Class 11 Sociology Solutions Chapter 8 राजनीति, धर्म, अर्थ प्रणाली तथा शिक्षा

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (Textual Questions)

I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1-15 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. शक्ति से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-शक्ति समूह या व्यक्तियों का वह सामर्थ्य है जिससे वह उस समय अपनी बात मनवाते हैं जब उनका विरोध हो रहा होता है।

प्रश्न 2. मैक्स वैबर द्वारा प्रस्तुत सत्ता के तीन प्रकार बताइये।
उत्तर-परंपरागत सत्ता, वैधानिक सत्ता तथा करिश्मायी सत्ता।

प्रश्न 3. अर्थव्यवस्था से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-समाजशास्त्रियों के अनुसार मानवीय क्रियाएं जो भोजन अथवा सम्पत्ति से संबंधित होती हैं, अर्थ व्यवस्था को बनाती हैं।

प्रश्न 4. राज्य के कोई दो तत्व बताइये।
उत्तर-जनसंख्या, भौगोलिक क्षेत्र, प्रभुसत्ता तथा सरकार राज्य के प्रमुख तत्त्व हैं।

प्रश्न 5. जीववाद का सिद्धांत किसने प्रस्तुत किया ?
उत्तर-ई० बी० टाईलर (E.B. Tylor) ने जीववाद का सिद्धांत दिया था।

प्रश्न 6. किसने पवित्र तथा सामान्य वस्तुओं में अंतर किया ?
उत्तर-दुर्थीम (Durkheim) ने पवित्र तथा अपवित्र वस्तुओं में अंतर दिया था।

प्रश्न 7. प्रकृतिवाद के विचार की चर्चा किसने की ?
उत्तर-प्रकृतिवाद का सिद्धांत मैक्स मूलर (Max Muller) ने दिया था।

प्रश्न 8. किसने धर्म को ‘आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास’ माना है ?
उत्तर-ई० बी० टाईलर ने धर्म को परा प्राकृतिक शक्ति में विश्वास कहा था।

प्रश्न 9. दो ऐसे धर्मों के नाम बताइये जो भारत में बाहर से आये हैं।
उत्तर-ईसाई और इस्लाम दो धर्म हैं जो भारत में बाहर से आए हैं।

प्रश्न 10. सम्प्रदाय से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-सम्प्रदाय एक धार्मिक विचार व्यवस्था का एक उपसमूह है तथा साधारणतया यह बड़े धार्मिक समूह से निकला एक हिस्सा होता है।

प्रश्न 11. पंथ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-पंथ एक धार्मिक संगठन है जो किसी एक व्यक्तिगत नेता के विचारों तथा विचारधारा में से निकला है।

प्रश्न 12. कार्ल मार्क्स द्वारा प्रस्तुत पूंजीवादी समाज में दो प्रमुख वर्गों के नाम बताइये।
उत्तर-पूंजीवादी वर्ग तथा मज़दूर वर्ग।

प्रश्न 13. औपचारिक शिक्षा किसे कहते हैं ?
उत्तर-वह शिक्षा जो हम स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय इत्यादि में लेते हैं, वह औपचारिक शिक्षा होती है।

प्रश्न 14. अनौपचारिक शिक्षा को परिभाषित दीजिए।
उत्तर-वह शिक्षा जो हम अपने परिवार से, रोज़ाना के अनुभवों से प्राप्त करते हैं, अनौपचारिक शिक्षा होती है।

II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30-35 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. राज्यहीन समाज किसे कहते हैं ?
उत्तर-जिन समाजों में राज्य नामक संस्था नहीं होती वह राज्य रहित समाज होते हैं। वे सादा या प्राचीन समाज होते हैं। यहां कम जनसंख्या होती है जिस कारण लोगों के बीच आमने-सामने के रिश्ते होते हैं तथा सामाजिक नियंत्रण के लिए समाज या सरकार जैसे किसी औपचारिक साधन की आवश्यकता नहीं होती। यहां बुजुर्गों की सभा से नियंत्रण किया जाता है।

प्रश्न 2. करिश्मई सत्ता पर विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर-जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से इतना प्रभावित होता है कि उसके कहने के अनुसार वह कुछ भी कर जाता है तो इस प्रकार की सत्ता करिश्मई सत्ता होती है। किसी व्यक्ति का करिश्मई व्यक्तित्व होता है तथा लोग उससे प्रभावित हो जाते हैं। धार्मिक नेता, राजनीतिक नेता इस प्रकार की सत्ता का प्रयोग करते हैं।

प्रश्न 3. वैधानिक-तार्किक सत्ता किसे कहते हैं ?
उत्तर-जो सत्ता कुछ नियमों-कानूनों के अनुसार प्राप्त होती है उसे वैधानिक सत्ता का नाम दिया जाता है। सरकार के पास वैधानिक सत्ता होती है तथा प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मंत्री, अधिकारी इस प्रकार की सत्ता का प्रयोग करते हैं जो संविधान की सहायता से प्राप्त की जाती है।

प्रश्न 4. पंचायती राज प्रणाली के दो गुण लिखिए।
उत्तर-

  1. पंचायती राज व्यवस्था को स्थानीय स्तर पर लागू किया जाता है तथा साधारण जनता को भी सत्ता में भागीदारी करने का मौका प्राप्त होता है।
  2. इस व्यवस्था में स्थानीय स्तर की समस्याओं का स्थानीय स्तर पर ही समाधान कर लिया जाता है तथा कार्य भी जल्दी हो जाता है।

प्रश्न 5. जीववाद (Animism) और प्रकृतिवाद (Naturism) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-

  1. जीववाद-यह सिद्धान्त Tylor ने दिया था तथा इसके अनुसार धर्म का उद्भव आत्मा के विचार से सामने आया अर्थात् लोग आत्माओं में विश्वास रखते हैं तथा इससे ही धर्म का जन्म हुआ।
  2. प्रकृतिवाद-इसके अनुसार प्राचीन समय में मनुष्य प्राकृतिक घटनाओं जैसे कि वर्षा, बर्फानी तूफान, आग इत्यादि से डरता था। इसलिए उसने प्रकृति की पूजा करनी शुरू की तथा धर्म सामने आया।

प्रश्न 6. हित समूह किसे कहते हैं ?
उत्तर-हित समूह एक विशेष समूह के लोगों की तरफ से बनाए गए समूह हैं जो केवल अपने सदस्यों के हितों के लिए कार्य करते हैं। उन हितों की प्राप्ति के लिए वह अन्य समूहों के हितों की भी परवाह नहीं करते। उदाहरण के लिए मज़दूर संघ, ट्रेड यूनियन, फिक्की (FICCI) इत्यादि।

प्रश्न 7. पवित्र एवं सामान्य पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-दुर्थीम ने धर्म से संबंधित पवित्र तथा साधारण वस्तुओं के बारे में बताया था। उनके अनुसार पवित्र वस्तुएं वे हैं जिन्हें हमसे ऊंचा तथा सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। ये असाधारण होती हैं तथा रोज़ाना के कार्यों से दूर होती हैं परन्तु बहुत-सी वस्तुएं ऐसी होती हैं जो रोज़ाना हमारे सामने आती हैं तथा प्रयोग की जाती हैं। इन्हें साधारण वस्तुएं कहा जाता है।

प्रश्न 8. टोटमवाद पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-टोटमवाद में कोई जनजाति स्वयं को किसी वस्तु, मुख्य रूप से कोई जानवर, पेड़, पौधा, पत्थर या किसी अन्य वस्तु से संबंधित मान लेती है। जिस वस्तु के प्रति उसका श्रद्धा भाव होता है वह जनजाति उस वस्तु के नाम को अपना लेती है तथा उसकी पूजा करती है। वह स्वयं को उस टोटम से पैदा हुई मान लेती है।

प्रश्न 9. पशुपालक अर्थव्यवस्था (Pastoral Economy) किसे कहते हैं ?
उत्तर-इस प्रकार की अर्थव्यवस्था में समाज अपनी जीविका कमाने के लिए घरेलू जानवरों पर निर्भर करते हैं। इन्हें चरवाहे कहा जाता है। वह भेड़ों-बकरियों, गाय, ऊंट, घोड़े इत्यादि रखते हैं। इस प्रकार के समाज घास वाले हरे-भरे मैदानों या पहाड़ों में मिलते हैं। मौसम बदलने से यह लोग स्थान भी बदल लेते हैं।

प्रश्न 10. कृषि अर्थव्यवस्था किस प्रकार औद्योगिक अर्थव्यवस्था से भिन्न है ?
उत्तर-कृषि अर्थव्यवस्था में लोगों का मुख्य पेशा कृषि होता है तथा वे कृषि करके अपना जीवन व्यतीत करते हैं। वहां कम जनसंख्या तथा अनौपचारिक संबंध होते हैं। परन्तु औद्योगिक अर्थव्यवस्था में लोग उद्योगों में कार्य करके पैसे कमाते हैं। वहां अधिकतर जनसंख्या तथा लोगों के बीच औपचारिक संबंध होते हैं।

प्रश्न 11. जजमानी प्रणाली किसे कहते हैं ?
उत्तर- यह व्यवस्था सेवा लेने तथा देने की व्यवस्था है जिसमें निम्न जातियां उच्च जातियों को अपनी सेवाएं देती हैं तथा सेवा देने वाली जाति को अपनी सेवाओं का मेहनताना मिल जाता है। सेवा लेने वाले को जजमान कहा जाता है तथा सेवा देने वाले को कमीन कहा जाता है।

प्रश्न 12. पूंजीवादी समाज पर विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर-पश्चिमी समाजों को पूंजीवादी समाज कहा जाता है जहां उद्योगों में पूंजी लगाकर पैसा कमाया जाता है। उद्योगों के मालिकों के हाथों में उत्पादन के साधन होते हैं तथा वे मजदूरों को काम पर रख कर वस्तुओं का उत्पादन करते हैं। पूंजीवाद का मुख्य तत्त्व है मज़दूरों, उत्पादन के साधनों, उद्योगों, मशीनों तथा मालिकों के बीच संबंध। .

प्रश्न 13. समाजवादी समाज किसे कहते हैं ?
उत्तर-यह संकल्प 19वीं शताब्दी में कार्ल मार्क्स ने दिया था, जिसके अनुसार सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था मज़दूरों के हाथों में होती है। मजदूर उद्योगपतियों के विरुद्ध क्रांति करके उनकी सत्ता खत्म कर देंगे तथा वर्ग रहित समाज की स्थापना करेंगे। सभी लोग कानून के सामने समान होंगे तथा उन्हें उनकी आवश्यकता के अनुसार सरकार की तरफ से मिल जाएगा।

प्रश्न 14. शिक्षा के निजीकरण का उदाहरण दीजिए।
उत्तर-आजकल प्रत्येक गांव, कस्बे तथा नगर में निजी स्कूल आरंभ हो गए हैं। नगरों में निजी कॉलेज खल गए हैं तथा देश के कई भागों में निजी विश्वविद्यालय खुल गए हैं। यह शिक्षा के निजीकरण के उदाहरण हैं।

III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 75-85 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1. धर्म पर एमिल दुर्खाइम के विचारों की चर्चा कीजिए।
उत्तर-दुर्थीम के अनुसार, “धर्म पवित्र वस्तुओं से संबंधित विश्वासों तथा आचरणों की ठोस व्यवस्था है जो इन पर विश्वास करने वालों को नैतिक रूप प्रदान करती है। दुर्शीम ने सभी धार्मिक विश्वासों तथा आदर्शात्मक वस्तुओं को ‘पवित्र’ तथा ‘साधारण’ दो वर्गों में विभाजित किया है। पवित्र वस्तुओं में देवताओं तथा आध्यात्मिक शक्तियों या आत्माओं के अतिरिक्त गुफाएं, पेड़, पत्थर, नदी इत्यादि शामिल हो सकते हैं। साधारण वस्तुओं की तुलना में पवित्र वस्तुएं अधिक शक्ति तथा शान रखती हैं। दुर्थीम के अनुसार, “धर्म पवित्र वस्तुओं अर्थात् अलग व प्रतिबन्धित वस्तुओं से संबंधित विश्वासों तथा क्रियाओं की संगठित व्यवस्था है।” .

प्रश्न 2. धर्म किस प्रकार समाज में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है ?
उत्तर-सामाजिक संगठन को बनाए रखने के लिए धर्म महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। एक धर्म में लाखों लोग होते हैं जिनके एक समान विश्वास होते हैं। यह विश्वास, प्रतिमान, व्यवहार के तरीके एक धार्मिक समूह को मिला देते हैं जिससे समूह में एकता बनी रहती है। इस प्रकार ही अलग-अलग समूहों में एकता के साथ सामाजिक संगठन बना रहता है। प्रत्येक धर्म अपने लोगों को दान देने व सहयोग करने के लिए कहता है जिससे समाज में मज़बूती तथा स्थिरता बनी रहती है। इस प्रकार धर्म का समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान है।

प्रश्न 3. शिक्षा संस्था से क्या अभिप्राय है ? सरकार द्वारा अपनायी गयी शिक्षा नीतियों के विषय में लिखिए।
उत्तर-शैक्षिक संस्था वह होती है जो व्यक्ति को शिक्षा देकर उसे आवश्यक ज्ञान देती है तथा उसे उत्तरदायी नागरिक बनाती है। सरकार की तरफ से लागू की गई शैक्षिक नीतियों का वर्णन इस प्रकार है

  • हमारे संविधान के अनुच्छेद 45 के अनुसार 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त तथा आवश्यक शिक्षा प्रदान की जाएगी।
  • 1960 के कोठारी कमीशन ने सभी बच्चों के स्कूल आने तथा उन्हें लगाकर पढ़ाने पर बल दिया था।
  • 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति को अपनाया गया था जिसमें वोकेशनल ट्रेनिंग तथा पिछड़े समूहों के लिए शैक्षिक सुविधाओं पर बल दिया।
  • सर्व शिक्षा अभियान 1986 तथा 1992 ने इस बात पर बल दिया कि 6-14 वर्ष के सभी बच्चों को आवश्यक शिक्षा प्रदान की जाए।
  • 2010 में शिक्षा का अधिकार (Right to Education) लागू किया गया जिसके अनुसार 6-14 वर्ष के बच्चों को क्लासों में 8 वर्ष की प्राथमिक शिक्षा दी जाएगी।

प्रश्न 4. शिक्षा के प्रकार्यों को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-

  • शिक्षा व्यक्ति के बौद्धिक विकास में सहायता करती है।
  • शिक्षा व्यक्तियों को समाज से जोड़ती है।
  • यह समाज में तालमेल बिठाने में सहायता करती है।
  • यह व्यक्ति की योग्यता बढ़ाने में सहायता करती है।
  • शिक्षा संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने में सहायता करती है।
  • शिक्षा से बच्चों में नैतिक गुणों का विकास होता है।
  • शिक्षा व्यक्ति के समाजीकरण में सहायक होती है।

प्रश्न 5. मैक्स वैबर द्वारा प्रस्तुत सत्ता के प्रकारों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-मैक्स वैबर ने सत्ता के तीन प्रकारों का वर्णन किया है-परंपरागत, वैधानिक तथा करिश्मई सत्ता। परंपरागत सत्ता वह होती है जो परंपरागत रूप से प्राचीन समय ही चलती आ रही है तथा जिसके विरुद्ध कोई किन्तु परन्तु नहीं होता। पिता के घर में इस प्रकार की सत्ता होती है। वैधानिक सत्ता वह होती है जो कुछ नियमों, कानूनों के अनुसार प्राप्त की जाती है। सरकार को प्राप्त सत्ता इस प्रकार की सत्ता है। करिश्मई सत्ता वह होती है जो किसी के करिश्मई व्यक्तित्व के कारण उसे प्राप्त हो जाती है तथा उसके चेले उसकी सत्ता बिना किसी प्रश्न के मानते हैं। धार्मिक नेता, राजनीतिक नेता इस प्रकार की सत्ता भोगते हैं।

प्रश्न 6. राज्य समाज एवं राज्यहीन समाज में अंतर कीजिए।
उत्तर-

  1. राज्य समाज (State Less Society)-आधुनिक समाजों को राज्य वाले समाज कहा जाता है जहां सत्ता राज्य नामक संस्था के हाथों में केन्द्रित होती है परन्तु इसे जनता से प्राप्त किया जाता है। मैक्स वैबर के अनुसार राज्य वह मानवीय समुदाय है जो एक निश्चित क्षेत्र में शारीरिक बल के साथ सत्ता का उपभोग करता
  2. राज्य हीन समाज (State Less Society)-जिन समाजों में राज्य नामक संस्था नहीं होती वह राज्य हीन समाज होते हैं। ये सादा या प्राचीन समाज होते हैं। यहां कम जनसंख्या होती है जिस कारण लोगों के बीच आमनेसामने के रिश्ते होते हैं तथा सामाजिक नियंत्रण के लिए राज्य या सरकार जैसे किसी औपचारिक साधन की कोई आवश्यकता नहीं होती। यहां बुजुर्गों की सभा से नियंत्रण रखा जाता है।

IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 250-300 शब्दों में दें:

प्रश्न 1. राजनीतिक संस्थाओं से आप क्या समझते हैं, विस्तार से चर्चा कीजिए ।
उत्तर- हमारा समाज काफ़ी बड़ा है तथा राजनीतिक व्यवस्था इसका एक भाग है। राजनीतिक व्यवस्था मनुष्यों की भूमिकाओं को परिभाषित करती है। राजनीति तथा समाज में काफ़ी गहरा संबंध है। सामाजिक मनुष्यों को नियंत्रण में करने के लिए राजनीतिक संस्थाओं की आवश्यकता होती है तथा वह राजनीतिक संस्थाएं हैं शक्ति, सत्ता, राज्य, सरकार, विधानपालिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका इत्यादि। ये राजनीतिक संस्थाएं हमारे समाज के ऊपर
औपचारिक नियंत्रण रखती हैं तथा यह नियंत्रण रखने के उनके अपने साधन होते हैं जैसे कि सरकार, पुलिस, सेना, न्यायालय इत्यादि। इस प्रकार राजनीतिक संस्थाएं वह साधन हैं जिनकी सहायता से समाज में शांति तथा व्यवस्था बना कर रखी जाती है। राजनीतिक संस्थाएं मुख्य रूप से समाज में शक्ति के वितरण से संबंध रखती हैं। राजनीतिक संस्थाओं में शक्ति तथा सत्ता को समझना आवश्यक है।

(i) शक्ति (Power)-शक्ति किसी व्यक्ति या समूह का सामर्थ्य होता है जिसके द्वारा वह अन्य लोगों पर अपनी इच्छा थोपता है चाहे उसका विरोध ही क्यों न हो रहा हो। इसका अर्थ है कि जिनके पास शक्ति होती है वह अन्य लोगों की कीमत पर शक्ति का भोग कर रहे होते हैं। समाज में शक्ति सीमित मात्रा में होती है। जिन लोगों या समूहों के पास अधिक शक्ति होती है वह कम शक्ति वाले समूहों या व्यक्तियों के ऊपर शक्ति का प्रयोग करते हैं तथा उन्हें प्रभावित करते हैं। इस प्रकार शक्ति अपने तथा अन्य लोगों के निर्णय लेने की वह सामर्थ्य है जिसमें वे देखा जाता है कि जिनके लिए निर्णय लिया गया है क्या वह उस निर्णय की पालना कर रहे हैं या नहीं। परिवार के बड़े बुजुर्ग, किसी कंपनी का जनरल मैनेजर, सरकार, मंत्री इत्यादि ऐसी शक्ति का प्रयोग करते हैं।

(ii) सत्ता (Authority)–शक्ति का सत्ता के द्वारा उपभोग किया जाता है। सत्ता शक्ति का ही एक रूप है जो वैधानिक तथा सही है। यह संस्थात्मक है तथा वैधता पर आधारित होती है जिनके पास सत्ता होती है। उनकी बात सभी को माननी पड़ती है तथा इसे वैध भी माना जाता है। सत्ता न केवल व्यक्तियों के ऊपर बल्कि समूहों तथा संस्थाओं पर भी लागू होती है। उदाहरण के लिए तानाशाही में सत्ता एक व्यक्ति, समूह या दल के हाथों में होती है जबकि लोकतंत्र में यह सत्ता जनता या उनके चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथों में होती है।
मैक्स वैबर ने तीन प्रकार की सत्ता का जिक्र किया है तथा वह हैं परंपरागत सत्ता, वैधानिक सत्ता तथा करिश्मयी सत्ता। पिता की घर में सत्ता परंपरागत सत्ता होती है, प्रधानमंत्री की सत्ता वैधानिक तथा किसी धार्मिक नेता की अपने चेलों पर स्थापित सत्ता करिश्मयी सत्ता होती है।

(iii) राज्य (State)—राज्य सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक संस्था है। राज्य एक ऐसा लोगों का समूह है जो एक निश्चित भू-भाग में होता है, जिसकी जनसंख्या होती है, जिसकी अपनी एक सरकार होती है तथा अपनी प्रभुसत्ता होती है। राज्य एक सम्पूर्ण समाज का हिस्सा है। बेशक यह सामाजिक जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित करता है परन्तु फिर भी यह समाज का स्थान कोई नहीं ले सकता। राज्य एक ऐसा साधन है जो सामाजिक समितियों को नियंत्रण में रखता है। राज्य समाज के सभी पक्षों को प्रभावित करता है तथा उनमें तालमेल बिठाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

(iv) सरकार (Government)-सरकार एक ऐसा संगठन होता है जिसके पास आदेशात्मक कन्ट्रोल होता है जो वे राज्य में शांति व्यवस्था बनाए रखने में सहायता करता है। सरकार को वैधता भी प्राप्त होती है क्योंकि सरकार किसी न किसी नियम के अन्तर्गत चुनी जाती है। इसे बहुमत का समर्थन प्राप्त होता है। सरकार राज्य के उद्देश्यों को पूर्ण करने का एक साधन है। यह राज्य का यन्त्र तथा उसका प्रतीक है। सरकार के तीन अंग होते हैंविधानपालिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका।

  • विधानपालिका (Legislature)-यह सरकार का वह अंग है जिसका कार्य देश के लिए कानून बनाना है। देश की संसद् विधानपालिका का कार्य करती है।
  • कार्यपालिका (Executive) यह सरकार का वह अंग है जो विधानपालिका द्वारा बनाए गए कानूनों को देश में लागू करती है। राष्ट्रीय, प्रधानमंत्री, मंत्रिमंडल इसका हिस्सा होते हैं।
  • न्यायपालिका (Judiciary)-सरकार का वह अंग है जो विधानपालिका द्वारा बनाए तथा कार्यपालिका द्वारा लागू किए कानूनों का प्रयोग करता है। हमारे न्यायालय, जज़ इत्यादि इसका हिस्सा होते हैं।

इस प्रकार अलग-अलग राजनीतिक संस्थाएं भी देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए अपना योगदान देती हैं। यह संस्थाएं बिना एक-दूसरे के क्षेत्र में आए अपना कार्य ठीक ढंग से करती रहती हैं।

प्रश्न 2. पंचायती राज्य पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर-हमारे देश में स्थानीय क्षेत्रों के विकास के लिए दो प्रकार की पद्धतियां हैं। शहरी क्षेत्रों का विकास करने के लिए स्थानीय सरकारें होती हैं तथा ग्रामीण क्षेत्रों का विकास करने के लिए पंचायती राज्य की संस्थाएं होती हैं। स्थानीय सरकार की संस्थाएं श्रम विभाजन के सिद्धान्त पर आधारित होती हैं क्योंकि इनमें सरकार तथा स्थानीय समूहों में कार्यों को बांटा जाता है। हमारे देश की 70% जनता ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। ग्रामीण क्षेत्रों को जिस स्थानीय सरकार की संस्था द्वारा शासित किया जाता है उसे पंचायत कहते हैं। पंचायती राज्य सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों के संस्थागत ढांचे को ही दर्शाता है।

जब भारत में अंग्रेजी राज्य स्थापित हुआ था तो सारे देश में सामन्तशाही का बोलबाला था। 1935 में भारत सरकार ने एक कानून पास किया जिसने प्रान्तों को पूर्ण स्वायत्तता दी तथा पंचायती कानूनों को एक नया रूप दिया गया। पंजाब में 1939 में पंचायती एक्ट पास हुआ जिसका उद्देश्य पंचायतों को लोकतान्त्रिक आधार पर चुनी हुई संस्थाएं बना कर ऐसी शक्तियां प्रदान करना था जो उनके स्वैशासन की इकाई के रूप में निभायी जाने वाली भूमिका के लिए ज़रूरी थीं। 2 अक्तूबर, 1961 ई० को पंचायती राज्य का तीन स्तरीय ढांचा औपचारिक रूप से लागू किया गया। 1992 में 73वां संवैधानिक संशोधन हुआ जिनमें शक्तियों का स्थानीय स्तर तक विकेन्द्रीकरण कर दिया गया। इससे पंचायती राज्य को बहुत-सी वित्तीय तथा अन्य शक्तियां दी गईं।

भारत के ग्रामीण समुदाय में पिछले 50 सालों में बहुत-से परिवर्तन आए हैं। अंग्रेज़ों ने भारतीय पंचायतों से सभी प्रकार के अधिकार छीन लिए थे। वह अपनी मर्जी के अनुसार गांवों को चलाना चाहते थे जिस कारण उन्होंने गांवों में एक नई तथा समान कानून व्यवस्था लागू की। आजकल की पंचायतें तो आज़ादी के बाद ही कानून के तहत सामने आयी हैं।
ए० एस० अलटेकर (A.S. Altekar) के अनुसार, “प्राचीन भारत में सुरक्षा, लगान इकट्ठा करना, कर लगाने तथा लोक कल्याण के कार्यक्रमों को लागू करना इत्यादि जैसे अलग-अलग कार्यों की जिम्मेदारी गांव की पंचायत की होती थी। इसलिए ग्रामीण पंचायतें विकेन्द्रीकरण, प्रशासन तथा शक्ति की बहुत ही महत्त्वपूर्ण संस्थाएं हैं।”

के० एम० पानीकर (K.M. Pannikar) के अनुसार, “यह पंचायतें प्राचीन भारत के इतिहास का पक्का आधार हैं। इन संस्थाओं ने देश की खुशहाली को मज़बूत आधार प्रदान किया है।”
संविधान के Article 30 के चौथे हिस्से में कहा गया है कि, “गांव की पंचायतों का संगठन-राज्य को गांव की पंचायतों के संगठन को सत्ता तथा शक्ति प्रदान की जानी चाहिए ताकि यह स्वैः सरकार की इकाई के रूप में कार्य कर सकें।”

गांवों की पंचायतें गांव के विकास के लिए बहुत-से कार्य करती हैं जिस लिए पंचायतों के कुछ मुख्य उद्देश्य रखे गए हैं जिनका वर्णन इस प्रकार है।

पंचायतों के उद्देश्य (Aims of Panchayats) –

  1. पंचायतों को स्थापित करने का सबसे पहला उद्देश्य है लोगों की समस्याओं को स्थानीय स्तर पर ही हल करना। ये पंचायतें लोगों के बीच के झगड़ों तथा समस्याओं को हल करती हैं।
  2. गांव की पंचायतें लोगों के बीच सहयोग, हमदर्दी, प्यार की भावनाएं पैदा करती हैं ताकि सभी लोग गांव की प्रगति में योगदान दे सकें।
  3. पंचायतों को गठित करने का एक और उद्देश्य है लोगों को तथा पंचायत के सदस्यों को पंचायत का प्रशासन ठीक प्रकार से चलाने के लिए शिक्षित करना ताकि सभी लोग मिल कर गांव की समस्याओं के हल निकाल सकें। इस तरह लोक कल्याण का कार्य भी पूर्ण हो जाता है।

गांवों की पंचायतों का संगठन (Organisation of Village Panchayats)-गांवों में दो प्रकार की पंचायतें होती हैं। पहली प्रकार की पंचायतें वे होती हैं जो सरकार द्वारा बनाए कानूनों अनुसार चुनी जाती हैं तथा ये औपचारिक होती हैं। दूसरी पंचायतें वे होती हैं जो अनौपचारिक होती हैं तथा इन्हें जाति पंचायतें भी कहा जाता है। इनकी कोई कानूनी स्थिति नहीं होती है परन्तु यह सामाजिक नियन्त्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

पंचायतों में तीन तरह का संगठन पाया जाता है-

  1. ग्राम सभा (Gram Sabha)
  2. ग्राम पंचायत (Gram Panchayat)
  3. न्याय पंचायत (Nyaya Panchayat)

ग्राम सभा (Gram Sabha) गांव की सम्पूर्ण जनसंख्या में से बालिग व्यक्ति इस ग्राम सभा का सदस्य होता है तथा यह गांव की सम्पूर्ण जनसंख्या की एक सम्पूर्ण इकाई है। यह वह मूल इकाई है जिसके ऊपर हमारे लोकतन्त्र का ढांचा टिका हुआ है। जिस ग्राम की जनसंख्या 250 से अधिक होती है वहां ग्राम सभा बन सकती है। अगर एक गांव की जनसंख्या कम है तो दो गांव मिलकर ग्राम सभा का निर्माण करते हैं। ग्राम सभा में गांव का प्रत्येक वह बालिग सदस्य होता है जिस को वोट देने का अधिकार होता है। प्रत्येक ग्राम सभा का एक प्रधान तथा कुछ सदस्य होते हैं। यह पांच सालों के लिए चुने जाते हैं।

ग्राम सभा के कार्य (Functions of Gram Sabha)-पंचायत के सालाना बजट तथा विकास के लिए किए जाने वाले कार्यक्षेत्रों को ग्राम सभा पेश करती है तथा उन्हें लागू करने में मदद करती है। यह समाज कल्याण के कार्य, प्रौढ़ शिक्षा के कार्यक्रम तथा परिवार कल्याण के कार्यों को करने में मदद करती है। यह गांवों में एकता रखने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

ग्राम पंचायत (Gram Panchayat)-हर एक ग्राम सभा अपने क्षेत्र में से एक ग्राम पंचायत को चुनती है। इस तरह ग्राम सभा एक कार्यकारिणी संस्था है जो ग्राम पंचायत के लिए सदस्य चुनती है। इनमें 1 सरपंच तथा 5 से लेकर 13 पंच होते हैं। पंचों की संख्या गांव की जनसंख्या के ऊपर निर्भर करती है। पंचायत में पिछडी श्रेणियों तथा औरतों के लिए स्थान आरक्षित होते हैं। यह 5 वर्ष के लिए चुनी जाती है। परन्तु अगर पंचायत अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करे तो राज्य सरकार उसे 5 साल से पहले भी भंग कर सकती है। अगर किसी ग्राम पंचायत को भंग कर दिया जाता है तो उसके सभी पद भी अपने आप ही समाप्त हो जाते हैं। ग्राम पंचायत के चुनाव तथा पंचों को चुनने के लिए गांव को अलग-अलग हिस्सों में बांट लिया जाता है। फिर ग्राम सभा के सदस्य पंचों तथा सरपंच का चुनाव करते हैं। ग्राम पंचायत में स्त्रियों के लिए आरक्षित सीटें कुल सीटों का एक तिहायी (1/3) होती हैं तथा पिछड़ी जाति के लिए आरक्षित सीटें गांव या उस क्षेत्र में उनकी जनसंख्या के अनुपात के अनुसार होती हैं। ग्राम पंचायत में सरकारी नौकर तथा मानसिक तौर पर बीमार व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकते। ग्राम पंचायतें गांव में सफ़ाई, मनोरंजन, उद्योग, संचार तथा यातायात के साधनों का विकास करती हैं तथा गांव की समस्याओं का समाधान करती पंचायतों के कार्य (Functions of Panchayat) ग्राम पंचायत गांव के लिए बहुत-से कार्य करती है जिनका वर्णन इस प्रकार है-

  • ग्राम पंचायत का सबसे पहला कार्य गांव के लोगों के सामाजिक तथा आर्थिक जीवन के स्तर को ऊँचा उठाना होता है। गांव में बहुत-सी सामाजिक बुराइयां भी पायी जाती हैं। पंचायत लोगों को इन बुराइयों को दूर करने के लिए प्रेरित करती है तथा उनके परम्परागत दृष्टिकोण को बदलने का प्रयास करती है।
  • किसी भी क्षेत्र के सर्वपक्षीय विकास के लिए यह ज़रूरी है कि उस क्षेत्र से अनपढ़ता ख़त्म हो जाए तथा भारतीय समाज के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण भी यही है। भारतीय गांव भी इसी कारण पिछड़े हुए हैं। गांव की पंचायत गांव में स्कूल खुलवाने तथा लोगों को अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करती है। बालिगों को पढ़ाने के लिए प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र खुलवाने का भी प्रबन्ध करती है।
  • गांव की पंचायत गांव की स्त्रियों तथा बच्चों की भलाई के लिए भी कार्य करती है। वह औरतों को शिक्षा दिलाने का प्रबन्ध करती है। बच्चों को अच्छी खुराक तथा उनके मनोरंजन के कार्य का प्रबन्ध भी पंचायत ही करती है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में मनोरंजन के साधन नहीं होते हैं। इसलिए पंचायतें ग्रामीण समाजों में मनोरंजन के साधन उपलब्ध करवाने का प्रबन्ध भी करती है। पंचायतें गांव में फिल्मों का प्रबन्ध, मेले लगवाने तथा लाइब्रेरी इत्यादि खुलवाने का प्रबन्ध करती है।
  • कृषि प्रधान देश में उन्नति के लिए कृषि के उत्पादन में बढ़ोत्तरी होनी ज़रूरी होती है। पंचायतें लोगों को नई तकनीकों के बारे में बताती है, उनके लिए नए बीजों, उन्नत उर्वरकों का भी प्रबन्ध करती है ताकि उनके कृषि उत्पादन में भी बढ़ोत्तरी हो सके।
  • गांवों के सर्वपक्षीय विकास के लिए गांवों में छोटे-छोटे उद्योग लगवाना भी जरूरी होता है। इसलिए पंचायतें गांव में सरकारी मदद से छोटे-छोटे उद्योग लगवाने का प्रबन्ध करती हैं। इससे गांव की आर्थिक उन्नति भी होती है तथा लोगों को रोजगार भी प्राप्त होता है।
  • कृषि के अच्छे उत्पादन में सिंचाई के साधनों का अहम रोल होता है। ग्राम पंचायत गांव में कुएँ, ट्यूबवैल इत्यादि लगवाने का प्रबन्ध करती है तथा नहरों के पानी की भी व्यवस्था करती है ताकि लोग आसानी से अपने खेतों की सिंचाई कर सकें।
  • गांव में लोगों में आमतौर पर झगड़े होते रहते हैं। पंचायतें उन झगड़ों को ख़त्म करके उनकी समस्याओं को हल करने का प्रयास करती हैं।

न्याय पंचायत (Nayaya Panchayat)-गांव के लोगों में झगड़े होते रहते हैं। न्याय पंचायत लोगों के बीच होने वाले झगड़ों का निपटारा करती है। 5-10 ग्राम-सभाओं के लिए एक न्याय पंचायत बनायी जाती है। इसके सदस्य चुने जाते हैं तथा सरपंच 5 सदस्यों की एक कमेटी बनाता है। इन को पंचायतों से प्रश्न पूछने का भी अधिकार होता है।.

पंचायत समिति (Panchayat Samiti)-एक ब्लॉक में आने वाली पंचायतें पंचायत समिति की सदस्य होती हैं तथा इन पंचायतों के सरपंच इसके सदस्य होते हैं। पंचायत समिति के सदस्यों का सीधा-चुनाव होता है। पंचायत समिति अपने क्षेत्र में आने वाली पंचायतों के कार्यों का ध्यान रखती है, गांवों के विकास कार्यों को चैक करती है तथा पंचायतों को गांव के कल्याण के लिए निर्देश भी देती है। यह पंचायती राज्य के दूसरे स्तर पर है।

जिला परिषद् (Zila Parishad)—पंचायती राज्य का सबसे ऊँचा स्तर हैं ज़िला परिषद् जोकि जिले में आने वाले पंचायतों के कार्यों का ध्यान रखती है। यह भी एक कार्यकारी संस्था होती है। पंचायत समितियों के चेयरमैन, चुने हुए सदस्य, लोक सभा, राज्य सभा, विधान सभा के सदस्य सभी जिला परिषद् के सदस्य होते हैं। यह सभी जिले में पड़ते गांवों के विकास कार्यों का ध्यान रखते हैं। जिला परिषद् कृषि में सुधार, ग्रामीण बिजलीकरण, भूमि सुधार, सिंचाई बीजों तथा उर्वरकों को उपलब्ध करवाना, शिक्षा, उद्योग लगवाने इत्यादि जैसे कार्य करती है।

प्रश्न 3. हित समूह किस प्रकार दबाव समूहों के रूप में काम करते हैं ?
उत्तर-पिछले कुछ समय के दौरान समाज में श्रम विभाजन नाम का संकल्प सामने आया है। श्रम विभाजन में अलग-अलग व्यक्ति अलग-अलग कार्य करते हैं जिस कारण बहुत से पेशेवर समूह सामने आए हैं। इन सभी पेशेवर समूहों के अपने-अपने हित होते हैं जिनकी प्राप्ति के लिए वे लगातार कार्य करते रहते हैं। इस प्रकार जो समूह किसी विशेष समूह के हितों का ध्यान रखते हैं तथा उन्हें प्राप्त करने के प्रयास करते हैं उन्हें हित समूह कहा जाता है। आजकल के लोकतांत्रिक समाजों में यह राजनीतिक निर्णय तथा अन्य प्रक्रियाओं को अपने हितों के अनुसार बदलने के प्रयास करते रहते हैं। यह समूह आवश्यकता पड़ने पर राजनीतिक दलों की भी सहायता करते हैं तथा उनके द्वारा सरकारी फैसलों को प्रभावित करने के प्रयास करते हैं। लगभग सभी हित समूहों का एक ही उद्देश्य होता है कि उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण स्थान हासिल हो। इसलिए वे सरकार पर उनके लिए नीतियां बनाने का दबाव डालते हैं। जब यह दबाव डालना शुरू कर देते हैं तो इन्हें दबाव समूह भी कहा जाता है

दबाव समूह संगठित या असंगठित होते हैं जो सरकारी नीतियों को प्रभावित करते हैं तथा अपने हितों को आगे बढ़ाते हैं। यह राजनीति को जिस ढंग से प्रभावित करने का प्रयास करते हैं उसका वर्णन इस प्रकार है-

  • यह दबाव समूह किसी विशेष मुद्दे पर आंदोलन चलाते हैं ताकि जनता का समर्थन हासिल किया जा सके। यह संचार साधनों की सहायता लेते हैं ताकि जनता का अधिक-से-अधिक ध्यान खींचा जा सके।
  • यह साधारणतया हड़तालें करवाते हैं, रोष मार्च निकालते हैं तथा सरकारी कार्यों को रोकने का प्रयास करते हैं। यह हड़ताल की घोषणा करते हैं तथा धरने पर बैठते हैं ताकि अपनी आवाज़ उठा सकें। अधिकतर मजदूर संगठन इस प्रकार से अपनी बातें मनवाते हैं।
  • साधारणतया व्यापारी समूह लॉबी का निर्माण करते हैं जिसके कुछ समान हित होते हैं ताकि सरकार पर उसकी नीतियां बदलने के लिए दबा बनाया जा सके।
  • प्रत्येक दबाव समूह या हित समूह किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़ा होता है। यह समूह चुनाव के समय अपने-अपने राजनीतिक दल का तन-मन-धन से समर्थन करते हैं ताकि वह चुनाव जीत कर उनकी मांगें पूर्ण करें।

प्रश्न 4. धर्म को परिभाषित कीजिए। इसकी विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर-सामाजिक शास्त्रियों के लिए सब से मुश्किल काम धर्म की परिभाषा देना है व ऐसी परिभाषा देना जिस पर सभी एक मत हों। इसका कारण है कि धर्म की प्रकृति काफ़ी जटिल है तथा इसके बारे में समाजशास्त्री अलगअलग विचार रखते हैं। यह इस कारण है कि अलग-अलग समाजशास्त्री अलग-अलग देशों व भिन्न-भिन्न संस्कृतियों से सम्बन्ध रखते हैं और इस कारण उनकी धर्म के बारे में व्याख्या भिन्न-भिन्न होती है। दुनिया में बहुत सारे धर्म हैं तथा इसी विविधता के कारण वह सभी धर्म की एक परिभाषा पर सहमत नहीं हैं। परन्तु फिर भी अलगअलग समाजशास्त्रियों ने धर्म की भिन्न-भिन्न परिभाषाएं दी हैं जिनका वर्णन इस प्रकार है-

  • दुर्जीम (Durkheim) के अनुसार, “धर्म पवित्र वस्तुओं से सम्बन्धित विश्वासों व आचरणों की एक ठोस व्यवस्था है जो इन पर विश्वास करने वालों को एक नैतिक समुदाय में संगठित करती है।”
  • फ्रेज़र (Frazer) के अनुसार, “धर्म मानव रूप अपने से श्रेष्ठ शक्तियों में विश्वास है। जिस सम्बन्ध में यह विश्वास किया जाता है वह प्रकृति व मानवीय जीवन का मार्ग दर्शन हैं व इसको नियन्त्रण करती है।”
  • मैकाइवर (MacIver) के अनुसार, “धर्म के साथ जैसे कि हम समझते हैं कि केवल मनुष्यों के बीच का सम्बन्ध ही नहीं है बल्कि एक सर्वोच्च शक्ति के प्रति मनुष्य का सम्बन्ध भी सूचित होता है।”
  • मैलिनोवस्की (Malinowski) के अनुसार, “धर्म क्रिया का एक ढंग है व साथ ही विश्वास की एक व्यवस्था है। धर्म एक समाजशास्त्रीय घटना के साथ-साथ व्यक्तिगत अनुभव भी है।”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि धर्म का आधार आलौकिक शक्ति पर विश्वास है और पद शक्ति मानवीय शक्ति से श्रेष्ठ व शक्तिशाली समझी जाती है। यह जीवन के सभी तत्त्वों यह नियन्त्रण रखती है जिनको आदमी अधिक महत्त्वपूर्ण समझता है। इसका एक आधार भावनात्मक होता है। इस शक्ति को खुश रखने के लिए कई विधियां या संस्कार होते हैं। स्पष्ट है कि धर्म की स्वीकृति परा-सामाजिक है क्योंकि धर्म की पुष्टि परा सामाजिक शक्तियों द्वारा होती है। समाज में धर्म का प्रयोग काफ़ी व्यापक रूप में किया जाता है समाजशास्त्रियों अनुसार धर्म मानव की आदतों व भावनात्मक अनुभूतियों की प्रतिनिधिता करता है। डर की भावनाओं के कारण व कई वस्तुओं प्रति मानव की श्रद्धा के कारण धर्म का विकास हुआ है।

धर्म के तत्त्व या विशेषताएं (Elements or Characteristics of Religion). –

1. आलौकिक शक्ति में विश्वास (Belief in Super natural Power)-धर्म विचारों, भावनाओं व विधियों की जटिलता है जो आलौकिक शक्तियों में विश्वास प्रकट करती है यानि यह शक्ति सर्वव्यापक व सर्व शक्तिमान है। यह विश्वास किया जाता है कि प्रत्येक मानवीय क्रिया का संचालन इसी शक्ति द्वारा होता है। इस प्रकार धर्म की सब से पहली विशेषता आलौकिक शक्ति पर विश्वास है। इस आलौकिक शक्ति के आधार तो भिन्न-भिन्न होते हैं पर यह शक्ति सारे धर्मों में आवश्यक तौर पर पाई जाती है।

2. संस्कार (Rituals)-धार्मिक रीतियां धर्म द्वारा निर्धारित क्रियाएं हैं। यह अपने आप में पवित्र हैं व पवित्रता की प्रतीक भी हैं। उदाहरण के लिए हिन्दू धर्म के अनुसार कई तरह के व्रत व तीर्थ यात्रा धार्मिक संस्कार है। एक धर्म के पैरोकारों को धार्मिक संस्कार एक सूत्र में बांधते हैं जबकि दूसरे धर्म के पैरोकारों को वह खुद से भिन्न समझते हैं।

3. धार्मिक कार्य विधियां (Religion Acts)—प्रत्येक धर्म की एक और महत्त्वपूर्ण विशेषता उसकी विभिन्न धार्मिक गतिविधियां हैं। इन कार्य विधियों द्वारा मानव विशेष आलौकिक शक्तियों को खुश करने की कोशिश करता है और इन्हें सिर चढ़ा कर इन शक्तियों में अपना विश्वास प्रकट करता है। यह कार्य विधियां दो प्रकार की हैं। पहली वह क्रियाएं जिसको पूरा करने के लिए विशेष धार्मिक ज्ञान की आवश्यकता है। आम आदमी यह काम नहीं कर सकता। इनको प्रत्येक धर्म में धार्मिक पण्डितों द्वारा पूरा कराया जाता है। दूसरा साधारण धार्मिक क्रियाएं हैं जैसे प्रार्थना करना, तीर्थ यात्रा आदि जिसके साधारण व्यक्ति आसान तरीके से पूरी कर लेता है। पर प्रत्येक धर्म में यह विश्वास प्रचलित है कि धार्मिक कार्यों को पूरा करके ही व्यक्ति दैवीय शक्तियों को खुश रख सकता है।

4. धार्मिक प्रतीक व चिह्न (Religious Symbols)—प्रत्येक धर्म में आलौकिक शक्ति के दर्शनों के लिए कुछ चिह्नों व प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है। जैसे हिन्दू धर्म में मूर्ति को दिव्य शक्ति के रूप में पूजा जाता है। प्रत्येक धर्म के साथ आलौकिक शक्तियों सम्बन्धी कई तरह की कहानियां जुड़ी होती हैं। लोगों को यह विश्वास होता है कि वह इन आलौकिक कथाओं में विश्वास करके भगवान् को खुश कर सकते हैं।

5. धार्मिक प्रस्थिति (Religious Hierarchy)-किसी भी धर्म के सभी पैरोकारों की धार्मिक समूह में प्रस्थिति समान नहीं होती। प्रत्येक धर्म में प्रस्थितियों की व्यवस्था मिलती है। उच्च पदति पर वह लोग होते हैं जो कि धार्मिक क्रियाओं को पूरा करने में माहिर होते हैं इन्हें दूसरे व्यक्तियों की तुलना में पवित्र समझा जाता है जैसे कि पुरोहित या पण्डित। दूसरी जगह वह लोग आते हैं जिन्हें अपने धार्मिक प्रतिनिधियों व सिद्धान्तों में पूरा विश्वास होता है। सबसे नीचे वह व्यक्ति आते हैं जिन्हें पवित्र नहीं माना जाता और वह धर्म द्वारा अपवित्र करार दिए काम करते हैं। अनेकों धर्मों में इस श्रेणी पर कई प्रकार के प्रतिबन्ध लगा दिए जाते हैं।

6. धार्मिक ग्रन्थ (Religious Books)—प्रत्येक धर्म का एक प्रमुख लक्षण रहा है, उससे सम्बन्धित ग्रन्थ या पुस्तकें। हर एक धर्म से सम्बन्धित कुछ धार्मिक लोग धार्मिक ग्रन्थ लिखते हैं तथा प्रत्येक धर्म की कुछ कथाएं, कहानियां होती हैं जिनका वर्णन इन ग्रन्थों में होता है; जैसे हिन्दू धर्म में रामायण, महाभारत, गीता, चार वेद, मनुस्मृति उपनिषद आदि होते हैं। इस प्रकार मुसलमानों में कुरान, सिक्खों में गुरु ग्रन्थ साहिब व ईसाइयों में बाईबल होते हैं।

7. पवित्रता की धारणा (Concept of Sacredness)-धर्म से सम्बन्धित सभी चीज़ों को पवित्र समझा जाता है। व्यक्ति जिस धर्म से सम्बन्धित होता है, उस धर्म की प्रत्येक वस्तु उसके लिए पवित्र होती है। हम कह सकते हैं कि धर्म पवित्र वस्तुओं से सम्बन्धित ऐसी व्यवस्था है जो नैतिक तौर पर समुदाय को इकट्ठा करती है।

प्रश्न 5. धर्म किस प्रकार समाज के लिए उपयोगी व हानिकारक है ?
उत्तर-धर्म के निम्नलिखित लाभ हैं :
1. सामाजिक संगठन को स्थिरता प्रदान करना (To give stability to social organization)समाज को स्थिरता प्रदान करने में और सामाजिक संगठन को बनाए रखने में धर्म का महत्त्वपूर्ण हाथ होता है। एक धर्म में लाखों व्यक्ति होते हैं, जिनके विचार व विश्वास साझे होते हैं। साझे विश्वास, प्रतिमान, व्यवहार के तरीके कम-से-कम उस धार्मिक समूह को एक कर देते हैं व उस समूह में एकता बन जाती है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न समूहों में एकता से सामाजिक संगठन दृढ़ व मज़बूत हो जाता है। प्रत्येक धर्म अपने धर्म के लोगों को दान देने, दया करने, सहयोग देने के लिए कहते हैं जिस कारण समाज में मज़बूती व स्थिरता बनी रहती है। इस तरह धर्म लोगों को अस्थिरता से बचाता है व समाज को स्थिरता प्रदान करता है।

2. सामाजिक जीवन को निश्चित रूप देना (To give definite form to social life) कोई भी धर्म रीति-रिवाज़ों रूढ़ियों का समूह होता है यह रीति-रिवाज व रूढ़ियां संस्कृति का ही भाग होते हैं। इस तरह धर्म के कारण सामाजिक वातावरण व संस्कृति में सन्तुलित बन जाता है। इस सन्तुलन के कारण सामाजिक जीवन को निश्चित रूप मिल जाता है। धर्म करण लोग रीति-रिवाजों तथा रूढ़ियों का आदर करते हैं और अन्य लोगों से सन्तुलन बना कर चलते हैं। इस तरह के सन्तुलन से ही सामाजिक जीवन सही ढंग से चलता रहता है व यह सब धर्म के कारण ही होता है।

3. पारिवारिक जीवन को संगठित करना (To organise family life)-भिन्न-भिन्न धर्मों में विवाह धार्मिक परम्पराओं के अनुसार होता है। धार्मिक परम्पराओं द्वारा परिवार स्थायी बन जाता है व उसका संगठन, जीवन आदि मज़बूत होता है। प्रत्येक धर्म परिवार के भिन्न-भिन्न सदस्यों के कर्त्तव्य व अधिकारों को निश्चित करता है। यह पिता, माता, बच्चों को बताता है कि उनके एक-दूसरे के प्रति क्या कर्त्तव्य हैं ? सारे परिवार में रहते हुए एकदूसरे के प्रति अपने कर्त्तव्यों की पालना करते हैं तथा एक-दूसरे के परिवार चलाने के लिए सहयोग करते हैं। इस तरह परिवार के सभी सदस्यों में सन्तुलन बना रहता है। परिवार में किए जाने वाले आमतौर पर सभी काम धर्म द्वारा निश्चित किए जाते हैं।

4. भेद-भाव दूर करना (To remove mutual differences)-दुनिया में बहुत सारे धर्म हैं व सभी धर्म ही एक-दूसरे के साथ लड़ने का नहीं बल्कि एक-दूसरे से प्यार से रहने का उपदेश देते हैं तथा यह भी कहते हैं कि वह आपसी भेद-भाव दूर करें। आपसी भेद-भाव को दूर करने से समाज में एकता बढ़ती है। इन धर्मों ने व उन्हें चलाने वालों ने समाज की नई जातियों के लोगों को आगे बढ़ाया।

5. सामाजिक नियन्त्रण रखना (To keep social control)-धर्म सामाजिक नियन्त्रण के प्रमुख साधनों में एक है। धर्म के पीछे सभी समुदाय की अनुमति होती है। व्यक्ति पर न चाहते हुए भी धर्म ज़बरदस्ती प्रभाव डालता है तथा वह इसका प्रभाव भी महसूस करता है कि धर्म का उनके जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव होता है। धर्म अपने सदस्यों के जीवन को इस तरह नियन्त्रित और निर्देशित करता है कि व्यक्ति को धर्म के आगे झुकना व उसका कहना मानना ही पड़ता है। धर्म आलौकिक शक्ति पर विश्वास है और लोग उस आलौकिक शक्ति के क्रोध से बचने के लिए कोई ऐसा काम नहीं करते जो कि उसकी इच्छाओं के विरुद्ध हो। इस प्रकार लोगों के व्यवहार व क्रिया करने के तरीके धर्म द्वारा नियन्त्रित होते हैं।।

6. समाज कल्याण (Social Welfare)—प्रत्येक धर्म अपने सदस्यों को समाज कल्याण के काम करने के लिए उत्साहित करता है दुनिया के सभी धर्मों में दान देना पवित्र माना जाता है। लोग धर्मशालाएं, अनाथालय, अस्पताल, आश्रम व स्कूलों को खुलवा कर वहां दान देकर उनकी मदद करते हैं।

7. व्यक्ति का विकास (Development of Man)-धर्म समाज का विकास करता है उसकी एकता, व सामाजिक संगठन का भी विकास करता है बल्कि वह व्यक्ति का विकास भी करता है। धर्म व्यक्ति का समाजीकरण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। धर्म उसको समाज में व्यवहार करने के तरीके बताता है, समाज के प्रतिमानों के बारे में बताता है। धर्म व्यक्तियों में भाई-चारे व एकता का निर्माण करता है। धर्म व्यक्ति में आध्यात्मिकता का विकास करता है धर्म से व्यक्तियों का आत्मबल बना रहता है। धर्म मानव को बड़ी-बड़ी मुश्किलों में स्थिर रहने की प्रेरणा देता है। धर्म लोगों को दान देना, सहयोग करना, सहनशीलता रखने की प्रेरणा देता है ताकि समाज के बेसहारा लोगों को सहारा मिल सके, क्योंकि इन बेसहारा लोगों का धर्म के सिवा और कोई नहीं होता।

धर्म के दोष अथवा अकार्य (Demerits or Dysfunctions of Religion) –

1. धर्म सामाजिक उन्नति के रास्ते में रुकावट बनता है (Religion is an obstacle)-धर्म प्रकृति से ही रूढ़िवादी होता है व परिवर्तन प्रकृति का ही नियम है। समाज में परिवर्तन आते रहते हैं जिनके कारण मौलिक तौर पर समाज की प्रगति तो हो जाती है पर आध्यात्मिक तौर पर नहीं होती। धर्म आमतौर पर परिवर्तन का विरोधी होता है। धर्म स्थिति को बदलने के पक्ष में नहीं बल्कि जैसे का तैसा बन कर रखने के पक्ष में होता है। बदले हुए हालात धर्म के अनुसार नहीं होते जिस कारण धर्म परिवर्तन का विरोध करता है। परिवर्तन का विरोध करके यह सामाजिक उन्नति के रास्ते में रुकावट बनता है।

2. व्यक्ति किस्मत के सहारे रह जाता है (Man become fatalist)-धर्म यह कहता है कि जो कुछ व्यक्ति की किस्मत में लिखा है वह उसको प्राप्त होगा। उसको न तो उससे अधिक और न ही उससे कम प्राप्त होगा। ऐसा सोचकर कुछ व्यक्ति अपना कर्म करना बन्द कर देते हैं कि यदि मिलना ही किस्मत के अनुसार है तो काम करने का क्या लाभ है? जो कुछ भी किस्मत में लिखा है वह तो मिल ही जाएगा। इसी तरह व्यक्ति किस्मत के सहारे रह जाता है।

3. राष्ट्रीय एकता का विरोधी (Opposite to National Unity) धर्म को हम राष्ट्रीय एकता का विरोधी ही कह सकते हैं। आमतौर पर प्रत्येक धर्म अपने-अपने सदस्य को अपने धर्म के नियमों पर चलने की शिक्षा देते हैं व यह नियम आमतौर पर दूसरे धर्म के विरोधी होते हैं। अपने धर्म को प्यार करते-करते कई बार लोग दूसरे धर्मों का विरोध करने लग जाते हैं। इस विरोध के कारण धार्मिक संकीर्णता व असहनशीलता पैदा होती है।

4. धर्म सामाजिक समस्याएं बढ़ाता है (Religion increases the Social Problems)—प्रत्येक धर्म में बहुत सारे कर्मकाण्ड, रीतियां आदि होते हैं। धर्म के ठेकेदार, पुजारी, महन्त इत्यादि इन कर्मकाण्डों को ज़रूरी समझते हैं। इन कर्मकाण्डों के कारण व्यक्ति अन्धविश्वासों में फँस जाता है। धर्म के ठेकेदार लोगों को दूसरे धर्मों के विरुद्ध भड़काते हैं। धर्म के कारण ही हमारे देश में कई समस्याएं हैं जैसे बाल विवाह, सती प्रथा, दहेज प्रथा, विधवा विवाह न होना, अस्पृश्यता, गरीबी आदि।

5. धर्म परिवर्तन के रास्ते में रुकावट है (Religion is an obstacle in the way of change)-धर्म हमेशा परिवर्तन के रास्ते में रुकावट बनता है। दुनिया में भिन्न-भिन्न प्रकार की नई खोजें होती रहती हैं। धर्म क्योंकि रूढ़िवादी होता है इस कारण वह परिवर्तन का हमेशा विरोधी होता है। समाज में होने वाले किसी भी परिवर्तन का विरोध धर्म सब से पहले करता है।

6. धर्म समाज को बांटता है (Religion divides, society)-धर्म समाज को बांट देता है। एक ओर तो वह लोग होते हैं जो अनपढ़ होते हैं व धर्म द्वारा फैलाए अन्ध-विश्वासों, कुरीतियों में फंसे होते हैं व दूसरी ओर वह पढ़े-लिखे होते हैं जो इन धर्म के अन्ध-विश्वासों व कुरीतियों से दूर होते हैं। अनपढ़ अन्ध-विश्वासों को मानते हैं व पढ़े-लिखे इन अन्ध-विश्वासों का विरोध करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि दोनों धर्म एक-दूसरे के विरोधी हो जाते हैं व उनमें अनुकूलन मुश्किल हो जाता है।

प्रश्न 6. आदिम, पशुपालक, कृषि तथा औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं की विशेषताओं की संक्षेप में चर्चा कीजिए।
उत्तर-(i) आदिम अर्थव्यवस्था (Primitive Economy) बहुत-से कबीले दूर-दूर के जंगलों तथा पहाड़ों पर रहते हैं। चाहे यातायात के साधनों के कारण बहुत-से कबीले मुख्य धारा में आकर मिल गए हैं तथा उन्होंने कृषि के कार्य को अपना लिया है परन्तु फिर भी कुछ कबीले ऐसे हैं जो अभी भी भोजन इकट्ठा करके तथा शिकार करके अपना जीवन व्यतीत करते हैं। वे जड़ें, फल, शहद इत्यादि इकट्ठा करते हैं तथा छोटे-छोटे जानवरों का शिकार भी करते हैं। कुछ कबीले कई चीज़ों का लेन-देन भी करते हैं। इस तरह कृषि के न होने की सूरत में वे अपनी आवश्यकताएं पूर्ण कर लेते हैं।

जो कबीले इस प्रकार से अपनी ज़रूरतें पूर्ण करते हैं उनको प्राचीन कबीले कहा जाता है। यह लोग शिकार करने के साथ-साथ जंगलों से फल, शहद, जड़ें इत्यादि भी इकट्ठा करते हैं। इस तरह वे कृषि के बिना भी अपनी आवश्यकताएं पूर्ण कर लेते हैं। जिस प्रकार से वे जानवरों का शिकार करते हैं उससे उनकी संस्कृति के बारे में भी पता चल जाता है। उनके समाजों में औज़ारों तथा साधनों की कमी होती है जिस कारण ही वे प्राचीन कबीलों के प्रतिरूप होते हैं। उनके समाजों में अतिरिक्त उत्पादन की धारणा नहीं होती है। इसका कारण यह है कि वे न तो अतिरिक्त उत्पादन को सम्भाल सकते हैं तथा न ही अतिरिक्त चीजें पैदा कर सकते हैं। वह तो टपरीवास अथवा घुमन्तु जीवन व्यतीत करते हैं।

(ii) पशुपालक आर्थिकता (Pastoral Economy)-पशुपालक अर्थव्यवस्था जनजातीय अर्थव्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। लोग अलग-अलग उद्देश्यों के लिए पशुओं को पालते हैं जैसे कि दूध लेने के लिए, मीट के लिए, ऊन के लिए, भार ढोने के लिए इत्यादि। भारत में रहने वाले चरवाहे कबीले स्थायी जीवन व्यतीत करते हैं तथा मौसम के अनुसार ही चलते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले कबीले अधिक सर्दी के समय मैदानी क्षेत्रों में अपने पशुओं के साथ चले जाते हैं तथा गर्मियों में वापस अपने क्षेत्रों में चले आते हैं। भारतीय कबीलों में प्रमुख चरवाहा कबीला हिमाचल प्रदेश में रहने वाला गुज्जर कबीला है जो व्यापार के उद्देश्य से गाय तथा भेड़ों को पालता है। इसके साथ-साथ तमिलनाडु के टोडस कबीले में भी यह प्रथा प्रचलित है। यह कबीला जानवरों को पालता है तथा उनसे दूध प्राप्त करता है। दूध कों या तो विनिमय के लिए प्रयोग किया जाता है या फिर अपनी आवश्यकताएं पूर्ण करने के लिए प्रयोग किया जाता है। भारतीय कबीलों में चरवाहे साधारणतया स्थापित जीवन व्यतीत करते हैं तथा उनसे कई प्रकार की चीजें जैसे कि दूध, ऊन, मांस इत्यादि प्राप्त करते हैं। वे पशुओं जैसे कि भेड़ों, बकरियों इत्यादि का व्यापार भी करते हैं।

(iii) कृषि अर्थव्यवस्था (Agrarian Economy)-ग्रामीण समाज का मुख्य व्यवसाय कृषि पेशा या उस पर आधारित कार्य होते हैं क्योंकि ग्रामीण समाज प्रकृति के बहुत ही नज़दीक होता है। क्योंकि इनमें प्रकृति के साथ बहुत ही नज़दीकी के सम्बन्ध होते हैं इस कारण यह जीवन को एक अलग ही दृष्टिकोण से देखते हैं। चाहे गांवों में और पेशों को अपनाने वाले लोग भी होते हैं जैसे कि बढ़ई, लोहार इत्यादि परन्तु यह बहुत कम संख्या में होते हैं तथा यह भी कृषि से सम्बन्धित चीजें ही बनाते हैं। ग्रामीण समाज में भूमि को बहुत ही महत्त्वपूर्ण समझा जाता है तथा लोग यहीं पर रहना पसन्द करते हैं क्योंकि उनका जीवन भूमि पर ही निर्भर होता है। यहां तक कि लोगों तथा गांव की आर्थिक व्यवस्था तथा विकास कृषि पर निर्भर करता है।

(iv) औद्योगिक अर्थव्यवस्था (Industrial Economy)-शहरी अर्थव्यवस्था को औद्योगिक अर्थव्यवस्था का नाम भी दिया जा सकता है क्योंकि शहरी अर्थव्यवस्था उद्योगों पर ही आधारित होती है। शहरों में बड़े-बड़े उद्योग लगे होते हैं जिन में हज़ारों लोग कार्य करते हैं। बड़े उद्योग होने के कारण उत्पादन भी बड़े पैमाने पर होता है। इन बड़े उद्योगों के मालिक निजी व्यक्ति होते हैं। उत्पादन मण्डियों के लिए होता है। ये मण्डियां न केवल देसी बल्कि विदेशी भी होती हैं। कई बार तो उत्पादन केवल विदेशी मण्डियों को ध्यान में रख कर किया जाता है। बड़ेबड़े उद्योगों के मालिक अपने लाभ के लिए ही उत्पादन करते हैं तथा मजदूरों का शोषण भी करते हैं।

शहरी समाजों में पेशों की भरमार तथा विभिन्नता पायी जाती है। प्राचीन समय में तो परिवार ही उत्पादन की इकाई होता था। सारे कार्य परिवार में ही हुआ करते थे परन्तु शहरों के बढ़ने के कारण हज़ारों प्रकार के पेशे तथा उद्योग विकसित हो गए हैं। उदाहरण के लिए एक बड़ी फैक्टरी में सैंकड़ों प्रकार के कार्य होते हैं तथा प्रत्येक कार्य को करने के लिए एक विशेषज्ञ की ज़रूरत होती है। उस कार्य को केवल वह व्यक्ति ही कर सकता है जिस को उस कार्य में महारथ हासिल हो। इस प्रकार शहरों में कार्य अलग-अलग लोगों के पास बंटे हुए होते हैं जिस कारण श्रम विभाजन बहुत अधिक प्रचलित है। लोग अपने-अपने कार्य में माहिर होते हैं जिस कारण विशेषीकरण का बहुत महत्त्व होता है। इस प्रकार शहरी अर्थव्यवस्था के दो महत्त्वपूर्ण अंग श्रम विभाजन तथा विशेषीकरण हैं।

प्रश्न 7. श्रम विभाजन पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-दुर्शीम ने 1893 में फ्रेन्च भाषा में अपनी प्रथम पुस्तक (De La Division Trovail Social) नाम से प्रकाशित की चाहे यह उसका पहला ग्रन्थ था पर यह उसकी प्रसिद्धि की आधारशिला थी। इसी पर उसको 1893 में डॉक्टरेट भी मिली थी दीम ने उसको तीन भागों में बांटा वह तीन भाग हैं

1. श्रम विभाजन के कार्य (Functions of Division of Labour)-दुर्थीम हर सामाजिक तथ्य को एक नैतिक तथ्य के रूप में स्वीकार करता है। कोई भी सामाजिक प्रतिमान नैतिक आधार पर ही जीवित सुरक्षित रह सकता है। एक कार्यवादी के रूप में दुर्थीम ने सब से पहले श्रम विभाजन के कार्यों की खोज की। दुर्थीम ने सब से पहले काम शब्द के बारे में बताया कि यह क्या होता है।

  1. कार्य से अर्थ गति व्यवस्था अर्थात् क्रिया से है।
  2. कार्य का अर्थ इस क्रिया या गति व उसके अनुरूप ज़रूरत के आपसी सम्बन्ध से है अर्थात् क्रिया से पूरी होने वाली ज़रूरत से है।

दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन के कार्य से उनका अर्थ यह है कि श्रम विभाजन की प्रक्रिया समाज की पहचान के लिए किन मौलिक ज़रूरतों को पूरा करती है। काम तो वह काम है जिसके न होने पर उसके तत्त्वों की मौलिक जरूरतों की पूर्ति नहीं हो सकती।

आम तौर पर यह कहा जाता है कि श्रम विभाजन का कार्य सभ्यता का विकास करना है क्योंकि श्रम विभाजन के विकास के साथ-साथ विशेषीकरण के फलस्वरूप समाज की सभ्यता बढ़ती है। दुर्थीम ने इसका विरोध किया है उन्होंने सभ्यता के विकास को श्रम विभाजन का काम नहीं माना। उनका मतलब स्रोत का मतलब काम नहीं है। सुखों के बढ़ने या बौधिक या भौतिक विकास श्रम विभाजन के फलस्वरूप पैदा होते हैं इसलिए यह उनके परिणाम हैं काम नहीं। काम का मतलब परिणाम नहीं होता।

इस प्रकार सभ्यता का विकास श्रम विभाजन का काम नहीं है। दुर्थीम के अनुसार नए समूहों का निर्माण व उनकी एकता ही श्रम विभाजन के काम है। दुर्थीम ने समाज की पहचान से सम्बन्धित किसी नैतिक ज़रूरत को ही श्रम विभाजन के काम के रूप में ढूंढ़ने की कोशिश की है। उनके अनुसार समाज के सदस्यों की संख्या व उनके आपसी सर्पकों के बढ़ने से ही धीरे-धीरे श्रम विभाजन की प्रक्रिया का विकास हुआ है। इस प्रक्रिया से अनेक नएनए व्यापारिक व सामाजिक समूहों का निर्माण हुआ। इन भिन्न-भिन्न समूहों में एकता ही समाज की पहचान के लिए ज़रूरी है। दुर्थीम के अनुसार समाज की इसी ज़रूरत को श्रम विभाजन द्वारा पूरा किया जाता है। जहां एक और श्रम विभाजन से सामाजिक समूहों का निर्माण होता है वहां दूसरी ओर इन्हीं समूहों की आपसी एकता व उनकी सामूहिकता बनी रहती है।

इस प्रकार दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन का कार्य समाज में, एकता स्थापित करना है। श्रम विभाजन मनुष्यों की क्रियाओं की भिन्नता से सम्बन्धित है यह भिन्नता ही समाज की एकता का आधार है। यह भिन्नता दो व्यक्तियों को करीब लाती है जिससे मित्रता के सम्बन्ध निर्धारित होते हैं। यह दो व्यक्तियों के मन में आपसी एकता का भाव पैदा करता है। – इस प्रकार दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन समूहों का निर्माण करता है व उनमें एकता पैदा करता है। इस एकता को बनाए रखने के लिए कानूनों का निर्माण किया जाता है। यह कानून दमनकारी भी होते हैं व प्रतिकारी भी। इन कानूनों के आधार पर ही दो भिन्न-भिन्न प्रकार की सामाजिक एकताओं का निर्माण होता है। यह दो प्रकार समाज की भिन्न-भिन्न जीवन शैलियों के परिणाम हैं। दमनकारी कानून का सम्बन्ध आदमी की आम प्रवृति से है, समानताओं से है जब कि प्रतिकारी कानून का सम्बन्ध विभिन्नताओं से या श्रम विभाजन से है। दमनकारी कानून से जिस प्रकार की एकता मिलती है, उसके दुर्थीम ने यान्त्रिक एकता का नाम दिया है व प्रतिकारी कानून से आंगिक एकता पैदा होती है।

इस प्रकार दुर्थीम के अनुसार समाज में दो प्रकार की सामाजिक एकताएं पाई जाती हैं-

1. यान्त्रिक एकता (Mechanical Solidarity)-दुर्थीम के अनुसार यान्त्रिक एकता को हम समाज की दण्ड संहिता में अर्थात् दमनकारी कानूनों में देख सकते हैं। समाज के सदस्यों में मिलने वाली समानताएं इस एकता का आधार है। जिस समाज के सदस्यों में समानताओं से भरपूर जीवन होता है, जहां विचारों, विश्वासों, कार्यों व जीवन शैली के आम प्रतिमान व आदर्श प्रचलित होते हैं व जो समाज इन समानताओं के परिणामस्वरूप एक सामूहिक इकाई के रूप में सोचता है क्रिया करता है। वह यान्त्रिक एकता का प्रदर्शन करता है अर्थात् उसके सदस्य एक यन्त्र या मशीन की भान्ति आपस में संगठित रहते हैं। इस एकता में दुर्थीम ने अपराध, दण्ड व सामूहिक चेतना को भी लिया है, दुर्थीम के अनुसार यह एक ऐसी सामाजिक एकता है जो चेतना की उन निश्चित अवस्थाओं में से पैदा होती है जोकि किसी समाज के सदस्यों के लिए आम है। इस को असल में दमनकारी कानून पेश करता है।

2. आंगिक एकता (Organic Solidarity)-दुर्थीम के अनुसार दूसरी एकता आंगिक एकता है। दमनकारी कानून की शक्ति सामूहिक चेतना में होती है। सामूहिक चेतना समानताओं से शक्ति प्राप्त करती है। आदिम समाज में दमनकारी कानून की प्रधानता होती थी क्योंकि उनमें समानताएं सामाजिक जीवन का आधार है। दुर्थीम के अनुसार आधुनिक समाज श्रम विभाजन व विशेषीकरण से प्रभावित है, जिसमें समानताओं की जगह पर विभिन्नताएं प्रमुख हैं। सामूहिक जीवन की यह विभिन्नता व्यक्तिगत चेतना को प्रमुखता देती है।

आधुनिक समाज में व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप में समूह के साथ बंधा नहीं रहता। इस समाज में मनुष्यों के आपसी सम्बन्धों का महत्त्व काफ़ी अधिक होता है। यही कारण है कि दुर्थीम ने आधुनिक समाज में दमनकारी कानून की जगह प्रतिकारी कानूनों की प्रधानता बताई है। विभिन्नता पूर्ण जीवन में मनुष्यों को एक-दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति केवल एक काम पर योग्यता प्राप्त कर सकता है और सभी कार्यों के लिए उसको दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। समूह के सदस्यों की यह आपसी निर्भरता, उनकी व्यक्तिगत असमानता उन्हें करीब आने के लिए मजबूर करती है जिसके आधार पर समाज मे एकता की स्थापना होती है। इस एकता के दुर्थीम ने आंगिक एकता कहा है। यह प्रतिकारी कानून के कारण होती है।

दुर्थीम के कारण यह एकता शारीरिक एकता के समान है हाथ, पांव, नाक, कान, आंखें इत्यादि अपने भिन्नभिन्न कार्यों के कारण स्वतन्त्र अंगों के रूप में काम करते हैं पर काम तो ही सम्भव है जब तक कि वह एकदूसरे से मिले हुए हों इस प्रकार शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों की एकता आपसी निर्भरता पर टिकी हुई है। दुर्थीम के अनुसार जनसंख्या बढ़ने के साथ ज़रूरतें भी बढ़ती है। इन्हें पूरा करने के लिए श्रम विभाजन व विशेषीकरण हो जाता है जिस कारण समाज में आंगिक एकता दिखाई देती है।

3. समझौते पर आधारित एकता (Contractual Solidarity)-आम एकता व आंगिक एकता का अध्ययन करने के पश्चात् दुर्थीम ने एक एकता बारे बताया है जिसको वह समझौते पर आधारित एकता कहता है। दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन की प्रक्रिया समझौते पर आधारित सम्बन्धों को जन्म देती है। समूह के लोग आपसी समझौते के आधार पर एक-दूसरे की सेवाओं को प्राप्त करते हैं व आपस में सहयोग करते हैं। यह सत्य है कि आधुनिक समाज में समझौतों के आधार पर लोगों में सहयोग व एकता स्थापित होती है। पर श्रम विभाजन का कार्य समझौतों पर आधारित एकता को उत्पन्न करना ही नहीं है। दुर्थीम के अनुसार यह एकता व्यक्तिगत तथ्य है चाहे यह समाज द्वारा ही संचालित होती है।

श्रम विभाजन के कारण (Causes of Division of Labour) – दुर्थीम ने श्रम विभाजन की व्याख्या समाजशास्त्रीय आधार पर की है। उसने श्रम विभाजन के कारणों की खोज सामाजिक जीवन की दिशाओं व उनसे सामाजिक ज़रूरतों से की है। इस प्रकार उसने श्रम विभाजन के कारणों को दो वर्गों में बांटा है

  1. प्राथमिक कारक
  2. द्वितीय कारक।

1. जनसंख्या व उसकी घनत्व का बढ़ना-दुर्थीम के अनुसार जनसंख्या के आकार पर घनत्ता का बढ़ना ही श्रम विभाजन का प्रमुख व प्राथमिक कारण है। .
दुर्शीम ने लिखा है कि, “श्रम विभाजन समाज की जटिलता व घनता का सीधा अनुपात है तथा सामाजिक विकास के इस दौरान में लगातार बढ़ोत्तरी होती है अर्थात् इसका कारण यह है कि समाज नियमित रूप से ओर अधिक जटिल होते जा रहे हैं।” दुर्थीम के अनुसार जनसंख्या बढ़ने के दो पक्ष हैं। जनसंख्या के आकार में बढ़ोत्तरी व जनसंख्या की घनत्व में बढ़ोत्तरी। यह दोनों पक्ष श्रम विभाजन को जन्म देते हैं। जनसंख्या के बढ़ने से मिश्रित समाज का निर्माण होने लगता है व जनसंख्या विशेष स्थानों पर केन्द्रित होने लगती है जनसंख्या की घनत्व को दो भागों में बांट सकते हैं।
(a) भौतिक घनत्व-शारीरिक तौर पर लोगों का एक ही स्थान पर एकत्र होना भौतिक घनत्व है।
(b) नैतिक घनत्व-भौतिक घनत्व के कारण लोगों के आपसी सम्बन्ध, क्रिया, प्रतिक्रिया बढ़ती है जिससे जटिलता भी बढ़ती है जिसको नैतिक घनत्व कहते हैं।

2. आम या सामूहिक चेतना की बढ़ती अस्पष्टता-दुर्थीम ने द्वितीय कारकों में सामूहिक चेतना की बढ़ती अस्पष्टता को प्रथम स्थान दिया है। समानताओं के आधार वाले समाज में सामूहिक चेतना का बोलबाला होता है जिस कारण समूह के व्यक्तिगत विचार आगे नहीं आते। दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन व विशेषीकरण तो ही सम्भव है जब सामूहिक विचार की जगह पर व्यक्तिगत विचार का विकास हो जाए व व्यक्तिगत चेतना सामूहिक चेतना को दबा दे। इस प्रकार श्रम विभाजन भी बढ़ जाएगा।

3. पैतृकता व श्रम विभाजन-श्रम विभाजन के द्वितीय कारक को दूसरे प्रकार को दुीम ने पैतकता के घटते प्रभाव को माना है। उनके अनुसार जितना अधिक पैतृकता का प्रभाव होगा। परिवर्तन के मौके उतने ही कम होंगे। अन्य शब्दों में श्रम विभाजन के विकास लिए यह ज़रूरी है कि पैतृक गुणों को महत्त्व न दिया जाए। श्रम विभाजन की प्रगति तो ही सम्भव है जब लोगों की प्राकृति व स्वभाव में भिन्नता हो। पैतृकता से प्राप्त गुणों के आधार पर मनुष्यों को उनके पूर्वजों से बांधने का यह परिणाम होता है कि हम अपनी खास आदतों का विकास नहीं कर सकते अर्थात् परिवर्तन नहीं कर सकते। इस प्रकार दुर्थीम के अनुसार पैतृकता श्रम विभाजन को रोकती है। समय के साथसाथ समाज का विकास होता है व पैतृकता का प्रभाव कम हो जाता है जिस कारण व्यक्तियों की विभिन्नताएं विकसित होती हैं श्रम विभाजन में बढ़ोत्तरी होती है।

श्रम विभाजन के परिणाम (Consequences of Division of Labour) –
श्रम विभाजन के प्राथिमक व द्वितीय कारकों के पश्चात् दीम इसके विकास के फलस्वरूप पैदा होने वाले परिणामों का जिक्र करता है। दुर्शीम ने श्रम विभाजन के बहुत सारे परिणामों का जिक्र किया है। जिनमें से कुछ प्रमुख हैं।

1. कार्यात्मक स्वतन्त्रता व विशेषीकरण-दुीम ने शारीरिक श्रम विभाजन व सामाजिक श्रम विभाजन में अन्तर किया है और सामाजिक श्रम विभाजन के परिणामों के बारे में बताया है। दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन का एक परिणाम यह होता है कि जैसे ही काम अधिक बांटा जाता है। श्रम विभाजन के कारण मनुष्य अपने कुछ विशेष गुणों को विशेष कामों में लगा देता है। जिस कारण श्रम विभाजन के विकास का एक परिणाम यह भी होता है कि व्यक्तियों के काम उनके शारीरिक लक्षणों से स्वतन्त्र हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में संरचनात्मक विशेषताएं उनकी कार्यात्मक प्रवृत्तियों को अधिक प्रभावित नहीं करतीं।

2. सभ्यता का विकास-दुर्थीम ने आरम्भ में ही स्पष्ट कर दिया था कि सभ्यता का विकास करना श्रम विभाजन का काम नहीं है क्योंकि श्रम विभाजन एक नैतिक तथ्य है तथा सभ्यता के तीनों अंगों औद्योगिक, कलात्मक व वैज्ञानिक विकास नैतिक विकास से सम्बन्ध नहीं रखते।
उनके अनुसार श्रम विभाजन के परिणाम स्वरूप सभ्यता का विकास होता है। जनसंख्या के आकार तथा घनत्ता में अधिक होना ही सभ्यता के विकास को ज़रूरी बना देता है। श्रम विभाजन व सभ्यता दोनों साथ-साथ प्रगति करते हैं पर श्रम विभाजन का विकास पहले होता है तथा उसके परिणामस्वरूप सभ्यता विकसित होती है। इसलिए दुर्थीम का मानना है कि सभ्यता का न तो श्रम विभाजन का उद्देश्य है और न ही काम बल्कि इसका परिणाम है।

3. सामाजिक प्रगति-प्रगति परिवर्तन का परिणाम है। श्रम विभाजन परिवर्तनों को भी जन्म देता है। परिवर्तन समाज में एक निरन्तर प्रक्रिया है इसलिए समाज में प्रगति भी निरन्तर होती रहती है। इस परिवर्तन का मुख्य कारण श्रम विभाजन है। श्रम विभाजन के कारण परिवर्तन होता है व परिवर्तन के कारण प्रगति होती है। इस प्रकार सामाजिक प्रगति श्रम विभाजन का एक परिणाम है।

दुर्थीम के विचार से प्रगति का प्रमुख कारक समाज है। हम इसके लिए बदल जाते हैं क्योंकि समाज बदल जाता है प्रगति तो ही कर सकती है जब समाज की गति रुक जाए पर ऐसा होना वैज्ञानिक रूप से सम्भव नहीं है। इसलिए दुर्थीम के विचार से प्रगति भी सामाजिक जीवन का परिणाम है।

प्रश्न 8. आर्थिक संस्था को परिभाषित कीजिए। अर्थप्रणाली में होने वाले परिवर्तनों की चर्चा कीजिए।
उत्तर-हमारे समाज में बहुत से व्यक्ति रहते हैं तथा प्रत्येक व्यक्ति की कुछ मूल आवश्यकताएं होती हैं। यह मूल आवश्यकताएं हैं-रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य सुविधाएं इत्यादि परन्तु इन सबकी पूर्ति के लिए व्यक्ति को पैसे की आवश्यकता पड़ती है। यह पैसा व्यक्ति को कार्य करके कमाना पड़ता है। पैसा कमाने के लिए व्यक्ति को समाज के अन्य व्यक्तियों के साथ सहयोग करना पड़ता है तथा उन्हें उनके कार्यों में सहायता करनी पड़ती है ताकि वह भी पैसे कमा सकें।

आर्थिक संस्थाएं वह संस्थाएं हैं जो लोगों के लिए वस्तुओं के उत्पादन, विभाजन व उपभोग का प्रबन्ध करती हैं। समाज में आर्थिक संस्थाओं का बहुत महत्त्व होता है। इसी कारण ही समाज के विभिन्न स्वरूपों को आर्थिक संस्थाओं या अर्थव्यवस्था के आधार पर विभाजित किया गया है जैसे शिकारी, कृषि, औद्योगिक समाज आदि। इन आर्थिक संस्थाओं से ही समाज की अन्य संस्थाओं जैसे परिवार, धर्म आदि प्रभावित होते हैं।

प्रत्येक मानव की कुछ ज़रूरतें व कुछ इच्छाएं होती हैं। कुछ आवश्यकताएं तो जैविक कारणों से पैदा होती हैं। जैसे खाना, पीना, सोना आदि पर व्यक्ति की कुछ इच्छाएं सांसारिक वस्तुओं के कारण होती हैं। जैसे उच्च स्तर, अधिक पैसे होने, ऐशो आराम की सभी चीजें आदि। व्यक्ति अपनी इच्छाएं आप ही बनाता है व उनको पूरा करने की सामर्थ्य भी समाज में व्यवस्थित की गई है। व्यक्ति सभी वस्तुओं को प्राप्त करना चाहता है पर उसके पास इन चीजों की पूर्ति के लिए हमेशा से ही स्रोत की कमी रही है। इसलिए लोग अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए दूसरे नित नए साधन ढूंढ़ते रहते हैं। इन साधनों के पता करने में उनसे उम्मीद की जाती है कि इन साधनों में तालमेल स्थापित किया जाए। इस तरह व्यक्ति अपनी ज़रूरतों व इच्छाओं की पूर्ति के लिए अपने साधनों का उपयोग करता है व उन साधनों को व्यवस्थित करने के लिए जो मापदण्ड व सामाजिक संगठनों का उपयोग करता है उसको धर्म व्यवस्था या आर्थिक संस्थाओं का नाम दिया जाता है।

जॉनस (Jones) के अनुसार, “जीवन निर्वाह की ज़रूरतों की पूर्ति के लिए वातावरण की उपयोग से सम्बन्धित तकनीकें, विचारों व प्रथाओं की जटिलता को आर्थिक संस्थाएं कहते हैं।”
प्रो० डेविस (Prof. Davis) के अनुसार, “किसी भी समाज में चाहे वह विकसित हो या आदिम, सीमित चीज़ों के विभाजन को निर्धारित करने वाले प्राथमिक विचारों, मानदण्डों व रूतबों को ही आर्थिक संस्था कहते हैं।”
ऑगबर्न व निमकौफ (Ogburn & Nimkoff) के अनुसार, “भोजन व सम्पत्ति के सम्बन्ध में मानव की क्रियाएं आर्थिक सम्पत्ति का निर्माण करती हैं।”

इस प्रकार इन परिभाषाओं को देख कर हम कह सकते हैं कि भौतिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए मानव द्वारा क्रियाओं के निश्चित व संगठित रूप को आर्थिक संस्था कहते हैं।

आर्थिक संस्थाओं में आ रहे परिवर्तन (Changes coming in the economic system)-20वीं शताब्दी के आरंभ से ही आर्थिक संस्थाओं में बहुत से परिवर्तन आने शुरू हो गए जिनका वर्णन इस प्रकार हैं-

  • अब उत्पादन बड़े स्तर पर होता है तथा उत्पादन के लिए Assembly Line नामक तकनीक सामने आ गई है जिसमें मनुष्य तथा मशीन दोनों इकट्ठा मिलकर नई वस्तु का उत्पादन करते हैं।
  • उत्पादन में बड़ी-बड़ी मशीनों का प्रयोग किया जाता है ताकि बड़े स्तर पर उत्पादन किया जा सके।
  • विश्वव्यापीकरण की प्रक्रिया ने सभी देशों की आर्थिक सीमाओं को खोल दिया है। लगभग सभी देशों ने सीमा शुल्क (Custom duty) इतना कम कर दिया है कि सभी वस्तुएं हमारे देश में आसानी से तथा कम दाम पर उपलब्ध हैं।
  • उदारीकरण (Liberalisation) की प्रक्रिया ने भी आर्थिक संस्थाओं में परिवर्तन ला दिए हैं। भारत सरकार ने सन् 1991 के पश्चात् उदारीकरण की प्रक्रिया को अपनाया जिससे देश की आर्थिकता तेज़ी से बढी। देश में बडीबड़ी विदेशी कंपनियों ने अपने उद्योग लगाए जिससे लोगों को रोजगार मिला तथा बेरोज़गारी में भी कमी आई।
  • देश में कम्प्यूटर (Computer) से संबंधित बहुत से उद्योग शुरू हुए।

BPO (Business Process Outsourcing) उद्योग, काल सेंटर, सॉफ्टवेयर सेवाएं इत्यादि ने देश के लिए विदेशी मुद्रा कमाने में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। इसने भारतीय अर्थव्यवस्था को विदेशों की अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया। अब प्रत्येक प्रकार के उद्योगों में मशीनों का प्रयोग बढ़ गया है।

प्रश्न 9. शिक्षा को परिभाषित कीजिए। औपचारिक एवं अनौपचारिक शिक्षा के मध्य उदाहरणों सहित अन्तर कीजिए।
उत्तर-शिक्षा व्यक्ति के समाजीकरण का एक साधन है। यह सांस्कृतिक मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का सबसे अच्छा तरीका है। शिक्षा ने ही व्यक्ति का औद्योगीकरण, नगरीकरण इत्यादि के साथ सामंजस्य स्थापित करवाया है। शिक्षा सिर्फ किताबी ज्ञान तक ही सीमित नहीं है। शिक्षा व्यक्ति को जीवन जीने का व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करती है। शिक्षा समाज में प्रेम, मैत्री, सहानुभूति, आज्ञाकारिता, अनुशासन इत्यादि जैसे गुणों का विकास करती है।

शिक्षा का अर्थ (Meaning of Education)- शिक्षा को हम ज्ञान के संग्रह के रूप में परिभाषित कर सकते हैं। निम्न परिभाषाओं से शिक्षा का अर्थ और भी स्पष्ट हो जाएगा।

  • फिलिप्स (Philips) के अनुसार, “शिक्षा वह संस्था है जिसका केंद्रीय तत्त्व ज्ञान का संग्रह है।”
  • महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi) के अनुसार, “शिक्षा से मेरा अभिप्राय बच्चे के शरीर, मन और आत्मा में विद्यमान सर्वोत्तम गुणों का सर्वांगीण विकास करना है।”
  • ब्राउन तथा रासेक (Brown and Rouck) के अनुसार, “शिक्षा अनुभव की वह संपूर्णता है जो किशोर और वयस्क दोनों की अभिवृत्तियों को प्रभावित करती है तथा उनके व्यवहारों का निर्धारण करती है।”

इन परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें तार्किक अनुभव सिद्ध, सैद्धांतिक और व्यावहारिक विचारों का समावेश होता है जिसका उद्देश्य व्यक्ति का सामाजिक व भौतिक पर्यावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करना होता है। शिक्षा सामाजिक नियंत्रण में एक अहम भूमिका निभाती है।

मुख्य रूप से शैक्षिक व्यवस्था के दो प्रकार होते हैं-औपचारिक शिक्षा तथा अनौपचारिक शिक्षा।

1. औपचारिक शिक्षा (Formal Education)-औपचारिक शिक्षा वह शिक्षा होती है जो हम औपचारिक तौर पर स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय इत्यादि में जाकर प्राप्त करते हैं। इस तरह की शिक्षा में स्पष्ट पाठ्यक्रम निश्चित किया जाता है तथा अध्यापकगण इस पाठ्यक्रम के अनुसार व्यक्ति को शिक्षा देते हैं। इस तरह की शिक्षा का एक स्पष्ट उद्देश्य होता है तथा वह उद्देश्य होता है व्यक्ति का सर्वपक्षीय विकास ताकि वह समाज का ज़िम्मेदार नागरिक बन सके।

2. अनौपचारिक शिक्षा (Informal Education)-अनौपचारिक शिक्षा वह होती है जो व्यक्ति किसी स्कूल, कॉलेज या विश्वविद्यालय में नहीं लेता है बल्कि वह यह शिक्षा तो रोज़मर्रा के अनुभवों और व्यक्तियों के विचारों, परिवार, पड़ोस, दोस्तों इत्यादि से लेता है। इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति अपने रोज़ाना जीवन से कुछ न कुछ सीखता रहता है। इस को ही अनौपचारिक शिक्षा कहते हैं। इसका कोई निश्चित समय नहीं होता, निश्चित पाठ्यक्रम नहीं होता, निश्चित स्थान नहीं होता। व्यक्ति इसको कहीं भी, किसी से भी तथा किसी भी समय प्राप्त कर सकता। इसके लिए कोई डिग्री नहीं मिलती बल्कि व्यक्ति इसको पाने से परिपक्व हो जाता है।

प्रश्न 10. समाज में शिक्षा की भूमिका पर प्रकार्यवादी समाजशास्त्रियों के विचारों को प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर-अगर हम आधुनिक समाज की तरफ देखें तो हमें पता चलता है कि जितनी तेजी से समाज में परिवर्तन शिक्षा के साथ आए हैं, उतने परिवर्तन किसी अन्य कारण के साथ नहीं आए हैं। शिक्षा के बढ़ने से सबसे पहले यूरोपियन समाजों में परिवर्तन आए तथा उसके बाद 20वीं शताब्दी के दूसरे उत्तरार्द्ध में एशिया के देशों में परिवर्तन आया। इन परिवर्तनों ने समाज को पूर्णतया बदल कर रख दिया। भारतीय समाज में आधुनिक शिक्षा के कारण ही काफ़ी परिवर्तन आए। लोगों ने पढ़ना लिखना शुरू किया जिससे उनके जीवन का सर्वपक्षीय विकास हुआ। स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन, निम्न तथा पिछड़ी जातियों की स्थिति में परिवर्तन शिक्षा के कारण ही संभव हो सका है। इस कारण समाजशास्त्रियों के लिए भी शिक्षा एक महत्त्वपूर्ण विषय रहा है कि वह समाज पर शिक्षा के प्रभावों को ढूंढ सकें।

समाजशास्त्री सामाजिक परिवर्तन के कारण के रूप में शिक्षा का अध्ययन करने में अधिक रुचि दिखाते हैं। उनके अनुसार शिक्षा मनुष्य को एक जीव से सामाजिक तथा सभ्य जीव के रूप में परिवर्तित कर देता है। फ्रांस के प्रमुख समाजशास्त्री दुर्थीम के अनुसार, “शिक्षा एक वयस्क पीढ़ी की तरफ से अवयस्क पीढ़ी के ऊपर डाला गया प्रभाव है।”

इसका अर्थ है कि शिक्षा वह प्रभाव है जो जाने वाली पीढी आने वाली पीढ़ी पर डालती है ताकि उस पीढी को समाज में रहने के लिए तैयार किया जा सके। दुखीम के अनुसार समाज का अस्तित्व तब ही बना रह सकता है अगर समाज के सदस्यों में एकरूपता (Homogeneity) बनी रहे तथा यह एकरूपता शिक्षा के कारण ही आती है। शिक्षा से ही लोग एक-दूसरे के साथ मिलजुल कर रहना सीखते हैं तथा उनमें एकरूपता आ जाती है। शिक्षा से ही एक बच्चा समाज में रहने के नियम, परिमाप, कीमतों इत्यादि को सीखता व ग्रहण करता है। किंगस्ले डेविस (Kingslay Davis) तथा विलबर्ट मूरे (Wilbert Moore) ने भी शिक्षा के कार्यात्मक पक्ष के बारे में बताया है। उनके अनुसार सामाजिक स्तरीकरण एक तरीका है जिससे समर्थ व्यक्तियों को उचित स्थितियां प्रदान की जाती हैं। इस उद्देश्य की प्राप्ति शिक्षा द्वारा होती है तथा यह इस बात को सुनिश्चित करती है कि सही व्यक्ति को, समाज को सही स्थान प्राप्त हो।

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