ही प्रथम समूह है जिसमें व्यक्ति स्वयं को शामिल समझता है।

परिवार के बीच रह कर बच्चे का समाजीकरण होता है। बच्चा समाज में रहने के तौर-तरीके सीखता है अर्थात् प्राथमिक शिक्षा की प्रप्ति उससे परिवार में रह कर ही होती है। व्यक्ति अपनी संस्कृति, रीति-रिवाज, परम्पराओं इत्यादि को भी परिवार में रह कर ही प्राप्त करता है। परिवार में व्यक्ति के सम्बन्ध आमने-सामने वाले होते हैं व परस्पर सहयोग की भावना होती है। परिवार के बाद वह अपने आस-पड़ोस के साथ सम्बन्धित हो जाता है, क्योंकि घर से बाहर निकल कर वह आस-पड़ोस के सम्पर्क में आता है। इस प्रकार वह परिवार की भांति प्यार लेता है। उसको बड़ों का आदर करना या किसी से कैसे बात करनी चाहिए इत्यादि का पता लगता है। आस-पड़ोस के सम्पर्क में आने के पश्चात् वह खेल समूह में आ जाता है। खेल समूह में वह अपनी बराबरी की उम्र के बच्चों में आकर अपने आप को कुछ स्वतन्त्र समझने लग जाता है। खेल समूह में वह अपनी सामाजिक प्रवृत्तियों को रचनात्मक प्रकटीकरण देता है। अलग-अलग खेलों को खेलते हुए वह दूसरों से सहयोग करना भी सीख जाता है। खेल खेलते हुए वह कई नियमों की पालना भी करता है। इससे उसको अनुशासन में रहना भी आ जाता है। वह आप भी दूसरों के व्यवहार अनुसार काम करना सीख लेता है। इससे उसके चरित्र का भी निर्माण होता है। इन सभी समूहों के बीच आमने-सामने के सम्बन्ध व नज़दीकी सम्बन्ध होते हैं। इस कारण इन समूहों को प्राथमिक समूह कहा जाता है।

द्वितीय समूह (Secondary Groups)-चार्ल्स कूले ने दूसरे समूह में द्वितीय समूह का विस्तारपूर्वक वर्णन किया। आजकल के समाजों में व्यक्ति अपनी ज़रूरतों को प्राथमिक ग्रुप में ही रह कर पूरी नहीं कर सकता। उसे दूसरे व्यक्तियों पर भी निर्भर रहना पड़ता है। इसी कारण द्वितीय ग्रुप की आधुनिक समाज में प्रधानता है। इसी कारण प्राथमिक समूहों की महत्ता भी पहले से कम हो गई है। इन समूहों की जगह दूसरी अन्य संस्थाओं ने भी ले ली है। विशेषकर शहरी समाज में से तो प्राथमिक समूह एक तरह से अलोप हो ही गए हैं। यह समूह आकार में बड़े होते हैं व सदस्यों के आपस में ‘हम’ से सम्बन्ध होते हैं अर्थात् द्वितीय ग्रुप में प्रत्येक सदस्य अपना-अपना काम कर रहा होता है तो भी वह एक-दूसरे के साथ जुड़ा होता है।

इन समूहों के बीच सदस्यों के विशेष उद्देश्य होते हैं जिनकी पूर्ति आपसी सहयोग से हो सकती है। इन समूहों के बीच राष्ट्र, सभाएं, राजनीतिक पार्टियां, क्लब इत्यादि आ जाते हैं। इनका आकार भी बड़ा होता है। इनकी उत्पत्ति भी किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही होती है। इसी कारण इस समूह के सभी सदस्य एक-दूसरे को जानते नहीं होते।

द्वितीय समूह किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विकसित होते हैं। इनका आकार भी बड़ा होता है। व्यक्ति अपने स्वार्थ हित की पूर्ति के लिए इसमें दाखिल होता है अर्थात् इस समूह का सदस्य बनता है व उद्देश्य पूर्ति के पश्चात् इस समूह से अलग हो जाता है। इन समूहों के बीच सदस्यों के आपसी सम्बन्धों में भी बहुत गहराई दिखाई नहीं पड़ती क्योंकि आकार बड़ा होने से प्रत्येक सदस्य को निजी तौर से जानना भी मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा सदस्य के ऊपर गैर-औपचारिक साधनों के द्वारा नियन्त्रण भी होता है। प्रत्येक सदस्य को अपने व्यवहार को इन्हीं साधनों के द्वारा ही चलाना पड़ता है।

प्रश्न 3. समाज के सदस्य होने के नाते तुम अन्य समूहों के साथ अन्तर्किया करते हो। आप किस प्रकार इसे समाजशास्त्रीय परिपेक्षय के रूप में देखोगे ?
उत्तर-हम लोग समाज में रहते हैं तथा समाज में रहते हुए हम कई प्रकार के समूहों से अन्तक्रिया करते ही रहते हैं। अगर हम समाजशास्त्रीय परिप्रेक्षय से देखें तो हम इन्हें कई भागों में विभाजित कर सकते हैं। हम परिवार में रहते हैं, पड़ोस में अन्तक्रिया करते हैं, अपने दोस्तों के समूह के साथ बैठते हैं। यह समूह प्राथमिक होते हैं क्योंकि हम इन समूहों के सदस्यों के साथ प्रयत्क्ष रूप से अन्तर्किया करते हैं क्योंकि हम इनके साथ बैठना पसंद करते हैं। हम इन समूहों के स्थायी सदस्य होते हैं तथा सदस्यों के बीच अनौपचारिक संबंध होते हैं। इन समूहों का हमारे जीवन में काफी अधिक महत्त्व होता है क्योंकि इन समूहों के बिना व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता। व्यक्ति जहाँ मर्जी चला जाए, परिवार, पड़ोस तथा खेल समूह जैसे प्राथमिक समूह उसे प्रत्येक स्थान पर मिल जाएंगे। .
प्राथमिक समूहों के साथ-साथ व्यक्ति कुछ ऐसे समूहों का भी सदस्य होता है जिनकी सदस्यता ऐच्छिक होती है तथा व्यक्ति अपनी इच्छा से ही इनका सदस्य बनता है। ऐसे समूहों को द्वितीय समूह कहा जाता है। इस प्रकार के समूहों का एक औपचारिक संगठन होता है जिसके सदस्यों का चुनाव समय समय पर होता रहता है। व्यक्ति इन समूहों का सदस्य किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए बनता है तथा वह उद्देश्य प्राप्ति के पश्चात् इनकी सदस्यता छोड़ सकता है। राजनीतिक दल, ट्रेड यूनियन इत्यादि जैसे समूह इसकी उदाहरण हैं।

अगर कोई साधारण व्यक्ति अलग-अलग समूहों के साथ अन्तक्रिया करता है तो उसके लिए इन समूहों का कोई अलग-अलग अर्थ नहीं होगा परन्तु एक समाजशास्त्रीय परिप्रेक्षय से सभी प्रकार के समूहों को अलग अलग प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है। यहाँ तक कि अलग-अलग समाजशास्त्रियों ने भी इनके अलग-अलग प्रकार दिए हैं क्योंकि इनके साथ हमारा अन्तक्रिया करने का तरीका भी अलग-अलग होता है।

प्रश्न 4. ‘मानवीय जीवन सामाजिक जीवन होता है। उदाहरण सहित व्याख्या करो।
उत्तर- इसमें कोई शक नहीं है कि मनुष्य का जीवन सामूहिक जीवन होता है तथा वह समूह में ही पैदा होता तथा मरता है। जब एक बच्चा जन्म लेता है उस समय वह सबसे पहले परिवार नामक प्राथमिक समूह के सम्पर्क में आता है। मनुष्यों के बच्चे सभी जीवों के बच्चों में से सबसे अधिक समय के लिए अपने परिवार पर निर्भर करते हैं। परिवार अपने बच्चों को पालता-पोसता है तथा धीरे-धीरे उन्हें बड़ा करता है। जिस कारण उसे अपने परिवार के साथ सबसे अधिक प्यार तथा लगाव होता है। परिवार ही बच्चे का समाजीकरण करता है, उन्हें समाज में रहने के तरीके सिखाता है, उनकी शिक्षा का प्रबन्ध करता है, ताकि वह आगे चलकर समाज का अच्छा नागरिक बन सके। इस प्रकार परिवार नामक समूह व्यक्ति को सामूहिक जीवन का प्रथम पाठ पढ़ाता है।

परिवार के बाद बच्चा जिस समूह के सम्पर्क में आता है वह है पड़ोस तथा खेल समूह । छोटे से बच्चे को पड़ोस में लेकर जाया जाता है जहाँ परिवार के अतिरिक्त अन्य लोग भी बच्चे को प्यार करते हैं। बच्चे के ग़लत कार्य करने पर उसे डाँटा जाता है। इसके साथ-साथ बच्चा मोहल्ले के अन्य बच्चों के साथ मिलकर खेल समूह का निर्माण करता है तथा नए-नए नियम सीखता है। खेल समूह में रहकर ही बच्चे में नेता बनने के गुण पनप जाते हैं जोकि सामाजिक जीवन जीने के लिए आवश्यक हैं । यह दोनों समूह भी प्राथमिक समूह होते हैं।

जब बच्चा बड़ा हो जाता है वो यह कई प्रकार के समूहों का सदस्य बनता है जिन्हें द्वितीय समूह कहा जाता है। वह किसी दफ्तर में नौकरी करता है, किसी क्लब, संस्था या सभा का सदस्य बनता है ताकि कुछ उद्देश्यों की पूर्ति की जा सके। वह किसी राजनीतिक दल, ट्रेड यूनियन अथवा अन्य सभा की सदस्यता भी ग्रहण करता है जिससे पता चलता है कि वह जीवन में प्रत्येक समय किसी न किसी समूह का सदस्य बना रहता है। वह अपनी मृत्यु तक बहुत से समूहों का सदस्य बनता रहता है तथा उनकी सदस्यता छोड़ता रहता है।

इस प्रकार ऊपर लिखित व्याख्याओं को देखकर हम कह सकते हैं कि मानवीय जीवन का कोई ऐसा पक्ष नहीं है जब वह किसी न किसी समूह का सदस्य नहीं होता। इस प्रकार मनुष्य का जीवन सामूहिक जीवन होता है तथा समूहों के बिना उसके जीवन का कोई अस्तित्व ही नहीं है।

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