Class 7 Social Notes Chapter 12 वातावरण का सजीवों पर प्रभाव

वातावरण का निर्माण

पृथ्वी, सूर्य से अलग हुई है, ऐसा माना जाता है। जब इसका उद्भव हुआ तब आग के गोले के रूप में थी। यह गरम गोला धीरे-धीरे ठण्डा होने लगा। ठण्डा होने पर इसमें रहे तत्त्व द्रव, ठोस और गैस-स्वरूप में रूपांतरित होने लगे। जिन तत्त्वों का ठोस स्वरूप में रूपांतरण हुआ, उन्हें हम मृदावरण के रूप में पहचानते हैं। द्रव तत्त्व को जलावरण के रूप में पहचानते हैं तथा गैस स्वरूप में रूपांतरित हुए, उन्हें वातावरण के रूप में पहचानते हैं।

वातावरण

पृथ्वी के चारों तरफ फैले हवा के आवरण को वातावरण कहते हैं। यह पृथ्वी के धरातल से सैकड़ों किलोमीटर की ऊँचाई तक फैला है। इसकी ऊपरी सीमा कितनी ऊँचाई तक है, यह कहना मुश्किल है। इसके उपरांत अवकाश में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव जहाँ तक है वहाँ तक वातावरण माना जाता है। पृथ्वी के धरातल से 32 किमी की ऊँचाई तक के वातावरण में 99 % जितनी हवा समाई होती है। पृथ्वी के धरातल से जैसे-जैसे ऊँचाई में जाते हैं वैसे-वैसे हवा पतली होती जाती है।

वातावरण की गैसें

वातावरण के बिना पृथ्वी पर जीवसृष्टि का अस्तित्व संभव नहीं है। वातावरण गैस, द्रव और ठोस तत्त्वों का बना है। जिनमें ऑक्सिजन और नाइट्रोजन गैस जीवसृष्टि के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। वातावरण में कोहरा, ओस, बादल आदि वातावरण में रहे पानी के स्वरूप हैं। द्रव तत्त्वों में मुख्यतः बरफ के कण, जीवजंतु आदि है। वातावरण पृथ्वी को दिन में गरमी और रात्रि में अतिशय ठण्डी से बचाता है।

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वातावरण में स्थित गैसों की मात्रा पास के कोष्ठक में दर्शाई गई है। नाइट्रोजन लगभग 130 किलोमीटर तक पाई जाती है, जबकि ऑक्सिजन लगभग 110 किलोमीटर और कार्बन डाईऑक्साइड लगभग 20 किलोमीटर तक पाई जाती है। जबकि 130 किलोमीटर की ऊँचाई के बाद के वातावरण में हाइड्रोजन और हिलियम की मात्रा अधिक है।

वातावरण की स्तररचना

वातावरण को पृथ्वी के धरातल से ऊँचाई की तरफ जाने से तापमान और गैसों की संरचना में होनेवाले परिवर्तनों के आधार पर अलग-अलग आवरण अथवा स्तरों में विभाजित किया गया है। इस परिवर्तन के आधार पर उसके चार उपविभाग किए गए हैं : (1) क्षोभ-आवरण (2) समताप-आवरण (3) मध्यावरण (4) उष्मावरण (तापमण्डल)

(1) क्षोभ-आवरण : पृथ्वी से लिपटे वातावरण का प्रथम आवरण क्षोभ-आवरण है। विषुववृत्त पर यह लगभग 16 किमी, समशीतोष्ण कटिबंध प्रदेशों में लगभग 12 किमी और ध्रुवों पर लगभग 8 किमी ऊँचाई तक फैला है। ऋतुओं के अनुसार इसमें परिवर्तन होता है। यह आवरण जीव सृष्टि के लिए अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण है। वातावरण के तूफान, आवाज की तरंगें, वायु की संरचना, बिजली, बरसात, बादल आदि इस आवरण में अनुभव किए जाते हैं। इस आवरण में प्रति 1 किमी की ऊँचाई पर लगभग 6.5° से की दर से तापमान घटता है, जब ऊँचाई बढ़ने पर तापमान घटना बंद हो जाता है तो उस सीमा को ‘क्षोभ-सीमा’ कहते हैं।

(2) समताप-आवरण/मण्डल : क्षोभ सीमा के ऊपर के आवरण को समताप आवरण कहते हैं जो क्षोभ-सीमा से लगभग 50 किमी की ऊँचाई तक फैला है। ऊँचाई के साथ इस आवरण में ऋतुएँ, बादल, बरसात, चक्रवात आदि नहीं पाए जाते। यहाँ वायु स्वच्छ और पतली होती है, जिससे जेट विमानों को कम अवरोध और तेजी से उड़ा सकते हैं। इस आवरण में लगभग 15 से 35 किमी की ऊँचाई पर ओजोन गैस की मात्रा अधिक पाई जाती है, जो सूर्य की अत्यंत गरम पराबैगनी किरणों (Ultra Violet Rays) का शोषण करती हैं।

(3) मध्यावरण : समताप आवरण के ऊपर लगभग 80 किमी ऊँचाई तक के वातावरण के भाग को ‘मध्यावरण’ कहते हैं। जिसमें ऊँचाई पर जाने पर तापमान घटता जाता है।

(4) उष्मावरण : यह आवरण, मध्यावरण के ऊपर स्थित है। 80 किमी से शुरू हो करके जहाँ वातावरण पूरा होता है वहाँ तक फैला है। यहाँ वायु अतिशय पतली होती है। जैसे-जैसे ऊँचाई पर जाते हैं वैसे-वैसे तापमान बढ़ता जाता है। इस आवरण को दो उपविभागों में बाँटा गया है : आयनावरण और बाह्यावरण। आयनावरण में से रेडियोतरंगों का परावर्तन होता है। टी.वी., रेडियो-प्रसारण, इन्टरनेट का लाभ इस आवरण का आभारी है। आयनावरण के ऊपर के आवरण को बाह्यावरण कहते हैं।

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मौसम

मौसम अर्थात् अल्प समय की वातावरण की औसत परिस्थितियाँ। किसी भी प्रदेश का मौसम, तापमान, नमी, बरसात, वायु का दबाव, कोहरा तथा बादलों के आधार पर निश्चित होता है। मौसम प्रातः, दोपहर, सायंकाल अथवा रात्रि का अलग हो सकता है। मौसम वातावरण की कम समय की परिस्थिति होता है जिसमें समयांतर परिवर्तन होता रहता है। प्रात:काल ठण्डी, दोपहर में गरमी और शाम को बरसात होना, ऐसा मौसम में संभव है। मौसम से हमारा जीवन और हमारी प्रवृत्तियाँ प्रभावित होती हैं, देश का मौसम विभाग मौसम के समाचार और नक्शे प्रतिदिन प्रकाशित करता है।

जलवायु

सामान्यरूप किसी प्रदेश की 35 वर्ष या उससे अधिक वर्षों की मौसम की औसत दशाओं को जलवायु कहते हैं। जलवायु स्थानीय परिस्थिति (तापमान, नमी, बरसात, वायुदाब, जलवाष्प) को ध्यान में रखकर निश्चित की जाती है। जलवायु किसी प्रदेश की सजीव सृष्टि, प्राणी सृष्टि और मानवजीवन तथा ऐसी प्रवृत्तियों को प्रभावित करती है।

तापमान

हवा में रही गरमी के स्तर को तापमान कहते हैं। वातावरण के तापमान में दिन और रात्रि के दरमियान परिवर्तन होता है। तापमान, ऋतुओं के अनुसार भी बदलता है। सर्दियों की तुलना में गर्मियों में तापमान अधिक होता है।
सूर्यताप (Insolation) तापमान के वितरण को प्रभावित करनेवाला महत्त्वपूर्ण कारक है। सूर्यताप की मात्रा विषुववृत्त से ध्रुवों की तरफ घटती है। इस कारण ध्रुवप्रदेश बर्फ से ढके होते हैं। यदि पृथ्वी पर तापमान बढ़ जाए तो कृषि फसलें उग नहीं सकतीं। शहरों में गाँवों की तुलना में अधिक तापमान होता है। इसका कारण पक्की सड़कें और सीमेन्ट की बनी इमारतें होती हैं।

वायुमण्डलीय दबाव

पृथ्वी के आसपास हवा के स्तर का वजन होता है। हवा का विशाल स्तर उसके वजन के अनुसार पृथ्वी के धरातल पर दबाव डालता है, उसे वायुमण्डलीय दबाव कहते हैं। समुद्रतल पर वातावरण का दबाव सबसे अधिक होता है। पृथ्वी के धरातल से ऊँचाई पर जाने पर वायु दाब घटता है। अधिक तापमानवाले प्रदेशों में वायु गरम होकर ऊपर की तरफ गति करती है और हल्का वायुदाब रचती है। हल्का दबाव बादल और नमीयुक्त ऋतु के साथ जुड़ा है। कम तापमानवाले प्रदेशों में वातावरण ठण्डा होता है इसलिए वहाँ भारी दबाव होता है।

पवन

पृथ्वी के आसपास स्थित गतिशील वायु को पवन कहते हैं। सामान्य रूप से पृथ्वी पर निर्मित होते हवा के हल्के, भारी दबाव हैं, जिसके मुख्य तीन प्रकार है : (1) स्थायी पवन (2) मौसमी पवन (3) दैनिक/स्थानीय पवन।

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(1) स्थायी पवन : पृथ्वी के धरातल पर कुछ भागों में बारहों मास निश्चित दिशा में पवन चलती है, जिन्हें स्थायी पवन कहते हैं। स्थायी पवनों में व्यापारिक पवन, पश्चिमीय पवन और ध्रुवीय पवन का समावेश होता है।

(2) मौसमी पवन : पृथ्वी के धरातल पर कुछ पवनें ऋतु के अनुसार चलती हैं और उनकी दिशा ऋतु के अनुसार बदलती है, जिन्हें मौसमी पवन कहते हैं। भारत, म्यानमार, बाँग्लादेश जैसे देशों में ऐसी पवनें चलने से इन्हें मौसमी पवनों का देश कहा जाता है। गरमी में नैऋत्य की पवनें और सर्दी में इशान कोणीय पवनें इस प्रकार की पवनों के उदाहरण हैं।

(3) दैनिक/स्थानीय पवन : पृथ्वी के कुछ प्रदेशों में कम समय के लिए वायु दाब में होनेवाले परिवर्तन के कारण उद्भव होनेवाली पवनों को दैनिक/स्थानीय पवनें कहते हैं। स्थानीय पवनों के उदाहरण के तौर पर समुद्री-जमीन की लहरें, पर्वत और घाटी की लहरें, लू और शीतलहर आदि हैं।

नमी

समुद्रों और जलाशयों में से पानी का वाष्पीभवन होने से उनका जलवाष्प में रूपांतरण होता है, जिसे नमी कहते हैं। नमी पृथ्वी के धरातल से वाष्पीभवन की क्रिया द्वारा वातावरण में मिलती है। वातावरण में रही नमी घनीभवन की प्रक्रिया द्वारा बादल बनकर बरसात के रूप में पृथ्वी के धरातल को पुनःप्राप्त होती है।

जलवायु और मानव जीवन

  • किसी भी प्रदेश की जलवायु का आहार, पोशाक और आवास आदि पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
  • अधिक वर्षावाले क्षेत्रों में घरों की छतें तीव्र ढालवाली होती हैं, जबकि कम वर्षावाले क्षेत्रों में मकान कम ढालवाले समतल छतवाले होते हैं।
  • किसी भी प्रदेश में उत्पन्न होनेवाली कृषि उपज उस प्रदेश के लोगों की मुख्य खुराक होती है। उदा. मैदानी प्रदेश के लोगों की खुराक में गेहूँ और पर्वतीय लोगों की खुराक में मकई का उपयोग अधिक होता है।
  • जिस प्रदेश में ठण्डी अधिक पड़ती है, वहाँ के लोग पूरा शरीर ढके ऐसे गरम ऊनी वस्त्रों का उपयोग करते हैं। उदाहरण, लद्दाख के लोग।
  • गरम प्रदेशों के लोग सूती और खुले (ढीले) वस्त्रों का उपयोग करते हैं। उदाहरण – दक्षिण भारत के लोग।
  • रेगिस्तानी प्रदेश के लोग निरंतर उड़ती रेत से बचने के लिए सिर पर रूमाल अथवा कपड़ा लपेटते हैं। उदा. अरब के लोग।
  • गरम और नमीवाली जलवायु के क्षेत्रों में मानव स्वभाव आलसी, जबकि समशीतोष्ण कटिबंध के प्रदेशों में जलवायु खुशनुमा होने से लोगों की कार्यक्षमता अधिक होती है।
  • मौसमी जलवायु के प्रदेशों में वर्षा ऋतु के अलावा अन्य समय में विविध सामाजिक प्रसंगों का आयोजन अधिक होता है।

प्राकृतिक वनस्पति और प्राणीसृष्टि

प्राकृतिक वनस्पति की वृद्धि का आधार जमीन, तापमान और नमी होती है। इसके उपरांत ढालवाले और मिट्टी की ऊँचाई । मिट्टी के आधार की मोटाई भी प्राकृतिक वनस्पति की वृद्धि को प्रभावित करती है। इन घटकों में रही विभिन्नता के कारण किसी भी प्रदेश की प्राकृतिक वनस्पति की सघनता और प्रकार में अंतर होता है।

प्राकृतिक वनस्पति का मुख्य तीन विभागों में वर्गीकरण किया गया है :

  1. जंगल : वनस्पति अनुकूल तापमान और बरसाती प्रदेशों में उगती है। तापमान और बरसात के आधार पर सघन अथवा छुट-पुट जंगल पाए जाते हैं।
  2. घास के मैदान : ये मध्यम वर्षावाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
  3. कंटीली वनस्पति और झाड़ियाँ : शुष्क और कम बरसातवाले प्रदेशों में ऐसी वनस्पति पाई जाती है।

प्राकृतिक वनस्पति के प्रकारों में इस अंतर का मुख्य कारण जलवायु में अंतर है। अब हम विश्व की प्राकृतिक वनस्पतियों और उनमें पाए जानेवाले मुख्य प्राणियों की जानकारी प्राप्त करेंगे।

जंगलों के प्रकार

(1) उष्णकटिबंधीय बारहमासी हरेभरे जंगल : इन जंगलों को उष्णकटिबंधीय बरसाती जंगल भी कहते हैं। ये घने जंगल विषुववृत्त और उष्णकटिबंध में पाए जाते हैं। इस क्षेत्र की जलवायु गरम और पूरे वर्ष वर्षा के कारण नमीवाली होती है। इस प्रदेश के वृक्षों के पत्ते एक साथ ना गिरकर, पूरे वर्ष हरेभरे रहते हैं, उन्हें बारहमासी हरे जंगल कहते हैं। इन जंगलों में रोज़वुड़, आबनूस, मोहगनी आदि वृक्ष पाए जाते हैं। भारत में अंदमान-निकोबार द्वीपसमूह में इस प्रकार के जंगल पाए जाते हैं।

(2) उष्णकटिबंधीय पतझड़ जंगल : उष्णकटिबंधीय पतझड़ जंगलों को मानसूनी जंगल भी कहते हैं। इस प्रदेश में जलवायु गरम और वर्षा की मात्रा कम होती है। गरमी की ऋतु में 6 से 8 सप्ताह के दरमियान वनस्पति के पत्ते झड़ जाते हैं इसलिए इन्हें पतझड़ या मानसूनी जंगलों के रूप में पहचाना जाता है। इन जंगलों में मजबूत और इमारती लकड़ीवाले वृक्ष जैसे साग, साल, नीम, शीशम आदि होते हैं। ये जंगल भारत में पठारी प्रदेश, पर्वतीय प्रदेश, उत्तर ऑस्ट्रेलिया और मध्य अमेरिका के अधिकांश भाग में इस प्रकार की वनस्पति पाई जाती है। इन जंगलों में बाघ, एशियाई सिंह, हाथी, बंदर, सुनहरे बंदर आदि प्राणी पाए जाते हैं। इस क्षेत्र में मोर, बाज, तोता, काबर (माया), कबूतर, मैना आदि पक्षी बड़ी संख्या में पाए जाते हैं।

(3) समशीतोष्ण सदाबहार जंगल : इस प्रकार के प्रदेश में तापमान सम और वर्षा अधिक मात्रा में पड़ती है। इस प्रदेश में बारहों मास जंगल हरेभरे रहते हैं। ये जंगल दक्षिण-पूर्व अमेरिका, दक्षिण चीन और दक्षिण-पूर्व ब्राजील में तथा भारत के उत्तर-पूर्व पर्वतीय प्रदेशों में पाए जाते हैं। इन जंगलों में बांस, चीड़ और नीलगिरि जैसी मुख्य वनस्पतियाँ होती हैं। इन जंगलों में हाथी, एक सिंगी गैंडा आदि प्राणी पाए जाते हैं।

(4) समशीतोष्ण पतझड़ के जंगल : इस प्रकार के जंगल कर्कवृत्त के उत्तर और मकरवृत्त के दक्षिण के प्रदेशों में पाए जाते हैं। ये जंगल उत्तर-पूर्वी अमेरिका, चीन, न्यूजीलैण्ड, चिली और पश्चिम यूरोप तथा उत्तर भारत में भी पाए जाते हैं। इन जंगलों में ऑक, मेपल जैसी मुख्य वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। इन जंगलों में हिरण, लोमड़ी, भेड़िया जैसे प्राणी पाए जाते हैं।

(5) भूमध्यसागरीय जंगल : ये जंगल भूमध्यसागर के नज़दीक के प्रदेशों में पाए जाते हैं। जो अधिकांश यूरोप, अफ्रीका, एशिया महाद्वीपों में पाए जाते हैं। इस प्रदेश की जलवायु गरमी में गरम-शुष्क, सर्दी में ठण्डी और नमीवाली होती है। इस प्रदेश में खट्टे फलों की वनस्पति संतरा, अंजीर, ऑलिव (जैतून), अंगूर आदि मुख्य पाए जाते हैं।

(6) शंकुद्रुम जंगल : शीत जलवायुवाले प्रदेश लगभग 50° उत्तर से 70° उत्तर अक्षाशों के प्रदेश तथा ऊँचे पर्वतीय प्रदेश में इस प्रकार के जंगल पाए जाते हैं। इन जंगलों की वनस्पति आकार में शंकु जैसी होती है। इन जंगलों में चीड़, देवदार, फर आदि मुख्य वनस्पतियाँ हैं। इन वनस्पतियों की लकड़ी मुलायम और हल्की होती है। ये कागज, दियासलाई तथा पैकिंग के लिए अधिक उपयोगी है। इस प्रदेश में बंदर, ध्रुवीय भालू, कस्तूरी मृग, याक आदि पाए जाते हैं।

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घास के मैदान

(1) उष्ण कटिबंधीय घास के मैदान : इस प्रदेश की जलवायु गरम है। यहाँ बरसात मध्यम से कम पड़ती है। यहाँ 3 से 4 मीटर जितनी ऊँची घास होती है। अफ्रीका का सवाना का घास का मैदान विश्वभर में प्रसिद्ध है। इस प्रदेश में सिंह, चीता, हाथी, जेब्रा, जिराफ, हिरण मुख्य प्राणी पाए जाते हैं।

(2) समशीतोष्ण घास के मैदान : सम जलवायुवाले महाद्वीपों के मध्यभाग के प्रदेशों में छोटी और पौष्टिक घास होती है। इस प्रदेश में जंगली भैंस, बायसन और काले हिरन जैसे प्राणी पाए जाते हैं। गुजरात में भावनगर में वेलावदर और कच्छ के बन्नी क्षेत्र में इस प्रकार की घास होती है।

कंटीली वनस्पति और झाड़ियाँ

रेगिस्तानी जलवायु गरम और शुष्क होती है। इस प्रदेश में वनस्पति कम पाई जाती है। जलवायु के साथ अनुकूलता साधने के लिए वनस्पति कंटीली होती है। इस क्षेत्र में बेर, थुअर (नागफनी), बबूल, खेजड़ी आदि वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। इस प्रदेश में ऊँट, लोमड़ी, झरख (लकड़बग्धा) जैसे प्राणी पाए जाते हैं। कच्छ के छोटे रेगिस्तान में पाया जानेवाला प्राणी घुड़खर विश्व में बेजोड़ है। इसके उपरांत बड़े रेगिस्तान में दलदलकीचड़वाले क्षेत्रों में सुरखाव पक्षी पाए जाते हैं। यहाँ प्रवासी पक्षी भी आते हैं। इस प्रदेश में साँप और बिच्छू भी पाए जाते हैं।

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इसके उपरांत ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में ठण्डी और शुष्क जलवायुवाले प्रदेशों में झाड़ियाँ और छोटी घास होती है। हिमालय और लद्दाख में ऐसी वनस्पति पाई जाती है। यहाँ हिमतेंदुआ, चीता, पान्डा आदि प्राणी पाए जाते हैं। कश्मीर में पश्मिनो बकरी पाई जाती है।

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