Class 12 Political Science Solutions Chapter 14 स्थानीय स्तर पर लोकतन्त्र

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. भारत में पंचायती राज व्यवस्था के संगठन का विवरण दीजिए। (Describe Structure of Panchayati Raj System in India.)
उत्तर- पंचायती राज स्वतन्त्र भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण खोज है। 4 दिसम्बर, 1960 को भारत के प्रधानमन्त्री स्वर्गीय पं० जवाहर लाल नेहरू ने राजपुरा (पटियाला, पंजाब) में भाषण देते हए कहा था कि पंजाब तथा समस्त देश में तीन क्रान्तियां चल रही हैं

  1. शिक्षा का प्रसार (Spread of Education)
  2. कृषि के नये औज़ार तथा तरीकों का प्रयोग (Use of New Tools and Methods of Agriculture)
  3. पंचायती राज की स्थापना (Establishment of Panchayati Raj)।

पंचायती राज के बारे में उन्होंने कहा कि इसकी स्थापना गांवों में की जा रही है तथा उसके द्वारा लोगों को अपने मामलों का प्रशासन तथा अपने क्षेत्र का विकास स्वयं करने की शक्ति दी जा रही है। इसके द्वारा लोग अपने गांवों को उन्नत तथा आत्म-निर्भर बना सकेंगे।

पंचायती राज की स्थापना सबसे पहले 2 अक्तूबर, 1959 को राजस्थान में हुई। आन्ध्र प्रदेश ने 1 नवम्बर, 1959 को पंचायती राज को अपनाया। असम, कर्नाटक एवं उड़ीसा ने 1959 में, बिहार, गुजरात, पंजाब, महाराष्ट्र एवं उत्तर प्रदेश ने 1961 में, मध्य प्रदेश ने 1962 में, पश्चिमी बंगाल ने 1963 में तथा हिमाचल प्रदेश ने 1968 में पंचायती राज विधान लागू किया। इस समय भारत के लगभग सभी राज्यों में पंचायती राज व्यवस्था लागू है। 73वें संशोधन द्वारा पंचायती राज की संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया गया है। पंजाब पंचायती राज अधिनियम, 1994 के अनुसार पंजाब में पंचायती राज की चार संस्थाएं (i) ग्राम सभा, (ii) ग्राम पंचायत, (iii) पंचायत समिति तथा (iv) जिला परिषद् स्थापित की गईं।

पंचायती राज क्या है-पंचायती राज उस व्यवस्था को कहते हैं जिनके द्वारा गांव के लोगों को अपने गांवों का प्रशासन तथा विकास स्वयं अपनी इच्छा तथा आवश्यकतानुसार करने का अधिकार दिया गया है। गांव के लोग अपने इस अधिकार का प्रयोग पंचायतों द्वारा करते हैं। इसलिए इसे पंचायती राज कहा जाता है। पं० जवाहर लाल नेहरू ने कहा था “पंचायती राज ऐसा नया तरीका है जिसमें बिना बाहरी सहायता की बाट जोहे हम अपने प्रयत्नों से ही गांव के जीवन को सुखी बना सकते हैं।” पंचायती राज एक तीन-स्तरीय (Three tiered) ढांचा है जिसका निम्नतम स्तर ग्राम पंचायत का है और उच्चतम स्तर जिला परिषद् का और बीच वाला स्तर पंचायत समिति का। कुछ राज्यों में दो-स्तरीय और कुछ राज्यों में तीन स्तरीय प्रणाली अपनाई गई है। आन्ध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, पंजाब राजस्थान, उत्तर प्रदेश इत्यादि राज्यों में तीन स्तरीय प्रणाली है। परन्तु असम, मणिपुर, गोवा, मिज़ोरम इत्यादि राज्यों में दो स्तरीय प्रणाली है। ग्राम पंचायत गांव में होती है, पंचायत समिति विकास खण्ड या ब्लॉक में और जिला परिषद् ज़िले में। 73वें संशोधन द्वारा जो राज्य बहुत छोटे हैं और जिनकी जनसंख्या 20 लाख से कम है उनको पंचायत समिति के मध्य स्तर से मुक्त रखा गया है। इस ढांचे का कार्य क्षेत्र ज़िले के ग्रामीण भागों तक सीमित होता है और यह ग्रामीण जीवन के हर पक्ष से सम्बन्धित होता है। इस ढांचे में निर्वाचित सदस्य होते हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासन और अन्य विकास कार्यों के लिए उत्तरदायी हैं।

1. पंचायत (Panchayats)-गांवों में पंचायतें स्थापित की गई हैं। एक गांव या गांवों के समूहों की जिनकी संख्या 200 से कम न हो, एक ग्राम सभा बनती है और गांवों का प्रत्येक वयस्क नागरिक ग्राम सभा का सदस्य होता है। यह ग्राम सभा एक कार्यकारी परिषद् चुनती है जिसे ग्राम पंचायत कहते हैं। ग्राम पंचायत का आकार सदस्यता के अनुसार 5 से 31 तक विभिन्न राज्यों में अलग-अलग निर्धारित किया गया है। पंजाब के पंचायती राज एक्ट 1994 के अनुसार पंजाब में एक गांव जिसकी जनसंख्या 200 से लेकर 1000 तक होती है उस गांव की ग्राम पंचायत में एक सरपंच के अतिरिक्त पांच पंच होते हैं और जिस गांव की जनसंख्या दस हजार से अधिक होगी उसके लिए सरपंच के अतिरिक्त 13 पंच होंगे। यह ग्राम पंचायत गांव का प्रशासन करती है और गांव के विकास तथा लोगों के जीवन को उन्नत करने का प्रयत्न करती है। ग्राम सभा की वर्ष में दो बैठकें होती हैं तथा ग्राम पंचायत इसके सामने अपने कार्यों की रिपोर्ट रखती है और आगे के प्रोग्राम पर ग्राम सभा की स्वीकृति लेती है। ग्राम पंचायत अपने कार्यों के लिए ग्राम सभा के प्रति उत्तरदायी है।

2. पंचायत समिति (Panchayat Samiti)-पंचायती राज के अन्तर्गत प्रत्येक ब्लॉक में पंचायत समिति की स्थापना की गई है। पंचायत समिति के क्षेत्र में आने वाली पंचायतों के सदस्यों द्वारा अपने में से कुछ सदस्य चुने जाते हैं। पंजाब में सदस्यों द्वारा चुने गए प्रतिनिधि तथा प्रत्यक्ष तौर पर चुने गये सदस्यों का अनुपात 60 : 40 था। परन्तु जून, 2002 में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने इस व्यवस्था को गैर-संवैधानिक घोषित कर दिया। अतः अब पंचायत समितियों के सभी सदस्यों का चुनाव लोगों द्वारा किया जाता है। पंजाब विधान सभा के सदस्य, जिनके चुनाव क्षेत्रों का बड़ा हिस्सा जिस पंचायत समिति में आता है, उसके पदेन सदस्य होते हैं। पंचायत समिति के सभी सदस्यों को पंचायत समिति की बैठकों में भाग लेने तथा मतदान का अधिकार प्राप्त है। प्रत्येक पंचायत समिति में अनुसूचित जातियों तथा पिछड़ी श्रेणियों के लिए सीटें आरक्षित की गई हैं। प्रत्येक पंचायत समिति में प्रत्यक्ष तौर पर चुने गए सदस्यों का एक तिहाई भाग महिलाओं के लिए आरक्षित रखा गया है। खण्ड विकास अधिकारी पंचायत समिति का कार्यकारी (Executive Officer) होता है तथा यह उसकी आज्ञाओं और निर्णयों को लागू करता है। पंचायती राज के ढांचे में सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान पंचायत समिति का है। ग्रामीण इलाकों में कृषि, पशु-पालन, ग्रामीण उद्योग, सिंचाई आदि की जितनी विकास योजनाएं हैं, सबकी सब इसी संस्था के अधीन होती हैं। यह कहना बिल्कुल ठीक है कि पंचायती राज की सफलता पंचायत समिति पर ही निर्भर है।

3. ज़िला परिषद् (Zila Parishad)-प्रत्येक जिले में एक ज़िला परिषद् स्थापित की गई है। जिला परिषद् के कुछ सदस्य प्रत्यक्ष तौर पर क्षेत्रीय चुनाव क्षेत्रों से चुने जाते हैं। पंजाब के पंचायती राज अधिनियम 1994 के अनुसार जिला परिषद् के सदस्यों की संख्या 10 से लेकर 25 तक हो सकती है जिनका चुनाव प्रत्यक्ष रूप में लोगों द्वारा किया जाएगा। पंजाब में जिला परिषद् के क्षेत्र में आने वाली पंचायत समितियों के सभी अध्यक्ष जिला परिषद् के सदस्य होते हैं। प्रत्येक जिला परिषद् से अनुसूचित जातियों तथा पिछड़ी श्रेणियों के लिए सीटें आरक्षित की गई हैं। महिलाओं के लिए प्रत्यक्ष तौर पर चुनी गई सीटों का एक तिहाई भाग आरक्षित रखा गया है। जिले के चुने गए विधानसभा तथा संसद् के सदस्य इसके सहायक होते हैं। जिलाधीश इसका पदेन सदस्य होता है। जिला परिषद् पंचायत समितियों के कार्यों की देखभाल करती है और उनमें तालमेल पैदा करने का प्रयत्न करती है।

पंचायत, पंचायत समिति तथा जिला परिषद् एक-दूसरे के साथ सम्बन्धित हैं। ब्लॉक या क्षेत्र की पंचायतों के पंच
और सरपंच पंचायत समिति के 16 सदस्यों का चुनाव करते हैं और जिले की पंचायत समितियों के सदस्य अपने सदस्यों में से जिला परिषद् के कुछ सदस्य चुनते हैं। इस प्रकार पंचायतों के कुछ सदस्य पंचायत समिति के सदस्य होते हैं और पंचायत समितियों के कुछ सदस्य ज़िला परिषद् के सदस्य होते हैं। अतः पंचायत, पंचायत समिति तथा ज़िला परिषद् मूल रूप से सम्बन्धित हैं।

प्रश्न 2. पंचायती राज से सम्बन्धित 73वें संवैधानिक संशोधन का वर्णन करें। (Explain 73rd Amendment relating to Panchayati Raj.)
अथवा
नई पंचायती राज व्यवस्था की मुख्य विशेषताओं की व्याख्या करें। (Describe the main characteristics of New Panchayati Raj System.)
अथवा
73वीं संवैधानिक संशोधन के अन्तर्गत पंचायती राज प्रणाली में क्या परिवर्तन किए गए हैं ?
(What changes have been made in Panchayati Raj System under 73rd constitutional amendment ?)
उत्तर-सितम्बर, 1991 को लोकसभा में 72वां संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश किया गया था। इस विधेयक का सम्बन्ध भारतीय पंचायती राज व्यवस्था में सुधार करना था। पंचायती राज व्यवस्था में सुधार के लिए एक 30 सदस्य समिति गठित की गई जिसमें 20 सदस्य लोकसभा के और 10 सदस्य राज्य सभा के थे। लोकसभा के वरिष्ठ नेता नाथू राम मिर्धा को इस समिति का अध्यक्ष बनाया गया। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट दिसम्बर, 1992 में संसद् के सामने पेश की। इस समिति की सिफ़ारिशों को जो कि पंचायती राज व्यवस्था से सम्बन्धित थीं, 22 दिसम्बर को लोकसभा ने और 23 दिसम्बर को राज्य सभा ने स्वीकृति दे दी। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने पर इस संवैधानिक संशोधन का नम्बर 73वां हो गया क्योंकि इससे पूर्व 72 संशोधन हो चुके थे। इस संशोधन की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

1. स्थानीय स्तर की लोकतान्त्रिक संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता (Constitutional Sanction to democratic institutions of Grass-Root level)–73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा स्थानीय स्तर की लोकतान्त्रिक संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई। इसके लिए संविधान में भाग 9 (Part IX) और 11वीं अनुसूची शामिल करके निम्न स्तर पर लोकतान्त्रिक संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई।

2. ग्राम सभा और ग्राम पंचायत की परिभाषा (Definition of Gram Sabha and Gram Panchayat)73वें संवैधानिक संशोधन के द्वारा ग्राम सभा और ग्राम पंचायत की परिभाषा की गई है। ग्राम सभा में एक पंचायत के अधिकार क्षेत्र में आने वाले गांव या गांवों के मतदाता ही ग्राम सभा के सदस्य हो सकते हैं और यही सारे मतदाता मिलकर ग्राम सभा का निर्माण करेंगे। इसका निर्माण राज्य विधानमण्डल के कानून के द्वारा ही होगा और इन्हें राज्य विधानमण्डल द्वारा निर्धारित काम ही करने पड़ेंगे। ग्राम पंचायत एक स्व-शासन संस्था है जिसका निर्माण सरकार ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए करती है।

3. तीन स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था (Three tier Panchayati Raj System)-73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा तीन स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की स्थापना की गई है। निम्न स्तर पर ग्राम पंचायत और उच्च स्तर पर ज़िला परिषद् व मध्य में पंचायत समिति या ब्लॉक समिति की व्यवस्था है। जिन राज्यों की जनसंख्या 20 लाख से कम है वहां द्वि-स्तरीय व्यवस्था की गई है। वहां मध्य स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को कायम करने या न करने की छूट दी गई है।

4. पंचायतों की रचना (Composition of Panchayats)-73वें संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि प्रत्येक राज्य का विधान मण्डल, प्रत्येक स्तर की पंचायत की रचना सम्बन्धी व्यवस्था स्वयं करेगा।

5. सदस्यों का चुनाव (Election of the Members)-73वें संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि प्रत्येक पंचायत के क्षेत्र को चुनाव क्षेत्रों में बांटा जायेगा और चुनाव क्षेत्रों से ही पंचायतों के सदस्यों का प्रत्यक्ष रूप से लोगों के द्वारा चुनाव होगा।

6. पंचायती चुनाव राज्य चुनाव आयोग की निगरानी में (Panchayat’s elections under the Supervision of State Election Commission)-प्रत्येक राज्य में होने वाले पंचायती चुनाव राज्य चुनाव आयोग की निगरानी, निर्देशन व नियन्त्रण में होंगे। चुनाव आयोग पंचायती राज के चुनावों से सम्बन्धित अधिसूचना जारी होने के बाद चुनावों की तिथि तय करता है, नामांकन-पत्रों की जांच-पड़ताल करता है, चुनाव चिह्न जारी करता है और निष्पक्ष व स्वतन्त्र, चुनाव करवाने की व्यवस्था करता है। इसके लिए राज्यों में स्वतन्त्र चुनाव आयोग की स्थापना की व्यवस्था की गई है। राज्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है। चुनाव आयुक्त की सेवा शर्ते और कार्यकाल राज्य विधानमण्डल द्वारा पास किए कानूनों के अनुसार राज्यपाल निश्चित करता है। चुनाव आयुक्तों को हटाने के लिए वह प्रक्रिया अपनाई गई है जिस तरह उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाया जाता है।

7. संसद् और विधानमण्डल के सदस्यों की प्रतिनिधिता (Representation of the Members of State Legislature and Parliament)-73वें संशोधन द्वारा राज्य विधानमण्डल को यह शक्ति दी गई है कि वह विभिन्न स्तरों की पंचायतों में निम्नलिखित सदस्यों की प्रतिनिधित्वता की व्यवस्था करें
(i) पंचायत समिति और जिला परिषद् के चुनाव क्षेत्र में आने वाले लोकसभा और विधानसभा के सदस्यों को इसमें प्रतिनिधित्वता दी जा सकती है।
(ii) राज्य सभा और विधान परिषद् के सदस्य जिनका नाम पंचायत समिति और जिला परिषद् के चुनाव क्षेत्र की मतदाता सूचियों में शामिल हो।
इन सदस्यों को पंचायत समिति और जिला परिषद् की बैठकों में वोट देने का अधिकार दिया गया है।

8. पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव व उसको पद से हटाने की विधि (Election and removal of the Chairman of Panchayats) ग्राम पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली द्वारा किए जाने की व्यवस्था है। अध्यक्ष को उसका कार्यकाल पूरा होने से पहले पद से हटाने की व्यवस्था की गई है। इसके लिए यह ज़रूरी है कि पंचायत अपने कुल सदस्यों के बहुमत और उपस्थित वोट देने वाले सदस्यों के बहुमत के साथ अध्यक्ष को हटाने सम्बन्धी प्रस्ताव पास करे। जब पंचायत का ऐसा प्रस्ताव ग्राम सभा को प्राप्त होगा तो ग्राम सभा उस प्रस्ताव पर विचार करने के लिए अपनी एक विशेष बैठक बुलाएगी जिसमें ग्राम सभा के 50% सदस्यों का उपस्थित होना आवश्यक है। इस बैठक में अगर पंचायत के अध्यक्ष को पद से हटाने का प्रस्ताव उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों की सर्वसहमति से पास कर दिया जाए तो प्रधान को पद से अलग कर दिया जाता है।

9. ग्राम पंचायतों और पंचायत समिति के अध्यक्ष को उच्च संस्थाओं में प्रतिनिधित्वता (Representation to the Chairperson of village level Panchayats and Intermediate level Panchayats in the other Panchayats Institution)-73वें संशोधन द्वारा राज्य विधानमण्डल को यह शक्ति दी गई है कि वह ग्रामीण स्तरीय पंचायत के अध्यक्षों में से पंचायत समिति में और पंचायत समिति के प्रधानों में से जिला परिषद् में प्रतिनिधित्वता दिए जाने की व्यवस्था कर सकती है।

10. पंचायत समिति और जिला परिषद् के प्रधानों का चुनाव और उन्हें पद से हटाने की विधि (Election and removal of the Chairmens of Panchayat Samiti and Zila Parishad) -73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि मध्य स्तरीय और जिला परिषद् के अध्यक्षों का चुनाव सम्बन्धित चुनाव क्षेत्र में से निर्वाचित सदस्यों में से ही किया जाएगा। अध्यक्ष को निश्चित कार्यकाल की समाप्ति से पहले पद से हटाने के लिए यह ज़रूरी है कि सम्बन्धित पंचायत के चुने हुए सदस्य उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत के साथ जो कि कुल सदस्यों का बहुमत भी होना चाहिए, के द्वारा प्रस्ताव पास करके अपने अध्यक्ष को पद से हटा सकते हैं।

11. सीटों में आरक्षण (Reservation of Seats)-73वें संशोधन द्वारा निम्नलिखित वर्गों के लिए सीटों में आरक्षण की व्यवस्था की गई है

  • पंचायती चुनावों के लिए प्रत्येक स्तर में अनुसूचित जाति और अनुसूचित कबीलों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात के अनुसार सीटों में आरक्षण की व्यवस्था होगी।
  • आरक्षित स्थानों में समय-समय पर परिवर्तन होगा।
  • अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन-जातियों के लिए आरक्षित स्थानों में 1/3 सीटें अनुसूचित जाति की स्त्रियों के लिए आरक्षित रखी जाएंगी।
  • कुल निर्वाचित सीटों का 1/3 भाग स्त्रियों के लिए आरक्षित होगा। यह आरक्षण अनुसूचित जाति की स्त्रियों के अतिरिक्त होगा।
  • विभिन्न स्तरों के चुनाव क्षेत्रों के अध्यक्षों की कुल संख्या का 1/3 भाग स्त्रियों के लिए आरक्षित होगा।
  • सभी पंचायती राज की संस्थाओं के अध्यक्ष पदों में से भी कुछ स्थान अनुसूचित जाति और जन जाति के लोगों के लिए आरक्षित रखे जाएंगे।

12. पंचायतों की अवधि (Tenure of a Panchayats)—प्रत्येक पंचायती चुनाव पांच साल में एक बार होना अनिवार्य है। यह चुनाव पांच साल की अवधि पूरी होने से पहले होना आवश्यक है। अगर किसी स्थान की पंचायतों को पहले भंग कर दिया गया है तो वहां छ: मास के भीतर चुनाव करवाना अनिवार्य है। इसी संशोधन द्वारा भारत की सभी पंचायतों की अवधि पांच वर्ष निश्चित की गई है।

13. सदस्यों की योग्यताएं (Qualifications for Members)-प्रत्येक स्तर की पंचायत का चुनाव लड़ने के लिए वही योग्यताएं निर्धारित हैं जो योग्यताएं राज्य विधानमण्डल का सदस्य बनने के लिए अनिवार्य हैं। जो व्यक्ति राज्य विधानमण्डल की सदस्यता के अयोग्य है वह पंचायत के चुनाव के लिए भी अयोग्य है। परन्तु इसके लिए निर्वाचन की आयु 21 वर्ष है।

14. पंचायतों की शक्तियां और कार्य (Powers and functions of Panchayats)-73वें संशोधन द्वारा राज्य विधानमण्डल पंचायतों को ऐसी शक्तियां व काम सौंप सकता है जो कि स्व-शासन संस्थाओं के लिए अनिवार्य हैं। ये उत्तरदायित्व हैं-(i) आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं तैयार करनी और उन्हें लागू करना। (ii) 11वीं अनुसूची में शामिल विषय-सूची-इस विषय सूची में 29 विषय शामिल हैं जिनमें खेतीबाड़ी, भूमि सुधार, सिंचाई, पशु-पालन, मछली पालन, वन उत्पादन, लघु उद्योग, खादी, घरेलू उद्योग, ग्रामीण आवास, पीने का पानी, सड़कें, पुलों का निर्माण, शिक्षा, सेहत और सफाई, सांस्कृतिक गतिविधियां, मण्डियां और मेले आदि मुख्य हैं।

15. कर लगाने की शक्ति (Power to impose Taxes)-राज्य का विधानमण्डल कानून द्वारा पंचायतों को कुछ कर लगाने और उन्हें एकत्रित करने की शक्ति सौंप सकता है। इसके अतिरिक्त राज्य की संचित निधि में से भी पंचायतों को सहायता राशि देने की व्यवस्था की गई है।

16. वित्त आयोग का निर्माण (Composition of Finance Commission)-73वें संशोधन द्वारा पंचायतों के लिए एक वित्त आयोग की व्यवस्था की गई है जिसकी नियुक्ति राज्यपाल करेगा। इसमें कितने सदस्य होंगे, उनकी योग्यताएं, उनका निर्वाचन, शक्तियां आदि प्रश्नों से सम्बन्धित व्यवस्था राज्य विधानमण्डल द्वारा होगी। इसके कार्य इस प्रकार हैं
(i) पंचायतों की वित्त स्थिति सम्बन्धी विचार करना। (ii) राज्य सरकार द्वारा निर्धारित करों को राज्य सरकार और पंचायतों में बांटने सम्बन्धी सिद्धान्तों को निश्चित करना। (iii) पंचायतों को सौंपे जाने वाले करों से सम्बन्धित सिद्धान्तों को निश्चित करना (iv) राज्यपाल द्वारा सौंपे गए किसी अन्य विषय पर विचार करना।

17. वर्तमान पंचायतों का जारी रहना (Continuance of Existing Panchayats)-73वें संशोधन के लागू होने से पहले सभी पंचायतें अपने कार्यकाल की समाप्ति तक काम करती थीं। परन्तु अब राज्य विधानमण्डल द्वारा प्रस्ताव पास होने पर ही पंचायतों को अपनी अवधि से पहले भंग किया जा सकता है, न कि मुख्यमन्त्री की स्वेच्छाचारी शक्ति के प्रयोग से।

18. वर्तमान कानूनों का जारी रहना (Continuance of Existing Law)-73वें संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि अगर प्रचलित कानून की कोई व्यवस्था इस संशोधन की व्यवस्थाओं से मेल नहीं रखती तो वह संशोधन के लागू होने के एक वर्ष के समय तक जारी रह सकती है।

19. पंचायतों के चुनाव झगड़े अदालतों के हस्तक्षेप से बाहर (Election Conflicts of Panchayats are outside the Jurisdiction of Courts)-73वें संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि पंचायती चुनावों के क्षेत्र निश्चित करने वाले किसी भी कानून को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। पंचायत के लिए चुने गए किसी सदस्य को केवल उस संस्था में ही चुनौती दी जा सकती है जिसकी व्यवस्था राज्य विधानमण्डल द्वारा कानून में की गई हो। ऐसे कानून को अदालती अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा गया है।

निष्कर्ष (Conclusion)-नई पंचायती राज व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य निम्न स्तर पर लोगों को अपने विकास के मामलों में हिस्सेदारी को स्वस्थ बनाना, शक्तियों के बंटवारों को विश्वास योग्य बनाना, अपने गांवों के विकास के लिए योजनाएं स्वयं तैयार करना और उन्हें लागू करना है। पंचायती राज संस्थाओं में हिस्सेदारी को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान की गई है। यह नई पंचायती राज व्यवस्था कितनी सफल होगी उसका फैसला नई पंचायती राज व्यवस्था के असली प्रयोग पर निर्भर करता है।

प्रश्न 3. पंचायती राज से आपका क्या अभिप्राय है ? ग्राम पंचायत की बनावट और कार्यों की व्याख्या कीजिए।
(What do you mean by the Panchayati Raj ? Discuss the composition and functions of Gram Panchayat.)
अथवा
ग्राम पंचायत की शक्तियों और कार्यों को लिखें। (Write down the powers and functions of Gram Panchayat.)
उत्तर–पंचायती राज का अर्थ- इसके लिए प्रश्न नं० 1 देखें।
ग्राम पंचायत की बनावट एवं कार्य-गांवों में स्थानीय स्वशासन की मुख्य इकाई ग्राम पंचायत है। इस समय देश में 2,50,000 हज़ार से अधिक पंचायतें हैं। एक ग्राम पंचायत एक ग्राम या ग्राम समूह के लिए बनाई जाती है।

रचना (Composition)-पंजाब में 200 की आबादी वाले और हरियाणा में 500 की आबादी वाले हर गांव में पंचायत की स्थापना की गई है। यदि किसी गांव की जनसंख्या इससे कम है तो दो या अधिक गांवों की संयुक्त पंचायत स्थापित कर दी जाती है। पंजाब में पंचायतों की संख्या लगभग 11,960 और हरियाणा में लगभग 6155 है। ग्राम पंचायत का आकार सदस्यता के अनुसार 5 से 31 सदस्य तक अलग-अलग होता है। हरियाणा में पंचायत में 6 से 20 तक सदस्य होते हैं और पंजाब में 5 से 13 तक, जबकि उत्तर प्रदेश में 16 से 31 सदस्य होते हैं। इनकी संख्या गांव की जनसंख्या के आधार पर निश्चित की जाती है। उदाहरणस्वरूप पंजाब को पंचायती राज एक्ट 1994 के अनुसार पंजाब के एक गांव जिसकी जनसंख्या 200 से लेकर 1000 तक है, उस गांव की ग्राम पंचायत में एक सरपंच के अतिरिक्त पांच पंच होते हैं और जिस गांव की जनसंख्या 1000 से 2000 तक हो वहां पर 7 पंच होते हैं तथा जिस गांव की आबादी 10,000 से ज्यादा हो तो उसके लिए सरपंच के इलावा 13 पंच होंगे। इस तरह पंजाब की एक ग्राम पंचायत में एक सरपंच के अतिरिक्त कम-से-कम 5 और ज्यादा-से-ज्यादा 13 सदस्य हो सकते हैं। अनुसूचित जातियों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित की गई हैं। महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गई हैं।

चुनाव-पंचायत के सदस्यों का चुनाव ग्राम सभा के सदस्यों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से गुप्त मतदान द्वारा किया जाता है। प्रत्येक वयस्क नागरिक जो गांव का रहने वाला है, पंचायत के चुनाव में वोट डाल सकता है। पंजाब में 18 वर्ष के नागरिक को मताधिकार प्राप्त है।

सदस्यों की योग्यताएं (Qualifications for Members)-

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • वह 21 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
  • गांव की मतदाताओं की सूची में उसका नाम हो।
  • दिवालिया, पागल और दण्डित न हो।
  • सरकारी कर्मचारी न हो।
  • वह राज्य विधानमण्डल या संसद् का सदस्य न हो।

आरक्षित स्थान-प्रत्येक पंचायत में अनुसूचित जातियों तथा जन-जातियों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित की गई हैं। पिछड़ी श्रेणी के लिए एक सीट आरक्षित-जिस ग्राम सभा क्षेत्र में पिछड़ी श्रेणी की जनसंख्या गांव की कुल जनसंख्या का 20 प्रतिशत से अधिक है उस गांव की पंचायत में एक सीट पिछड़ी श्रेणी के लिए आरक्षित रखी गई है।
स्त्री सदस्य (Women Members)-पंजाब में सन् 2017 से यह प्रावधान है कि ग्राम पंचायतों में 50% स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगे ।

अवधि (Terms)-73वें संवैधानिक संशोधन से पूर्व पंचायतों की अवधि सभी राज्यों में एक समान नहीं थी। कुछ राज्यों में यह अवधि 3 वर्ष तो कुछ राज्यों में 5 वर्ष थी। लेकिन 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा अब पंचायतों की अवधि 5 वर्ष सुनिश्चित कर दी गई है। राज्य सरकार कुछ परिस्थितियों में पांच वर्ष से पूर्व भी पंचायत को भंग कर सकती है, लेकिन इसके लिए 6 मास के भीतर नई पंचायत के चुनाव हो जाने चाहिएं। उल्लेखनीय है कि भंग की गई पंचायत के स्थान पर नव-गठित पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष नहीं अपितु शेष समय तक रहता है।

सरपंच (Chairman)-पंचायत का एक अध्यक्ष होता है जिसे सरपंच कहा जाता है। पंजाब में सरपंच का चुनाव ग्राम सभा के सदस्यों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है। सरपंच को भी अन्य सदस्यों की तरह अवधि पूरी होने से पहले हटाया जा सकता है। सरपंच को निर्णायक मत देने का अधिकार प्राप्त होता है।

बैठकें (Meetings)-पंचायत की बैठकें महीने में एक बार अवश्य होती हैं। पंचायत की बैठकें सरपंच बुलाता है तथा उनकी अध्यक्षता करता है।

निर्णय (Decisions)-पंचायत के निर्णय साधारण बहुमत से होते हैं। परन्तु यदि किसी विषय के पक्ष और विपक्ष में बराबर मत हों तो सरपंच को निर्णायक मत देने का अधिकार है।

ग्राम पंचायत के कार्य तथा शक्तियां (POWERS AND FUNCTIONS OF THE GRAM PANCHAYATS)

पंचायत कई प्रकार के कार्य करती है। इन कार्यों को निम्नलिखित भागों में बांटा जा सकता है –

  1. (1) प्रशासनिक कार्य (Administrative Functions)
  2. (2) सार्वजनिक कार्य (Functions of Public Welfare)
  3. विकास सम्बन्धी कार्य(Development Functions)
  4. न्याय सम्बन्धी कार्य (Judicial Functions)

1. प्रशासनिक कार्य (Administrative Functions)—पंचायत को अपने क्षेत्र में कई प्रकार के प्रशासनिक कार्य करने पड़ते हैं

  • गांव में शान्ति और व्यवस्था को बनाए रखना पंचायत का उत्तरदायित्व है।
  • पंचायत अपने क्षेत्र में अपराधियों को पकड़ने और अपराधों की रोकथाम करने के लिए पुलिस की सहायता करती है।
  • पंचायत 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पास करके अपने क्षेत्र में शराब बेचने को निषेध कर सकती है।
  • गांव के सरकारी कर्मचारियों के कामों पर देख-रेख रखना पंचायत का काम है। यदि पटवारी, नम्बरदार, चौकीदार या कोई अधिकारी अपने कर्तव्य का ठीक प्रकार से पालन न करे तो पंचायत उसकी शिकायत जिलाधीश से कर सकती है। जिलाधीश के लिए अनिवार्य है कि वह ऐसी शिकायत पर कार्यवाही करे और उसका परिणाम पंचायत को बताए।
  • गांव में सड़कों, पुलों, गलियों और नालियों को बनाना और उनकी मुरम्मत करना पंचायत का काम है।

2. सार्वजनिक कल्याण सम्बन्धी कार्य (Functions of Public Welfare)-पंचायत ऐसे बहुत-से कार्य करती है जिससे जनता की भलाई हो जैसे

  • अपने क्षेत्र में सफ़ाई आदि का प्रबन्ध पंचायत करती है।
  • पंचायत लोगों के स्वास्थ्य को अच्छा बनाने का प्रयत्न करती है। इसके लिए वह अस्पताल, दवाखाने खोलती है तथा प्रसूति गृह, बालहित केन्द्र स्थापित करती है। लोगों को चेचक, हैज़ा आदि के टीके लगाए जाते हैं।
  • गांव में पीने के लिए शुद्ध पानी की व्यवस्था की जाती है और कुओं तथा तालाबों में दवाई आदि डाले जाने का प्रबन्ध किया जाता है।
  • सड़कों, गलियों और बाजारों में रोशनी का प्रबन्ध किया जाता है।
  • पंचायत अपने इलाके में प्रारम्भिक शिक्षा का प्रबन्ध भी करती है। पंजाब और हरियाणा में यह काम सरकार ने अपने हाथ में लिया हुआ है।
  • यह लोगों के मानसिक विकास करने के लिए गांव में पुस्तकालय तथा वाचनालय स्थापित करती है।
  • गांव के सार्वजनिक स्थानों की देखभाल तथा सफ़ाई का प्रबन्ध पंचायत करती है।
  • वह शमशान भूमि का प्रबन्ध तथा उसकी देखभाल करती है।
  • गांव में नए वृक्ष लगाना तथा उनकी देखभाल करना भी उसका काम है।
  • पंचायत अपने इलाके में पशुओं की नस्ल को सुधारने का प्रयत्न करती है।
  • कृषि को उन्नत करना, किसानों के लिए अच्छे बीजों का प्रबन्ध करना और उन्हें कृषि के वैज्ञानिक तरीकों से परिचित करना भी पंचायत का कर्तव्य है।
  • पंचायत घरेलू उद्योग-धन्धों को विकसित करने का प्रयत्न करती है ताकि लोगों को अधिक-से-अधिक रोजगार मिल सके।
  • पंचायत लोगों के सामाजिक जीवन को सुधारने के प्रयत्न करती है और समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने का प्रयत्न करती है।
  • बाढ़, अकाल तथा दूसरे प्रकार के संकटों के समय पंचायतें अपने इलाके के लोगों की आर्थिक सहायता भी करती है।
  • पंचायत लोगों के मनोरंजन के लिए मेले, मण्डियां, प्रदर्शनी और दंगल आदि का प्रबन्ध करती है।

3. विकास सम्बन्धी कार्य (Development Functions)-पंचायतें ग्रामीण क्षेत्र में सामुदायिक विकास योजनाएं लागू करती हैं। पंचायतें अपने क्षेत्र के बहुमुखी विकास के लिए छोटी-छोटी योजनाएं बनाती हैं तथा उन्हें लागू करती हैं। कृषि की पैदावार बढ़ाने के लिए किसानों को बढ़िया बीज तथा खाद बांटने का प्रबन्ध करती है। पंचायतें ग्रामीण उद्योगों के विकास के लिए भी प्रयास करती हैं।

4. न्यायिक कार्य (Judicial Functions)-कुछ राज्यों में पंचायतें अपने क्षेत्रों के छोटे-मोटे दीवानी, भूमि सम्बन्धी तथा फौजदारी मुकद्दमे का निर्णय भी करती है। कई राज्यों में अलग न्याय पंचायतों अथवा ‘अदालती पंचायतों’ की व्यवस्था की गई है। अदालती पंचायतों का संगठन सीमावर्ती कुछ पंचायतों को मिलाकर किया जाता है। पंजाब और हरियाणा में अदालती पंचायतों की स्थापना नहीं की गई है। पंचायतों को प्राय: निम्नलिखित न्यायिक शक्तियां प्राप्त हैं-

(1) दीवानी मुकद्दमे-साधारण पंचायत 200 रुपए तक के और विशेष अधिकारों वाली पंचायत को 500 रुपए के दीवानी मुकद्दमे सुनने और फैसले देने का अधिकार प्राप्त है। परन्तु पंचायतें वसीयत सम्बन्धी मुकद्दमे, नाबालिग तथा पागलों के विरुद्ध मुकद्दमे, सरकारी कर्मचारियों और दिवालियों के विरुद्ध मुकद्दमे नहीं सुन सकती।
(2) फौजदारी मुकद्दमे-गाली-गलोच, मारपीट, अश्लील गाने गाना, पशुओं के साथ निर्दयता का व्यवहार करना, सार्वजनिक भवनों को खराब करना, रास्ता रोकना आदि के फौजदारी मुकद्दमे पंचायतें सुनती हैं। पंचायतें 200 रुपए तक का जुर्माना कर सकती हैं। पंचायतें अपना आदेश पालन न करने वाली पर 25 रुपए तक जुर्माना कर सकती है। पंचायतों के सामने वकील उपस्थित नहीं हो सकते। दोनों ओर के व्यक्तियों को स्वयं उपस्थित होकर अपनी बात करनी पड़ती है। पंचायत के निर्णयों के विरुद्ध न्यायालयों में अपील की जा सकती है।

पंचायतों के आय के साधन (SOURCES OF INCOME OF PANCHAYAT)-

पंचायतों को अपना काम चलाने को लिए धन की आवश्यकता पड़ती है। यह धन उन्हें निम्नलिखित साधनों से प्राप्त होता है

  1. गांव में से इकट्ठे होने वाले लगान का 10 प्रतिशत भाग पंचायत को मिलता है।
  2. पंचायत गांव में मकानों पर गृह कर (House Tax) लगाती है।
  3. गांव की साझी भूमि जिसे शामलात (Shamlat) कहते हैं, से भी आय प्राप्त होती है।
  4. पंचायत अपराधी पर जो जुर्माना करती है, उस धन को वह अपने पास रखती है।
  5. खाद की बिक्री आदि से भी पंचायत को आय होती है।
  6. किसी विशेष आवश्यकता पूर्ति के लिए पंचायत गांव के लोगों से विशेष कर इकट्ठा कर सकती है। यह कर धन के रूप में या मुफ्त परिश्रम (Free manual labour) के रूप में दिया जा सकता है।
  7. यह गांव में होने वाले मेलों, मण्डियों और प्रदर्शनी आदि पर भी लगा सकती है।
  8. पंचायत को राज्य सरकार के प्रति वर्ष धन की सहायता मिलती है ताकि वे अपना काम ठीक प्रकार से कर सकें।
  9. पंचायतें कई प्रकार के लाइसैंस भी देती हैं और उसके लिए वह फीस लेती है।
  10. मरे हुए पशुओं की खाल को बेचने से भी पंचायत को आय होती है।

पंचायतों पर सरकारी नियन्त्रण (GOVERNMENT CONTROL OVER PANCHAYATS)-

ग्राम पंचायतें अपने कार्यों एवं क्षेत्र में पूर्ण स्वतन्त्र नहीं हैं। ग्राम पंचायतों पर राज्य सरकार का नियन्त्रण होता है। राज्य सरकार निम्नलिखित ढंगों से पंचायतों पर नियन्त्रण रखती है-

  • ग्राम पंचायतों की स्थापना राज्य सरकार के एक्ट के अधीन की जाती है। राज्य सरकारें ही ग्राम पंचायतों के संगठन, शक्तियों एवं कार्यों को निश्चित करती हैं।
  • राज्य सरकार या उनका कोई अधिकारी ग्राम पंचायतों को आवश्यक आदेश दे सकता है।
  • ग्राम पंचायत के मुख्य अधिकारियों की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाती है।
  • सरकार डिप्टी कमिश्नर द्वारा पंचायतों के बजट पर नियन्त्रण रखती है।
  • पंचायतें सरकार से अनुदान प्राप्त करती हैं। अतः सरकार पर पंचायतों पर नियन्त्रण होना स्वाभाविक है। सरकार पंचायतों के हिसाब-किताब की जांच-पड़ताल करती है।
  • सरकार या उसका अधिकारी पंचायत के कार्यों की जांच-पड़ताल कर सकता है।
  • विशेष परिस्थितियों में सरकार पंचायतों को भंग कर सकती है।

प्रश्न 4. ब्लॉक समिति की बनावट और कार्यों का वर्णन कीजिए।
(Explain the composition and functions of Block Samiti.)
अथवा
पंचायत समिति के कार्यों और शक्तियों का वर्णन कीजिए।
(Give the functions and powers of Panchayat Samiti.)
उत्तर-पंचायती राज जोकि लगभग सारे भारत में उपस्थित है, एक तीन स्तरीय संगठन है। इसके बीच वाले स्तर को पंचायत समिति कहा जाता है। पंचायत समिति पंचायती ढांचे की सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण इकाई है। इतनी शक्तियां, ज़िम्मेदारियां और किसी अन्य इकाई के पास नहीं हैं। इस इकाई को पंचायती राज की धुरी कहना गलत नहीं होगा। इस समय सारे देश में लगभग 6000 पंचायत समितियां हैं।

पंचायत समिति की रचना (Composition of Panchayat Samiti)-प्रत्येक विकास खण्ड (Development of Block) की एक पंचायत समिति होती है। उत्तर प्रदेश में उसे “क्षेत्र समिति” कहते हैं, मध्य प्रदेश में इसे ‘जन परिषद्’ तथा गुजरात में ‘तालुका पंचायत’ कहते हैं।
पंजाब में पंचायत समिति के सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से लोगों द्वारा किया जाता है। अतः अब पंचायत समितियों के सभी सदस्यों का चुनाव लोगों द्वारा किया जाता है। प्रत्येक पंचायत समिति के सदस्यों की संख्या समिति के क्षेत्र की जनसंख्या के अनुसार निश्चित की जाती है, परन्तु किसी भी पंचायत समिति के सदस्यों की संख्या 10 से कम नहीं हो सकती।
विधान सभा के सदस्य-पंजाब विधानसभा के सदस्य जिनके निर्वाचन क्षेत्र का बहुत भाग पंचायत समिति के क्षेत्र में आता है।
विधान परिषद् के सदस्य-अगर राज्य में विधान परिषद् है तो उनके सदस्य भी, जिनका नाम पंचायत समिति के क्षेत्र की मतदाता सूची में रजिस्टर हो।
आरक्षित स्थान-73वें संशोधन के अनुसार अनुसूचित जातियों व जन-जातियों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षित स्थान देने की व्यवस्था की गई है।
महिलाओं के लिए आरक्षित स्थान-पंजाब में प्रत्येक पंचायत समिति में प्रत्यक्ष तौर पर कुल चुनी गई सीटों में से 50% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रखी गई हैं।

सदस्यों की योग्यताएं (Qualifications of Members)—पंचायत समिति का सदस्य चुने जाने या संयोजित (Co-opt.) किये जाने के लिए निम्नलिखित योग्यताएं निश्चित हैं-

  • वह भारत का नागरिक हो
  • वह 21 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो
  • वह किसी सरकारी लाभदायक पद पर न हो
  • वह पागल या दिवालिया न हो
  • वह किसी न्यायालय द्वारा अयोग्य घोषित न किया गया हो।

अवधि (Tenure)-73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पंचायत समितियों की अवधि 5 वर्ष निश्चित की गई है। राज्य सरकार कुछ परिस्थितियों में पांच वर्ष से पूर्व भी पंचायत समिति को भंग कर सकती है, लेकिन इसके लिए 6 माह के भीतर नई पंचायत समिति के चुनाव करवाना आवश्यक है। उल्लेखनीय है कि भंग की गई पंचायत समिति के स्थान पर नवगठित पंचायत समिति का कार्यकाल 5 वर्ष नहीं, अपितु शेष समय तक रहता है।

अध्यक्ष (Chairman)-पंचायत समिति के सदस्य अपने में से एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष को चुनते हैं। अध्यक्ष पंचायत समिति की बैठकों में सभापतित्व करता है। इसकी अवधि भी पांच वर्ष होती है, परन्तु उसे इससे पहले दो तिहाई सदस्यों द्वारा भी हटाए जाने की व्यवस्था है।

कार्यकारी अधिकारी (Executive Officer) खण्ड विकास तथा पंचायत अधिकारी (B.D.O.) पंचायत समिति का कार्यकारी अधिकारी होता है। पंचायत समिति का दैनिक शासन उसी के द्वारा चलाया जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य कई कर्मचारी होते हैं जिनमें तकनीकी विशेषज्ञ भी शामिल होते हैं।

बैठकें (Meetings)—पंचायत समिति की साधारण बैठकें एक वर्ष में कम-से-कम 6 बार बुलाई जाती हैं। पंचायत समिति के एक-तिहाई सदस्य यदि लिखकर दें तो पंचायत समिति की विशेष बैठकें बुलाई जा सकती हैं। साधारण बैठक दो महीने में एक बार अवश्य बुलाई जाती है।

गणपूर्ति (Quorum)—साधारण बैठकों के लिए कुछ सदस्यों का एक तिहाई और विशेष बैठकों के लिए आधे सदस्यों का उपस्थित होना आवश्यक है।

पंचायत समिति के कार्य तथा शक्तियां
(POWERS AND FUNCTIONS OF THE PANCHAYAT SAMITI)-

पंचायत समिति निम्नलिखित कार्य करती है-

1. पंचायतों पर निगरानी और नियन्त्रण-पंचायत समिति अपने क्षेत्रों में पंचायतों के कार्य पर देख-रेख करती है। पंचायत समिति पंचायतों पर निगरानी और नियन्त्रण रखती है। उड़ीसा, राजस्थान, असम और महाराष्ट्र में पंचायत समिति अपने क्षेत्र के बजट को स्वीकार करती है।
2. कृषि का विकास-पंचायत समिति अपने क्षेत्र में कृषि को बढ़ावा देने का प्रयत्न करती है और किसानों में अच्छे बीज, खाद तथा वैज्ञानिक औज़ारों को बांटती है। पंचायत समिति चूहों, टिड्डी दल तथा कीड़ों आदि से फसलों को बचाने का प्रयत्न करती है।
3. सिंचाई-पंचायत समिति कृषि के विकास के लिए सिंचाई के साधनों की व्यवस्था करती है।
4. लघु और कुटीर उद्योगों का विकास-पंचायत समिति अपने इलाके में घरेलू उद्योग-धन्धों को बढ़ावा देने का प्रयत्न करती है। वह इस सम्बन्ध में योजनाएं बनाने और लागू करने का अधिकार रखती है।
5. पशु-पालन और मछली पालन-पंचायत समिति पशु-नस्ल को अच्छा बनाने के कदम उठाती है। वह दूध को डेयरियां खोलने में लोगों की सहायता करती है। पंचायत समिति अपने क्षेत्र में मछली उद्योग को प्रोत्साहन देती है।
6. सफ़ाई और स्वास्थ्य-अपने क्षेत्र की सफ़ाई और स्वास्थ्य का उचित प्रबन्ध करना इसका कार्य है। इसके लिए वह अस्पताल खोलती है और प्रसूति गृह तथा बालहित केन्द्र स्थापित करती है। वह बीमारियों को रोकने के लिए टीके लगवाने तथा दूसरे कदम उठाने का प्रबन्ध करती है।
7. पीने के पानी की व्यवस्था-पंचायत समिति अपने क्षेत्र में पीने के पानी की व्यवस्था करती है। जल प्रदूषण को रोकती है।
8. वनों और वृक्षों का विकास-पंचायत समिति वनों के विकास के लिए वृक्ष लगाती है और उनकी देखभाल करती है।
9. सार्वजनिक निर्माण कार्य-पंचायत समिति अपने इलाके की सड़कों और पुलों के निर्माण और मुरम्मत का प्रबन्ध करती है। वह इलाके में सार्वजनिक नौका घाटों का प्रबन्ध करती है।
10. सहकारी समितियां-पंचायत समिति अपने इलाके में सहकारी समितियों को प्रोत्साहन देती है। कृषि,
औद्योगिक और सिंचाई के क्षेत्र में सहकारी समितियों की स्थापना की जाती है।
11. शिक्षा-पंचायत समिति अपने क्षेत्र में शिक्षा के विकास की ओर भी ध्यान देती है तथा इसमें एक पुस्तकालय
और वाचनालय आदि खोलने का प्रबन्ध करती है। ___ 12. सामुदायिक विकास-पंचायत समिति अपने क्षेत्र की सामुदायिक विकास परियोजनाओं (Community Development Projects) को लागू करती है और क्षेत्र के विकास का प्रयत्न करती है।
13. सहायता के कार्य-पंचायत समिति अपने क्षेत्र के लोगों की अकाल, बाढ़ तथा दूसरे संकट के समय आर्थिक सहायता का प्रयत्न करती है। ___ 14. सहकारी सम्पत्ति-पंचायत समिति सहकारी सम्पत्ति का प्रबन्ध तथा उनकी देखभाल करती है। पंचायत समिति सार्वजनिक हितों के लिए सम्पत्ति का अधिग्रहण भी कर सकती है। .
15. मनोरंजन सम्बन्धी कार्य-पंचायत समिति अपने क्षेत्र के लोगों के लिए सांस्कृतिक कार्यों की भी व्यवस्था करती है, वह खेल-कूद (Tournaments) का प्रबन्ध करती है, मनोरंजन केन्द्र स्थापित करती है, युवक केन्द्रों की व्यवस्था करती है और दंगल आदि का प्रबन्ध करके लोगों के मनोरंजन और सांस्कृतिक विकास के लिए प्रयत्न करती है। पंचायत समिति गांव वालों के लिए मेलों, प्रदर्शनियों तथा मण्डियों का प्रबन्ध करती है।
16. जन्म और मृत्यु का पंजीकरण- वह जन्म और मृत्यु का रजिस्टर भी रखती है जिसमें क्षेत्र में होने वाली जन्म-मरण सम्बन्धी सूचना लिखी जाती है।
17. विश्राम गृहों का प्रबन्ध-पंचायत समिति सरायों और विश्राम-गृहों का प्रबन्ध करती है। 18. सार्वजनिक वितरण प्रणाली-पंचायत समिति सार्वजनिक वितरण प्रणाली को लागू करती है।
19. पिछड़े वर्गों एवं अनुसूचित जाति एवं जनजाति का कल्याण-पंचायत समिति कमजोर वर्गों विशेषकर अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों के लोगों को अन्याय तथा शोषण से बचाती है और उनकी भलाई के लिए उचित कदम उठाती है।
20. उपनियमों का निर्माण-पंचायत समिति आवश्यकता पड़ने पर अनेक विषयों पर उप-नियम बना सकती है।
21. भूमि की सुरक्षा-पंचायत समिति राज्य सरकार के भूमि संरक्षण कार्यक्रम में सरकार की सहायता करती है। .
22. गरीबी निवारण-पंचायत समिति गरीबी दूर करने के लिए अनेक प्रकार के कार्यक्रम एवं योजनाएं बनाती है तथा उन्हें लागू करती है।
23. यातायात के साधनों का विकास-पंचायत समिति सड़कों की देखभाल करती है और यातायात के साधनों का विकास करती है।
24. अनौपचारिक ऊर्जा साधनों का विकास-पंचायत समिति का एक कार्य यह भी है कि वह अनौपचारिक ऊर्जा साधनों का विकास करे।
25. महिलाओं एवं बच्चों का विकास-पंचायत समिति महिलाओं एवं बच्चों के विकास के लिए भी कार्य करती
26. बिजली का प्रबन्ध-पंचायत समिति ग्रामीण क्षेत्र में बिजली का प्रबन्ध करती है।

आय के साधन (SOURCES OF INCOME)-

पंचायत समिति को निम्नलिखित साधनों से आय प्राप्त होती है-

  • पंचायत क्षेत्र में लगाए स्थानीय कर (Local Taxes) का कुछ भाग पंचायत समिति को मिलता है।
  • इसे मेलों तथा मण्डियों से भी आय प्राप्त होती है। पशुओं के मेलों में भाग लेने वाले पशुओं के मालिकों से यह फीस लेती है।
  • यह कई प्रकार के लाइसेंस भी देती है।
  • इसे राज्य सरकार से भी सहायता के रूप में धन मिलता है।
  • समिति को अपनी सम्पत्ति से भी आय होती है।
  • समिति जिला परिषद् की अनुमति से और भी कर लगा सकती है और अपनी आय को बढ़ा सकती है।
  • उसके क्षेत्र में इकट्ठे होने वाले लगान से भी कुछ भाग पंचायत समिति को मिलता है।

प्रश्न 5. जिला परिषद् का संगठन किस प्रकार किया जाता है, इसके कार्यों का वर्णन करो। (How is the Zila Parishad organised ? Discuss its functions.)
अथवा
जिला परिषद् के गठन और कार्यों का वर्णन कीजिए। (Describe the organisation and functions of the Zila Parishad.)
उत्तर-पहले प्रत्येक जिले में जिला बोर्ड होते थे जो ग्रामीण क्षेत्रों के स्थानीय मामलों का प्रशासन करते थे। पंचायती राज की स्थापना के कारण ज़िला बोर्ड को तोड़ दिया गया है। अब प्रत्येक जिले में एक जिला परिषद् होती है। जिला परिषद् पंचायती राज की सर्वोच्च इकाई है। इस समय सारे देश में लगभग 500 जिला परिषदें हैं।

रचना (Composition)—पंचायत समिति की तरह जिला परिषद् में भी कई प्रकार के सदस्य होते हैं। पंजाब की प्रत्येक जिला परिषद् में निम्नलिखित सदस्य होते हैं

1. (क) जनता द्वारा निर्वाचित सदस्य-क्षेत्रीय चुनाव क्षेत्र में से जनता द्वारा प्रत्यक्ष चुने गए सदस्य, जिनकी सदस्य संख्या 10 से लेकर 25 तक होती है।
(ख) पंचायत समितियों के सभी अध्यक्ष।
(ग) लोकसभा व राज्य विधानसभा के सदस्य-जिले का लोकसभा में व राज्य विधानसभा में प्रतिनिधित्व करने वाले लोकसभा व राज्य विधानसभा के सदस्य।
(घ) राज्यसभा व राज्य विधान परिषद् के सदस्य-परिषद् के निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में अंकित राज्यसभा व राज्य विधान परिषद के सदस्य।

2. जिला परिषद् के वह सदस्य जो जिला परिषद् के क्षेत्र में प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा चुने गए हों या नहीं, को भी जिला परिषद् की बैठकों में अपने मत का प्रयोग करने का अधिकार है।
ज़िला परिषद् का प्रत्येक सदस्य 50 हजार की जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है। जिस जिला परिषद् की जनसंख्या पांच लाख या इससे कम है तो उसमें 10 सदस्य होते हैं और जिस जिला परिषद् की जनसंख्या 12 लाख या इससे ज्यादा है तो उस जिला परिषद् के सदस्यों की संख्या 25 से ज्यादा नहीं हो सकती है।

आरक्षित स्थान-जिला परिषद् में अनुसूचित जातियों, जन-जातियों तथा पिछड़ी श्रेणियों के लिए कुछ स्थान आरक्षित किए गए हैं। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों में अनुसूचित जातियों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित की गई हैं। पंजाब में 50% स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित रखे गए हैं। जिला परिषद् में एक सीट पिछड़ी श्रेणियों के लिए आरक्षित रखी जाती है यदि उस जिले में पिछड़ी श्रेणियों की जनसंख्या कुल जनसंख्या का 20 प्रतिशत से कम न हो।

सदस्यों की योग्यताएं (Qualifications of Members)-ज़िला-परिषद् का सदस्य बनने के लिए निम्नलिखित योग्यताएं निश्चित हैं

  • वह भारत का नागरिक हो
  • वह 21 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो
  • वह सरकार या समिति परिषद् के अधीन किसी लाभदायक पद पर न हो
  • वह पागल या दिवालिया न हो और किसी न्यायालय द्वारा अयोग्य भी घोषित न किया गया हो।

अवधि (Tenure)-73वें संवैधानिक संशोधन के अनुसार जिला परिषद् का कार्यकाल पांच वर्ष निश्चित किया गया है। परन्तु कुछ परिस्थितियों में राज्य सरकार जिला परिषद् को समय से पूर्व भी भंग कर सकती है, परन्तु 6 महीने के अन्दर जिला परिषद् के चुनाव करवाना आवश्यक है। उल्लेखनीय है कि नवगठित जिला परिषद् का कार्यकाल 5 वर्ष नहीं, अपितु शेष समय तक रहता है। पंजाब और हरियाणा में जिला-परिषद् का कार्यकाल 5 वर्ष है। सरकार इसे अवधि से पूर्व भी भंग कर सकती है। परन्तु 6 महीने के अन्दर चुनाव करवाना अनिवार्य है।

अध्यक्ष (Chairman)-ज़िला परिषद् का एक अध्यक्ष होता है जो जिला परिषद् के सदस्यों के द्वारा चुना जाता है। सदस्य उपाध्यक्ष (Vice-Chairman) भी चुनते हैं। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को अवधि पूरी होने से पहले दो तिहाई सदस्यों द्वारा हटाए जाने की व्यवस्था है। कई राज्यों में अध्यक्ष को वेतन मिलता हैं, परन्तु पंजाब और हरियाणा में अध्यक्ष को कोई वेतन नहीं मिलता है। जिला परिषद् के अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष की सीटें अनुसूचित जातियों के लिए उनकी राज्य की कुल जनसंख्या के अनुपात के हिसाब से आरक्षित की गई हैं।

सलाहकार (Advisors)-जिला स्तर पर लगे हुए किसी भी सरकारी अधिकारी को जिला परिषद् सलाह देने के लिए अपनी मीटिंग में उपस्थित होने के लिए कह सकती है। जिला परिषद् का ऐसा निमन्त्रण बाध्यकारी होता है।

सचिव (Secretary)-ज़िला परिषद् का एक सचिव होता है जो इसके दैनिक प्रशासन को चलाता है। सचिव को मासिक वेतन मिलता है। इसकी नियुक्ति जिला परिषद् की सिफ़ारिश पर सरकार द्वारा होती है।

बैठकें (Meetings)-जिला परिषद् की बैठक वर्ष में चार बार अवश्य होती है। जिला परिषद् की तीन महीने में एक बार बैठक होना अनिवार्य है। एक तिहाई सदस्यों की मांग से विशेष बैठक भी हो सकती है। सदस्यों की कुल संख्या का एक-तिहाई (1/3) भाग गणपूर्ति के लिए निश्चित किया गया है।

निर्णय (Decisions)-ज़िला परिषद् के निर्णय उपस्थित सदस्यों के बहुमत से किए जाते हैं। परन्तु यदि किसी विषय पर पक्ष और विपक्ष में मत बराबर हों तो अध्यक्ष को निर्णायक मत देने का अधिकार है।

समितियां (Committees)-ज़िला परिषद् अपने कार्यों को कुशलता से करने के लिए कई प्रकार की समितियों की स्थापना करती है।

जिला परिषद् के कार्य (FUNCTIONS OF THE ZILA PARISHAD)

जिला-परिषद् के कार्य सभी राज्यों में एक समान नहीं हैं। यह अलग-अलग राज्यो में अलग-अलग हैं। जिलापरिषद् को केवल समन्वय लाने वाली और निरीक्षण करने वाली संस्था (Co-ordinating and Supervisory Body) के रूप में ही स्थापित किया गया है। इसे निम्नलिखित कार्य करने पड़ते हैं-

(1) यह अपने क्षेत्र में पंचायत समितियों के कार्यों में समन्वय (Co-ordination) स्थापित करने का प्रयत्न करती है।
(2) पंचायत समितियां अपना वार्षिक बजट पास करके ज़िला-परिषद् के पास भेजती है। जिला परिषद् उस पर सोच-विचार कर अपनी स्वीकृति देती है। वह चाहे तो उसमें परिवर्तन के सुझाव भी दे सकती है।
(3) जिला परिषद् अपने क्षेत्र की पंचायत समितियों के कार्यों पर देख-रेख रखती है।
(4) यदि कोई पंचायत समिति अपना काम ठीक प्रकार से न कर रही हो तो जिला परिषद् उसे कर्त्तव्य-पालन के सम्बन्ध में आदेश दे सकती है।
(5) जिला परिषद् जिले के ग्रामीण जीवन का विकास करने और लोगों के जीवन को ऊंचा उठाने के प्रयत्न करती है। (6) यह सरकार को जिले के ग्रामीण विकास के बारे में सुझाव भेज सकती है।
(7) यदि कोई विकास योजना से दो या दो से अधिक पंचायत समितियों का सामूहिक विकास हो तो ज़िला-परिषद् उनमें एकता लाने तथा उस योजना को सफल बनाने का प्रयत्न करती है।
(8) सरकार किसी भी विकास योजना को लागू करने का उत्तरदायित्व जिला परिषद् पर डाल सकती है। (9) जिला परिषद् के जिम्मे विशेष कार्य भी सौंपे गए हैं। जैसे कि पशु-पालन, मछली-पालन, सड़क आदि।
(10) ज़िला परिषद् सरकार को पंचायत समितियों के कार्यों में विभाजन तथा ताल-मेल के सम्बन्ध में परामर्श दे सकती है।
(11) जिला परिषद् खेती-बाड़ी के लिए बीज, फार्म तथा व्यापारिक कार्य खोलती है, गोदामों की स्थापना तथा देखभाल करती है और खेतीबाडी और मेलों का प्रबन्ध करती है।
(12) जिला परिषद् सिंचाई के साधनों का विकास करती है तथा सिंचाई योजनाओं के अधीन पानी का उचित बंटवारा करती है।
(13) जिला परिषद् सामूहिक पम्प सेट्स तथा वाटर वर्क्स लगवाती है।
(14) जिला परिषद् पार्कों का निर्माण, उनकी देखभाल करती है तथा बाग़ लगवाती है।
(15) जिला परिषद् सभी तरह के आंकड़ों को प्रकाशित करती है।
(16) जिला परिषद् जंगलों का विकास करती है तथा वृक्ष लगाती है।
(17) ज़िला परिषद् पशु-पालन तथा पशुओं की डेयरी के विकास के लिए अनेक कार्य करती है।
(18) जिला परिषद् अपने क्षेत्र में ज़रूरी वस्तुओं के वितरण का प्रबन्ध करती है।
(19) जिला परिषद् घरेलू तथा लघु उद्योगों के विकास के लिए अनेक कार्य करती है।
(20) ज़िला परिषद् अपने क्षेत्र में शिक्षा के विस्तार के लिए स्कूलों की स्थापना करती है। अनपढ़ता दूर करने के लिए तथा आम शिक्षा के प्रसार के लिए कार्य करती है।
(21) ज़िला परिषद् गरीबी को दूर करने से सम्बन्धित कार्यक्रमों को लागू करती है।

जिला परिषद् की आय के साधन (SOURCES OF INCOME OF ZILA PARISHAD)

जिला परिषद् की आय के निम्नलिखित साधन हैं-

  • स्थानीय करों (Local Taxes) का कुछ भाग जिला परिषद् को मिलता है।
  • जिला परिषद् सरकार की आज्ञा से कुछ धन पंचायतों से ले सकती है।
  • राज्य सरकार जिला परिषद् की सहायता के रूप में प्रति वर्ष कुछ धन देती है।
  • जिला परिषद् को अपनी सम्पत्ति से बहुत-सी आय होती है।
  • जिला परिषद् सरकार की अनुमति से ब्याज पर उधार भी ले सकती है।

प्रश्न 6. भारत में पंचायती राज व्यवस्था की उपलब्धियों का उल्लेख कीजिए।
(Explain the achievements of Panchayati Raj System in India.)
अथवा
भारत में पंचायती राज प्रणाली की उपलब्धियों/प्राप्तियों का वर्णन करें। (Discuss the achievements of Panchati Raj System in India.)
उत्तर-पंचायती राज का बहुत बड़ा महत्त्व है। इसे भारत के प्रधानमन्त्री स्वर्गीय पं० जवाहर लाल नेहरू ने क्रान्ति का नाम दिया, एक ऐसी क्रान्ति जो नवभारत का निर्माण करेगी। 2 अक्तूबर, 1959 को राजस्थान में पंचायती राज का उद्घाटन करते हुए पं० नेहरू ने कहा था, “हम भारत के लोकतन्त्र की आधारशिला रख रहे हैं।” दिसम्बर, 1992 में संसद् ने 73वां संविधान संशोधन सर्वसम्मति से पास करके पंचायती राज की संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता दी है। इस प्रकार निम्न स्तर पर भी लोकतन्त्र को मान्यता मिल गई है। निम्नलिखित बातों से पंचायती राज के महत्त्व का पता चलता है-

1. जनता का राज (People’s Participation)-पंचायती राज का सबसे बड़ा महत्त्व यह है कि यह जनता का राज है। विदेशी शासन का राज चाहे कितना भी कुशल क्यों न हो फिर भी उससे लोगों के नैतिक जीवन का स्तर ऊंचा नहीं हो सकता। एक प्रसिद्ध कथन है, “अच्छी सरकार से स्वशासन का स्थानापन्न नहीं हो सकता।” (“Good government is not substitution for self-government.) गांव में लोगों का अपना शासन स्थापित हो चुका है। अपने शासन से अच्छा कोई शासन नहीं होता। गांव का प्रत्येक वयस्क नागरिक ग्राम सभा का सदस्य है और ग्राम पंचायत के चुनाव में भाग लेता है। ग्राम पंचायत ग्राम के प्रशासन सम्बन्धी, समाज कल्याण सम्बन्धी, विकास सम्बन्धी तथा न्याय सम्बन्धी सब कार्य करती है। इस प्रकार गांव का व्यक्ति अपने भविष्य का स्वयं निर्माता बना हुआ है। भारत का नागरिक अब किसी के अधीन नहीं है और वह वास्तविक रूप में अपने ऊपर स्वयं शासन करता है।

2. प्रत्यक्ष लोकतन्त्र (Direct Democracy)-पंचायती राज गांवों में प्रत्यक्ष लोकतन्त्र से कम नहीं है। गांव के सब लोग ग्रामसभा के सदस्य के रूप में, जिनकी बैठक वर्ष में दो बार बुलाई जाती है, गांव की समस्याओं पर विचार करते हैं और उनका निर्णय करते हैं। ग्रामसभा गांव की संसद् ( Parliament) की तरह है और गांव के सभी नागरिक इस संसद् के सदस्य हैं। पंचायती राज के वे सब लाभ हैं जो प्रत्यक्ष लोकतन्त्र से प्राप्त होते हैं। पंचायती राज की महत्ता को समझते हुए महात्मा गांधी ने स्वराज्य की मांग की थी जिसका अर्थ सम्पूर्ण गणतन्त्र था।

3. आत्म-निर्भरता (Self-sufficiency)-पंचायती राज का एक उद्देश्य यह है कि प्रत्येक गांव अपने विकास कार्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति, प्रशासन सम्बन्धी बातों तथा न्याय के सम्बन्ध में आत्म-निर्भर हो जाए। पंचायत तथा पंचायत समितियां जनता की संस्थाएं हैं और वे स्वयं टैक्स आदि लगाकर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं, अपने विकास की योजनाएं भी संस्थाएं स्वयं बनाती हैं। पंचायती राज से पहले गांव के विकास की योजनाएं सरकारी कर्मचारी बनाते थे और वे अपनी इच्छा से उन्हें लाग करते थे अर्थात् गांव की विकास योजना तथा आवश्यकता पूर्ति सरकार की इच्छा पर निर्भर थी, परन्तु अब यह लोगों की अपनी इच्छा पर निर्भर है। विकास और पंचायत अधिकार (B.D.0.) अब पंचायत समिति द्वारा निश्चित योजना को लागू करता है।

4. आत्म-विश्वास (Self-confidence)-पंचायती राज से जनता में आत्म-विश्वास की भावना पैदा होती है जो कि किसी भी राष्ट्र को जीवित रखने तथा उसका विकास करने के लिए आवश्यक है। अभी तक प्रशासन के सब कार्यों में सरकार द्वारा ही पहल की जाती थी और सरकार द्वारा निश्चित योजना को ही लागू किया जाता था। लोगों को जो शक्ति मिलती थी उसका प्रयोग भी वे उसी तरीके के अनुसार करते थे जो तरीका सरकार निश्चित कर देती थी, परन्तु अब विकास योजनाओं को गांव वाले स्वयं बनाते हैं, स्वयं ही उन्हें लागू करते हैं। न्यायिक कार्यों में पंचायतों को स्वतन्त्रता दी गई है। पंचायत के सामने वकील नहीं आ सकते। प्रत्येक व्यक्ति पंचायत के सामने अपनी बात स्पष्ट रूप से कहता है। पंचायत के लिए न्याय का कोई विशेष और जटिल तरीका नहीं है। प्रत्येक पंचायत अपनी इच्छानुसार निर्णय करती है। अपने छोटे-छोटे झगड़ों के लिए अब गांव वालों को तहसील तथा जिले में जाने की आवश्यकता नहीं है। गांव वालों के सब काम गांव में बैठे-बैठे ही स्वयं उनके द्वारा हो जाते हैं। इस कारण उनमें आत्म-विश्वास पैदा होना स्वाभाविक है कि वे भी प्रशासन तथा विकास कार्य कर सकते हैं।

5. बाहरी हस्तक्षेप कम (Less outside Interference)–पंचायती राज की स्थापना से ग्रामीण प्रशासन तथा विकास कार्यों में बाहरी हस्तक्षेप बहुत कम हो गया है। सरकारी कर्मचारी अब ग्राम पंचायत समितियों तथा जिला परिषदों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। गांव के लोग अपनी इच्छानुसार ही सब बातों का निर्णय करते हैं। उन पर टैक्स भी उनकी अपनी इच्छा से लगते हैं, इन करों का प्रयोग जनता अपनी इच्छानुसार ही विकास तथा प्रशासन कार्यों पर करती है। बाहरी हस्तक्षेप के कम होने से लोगों में स्वतन्त्रता की भावना पैदा होती है। केवल लोकतन्त्र स्थापित करने से स्वतन्त्रता की भावना नहीं आ जाया करती। यह भावना लोगों में उस समय उत्पन्न होती है जब उन्हें अपने दैनिक कार्यों में पूर्ण स्वतन्त्रता हो। पंचायती राज ने लोगों को यह स्वतन्त्रता प्रदान की है।

6. लोगों को प्रशासन की शिक्षा (Training in Administration to the People)-भारत में लोकतन्त्र सरकार है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को प्रशासन की ज़िम्मेदारी सम्भालने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए। पंचायती राज लोगों को प्रशासन की शिक्षा देने का सर्वोत्तम साधन है। शहरों की स्थानीय संस्था नियम बनाने की प्रशिक्षण जो लोगों को देती हैं, परन्तु न्याय करने की प्रशिक्षण उन संस्थाओं के सदस्यों को नहीं मिलता। पंचायती राज गांव के लोगों को नियम बनाने, उन्हें लागू करने, विकास योजनाएं बनाने तथा लागू करने और न्याय करने का भी अवसर देता है। एक गांव में से सब कार्य करके व्यक्ति राज्य सरकार या संघ सरकार के लिए अच्छी प्रकार से योग्य बन जाता है।

7. गांवों की समस्याओं का हल (Solution of Village Problems)-गांवों तथा कस्बों की समस्याओं को हल करने के लिए पंचायती राज अति आवश्यक है। गांवों और कस्बों की विकास सम्बन्धी समस्याएं इतनी विविध और बड़ी हो गई हैं कि कोई भी प्रशासन भरपूर साधन होने पर भी उनका समाधान नहीं कर सकता। उन समस्याओं का हल स्थानीय लोग ही पंचायत के जरिए आम सहमति से कर सकते हैं। यह बात पिछले दो दशकों से स्पष्ट हो गई है।

8. ग्रामीण जीवन की शीघ्र उन्नति (Rapid Development of Rural Life)-पंचायती राज से ग्रामीण जीवन की उन्नति तेज़ी से होने लगी है और वह दिन दूर नहीं जब ग्रामीण एक पूर्ण और विकसित व्यक्ति होगा और उसकी ग़रीबी, अज्ञानता तथा बीमारी बीते दिनों की कहानी बनकर रह जाएगी। पंचायती राज से ग्रामीण सरकारी कर्मचारियों की इच्छा पर निर्भर नहीं रहते अपितु अब वे अपनी आवश्यकताओं को स्वयं अनुभव करते हुए इस बात का निर्णय स्वयं करते हैं कि उनको किन उपायों से प्राप्त किया जाए और उन उपायों को स्वयं तथा सरकारी कर्मचारियों की सहायता से पूरा करते हैं। अब गांव को अपने जीवन को स्वस्थ, सुखी और विकसित बनाने का अधिकार व्यक्ति को ही है और ऐसा करने में उसका रुचि लेना स्वाभाविक ही है। यह आशा है कि भविष्य में व्यक्ति का अपने प्रयत्नों से जीवन शीघ्र ही विकसित होगा।

9. स्वतन्त्रता की भावना का विकास-केवल लोकतन्त्र की स्थापना से ही स्वतन्त्रता की भावना का विकास नहीं होता बल्कि पंचायती राज की स्थापना से ही लोकतन्त्र की जड़ें मज़बूत होती हैं और स्वतन्त्रता की भावना विकसित होती है। ___पंचायती राज के महत्त्व का वर्णन करते हुए श्रीमती इन्दिरा जी ने कहा था कि, “हमारे देश के लोकतन्त्र की बनियाद मज़बूत होने में पंचायती राज संस्थाओं का प्रमुख स्थान रहा है। इन पर जो बड़ी आशाएं रखी गई हैं, वे पूरी हो सकती हैं, जबकि देहातों में रहने वाले कमजोर वर्ग के लोग, ग्रामीण स्वायत्त शासन में सक्रिय रूप से हिस्सा लें।”

10. न्यायिक कार्यों का महत्त्व-न्यायिक कार्यों में भी पंचायतों को स्वतन्त्रता प्रदान की गई है। पंचायतों के समक्ष वकील उपस्थित नहीं हो सकते। प्रत्येक व्यक्ति पंचायत के सम्मुख अपनी बात स्पष्ट रूप से कह सकता है। पंचायत के लिए न्याय का कोई विशेष तथा जटिल ढंग नहीं है। प्रत्येक पंचायत अपनी इच्छा अनुसार फैसला करती है। अपने छोटे-छोटे झगड़ों के लिए अब गांव वालों को तहसील तथा जिले में जाने की आवश्यकता नहीं है।

11. धन का सही प्रयोग-पंचायती राज से सम्बन्धित संस्थाएं अपने-अपने क्षेत्र में धन एकत्रित करके उस धन को विकास योजनाओं में लगाती है। इससे धन का सही प्रयोग होता है।

12. केन्द्रीय और राज्य सरकारों के कार्यों को कम करती हैं -पंचायती संस्थाओं का एक महत्त्व यह है कि वह केन्द्रीय एवं राज्यों की सरकारों के कार्यों को कम करती हैं। केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों को अलग-अलग तरह के कार्य करने पड़ते हैं, जिससे वह ग्रामीण संस्थाओं के कार्य ठीक ढंग से नहीं कर पाती है। पंचायती संस्थाएं इनके कार्यों को कम करती हैं।

13. सामन्तवादी मूल्यों में कमी-पंचायती राज संस्थाओं की स्थापना से सामन्तवादी मूल्यों में कमी आयी है, क्योंकि पंचायतों, पंचायत समितियों एवं जिला परिषदों में अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा पिछड़े वर्गों के लोग तथा कथित उच्च जाति एवं सामान्त प्रवृत्ति के लोगों के बराबर बैठ कर निर्णय लेते हैं तथा नीतियां बनाते हैं।
पिछले कुछ समय से देश में पंचायती राज की उपयोगिता और महत्त्व पर बहुत अधिक बल दिया जा रहा है और पंचायती राज के प्रति यह नई जागरूकता भूतपूर्व प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने उत्पन्न की है। श्री राजीव गांधी ने कई बार कहा था कि बिना पंचायती राज संस्थाओं को मज़बूत बनाए गांवों की समस्याओं को हल नहीं किया जा सकता। देश में पंचायती राज पद्धति को पुनर्जीवित और सुदृढ़ करने से ही सही रूप से शासन जनता का सच्चा प्रतिनिधि तथा उसके प्रति उत्तरदायी बन सकता हैं।

प्रश्न 7. पंचायती राज प्रणाली के क्या अवगुण हैं ? इसके अवगुणों को दूर करने के लिए सुझाव दीजिए।
(What are the defects of Panchayati Raj System ? Give suggestions to remove its defects.)
अथवा
पंचायती राज की समस्याओं का वर्णन कीजिए।
(Describe the problems of Panchayati Raj.)
उत्तर-सन् 1952 में ग्राम पंचायत स्थापित की गई तथा पंचायतों को अधिक अधिकार दिए गए। बाद में गांवों में पंचायती राज स्थापित किया गया परन्तु इतने वर्ष बीतने के बाद भी पंचायती राज को वह सफलता नहीं मिली जिसकी आशा की गई थी। इनमें कई दोष पाए जाते हैं जो निम्नलिखित हैं-

1. अशिक्षा (Imiteracy)-गांव के अधिकतर लोग अनपढ़ हैं और इससे पंचायत के अधिकतर सदस्य भी अशिक्षित होते हैं। बहुत-सी पंचायतें तो ऐसी हैं जिनके सरपंच भी अशिक्षित हैं और अपने हस्ताक्षर नहीं कर सकते। जनता भी इनके कार्यों में अधिक दिलचस्पी नहीं लेती। परिणाम यह निकलता है कि पंचायतों के सदस्य अयोग्य तथा चालाक व्यक्ति चुने जाते हैं। जब तक चुनने वाले तथा चुने जाने वाले व्यक्ति शिक्षित नहीं होंगे तब तक कोई भी स्थानीय संस्था सफलता से काम नहीं कर सकती।

2. अज्ञानता (Ignorance)—चूंकि गांव के अधिकांश लोग अशिक्षित हैं, इसलिए उन्हें पंचायती राज के उद्देश्यों का भी पता नहीं है। उदाहरण के लिए पंचायती राज के प्रमुख उद्देश्यों में से ग्रामीण जन-समुदाय को अधिक आत्मनिर्भर बनाना है, परन्तु केवल संस्थाएं चलाने वालों में से 1/5 ही इस उद्देश्य को जानते हैं तथा दुर्भाग्यवश ग्रामीण नेतृत्व में से 1/8 ही यह जानते हैं कि पंचायती राज के उद्देश्यों में एक बहत सारे कमजोर वर्गों को सुधारना भी है।

3. साम्प्रदायिकता (Communalism)—गांव के लोगों में जाति-भेद की भावना प्रबल है। पंचायतों के चुनाव जाति-भेद के आधार पर लड़े जाते हैं और चुने जाने के बाद भी उनके भेदभाव समाप्त नहीं होते बल्कि और भी बढ़ जाते हैं। पंच भी जाति-पाति के आधार पर आपस में लड़ते रहते हैं और पंचायत का काम ठीक प्रकार से नहीं हो पाता। हमारे सामाजिक जीवन का यह बहुत बड़ा अभिशाप है, गन्दा दाग है। जब तक ठीक प्रकार की शिक्षा नहीं दी जाती, तब तक विचारों और दृष्टिकोण में अदला-बदली नहीं आएगी। ऐसी अदला-बदली करने में चाहे कितने ही कानून क्यों न बनाए जाएं, कुछ नहीं बन सकता। अदला-बदली विचारों में आनी चाहिए।

4. गुटबन्दी (Groupism)-पंचायतों तथा दूसरी संस्थाओं के चुनाव में लोग प्रायः अपने छोटे-छोटे ग्रुप या दल बना लेते हैं। पंचायतों के चुनाव दलों के आधार पर नहीं लड़े जाते। कम-से-कम चुनाव में दलों को भाग लेने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। जाति, धर्म और भाषा के आधार पर भी लोगों में गुटबन्दी चलती है। इसका परिणाम यह निकलता है कि पंचायत तथा नगरपालिका के काम ठीक प्रकार से नहीं चल पाते।

5. राजनीतिक दलों का अनुचित हस्तक्षेप (Undue Interference by Political Parties)—यह बात लगभग सर्वमान्य है कि स्थानीय स्वशासन में राजनीतिक दलों के लिए कोई स्थान नहीं है। कानून के अनुसार राजनीतिक दल पंचायतों के चुनाव में अपने उम्मीदवार खड़े नहीं कर सकते। कोई भी उम्मीदवार राजनीतिक दलों के चुनाव-निशान प्रयोग नहीं कर सकता। इतना होते हुए भी राजनीतिक दल इन संस्थाओं के कार्यों में हस्तक्षेप किए बिना नहीं रह सकते। यह दल गुटबन्दी को अधिक तीव्र कर देते हैं। इन दलों के समक्ष लोगों के कल्याण की बजाय इनका अपना ही कल्याण होता है।

6. सरकार का अत्यधिक नियन्त्रण (Excessive Control of the Government)—पंचायती राज की संस्थाओं पर सरकार का नियन्त्रण बहुत अधिक है और वह जब चाहे इनके कार्यों में हस्तक्षेप कर सकती है। इसका परिणाम यह निकलता है कि इन संस्थाओं में काम करने का उत्साह पैदा नहीं होता। सरकार इनके प्रस्तावों को रद्द कर सकती है और इनके बजट पर नियन्त्रण रखती है। इन संस्थाओं में सरकारी हस्तक्षेप के कारण ज़िम्मेदारी की भावना भी उत्पन्न नहीं हो पाती।

7. धन का अभाव (Lack of Funds)—पंचायती राज की संस्थाओं को कार्य तो राष्ट्र-निर्माण वाले सौंपे गए हैं, परन्तु इनके पास धन की इतनी व्यवस्था नहीं की गई कि ये अपना कार्य अच्छी तरह से कर सकें। उनकी अपनी स्वतन्त्र आय भी इतनी नहीं होती कि वे अपनी आवश्यकताओं को अच्छी तरह पूरा कर सकें। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उन्हें सरकार से धन की सहायता लेनी पड़ती है। यदि स्थानीय संस्था कोई नई योजना बनाकर लागू करना चाहे तो नहीं कर सकती क्योंकि धन देना या न देना सरकार की इच्छा पर निर्भर करता है।

8. ग़रीबी (Poverty)-भारत के अधिकांश लोग ग़रीब हैं। गांवों में तो ग़रीबी और भी अधिक है। ग़रीबी के कारण अधिक लोग टैक्स नहीं दे सकते और पंचायतें भी नए टैक्स लगा कर अपनी आय को बढ़ा नहीं सकतीं। ग़रीब व्यक्ति सारा दिन अपना पेट भरने की चिन्ता में ही लगे रहते हैं और गांव, नगर तथा देश की दशा के बारे में विचार करने का समय नहीं मिलता। इस कारण भी लोग अपने स्थानीय मामलों पर स्थानीय संस्था के कार्यों में रुचि नहीं ले पाते।

9. पंचायती राज के ढांचे का प्रश्न विवादास्पद है (Structure of Panchayati Rajis Controversial)शुरू से ही इस बात पर विवाद रहा है कि पंचायती राज का ढांचा क्या हो। बलवन्त राय मेहता ने त्रि-स्तरीय ढांचे की सिफ़ारिश की थी। परन्तु केरल और जम्मू-कश्मीर में यह ढांचा एक स्तरीय है जबकि उड़ीसा में द्वि-स्तरीय ढांचा कायम किया गया। पंजाब में 1978 में अकाली-जनता सरकार ने पंचायत समिति को समाप्त कर दिया था। अशोक मेहता समिति ने पंचायती राज को दो चरणों वाली बनाने की सिफारिश की परन्तु मई 1979 में मुख्यमन्त्रियों के सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि पंचायती राज त्रि-स्तरीय होना चाहिए। जनवरी, 1989 में पंचायती राज सम्मेलन में समापन भाषण देते हुए प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने स्पष्ट कहा कि जनसंख्या और क्षेत्रफल को देखते हुए पूरे देश में तीन स्तरीय पंचायती राज प्रणाली कायम नहीं की जा सकती। इसे कुछ राज्यों में तीन स्तरीय और कुछ में दो स्तरीय ही रखना होगा।

10. अयोग्य और लापरवाह कर्मचारी (Inefficient and Careless Staff) स्थानीय स्वशासन की संस्थाएं अपने दैनिक प्रशासकीय कार्यों के लिए अपने कर्मचारियों पर निर्भर हैं, परन्तु ये कर्मचारी प्रायः अयोग्य, लापरवाह और भ्रष्ट होते हैं।

11. ग्राम सभा का प्रभावहीन होना (Ineffective Role of Gram Sabha) ग्राम सभा पंचायती राज की प्रारम्भिक इकाई है तथा पंचायती राज की सफलता बहुत हद तक किसी संस्था के सक्रिय (Active) रहने पर निर्भर करती है। परन्तु बड़े अफसोस की बात है कि संस्था नाममात्र की संस्था बनकर रह गई है। इसकी बैठकें न तो नियमित रूप से होती हैं और न ही आने वाले नागरिक इसकी बैठकों में रुचि लेते हैं।

12. चुनाव का नियमित रूप से न होना (No Regular Election)—पंचायती राज का एक महत्त्वपूर्ण दोष यह है कि पंचायती संस्थाओं के चुनाव निश्चित अवधि के पश्चात् नहीं होते हैं।

पंचायती राज के दोषों को दूर करने के उपाय (METHODS TO REMOVE THE DEFECTS OF PANCHAYATI RAJ SYSTEM)-

1. शिक्षा का प्रसार (Spread of Education) स्थानीय संस्थाओं को सफल बनाने के लिए प्रथम आवश्यकता शिक्षा के प्रसार की है। जब तक लोग शिक्षित नहीं होंगे और अपने कर्त्तव्यों तथा अधिकारों के प्रति सजग नहीं होंगे, ये संस्थाएं सफलता के काम नहीं कर सकतीं।

2. सदस्यों का प्रशिक्षण (Training for the Members)-आज स्थानीय स्वशासन संस्थाओं का काम पहले की तरह सरल नहीं है। पंचायती राज की संस्थाओं के काम तो बहुत ही अधिक पेचीदा और जटिल हैं। इन संस्थाओं के सदस्य प्रशिक्षण के बिना अपने कार्यों को ठीक तरह से नहीं निभा सकते और न ही उचित फैसले कर सकते हैं। अज्ञानता के कारण वह कर्मचारियों और सरकार के अफसरों की कठपुतली बन जाते हैं जो कि अवांछनीय है। इस कारण इन सदस्यों की प्रशिक्षण की पूरी-पूरी व्यवस्था होनी चाहिए।

3. योग्य और ईमानदार कर्मचारी (Competent and Honest Staff)-किसी भी सरकारी संस्था या संगठन को ठीक ढंग से चलाने में कर्मचारियों का बहुत योगदान होता है। स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के कर्मचारियों की नियुक्ति योग्यता के आधार पर होनी चाहिए। उनके वेतन आदि अन्य सरकारी कर्मचारियों के बराबर होने चाहिएं ताकि योग्य व्यक्ति इन संस्थाओं में नौकरी प्राप्त करने के लिए आकर्षित हों। इन कर्मचारियों के प्रशिक्षण की ओर भी ध्यान देना आवश्यक है।

4. सरकारी हस्तक्षेप में कमी (Less Government Interference)-स्थानीय संस्थाओं को अपने कार्यों में अधिक-से-अधिक स्वतन्त्रता मिलनी चाहिए, तभी ये संस्थाएं सफल हो सकती हैं। सरकारी हस्तक्षेप या नियन्त्रण की बजाए इन संस्थाओं को उचित परामर्श (Proper Guidance) की अधिक आवश्यकता है।

5. धन की अधिक सहायता (More Financial Aid)-धन का अभाव भी एक बहुत बड़ा दोष है। सरकार को चाहिए कि इन संस्थाओं की धन से पूरी-पूरी सहायता करे। लोगों के जीवन का सुधार करने के लिए जो नई योजनाएं ये संस्थाएं बनाएं सरकार को चाहिए कि उसके लिए उचित मात्रा में धन दे। इसके अतिरिक्त कुछ और टैक्स लगाये जाने का अधिकार इन संस्थाओं को मिलना चाहिए ताकि इनकी स्वतन्त्र आय हो और उन्हें सरकार से धन मांगने की कम आवश्यकता पड़े।

6. नियमित चुनाव (Regular Election)-पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव निश्चित अवधि के पश्चात् नियमित रूप से होने चाहिए। फरवरी, 1989 में राष्ट्रपति वेंकटरमण ने यह सुझाव दिया कि पंचायत के चुनाव को राज्यों की विधानसभाओं तथा लोकसभा के चुनावों की तरह अनिवार्य बना दिया जाए और इसके लिए संविधान में संशोधन कर दिया जाए। पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव, चुनाव आयोग की देख-रेख में होने चाहिए। 73वें संविधान संशोधन के अन्तर्गत पंचायती राज संस्थाओं में पांच वर्ष में चुनाव कराए जाना और भंग किए जाने की स्थिति में छ: महीने के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य किया गया है।

7. राजनीतिक दलों पर रोक (Check on Political Parties)-स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं में राजनीतिक दलों के लिए कोई स्थान नहीं है। यह एक सर्वमान्य तथ्य है। वैसे तो कानून द्वारा इन दलों पर कुछ एक प्रतिबन्ध लगाए हुए हैं, परन्तु व्यावहारिक रूप में ये प्रतिबन्ध निष्प्रभावी हैं। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष ढंग से यह दल नगरपालिकाओं और पंचायती राज में आ ही घुसते हैं। इस कुप्रथा को रोकने के लिए कानून पर अधिक निर्भर रहना ठीक नहीं है बल्कि लोगों . की सावधानी और दलों की सद्भावना और शुभ नीति ही अधिक उपयोगी हो सकते हैं।

8. ग्राम सभा को सक्रिय किया जाना चाहिए (Gram Sabha should be made Active)-पंचायती राज को सफल बनाने के लिए यह आवश्यक है कि ग्राम सभा को एक प्रभावशाली संस्था बनाया जाए। इसकी बैठकें नियमित रूप से होनी चाहिएं और गांव के नागरिकों को इसकी कार्यवाहियों में रुचि नहीं लेनी चाहिए। जब तक गांव के नागरिक स्वयं अपनी समस्याओं तथा अपने क्षेत्र के प्रति उत्साह नहीं दिखाएंगे तब तक पंचायती राज का सफल होना नामुमकिन है। इसलिए 73वें संविधान संशोधन के अनुसार ग्राम सभा को पंचायती राज व्यवस्था का मूलाधार बनाया गया है। इस संशोधन के अनुसार ग्राम सभा ऐसे सारे काम करेगी जो राज्य विधानमण्डल उसे सौंपेगा।।

9. पंचायती राज की संस्थाओं को अधिक शक्तियां देनी चाहिए (More Powers should be given to the Panchayati Raj Institutions)-पंचायती राज की संस्थाओं को अधिक दायित्व व शक्तियां देनी चाहिए। ग्राम पंचायतों को गांव का सुधार करने का पूरा अधिकार होना चाहिए। ग्राम पंचायतों को गांवों के सभी निर्माण कार्यों के बारे में निर्णय करने तथा उन कार्यों को कराने का भार सौंप दिया जाए। इस तरह ब्लॉक क्षेत्र के निर्माण कार्यों का ब्लॉक पंचायतों को और जिले के निर्माण कार्यों का उत्तरदायित्व जिला परिषदों को सौंपा जाए।

10. अधिवेशन और चुनाव (Session and Election)-ग्राम सभा के अधिवेशनों को समयानुसार बुलाना चाहिए। स्थानीय संस्थाओं के चुनाव भी नियमित रूप से होने चाहिए।

11. एकरूपता (Uniformity)—अलग-अलग राज्यों में पंचायती राज संस्थाओं के नाम और महत्त्व को एकजैसा कर देना चाहिए ताकि साधारण बुद्धि रखने वाले व्यक्ति भी सुगमता से समझ सकें।

12. स्वशासन के यूनिट-श्री जय प्रकाश नारायण इन संस्थाओं को इनसे सम्बन्धित स्तरों पर “स्व-शासन के यूनिट” समझने हैं तथा वह यह सुझाव देते थे कि राज्य सरकारों से इनका इस प्रकार का सम्बन्ध होना चाहिए जैसे की राज्य सरकारों का केन्द्रीय सरकार से होता है।
निष्कर्ष (Conclusion)-पंचायती राज में अनेक कमियों के बावजूद भी इसके महत्त्व को भुलाया नहीं जा सकता। पंचायत राज व्यवस्था ने देश के राजनीतिकरण (Politilisation) और आधुनिकीकरण (Modernization) में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। पंचायतों के चुनावों ने ग्रामीणों में राजनीतिक चेतना उत्पन्न की है और पंचायती राज व्यवस्था के कारण उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी (Political Participation) में वृद्धि हुई है। 73वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता दी गई है। इस संशोधन द्वारा पंचायती संस्थाओं के चुनाव नियमित और निश्चित समय पर होंगे। आवश्यकता इस बात की है कि साम्प्रदायिकता, हिंसा, भ्रष्टाचार इत्यादि बुराइयों को दूर किया जाए।

प्रश्न 8. शहरी स्थानीय संस्थाओं सम्बन्धी 74वें संवैधानिक संशोधन की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (Explain the main features of 74th Amendment relating to Urban Local Self-Government.)
अथवा
शहरी स्थानीय संस्थाओं की नई प्रणाली की मुख्य विशेषताएं लिखिए। (Write down the main characteristics of the New System of Urban Local Bodies.)
उत्तर-सितम्बर, 1991 को लोकसभा में 73वां संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश किया गया। इस विधेयक का सम्बन्ध शहरी स्थानीय संस्थाओं में सुधार करना था। दोनों सदनों की स्वीकृति मिलने पर शहरी स्वशासन में सुधार के लिए एक 30 सदस्यों की समिति गठित की गई, जिसमें 20 सदस्य लोकसभा के और 10 सदस्य राज्यसभा के शामिल किए गए। इस समिति के अध्यक्ष के० पी० सिंह देव (K. P. Singh Dev) थे। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट जुलाई, 1992 को संसद् के सामने पेश की। इस समिति की सिफ़ारिशों को जो कि शहरी स्वशासन में सुधार से सम्बन्धित थीं, 22 दिसम्बर, 1992 को लोकसभा ने और 23 दिसम्बर, 1992 को राज्यसभा ने अपनी स्वीकृति प्रदान की। राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त होने के बाद इसका नम्बर 74 हो गया क्योंकि इससे पूर्व 73 संवैधानिक संशोधनों को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हो चुकी थी। इस संशोधन की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

1. शहरी स्थानीय स्व-शासन की संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता (Constitutional Sanction to Urban Local Bodies)-74वें संशोधन द्वारा संविधान में भाग 9A (Part IX A) में शामिल किया गया। इसके साथ ही 12वीं अनुसूची (12th Schedule) को भी इसमें शामिल किया गया है। भाग 9A में कुल 18 धाराएं हैं और 12वीं अनुसूची में ऐसे 18 विषय शामिल हैं, जिनके सम्बन्ध में योजनाओं को लागू करने का उत्तरदायित्व राज्य विधानमण्डल नगरपालिकाओं को सौंप सकता है।

2. तीन स्तरीय स्थानीय व्यवस्था (Three tier Urban Local Bodies)-74वें संवैधानिक संशोधन द्वारा प्रत्येक राज्य में तीन स्तरीय शहरी स्थानीय संस्थाओं की स्थापना की व्यवस्था की गई है। निम्न स्तर पर नगरपालिका, उच्च स्तर पर नगर-निगम और मध्य में नगर परिषद् की व्यवस्था की गई है।

3. नगरपालिका की रचना (Composition of Municipalities)-74वें संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि प्रत्येक राज्य का विधानमण्डल तीनों स्तर की नगरपालिकाओं की रचना सम्बन्धी व्यवस्था स्वयं करेगा। प्रत्येक नगरपालिका का क्षेत्र सरकार द्वारा निर्धारित किया जाएगा। नगरपालिका के निर्वाचन क्षेत्र को वार्ड कहा जाएगा। इन वार्डों के मतदाताओं द्वारा प्रत्यक्ष रूप से नगरपालिका के लिए अपने-अपने वार्ड का एक-एक प्रतिनिधि निर्वाचित करना होगा। चुनाव सम्बन्धी झगड़ों का निपटारा राज्य विधानमण्डल के कानून के अनुसार होगा।

4. (Provision to representation to persons of different Categories)-74वें संशोधन द्वारा राज्य विधानमण्डल को यह शक्ति दी गई है कि वह विभिन्न स्तरों पर नगरपालिकाओं में निम्नलिखित वर्गों के व्यक्ति को प्रतिनिधित्वता प्रदान करें

  • जिन व्यक्तियों को नगरपालिकाओं के प्रशासन सम्बन्धी विशेष ज्ञान या अनुभव है। इन्हें किसी प्रस्ताव पर मतदान का अधिकार नहीं है।
  • नगरपालिका के क्षेत्र में रहने वाले लोकसभा और राज्य विधानसभा के सदस्य।
  • नगरपालिका के क्षेत्र में मतदाताओं के रूप में दर्ज राज्यसभा और विधान परिषद् के सदस्य।
  • वार्ड समितियों के सभापति।

5. नगरपालिका के अध्यक्ष का चुनाव (Election of Chairman of the Municipalities)-74वें संशोधन द्वारा नगरपालिका अध्यक्ष का चुनाव, नगरपालिका के चुनाव क्षेत्रों में से प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सदस्यों में से ही किया जाएगा।

6. वार्ड समिति (Ward Committee)-74वें संशोधन द्वारा तीन लाख से ज्यादा जनसंख्या वाली नगरपालिका में वार्ड समितियों की स्थापना की व्यवस्था की गई है। वार्ड समितियों की रचना व अधिकार क्षेत्र को निश्चित करने का काम राज्य विधानमण्डल को सौंपा गया है। राज्य विधानमण्डल अपने इस काम को कानून द्वारा पूरा करेगा। एक वार्ड समिति के क्षेत्र में आने वाले वार्डों से निर्वाचित नगरपालिका के सदस्य भी उस वार्ड समिति के सदस्य होंगे।

7. वार्ड समिति का अध्यक्ष (Chairman of Ward Committee)-74वें संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि अगर वार्ड समिति के क्षेत्र में केवल एक ही सदस्य है तो नगरपालिका के लिए निर्वाचित उस वार्ड का सदस्य ही वार्ड समिति का अध्यक्ष होगा। अगर वार्ड समिति में दो या दो से अधिक सदस्य हों तो निर्वाचित सदस्यों में से एक सदस्य को वार्ड समिति के सदस्यों द्वारा समिति का अध्यक्ष निर्वाचित किया जाएगा।

8. वार्ड समिति के काम और शक्तियां (Powers and Functions of Ward Committee) वार्ड समितियों की शक्तियां और काम राज्य विधानमण्डल द्वारा निर्धारित किए जाएंगे। राज्य विधानमण्डल वार्ड समितियों को संविधान की 12वीं अनुसूची में शामिल विषयों से सम्बन्धित शक्तियां सौंप सकता है।

9. सीटों में आरक्षण की व्यवस्था (Provision of the Reservation of seats)-74वें संशोधन द्वारा निम्नलिखित वर्गों के लिए सीटों में आरक्षण की व्यवस्था की गई है-

  • प्रत्येक नगरपालिका में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन-जातियों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात के अनुसार सीटें आरक्षित रखी गई हैं।
  • अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन-जातियों के लिए आरक्षित स्थानों में से 1/3 सीटें अनुसूचित जाति की महिलाओं के लिए आरक्षित रखी गई हैं।
  • कुल निर्वाचित पदों का 1/3 भाग स्त्रियों (अनुसूचित जाति एवं जन-जाति की स्त्रियों समेत) के लिए आरक्षित
    होगा।
  • विभिन्न नगरपालिकाओं के अध्यक्ष पद के लिए 1/3 स्थान स्त्रियों के लिए आरक्षित होंगे।
  • राज्य विधानमण्डल कानून बना कर नागरिकों की किसी भी पिछड़ी श्रेणी के लिए स्थान आरक्षित रखने की व्यवस्था कर सकता है। .

10. निश्चित अवधि (Fixed Tenure)—प्रत्येक शहरी स्थानीय संस्थाओं का कार्यकाल पांच वर्ष निर्धारित किया गया है और उनका कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व नये चुनाव होना अनिवार्य है। निर्धारित समय से पहले भंग किए जाने सम्बन्धी मामले में चुनाव छ: महीने के भीतर होना अनिवार्य है। 74वें संशोधन द्वारा यह भी व्यवस्था की गई है कि यदि किसी नगरपालिका को भंग या स्थगित किया जाता है तो उससे पूर्व उसे अपना पक्ष स्पष्ट करने का उचित मौका दिया जाना ज़रूरी है।

11. सदस्यों की योग्यताएं. (Qualifications of Members)-प्रत्येक स्तर की नगरपालिकाओं का चुनाव लड़ने के लिए वही योग्यताएं अनिवार्य हैं जो योग्यताएं विधानमण्डल के सदस्य बनने के लिए आवश्यक हैं । जो व्यक्ति विधानमण्डल का सदस्य बनने के अयोग्य है वह नगरपालिका का सदस्य बनने के भी अयोग्य है।

12. नगरपालिकाओं की शक्तियां और कार्य (Powers and functions of Municipalities)-74वें संवैधानिक संशोधन के अन्तर्गत नगरपालिकाओं की शक्तियां और ज़िम्मेदारियां निश्चित करने का काम राज्य विधानमण्डल को सौंपा गया है। संविधान की 12वीं अनुसूची में शामिल विषयों सम्बन्धी काम भी नगरपालिकाओं को सौंपे गए हैं। इसके अतिरिक्त राज्य विधानमण्डल कानून द्वारा नगरपालिकाओं को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय प्रदान करने के लिए योजनाएं तैयार करवाने का उत्तरदायित्व भी सौंप सकता है। 12वीं अनुसूची में कुल 18 विषय हैं और उनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

शहरी योजनाबन्दी, जिसमें नगर योजनाबन्दी भी शामिल हैं, भवनों का निर्माण, आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए योजनाबन्दी, सड़कें व पुल, घरेलू उद्योग और व्यापारिक महत्त्व का प्रोत्साहन, पानी की सप्लाई, स्वास्थ्य, अग्नि सेवाओं का प्रबन्ध, वातावरण की सुरक्षा, गन्दी बस्तियों का सुधार, शिक्षा और कला सम्बन्धी विकास, गलियों की रोशनी का प्रबन्ध आदि की व्यवस्था करना।

13. कर लगाना (Power to impose Taxes)—राज्य विधानमण्डल कानून द्वारा नगरपालिकाओं को कुछ कर लगाने और एकत्रित करने का अधिकार सौंप सकती है। इसके अलावा राज्य विधानमण्डल द्वारा लगाने जाने वाले विभिन्न करों में से कुछ कर नगरपालिकाओं को सौंप सकता है। राज्य अपनी संचित निधि में से भी नगरपालिकाओं की सहायता के लिए कुछ धन-राशि दे सकता है।

14. वित्त आयोग का गठन व कार्य (Composition and Functions of Finance Commission)-74वें संशोधन द्वारा नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति पर नियन्त्रण करने के लिए वित्त आयोग की व्यवस्था की गई है जिसके सदस्यों की संख्या, जिनकी योग्यताएं, चुनाव, शक्तियां राज्य विधानमण्डल द्वारा निश्चित की जाएंगी। वित्त आयोग की नियुक्ति 73वां व 74वां संवैधानिक संशोधन लागू होने के एक वर्ष के भीतर राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाएगी। पांच वर्ष की अवधि पूरी होने पर पुनः अगले वित्त आयोग की नियुक्ति की जाएगी। इसके काम इस प्रकार हैं-

  • नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति सम्बन्धी विचार करना
  • राज्य सरकार द्वारा लगाए जाने वाले विभिन्न करों की धन-राशि सरकार और नगरपालिकाओं में बांटना
  • नगरपालिकाओं द्वारा सौंपे जाने वाले करों सम्बन्धी सिद्धान्तों का निर्माण करना
  • नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए राज्यपाल को सिफ़ारिश करना
  • राज्यपाल द्वारा नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति के हित में सौंपे गए किसी भी अन्य मामले पर विचार।

15. जिला योजनाबन्दी के लिए समिति (Committee for District Planning)-74वें संशोधन द्वारा प्रत्येक जिले में जिला स्तरीय योजनाबन्दी की व्यवस्था की गई है। राज्य विधानमण्डल कानून द्वारा (1) जिला योजनाबन्दी समिति की रचना, (2) वह विधि जिस द्वारा समिति में स्थान भरे जाएंगे, जिसमें जिला योजनाबन्दी समिति के कुल सदस्यों का 4/5 भाग, जिला स्तरीय पंचायतों और जिले की नगरपालिकाओं से चुने गए सदस्यों द्वारा अपने में से चना जाना अनिवार्य होगा, (3) जिला योजनाबन्दी से सम्बन्धित ऐसे कार्य जो कि योजनाबन्दी समिति को सौंपे जाने हैं, (4) जिला योजनाबन्दी समितियों के अध्यक्षों की निर्वाचन विधि आदि से सम्बन्धी व्यवस्था कर सकता है।

16. जिला योजनाबन्दी के कार्य (Functions of the District Planning Committee)—इसका मुख्य काम ज़िला परिषदों और नगरपालिकाओं द्वारा तैयार की गई योजनाओं को इकट्ठा करना और पूरे जिले के विकास के लिए ढांचा तैयार करना है। इसका प्रधान समिति द्वारा तैयार की गई विकास योजना को राज्य सरकार के सम्मुख पेश करता है।

17. बड़े शहरों की योजनाबन्दी (Committee for Metropolitan Planning)-74वें संशोधन द्वारा प्रत्येक शहर के लिए एक महानगर योजनाबन्दी समिति की व्यवस्था की गई है। इस समिति के द्वारा महानगर के विकास की योजनाएं बनाई जाती हैं। इसकी स्थापना उस नगर में की जाती है जिसकी जनसंख्या लगभग 20 लाख या इससे अधिक हो। ऐसे क्षेत्र में एक ज़िला या एक से अधिक जिले शामिल किए जा सकते हैं। राज्य की सरकार जनमत आदेश द्वारा ऐसे क्षेत्र को महानगर घोषित कर सकती है। राज्य सरकार की घोषणा के बिना किसी भी क्षेत्र को महानगर नहीं स्वीकार किया जा सकता।

18. महानगर योजनाबन्दी समिति की रचना और कार्य (Composition and functions of Metropolitan Planning Committee)–74वें संशोधन द्वारा इसकी रचना सम्बन्धी व्यवस्था राज्य सरकार के कानून द्वारा की जाएगी। महानगर योजनाबन्दी समिति के कुल सदस्यों का 2/3 भाग महानगर क्षेत्र की नगरपालिकाओं के चुने हुए सदस्यों और जिला परिषदों के अध्यक्षों में से निर्वाचित होना अनिवार्य है। इसकी योजनाबन्दी समिति में भारत सरकार, राज्य सरकार और दूसरी संस्थाओं को आवश्यकतानुसार प्रतिनिधित्व दिए जाने की व्यवस्था की गई है। राज्य सरकार के कानून द्वारा ही समिति के प्रधान का निर्वाचन निश्चित किया जाता है।

योजना समिति के कार्य (Functions of the Planning Committee)-इसका मुख्य काम महानगर के विकास के लिए योजनाएं तैयार करना है। अपने क्षेत्र के विकास के लिए योजनाएं तैयार करते समय इसे अपने क्षेत्र में आने वाली नगरपालिकाओं द्वारा तैयार की गई योजनाओं को ध्यान में रखना पड़ता है। इसके बाद महानगर के विकास के लिए योजना का निर्माण भारत सरकार और राज्य सरकार द्वारा घोषित उद्देश्यों को सम्मुख रखकर किया जाएगा। महानगर समिति द्वारा तैयार की गई योजना समिति के अध्यक्ष द्वारा राज्य सरकार को पेश की जाएगी।

19. नगरपालिकाओं का जारी रहना (Continuance of existing Municipalities)-74वें संशोधन से पहले नगरपालिकाएं अपने निर्धारित समय तक जारी रहती थीं और मुख्यमन्त्री ही इन्हें समय से पूर्व भंग कर सकता था। परन्तु 74वें संशोधन के बाद राज्य विधानमण्डल की सिफ़ारिश पर ही मुख्यमन्त्री नगरपालिकाओं को भंग कर सकता है। इसके लिए विधानमण्डल द्वारा एक प्रस्ताव पास किया जाना अनिवार्य है।

20. वर्तमान कानूनों का जारी रहना (Continuance of the existing laws)-74वें संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि अगर वर्तमान कानून इस संशोधन द्वारा की गई व्यवस्थाओं से मेल नहीं खाते तो यह व्यवस्था इस संशोधन के लागू होने के एक वर्ष बाद तक जारी रह सकती है। इससे पहले भी पहली व्यवस्था में राज्य विधानमण्डल द्वारा कानून बनाकर परिवर्तन किया जा सकता है।

21. नगरपालिकाओं के चुनाव, चुनाव आयोग की निगरानी में (Election of Municipalities are under supervision of Election Commission)-शहरी क्षेत्रों में कायम स्थानीय संस्थाओं के चुनावों की निगरानी, निर्देशन, नियन्त्रण, मतदाता सूचियों की तैयारी आदि कार्य संविधान के 73वें संशोधन द्वारा स्थापित स्वतन्त्र चुनाव आयोग द्वारा सम्पन्न करवाए जाएंगे। राज्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति सम्बन्धी निर्णय राज्य के राज्यपाल द्वारा होगा। चुनाव आयुक्त की सेवा शर्ते और कार्यकाल राज्य विधानमण्डल द्वारा पास किए कानूनों के अनुसार राज्यपाल निश्चित करेगा। चुनाव आयुक्तों को हटाने के लिए वही प्रक्रिया अपनाई जाएगी जिसके द्वारा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाया जाता है।

22. नगरपालिका के चुनाव विवाद अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर (Election matters of Municipalities are outside the Judicial Jurisdiction)-74वें संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि नगरपालिका के चुनाव क्षेत्र निश्चित करने और उनके मध्य सीटों का बंटवारा करने वाला कानून को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है। नगरपालिका के किसी भी सदस्य के चुनाव को केवल राज्य विधानमण्डल द्वारा निर्धारित संस्था में ही चुनौती दी जा सकती है।

निष्कर्ष (Conclusion)-74वें संशोधन द्वारा पहली बार शहरी स्थानीय स्व-शासन से सम्बन्धित संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता दी गई है, नगरपालिका के लगातार चुनाव, उनके कार्यों और शक्तियों में व्यापक वृद्धि, इनकी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने के लिए इनको कुछ कर लगाने की शक्ति प्रदान करना और सारे देश के लिए इन्हें एकरूपता प्रधान की गई है। यह स्थानीय प्रबन्ध को बढ़िया बनाने की दिशा में उठाया गया एक अच्छा और ठोस कदम है।

प्रश्न 9. नगर-निगम के संगठन और कार्यों का विवेचन कीजिए।
(Describe the organisation and functions of Municipal Corporation.)
अथवा नगर-निगम के संगठन और कार्यों की चर्चा कीजिए।(Describe the organisation and functions of Municipal Corporation.)
उत्तर-नगर-निगम शहरी स्थानीय स्वशासन की सर्वोच्च संस्था है। नगर-निगम की स्थापना बड़े-बड़े शहरों में की जाती है। नगर-निगम की स्थापना संसद् अथवा राज्य विधानमण्डल के द्वारा निर्मित कानून के अनुसार की जाती है। सब से पहले 1888 में एक अधिनियम के अन्तर्गत मुम्बई में नगर-निगम की स्थापना की गई थी। दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, यागरा, अमृतसर, जालन्धर, लुधियाना, कानपुर, हैदराबाद, लखनऊ, कलकत्ता (कोलकाता), पूना, बंगलौर, पटना, ग्वालियर, बनारस, शिमला, जबलपुर, भोपाल, इन्दौर, अहमदाबाद, बड़ौदा, सूरत, फरीदाबाद, पंचकूला, अम्बाला शहर, यमुनानगर, करनाल, हिसार, रोहतक, पानीपत आदि नगरों में स्थानीय शासन नगर-निगमों द्वारा चलाया जाता है।

नगर-निगम का संगठन (Organisation of Municipal Corporation)-भारत के विभिन्न नगर-निगमों का गठन प्राय: एक जैसा है। नगर-निगम के सदस्यों का निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर सम्बन्धित क्षेत्र की जनता प्रत्यक्ष रूप से करती है। निगम की सदस्य संख्या विभिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न है। क्योंकि यह मुख्यतः शहर की जनसंख्या से सम्बन्धित होती है। पंजाब में नगर-निगम की सदस्य संख्या कम-से-कम 40 और अधिक-से-अधिक 50 होती है। अमृतसर, जालन्धर तथा लुधियाना निगम की संख्या 50 निश्चित की गई है। नगर-निगमों में अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जन-जाति के लिए स्थानों से आरक्षण का भी प्रावधान है। पंजाब में महिलाओं को कुल प्रतिनिधियों के स्थानों में से 50% स्थान देने की व्यवस्था की गई है। पंजाब में प्रत्येक नगर-निगम में दो सीटें पिछड़ी श्रेणियों के लिए आरक्षित की गई हैं।

कार्यकाल (Tenure)-73वें संवैधानिक संशोधन के अनुसार नगर-निगम का कार्यकाल पांच वर्ष निश्चित किया गया है। परन्तु कुछ परिस्थितियों में राज्य सरकार नगर-निगम को समय से पूर्व भी भंग कर सकती है, परन्तु 6 महीने के अन्दर नगर-निगम के चुनाव करवाना आवश्यक है। उल्लेखनीय है कि नवगठित नगर-निगम का कार्यकाल 5 वर्ष नहीं, अपितु शेष समय तक रहता है।
नगर-निगम के अधिकारी (Officers of the Municipal Corporation)-नगर-निगम के प्रमुख अधिकारी अग्रलिखित होते हैं :-

1. महापौर (Mayor)–महापौर नगर-निगम का राजनीतिक प्रशासक होता है। निगम की पहली बैठक में निगम के सभी सदस्य महापौर (Mayor) और उप महापौर (Deputy Mayor) का पांच वर्ष के लिए चुनाव करते हैं। महापौर नगर-निगम की बैठकों की अध्यक्षता करता है तथा विचार-विमर्श का मार्ग-दर्शन करता है।

2. मुख्य प्रशासन अधिकारी (Chief Administrative Officer)-निगम का प्रशासन चलाने का उत्तरदायित्व मुख्य प्रशासन अधिकारी का होता है जिसे निगम कमिश्नर कहा जाता है। कमिश्नर की नियुक्ति सरकार द्वारा की जाती है। दिल्ली के निगम कमिश्नर की नियुक्ति केन्द्रीय सरकार करती है। निगम के सारे प्रशासनिक कार्य कमिश्नर के नियन्त्रण में होते हैं तथा यह आवश्यक मार्ग-दर्शन तथा नियन्त्रण करता है।

निगम के कार्य (FUNCTIONS OF CORPORATION)-

निगम के कार्यों को दो भागों में बांटा गया है-अनिवार्य तथा ऐच्छिक कार्य। अनिवार्य कार्यों में वे कार्य आते हैं जो नगर निगम को अवश्य करने होते हैं। ऐच्छिक कार्य वे होते हैं जो आवश्यक नहीं, परन्तु वित्तीय स्रोतों के आधार पर इन्हें किया जा सकता है।

अनिवार्य कार्य-

(1) अपने समस्त क्षेत्र की सफ़ाई का ध्यान रखना। (2) जल सप्लाई का प्रबन्ध करना। (3) नालियां बनवाना ताकि गन्दा पानी नगर से बाहर चला जाए। (4) बिजली का प्रबन्ध करना। (5) गन्दी बस्तियों (Slum Areas) का सुधार करना। (6) श्मशान भूमि बनाना। (7) प्रसूति सहायता केन्द्र तथा बच्चों के कल्याण केन्द्र खोलना। (8) यातायात सेवाओं का प्रबन्ध करना। (9) प्राइमरी या मिडल तक की शिक्षा का प्रबन्ध करना। (10) भवन-निर्माण के लिए नियम बनाना और नक्शे मन्जूर करना। (11) जन्म तथा मृत्यु के आंकड़े रखना। (12) तांगे, ठेले, साइकिल-रिक्शा, मोटररिक्शा, रेहड़ी आदि के लाइसेंस देना और उनके बारे नियम निश्चित करना। (13) गलियों, सड़कों, बाज़ारों और पुलों की मुरम्मत करना। (14) खाने-पीने की चीज़ों में मिलावट को रोकना और अपराधियों को दण्ड देना। (15) गिरने वाले मकानों की मुरम्मत के लिए मकान मालिक को नोटिस देना। (46) निगम के क्षेत्र में व्यापार तथा कारखाना चलाने के इच्छुक लोगों को लाइसेंस देना। (17) छुआछूत के रोगों को फैलने से रोकने के लिए टीके लगाना। (18) आग बुझाने के लिए फायर ब्रिगेड (Fire Brigade) का प्रबन्ध करना। (19) भांग, अफीम आदि नशीली वस्तुओं की बिक्री पर नियन्त्रण करना तथा उसकी बिक्री के विषय में नियम बनाना। (20) कर लगाना तथा बजट पास करना। (21) जनता की शिकायत पर विचार करना।

ऐच्छिक कार्य –

  • लोगों के मनोरंजन के लिए पॉर्क, चिड़िया घर और अजायब घर बनवाना।
  • पुस्तकालयों, थियेटरों, अखाड़ों तथा स्टेडियमों का निर्माण करना।
  • सार्वजनिक गृह-निर्माण।
  • नि:सहाय तथा अपंग लोगों की सहायता करना।
  • बीमारी से मुफ्त इलाज के लिए औषधालय खोलना।
  • बाज़ारों की स्थापना और प्रबन्ध करना।
  • शादियों का पंजीकरण करना।
  • मेलों नुमाइशों का संगठन तथा प्रबन्ध करना।
  • लोगों के लिए संगीत का प्रबन्ध करना।
  • महत्त्वपूर्ण अतिथियों का नागरिक अभिनन्दन करना।
  • आवारा कुत्तों, सुअरों तथा उपद्रवी जानवरों को पकड़ना या समाप्त करना।
  • सड़क के किनारे वृक्ष लगाना और उनकी देखभाल करना।
  • शहरी योजनाबंदी, जिसमें नगर योजनाबन्दी भी शामिल है।
  • अग्नि सेवाओं की व्यवस्था करना।
  • शहरी वनं पालन, वातावरण की सुरक्षा एवं सन्तुलन।
  • जन्म-मृत्यु का पंजीकरण।

आय के स्रोत (SOURCES OF INCOME)-

नगर-निगम की आय के साधन निम्नलिखित हैं :

(1) जल कर। (2) सफ़ाई कर। (3) बिजली की खपत पर कर। (4) थियेटर कर। (5) गाड़ी तथा पशु कर। (6) शहरी और देहाती क्षेत्र में जायदाद पर कर । (7) अखबारों में प्रकाशित विज्ञापनों के अतिरिक्त अन्य विज्ञापनों पर कर। (8) भवनों के नक्शे पास करने से प्राप्त फीस। (9) चुंगी। (10) स्थानीय कारपोरेशन में कुछ पैसा भूमि कर के साथ ही इकट्ठा किया जाता है। (11) जायदादों के तबादलों पर कर। (12) नगर-निगम सरकार से अनुदान प्राप्त करते हैं।

प्रश्न 10. नगरपालिका के कार्य और आय के साधनों का वर्णन कीजिए। (Write down the functions and sources of Income of Municipal Council / Committee.)
अथवा
नगर-परिषद् की संरचना और इसके कार्यों का वर्णन करो। (Explain the composition and functions of Municipal Council.)
उत्तर-नगरों में स्थानीय स्वशासन की महत्त्वपूर्ण संस्था नगरपालिका है। यू० पी० में इन्हें ‘नगर बोर्ड’ कहा जाता है। सारे भारत में लगभग सोलह सौ नगरपालिकाएं हैं।
स्थापना (Establishment)-स्थानीय स्वशासन राज्य-सूची का विषय है और प्रत्येक राज्य अपने भू-क्षेत्र में इस संस्था की स्थापना आदि का निर्णय स्वयं करता है। नगरपालिका किस नगर में स्थापित की जाएगी, इसका निश्चय राज्य सरकार ही करता है। सरकार किसी भी स्थान या क्षेत्र को नगरपालिका क्षेत्र (Municipality) घोषित कर सकती है। प्रायः उस नगर की जितनी जनसंख्या 20,000 से अधिक हो, नगरपालिका स्थापित कर दी जाती है।

रचना (Composition)-नगरपालिका के सदस्यों की संख्या राज्य सरकार द्वारा उस नगर की जनसंख्या के आधार पर निश्चित की जाती है। सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं। प्रत्येक उस वयस्क नागरिक को जो नगरपालिका के क्षेत्र में रहते हैं मतदान का अधिकार है। चुनाव संयुक्त-चुनाव प्रणाली तथा गुप्त मतदान के आधार पर होता है। चुनाव का आधार पर इसको वार्डों (Wards) में बांटा जाता है। प्रत्येक वार्ड का एक सदस्य चुना जाता है।

74वें संविधान संशोधन के अनुसार प्रत्येक नगरपालिका में अनुसूचित जाति, जन-जाति और महिला प्रतिनिधियों के प्रति स्थान सुरक्षित रखने की व्यवस्था की गई है। महिलाओं को कुल प्रतिनिधियों के स्थानों में से 50% स्थान देने की व्यवस्था की गई है। राज्य विधानसभा का हर सदस्य M.L.A. उन सब नगरपालिका का सहायक सदस्य (Associate Member) होता है जोकि चुनाव क्षेत्र (Constituency) में शामिल हैं। इस प्रकार के सदस्यों को नगरपालिका की बैठकों में भाषण आदि देने का अधिकार तो होता है, परन्तु मतदान में भाग लेने का नहीं।

योग्यताएं (Qualifications)-नगरपालिका के चुनाव में वही व्यक्ति खड़ा हो सकता है, जिसके पास निम्नलिखित योग्यताएं हों :-

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • वह 21 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
  • किसी सरकार तथा नगरपालिका के अधीन किसी लाभदायक पद पर न हो।
  • वह उस नगर का रहने वाला हो और मतदाताओं की सूची में उसका नाम हो।
  • वह पागल तथा दिवालिया न हो। नगरपालिका के चुनाव में मताधिकार या चुनाव के अयोग्य घोषित न किया गया हो।

अवधि (Tenure)-74वें संवैधानिक संशोधन द्वारा नगर परिषद् एवं नगरपालिका का कार्यकाल 5 वर्ष निश्चित किया गया है। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों में नगर परिषद् एवं नगरपालिका की अवधि पांच वर्ष है।
सरकार इससे पहले जब चाहे नगरपालिका को स्थगित या भंग कर सकती है और इसका कार्य किसी प्रशासक (Administrator) को सौंप सकती है। परन्तु नगरपालिका भंग होने की स्थिति में 6 महीने के अन्दर-अन्दर चुनाव करवाना अनिवार्य है। नगरपालिका के सदस्य को Municipal Commissioner या City Father कहा जाता है। इनको कोई वेतन नहीं मिलता है।

सभापति (President) नगरपालिका के सदस्य अपने में से एक सभापति और एक या दो उप-सभापति चुनते हैं। जहां उप-सभापतियों की संख्या दो होती है वहां एक को वरिष्ठ (Senior) और दूसरे को कनिष्ठ (Junior) उप-सभापति कहते हैं। नगरपालिका के सदस्य दो तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास करके सभापति या उप-सभापति को पद से हटा सकते हैं। कुछ विशेष दोषों के आरोप में सरकार भी इनकी अवधि पूरा होने से पहले इन्हें पदच्युत कर सकती है।

सचिव, कार्यकारी अधिकारी (Secretary, Executive Officers)-नगरपालिका का एक सचिव होता है, जिसे नियमित रूप से वेतन मिलता है। वही नगरपालिका के दैनिक कार्य चलाता है। उसकी नियुक्ति नगरपालिका द्वारा होती है। कई बड़ी नगरपालिकाओं में सचिव के अतिरिक्त कार्यकारी अधिकारी (Executive Officer) होता है। जहां कार्यकारी अधिकारी हों वहां इसका स्थान सचिव से ऊंचा होता है। सचिव इस कार्यकारी अधिकारी के अधीन अपना कार्य करता है। कार्यकारी अधिकारी अपनी नगरपालिका का कार्यकारी मुखिया (Executive Chief) होता है और इसे बहुत विशाल शक्तियां प्राप्त हैं। इसके अतिरिक्त नगरपालिका के कई दूसरे स्थायी कर्मचारी भी होते हैं। जैसे-इंजीनियर, स्वास्थ्य अधिकारी, सफ़ाई इन्स्पैक्टर (Sanitary Inspector) तथा चुंगी इन्स्पैक्टर (Octroi Inspector) आदि।

नगरपालिका के कार्य (FUNCTIONS OF THE MUNICIPAL COMMITTEE)
1. सफ़ाई (Sanitation)–नगरपालिका का मुख्य कार्य है कि वह अपने नगर की सफ़ाई का प्रबन्ध करे। इसके लिए नगरपालिका कई प्रकार के कार्य करती है। प्रतिदिन सड़कों, बाज़ारों, गलियों की सफाई करवाई जाती है। गलियों और बाजारों में गन्दे पानी के लिए नालियां बनाई जाती हैं और प्रतिदिन इन नालियों की सफाई करवाई जाती है। नगर का कूड़ा-कर्कट इकट्ठा किया जाता है तथा उसे शहर से बाहर फेंके जाने की व्यवस्था की जाती है। यदि वह नगर की सफ़ाई का प्रबन्ध न करे तो गन्दगी फैल जाए और बीमारियां फैलने लगें। इस कार्य के लिए नगरपालिका में एक सफ़ाई इन्स्पैक्टर होता है तथा उसके अधीन दारोगा और ज़मींदार (सफ़ाई कर्मचारी) होते हैं।

2. सार्वजनिक स्वास्थ्य (Public Health)-नगर के लोगों के स्वास्थ्य की ओर ध्यान देना भी नगरपालिका का बड़ा महत्त्वपूर्ण काम है। इसके लिए नगरपालिका चेचक, हैज़ा आदि के टीके लगाने का प्रबन्ध करती है। खाने-पीने की वस्तुओं की जांच की जाती है और गन्दी, गली-सड़ी तथा बीमारी फैलने वाली वस्तुओं के बेचे जाने पर प्रतिबन्ध लगाया जाता है। यह मेले आदि के दिनों में सफ़ाई आदि का विशेष प्रबन्ध तथा टीके लगाए जाने की व्यवस्था करती है। नगरपालिका रोगी व्यक्तियों के लिए अस्पताल तथा दवाखाने स्थापित करती है जहां रोगियों को मुफ्त दवा मिलती है। इसके अतिरिक्त नगरपालिका प्रसूति गृह, बालहित केन्द्र तथा परिवार नियोजन केन्द्र खोलती है। नगरपालिका खाद्य वस्तुओं तथा दूसरी वस्तुओं में मिलावट की रोकथाम का प्रबन्ध भी करती है। वर्षा के दिनों में कुंओं तथा तालाबों में कीटाणुओं को मारने की दवाई डाली जाती है और मच्छरों को मारने की दवाई छिड़कर कर मलेरिया फैलने से रोका जाता है। यदि नगरपालिका को पता चल जाए कि कोई संक्रामक रोग (Infectious Disease) का रोगी रहता है तो वह उसे वहां से अस्पताल जाने के लिए बाध्य कर सकती है। नगरपालिका लोगों के लिए सार्वजनिक पाखाने (Public Lavatories) भी बनाती है। बड़े-बड़े शहरों में तो उनकी विशेष आवश्यकता होती है।

3. सड़कें तथा पुल (Roads and Bridges)-नगरपालिका अपने इलाके में पक्की सड़कें तथा पुल बनाने का प्रबन्ध करती है। गलियों और बाजारों में भी पक्की सड़कें बनाई जाती हैं। पक्की सड़कों तथा पुलों की मुरम्मत भी नगरपालिका करवाती रहती है। इससे नगर के लोगों को आने-जाने में सुविधा मिलती है।

4. शिक्षा (Education)-अपने नगर के लोगों को शिक्षित करना भी नगरपालिका का काम है। इसके लिए नगरपालिका प्राइमरी तथा मिडिल स्कूल खोलती है। बड़े नगरों में हाई स्कूल तथा कॉलिज भी नगरपालिका द्वारा खोले जाते हैं। प्रौढ़ व्यक्तियों के लिए शिक्षा केन्द्र (Adult Education Centre) भी खोले जाते हैं। लोगों के बौद्धिक विकास के लिए पुस्तकालय तथा वाचनालय भी स्थापित किए जाते हैं। नगरपालिका समाचार-पत्रों तथा ज्ञानवर्धक फिल्मों के दिखाये जाने का प्रबन्ध भी करती है। पंजाब तथा हरियाणा में कोई भी नगरपालिका किसी प्रकार की शिक्षा संस्था का संचालन नहीं करती बल्कि शिक्षा प्रसार के लिए काफ़ी मात्रा में खर्च करती है, जैसे कि छात्रवृत्तियां देकर, नगर में स्थित स्कूलों व कॉलिजों को आर्थिक सहायता (Grants) देकर। पंजाब के नगर मण्डी गोबिन्दगढ़ की नगरपालिका ने लड़कियों के लिए एक कॉलेज खोला हुआ है।

5. पानी और बिजली (Water and Electricity)-नगर के लोगों के पीने के लिए.शुद्ध पानी की व्यवस्था करना भी नगरपालिका का काम है। इसके लिए पहले कुओं की व्यवस्था की गई थी और उनमें दवाई आदि बलने का काम किया जाता था, परन्तु आजकल अधिकतर नगरों में नगरपालिका नलकूप लगाकर, पानी के बड़े-बड़े टैंक (Tanks) बनाकर, घरों, बाज़ारों तथा गलियों में नलके लगवाकर, लोगों के लिए पीने के पानी का प्रबन्ध करती है। इसके अतिरिक्त सड़कों तथा गलियों में रोशनी का प्रबन्ध भी नगरपालिका करती है।

6. परिवहन (Transport) बड़े-बड़े नगरों के लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर आने-जाने में काफ़ी समय लगता है और असुविधा होती है। इसको दूर करने के लिए वहां की नगरपालिकाएं बसों आदि का प्रबन्ध करती हैं। स्थानीय परिवहन के दूसरे साधन भी होते हैं जैसा तांगा, रिक्शा आदि। नगरपालिका तांगों तथा रिक्शाओं आदि के लाइसेंस देती हैं।

7. सुरक्षा सम्बन्धी कार्य (Security Functions) नगरपालिका शहरी सुरक्षा का प्रबन्ध करती है। वह आग बुझाने का प्रबन्ध करती है और इसके लिए आग बुझाने के इंजन रखे जाते हैं। वह पागल कुत्तों तथा जंगली जानवरों को मारने का प्रबन्ध करती है। वह पुराने तथा खतरनाक मकानों को गिराने का प्रबन्ध करती है।

8. मनोरंजन सम्बन्धी कार्य (Recreation Functions)-नगरपालिका शहर में रहने वाले लोगों के मनोरंजन के लिए कई कार्य करती है। नगरपालिका खेल के मैदान, पॉर्क और व्यायाम-शालाओं की व्यवस्था करती है। नगरपालिका थियेटर, कला केन्द्र, ड्रामा क्लब, मेलों, प्रदर्शनियों तथा मेलों और खेलों का प्रबन्ध करती है।

9. गरीबी दूर करना-नगरपालिका शहर में पाई जाने वाली गरीबी को दूर करने के लिए कई प्रकार की नीतियां एवं कार्यक्रम बनाती है।

10. पिछड़े एवं कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा-नगरपालिका शहर में रहने वाले कमज़ोर एवं पिछड़े वर्गों की भलाई के लिए कई प्रकार की नीतियां बनाती है।

11. अन्य कार्य (Other Functions)—

  • नगरपालिका श्मशान भूमि का प्रबन्ध और उसकी देखभाल करती
  • मकानों के नक्शे पास करती है और पुराने तथा खतरनाक मकानों को गिराने का प्रबन्ध करती है।
  • बड़े-बड़े नगरों में नगरपालिका द्वारा लोगों के लिए शुद्ध दूध, मक्खन, घी तथा दूसरी आवश्यक वस्तुओं का प्रबन्ध किया जाता है।
  • जन्म और मृत्यु का रजिस्ट्रेशन भी नगरपालिका का महत्त्वपूर्ण काम होता है।
  • नगर की गलियों के नाम रखना और नम्बर लगाना तथा मकानों के नम्बर लगाना भी इसका काम होता है।
  • नगरपालिका बारात घर, सराय, विश्रामगृह आदि का निर्माण करती है।
  • नगरपालिका सड़क के दोनों ओर छायादार वृक्ष लगाती है।
  • नगरपालिका नगर के विकास के लिए योजनाएं बनाती है।
  • नगरपालिका आवश्यकतानुसार भूमि प्राप्त करती और बेचती है।
  • नगरपालिका कर्मचारियों की भर्ती करती है और उन्हें आवश्यकता पड़ने पर नियमों के अन्तर्गत हटा भी सकती है।

नगरपालिका के आय के साधन (Sources of Income)-नगरपालिका को भी अपना कार्य चलाने के लिए धन की आवश्यकता पड़ती है। यह धन उसे निम्नलिखित साधनों से प्राप्त होता है :

  • चुंगीकर (Octroi)-नगरपालिका की आय का मुख्य साधन चुंगीकर है। वह कर नगर से शहर में आने वाली वस्तुओं पर लगाया जाता है।
  • मकानों पर कर (House Tax)-नगरपालिका अपने इलाके में मकानों पर कर लगाती है।
  • लाइसेंस फीस (Licence Fees)–नगरपालिका कई वस्तुओं के रखने पर टैक्स लगाती है जैसे तांगों, रेड़ों, ठेले, साइकिल, रिक्शा आदि के रखने पर लाइसेंस दिए जाते हैं।
  • टोल टैक्स (Toul Tax)-कई नगरों मे किसी विशेष स्थान पर जाने या किसी पुल अथवा नदी का प्रयोग करने पर नगरपालिका टैक्स लगा देती है। ऐसा टैक्स उत्तर प्रदेश में अधिक लगा हुआ है।
  • पानी तथा बिजली कर (Water and Electricity Tax)–नगरपालिका गलियों और बाजारों में बिजली तथा पानी का प्रबन्ध करती है, इसके लिए वह मकान के मालिकों पर पानी तथा बिजली कर लगाती है।
  • व्यापार तथा व्यवसायों पर कर (Professional Tax)-नगरपालिका अपने इलाके के व्यवसायों तथा व्यापार पर कर लगाती है।
  • मनोरंजन कर (Entertainment Tax)-नगरपालिका सिनेमा, थिएटर, दंगल आदि पर टैक्स लगा सकती है। 8. पशुओं पर टैक्स (Tax on Animals)-नगरपालिका पशुओं के रखने पर भी टैक्स लगा सकती है।
  • अपनी सम्पत्ति से आय (Income from its Property)–नगरपालिका की अपनी सम्पत्ति भी होती है, जिसे किराये पर दे दिया जाता है। इससे किराये की आय होती है।
  • ठेके (Contracts) नगरपालिका अपने क्षेत्र में कई प्रकार के ठेके देती है जैसे कि मुख्य स्थानों पर साइकिल स्टैण्ड आदि का ठेका, कुड़ा-कर्कट, खाद आदि का ठेका।
  • जुर्माने (Fines)–नगरपालिका को जुर्माने आदि से भी आय होती है। जो लोग इसके नियमों का उल्लंघन करते हैं, उन पर जुर्माना किया जाता है।
  • राज्य सरकार की सहायता-प्रति वर्ष राज्य सरकार नगरपालिकाओं को सहायता के रूप में अनुदान देती है।
  • ऋण (Loan)-नगरपालिकाएं अपने कई बड़े-बड़े खर्चों को पूरा करने के लिए सरकार या बैंक से भी उधार लेती हैं।

नगरपालिका पर सरकार का नियन्त्रण (GOVERNMENT CONTROL OVER THE MUNICIPAL COMMITTEE)
नगरपालिका को स्थानीय मामलों का प्रशासन चलाने में कुछ स्वायत्तता तो प्राप्त होती, परन्तु वह बिल्कुल स्वतन्त्र नहीं होती। राज्य सरकार इसके कामों पर कई तरह का नियन्त्रण रखती है। सरकार निम्नलिखित तरीके से नगरपालिका पर नियन्त्रण रखती है :

  • ज़िले का ज़िलाधीश नगरपालिका के कार्यों पर देख-रेख रखता है।
  • यदि नगरपालिका अपना काम ठीक से न करे या अपने कर्तव्यों की ओर ध्यान न दे तो जिलाधीश उसको सावधान कर सकता है। यदि नगरपालिका फिर भी अपना काम ठीक से न करे तो जिलाधीश सरकार से उसे भंग करने की सिफ़ारिश करके उसे भंग या स्थगित करवा सकता है।
  • नगरपालिका के हिसाब-किताब की जांच-पड़ताल (Audit) सरकार द्वारा की जाती है। सरकार कभी भी उसका निरीक्षण कर सकती है।
  • नगरपालिका जो भी उपनियम (Bye-Laws) बनाती है, उन्हें लागू करने से पहले सरकार की स्वीकृति लेनी पड़ती है।
  • सरकार किसी भी नगरपालिका को भंग करके वहां प्रशासक (Administrator) नियुक्त कर सकती है।
  • सरकार द्वारा नगरपालिका के सदस्यों की संख्या निश्चित की जाती है।
  • सरकार कई दोषों के कारण नगरपालिका के सदस्य या सभापति की अवधि पूरी होने से पहले उसे पदच्युत भी कर सकती है।
  • नगरपालिका के प्रमुख कर्मचारियों की नियुक्ति सरकार की स्वीकृति से भी हो सकती है। सरकार किसी कर्मचारी को पदच्युत करने के लिए नगरपालिका को आदेश दे सकती है।
  • सरकार कभी भी नगरपालिका के रिकार्ड का निरीक्षण कर सकती है।
  • नगरपालिका को अपने कार्यों की वार्षिक रिपोर्ट सरकार को भेजनी पड़ती है।
  • नगरपालिका अपना बजट पास करके मन्जूरी के लिए सरकार के पास भेजती है। वह उसमें परिवर्तन करवा सकती है।
  • सरकार प्रति वर्ष नगरपालिका को धन की सहायता देती है। धन की सहायता देते समय सरकार उसे कोई भी कार्य करने के लिए कह सकती है।
    निष्कर्ष (Conclusion)-नगरपालिका का राष्ट्रीय जीवन में बहुत महत्त्व है। लोग अपनी प्रारम्भिक आवश्यकताओं जैसे कि गली-मुहल्ले की सफ़ाई, रात को रोशनी, पीने के लिए पानी, शिक्षा के लिए स्कूल, जन्म-मरण का हिसाबकिताब, बच्चों के लिए टीके, भयानक रोगों से बचाव और अन्य श्मशान भूमि के लिए नगरपालिका पर निर्भर है

लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. भारत में पंचायती राज्य की रचना (संगठन) लिखिए।
अथवा
पंचायती राज का तीन-स्तरीय ढांचा क्या है?
उत्तर-पंचायती राज उस व्यवस्था को कहते हैं जिसके द्वारा गांव के लोगों को अपने गांवों का प्रशासन तथा विकास स्वयं अपनी इच्छा तथा आवश्यकतानुसार करने का अधिकार दिया गया है। गांव के लोग इस अधिकार का प्रयोग पंचायतों द्वारा करते हैं। इसलिए इसे पंचायती राज कहा जाता है। पंचायती राज एक तीन स्तरीय (Three tiered) ढांचा है जिसका निम्नतम स्तर ग्राम पंचायत का है और उच्चतम स्तर जिला परिषद् का और बीच वाला स्तर पंचायत समिति का। 73वें संशोधन द्वारा जो राज्य बहुत छोटे होते हैं और जिनकी जनसंख्या 20 लाख से कम है उनको पंचायत समिति के मध्य स्तर से मुक्त रखा गया है। इस ढांचे का कार्यक्षेत्र जिले के ग्रामीण भागों तक सीमित होता है और ग्रामीण जीवन के हर क्षेत्र से सम्बन्धित होता है। इस ढांचे के निर्वाचित सदस्य होते हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय विकास के कार्यों के लिए उत्तरदायी हैं।

प्रश्न 2. पंचायती राज के क्या उद्देश्य हैं ?
अथवा
पंचायती राज के मुख्य उद्देश्य लिखिए।
उत्तर-

  • पंचायती राज का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में लोकतन्त्र की स्थापना करना है।
  • पंचायती राज का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को अपने स्थानीय मामलों को स्वयं नियोजित करने और शासन प्रबन्ध चलाने का अवसर देना है।
  • गांवों के लोगों में सामुदायिक भावना और आत्म-निर्भरता की भावना पैदा करना। (4) पंचायती राज का एक उद्देश्य स्थानीय स्तर पर जन सहभागिता को बढ़ाना है।

प्रश्न 3. मेयर कौन होता है ? एक कॉर्पोरेशन में मेयर की क्या भूमिका है ?
अथवा
मेयर कौन होता है ? नगर निगम के मेयर को कैसे चुना जाता है ?
अथवा
मेयर किसे कहते हैं ? किसी निगम के मेयर की भूमिका लिखें।
उत्तर- नगर निगम की राजनीतिक कार्यपालिका भी होती है जिसे प्रायः ‘मेयर’ (Mayor) अथवा महापौर (Mahapour) कहा जाता है। नगर निगम में मेयर का पद बहुत सम्मानपूर्ण तथा गौरवशाली होता है। मेयर का चुनाव निगम के सदस्यों में से किया जाता है। मेयर को शहर का प्रथम नागरिक समझा जाता है। मेयर ही निगम की बैठकों की अध्यक्षता करता है तथा बैठकों की कार्यवाही उसके द्वारा ही नियन्त्रित की जाती है। राज्य सरकार तथा निगम में सामंजस्य व सम्पर्क बनाने का कार्य मेयर के द्वारा ही किया जाता है क्योंकि मेयर का चुनाव लोगों के द्वारा नहीं किया जाता इसलिए उसे लोगों की आवाज़ का प्रतिरूप नहीं कहा जा सकता। लेकिन फिर भी निगम अपने सभी प्रशासनिक, विधायी व अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य मेयर द्वारा ही करती है। महानगर का विकास भी काफ़ी हद तक मेयर की सक्रिय भूमिका पर ही निर्भर करता है।

प्रश्न 4. नगर निगम की आय के कोई चार महत्त्वपूर्ण साधन लिखो।
अथवा
नगर निगम की आय के कोई चार साधन लिखो।
उत्तर-

  1. नगर निगम की आय का मुख्य स्रोत कर है। नगर निगम को सम्पत्ति कर, विज्ञापन कर, मनोरंजन कर आदि लगाने का अधिकार है।
  2. नगर निगम को मकानों, दुकानों इत्यादि के नक्शे पास करने पर फीस प्राप्त होती है।
  3. नगर निगम को पानी और बिजली से आय होती है।
  4. नगर-निगम सरकार से अनुदान प्राप्त करते हैं।

प्रश्न 5. ग्राम सभा क्या है ?
उत्तर-ग्राम सभा को पंचायती राज की नींव कहा जाता है। एक ग्राम पंचायत के क्षेत्र के सभी मतदाता ग्राम सभा के सदस्य होते हैं। हरियाणा में 500 तथा पंजाब में 200 की आबादी पर ग्राम सभा की स्थापना की जाती है। ग्राम सभा की एक वर्ष में दो सामान्य बैठकें होना आवश्यक है। ग्राम सभा अपने अध्यक्ष और कार्यकारी समिति का चुनाव करती है। ग्राम सभा की बैठकों की अध्यक्षता सरपंच करता है। ग्राम सभा पंचायत द्वारा बनाए गए बजट पर सोच-विचार करती है। और अपने क्षेत्र के लिए विकास योजना तैयार करती है। ग्राम सभा गांव से सम्बन्धित विकास योजनाओं को लागू करने में सहायता करती है। व्यवहार में ग्राम सभा कोई विशेष कार्य नहीं करती क्योंकि इसकी बैठकें बहुत कम होती हैं।

प्रश्न 6. ग्राम पंचायत के कोई चार सार्वजनिक कार्य लिखो।
उत्तर-

  • गांव में शान्ति और व्यवस्था को बनाए रखना पंचायत का उत्तरदायित्व है।
  • अपने क्षेत्र में सफाई आदि का प्रबन्ध पंचायत करती है।
  • पंचायत पशुओं की नस्ल को सुधारने का प्रयास करती है।
  • पंचायत लोगों के मनोरंजन का प्रबन्ध करती है।

प्रश्न 7. ग्राम पंचायत की आमदनी के स्त्रोतों को लिखिए।
उत्तर-पंचायतों की आय के साधन निम्नलिखित हैं-

  • कर-पंचायतों की आय का प्रथम साधन कर है। पंचायत राज्य सरकार द्वारा या पंचायती राज अधिनियम द्वारा स्वीकृत किए कर लगा सकती है जैसे सम्पत्ति कर, पशु कर, मार्ग कर, चुंगी कर इत्यादि।
  • फीस और जुर्माना-पंचायत की आय का दूसरा साधन इसके द्वारा किए गए जुर्माने तथा अन्य प्रकार के शुल्क हैं जैसे पंचायती विश्राम घर के प्रयोग के लिए फीस, गली तथा बाजारों में रोशनी करने का कर, पानी कर आदि। इन करों का प्रयोग केवल उन्हीं पंचायतों द्वारा किया जाता है जो ये सुविधाएं प्रदान करती हैं।
  • पंचायत की आय का मुख्य साधन सरकारी अनुदान है। सरकार पंचायतों को विकास सम्बन्धी योजनाओं को पूर्ण करने के लिए विभिन्न प्रकार के अनुदान देती है।
  • खाद की बिक्री आदि से भी पंचायत को आय होती है।

प्रश्न 8. नई पंचायती राज प्रणाली की कोई चार विशेषताएं लिखें।
उत्तर-नई पंचायती राज प्रणाली की व्यवस्था 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा की गई है। उसकी मुख्य विशेषताएं अग्रलिखित हैं

  • 73वें संशोधन द्वारा पंचायती राज की संस्थाओं को संविधान के भाग 9 (Part IX) व 11वीं अनुसूची में शामिल करके निम्न स्तर पर लोकतान्त्रिक संस्थाओं के रूप में संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई है।
  • 73वें संशोधन द्वारा तीन स्तरीय निम्न स्तर पर ग्राम पंचायत, मध्य में पंचायत समिति और उच्च स्तर पर ज़िला परिषद् के स्तर की पंचायती राज व्यवस्था की गई है।
  • 73वें संशोधन के द्वारा प्रत्येक स्तर के पंचायती चुनाव प्रत्यक्ष रूप में होंगे। (4) प्रत्येक पंचायती चुनाव पांच साल में होना आवश्यक है।

प्रश्न 9. ग्राम पंचायत की रचना का वर्णन कीजिए।
अथवा
ग्राम पंचायत की संरचना लिखो।
उत्तर-पंजाब में 200 की आबादी वाले, हरियाणा में 500 की आबादी वाले हर गांव में पंचायत की स्थापना की गई है। यदि किसी गांव की जनसंख्या इससे कम है तो दो या अधिक गांवों की संयुक्त पंचायत स्थापित कर दी जाती है। ग्राम पंचायतों का आकार सदस्यता के अनुसार 5 से 31 सदस्य तक अलग-अलग होता है। हरियाणा में 6 से 20 तक सदस्य होते हैं और पंजाब में 5 से 13 तक। उत्तर प्रदेश में 16 से 31 तक सदस्य होते हैं। इसकी सदस्य संख्या गांवों की जनसंख्या के आधार पर निर्धारित की जाती है। उदाहरणस्वरूप पंजाब के एक गांव में जिसकी जनसंख्या 200 से लेकर 1000 तक है, उस गांव की ग्राम पंचायत में एक सरपंच के अलावा पांच पंच होते हैं और जिस गांव जनसंख्या की 10,000 से अधिक है तो उसमें सरपंच के अतिरिक्त 13 पंच होते हैं। पंचायतों में अनुसूचित जातियों तथा पिछड़े कबीलों को विशेष प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था की गई है। पंजाब में महिलाओं को कुल प्रतिनिधियों के स्थानों में से 50% स्थान देने की व्यवस्था की गई है।

प्रश्न 10. ब्लाक समिति के चार महत्त्वपूर्ण कार्य बताइए।
उत्तर-पंचायत समिति निम्नलिखित कार्य करती है-

  • पंचायतों पर निगरानी और नियन्त्रण-पंचायत समिति अपने क्षेत्रों में पंचायतों के कार्यों की देख-रेख करती है। पंचायत समिति पंचायतों पर निगरानी और नियन्त्रण रखती है। उड़ीसा, राजस्थान, असम तथा महाराष्ट्र में पंचायत समिति अपने क्षेत्र में पंचायतों के बजट को स्वीकार करती है।
  • सफ़ाई और स्वास्थ्य-अपने क्षेत्र की सफाई और स्वास्थ्य का उचित प्रबन्ध करना इसका कार्य है। इसके लिए वह अस्पताल खोलती है और प्रसूति-गृह तथा बाल हित केन्द्र स्थापित करती है। वह बीमारियों को रोकने के लिए टीके लगवाने तथा दूसरे कदम उठाने का प्रबन्ध करती है।
  • लघु और कुटीर उद्योगों का विकास-पंचायत समिति अपने इलाके में घरेलु उद्योग-धन्धों को बढावा देने का प्रयत्न करती है। वह इस सम्बन्ध में योजनाएं बनाने और लागू करने का अधिकार रखती है।
  • यह विश्राम ग्रहों की व्यवस्था करती है।

प्रश्न 11. जिला परिषद् क्या होती है? ।
अथवा
जिला परिषद् की रचना लिखिए।
उत्तर-जिला परिषद त्रि-स्तरीय पंचायती राज ढांचे की सर्वोच्च संस्था है। पंचायती राज की अन्य संस्थाएं जिला परिषद् के निरीक्षण में कार्य करती हैं। जिला परिषद् में निम्नलिखित सदस्य आते हैं-

  • क्षेत्रीय चुनाव में से जनता द्वारा प्रत्यक्ष तौर पर चुने हुए सदस्य, जिनकी गिनती 10 से 25 तक होगी।
  • पंचायत समितियों के सभी सदस्य।
  • जिले का लोकसभा व राज्य विधानसभा में प्रतिनिधित्व कर रहे लोकसभा व राज्य विधानसभा के सदस्य।
  • राज्यसभा के सदस्य और राज्य विधान परिषद् के सदस्य, अगर कोई है और वे राज्य के जिस जिले में मतदाता के रूप में रजिस्टर्ड हों।

जिला परिषद् का प्रत्येक सदस्य 50 हजार की जनसंख्या का प्रतिनिधि होगा। जिस ज़िला परिषद् की जनसंख्या पांच लाख या इससे कम है तो उस में 10 सदस्य होंगे। जिस जिला परिषद् की जनसंख्या 12 लाख से कम या इससे अधिक है तो उसमें सदस्यों की संख्या 25 से अधिक नहीं होगी। प्रत्येक जिला परिषद् में नियमानुसार अनुसूचित जातियों व पिछड़ी जातियों के लिए कुल सीटों के अनुपात में से एक तिहाई सीटें उनके लिए आरक्षित की गई हैं। पंजाब में महिलाओं के लिए जिला परिषद में 50% स्थान आरक्षित किये गए हैं।

प्रश्न 12. नगरपालिका की रचना लिखें।
उत्तर-नगरपालिका के सदस्यों की संख्या सरकार द्वारा उस नगर की जनसंख्या के आधार पर निर्धारित की जाती है। विभिन्न राज्यों में कम-से-कम 5 तथा अधिक-से-अधिक 50 सदस्य होते हैं। हरियाणा में नगरपालिका/नगरपरिषद् के कम-से-कम 11 और अधिक-से-अधिक 31 सदस्य हो सकते हैं। 74वें संविधान संशोधन के अनुसार प्रत्येक नगरपालिका में अनुसूचित जाति, जनजाति और महिला प्रतिनिधियों के लिए स्थान सुरक्षित रखने की व्यवस्था की गई है। पंजाब में महिलाओं को कुल प्रतिनिधियों के स्थानों में से 50% स्थान देने की व्यवस्था की गई है। राज्य विधानसभा का प्रत्येक सदस्य (M.L.A.) उन सब नगरपालिकाओं का सहायक सदस्य होता है जोकि उनके चुनाव क्षेत्र में शामिल हैं। सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं। प्रत्येक उस वयस्क व्यक्ति को जोकि नगरपालिका के क्षेत्र में रहता है मताधिकार प्राप्त होता है। अनुसूचित जातियों के लिए कुछ स्थान आरक्षित किए जा सकते हैं। चुनाव के लिए नगर को वार्डों में बांटा जाता है और प्रत्येक वार्ड से एक सदस्य चुना जाता है।

प्रश्न 13. नगरपालिका के चार महत्त्वपूर्ण कार्य बताइए।
उत्तर-

  • सार्वजनिक स्वास्थ्य-नगर के लोगों के स्वास्थ्य की ओर ध्यान देना भी नगरपालिका का महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसके लिए नगरपालिका चेचक और हेज़ा आदि के टीके लगाने का प्रबन्ध करती है।
  • सड़कें तथा पुल-नगरपालिका अपने इलाके में पक्की सड़कें तथा पुल बनवाने का प्रबन्ध करती है। गलियों व बाजारों में भी पक्की सड़कें बनाई जाती हैं। पक्की सड़कों व पुलों की मुरम्मत भी नगरपालिका करवाती है। इससे नगर के लोगों को आने-जाने की सुविधा होती है।
  • नगरपालिका अपने क्षेत्र में परिवहन की व्यवस्था करती है।

प्रश्न 14. जिला परिषद् के कोई चार कार्य लिखो।
उत्तर-ज़िला परिषद् के कार्य सभी राज्यों में एक समान नहीं हैं। ये अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग हैं। जिला परिषद् को केवल समन्वय लाने वाली और निरीक्षण करने वाली संस्था के रूप में ही स्थापित किया गया है। इसे निम्नलिखित कार्य करने पड़ते हैं

  • यह अपने क्षेत्र में पंचायत समितियों के कार्यों में समन्वय स्थापित करने का प्रयत्न करती है।
  • जिला परिषद् जिले के ग्रामीण जीवन का विकास करने और लोगों के जीवन को ऊंचा उठाने का प्रयत्न करती है।
  • यह सरकार को जिले के ग्रामीण विकास के बारे में सुझाव भेज सकती है।
  • यह सभी तरह के आंकड़ों को प्रकाशित करती है।

प्रश्न 15. पंजाब में नगर निगम की बनावट का वर्णन कीजिए।
अथवा
नगर-निगम किसे कहते हैं ?
उत्तर-नगर-निगम शहरी स्थानीय स्वशासन की सर्वोच्च संस्था है। नगर-निगम की स्थापना बड़े-बड़े शहरों में की जाती है। नगर निगम की स्थापना संसद् अथवा राज्य विधानमण्डल के द्वारा निर्मित कानून के अनुसार की जाती है। नगरनिगम के सदस्यों का निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर सम्बन्धित क्षेत्र की जनता प्रत्यक्ष रूप से करती है। ये निर्वाचित सदस्य कुछ अन्य सदस्यों का निर्वाचन करते हैं। पंजाब नगर-निगम कानून के अनुसार यह संख्या कम-सेकम 40 और अधिक-से-अधिक 50 हो सकती है। भारत के विभिन्न नगर-निगमों का गठन प्रायः एक जैसा है। सबसे पहले 1888 के अधिनियम के अन्तर्गत मुम्बई में नगर-निगम की स्थापना की गई। नगर-निगम के अध्यक्ष को महापौर (Mayor) कहा जाता है। 74वें संवैधानिक संशोधन द्वारा नगर निगम में अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लिए एक तिहाई स्थानों के आरक्षण की व्यवस्था की गई है। पंजाब में महिलाओं के लिए नगर-निगमों में 50% स्थान आरक्षित किये गए हैं।

पंजाब में नगर-निगम चार बड़े शहरों अमृतसर, जालन्धर, पटियाला और लुधियाना में स्थापित हैं। पंजाब सरकार ने जुलाई 2011 में मोगा, फगवाड़ा, मोहाली तथा पठानकोट में भी नगर निगम बनाने का निर्णय लिया था।

प्रश्न 16. पंचायत समिति की संरचना लिखो।
उत्तर-1994 में पंजाब पंचायती राज अधिनियम अधीन यह व्यवस्था की गई है कि एक पंचायत समिति में कमसे-कम 6 और अधिक-से-अधिक 10 सदस्य लोगों द्वारा प्रत्यक्ष तौर पर चुने जाएंगे। इनके अतिरिक्त प्रत्येक पंचायत समिति में उस क्षेत्र की ग्राम पंचायतों के लिए सरपंचों के प्रतिनिधि भी सम्मिलित किए जाएंगे। प्रत्येक पंचायत समिति में अनुसूचित जातियों और स्त्रियों के लिए स्थान आरक्षित रखे जाते हैं। प्रत्येक पंचायत समिति में एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष होता है जिनका चुनाव पंचायत समिति के सदस्यों में से ही सदस्यों द्वारा किया जाता है। उस क्षेत्र में से निर्वाचित किए गए विधानसभा, विधान परिषद्, लोकसभा तथा राज्यसभा के सदस्य भी पंचायत समिति के सहयोगी सदस्य होते हैं। पंचायतों की भान्ति ब्लॉक समितियों में भी अनुसूचित श्रेणियों तथा स्त्रियों को विशेष प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था की गई है। पंजाब में महिलाओं के लिए पंचायत समिति में 50% स्थान आरक्षित किये गए हैं।

प्रश्न 17. नगर-निगम के चार कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-

  • अपने समस्त क्षेत्र की सफ़ाई का ध्यान रखना।
  • जल सप्लाई का प्रबन्ध करना।
  • नालियां बनवाना ताकि गन्दा पानी शहर के बाहर चला जाए।
  • नगर-निगम बाज़ारों की स्थापना और प्रबन्ध करता है।

प्रश्न 18. भारत में पंचायती राज्य प्रणाली की कोई चार कमजोरियां लिखिए।
उत्तर-पंचायती राज की मुख्य समस्याएं अथवा दोष निम्नलिखित हैं-

  • अशिक्षा-गांव के अधिकतर लोग अनपढ़ हैं और इससे पंचायत के अधिकतर लोग भी अशिक्षित होते हैं। बहुत-सी पंचायतें तो ऐसी हैं जिनके सरपंच भी अशिक्षित हैं और हस्ताक्षर नहीं कर सकते।
  • अज्ञानता-चूंकि गांव के अधिकांश लोग अशिक्षित हैं, इसलिए उन्हें पंचायती राज के उद्देश्यों का भी पता नहीं है।
  • साम्प्रदायिकता-गांव के लोगों में जाति भेद की भावना प्रबल है। पंचायतों के चुनाव जाति भेद के आधार पर लड़े जाते हैं और चुने जाने के बाद भी उनके भेदभाव समाप्त नहीं होते बल्कि और भी बढ़ जाते हैं। पंच भी जाति आदि के आधार पर आपस में लड़ते हैं जिससे पंचायत का काम ठीक प्रकार से नहीं हो पाता।
  • पंचायत के कार्यों में राजनीति दलों का अनुचित हस्तक्षेप होता है।

प्रश्न 19. नगरपालिका का चुनाव कौन लड़ सकता है ?
उत्तर-नगरपालिका के चुनाव में वही व्यक्ति खड़ा हो सकता है, जिसके पास निम्नलिखित योग्यताएं हों-

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • वह 21 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
  • किसी सरकार तथा नगरपालिका के अधीन किसी लाभदायक पद पर न हो।
  • वह उस नगर का रहने वाला हो और मतदाताओं की सूची में उसका नाम हो।
  • वह पागल तथा दिवालिया न हो। नगरपालिका के चुनाव में मताधिकार या चुनाव के अयोग्य घोषित न किया गया हो।

प्रश्न 20. भारतीय पंचायती राज की महत्ता का वर्णन कीजिए।
उत्तर-पंचायती राज भारतीय लोकतन्त्र की आधारशिला है। निम्नलिखित बातों से पंचायती राज का महत्त्व स्पष्ट हो जाता है-

  • जनता का राज-पंचायती राज का सबसे बड़ा महत्त्व यह है कि यह जनता का राज है। गांव में लोगों का अपना शासन स्थापित हो चुका है। अपने शासन से अच्छा कोई शासन नहीं होता। गांव का प्रत्येक वयस्क नागरिक ग्राम सभा का सदस्य है और ग्राम पंचायत के चुनाव में भाग लेता है।
  • प्रत्यक्ष लोकतन्त्र-पंचायती राज गांवों में प्रत्यक्ष लोकतन्त्र से कम नहीं है। ग्राम सभा गांव की संसद् की तरह है और गांव के सभी नागरिक इस संसद् के सदस्य हैं। पंचायती राज के वे सभी लाभ हैं जो प्रत्यक्ष लोकतन्त्र से प्रभावित होते हैं।
  • आत्म-निर्भरता-पंचायती राज का एक उद्देश्य यह है कि प्रत्येक गांव अपने विकास कार्य की आवश्यकताओं की पूर्ति, प्रशासन सम्बन्धी बातों तथा न्याय के सम्बन्ध में आत्म-निर्भर हो जाए।
  • लोगों में स्वतन्त्रता की भावना का विकास होता है।

प्रश्न 21. पंचायती राज के दोषों को दूर करने के लिए चार उपाय लिखें।
उत्तर-पंचायती राज के दोषों को दूर करने के महत्त्वपूर्ण उपाय निम्नलिखित हैं-

  • शिक्षा का प्रसार-स्थानीय संस्थाओं को सफल बनाने के लिए प्रथम आवश्यकता शिक्षा के प्रसार की है। शिक्षित व्यक्ति अपने मत का सोच-समझ कर प्रयोग कर सकते हैं और जाति-भेद के चक्कर में नहीं पड़ेंगे।
  • सदस्यों का प्रशिक्षण-इन संस्थाओं के सदस्य प्रशिक्षण के बिना अपने कार्यों को ठीक तरह से नहीं निभा सकते और न ही उचित फैसलें कर सकते हैं। अत: पंचायती राज के कर्मचारियों और सरकार के अफसरों के प्रशिक्षण की पूरी-पूरी व्यवस्था होनी चाहिए।
  • योग्य और ईमानदार कर्मचारी-किसी भी सरकारी संस्था या संगठन को ठीक ढंग से चलाने में कर्मचारियों का बहुत योगदान होता है। स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के कर्मचारियों की नियुक्ति योग्यता के आधार पर होनी चाहिए।
  • पंचायती राज संस्थाओं को और अधिक शक्तियां देनी चाहिएं।

प्रश्न 22. नगर सुधार ट्रस्ट क्या होता है ? इसके कार्यों का संक्षेप में वर्णन करो।
अथवा
नगर सुधार ट्रस्ट से आपका क्या अभिप्राय है, और यह क्या काम करता है ?
उत्तर-नगर सुधार ट्रस्ट बड़े-बड़े नगरों में स्थापित किया जाता है। पंजाब एवं हरियाणा के प्रत्येक महत्त्वपूर्ण नगर में इसकी स्थापना की गई है। नगर सुधार ट्रस्ट के कुछ सदस्य नगरपालिका द्वारा चुने जाते हैं और शेष सरकार द्वारा मनोनीत होते हैं। इसका एक अध्यक्ष होता है जो सरकार द्वारा मनोनीत होता है। अध्यक्ष को वेतन आदि मिलता है। अध्यक्ष के अतिरिक्त और भी महत्त्वपूर्ण अधिकारी होते हैं। जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है, इसका काम नगर का सुधार या विकास करना एवं उसे सुन्दर बनाना है। गन्दी बस्ती को गिराकर नई बस्ती बनाना, सड़कों को चौड़ा करना, बगीचे लगवाना, पार्क बनवाना इसके मुख्य कार्य हैं। नगर के आस-पास जो नई बस्तियां बनती हैं, उनमें सड़कों, नालियों, पानी, रोशनी, मकानों के निर्माण आदि के कार्य पहले नगर सुधार ट्रस्ट करता है और जब वह बस्ती पूरी तरह सुधर जाए तो उसे नगरपालिका को सौंप दिया जाता है।

प्रश्न 23. 1994 के पंजाब पंचायती राज एक्ट के अधीन स्थापित तीन परता (थ्री टायर) पंचायती राज प्रणाली का वर्णन कीजिए।
उत्तर-21 अप्रैल, 1994 को पंजाब पंचायती राज अधिनियम (Punjab Panchayati Raj Act, 1994) लागू हुआ था। इस अधिनियम द्वारा पंजाब में पंचायती राज की व्यवस्था नए रूप में की गई है। इस अधिनियम के अधीन पंजाब में ग्राम सभा के अतिरिक्त निम्नलिखित तीन संस्थाओं की व्यवस्था मिलती है

  • ग्राम पंचायत
  • पंचायत समिति
  • जिला परिषद्।

ये संस्थाएं पंजाब में ग्रामीण क्षेत्र के स्वशासन की संस्थाएं हैं और इन संस्थाओं को ही पंचायती राज का तीन स्तरीय ढांचा माना जाता है। पंजाब में इन संस्थाओं का गठन चुनावों द्वारा पांच साल के लिए किया जाता है।।

प्रश्न 24. पंचायत समिति की आमदन के चार साधन लिखो।
उत्तर-

  • पंचायत समिति द्वारा लगाए गए कर-पंचायत समिति एवं जिला परिषद् एक्ट की धाराओं के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के कर लगा सकती है; जैसे व्यवसाय कर, टोकन कर, मार्ग कर, आय कर आदि से होने वाली आय।
  • सम्पत्ति से आय-पंचायत समिति के अधिकार में रखी गई सम्पत्ति से आय।
  • शुल्क-पंचायत समिति के द्वारा प्रदान की गई सेवाओं के शुल्क से आय। 4. पंचायत समिति को सरकार से भी सहायता के रूप में धन मिलता है।

प्रश्न 25. सरपंच का चुनाव कैसे किया जाता है ?
उत्तर-मार्च 2012 में पंजाब विधानसभा द्वारा पास किए गए पंजाब पंचायती राज (संशोधन) कानून के अन्तर्गत यह व्यवस्था की गई है, कि सरपंच का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से ग्राम सभा के सदस्यों द्वारा किया जायेगा।

प्रश्न 26. नगरपालिका से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-नगरपालिका शहरी स्थानीय शासन की महत्त्वपूर्ण संस्था है। नगरपालिका का आकार सम्बन्धित नगर की जनसंख्या पर निर्भर करता है। विभिन्न राज्यों में नगरपालिका के कम-से-कम 5 तथा अधिक-से–अधिक 50 सदस्य होते हैं। नगरपालिका में कुलं निर्वाचित स्थानों का एक-तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित होता है। नगरपालिका की अवधि 5 वर्ष होती है। इसके सदस्य वयस्क मताधिकार के आधार पर चुने जाते हैं। नगरपालिका नगर की सफ़ाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, जलापूर्ति, रोशनी, लघु-उद्योग, इत्यादि अनेक स्थानीय महत्त्व के कार्य करती है। नगरपालिका विभिन्न कार्यों को करने के लिए अनेक प्रकार के कर लगाती हैं तथा राज्य सरकार से भी वित्तीय सहायता प्राप्त करती है।

प्रश्न 27. ग्राम पंचायत का सभापति कौन होता है ? उसके तीन कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर-ग्राम पंचायत का सभापति सरपंच होता है। इसके तीन कार्य निम्नलिखित हैं-

  1. सरपंच ग्राम पंचायतों की बैठकें बुलाता है और उनका सभापतित्व करता है।
  2. सरपंच ग्राम पंचायतों की कार्यवाहियों का रिकॉर्ड रखता है।
  3. सरपंच अपने गांव की पंचायतों के वित्तीय और कार्यकारी प्रशासन के लिए ज़िम्मेदार होता है।

प्रश्न 28. छावनी बोर्ड क्या होता है?
अथवा
छावनी बोर्ड क्या होता है और यह क्या काम करता है ?
उत्तर-छावनी बोर्ड की स्थापना सैनिक क्षेत्र में की जाती है। इसका उद्देश्य सैनिकों के लिए विभिन्न प्रकार के प्रबन्ध करना होता है। छावनी बोर्ड, छावनी के सेवा कमांड के जनरल अधिकारी के निरीक्षण में कार्य करता है, जोकि रक्षा मन्त्रालय के अधीन होता है। छावनी बोर्ड के आधे सदस्यों का चुनाव शहर के लोगों द्वारा किया जाता है, जबकि आधे सदस्य मनोनीत किये जाते हैं। छावनी बोर्ड सैनिक क्षेत्र के लोगों को पानी, शिक्षा, सफ़ाई, स्वास्थ्य तथा बिजली आदि की सुविधाएँ उपलब्ध कराती है।

प्रश्न 29. पोर्ट ट्रस्ट क्या है ?
उत्तर-पोर्ट ट्रस्ट बंदरगाह के क्षेत्र में स्थापित की जाती है। पोर्टट्रस्ट के कुछ सदस्य सरकार द्वारा मनोनीत किये जाते हैं, तथा कुछ सदस्य व्यापारियों द्वारा चुने जाते हैं, पोर्ट ट्रस्ट का मुख्य उद्देश्य बंदरगाह पर उतरने वाले माल के लिए व्यापारिक सुविधाओं की व्यवस्था करना तथा बंदरगाह की साफ़-सफ़ाई का ध्यान रखना है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. मेयर किसे कहते हैं ? किसी निगम के मेयर की भूमिका लिखें।
उत्तर-नगर-निगम की राजनीतिक कार्यपालिका भी होती है जिसको प्राय: ‘मेयर’ (Mayor) अथवा महापौर (Mahapour) कहा जाता है। नगर-निगम में मेयर का पद बहुत सम्मानपूर्ण तथा गौरवशाली होता है। मेयर का चुनाव निगम के सदस्यों में से किया जाता है। मेयर को शहर का प्रथम नागरिक समझा जाता है। मेयर ही निगम की बैठकों की अध्यक्षता करता है तथा बैठकों की कार्यवाही उसके द्वारा ही नियन्त्रित की जाती है।

प्रश्न 2. नगर-निगम की आय के कोई दो महत्त्वपूर्ण साधन लिखो।
उत्तर-

  1. नगर-निगम की आय का मुख्य स्रोत कर है। नगर-निगम को सम्पत्ति कर, विज्ञापन कर, मनोरंजन कर आदि लगाने का अधिकार है।
  2. नगर-निगम को मकानों, दुकानों इत्यादि के नक्शे पास करने पर फीस प्राप्त होती है।

प्रश्न 3. पंचायत समिति का गठन कैसे होता है ?
उत्तर- प्रत्येक विकास खण्ड की एक पंचायत समिति होती है। पंजाब के पंचायती राज एक्ट 1994 के अनुसार पंचायत समिति में निम्नलिखित सदस्य होंगे

  1. पंचायत समिति के क्षेत्र की जनता द्वारा सीधे या प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सदस्य, जिनकी संख्या 6 से 10 तक होगी।
  2. पंचायत समिति में आने वाली ग्राम पंचायतों के सरपंचों द्वारा चुने गए अपने प्रतिनिधि।

प्रश्न 4. ग्रामीण स्थानीय लोकतंत्र की स्थापना के लिए भारतीय संविधान में कौन-सा भाग और अनुसूची अंकित की गई है ?
उत्तर-ग्रामीण स्थानीय लोकतंत्र की स्थापना के लिए भारतीय संविधान में भाग १ (Part-IX) और 11वीं अनुसूची अंकित की गई है।

प्रश्न 5. शहरी स्थानीय संस्थाओं की स्थापना के लिए भारतीय संविधान में कौन-सा भाग तथा अनुसूची अंकित की गई है ?
उत्तर-शहरी स्थानीय संस्थाओं की स्थापना के लिए भारतीय संविधान में भाग 9A तथा 12वीं अनुसूची अंकित की गई है।

प्रश्न 6. ग्राम सभा की संरचना लिखो।
उत्तर-ग्राम सभा को पंचायती राज की नींव कहा जाता है। एक ग्राम पंचायत के क्षेत्र के सभी मतदाता ग्राम सभा के सदस्य होते हैं। ग्राम सभा की एक वर्ष में दो सामान्य बैठकें होना आवश्यक है। ग्राम सभा अपने अध्यक्ष और कार्यकारी समिति का चुनाव करती है। ग्राम सभा की बैठकों की अध्यक्षता सरपंच करता है।

प्रश्न 7. ग्राम पंचायत के कोई दो कार्य लिखें।
उत्तर-

  1. गांव में शान्ति और व्यवस्था को बनाए रखना पंचायत का उत्तरदायित्व है।
  2. पंचायत अपने क्षेत्र में अपराधियों को पकड़ने और अपराधों की रोकथाम करने के लिए पुलिस की सहायता करती है।

प्रश्न 8. ग्राम पंचायत की बनावट लिखें।
उत्तर-पंजाब में 200 की आबादी वाले, हरियाणा में 500 की आबादी वाले हर गांव में पंचायत की स्थापना की गई है। ग्राम पंचायतों का आकार सदस्यता के अनुसार 5 से 31 सदस्य तक अलग-अलग होता है। पंचायतों में अनुसूचित जातियों तथा पिछड़े कबीलों को विशेष प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था की गई है। 73वें संशोधन के द्वारा महिलाओं को कुल प्रतिनिधियों के स्थानों में से एक तिहाई स्थान देने की व्यवस्था की गई है।

प्रश्न 9. पंचायत समिति के कोई दो मुख्य कार्य बताएं।
उत्तर-

  1. पंचायतों पर निगरानी और नियन्त्रण-पंचायत समिति अपने क्षेत्रों में पंचायतों के कार्यों की देखरेख करती है।
  2. सफ़ाई और स्वास्थ्य-अपने क्षेत्र की सफ़ाई और स्वास्थ्य का उचित प्रबन्ध करना इसका कार्य है।

प्रश्न 10. नगरपालिका की रचना लिखें।
उत्तर-नगरपालिका के सदस्यों की संख्या सरकार द्वारा उस नगर की जनसंख्या के आधार पर निर्धारित की जाती है। विभिन्न राज्यों में कम-से-कम 5 तथा अधिक-से-अधिक 50 सदस्य होते हैं। 74वें संविधान संशोधन के अनुसार प्रत्येक नगरपालिका में अनुसूचित जाति, जनजाति और महिला प्रतिनिधियों के स्थान सुरक्षित रखने की व्यवस्था की गई है। प्रत्येक उस वयस्क व्यक्ति को जोकि नगरपालिका के क्षेत्र में रहता है मताधिकार प्राप्त होता है।

प्रश्न 11. नगरपालिका का चुनाव कौन लड़ सकता है?
उत्तर-

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. उसकी आयु 21 वर्ष से कम न हो।

प्रश्न 12. नगरपालिका के कोई दो महत्त्वपूर्ण कार्य बताइए।
उत्तर-

  1. सफ़ाई-नगरपालिका का मुख्य कार्य अपने नगर की सफ़ाई का प्रबन्ध करना है।
  2. सार्वजनिक स्वास्थ्य-नगर के लोगों के स्वास्थ्य की ओर ध्यान देना भी नगरपालिका का महत्त्वपूर्ण कार्य है।

प्रश्न 13. ज़िला परिषद् के दो कार्य लिखें।
उत्तर-

  1. यह अपने क्षेत्र में पंचायत समीतियों के कार्यों में समन्वय स्थापित करने का प्रयत्न करती है।
  2. ज़िला परिषद् जिले के ग्रामीण जीवन का विकास करने और लोगों के जीवन को ऊंचा उठाने का प्रयत्न करती

प्रश्न 14. नगर-निगम किसे कहते हैं ?
उत्तर- नगर-निगम की स्थापना संसद् अथवा राज्य विधानमण्डल के द्वारा निर्मित कानून के अनुसार की जाती है। नगर-निगम के सदस्यों का निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर सम्बन्धित क्षेत्र की जनता प्रत्यक्ष रूप से करती है। ये निर्वाचित सदस्य कुछ अन्य सदस्यों का निर्वाचन करते हैं।

प्रश्न 15. शहरी क्षेत्र की स्थानीय संस्थाओं के नाम लिखो।
उत्तर-74वें संशोधन द्वारा शहरी शासन के लिए तीन स्तरीय स्थानीय संस्थाओं की व्यवस्था की गई जिसका वर्णन इस प्रकार है

  1. नगर पंचायत (Nagar Panchayat)
  2. नगर परिषद् (Municipal Council)
  3. नगर निगम (Municipal Corporation)।

प्रश्न 16. भारत में पंचायती राज के कोई दो दोष लिखें।
उत्तर-

  1. अशिक्षा-गांव के अधिकतर लोग अनपढ़ हैं और इससे पंचायत के अधिकतर लोग भी अशिक्षित होते हैं। जब तक चुनने वाले तथा चुने जाने वाले व्यक्ति शिक्षित नहीं होंगे तब तक कोई भी स्थानीय संस्था सफलता से काम नहीं कर सकती।
  2. अज्ञानता-चूंकि गांव के अधिकांश लोग अशिक्षित हैं, इसलिए उन्हें पंचायती राज़ के उद्देश्यों का भी पता नहीं है।

प्रश्न 17. नगर सुधार ट्रस्ट क्या होता है?
उत्तर-नगर सुधार ट्रस्ट बड़े-बड़े नगरों में स्थापित किया जाता है। पंजाब एवं हरियाणा के प्रत्येक महत्त्वपूर्ण नगर में इसकी स्थापना की गई है। नगर सुधार ट्रस्ट के कुछ सदस्य नगरपालिका द्वारा चुने जाते हैं और शेष सरकार द्वारा मनोनीत होते हैं। इसका एक अध्यक्ष होता है जो सरकार द्वारा मनोनीत होता है। अध्यक्ष को वेतन आदि मिलता है। अध्यक्ष के अतिरिक्त और भी महत्त्वपूर्ण अधिकारी होते हैं। इसका मुख्य काम नगर सुधार या विकास करना एवं उसे सुन्दर बनाना है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. पंचायती राज क्या है ?
उत्तर- पंचायती राज उस व्यवस्था को कहते हैं, जिसके द्वारा गांव के लोगों को अपने गांवों का प्रशासन तथा विकास स्वयं अपनी इच्छा तथा आवश्यकतानुसार करने का अधिकार दिया गया है।

प्रश्न 2. ग्राम पंचायत का चुनाव लड़ने के लिए कम-से-कम आयु कितनी निर्धारित की गई है ?
उत्तर-21 वर्ष की आयु निर्धारित की गई है।

प्रश्न 3. पंचायती राज प्रणाली का ढांचा किस समिति की सिफ़ारिशों पर आधारित है ?
उत्तर-बलवंत राय मेहता की सिफारिशों के आधार पर।

प्रश्न 4. बलवंत राय मेहता समिति की सिफ़ारिशों के आधार पर कितने स्तरीय पंचायती राज की व्यवस्था की गई थी ?
उत्तर-त्रि-स्तरीय पंचायती राज की व्यवस्था की गई।

प्रश्न 5. किस संवैधानिक संशोधन द्वारा पंचायती राज की संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई है ?
उत्तर-73वें संशोधन द्वारा पंचायती राज की संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई है।

प्रश्न 6. पंचायती राज से सम्बन्धित 73वां संवैधानिक संशोधन कब लागू हुआ था ?
उत्तर-पंचायती राज से सम्बन्धित 73वां संवैधानिक संशोधन 1993 में लागू हुआ था।

प्रश्न 7. किस राज्य ने तीन स्तरीय पंचायती राज प्रणाली को पहले लागू किया ?
उत्तर-राजस्थान ने तीन स्तरीय पंचायती राज प्रणाली को पहले लागू किया।

प्रश्न 8. पंचायत समिति का कार्यकारी अधिकारी कौन होता है ?
उत्तर-खण्ड विकास तथा पंचायत अधिकारी (B.D.O.) पंचायत समिति का कार्यकारी अधिकारी होता है।

प्रश्न 9. ग्राम पंचायत के सरपंच का चुनाव कौन करता है ?
उत्तर-ग्राम पंचायत के सरपंच का चुनाव ग्राम सभा द्वारा निर्वाचित पंचों द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 10. नगर-निगम का अध्यक्ष कौन होता है ?
उत्तर-नगर-निगम का अध्यक्ष मेयर होता है।

प्रश्न 11. शहरी स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं को किस संवैधानिक संशोधन द्वारा संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया?
उत्तर-74वें संवैधानिक संशोधन द्वारा।

प्रश्न 12. पंजाब में किन शहरों में नगर-निगम स्थापित किये गये हैं ?
उत्तर-अमृतसर, जालन्धर, लुधियाना, पटियाला तथा बठिण्डा में। पंजाब सरकार ने जुलाई 2011 में मोगा, फगवाड़ा, मोहाली तथा पठानकोट में भी नगर-निगम बनाने का निर्णय लिया था।

प्रश्न 13. ग्राम पंचायत के सदस्यों का चुनाव कैसे किया जाता है ?
उत्तर-ग्राम पंचायत के सदस्यों का चुनाव ग्राम सभा के सदस्यों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से गुप्त मतदान द्वारा किया जाता है। प्रत्येक वयस्क नागरिक जो गांव का रहने वाला है, पंचायत के चुनाव में वोट डाल सकता है। पंजाब में 18 वर्ष के नागरिक को मताधिकार प्राप्त है।

प्रश्न 14. नगर-निगम का अध्यक्ष कौन होता है ?
उत्तर-नगर-निगम का अध्यक्ष मेयर (महापौर) होता है।

प्रश्न 15. नगरपालिका का चुनाव कितनी अवधि के लिए होता है ?
अथवा नगर परिषद् का कार्यकाल क्या है ?
उत्तर-नगरपालिका का चुनाव पाँच वर्षों के लिए होता है।

प्रश्न 16. पंचायती राज के अधीन पंजाब पंचायती राज की सबसे ऊपरी व नीचे की संस्था का नाम लिखें।
उत्तर-पंजाब पंचायती राज की सबसे ऊपरी संस्था ज़िला परिषद् तथा सबसे निचली संस्था ग्राम सभा है।

प्रश्न 17. पंजाब में स्थानीय स्तर की संस्थाओं में महिलाओं के लिए कितनी सीटें आरक्षित की गईं ?
उत्तर-पंजाब में स्थानीय स्तर की संस्थाओं में महिलाओं के लिए 50% सीटें आरक्षित की गई हैं।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. आधुनिक राज्य का स्वरूप ……….. है।
2. …………….. ने पंचायती राज के त्रिस्तरीय ढांचे की सिफ़ारिश की।
3. शहरी स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं को ………….. संवैधानिक संशोधन द्वारा संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।
4. ……… संवैधानिक संशोधन द्वारा ग्रामीण स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।
5. स्थानीय स्वशासन …………….. का विषय है।
6. नगरपालिका की अवधि ………………. है।
उत्तर-

  1. कल्याणकारी
  2. बलवंत राय मेहता समिति
  3. 74वें
  4. 73वें
  5. राज्य सूची
  6. पांच वर्ष ।

प्रश्न III. निम्नलिखित वाक्यों में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें

1. शासन की कुशलता एवं जनता की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए शक्तियों का केन्द्रीयकरण होना आवश्यक
2. स्थानीय शासन से अभिप्राय उस व्यवस्था से है, जिसके अंतर्गत स्थानीय जनता, स्थानीय साधनों द्वारा स्थानीय
मामलों का प्रबंध स्वयं या अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से नहीं करती है।
3. स्थानीय शासन को संवैधानिक दर्जा देने के लिए 73वां तथा 74वां संवैधानिक संशोधन किया गया।
4. 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा ग्राम सभा और ग्राम पंचायत को परिभाषित किया गया है।
5. 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पांच स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की स्थापना की गई है।
उत्तर-

  1. ग़लत
  2. ग़लत
  3. सही
  4. सही
  5. ग़लत।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1. वर्तमान त्रिस्तरीय पंचायती राज का सुझाव किसने दिया था ?
(क) अशोक मेहता
(ख) बलवन्त राय मेहता
(ग) रजनी कोठारी
(घ) ए० डी० गोरवाला।
उत्तर-(ख) बलवन्त राय मेहता

प्रश्न 2. किस राज्य ने तीन स्तरीय पंचायती राज प्रणाली को पहले लागू किया ?
(क) तमिलनाडु
(ख) राजस्थान
(ग) मध्य प्रदेश
(घ) पंजाब।
उत्तर-(ख) राजस्थान

प्रश्न 3. पंचायती राज इकाइयां उत्पत्ति हैं-
(क) पार्लियामेंट की
(ख) क्षेत्रीय कौंसिल की
(ग) राज्य विधानपालिका की
(घ) ऊपर में से कोई नहीं।
उत्तर-(ग) राज्य विधानपालिका की

प्रश्न 4. किस संवैधानिक संशोधन द्वारा पंचायती राज की संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है ?
(क) 64वें
(ख) 74वें
(ग) 73वें
(घ) 76वें।
उत्तर-(ग) 73वें

प्रश्न 5. 73वीं संवैधानिक संशोधन के द्वारा ग्रामीण क्षेत्र में किनके लिए स्थान सुरक्षित रखे जाते हैं ?
(क) केवल स्त्रियों के लिए
(ख) अनुसूचित जाति के लिए
(ग) केवल बच्चों के लिए
(घ) स्त्रियों तथा अनुसूचित जाति के लिए।
उत्तर-(घ) स्त्रियों तथा अनुसूचित जाति के लिए।

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