Class 11 Sociology Solutions Chapter 6 समाजीकरण

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (Textual Questions)

I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1-15 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. समाजीकरण से आप क्या समझते हो ?
उत्तर-वह प्रक्रिया जिसके द्वारा व्यक्ति समाज में रहने के तथा जीवन जीने के तरीके सीखता है।

प्रश्न 2. समाजीकरण के स्तरों के नाम लिखो।
उत्तर-बाल अवस्था, शैशवास्था, किशोरावस्था, युवावस्था तथा वृद्धावस्था।

प्रश्न 3. किशोरावस्था क्या है ?
उत्तर-वह अवस्था जो 12-13 वर्ष से शुरू होकर 18-19 वर्ष तक चलती है तथा व्यक्ति में शारीरिक परिवर्तन आते हैं।

प्रश्न 4. शिशु अवस्था क्या है ?
उत्तर-वह अवस्था जो पैदा होने से शुरू होकर एक-डेढ़ वर्ष तक चलती है तथा बच्चा अपनी आवश्यकताओं के लिए अन्य लोगों पर निर्भर होता है।

प्रश्न 5. समाजीकरण की प्राथमिक अभिकरण (संस्थाएं) कौन-सी हैं ?
उत्तर-परिवार, स्कूल तथा खेल समूह समाजीकरण के प्राथमिक साधन हैं।

प्रश्न 6. समाजीकरण की औपचारिक संस्था के दो उदाहरण लिखो।
उत्तर-सरकार, न्यायालय, कानून, राजनीतिक व्यवस्था इत्यादि।

प्रश्न 7. समाजीकरण की अनौपचारिक संस्था के दो उदाहरण लिखो।
उत्तर-परिवार, संस्थाएं, धर्म, खेल-समूह इत्यादि।

II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30-35 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. समाजीकरण को परिभाषित कीजिए।
उत्तर-बोर्गाडस (Bogardus) के अनुसार, “समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति मानवीय कल्याण के लिए निश्चित रूप से मिलकर व्यवहार करना सीखते हैं तथा ऐसा करने से वह आत्मनियन्त्रण, सामाजिक उत्तरदायित्व तथा संतुलित व्यक्तित्व का अनुभव करते हैं।”

प्रश्न 2. समाजीकरण के स्तरों को लिखिए।
उत्तर-

  • शिशु अवस्था (Infancy)
  • बचपन अवस्था (Childhood stage)
  • किशोरावस्था (Adolescent stage)
  • युवावस्था (Adulthood stage)
  • वृद्धावस्था (Old age)।

प्रश्न 3. समाजीकरण की प्रक्रिया में परिवार की भूमिका पर विचार-विमर्श करो।
उत्तर-व्यक्ति के समाजीकरण में परिवार का विशेष स्थान है। बच्चे के अचेतन मन पर जो प्रभाव परिवार का पड़ता है वह किसी और का नहीं पड़ता है। परिवार में बच्चा कई प्रकार की भावनाओं जैसे कि प्यार, हमदर्दी इत्यादि सीखता है। परिवार ही बच्चे को परंपराएं, रीति-रिवाज, कीमतें, रहने-सहने के तरीके सिखाता है जिससे उसका समाजीकरण होता है।

प्रश्न 4. समाजीकरण की तीन औपचारिक संस्थाएं लिखो।
उत्तर-पुलिस, कानून और राजनीतिक व्यवस्था समाजीकरण के तीन औपचारिक साधन हैं। अगर कोई व्यक्ति अपराध करता है तो पुलिस उसे पकड़ लेती है। फिर कानूनों की सहायता से उस व्यक्ति को कठोर सज़ा दी जाती है। हमारी राजनीतिक व्यवस्था कठोर कानूनों का निर्माण करती है ताकि व्यक्ति अपराध न करें। इस प्रकार इनसे डर कर व्यक्ति अपराध नहीं करता और उसका समाजीकरण हो जाता है।

प्रश्न 5. प्राथमिक समाजीकरण को संक्षिप्त रूप में लिखो।
उत्तर-परिवार तथा खेल समूह व्यक्ति का प्राथमिक समाजीकरण करते हैं। परिवार में रह कर बच्चा समाज में रहने के, जीवन जीने के तौर-तरीके सीखता है तथा समाज का अच्छा नागरिक बनता है। खेल समूह में रहकर उसे पता चलता है कि उसकी तरह अन्य बच्चे भी हैं तथा उनका ध्यान भी रखना पड़ता है। इस तरह उसका समाजीकरण होता रहता है।

प्रश्न 6. मास मीडिया समाजीकरण की संस्था है चर्चा करो।
उत्तर-आजकल व्यक्ति के जीवन में मास मीडिया का महत्त्व काफ़ी बढ़ गया है। अलग-अलग समाचार-पत्र, खबरों के चैनल लगातार 24 घण्टे चलते रहते हैं तथा हमें अलग-अलग प्रकार की जानकारी देते हैं। इनसे हमें संसार में होने वाली घटनाओं के बारे में पता चलता रहता है जिससे उसका समाजीकरण होता रहता है।

III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 75-85 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. समाजीकरण की विशेषताओं पर विचार-विमर्श कीजिए।
उत्तर-

  • समाजीकरण की प्रक्रिया एक सर्वव्यापक प्रक्रिया है जो प्रत्येक समाज में एक जैसे रूप में ही मौजूद है।
  • समाजीकरण की प्रक्रिया एक सीखने वाली प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति तमाम आयु सीखता रहता है।
  • समाजीकरण की प्रक्रिया के अलग-अलग स्तर होते हैं तथा इसके अलग-अलग स्तरों में सीखने की प्रक्रिया भी अलग-अलग होती है।
  • जवान होने के पश्चात् समाजीकरण की प्रक्रिया में सीखने की प्रक्रिया कम हो जाती है परन्तु यह मृत्यु तक चलती रहती है।
  • समाजीकरण के बहुत से साधन होते हैं परन्तु परिवार सबसे महत्त्वपूर्ण साधन होते हैं जो उसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

प्रश्न 2. समाजीकरण में क्रीड़ा समूह की महत्ता क्या है ?
उत्तर-परिवार के बाद समाजीकरण के साधन के रूप में क्रीड़ा समूह की बारी आती है। बच्चा घर से बाहर निकलकर अपने मित्रों के साथ खेलने जाता है तथा क्रीड़ा समूह बनाता है। खेल समूह में ही बच्चे की सामाजिक शिक्षा शुरू हो जाती है। यहाँ वह सब कुछ सीखता है जो वह परिवार में नहीं सीख सकता। यहाँ उसे अपनी इच्छाओं का त्याग करना पड़ता है तथा उसे पता चल जाता है कि उसकी तरह अन्य लोगों की भी इच्छाएं होती हैं। खेल समूह में समानता वाले संबंध होते हैं। इसलिए जब वह क्रीड़ा समूह में भाग लेता है तो वह वहाँ अनुमान तथा . सहयोग सीखता है। यह उसके भविष्य पर प्रभाव डालते हैं। यहाँ उसमें नेता जैसे गुण उत्पन्न हो जाते हैं। खेलते समय बच्चे लड़ते भी हैं। साथ ही वह दूसरों के अधिकारों की रक्षा करना भी सीखते हैं। इस प्रकार समाजीकरण में खेल समूह का काफ़ी महत्त्व है।

प्रश्न 3. युवावस्था तथा वृद्धावस्था में समाजीकरण की प्रक्रिया को दर्शाइए।
उत्तर-युवावस्था-समाजीकरण की प्रक्रिया में इस स्तर का काफ़ी महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस अवस्था में वह दूसरों के साथ अनुकूलन करना सीखता है। यहाँ उसके आगे जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न पेशा ढूंढ़ना होता है। पेशा ढूंढ़ते समय इसे कई स्थानों पर नकार दिया जाता है परन्तु वह हार नहीं मानता तथा लगातार प्रयास करता है। इससे वह काफ़ी कुछ सीखता है। विवाह तथा बच्चे होने के पश्चात् उसकी भूमिकाएं बदल जाती हैं जो उसे काफी कुछ सिखाती हैं।

वृद्धावस्था-इस अवस्था में आकर उसे जीवन के नए पाठ सीखने पड़ते हैं। उसे पता चल जाता है कि अब वह अपने परिवार पर निर्भर है, उसे कई प्रकार की बीमारियां लग जाती हैं तथा उसे जीवन से नए ढंग से अनुकूलन करना सीखना पड़ता है। उसे अपने बच्चों के अनुसार जीवन व्यतीत करना पड़ता है जिससे कई प्रकार की समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं तथा वह इनसे तालमेल बिठाने का प्रयास करता रहता है।

IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 250-300 शब्दों में दें:

प्रश्न 1. समाजीकरण की प्रक्रिया के द्वारा एक व्यक्ति के विकास पर विचार-विमर्श कीजिए।
उत्तर-व्यक्ति समाज में रहने के योग्य कैसे बनता के यह लोगों एवं पदार्थों के सम्पर्क में आने से बनता है। जब एक बच्चा पैदा होता है तो उसमें कोई भी सामाजिक कार्य करने की योग्यता नहीं होती और वह अपने आसपास की वस्तुओं के प्रति अनजान सा होता है। परन्तु धीरे-धीरे वह अपने आस-पास की वस्तुओं की तरफ़ ध्यान देने लग पड़ता है। बच्चा आरम्भ में जिन व्यक्तियों के द्वारा घिरा रहता है उन्हीं के कारण ही सामाजिक व्यक्ति बन जाता है क्योंकि यही उसके आस-पास के व्यक्ति उसको रहने-सहने के बारे में सिखाते हैं और रहन-सहन के नियम बताते हैं। वह दूसरों का अनुसरण करता है और अपने एवं दूसरों के कार्यों की तुलना करता है।

धीरे-धीरे अपने अनुभव से वह सीखता है कि अन्य लोग भी उसी की तरह हैं और अपनी भावनाएं एवं आनन्द दूसरों को दिखाता है। यह वह उस समय करता है जब उसको महसूस होता है कि अन्यों की भी उस की तरह ही भावनाएं हैं। इस तरह जब वह इधर-उधर घूमने लगता है तो वह प्रत्येक वस्तु जो उसको सामने आती है को जानने की कोशिश करता है कि वह क्या है? और क्यों है इस तरह माता-पिता इशारों से बच्चों को अवस्थाओं के बारे में समझाते हैं कि वह चीज़ गलत है और वह चीज़ ठीक है। धीरे-धीरे बच्चे को मन्दिर जाना, स्कूल जाना, शिक्षा आदि के बारे में बताया जाता है उसको स्कूल भेजा जाता है, जहां पर वह अन्य अवस्थाओं के बारे में अनुकूलन करना सीखता है और ज़िन्दगी के प्रत्येक उस तरीके को सीखता है, जो उसके जीवन जीने के लिये आवश्यक हैं। इस तरह समाज में एक सदस्य धीरे-धीरे बड़ा होकर समाज के नियमों को सीखता है।

बच्चे का सबसे पहला सम्बन्ध अपने परिवार के साथ होता है। पैदा होने के बाद उसकी सबसे पहली आवश्यकता उसकी भौतिक आवश्यकताएं, भूख, प्यास इत्यादि होती हैं। उसकी रुचि अपनी मां में सबसे अधिक होती है क्योंकि वह उसकी भौतिक आवश्यकताएं पूरी करती है। मां के पश्चात् ही परिवार के अन्य सदस्य पिता, भाई, बहन, चाचा-चाची, दादा-दादी आते हैं। ये सभी सदस्य उसको संसार के बारे में बताते हैं जिसमें उसको अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत करना होता है और परिवार में ही रहकर उसे प्यार, शक्ति, अधिकार आदि वस्तुओं का अनुभव होता है क्योंकि यह सब कुछ उसे परिवार में ही मिलता है।

आरम्भ में बच्चे को जो भी कुछ चीज़ उसे पसन्द होती है वह उसे प्राप्त करना चाहता है क्योंकि वह उस पर अपना अधिकार समझता है। वस्तुएं न मिलने पर वह रोता है और ज़िद्द भी करता है। दो या तीन वर्ष की आयु में आते-आते उसे समझ आने लग जाती है कि जिन वस्तुओं पर वह अधिकार समझता है वह किसी और की भी हो सकती हैं और वह उसको प्राप्त नहीं कर सकता। वह मनमानी करने की कोशिश भी करता है तो उसकी माता उसे शुरू में मना करती है। आरम्भ में वस्तुओं की प्राप्ति न होने से उसे निराशा अनुभव होती है। परन्तु धीरेधीरे वह अपनी निराशा पर नियन्त्रण रखने लगता है। बच्चा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए परिवार पर निर्भर करता है जिनके लिए उसे अपने परिवार का सहयोग प्राप्त करना आवश्यक होता है। उनका सहयोग उसे स्वयं नियंत्रण से ही प्राप्त हो जाता है और वह समाज के प्रतिमानों, परिमापों का आदर करना सीखता है जो कि उसके लिये समाज में रहने एवं व्यवहार करने के लिये आवश्यक है।

जब व्यक्ति का विकास होता है तो वह समाज के तौर तरीके, शिष्टाचार, बोल-चाल, उठने-बैठने एवं व्यवहार करने के तरीके सीखता है। इसके साथ ही उसके स्वैः (Self) का विकास होता है। जब व्यक्ति अपने कार्यों के प्रति चेतन हो जाता है तो इसे चेतना का स्वैः (Self) कहते हैं। आरम्भ में वह अपने एवं पराये में भेदभाव नहीं समझता, क्योंकि उसे दुनियादारी व रिश्तों का पता नहीं होता। परन्तु धीरे-धीरे जब वह अन्यों एवं परिवार के अन्य सदस्यों के साथ अन्तक्रिया करता है तो इस बारे में भी सीख जाता है। परिवार के सदस्यों के पश्चात् उसके अन्य साथी या मित्र मिलते हैं। यह मित्र अलग-अलग अवस्थाओं में पलकर बड़े हुए होते हैं। इन सभी साथियों के भिन्नभिन्न आदर्श होते हैं और बच्चा धीरे-धीरे इनको सीखता है और कठिन अवस्थाओं से तालमेल करता है जोकि समाजीकरण की ही एक प्रक्रिया का नाम है। यहां पर बच्चे की ज़िन्दगी में एक अन्य महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आता है, जब वह स्कूल में पढ़ने के लिये जाता है। स्कूल में उसके ऊपर अन्य विद्यार्थियों एवं अध्यापकों के आचरण का प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार वह कॉलेज के प्रोफ़ैसरों से नौजवान लड़के एवं लड़कियों से उठना बैठना, विचार करना, व्यवहार करने के तरीके सीखता है जो कि उसकी आगे की ज़िन्दगी के लिये आवश्यक हैं।

कॉलेज के बाद व्यवसाय, विवाह इत्यादि के साथ उसका समाजीकरण होता है जो इस कार्य में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पति पत्नी का एक-दूसरे के व्यक्तित्व पर काफ़ी प्रभाव पड़ता है। विवाहोपरान्त व्यक्ति को कई नई जिम्मेदारियां जैसे-पति और पिता की देखभाल करनी पड़ती है। यह नयी जिम्मेदारियां उसे काफ़ी कुछ सिखाती हैं। इस प्रकार समाजीकरण की प्रक्रिया उसके जन्म से लेकर मृत्यु तक चलती रहती है। व्यक्ति यद्यपि मर जाता है, परन्तु समाजीकरण की प्रक्रिया समाप्त नहीं होती।

प्रश्न 2. समाजीकरण के विभिन्न स्तरों के बारे में लिखिए।
उत्तर-समाजीकरण की प्रक्रिया काफ़ी व्यापक होती है। यह बच्चे के जन्म से ही आरम्भ हो जाती है। बच्चा जब जन्म लेता है तो वह पशु से अधिक कुछ नहीं होता है। क्योंकि उसे समाज के तौर-तरीकों का ज्ञान नहीं होता है। परन्तु जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसकी समाजीकरण की प्रक्रिया भी साथ-साथ चलती रहती है और वह सामाजिक जीवन के अनुसार ढलता रहता है। वह समाज के आदर्शों, कीमतों, परिमापों, नियमों, विश्वासों एवं प्रेरणाओं को ग्रहण करता रहता है। बच्चा जब जन्म लेता है तो उसमें सहज प्रवृत्ति होती है। परन्तु समाज के सम्पर्क में आने के पश्चात् वह प्रवृत्तियां आदतों में परिवर्तित हो जाती हैं। यह सब कुछ अलग-अलग समय पर होता है। समाजीकरण के अलग-अलग समय पर अलग-अलग स्तर होते हैं जो इस प्रकार हैं-

  1. शिशु अवस्था (Infant Stage)
  2. बचपन अवस्था (Childhood Stage)
  3. किशोरावस्था (Adolescent Stage)
  4. युवावस्था (Adulthood Stage) 5. वृद्धावस्था (Old Age)

1. शिशु अवस्था (Infant Stage)—पहली अवस्था की व्याख्या करते हुए जानसन ने कहा है कि ये अवस्था बच्चे के जन्म से लेकर डेढ़ साल तक ही होती है। इस अवस्था में बच्चा न तो बोल सकता है और न ही चलफिर सकता है। इसके अतिरिक्त वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति भी स्वयं नहीं कर सकता। उसको अपनी मां पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यह अवस्था ऐसी अवस्था होती है कि वह वस्तुओं का विभेदीकरण नहीं कर सकता। भूख, प्यास आदि की आवश्यकता के लिए वह अपने परिवार के सदस्यों पर निर्भर रहता है। जो भी वस्तु उसे अच्छी लगती है वह उस पर नियन्त्रण रखना चाहता है और अधिकार समझता है। पारसन्स ने भी इस अवस्था को आरम्भिक पहचान की अवस्था कहा है। अधिकांश तौर पर वह अपनी मां को पूर्ण तौर पर पहचान लेता है और उसके सम्पर्क में खुशी और आनन्द प्राप्त करता है। उसकी काल्पनिक और वास्तविक अवस्था में कोई अन्तर नहीं होता।

2. बचपन अवस्था (Childhood Stage)-यह अवस्था डेढ़ साल से 12-13 साल तक चलती है। बच्चा इस अवस्था में अच्छी तरह बोलना व चलना सीख लेता है। कुछ सीमा तक वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं करने लग पड़ता है। 2 साल की आयु तक पहुंचते-पहुंचते वह समझने लग पड़ता है कि उसके अतिरिक्त अन्य बच्चों के भी अधिकार हैं और वह जितनी भी कोशिश कर ले सभी वस्तुओं को प्राप्त नहीं कर सकता। अपनी इच्छाओं की पूर्ति न होने पर उसे बार-बार निराशा होती है। इस निराशा के कारण ही वह अपने ऊपर नियन्त्रण रखना सीख जाता है। इस समय में उसे सज़ा और इनाम देकर अच्छी आदतें डालने की कोशिश की जाती है। इस समय में वह प्यार की कीमतें सीख जाता है और अपने परिवार के सदस्यों का अनुकरण करने लग पड़ता है।

इस अवस्था में बच्चा कुछ-कुछ कार्य स्वयं करने लग जाता है। उदाहरण के तौर पर बच्चा जब मलमूत्र करता है या तो वह पहले बता देता है या फिर बाद में इस बारे में सफ़ाई की ओर इशारा करने लग पड़ता है। कई बार ज़ोर से रोने भी लग जाता है। इस अवस्था में वह बोलने भी लग पड़ता है और चलने भी। वह अपनी इच्छाओं पर भी नियन्त्रण रखने लग जाता है। इस अवस्था में इनाम एवं सज़ा (Reward & Punishment) आदि के द्वारा बच्चे को अच्छी आदतों को ग्रहण करने की सीख दी जाती है। उदाहरण के लिए जब बच्चा माता-पिता की आवाज़ सुनकर उनके कहने के अनुसार कार्य करता है तो माता-पिता प्रसन्न होकर उसे इनाम भी देते हैं और कहते हैं कि कितना अच्छा बच्चा है।

दूसरी तरफ़ जब वह कोई गलत कार्य करता है तो उसे गुस्सा किया जाता है और कई बार थप्पड़ भी लग जाता है। इस अवस्था में वह अपने परिवार की कीमतों को ग्रहण करना आरम्भ कर देता है। उसके ऊपर परिवार के दूसरे सदस्यों का भी प्रभाव पड़ने लग जाता है। वह परिवार की कई बातें तो स्वाभाविक रूप में ही सीख जाता है। इसमें वह प्यार लेना एवं प्यार देना भी सीख जाता है। कुछ बातें तो वह नकल करके भी सीख जाता है। नकल करना उसके लिये मनोरंजन का साधन होता है। जैसे वह अपने पिता को अखबार पढ़ते हुए देखता है तो वह स्वयं भी अखबार पढ़ने लग जाता है। इस अवस्था में वह परिवार के विभिन्न सदस्यों को जैसे करते हुए देखता है वह भी उनकी तरह व्यवहार करने लग जाता है। ‘पारसन्स’ ने इस अवस्था को ‘दोहरा कार्य ग्रहण’ करने का भी नाम दिया है। इस अवस्था में बच्चे के अन्दरूनी गुणों का विकास होने लग जाता है व इस प्रकार बच्चे के द्वारा ठीक एवं गलत कार्यों की पहचान करनी भी आरम्भ हो जाती है।’

3. किशोरावस्था (Adolescence)—यह अवस्था 14-15 साल से लेकर 20-21 वर्ष तक चलती है। इस आयु में पहुंचने पर माता-पिता का बच्चों पर नियन्त्रण नहीं रहता क्योंकि बच्चों को भी लगता है कि उन्हें और अधिक स्वतन्त्रता की आवश्यकता है और वह और अधिक स्वतन्त्रता की मांग भी करते हैं। अब उनके अंग विकसित होने लग जाते हैं और इनके अंगों के विकसित होने पर उनमें नयी भावनाएं उत्पन्न होती हैं और व्यवहार के नये ढंग सीखते पड़ते हैं। लड़कियों के लिये यह आवश्यक होता है कि लड़कों से कुछ दूरी पर रहें। दूसरे लिंग के प्रति भी उन्हें पुनः तालमेल की आवश्यकता होती है। इसके साथ-साथ उन्हें यौन, प्यार कीमतों एवं विश्वास आदि के नियमों को सिखाया जाता है। उन पर अधिक ध्यान दिया जाने लगता है जिस कारण उनमें विद्रोह की भावना भी पैदा हो जाती है। उनके अन्दर तेज़ मानसिक संघर्ष चलता रहता है। इस संघर्ष से लड़ते हुए वह आत्म नियन्त्रण करना सीखता है।

4. युवावस्था (Adulthood Stage)-इस अवस्था में व्यक्ति का सामाजिक दायरा किशोरावस्था से काफ़ी बड़ा हो जाता है। व्यक्ति कोई न कोई कार्य करने लग जाता है। यह भी हो सकता है कि वह किसी सामाजिक समूह राजनीतिक दल, क्लब, ट्रेड यूनियन का सदस्य बन जाए। इस अवस्था में उसका विवाह हो जाता है तथा उसके माता-पिता, मित्र, पड़ोसियों के अतिरिक्त वह अपनी पत्नी के साथ भी रिश्ते बनाता है। पत्नी के परिवार के साथ भी तालमेल बिठाना पड़ता है। अब वह किसी पर निर्भर नहीं है बल्कि वह एक ज़िम्मेदार व्यक्ति बन गया है। उसे अलग-अलग प्रकार की भूमिकाएं निभानी पड़ती हैं जैसे कि पति/पत्नी, माता/पिता, घर का मुखिया व देश का नागरिक। उससे एक विशेष प्रकार की भूमिका निभाने की आशा की जाती है तथा वह निभाता भी है जिससे समाजीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ती रहती है।

5. वृद्धावस्था (Old Age)-एक उम्रदराज व्यक्ति का जीवन काफ़ी हद तक वातावरण, पेशे, मित्रों तथा कई समूहों की सदस्यता से प्रभावित होता है। उसमें बहुत-सी कीमतों का आत्मसात (internalised) होता है तथा उसे उनसे तालमेल बिठाना सीखना पड़ता है क्योंकि अब वह अधिक शक्तिशाली नहीं रहा है। उसे कई भूमिकाएं मिल जाती हैं जैसे कि सास/ससुर, दादा/दादी, नाना/नानी, रिटायर व्यक्ति इत्यादि। उसे नई परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाना सीखना पड़ता है तथा समाजीकरण की प्रक्रिया चलती रहती है।

प्रश्न 3. समाजीकरण की संस्थाओं को विस्तृत रूप में लिखो।
उत्तर-1. परिवार (Family)—व्यक्ति के समाजीकरण में परिवार का विशेष स्थान है। कुछ प्रसिद्ध समाज शास्त्रियों के अनुसार एक बच्चे का मन अचेतन अवस्था में होता है और उस अचेतन मन पर जो प्रभाव परिवार का पड़ता है वह किसी और का नहीं पड़ सकता है। इसी प्रभाव के परिणामस्वरूप ही बच्चे के व्यक्तित्व पर और भविष्य पर भी प्रभाव पड़ता है। बचपन में बच्चे का मन इस तरह का होता है कि उसे जिधर भी चाहो मोड़ा जा सकता है। उसके इस कच्चे मन पर प्रत्येक वस्तु का प्रभाव पड़ता है। बच्चे के व्यक्तित्व पर माता-पिता का काफ़ी प्रभाव पड़ता है। यदि माता-पिता का बच्चे पर नियन्त्रण काफ़ी सख्त होगा तो बच्चा बड़ा होकर नियंत्रण से बाहर हो सकता है और यदि बच्चे को काफ़ी लाड-प्यार दिया जाएगा तो वह उसके बिगड़ जाने के अवसर काफ़ी हो जाएगा और यदि बच्चे को माता-पिता का प्यार न मिले तो उसके व्यक्तित्व के असन्तुलन का खतरा अधिक होता है।

बच्चे की आरम्भिक शिक्षा का आधार परिवार ही होता है। परिवार में ही बच्चे के मन के ऊपर कई प्रकार की भावनाएं, जैसे प्यार और हमदर्दी का प्रभाव पड़ता है और वह इस प्रकार के कई गुणों को सीखता है। परिवार ही बच्चे को समाज की तथा परिवार की परम्पराओं, रीति-रिवाज, परिमापों एवं कीमतों के बारे में बताता है। बच्चे को परिवार में ही व्यवहार के तरीकों एवं नियमों इत्यादि की शिक्षा दी जाती है। परिवार के बीच में रहकर बच्चा बड़ों का आदर करना और कहना मानना सीखता है। यदि बच्चे के ऊपर माता-पिता का नियन्त्रण है तो इसका अर्थ है व्यक्ति के ऊपर समाज का नियन्त्रण है क्योंकि बच्चे के समाजीकरण के समय बच्चे के माता-पिता ही समाज के प्रतिनिधि होते हैं। परिवार में तो बच्चा कई प्रकार के गुणों को सीखता है जिसके साथ वह समाज या देश का एक ज़िम्मेदार नागरिक बनता है। परिवार में ही बच्चे को अपने विचार प्रकट करने और व्यक्तित्व के विकास करने का अवसर मिलता है।

आरम्भिक काल में बच्चा जो कुछ भी देखता है उसकी ही नकल करनी आरम्भ कर देता है। इस कारण यह परिवार पर ही आधारित होता है कि वह बच्चे को सही दिशा की तरफ ले जाए। कई मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, परिवार का प्रभाव बच्चे के अचेतन मन पर काफ़ी अधिक पड़ता है और इसका प्रभाव उसके भविष्य पर पड़ने लग जाता है। उदाहरण के लिये यदि माता-पिता के बीच परिवार में लड़ाई-झगड़ा होता रहता है तो उसका प्रभाव बच्चे के मन पर पड़ता है और वह उनका प्यार नहीं प्राप्त कर सकता। यदि कोई परिवार तलाक या अन्य किन्हीं कारणों से टूट जाते हैं तो इसका प्रभाव बच्चों पर पड़ता है और वह मनोवैज्ञानिक तौर पर तनावपूर्ण रहते हैं। प्यार के दृष्टिकोण से भी वह वंचित रह जाता है। कई बार तो शारीरिक विकास के ऊपर भी इसका प्रभाव पड़ता है। हमदर्दी, प्यार व सहयोग इत्यादि के गुणों से वह दूर हो जाता है क्योंकि परिवार के गुणों के आधार पर ही वह समाज का सदस्य बनता है। इसलिये टूटे हुए परिवारों में इन गुणों की प्राप्ति असम्भव हो जाती है।

इस तरह हम कह सकते हैं कि परिवार ही व्यक्ति के चरित्र एवं व्यक्तित्व का निर्माण करता है। इस तरह समाजीकरण में परिवार का सबसे अधिक महत्त्व होता है।

2. खेल समूह (Play Group)- परिवार के पश्चात् खेल समूह की समाजीकरण के साधन के रूप में बारी आती है। बच्चा अपने परिवार के घेरे में से निकल कर अपने साथियों के साथ खेलने जाता है और खेल समूह बनाता है। खेल समूह में ही बच्चे की सामाजिक शिक्षा आरम्भ हो जाती है। खेल समूह में रह कर बच्चा. वह सब कुछ सीखता है जो वह परिवार में रह कर नहीं सीख सकता। खेल समूह में रह कर वह अपनी इच्छाओं का त्याग करता है और उसे पता चलता है कि उसके अतिरिक्त अन्य बच्चों की भी इच्छाएं होती हैं। इसके अतिरिक्त खेल समूह में सम्बन्ध समानता पर ही आधारित होते हैं। इसलिये बच्चा जब खेल समूह में भाग लेता है तो वह वहां पर अनुशासन एवं सहयोग सीखता है।

यह उसके भविष्य में प्रभाव डालते हैं। इसके साथ हो खेल समूह में ही व्यक्ति में नेता के गुण पैदा होते हैं। खेलते समय बच्चे एक दूसरे के साथ लड़ते-झगड़ते हैं। साथ-साथ अपने और दूसरों के अधिकारों की रक्षा करने के सिद्धान्त को सीखते हैं। यहां पर आकर बच्चे को अपनी भूमिका की योग्यता व अयोग्यता का भी पता चलता है। खेल समूह में ही योग्यता एवं भावनाओं को बच्चा ग्रहण करता है। संक्षेप में बच्चे के बिगड़ने एवं बनने में खेल समूह का काफ़ी बड़ा हाथ होता है। यदि खेल समूह अच्छा है तो बच्चा अच्छा बन जाता है और यदि खेल समूह बुरा है तो उसके बुरे होने की सम्भावना अधिक है।

इस प्रकार खेल समूह का स्वस्थ होना, व्यक्ति के समाजीकरण के लिये आवश्यक होता है। विद्वानों के अनुसार खेल समूह की इतनी महत्ता होती है कि यह व्यक्ति को निम्न स्तर से उच्च स्तर तक उठा लेता है और दूसरी तरफ ऊपर से निम्न स्थिति की तरफ ले जाता है। इसलिये जहां बच्चे में प्यार, हमदर्दी, सहयोग, समानता इत्यादि के गुण पैदा होते हैं वहीं दूसरी तरफ असन्तुलित खेल समूह बच्चे को अपराधों, चोर, शराबी, जुआरी इत्यादि तक बना देता है क्योंकि जो कुछ वह अपने परिवार से नहीं सीख पाता वह सीखने के लिए खेल समूह पर निर्भर रहता है।

3. पड़ोसी (Neibourhood)- व्यक्ति का पड़ोस भी समाजीकरण का एक बहुत बड़ा साधन होता है जब बच्चा परिवार के हाथों से निकल कर पड़ोसियों के पास चला जाता है तो उसे यह पता चलता है कि उसने अन्य लोगों से किस प्रकार का व्यवहार करना है क्योंकि यदि परिवार में रह कर वह गलत व्यवहार करे तो उसको मज़ाक समझ कर टाल दिया जाता है। परन्तु यदि यह व्यवहार वह बाहर करता है तो उसके व्यवहार का बुरा मनाया जाता हैं। पड़ोस के लोगों के साथ उसे लगातार अनुकूलन करके रहना पड़ता है क्योंकि पड़ोस में उसके गलत व्यवहार को सहन नहीं किया जाता। पड़ोस के लोगों के साथ अनुकूलन बनाकर रहना पड़ता है। यही अनुकूलन उसे सम्पूर्ण ज़िन्दगी काम आता है और पता लगता है कि उसने विभिन्न अवस्थाओं में कैसे अनुकूलन करना है। पड़ोस के लोगों के साथ जब वह अन्तःक्रिया करता है तो समाज के नियमों के अनुसार कैसे अनुकूलन करना है यह सीखता है।

4. स्कूल (School)- इसके बाद बारी आती है स्कूल की जो एक असभ्य बच्चे को सभ्य बच्चे का रूप देता है या फिर आप कह सकते हैं कि कच्चे माल को तैयार माल का रूप देता है। स्कूल में ही बच्चे के गुणों का विकास होता है। स्कूल में बच्चा अन्य विद्यार्थियों के संग रहता है और विभिन्न प्रकार के अध्यापकों का भी उसके मन पर काफ़ी प्रभाव पड़ता है। अध्यापक के बोलने, उठने, बैठने, व्यवहार करने, पढ़ाने के तरीकों का उसके मन पर काफ़ी प्रभाव पड़ता है। परन्तु यहां पर एक बात ध्यान देने योग्य होती है कि किसी बच्चे के ऊपर किसी अध्यापक का प्रभाव पड़ता है और कई बच्चे तो अध्यापकों को ही अपना आदर्श मानने लग जाते हैं और उनके अपने व्यक्तित्व पर इसका काफ़ी प्रभाव पड़ता है।

अध्यापक के अतिरिक्त अन्य बच्चे भी उस बच्चे का समाजीकरण करते हैं। उनके साथ रहते हुए उसे कई पद एवं रोल मिलते हैं जो उसको अगले जीवन में काफ़ी मदद करते हैं और बच्चों के साथ बैठने से उनके व्यक्तित्व पर काफ़ी प्रभाव पड़ता है। स्कूल में जाने के साथ बच्चे के खेल समूह और अन्तक्रियाओं का दायरा काफ़ी बढ़ जाता है क्योंकि उसको कई तरह के बच्चे मिलते हैं। स्कूल में बच्चा कई प्रकार के नियम, अनुशासन, परम्पराओं, विषय आदि सीखते हैं जो उसको उसके भविष्य के जीवन में काम आते हैं।

व्यक्ति के व्यक्तित्व पर जहां अध्यापक का प्रभाव पड़ता है। वहां पर उसके आस पड़ोस के लोगों के विचारों का भी प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त सहयोग की भावना भी बढ़ती है। बच्चे एक दूसरे के साथ मिलकर रहते हैं। लड़के एवं लड़कियों के इकट्ठे एक स्कूल में पढ़ने से दोनों के व्यक्तित्व पर विकास होता है। बच्चा स्कूल में पढ़ते हुए विभिन्न प्रकार की जातियों, धर्मों इत्यादि के सम्पर्क में आता है। इसलिए वह विभिन्न समूहों के प्रति विश्वास रखने लग जाता है। बच्चे को इतनी समझ आ जाती है कि किन परिस्थितियों में कैसा व्यवहार करना है।

5. सामाजिक संस्थाएं (Social Institutions)—समाजीकरण में परिवार एवं स्कूल के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार की सामाजिक संस्थाएं भी महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं निभाती हैं। समाज में कई प्रकार की संस्थाएं हैं जो धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक इत्यादि के समाजीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। राजनीतिक संस्थाएं व्यक्ति को सरकार या देश के प्रति सही व्यवहार करना सिखाती हैं। आर्थिक संस्थाएं व्यापार करने का तरीका सिखाती हैं। धार्मिक संस्थाएं व्यक्ति में कई प्रकार के सद्गुण जैसे प्यार, हमदर्दी, दया इत्यादि करना सिखाती हैं। प्रत्येक व्यक्ति धर्मानुसार बनाए गए व्यवहार करने के तरीके, रहने-सहने के नियम, विश्वासों इत्यादि को अचेतन मन से स्वीकार करता है। इस प्रकार प्रत्येक समाज या जाति व्यक्ति को समाज में रहने के नियमों की जानकारी देता है। इसके अतिरिक्त कई प्रकार की मनोरंजन संस्थाएं भी व्यक्ति को समाज में क्रियाशील सदस्य बने रहने के लिए प्रेरित करती हैं।

सामाजिक संस्थाओं में आर्थिक, धार्मिक इत्यादि संस्थाओं का प्रभाव आधुनिक समाज में व्यक्ति के व्यक्तित्व पर प्रभाव डालता है। उदाहरण के लिए आर्थिक संस्थाओं को ही ले लीजिए। आर्थिक संस्थाओं के प्रभाव के अधीन व्यक्ति अपना काफ़ी समय व्यतीत करता है क्योंकि जीवित रहने के लिए उसे कमाई की आवश्यकता पड़ती है और कमाई के लिए वह व्यवसाय पर आधारित होता है। व्यक्ति को व्यवसाय उसकी योग्यता के आधार पर ही मिलता है। किसी भी व्यवसाय को अपनाने के लिए व्यक्ति को कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है अर्थात् वह अपने आपको स्थिति के अनुकूल बना लेता है। व्यवसाय के क्षेत्र में उसके सम्बन्ध विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों से पैदा हो जाते हैं। वह कई व्यक्तियों के सम्पर्क में आता है। इस कारण उसके व्यक्तित्व और चरित्र पर काफ़ी प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त यदि हम राजनीतिक संस्थाओं के ऊपर नज़र डालें तो हम देखते हैं कि आजकल के समय में समाज का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं बचा जिसके ऊपर राजनीतिक संस्थाओं का प्रभाव न हो। व्यापार, भाषा, कला, संगीत, शिक्षा, परिवार इत्यादि प्रत्येक प्रकार के समूह के ऊपर कानून का नियंत्रण होता है। व्यक्ति को प्रत्येक स्थान पर कानून का सहारा लेकर ही आगे बढ़ना पड़ता है। इस कारण व्यक्ति अपने व्यवहार को भी इनके अनुसार ढाल लेता है।

6. आवश्यकता (Needs)- मनुष्य की कई प्रकार की सामाजिक एवं शारीरिक आवश्यकताएं होती हैं जिस कारण व्यक्ति को समाज के सदस्यों के साथ तालमेल करना पड़ता है। व्यक्ति अपनी इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये समाज के द्वारा प्रभावित तरीकों को अपनाता है ताकि उनकी निन्दा न हो सके। इस तरह व्यक्ति समाज से डर कर कार्य करता है और इसके साथ ही व्यक्ति में अनुकूलन की भावना पैदा होती है। .

7. भाषा (Language)- केवल एक भाषा ही है जो बच्चे का इस प्रकार से विकास कर सकती है। आप ज़रा सोचे, यदि बच्चे को भाषा का ही ज्ञान न हो तो वह अपनी भावनाओं, बातों आदि को किसके आगे प्रकट करेगा। भाषा के कारण ही वह (बच्चा) लोगों के सम्पर्क में आता है और उसे अपनी भावनाओं को प्रकट करने का अवसर मिलता है। जैसे-जैसे बच्चा भाषा को सीखता है, वैसे-वैसे ही उसके पास अपनी भावनाओं के प्रकट करने का अवसर मिलता रहता है। भाषा के कारण ही वह अनेक प्रकार के व्यक्तियों के सम्पर्क में आता है और अन्य लोगों से मिलकर अपने सामाजिक दृष्टिकोण को बढ़ाता है। भाषा के कारण ही वह अपनी आवश्यकताओं और अन्य कठिनाइयों की दूसरों को जानकारी देता है।

भाषा के कारण को ही उसका अन्य लोगों के साथ सम्बन्धों का आदान-प्रदान होता है और वह सम्बन्धों को चलाने वाले नियमों के सीखता है। इसके साथ ही उसमें धर्म एवं नैतिकता का विकास होता है। भाषा ही उसे भिन्न-भिन्न प्रकार की भूमिकाएं निभाने के लिये तैयार करती है। भाषा के कारण ही उसे अन्य लोगों के विचारों का पता चलता है। इससे उसे पता चलता है कि समाज में उसकी क्या स्थिति है इस कारण भाषा के द्वारा ही उसका काफ़ी समाजीकरण होता है।

भाषा के द्वारा ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है। इस भाषा के प्रयोग के कारण ही बच्चा दूसरों के सम्पर्क में आता है और वह सामाजिक सम्बन्धों, परिमापों, नियमों, सिद्धान्तों को कहना आरम्भ कर देता है। संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि व्यक्ति के समाजीकरण के लिए प्रत्येक प्रकार के छोटे-छोटे समूह और बड़े समूह महत्त्वपूर्ण होते हैं। व्यक्ति जैसे-जैसे, भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के सम्पर्क में आता है, वैसे-वैसे उसका समाजीकरण भी होता है। वह अपने व्यवहारों को चेतन एवं अचेतन रूप में बदल लेता है। व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण ज़िन्दगी ही कुछ न कुछ सीखता रहता है। अंत में हम कह सकते हैं कि समाज में और भी छोटे-बड़े समूह हैं, जो बच्चे के समाजीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जिनका वर्णन करना यहां पर मुमकिन नहीं, परन्तु फिर भी इनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।

प्रश्न 4. व्यक्ति के विकास के विभिन्न स्तरों तथा समाजीकरण की संस्थाओं के मध्य संबंधों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर-
समाजीकरण की प्रक्रिया काफ़ी व्यापक होती है। यह बच्चे के जन्म से ही आरम्भ हो जाती है। बच्चा जब जन्म लेता है तो वह पशु से अधिक कुछ नहीं होता है। क्योंकि उसे समाज के तौर-तरीकों का ज्ञान नहीं होता है। परन्तु जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसकी समाजीकरण की प्रक्रिया भी साथ-साथ चलती रहती है और वह सामाजिक जीवन के अनुसार ढलता रहता है। वह समाज के आदर्शों, कीमतों, परिमापों, नियमों, विश्वासों एवं प्रेरणाओं को ग्रहण करता रहता है। बच्चा जब जन्म लेता है तो उसमें सहज प्रवृत्ति होती है। परन्तु समाज के सम्पर्क में आने के पश्चात् वह प्रवृत्तियां आदतों में परिवर्तित हो जाती हैं। यह सब कुछ अलग-अलग समय पर होता है। समाजीकरण के अलग-अलग समय पर अलग-अलग स्तर होते हैं जो इस प्रकार हैं-

  1. शिशु अवस्था (Infant Stage)
  2. बचपन अवस्था (Childhood Stage)
  3. किशोरावस्था (Adolescent Stage)
  4. युवावस्था (Adulthood Stage) 5. वृद्धावस्था (Old Age)

1. शिशु अवस्था (Infant Stage)—पहली अवस्था की व्याख्या करते हुए जानसन ने कहा है कि ये अवस्था बच्चे के जन्म से लेकर डेढ़ साल तक ही होती है। इस अवस्था में बच्चा न तो बोल सकता है और न ही चलफिर सकता है। इसके अतिरिक्त वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति भी स्वयं नहीं कर सकता। उसको अपनी मां पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यह अवस्था ऐसी अवस्था होती है कि वह वस्तुओं का विभेदीकरण नहीं कर सकता। भूख, प्यास आदि की आवश्यकता के लिए वह अपने परिवार के सदस्यों पर निर्भर रहता है। जो भी वस्तु उसे अच्छी लगती है वह उस पर नियन्त्रण रखना चाहता है और अधिकार समझता है। पारसन्स ने भी इस अवस्था को आरम्भिक पहचान की अवस्था कहा है। अधिकांश तौर पर वह अपनी मां को पूर्ण तौर पर पहचान लेता है और उसके सम्पर्क में खुशी और आनन्द प्राप्त करता है। उसकी काल्पनिक और वास्तविक अवस्था में कोई अन्तर नहीं होता।

2. बचपन अवस्था (Childhood Stage)-यह अवस्था डेढ़ साल से 12-13 साल तक चलती है। बच्चा इस अवस्था में अच्छी तरह बोलना व चलना सीख लेता है। कुछ सीमा तक वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं करने लग पड़ता है। 2 साल की आयु तक पहुंचते-पहुंचते वह समझने लग पड़ता है कि उसके अतिरिक्त अन्य बच्चों के भी अधिकार हैं और वह जितनी भी कोशिश कर ले सभी वस्तुओं को प्राप्त नहीं कर सकता। अपनी इच्छाओं की पूर्ति न होने पर उसे बार-बार निराशा होती है। इस निराशा के कारण ही वह अपने ऊपर नियन्त्रण रखना सीख जाता है। इस समय में उसे सज़ा और इनाम देकर अच्छी आदतें डालने की कोशिश की जाती है। इस समय में वह प्यार की कीमतें सीख जाता है और अपने परिवार के सदस्यों का अनुकरण करने लग पड़ता है।

इस अवस्था में बच्चा कुछ-कुछ कार्य स्वयं करने लग जाता है। उदाहरण के तौर पर बच्चा जब मलमूत्र करता है या तो वह पहले बता देता है या फिर बाद में इस बारे में सफ़ाई की ओर इशारा करने लग पड़ता है। कई बार ज़ोर से रोने भी लग जाता है। इस अवस्था में वह बोलने भी लग पड़ता है और चलने भी। वह अपनी इच्छाओं पर भी नियन्त्रण रखने लग जाता है। इस अवस्था में इनाम एवं सज़ा (Reward & Punishment) आदि के द्वारा बच्चे को अच्छी आदतों को ग्रहण करने की सीख दी जाती है। उदाहरण के लिए जब बच्चा माता-पिता की आवाज़ सुनकर उनके कहने के अनुसार कार्य करता है तो माता-पिता प्रसन्न होकर उसे इनाम भी देते हैं और कहते हैं कि कितना अच्छा बच्चा है।

दूसरी तरफ़ जब वह कोई गलत कार्य करता है तो उसे गुस्सा किया जाता है और कई बार थप्पड़ भी लग जाता है। इस अवस्था में वह अपने परिवार की कीमतों को ग्रहण करना आरम्भ कर देता है। उसके ऊपर परिवार के दूसरे सदस्यों का भी प्रभाव पड़ने लग जाता है। वह परिवार की कई बातें तो स्वाभाविक रूप में ही सीख जाता है। इसमें वह प्यार लेना एवं प्यार देना भी सीख जाता है। कुछ बातें तो वह नकल करके भी सीख जाता है। नकल करना उसके लिये मनोरंजन का साधन होता है। जैसे वह अपने पिता को अखबार पढ़ते हुए देखता है तो वह स्वयं भी अखबार पढ़ने लग जाता है। इस अवस्था में वह परिवार के विभिन्न सदस्यों को जैसे करते हुए देखता है वह भी उनकी तरह व्यवहार करने लग जाता है। ‘पारसन्स’ ने इस अवस्था को ‘दोहरा कार्य ग्रहण’ करने का भी नाम दिया है। इस अवस्था में बच्चे के अन्दरूनी गुणों का विकास होने लग जाता है व इस प्रकार बच्चे के द्वारा ठीक एवं गलत कार्यों की पहचान करनी भी आरम्भ हो जाती है।’

3. किशोरावस्था (Adolescence)—यह अवस्था 14-15 साल से लेकर 20-21 वर्ष तक चलती है। इस आयु में पहुंचने पर माता-पिता का बच्चों पर नियन्त्रण नहीं रहता क्योंकि बच्चों को भी लगता है कि उन्हें और अधिक स्वतन्त्रता की आवश्यकता है और वह और अधिक स्वतन्त्रता की मांग भी करते हैं। अब उनके अंग विकसित होने लग जाते हैं और इनके अंगों के विकसित होने पर उनमें नयी भावनाएं उत्पन्न होती हैं और व्यवहार के नये ढंग सीखते पड़ते हैं। लड़कियों के लिये यह आवश्यक होता है कि लड़कों से कुछ दूरी पर रहें। दूसरे लिंग के प्रति भी उन्हें पुनः तालमेल की आवश्यकता होती है। इसके साथ-साथ उन्हें यौन, प्यार कीमतों एवं विश्वास आदि के नियमों को सिखाया जाता है। उन पर अधिक ध्यान दिया जाने लगता है जिस कारण उनमें विद्रोह की भावना भी पैदा हो जाती है। उनके अन्दर तेज़ मानसिक संघर्ष चलता रहता है। इस संघर्ष से लड़ते हुए वह आत्म नियन्त्रण करना सीखता है।

4. युवावस्था (Adulthood Stage)-इस अवस्था में व्यक्ति का सामाजिक दायरा किशोरावस्था से काफ़ी बड़ा हो जाता है। व्यक्ति कोई न कोई कार्य करने लग जाता है। यह भी हो सकता है कि वह किसी सामाजिक समूह राजनीतिक दल, क्लब, ट्रेड यूनियन का सदस्य बन जाए। इस अवस्था में उसका विवाह हो जाता है तथा उसके माता-पिता, मित्र, पड़ोसियों के अतिरिक्त वह अपनी पत्नी के साथ भी रिश्ते बनाता है। पत्नी के परिवार के साथ भी तालमेल बिठाना पड़ता है। अब वह किसी पर निर्भर नहीं है बल्कि वह एक ज़िम्मेदार व्यक्ति बन गया है। उसे अलग-अलग प्रकार की भूमिकाएं निभानी पड़ती हैं जैसे कि पति/पत्नी, माता/पिता, घर का मुखिया व देश का नागरिक। उससे एक विशेष प्रकार की भूमिका निभाने की आशा की जाती है तथा वह निभाता भी है जिससे समाजीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ती रहती है।

5. वृद्धावस्था (Old Age)-एक उम्रदराज व्यक्ति का जीवन काफ़ी हद तक वातावरण, पेशे, मित्रों तथा कई समूहों की सदस्यता से प्रभावित होता है। उसमें बहुत-सी कीमतों का आत्मसात (internalised) होता है तथा उसे उनसे तालमेल बिठाना सीखना पड़ता है क्योंकि अब वह अधिक शक्तिशाली नहीं रहा है। उसे कई भूमिकाएं मिल जाती हैं जैसे कि सास/ससुर, दादा/दादी, नाना/नानी, रिटायर व्यक्ति इत्यादि। उसे नई परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाना सीखना पड़ता है तथा समाजीकरण की प्रक्रिया चलती रहती है।

समाजीकरण की संस्थाओं को विस्तृत रूप में लिखो।
1. परिवार (Family)—व्यक्ति के समाजीकरण में परिवार का विशेष स्थान है। कुछ प्रसिद्ध समाज शास्त्रियों के अनुसार एक बच्चे का मन अचेतन अवस्था में होता है और उस अचेतन मन पर जो प्रभाव परिवार का पड़ता है वह किसी और का नहीं पड़ सकता है। इसी प्रभाव के परिणामस्वरूप ही बच्चे के व्यक्तित्व पर और भविष्य पर भी प्रभाव पड़ता है। बचपन में बच्चे का मन इस तरह का होता है कि उसे जिधर भी चाहो मोड़ा जा सकता है। उसके इस कच्चे मन पर प्रत्येक वस्तु का प्रभाव पड़ता है। बच्चे के व्यक्तित्व पर माता-पिता का काफ़ी प्रभाव पड़ता है। यदि माता-पिता का बच्चे पर नियन्त्रण काफ़ी सख्त होगा तो बच्चा बड़ा होकर नियंत्रण से बाहर हो सकता है और यदि बच्चे को काफ़ी लाड-प्यार दिया जाएगा तो वह उसके बिगड़ जाने के अवसर काफ़ी हो जाएगा और यदि बच्चे को माता-पिता का प्यार न मिले तो उसके व्यक्तित्व के असन्तुलन का खतरा अधिक होता है।

बच्चे की आरम्भिक शिक्षा का आधार परिवार ही होता है। परिवार में ही बच्चे के मन के ऊपर कई प्रकार की भावनाएं, जैसे प्यार और हमदर्दी का प्रभाव पड़ता है और वह इस प्रकार के कई गुणों को सीखता है। परिवार ही बच्चे को समाज की तथा परिवार की परम्पराओं, रीति-रिवाज, परिमापों एवं कीमतों के बारे में बताता है। बच्चे को परिवार में ही व्यवहार के तरीकों एवं नियमों इत्यादि की शिक्षा दी जाती है। परिवार के बीच में रहकर बच्चा बड़ों का आदर करना और कहना मानना सीखता है। यदि बच्चे के ऊपर माता-पिता का नियन्त्रण है तो इसका अर्थ है व्यक्ति के ऊपर समाज का नियन्त्रण है क्योंकि बच्चे के समाजीकरण के समय बच्चे के माता-पिता ही समाज के प्रतिनिधि होते हैं। परिवार में तो बच्चा कई प्रकार के गुणों को सीखता है जिसके साथ वह समाज या देश का एक ज़िम्मेदार नागरिक बनता है। परिवार में ही बच्चे को अपने विचार प्रकट करने और व्यक्तित्व के विकास करने का अवसर मिलता है।

आरम्भिक काल में बच्चा जो कुछ भी देखता है उसकी ही नकल करनी आरम्भ कर देता है। इस कारण यह परिवार पर ही आधारित होता है कि वह बच्चे को सही दिशा की तरफ ले जाए। कई मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, परिवार का प्रभाव बच्चे के अचेतन मन पर काफ़ी अधिक पड़ता है और इसका प्रभाव उसके भविष्य पर पड़ने लग जाता है। उदाहरण के लिये यदि माता-पिता के बीच परिवार में लड़ाई-झगड़ा होता रहता है तो उसका प्रभाव बच्चे के मन पर पड़ता है और वह उनका प्यार नहीं प्राप्त कर सकता। यदि कोई परिवार तलाक या अन्य किन्हीं कारणों से टूट जाते हैं तो इसका प्रभाव बच्चों पर पड़ता है और वह मनोवैज्ञानिक तौर पर तनावपूर्ण रहते हैं। प्यार के दृष्टिकोण से भी वह वंचित रह जाता है। कई बार तो शारीरिक विकास के ऊपर भी इसका प्रभाव पड़ता है। हमदर्दी, प्यार व सहयोग इत्यादि के गुणों से वह दूर हो जाता है क्योंकि परिवार के गुणों के आधार पर ही वह समाज का सदस्य बनता है। इसलिये टूटे हुए परिवारों में इन गुणों की प्राप्ति असम्भव हो जाती है।

इस तरह हम कह सकते हैं कि परिवार ही व्यक्ति के चरित्र एवं व्यक्तित्व का निर्माण करता है। इस तरह समाजीकरण में परिवार का सबसे अधिक महत्त्व होता है।

2. खेल समूह (Play Group)- परिवार के पश्चात् खेल समूह की समाजीकरण के साधन के रूप में बारी आती है। बच्चा अपने परिवार के घेरे में से निकल कर अपने साथियों के साथ खेलने जाता है और खेल समूह बनाता है। खेल समूह में ही बच्चे की सामाजिक शिक्षा आरम्भ हो जाती है। खेल समूह में रह कर बच्चा. वह सब कुछ सीखता है जो वह परिवार में रह कर नहीं सीख सकता। खेल समूह में रह कर वह अपनी इच्छाओं का त्याग करता है और उसे पता चलता है कि उसके अतिरिक्त अन्य बच्चों की भी इच्छाएं होती हैं। इसके अतिरिक्त खेल समूह में सम्बन्ध समानता पर ही आधारित होते हैं। इसलिये बच्चा जब खेल समूह में भाग लेता है तो वह वहां पर अनुशासन एवं सहयोग सीखता है।

यह उसके भविष्य में प्रभाव डालते हैं। इसके साथ हो खेल समूह में ही व्यक्ति में नेता के गुण पैदा होते हैं। खेलते समय बच्चे एक दूसरे के साथ लड़ते-झगड़ते हैं। साथ-साथ अपने और दूसरों के अधिकारों की रक्षा करने के सिद्धान्त को सीखते हैं। यहां पर आकर बच्चे को अपनी भूमिका की योग्यता व अयोग्यता का भी पता चलता है। खेल समूह में ही योग्यता एवं भावनाओं को बच्चा ग्रहण करता है। संक्षेप में बच्चे के बिगड़ने एवं बनने में खेल समूह का काफ़ी बड़ा हाथ होता है। यदि खेल समूह अच्छा है तो बच्चा अच्छा बन जाता है और यदि खेल समूह बुरा है तो उसके बुरे होने की सम्भावना अधिक है।

इस प्रकार खेल समूह का स्वस्थ होना, व्यक्ति के समाजीकरण के लिये आवश्यक होता है। विद्वानों के अनुसार खेल समूह की इतनी महत्ता होती है कि यह व्यक्ति को निम्न स्तर से उच्च स्तर तक उठा लेता है और दूसरी तरफ ऊपर से निम्न स्थिति की तरफ ले जाता है। इसलिये जहां बच्चे में प्यार, हमदर्दी, सहयोग, समानता इत्यादि के गुण पैदा होते हैं वहीं दूसरी तरफ असन्तुलित खेल समूह बच्चे को अपराधों, चोर, शराबी, जुआरी इत्यादि तक बना देता है क्योंकि जो कुछ वह अपने परिवार से नहीं सीख पाता वह सीखने के लिए खेल समूह पर निर्भर रहता है।

3. पड़ोसी (Neibourhood)- व्यक्ति का पड़ोस भी समाजीकरण का एक बहुत बड़ा साधन होता है जब बच्चा परिवार के हाथों से निकल कर पड़ोसियों के पास चला जाता है तो उसे यह पता चलता है कि उसने अन्य लोगों से किस प्रकार का व्यवहार करना है क्योंकि यदि परिवार में रह कर वह गलत व्यवहार करे तो उसको मज़ाक समझ कर टाल दिया जाता है। परन्तु यदि यह व्यवहार वह बाहर करता है तो उसके व्यवहार का बुरा मनाया जाता हैं। पड़ोस के लोगों के साथ उसे लगातार अनुकूलन करके रहना पड़ता है क्योंकि पड़ोस में उसके गलत व्यवहार को सहन नहीं किया जाता। पड़ोस के लोगों के साथ अनुकूलन बनाकर रहना पड़ता है। यही अनुकूलन उसे सम्पूर्ण ज़िन्दगी काम आता है और पता लगता है कि उसने विभिन्न अवस्थाओं में कैसे अनुकूलन करना है। पड़ोस के लोगों के साथ जब वह अन्तःक्रिया करता है तो समाज के नियमों के अनुसार कैसे अनुकूलन करना है यह सीखता है।

4. स्कूल (School)- इसके बाद बारी आती है स्कूल की जो एक असभ्य बच्चे को सभ्य बच्चे का रूप देता है या फिर आप कह सकते हैं कि कच्चे माल को तैयार माल का रूप देता है। स्कूल में ही बच्चे के गुणों का विकास होता है। स्कूल में बच्चा अन्य विद्यार्थियों के संग रहता है और विभिन्न प्रकार के अध्यापकों का भी उसके मन पर काफ़ी प्रभाव पड़ता है। अध्यापक के बोलने, उठने, बैठने, व्यवहार करने, पढ़ाने के तरीकों का उसके मन पर काफ़ी प्रभाव पड़ता है। परन्तु यहां पर एक बात ध्यान देने योग्य होती है कि किसी बच्चे के ऊपर किसी अध्यापक का प्रभाव पड़ता है और कई बच्चे तो अध्यापकों को ही अपना आदर्श मानने लग जाते हैं और उनके अपने व्यक्तित्व पर इसका काफ़ी प्रभाव पड़ता है।

अध्यापक के अतिरिक्त अन्य बच्चे भी उस बच्चे का समाजीकरण करते हैं। उनके साथ रहते हुए उसे कई पद एवं रोल मिलते हैं जो उसको अगले जीवन में काफ़ी मदद करते हैं और बच्चों के साथ बैठने से उनके व्यक्तित्व पर काफ़ी प्रभाव पड़ता है। स्कूल में जाने के साथ बच्चे के खेल समूह और अन्तक्रियाओं का दायरा काफ़ी बढ़ जाता है क्योंकि उसको कई तरह के बच्चे मिलते हैं। स्कूल में बच्चा कई प्रकार के नियम, अनुशासन, परम्पराओं, विषय आदि सीखते हैं जो उसको उसके भविष्य के जीवन में काम आते हैं।

व्यक्ति के व्यक्तित्व पर जहां अध्यापक का प्रभाव पड़ता है। वहां पर उसके आस पड़ोस के लोगों के विचारों का भी प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त सहयोग की भावना भी बढ़ती है। बच्चे एक दूसरे के साथ मिलकर रहते हैं। लड़के एवं लड़कियों के इकट्ठे एक स्कूल में पढ़ने से दोनों के व्यक्तित्व पर विकास होता है। बच्चा स्कूल में पढ़ते हुए विभिन्न प्रकार की जातियों, धर्मों इत्यादि के सम्पर्क में आता है। इसलिए वह विभिन्न समूहों के प्रति विश्वास रखने लग जाता है। बच्चे को इतनी समझ आ जाती है कि किन परिस्थितियों में कैसा व्यवहार करना है।

5. सामाजिक संस्थाएं (Social Institutions)—समाजीकरण में परिवार एवं स्कूल के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार की सामाजिक संस्थाएं भी महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं निभाती हैं। समाज में कई प्रकार की संस्थाएं हैं जो धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक इत्यादि के समाजीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। राजनीतिक संस्थाएं व्यक्ति को सरकार या देश के प्रति सही व्यवहार करना सिखाती हैं। आर्थिक संस्थाएं व्यापार करने का तरीका सिखाती हैं। धार्मिक संस्थाएं व्यक्ति में कई प्रकार के सद्गुण जैसे प्यार, हमदर्दी, दया इत्यादि करना सिखाती हैं। प्रत्येक व्यक्ति धर्मानुसार बनाए गए व्यवहार करने के तरीके, रहने-सहने के नियम, विश्वासों इत्यादि को अचेतन मन से स्वीकार करता है। इस प्रकार प्रत्येक समाज या जाति व्यक्ति को समाज में रहने के नियमों की जानकारी देता है। इसके अतिरिक्त कई प्रकार की मनोरंजन संस्थाएं भी व्यक्ति को समाज में क्रियाशील सदस्य बने रहने के लिए प्रेरित करती हैं।

सामाजिक संस्थाओं में आर्थिक, धार्मिक इत्यादि संस्थाओं का प्रभाव आधुनिक समाज में व्यक्ति के व्यक्तित्व पर प्रभाव डालता है। उदाहरण के लिए आर्थिक संस्थाओं को ही ले लीजिए। आर्थिक संस्थाओं के प्रभाव के अधीन व्यक्ति अपना काफ़ी समय व्यतीत करता है क्योंकि जीवित रहने के लिए उसे कमाई की आवश्यकता पड़ती है और कमाई के लिए वह व्यवसाय पर आधारित होता है। व्यक्ति को व्यवसाय उसकी योग्यता के आधार पर ही मिलता है। किसी भी व्यवसाय को अपनाने के लिए व्यक्ति को कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है अर्थात् वह अपने आपको स्थिति के अनुकूल बना लेता है। व्यवसाय के क्षेत्र में उसके सम्बन्ध विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों से पैदा हो जाते हैं। वह कई व्यक्तियों के सम्पर्क में आता है। इस कारण उसके व्यक्तित्व और चरित्र पर काफ़ी प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त यदि हम राजनीतिक संस्थाओं के ऊपर नज़र डालें तो हम देखते हैं कि आजकल के समय में समाज का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं बचा जिसके ऊपर राजनीतिक संस्थाओं का प्रभाव न हो। व्यापार, भाषा, कला, संगीत, शिक्षा, परिवार इत्यादि प्रत्येक प्रकार के समूह के ऊपर कानून का नियंत्रण होता है। व्यक्ति को प्रत्येक स्थान पर कानून का सहारा लेकर ही आगे बढ़ना पड़ता है। इस कारण व्यक्ति अपने व्यवहार को भी इनके अनुसार ढाल लेता है।

6. आवश्यकता (Needs)- मनुष्य की कई प्रकार की सामाजिक एवं शारीरिक आवश्यकताएं होती हैं जिस कारण व्यक्ति को समाज के सदस्यों के साथ तालमेल करना पड़ता है। व्यक्ति अपनी इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये समाज के द्वारा प्रभावित तरीकों को अपनाता है ताकि उनकी निन्दा न हो सके। इस तरह व्यक्ति समाज से डर कर कार्य करता है और इसके साथ ही व्यक्ति में अनुकूलन की भावना पैदा होती है। .

7. भाषा (Language)- केवल एक भाषा ही है जो बच्चे का इस प्रकार से विकास कर सकती है। आप ज़रा सोचे, यदि बच्चे को भाषा का ही ज्ञान न हो तो वह अपनी भावनाओं, बातों आदि को किसके आगे प्रकट करेगा। भाषा के कारण ही वह (बच्चा) लोगों के सम्पर्क में आता है और उसे अपनी भावनाओं को प्रकट करने का अवसर मिलता है। जैसे-जैसे बच्चा भाषा को सीखता है, वैसे-वैसे ही उसके पास अपनी भावनाओं के प्रकट करने का अवसर मिलता रहता है। भाषा के कारण ही वह अनेक प्रकार के व्यक्तियों के सम्पर्क में आता है और अन्य लोगों से मिलकर अपने सामाजिक दृष्टिकोण को बढ़ाता है। भाषा के कारण ही वह अपनी आवश्यकताओं और अन्य कठिनाइयों की दूसरों को जानकारी देता है।

भाषा के कारण को ही उसका अन्य लोगों के साथ सम्बन्धों का आदान-प्रदान होता है और वह सम्बन्धों को चलाने वाले नियमों के सीखता है। इसके साथ ही उसमें धर्म एवं नैतिकता का विकास होता है। भाषा ही उसे भिन्न-भिन्न प्रकार की भूमिकाएं निभाने के लिये तैयार करती है। भाषा के कारण ही उसे अन्य लोगों के विचारों का पता चलता है। इससे उसे पता चलता है कि समाज में उसकी क्या स्थिति है इस कारण भाषा के द्वारा ही उसका काफ़ी समाजीकरण होता है।

भाषा के द्वारा ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है। इस भाषा के प्रयोग के कारण ही बच्चा दूसरों के सम्पर्क में आता है और वह सामाजिक सम्बन्धों, परिमापों, नियमों, सिद्धान्तों को कहना आरम्भ कर देता है। संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि व्यक्ति के समाजीकरण के लिए प्रत्येक प्रकार के छोटे-छोटे समूह और बड़े समूह महत्त्वपूर्ण होते हैं। व्यक्ति जैसे-जैसे, भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के सम्पर्क में आता है, वैसे-वैसे उसका समाजीकरण भी होता है। वह अपने व्यवहारों को चेतन एवं अचेतन रूप में बदल लेता है। व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण ज़िन्दगी ही कुछ न कुछ सीखता रहता है। अंत में हम कह सकते हैं कि समाज में और भी छोटे-बड़े समूह हैं, जो बच्चे के समाजीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जिनका वर्णन करना यहां पर मुमकिन नहीं, परन्तु फिर भी इनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।

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