Class 12 Political Science Solutions Chapter 16 चुनाव व्यवस्था

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. जन-सहभागिता का अर्थ बताएं। भारत में कम तथा नीचे दर्जे की जन-सहभागिता के चार कारणों का वर्णन करें।
(What is the meaning of people’s participation ? Explain four reasons of low and poor people’s participation in India.)
अथवा
जन सहभागिता का क्या अर्थ है ? भारत में कम जन सहभागिता के कारणों का वर्णन करो।
(What is meant by People’s Participation ? What are the reasons of Peoples low participation in India ?)
उत्तर-जन-सहभागिता का अर्थ-जन-सहभागिता लोकतन्त्रीय शासन प्रणाली का महत्त्वपूर्ण आधार है। जनसहभागिता का अर्थ है राजनीतिक प्रक्रिया में लोगों द्वारा भाग लेना। जन-सहभागिता का स्तर सभी शासन प्रणालियों और सभी देशों में एक समान नहीं होता। अधिनायकवाद और निरंकुशतन्त्र में जन-सहभागिता का स्तर बहुत कम होता है जबकि लोकतन्त्र में जन-सहभागिता का स्तर बहुत ऊंचा होता है। लोकतन्त्र में जन-सहभागिता के द्वारा ही लोग शासन में भाग लेते हैं। हरबर्ट मैक्कलॉस्की के अनुसार, “सहभागिता वह मुख्य साधन है जिसके द्वारा लोकतन्त्र में सहमति प्रदान की जाती है और वापस ली जाती है तथा शासकों को शासितों के प्रति उत्तरदायी बनाया जाता है।”

भारत में जनसहभागिता की धारणा-भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है। किसी लोकतान्त्रिक देश की जनसंख्या इतनी नहीं है जितनी कि भारत में मतदाताओं की संख्या है। 1991 में दसवीं लोकसभा के चुनाव के अवसर पर मतदाताओं की संख्या 52 करोड़ से अधिक है जबकि 1996 में ग्यारहवीं लोकसभा के चुनाव के अवसर पर मतदाताओं की संख्या 58 करोड़ से अधिक थी। अप्रैल-मई, 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनावों में मतदाताओं की संख्या 81 करोड़ 40 लाख थी। आम चुनावों के समय जितने लोग राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेते हैं, उतने अन्य किसी राष्ट्रीय उत्सव या पर्व में नहीं लेते हैं। चुनाव एक माध्यम है जिसके द्वारा मतदाता अपनी प्रभुसत्ता का प्रयोग करते हैं।

चुनाव के द्वारा ही मतदाताओं और राजनीतिक नेताओं में सीधा सम्पर्क स्थापित होता है। यद्यपि भारत के अधिकांश मतदाता अनपढ़ हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उनमें राजनीतिक जागरूकता बढ़ती जा रही है। 1952 के मतदाता और अब के मतदाता में बहुत अन्तर है। पहले मतदाता न तो राजनीतिक प्रश्नों पर विचार करते थे और न ही राजनीतिक दलों के कार्यक्रमों पर। वे पं० जवाहरलाल नेहरू और कुछ अन्य नेताओं के नाम पर मतदान करते थे या फिर जाति, धर्म एवं बिरादरी के उम्मीदवार को वोट डालते थे। इसलिए प्रायः सभी राजनीतिक दल उम्मीदवारों का चयन करते समय जाति एवं धर्म का ध्यान रखते रहे हैं और जिस चुनाव क्षेत्र में जिस जाति के मतदाताओं की संख्या अधिक होती है, उस क्षेत्र में प्रायः उस जाति का उम्मीदवार खड़ा किया जाता रहा है। परन्तु पिछले कुछ सालों के चुनावों में मतदाताओं ने जाति से ऊपर उठकर मतदान किया।

इन चुनावों के परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय मतदाता राष्ट्रीय समस्याओं पर सोचने-विचारने लगे हैं और उनमें राजनीतिक सूझ-बूझ है, चाहे वे अधिकतर पढ़े-लिखे नहीं हैं। मतदाता दल की पिछली सफलताओं में रुचि न लेकर समकालीन घटनाओं तथा समस्याओं में अधिक रुचि रखते हैं। 1977 में मतदाताओं ने कांग्रेस के विरुद्ध मतदान किया क्योंकि मतदाता कांग्रेस सरकार के आपात्काल के अत्याचारों से बहुत भयभीत हो गए थे। यहां तक कि श्रीमती इन्दिरा गांधी स्वयं भी चुनाव हार गईं। 1980 में मतदाताओं ने जनता पार्टी के विरुद्ध मतदान किया क्योंकि जनता पार्टी के नेता सत्ता में आने के बाद परस्पर लड़ते रहे और अधिक समय तक सत्ता में न रह सके। मतदाताओं ने श्रीमती गांधी को पुनः सत्ता सौंप दी क्योंकि श्रीमती इन्दिरा गांधी ने शासन में स्थायित्व
और कीमतों को कम करने का आश्वासन दिया था।

भारतीय महिलाएं चुनाव में पुरुषों के समान ही हिस्सा लेती हैं। लोकसभा के लिए हुए विभिन्न चुनावों में कई क्षेत्रों में महिला मतदाताओं ने पुरुषों से अधिक मतदान किया। महिलाओं की राजनीति में रुचि बढ़ती जा रही है जो कि प्रजातन्त्र के लिए अच्छी बात है, परन्तु महिलाओं का प्रतिनिधित्व संसद् में कम होता जा रहा है। अप्रैल-मई, 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनावों में केवल 61 महिलाएं लोकसभा के लिए निर्वाचित हुईं।

सहभागिता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि अधिकतर भारतीय मतदाता राजनीति में रुचि नहीं रखते या राजनीति के प्रति उदासीन हैं, विशेषकर शिक्षित मतदाता बहुत कम वोट डालने जाते हैं। आम चुनावों से स्पष्ट हो जाता है कि लगभग 60 प्रतिशत मतदाता ही मतदान करने जाते हैं। यह उदासीनता लोकतन्त्र के लिए अच्छी नहीं है। फरवरी, 1992 में पंजाब विधानसभा का चुनाव हुआ. जिसका अकाली दल (मान), अकाली दल (बादल) तथा अन्य अकाली दलों ने बहिष्कार किया, मतदान केवल 28 प्रतिशत रहा।

भारतीय नागरिकों की न केवल चुनाव में सहभागिता कम है बल्कि अन्य राजनीतिक गतिविधियों में भी कम लोग भाग लेते हैं। अधिकांश नागरिक राजनीतिक दलों के सदस्य बनना पसन्द नहीं करते और राजनीतिक दल भी निरन्तर सक्रिय नहीं रहते। केवल चुनाव के समय ही राजनीतिक दल सक्रिय होते हैं और चुनावों के समाप्त होने के साथ ही सो जाते हैं। आम जनता सार्वजनिक मामलों और राजनीतिक गतिविधियों में रुचि नहीं लेती। बहुत कम नागरिक चुनाव के पश्चात् अपने प्रतिनिधियों से मिलते रहते हैं और उन्हें अपनी समस्याओं से अवगत कराते हैं। इस प्रकार भारत में जन-सहभागिता का स्तर निम्न है।

भारत में निम्न स्तर की जन-सहभागिता के कारण (CAUSES OF LOW LEVEL OF PEOPLE’S PARTICIPATION IN INDIA)

भारत में निम्न स्तर की जन-सहभागिता के निम्नलिखित कारण हैं-
1. अनपढ़ता (mliteracy)—स्वतन्त्रता के इतने वर्ष बाद भी भारत में बहुत अनपढ़ता पाई जाती है। अशिक्षित व्यक्तियों में आत्म-विश्वास की कमी होती है और वे देश की समस्याओं को समझने की स्थिति में भी नहीं होते। अशिक्षित व्यक्ति को न तो अपने अधिकारों का ज्ञान होता है और न ही अपने कर्तव्यों का। अशिक्षित व्यक्ति का मताधिकार का महत्त्व नहीं समझता और न ही अधिकांश अशिक्षित व्यक्तियों को मताधिकार का प्रयोग करना आता है। चुनाव के समय लाखों मत-पत्र का अवैध घोषित किया जाना इस बात का प्रमाण है कि लोगों को मत का प्रयोग करना नहीं आता।

2. ग़रीबी (Poverty)-भारत की अधिकांश जनता ग़रीब है। ग़रीब नागरिक को पेट भर कर भोजन न मिल सकने के कारण उनका शारीरिक और मानसिक विकास नहीं हो सकता। वह सदा अपना पेट भरने की चिन्ता में लगा रहता है और उसके पास समाज और देश की समस्याओं पर विचार करने का न तो समय होता है और न ही इच्छा। ग़रीब व्यक्ति चुनाव लड़ना तो दूर की बात वह चुनाव की बात भी नहीं सोच सकता। ग़रीब व्यक्ति मताधिकार का महत्त्व नहीं समझता और अपनी वोट को बेचने के लिए तैयार हो जाता है।

3. बेकारी (Unemployment)-भारत में जन-सहभागिता के निम्न स्तर के होने का एक कारण बेकारी है। भारत में करोड़ों लोग बेकार हैं। भारत में बेकारी अशिक्षित तथा शिक्षित दोनों प्रकार के लोगों में पाई जाती है। बेकार व्यक्ति में हीन भावना आ जाती है और वह अपने आपको समाज पर बोझ समझने लगता है। बेकार व्यक्ति अपनी समस्याओं में ही उलझा रहता है और उसे समाज एवं देश की समस्याओं का कोई ज्ञान नहीं होता। बेकारी के कारण नागरिकों का प्रशासनिक स्वरूप तथा राजनीतिक दलों की क्षमता में विश्वास कम होता जा रहा है। बेकार व्यक्ति मताधिकार को कोई महत्त्व नहीं देता और अपना वोट बेचने के लिए तैयार रहता है।

4. शिक्षित लोगों में राजनीतिक उदासीनता (Political apathy among educated people)-भारत में शिक्षित लोगों में राजनीतिक उदासीनता पाई जाती है। पढ़े-लिखे लोग राजनीति में रुचि नहीं रखते और राजनीतिक दलों का सदस्य बनना पसन्द नहीं करते। चुनाव में अधिकांश शिक्षित लोग वोट डालने नहीं जाते क्योंकि वे यह समझते हैं कि उनके मतों से चुनाव के परिणाम पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है क्योंकि अधिकांश जनता अनपढ़ है और उनके मतदान से ही परिणाम निर्धारित होते हैं।

5. भ्रष्टाचार (Corruption)-भारत में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। भ्रष्टाचार राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर दोनों पर पाया जाता है। राजनीति में सत्य, नैतिकता और ईमानदारी का कोई स्थान नहीं है। चुनाव के लिए सभी तरह के भ्रष्ट तरीके अपनाए जाते हैं। अतः ईमानदार और नैतिक व्यक्ति राजनीतिक से दूर रहना पसन्द करता है क्योंकि भारत में यह आम धारणा है कि राजनीति भ्रष्ट लोगों का खेल है। इसलिए ईमानदार व्यक्ति न तो चुनाव में खड़े होते हैं और न ही राजनीतिक कार्यों में दिलचस्पी लेते हैं।

6. राजनीतिक दलों में विश्वास की कमी (Lack of faith in Political Parties)-भारत की अधिकांश जनता को राजनीतिक दलों पर विश्वास नहीं है। आम धारणा यह है कि राजनीतिक दलों का उद्देश्य जनता की सेवा करना नहीं है बल्कि ये दल अपने हितों की रक्षा के लिए सत्ता करना चाहते हैं। दल-बदल ने जनता का राजनीतिक दलों से विश्वास बिल्कुल उठा दिया है। लोगों का विचार है कि राजनीतिक नेता अपनी कुर्सी के चक्कर में रहते हैं और उन्हें जनता के हितों की कोई परवाह नहीं होती। इसलिए आम जनता की चुनावों और अन्य राजनीतिक गतिविधियों में सहभागिता कम होती जा रही है।

7. अज्ञानता (Ignorance)-भारत में निम्न स्तर की जन-सहभागिता का एक कारण लोगों की अज्ञानता है। भारत में प्राय: शिक्षित लोग भी कई प्रकार की राजनीतिक समस्याओं से अनभिज्ञ रहते हैं। वे राजनीति में होने वाली महत्त्वपूर्ण गतिविधियों को समझ नहीं पाते तथा राजनीति में कम रुचि लेते हैं।

8. राजनीति व्यवसाय के रूप में (Politics As a Profession)-भारत में निम्न स्तर की जन-सहभागिता का एक प्रमुख कारण यह है, कि राजनीति एक पारिवारिक व्यवसाय बन चुकी है। यदि एक व्यक्ति किसी निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ता है, तो वह यह कोशिश करता है कि आगे समय में उसके परिवार के ही किसी सदस्य को टिकट मिले। इस कारण राजनीति केवल कुछ लोगों के मध्य सीमित होकर रह गई हैं। जिससे आम नागरिक राजनीति में रुचि नहीं लेता।

प्रश्न 2. मतदान व्यवहार से क्या भाव है ? मतदान व्यवहार को प्रभावित करने वाले तथ्यों का वर्णन करें।
(What is meant by Voting Behaviour ? Write main determinants of Voting Behaviour in India.)
अथवा
मतदान व्यवहार से क्या भाव है ? भारत में मतदान व्यवहार को प्रभावित करने वाले तथ्यों का वर्णन करो।
(What is meant by Voting Behaviour ? Write the factors which determine the Voting Behaviour in India.)
उत्तर- भारतीय संविधान के अनुसार प्रत्येक नागरिक को जो एक निश्चित तिथि को 18 वर्ष की आयु को प्राप्त कर चुका हो मताधिकार दिया गया है। नागरिक मताधिकार का प्रयोग करते समय अनेक कारकों से प्रेरित होता है। जिन कारणों अथवा स्थितियों से प्रभावित होकर मतदाता किसी उम्मीदवार को वोट डालने का निर्णय करता है, उन तथ्यों तथा स्थितियों के अध्ययन को ही मतदान व्यवहार का अध्ययन कहा जाता है। जे० सी० प्लेनो और रिगस (J. C. Plano and Riggs) के अनुसार, “मतदान व्यवहार अध्ययन के उस क्षेत्र को कहा जाता है जो उन विधियों से सम्बन्धित है जिन विधियों द्वारा लोग सार्वजनिक चुनाव में अपने मत का प्रयोग करते हैं। मतदान व्यवहार उन कारणों से सम्बन्धित है जो कारण मतदाताओं को किसी विशेष रूप से मताधिकार का प्रयोग करने के लिए प्रेरित करते हैं।”

(“Voting behaviour is a field study of concerned with the ways in which people tend to vote in public elections and the reasons why they vote or they do.”) साधारण शब्दों में मतदान व्यवहार का अर्थ है कि मतदाता अपने मत का प्रयोग क्यों करते हैं और किस प्रकार करते हैं। निष्पक्ष चुनाव के लिए यह आवश्यक है कि मतदाता अपने इस अधिकार का प्रयोग ईमानदारी और समझदारी से करें। विख्यात विचारक काका कालेलकर का कहना है कि मतदाताओं को यह चाहिए कि “प्रतिनिधि को उसी दृष्टि से चुने जिस दृष्टि से हम मरीज़ के लिए डॉक्टर को चुनते हैं। देश का मामला बिगड़ गया है। उनको सुलझा सकें, उसी दल को अपना वोट दो और उस दल का बहुमत बनाने के लिए उसके छांटे हुए उम्मीदवारों को वोट दो। वोट देने वाले को दो बातें देखनी चाहिएं-एक यह कि किन नेताओं के द्वारा देश-हित हो सकता है, दूसरा यह कि ऐसे नेताओं के पृष्ठ-पोषण करने वाले प्रतिनिधि सार्वजनिक चरित्र के बारे में शुद्ध हैं या नहीं। जो नेता स्वयं उच्च चरित्र के हों, वे अपने पक्ष में हीन चरित्र के लोगों को लेकर बहुमत लाना चाहें, उन्हें पसन्द न करना जनता का कर्तव्य हो जाता है।”

परन्तु अफसोस यह है कि भारतीय मतदाता ईमानदारी और समझदारी से वोट न डालकर धार्मिक, जात-पात, क्षेत्रीय तथा अन्य सामाजिक भावनाओं के ओत-प्रोत होकर मतदान करता है। भारतीय मतदान व्यवहार को अनेक तत्त्व प्रभावित करते हैं जिनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं

1. जाति का मतदान व्यवहार पर प्रभाव (Influence of Caste on the Voting behaviour) जाति सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व है जिसका आरम्भ से ही मतदान व्यवहार पर बड़ा प्रभाव रहा है। स्वतन्त्रता से पूर्व भी जब अभी वयस्क मताधिकार प्रचलित नहीं हुआ था, जाति का मतदान पर बहुत प्रभाव था। स्वतन्त्रता के पश्चात् यह प्रभाव कम होता दिखाई नहीं देता, इसके बावजूद भी कि शिक्षकों और सामाजिक नेताओं ने जाति की बुराइयों के विरुद्ध स्वतन्त्रता के पश्चात् काफ़ी प्रचार किया है। प्रो० श्रीनिवास (Shrinivas) ने ठीक ही कहा है कि, “शिक्षित भारतीयों में यह साधारण विश्वास है कि जाति अब अपनी आखिरी मंजिल पर है और शहर के शिक्षित तथा पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित उच्च वर्ग के लोग अब इस बुराई के चंगुल से बाहर निकल चुके हैं।

परन्तु उनका ऐसा सोचना ग़लत है। ये लोग चाहे जाति के बन्धनों को कम मानते हैं और जाति के बाहर भी शादी कर लेते हैं, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि जाति का प्रभाव बिल्कुल समाप्त हो गया है।” प्रो० रूडाल्फ (Prof. Rudolph) के विचारानुसार, “इसके अतिरिक्त भी कि भारतीय समाज लोकतान्त्रिक नीति के मूल्यों और विधियों को अपना रहा है, जाति भारतीय समाज की धुरी है। वास्तव में जाति एक मुख्य साधन है जिसके द्वारा भारतीय जनता लोकतन्त्रात्मक राजनीति से बंधी हुई है।” प्रो० मौरिस जॉन्स के मतानुसार, “राजनीति जाति से अधिक महत्त्वपूर्ण है और जाति पहले से राजनीति से अधिक महत्त्वपूर्ण है।”

इन सब विद्वानों ने ठीक ही विचार दिए हैं कि भारतीय राजनीति में जाति का बहुत महत्त्व है और भारतीय जनता अधिकतर जाति के प्रभाव में ही आकर मतदान करती है। कुछ राज्यों में तो यह तत्त्व वह बहत निर्णायक है क्योंकि मतदाता अपनी जाति के उम्मीदवार को वोट देना अपना कर्त्तव्य मानते हैं। उदाहरण के लिए, हरियाणा में अनुसूचित जातियों में हरिजनों की संख्या सबसे अधिक है और राजनीति तथा मतदान के क्षेत्र में उनकी दूसरी जातियों की अपेक्षा अधिक चलती है। गुड़गांव, महेन्द्रगढ़ में अहीर जाति के जाट केवल अहीर उम्मीदवार को ही वोट देते हैं। चुनाव के दिनों में यह नारा बहुत लोकप्रिय होता है, “जाट की बेटी जाट को, जाट का वोट जाट को।” मियू (Meo) जाति के मुसलमान भी जाति के आधार पर वोट डालते हैं। बिहार, गुजरात, पंजाब तथा केरल आदि राज्यों में भी मतदाता जाति के आधार पर ही अधिकतर वोट डालते हैं। अनेक दल तो जातियों के आधार पर ही बने हुए हैं और उन्हें विशेष जातियों का समर्थन प्राप्त है-जैसे लोकदल जाट जाति पर नाज करता है, अकाली दल कट्टर सिक्खों के सहारे जिन्दा है, परन्तु पिछले कुछ वर्षों के लोकसभा के चुनावों में जाति ने पहले की अपेक्षा बहुत कम प्रभावित किया है।

2. धर्म का प्रभाव (Influence of Religion)-भारतीय मतदाता धर्म के प्रभाव में आकर भी वोट डालते हैं। टिकट बांटते समय निर्वाचित क्षेत्र की रचना को ध्यान में रखा जाता है और प्रायः उसी धर्म के व्यक्ति को टिकट दी जाती है जिस धर्म के लोगों की वोटें उस निर्वाचन क्षेत्र में अधिकतम होती हैं। अधिकतर भारतीय अनपढ़ हैं और वे धर्म के नाम पर सब कुछ करने के लिए तैयार हो जाते हैं। मई-जून, 1991 के लोकसभा के चुनाव में राम जन्मभूमिबाबरी मस्जिद विवाद ने मतदाताओं को काफी प्रभावित किया। भारतीय जनता पार्टी को श्री राम मन्दिर बनाने के लिए राम भक्तों ने मत डाले।

3. क्षेत्रीयवाद अथवा स्थानीयवाद (Regionalism or Localism) भारत में मतदाता स्थानीयवाद तथा क्षेत्रीयवाद की भावनाओं से ओत-प्रोत होकर भी मतदान करते हैं। साधारणत: मतदाता उसी उम्मीदवार को वोट डालते हैं जो उनके क्षेत्र का रहने वाला है। यदि कोई उम्मीदवार किसी दूसरे राज्य से आ कर चुनाव लड़ता है तो उसका चुनाव जीतना यदि असम्भव नहीं तो मुश्किल अवश्य होता है।

4. धन (Money)-भारतीय जनता अधिकतर गरीब तथा अनपढ़ है, लाखों क्या करोड़ों मतदाता ऐसे हैं, जिन्हें दिन-रात रोटी की चिन्ता लगी रहती है। ऐसे मतदाता पैसे लेकर अपने वोट बेचने को सदैव तैयार रहते हैं। इसलिए ग्रायः वही उम्मीदवार चुनाव जीतता है जो अधिक धन खर्च करता है।

5. दलों की विचारधारा (Ideology of the Parties)-राजनीतिक दलों की विचारधारा भी विशेषकर शिक्षित मतदाताओं को काफ़ी प्रभावित करती है। हमें ऐसे मतदाता भी मिलते हैं जो धर्म, जाति, क्षेत्रीयवाद आदि बन्धनों से मुक्त होकर राजनीतिक दलों के प्रोग्राम को वोट डालते हैं।

6. उम्मीदवार का व्यक्तित्व (Personality of the Candidate)-उम्मीदवारों के अपने विचार तथा व्यक्तित्व भी मतदाता को काफ़ी प्रभावित करते हैं। वे राष्ट्रीय दलों की अपेक्षा उम्मीदवार को महत्ता देते हैं। मतदाता राष्ट्रीय स्तर के चुनावों में मतदान करते समय दल के बाद उम्मीदवार को महत्ता देता है जबकि क्षेत्रीय चुनाव दलों की अपेक्षा उम्मीदवार को महत्ता दी जाती है। भारत के मतदाता उम्मीदवार में प्रायः दो बातें देखता है, एक तो ईमानदारी और दूसरा जनता के कल्याण से उसका सम्बन्ध। ऐसे मतदाताओं की कमी है जो उम्मीदवार को देखकर मतदान करते हैं।

7. वैचारिक प्रतिबद्धता (Ideological Committment)—वैचारिक प्रतिबद्धता भी मतदान व्यवहार को प्रभावित करती है। कई मतदाता किसी-न-किसी विचारधारा में विश्वास रखते हैं। ऐसे मतदाता उस विचारधारा के समर्थक उम्मीदवार को न केवल अपना वोट डालते हैं बल्कि अन्य मतदाताओं को भी उसी उम्मीदवार को वोट डालने के लिए प्रेरित करते हैं। भारत के पश्चिम बंगाल, केरल, त्रिपुरा आदि राज्यों में काफ़ी मतदाता साम्यवादी विचारधारा में विश्वास रखते हैं और ये मतदाता मार्क्सवादी साम्यवादी दल को वोट डालते हैं। इसलिए 35 वर्षों तक पश्चिम बंगाल में मार्क्ससाम्यवादी दल की सरकार थी।

8. वर्ग-चेतना (Class Consciousness) वर्ग चेतना भी मतदान व्यवहार को प्रभावित करती है। यह प्रायः देखने में आया है कि भूमिहीन किसान और श्रमिक वामपंथी दलों को वोट डालते हैं जबकि पूंजीपति, उद्योगपति, ज़मींदार तथा व्यापारी प्रायः दक्षिण पंथी दलों को मत देते हैं। गरीब, मजदूर और भूमिहीन किसान साम्यवादी दलों के मुख्य समर्थक हैं।

9. आयु (Age) आयु का भी मतदान व्यवहार पर प्रभाव पड़ता है। नवयुवकों में अधिक जोश और उत्साह होता है और वे नेताओं के जोशीले भाषणों से प्रभावित होकर मतदान करते हैं। प्रौढ़ आयु के व्यक्ति नेताओं के जोशीले भाषणों से प्रभावित नहीं होते बल्कि सोच-विचार कर वोट डालते हैं।

10. लिंग (Sex)-प्रायः भारतीय स्त्रियां अपनी इच्छा से मतदान न करके पति की इच्छानुसार मतदान करती हैं। अविवाहित स्त्रियां अपनी पिता या भाई की इच्छानुसार मतदान करती हैं।

11. विशेषाधिकार (Privileges)-भारत में कुछ जातियां जैसे कि अनुसूचित जातियां तथा पिछड़े वर्ग के लोग हैं जिन्हें कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हैं। इन जातियों के लोग अधिकतर कांग्रेस को ही वोट डालते हैं क्योंकि उनको यह विशेषाधिकार कांग्रेस ने ही दिए हैं और उन्हें यह डर भी है कि यदि कोई अन्य पार्टी सत्ता में आ गई तो उनके विशेषाधिकार समाप्त कर दिए जाएंगे। लेकिन 1977 में जनता पार्टी सरकार ने भी इनको विशेषाधिकार से वंचित नहीं किया।

12. राजनीतिक स्थिरता की अभिलाषा-राजनीतिक स्थिरता की अभिलाषा भी मतदाता के व्यवहार को प्रभावित करती है। 1967 के आम चुनाव के पश्चात् राजनीतिक अस्थिरता बहुत बढ़ गई थी क्योंकि इस चुनाव के पश्चात् कांग्रेस को आठ राज्यों में बहुमत प्राप्त नहीं हुआ था। अतः जब 1971 में चुनाव हुए तो लोगों ने राजनीतिक स्थिरता की अभिलाषा से प्रभावित होकर कांग्रेस को मत डाले जिस कारण कांग्रेस को लोकसभा में भारी बहुमत प्राप्त हुआ। जनवरी, 1980 के लोकसभा के चुनाव में राजनीतिक स्थिरता की लालसा ने ही लोगों को कांग्रेस (इ) को मत डालने के लिए विवश किया। राजनीति स्थिरता की अभिलाषा के कारण ही भारतीय मतदाताओं ने 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनावों में भाजपा को पूर्ण बहुमत प्रदान किया था।

13. देश की आर्थिक स्थिति-मतदान व्यवहार को देश की आर्थिक स्थिति भी प्रभावित करती है। 1977 के चुनावों में मतदाताओं ने कांग्रेस के विरुद्ध मतदान किया क्योंकि देश की आर्थिक दशा बहुत खराब हो गई थी। परन्तु जब श्रीमती इन्दिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा लगाया तो 1980 में जनता ने कांग्रेस को भारी बहुमत में मत डाले।

14. नेतृत्व-मतदान व्यवहार को नेतृत्व के तत्त्व भी प्रभावित करते हैं। श्री जवाहरलाल नेहरू का महान् व्यक्तित्व एवं नेतृत्व मतदान व्यवहार को बहुत प्रभावित करता था। 1977 के चुनाव में श्री जय प्रकाश नारायण ने मतदाताओं को बहुत प्रभावित किया जिससे जनता पार्टी सत्ता में आई। 1980 के चुनाव में कांग्रेस (इ) को श्रीमती इन्दिरा गांधी के नेतृत्व के कारण ही महान् सफलता मिली। दिसम्बर, 1984 के लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस (इ) की महान् सफलता का कारण यह था कि मतदाता युवा प्रधानमन्त्री राजीव गांधी के व्यक्तित्व तथा नेतृत्व से बहुत प्रभावित हुए थे। –

15. चुनाव प्रचार-चुनाव प्रचार भी मतदाता व्यवहार को प्रभावित करता है परन्तु यह उन मतदाताओं को अधिक प्रभावित कर पाता है जो किसी राजनीतिक दल से सम्बन्धित नहीं होते हैं।

16. सामन्तशाही व्यवस्था-सामन्तशाही व्यवस्था ने भी मतदाता व्यवहार को प्रभावित किया है। यह प्रभाव नकारात्मक तथा सकारात्मक दोनों प्रकार का रहा है। सन् 1971 के पांचवें लोकसभा के चुनाव से पूर्व सामन्तशाही व्यवस्था ने मतदान व्यवस्था को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया, परन्तु 1971 के चुनाव में नकारात्मक रूप से प्रभावित किया।

17. भाषायी विवाद (Language Controversies)-भारत में समय-समय पर भाषायी विवाद और भाषायी आन्दोलन होते रहते हैं और इनका भी मतदान व्यवहार पर काफ़ी प्रभाव पड़ता है। तमिलनाडु में डी० एम० के० पार्टी ने 1967 और 1971 के चुनावों में हिन्दी विरोधी प्रचार द्वारा मतदाताओं के मत प्राप्त किए। अब भी तमिलनाडु में अन्ना डी० एम० के० और डी० एम० के० हिन्दी विरोधी प्रचार द्वारा मतदाताओं का समर्थन प्राप्त करने का प्रयास करते रहते

18. तत्कालीन मामले (Immediate Issues)-चुनाव के अवसर पर जो महत्त्वपूर्ण मामले होते हैं, उनका मतदान पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए 1977 के चुनाव के समय आपात्कालीन घोषणा एक महत्त्वपूर्ण मामला था और इसका मतदान पर बड़ा प्रभाव पड़ा। दिसम्बर, 1984 में लोकसभा के चुनावों के समय श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या का मतदान पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा और मतदाताओं ने राजीव गांधी को वोट दिए। 1989 के लोकसभा के चुनावों में बोफोर्स के मामले ने मतदाताओं को प्रभावित किया और कांग्रेस (इ) की पराजय हुई। अप्रैलमई, 1996 के आम चुनावों को हवाला मामले और इस काल में हुए अन्य घोटालों ने प्रभावित किया है। इसी प्रकार अप्रैल-मई 2014 में हुए चुनावों में कालेधन, स्थिरता एवं भ्रष्टाचार के मुद्दों ने मतदान को प्रभावित किया।

19. लोकवादी नारे (Populist Slogans) राजनीतिक दलों और नेताओं द्वारा दिए गए लोकवादी नारे भी मतदान को प्रभावित करते हैं। 1971 में श्रीमती इन्दिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा लगाकर लोगों का भारी समर्थन प्राप्त किया। 1977 में जनता पार्टी ने लोकसभा के चुनाव के अवसर पर ‘लोकतन्त्र बनाम तानाशाही’ का नारा लगाया जिसका जनता पर बड़ा प्रभाव पड़ा और जनता पार्टी सत्ता में आई। 1980 के चुनाव में कांग्रेस (इ) ने ‘सरकार जो काम करती है’ का नारा दिया और कांग्रेस (इ) सत्ता में आई।

1967 के आम चुनाव में धर्म, भाषा, जाति, क्षेत्रीयवाद आदि तत्त्वों ने मतदान को काफ़ी प्रभावित किया, परन्तु 1980 में जब लोकसभा के लिए चुनाव हुए तब इन तत्त्वों का प्रभाव काफ़ी कम था क्योंकि मतदाताओं में केन्द्र में स्थायी सरकार बनाने की लालसा थी। अतः मतदाताओं ने स्थायी सरकार को स्थापित करने की लालसा को पूरा करने के लिए इन्दिरा कांग्रेस को वोट डाले। इसी प्रकार पंजाब और हरियाणा में जब मध्यवर्ती चुनाव हुए तब लोगों ने धर्म और जाति के बन्धनों से मुक्त होकर कांग्रेस को वोट दिए। परन्तु इसका अर्थ यह न लिया जाए कि ये तत्त्व अब बिल्कुल प्रभावहीन हो गए हैं। अब भी इन तत्त्वों का मतदान व्यवहार पर बहुत प्रभाव है।

प्रश्न 3. चुनाव आयोग का संगठन बताते हुए, राष्ट्रीय चुनाव आयोग के चार कार्यों का वर्णन करें।
(Explain the composition of the Election Commission and explain four functions of National Election Commission in India.)
अथवा भारत में चुनाव आयोग के गठन और कार्यों का वर्णन कीजिए। (Discuss the compositions and functions of Election Commission in India.)
अथवा भारतीय चुनाव आयोग के कोई छः कार्यों का वर्णन कीजिए। (Discuss any six functions of Election Commission of India.)
उत्तर- भारतीय संविधान के अनुसार भारत को एक प्रभुसत्ता सम्पन्न लोकतन्त्रीय गणराज्य घोषित किया गया है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतन्त्रीय राज्य है। प्रत्येक नागरिक को जिसकी आयु 18 वर्ष है, बिना किसी भेदभाव के मताधिकार दिया गया है। नागरिक मताधिकार का प्रयोग चुनाव के माध्यम से करते हैं। भारत में लोकतन्त्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि संसद् के दोनों सदनों, राज्य विधानसभाओं व अन्य संस्थाओं का स्वतन्त्र व निष्पक्ष चुनाव हो।

भारतीय संविधान के निर्माता स्वतन्त्र और निष्पक्ष चुनाव के महत्त्व को अच्छी तरह समझते थे अतः स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष चुनाव करवाने का उत्तरदायित्व भारत में एक स्वतन्त्र चुनाव आयोग को सौंपा गया है जो अपने कार्य में स्वतन्त्र है और जो एक मुख्य चुनाव आयुक्त के अधीन कार्य करता है।

संविधान के अनुच्छेद 324 के अन्तर्गत एक चुनाव आयोग की व्यवस्था की गई है कि जो संसद् तथा राज्य विधानमण्डलों के चुनाव सम्बन्धी सभी मामलों पर नियन्त्रण और निर्देशन के अधिकार रखता है। यह आयोग विभिन्न चुनावों का प्रबन्ध करता है और यह देखना इसका कर्तव्य है कि सभी व्यक्ति स्वतन्त्रतापूर्वक अपने मतों का प्रयोग करें तथा चुनावों में किसी प्रकार की गड़बड़ न हो।

चुनाव आयोग की रचना (Composition of Election Commission)-चुनाव आयोग की रचना का वर्णन संविधान के अनुच्छेद 324 में किया गया है। अनुच्छेद 324 के अनुसार चुनाव आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner) तथा कुछ चुनाव आयुक्त (Election Commissioners) होंगे। चुनाव आयुक्तों की संख्या समय-समय पर राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाएगी। चुनाव आयोग को सहायता देने के लिए लोकसभा व राज्य विधानमण्डलों के चुनाव से पूर्व राष्ट्रपति को क्षेत्रीय चुनाव आयुक्त (Regional Election Commissioners) नियुक्त करने का अधिकार है। चुनाव आयुक्तों और क्षेत्रीय आयुक्तों के कार्यकाल तथा सेवाकाल सम्बन्धी शर्तों और कार्यविधि संसद् द्वारा बनाए गए कानूनों के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा निश्चित की जाती है।

1989 से पूर्व चुनाव आयोग में केवल एक मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner) ही होता था। अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति नहीं की गई थी। यदि अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की जाती तो मुख्य चुनाव आयुक्त चुनाव आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करता। 1989 में कांग्रेस सरकार ने पहली बार मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ दो अन्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किए परन्तु राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने दो अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को रद्द कर दिया। 1 अक्तूबर, 1993 को केन्द्र सरकार ने दो नए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कर चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय बनाने का महत्त्वपूर्ण कदम उठाया। राष्ट्रपति ने अध्यादेश जारी करके कृषि सचिव एम० एस० गिल और . विधि आयोग के सदस्य जी० वी० जी० कृष्णामूर्ति को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया। चुनाव आयोग को बहु-सदस्यीय बनाने सम्बन्धी विधेयक को संसद् ने 20 दिसम्बर, 1993 को पास कर दिया। 14 जुलाई, 1995 को सर्वोच्च न्यायालय ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए तीनों चुनाव आयुक्तों को एक समान दर्जा देने की व्यवस्था की। वर्तमान समय में चुनाव आयोग तीन सदस्यीय है।

नियुक्ति (Appointment)-अनुच्छेद 324 (2) के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त, अन्य चुनाव आयुक्त तथा क्षेत्रीय आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति संसद् द्वारा निर्मित कानून की धाराओं के अनुसार करेगा। यदि संसद् ने इस सम्बन्ध में कोई कानून न बनाया हो तब नियुक्ति की विधि, सेवा की शर्ते आदि राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाएंगी। व्यवहार में मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल की सलाह से करता है।

योग्यताएं (Qualifications)-संविधान में मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्तों की योग्यताओं का वर्णन नहीं किया गया है और न ही संसद् ने इस सम्बन्ध में कोई कानून बनाया है। इसीलिए आज तक जितने भी मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए हैं वे सभी भारत सरकार के उच्च अधिकारी रहे हैं।

कार्यकाल (Tenure)-संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार आयुक्तों का कार्यकाल संसद् द्वारा बनाए गए कानूनों के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा निश्चित किया जाएगा। 1972 से पूर्व मुख्य चुनाव आयोग के कार्यकाल और सेवा सम्बन्धी शर्तों के बारे में कोई विशेष व्यवस्था नहीं थी। इसीलिए पहले दो मुख्य चुनाव आयुक्त आठ वर्ष तक इस पद पर रहे। 20 दिसम्बर, 1993 को पास किए गए एक कानून के अन्तर्गत मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल 6 वर्ष तथा 65 वर्ष की आयु पूरी करने तक (जो भी इनमें से पहले पूरा हो जाए) निश्चित किया गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्त 6 वर्ष की अवधि से पूर्व त्याग-पत्र भी दे सकता है और राष्ट्रपति भी 6 से पूर्व वर्ष निश्चित विधि के अनुसार उन्हें हटा सकता है।

पद से हटाने की विधि (Method of Removal)-संविधान के अनुच्छेद 324 (5) के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी प्रकार हटाया जा सकता है जिस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को। मुख्य चुनाव आयुक्त को राष्ट्रपति तभी हटा सकता है जब उसके विरुद्ध दुराचार (Misbehaviour) तथा अक्षमता (Incapacity) का आरोप सिद्ध हो जाए और संसद् के दोनों सदनों ने इस सम्बन्ध में अलग-अलग अपने सदन के सदस्यों के पूर्ण बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास किया हो। अभी तक किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को समय से पहले नहीं हटाया गया है।

सेवा शर्ते (Conditions of Service)-संविधान के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त, अन्य चुनाव आयुक्तों तथा क्षेत्रीय चुनाव आयुक्तों का वेतन तथा अन्य सेवा सम्बन्धी शर्ते राष्ट्रपति द्वारा संसद् द्वारा इस सम्बन्ध में बनाए गए कानून के अनुसार निश्चित की जाती हैं। परन्तु संविधान में यह व्यवस्था भी की गई है कि मुख्य चुनाव आयुक्त, अन्य चुनाव आयुक्तों तथा क्षेत्रीय चुनाव आयुक्तों के वेतन तथा सेवा शर्तों में उनकी नियुक्ति के पश्चात् कोई ऐसा परिवर्तन नहीं किया जा सकता जिससे उनको कोई हानि होती है।

चुनाव आयोग के कर्मचारी (Staff of Election Commission)-संविधान में चुनाव आयोग के कर्मचारियों
की भी व्यवस्था की गई है ताकि चुनाव आयोग अपने कार्यों को अच्छी तरह कर सके। संविधान के अनुच्छेद 324 (6) के अनुसार चुनाव आयुक्त अपने कार्यों को पूरा करने के लिए राष्ट्रपति तथा राज्य के राज्यपालों से आवश्यक कर्मचारियों की मांग कर सकता है और उन कर्मचारियों की व्यवस्था करना राष्ट्रपति तथा राज्यपालों का काम है। चुनावों इत्यादि का प्रबन्ध करने के लिए आवश्यक कर्मचारियों की व्यवस्था सामान्यतः राज्य सरकारों द्वारा की जाती है, परन्तु ये कर्मचारी चुनाव आयोग के निर्देशों पर कार्य करते हैं।

चुनाव आयोग के कार्य (FUNCTIONS OF ELECTION COMMISSION)-

चुनाव आयोग के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं-

1. चुनावों का निरीक्षण, निर्देशन तथा नियन्त्रण (Superintendence, Direction and Control)-चुनाव आयोग को चुनाव सम्बन्धी सभी मामलों पर निरीक्षण, निर्देशन तथा नियन्त्रण का अधिकार प्राप्त है। चुनाव आयोग चुनाव सम्बन्धी सभी समस्याओं को हल करता है। स्वतन्त्र और निष्पक्ष चुनाव करवाना चुनाव आयोग का कर्तव्य है।

2. मतदाता सूचियों को तैयार करना (Preparation of Electoral Roll)-चुनाव आयोग का एक महत्त्वपूर्ण कार्य संसद् तथा राज्य विधानमण्डलों के चुनाव के लिए मतदाता सूची तैयार करवाना है। प्रत्येक जनगणना के पश्चात् और आम चुनाव से पहले मतदाताओं की सूची में संशोधन किए जाते हैं। इन सूचियों में नए मतदाताओं के नाम लिखे जाते हैं और जो नागरिक मर चुके होते हैं उनके नाम मतदाता सूची से निकाले जाते हैं। यदि किसी नागरिक का नाम मतदाता सूची में नहीं लिखा जाता तो वह व्यक्ति एक निश्चित तिथि तक आवेदन-पत्र देकर मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करवा सकता है। मतदाता सूची के तैयार होने पर चुनाव आयोग द्वारा निश्चित तिथि तक आपत्तियां मांगी जाती हैं और कोई भी आपत्ति कर सकता है। नागरिकों द्वारा एवं राजनीतिक दलों द्वारा उठाई गई आपत्तियों को चुनाव आयोग के कर्मचारियों द्वारा दूर किया जाता है।

3. चुनाव के लिए तिथि निश्चित करना (To decide Date of Election)-चुनाव आयोग विभिन्न क्षेत्रों में चुनाव करवाने की तिथि निश्चित करता है। चुनाव आयोग नामांकन पत्रों के दाखले (Submission of Nomination Papers) की अन्तिम तिथि निश्चित करता है। चुनाव आयोग उम्मीदवारों के नाम वापस लेने की तिथि घोषित करता है। यदि किसी उम्मीदवार के नामांकन-पत्र में कोई त्रुटि पाई जाती है तो उस नामांकन-पत्र को अस्वीकार कर दिया जाता

4. राज्य विधानमण्डलों के लिए चुनाव कराना (Conduct of Elections of State Legislatures)-चुनाव
आयोग सभी राज्यों के विधानमण्डलों के चुनाव की व्यवस्था करता है। भारत में आजकल 29 राज्य और 7 संघीय क्षेत्र हैं। चुनाव आयोग विधानसभाओं एवं विधानपरिषदों के चुनाव तथा उप-चुनावों की व्यवस्था करता है। अप्रैल-मई, 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनावों के साथ ही चुनाव आयोग ने आन्ध्र-प्रदेश, सिक्किम और उड़ीसा की विधानसभा के भी चुनाव करवाए थे।

5. संसद् के चुनाव कराना (To Conduct Elections of Parliament)-चुनाव आयोग संसद् के दोनों सदनों-लोकसभा तथा राज्यसभा के चुनावों की व्यवस्था करता है। लोकसभा का सामान्य स्थिति में कार्यकाल 5 वर्ष है। अतएव लोकसभा के साधारणतः पांच 5 वर्ष के बाद चुनाव कराए जाते हैं। यदि लोकसभा को पांच वर्ष से पहले भंग कर दिया जाए जैसा कि सन् 1979, 1991, 1998 तथा 1999 में किया गया था तब चुनाव आयोग लोकसभा के मध्यावधि चुनाव कराता है। सन् 1996 में चुनाव आयोग ने लोकसभा के चुनाव कराए। राज्यसभा के सदस्यों की अवधि 6 वर्ष है और एक-तिहाई सदस्य प्रति दो वर्ष के पश्चात् रिटायर होते हैं। इसलिए राज्य सभा के एक-तिहाई सदस्यों का चुनाव आयोग द्वारा प्रत्येक दो वर्ष के पश्चात् करवाया जाता है। संसद् के दोनों सदनों के रिक्त स्थानों की पूर्ति के लिए चुनाव आयोग उप-चुनाव करवाता है। अब तक चुनाव आयोग ने लोकसभा के 16 बार चुनाव करवाए हैं।

6. राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के लिए चुनाव कराना (To conduct Elections of President and VicePresident)-चुनाव आयोग राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के चुनाव कराता है। राष्ट्रपति के चुनाव में संसद् तथा राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य भाग लेते हैं जबकि उप-राष्ट्रपति के चुनाव में संसद् के दोनों सदनों के सदस्य भाग लेते हैं। चुनाव आयोग राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति का चुनाव कराने के लिए मतदाता सूची तैयार करवाता है, चुनाव के लिए अधिसूचना जारी करता है, नामांकन-पत्र भरने, नामांकन-पत्रों की जांच करने तथा नाम वापस लेने की तिथि निश्चित करता है। चुनाव आयोग चुनाव कराने के लिए एक निर्वाचन अधिकारी दिल्ली के लिए और सहायक निर्वाचन अधिकारी विभिन्न राज्यों की राजधानी के लिए नियुक्त करता है। मतदान के पश्चात् निर्वाचन अधिकारी सफल उम्मीदवारों के नामों की घोषणा करता है। अब तक चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति के लिए 15 बार चुनाव करवाए हैं।

7. राजनीतिक दलों को मान्यता देना है (To give recognition to Political Parties)-भारत में अनेक राजनीतिक दल पाए जाते हैं-कुछ राष्ट्रीय स्तर के और कुछ प्रादेशिक दल। पर कौन-सा दल राष्ट्रीय स्तर का है और कौन-सा दल प्रादेशिक दल है, इसका निर्णय चुनाव आयोग द्वारा किया जाता है। चुनाव आयोग ही राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय दल अथवा प्रादेशिक दल के रूप में मान्यता देता है। उस राजनीतिक दल को राष्ट्रीय स्तर के दल के रूप में मान्यता दी जाती है, जिसने लोकसभा अथवा विधानसभा चुनाव में चार अथवा इससे अधिक राज्यों में कम से कम 6 प्रतिशत वैध मत हासिल करने के साथ-साथ लोकसभा की कम से कम 4 सीटें जीती हों अथवा कम से कम 3 राज्यों से लोकसभा में प्रतिनिधित्व कुल सीटों का दो प्रतिशत (वर्तमान 543 सीटों में से कम से कम 11 सीटें) प्राप्त किया हो। इसी तरह इस राजनीतिक दल को राज्य स्तरीय दल के रूप में मान्यता दी जाती है, जिसने लोकसभा अथवा राज्य विधानसभा चुनाव में कुल पड़े वैध मतों का कम से कम 6 प्रतिशत प्राप्त किया हो और विधानसभा चुनाव में कम से कम दो सीटें जीती हों, अथवा राज्य विधानसभा में कुल सीटों की कम से कम 3 प्रतिशत सीटें या कम से कम तीन सीटें (इनमें से जो भी अधिक हो) प्राप्त की हों। चुनाव आयोग ने 7 राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय स्तर पर एवं 58 राजनीतिक दलों को राज्य स्तरीय दल के रूप में मान्यता प्रदान की हुई है।

8. चुनाव चिह्न देना (To Allot Election Symbols) विभिन्न राजनीतिक दलों को चुनाव चिह्न चुनाव आयोग द्वारा दिए जाते हैं। जो उम्मीदवार स्वतन्त्र रूप से चुनाव में खड़े होते हैं उनको भी चुनाव आयोग चिह्न प्रदान करता है। राष्ट्रीय स्तर और प्रादेशिक स्तर के मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के चुनाव चिह्न सुरक्षित और स्थायी होते हैं। सभी चुनावों में राष्ट्रीय स्तर और प्रादेशिक स्तर के दल अपने-अपने चुनाव चिह्नों का प्रयोग करते हैं। जब किसी दल का विभाजन हो जाता है। तब चुनाव आयोग यह निश्चित करता है कि उस राजनीतिक दल का चुनाव चिह्न किस विभाजित गुट को मिलना चाहिए। चुनाव चिह्नों से सम्बन्धित सभी तरह के विवादों का हल चुनाव आयोग द्वारा किया जाता है।
१. चुनाव कर्मचारियों पर नियन्त्रण (Control over Election Staffs)-संविधान के अनुसार चुनाव आयोग चुनाव करवाने के लिए राष्ट्रपति और राज्यों के राज्यपालों से कर्मचारी मांग सकता है। केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा चुनाव कार्य के लिए दिए गए कर्मचारियों पर चुनाव आयोग का नियन्त्रण होता है। ये कर्मचारी चुनाव आयोग के आदेशों के अनुसार कार्य करते हैं।

10. चुनाव सम्बन्धी व्यवहार संहिता निर्धारित करना (Determination of Code of Conduct for Election)—चुनाव आयोग स्वतन्त्र और निष्पक्ष चुनाव करवाने के लिए चुनाव व्यवहार संहिता निर्धारित करता है। चुनाव व्यवहार संहिता का राजनीतिक दलों, स्वतन्त्र उम्मीदवारों और सरकार द्वारा पालन किए जाने के लिए चुनाव आयोग आवश्यक निर्देश जारी करता है। यदि कोई राजनीतिक दल, स्वतन्त्र उम्मीदवार या सरकार चुनाव कानून या चुनाव व्यवहार संहिता का उल्लंघन करता है तो उल्लंघन के आरोपों की जांच चुनाव आयोग करता है। उदाहरण के लिए नवम्बर, 1984 में लोकसभा के चुनाव की घोषणा होने के बाद जब मध्य प्रदेश और गुजरात की सरकारों पर कुछ वर्गों को रियायतें देने का आरोप लगाया गया तब चुनाव आयोग ने इसकी जांच के लिए शीघ्र कदम उठाया था। फरवरी, 1995 में छः विधानसभाओं के चुनाव करवाए जाने की घोषणा के बाद जब बिहार की सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के तबादले किए तब मुख्य चुनाव आयुक्त ने बिहार सरकार को तबादले से दूर रहने का निर्देश दिया।

11. मतदान केन्द्र स्थापित करना (To Establish Polling Station)-चुनाव के समय कितने मतदान केन्द्रों की स्थापना की आवश्यकता है, इसका निर्णय चुनाव आयोग ही करता है। चुनाव आयोग द्वारा मतदान केन्द्रों की स्थापना करते समय इस बात को अवश्य ध्यान में रखा जाता है कि नागरिकों को बहुत दूर मतदान करने के लिए नहीं जाना पड़े।

12. सदस्यों की अयोग्यता सम्बन्धी विवादों के सम्बन्ध में सलाह देना (To give advice on the disqualifications of members)-भारतीय संविधान में संसद् तथा राज्य विधानमण्डल के सदस्यों सम्बन्धी कुछ अयोग्यताएं निश्चित की गई हैं। जब संसद् के लिए निर्वाचित किसी सदस्य की योग्यता के सम्बन्ध में कोई विवाद उत्पन्न हो जाए तो उस विवाद का निर्णय राष्ट्रपति चुनाव आयोग की सलाह से करता है। इसी तरह यदि राज्य विधानमण्डल के लिए चुने गए किसी सदस्य की योग्यता के सम्बन्ध में विवाद उत्पन्न हो जाए तो उसका फैसला राज्यपाल चुनाव आयोग की सलाह से करता है। अतः चुनाव आयोग संसद् और राज्य विधानमण्डलों के सदस्यों की अयोग्यता सम्बन्धी विवादों के सम्बन्ध में राष्ट्रपति और राज्यपाल को परामर्श देता है।

13. चुनाव क्षेत्र में पुनः मतदान (Order of Re-Polling)—यदि किसी चुनाव क्षेत्र में या किसी विशेष मतदान केन्द्र पर भ्रष्ट तरीकों द्वारा कोई गड़बड़ी होती है, तब चुनाव आयोग उस चुनाव क्षेत्र या विशेष मतदान केन्द्र पर पुनः मतदान के आदेश दे सकता है। अप्रैल-मई, 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनावों में चुनाव आयोग ने कई मतदान केन्द्रों पर पुनः मतदान के आदेश दिए थे।

14. पर्यवेक्षकों की नियुक्ति-चुनाव आयोग निष्पक्ष और स्वतन्त्र मतदान करवाने के लिए पर्यवेक्षकों की नियुक्ति करता है। फरवरी, 1995 में छः विधानसभाओं के चुनाव के अवसर पर चुनाव आयोग ने 100 से अधिक पर्यवेक्षक नियुक्त किए। अप्रैल-मई, 1996 के लोकसभा के चुनाव और विधानसभाओं के चुनाव के अवसर पर चुनाव आयोग ने 600 पर्यवेक्षक नियुक्त किए।

15. चुनाव सुधारों के सुझाव (Recommendations of Election Reforms)—चुनाव आयोग समय-समय पर चुनाव सुधारों की सिफ़ारिशें करता रहता है। मार्च, 1988 में चुनाव आयोग ने सरकार से कहा कि वह इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीन, मतदाता आयु 18 वर्ष करने और चुनाव क्षेत्रों का पुनर्गठन करने, मतदाताओं को पहचान पत्र, चुनावी खर्चे में वृद्धि, जैसे चुनाव सुधारों को जितनी जल्दी सम्भव हो लागू करे। चुनाव आयोग ने बहु-उद्देशीय पहचान-पत्र और चुनाव याचिकाओं को शीघ्र निपटाने के लिए तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति की भी सिफ़ारिश की है। चुनाव आयोग का विचार है कि बहु-उद्देशीय परिचय-पत्र लागू करने से न केवल फर्जी मतदान रुक जाएगा बल्कि आर्थिक और सामाजिक योजना की दिशा में भी यह महत्त्वपूर्ण कदम होगा।

चुनाव आयोग का महत्त्व-भारत का चुनाव भारत की जनता के लिए एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण संस्था है। यह संसद् और विधानमण्डलों के चुनावों का प्रबन्ध करती है। भारत जैसे बड़े देश में चुनावों का प्रबन्ध करना कोई मामूली बात नहीं है। चुनाव आयोग ने अब तक 16 आम चुनाव करवाए हैं और इनके लिए वही प्रशंसा का पात्र है। भारत में लोकतन्त्र की सफलता स्वतन्त्र और निष्पक्ष चुनावों पर बहुत कुछ आधारित है और इसके लिए चुनाव आयोग ही बधाई का पात्र कहा जा सकता है। चुनाव आयोग की देखभाल में अब तक निष्पक्ष और स्वतन्त्र चुनाव होते आए हैं।

प्रश्न 4. भारत में चुनाव प्रक्रिया के प्रमुख चरणों की व्याख्या कीजिए। (Explain the main stages of Electoral Process in India.)
अथवा
चुनावी प्रक्रिया क्या होती है ? भारतीय चुनाव प्रक्रिया के सारे महत्त्वपूर्ण पड़ावों के नाम लिखो। (What is Election Process ? Name all the important stages of Indian Election Process.)
उत्तर- भारत में प्रजातन्त्र की व्यवस्था की गई है। प्रजातन्त्र में शासन जनता द्वारा चलाया जाता है, परन्तु भारत जैसे बड़े देश में प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र को अपनाना कठिन ही नहीं, बल्कि असम्भव भी है। अतः संविधान निर्माताओं ने अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र की व्यवस्था की है। शासन जनता के प्रतिनिधियों द्वारा चलाया जाता है जो निश्चित अवधि के लिए चुने जाते हैं। अतः निश्चित अवधि के बाद चुनाव कराए जाते हैं। इस सारी चुनाव प्रणाली को चुनाव प्रक्रिया कहा जाता है। संसद् ने चुनाव से सम्बन्धित दो महत्त्वपूर्ण एक्ट पास किए हैं- जन प्रतिनिधित्व एक्ट, 1950 तथा जन प्रतिनिधित्व एक्ट, 1951 । पहले एक्ट में मतदाताओं की योग्यताओं और मतदाताओं की सूची बनाने के सम्बन्ध में और दूसरे एक्ट चुनाव प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन किया गया है। इन दोनों एक्टों के आधार पर केन्द्रीय सरकार ने चुनाव सम्बन्धी अनेक कानून पास किए हैं। भारत में चुनाव प्रक्रिया की निम्नलिखित अवस्थाएं हैं-

1. चुनाव क्षेत्र निश्चित करना (To fix Constituencies)—चुनाव प्रबन्ध में सर्वप्रथम कार्य चुनाव-क्षेत्र को निश्चित करना है। लोकसभा में जितने सदस्य चुने जाते हों, लगभग समान जनसंख्या वाले उतने ही क्षेत्रों में सारे भारत को बांट दिया जाता है। इसी प्रकार विधान सभाओं के चुनाव में राज्य को समान जनसंख्या वाले चनाव क्षेत्र में बांट दिया जाता है और प्रत्येक चुनाव-क्षेत्र से एक सदस्य चुना जाता है। प्रत्येक जनगणना के पश्चात् चुनाव क्षेत्रों की सीमाएं पुनः निर्धारित की जाती हैं। सीमा निर्धारक का यह कार्य एक आयोग करता है जिसे परिसीमन आयोग (Delimilation Commission) कहा जाता है।

2. मतदाताओं की सूची (List of Voters)-मतदाता सूचियां तैयार करना चुनाव प्रक्रिया की दूसरी अवस्था है। संविधान के अनुच्छेद 325 के अनुसार प्रत्येक चुनाव क्षेत्र के लिए एक साधारण मतदाता सूची तैयार की जाएंगी। धर्म, जाति, वंश, भाषा, लिंग आदि के आधार पर किसी को मताधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। सबसे पहले मतदाताओं की अस्थायी (Temporary) सूची तैयार की जाती है। इन सूचियों को कुछेक विशेष स्थानों पर जनता के देखने के लिए रख दिया जाता है। यदि उस सूची में किसी का नाम लिखने से रह गया हो अथवा किसी का नाम भूल से ग़लत लिख दिया हो तो उसको एक निश्चित तिथि तक संशोधन करवाने के लिए प्रार्थना-पत्र देना होता है। फिर संशोधित सूचियां तैयार की जाती हैं।

3. चुनाव तिथि की घोषणा (Announcement of Election Date)-चुनाव आयोग चुनाव की तिथि की घोषणा करता है। पर चुनाव की तिथि निश्चित करने से पहले चुनाव आयोग केन्द्रीय सरकार और सम्बन्धित राज्य सरकारों से विचार-विमर्श करता है। चुनाव आयोग नामांकन-पत्र भरने की तिथि, नाम वापस लेने की तिथि, नामांकनपत्रों की जांच-पड़ताल की तिथि तथा मतदान की तिथि निश्चित करता है।

4. चुनाव अधिकारियों की नियुक्ति (Appointment of Electoral Staff)—चुनाव करवाने के लिए प्रत्येक राज्य में मुख्य चुनाव अधिकारी (Chief Electoral Officer) और प्रत्येक चुनाव क्षेत्र के लिए चुनाव अधिकारी (Returning Officer) व अन्य कई कर्मचारी नियुक्त किए जाते हैं।

5. मतदान केन्द्र स्थापित करना (To establish Polling Stations)—चुनाव क्षेत्र में मतदाताओं की सुविधा के लिए अनेक मतदान केन्द्र स्थापित किए जाते हैं। मतदान केन्द्र इस ढंग से स्थापित किए जाते हैं कि नागरिकों को वोट डालने के लिए बहुत दूर न जाना पड़े। प्रत्येक मतदान केन्द्र में निश्चित संख्या तक मतदाता रखे जाते हैं और उस मतदान केन्द्र में आने वाले नागरिक उसी मतदान केन्द्र पर मत डालते हैं।

6. नामांकन दाखिल करना (Filling of the Nomination Papers)-इसके बाद मैम्बर बनने के इच्छुक व्यक्ति के नाम का प्रस्ताव एक निश्चित तिथि के अन्दर छपे फ़ार्म पर, जिसका नाम नामांकन पत्र (Nomination Paper) है, किसी एक मतदाता द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। दूसरा मतदाता उसका अनुमोदन करता है। इच्छुक व्यक्ति (उम्मीदवार) भी उस पर अपनी स्वीकृति देता है। प्रार्थना-पत्र के साथ जमानत की निश्चित राशि जमा करवानी पड़ती है।

7. नाम की वापसी (Withdrawal of Nomination)-यदि उम्मीदवार किसी कारण से अपना नाम वापस लेना चाहे तो एक निश्चित तिथि तक उनको ऐसा करने का अधिकार होता है। वह अपना नाम वापस ले सकता है। जमानत की राशि भी उसे वापस मिल जाती है।

8. जांच और आक्षेप (Scrutiny and Objections)-एक निश्चित तिथि को प्रार्थना-पत्रों की जांच की जाती है। यदि किसी में कोई अशुद्धि रह गई हो तो उसे अस्वीकार कर दिया जाता है। यदि कोई दूसरा व्यक्ति उसके प्रार्थनापत्र के सम्बन्ध में आक्षेप करना चाहे तो उसे ऐसा करने का अधिकार दिया जाता है। यदि आपेक्ष उचित सिद्ध हो जाए तो वह प्रार्थना-पत्र अस्वीकार कर दिया जाता है।

9. चुनाव अभियान (Election Compaign)-वैसे तो चुनाव की तिथि की घोषणा के साथ ही राजनीतिक दल चुनाव प्रचार शुरू कर देते हैं पर चुनाव प्रचार सही ढंग से तब शुरू होता है जब नामांकन-पत्रों की जांच-पड़ताल के बाद उम्मीदवारों की अन्तिम सूची.घोषित की जाती है। 19 जनवरी, 1992 को राष्ट्रपति ने एक अध्यादेश जारी कर लोकसभा व विधानसभा चुनावों में नामांकन वापस लेने की अन्तिम तारीख के बाद मतदान कराने की न्यूनतम समय सीमा को 20 दिन से घटा कर 14 दिन कर दिया है। राजनीतिक दल मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए अपनेअपने चुनाव घोषणा-पत्र (Election Manifesto) घोषित करते हैं, जिसमें दल की नीतियां एवं कार्यक्रम घोषित किया जाता है। राजनीतिक दल पोस्टरों द्वारा, जलसों द्वारा रेडियो तथा दूरदर्शन द्वारा अपने कार्यक्रम का प्रचार करते हैं। उम्मीदवारों के समर्थक घर-घर जाकर अपने उम्मीदवारों का प्रचार करते हैं और उम्मीदवार भी जहां तक हो सके सभी घरों में वोट मांगने जाते हैं। गलियों और सड़कों के चौराहों पर छोटी-छोटी सार्वजनिक सभाएं की जाती हैं।

10. मतदान (Voting) सदस्यता के प्रत्येक स्थान के लिए जितने भी उम्मीदवारों के प्रार्थना-पत्र स्वीकार होते हैं, उनके लिए निश्चित तिथि को निश्चित स्थान पर मतदाताओं की वोट ली जाती है। प्रत्येक मतदाता को एक पर्ची (Ballot Paper) दे दी जाती है जिस पर वह अपनी मर्जी से जिसे वोट देना चाहता है, मोहर लगाकर बॉक्स में डाल देता है।

11. मतगणना (Counting of Votes)—प्रत्येक निर्वाचन-बॉक्स उस क्षेत्र के सभी उम्मीदवारों या उनके प्रतिनिधियों के सामने खोलकर प्रत्येक उम्मीदवार के पक्ष में डाली गई पर्चियों को गिन लिया जाता है। जिसके पक्ष में अधिक मत पड़े हैं उसका नाम सरकारी गज़ट में सफल प्रतिनिधियों की सूची में प्रकाशित कर दिया जाता है। यदि कोई उम्मीदवार कुल मतों का 1/6 भाग लेने में असमर्थ होता है, तो उस उम्मीदवार की जमानत की राशि जब्त हो जाती है।

12. चुनाव खर्च का ब्योरा (Election Expenses)—प्रत्येक उम्मीदवार को चुनाव समाप्त होने के 90 दिन के अन्दर-अन्दर चुनाव में खर्च किए जाने वाले धन का ब्योरा चुनाव आयोग को भेजना पड़ता है। चुनाव में खर्च किए जाने के लिए धन-राशि निश्चित है ताकि धनी व्यक्ति पैसे को पानी की तरह बहाकर ग़रीब व्यक्तियों के लिए चुनाव लड़ना कठिन न बना दे।

13. निर्वाचन के विरुद्ध प्रार्थना (Election Petition) यदि कोई उम्मीदवार निर्वाचन की निष्पक्षता या किसी और कारण से सन्तुष्ट न हो तो वह निर्वाचन के विरुद्ध उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकते है। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला अन्तिम होता है।

14. उप-चुनाव (By-election)-यदि किसी प्रतिनिधि का चुनाव रद्द घोषित कर दिया जाए या वह स्वयं त्यागपत्र दे दे, या किसी प्रतिनिधि की मृत्यु के कारण स्थान खाली हो जाए तो अगले चुनाव तक उस स्थान को खाली नहीं रखा जाता बल्कि शीघ्र ही उस चुनाव क्षेत्र में चुनाव की व्यवस्था की जाती है, इसे उप-चुनाव कहते हैं। उप-चुनाव में चुना गरिलिधि पांच वर्ष के लिए नहीं चुना जाता बरि, अगले चुनाव तक ही अपने पद पर रहता है।

प्रश्न 5. सरकार द्वारा किए गए चुनाव सुधारों की व्याख्या करो। (Explain briefly reforms made by the Government.)
उत्तर-पिछले कुछ वर्षों से चुनाव व्यवस्था में सुधार करने की मांग ज़ोर पकड़ती रही है। विपक्षी दलों ने चुनाव व्यवस्था में सुधार करने के लिए कई बार संसद् से भी मांग की। चुनाव आयोग ने भी चुनाव व्यवस्था में सुधार करने के लिए अनेक सुझाव दिए। राजीव गांधी की सरकार ने चुनाव व्यवस्था में सुधार करने के लिए 13 दिसम्बर, 1988 को लोकसभा में दो बिल पेश किए। इन बिलों में एक बिल 62वां संविधान संशोधन बिल था जो संसद् द्वारा पास होने और आधे राज्यों की विधानसभाओं की स्वीकृति मिलने के बाद 61वां संशोधन एक्ट बना है। दूसरे बिल द्वारा जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 में संशोधन किया गया है। इन दोनों द्वारा चुनाव व्यवस्था में निम्नलिखित सुधार किए गए हैं

1. मताधिकार की आयु 18 वर्ष-बहुत समय से राजनीतिक दलों और युवा वर्ग की यह मांग थी कि मताधिकार की आयु 21 वर्ष से घटा कर 18 वर्ष की जाए। 61वें संविधान संशोधन द्वारा मताधिकार की आयु 21 वर्ष से घटा कर 18 वर्ष कर दी गई है। यह संशोधन संसद् ने सर्वसम्मति से पास किया था। श्री राजीव गांधी ने कहा कि मतदान की आयु 21 वर्ष से 18 वर्ष करने से पांच करोड़ नए मतदाता चुनाव प्रक्रिया से जुड़ेंगे।

2. चुनाव मशीनरी को चुनाव आयोग के अधीन करना-अब प्रतिनिधि कानून 1951 में संशोधन करके सारी चुनाव मशीनरी को चुनाव आयोग के अधीन कर दिया गया है। चुनाव के दौरान चुनाव का काम करने वाले राज्य सरकारों के अधिकारियों की सेवाओं को चुनाव आयोग के अधीन किया गया है ताकि अधिकारी चुनाव की ज़िम्मेवारी निष्पक्ष और अनुशासनबद्ध तरीके से निभा सकें।

3. इलेक्ट्रॉनिक मशीन-जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 में संशोधन करके चुनाव में इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों के इस्तेमाल की भी व्यवस्था की गई है।

4. मतदान केन्द्रों पर कब्जा करने पर कड़ी सज़ा-जन प्रतिनिधि कानून 1951 में संशोधन करके मतदान केन्द्रों पर कब्जा करने पर पहले से ज्यादा कड़ी सज़ा देने की व्यवस्था की गई हैं। मतदान केन्द्रों पर कब्जा करने वाले को कम-से-कम 6 महीने और अधिक-से-अधिक दो वर्ष की कैद की सजा व जुर्माने से दंडित करने का प्रावधान है। यदि मतदान केन्द्र पर कब्जा करने में सरकारी अधिकारी या कर्मचारी सहायता देते पकड़े जाते हैं तो उन्हें अधिक सज़ा देने का प्रावधान किया गया है। ऐसे मामलों में न्यूनतम एक वर्ष और अधिकतम तीन वर्ष की सजा व जुर्माना करने का प्रावधान किया गया है।

5. चुनाव बैठकों में बाधा डालने की सज़ा-जन प्रतिनिधि कानून 1951 में संशोधन करके चुनाव बैठकों में बाधा डालने वाले को एक हज़ार रुपए के जुर्माने और तीन महीने की सजा देने की व्यवस्था की गई है जबकि पहले ऐसा करने पर सिर्फ 250 रुपए जुर्माने की सजा का प्रावधान था। यह संशोधन चुनाव में गुण्डागर्दी रोकने के लिए किया गया है।

6. अपराधियों को चुनाव में खड़ा होने से रोकने का आधार विस्तृत किया-जन प्रतिनिधि कानून 1951 में संशोधन करके अपराधी व्यक्तियों के चुनाव में भाग लेने पर रोक के आधार को विस्तृत किया गया है। उन लोगों को चुनाव लड़ने के लिए 6 वर्ष तक अयोग्य घोषित करने की व्यवस्था की गई है जो मुनाफाखोरी व जमाखोरी करने, खाद्य वस्तुओं व दवाओं में मिलावट करने, दहेज विरोधी कानून, सती कानून, आतंकवाद या नशीली दवाओं के कानून का उल्लंघन करते पकड़े गए हों और उन्होंने इन अपराधों के लिए कम-से-कम 6 महीने की सज़ा भुगती हो।

7. उम्मीदवारों को कम करने के लिए व्यवस्था-31 जुलाई, 1996 को चुनाव में उम्मीदवारों की भीड़ कम करने के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को अपनी नामजदगी की दस फीसदी मतदाताओं या दस प्रस्तावकों जो भी कम हो, से पुष्टि करवाने की व्यवस्था की गई है।

8. राजनीतिक दलों का पंजीकरण-जन प्रतिनिधि कानून 1951 में संशोधन करके दलों के पंजीकरण और पंजीकरण के नियमों की भी व्यवस्था की गई है। राजनीतिक दलों के पंजीकरण के लिए अनिवार्य शर्तों में धर्म-निरपेक्षता और समाजवाद के प्रति आस्था व्यक्त करने की व्यवस्था की गई है। चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों के रजिस्ट्रेशन का अधिकार दिया गया है।

9. स्वतन्त्र उम्मीदवारों की मृत्यु होने पर चुनाव रद्द नहीं-मार्च, 1992 में संसद् ने लोक प्रतिनिधि (संशोधन) विधेयक पास किया। विधेयक में किसी निर्दलीय उम्मीदवार के निधन की स्थिति में चुनाव रद्द न करने का प्रावधान है।

10. चुनाव प्रचार अभियान के समय में कमी-राष्ट्रपति ने जनवरी, 1992 में एक अध्यादेश जारी कर लोकसभा व विधानसभा चुनावों में नामांकन वापस लेने की अन्तिम तारीख के बाद मतदान कराने की न्यूनतम समय सीमा को 20 दिन से घटा कर 14 दिन कर दिया है।

11. पहचान पत्र अनिवार्य-15 दिसम्बर, 1993 को चुनाव आयोग ने आदेश जारी किया कि 30 नवम्बर, 1994 तक जम्मू-कश्मीर को छोड़कर देश के सभी संसदीय चुनाव क्षेत्रों में चुनाव पहचान पत्र जारी कर दिए जाएंगे। 18 अप्रैल, 2000 को चुनाव आयोग ने सभी राज्यों तथा केन्द्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि आगामी सभी चुनावों तथा उपचुनावों में उन सभी मतदाताओं के लिए फोटो पहचान पत्र दिखाये जाने पर जोर देगा, जिनके फोटो परिचय पत्र बन चुके हैं।

12. मन्त्रियों के कार काफ़िले पर रोक-चुनाव आयोग ने 12 फरवरी, 1994 को आदेश जारी करके चुनाव प्रचार के दिनों में राज्यों या केन्द्र के मन्त्री के साथ तीन से अधिक कारों के काफिले पर रोक लगा दी है। आदेश में चेतावनी दी गई है कि यदि इस आदेश का सख्ती से पालन न किया गया तो मतदान या चुनाव भी रद्द किया जा सकता है।

13. चुनावी खर्चे में वृद्धि-चुनाव में काले धन के महत्त्व को कम करने के लिए 2014 में सरकार ने लोकसभा की सीट के लिए अधिकतम चुनावी खर्चा बढ़ाकर 70 लाख कर दिया और विधानसभा सीट के लिए अधिकतम चुनावी खर्चा बढ़ाकर 28 लाख कर दिया। इससे अधिक कोई भी उम्मीदवार खर्च नहीं कर सकता है।

14. साम्प्रदायिकता को नियन्त्रित करना-चुनाव आयोग ने दिसम्बर, 1994 में एक अधिसूचना जारी करके चुनावों के दौरान धर्म व जाति का प्रयोग न करने के आदेश जारी किए। इन आदेशों की पालना के लिए चुनाव आयोग ने धर्म-निरपेक्ष पर्यवेक्षकों की नियुक्ति की है।

15. चुनाव आयोग को बहु-सदस्यीय बनाना-अक्तूबर, 1993 में राष्ट्रपति ने एक अध्यादेश जारी करके चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय बना दिया, जिसके अन्तर्गत चुनाव आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्त हो सकते हैं। दिसम्बर, 1993 में इस अध्यादेश पर संसद् की स्वीकृति मिल गई।

16. जमानत राशि में वृद्धि-1998 में सरकार ने जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन करके लोकसभा तथा राज्य विधानमण्डलों के चुनाव लड़ने के लिए जमानत की राशि को बढ़ा दिया जिसके अन्तर्गत सामान्य वर्ग के उम्मीदवार के लिए दस हज़ार तथा अनुसूचित जाति एवं जन-जाति के उम्मीदवारों के लिए जमानत राशि पांच हजार रुपये कर दी गई। 2010 में जमानत राशि में पुनः वृद्धि की गई। लोकसभा चुनाव के उम्मीदवारों के लिए 25 हजार रुपये तथा विधानसभा चुनाव के उम्मीदवारों के लिए 10 हज़ार रुपये जमानत राशि के रूप में निर्धारित किये गए। अनुसूचित जाति एवं जनजाति के उम्मीदवारों के लिए में यह राशि आधी होगी।

यद्यपि सरकार द्वारा किए गए चुनाव सुधार काफ़ी महत्त्वपूर्ण हैं। फिर भी चुनाव-सुधार एक तरफा तथा अधूरे हैं। चुनाव सुधार में चुनाव में धन की बढ़ती भूमिका पर अंकुश की कोई व्यवस्था नहीं की गई है, न सरकारी प्रचार तन्त्र और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग पर ही रोक लगाने की व्यवस्था की गई है। सरकार ने चुनाव आयोग द्वारा दी गई चुनाव सुधार की 90 प्रतिशत सिफ़ारिशों को मान लिया है। 29 अप्रैल, 2000 को चुनाव प्रणाली की समीक्षा तथा चुनाव सुधार के लिए एक सर्वदलीय बैठक हुई, परन्तु इस बैठक में आम सहमति न होने के कारण कोई निर्णय नहीं हो सका। सभी दल चुनाव प्रणाली में सुधार करने के पक्ष में हैं ताकि धन और भुज-बल के प्रयोग को रोका जा सके। आवश्यकता इस बात की है कि चुनाव व्यवस्था में व्यापक सुधार किए जाएं ताकि चुनाव निष्पक्ष और स्वतन्त्रता के वातावरण में हो।

लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. चुनाव आयोग के सदस्यों का कार्यकाल लिखें।
उत्तर-संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार आयुक्तों का कार्यकाल संसद् द्वारा बनाए गए कानूनों के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा निश्चित किया जाएगा। 1972 से पूर्व मुख्य चुनाव आयोग के कार्यकाल और सेवा सम्बन्धी शर्तों के बारे में कोई विशेष व्यवस्था नहीं थी। इसीलिए पहले दो मुख्य चुनाव आयुक्त आठ वर्ष तक इस पद पर रहे। 20 दिसम्बर, 1993 को पास किए गए कानून के अन्तर्गत मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल 6 वर्ष तथा 65 वर्ष की आयु पूरी करने तक (जो भी इनमें से पहले पूरा हो जाए) निश्चित किया गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्त 6 वर्ष की अवधि से पूर्व त्याग-पत्र भी दे सकता है और राष्ट्रपति भी 6 वर्ष से पूर्व निश्चित विधि के अनुसार उन्हें हटा सकता है।

प्रश्न 2. मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से अलग करने की विधि लिखो।
उत्तर-संविधान के अनुच्छेद 324 (5) के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी प्रकार हटाया जा सकता है जिस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को। मुख्य चुनाव आयुक्त को राष्ट्रपति तभी हटा सकता है जब उसके विरुद्ध दुराचार (Misbehaviour) तथा अक्षमता (Incapacity) का आरोप सिद्ध हो जाए और संसद् के दोनों सदनों ने इस सम्बन्ध में अलग-अलग अपने सदन के सदस्यों के पूर्ण बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास किया हो। अभी तक किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को समय से पहले नहीं हटाया गया है।

प्रश्न 3. भारत में जन-सहभागिता की क्या स्थिति है ? .
उत्तर-भारत में जन-सहभागिता की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। अधिकतर भारतीय मतदाता राजनीति में रुचि नहीं रखते या राजनीति के प्रति उदासीन हैं। आम चुनावों से स्पष्ट हो जाता है कि लगभग 60 प्रतिशत मतदाता ही मतदान करने जाते हैं। भारतीय नागरिकों की न केवल चुनाव में सहभागिता कम है बल्कि अन्य राजनीतिक गतिविधियों में भी कम लोग भाग लेते हैं। आम जनता सार्वजनिक मामलों और राजनीतिक गतिविधियों में रुचि नहीं लेती। बहुत कम नागरिक चुनाव के पश्चात् अपने प्रतिनिधियों से मिलते हैं और उन्हें अपनी समस्याओं से अवगत कराते हैं। इसी कारण भारत में जन-सहभागिता का स्तर कम है।

प्रश्न 4. भारत में निम्न स्तर की जन-सहभागिता के लिए कोई चार कारण लिखो।
अथवा
भारत में जन-सहभागिता का स्तर इतना नीचे क्यों है ?
अथवा
भारत के चुनावों में लोगों की कम सहभागिता के लिए उत्तरदायी कोई चार तथ्यों का वर्णन करें।
उत्तर-

  • अनपढ़ता–भारत की अधिकांश जनता अनपढ़ है। अशिक्षित व्यक्ति मताधिकार का महत्त्व नहीं समझता और न ही अधिकांश अशिक्षित व्यक्तियों को मताधिकार का प्रयोग करना आता है। चुनाव के समय लाखों मत पत्रों को अवैध घोषित किया जाना इस बात का प्रमाण है कि लोगों को मत का प्रयोग करना नहीं आता।
  • ग़रीबी-ग़रीब व्यक्ति चुनाव लड़ना तो दूर की बात वह ऐसा सोच भी नहीं सकता। ग़रीब व्यक्ति मताधिकार का महत्त्व नहीं समझता और अपनी वोट को बेचने के लिए तैयार हो जाता है।
  • बेकारी-भारत में जन-सहभागिता के निम्न स्तर के होने का एक कारण बेकारी है। भारत में करोड़ों लोग बेकार हैं। बेकारी के कारण नागरिकों का प्रशासनिक स्वरूप तथा राजनीतिक दलों की क्षमता में विश्वास कम होता चला जा रहा है। बेकार व्यक्ति मताधिकार को कोई महत्त्व नहीं देता और अपना वोट बेचने के लिए तैयार रहता है।
  • राजनीतिक उदासीनता- भारत में अधिकांश लोग राजनीति के प्रति उदासीन रहते हैं और वे वोट डालने नहीं जाते।

प्रश्न 5. मतदान व्यवहार से क्या भाव है ?
उत्तर- भारत में प्रत्येक नागरिक को जिसकी आयु 18 वर्ष हो मताधिकार प्राप्त है, परन्तु भारतीय मतदाता ईमानदारी से वोट न डालकर, धर्म, जाति तथा अन्य सामाजिक भावनाओं से प्रेरित होकर मतदान करता है। प्रो० जे० सी० प्लेनो
और रिग्स के अनुसार, “मतदान व्यवहार अध्ययन के उस क्षेत्र को कहा जाता है जो उन विधियों से सम्बन्धित है जिन विधियों द्वारा लोग सार्वजनिक चुनाव में अपने मत का प्रयोग करते हैं। मतदान व्यवहार उन कारणों से सम्बन्धित है जो कारण मतदाताओं को किसी विशेष रूप से मताधिकार का प्रयोग करने के लिए प्रेरित करते हैं।”

प्रश्न 6. भारत में मतदान व्यवहार को प्रभावित करने वाले तत्त्व लिखिए।
अथवा
भारत में मतदान व्यवहार को प्रभावित करने वाले कोई चार तत्व लिखो।
उत्तर- भारतीय मतदान व्यवहार को अनेक तत्त्व प्रभावित करते हैं जिनमें मुख्य निम्नलिखित हैं

  • जाति का मतदान व्यवहार पर प्रभाव-भारतीय राजनीति में जाति का बहुत महत्त्व है और भारतीय जनता अधिकतर जाति के प्रभाव में ही आकर मतदान करती है।
  • धर्म का प्रभाव-भारतीय मतदाता धर्म के प्रभाव में आकर भी वोट डालते हैं। टिकट बांटते समय निर्वाचित क्षेत्र की रचना को ध्यान में रखा जाता है और प्रायः उसी धर्म के व्यक्ति को टिकट दी जाती है जिस धर्म के लोगों की वोटें उस निर्वाचन क्षेत्र में अधिकतम होती हैं।
  • क्षेत्रीयवाद और स्थानीयवाद- भारत में मतदाता स्थानीयवाद तथा क्षेत्रीयवाद की भावनाओं से ओत-प्रोत होकर मतदान करते हैं।
  • वैचारिक प्रतिबद्धता-वैचारिक प्रतिबद्धता भी मतदान व्यवहार को प्रभावित करती है।

प्रश्न 7. चुनाव आयोग के चार कार्यों का वर्णन करें।
अथवा
चुनाव आयोग के कोई चार कार्य लिखो।
उत्तर-चुनाव आयोग के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं-

  • चुनाव आयोग का मुख्य कार्य संसद् तथा विधानमण्डलों के चुनावों के लिए मतदाता सूची तैयार करवाना है।
  • चुनाव आयोग को चुनाव सम्बन्धी सभी मामलों पर निरीक्षण, निर्देश तथा नियन्त्रण का अधिकार प्राप्त है।
  • यह आयोग विभिन्न चुनाव क्षेत्रों में चुनाव करवाने की तिथि निश्चित करता है।
  • राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति के पदों पर चुनाव करवाने का काम भी चुनाव आयोग को सौंपा गया है।

प्रश्न 8. भारतीय चुनाव प्रणाली में किए जाने वाले सुधारों से सम्बन्धित कोई चार सुझाव दें।
उत्तर-चुनाव प्रणाली के दोषों को निम्नलिखित ढंगों से दूर किया जा सकता है

  • निष्पक्षता-चुनाव निष्पक्ष ढंग से होने चाहिए। सत्तारूढ़ दल को चुनाव में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और न ही अपने दल के हित में सरकारी मशीनरी का प्रयोग करना चाहिए।
  • धन के प्रभाव को कम करना-इसके लिए पब्लिक फण्ड बनाना चाहिए और उम्मीदवारों की धन से सहायता करनी चाहिए। चुनाव का खर्च शासन को ही करना चाहिए।
  • आनुपातिक चुनाव प्रणाली-प्रायः सभी विपक्षी दल वर्तमान में एक सदस्यीय चुनाव क्षेत्र की प्रणाली से सन्तुष्ट नहीं हैं। कांग्रेस को अल्पसंख्या में मत मिलते हैं पर संसद् में सीटें बहुत अधिक मिलती हैं। आम तौर पर सभी विरोधी दल आनुपातिक चुनाव प्रणाली के पक्ष में हैं।
  • भारत में फर्जी मतदान को रोकना चाहिए।

प्रश्न 9. भारतीय चुनाव प्रणाली की चार विशेषताएं लिखो।
उत्तर-भारतीय चुनाव प्रणाली की निम्नलिखित विशेषताएं हैं

  • वयस्क मताधिकार-भारतीय चुनाव प्रणाली की प्रथम विशेषता वयस्क मताधिकार है। वयस्क मताधिकार की व्यवस्था देते हुए संविधान में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति जो भारत का नागरिक है और जो कानून के अन्तर्गत किसी निश्चित तिथि पर 18 वर्ष का है तथा संविधान अथवा कानून के अन्तर्गत चुनाव के लिए किसी भी दृष्टि से अयोग्य नहीं है तो उसे चुनावों में मतदाता के रूप में भाग लेने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है।
  • संयुक्त चुनाव पद्धति-भारतीय चुनाव प्रणाली की दूसरी मुख्य विशेषता संयुक्त चुनाव पद्धति है।
  • अनुसूचित जातियों तथा पिछड़े वर्गों के लिए सुरक्षित स्थान-संयुक्त चुनाव प्रणाली के बावजूद भी हमारे संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित तथा पिछड़े लोगों के लिए स्थान सुरक्षित कर दिए हैं।
  • भारतीय चुनाव प्रणाली की एक अन्य विशेषता यह है कि मतदान गुप्त होता है।

प्रश्न 10. भारत में चुनाव प्रक्रिया के किन्हीं चार पड़ावों के बारे में लिखो।
अथवा
भारत में चुनाव विधि के कोई चार पड़ावों का वर्णन करें।
उत्तर-भारत में चुनाव प्रक्रिया की निम्नलिखित अवस्थाएं हैं
1. चुनाव क्षेत्र निश्चित करना-चुनाव प्रबन्ध में सर्वप्रथम कार्य चुनाव क्षेत्र को निश्चित करना है। लोकसभा में जितने सदस्य चुने जाते हैं, लगभग समान जनसंख्या वाले उतने ही क्षेत्रों में सारे भारत को बांट दिया जाता है। इसी प्रकार विधानसभाओं के चुनाव में राज्य को समान जनसंख्या वाले चुनाव क्षेत्र में बांट दिया जाता है और प्रत्येक क्षेत्र से एक सदस्य चुना जाता है।

2. मतदाताओं की सूची-मतदाता सूचियां तैयार करना चुनाव प्रक्रिया की दूसरी अवस्था है। सबसे पहले मतदाताओं की अस्थायी सूची तैयार की जाती है। इन सूचियों को कुछ एक विशेष स्थानों पर जनता को देखने के लिए रख दिया जाता है। यदि उस सूची में किसी का नाम लिखने से रह गया हो या किसी का नाम ग़लत लिख दिया गया हो तो उसको एक निश्चित तिथि तक संशोधन करवाने के लिए प्रार्थना-पत्र देना होता है। फिर संशोधित सूचियां तैयार की जाती हैं।

3. चुनाव तिथि की घोषणा-चुनाव आयोग चुनाव की तिथि की घोषणा करता है। चुनाव आयोग नामांकन-पत्र भरने की तिथि, नाम वापस लेने की तिथि, नामांकन-पत्रों की जांच-पड़ताल की तिथि निश्चित करता है।

4. उम्मीदवारों का नामांकन-चुनाव कमिशन द्वारा की गई चुनाव घोषणा के पश्चात् विभिन्न राजनीतिक दलों के उम्मीदवार अपने नामांकन पत्र दाखिल करते हैं। राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों के अतिरिक्त स्वतन्त्र उम्मीदवार भी अपने नामांकन-पत्र प्रस्तुत करते हैं।

प्रश्न 11. चुनाव आयोग की रचना लिखो।
अथवा
भारत में चुनाव आयोग की रचना की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-अनुच्छेद 324 के अनुसार चुनाव आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त तथा कुछ अन्य चुनाव आयुक्त होंगे। चुनाव आयुक्तों की संख्या राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाएगी। संविधान के लागू होने से लेकर 1988 तक चुनाव आयोग में केवल मुख्य चुनाव आयुक्त ही था और अन्य सदस्यों की नियुक्ति नहीं की गई थी। 1989 में कांग्रेस सरकार ने पहली बार मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ दो अन्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किए, परन्तु राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने दो अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को रद्द कर दिया। 1 अक्तूबर, 1993 को केन्द्र सरकार ने दो नए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कर चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय बनाने का महत्त्वपूर्ण कदम उठाया। दिसम्बर, 1993 में संसद् ने विधेयक पास करके चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय बना दिया। अतः आजकल चुनाव आयोम में एक मुख्य चुनाव आयुक्त तथा दो अन्य सदस्य हैं। चुनाव आयोग के तीनों सदस्यों को समानाधिकार प्राप्त हैं।

प्रश्न 12. भारतीय चुनाव प्रणाली के चार दोष लिखें।
उत्तर- भारत में चुनाव प्रणाली तथा चुनावों में कई दोष हैं जो मुख्य रूप से निम्नलिखित हैं

  • एक सदस्यीय चुनाव क्षेत्र-भारत में एक सदस्यीय चुनाव क्षेत्र है और एक स्थान के लिए बहुत-से उम्मीदवार खड़े हो जाते हैं। कई बार थोड़े से मत प्राप्त करने वाला उम्मीदवार भी चुना जाता है।
  • जाति और धर्म के नाम पर वोट-भारत में साम्प्रदायिकता का बड़ा प्रभाव है और इसने हमारी प्रगति में सदैव बाधा उत्पन्न की है। जाति और धर्म के आधार पर खुले रूप से मत मांगे और डाले जाते हैं। राजनीतिक दल भी अपने उम्मीदवार खड़े करते समय इस बात का ध्यान रखते हैं और उसी जाति का उम्मीदवार खड़ा करने का प्रयत्न करते हैं जिस जाति का उस क्षेत्र में बहुमत हो।
  • धन का अधिक खर्च- भारत में चुनाव में धन का अधिक खर्च होता है, जिसे देखकर साधारण व्यक्ति तो चुनाव लड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकता।
  • भारत में फर्जी मतदान एक बहुत बड़ी समस्या है।

प्रश्न 13. भारत सरकार द्वारा चुनाव व्यवस्था में किए गए कोई चार सुधार लिखें।
उत्तर-भारत सरकार द्वारा चुनाव व्यवस्था में निम्नलिखित सुधार किए गए हैं-

  • मताधिकार की आयु 18 वर्ष-बहुत समय से राजनीतिक दलों और युवा वर्गों की मांग यह थी कि मताधिकार की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की जाए। 61वें संविधान संशोधन द्वारा मताधिकार की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई है।
  • चुनाव मशीनरी को चुनाव आयोग के अधीन करना-जन प्रतिनिधि कानून 1951 में संशोधन करके सारी चुनाव मशीनरी को चुनाव आयोग के अधीन कर दिया गया है।
  • इलेक्ट्रॉनिक मशीन-जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 में संशोधन करके चुनाव में इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों के इस्तेमाल की भी व्यवस्था की गई है।
  • मतदान केन्द्रों पर कब्जा करने पर कड़ी सजा की व्यवस्था की गई है।

प्रश्न 14. जन-सहभागिता का क्या अर्थ है ?
उत्तर-जन-सहभागिता लोकतन्त्रीय शासन प्रणाली का महत्त्वपूर्ण आधार है। जन-सहभागिता का अर्थ है राजनीतिक प्रक्रिया में लोगों द्वारा भाग लेना। जन-सहभागिता का स्तर सभी शासन प्रणालियों और सभी देशों में एक समान नहीं होता। अधिनायकवाद और निरंकुशतन्त्र में जन-सहभागिता का स्तर बहुत कम होता है जबकि लोकतन्त्र में जन-सहभागिता का स्तर बहुत ऊंचा होता है। लोकतन्त्र में जन-सहभागिता के द्वारा ही लोग शासन में भाग लेते हैं। हरबर्ट मैक्कलॉस्की के अनुसार, “सहभागिता वह मुख्य साधन है, जिसके द्वारा लोकतन्त्र में सहमति प्रदान की जाती है और वापस ली जाती है तथा शासकों को शासितों के प्रति उत्तरदायी बनाया जाता है।

प्रश्न 15. भारत में सूचियों को कौन बनाता है ?
अथवा
भारत में मतदाता सूचियां कौन तैयार करता है ?
उत्तर-भारत में मतदाता सूचियां तैयार करने का काम चुनाव आयोग करता है। प्रत्येक जनगणना के पश्चात् और आम चुनाव से पहले मतदाताओं की सूची में संशोधन किए जाते हैं। इन सूचियों में नए मतदाताओं के नाम लिखे जाते हैं जो नागरिक मर चुके होते हैं उनके नाम मतदाता सूची में से निकाले जाते हैं। यदि किसी नागरिक का नाम मतदाता सूची में नहीं लिखा जाता तो वह व्यक्ति एक निश्चित तिथि तक आवेदन-पत्र देकर मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करवा सकता है। मतदाता सूची के तैयार होने पर चुनाव आयोग द्वारा निश्चित तिथि तक आपत्तियां मांगी जाती हैं और कोई भी आपत्ति कर सकता है। नागरिकों द्वारा एवं राजनीतिक दलों द्वारा उठाई गई आपत्तियों को चुनाव आयोग के कर्मचारियों द्वारा दूर किया जाता है।

प्रश्न 16. चुनाव मुहिम से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-चुनाव की तिथि की घोषणा के साथ ही राजनीतिक दल चुनाव प्रचार शुरू कर देते हैं पर चुनाव प्रचार सही ढंग से तब शुरू होता है जब नामांकन-पत्रों की जांच-पड़ताल के बाद उम्मीदवारों की अन्तिम सूची घोषित की जाती है। राजनीतिक दल मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए अपने-अपने चुनाव घोषणा-पत्र (Election Manifesto) घोषित करते हैं, जिसमें दल की नीतियां एवं कार्यक्रम घोषित किया जाता है। राजनीतिक दल, पोस्टरों द्वारा, जलसों द्वारा, रेडियो तथा दूरदर्शन द्वारा अपने कार्यक्रम का प्रचार करते हैं। उम्मीदवारों के समर्थक घर-घर जाकर अपने उम्मीदवारों का प्रचार करते हैं और उम्मीदवार भी जहां तक हो सके सभी घरों में वोट मांगने जाते हैं। गलियों और सड़कों के चौराहों पर छोटी-छोटी सार्वजनिक सभाएं की जाती हैं।

प्रश्न 17. भारत में जातिवाद मतदान व्यवहार को कैसे प्रभावित करता है ?
उत्तर-जाति सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व है जिसका आरम्भ से ही मतदान व्यवहार पर बड़ा प्रभाव रहा है। स्वतन्त्रता से पूर्व भी जब अभी वयस्क मताधिकार प्रचलित नहीं हुआ था, जाति का मतदान पर बहुत प्रभाव था। स्वतन्त्रता के पश्चात् यह प्रभाव कम होता दिखाई नहीं देता। भारतीय जनता अधिकतर जाति के प्रभाव में ही आकर मतदान करती है। कुछ राज्यों में तो यह तत्त्व बहुत निर्णायक है क्योंकि मतदाता अपनी जाति के उम्मीदवार को वोट देना अपना कर्त्तव्य मानते हैं। उदाहरण के लिए हरियाणा में अनुसूचित जातियों में हरिजनों की संख्या सबसे अधिक है और राजनीति तथा मतदान के क्षेत्र में उनकी दूसरी जातियों की अपेक्षा अधिक चलती है। अनेक दल तो जातियों के आधार पर ही बने हुए हैं और उन्हें विशेष जातियों का समर्थन प्राप्त है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. भारत में जन-सहभागिता का स्तर इतना कम क्यों हैं ?
उत्तर-

  • अनपढ़ता- भारत की अधिकांश जनता अनपढ़ है। अशिक्षित व्यक्ति मताधिकार का महत्त्व नहीं समझता और न ही अधिकांश अशिक्षित व्यक्तियों को मताधिकार का प्रयोग करना आता है।
  • ग़रीबी-गरीब व्यक्ति चुनाव लड़ना तो दूर की बात वह ऐसा सोच भी नहीं सकता। ग़रीब व्यक्ति मताधिकार का महत्त्व नहीं समझता और अपनी वोट को बेचने के लिए तैयार हो जाता है।

प्रश्न 2. मतदान व्यवहार से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर भारत में प्रत्येक नागरिक को जिसकी आयु 18 वर्ष हो मताधिकार प्राप्त है, परन्तु भारतीय मतदाता ईमानदारी से वोट न डालकर, धर्म, जाति तथा अन्य सामाजिक भावनाओं से प्रेरित होकर मतदान करता है। प्रो० जे० सी० प्लेनो और रिग्स के अनुसार, “मतदान व्यवहार अध्ययन के उस क्षेत्र को कहा जाता है जो उन विधियों से सम्बन्धित है जिन विधियों द्वारा लोग सार्वजनिक चुनाव में अपने मत का प्रयोग करते हैं। मतदान व्यवहार उन कारणों से सम्बन्धित है जो कारण मतदाताओं को किसी विशेष रूप से मताधिकार का प्रयोग करने के लिए प्रेरित करते हैं।”

प्रश्न 3. भारत में मतदान व्यवहार को प्रभावित करने वाले दो तत्त्व लिखो।
उत्तर-

  • जाति का मतदान व्यवहार पर प्रभाव-भारतीय राजनीति में जाति का बहुत महत्त्व है और भारतीय जनता अधिकतर जाति के प्रभाव में ही आकर मतदान करती है। .
  • धर्म का प्रभाव-भारतीय मतदाता धर्म के प्रभाव में आकर भी वोट डालते हैं।

प्रश्न 4. चुनाव आयोग के कोई दो कार्य लिखो।
उत्तर-

  • मतदाता सूचियों को तैयार करना-चुनाव आयोग का एक महत्त्वपूर्ण कार्य संसद् तथा राज्य विधानमण्डलों के चुनाव के लिए मतदाता सूची तैयार करना होता है।
  • चुनाव के लिए तिथि निश्चित करना-चुनाव आयोग विभिन्न चुनाव क्षेत्रों में चुनाव करवाने की तिथि निश्चित करता है।

प्रश्न 5. चुनाव आयोग की रचना लिखो।
उत्तर-अनुच्छेद 324 के अनुसार चुनाव आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त तथा कुछ अन्य चुनाव आयुक्त होंगे। चुनाव आयुक्तों की संख्या राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाएगी। दिसम्बर, 1993 में संसद् ने विधेयक पास करके चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय बना दिया। अत: आजकल चुनाव आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त तथा दो अन्य सदस्य हैं। चुनाव आयोग के तीनों सदस्यों को समानाधिकार प्राप्त हैं।

प्रश्न 6. जन-सहभागिता का क्या अर्थ है ?
उत्तर-जन-सहभागिता लोकतन्त्रीय शासन प्रणाली का महत्त्वपूर्ण आधार है। जन-सहभागिता का अर्थ है राजनीतिक प्रक्रिया में लोगों द्वारा भाग लेना। जन सहभागिता का स्तर सभी शासन प्रणालियों और सभी देशों में एक समान नहीं होता। अधिनायकवाद और निरंकुशतन्त्र में जन-सहभागिता का स्तर बहत कम होता है जबकि लोकतन्त्र में जन-सहभागिता का स्तर बहुत ऊंचा होता है। लोकतन्त्र में जन-सहभागिता के द्वारा ही लोग शासन में भाग लेते हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. भारत में मतदाता कौन हो सकता है ?
उत्तर-भारत में 18 वर्ष के व्यक्ति को मताधिकार प्राप्त है।

प्रश्न 2. भारत में किस प्रकार की चुनाव प्रणाली अपनाई गई है ?
उत्तर-भारत में वयस्क मताधिकार पर आधारित संयुक्त चुनाव प्रणाली अपनाई गई है।

प्रश्न 3. चुनाव आयोग के कितने सदस्य हैं ?
उत्तर-चुनाव आयोग के तीन सदस्य हैं।

प्रश्न 4. भारतीय चुनाव आयोग की रचना का वर्णन करें।
उत्तर-चुनाव आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त तथा कुछ अन्य चुनाव आयुक्त हो सकते हैं। आजकल चुनाव आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त व दो अन्य चुनाव आयुक्त हैं।

प्रश्न 5. चुनाव आयोग की नियुक्ति कौन करता है ?
उत्तर-चुनाव आयोग की नियुक्ति संविधान के अनुसार राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है।

प्रश्न 6. मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति कौन करता है ?
उत्तर–मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।

प्रश्न 7. चुनाव आयोग के सदस्यों का कार्यकाल बताइए।
उत्तर-चुनाव आयोग के सदस्यों का कार्यकाल राष्ट्रपति नियम बना कर निश्चित करता है। प्रायः यह अवधि 6 वर्ष होती है।

प्रश्न 8. भारतीय चुनाव आयोग का एक कार्य लिखो।
उत्तर-चुनाव आयोग का मुख्य कार्य संसद् तथा राज्य विधान सभाओं के चुनाव करवाना तथा उनकी मतदाता सूची तैयार करवाना है।

प्रश्न 9. भारत में मताधिकार सम्बन्धी कौन-सा सिद्धान्त अपनाया गया है ?
उत्तर- भारत में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के सिद्धान्त को अपनाया गया है।

प्रश्न 10. संयुक्त निर्वाचन प्रणाली से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 325 के अनुसार संयुक्त निर्वाचन प्रणाली की व्यवस्था की गई है, जिसके अन्तर्गत एक निर्वाचन क्षेत्र के सभी मतदाता, चाहे वे किसी भी धर्म, जाति या सम्प्रदाय से सम्बन्धित हो, उनके नाम एक ही मतदाता सूची में शामिल किये जाते हैं तथा वे मिलकर अपने प्रतिनिधि का चुनाव करते हैं।

प्रश्न 11. भारत में चुनाव प्रक्रिया की दो अवस्थाओं के नाम लिखें।
उत्तर-

  1. चुनाव क्षेत्र निश्चित करना
  2. मतदाता सूची बनाना।।

प्रश्न 12. चुनाव आयोग का अध्यक्ष कौन होता है ?
उत्तर-चुनाव आयोग का अध्यक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त होता है।

प्रश्न 13. भारत में कौन-कौन से दो चुनाव अप्रत्यक्ष ढंग से करवाए जाते हैं ? ।
उत्तर-

  1. राष्ट्रपति का चुनाव
  2. उप-राष्ट्रपति का चुनाव।

प्रश्न 14. भारत में मतदान व्यवहार का आधार क्या है ? वोट कौन डाल सकता है ?
उत्तर-भारत में सार्वभौमिक मताधिकार के सिद्धान्त को अपनाया गया है। भारत का प्रत्येक 18 वर्ष का नागरिक बिना किसी भेदभाव के मतदान कर सकता है।

प्रश्न 15. भारत में कौन-से दो चुनाव प्रत्यक्ष चुनाव ढंग द्वारा करवाए जाते हैं ?
उत्तर-

  • लोकसभा का चुनाव
  • विधान सभा का चुनाव।

प्रश्न 16. जन सहभागिता से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-जन सहभागिता का अर्थ है, राजनीतिक प्रक्रिया में लोगों द्वारा भाग लेना।

प्रश्न 17. जन सहभागिता की क्या महत्ता है ?
उत्तर- जन सहभागिता शासन को वैधता प्रदान करती है, उसे उत्तरदायी बनाती है तथा स्थिरता प्रदान करती है।

प्रश्न 18. चुनाव आयोग के सदस्यों को किस प्रकार पद से हटाया जा सकता है ?
उत्तर-चुनाव आयोग के सदस्यों को संसद् द्वारा महाभियोग प्रस्ताव द्वारा हटाया जा सकता है।

प्रश्न 19. मतदान व्यवहार को प्रभावित करने वाले कोई दो तत्त्व लिखिए।
अथवा
भारत में मतदान व्यवहार को प्रभावित करने वाला कोई एक तत्त्व लिखें।
उत्तर-

  • जाति
  • धर्म।

प्रश्न 20. चुनाव अभियान से आपका क्या अभिप्राय है ? .
उत्तर-चुनावों के समय राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों तथा उनके समर्थकों द्वारा किया गया चुनाव प्रचार, चुनाव अभियान कहलाता है।

प्रश्न 21. निर्वाचन मंडल से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-कुल जनसंख्या का वह भाग जो प्रतिनिधियों के चुनाव में भाग लेता है, सामूहिक रूप से निर्वाचन मंडल कहलाता है।

प्रश्न 22. निर्वाचन क्षेत्र किसे कहते हैं ? .
उत्तर-निर्वाचन क्षेत्र उस निश्चित क्षेत्र या इलाके को कहा जाता है, जहां से मतदाता अपना प्रतिनिधि चुनते हैं।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. भारत में प्रत्येक ……………… के नागरिक को मताधिकार प्राप्त है।
2. भारत में अब तक ……………. लोक सभा के चुनाव करवाए जा चुके हैं।
3. भारत में ………….. मताधिकार को अपनाया गया है।
4. भारत में पहला आम चुनाव …………. में हुआ।
5. लोकसभा के चुनाव के लिए एक प्रत्याशी का अधिकतम चुनाव खर्च ………… रु० निर्धारित किया गया है।
उत्तर-

  1. 18
  2. 16
  3. सार्वभौमिक वयस्क
  4. 1952
  5. 70 लाख।

प्रश्न III. निम्नलिखित वाक्यों में से सही या ग़लत का चुनाव करें

1. भारत विश्व का सबसे बड़ा तानाशाही राज्य है। यहां पर अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली को अपनाया गया है।
2. 61वें संशोधन द्वारा मताधिकार की आयु घटाकर 18 वर्ष कर दी गई।
3. भारत में प्रथम आम चुनाव 1950 में हुए, जबकि 16वीं लोकसभा के चुनाव अप्रैल-मई, 2004 में हुए।
4. भारत में महिलाओं को मताधिकार प्राप्त है।
5. भारतीय चुनाव प्रणाली के महत्त्वपूर्ण दोष वयस्क मताधिकार, संयुक्त निर्वाचन तथा गुप्त मतदान है।
उत्तर-

  1. ग़लत
  2. सही
  3. ग़लत
  4. सही
  5. ग़लत।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न 1. भारतीय संविधान के किस अध्याय में चुनाव प्रणाली का वर्णन किया गया है ?
(क) अध्याय-3
(ख) अध्याय-4
(ग) अध्याय-15
(घ) अध्याय-18.
उत्तर-(ग) अध्याय-15

प्रश्न 2. भारत में मताधिकार प्राप्त है
(क) जिस नागरिक की आयु 21 वर्ष से अधिक हो
(ख) जिस नागरिक की आयु 25 वर्ष से अधिक हो
(ग) जिस नागरिक की आयु 20 वर्ष से अधिक हो
(घ) जिस नागरिक की आयु 18 वर्ष हो।
उत्तर-(घ) जिस नागरिक की आयु 18 वर्ष हो।

प्रश्न 3. चुनाव आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य-
(क) तीन सदस्य होते हैं
(ख) दो सदस्य होते हैं
(ग) पांच सदस्य होते हैं
(घ) चार सदस्य होते हैं।
उत्तर-(ख) दो सदस्य होते हैं

प्रश्न 4. मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य सदस्यों की अवधि है-
(क) पांच वर्ष
(ख) चार वर्ष
(ग) आठ वर्ष
(घ) छ: वर्ष।
उत्तर-(घ) छ: वर्ष।

प्रश्न 5. भारत में पहला आम चुनाव किस वर्ष में हुआ?
(क) सन् 1950 में
(ख) सन् 1952 में
(ग) सन् 1960 में
(घ) सन् 1962 में।
उत्तर-(ख) सन् 1952 में

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