Class 7 Social Notes Chapter 1 राजपूत-युग : नए शासक और राज्य

राजपूत राजाओं ने 700 ई. से 1200 ई. के बीच 500 वर्ष के दौरान अधिकांशतः उत्तर भारत और दक्षिण भारत पर वर्चस्व जमाकर राजपूत-युग की स्थापना की। उन्होंने भारतीय हिंदू संस्कृति को प्रज्ज्वलित रखा। ये सभी छोटे-बड़े फिर भी उल्लेखनीय राजपूत राज्य कहाँ और कैसे थे, उन्हें विस्तार से जानें :

हर्षवर्धन के बाद का समयकाल

सातवीं शताब्दी में हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद उत्तर भारत में उनके विशाल साम्राज्य का छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों में विभाजन हो गया। इसी तरह पुलकेशी द्वितीय की मृत्यु के बाद दक्षिण भारत में भी स्वतंत्र राज्य बने। मध्ययुग के इस समयकाल को भारतीय इतिहास में राजपूत-युग कहा जाता है।

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राजपूत बहादुर थे और उतने ही आत्म-सम्मान की प्रबल भावनावाले थे। प्राण देकर भी अपने वचन की रक्षा करते थे। दुश्मन को पीठ दिखाने के बदले वे मृत्यु को पसंद करते थे। राजपूत गौ-ब्राह्मण प्रतिपालक थे। शरण में आए हुए की वे हर हालत में रक्षा करते थे। लड़ाई में भी वे अधर्म का आचरण नहीं करते थे। भारत की राजपूतानियाँ वीरत्व के लिए विख्यात थीं। पुत्र और पति को प्रसन्न मुख से युद्ध के लिए विदा करती थीं। सतीत्व, निडरता और सत्य के लिए वे प्राण की भी चिंता नहीं करती थीं। जरूरत पड़ने पर हाथ में तलवार लेकर युद्धमैदान के लिए निकल पड़ती थीं। ऐसी वीरांगनाओं के अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं।

भारत के मध्ययुगीन इतिहास में रणधीर राजपूत शासकों की वीरता, साहस और शौर्य के प्रसंगों का उल्लेख है। लगभग पाँच सौ वर्ष तक राजपूतों ने भारत को विदेशी आक्रमणों से बचाया था। ऐसे राजपूत राजवंशों के विषय में जानें।

सातवीं शताब्दी के अंत में सामंतशाही शक्तियों का उदय होने से भारत अनेक छोटे-बड़े भागों में बँट गया। देश में अनेक राजपूत राजवंशों का उदय हुआ। इस समयकाल को मध्ययुग कहते हैं। हम उस समय के उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों का अध्ययन करेंगे।

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उत्तर भारत के राज्य

गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य के पतन के बाद कन्नौज का गढ़वाल राज्य, बुंदेलखंड (जेजाकभुक्ति) के चंदेल, मालवा का परमार राज्य, अणहिलवाड़ का चौलुक्य (सोलंकी) राज्य, डाहल का चेदिराज्य, शाकंभरी का चौहान राज्य, दक्षिण राजस्थान का गोहिल राज्य स्थापित हुआ।

गढ़वाल राज्य के स्थापक चंद्रदेव थे। उन्होंने कन्नौज के अतिरिक्त काशी को भी दूसरी राजधानी बनाई थी। इस वंश में मदनचंद्र, गोविन्दचंद्र जैसे शासक हुए थे। जिनमें गोविन्दचंद्र इस कुल के सबसे प्रतापी और पराक्रमी राजा थे। उन्होंने गजनी के आक्रमण को रोका था तथा कई बौद्धविहारों का जीर्णोद्धार करवाया था। उत्तर भारत के अन्य शासकों में बुंदेलखंड के चंदेलों का समावेश होता है। बुंदेलखंड प्रदेश के चंदेलों का यह राज्य बाद में जेजाकभुक्ति नाम से जााना गया। इस राज्य में यशोवर्मन, कीर्तिवर्मन, परमर्हिदेव (परमार) जैसे महान शासक हुए थे। भारत के इतिहास में चंदेलवंश का खूब महत्त्व है। खजुराहो, कालिंजर और महोबा चंदेलों के मुख्य नगर थे। भव्य मंदिरों के कारण खजुराहो तीर्थस्थान के रूप में प्रसिद्ध था। चंदेलों ने बुंदेलखंड में महान धार्मिक इमारतों और जलाशयों का निर्माण करवाकर वहाँ की सुंदरता बढ़ाई थी।

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मालवा का प्रदेश प्राचीनकाल से अवंति अथवा उज्जैनी के राज्य के रूप में जाना जाता है। 820 ई. में कृष्णराज ने परमार वंश की स्थापना की थी। परमार वंश में सीयक, मुंज, भोज जैसे महान शासक हुए थे। भोज परमार वंश के सबसे श्रेष्ठ राजा थे। उनकी ख्याति भारत के एक आदर्श लोकप्रिय राजा के रूप में थी। राजा भोज ने धारानगरी में एक महाविद्यालय की स्थापना की थी। उन्होंने चारों ओर से पहाड़ों से घिरे भोजपुर (वर्तमान भोपाल) नामक सुंदर नगर को बसाया था। चौहान या चाहमान वंश के अनेक राजपूत सरदार गुजरात और राजस्थान के विविध भागों में राज्य करते थे। उनमें से एक शाखा आठवीं शताब्दी में सांभर सरोवर के निकट शाकंभरी (अजमेर के उत्तर में स्थित सांभर) नामक स्थल पर राज्य करती थी। शाकंभरी के चाहमान (चौहान) वंश के स्थापक वासुदेव थे। बारहवीं शताब्दी के आरंभ में अजयराज शाकंभरी की गद्दी पर बैठे थे। उन्होंने अजयमेरू नामक नगर की स्थापना की थी, जिसे बाद में अजमेर नाम से जाना गया।

गुजरात के सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह की राजकुमारी का विवाह चौहान वंश के अर्णोराज के साथ हुआ था। उनका पुत्र सोमेश्वर चौहान गद्दी पर बैठा। उनके बाद उनका पुत्र पृथ्वीराज तृतीय गद्दी पर बैठा था। पृथ्वीराज तृतीय भारत के इतिहास में अद्वितीय स्थान रखते हैं। 1191 ई. में थानेश्वर और कर्नाल के बीच स्थित तराइन के मैदान में शहाबुद्दीन गोरी को पृथ्वीराज चौहान ने जबरदस्त पराजय दी थी। उसके पश्चात् 1192 ई. में पृथ्वीराज चौहान की हार हुई और दिल्ली के तख्त पर मुस्लिम सत्ता का उदय हुआ। अतः तराइन का युद्ध भारतीय इतिहास में सीमाचिह्न रूप माना जाता है।

राजपूत-युग में गुजरात के शासकों का विशेष स्थान है। आठवीं शताब्दी में गुर्जर प्रतिहारों का राज्य था। आठवीं शताब्दी के मध्य में लगभग 756 ई. में सरस्वती नदी के किनारे वनराज चावड़ा ने अणहिलवाड़ पाटन की स्थापना की थी। अपने बालमित्र अणहिल भरवाड़ के नाम पर से वनराज चावड़ा ने नवीन नगर का नाम अणहिलवाड़ पाटन रखा, ऐसी सामान्य मान्यता है। इस समय गुजरात में सौराष्ट्र और कच्छ में चावड़ा वंश के शासक थे।

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जिसमें वढवाण, दीव, ओखामंडल, पाटगढ़ (लखपत), भद्रावती (कच्छ) वगैरह का समावेश होता है। इन सभी शासकों में सोलंकियों के शासनकाल को गुजरात के राजपूत शासन का स्वर्णयुग माना जाता है। इस वंश में मूलराज, भीमदेव (प्रथम), सिद्धराज जयसिंह, कुमारपाल, भीमदेव द्वितीय वगैरह शक्तिशाली शासक हुए हैं। सोलंकियों के शासन में गुजरात आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध था। जूनागढ़ के शासक रा’खेंगार की पुत्री उदयमति का विवाह भीमदेव (प्रथम) सोलंकी के साथ हुआ था। रानी उदयमति ने पाटन में विश्व प्रसिद्ध वाव (बावड़ी) बनवाई थी, जो रानी की वाव नाम से जानी जाती है। आज इस रानी की वाव को युनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट का दर्जा प्राप्त है। सिद्धराज जयसिंह की माता मीनलदेवी (मयणल्लदेवी ) आदर्श राजमाता थीं। उन्होंने प्रजा को न्याय देने के लिए अनेक कार्य किए थे। सोमनाथ की यात्रा-कर बंद करवाने में और धोलका में मलाव तालाब के निर्माण में उनका ही निर्णय था। सिद्धराज जयसिंह ने कलिकालसर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य से ‘सिद्धहेमशब्दानुशासन’ नामक समृद्ध ग्रंथ की रचना करवाई थी और हाथी पर इस ग्रंथ की नगर-यात्रा निकलवाई थी। उस समय आमप्रजा के साथ स्वयं राजा पैदल चले थे। कुमारपाल भी प्रजा का कल्याण करनेवाले शासक थे और आचार्य हेमचंद्राचार्य का उन पर गहरा प्रभाव था। उनकी प्रेरणा से राजा कुमारपाल ने राज्य में जुए के खेल, पशुवध पर प्रतिबंध लगाया था और अहिंसा के पालन के लिए सख्त आदेश दिया था। ‘कुमारपाल-चरित्र’ ग्रंथ लिखकर हेमचंद्राचार्य ने इस राजा की प्रतिष्ठा में वृद्धि की है।।

कुमारपाल के बाद अजयपाल पाटन की गद्दी पर बैठे थे। लगभग चार वर्ष के शासन के बाद उनकी मृत्यु हो जाने से गुजरात की राजगद्दी पर उनका पुत्र मूलराज द्वितीय बैठा। 1178 ई. के आसपास शहाबुद्दीन गोरी ने गुजरात पर आक्रमण किया, तब मूलराज द्वितीय ने छोटी उम्र में उसे पराजित किया था। इस लड़ाई में नाडोल के चाहमान राजा केल्हण और उनके भाई कीर्तिपाल ने उन्हें मदद की थी।

सोलंकी शासकों की सत्ता कमजोर पड़ने पर गुजरात की गद्दी पर वाघेला वंश का शासन आया। वाघेला सोलंकियों के वफादार सरदार थे। उनकी सेवा के बदले में सोलंकियों ने व्याघ्रपल्ली (वाघेल) गाँव अर्णोराज को दिया था। उसी गाँव के नाम पर से उनके वंशज वाघेला कहलाए। वैसे तो वे भी मूल चौलुक्य जाति के थे। वाघेला वंश में वीरधवल, विसलदेव, अर्जुनदेव, सारंगदेव जैसे शासकों ने गुजरात का शासन अच्छी तरह चलाया था। वीरधवल के शासनकाल में गुजरात को वस्तुपाल और तेजपाल जैसे समर्थ मंत्री मिले थे। इन मंत्रियों की चतुराई के कारण गुजरात मुस्लिमों के आक्रमणों से बचा था। वाघेला वंश के अंतिम शासक कर्णदेव वाघेला के समय में 1304 ई. के आसपास गुजरात में दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई।

आठवीं शताब्दी के मध्यभाग में बंगाल में पालवंश का शासन था। इस वंश के स्थापक और उनके वंशजों के नाम में ‘पाल’ शब्द पीछे जुड़ा होने से इस वंश को बंगाल का ‘पालवंश’ कहा जाता है। इस वंश का स्थापक गोपाल (750 ई. से 770 ई.) नामक राजा था। पालवंश के पतन के बाद 1095 ई. में सेनवंश की स्थापना हुई थी। इस वंश में विजयसेन प्रथम उल्लेखनीय राजा थे। उनके पुत्र बल्लालसेन ने ‘दानसागर’ और ‘अद्भुतसागर’ नामक ग्रंथ की रचना की थी।

कर्णदेव वाघेला से गुजरात जीत लेने के बाद दिल्ली के सुल्तान नाज़िमो (सूबा) की नियुक्ति करते थे। उनके द्वारा राज्य का प्रशासन होता था। ज़फरखान 1407 ई. में मुज़फ्फरशाह नाम धारण करके सुलतान बना। इस वंश में चौदह सुलतान हुए, जिनमें अहमदशाह, महमूद बेगड़ा, बहादुरशाह जैसे सुल्तानों का समावेश होता है। सोलहवीं शताब्दी में गुजरात में मुगल शासन का आरंभ होने से सल्तनतकाल का अंत हुआ।

दक्षिण भारत के राज्य

नर्मदा नदी के दक्षिण में आए राज्यों को दक्षिण के राज्य कहा जाता है। आठवीं शताब्दी में उत्तर भारत की तरह दक्षिण भारत में भी अनेक छोटे-बड़े राजवंश स्वतंत्र हुए। उनमें से चालुक्य, राष्ट्रकूट, पल्लव, चोल, पांड्य, चेर जैसे राजवंशों के बारे में संक्षिप्त में जानकारी प्राप्त करें।

चालुक्य वंश के प्रथम राजा जयसिंह थे। पुलकेशी प्रथम ने 540 ई. में वातापी को राजधानी बनाकर अलग स्वतंत्र राज्य स्थापित किया था। यह वंश वातापी (वर्तमान समय में बादामी) का चालुक्य वंश कहलाया। इस वंश में कीर्तिवर्मन, पुलकेशी प्रथम, पुलकेशी द्वितीय जैसे महान शासक हुए। वातापी के चालुक्यों की सत्ता कमज़ोर पड़ी तब उनकी एक शाखा कृष्णा और गोदावरी नदी के बीच के प्रदेश में स्थापित हुई। उसके स्थापक विष्णुवर्धन थे। इन पूर्वी चालुक्य शासकों ने अपनी राजधानी वेंगी में स्थापित की इसलिए वे वेंगी के चालुक्य कहलाए। वातापी और वेंगी की तरह कल्याणी में भी चालुक्य वंश की एक शाखा थी। ये चालुक्य कल्याणी के चालुक्य कहलाए।

दक्षिण में चालुक्यवंश की समाप्ति के बाद राष्ट्रकूट वंश की सत्ता का उदय हुआ। इस वंश का सबसे पहला राजा इन्द्र प्रथम को माना जाता है। गोविंद तृतीय राष्ट्रकूट वंश के शासकों में सबसे अधिक शक्तिशाली शासक थे।

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इस समय यादववंश के दो राज्य अस्तित्व में थे : (1) देवगिरि और (2) द्वारसमुद्र। द्वारसमुद्र में होयसल वंश का शासन था और देवगिरि में यादवों का शासन था। द्वारसमुद्र होयसलों की राजधानी थी और देवगिरि (वर्तमान दौलताबाद) यादवों की राजधानी थी।

दक्षिण में कल्याणी चालुक्य साम्राज्य के पतन के बाद वहाँ नए राज्यों का उदय हुआ। उनमें वरंगल के काकतीय भी थे। कृष्णा और कावेरी नदियों के बीच के भूमि प्रदेश पर उनका राज्य था। वरंगल उनकी राजधानी थी। ऐसा ही एक महत्त्वपूर्ण वंश पल्लववंश भी था। इस वंश की स्थापना बप्पदेव ने की थी। उनकी राजधानी कांचीपुरम में थी। महेन्द्रवर्मन प्रथम, नरसिंहवर्मन प्रथम और नरसिंहवर्मन द्वितीय इस वंश के मुख्य शासक थे। तंजौर, तिरुचिरापल्ली और पुदुकोट्टई जहाँ आए हुए हैं, वहीं मध्यकाल में चोलमंडल का राज्य था। तंजौर उनकी राजधानी थी। राजराज प्रथम, राजाधिराज प्रथम और राजेन्द्र प्रथम चोलवंश के प्रमुख शासक थे। दक्षिण में एक प्राचीन राज्य पांड्य भी था। पांड्यों का राज्य छोटा था, परंतु व्यापार का बड़ा केन्द्र था। इस समय तमिल से अलग हुए एक भाग पर चेर वंश का शासन था। चेर का दूसरा नाम केरल अथवा मलयालम है। अयन चेर वंश का प्रथम शासक था और सेतुंगवन चेर शासकों में सर्वश्रेष्ठ शासक था।

राजपूत-युग की शासन-व्यवस्था

राजपूत-युग में विविध राजवंशों का शासन था। उस समय शासक राजवंशों में तो परिवर्तन आता था, परंतु राजनैतिक परिस्थिति में कोई परिवर्तन देखने को नहीं मिलता है।

राजपूत-युग में राजा का पद वंशपरंपरागत था। राजा का ज्येष्ठ पुत्र राज्याधिकारी बने, ऐसा नहीं था। राजा अपने पुत्रों में से उत्तराधिकारी के रूप में किसी एक पुत्र को युवराज बनाते थे। वही युवराज बाद में राजा बनता था। लोगों या राजदरबारियों द्वारा चुनाव करके अथवा मनपसंद राजा चुनने के उदाहरण देखने को मिलते हैं। जैसे; कश्मीर के यशस्कर को ब्राह्मणों की सभा ने चुना था। इस समय मंत्रियों के दो प्रकार थे : (1) अमात्य और (2) सचिव। अमात्य का कार्य मंत्रणा और राजनीति करना था। सचिव का कार्य लड़ाई और समझौते का था। हर प्रकार की नीति का अंतिम निर्णय राजा करता था। इस समय शासन के अमलदारों में महा-प्रतिहार और दंडनायक जैसे पद थे। नगर की सभा का प्रमुख नगरपति कहलाता था।

राजपूत-युग में ग्रामीण संस्थाओं का विशेष महत्त्व था। इन संस्थाओं का इतना विकास हुआ कि मुगलकाल में भी ग्राम पंचायत का महत्त्व बना रहा। उत्तर भारत की तरह ही दक्षिण भारत भी ग्राम पंचायत के अधीन था। उसका प्रमुख मुखिया या सरपंच माना जाता था। कुछ विषयों में ग्रामसभा न्याय करती थी, परंतु राज्य शासन में न्यायतंत्र का सर्वोच्च प्रमुख राजा था।

व्यापार-वाणिज्य : राजपूत-युग में वाणिज्य-व्यवस्था पर देखरेख रखने के लिए एक अलग विभाग था। यह विभाग विदेशी व्यापार पर सीमा शुल्क वसूल करने, वस्तुओं का मूल्य निर्धारित करने और राज्य में आवश्यक वस्तुएँ मँगवाने आदि की व्यवस्था करता था। मुख्य कर जमीन की उपज का छठा भाग था। राजपूत-युग में जमीन पर लगनेवाला कर ‘भाग’ कहलाता था। आज भी जमीन पर कर लिया जाता है। बंदरगाह और नाका पर तथा सिंचाई पर कर वसूल किया जाता था। इस समय समुद्र पार व्यापार के लिए गुजरात के स्तंभतीर्थ (खंभात) और भृगुकच्छ (भरूच) बंदरगाह प्रसिद्ध थे।

भारत पर विदेशी आक्रमण

आठवीं से बारहवीं शताब्दी दौरान भारत में मुस्लिम आक्रमण हुए। आठवीं शताब्दी में अरब राजसत्ता का विस्तार करने के उद्देश्य से मुहम्मद बिन कासिम ने भारत के उत्तरी-पश्चिमी भाग पर आक्रमण किया। वायव्य दिशा से सबुकतिगिन की फौज ने भी आक्रमण किया था। लेकिन इन आक्रमणों से भारत में उनकी राजसत्ता स्थापित न हो सकी। इसके बाद गजनी के सुल्तान महमूद गजनवी ने 1000 ई. से 1026 ई. के समयकाल में भारत की अथाह धन-संपत्ति को देखकर कई बार आक्रमण किया। महमूद गज़नवी के क्रमण का मुख्य कारण भारत की अथाह संपत्ति थी। वह एक आक्रमण के बाद दूसरा आक्रमण करता था और हर बार पहले से अधिक ताकतवर होकर भारत पर चढ़ाई करता था। इस समय भारत के शासक एकजुट होकर शक्तिशाली सेना नहीं बना सके। परिणाम स्वरूप 1026 ई. में उसने सोमनाथ पर आक्रमण करके अथाह संपत्ति लूट ली।

महमूद गज़नवी के आक्रमण के पश्चात् लगभग डेढ़ सौ वर्ष बाद पुनः भारत पर उसी दिशा से आक्रमण हुआ। पहले हुए आक्रमणों की बात भारतीय शासक भूल गए। महमूद गज़नवी की मृत्यु के बाद सत्ता के लिए गजनी में लड़ाइयाँ चल रही थीं, लेकिन इस समय सत्ता स्थिर नहीं हुई थी। तब हमारे शासक इस कमज़ोरी का लाभ नहीं ले सके। परिणाम स्वरूप बारहवीं शताब्दी के अंत में शहाबुद्दीन गोरी ने आक्रमण किया। शुरुआत में उसे कई बार हार का सामना करना पड़ा। परंतु तराइन के मैदान में उसने दूसरी बार के आक्रमण में पृथ्वीराज चौहान को पराजित करके दिल्ली में सत्ता स्थापित की।

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