Class 7 Social Notes Chapter 2 दिल्ली सल्तनत

प्राचीनकाल से ही दिल्ली भारतीय राजनीति के केन्द्र में रही है। 12वीं शताब्दी में तोमर और चौहान राजपूतों के समय में दिल्ली व्यापार-वाणिज्य का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र थी। 13वीं शताब्दी के प्रारंभ में दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई। 1206 ई. से 1526 ई. दौरान उत्तर भारत के विशाल विस्तार पर शासन करनेवाले शासकों को सुल्तान और शासनकाल को दिल्ली सल्तनत कहा जाता है। ये शासक मूलभूत रूप से तुर्क और अफ़गान मूल के थे। इन सवा तीन सौ वर्ष दौरान दिल्ली सल्तनत पर कुल पाँच वंशों ने शासन किया; जिनमें गुलामवंश, खिलजी वंश, तुगलक वंश, सैयद वंश और लोदीवंश का समावेश होता है। दिल्ली सल्तनत के साथ हम इस पाठ में विजयनगर और बहमनी साम्राज्य का भी अध्ययन करेंगे।

दिल्ली सल्तनत के शासक

गुलाम वंश (1206 ई. – 1290 ई.) : 1192 ई. में तराइन के द्वितीय युद्ध में शहाबुद्दीन गोरी ने पृथ्वीराज चौहान के सामने निर्णायक विजय प्राप्त करके दिल्ली में सल्तनत की सत्ता की नींव डाली। मुहम्मद गोरी की मृत्यु के बाद उसका गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान बना (1206 ई.)। मात्र पाँच वर्ष के अपने शासनकाल में उसने सल्तनत सत्ता को बनाए रखने का प्रयत्न किया। 1210 ई. में पोलो के खेल में घोड़े पर से गिर जाने के कारण उसकी मृत्यु हुई। कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद उसका गुलाम और दामाद इल्तुत्मिश गद्दी पर बैठा। उसने सल्तनत सत्ता को सर्वोपरि बनाने के लिए ‘चेहलगान’ (चारगान) की स्थापना की अर्थात् 40 तुर्क अमीरों के दल की रचना की। उसने राजधानी का स्थानांतरण लाहौर से दिल्ली किया। इल्तुत्मिश को गुलामवंश का वास्तविक स्थापक माना जाता है। अपने एक भी पुत्र को सुल्तान बनाने के योग्य न समझकर इल्तुत्मिश ने अपनी काबिल पुत्री रजिया को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।

इल्तुत्मिश की मृत्यु के थोड़े समय बाद उसकी पुत्री रजिया सुल्तान दिल्ली की गद्दी पर बैठी। वह दिल्ली की गद्दी पर बैठनेवाली प्रथम महिला शासक थी। उस समय के इतिहासकार मिन्हाज-ए-सिराज भी मानते हैं कि रजिया सुल्तान अपने सभी भाइयों में सबसे अधिक काबिल और सक्षम थी। फिर भी एक महिला शासनकर्ता के रूप में मान्यता मिलना मुश्किल था। दरबारी भी उसे स्वतंत्र शासक के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। अमीरों की सत्ता लालसा और निरंतर चलनेवाले विद्रोहों ने उसके शासन का अंत कर दिया। उसकी मृत्यु के बाद 6 वर्ष तक राज्य में अराजकता का माहौल रहा। अमीरों ने इल्तुत्मिश के पुत्र नासिरुद्दीन को दिल्ली की गद्दी पर बैठाया। 21 वर्ष के उसके शासनकाल के बाद उसकी मृत्यु होने से गयासुद्दीन बलबन गद्दी पर बैठा। उसने ‘चेहलगान’ दल का नाश करके शासनतंत्र पर से अमीरों के प्रभाव को कम किया। उसने राजा के पद को अधिक मजबूत बनाया। बलबन साहित्य और कला का पोषक भी था। 22 वर्ष के उसके शासन के थोड़े समय बाद दिल्ली सल्तनत पर खिलजी वंश की स्थापना हुई।

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खिलजी वंश (1290 ई. – 1320 ई.) : जलालुद्दीन खिलजी से खिलजी वंश के शासन की शुरुआत हुई। जलालुद्दीन के 6 वर्ष के शासन के बाद दिल्ली की गद्दी पर महत्त्वाकांक्षी सुल्तान अलाउद्दीन आया। उसने उत्तर भारत, गुजरात और दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त करके साम्राज्य का विस्तार किया। दिल्ली में स्थायी सेना की शुरुआत की। उसने सेना के घोड़ों और सैनिकों की विशिष्ट पहचान के लिए ‘दाग’ और ‘चेहरा’ पद्धति की शुरुआत की। इसके उपरांत भाव-नियमन, बाजार-नियंत्रण, संग्रहखोरी-नियमन जैसे प्रशासनिक सुधार भी किए। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद राज्य में अराजकता का वातावरण रहा। खिलजी वंश का अंत करके दिल्ली की गद्दी से तुगलक शासन की शुरुआत करनेवाला गयासुद्दीन तुगलक था।

तुगलक वंश (1320 ई. – 1414 ई.) : तुगलक वंश दौरान मुहम्मद-बिन-तुगलक एक प्रतिभाशाली सुल्तान हुआ। उसने अपने समय में कई योजनाएं लागू की, जिसमें दिल्ली से दौलताबाद राजधानी का स्थानांतर, प्रतीक मुद्राप्रयोग आदि योजनाओं का समावेश होता है। परंतु अधिकांश योजनाएँ व्यावहारिकता के अभाव तथा क्रमबद्ध और आयोजनबद्ध कार्यान्वयन के अभाव के कारण निष्फल गईं। अतः इतिहास में ये योजनाएँ ‘तरंगी योजना’ के नाम से जानी जाती हैं। मुहम्मद तुगलक के समय में अफ्रीकन यात्री इब्नबतूता भारत की यात्रा पर आया था। मुहम्मद तुगलक के बाद उसका चचेराभाई फिरोजशाह तुगलक गद्दी पर बैठा। फिरोजशाह तुगलक की मृत्यु के बाद तैमूरलंग ने दिल्ली पर आक्रमण किया (1398-99 ई.)। जिससे सत्ता की नींव हिल गई और तुगलक-सत्ता मर्यादित बनी।

सैयद वंश (1414 ई. – 1451 ई.) और लोदी वंश (1451 ई. – 1526 ई.) : तुगलक वंश के शासन के अंत के बाद खिज्र खाँ ने सैयद वंश की स्थापना की थी। सैयद वंश के बाद बहलोल लोदी ने लोदी वंश की स्थापना की थी। बहलोल लोदी सल्तनत का प्रथम अफगान शासक था। लोदी वंश का अंतिम बादशाह इब्राहिम लोदी था। 1526 ई. में बाबर के साथ पानीपत के प्रथम युद्ध में उसकी पराजय हुई और सल्तनतयुग का अंत हुआ। इसी के साथ मुगल शासन की शुरुआत हुई।

राज्य-व्यवस्था

13वीं शताब्दी में स्थापित दिल्ली सल्तनत भारत में राज्य शासन-व्यवस्था की दृष्टि से विशिष्ट थी। दिल्ली सल्तनत शासन के केन्द्र में सुल्तान था। सुल्तान की सत्ता सर्वोपरि मानी जाती थी। जो सर्वोच्च सेनापति, कार्यकारिणी का सर्वोच्च प्रमुख और सर्वोपरि न्यायाधीश भी था। सुल्तान को मदद करने के लिए एक मंत्रिमंडल था। मंत्रिमंडल के मंत्रियों एवं अधिकारियों की नियुक्ति सुल्तान स्वयं करता था। सल्तनत शासन-व्यवस्था केन्द्रीय, प्रांतीय और स्थानीय – इस तरह तीन विभागों में विभाजित थी।

केन्द्रीय शासन : सुल्तान के बाद मंत्रिमंडल मुख्य था। सुल्तान का प्रधानमंत्री वजीर कहलाता था, जो प्रशासनतंत्र का प्रमुख था। इसके उपरांत मंत्रिमंडल में सैन्य-विभाग, पत्राचार-विभाग, धर्म-विभाग, विदेश-विभाग, गुप्तचर-विभाग आदि विभागों का समावेश होता था। इस तरह, कुछ अंश में आधुनिक मंत्रिमंडल जैसी व्यवस्था उस समय देखने को मिलती है।

प्रांतीय शासन : सल्तनतकाल में प्रांत को जागीर में बाँटा गया था, जिसे ‘इक्ता’ कहते थे। इक्ता का प्रमुख ‘इक्तेदार’ या ‘मुक्ति’ कहलाता था, जो प्रांत की कार्यकारिणी और न्यायतंत्र का प्रमुख होता था। उसका कार्य भू-राजस्व एकत्र करना और सुल्तान को आवश्यकता अनुसार सेना उपलब्ध करवाना था। जबकि अलाउद्दीन खिलजी और मुहम्मद तुगलक के समय में केन्द्रीय सेना को महत्त्व देते हुए इक्तेदारों पर नियंत्रण स्थापित किया गया।

स्थानीय प्रशासन : प्रांत से नीचे की इकाई को जिला और तहसील में विभाजित किया जाता था, जिसे क्रमशः ‘शिक’ और ‘परगना’ कहा जाता था। गाँव का प्रशासन मुखिया या मुकद्दम करता था, पटवारी और लिपिक उसकी मदद करते थे।

किला और अन्य निर्माण

दिल्ली सल्तनत की स्थापना से भारत में भारतीय इस्लामिक शैली के स्थापत्यों के निर्माण की शुरुआत हुई। दिल्ली सल्तनत के समयकाल दौरान किला, मस्जिद, मकबरा, मकान, बगीचा, दरवाजा, मीनार आदि जैसी स्थापत्यकला की दृष्टि से उल्लेखनीय निर्माण हुए।

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कुतुबुद्दीन ऐबक के समय में दिल्ली में कुव्वत-उल-इस्लाम नामक मस्जिद का निर्माण हुआ। ऐबक द्वारा बनवाई गई दूसरी महत्त्वपूर्ण इमारत कुतुबमीनार है। कुतबुद्दीन के समय में उसकी एक मंजिल बन सकी थी। उसकी मृत्यु के बाद शेष काम इल्तुत्मिश ने पूर्ण करवाया था। फिरोजशाह तुगलक और सिकंदर लोदी ने उसका जीर्णोद्धार करवाया। कुतुबुद्दीन ऐबक निर्मित अन्य एक इमारत ‘ढाई दिन का झोपड़ा’ नामक मस्जिद है, जो अजमेर में है। इल्तुत्मिश के समय में हौज-ए-शम्सी, शम्सी ईदगाह और जामा मस्जिद का निर्माण हुआ था। खिलजी वंश दौरान अलाउद्दीन खिलजी द्वारा बनवाए अलाई दरवाजा नामक प्रवेशद्वार, सीरी नामक किला और सीरी नामक नगर तथा हौज-ए-खास का समावेश होता है। तुगलक शासन दौरान तुगलकाबाद, फिरोजाबाद, हिसार, जौनपुर, फिरोजपुर, फतेहाबाद आदि नगर बसाए गए। इस समयकाल दौरान दिल्ली में अनेक किलों, मस्जिदों, तालाबों, महलों, स्नानागरों, मकबरों, पुलों, सरायों, बगीचों आदि का निर्माण हुआ। सैयद और लोदी वंश दौरान मकबरों और मस्जिदों का निर्माण हुआ। जिनमें बंदेखान का गुम्बज, बड़ा गुम्बज, मोठ की मस्जिद और शहाबुद्दीन का मकबरा मुख्य है।

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विजयनगर साम्राज्य (1336 ई. – 1646 ई.)

तुगलक वंश के निर्बल सुल्तानों के समय दौरान दिल्ली सल्तनत के विघटन की प्रक्रिया शुरू हुई। सैयद वंश और लोदी वंश के समय यह प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ी। तैमूर के आक्रमण के कारण भी स्थिति अधिक खराब हुई थी। इन सभी परिस्थितियों के कारण उत्तर और दक्षिण भारत में अनेक प्रदेश स्वतंत्र हुए, जिनमें विजयनगर, बहमनी, मालवा, मेवाड़, बंगाल, जौनपुर आदि का समावेश होता है। यहाँ हम विजयनगर और बहमनी राज्य के विषय में थोड़ी-सी जानकारी प्राप्त करेंगे।

हरिहरराय और बुक्काराय नामक दो भाइयों (1336 ई. में) ने तुंगभद्रा नदी के किनारे अपने राज्य की राजधानी बनाकर विजयनगर साम्राज्य की नींव डाली। प्रारंभ में उनके गुरु स्वामी विद्यारण्य के नाम पर से यह नगर विद्यानगर के नाम से जाना गया। बाद में उनके सम्राटों की सैन्य सफलता के कारण वह विजयनगर कहलाया। हरिहरराय और बुक्काराय संगम वंश के राजा थे। विजयनगर साम्राज्य में संगमवंश, सालुव वंश, तुलुव वंश और अरविंडु वंश ने शासन किया। हरिहरराय प्रथम और बुक्काराय ने छोटे राज्य को साम्राज्य बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। सालुव वंश के शासन के बाद तुलुव वंश की स्थापना हुई।

तुलुव वंश में कृष्णदेवराय जैसा महान शासक हुआ, जो मात्र तुलुव वंश का ही नहीं बल्कि समग्र विजयनगर साम्राज्य का सर्वश्रेष्ठ शासक सिद्ध हुआ। इतना ही नहीं उसे भारत का एक महान शासक बनने का गौरव भी प्राप्त हुआ। उसने शासन दौरान कई विजय प्राप्त की। कृष्णदेवराय का अधिकांश जीवन युद्ध-भूमि पर ही व्यतीत हुआ। फिर भी उसने प्रशासनिक तंत्र की उपेक्षा नहीं की थी। उसने राज्य में तालाबों एवं नहरों का निर्माण करवाकर खेतीवाड़ी को समृद्ध किया था। कई अयोग्य करों को रद्द करके प्रजा का प्रेम प्राप्त किया था। विजयनगर के पास नागलपुर नामक नगर बसाया तथा उसे इमारतों और मंदिरों से सजाया। कृष्णदेवराय स्वयं विद्वान थे। उन्होंने संस्कृत और तेलगू भाषा में कई ग्रंथ लिखे। साहित्य और कला को बढ़ावा देने के कारण वे ‘आंध्र के भोज’ कहलाए।

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कृष्णदेवराय की मृत्यु के बाद विजयनगर में आंतरिक संघर्ष और षड्यंत्र शुरू हुए। 23 जनवरी, 1565 ई. को तालीकोटा के युद्ध में मुस्लिम राज्यों द्वारा बने संघ के सामने विजयनगर की पराजय हुई। युद्ध के बाद भी विजयनगर साम्राज्य एक शताब्दी तक बना रहा, परन्तु पहले जैसी भव्यता नहीं प्राप्त कर सका।

बहमनी राज्य (1347 ई. – 1518 ई.)

तुगलक वंश के समय में ही दक्खन में ज़फरखान ने (1347 ई.में) बहमनी राज्य की स्थापना की। इस राज्य ने लगभग डेढ़ शताब्दी तक दक्षिण भारत की राजनीति पर प्रभाव बनाए रखा। ज़फरखान ने अलाउद्दीन बहमनशाह नाम धारण करके स्वतंत्र शासन किया। उसने नए स्वतंत्र राज्य की राजधानी गुलमर्ग को बनाकर अपने राज्य में कई प्रदेश जोड़े। बहमनी साम्राज्य में अहमदशाह और मुहम्मद शाह तृतीय का शासन उल्लेखनीय है। अहमदशाह गुलमर्ग से अपनी राजधानी बीडर ले गए और वहाँ कई इमारतों का निर्माण करवाया।

मुहम्मदशाह तृतीय का वजीर महमूद गवाँ था। उसने सक्षम प्रशासनिक तंत्र की रचना की थी। मुहम्मदशाह तृतीय के समय में बहमनी सत्ता मजबूत बनी थी, परंतु उसके बाद महमूदशाह बहमनी द्वितीय के समय में राज्य की सारी सत्ता उसके वजीर कासिम बरीद के हाथ में आ गई। उसी के समय में ही बहमनी साम्राज्य का अंत भी हुआ। समग्र साम्राज्य बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुंडा, बीडर और बरार जैसे पाँच स्वतंत्र राज्यों में विभक्त हो गया।

दिल्ली सल्तनत शासन का अंत

दिल्ली सल्तनत शासन की स्थापना 1206 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा हुई और 320 वर्ष बाद 1526 ई. में इब्राहिम लोदी के शासन के अंत के साथ उसका अस्त हुआ। इस लगभग सवा तीन सौ वर्ष दौरान योग्य, शक्तिशाली और कई बार निर्बल सुल्तान भी गद्दी पर बैठे। दिल्ली के इस मुस्लिम महाराज्य ने अनेक धूप-छाया देखी और ‘जिसका उदय उसका अस्त’ इस न्याय के अनुसार उसका पतन हुआ।

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