Class 12 Political Science Solutions Chapter 17 राष्ट्रीय एकीकरण

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. राष्ट्रीय एकीकरण की परिभाषा लिखो। इसके रास्ते में आने वाली समस्याओं का वर्णन करो।
(Define National Integration. Explain the difficulties faced in the way of National Integration.)
अथवा
राष्ट्रीय एकीकरण के रास्ते में आने वाली तीन रुकावटों का वर्णन करें तथा भारत में एकता बनाए रखने के लिए तीन सुझाव भी दें।
(Explain three obstacles in the way of National Integration and also give any three suggestions to maintain National Integration in India.)
अथवा
राष्ट्रीय एकीकरण की परिभाषा लिखो। भारत में इसकी समस्याओं को हल करने के लिए सुझाव लिखो।
(Define National Integration. Write suggestions to solve the Problems of National Integration in India.)
उत्तर-किसी भी राज्य की राष्ट्रीय अखण्डता तथा एकता उसके लिए सर्वोपरि होती है। कोई भी राज्य यह सहन नहीं कर सकता है कि उसकी राष्ट्रीय अखण्डता का विनाश हो। राष्ट्रीय अखण्डता राष्ट्रीय एकीकरण पर निर्भर करती है। राष्ट्रीय एकीकरण राज्य की प्रथम आवश्यकता है। राज्य के विकास के लिए यह आवश्यक है कि राज्य के अन्दर रहने वाले विभिन्न लोगों में एकता की भावना हो और यही भावना राष्ट्रीय एकीकरण का सार है। राष्ट्रीय का सम्बन्ध अनेकता में एकता स्थापित करना है। राष्ट्रीय एकीकरण की भावना द्वारा विभिन्न धर्मों, जातियों व भाषाओं के लोगों में परस्पर मेल-जोल बढ़ा कर एकता का विकास किया जाना है।

भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ० एस० राधाकृष्णन (Dr. S Radhakrishnan) के अनुसार, “राष्ट्रीय एकीकरण एक घर नहीं है जो चूने और ईंटों से बनाया जा सकता है। यह एक औद्योगिक योजना भी नहीं है जिस पर विशेषज्ञों द्वारा विचार किया जा सकता है और रचनात्मक रूप दिया जा सकता है। इसके विपरीत एकीकरण एक ऐसा विचार है जिसका विकास लोगों के दिलों में होता है। यह एक चेतना है जिससे जनसाधारण को जागृत करना है।” (‘National integration is not a house which could be built by mortar and bricks. It is not an industrial plan. which could be discussed and implemented by experts. Integration, on the contrary, is a thought which must go into the heart of the people. It is the consciousness which must awaken the people at large.”’)

प्रो० माइरन वीनर (Myron Weiner) के अनुसार, “राष्ट्रीय एकीकरण का अभिप्राय उन विघटनकारी आन्दोलनों पर निगरानी रखना है जो राष्ट्र को खण्डित कर सकते हों और सम्पूर्ण समाज में ऐसी अभिवृत्तियों का होना है जो संकीर्ण हितों की अपेक्षा राष्ट्रीय और सार्वजनिक हितों को प्राथमिकता देती है।”

एच० ए० गन्नी (H.A. Gani) के अनुसार, “राष्ट्रीय एकीकरण एक ऐसी सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और शैक्षणिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा लोगों के दिलों में एकता, दृढ़ता और सम्बद्धता की भावना विकसित होती हो और उनमें सामान्य नागरिकता की भावना अथवा राष्ट्र के प्रति वफ़ादारी की भावना का विकास होता है।” (“National integration is a socio-psychological and educational process through which a feeling of unity, solidarity and cohesion develops in the hearts of people and a sense of common citizenship or feeling of loyality to the nation is fostered among them.”)

भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधाएं (OBSTACLES IN THE WAY OF NATIONAL INTEGRATION IN INDIA)-

जैसा कि प्रारम्भ में ही कहा जा चुका है कि भारत में अनेक विभिन्नताएं हैं, ये सभी विभिन्नताएं वास्तव में राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधाएं बनती हैं। इसका वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है

1. भाषा (Language)-भारत एक बहुभाषी राज्य है तथा सदैव से ही रहा है, भाषा की समस्या राष्ट्रीय अखण्डता के लिए खतरा बन चुकी है। भाषा को लेकर विभिन्न क्षेत्रों के लोगों में तनाव बढ़ता है। यूं तो हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा बनाया गया है पर अहिन्दी भाषी प्रान्तों में हिन्दी विरोधी आन्दोलनों को जन्म दिया। यही कारण है कि आज भी राजकाज की भाषा अंग्रेज़ी ही चली आ रही है। यद्यपि सरकार ने इसके समाधान के लिए कुछ कदम उठाए हैं जैसा कि त्रि-भाषायी फार्मूला, पर इसको कोई अधिक सफलता नहीं मिल पाई है।

2. क्षेत्रवाद (Regionalism) क्षेत्रवाद या प्रादेशिकता का अर्थ है कि सारे की अपेक्षा किसी एक विशेष क्षेत्र के प्रति निष्ठा रखना। भारत में प्रादेशिकता की यह समस्या अत्यन्त गम्भीर है तथा एक देशव्यापी सिद्धान्त बन गया है। यह राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में एक बहुत बड़ी बाधा बन गया है। इसके विकास के तीन प्रमुख कारण हैं। सर्वप्रथम इसका कारण ऐसा औद्योगिक या आर्थिक विकास जिसके कारण साधारण व्यक्ति को बहुत कम लाभ हुआ है। लोगों को बताया गया था कि उनके कष्टों का कारण ब्रिटिश शासन है तथा स्वतन्त्रता के बाद एक खुशहाल तथा सम्पन्न युग का प्रारम्भ होगा, पर ये सभी वायदे झूठे निकले तथा लोगों को सिवाए निराशा, कठिनाइयों व शोषण के कुछ नहीं मिला। दूसरा कारण था कि पिछड़े हुए क्षेत्रों के लोगों ने यह अनुभव करना आरम्भ कर दिया कि कारखाने या उद्योग लगाने में, रोज़गार की सुविधाएं उपलब्ध करवाने में, बांधों-पुलों इत्यादि के निर्माण में तथा केन्द्रीय अनुदान प्रदान करने में उनको अनदेखा किया जा रहा है। तीसरा इसका कारण यह भी रहा कि कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं ने शक्ति के लिए नंगा नाच करना प्रारम्भ कर दिया। इसमें वे कभी-कभी क्षेत्रवाद का प्रचार करने से भी न चूकते थे। इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत में क्षेत्रीयवाद का काफ़ी बोलबाला है। यह राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधा तो है ही साथ-ही-साथ राष्ट्रीयता अखण्डता के लिए सीधा खतरा भी है।

3. साम्प्रदायिकतावाद (Communalism)-अंग्रेजी शासन से पहले भारत में साम्प्रदायिकता देखने को नहीं मिलती थी यद्यपि युद्ध होते थे पर वे राजाओं के बीच थे। जनता में कटुता की भावना न थी। अकबर जैसा सम्राट तो हिन्दू-मुस्लिम एकता का समर्थक था। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि भारत में साम्प्रदायिकता फैलाने का कार्य अंग्रेज़ों ने किया उनके द्वारा यहा फूट डालो राज्य करो की नीति अपनाई गई। क्योंकि उन्होंने सत्ता मुसलमानों से छीनी थी इसलिए प्रारम्भ में उन्होंने मुसलमान विरोधी तथा हिन्दू समर्थक नीति को अपनाथा। बाद में जब उन्हें मुसलमानों से कोई डर न रहा तो उनकी नीति मुसलमान समर्थक तथा हिन्दू विरोधी हो गई। उन्होंने साम्प्रदायिकता चुनाव प्रणाली को प्रारम्भ किया। यही साम्प्रदायिकता की आग धीरे-धीरे इतनी बढ़ी कि सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा एक लेखक शायर इकबाल भी पाकिस्तान के नारे लगाने लगा। जिन्नाह ने द्वि-राष्ट्रीय सिद्धान्त को अपनाया। इस प्रकार इसका अन्त अत्यधिक खून-खराबे के बाद भारत विभाजन तथा पाकिस्तान के निर्माण के रूप में हुआ। स्वतन्त्रता के पश्चात् भी यह आग ठण्डी न हुई। जो मुसलमान भारत में रह गए वे अल्प मत में होने के कारण अपने प्रति दुर्व्यवहार की शिकायत करते हैं। हिन्दू-मुसलमानों में तनाव यदा-कदा बढ़ता रहता है तो साम्प्रदायिक दंगे होते हैं। जिनमें न जाने कितनी जानें चली जाती हैं। कभी कानपुर, कभी मुरादाबाद, कभी मेरठ तो कभी दिल्ली में ये दंगे होते ही रहते हैं। महाराष्ट्र में भी हिन्दू-मुस्लिम फसाद होते रहते हैं। भारत में राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के कारण साम्प्रदायिक दंगे-फसाद में वृद्धि हुई जोकि राष्ट्रीय एकता के लिए खतरनाक है। 6 दिसम्बर, 1992 को बाबरी मस्जिद को कार सेवकों ने गिरा दिया जिसके बाद देश के अनेक भागों में भीषण साम्प्रदायिक दंगे फसाद हुए। 2002 में गुजरात में साम्प्रदायिक दंगे हुए।

4. जातिवाद (Casteism) जातिवाद की समस्या ने भी राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधा पहुंचाई है। इस समस्या के सम्बन्ध में प्रथम राष्ट्रीय एकीकरण सम्मेलन में भाषण करते हुए तत्कालीन उप-राष्ट्रपति डॉ० राधाकृष्णन ने कहा था, “यद्यपि जाति का एक सामाजिक बुराई के रूप में अन्त हो रहा है, तथापि अब उसने एक राजनीतिक और प्रशासकीय बुराई का रूप धारण कर लिया है। हम जाति के प्रति निष्ठाओं को चुनाव जीतने के लिए नौकरियों में अधिक लोगों को रखने के लिए प्रयोग कर रहे हैं।”

श्री जयप्रकाश नारायण ने एक बार कहा था, “भारत में जाति सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक दल है।” जातीय संगठनों ने भारत की राजनीति में वही हिस्सा लिया है जो पश्चिमी देशों में विभिन्न हितों व वर्गों ने लिया है। चुनाव के समय उम्मीदवारों का चयन जाति के आधार पर किया जाता है और चुनाव प्रचार में जाति पर वोटें मांगी जाती हैं। प्रशासन में भी जातीयता का समावेश हो गया है।

5. ग़रीबी (Poverty)—ग़रीबी राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में महत्त्वपूर्ण बाधा है। भारतीय समाज की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता ग़रीबी है। ग़रीब व्यक्ति अपने आपको और अपने परिवार को जीवित रखने के लिए संघर्ष में जुटा रहता है। जब एक ग़रीब व्यक्ति या ग़रीब वर्ग किसी दूसरे व्यक्ति या वर्ग को खुशहाल पाता है तो उसमें निराशा और घृणा की भावना उत्पन्न होती है और राजनीतिज्ञ ऐसे अवसरों का लाभ उठाकर आन्दोलन करवाते हैं। जो क्षेत्र आर्थिक दृष्टि से पिछड़े होते हैं वह आर्थिक विकास के लिए आन्दोलन करते हैं और कई बार अलग राज्य की मांग भी करते हैं।

6. सभी राजनीतिक दल संविधान के मूल मूल्यों पर सहमत नहीं (An the Political Parties do not accept the basic values of Constitution)-सभी राजनीतिक दल संविधान में निहित मूल मूल्यों (Basic Values) पर सहमत नहीं है। विशेषकर साम्यवादी और साम्प्रदायिकतावादी दल संविधान के मूल मूल्यों में विश्वास नहीं रखते। साम्यवादियों ने जब पश्चिमी बंगाल और केरल में सरकारें बनाईं तो उन्होंने सार्वजनिक रूप में घोषणा की थी कि उन्होंने संविधान को तोड़ने के उद्देश्य से सरकारें बनाई हैं। साम्प्रदायिक दल धर्म-निरपेक्षता में विश्वास नहीं रखते जो कि संविधान का आधारभूत सिद्धान्त है।

7. अनपढ़ता (Illiteracy)-भारत की अधिकांश जनता अशिक्षित है, जिसके स्वार्थी नेता अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए आम जनता को आसानी से मनचाहे रास्ते पर ले जाते हैं और अनपढ़ जनता स्वार्थी नेताओं की बातों में आकर आन्दोलन के पथ पर चल पड़ती है। कई बार आन्दोलनकारियों को यह भी पता होता कि उनके आन्दोलन का लक्ष्य क्या है और वे किस ओर जा रहे हैं ? स्वार्थी नेता धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र आदि के नाम पर सीधे-सीधे लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं और अपना उल्लू सीधा करते हैं।

8. समाजवाद की असफलता (Failure of Socialism) प्रो० गोविंदराम वर्मा के मतानुसार समाजवाद की असफलता ने भी राष्ट्रीय एकीकरण की समस्या को पैदा किया है। यदि समाजवाद सफल हो जाता तो आर्थिक विकास का फल सभी को चखने को मिलता। परन्तु अब बेरोज़गारी, पिछड़ापन, गरीबी, आर्थिक असमानता आदि ऐसे ही विघटनकारी आर्थिक तत्त्व हैं जो देश में भावनात्मक एकता पैदा नहीं करने देते, जिससे गम्भीर राजनीतिक समस्याएं उठ खड़ी होती हैं और देश की राजनीतिक व्यवस्था को भी खतरा पहुंचता है।

9. दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली (Defective Educational System) भारत की शिक्षा प्रणाली दोषपूर्ण है। हमारी शिक्षा प्रणाली विद्यार्थियों में चरित्र का निर्माण और अनुशासन कायम करने में सफल नहीं हुई। नैतिक और राष्ट्रीय मूल्यों का विकास नहीं हो रहा। इसका एक महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि अधिकांश शिक्षा संस्थाएं व्यक्तिगत व्यक्तियों तथा संस्थाओं के हाथ में है। भारतीय शिक्षा प्रणाली राष्ट्रीय एकीकरण की भावना विकसित करने में सफल नहीं रही।

10. असन्तुलित क्षेत्रीय विकास (Unbalanced Regional Development)-भारत के सभी क्षेत्रों का एकजैसा विकास नहीं हुआ है। कुछ क्षेत्रों का बहुत अधिक विकास हुआ है जबकि कुछ क्षेत्र आज भी पिछड़े हुए हैं। पिछड़े हुए क्षेत्रों के लोगों में यह भावना विकसित हो गई है कि सरकार उनके साथ भेदभाव कर रही है और यदि ये अलग हो जाएं तो अपना विकास कर सकेंगे। अतः असन्तुलित क्षेत्रीय विकास राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधा है।

11. आन्दोलनों और हिंसा की राजनीति (Politics of Agitations and Violence)-पिछले कुछ वर्षों से भारत की राजनीति में आन्दोलन और हिंसा में वृद्धि हुई है। संविधान शान्तिपूर्वक साधनों द्वारा विरोध प्रकट करने का अधिकार देता है, पर राजनीति में हिंसा की घटनाएं दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। राजनीतिक हत्याओं में बहुत वृद्धि हुई है। चुनावों में कई स्थानों पर मतदान केन्द्रों पर कब्जा करने के लिए बमों, बन्दूकों, छुरों-भालों आदि का खुलेआम प्रयोग किया जाता है। अतः आन्दोलनों और हिंसा की राजनीति राष्ट्रीय एकीकरण के लिए एक गम्भीर खतरा है।

12. भ्रष्टाचार (Corruption)-भारतीय प्रशासन की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता भ्रष्टाचार है और इसने भी राष्ट्रीय एकीकरण में बाधा पहुंचाई है। प्रशासन में भ्रष्टाचार का बोलबाला है और चारों तरफ भाई-भतीजावाद चल रहा है, जिस कारण जनता का विश्वास प्रशासन के प्रति नहीं रहा। इसके फलस्वरूप दंगे-फसाद होते हैं जो राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधक हैं। हिंसा और अराजकतावाद के वातावरण ने राष्ट्रीय एकीकरण की समस्या को और अधिक गम्भीर बनाया है।

13. सरकार की नीति (Government’s Policy) सरकार की नीति भी राष्ट्रीय एकीकरण की समस्या के मार्ग में बाधा बनी हुई है। सरकार राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधक तत्त्वों को नष्ट करने में सफल नहीं हुई। यद्यपि कांग्रेसी नेता जातिवाद, क्षेत्रीयवाद, साम्प्रदायिकता आदि के विरुद्ध आवाज़ उठाते रहते हैं परन्तु व्यवहार में कांग्रेस ने जातिवाद और क्षेत्रीयवाद को बढ़ावा ही दिया है। यह भी कहा जाता है कि सरकार सख्ती से कार्यवाही नहीं करती क्योंकि उसे उन लोगों के मत भी प्राप्त करने होते हैं। कांग्रेस सरकार ने मुसलमानों के प्रतिसदैव ढीली नीति अपनाई है क्योंकि साधारणत: मुस्लिम वोट कांग्रेस के ही समझे जाते हैं।

14. क्षेत्रीय दल (Regional Parties) क्षेत्रीय दलों में वृद्धि राष्ट्रीय एकीकरण के लिए समस्या है। भारत में राष्ट्रीय दलों के मुकाबले में क्षेत्रीय दलों की संख्या बहुत अधिक है। 2016 में चुनाव आयोग ने 53 राजनीतिक दलों को राज्य स्तर के दलों के रूप में मान्यता प्रदान की। वर्तमान समय में क्षेत्रीय दलों का महत्त्व बहुत बढ़ गया है। क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय हित को महत्त्व न देकर क्षेत्रीय हितों पर जोर देते हैं। क्षेत्रीय दल अपने राजनीतिक लाभ के लिए लोगों की क्षेत्रीय भावनाओं को भड़काते हैं। आजकल कई राज्यों में क्षेत्रीय दल सत्ता में हैं। क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय हित को हानि पहुंचाते हैं।

15. विदेशी ताकतें (Foreign Powers)-विदेशी ताकतें कुछ वर्षों से भारत में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रही हैं। भूतपूर्व प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने कई बार कहा कि विदेशी ताकतों से भारत की एकता व अखण्डता को खतरा है। पाकिस्तान खुले रूप में पंजाब और जम्मू-कश्मीर के आतंकवादियों को आधुनिक हथियार और वित्तीय सहायता दे रहा है।

16. आतंकवाद (Terrorism)—आतंकवाद पिछले कुछ वर्षों से भारत की एकता व अखण्डता के लिए खतरा बना हुआ है।
राष्ट्रीय एकीकरण की समस्याओं को दूर करने के उपाय-इसके लिए प्रश्न नं० 2 देखें।

प्रश्न 2. भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के रास्ते में आने वाली रुकावटों को दूर करने के सुझाव दीजिए।
(Give suggestions to remove hindrances which come in the way of National Integration in India.)
उत्तर- भारत की एकता व अखण्डता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय एकीकरण अति आवश्यक है। बिना राष्ट्रीय एकीकरण के राष्ट्रीय अखण्डता को कायम नहीं रखा जा सकता। अतः राष्ट्रीय अखण्डता को बनाए रखने के लिए उन बाधाओं को दूर करना आवश्यक है जो राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में रोड़ा अटकाए हुए हैं। इन बाधाओं को दूर करने के लिए निम्नलिखित उपाय हैं-

1. आर्थिक विकास (Economic Development)-राष्ट्रीय एकीकरण लाने के लिए देश का आर्थिक विकास करना अति आवश्यक है। बेरोजगारी को दूर करके, आर्थिक विषमता को कम करके, गरीबी को दूर करके तथा आर्थिक लाभों को न्यायपूर्ण ढंग से वितरित करके ही राष्ट्रीय एकीकरण की सम्भावना को बढ़ाया जा सकता है।

2. राजनीतिक वातावरण में सुधार (Reforms in Political Atmosphere)-राष्ट्रीय अखण्डता को बनाए रखने के लिए देश के राजनीतिक वातावरण में सुधार करने भी ज़रूरी है। आज देश के विभिन्न सम्प्रदायों, जाति क्षेत्र के लोगों में एक-दूसरे के प्रति वांछित विश्वास का अभाव है। इस अविश्वास की स्थिति में राष्ट्रीय एकता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अतः राष्ट्रीय एकीकरण के लिए विभिन्न जातियों सम्प्रदायों एवं क्षेत्रों में विश्वास की भावना उत्पन्न करने के लिए राजनीतिक वातावरण में सुधार होना चाहिए।

3. समुचित शिक्षा व्यवस्था (Proper Education System)-समुचित शिक्षा व्यवस्था राष्ट्रीय एकीकरण लाने के लिए महत्त्वपूर्ण साधन है। शिक्षा प्रणाली देश की आवश्यकताओं के अनुकूल होनी चाहिए। शिक्षा प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जिससे साम्प्रदायवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद आदि की समस्याओं को हल किया जा सके। विभिन्न स्तरों पर पाठ्यक्रम ‘ऐसे होने चाहिए जिससे विद्यार्थियों में यह चेतना पैदा हो कि वे पहले भारतीय हैं और बाद में पंजाबी, बंगाली एवं मराठी हैं। पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जो विद्यार्थियों में धर्म-निरपेक्ष दृष्टिकोण विकसित करने में सहायक हो।

4. भाषायी समस्या का समाधान (Solution of Linguistic Problem)-राष्ट्रीय एकीकरण को बनाए रखने के लिए भाषायी समस्या का समाधान करना अति आवश्यक है। राज्यों के पुनर्गठन पर पुनः विचार किया जाना चाहिए और जिन लोगों की भाषा के आधार पर मांग उचित है उस राज्य की स्थापना की जानी चाहिए। यह ठीक है कि हिन्दी को हिन्दी विरोधी लोगों पर नहीं थोपना चाहिए। यह राष्ट्रीय एकीकरण के विकास के लिए राष्ट्र भाषा का विकसित होना अति आवश्यक है। त्रि-भाषायी फार्मूले को सही ढंग से लागू किया जाना चाहिए।

5. सन्तुलित आर्थिक विकास (Balanced Economic Development)-राष्ट्रीय एकीकरण के विकास के लिए यह आवश्यक है कि देश के सभी क्षेत्रों का योजनाबद्ध आर्थिक विकास किया जाए। पिछड़े हुए क्षेत्रों का विकास बड़ी तेज़ी से किया जाना चाहिए।

6. धर्म निरपेक्षता को वास्तविक बनाना (Secularism should be real) यद्यपि संविधान द्वारा भारत को एक धर्म-निरपेक्ष राज्य घोषित किया गया है, परन्तु इसे व्यावहारिक रूप देना अति आवश्यक है। लोगों में एक-दूसरे के धर्म के प्रति सहिष्णुता विकसित करना ज़रूरी है। यदि सरकारी कर्मचारी किसी धर्म विशेष के अनुयायियों के साथ पक्षपात करते पाए जाएं तो उनको कठोर दण्ड दिया जाना चाहिए।

7. भ्रष्टाचार को दूर करना (To remove Corruption) राष्ट्रीय एकीकरण लाने के लिए प्रशासन में भ्रष्टाचार समाप्त करना आवश्यक है। भाई-भतीजावाद बन्द होना चाहिए।

8. सांस्कृतिक आदान-प्रदान-राष्ट्रीय एकीकरण लाने के लिए विभिन्न भाषायी समुदायों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान अधिक-से-अधिक होना चाहिए। ऐसी संस्कृति का विकास होना चाहिए जो हमारे आधुनिक समाज के अनुरूप हो।

9. राजनीतिक दलों का योगदान (Contribution of Political Parties)-राष्ट्रीय एकता व अखण्डता को बनाए रखने के लिए राजनीतिक दलों का सहयोग अनिवार्य है। राजनीतिक दलों को अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए, धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्रीय भावनाओं को नहीं भड़काना चाहिए। राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय एकीकरण के लिए एक स्वस्थ जनमत का निर्माण करना चाहिए।

10. सरकार की नीतियों में परिवर्तन (Change in the Policies of Government)-राष्ट्रीय एकीकरण के लिए केन्द्रीय सरकार को अपनी नीतियों में परिवर्तन करना होगा। सरकार को भेदभाव की नीति का त्याग करना होगा। कोई भी निर्णय लेते समय सरकार को यह नहीं सोचना चाहिए कि अमुक राज्य उसी के दल द्वारा शासित है अथवा नहीं। सरकार को लोगों की उचित मागों को तुरन्त स्वीकार कर लेना चाहिए ताकि जनता को आन्दोलन करने का अवसर न मिले। जब सरकार आन्दोलन के बाद मांगों को मानती है तो उससे लोगों में यह धारणा बन जाती है कि सरकार शक्ति की भाषा ही समझती है।

11. साम्प्रदायिक संगठनों पर प्रतिबन्ध (Restrictions on Communal Organisation)-राष्ट्रीय अखण्डता व एकता को बनाए रखने के लिए साम्प्रदायिक संगठनों एवं दलों पर कठोर प्रतिबन्ध लगाने चाहिए। परन्तु इसके साथसाथ ही आवश्यक है कि आम जनता को इस प्रकार के प्रतिबन्धों के औचित्य के सम्बन्धों में प्रशिक्षित किया जाए।

12. राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान (Respect for National Symbols)-राष्ट्रीय एकता अखण्डता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि सभी भारतीय राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करें। राष्ट्रीय झण्डे और राष्ट्रीय गीत का सम्मान करना सभी का कर्त्तव्य है।

13. सिद्धान्तों पर आधारित राजनीति (Value Based Politics)-राष्ट्रीय एकीकरण के विकास के लिए यह आवश्यक है कि राजनीतिक सिद्धान्तों व मूल्यों पर आधारित होनी चाहिए। राजनीतिज्ञों को धर्म, जाति, भाषा, अल्पसंख्या आदि की राजनीति से मुक्त होना पड़ेगा। पिछले कुछ वर्षों से कुछ नेताओं ने मूल्यों पर आधारित राजनीति की बात कह है पर आवश्यकता इसको अपनाने की है।

14. भावनात्मक एकीकरण (Emotional Integration) राष्ट्रीय एकीकरण के विकास के लिए भावनात्मक एकीकरण का होना आवश्यक है। भावनात्मक एकीकरण को देखा नहीं जा सकता और न ही खरीदा जा सकता है। यह भावना तो लोगों के दिलों में पाई जाती है और इसका विकास भी लोगों के मन और दिलों में होना चाहिए। लोगों के सामने देश प्रेम, त्याग, बलिदान आदि के आदर्श रखे जाने चाहिए ताकि सभी लोगों में भातृभाव व प्रेम की भावना विकसित हो।

15. अमीरी एवं ग़रीबी का अन्तर कम करना (To Narrow the gap between Rich and Poor) भारत में राष्ट्रीय एकता बनाये रखने के लिए आवश्यक है, कि अमीरी एवं ग़रीबी के अन्तर को कम किया जाए।

16. सस्ता एवं सरल न्याय (Cheap and efficient Justice)-भारत में न्यायिक प्रक्रिया महंगी एवं जटिल होने से कारण गरीब लोगों को न्याय नहीं मिल पाता, जिससे उनका राजनीतिक व्यवस्था से विश्वास उठने लगता है। अत: सरकार को चाहिए कि लोगों को सस्ता एवं सरल न्याय उपलब्ध करवाएं।

प्रश्न 3. भारत के राष्ट्रीय एकीकरण की समस्या के बारे में आप क्या जानते हैं ? भारत के द्वारा राष्ट्रीय एकीकरण करने के लिए आज तक क्या कदम उठाए गए हैं ?
(What do you know by the problem of Indian National Integration ? What steps have been taken towards Indian National Integration ?).
अथवा
भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के लिए क्या कदम उठाए गए हैं ? (What steps have been taken towards Indian National Integration ?)
उत्तर-राष्ट्रीय एकीकरण का अर्थ-इसके लिए प्रश्न नं० 1 देखिए।

राष्ट्रीय एकीकरण के लिए किए गए प्रयत्न (EFFORTS TOWARDS NATIONAL INTEGRATION)-

राष्ट्रीय एकीकरण लाने के लिए किए गए प्रयत्नों को हम तीन भागों में बांट सकते हैं-

(1) सरकार द्वारा बनाए गए कानून।
(2) सरकारी तथा औपचारिक संगठनों द्वारा किए गए कार्य।
(3) अनौपचारिक संगठनों द्वारा किए गए कार्य।

1. सरकार द्वारा बनाए गए कानून-1961 में साम्प्रदायिक प्रचार पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए दो कानून पास किए। एक कानून द्वारा ऐसे किसी भी कार्य को कानून द्वारा दण्डनीय बना दिया गया जिससे विभिन्न धार्मिक मूल वंश पर आधारित अथवा भाषायी समुदायों अथवा जातियों के बीच शत्रुता और घृणा फैलती हो। दूसरे कानून द्वारा चुनाव में, धर्म मूल वंश, सम्प्रदाय, जाति अथवा भाषायी भावनाओं को उभारना दण्डनीय अपराध बना दिया गया। इन कानूनों में यह भी व्यवस्था की गई है कि जिस व्यक्ति को इस कानून के अन्तर्गत दण्ड मिलेगा। वह न तो चुनाव में मतदान कर सकता है और न ही चुनाव लड़ सकता है। 1963 में 16वां संशोधन किया गया। इस संशोधन का उद्देश्य भारत की अखण्डता और प्रभुसत्ता को सुरक्षित रखने से है। इस संशोधन द्वारा यह निश्चित किया गया कि राज्य विधानमण्डल या संसद् का चुनाव लड़ने से पहले तथा चुने जाने के बाद प्रत्येक उम्मीदवार को यह शपथ लेनी पड़ती है कि मैं भारतीय संविधान के प्रति वफ़ादार रहूंगा और भारत की अखण्डता व प्रभुसत्ता को बनाए रखूगा। 42वें संशोधन द्वारा प्रस्तावना में संशोधन करके राष्ट्र की एकता के साथ अखण्डता (Integrity) शब्द जोड़ा गया है।

2. सरकारी या औपचारिक संगठनों द्वारा किए गए कार्य-सरकार ने राष्ट्रीय एकीकरण का विकास करने के लिए निम्नलिखित प्रयास किए हैं
राष्ट्रीय एकीकरण सम्मेलन 1961 (National Integration Conference 1961)-नई दिल्ली में 28 सितम्बर से 1 अक्तूबर, 1961 तक राष्ट्रीय एकीकरण सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए सभी राजनीतिक दलों के नेताओं, प्रमुख शिक्षा शास्त्रियों, लेखकों और वैज्ञानिकों को आमन्त्रित किया गया। इस सम्मेलन का मत था कि राजनीतिक दलों ने सम्प्रदायवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद आदि को बढ़ावा देने में प्रोत्साहन दिया है। इसलिए सम्मेलन ने राजनीतिक दलों के लिए एक आचार संहिता पर बल दिया। इस संहिता में निम्नलिखित बातें कही गईं-

  • किसी भी दल को कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जिससे विभिन्न धर्मों एवं भाषायी समुदायों में घृणा पैदा हो या उनके बीच तनाव उत्पन्न हो।
  • राजनीतिक दलों को साम्प्रदायिक, जातिगत, क्षेत्रीय अथवा भाषायी समस्याओं पर कोई ऐसा आन्दोलन शुरू नहीं करना चाहिए जिससे शान्ति के लिए कोई खतरा पैदा होता हो।
  • राजनीतिक दलों को अन्य दलों द्वारा आयोजित सभाओं, प्रदर्शनों आदि को तोड़ने के कोई काम नहीं करने चाहिए।
  • सरकार को नागरिक स्वतन्त्रताओं पर कोई अनुचित प्रतिबन्ध नहीं लगाने चाहिए और न ही उसे कोई ऐसा कार्य करना चाहिए जिससे राजनीतिक दलों की सामान्य गतिविधियों में बाधाएं उत्पन्न होती हों।
  • दलगत हितों की प्राप्ति के लिए राजनीतिक सत्ता को प्रयोग में नहीं लाया जाना चाहिए। सम्मेलन ने यह सुझाव दिया कि शिक्षा को समवर्ती सूची में स्थान दिया जाए ताकि शिक्षा में एकरूपता लायी जा सके।

राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् (National Integration Council)-राष्ट्रीय एकीकरण सम्मेलन, 1961 में ही राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् की भी रचना की गई जिसमें प्रधानमन्त्री, गृहमन्त्री, राज्यों के मुख्यमन्त्री, राजनीतिक दलों के सात नेता, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष, दो शिक्षा शास्त्री, अनुसूचित जातियों और जन-जातियों का आयुक्त तथा प्रधानमन्त्री द्वारा मनोनीत सात व्यक्तियों को स्थान दिया गया। इस परिषद् को सामान्य जनता, प्रेस तथा विद्यार्थियों के लिए आचार-संहिता बनाने का काम दिया गया। इस परिषद् का कार्य अल्पसंख्यकों की शिकायतों पर विचार करना भी था। भूतपूर्व प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् को राष्ट्रीय एकीकरण के सभी पहलुओं पर विचार करने और उसके बारे में अपनी सिफ़ारिशें पेश करने का निर्देश दिया था।

राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् का पुनर्गठन-राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् का समय-समय पर पुनर्गठन किया गया। 12 अप्रैल, 2010 को राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् का पुनर्गठन किया गया। 147 सदस्यीय परिषद् में 14 प्रमुख केन्द्रीय मंत्रियों सहित विपक्षी दल के नेता भी शामिल किए गए।
राष्ट्रीय एकता परिषद् की बैठक-सितम्बर, 2013 को राष्ट्रीय एकता परिषद् की महत्त्वपूर्ण बैठक नई दिल्ली में हुई। इस बैठक में मुजफ्फरनगर दंगों के साम्प्रदायिक हिंसा का मुद्दा छाया रहा। प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने राज्यों को साम्प्रदायिक हिंसा से निपटने के लिए कठोर कार्यवाही करने को कहा।

3. अनौपचारिक संगठनों द्वारा किए गए कार्य-अनौपचारिक संगठनों में दो संगठन महत्त्वपूर्ण(1) इन्सानी बिरादरी तथा (2) अखिल भारतीय साम्प्रदायिकता विरोधी समिति। इन्सानी बिरादरी की स्थापना अगस्त, 1970 में की गई। श्री जय प्रकाश नारायण को इस संगठन का अध्यक्ष और शेख अब्दुल्ला को इसका उपाध्यक्ष बनाया गया, परन्तु इन संगठनों को साम्प्रदायिक संगठन कहा गया। अखिल भारतीय साम्प्रदायिकता विरोध समिति की नेता श्रीमती सुभद्रा जोशी थी। इस संगठन का विश्वास है कि देश में साम्प्रदायिक दंगों के लिए साम्प्रदायिकतावाद की संगठित शक्तियां उत्तरदायी हैं और इनमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सबसे अधिक प्रमुख है। इस समिति का छठा सम्मेलन 1974 में दिल्ली में हुआ। इस सम्मेलन में साम्प्रदायिक संगठनों पर कानून प्रतिबन्धों के लगाने की बात कही गई। इस समिति में कहा है कि जनसंघ जैसे साम्प्रदायिक संगठनों के प्रतिबन्धों को राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् में स्थान नहीं दिया जाना चाहिए तथा शिक्षा प्रणाली को धर्म-निरपेक्ष बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष (Conclusion)-संक्षेप में, राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में अनेक बाधाएं हैं, जिनसे राष्ट्रीय अखण्डता व एकता को खतरा पैदा हो गया है। आज देश को कमजोर करने वाली पृथक्कतावादी तथा साम्प्रदायिक ताकतों का कड़ाई से मुकाबला करना चाहिए।

प्रश्न 4. भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के विभिन्न पहलुओं का विस्तार सहित वर्णन करो। (Write different aspects of National Integration in India in detail.)
उत्तर-आज भारतीय राष्ट्र की सबसे बड़ी समस्या राष्ट्रीय एकीकरण की है। भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के विभिन्न पक्ष इस प्रकार हैं

1. राष्ट्रीय एकीकरण का राजनीतिक पहल-राष्ट्रीय एकीकरण की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि देश के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों की राजनीतिक मांगों की ओर उचित ध्यान दिया जाए। राष्ट्रीय एकीकरण के लिए ऐसी सत्ता की स्थापना होनी चाहिए जिसके प्रति लोग वफ़ादार हों। भारतीय संघ के राज्यों का पुनर्गठन इसलिए भाषा के आधार पर किया गया है और आज भारत में 29 राज्य हैं। केन्द्र और राज्यों में जनता द्वारा निर्वाचित सरकारें हैं और उनमें जनता की निष्ठा हैं, परन्तु भारतीय जनता राजनीतिक दृष्टि से पूरी तरह सन्तुष्ट नहीं हैं। आज भी विभिन्न भागों में अलग राज्य की स्थापना की मांग चली आ रही है।

2. राष्ट्रीय एकीकरण का सामाजिक पहलू-राष्ट्रीय एकीकरण के सामाजिक पहलू का अर्थ यह है कि देश में सभी भागों का विकास हो और लोगों में बहुत अधिक आर्थिक असमानताएं नहीं होनी चाहिएं। देश के पिछड़े क्षेत्र का विकास करना अति आवश्यक है। राष्ट्र के सभी सदस्यों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों के साथ धर्म, जाति, रंग, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। भारत में यद्यपि संविधान के अन्तर्गत छुआछूत को समाप्त कर दिया गया है, परन्तु इसके बावजूद आज भी देश के कई भागों में जाति-पाति के भेदभाव को दूर करना आवश्यक है।

3. राष्ट्रीय एकीकरण का सांस्कृतिक पक्ष-भारत में विभिन्न संस्कृतियों के लोग रहते हैं। संविधान ने सभी अल्प-संख्यकों को अपनी संस्कृति, अपनी भाषा तथा लिपि को कायम रखने तथा विकसित करने की स्वतन्त्रता दी है। ऐसी संवैधानिक व्यवस्था के बावजूद भारत में रहने वाले अल्प-संख्यकों को यह सन्देह है कि भारत के बहु-संख्यक उनको संस्कृति को नष्ट करने के लिए प्रयत्नशील हैं। भारत के सांस्कृतिक अल्प-संख्यकों को यह सन्देह है कि भारत के बहु-संख्यक उनको अपनी ही संस्कृति में शामिल करने के इच्छुक हैं। अल्प-संख्यकों का ऐसा सन्देह राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में एक बाधा है तथा इस क्षेत्र को ही राष्ट्रीय एकीकरण का सांस्कृतिक पक्ष माना जाता है।

4. राष्ट्रीय एकीकरण का मनोवैज्ञानिक पक्ष-राष्ट्रीय एकीकरण कोई ऐसा भवन नहीं है जिसका निर्माण अच्छे भवन निर्माताओं द्वारा ईंटों तथा गारे से किया जा सकता है। राष्ट्रीय एकीकरण वास्तव में एक धारणा अथवा विचार है जिसका निवास लोगों के हृदयों में होना अनिवार्य है। यह एक ही राष्ट्र से सम्बन्धित होने की चेतना तथा भावना है। परन्तु भारत में व्याप्त साम्प्रदायिकता, जातिवाद, भाषायी, आतंकवाद तथा प्रान्तवाद के तत्त्व भारतीयों के हृदयों में ऐसी चेतना अथवा भावना विकसित नहीं होने देते हैं। ऐसी चेतना अथवा भावना के विकास की आवश्यकता को ही भारत में राष्ट्रीय एकीकरण का मनोवैज्ञानिक पक्ष माना जाता है।

5. राष्ट्रीय एकीकरण का आर्थिक पक्ष-राष्ट्रीय एकीकरण का आर्थिक पहलू इस बात की मांग करता है कि देश के सभी भागों का विकास हो और लोगों में बहुत अधिक आर्थिक असमानताएं नहीं होनी चाहिए। देश के पिछड़े क्षेत्रों का विकास करना अति आवश्यक है। राष्ट्रीय एकीकरण के लिए ग़रीबी और बेकारी को दूर करना आवश्यक है क्योंकि ग़रीब और बेरोज़गार व्यक्ति के लिए एकीकरण का कोई महत्त्व नहीं है। यदि अधिकांश जनता ग़रीब है और देश के अनेक क्षेत्र बहुत पिछड़े हैं तो राष्ट्रीय एकीकरण का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. राष्ट्रीय एकीकरण का अर्थ लिखो।
अथवा
राष्ट्रीय एकीकरण से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-राष्ट्रीय एकीकरण का साधारण अर्थ यह है कि एक देश में रहने वाले विभिन्न धर्मों, वर्गों, नस्लों तथा भाषाओं के लोगों में एक ही राष्ट्र से सम्बन्धित होने की भावना हो और वे अपने को एक अनुभव करते हों। राज्य के विकास के लिए यह आवश्यक है कि राज्य के अन्दर रहने वाले लोगों में एकता की भावना हो और यही भावना राष्ट्रीय एकीकरण का सार है। राष्ट्रीय एकीकरण का सम्बन्ध अनेकताओं में एकता स्थापित करना है। भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ० एस० राधाकृष्णन के अनुसार, “राष्ट्रीय एकीकरण एक घर नहीं जो चूने और ईंटों से बनाया जा सके। यह एक औद्योगिक योजना भी नहीं है जिस पर विशेषज्ञों द्वारा विचार किया जा सके। इसके विपरीत एकीकरण का ऐसा विचार है जिसका विकास लोगों के दिलों में होता है। यह एक चेतना है जिसने जनसाधारण को जागृत करना है।” एच० ए० गन्नी के मतानुसार, “राष्ट्रीय एकीकरण एक ऐसी सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और शैक्षणिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा लोगों के दिलों में एकता, दृढ़ता और सम्बद्धता की भावना विकसित होती है और उनमें सामान्य नागरिकता की भावना अथवा राष्ट्र के प्रति वफ़ादारी की भावना का विकास होता है।”

प्रश्न 2. भारत के लिए राष्ट्रीय एकीकरण की विशेष आवश्यकता क्यों है ?
उत्तर-राष्ट्रीय एकीकरण राज्य की पहली आवश्यकता है। राज्य के विकास के लिए यह ज़रूरी है कि राज्य के अन्दर रहने वाले विभिन्न लोगों के मध्य एकता की भावना हो और यह भावना राष्ट्रीय एकीकरण का सार है। स्वतन्त्रता के इतने वर्ष बाद भी भारत में राष्ट्रीय एकीकरण की समस्या पूरी तरह मौजूद है और यह भारत की राष्ट्रीय अखण्डता के लिए खतरा पैदा कर रही है। बहुत सारे राज्यों में पाई जाने वाली अलगाववादी प्रवृत्तियां, भाषायी भेदभाव, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, भ्रष्टाचार, क्षेत्रीयवाद, आन्दोलन व हिंसा, असन्तुलित क्षेत्रीय विकास आदि समस्याओं ने भारतीय एकीकरण को बहुत प्रभावित किया है। ये सभी बातें इसका सबूत है कि भारत की राष्ट्रीय एकीकरण की समस्याओं का स्वरूप गम्भीर है। इसका एक बड़ा कारण भारत का विशाल क्षेत्रफल है जिसमें जाति, भाषा, धर्म, सभ्याचारिक, रीति-रिवाज आदि अनेक भिन्नताएं मिलती हैं। कुछ स्वार्थी लोग या राजनीतिक दल इन समस्याओं के द्वारा जनता की भावनाओं को जनाधार प्राप्त करने के लिए भड़काते हैं और इस तरह राष्ट्रीय एकीकरण की समस्या को गम्भीर बनाकर देश की अखण्डता के वास्ते खतरा पैदा कर देते हैं। राष्ट्रीय एकीकरण के अभाव में ही हिन्दुस्तान का बंटवारा हुआ था और पाकिस्तान की स्थापना हुई थी जिसका मुख्य आधार धार्मिक था। अत: भारत को अपनी राष्ट्रीय एकता व अखण्डता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय एकीकरण की सख्त ज़रूरत है ताकि भारत इन समस्याओं का दृढ़तापूर्ण सामना कर सके।

प्रश्न 3. राष्ट्रीय एकीकरण के रास्ते में आने वाली किन्हीं चार बाधाओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के रास्ते में चार रूकावटें लिखें।
उत्तर- भारत में अनेक विभिन्नताएं हैं। ये सभी भिन्नताएं वास्तव में राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधाएं हैं। इनका वर्णन इस प्रकार है-

  • भाषा-भाषा की समस्या राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा बन चुकी है। भाषा को लेकर विभिन्न क्षेत्रों के लोगों में तनाव बढ़ता है।
  • क्षेत्रवाद–क्षेत्रवाद या प्रादेशिकता का अर्थ है कि सारे देश की अपेक्षा किसी एक विशेष क्षेत्र के प्रति निष्ठा रखना। भारत में प्रादेशिकता की यह समस्या अत्यन्त गम्भीर है।
  • सम्प्रदायवाद-सम्प्रदायवाद राष्ट्रीय एकीकरण में बहुत बड़ी बाधा है।
  • जातिवाद ने भी राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधा पैदा की है।

प्रश्न 4. साम्प्रदायिकता का राष्ट्रीय एकीकरण पर क्या प्रभाव है ?
अथवा
राष्ट्रीय एकीकरण के लिए साम्प्रदायिकता बाधा कैसे है?
उत्तर-आजकल भारत की महत्त्वपूर्ण समस्या साम्प्रदायिकता है। साम्प्रदायिकता ने राष्ट्रीय एकीकरण को बहुत अधिक प्रभावित किया है। साम्प्रदायिकता राष्ट्रीय एकीकरण के रास्ते में बहुत बड़ी बाधा है। साम्प्रदायिकता की भावना बढ़ने से लोगों की सोच साम्प्रदायिक रंग में रंगती जा रही है जिस कारण लोग राष्ट्र की अपेक्षा अपने-अपने सम्प्रदाय के प्रति अधिक वफ़ादार होते जा रहे हैं। साम्प्रदायिकता का तेजी से विकास होने के कारण राष्ट्रीय एकीकरण की गति धीमी हो गई है। साम्प्रदायिकता के प्रभाव के कारण लोग राष्ट्र की मुख्य धारा से दूर होते जा रहे हैं। साम्प्रदायिकता की समस्या को हल किए बिना राष्ट्रीय एकीकरण का ध्येय पूरा नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 5. इंसानी बिरादरी का निर्माण क्यों किया गया था ?
अथवा
इन्सानी बिरादरी से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-इन्सानी बिरादरी एक गैर-सरकारी संगठन है, जिसकी स्थापना 1970 में प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी खान अब्दुल गफ्फार खां (सरहदी गान्धी) की प्रेरणा से हुई। श्री जय प्रकाश नारायण को इस संगठन का अध्यक्ष तथा श्री शेख अब्दुला को उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य साम्प्रदायिक शक्तियों को नष्ट करके राष्ट्रीय भावना को विकसित करना था। सहनशीलता, आपसी समझ और सराहना (Toleration, Mutual Understanding and Appreciation) इस संगठन के तीन मूल तन्त्र थे परन्तु यह संगठन प्रभावी सिद्ध नहीं हुआ क्योंकि यह संगठन यह भी निश्चित नहीं कर पाया है कि देश में किन संगठनों को साम्प्रदायिक संगठन कहा जाए।

प्रश्न 6. राष्ट्रीय एकीकरण के राजनीतिक और सामाजिक पहलू का वर्णन करें।
अथवा
राष्ट्रीय एकीकरण के राजनीतिक पक्ष का क्या अर्थ है ?
उत्तर-1. राष्ट्रीय एकीकरण का राजनीतिक पहलू-राष्ट्रीय एकीकरण की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि देश के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों की राजनीतिक मांगों की ओर उचित ध्यान दिया जाए। राष्ट्रीय एकीकरण के लिए ऐसी सत्ता की स्थापना होनी चाहिए जिसके प्रति लोग वफ़ादार हो। भारतीय संघ के राज्यों का पुनर्गठन इसलिए भाषा के आधार पर किया गया है और आज भारत में 29 राज्य हैं। केन्द्र और राज्यों में जनता द्वारा निर्वाचित सरकारें हैं और उनमें जनता की निष्ठा है, परन्तु भारतीय जनता राजनीतिक दृष्टि से पूरी तरह सन्तुष्ट नहीं है। आज भी विभिन्न भागों में अलग राज्य की स्थापना की मांग चली आ रही है।

2. राष्ट्रीय एकीकरण का सामाजिक पहलू-राष्ट्रीय एकीकरण के सामाजिक पहलू का अर्थ यह है कि देश में सभी भागों का विकास हो और लोगों में बहुत अधिक आर्थिक असमानताएं नहीं होनी चाहिएं। देश के पिछड़े क्षेत्रों का विकास करना अति आवश्यक है। राष्ट्र से सभी सदस्यों के साथ समान व्यवहार होना चाहिएं। समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों के साथ धर्म, जाति, रंग, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। भारत में यद्यपि संविधान के अन्तर्गत छुआछूत को समाप्त कर दिया गया है, परन्तु इसके बावजूद आज भी देश के कई भागों में जाति-पाति के भेदभाव को दूर करना आवश्यक है।

प्रश्न 7. भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के मनौवज्ञानिक पक्ष से आपका क्या भाव है ?
अथवा
राष्ट्रीय एकीकरण का मनोवैज्ञानिक पक्ष क्या है ?
उत्तर-राष्ट्रीय एकीकरण कोई ऐसा भवन नहीं है जिसका निर्माण अच्छे भवन निर्माताओं द्वारा ईंटों तथा गारे से किया जा सकता है। राष्ट्रीय एकीकरण वास्तव में एक धारणा अथवा विचार है जिसका निवास लोगों के हृदयों में होना अनिवार्य है। यह एक ही राष्ट्र से सम्बन्धित होने की चेतना तथा भावना है। परन्तु भारत में व्याप्त साम्प्रदायिकता, जातिवाद, भाषायी आतंकवाद तथा प्रान्तवाद के तत्त्व भारतीयों के हृदयों में ऐसी चेतना अथवा भावना विकसित नहीं होने देते हैं। ऐसी चेतना अथवा भावना के विकास की आवश्यकता को ही भारत में राष्ट्रीय एकीकरण का मनोवैज्ञानिक पक्ष माना जाता है।

प्रश्न 8. राष्ट्रीय एकीकरणा के विकास में ‘शिक्षा’ क्या भूमिका निभा सकती है ?
उत्तर-राष्ट्रीय एकीकरण लाने के लिए शिक्षा महत्त्वपूर्ण साधन है। शिक्षा के द्वारा व्यक्ति में राजनीतिक चेतना पैदा होती है और शिक्षा प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जिससे साम्राज्यवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद आदि की समस्याओं को हल किया जा सके। शिक्षा द्वारा विद्यार्थियों में धर्म-निरपेक्ष-दृष्टिकोण विकसित किया जा सकता है। शिक्षा द्वारा विद्यार्थियों में यह भावना विकसित की जा सकती है कि वे पहले भारतीय और बाद में पंजाबी, बंगाली, मराठी आदि है।

प्रश्न 9. राष्ट्रीय एकीकरण के विकास के लिए चार सुझाव दीजिए।
उत्तर-राष्ट्रीय अखण्डता को बनाए रखने के लिए उन बाधाओं को दूर करना आवश्यक है जो राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधक हैं। इन बाधाओं को दूर करने के निम्नलिखित उपाय हैं-

  • आर्थिक विकास-राष्ट्रीय एकीकरण लाने के लिए देश का आर्थिक विकास करना अति आवश्यक है। बेरोज़गारी को दूर करके, आर्थिक विषमता को कम करके, ग़रीबी को दूर करके तथा आर्थिक लाभों को न्यायपूर्ण ढंग से वितरित करके ही राष्ट्रीय एकीकरण की सम्भावना को बढ़ाया जा सकता है।
  • राजनीतिक वातावरण में सुधार- राष्ट्रीय अखण्डता को बनाए रखने के लिए देश के राजनीतिक वातावरण में सुधार करना भी ज़रूरी है। अतः राष्ट्रीय एकीकरण के लिए विभिन्न जातियों, सम्प्रदायों एवं क्षेत्रों के विकास की भावना उत्पन्न करने के लिए राष्ट्रीय राजनीतिक वातावरण में सुधार होना चाहिए।
  • समुचित शिक्षा व्यवस्था-समुचित शिक्षा व्यवस्था राष्ट्रीय एकीकरण लाने के लिए महत्त्वपूर्ण साधन है।
  • भाषायी समस्या का समाधान-राष्ट्रीय एकीकरण को बनाए रखने के लिए भाषायी समस्या का समाधान करना अति आवश्यक है।

प्रश्न 10. भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय एकीकरण के लिए उठाए गए मुख्य कदमों का वर्णन कीजिए।
अथवा
राष्ट्रीय एकीकरण के विकास के लिए सरकार द्वारा उठाए गए किन्हीं चार उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-

  • 1961 में साम्प्रदायिक प्रचार पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए दो कानून पास किए गए। कानून द्वारा चुनाव में धर्म, मूल, वंश, सम्प्रदाय, जाति अथवा भाषायी भावनाओं को उभारना दण्डनीय अपराध बना दिया गया।
  • 1963 में संविधान में 16वां संशोधन किया गया। इस संशोधन का उद्देश्य भारत की अखण्डता और प्रभुसत्ता
    को सुरक्षित रखने से है।
  • 42वें संशोधन द्वारा प्रस्तावना में संशोधन करके राष्ट्र की एकता के साथ अखण्डता (Integrity) शब्द जोड़ा गया है।
  • सरकार ने 1961 में नई दिल्ली में राष्ट्रीय एकीकरण सम्मेलन का आयोजन किया। इस सम्मेलन में राष्ट्रीय एकीकरण को प्रोत्साहन देने के लिए राजनीतिक दलों के लिए एक आचार संहिता पर बल दिया गया।

प्रश्न 11. राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् क्या है ?
उत्तर-सितम्बर-अक्तूबर, 1961 में प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू की प्रेरणा पर नई दिल्ली में एक राष्ट्रीय एकीकरण सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में प्रधानमन्त्री, केन्द्रीय गृह मन्त्री, राज्यों के मुख्यमन्त्री, शिक्षा शास्त्री, प्रसिद्ध पत्रकार, विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता तथा सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों से जुड़े प्रसिद्ध व्यक्तियों ने भाग लिया। सम्मेलन में एक राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् (National Integration Council) का निर्माण किया गया। इस परिषद् में प्रधानमन्त्री के अलावा केन्द्रीय गृह मन्त्री, राज्यों के मुख्यमन्त्री, राजनीतिक दलों के सात नेता, दो शिक्षा शास्त्री, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का अध्यक्ष, अनुसूचित जातियों तथा जन-जातियों के कमिश्नर तथा प्रधानमन्त्री द्वारा नियुक्त सात अन्य लोगों को नियुक्त किया गया। इस परिषद् की समय-समय पर प्रधानमन्त्री की अध्यक्षता में बैठकें होती रहती हैं जिसमें राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए मार्ग खोजे जाते हैं।

प्रश्न 12. राष्ट्रीय एकीकरण के लिए जातिवाद किस प्रकार रुकावट बनता है ?
अथवा
राष्ट्रीय एकीकरण के लिए जातिवाद बाधा कैसे है?
उत्तर-जातिवाद की समस्या ने राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बहुत बाधा पहुंचाई है। इस समस्या के सम्बन्ध में प्रथम राष्ट्रीय एकीकरण सम्मेलन में भाषण करते हुए तत्कालीन उप-राष्ट्रपति डॉ० राधाकृष्णन ने कहा था, “यद्यपि जाति का एक सामाजिक बुराई के रूप में अन्त हो रहा है, तथापि अब उसने एक राजनीतिक और प्रशासकीय बुराई का रूप धारण कर लिया है। हम जाति के प्रति निष्ठाओं को चुनाव जीतने के लिए अथवा नौकरियों में अधिक लोगों को रखने के लिए प्रयोग कर रहे हैं।”

श्री जय प्रकाश नारायण ने एक बार कहा था, “भारत में जाति सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक दल है।” जातीय संगठनों ने भारत की राजनीति में वही हिस्सा लिया है जो पश्चिमी देशों में विभिन्न हितों व वर्गों ने लिया है। चुनाव के समय उम्मीदवारों का चयन जाति के आधार पर किया जाता है और चुनाव प्रचार में जाति पर वोटें मांगी जाती हैं। प्रशासन में भी जातीयता का समावेश हो गया है। राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा जातीय हितों को प्राथमिकता दी जा रही है।

प्रश्न 13. ग़रीबी राष्ट्रीय एकीकरण के रास्ते में कैसे रुकावट है ?
अथवा
राष्ट्रीय एकीकरण के लिए ग़रीबी बाधा कैसे है?
उत्तर-ग़रीबी राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में महत्त्वपूर्ण बाधा है। भारतीय समाज की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता ग़रीबी है। ग़रीब व्यक्ति अपने आपको और अपने परिवार को जीवित रखने के लिए संघर्ष में जुटा रहता है। जब एक ग़रीब व्यक्ति या ग़रीब वर्ग किसी दूसरे व्यक्ति या वर्ग को खुशहाल पाता है तो उसमें निराशा और घृणा की भावना उत्पन्न होती है और राजनीतिज्ञ ऐसे अवसरों का लाभ उठाकर आन्दोलन करवाते हैं। जो क्षेत्र आर्थिक दृष्टि से पिछड़े होते हैं वह आर्थिक विकास के लिए आन्दोलन करते हैं और कई बार अलग राज्य की मांग भी करते हैं।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. राष्ट्रीय एकीकरण से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-राष्ट्रीय एकीकरण का साधारण अर्थ यह है कि एक देश में रहने वाले विभिन्न धर्मों, वर्गों, नस्लों तथा भाषाओं के लोगों में एक ही राष्ट्र से सम्बन्धित होने की भावना हो और वे अपने को एक अनुभव करते हों। राज्य के विकास के लिए यह आवश्यक है कि राज्य के अन्दर रहने वाले लोगों में एकता की भावना हो और यही भावना राष्ट्रीय एकीकरण का सार है। राष्ट्रीय एकीकरण का सम्बन्ध अनेकताओं में एकता स्थापित करना है।

प्रश्न 2. राष्ट्रीय एकीकरण की कोई एक प्रसिद्ध परिभाषा बताएं।
उत्तर-डॉ० एस० राधाकृष्णन के अनुसार, “राष्ट्रीय एकीकरण एक घर नहीं जो चूने और ईंटों से बनाया जा सके। यह एक औद्योगिक योजना भी नहीं है जिस पर विशेषज्ञों द्वारा विचार किया जा सके। इसके विपरीत एकीकरण का ऐसा विचार है जिसका विकास लोगों के दिलों में होता है। यह चेतना है, जिसने जनसाधारण जो जागृत किया है।”

प्रश्न 3. राष्ट्रीय एकीकरण के रास्ते में आने वाली किन्हीं दो बाधाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-

  1. भाषा-भारत एक बहुभाषी राज्य है और सदैव से ही रहा है। भाषा की समस्या राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा बन चुकी है।
  2. क्षेत्रवाद-क्षेत्रवाद या प्रादेशिकता का अर्थ है कि सारे देश की अपेक्षा किसी एक विशेष क्षेत्र के प्रति निष्ठा रखना।

प्रश्न 4. राष्ट्रीय एकीकरण के मनोवैज्ञानिक पक्ष से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-राष्ट्रीय एकीकरण कोई ऐसा भवन नहीं है जिसका निर्माण अच्छे भवन निर्माताओं द्वारा ईंटों तथा गारे से किया जा सकता है। राष्ट्रीय एकीकरण वास्तव में एक धारणा अथवा विचार है जिसका निवास लोगों के हृदयों में होना अनिवार्य है। यह एक ही राष्ट्र से सम्बन्धित होने की चेतना तथा भावना है। परन्तु भारत में व्याप्त साम्प्रदायिकता, जातिवाद, भाषायी झगड़े, आतंकवाद तथा प्रान्तवाद के तत्त्व भारतीयों के हृदयों में ऐसी चेतना अथवा भावना विकसित नहीं होने देते हैं। ऐसी चेतना अथवा भावना के विकास की आवश्यकता को ही भारत में राष्ट्रीय एकीकरण का मनोवैज्ञानिक पक्ष माना जाता है।

प्रश्न 5. राष्ट्रीय एकीकरण के रास्ते में आने वाली रुकावटों को दूर करने के कोई दो उपाय लिखिए।
उत्तर-

  1. आर्थिक विकास-राष्ट्रीय एकीकरण लाने के लिए देश का आर्थिक विकास करना अति आवश्यक
  2. राजनीतिक वातावरण में सुधार-राष्ट्रीय अखण्डता को बनाए रखने के लिए देश के राजनीतिक वातावरण में सुधार करना भी ज़रूरी है।

प्रश्न 6. राष्ट्रीय एकीकरण कौन्सिल क्या है?
उत्तर-सितम्बर-अक्तूबर, 1961 में प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू की प्रेरणा पर नई दिल्ली में एक राष्ट्रीय एकीकरण सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में प्रधानमन्त्री, केन्द्रीय गृह मन्त्री, राज्यों के मुख्यमन्त्री, शिक्षा शास्त्री, प्रसिद्ध पत्रकार, विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता तथा सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों से जुड़े प्रसिद्ध व्यक्तियों ने भाग लिया। सम्मेलन में एक राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् (National Integration Council) का निर्माण किया गया।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. राष्ट्रीय एकीकरण का क्या अर्थ है ?
उत्तर-एक ही देश में रहने वाले विभिन्न संस्कृतियों के लोगों में एक ही राष्ट्र से सम्बन्ध होने की भावना विकसित करना राष्ट्रीय एकीकरण का वास्तविक अर्थ है।

प्रश्न 2. राष्ट्रीय एकीकरण की कोई एक परिभाषा लिखिए।
उत्तर-माईरन बीनर के अनुसार, “राष्ट्रीय एकीकरण की धारणा का अभिप्राय क्षेत्रीय राष्ट्रीयता की ऐसी भावना विकसित करना है, जो अन्य वर्गीय निष्ठाओं को समाप्त करती है, या उन छोटी निष्ठाओं से श्रेष्ठ होती है।”

प्रश्न 3. भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के दो पक्षों के नाम लिखें।
उत्तर-

  1. राजनीतिक पक्ष
  2. माजिक पक्ष।

प्रश्न 4. भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के किसी एक पहलू के बारे में लिखें।
उत्तर- राष्ट्रीय एकीकरण का राजनीतिक पक्ष देश के क्षेत्रीय संगठन से सम्बन्धित है।

प्रश्न 5. राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् का निर्माण कब हुआ ?
उत्तर-राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् का निर्माण सन् 1961 में किया गया।

प्रश्न 6. ‘इंसानी बिरादरी’ नाम की संस्था का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-‘इंसानी बिरादरी’ नाम की संस्था के संस्थापक खान अब्दुल गफ्फार खान थे।

प्रश्न 7. राष्ट्रीय एकीकरण के आर्थिक पक्ष का क्या अर्थ है ?
उत्तर-राष्ट्रीय एकीकरण के आर्थिक पक्ष का अर्थ यह है कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों का असन्तुलित आर्थिक विकास न हो, बल्कि सभी क्षेत्रों का उचित तथा सन्तुलित विकास हो।

प्रश्न 8. राष्ट्रीय एकीकरण के सामाजिक पक्ष का क्या अर्थ है ?
उत्तर-राष्ट्रीय एकीकरण के सामाजिक पक्ष का प्रत्यक्ष सम्बन्ध भारतीय समाज में शताब्दियों से चली आ रही जाति प्रथा से है, जब जाति के आधार पर मनुष्य के साथ पक्षपात किया जाए, तो ऐसी स्थिति राष्ट्रीय एकीकरण के सामाजिक पक्ष का प्रतीक होती है।

प्रश्न 9. राष्ट्रीय एकीकरण के रास्ते में आने वाली दो रुकावटों के नाम लिखें।
उत्तर-

  1. साम्प्रदायिकता
  2. जातिवाद।

प्रश्न 10. भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के विकास के लिए कोई एक सुझाव लिखें।
उत्तर-गरीबी और बेरोज़गारी दूर करना।

प्रश्न 11. राष्ट्रीय एकीकरण के लिए जातिवाद किस प्रकार रुकावट बनता है ?
उत्तर-निम्न जातियों के साथ दुर्व्यवहार तथा जाति के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था, राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधा बनती है।

प्रश्न 12. धरती के बेटों के सिद्धान्त से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर- धरती के बेटों के सिद्धान्त का अभिप्राय अपने ही राज्य के लोगों को रोज़गार इत्यादि के अवसरों में प्राथमिकता देना है।

प्रश्न 13. माओवादी हिंसा ने राष्ट्रीय एकीकरण को कैसे प्रभावित किया है ?
उत्तर-माओवादी हिंसा देश की एकता और अखंडता को कमज़ोर कर रही है।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. राष्ट्रीय अखण्डता …………….. पर निर्भर करती है।
2. राष्ट्रीय एकीकरण का सम्बन्ध अनेकता में ……….. स्थापित करना है।
3. भारत में जाति, भाषा, धर्म एवं संस्कृति की अनेक …………. पाई जाती हैं।
4. भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में ………. भाषाओं का वर्णन किया गया है।
5. सन् ………. में भाषायी आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया गया।
उत्तर-

  1. राष्ट्रीय एकीकरण
  2. एकता
  3. विभिन्नताएं
  4. 22
  5. 1956.

प्रश्न III. निम्नलिखित वाक्यों में से सही या ग़लत का चुनाव करें-

1. जातिवाद की समस्या ने राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधा पहुंचाई है।
2. गरीबी राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधा नहीं होती।
3. अनपढ़ता राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देती है।
4. राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देने में शिक्षा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
5. भ्रष्टाचार ने राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधा पहुंचाई है।
उत्तर-

  1. सही
  2. ग़लत
  3. ग़लत
  4. सही
  5. सही।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1. यह कथन किसका है, “कि भारत के सामने यह खतरा है, कि वह अनेक छोटे-छोटे सर्वसत्तावादी राष्ट्रों में बंट जायेगा।”
(क) डॉ० एस० राधाकृष्णन
(ख) प्रो० सुनीता कुमार चैटर्जी
(ग) प्रो० आर० भास्करण
(घ) रजनी कोठारी।
उत्तर-(ख) प्रो० सुनीता कुमार चैटर्जी

प्रश्न 2. भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधा है
(क) क्षेत्रवाद
(ख) साम्प्रदायिकता
(ग) जातिवाद
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 3. “समाजवाद की असफलता ने भी राष्ट्रीय एकीकरण की समस्या को पैदा किया है।” यह कथन किसका
(क) पं० नेहरू
(ख) श्री लाल बहादुर शास्त्री
(ग) प्रो० गोविन्द राम वर्मा
(घ) श्री अटल बिहारी वाजपेयी।
उत्तर-(ग) प्रो० गोविन्द राम वर्मा

प्रश्न 4. राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए क्या उपाय किया जाना चाहिए ?
(क) आर्थिक विकास
(ख) राजनीतिक वातावरण में सुधार
(ग) समुचित शिक्षा व्यवस्था
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 5. निम्न में से एक राष्ट्रीय एकीकरण का पक्ष माना जाता है-
(क) राजनीतिक पक्ष
(ख) सामाजिक पक्ष
(ग) सांस्कृतिक पक्ष
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-(घ) उपरोक्त सभी।

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