Class 7 Social Notes Chapter 7 भक्तियुग : धार्मिक समुदाय और विचारक

भारत के मध्यकालीन सांस्कृतिक घटनाक्रम की एक महत्त्वपूर्ण घटना में भक्ति और सूफी आंदोलन का समावेश होता है। इस आंदोलन का उद्देश्य किसी राजसत्ता का विरोध या राजनीतिक लाभ प्राप्त करना नहीं था, बल्कि उसका मुख्य प्रयोजन अज्ञान, मिथ्याचार, दुःख और यातनाओं से पीड़ित लोगों को सादा, सरल धर्मयुक्त मार्ग बताना था। संत अपने जीवन में चरितार्थ कर चुके उपदेश जनता को देते थे, जिससे उनका गहरा प्रभाव पड़ता था।

उद्भव और विकास

भारत के इतिहास में भक्ति तथा सूफी आंदोलनों का उद्भव और विकास हुआ। जिसके कारण धर्म में ऊँच-नीच का भेदभाव, मान्यताओं, अंधश्रद्धाओं और विविध धर्मों की दीवारों की अवगणना करके भक्तिमार्ग का द्वार सबके लिए खोल दिया गया। भक्ति और सूफी आंदोलनों ने हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक समन्वय को जन्म दिया और एक नए युग की शुरुआत हुई। अधिकांश संत निर्गुणवादी थे। वे ऐक्य के पक्षधर थे। ये सभी संत-फकीर धर्म और संप्रदाय की एकता में मानते थे। सामाजिक समानता के पक्षधर थे। उनके मतानुसार ईश्वर निर्गुण, निराकार और अवर्णनीय है। मूर्तिपूजा और क्रियाकांड के वे विरोधी थे। उन्होंने लोगों को सरल भाषा में उपदेश दिया। लोग समझ सकें, ऐसी भाषा में साहित्य और पदों की रचना की। लोगों की बोल-चाल की भाषा में रचित साहित्य, पद और सरलवाणी ने समाज में ऐक्यवाद का प्रचार-प्रसार किया। वे कहते थे कि सभी धर्मों का सार एक ही है। ईश्वर एक ही है और वह सब जगह विद्यमान है। सभी धर्मों का एक ही मार्ग है – ईश्वर के साथ अनुराग।

मुख्य संत और उनकी विचारधारा

शंकराचार्य ने दक्षिण भारत में धार्मिक-सुधार का कार्य आठवीं शताब्दी में आरंभ किया। उनके पश्चात् 250 वर्ष बाद रामानुजाचार्य ने भक्ति संबंधी प्रेरणा दी। इसी समय दक्षिण भारत में अलवार और नयनार संतों ने भी धार्मिक-आंदोलनों का प्रचार-प्रसार किया। अलवार संत वैष्णव थे और नयनार संत शैव थे। भक्तिमार्ग के ये अनुयायी एकेश्वरवाद में मानते थे। वे सभी धर्मों और संप्रदायों की एकता में विश्वास रखते थे और मूर्तिपूजा तथा कर्मकांड के विरोधी थे।

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भक्ति-आंदोलनों ने आत्मसाक्षात्कार का द्वार सबके लिए खोल दिया। भक्तिमार्ग के संतों और चिंतकों ने आम जनता की भाषा में उपदेश दिया। इन संतों और तत्त्वचिंतकों में कुछ महान आचार्य भी थे, जिनमें शंकराचार्य हिंदू धर्म के प्रचारकों में से एक थे। शंकराचार्य के बाद लगभग 250 वर्ष बाद दक्षिण में रामानुजाचार्य हुए। सामान्य रूप से ऐसा माना जाता है कि, भक्ति-आंदोलन की शुरुआत रामानुजाचार्य से होती है। उन्होंने भक्तिमार्ग का सरल उपदेश देकर ईश्वर-प्राप्ति का संदेश दिया।

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जयदेव और चैतन्य जैसे महान संत भी इसी समय में हुए थे। चैतन्य महाप्रभु ने कृष्णभक्ति के गीतों की रचना करके बंगाल में ‘हरिबोल’ मंत्र की गूंज पैदा की। उत्तर भारत में रामानंद जैसे महान संत ने भक्ति आंदोलन का श्रीगणेश किया। एकेश्वर परंपरा में कबीर सबसे महत्तवपूर्ण संत थे। वे व्यवसाय से जुलाहा थे। ‘बीजक’ उनका कवितासंग्रह है। संत रैदास उनके गुरुभाई थे। वे भी कबीर की तरह गृहस्थ और निर्गुण शाखा के संत थे।

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गुरुनानक सिख धर्म के स्थापक थे। वे निर्गुण शाखा के संत थे। उनके शिष्य सिख कहलाते थे। ‘गुरु ग्रंथसाहिब’ उनका पवित्र ग्रंथ है। उत्तर भारत और राजस्थान में तुलसीदास, सूरदास और मीराबाई वैष्णव भक्ति-आंदोलन के महत्त्वपूर्ण संत थे। तुलसीदास युवावस्था में ही साधू बन गए थे। उन्होंने ‘रामचरित मानस’ और ‘विनयपत्रिका’ जैसे लोकप्रिय ग्रंथों की रचना की थी। तुलसीदास का ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ आज भी उतना ही लोकप्रिय है। गुजरात में भक्तिरस से प्रजा को रसविभोर करने में पंद्रहवीं शताब्दी में हुए संत नरसिंह मेहता का विशेष योगदान है। नरसिंह मेहता (1412 ई. – 1480 ई.) गुजराती भाषा के आदिकवि हैं। मूल तलाजा (भावनगर) के हैं, लेकिन बाद में जूनागढ़ आकर बस गए। उनके ज्ञान और भक्तिपूर्ण पदों तथा प्रभातियों ने लोक जनसमाज पर गहरी छाप छोड़ी है। नरसिंह मेहता का ‘वैष्णवजन तो तेने कहिए…’ भजन आज भी लोकप्रिय है। वे संसारी होने पर भी संसार के रंगों से परे थे। उन्होंने छुआछूत और जातिभेद का विरोध किया था। वे सबके घर भजन करने जाते थे। हरि भजन करनेवाला उनका मन हरि का जन था। ‘पक्षपात में नहीं परमेश्वर, समदृष्टि औ सर्व समान’। उन्होंने कृष्णभक्ति की महिमा का गान करते हुए कहा कि, श्रीकृष्ण की भक्ति के सहारे मनुष्य किसी भी प्रकार की आपत्ति को पार कर सकता है। उनका जीवन इसका उत्तम उदाहरण है। उनके पद प्रभातियों के नाम से प्रसिद्ध हैं।

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राजपूत राजकुमारी मीरांबाई मेड़ता के राजा की पुत्री थीं। उनका विवाह मेवाड़ के राजपरिवार में हुआ था। वे बचपन से ही कृष्णभक्त थीं। श्रीकृष्ण को वे गिरधर गोपाल के रूप में पूजती थीं। मीरांबाई एक भक्त कवयित्री थीं। जिन्होंने गुजराती और हिंदी भाषा में पदों की रचना की थी। उनके पद नरसिंह और कबीर के पद की तरह लोकप्रिय हैं। ऐसे ही एक संत सूरदास थे। वे वल्लभाचार्य के शिष्य थे। व्रज में रहकर उन्होंने श्रीकृष्ण के पदों की रचना की थी।

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महाराष्ट्र में भक्ति-आंदोलन उत्तर भारत के ठीक साथ-साथ चल रहा था। पंढरपुर का विठोबा मंदिर उसका मुख्य केन्द्र था। ज्ञानेश्वर ने महाराष्ट्र में भक्ति-आंदोलन की उम्र में उन्होंने भगवद्गीता पर टीका ‘ज्ञानेश्वरी’ लिखी थी। नामदेव युवावस्था में अधर्म के मार्ग पर थे। परंतु सत्य जानने के बाद धर्म की राह पर मुड़ गए थे और आगे चलकर महाराष्ट्र के महान संत माने गए। एकनाथ भी महाराष्ट्र के महान संत थे। वे ऊँच-नीच और जाति-पाँति के भेदभाव के विरोधी थे। वे सबको समान मानते थे। तुकाराम महाराष्ट्र के संतकवि थे। उनकी अभंग रचनाएँ खूब प्रसिद्ध हैं। समर्थ गुरु रामदास शिवाजी के गुरु थे। उन्होंने आध्यात्मिक और सांसारिक जीवन को जोड़ने का प्रयास किया था। लोगों को उपदेश देने के लिए उन्होंने ‘दासबोध’ नामक ग्रंथ की रचना की थी।

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सूफी-आंदोलन

मध्यकाल में भारत में हुए धार्मिक आंदोलनों में सूफी-आंदोलन का भी समावेश होता है। इस धार्मिक, सामाजिक आंदोलन ने हिंदू-मुस्लिम समन्वय को जन्म दिया। वैसे भी प्राचीनकाल से ही भारत विभिन्न संस्कृतियों का मिलन स्थल रहा है। सूफी शब्द इस्लाम के धार्मिक विचारों को व्यक्त करता है। उसका मुख्य मत ईश्वर और मनुष्य के बीच प्रेम का संबंध स्थापित करना है। भारत में सूफी मत फैलानेवाली मुख्य चार परंपराएँ थीं : (1) चिश्ती (2) सुहरावर्दी (3) कादरी (4) नक्शबंदी।

सूफी आंदोलन में चिश्ती और सुहरावर्दी परंपरा खूब लोकप्रिय थी। बगदाद के शहाबुद्दीन सुहरावर्दी ने सुहरावर्दी परंपरा की स्थापना की थी। अजमेर में मोइनुद्दीन चिश्ती ने चिश्ती परंपरा की स्थापना की थी, जो आज भी कौमी एकता का उत्तम उदाहरण है। उनकी मृत्यु के बाद उन्हें एक सूफी संत के रूप में खूब प्रसिद्धि मिली। मोइनुद्दीन चिश्ती के अतिरिक्त कुतुबुद्दीन बख्तियार, बाबा फरीदुद्दीन-गंज-ए-शकर, निज़ामुद्दीन औलिया, ख्वाजा बकी बिल्लाह और शेख अहमद सरहिंदी मुख्य संत थे। दक्षिण भारत में शेख बुरहानुद्दीन गरीब लोकप्रिय चिश्ती संत थे।

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भक्ति और सूफी-आंदोलन का प्रभाव :

भक्ति और सूफी-आंदोलन के संतों, आचार्यों, विचारकों और चिश्ती संतों वगैरह के उपदेश से समाज में व्याप्त बाह्य आडंबरों, ऊँच-नीच के भेदभाव, अंधविश्वास और अनेक कुरीतियों पर प्रभाव पड़ा। धर्म का सही अर्थ सामान्य मनुष्य नहीं समझ सकता था, वह अब समझने लगा। ईश्वर सबके हैं और हम उसे प्राप्त कर सकते हैं – ऐसी श्रद्धा लोगों में फैल गई। साधु-संतों और चिश्ती संतों के प्रयत्न से धर्मों के बीच का भेदभाव कम हुआ। कबीर जैसे संतों के शिष्य हिंदू-मुस्लिम दोनों थे। इस आंदोलन का प्रभाव ऊँच-नीच के भेदभाव पर पड़ा। इस दौरान कई संतों ने जाति-पाँति का भेद भूलकर सबको अपना शिष्य बनाया। मीराबाई, रैदास, रसखान आदि इसके उत्तम उदाहरण हैं। ग्वालियर के सैयद मुहम्मद छौस ने विंध्याचल के एकांत स्थानों में हिंदू संतों के साथ वर्षों व्यतीत किया था। मुस्लिम रहस्यवादी विचारधारा में कई हिंदू रहस्यवादी क्रियाएँ और प्रार्थनाएँ शामिल की गई हैं। सूफियों ने हिंदुओं की कई धार्मिक क्रिया-विधियाँ अपनाई थीं। उदाहरण स्वरूप सूफीवाद (पंथ) में शामिल सिरमुंडन, जनबीन (भिक्षापात्र) रखना, यात्रियों को पानी पिलाना, संगीत के मुशायरे का आयोजन करना आदि।

इस तरह, भक्ति और सूफी-आंदोलन ने समाज की कायापलट कर दी। हिंदू और मुस्लिम समाज को एक करने की बात की। प्रत्येक संत ने समभाव, सदाचार भाईचारा की बात की। वैसे भी भारत देश अनेक संस्कृतियों और धर्मों का आश्रयस्थान रहा है। जिसमें मध्यकालीन संतों ने अपने सरल उपदेशों से जान डाल दी।

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