Class 7 Social Notes Chapter 11 पर्यावरण के घटक और आंतरसंबंध

पृथ्वी सौरमंडल का एकमात्र ऐसा ग्रह है, जिसे प्राकृतिक पर्यावरण की भेट मिली है। यदि पर्यावरण नहीं होता तो हमारा अस्तित्व ही नहीं होता। पर्यावरण के कारण मानव जीवन चलता रहता है। पर्यावरण अस्तित्व, विकास तथा प्रगति का प्रेरक बल है।

पर्यावरण शब्द दो शब्दों से बना है : ‘परि’ अर्थात् आसपास या चारों तरफ और ‘आवरण’ अर्थात् ऊपर आई हुई विशिष्ट सतह या स्तर। पर्यावरण अर्थात् पृथ्वी के आसपास रचा प्राकृतिक घटकों का आवरण। पर्यावरण यह मृदावरण, जलावरण, वातावरण और जीवावरण से बना है।

पर्यावरण के घटक

पर्यावरण मुख्य चार घटकों का बना है। इन चार घटकों में मृदावरण, जलावरण, वातावरण और जीवावरण का समावेश होता है। इन चार आवरणों के विषय में कक्षा 6 में अध्ययन किया था। हम इनके विषय में संक्षिप्त में समझेंगे :

मृदावरण : पृथ्वी के ऊपर की ठोस परत को मृदावरण कहते हैं। यह परत चट्टानों, खनिजों और मिट्टी से बनी है। मृदावरण की मुख्य उपयोगिता यह है कि वह सजीवसृष्टि के लिए आवास, कृषि के लिए जमीन तथा उद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध करता है।

जलावरण : पृथ्वी की सतह का निचला हिस्सा पानी से घिरा है, जिसे जलावरण कहते हैं। जो पानी के विभिन्न स्रोत जैसे कि महासागरों, समुद्रों, नदियों, झीलों आदि से बना है। पानी सजीवसृष्टि के लिए अनिवार्य है तथा महासागर भी संसाधनों के भण्डार हैं।

वातावरण : पृथ्वी के चारों तरफ आए हवा के आवरण को वातावरण कहते हैं। वातावरण विविध गैसों, जलवाष्प, धूल के रजकणों, क्षारकणों आदि से बना है। वातावरण सूर्य की पराबैंगनी किरणों को शोषित कर जीव सृष्टि की रक्षा करता है। वातावरण के माध्यम से हम आवाज सुनते हैं। रेडियो, टेलीविजन और मोबाइल फोन के संदेशाव्यवहार/प्रसारण वातावरण को आभारी है।

जीवावरण : पृथ्वी पर मृदावरण, जलावरण और वातावरण के जिस भाग में जीवसृष्टि व्याप्त है, उसे जीवावरण कहते हैं। इनमें वनस्पति, प्राणियों, जीवजंतुओं और मानव का समावेश होता है। सजीवसृष्टि की खुराक और अन्य आवश्यकताएँ जीवावरण में से प्राप्त (पूरी) होती हैं।

पर्यावरण के मुख्य दो प्रकार है : प्राकृतिक पर्यावरण और मानवसर्जित पर्यावरण। प्राकृतिक पर्यावरण में जैविक घटक जैसे कि वनस्पति सृष्टि, प्राणीसृष्टि और मानव का समावेश होता है। अजैविक घटकों में भूमि, जल, हवा आदि का समावेश होता है। मानवसर्जित पर्यावरण मानव के बुद्धि-कौशल से जैविक और अजैविक घटकों के साथ आंतर क्रिया से बनता है।

मानवनिर्मित पर्यावरण

मनुष्य अपने आसपास के पर्यावरण के साथ आंतरक्रिया करता है। अपनी आवश्यकता के अनुसार उसमें परिवर्तन करता है। आदिकाल में मनुष्य भटकता जीवन जीता था और अपनी आवश्यकता के लिए पर्यावरण को अनुकूल बनाता था। उसका जीवन सरल और आवश्यकताएँ मर्यादित थीं, जिससे उसके आसपास के पर्यावरण में से सभी आवश्यकताएँ पूरी हो जाती थीं। समय के साथ परिवर्तन हुआ और आवश्यकताओं में भी वृद्धि हुई। मनुष्य ने पर्यावरण का उपयोग और उसमें परिवर्तन करने के तरीके सीख लिए थे। परिणामस्वरूप कृषि, पशुपालन, चक्र की खोज, औद्योगिक क्रांति के कारण उत्पादन में वृद्धि हुई। इस मानवनिर्मित पर्यावरण को सांस्कृतिक पर्यावरण के रूप में भी पहचाना जाता है।

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जल का वितरण

पृथ्वी के धरातल पर भूमि क्षेत्र की अपेक्षा जल क्षेत्र अधिक है। जो पृथ्वी के धरातल का लगभग 71 % क्षेत्र रोकता है। पानी की विशाल जलराशिवाले भागों को महासागर कहते हैं। पृथ्वी पर चार महासागर हैं, जो इस प्रकार से हैं : (1) पेसिफिक (2) एटलान्टिक (3) हिन्द (4) आर्कटिक। ये सभी महासागर एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। ये महासागर खूब ही विशाल और गहरे हैं। पेसिफिक महासागर में तो 10 से 11 किलोमीटर तक गहरी घाटियाँ हैं।

पृथ्वी के धरातल के पानी का अधिकांश भाग खारा है। जो मुख्यतः महासागरों और समुद्रों में है। मीठे पानी के मुख्य स्रोत हिमशिखर, भूमिगत पानी, सरोवर नदियाँ आदि हैं।

समुद्र की लहरें

समुद्र में लहरें विविध प्रकार के बलों से उत्पन्न होती हैं। सामान्य लहरें समुद्र की सतह पर बहते पवनों से सर्जित होती हैं। बवंडर या चक्रवात से ऊँची लहरें उछलती हैं। ये लहरें समुद्री किनारे पर पहुँचकर भारी नुकसान करती हैं।

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ज्वार-भाटा

दिन में दो बार समुद्र का स्तर समयांतर में ऊँचा चढ़ता और नीचे उतरता है। समुद्र की इस उतार-चढ़ाव की घटना को ज्वार-भाटा कहते हैं। ज्वार के समय समुद्र का पानी लहरों के रूप में किनारे की तरफ घुस आता है जबकि भाटे के समय समुद्र का पानी किनारे से समुद्र की तरफ लौटता है। दो ज्वार या भाटे के बीच का समय अंतर लगभग 12:25 घण्टे जितना अमावस्या होता है।

सूर्य और चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण पृथ्वी पर ज्वार-भाटा आता है। सूर्य चंद्र से द्रव्यमान में अधिक बड़ा है परंतु चंद्र की अपेक्षा पृथ्वी से दूर स्थित है जिससे पृथ्वी पर चंद्र का गुरुत्वाकर्षण बल अधिक है। पृथ्वी के भिन्न-भिन्न भाग सूर्य और चंद्र के सामने आते हैं। इसलिए अलग-अलग समय पर ज्वार-भाटा आता है।

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अमावस्या और पूनम के दिन सूर्य, पृथ्वी और चंद्र लगभग एक सीधी रेखा में आते हैं। इस स्थिति के प्रभाव से दीर्घ ज्वार आता है, जबकि शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष के मध्य के दिनों में गुरुत्वाकर्षण घटने से ज्वार नीचे आते हैं।

महासागरीय प्रवाह (समुद्री धाराएँ)

धरती पर नदियों की तरह महासागरों में भी विशाल जलराशि हजारों वर्षों से निश्चित दिशा में बहती है, इस प्रवाह को महासागरीय प्रवाह कहते हैं। ये प्रवाह गरम अथवा ठण्डा होता है। प्रवाहों के उद्भव के कारण सूर्यशक्ति, पवन, समुद्रजल की क्षारता और पृथ्वी का परिभ्रमण मुख्य है। अधिकांश गरम धाराएँ विषुववृत्त से ध्रुवों की तरफ और ठंडी धाराएँ ध्रुवों से विषुववृत्त की तरफ गति करती हैं।

पर्यावरण के घटकों के बीच आंतरसंबंध

पर्यावरण के सभी घटकों में मानव केन्द्र में है। पर्यावरण के भिन्न-भिन्न घटक कुछ भौतिक चक्रों से एक-दूसरे के साथ संलग्न हैं। ये भौतिकचक्र मानवीय प्रवृत्तियों से प्रभावित होते हैं। मृदावरण में मनुष्य खनिज प्राप्त करने के लिए उत्खनन करता है। उन खण्डों में पानी भरने से वे जलावरण का भाग बन जाते हैं। वातावरण में तापमान बढ़ने से जलावरण के पानी का वाष्पीभवन होता है और वह वातावरण में मिलता है। वातावरण में रही नमी का घनीभवन होने से बादल बनते हैं और बरसात होती है। उस पानी के बहने से मृदावरण का कटाव होता है और विविध भूमि-स्वरूपों की रचना होती है। इसके उपरांत मनुष्य की विविध प्रवृत्तियाँ, प्राकृतिक पर्यावरण के घटक पर्यावरण के घटकों के कारण जीवसृष्टि से परस्पर जुड़ी हैं।

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प्रदूषण

मानव अपनी बुद्धिशक्ति से पर्यावरण के विविध घटकों के उपयोग द्वारा अपनी आवश्यकताओं को संतुष्ट करता है। महात्मा गाँधीजी ने कहा है कि, मानवीय गतिविधियों से प्राकृतिक पर्यावरण के दूषित होने की क्रिया अर्थात् प्रदूषण। पर्यावरण को दूषित करनेवाले घटकों को प्रदूषक कहते हैं। मनुष्य प्रकृति के संसाधनों का अमर्यादित और अविवेकपूर्ण उपयोग करें तब पर्यावरण प्रदूषित होता है। मानव-विकास की तीव्र लालसा, औद्योगिकीकरण और यांत्रिकीकरण पर्यावरण को प्रदूषित करने के लिए जवाबदार हैं।

वर्तमान समय में भूमिप्रदूषण, जलप्रदूषण, वायुप्रदूषण और ध्वनिप्रदूषण अति तीव्रता से बढ़ रहे हैं। प्रदूषण से पर्यावरण, मानव जीवन और सजीव सृष्टि पर विपरीत असर हो रहे हैं। हमें पर्यावरण प्रदूषण, उसके प्रभाव और रोकने के उपाय सोचकर पर्यावरण-संरक्षण के लिए त्वरित कदम उठाने जरूरी हैं।

भूमि (जमीन) प्रदूषण : विविध कारणों से जमीन की गुणवत्ता तथा उसके पोषक घटकों में होनेवाले परिवर्तन (कमी) को भूमि प्रदूषण कहते हैं। भूमि प्रदूषण आसानी से अनुभव नहीं होता। विश्वभर में भूमि प्रदूषण सतत बढ़ रहा है। घरेलू ठोस कचरे या पानी का निकास, उपजाऊ तथा कृषि योग्य जमीन पर उद्योगों की स्थापना, उद्योगों में उपयोग किया गया दूषित पानी खुली जमीन पर छोड़ना, उद्योगों का ठोस कचरा जमीन पर फेंकना, उत्खनन की प्रवृत्तियाँ, निर्माण कार्य, कृषि के लिए रासायनिक खाद, अति सिंचाई और जंतुनाशक दवाओं का बढ़ता उपयोग तथा प्लास्टिक के उपयोग से जमीन प्रदूषित होती है।

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भूमि (जमीन) प्रदूषण रोकने के उपाय :

  • जंतुनाशक दवाओं और रासायनिक खाद के बदले जैविक और देशी खाद, हरी खाद का उपयोग करना चाहिए।
  • जंतुनाशक दवाओं का मर्यादित उपयोग करना चाहिए।
  • ठोस कचरे का वर्गीकरण करके उसे पुन: उपयोग में लाना चाहिए।
  • प्लास्टिक/ठोस कचरे का रिसाईक्लिंग करके पुनः उपयोग करना चाहिए।
  • खेती में टपक और फुवारा सिंचाई पद्धतियों का उपयोग करना चाहिए।

जलप्रदूषण : जल जब उसके निर्धारित उपयोग के लिए अयोग्य बने और उसमें बाह्य अशुद्धियाँ मिश्रित हों तब उस दूषित जल को जलप्रदूषण कहते हैं। गटर का पानी, उद्योगों का प्रदूषित पानी, खनिज तेलवाहक जहाजों में से होनेवाला रिसाव, खेती में उपयोग में आनेवाले रासायनिक खाद और जंतुनाशक आदि जलप्रदूषण के लिए जवाबदार हैं।

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जलप्रदूषण रोकने के उपाय :

  • गृह उपयोग में लिए गए पानी और उद्योगों से प्रदूषित पानी को शुद्धीकरण की प्रक्रिया करने के बाद ही उसका निकास करना चाहिए।
  • शुद्धीकरण-प्रक्रिया किए बिना गंदे पानी के निकास पर कड़े नियंत्रण रखना चाहिए।
  • पानी को प्रदूषित करनेवाले पदार्थों के उपयोग पर नियंत्रण रखना चाहिए।

वायु प्रदूषण : उद्योगों, मिलों, कारखानों, ताप विद्युत केन्द्रों आदि द्वारा छोड़े जानेवाले धुंए या गैस वातावरण में मिलते हैं, जिसे वायु प्रदूषण कहते हैं। वायु प्रदूषण के लिए वायु में उड़ते रजकण जैसे ईंधन के रूप में उपयोग में आनेवाले कोयले के रजकण, कारखाने के धुंए में से कार्बनयुक्त रजकण मिलते हैं। इसके उपरांत पेट्रोल और डीज़ल से चलते वाहनों के धुंए में रहे नाईट्रस ऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, बेन्जोपायरिन और कार्बन डायोक्साइड जैसे वायु के प्रदूषक मिलते हैं। खनन और निर्माण कार्य की प्रवृत्तियों से प्रदूषक वायु में मिलते है। कृषि का ठोस कचरा जलाने पर भी वायु का प्रदूषण बढ़ता है।

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वायु-प्रदूषण रोकने के उपाय :

  • वायु-प्रदूषण रोकने के लिए सरकार को कानून बनाकर सख्ती से पालन करवाना चाहिए।
  • धुंआ और जहरीली गैस फिल्टर हो, ऐसे साधनों का उपयोग करना चाहिए।
  • कोयला, पेट्रोल, डीज़ल आदि का उपयोग आवश्यकता के अनुसार ही करना चाहिए।
  • प्रदूषणमुक्त जैसे CNG, PNG, सौरऊर्जा आदि के उपयोग को प्रोत्साहित करना चाहिए।
  • सार्वजनिक परिवहन में यात्रा करने के लिए लोकजागृति फैलानी चाहिए।
  • वाहनों के लिए PUC का कड़क अमल करवाना चाहिए।

ध्वनि-प्रदूषण : अनावश्यक, अत्यंत असाध्य आवाज अर्थात् शोर। इस शोर को हम ध्वनि प्रदूषण के नाम से पहचानते हैं। शोर प्रत्येक व्यक्ति के लिए सापेक्ष होता है। मंद संगीत सुननेवाले के लिए रॉक संगीत शोर लगता है, जबकि रॉक संगीत के चाहक के लिए वह कर्णप्रिय होता है।

कारखानों में चलते यंत्रों, वाहनों की कर्कश आवाज़ और हॉर्न की आवाज़, सिनेमा घरों, टी.वी. की बढ़ती आवाज ध्वनि प्रदूषण को बढ़ाती है। जेट विमानों और युद्ध विमानों की कर्कश तथा तीखी गर्जना, विविध प्रकार के साइरनों की आवाज़ ध्वनि प्रदूषण को बढ़ाती है। सामाजिक प्रसंगों में उपयोग में आते लाउड स्पिकरों, बैन्डबाजों, ढोलनगाड़ों, डी.जे. की आवाज़, उत्सवों और उद्घाटन प्रसंगों पर की जानेवाली आतिशबाजी, सार्वजनिक कार्यक्रमों, चुनाव रैलियों, विज्ञापनों की आवाज़ भी ध्वनि प्रदूषण करती है।

ध्वनि प्रदूषण से मानव में बहरापन आता है, मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत असर, स्वभाव में चिड़चिड़ापन और कार्य करने की क्षमता में कमी आती है। अधिक शोर से कई कीट और जीवाणुओं का नाश होता है।

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ध्वनि-प्रदूषण रोकने के उपाय :

  • सिनेमाघर, सार्वजनिक सभागृहों में ध्वनिशोषक यंत्र और पर्दे लगाना चाहिए।
  • सामाजिक प्रसंग, उत्सवों, उद्घाटन प्रसंगों आदि में अनावश्यक शोर को टालना चाहिए।
  • उद्योगों, हवाई अड्डों के आसपास अधिक वृक्ष लगाने चाहिए।
  • विद्यालय, हॉस्पिटल जैसे स्थलों के पास ‘नो होर्न’, ‘साईलन्स जोन’ का सख्त पालन करवाना चाहिए।
  • मनाए जानेवाले (आयोजित) कार्यक्रमों में पटाखों का उपयोग टालना चाहिए।
  • रेडियो, टेलीविजन, मोबाइल फोन आदि की आवाज़ कम रखने की आदत डालनी चाहिए।
  • यंत्रों और वाहनों की समयांतर में सर्विस (रिपेयरिंग) करवानी चाहिए।

मानव की उपर्युक्त विविध प्रवृत्तियों से जमीन, जल, वायु और ध्वनि प्रदूषण होता है। इसके अलावा अन्य कुछ प्रवृत्तियाँ जैसे कि अवकाश में प्रक्षेपित उपग्रहों, अवकाश यात्रियों द्वारा अवकाश में छोड़ा गया कचरा, कृत्रिम वर्षा करने के लिए छोड़े गए विविध रसायन, परमाणुशक्ति के उपयोग से होता किरणोत्सर्गी प्रदूषण आदि भी पर्यावरण को प्रभावित करता है। तथा कुछ प्राकृतिक घटनाएँ, आपत्तियाँ जैसे कि ज्वालामुखी विस्फोट, भूकंप, बाढ़ भी पर्यावरण के प्रदूषण में वृद्धि करती है। पर्यावरण संरक्षण और पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के लिए मनुष्य स्वयं ही दृढ़ संकल्प करे यही अंतिम उपाय है।

Class 7 Social Notes Chapter 9 अठारहवीं सदी के राजनीतिक शासक

भारत में 18वीं सदी अनेक राजनैतिक उथल-पुथलवाली थी। 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के बाद भारत छोटे-छोटे राज्यों में बँट गया था। जिसका हम अध्ययन करेंगे।

मुगलवंश का अंतिम शासक

औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल गद्दी पर बहादुरशाह नामक सुलतान आया। उसने राजपूत और मराठा राज्यों के साथ शांतिपूर्ण संबंध स्थापित किया। जबकि मराठों के बीच उत्तराधिकार के मुद्दे पर विग्रह भी करवाया। उसके समय में गुरुगोविंदसिंह की मृत्यु के बाद सिख सरदार बंदा बहादुर ने मुगल साम्राज्य के सामने विद्रोह किया।

1712 ई. में बहादुरशाह की मृत्यु होने पर जहाँदरशाह गद्दी पर आया। किंतु 1713 ई. में ही उसे पदस्त करके फर्रुखसियर गद्दी पर बैठा। इस समय सैयद बंधुओं के रूप में पहचाने जानेवाले दोनों भाई साम्राज्य में खूब वर्चस्व रखते थे। उन्होंने फर्रुखसियर को गद्दी पर से उतारकर मुहम्मदशाह को बादशाह बना दिया। उसने लम्बे समय तक शासन किया। उसके समय में 1739 ई. में ईरान के नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण किया। जिसने मुगल साम्राज्य को भारी क्षति पहुँचाई। 1759 ई. में गद्दी पर बैठनेवाले शाह आलम द्वितीय को अंग्रेजों ने बक्सर के युद्ध में हराकर कंपनी का पेन्शनर बना दिया।

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बंगाल

मुर्शिदकुली खान और अलीवर्दी खान ने बंगाल में स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। 1757 ई. में सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब हैदराबाद बना। ईस्ट इंडिया कंपनी और बंगाल के नवाब के बीच 1757 ई. में प्लासी का युद्ध हुआ। इस युद्ध की जीत से बंगाल में अंग्रेजों को 24 परगना की जागीर मिली। प्लासी के युद्ध के बाद नवाब बने मीरजाफर को हटाकर मीरकासिम को बंगाल का नवाब बनाया। उसने अवध के नवाब और मुगल शहंशाह का सहयोग पाकर अंग्रेजों के समक्ष बक्सर का युद्ध किया, जिसमें उसकी पराजय होने से बंगाल में नवाब के शासन का अंत हुआ।

राजपूत शासन

मुगल साम्राज्य के पतन के बाद राजस्थान में जयपुर सबसे शक्तिशाली राज्य था। राजा सवाई जयसिंह कुशाग्र राजनेता, सुधारक, कानूनविद् और विज्ञानप्रेमी थे। उन्होंने जयपुर शहर की स्थापना की। वे महान खगोलशास्त्री थे। उन्होंने दिल्ली, जयपुर, उज्जैन और मथुरा में आधुनिक वेधशालाओं की स्थापना की थी।
अन्य राजपूत राज्यों में जोधपुर, बीकानेर, कोटा, मेवाड़, बूंदी और शिरोही मुख्य थे।

सिख साम्राज्य

गुरुनानक ने 15वीं सदी में सिख धर्म की स्थापना की थी। सिख धर्म गुरु परंपरा के साथ जुड़ा हुआ है, जिसमें 10 गुरु हुए। दसवें गुरु गोविंदसिंह ने सिखों को एकता के धागे में बाँधकर सिख राज्य की स्थापना की। गुरु गोविंदसिंह के बाद बंदा बहादुर ने मुगल साम्राज्य के विरुद्ध भयंकर विद्रोह किया। सिख 12 समूहों में विभाजित थे, जिनमें से एक समूह सुकरचकिया के शक्तिशाली नेता रणजीत सिंह ने सिख साम्राज्य का विकास किया। उन्होंने लाहौर और अमृतसर पर विजय प्राप्त की। उन्होंने कश्मीर, पेशावर और मुलतान पर विजय प्राप्त करके सिख साम्राज्य के विस्तार को विशाल बनाया। उनकी सेना में यूरोपियन सेनापति और सैनिक थे। उन्होंने अपनी सेना को यूरोपियन सेना की तरह अति आधुनिक बनाया था। लाहौर में उन्होंने तोप बनाने का कारखाना स्थापित किया था। वे धार्मिक दृष्टि से उदार थे। जबकि उनकी मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने 1849 ई. में सिख साम्राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया।

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मराठा साम्राज्य

17वीं सदी के महान शासकों में छत्रपति शिवाजी अग्रगण्य हैं। बीजापुर के सुलतान, मुगल सम्राट औरंगजेब, पुर्तगालियों वगैरह को थका करके शिवाजी ने एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की थी।

छत्रपति शिवाजी महाराज के नेतृत्व में मराठों ने दक्कन में गुरिल्ला युद्ध-पद्धति अपनाई। उन्होंने स्वतंत्र राज्य के लिए कुशल, कार्यक्षम और प्रजाहितकारी शासनतंत्र की स्थापना की। इन सिद्धियों के साथ शिवाजी का उच्च चरित्र और उदार नीतियाँ भी शामिल थीं। छत्रपति शिवाजी के बाद शिवाजी के पौत्र शाहू को औरंगजेब ने कैद कर लिया था। 1707 ई. के बाद जब शाहू मुक्त हुए तो अपनी काकी ताराबाई से उत्तराधिकार के लिए संघर्ष हुआ। शाहू से जुड़े पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने शाहू को विजय दिलवाई। उनके समय से मराठा राज्य में पेशवा प्रथा की शुरुआत हुई।

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बालाजी विश्वनाथ प्रथम पेशवा थे। उन्होंने मराठा राज्य का विकास करके सभी सत्ताएँ अपने हाथ में ले ली। 1720 ई. में उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र बाजीराव प्रथम पेशवा बने। वे कुशल योद्धा और चतुर राजनीतिज्ञ थे। उन्होंने कई मुगल क्षेत्रों को मराठा साम्राज्य में मिलाकर मराठा राज्य का विकास किया। उन्होंने मालवा, गुजरात और बुंदेलखंड भी जीत लिया। इतना ही नहीं उन्होंने हैदराबाद के निज़ाम को भी हराया। उन्होंने महाराष्ट्र को एक महान मराठा साम्राज्य में परिवर्तित कर दिया।
बालाजी विश्वनाथ

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1740 ई. में उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र बालाजी बाजीराव पेशवा बने। उन्होंने बंगाल से लेकर मैसूर तक विजय प्राप्त की।

1761 ई. में ईरान के शाह अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर आक्रमण किया। मराठों और अब्दाली के बीच पानीपत का तृतीय युद्ध हुआ, जिसमें मराठा राज्य की हार हुई। हार का समाचार मिलते ही आघात से बालाजी बाजीराव की मृत्यु हुई। इस युद्ध ने मराठों को निर्बल बनाया। परिणाम स्वरूप भारत में ब्रिटिश सत्ता का उदय हुआ।

Class 7 Social Notes Chapter 14 संसाधनों की देखभाल और संरक्षण

संसाधन

पृथ्वी पर प्राप्त होनेवाले मानव उपयोगी प्राकृतिक पदार्थों को संसाधन कहते हैं। वायु, जल, जमीन, वनस्पति और खनिजों के स्वरूप में हमें प्राप्त प्राकृतिक भेट अर्थात् प्राकृतिक संसाधन। संसाधन राष्ट्रीय अर्थतंत्र की रीड की हड्डी है। वह लोगों की शक्ति और समृद्धि का आधार स्तंभ है। संसाधनों की कुछ निश्चित विशेषताएँ और उपयोगिताएँ हैं। सामान्य रूप से संसाधन मर्यादित मात्रा में उपलब्ध हैं। इन संसाधनों को अधिक उपयोगी बनाने के लिए हमें विविध तकनीकों का उपयोग करना चाहिए।

संसाधनों के प्रकार

संसाधनों का हम विविध रूप से उपयोग करते हैं। कृषि से लेकर उद्योग और परिवहन की प्रवृत्ति तक सभी प्रवृत्तियों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हम प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते हैं। भोजन के रूप में, जमीन और वनस्पति में से प्राप्त होती विविध सामग्री ईंधन और ऊर्जा के रूप में उपयोग करते हैं।

संसाधन सामान्यतः दो भागों में विभाजित किए जाते हैं : प्राकृतिक और मानवनिर्मित। भूमि, जल, खनिज और जंगलों का प्राकृतिक संसाधनों में समावेश होता है। इसमें भी दो प्रकार हैं : जैविक और अजैविक। भूमि, हवा, जल, जमीन अजैविक संसाधन हैं, जबकि जंगल और प्राणी जैविक संसाधन हैं। मानवसर्जित उद्योग, स्मारक, चित्रकला और सामाजिक संस्थाएँ आदि मानवनिर्मित संसाधन हैं। मनुष्य में रहे ज्ञान, बुद्धि, कौशल, स्वास्थ्य और अन्य गुणों का समावेश मानवसंसाधन में होता है। प्राकृतिक संसाधनों के विकास के लिए मानवसंसाधन होना आवश्यक है।

कुछ ऐसे संसाधन हैं जो निश्चित समय में स्वयंनिर्मित होते हैं। वृक्ष-पत्ते, पशु-पक्षी आदि में स्वयं उत्पन्न होने की क्षमता होती है। इस तरह वन और वन्यजीवन निश्चित समय में निर्मित होते हैं।

संसाधनों का संरक्षण

प्राकृतिक संसाधन मर्यादित हैं, जबकि मानव की आवश्यकताएँ असीमित हैं। पिछले कुछ वर्षों से तकनीकि क्षेत्र में हुए असाधारण विकास और जनसंख्या विस्फोट से संसाधनों का उपयोग खूब बढ़ गया है। इस परिस्थिति के संदर्भ में गंभीरता से नहीं विचार करेंगे तो उसके गंभीर परिणाम हमें भोगने पड़ेंगे। इसलिए भविष्य की पीढ़ियों के लिए संसाधनों का संरक्षण करना हम सबका कर्तव्य है। संसाधनों का संरक्षण अर्थात् संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग। कुछ संसाधन स्वयं निश्चित समय में अपनी पूर्ति करते हैं अथवा समाप्त नहीं होते हैं जिन्हें नवीनीकरणीय संसाधन कहते हैं। जैसे कि जंगल, सूर्यप्रकाश। एकबार उपयोग के बाद पुन: उपयोग में नहीं लिए जा सकते या बना नहीं सकते उन्हें अनवीनीकरणीय संसाधन कहते हैं। जैसे पेट्रोलियम, खनिज कोयला, प्राकृतिक गैस।

संसाधन

  • भूमि-संसाधन
  • जल-संसाधन
  • जंगल संसाधन
  • कृषि-संसाधन
  • प्राणी (वन्यजीव) संसाधन
  • खनिज संसाधन

इसके अलावा मनुष्य स्वयं भी एक संसाधन है। खनिजों को मालिकी, पुनःप्राप्यता वितरण क्षेत्र के आधार पर भी वर्गीकृत किया जाता है।

भूमि-संसाधन

जमीन निर्माण : सामान्य रूप से भू-धरातल की ऊपरी परत जिसमें वनस्पति उगती है, उसे हम जमीन कहते हैं। जमीन पृथ्वी की पपड़ी के अनेकविध कणों से बनी एक पतली परत है। चट्टानों के छोटे-बड़े टुकड़ों, कंकड़, मिट्टी के रज कण जो अजैविक हैं, उन्हें ‘रेगोलिथ’ कहते हैं। जिसमें जैविक द्रव्य हवा और पानी मिलने से ‘जमीन’ बनती है। कृषि के संदर्भ में किसी भी देश का आर्थिक विकास उस देश की जमीन की गुणवत्ता और प्रकार पर निर्भर करता है।

मिट्टी (जमीन) के प्रकार : भारतीय कृषि संशोधन परिषद (ICAR) द्वारा भारतीय जमीन को कुल आठ भागों में बाँटा गया है : (1) कांप की जमीन (2) लाल जमीन (3) काली जमीन (4) लैटेराइट जमीन (5) मरुस्थलीय जमीन (6) पर्वतीय जमीन (7) जंगलीय जमीन (8) दलदली जमीन।

मिट्टी का कटाव और संरक्षण : गतिशील पानी या हवा से मिट्टी का कटाव होता है। मिट्टी के ऊपरी कणों का तेजी से प्राकृतिक बलों द्वारा अन्यत्र स्थलांतरण होना मिट्टी का कटाव कहलाता है। ऐसा होने से कृषि की उपज में कमी होती है। जिसे रोकना चाहिए।

मिट्टी के कटाव को रोकने के उपाय : बंजर जमीन में वृक्षारोपण करना चाहिए। जहाँ ढालू जमीन है, वहाँ सीढ़ीनुमा खेत बनाकर कृषि करनी चाहिए। चेक डेम बनाने चाहिए। मिट्टी पर चरागाह प्रवृत्ति को नियंत्रण में लेना चाहिए।

भूमि-संरक्षण

भूमि संरक्षण अर्थात् मिट्टी के कटाव को रोककर, उसकी गुणवत्ता बनाए रखना। नदी की घाटियों और पहाड़ी ढलानों पर वृक्ष लगाना। रेगिस्तान के नज़दीक के क्षेत्रों में बहते पवनों को रोकने के लिए वृक्षों की श्रृंखलाएँ उगाना। अनियंत्रित चरागाह को रोकना चाहिए। उपजाऊपन खो-बैठी जमीन में पुनः सेन्द्रिय पदार्थों को मिलाना चाहिए। इसमें सबको मिलकर सामूहिक प्रयत्न करना चाहिए।

जल-संसाधन

पृथ्वी पर पीने लायक पानी की मात्रा लगभग 3 % है। पृथ्वी के एक तिहाई भाग पर जल क्षेत्र है।
जल प्रकृति से प्राप्त अनमोल भेट है। जल मानव-जीवन के प्राथमिक दैनिक जीवन की प्रवृत्तियों, उद्योगों और कृषि के लिए खूब ही उपयोगी स्रोत है। जल संसाधनों में महासागर, उपसागर, नदी, झील, भूमिगत जल आदि का समावेश होता है। पृथ्वी पर जल संसाधन का मुख्य स्रोत बरसात है। सभी जल स्रोत बरसात के आभारी हैं। पृष्ठीय जलस्रोतों में नदी, सरोवर, तालाब, झरने आदि का समावेश होता है, जिनमें मुख्य स्रोत नदी मानी जाती है।

जलसंकट

पानी प्राकृतिक उपहार है। बढ़ती जनसंख्या के लिए अनाज की बढ़ती माँग, व्यापारिक फसलें उगाने, शहरीकरण और उच्च जीवनशैली के परिणाम स्वरूप पानी की माँग निरंतर बढ़ती जाती है। पानी गंदगी की सफाई के लिए भी जरूरी है। वर्तमान समय में हमारे देश के अनेक भागों में जलसंकट बढ़ता जा रहा है। पेयजल की कमी पाई जाती है। वर्तमान समय में भूमिगतजल ट्यूबवेलों द्वारा बाहर निकालने से भूमिगत जल स्तर नीचे चला गया है। आज देश में पानी की घटती उपलब्धता और बढ़ती कमी जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

जल-संसाधनों की सुरक्षा और व्यवस्थापन

आज उपलब्ध जल मर्यादित मात्रा में है। प्रदूषित जल की विकट समस्या है। जिससे उसका विवेकपूर्ण उपयोग और उसके संरक्षण के उपाय करना अनिवार्य बन गया है। जल हमारी सामूहिक संपत्ति है। जलसंरक्षण के लिए सामान्य उपाय जैसे कि अधिक जलाशयों का निर्माण करना, भूमिगत जल को ऊपर लाने के प्रयत्न करना, नदियों के पानी को रोककर जल-संचय करने की आवश्यकता है। बरसात के पानी को रोककर संग्रह करने के उपाय भी करने चाहिए। जैसेकि बांध बनाना, शोषणकुएँ बनाना, खेत-तालाब बनाना आदि कार्य करने चाहिए। इसके अलावा लोकजागृति लाकर जल-संरक्षण में लोक भागीदारी बढ़ाना। बाग-बगीचे, शौचालयों में पानी का उपयोग मितव्ययितापूर्ण करना चाहिए। जलाशयों, नदियों को प्रदूषण से बचाना। भूमिगत जल का उपयोग करनेवाली इकाइयों पर ध्यान रखना चाहिए।

खनिज संसाधन

वर्षों पहले मनुष्य शिकार करने के लिए पत्थर से बने औजारों का उपयोग करता था। इस प्रकार मनुष्य का खनिज के साथ संबंध खूब ही प्राचीन और गहरा है। मानव-संस्कृति में मानव-विकास के युगों के नाम खनिज पर रखे गये हैं। जैसे पाषाणयुग, ताम्रयुग, कांस्ययुग, लौहयुग, वर्तमान समय को अणुयुग कहते हैं। औद्योगिक क्रांति के बाद खनिजों का महत्त्व अनेक गुना बढ़ गया है। भारत के पास पर्याप्त मात्रा में खनिज सम्पत्ति होने से विश्व के देशों के साथ कदम मिलाने के लिए आगे बढ़ रहा है।

खनिज-संरक्षण

औद्योगिक क्रांति के बाद तकनीकि और बढ़ती जनसंख्या की माँग के कारण प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग चरम सीमा तक पहुँच गया है। जिससे कुछ खनिजों के समाप्त होने का भय उत्पन्न हो गया है। खनिज सम्पत्ति का वर्तमान में खूब उपयोग होने लगा है। पेट्रोलियम जैसे खनिज पदार्थ समाप्त होने के स्तर पर आ गए हैं।
इसलिए खनिज संसाधनों का मितव्ययितापूर्ण उपयोग करना चाहिए। उनका संरक्षण एक प्रकार की बचत है। समाप्त होनेवाले खनिजों का विकल्प खोजना भी जरूरी है। जहाँ तक संभव हो खनिजों का पुन: उपयोग करने की प्रक्रिया करनी चाहिए।

वन और वन्यजीव संसाधन

मानवजीवन का अस्तित्व और प्रगति विविध संसाधनों का आभारी है। प्रकृति से हम विविध चीजें प्राप्त कर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। जिनमें जंगल अति महत्त्वपूर्ण संसाधन हैं। साथ ही वन्यजीवन भी अजीब और वैविध्यपूर्ण है। भारतीय संस्कृति में भी वनों का खूब महत्त्व दर्शाया है।

जंगलों का महत्त्व :
जंगल हमें अनेक तरह से उपयोगी है। जंगलों से प्राप्त होनेवाली साग और साल की लकड़ी इमारती लकड़ी के रूप में उपयोगी होती है। जिससे घर का फर्निचर आदि बनाया जाता है। देवदार और चीड़ की लकड़ी से खेल सामग्री बनती है। बाँस से टोकरा-टोकरी, कागज, रेयॉन आदि बना सकते हैं। जंगल से लाख, गोंद, शहद, औषधियाँ आदि हमें मिलती हैं। जंगलों में रहनेवाली प्रजा को आजीविका देते हैं।

जंगलों के आर्थिक महत्त्व के साथ पर्यावरणीय महत्त्व भी विशेष है। जंगल जलवायु को विषम बनने से रोककर नमी बनाए रखते हैं। वर्षा लाने में सहायक हैं। भूमिगत जल को टिकाए रखने में भी सहायक होते हैं तथा मिट्टी के कटाव को भी रोकते हैं। वातावरण में ऑक्सिजन और कार्बन-डायोक्साइड का संतुलन बनाए रखने में सहायक हैं।

भारत में जंगलों की मात्रा अत्यंत कम है। सबसे अधिक जंगल अंदमान-निकोबार द्वीपसमूह में तथा मिज़ोरम, मणिपुर, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश राज्यों में हैं। उत्तर-पूर्व के पर्वतीय क्षेत्रों में जंगलों की मात्रा 60 % से अधिक है। गुजरात में उसके कुल क्षेत्रफल के (स्टेट फोरेस्ट डिपार्टमेन्ट 2017-18 की रिपोर्ट के अनुसार) 11.18 % क्षेत्र में जंगल हैं। राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार कुल भू-भाग के 33 % भाग में जंगल होने चाहिए। भारत में लगभग 23 % भू-भाग पर जंगल है।

वन-संरक्षण

वर्तमान में जंगल तीव्रता से नष्ट हो रहे हैं। जंगलों की घटती संख्या विश्व की बड़ी समस्या बन गई है। वनों के घटने के अनेक कारण हैं। जैसे कि मानव की जमीन प्राप्त करने की लालसा, उद्योगों के लिए कच्चा माल प्राप्त करना, इमारती लकड़ी प्राप्त करना, शहरीकरण आदि के कारण जंगल तीव्रता से कम हो रहे हैं।

जंगलों के अंधाधुंध विनाश से पर्यावरण को कुछ गंभीर परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं : (1) प्रदूषण में वृद्धि (2) बरसात का प्रमाण घटना (3) अकाल (4) जमीन का कटाव (5) निराश्रित वन्य पशु और उनकी घटती संख्या (6) वैश्विक तापमान में वृद्धि (7) प्राकृतिक सौंदर्य का नष्ट होना आदि। भारतीय संविधान में वनों, झीलों, नदियों, वन्य प्राणियों सहित प्राकृतिक पर्यावरण का रक्षण करना और उनमें सुधार करना तथा जीवों के प्रति अनुकंपा दर्शाना नागरिक का मूलभूत कर्तव्य है। वन और वन्यजीवन को कानून द्वारा भी सुरक्षा प्रदान की गई है, इसमें सजा का भी प्रावधान किया गया है।

वन-संरक्षण के कुछ उपाय निम्नानुसार हैं :-

  • पर्यावरण-शिक्षण और पर्यावरणीय जागृति लाने से वन-संरक्षण कर सकते हैं।
  • विविध स्पर्धाओं, प्रवृत्तियों द्वारा जंगलों का महत्त्व समझाना।
  • जंगल विभाग के कार्यक्षेत्र को गुणवत्तायुक्त बनाना।
  • बंजर भूमि पर वृक्षारोपण करना।।
  • विद्यालय में इको-क्लब की रचना कर विविध प्रवृत्तियाँ करना।
  • वृक्षारोपण, वन-महोत्सव जैसे कार्यक्रमों को महत्त्व देना।

उत्सव के विविध दिन

  • 21 मार्च : विश्व वन दिवस
  • 4 अक्टूबर : वन्य प्राणी दिवस
  • 5 जून : विश्व पर्यावरण दिवस
  • 29 दिसम्बर : जैवविविधता दिवस

वन्यजीव संसाधन

भारत का वन्यजीवन वैविध्यपूर्ण है। विश्व के विविध जंतुओं और अनेक प्राणियों की प्रजातियाँ भारत में पाई जाती हैं। पक्षियों और मछलियों की प्रजाति में भी काफी वैविध्य पाया जाता है। सरीसृपों, स्तनधारियों और उभयजीवी प्राणियों में भी काफी वैविध्य पाया जाता है।

  • जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में कश्मीरी मृग, जंगली बकरी पाई जाती है।
  • उत्तराखण्ड, कर्णाटक, केरल, असम आदि राज्यों में हाथी पाया जाता है।
  • एक सिंगी गैंडा भारत का विशिष्ट प्राणी है। वह असम और पश्चिम बंगाल के दलदलीय क्षेत्रों में बसते हैं।
  • कच्छ के छोटे रेगिस्तान में और उससे लगे क्षेत्रों में घुड़खर (जंगली गधा) पाया जाता है।

Class 7 Social Notes Chapter 14 संसाधनों की देखभाल और संरक्षण 1

  • भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ सिंह, तेंदुआ और बाघ तीनों पाए जाते हैं। सिंह गुजरात के गीर के जंगलों में बसता है। बाघ पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्णाटक, राजस्थान, हिमालय के क्षेत्रों आदि में पाया जाता है। रोयल बंगाल टाईगर (बंगाल का बाघ) विश्व की आठ जातियों में से एक है।
  • दांता, जेसोर, विजयनगर, गुजरात के डेडियापाड़ा और रतनमहाल क्षेत्रों में भालू (रीछ) पाया जाता है।
  • भारत में बतख, तोता, काबर, कबूतर, मैना आदि जाति के पक्षी बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। गुजरात के नल सरोवर में सर्दियों में ऐसे प्रवासी पक्षी आते हैं। सुरखाब गुजरात का राज्य पक्षी है। भारत के समुद्री किनारे पर मेकरल, झिंगा, बूमला, शार्क, डोल्फिन, सालमन आदि प्रजातियों की मछलियाँ पाई जाती हैं।
  • भारत में विविध प्रकार के हिरण और साँप की अनेक प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
  • हिमालय के शीत वनों में लाल पांडा पाया जाता है।

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लुप्त होता वन्यजीवन

गुजरात के वनों में से बाघ और भारत के वनों में से तेंदुआ लुप्त हो गया है। कुछ पक्षी जिनमें गौरैया, गीध, सारस, उल्लू, घोराड़ (सोहन चिड़िया) और घड़ियाल, गंगेय डॉल्फिन जैसे प्राणी लुप्त होने के कगार पर हैं। गुजरात की नर्मदा, तापी, साबरमती आदि नदियों में पाए जानेवाले ऊदबिलाव संकट में हैं।

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वन्यजीवन संरक्षण

सदियों से वन्यजीवन संरक्षण के लिए कानून बनते रहे हैं। सम्राट अशोक द्वारा वन्यजीवन संरक्षण के लिए कानून बनवाने की जानकारी इतिहास से प्राप्त होती है। आज भी इसके लिए कानून है। अधिकांश राज्यों में ‘स्टेट वाइल्ड लाइफ’ की रचना हुई है। अन्य स्वैच्छिक संस्थाएँ भी इसके लिए कार्य कर रही हैं।

वन्यजीव संरक्षण के लिए निम्नानुसार कानूनी कदम उठाने चाहिए :

  • वन्यजीवों पर होनेवाले अत्याचार और शिकार प्रवृत्ति को रोकने के लिए कड़क अमल करना।
  • जंगल के प्राणियों की गिनती समयांतर करनी चाहिए।
  • जंगल वन्यजीवों को प्राकृतिक संरक्षण देते हैं। इसलिए जंगलों का विनाश रोकना चाहिए।
  • लोगों को वन्यजीवों का महत्त्व समझाकर वन्यजीव संरक्षण की जानकारी देनी चाहिए।
  • जंगलों में लगती आग को रोकने के शीघ्र प्रयत्न करने चाहिए।
  • वन्यजीवों को डॉक्टरी सुविधा मिले, ऐसा प्रयत्न करना चाहिए।
  • वन्यजीवों के लिए संरक्षित क्षेत्रों का विकास करना चाहिए।
  • प्रचार-प्रसार माध्यमों द्वारा जागृति लानी चाहिए।
  • वन्यजीवों के संदर्भ में वन्यजीवों की आवश्यकताएँ जैसे पानी, खुराक, प्राकृतिक आवास पर्याप्त मात्रा में मिले, ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए।

रेगिस्तान का जीवन

(1) सहारा का रेगिस्तान : सहारा का रेगिस्तान विश्व का सबसे बड़ा रेगिस्तान है। यह रेगिस्तान अधिक विशाल है।
सहारा की जलवायु गरम और शुष्क है। बरसात बहुत ही कम पड़ती है। वनस्पति रहित इस प्रदेश में दिन का तापमान 50° से तक पहुँच जाता है, तो रात्रि में 0° से नीचे तक भी हो जाता है।

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वनस्पति और प्राणीजगत

सहारा के रेगिस्तान में कंटीली वनस्पति, खजूर के वृक्ष आदि पाए जाते हैं। रेगिस्तानी प्रदेश होने से बहुत कम वनस्पति देखने को मिलती है। रेगिस्तान में खजूर के वृक्षों से घिरे रेगिस्तानी द्वीप है। लोमड़ी, लकड़बग्धा, रेगिस्तान के बिच्छू, गिरगिट, रेगिस्तानी गोह और साँप जैसे प्राणी रेगिस्तान में पाए जाते हैं।

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लोकजीवन

सहारा की विषम जलवायु में भी लोकजीवन सक्रिय पाया जाता है। जिनमें बेदुईन, तुआरेंग और बर्बर जैसी जनजाति के लोग निवास करते हैं। अधिकांक्ष लोग भेड़-बकरी और ऊँट जैसे प्राणी पालते हैं। जिनसे वे दूध, चमड़ा और ऊन जैसे उत्पाद प्राप्त करके जीवन की आवश्यक चीजवस्तुएँ जैसे कालीन, वस्त्र, गरम कंबल बनाते हैं। रेगिस्तानी क्षेत्र में आई नीलघाटी में जल उपलब्ध होने से यहाँ खजूर और गेहूँ जैसी फसलें ली जाती हैं।
सहारा के रेगिस्तानी क्षेत्र में खनिज तेल मिलता है। इसके उपरांत इन क्षेत्रों में से लोहा, फास्फोरस, मैंगेनीज और युरेनियम जैसे खनिज भी मिलते हैं। खनिजों का अधिकमात्रा में उत्पादन होने से कई क्षेत्रों के लोकजीवन में बड़े परिवर्तन होने लगे हैं। कच्चे मिट्टी के मकानों के बदले पक्के मकान और सड़क मार्ग बनने से शहरीकरण भी हो रहा है। विदेशों से भी कई लोग यहाँ के तेलक्षेत्र में रोजगार के लिए आते हैं।

(2) लद्दाख का रेगिस्तान
भारत के उत्तर में लद्दाख केन्द्रशासित प्रदेश हैं। लद्दाख भारत का ठण्डा रेगिस्तान है। जिसके उत्तर में काराकोरम पर्वत श्रेणी और दक्षिण में जास्कर पर्वत श्रेणी है। इस क्षेत्र की मुख्य नदी सिंधु है। ऊँचाई के कारण यहाँ हवा अत्यंत पतली है। और जलवायु ठण्डी और शुष्क है। यहाँ गरमी में दिन का तापमान 0° से. से ऊपर और रात्रि में –30° से. भी नीचे उतर सकता है। यहाँ बरसात की मात्रा अत्यंत ही कम रहती है।

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वनस्पति और वन्यजीवन

लद्दाख का ठण्डा रेगिस्तान शुष्क वातावरणवाला होने से वहाँ बहुत कम वनस्पति होती है। केवल छोटी घास पाई जाती है। जो पालतू प्राणियों को चराने के लिए उपयोग में ली जाती है। घाटी के प्रदेशों में देवदार और पॉप्लर (चिनार) के वृक्ष हैं। लद्दाख में पक्षियों की विभिन्न प्रजातियाँ जैसे कि देवचिड़िया, रेडस्टार्ट, चुकार, शैला, स्नो पाट्रिज, तिब्बत का स्नोकोक, रैवेन तथा हॉप पाए जाते हैं। जबकि प्राणियों में हिमतेंदुआ, लाल लोमड़ी, मर्मोट (बड़ी गिलहरी), गेरुए रंग का रीछ और हिमालयी ताहर पाए जाते हैं। दूध और माँस प्राप्त करने के लिए जंगली बकरी, भेड़ और याक जैसे प्राणी पाले जाते हैं। याक के दूध से वे पनीर बनाते हैं और भेड़-बकरी तथा याक के ऊन का उपयोग करके गरम कपड़े बनाए जाते हैं।

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लोग (लोकजीवन)

लद्दाख अपने पहाड़ी सौंदर्य और संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ अधिकांश इण्डो आर्यन, तिब्बतियन, लद्दाखी प्रजाति के लोग बसते हैं। जिनमें अधिकांश लोग बौद्ध धर्म का पालन करते हैं। लद्दाख क्षेत्र में अनेक बौद्ध मठ स्थित हैं। जिसमें हेमिस, थिक्से, रॉ आदि हैं।

गरमी की ऋतु में यहाँ जौ, आलू, मटर आदि की खेती करते हैं। महिलाएँ गृहकार्य, कृषि के साथ-साथ छोटे व्यवसाय जैसे की दुकान खोलना, गरम कपड़े बुनना आदि भी करती हैं। यहाँ तिब्बतियन संस्कृति के मोटे तौर पर फैलाव के कारण इसे ‘छोटे तिब्बत’ के रूप में भी पहचाना जाता है।

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यहाँ के लोग सादा और सरल जीवन जीते हैं। यहाँ के अधिकांश लोगों के रोजगार का मुख्य साधन पर्यटन है। देश-विदेश के लोग यहाँ घूमने आते हैं। यहाँ मठ, घास के मैदान और हिमनदियाँ देखने लायक हैं। साथ ही यहाँ के लोगों के उत्सव और धार्मिक अनुष्ठान देखने लायक हैं। इस तरह लद्दाख के लोगों का जीवन देखना एक अद्भुत अनुभव है।

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लद्दाख का मुख्य शहर लेह है। जो वायु और जमीन मार्ग से जुड़ा है। जहाँ से राष्ट्रीय राजमार्ग नं. 1A गुजरता है।
आधुनिकीकरण से यहाँ, जीवन में भी परिवर्तन आने लगा है। इसके उपरांत यहाँ लोग प्रकृति के साथ कदम मिलाकर चलते हैं। प्राकृतिक वस्तुओं का खूब मितव्ययिता से उपयोग करके अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

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(3) कच्छ का रेगिस्तान

गुजरात राज्य के उत्तर-पश्चिम में कच्छ का रेगिस्तान है। कच्छ के रेगिस्तान के पश्चिम में पाकिस्तान देश तथा उत्तर-पूर्व में राजस्थान राज्य है। इसके दो भाग हैं : छोटा और बड़ा रेगिस्तान। ऐसा प्रतीत होता है कि महाद्वीपीय शेल्फ ऊपर उठने से बना है। गुजरात के कच्छ जिला में स्थित रेगिस्तान थार के रेगिस्तान का एक भाग है। यहाँ सफेद रेगिस्तान भी है। यहाँ की जलवायु गरम और शुष्क है।

वनस्पति और प्राणीजीवन

कच्छ के रेगिस्तान में ‘बन्नी’ क्षेत्र है। यहाँ विविध प्रकार के घास और कंटीली झाड़ियाँ पाई जाती हैं। कच्छ के रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकने के लिए बबूल के वृक्ष लगाए गए हैं।

कच्छ के बड़े रेगिस्तान में सुरखाब (फ्लेमिंगो) पाया जाता है। इसके उपरांत लावरी, घोराड़, कुंज, सारस आदि अन्य पक्षी पाए जाते हैं। घोराड़ पक्षी लुप्त होने की कगार पर है। यहाँ घुड़खर (जंगली गधा), नीलगाय, सुनहरी लोमड़ी, जंगली बिल्ली, भेड़िया, बिल्ली, लकड़बग्धा, चिंकारा, कलियार (कृष्णमृग) आदि भी पाए जाते हैं।

लोक जीवन

कच्छ का लोकजीवन वैविध्यपूर्ण है। यहाँ के लोग भेड़-बकरी, ऊँट, गाय-भैंस, गधा जैसे प्राणियों का पालन करते हैं। समुद्री किनारे के लोग जलपरिवहन, मछली पकड़ने, झींगा पकड़ने के व्यवसाय से रोजगारी प्राप्त करते हैं। कई क्षेत्रों में विशिष्ट जलवायु होने से खजूर, अनार, नारियल और कच्छी केसर आम की फसल ली जाती है। यहाँ की मुख्य फसल बाजरी है।

कच्छ के कुछ लोग विशिष्ट भरतकार्य (दस्तकारी) और हस्तकला के व्यवसाय से जुड़े हैं। आधुनिक उद्योगों के विकास से रोजगारी भी बढ़ जाती है। यहाँ पर्यटन उद्योग भी खूब तेजी से विकसित हो रहा है। जिसमें से भी अनेक लोग रोजगार प्राप्त करते हैं। कच्छ की भौगोलिक समतल परिस्थिति होने से पैरा ग्लाइडिंग जैसी साहसिक प्रवृत्तियाँ विकसित हो रही हैं।

Class 7 Social Notes Chapter 12 वातावरण का सजीवों पर प्रभाव

वातावरण का निर्माण

पृथ्वी, सूर्य से अलग हुई है, ऐसा माना जाता है। जब इसका उद्भव हुआ तब आग के गोले के रूप में थी। यह गरम गोला धीरे-धीरे ठण्डा होने लगा। ठण्डा होने पर इसमें रहे तत्त्व द्रव, ठोस और गैस-स्वरूप में रूपांतरित होने लगे। जिन तत्त्वों का ठोस स्वरूप में रूपांतरण हुआ, उन्हें हम मृदावरण के रूप में पहचानते हैं। द्रव तत्त्व को जलावरण के रूप में पहचानते हैं तथा गैस स्वरूप में रूपांतरित हुए, उन्हें वातावरण के रूप में पहचानते हैं।

वातावरण

पृथ्वी के चारों तरफ फैले हवा के आवरण को वातावरण कहते हैं। यह पृथ्वी के धरातल से सैकड़ों किलोमीटर की ऊँचाई तक फैला है। इसकी ऊपरी सीमा कितनी ऊँचाई तक है, यह कहना मुश्किल है। इसके उपरांत अवकाश में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव जहाँ तक है वहाँ तक वातावरण माना जाता है। पृथ्वी के धरातल से 32 किमी की ऊँचाई तक के वातावरण में 99 % जितनी हवा समाई होती है। पृथ्वी के धरातल से जैसे-जैसे ऊँचाई में जाते हैं वैसे-वैसे हवा पतली होती जाती है।

वातावरण की गैसें

वातावरण के बिना पृथ्वी पर जीवसृष्टि का अस्तित्व संभव नहीं है। वातावरण गैस, द्रव और ठोस तत्त्वों का बना है। जिनमें ऑक्सिजन और नाइट्रोजन गैस जीवसृष्टि के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। वातावरण में कोहरा, ओस, बादल आदि वातावरण में रहे पानी के स्वरूप हैं। द्रव तत्त्वों में मुख्यतः बरफ के कण, जीवजंतु आदि है। वातावरण पृथ्वी को दिन में गरमी और रात्रि में अतिशय ठण्डी से बचाता है।

Class 7 Social Notes Chapter 12 वातावरण का सजीवों पर प्रभाव 1

वातावरण में स्थित गैसों की मात्रा पास के कोष्ठक में दर्शाई गई है। नाइट्रोजन लगभग 130 किलोमीटर तक पाई जाती है, जबकि ऑक्सिजन लगभग 110 किलोमीटर और कार्बन डाईऑक्साइड लगभग 20 किलोमीटर तक पाई जाती है। जबकि 130 किलोमीटर की ऊँचाई के बाद के वातावरण में हाइड्रोजन और हिलियम की मात्रा अधिक है।

वातावरण की स्तररचना

वातावरण को पृथ्वी के धरातल से ऊँचाई की तरफ जाने से तापमान और गैसों की संरचना में होनेवाले परिवर्तनों के आधार पर अलग-अलग आवरण अथवा स्तरों में विभाजित किया गया है। इस परिवर्तन के आधार पर उसके चार उपविभाग किए गए हैं : (1) क्षोभ-आवरण (2) समताप-आवरण (3) मध्यावरण (4) उष्मावरण (तापमण्डल)

(1) क्षोभ-आवरण : पृथ्वी से लिपटे वातावरण का प्रथम आवरण क्षोभ-आवरण है। विषुववृत्त पर यह लगभग 16 किमी, समशीतोष्ण कटिबंध प्रदेशों में लगभग 12 किमी और ध्रुवों पर लगभग 8 किमी ऊँचाई तक फैला है। ऋतुओं के अनुसार इसमें परिवर्तन होता है। यह आवरण जीव सृष्टि के लिए अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण है। वातावरण के तूफान, आवाज की तरंगें, वायु की संरचना, बिजली, बरसात, बादल आदि इस आवरण में अनुभव किए जाते हैं। इस आवरण में प्रति 1 किमी की ऊँचाई पर लगभग 6.5° से की दर से तापमान घटता है, जब ऊँचाई बढ़ने पर तापमान घटना बंद हो जाता है तो उस सीमा को ‘क्षोभ-सीमा’ कहते हैं।

(2) समताप-आवरण/मण्डल : क्षोभ सीमा के ऊपर के आवरण को समताप आवरण कहते हैं जो क्षोभ-सीमा से लगभग 50 किमी की ऊँचाई तक फैला है। ऊँचाई के साथ इस आवरण में ऋतुएँ, बादल, बरसात, चक्रवात आदि नहीं पाए जाते। यहाँ वायु स्वच्छ और पतली होती है, जिससे जेट विमानों को कम अवरोध और तेजी से उड़ा सकते हैं। इस आवरण में लगभग 15 से 35 किमी की ऊँचाई पर ओजोन गैस की मात्रा अधिक पाई जाती है, जो सूर्य की अत्यंत गरम पराबैगनी किरणों (Ultra Violet Rays) का शोषण करती हैं।

(3) मध्यावरण : समताप आवरण के ऊपर लगभग 80 किमी ऊँचाई तक के वातावरण के भाग को ‘मध्यावरण’ कहते हैं। जिसमें ऊँचाई पर जाने पर तापमान घटता जाता है।

(4) उष्मावरण : यह आवरण, मध्यावरण के ऊपर स्थित है। 80 किमी से शुरू हो करके जहाँ वातावरण पूरा होता है वहाँ तक फैला है। यहाँ वायु अतिशय पतली होती है। जैसे-जैसे ऊँचाई पर जाते हैं वैसे-वैसे तापमान बढ़ता जाता है। इस आवरण को दो उपविभागों में बाँटा गया है : आयनावरण और बाह्यावरण। आयनावरण में से रेडियोतरंगों का परावर्तन होता है। टी.वी., रेडियो-प्रसारण, इन्टरनेट का लाभ इस आवरण का आभारी है। आयनावरण के ऊपर के आवरण को बाह्यावरण कहते हैं।

Class 7 Social Notes Chapter 12 वातावरण का सजीवों पर प्रभाव 2

मौसम

मौसम अर्थात् अल्प समय की वातावरण की औसत परिस्थितियाँ। किसी भी प्रदेश का मौसम, तापमान, नमी, बरसात, वायु का दबाव, कोहरा तथा बादलों के आधार पर निश्चित होता है। मौसम प्रातः, दोपहर, सायंकाल अथवा रात्रि का अलग हो सकता है। मौसम वातावरण की कम समय की परिस्थिति होता है जिसमें समयांतर परिवर्तन होता रहता है। प्रात:काल ठण्डी, दोपहर में गरमी और शाम को बरसात होना, ऐसा मौसम में संभव है। मौसम से हमारा जीवन और हमारी प्रवृत्तियाँ प्रभावित होती हैं, देश का मौसम विभाग मौसम के समाचार और नक्शे प्रतिदिन प्रकाशित करता है।

जलवायु

सामान्यरूप किसी प्रदेश की 35 वर्ष या उससे अधिक वर्षों की मौसम की औसत दशाओं को जलवायु कहते हैं। जलवायु स्थानीय परिस्थिति (तापमान, नमी, बरसात, वायुदाब, जलवाष्प) को ध्यान में रखकर निश्चित की जाती है। जलवायु किसी प्रदेश की सजीव सृष्टि, प्राणी सृष्टि और मानवजीवन तथा ऐसी प्रवृत्तियों को प्रभावित करती है।

तापमान

हवा में रही गरमी के स्तर को तापमान कहते हैं। वातावरण के तापमान में दिन और रात्रि के दरमियान परिवर्तन होता है। तापमान, ऋतुओं के अनुसार भी बदलता है। सर्दियों की तुलना में गर्मियों में तापमान अधिक होता है।
सूर्यताप (Insolation) तापमान के वितरण को प्रभावित करनेवाला महत्त्वपूर्ण कारक है। सूर्यताप की मात्रा विषुववृत्त से ध्रुवों की तरफ घटती है। इस कारण ध्रुवप्रदेश बर्फ से ढके होते हैं। यदि पृथ्वी पर तापमान बढ़ जाए तो कृषि फसलें उग नहीं सकतीं। शहरों में गाँवों की तुलना में अधिक तापमान होता है। इसका कारण पक्की सड़कें और सीमेन्ट की बनी इमारतें होती हैं।

वायुमण्डलीय दबाव

पृथ्वी के आसपास हवा के स्तर का वजन होता है। हवा का विशाल स्तर उसके वजन के अनुसार पृथ्वी के धरातल पर दबाव डालता है, उसे वायुमण्डलीय दबाव कहते हैं। समुद्रतल पर वातावरण का दबाव सबसे अधिक होता है। पृथ्वी के धरातल से ऊँचाई पर जाने पर वायु दाब घटता है। अधिक तापमानवाले प्रदेशों में वायु गरम होकर ऊपर की तरफ गति करती है और हल्का वायुदाब रचती है। हल्का दबाव बादल और नमीयुक्त ऋतु के साथ जुड़ा है। कम तापमानवाले प्रदेशों में वातावरण ठण्डा होता है इसलिए वहाँ भारी दबाव होता है।

पवन

पृथ्वी के आसपास स्थित गतिशील वायु को पवन कहते हैं। सामान्य रूप से पृथ्वी पर निर्मित होते हवा के हल्के, भारी दबाव हैं, जिसके मुख्य तीन प्रकार है : (1) स्थायी पवन (2) मौसमी पवन (3) दैनिक/स्थानीय पवन।

Class 7 Social Notes Chapter 12 वातावरण का सजीवों पर प्रभाव 3

(1) स्थायी पवन : पृथ्वी के धरातल पर कुछ भागों में बारहों मास निश्चित दिशा में पवन चलती है, जिन्हें स्थायी पवन कहते हैं। स्थायी पवनों में व्यापारिक पवन, पश्चिमीय पवन और ध्रुवीय पवन का समावेश होता है।

(2) मौसमी पवन : पृथ्वी के धरातल पर कुछ पवनें ऋतु के अनुसार चलती हैं और उनकी दिशा ऋतु के अनुसार बदलती है, जिन्हें मौसमी पवन कहते हैं। भारत, म्यानमार, बाँग्लादेश जैसे देशों में ऐसी पवनें चलने से इन्हें मौसमी पवनों का देश कहा जाता है। गरमी में नैऋत्य की पवनें और सर्दी में इशान कोणीय पवनें इस प्रकार की पवनों के उदाहरण हैं।

(3) दैनिक/स्थानीय पवन : पृथ्वी के कुछ प्रदेशों में कम समय के लिए वायु दाब में होनेवाले परिवर्तन के कारण उद्भव होनेवाली पवनों को दैनिक/स्थानीय पवनें कहते हैं। स्थानीय पवनों के उदाहरण के तौर पर समुद्री-जमीन की लहरें, पर्वत और घाटी की लहरें, लू और शीतलहर आदि हैं।

नमी

समुद्रों और जलाशयों में से पानी का वाष्पीभवन होने से उनका जलवाष्प में रूपांतरण होता है, जिसे नमी कहते हैं। नमी पृथ्वी के धरातल से वाष्पीभवन की क्रिया द्वारा वातावरण में मिलती है। वातावरण में रही नमी घनीभवन की प्रक्रिया द्वारा बादल बनकर बरसात के रूप में पृथ्वी के धरातल को पुनःप्राप्त होती है।

जलवायु और मानव जीवन

  • किसी भी प्रदेश की जलवायु का आहार, पोशाक और आवास आदि पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
  • अधिक वर्षावाले क्षेत्रों में घरों की छतें तीव्र ढालवाली होती हैं, जबकि कम वर्षावाले क्षेत्रों में मकान कम ढालवाले समतल छतवाले होते हैं।
  • किसी भी प्रदेश में उत्पन्न होनेवाली कृषि उपज उस प्रदेश के लोगों की मुख्य खुराक होती है। उदा. मैदानी प्रदेश के लोगों की खुराक में गेहूँ और पर्वतीय लोगों की खुराक में मकई का उपयोग अधिक होता है।
  • जिस प्रदेश में ठण्डी अधिक पड़ती है, वहाँ के लोग पूरा शरीर ढके ऐसे गरम ऊनी वस्त्रों का उपयोग करते हैं। उदाहरण, लद्दाख के लोग।
  • गरम प्रदेशों के लोग सूती और खुले (ढीले) वस्त्रों का उपयोग करते हैं। उदाहरण – दक्षिण भारत के लोग।
  • रेगिस्तानी प्रदेश के लोग निरंतर उड़ती रेत से बचने के लिए सिर पर रूमाल अथवा कपड़ा लपेटते हैं। उदा. अरब के लोग।
  • गरम और नमीवाली जलवायु के क्षेत्रों में मानव स्वभाव आलसी, जबकि समशीतोष्ण कटिबंध के प्रदेशों में जलवायु खुशनुमा होने से लोगों की कार्यक्षमता अधिक होती है।
  • मौसमी जलवायु के प्रदेशों में वर्षा ऋतु के अलावा अन्य समय में विविध सामाजिक प्रसंगों का आयोजन अधिक होता है।

प्राकृतिक वनस्पति और प्राणीसृष्टि

प्राकृतिक वनस्पति की वृद्धि का आधार जमीन, तापमान और नमी होती है। इसके उपरांत ढालवाले और मिट्टी की ऊँचाई । मिट्टी के आधार की मोटाई भी प्राकृतिक वनस्पति की वृद्धि को प्रभावित करती है। इन घटकों में रही विभिन्नता के कारण किसी भी प्रदेश की प्राकृतिक वनस्पति की सघनता और प्रकार में अंतर होता है।

प्राकृतिक वनस्पति का मुख्य तीन विभागों में वर्गीकरण किया गया है :

  1. जंगल : वनस्पति अनुकूल तापमान और बरसाती प्रदेशों में उगती है। तापमान और बरसात के आधार पर सघन अथवा छुट-पुट जंगल पाए जाते हैं।
  2. घास के मैदान : ये मध्यम वर्षावाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
  3. कंटीली वनस्पति और झाड़ियाँ : शुष्क और कम बरसातवाले प्रदेशों में ऐसी वनस्पति पाई जाती है।

प्राकृतिक वनस्पति के प्रकारों में इस अंतर का मुख्य कारण जलवायु में अंतर है। अब हम विश्व की प्राकृतिक वनस्पतियों और उनमें पाए जानेवाले मुख्य प्राणियों की जानकारी प्राप्त करेंगे।

जंगलों के प्रकार

(1) उष्णकटिबंधीय बारहमासी हरेभरे जंगल : इन जंगलों को उष्णकटिबंधीय बरसाती जंगल भी कहते हैं। ये घने जंगल विषुववृत्त और उष्णकटिबंध में पाए जाते हैं। इस क्षेत्र की जलवायु गरम और पूरे वर्ष वर्षा के कारण नमीवाली होती है। इस प्रदेश के वृक्षों के पत्ते एक साथ ना गिरकर, पूरे वर्ष हरेभरे रहते हैं, उन्हें बारहमासी हरे जंगल कहते हैं। इन जंगलों में रोज़वुड़, आबनूस, मोहगनी आदि वृक्ष पाए जाते हैं। भारत में अंदमान-निकोबार द्वीपसमूह में इस प्रकार के जंगल पाए जाते हैं।

(2) उष्णकटिबंधीय पतझड़ जंगल : उष्णकटिबंधीय पतझड़ जंगलों को मानसूनी जंगल भी कहते हैं। इस प्रदेश में जलवायु गरम और वर्षा की मात्रा कम होती है। गरमी की ऋतु में 6 से 8 सप्ताह के दरमियान वनस्पति के पत्ते झड़ जाते हैं इसलिए इन्हें पतझड़ या मानसूनी जंगलों के रूप में पहचाना जाता है। इन जंगलों में मजबूत और इमारती लकड़ीवाले वृक्ष जैसे साग, साल, नीम, शीशम आदि होते हैं। ये जंगल भारत में पठारी प्रदेश, पर्वतीय प्रदेश, उत्तर ऑस्ट्रेलिया और मध्य अमेरिका के अधिकांश भाग में इस प्रकार की वनस्पति पाई जाती है। इन जंगलों में बाघ, एशियाई सिंह, हाथी, बंदर, सुनहरे बंदर आदि प्राणी पाए जाते हैं। इस क्षेत्र में मोर, बाज, तोता, काबर (माया), कबूतर, मैना आदि पक्षी बड़ी संख्या में पाए जाते हैं।

(3) समशीतोष्ण सदाबहार जंगल : इस प्रकार के प्रदेश में तापमान सम और वर्षा अधिक मात्रा में पड़ती है। इस प्रदेश में बारहों मास जंगल हरेभरे रहते हैं। ये जंगल दक्षिण-पूर्व अमेरिका, दक्षिण चीन और दक्षिण-पूर्व ब्राजील में तथा भारत के उत्तर-पूर्व पर्वतीय प्रदेशों में पाए जाते हैं। इन जंगलों में बांस, चीड़ और नीलगिरि जैसी मुख्य वनस्पतियाँ होती हैं। इन जंगलों में हाथी, एक सिंगी गैंडा आदि प्राणी पाए जाते हैं।

(4) समशीतोष्ण पतझड़ के जंगल : इस प्रकार के जंगल कर्कवृत्त के उत्तर और मकरवृत्त के दक्षिण के प्रदेशों में पाए जाते हैं। ये जंगल उत्तर-पूर्वी अमेरिका, चीन, न्यूजीलैण्ड, चिली और पश्चिम यूरोप तथा उत्तर भारत में भी पाए जाते हैं। इन जंगलों में ऑक, मेपल जैसी मुख्य वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। इन जंगलों में हिरण, लोमड़ी, भेड़िया जैसे प्राणी पाए जाते हैं।

(5) भूमध्यसागरीय जंगल : ये जंगल भूमध्यसागर के नज़दीक के प्रदेशों में पाए जाते हैं। जो अधिकांश यूरोप, अफ्रीका, एशिया महाद्वीपों में पाए जाते हैं। इस प्रदेश की जलवायु गरमी में गरम-शुष्क, सर्दी में ठण्डी और नमीवाली होती है। इस प्रदेश में खट्टे फलों की वनस्पति संतरा, अंजीर, ऑलिव (जैतून), अंगूर आदि मुख्य पाए जाते हैं।

(6) शंकुद्रुम जंगल : शीत जलवायुवाले प्रदेश लगभग 50° उत्तर से 70° उत्तर अक्षाशों के प्रदेश तथा ऊँचे पर्वतीय प्रदेश में इस प्रकार के जंगल पाए जाते हैं। इन जंगलों की वनस्पति आकार में शंकु जैसी होती है। इन जंगलों में चीड़, देवदार, फर आदि मुख्य वनस्पतियाँ हैं। इन वनस्पतियों की लकड़ी मुलायम और हल्की होती है। ये कागज, दियासलाई तथा पैकिंग के लिए अधिक उपयोगी है। इस प्रदेश में बंदर, ध्रुवीय भालू, कस्तूरी मृग, याक आदि पाए जाते हैं।

Class 7 Social Notes Chapter 12 वातावरण का सजीवों पर प्रभाव 4

घास के मैदान

(1) उष्ण कटिबंधीय घास के मैदान : इस प्रदेश की जलवायु गरम है। यहाँ बरसात मध्यम से कम पड़ती है। यहाँ 3 से 4 मीटर जितनी ऊँची घास होती है। अफ्रीका का सवाना का घास का मैदान विश्वभर में प्रसिद्ध है। इस प्रदेश में सिंह, चीता, हाथी, जेब्रा, जिराफ, हिरण मुख्य प्राणी पाए जाते हैं।

(2) समशीतोष्ण घास के मैदान : सम जलवायुवाले महाद्वीपों के मध्यभाग के प्रदेशों में छोटी और पौष्टिक घास होती है। इस प्रदेश में जंगली भैंस, बायसन और काले हिरन जैसे प्राणी पाए जाते हैं। गुजरात में भावनगर में वेलावदर और कच्छ के बन्नी क्षेत्र में इस प्रकार की घास होती है।

कंटीली वनस्पति और झाड़ियाँ

रेगिस्तानी जलवायु गरम और शुष्क होती है। इस प्रदेश में वनस्पति कम पाई जाती है। जलवायु के साथ अनुकूलता साधने के लिए वनस्पति कंटीली होती है। इस क्षेत्र में बेर, थुअर (नागफनी), बबूल, खेजड़ी आदि वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। इस प्रदेश में ऊँट, लोमड़ी, झरख (लकड़बग्धा) जैसे प्राणी पाए जाते हैं। कच्छ के छोटे रेगिस्तान में पाया जानेवाला प्राणी घुड़खर विश्व में बेजोड़ है। इसके उपरांत बड़े रेगिस्तान में दलदलकीचड़वाले क्षेत्रों में सुरखाव पक्षी पाए जाते हैं। यहाँ प्रवासी पक्षी भी आते हैं। इस प्रदेश में साँप और बिच्छू भी पाए जाते हैं।

Class 7 Social Notes Chapter 12 वातावरण का सजीवों पर प्रभाव 5

इसके उपरांत ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में ठण्डी और शुष्क जलवायुवाले प्रदेशों में झाड़ियाँ और छोटी घास होती है। हिमालय और लद्दाख में ऐसी वनस्पति पाई जाती है। यहाँ हिमतेंदुआ, चीता, पान्डा आदि प्राणी पाए जाते हैं। कश्मीर में पश्मिनो बकरी पाई जाती है।

Class 7 Social Notes Chapter 10 पृथ्वी की आंतरिक संरचना और भूमि-स्वरूप

हमारी पृथ्वी एक ऐसा ग्रह है कि जिस पर विकसित जीवन देखने को मिलता है। अन्य अवकाशी पिंडों की तरह पृथ्वी का आकार भी गोलाकार है। उसमें अंदर और बाहर निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं। क्या हमने कभी ऐसा सोचा कि पृथ्वी के आंतरिक भाग में क्या होगा? पृथ्वी किन पदार्थों से बनी है?

पृथ्वी का आंतरिक भाग या भूगर्भ (Interior of the Earth)

पृथ्वी प्याज की तरह एक के ऊपर एक व्यविस्थत अनेक स्तरों से बनी है।
पृथ्वी की सतह के सबसे ऊपरी स्तर को ‘भूकवच’ कहते हैं। यह सबसे पतला स्तर होता है। यह भूमिखंड पर लगभग 35 किलोमीटर तक होता है। भूमिखंड की सतह विशेष करके सिलिका और एल्युमिना जैसे खनिजों से बना है, इसीलिए उसे सियाल (सि – सिलिका तथा एल – एल्युमिना) कहा जाता है।
महासागर का कवच मुख्य रूप से सिलिका और मैग्नेशियम से बना है, इसलिए उसे ‘सिमा’ (सि – सिलिका तथा मा – मैग्नेशियम) कहा जाता है।

Class 7 Social Notes Chapter 10 पृथ्वी की आंतरिक संरचना और भूमि-स्वरूप 1

इस कवच के ठीक नीचे मेन्टल होता है, जो लगभग 2900 किलोमीटर की गहराई तक फैला होता पपड़ी है। पृथ्वी का सबसे आंतरिक स्तर भूगर्भ है। जिसकी त्रिज्या लगभग 3500 किलोमीटर है। जो खास करके निकल और फेरस (लोहा) का बना होता है, इसलिए इसे निफे (नि – निकल; फे – फेरस) कहते हैं। केन्द्रीय भूगर्भ में तापमान, दबाव और पदार्थों का घनत्व खूब अधिक होता है।

चट्टान और खनिज (Rocks and Minerals)

चट्टानों के प्रकार अपने गुण, कण के आकार और अपनी निर्माण प्रक्रिया के आधार पर अलग-अलग होती हैं। निर्माण प्रक्रिया की दृष्टि से चट्टानें तीन प्रकार की होती हैं :

(i) अग्निकृत चट्टान (Igneous Rock) :
गरम मैग्मा ठंडा होकर ठोस बन जाता है। इस प्रकार बनी चट्टानों को अग्निकृत चट्टान कहते हैं। अग्निकृत चट्टानें दो प्रकार की होती हैं : आंतरिक चट्टान और बाह्य चट्टान।

क्या आप ज्वालामुखी से निकलनेवाले लावा की कल्पना कर सकते हैं? वास्तव में आग की तरह एकदम लाल तरल मैग्मा ही लावा है, जो पृथ्वी के आंतरिक भाग में से निकलकर धरातल पर फैल जाता है। जब तरल लावा धरातल पर आता है तब तेजी से ठंडा होकर जम जाता है। भूकवच पर दिखाई देनेवाली चट्टानों को बाह्य अग्निकृत चट्टान कहते हैं। उसकी संरचना खूब छोटी दानेदार होती है, जैसे कि बेसाल्ट। तरल मैग्मा कभी-कभी भूकवच के अंदर गहराई में ही ठंडा हो जाता है। इस तरह बनी ठोस चट्टानों को आंतरिक अग्निकृत चट्टान कहते हैं। धीरे-धीरे लावा ठंडा होने के कारण बड़े दाने का स्वरूप धारण करता है। उदाहरण स्वरूप ग्रेनाइट चट्टान। चक्की में अनाज या मसाले को पीसने के लिए ज्यादातर ग्रेनाइट पत्थरों का उपयोग किया जाता है।

(ii) अवसादी (परतदार) चट्टान (Sedimentary Rock) :
चट्टाने घिसकर, टकराकर छोटे-छोटे कणों में बदल जाती हैं। यह अवसाद या मलबा पवन, हवा, पानी आदि के द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पहुँचता है और एकत्रीकरण होता है। यह निक्षेपित चट्टानें दबकर और जमकर चट्टानों की परतें बनाती हैं। इस प्रकार की चट्टानों को परतदार चट्टान कहते हैं। उदाहरण स्वरूप रेतीले पत्थर रेत के कणों से बनते हैं। इन चट्टानों में वनस्पति, प्राणी और सूक्ष्म जीव जो कभी-कभी इन चट्टानों में देखने को मिलते हैं, वे जीवाश्मि भी बनते हैं।

(iii) रूपांतरित चट्टान (Metamorphic Rock) :
अग्निकृत और अवसादी चट्टानें उच्च तापमान और अतिशय दबाव के कारण रूपांतरित चट्टानों में बदल जाती हैं, ऐसी चट्टानों को ‘रूपांतरित चट्टान’ कहते हैं। उदाहरण स्वरूप चिकनी मिट्टी स्लेट में और चूना पत्थर संगमरमर में बदल जाता है।

Class 7 Social Notes Chapter 10 पृथ्वी की आंतरिक संरचना और भूमि-स्वरूप 2

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि कुछ निश्चित परिस्थितियों में एक प्रकार की चट्टान चक्रीय-पद्धति से एक-दूसरे में परिवर्तित हो जाती है। एक चट्टान में से दूसरी चट्टान में परिवर्तित होने की इस क्रिया को चट्टानचक्र कहते हैं। आप जानते हैं कि तरल मैग्मा ठंडा होकर अग्निकृत चट्टान बन जाता है। ये अग्निकृत चट्टानें छोटे-छोटे टुकड़ों के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होकर परतदार (अवसादी) चट्टानों का निर्माण करती हैं। तापमान और दबाव के कारण अग्निकृत और परतदार चट्टान रूपांतरित चट्टान में बदल जाती है। अतिशय तापमान और दबाव के कारण रूपांतरित चट्टानें पुनः पिघलकर तरल मैग्मा बन जाती हैं। यह तरल मैग्मा फिर ठंडा होकर अग्निकृत चट्टानों में बदल जाता है।

हमारे लिए चट्टानें खूब उपयोगी हैं। ठोस चट्टानों का उपयोग सड़क, मकान और ईमारतों को बनाने में किया जाता है।
चट्टानें विविध खनिजों में से बनती हैं। खनिज प्राकृतिक रूप से मिलनेवाला पदार्थ है, जिसमें निश्चित भौतिक गुणधर्म और निश्चित रासायनिक मिश्रण होता है। खनिज मानव के लिए खूब उपयोगी हैं। कुछ का उपयोग ईंधन के रूप में होता है; जैसे कि कोयला, प्राकृतिक गैस, खनिज तेल और पेट्रोलियम। उनका उपयोग विविध उद्योगों और औषधि बनाने में भी होता है; जैसे कि लोहा, एल्यूमिनियम, सोना, यूरेनियम आदि।

भूमि-स्वरूपों का निर्माण

मृदावरण अनेक भूतख्ती में विभाजित है, जिसे मृदावरणीय भूतख्ती (प्लेट) कहते हैं। आप यह जानकर आश्चर्य चकित होंगे कि भूतख्तियाँ (प्लेटें) अलग-अलग दिशा में खिसकती रहती हैं अर्थात् वर्ष दौरान पृथ्वी में मात्र कुछ सेन्टीमीटर पिघले मैग्मा में होनेवाली गति के कारण ऐसा होता है। पृथ्वी के गर्भ में पिघला मैग्मा वृत्ताकार रूप में घूमता रहता है।

प्लेटों की गति के कारण पृथ्वी की सतह में परिवर्तन होते हैं। पृथ्वी की गति को इन बलों के आधार पर विभाजित किया जाता है, जिनके कारण यह गति उत्पन्न होती है। वह बल पृथ्वी के आंतरिक भाग में निर्मित होता है, जिसे आंतरिक बल (इंडोजेनिक फोर्स ) कहते हैं और जो बल पृथ्वी की सतह पर उत्पन्न होता है, उसे बाह्यबल (एक्सोजेनिक फोर्स) कहते हैं।

आंतरिक बल कभी आकस्मिक गति पैदा करता है तो कभी धीमी गति। भूकंप और ज्वालामुखी जैसी आकस्मिक गति के कारण पृथ्वी की सतह पर परिवर्तन होते हैं। भूकवच पर एक छिद्र खुलता है और उसमें से पिघला पदार्थ अचानक निकलने लगता है, उसे ज्वालामुखी कहते हैं।

इस तरह, मृदावरणीय भू-तख्ती (प्लेटों) की गतिशीलता से पृथ्वी की सतह पर कंपन होता है। यह कंपन उसके केन्द्र के चारों ओर होता है, इस कंपन को ‘भूकंप’ कहते हैं। भूकवच के नीचे जिस स्थान से कंपन की शुरुआत होती है, उसे ‘उद्गम केन्द्र’ कहा जाता है। यह कंपन उद्गम केन्द्र के बाहर की तरफ तरंग रूप में गति करता है। उद्गम केन्द्र के निकट की सतह के केन्द्र को ‘अधिकेन्द्र’ कहते हैं। अधिकेन्द्र (निर्गमन केन्द्र) के सबसे निकट के भाग में सबसे अधिक नुकसान होता है और अधिकेन्द्र से अंतर बढ़ने के साथ भूकंप की तीव्रता धीरे-धीरे कम हो जाती है।

फिर भी भूकंप का पूर्वानुमान संभव नहीं है। यदि हम पहले से ही सावधानी रखें तो उसके प्रभाव को निश्चित रूप से कम कर सकते हैं।
स्थानीय लोग कई सामान्य पद्धति से भूकंप की संभावना का अनुमान करते हैं, जैसे कि प्राणियों के व्यवहार का अध्ययन, तालाब की मछलियों का तेजी से इधर-उधर भागना, सरीसृपों का पृथ्वी की सतह पर आना आदि।

मुख्य भूमि-स्वरूप : अपक्षय यह अपरदन (कटाव), परिवहन और निक्षेपण जैसी प्रक्रिया द्वारा भू-सतह निरंतर बदलती रहती है। पृथ्वी की सतह पर चट्टानों के टूटने से अपक्षय की क्रिया होती है। भू-सतह पर जल, पवन और हिम जैसे विभिन्न घटकों द्वारा होनेवाले क्षय को अपक्षय कहते हैं। पवन, जल वगैरह अपक्षय युक्त पदार्थों को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाते हैं, इसे परिवहन कहते हैं और उन पदार्थों का अन्यत्र निक्षेपण (जमा) करते हैं। अपक्षय से निक्षेपण तक की यह प्रक्रिया पृथ्वी की सतह पर विभिन्न भूमि-स्वरूपों का निर्माण करती है।

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नदी का कार्य : नदी के पानी से जमीन का अपक्षय (टूट-फूट) होता है। जब नदी कठोर चट्टान पर से ऊँचाई से खड़े ढाल के सहारे घाटी या निचली भूमि पर गिरती है, तब उसे जलप्रपात या झरना कहते हैं।

जब नदी मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती है तब वह मोड़वाले मार्ग पर बहने लगती है। नदी के इन बड़े मोड़ों को सर्पाकार वहनमार्ग कहते हैं। उसके बाद सर्पाकार वहनमार्ग के किनारों पर निरंतर अपक्षय और निक्षेपण शुरू हो जाता है। सर्पाकार मोड़ धीरे-धीरे अत्यंत नज़दीक आ जाते हैं। जिससे वे लगभग घोड़े की नाल के आकार के या वृत्ताकार दिखाई देते हैं। इस अवस्था में जब नदी में बाढ़ आती है तब निक्षेपण से मोड़ के बीच के भूभाग नदी के प्रवाह से कट जाते हैं। फिर नदी अपने लंबे मार्ग को छोड़कर सीधा मार्ग बना लेती है। नदी द्वारा छोड़े गए नलाकार भाग में पानी रह जाता है, उसे नलाकार सरोवर कहते हैं। कभी-कभी नदी अपने किनारों से बाहर बहने लगती है। परिणाम स्वरूप आसपास के क्षेत्रों में काँप और अन्य पदार्थों का निक्षेपण करती है, उसे बाढ़ का मैदान कहते हैं। इससे समतल उपजाऊ बाढ़ के मैदान का निर्माण होता है। जब नदी के दोनों किनारे अधिक मात्रा में काँप-मिट्टी के

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निक्षेपण से लंबे और कम ऊँचाई के अनेक ढेर बन जाते हैं तब उसे प्राकृतिक तटबंध कहते हैं। समुद्र में गिरने से पहले नदी के बहने की गति एकदम धीमी पड़ जाती है तथा नदी अनेक प्रवाहों में विभाजित हो जाती है, जिसे शाखा/प्रशाखा कहा जाता है। यहाँ नदी की गति धीमी होने से वह अपने साथ लाए काँप, रेती, मिट्टी और अन्य पदार्थों का निक्षेपण करने लगती है। प्रत्येक शाखा/प्रशाखा अपने मुख का निर्माण करती है। सभी मुखों के निक्षेपण से डेल्टा (मुखत्रिकोण) का निर्माण होता है।

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समुद्री लहरों का कार्य : समुद्री लहरों के कटाव और जमाव (निक्षेपण) से तटीय भूमि-स्वरूपों का निर्माण होता है। समुद्र की लहरें सतत चट्टानों के साथ टकराती रहती हैं, जिनसे तट का निचला हिस्सा कट जाता है। समय के साथ-साथ वे बड़े और चौड़े हो जाते हैं, उन्हें समुद्री गुफा कहते हैं। इन गुफाओं के बड़े होते जाने से मात्र छत ही रह जाती है, जिससे तटीय कमान (मेहराब) बनती है। सतत कटाव छत को भी तोड़ देता है और केवल दीवारें रह जाती हैं। दीवार जैसे इस भू-स्वरूप को ‘स्टैक’ कहते हैं। समुद्र जल के ऊपर लगभग ऊर्ध्व बने ऊँचे पथरीले किनारों को समुद्र कमान कहते हैं। समुद्री लहरें किनारों पर निक्षेपण (जमाव) द्वारा समुद्र पुलिन का निर्माण करती हैं।

हिमनदी का कार्य : हिमनदी हिमाच्छादित पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ की नदी बनती है। हिमनदियाँ नीचे की कठोर चट्टानों से गोलाश्म मिट्टी और पत्थरों का कटाव करके विशिष्ट या गोलाश्म भूदृश्य का निर्माण करती हैं। हिमनदी कटाव द्वारा ‘U’ आकार की घाटी का निर्माण करती है। हिमनदी के पिघलने पर पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित खोह (कंदरा) में पानी भरने से सरोवर (टान) का निर्माण होता है। हिमनदी द्वारा लाए पदार्थ जैसे कि छोटे-बड़े पत्थर, रेती और कंकड़ निक्षेपित (जमा) होने से उसके प्रवाह के बीच टीले सदृश्य ‘ड्रमलिन’ (Drumlin) भूमिस्वरूप की रचना होती है।

Class 7 Social Notes Chapter 10 पृथ्वी की आंतरिक संरचना और भूमि-स्वरूप 6

पवन का कार्य : रेगिस्तान में पवन यह अपरदन और निक्षेपण का मुख्य परिबल है। पवन चट्टानों के ऊपरी भाग की तुलना में निचले भाग को सरलता से घिसता है। अतः ऐसी चट्टानों का आधार पतला और शीर्ष मोटा हो जाता है। रेगिस्तान में छत्रक आकार की चट्टानें देखने को मिलती हैं, जिसे सामान्य रूप से छत्रक शिला कहा जाता है। ऐसे भूमि स्वरूप को छत्रक शिला कहते हैं। पवन गति से अपने साथ रेत (बालू) को एक स्थान से दूसरे स्थान पहुँचाता है, जब पवन की गति मंद पड़ती है तो वह रेत (बालू) जमीन पर गिरकर छोटे टीले बनाती है। उसे बालुका स्तूप (बारखन) कहते हैं। राजस्थान के रेगिस्तान में इस प्रकार के बालुका स्तूप देखने को मिलते हैं। जब मिट्टी के कण (धूल) विशाल विस्तार में निक्षेपित (जमाव) हो जाते हैं, तो उसे लोयस कहते हैं। चीन में लोयस निर्मित बड़े स्थल देखने को मिलते हैं।

Class 7 Social Notes Chapter 15 लोकतंत्र में समानता

लोकतंत्र में समानता भारत एक लोकतांत्रिक देश है। विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में देश का शासन चलाने के लिए संविधान की रचना की गई है। संविधान देश का शासन चलाने की मार्गदर्शिका कहलाता है। विश्व में सबसे बड़ा लिखित संविधान भारत का है। भाषा, जाति, धर्म और आर्थिक असमानता के बीच देश का सुचारु शासन हो इसके लिए संविधान में अनेक व्यवस्थाएँ की गई हैं। हमारा देश इतना विशाल और विविधतावाला देश है कि जिसके संचालन में विशेष प्रकार की व्यवस्था न हो तो संचालन सही ढंग से नहीं हो पाता।

हमारे देश में आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक भिन्नता होने के उपरांत सबको समान अवसर मिलता रहे इसके लिए हमारे संविधान निर्माताओं ने सब कुछ ध्यान रखा है।

समानता अर्थात् क्या?

भारत के संविधान में सबको समान अवसर देने का प्रावधान किया गया है। यह समानता अर्थात् सभी समान, सबको सम्मान। इस आशय के साथ सरकार संविधान के अनुसार कार्यरत है। सबको समान अधिकार अर्थात् कानून के समक्ष समानता और कानून का समान रक्षण।

कानून के आधार पर समानता

Class 7 Social Notes Chapter 15 लोकतंत्र में समानता 1

किसी एक स्थान पर पहुँचने की स्पर्धा रखी जाए। इस समय एक खिलाड़ी को साइकल, दूसरे को मोटरसाइकल, तीसरे व्यक्ति को दौड़कर पहुँचना हो तो इसे समानता नहीं कह सकते। इसके लिए तीनों को साइकल, मोटरसाइकल या दौड़ता रखा जाए तो ही सबको समान अवसर दिया गया माना जाएगा। दिए गए चित्र को देखें और समानता के संदर्भ में चर्चा करें :

आप सभी सरलता से समानता के बारे में समझ सके होंगे। यहाँ सुविधा उपलब्ध करवाना जिसके साथ इसका योग्य रूप से अमल कर सकें तो ही समानता प्राप्त होती है। इस प्रकार देखें तो समानता अर्थात् सबके लिए समान। सबको समान अवसर। शिक्षा प्राप्त करने, विकसित होने, धंधा-रोजगार अथवा विविध धर्म माननेवाले सभी के लिए भारत देश के संविधान में दिया गया समानता का अधिकार महत्त्वपूर्ण है।

हमारे विकास के साथ, सबके सर्वांगीण विकास द्वारा देश के विकास के लिए दिया जाने वाला समानता का अधिकार अत्यंत महत्त्वपूर्ण है और हमारे स्वाभिमान को बनाए रखने के लिए भी समानता का अधिकार जरूरी है।

Class 7 Social Notes Chapter 15 लोकतंत्र में समानता 2

मताधिकार में समानता

हमने देखा कि संविधान में सभी को विविध प्रकार की समानता दी गई है। ‘लोगों का, लोगों द्वारा और लोगों के लिए चलाया जानेवाला शासन अर्थात् लोकतंत्र।’ लोकतंत्र में सरकार की रचना लोगों के मतदान द्वारा होती है। लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई ग्राम पंचायत से लेकर देश की सबसे बड़ी पंचायत अर्थात् संसद का चुनाव मतदान द्वारा होता है। 18 वर्ष से बड़ी उम्र के प्रत्येक नागरिक को मताधिकार दिया गया है। मताधिकार सूची में दर्ज कोई भी नागरिक मतदान कर सकता है।

Class 7 Social Notes Chapter 15 लोकतंत्र में समानता 3

धर्म, भाषा, लिंग, बोली या धार्मिक असमानता के बीच सबको संवैधानिक समानता दी गई है। प्रत्येक को मतदान करने का अधिकार है। यहाँ मतदान करने के अधिकार के संदर्भ में अनेक रोचक बातें भी सामने आती हैं। कोई धाक, धमकी, जबरदस्ती या डर के अधीन मतदान न करे, इसके लिए मतदाता को जागृत किया जाता है। मत का महत्त्व समझाने और किसी भी प्रकार के डर बिना मतदान हो इसके लिए निर्वाचन आयोग व्यवस्था करता है। चुनाव के समय अधिक से अधिक लोग मतदान कर सकें, इसके लिए विशेष प्रयत्न किए गए हैं। विज्ञापन और विशेष व्यवस्था के अधीन मतदाताओं को जागृत किया जाता है। निर्वाचन आयोग निष्पक्ष रूप से चुनाव करवाता है। भारत देश में दर्ज सभी मतदाता मतदान कर सकें, इसके लिए विशेष व्यवस्था की जाती है। महिलाओं के लिए विशेष मतदान केन्द्र है। दिव्यांग व्यक्तियों के लिए विशेष सुविधा की जाती है।

बाल मजदूरी

समानता के संदर्भ में संविधान में कुछ बातों में स्पष्ट मार्गदर्शन दिया गया है। ऐसा होने के उपरांत कई बार असमानता पाई जाती है। ऐसी असमानता में बाल मजदूरी मुख्य है। बाल मजदूरी शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार का उल्लंघन माना जाता है। हमारे देश में सभी नागरिकों को छ: से चौदह वर्ष तक मुफ्त, अनिवार्य और सार्वत्रिक अध्ययन का अधिकार है। यह अधिकार, समान रूप से दिया गया है। आधुनिक समय में उच्च शिक्षण में लड़कियों को ना पढ़ने देने की भावना कहीं-कहीं पाई जाती है। बालकों को विद्यालय में पढ़ना हो, उस उम्र में वे मजदूरी करें तो वह एक प्रकार का अपराध है। चौदह वर्ष से छोटी उम्र के बालकों को मजदूरी पर रखना कानून के अधीन एक अपराध है।

श्रम और मजदूरी

एक समान कार्य में पुरुष और महिलाओं को मजदूरी चुकाने में भेदभाव रखा जाता है। कम मजदूरी चुकानी पड़े इसके लिए कई जगह बाल मजदूर भी रखे जाते हैं। कई कार्यों में दिव्यांगों से मजदूरी करवाई जाती है। उन्हें इस काम में मजदूरी भी खूब कम चुकाई जाती है। लोकतंत्र में दिव्यांग व्यक्तियों का शोषण न हो, इसके लिए उन्हें प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर करने के लिए सरकार द्वारा अनेक योजनाएं लागू की गई हैं। हमारे आसपास ऐसे दिव्यांग व्यक्ति हों, तो उन्हें सहयोग देना हम सभी का कर्तव्य है। दिव्यांगों, स्त्रियों और छोटे बालकों को कम पैसे चुकाए जाते हैं, यह अन्याय है।

लोकतंत्र में समानता

लोकतांत्रिक देश में समानता को खूब ही महत्त्व दिया जाता है। यहाँ समानता का अधिकार सबके लिए आवश्यक है। हम किसी को सम्मान देते हैं तो वह हमें सम्मान देगा। इसी तरह से संविधान में भी समानता का महत्त्व स्वीकारा गया है। कुछ अवलोकनों के आधार पर जब दया भाव पाया जाए, तब समझना चाहिए कि सामनेवाले व्यक्ति को समान अधिकार नहीं मिला है।

Class 7 Social Notes Chapter 15 लोकतंत्र में समानता 4

ऐसी बातों को समझने के लिए हम स्वयं क्या कर सकते हैं, यह विचार करना जरूरी है। तभी जहाँ-जहाँ समानता नहीं है, वहाँ-वहाँ हम प्रयत्न कर सकेंगे। मैं कुछ नहीं कर सकता ऐसा विचार नहीं करना चाहिए। इसके लिए पहल करना जरूरी है। हम स्वच्छता रखेंगे तो ही किसी को स्वच्छता के लिए कह सकेंगे। ऐसा ही समानता के लिए भी है। यहाँ कुछ जानकारी दी गई है। इस जानकारी के आधार पर आप समानता के संबंध में क्या कर सकेंगे। इसके संदर्भ में लिखें।

Class 7 Social Notes Chapter 15 लोकतंत्र में समानता 5

असमानता एक चुनौती

छोटा गाँव।
गाँव में पानी के दो ही कुएँ।
यहाँ पूरा गाँव दो भाग में पानी भरता है। समय बीतता गया। गाँव के एक कुँए में पानी समाप्त हो गया। अब आधे गाँव के लोगों को पानी भरने की असुविधा उत्पन्न हुई। कुँए में पानी समाप्त हो जाएगा इस डर से किसी एक क्षेत्र के लोग दूसरे क्षेत्र में किसी को पानी भरने नहीं देते। यह तो असमानता कहलाती है। समानता का भंग हो ऐसी एक-दो घटनाओं से सामाजिक समरसता पर विघातक प्रभाव देखने को मिलता है। जैसे कि कई बार गाँव के या व्यक्तिगत अवसरों पर दूल्हे को घोड़े पर बैठाकर बारात निकालना, मंदिर या मस्जिद में लाऊड स्पीकर बजाने से विवाद देखने या सुनने को मिलता है। ऐसी बातें समानता के सामने चुनौती हैं। ऐसे अवसरों पर शांति बनी रहे, ऐसे प्रयत्न करके हमें समानता के भाव के साथ व्यवहार करना चाहिए। समाज में समरसता बनी रहे, इसके लिए सरकार द्वारा खूब प्रयत्न किए जाते हैं। प्रत्येक समाज और प्रत्येक व्यक्ति को, समानता का अधिकार संविधान में दिया गया है। हम अपने अधिकारों का उपयोग कर सकें, इसके लिए जागृत होना जरूरी है।

Class 7 Social Notes Chapter 17 लैंगिक भिन्नता

हमारे देश में लड़के और लड़कियों के लालन-पालन में कभी समानता तो कभी असमानता पाई जाती है। पिछले दो दशकों में इस संदर्भ में जागृति फैली है। सरकार भी विभिन्न योजनाओं एवं आयोजनों के माध्यम से लड़के और लड़कियों में कोई भेदभाव न हो, ऐसा प्रयत्न कर रही है। हमारा देश अनेक भिन्नताओंवाला देश है। आधुनिक समय के अनुसार लड़के-लड़कियों को शिक्षा का समान अधिकार दिया गया है। रूढ़िगत मान्यता के अनुसार आज भी कुछ क्षेत्रों में कन्याओं को शिक्षा का अधिकार प्राप्त करने में कई असुविधाएँ होती हैं। समाज में प्रवर्तित भेदभाव का प्रभाव लम्बे समय तक समाज व्यवस्था पर पड़ता है। समाज में कई कुरिवाज प्रचलित होते हैं। आज भी कई स्थानों पर पाए जानेवाले बालविवाह का एक कारण यह भेदभाव है। बालविवाह के कारण अधिकांश महिलाएँ आगे शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकतीं, जिसके कारण उनका विकास रुक जाता है। जिसका एक प्रभाव स्त्रियों के स्वास्थ्य पर भी होता है। यदि लैंगिक भेदभाव दूर हो तो ऐसी अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है।

हमारे आस-पास स्त्री-पुरुष के बीच कुछ भिन्नता स्वीकार की गई है। स्त्री-पुरुषों में समान काम के लिए पुरुषों को अधिक वेतन दिया जाता है। ऐसा भेदभाव अपराध बनता है। आधुनिक समय में महिलाएँ सभी क्षेत्रों में जुड़ी हैं। चिकित्सा, इन्जीनियरिंग, वकालत, विमान चालक जैसी प्रत्येक बात में महिलाएँ समान रूप से काम करती हैं।

लैंगिक भिन्नता का विशेष असर अधिकांश ग्राम्य क्षेत्रों में पाया जाता है। कई बार लड़कियों को उच्च शिक्षण दिलाते समय अभिभावकों में हिचकिचाहट पाई जाती है। सरकार द्वारा सहायता एवं लोगों में आई जागृति के कारण लड़कियों के लिए उच्च शिक्षण सरल और सहज बना है।

भारतीय मान्यता के अनुसार लड़के-लड़कियों का लालन-पालन

सन् 2001 की जनगणना में 0 से 6 वर्ष तक के बालकों में लड़के-लड़कियों की संख्या में बड़ा अंतर पाया जाता है। कुछ समय पहले लड़की को जन्म से पहले ही मार देने के कारण लड़के-लड़कियों की संख्या में अधिक असमानता पाई गई, इसके लिए सरकार द्वारा भ्रूण हत्या विरोधी कानून बनाया गया। गर्भ में लड़के या लड़की का परीक्षण करना भी अपराध है। भारतीय मान्यता के अनुसार अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए संतान में पुत्र को ही महत्त्व दिया गया था। पिछले दशक में सामाजिक रूप से महिलाओं की भागीदारी ने इस मान्यता को खूब ही प्रभावित किया है।

अपने विद्यालय में विविध आयोजनों के समय आप जुड़े होंगे। विद्यालय कार्यक्रमों में लड़कों और लड़कियों द्वारा की गई प्रवृत्तियों को लिखिए।

Class 7 Social Notes Chapter 17 लैंगिक भिन्नता 1

रूढ़िगत मान्यता

लैंगिक भिन्नता के संदर्भ में हमारे देश में अनेक मान्यताएँ प्रवर्तित हैं। लड़कों और लड़कियों के लालन-पालन में इस संदर्भ में कई अंतर पाया जाता है। कुछ क्षेत्रों में प्राथमिक शिक्षण भी कभी पूरा नहीं करवाया जाता था। पिछले दो दशकों में प्राथमिक शिक्षण पूरा हो ऐसे खास प्रयत्न सरकार द्वारा किए गए हैं। सरकार के विशेष प्रयत्नों से आज हमारी सेना और पुलिस में लड़कियों की संख्या बढ़ रही है। लड़कियों को बाहर पढ़ने के लिए या नौकरी करने के लिए शहर भेजने के बदले लोग अपने क्षेत्र में ही नौकरी करवाना पसंद करते हैं। पिछले कुछ दशकों से महिलाएँ विविध कार्यों के साथ जुड़ी हैं। अंतरिक्ष क्षेत्र में भी महिलाएं जुड़ रही हैं। कन्याओं की सुरक्षा और संरक्षण के लिए सरकार सतत प्रयत्न कर रही है। रूढ़िगत मान्यताओं के आधार पर कह सकते हैं कि आज भी कुछ समाजों में कन्याओं के पढ़ने के संदर्भ में अनेक समस्याएँ पाई जाती हैं। उच्च पाठ्यक्रमों में कन्याओं को पढ़ाने के प्रति अभिभावकों में उदासीनता पाई जाती है। इसलिए अब राज्य सरकार द्वारा उच्च-शिक्षण के लिए विशेष सहायता दी जाती है।

गृहकार्य में असमानता

हमने देखा कि छोटी-छोटी बातों में लड़के-लड़की के साथ भेदभाव पाया जाता है। आगे जाकर यह भेदभाव समस्या बन जाता है। घर के छोटे-बड़े काम के लिए साइकल या अन्य वाहन चलाने और सीखने में ऐसा भेदभाव अधिक पाया जाता है। घर, विद्यालय या सार्वजनिक स्थलों में हम ऐसा भेदभाव देख सकते हैं। ऐसी कुछ बातों के संदर्भ में चर्चा करेंगे।

Class 7 Social Notes Chapter 17 लैंगिक भिन्नता 2

महिला सशक्तीकरण

एक मकान को घर बनाने का काम महिला द्वारा ही संभव है। घर के साथ बालक और अन्य जिम्मेदारियाँ निभाने में महिलाएँ अग्रसर होती हैं। आधुनिक समय में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में महिलाएँ सफल हुई हैं। आधुनिक समय में महिलाएँ विविध क्षेत्रों में अनोखी पहचान के साथ आगे बढ़ती पाई जाती हैं। खेल-जगत, फिल्म, मनोरंजन, राजनीति, अंतरिक्ष के उपरांत विज्ञान और संशोधन के क्षेत्र में भी महिलाएँ विशेष जुड़ रही हैं। संरक्षण जैसे खतरनाक कार्यों में भी आज महिलाएँ आगे बढ़ रही हैं। हमारे देश में अनेक महिलाओं ने विशेष सिद्धि हासिल की है।

महिलाओं को सशक्त करने के लिए पिछले दो दशकों में सरकार द्वारा अनेक कार्यक्रम और योजनाएँ बनाई गई हैं। पशुपालन, उद्योग और अन्य साहस के लिए सहायता दी जाती है। सरकार द्वारा ‘स्टार्टअप इण्डिया’ और ‘मेक इन इण्डिया’ के अन्तर्गत अनेक योजनाएँ महिला सशक्तीकरण के लिए चलाई जा रही हैं। महिलाओं को उद्योग शुरू करने के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है। नारी सशक्तीकरण के लिए अनेक संस्थाएँ भी कार्य कर रही हैं। सरकार की योजनाएँ, सार्वजनिक संस्थाएँ और अन्य द्वारा ऐसी महिलाओं को सहायता करके आत्मनिर्भर बनने में मदद की जाती है। नारी सशक्तीकरण के लिए योजनाओं के उपरांत शिक्षण में भी कन्याओं के लिए विशेष व्यवस्था और योजनाएँ लागू हैं। हमारे देश के विविध क्षेत्रों की महिलाओं के बारे में जानें।

विशेष क्षेत्रों में महिलाएँ

Class 7 Social Notes Chapter 17 लैंगिक भिन्नता 3

लिंगानुपात

समग्र देश में जनगणना करने के लिए लाखों लोग जुड़े होते हैं। जिस वर्ष में इकाई का अंक एक हो उन वर्षों में जनगणना की जाती है। पिछली जनगणना वर्ष 2011 में हुई थी। प्रथम जनगणना 1871 में हुई थी। केन्द्र सरकार द्वारा प्रति 10 वर्ष में जनगणना करवाई जाती है। अब आगे की जनगणना कब होगी?

शहरी और ग्रामीण लिंगानुपात में बड़ा अंतर पाया जाता है। यहाँ हम गुजरात के लिंगानुपात की स्थिति को देखेंगे। यह प्रति हजार पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या दर्शाता है। इस सारणी के आधार पर नीचे दिए गए प्रश्नों की चर्चा कीजिए :

Class 7 Social Notes Chapter 17 लैंगिक भिन्नता 4

चर्चा कीजिए

  • इस अंतर के कारण कौन-सी समस्या उत्पन्न होती है?
  • इस समस्या का समाधान किस तरह हो सकता है?
  • शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में अंतर क्यों अधिक है?
  • जनसंख्या वृद्धि के साथ लिंगानुपात क्यों महत्त्वपूर्ण है ?

हमारे आस-पास स्त्रियों और पुरुषों का परस्पर समान अनुपात लगता है। देश में स्त्रियों का अनुपात लगभग आधा माना जाता है। अभी तक की जनगणना के अनुसार कह सकते हैं कि, भारत में स्त्रियों और पुरुषों के लिंगानुपात में असमानता दिखाई देती है। नीचे विविध वर्षों में स्त्रियों का अनुपात निम्नानुसार दर्ज किया गया है :

Class 7 Social Notes Chapter 17 लैंगिक भिन्नता 5

सोचकर कहिए

  • किस वर्ष में स्त्रियों का अनुपात सर्वाधिक है?
  • किस वर्ष में स्त्रियों का अनुपात सबसे कम है?
  • स्त्रियों का अनुपात घटता जाए तो क्या समस्याएँ उत्पन्न होंगी?
  • स्त्री-पुरुषों की संख्या की असमानता को दूर करने के लिए सरकार क्या कदम उठाती है?

महिला आंदोलनों का अध्ययन

हमारा देश आजाद हुआ उससे पहले देश पर राज करनेवाले अंग्रेजों के सामने अनेक आंदोलन हुए थे। गाँधी बापू के नेतृत्व में विविध आंदोलन हुए थे। गुजरात सहित देशभर में कस्तूरबा के साथ अनेक महिलाएँ इन आंदोलनों के साथ जुड़ी थीं। बिहार में महिलाओं ने मद्य-निषेध के लिए सरकार के सामने सफल आंदोलन किया था। विशेषकर शहरों में कभी-कभी गरमी में पानी के लिए महिलाएँ आंदोलन करती हैं। ऐसे दूसरे अनेक आंदोलन महत्त्वपूर्ण रूप से महिलाओं के लिए हुए हैं। इन आंदोलनों में महिलाएँ जुड़ती हैं और अपनी समस्याओं के लिए आंदोलन करती हैं।

किसी महिला आंदोलन के विषय में सोचें और लिखें

  • उस महिला आंदोलन के विषय में आप क्या-क्या जानते हैं ?
  • वह आंदोलन क्यों किया गया था?
  • उस आंदोलन से क्या प्रभाव पड़ा?

Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार

आप पेन, नोटबुक, पुस्तकें खरीदने के लिए दुकान जाते होंगे। आपके घर के लिए भी चीज-वस्तुओं की खरीदी की जाती होगी। आपको लगता होगा कि ये सभी चीज-वस्तुएँ कौन बनाता होगा? किस तरह ये वस्तुएँ दुकानों तक पहुँचती होंगी? इन चीज-वस्तुओं को खरीदनेवाले कौन होंगे? इन चीज-वस्तुओं को बेचने वाले कौन होंगे? आइए, मित्रों आज हम इसके विषय में अध्ययन करें।

बाजार

चीज-वस्तुओं की बिक्री करती दुकानें जहाँ हों वह स्थान अर्थात् बाजार। बाजार अर्थात् जहाँ क्रेता और विक्रेता इकट्ठे होते हों, वह स्थल। बाजार में अनेक चीज-वस्तुओं की बिक्री होती है। जैसे कि सब्जियाँ, फल, साबुन, दंतमंजन, मसाले, ब्रेड, बिस्कुट, अनाज, दाल, चावल, कपड़ा, पुस्तकें, नोटबुक, पेन, पेन्सिल, बूट-जुराब, मोबाइल फोन, साइकल, टी.वी., फ्रिज आदि सूची बनाएं तो कितनी लम्बी सूची तैयार होगी। ऐसी अनेक वस्तुएँ हम बाजार में जाकर खरीदते हैं।

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बाजार के प्रकार

हम अपने दैनिक जीवन उपयोगी वस्तुओं की खरीदी अलग-अलग बाजार से करते हैं। जैसे कि, हमारे आसपास मोहल्ला बाजार, साप्ताहिक बाजार अथवा गुजरी बाजार, बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, नियंत्रित बाजार और ऑनलाइन बाजार।

मोहल्ला बाजार : हम दैनिक जीवन की उपयोगी वस्तुएँ अपने आस-पास की दुकानों से खरीदते हैं। जैसे कि डेयरी से दूध, दहीं, छाछ, किराणा की दुकानों से तेल-मसाला और गृह उपयोगी वस्तुएँ, स्टेशनरी की दुकान से पेन, पेन्सिल, नोटबुक, पुस्तकें आदि और दवा की दुकान से दवाइयाँ खरीदते हैं। तथा मार्गों के आस-पास छोटी दुकानें अथवा ठेलों से, सब्जियाँ अथवा वारत्योहार पर खिलौने, पतंग अथवा अन्य वस्तुएँ खरीदते हैं।

Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 1

  • ये दुकानें हमारे घर के आस-पास होती हैं।
  • हमारी आवश्यकता के अनुसार दिन के समय चाहे जब खरीदी कर सकते हैं।
  • ये दुकानदार अपने नियमित ग्राहकों को उधार पर भी बिक्री करते हैं।

गुजरी अथवा साप्ताहिक बाजार : साप्ताहिक बाजार किसी एक निश्चित दिन पर ही लगती है। इसलिए इन्हें साप्ताहिक बाजार कहते हैं। कुछ क्षेत्रों में इन्हें ‘हाट’ कहा जाता है। उदाहरण : प्रत्येक शनिवार को यह बाजार लगती हो तो शनिवारी बाजार। व्यापारी दिन के समय अपनी बेचनेवाली चीजवस्तुएँ लाते हैं और शाम तक दुकान समेटकर चले जाते हैं। दूसरे दिन किसी अन्य स्थान पर जाकर वहाँ दुकान लगाते हैं। देश भर में अनेक स्थानों पर ऐसे हजारों बाजार लगते हैं। जिनमें लोग अपनी रोजमर्रा की उपयोगी वस्तुएँ खरीदते हैं।

Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 2

  • जरूरी कई वस्तुएँ एक ही स्थान पर मिलती हैं।
  • छोटे व्यापारी और कारीगर रोजगार प्राप्त करते हैं।
  • व्यापारी दुकान का किराया, बिजली, कर, कर्मचारी का वेतन आदि खर्च नहीं होने से चीज वस्तुएँ सस्ते दर पर बेच सकते हैं।

शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और मोल

हमारे आसपास की दुकानों और साप्ताहिक बाजारों के अलावा बड़े शहरों में अन्य बाजार भी होते हैं। एक ही बिल्डिंग में एक साथ अलग-अलग प्रकार की दुकानें होती हैं। जिसे शॉपिंग कॉम्प्लेक्स कहते हैं। जिसमें हमें छोटी-बड़ी कम्पनी की ब्रांडेड और बिना ब्रान्ड की वस्तुएँ मिलती हैं। बड़ी कंपनी सार्वजनिक खबरों द्वारा ऊँची गुणवत्ता के विज्ञापन करके इन ब्रान्डेड वस्तुओं को ऊँचे भाव पर ऐसे बड़े शो-रूमों में बेचती हैं। जिनकी कीमत शॉपिंग मोल अधिक होने से कुछ लोग ही ऐसी वस्तुएँ खरीदते हैं।

Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 3

  • ग्राहक को केन्द्र में रखकर दुकानें सजाई जाती हैं।
  • विविध ब्रान्ड की अनेक वस्तुएँ एक साथ बिकती हैं। जिससे ग्राहक को पसंदगी का अवसर मिलता है।
  • वातानुकूलित मोल में ग्राहक पर्याप्त समय देकर विशेष छूट मिलती हो, ऐसी वस्तुएँ खरीद सकता है।
  • ग्राहक को वस्तु की छपी कीमत पर विशेष छूट दी जाती है।
  • ग्राहक काउन्टर पर नगद, क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड, नेट बैंकिंग से कीमत चुका सके, ऐसी व्यवस्था होती है।

नियंत्रित बाजार (मार्केटिंग यार्ड) (APMC)

कृषि की सफलता में अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के उपरांत अच्छी बाजार व्यस्था होना भी जरूरी है। आजादी के बाद के चरण में कृषि उत्पादन की बिक्री की निश्चित व्यवस्था न होने से किसानों का शोषण होता था। इसको रोकने के लिए सरकार ने नियंत्रित बाजार व्यवस्था अर्थात् मार्केटिंग यार्ड (खेती-बाड़ी उत्पादन बाजार समिति) की व्यवस्था की है। किसान फसल – बिक्री में ठगा न जाए और उसकी फसल-उत्पादन का उचित भाव प्राप्त करे और इस तरह वह आर्थिक समृद्ध बने इसके लिए गुजरात की विविध तहसील केन्द्रों पर खेतीबाड़ी उत्पादन बाजार समितियों की स्थापना की गई है। जैसे,

Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 4

  • किसानों की कृषि उपजों को सार्वजनिक नीलामी के आधार पर बेचा जाता है।
  • व्यापारियों का नैतिक स्तर बना रहता है।
  • भाव निर्धारण में पारदर्शिता बढ़ती है।
  • किसानों को उनकी कृषि उपजों का अच्छा भाव मिल सकता है।
  • व्यापारियों को अच्छा माल एक ही स्थान पर पर्याप्त मात्रा में मिल सकता है।
  • विविध सेवाएँ जैसे कि बैंकिंग, कर्ज (ऋण), बीमा, गोदाम, अन्य सुविधाओं का निर्माण आदि प्रभावी रूप से होता है।
  • रेडियो, समाचारपत्र, टी.वी. तथा ऑनलाइन मोबाइल फोन पर किसानों को कृषि-उत्पादों का दैनिक बाजार भाव मिल जाता है।
  • किसानों को मार्केटिंग यार्ड में रात्रि में ठहरने की सुविधा, उनकी फसलों का संग्रह करने के लिए गोदाम की सुविधा मिलती है।

ऑनलाइन बाजार

वर्तमान समय में ऑनलाइन शॉपिंग का प्रमाण बढ़ रहा है। बाजार में गए बिना ही हम कम्प्यूटर, मोबाइल फोन या टी.वी. पर डिजिटल पेमेन्ट करके सीधे खरीदी कर सकते हैं। ऑनलाइन शॉपिंग के लिए अनेक कंपनियाँ ग्राहकों को सीधे बिक्री करने से अधिक छूट देकर बाजार से सस्ती दर पर चीजें बेच सकती हैं। ग्राहक के घर तक चीजवस्तुएँ सीधे पहुँच जाती हैं। जिसके कारण इसका उपयोग अधिक से अधिक हो रहा है। आपने भी ऑनलाइन खरीदी की होगी। इस प्रकार अब बाज़ार हमारे घर में ही या हाथ में आ गया है ऐसा कह सकते हैं। ऑनलाइन खरीदी में सावधानी रखनी जरूरी है, अन्यथा धोखा-धड़ी का डर रहता है।

Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 5

बाजार के आसपास

हम चीजवस्तुएँ खरीदने जाते हैं ऐसे विविध प्रकार के बाजार के विषय में अध्ययन किया। आपको लगा होगा कि ये सभी दुकानदार अपनी दुकानों के लिए मालसामान कहाँ से खरीदते होंगे? चीजवस्तुओं का उत्पादन कारखाना, गृहउद्योग, घरों और खेतों में होता है, परंतु हम सीधे कारखाने या खेत से चीजवस्तुएँ नहीं खरीदते।

जो व्यापारी खेत या कारखानों, घरों में अधिक मात्रा में उत्पादित मालसामान को खरीदते हैं, उन्हें थोकबंध व्यापारी कहते हैं। वे यह सामान छोटे व्यापारियों या दुकानदारों को बेचते हैं। इस प्रकार ये खरीदी और बिक्री करनेवाले दोनों ही व्यापारी होते हैं। हम जिस दुकानदार या व्यापारी से वस्तुएँ खरीदते हैं, उसे फुटकर व्यापारी कहते हैं।

मोटरकार में उपयोग में आनेवाले विविध भाग छोटे-छोटे कारखानों में बनते हैं। कार की कंपनियाँ उन्हें खरीदकर, उन भागों को जोड़कर कार बनाती हैं, तैयार मोटरकार हम शो-रूम में से खरीदते हैं। इस प्रकार हमारे आसपास अनेक वस्तुएँ बनाकर उनका क्रय-विक्रय होता है। जिनसे हम अनजान होते हैं।

बाजार में समानता

हमने अपने आसपास के बाजार के विषय में जाना। कारखाने या खेत में उत्पादित मालसामान को बेचनेवाले और अंत में उसे खरीदनेवाले ग्राहकों के बीच सभी व्यापारी हैं। हमने साप्ताहिक बाजार से मोल तक की दुकानों और दुकानदारों की जानकारी प्राप्त की। इन दोनों दुकानदारों के बीच एक बड़ा अंतर है। एक कम पैसों से खुला व्यापार करनेवाला छोटा दुकानदार है और दूसरा अपने मोल या कॉम्प्लेक्स में अधिक पूँजी निवेश करनेवाला बड़ा दुकानदार है। छोटे दुकानदार बहुत कम लाभ पाते हैं, जबकि बड़े दुकानदार खूब लाभ प्राप्त करते हैं। ऐसे अनेक लोग हैं जो सस्ता मिलनेवाले माल-सामान भी नहीं खरीद सकते। जबकि कई ऐसे लोग भी होते हैं जो मोल में मिलती महँगी वस्तुओं की खरीदी करते हैं। इस प्रकार हमारी आर्थिक स्थिति के आधार पर हम किस बाजार के क्रेता या विक्रेता बनेंगे यह निश्चित होता है।

ग्राहक के रूप में हम अपने आसपास कई बार बड़ी उम्र के लोगों को छोटी-बड़ी वस्तुएँ बेचते देखते हैं। ऐसे बुजुर्ग पुरुष या महिला की उम्र आराम करने की होने के उपरांत वे गरीबी या मजबूरी के कारण मार्गों के आसपास वस्तुओं की बिक्री करते पाए जाते हैं। ऐसे में हमें दुकान या मोल से वस्तुएँ खरीदने की बजाय ऐसे जरूरतमंद व्यक्तियों से वस्तुएँ खरीदकर उन्हें सहायक बनना चाहिए।

बाजार में ग्राहक

‘ग्राहक अर्थात् जो मूल्य देकर अपने उपयोग के लिए चीजवस्तुएँ खरीदे अथवा सेवा प्राप्त करे वह व्यक्ति।’ आज प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप में ग्राहक है। उदाहरण के रूप में साबुन, तेल, बिस्कुट, अनाज या अन्य वस्तु की खरीदी अथवा मोबाइल फोन रीचार्ज, बीमा, ट्रेन टिकिट बुकिंग आदि सेवा जो प्राप्त करते हैं, वे ग्राहक की व्याख्या में आते हैं। विश्व में सबसे अधिक ग्राहक भारत में हैं। भारत विश्व का सबसे बड़ा बाजार माना जाता है। ग्राहक अपनी दैनिक जीवन उपयोगी और मौज-शौक की वस्तुएँ बाजार से खरीदते हैं। ग्राहक के रूप में उन्हें वस्तु की गुणवत्ता, कीमत, वस्तु की पसंदगी और पैसे का पूरा बदला प्राप्त करने का अधिकार है।

Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 6

प्रमाणित चीजवस्तु का चिह्न (लोगो)

ग्राहकों को अच्छी गुणवत्तावाली वस्तुएँ मिलती रहें, इसके लिए सरकार ने विविध वस्तुओं के मापदण्ड निश्चित किए हैं। विशेष चिह्न(मार्क)वाली वस्तुओं की बिक्री की जाती है। गृह उपयोग की और बिजली से चलनेवाली वस्तुओं के लिए ‘आई.एस.आई. – ISI’, सोने-चाँदी के लिए ‘होलमार्क’, ऊन की बनावट के लिए ‘वुलमार्क’, खाद्यपदार्थ के लिए ‘एगमार्क’ तथा ‘एफ.एस.एस.ए.आई-FSSAI’ आदि चिह्न लगाए जाते हैं। जिसके आधार पर ग्राहक अच्छी गुणवत्तावाली वस्तुएँ खरीद सकते हैं।

इसी तरह शाकाहारी खाद्यसामग्री परClass 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 7 निशानी और मांसाहारी खाद्यसामग्री पर Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 8 चिह्न लगाया जाता है।

ग्राहक के अधिकार और कर्तव्य

बाजार में समान लक्षणोंवाली अनेक ब्रांड की असंख्य वस्तुएँ मिलती हैं। ग्राहक को उनकी सम्पूर्ण जानकारी या ज्ञान नहीं होता है। उत्पादक और ग्राहकों के बीच अनेक बिचौलिए होने से ग्राहक का शोषण होने लगा है। ग्राहकों को शोषण से बचाने के लिए ग्राहक सुरक्षा का कानून लागू है। ग्राहक वर्तमान बाजार व्यवस्था के कारण वस्तु की गुणवत्ता, पूर्ति, कीमत और सेवा जैसी प्रत्येक बात में ठगा जाता है। ग्राहक चीज अथवा सेवा के संबंध में अपना अधिकार प्राप्त कर सके ऐसे उद्देश्य के साथ भारत सरकार द्वारा संसद में कानून पास करके ‘ग्राहक सुरक्षा अधिनियम- 1986’ बनाया गया है। इस कानून के आधार पर ग्राहक को निम्नलिखित छः अधिकार मिलते हैं :

  • सुरक्षा का अधिकार : व्यक्ति के जीवन तथा स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक उत्पादों और सेवाओं के संबंध में सम्पूर्ण सुरक्षा का अधिकार अर्थात् आप कोई भी वस्तु या सेवा खरीदते हों, तो उसका उपयोग करने के बाद लम्बे समय में भी आपके स्वास्थ्य या जीवन को कोई नुकसान हो तो आप ग्राहक सुरक्षा कानून के तहत शिकायत कर सकते हैं।
  • सूचना प्राप्त करने का अधिकार : चीजवस्तु या सेवा पसंद करने के लिए वस्तु संबंधी जरूरी सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करना ग्राहक का अधिकार है।पसंदगी करने का अधिकार : विविध प्रकार की अनेक वस्तुओं में से ग्राहक को अपने अनुकूल वस्तु पसंद करने का अधिकार है।
  • प्रस्तुतीकरण का अधिकार : ग्राहक के अधिकार और हितों के रक्षण के लिए ग्राहक सुरक्षा मण्डल में उसकी उचित शिकायत का अधिकार है।
  • शिकायत निवारण का अधिकार : कमीयुक्त माल, क्षतियुक्त सेवा या धोखा-धड़ी की शिकायत से उपभोक्ता को हुए नुकसान का बदला प्राप्त करने का अधिकार है।
  • ग्राहक शिक्षण प्राप्त करने का अधिकार : इस अधिकार से जीवनभर जानकारीयुक्त ग्राहक बनने के लिए सभी जानकारी और ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार है।

ग्राहक के कर्तव्य

  • ग्राहकशिक्षण से ग्राहक धोखाधड़ी से बच सकता है। खरीदी करते समय कुछ बातों के संबंध में सावधानी भी ग्राहक का कर्तव्य बनता है, जो निम्नानुसार है :
  • किसी भी वस्तु को खरीदते समय जी.एस.टी.वाले बिल को लेकर खरीदें तथा उसे लम्बे समय तक संभालकर रखें।
  • बड़ी खरीदी में तथा विशेषकर इलेक्ट्रोनिक्स वस्तुएँ आई.एस.आई. मार्क की ही खरीदनी चाहिए। दुकानदार द्वारा सही-सिक्का किया हुआ गेरन्टी कार्ड, वॉरंटी कार्ड, फ्री सर्विस कूपन आदि ध्यान ध्यान देकर प्राप्त कर लें और संभालकर रखें।
  • सोने-चाँदी जैसी खरीदी में ‘होलमार्क’वाले जेवरात ही खरीदें। व्यापारी की बातों में आकर किसी भी प्रकार के टैक्स बचाने की कोशिश न करें, हमेशा पक्का बिल लें। बिल में शुद्धता, कीमत, घड़ाई आदि सभी सूचनाएँ स्पष्ट और अलग लिखी हुई हैं या नहीं, इसका ध्यान रखें।
  • खाद्य पदार्थ ‘एगमार्क’ ‘fssai’ लोगोवाले ही खरीदने चाहिए। उनकी पैकिंग, कंपनी, ब्रान्डनेम, बैच नम्बर, उत्पादन की तारीख, एक्सपायरी डेट, इनग्रेडियन्ट (समाविष्ट घटक) आदि सभी विगतों को देखना चाहिए और मिलावट के मामलों में अचूक शिकायत करनी चाहिए।
  • दवाएँ प्रिस्क्रिप्शन के साथ खरीदनी चाहिए। उत्पादन की तारीख और एक्सापयरी डेट आदि जाँचनी चाहिए। जेनरिक दवाएँ मिलती हों तो पहले उन्हें खरीदनी चाहिए।
  • कपड़ों में कपड़ा, कलर, सिलाई, जरी, भरत, माप-साइज आदि चेक करके खरीदने चाहिए।
  • पेट्रोल या सी.एन.जी. पंप पर मीटर जीरो होने के बाद ही वाहन में ईंधन भरवाना चाहिए। गैस-वितरण में सिलैण्डर का वजन और सुरक्षा के संबंध में जाँच करनी चाहिए।
  • शैक्षिणक संस्थाओं में सुरक्षा की व्यवस्था, शिक्षकों की योग्यता की जानकारी और फीस भरने के बाद रसीद लेनी चाहिए।
  • जीवन वीमा पॉलिसी या वाहन बीमा के संयोगों में पॉलिसी की शर्ते समझकर असली पॉलिसी का दस्तावेज जरूर प्राप्त कर लें।
  • अनावश्यक और गलत खरीदी से बचें। सेल, भेंटकूपन, इनामी योजना आदि लुभावने विज्ञापनों से बचें और यदि ठगे गए हों, तो समाचारपत्रों द्वारा उसकी जानकारी दूसरों को देनी चाहिए, जिससे वे ठगे जाने से बच सकें।

Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 9

इतना जानिए-

भारत सरकार ने 15 मार्च को ‘विश्व ग्राहक दिवस’ और 24 दिसम्बर को ‘राष्ट्रीय ग्राहक अधिकार दिवस’ के रूप में मनाने का निश्चय किया गया है। ग्राहकों की शिकायतों का तीव्र और बिना खर्च निवारण करने के लिए प्रत्येक जिले, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर ग्राहक सुरक्षा मण्डल और ग्राहक अदालतों की रचना की गई है।
ग्राहक सुरक्षा की शिकायतों के लिए ग्राहक हेल्पलाइन टोल फ्री नं. : 1800 233 0222

उत्पादन से बाजार तक की यात्रा

हमने बाजार, बाजार के प्रकार और अपने आसपास के बाजार के विषय में अध्ययन किया। हमारे आसपास की अनेक प्रक्रियाएँ बाजार व्यवस्था पर प्रभाव डालती हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ खरीदकर बाजार व्यवस्था को चालक बल प्रदान करता है। अब हम शर्ट और पैन्ट बनाने में उपयोग में आनेवाले कपड़े की बात करके बाजार की विशेष जानकारी प्राप्त करेंगे। आप सभी जानते ही हैं कि, कपड़ा बनाने के लिए कपास कच्चा माल है। कपास की बुवाई से शुरू करके शर्ट-पैन्ट की बिक्री तक बाजार की श्रृंखला एक-दूसरे से किस तरह से जुड़ी है, यह जानें। सौराष्ट्र के रामपर गाँव में मगनभाई के पास 5 हेक्टर जमीन है। उसने अपने खेत में खरीफ की फसल की बुवाई बीज करने हेतु कपास के बीज की बिक्री करनेवाली दुकान से कपास के प्रमाणित किए हुए बीज खरीदे। जून महीने में बरसात आए उससे पहले ही हल चलाकर तैयार रखे अपने खेत में कपास की बुवाई कर दी। प्रथम बरसात बोने लायक होने से दो-चार दिनों में जमीन में से कपास के अंकुर फूटकर बाहर आ गए। बरसात के कारण कपास के साथ खर-पतवार भी उग जाते हैं। कपास के पौधे के पास से खर-पतवार दूर करके खेत एकदम खर-पतवार मुक्त कर दिया। खेत में आड़ी-तिरछी मेड़ करके दो-तीन अच्छी बरसात के साथ रासायनिक खाद भी छिड़क दिया। नवरात्रि आने तक तो आपके सिर तक पहुँचे ऐसा कपास खेतों में लहराने लगा। फूल खिलकर उसमें बड़ी-बड़ी गाँठें भी आ गई थी और अब गाँठों में से सफेद कपास बाहर दिखने लगी अर्थात् मगनभाई मजदूरों से यह कपास बिनवाकर बोझ बाँधकर अपने घर में रखने लगे।

Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 10

अंत में मगनभाई उसके खेत में उत्पन्न हुआ कपास बेचने के लिए ट्रैक्टर में भरकर तहसील केन्द्र में स्थित मार्केटिंग यार्ड में ले गए।

Class 7 Social Notes Chapter 19 बाज़ार 11

उनके कपास की व्यापारियों ने बोली लगाई, जिसमें चुनीलाल व्यापारी ने उसका कपास खरीद लिया और मगनभाई को उसका पैसा तुरन्त मिल गया। चुनीलाल ने सारा कपास जीनिंग फैक्ट्री चलानेवाले धनजीभाई के कारखाने को बेच दिया। जीन में इस कपास में से कपास के बीज अलग करके तेल निकालनेवाले व्यापारी को बेच दिया। आप सभी जानते हो कि, कपास का तेल खाद्य तेल के रूप में उपयोग होता है और खोल पशुओं को खिलाने वाले आहार खली के रूप में उपयोगी है। जीनिंग मिल के (कारखाने) मालिक ने कपास की गांठों से धागे बनाने के लिए स्पिनिंग मिल में भेज दिया। इन धागों को अहमदाबाद की एक कपड़े की मिल ने कपड़े बनाने के लिए खरीद लिया। जिनमें से तैयार हुए कपड़े के ताके कलर करती डाइंग मिल में कलर करने के लिए भेज दिए गए। इस कपड़े को वस्त्र बनाती फैक्ट्री में अलग-अलग नाप के कटिंग करके, उसकी सिलाई करके शर्ट और पैन्ट बनाकर, उन्हें लेबल लगाकर बॉक्स में पैक करके विदेश में थोकबंध निर्यात किया गया और बाजार में भी बेचा गया। हमारे शहर के शो रूम के व्यापारी ये पैन्ट-शर्ट शरीद लाते हैं और उनसे हम पैन्ट-शर्ट खरीदते हैं।

कपास में से पैन्ट और शर्ट बनाने तक का सफर हमने देखा। कच्चे माल से तैयार होकर वस्तु कितने सारे लोगों (किसान, उत्पादक, व्यापारी, परिवहन सेवा) से गुजरकर ग्राहक तक पहुँचती है और उसमें जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को थोड़ा-बहुत लाभ मिलता है। हम दैनिक उपयोगी चीज-वस्तुएँ बाजार से प्राप्त करते हैं। यह बाजार कई लोगों को रोजगार देता है। सड़क-मार्ग, परिवहन, बैंकिंग और संचार की सुविधाओं के कारण बाजार व्यवस्था में क्रांति आई है। विश्व के देश परस्पर व्यापार द्वारा जुड़े हैं। हमारे आसपास के बाजार और ऑनलाइन बाजार द्वारा हम वैश्विक बाजार के साथ जुड़े रहते हैं। इस प्रकार वर्तमान समय में समग्र विश्व एक बाजार है।

Class 11 Geography Solutions Chapter 3(v) समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य

समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य Textbook Questions and Answers

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1 या 2 शब्दों में दें-

प्रश्न (क) लहरों के ऊँचे भाग को क्या कहते हैं ?
उत्तर-क्रेस्ट (Crest)।

प्रश्न (ख) भारत के समुद्री तट की लंबाई क्या है ?
उत्तर-7516 कि०मी०।

प्रश्न (ग) विश्व के दूसरे नंबर पर बड़ी बीच कौन-सी है ?
उत्तर-मरीना बीच (चेन्नई)।

प्रश्न (घ) जब दो स्पिट आपस में मिल जाते हैं, तो इसको क्या कहा जाता है ?
उत्तर-लूपड बार (Looped Bar)।

2. निम्नलिखित पर नोट लिखें-

(क) स्पिट (Spit)
(ख) समुद्री बीच (Sea Beach)
(ग) समुद्री गुफा (Sea Caves)
(घ) हाईड्रोलिक एक्शन (Hydrolic Action)।
उत्तर-(क) स्पिट-रेत की वह श्रेणी जिसका एक सिरा तट से जुड़ा होता है और दूसरा सिरा समुद्र में डूबा होता है।
(ख) समुद्री बीच-तट के साथ मलबे से बनी श्रेणी को बीच कहते हैं।
(ग) समुद्री गुफा-सागर की लहरों के अपरदन से तट पर चट्टानें टूटकर गुफा का निर्माण करती हैं।
(घ) हाईड्रोलिक एक्शन-जब जल-दबाव के कारण चट्टानें टूटती हैं, तो उन्हें जल-दबाव क्रिया कहते हैं।

3. निम्नलिखित में अंतर स्पष्ट करो-
(i) क्रेस्ट (Crest) और ट्रफ (Trough)
(ii) रेत बार (Sand Bar) और लैगून (lagoon)
उत्तर-
क्रेस्ट (Crest)-

(क) लहर के सबसे ऊँचे उठे हुए भाग को क्रेस्ट (Crest) कहते हैं।
(ख) हवा की शक्ति से लहरों का पानी ऊपर उठ जाता है।

ट्रफ (Trough)-

(क) लहर के सबसे नीचे दबे हुए भाग को ट्रफ (Trough) कहते हैं।
(ख) हवा की शक्ति कम होने से लहरों का पानी नीचे दब जाता है।

(ii) रेत बार (Sand Bar) – जब लहरें मलबे को तट के समानांतर एक श्रेणी के रूप में जमा कर देती हैं, तो इसे रेत बार कहते हैं।
लैगून (Lagoon) – कई तटों पर रेत की श्रेणियों के पीछे दलदले क्षेत्र बन जाते हैं, इनके मध्य पानी की एक झील बनती है, जिसे लैगून कहते हैं।

4. निम्नलिखित के उत्तर विस्तार सहित दो :

प्रश्न (क) समुद्री जल की खुर्चन (अपघर्षण) की क्रिया (Erosional work) क्या है और इससे बनने वाली धरातलीय आकृतियों की व्याख्या करें।
उत्तर-
समुद्री तरंगों के अपरदन द्वारा उत्पन्न भू-आकृतियाँ (Landforms Produced by Sea Wave Erosion)-

समुद्री तरंगें अपरदन द्वारा तटों पर नीचे लिखी भू-आकृतियों की रचना करती हैं-

1. खड़ी चट्टान/समुद्री क्लिफ (Sea Cliffs)—समुद्री लहरें सबसे अधिक प्रभाव तट पर स्थित चट्टानों के निचले भाग पर डालती हैं। नीचे से चट्टानें कट जाती हैं और एक नोच (Notch) बन जाती है। तरंगों के निरंतर हमले के कारण नोच गहरी होती जाती है जिससे ऊपर का भाग आगे को झुका हुआ लगने लगता है। कुछ समय के बाद यह झुका हुआ भाग अपने ही भार के कारण टूटकर नीचे गिर जाता है। इसके फलस्वरूप नोच के ऊपरी भाग फिर से खड़ी ढलान वाले हो जाते हैं। तट पर ऐसी खड़ी ढलान को खड़ी चट्टान/समुद्री क्लिफ कहते हैं।

Class 11 Geography Solutions Chapter 3(v) समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य 1

2. लहर-कटा चबूतरा (Wave-cut Platform or Bench)—कंधियों अथवा क्लिफों और नोचों (Notches) पर तरंगों के लगातार हमले के कारण वे कटकर स्थल की ओर पीछे को हटते रहते हैं। इसके परिणामस्वरूप अगले भाग में बनी एक नोच का विस्तार होता रहता है, जिसे लहर-कटा चबूतरा (Wave-cut Platform) कहते हैं।

3. समुद्री गुफाएँ (Sea Caves)-कमज़ोर चट्टानों वाली नोचों (Notches) में तरंगों के जल-दबाव (Hydraulic Pressure) के कारण उनमें दरारें उत्पन्न हो जाती हैं। तरंगें इन जोड़ों और दरारों के द्वारा प्रभाव डालकर उन्हें चौड़ा कर देती हैं। तरंगों के अपरदन के समय इन दरारों से भीतरी हवा दबाई जाती है और जब ये तरंगें समुद्र की ओर मुडती हैं तो जल के दबाव से मुक्त यह भीतरी हवा फैलती है और चट्टानों पर दबाव डालती है। इस क्रिया के निरंतर होते रहने से चट्टानें टूटती रहती हैं और कुछ समय के बाद गहरा खड्डा बन जाता है। धीरेधीरे यह खड्ड, गहरी गुफा का रूप धारण कर लेता है। दो पड़ोसी गुफाओं के बीच की दीवार टूट जाने पर
महराब (Arch) बन जाती है, जिसे प्राकृतिक पुल (Natural Bridge) कहते हैं।

4. समुद्री किनारे के सुराख (Spout Horns or Blow Holes)-तट पर हमले के समय तरंगें गुफाओं के मुँह को जल से बंद कर देती हैं, जिससे गुफाओं की अंदर की वायु अंदर ही बंद हो जाती है। यदि गुफा की छत कमज़ोर हो, तो वह वायु उसको फाड़कर ऊपर सुराख कर देती है। इसे समुद्री किनारे के सुराख कहते हैं। यदि तरंगों के हमले के समय वायु सीटी बजाती हुई इन सुराखों से निकलती है, तो गुफा में भरा जल भी वायु के साथ फव्वारे के समान बाहर निकलता है, इसीलिए इसे टोंटीदार सुराख (Spouting horn) कहकर भी पुकारते हैं।

5. खाड़ियाँ (Bays)–जब किसी तट पर कोमल और कठोर चट्टानें लंब रूप में स्थित हों, तो कोमल चट्टानें (Soft Rocks) अंदर की ओर अधिक कट जाती हैं। इस प्रकार कोमल चट्टानों में खाड़ियाँ (Bays) बन जाती हैं।

Class 11 Geography Solutions Chapter 3(v) समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य 2

6. हैडलैंड या केप या अंतरीप (Headland or Cape)-तट की लंबवर्ती स्थिति में फैली एक कठोर चट्टान के दोनों तरफ से नर्म चट्टानों का अपरदन हो जाता है और वहाँ खाड़ियाँ बन जाती हैं और वह सख्त चट्टान समुद्र में बढ़ी हुई रह जाती है, जिसे अंतरीप कहते हैं।

Class 11 Geography Solutions Chapter 3(v) समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य 3

7. स्टैक (Stack)-जब महराब की छत तरंगों द्वारा अपरदित हो जाती है अथवा किसी अन्य कारण से टूटकर नष्ट हो जाती है तो मेहराब का अगला भाग पिछले भाग से स्तंभ के रूप में अलग खड़ा रह जाता है। इस स्तंभ को स्टैक कहते हैं। स्कॉटलैंड के उत्तर में ओरकनीज़ (Orkneys) टापूओं में Old man of Hoai इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।

समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-4 शब्दों में दें-

प्रश्न 1. समुद्री जल की गतियाँ बताएँ।
उत्तर-लहरें, धाराएँ और ज्वारभाटा।

प्रश्न 2. तट रेखा से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-जहाँ जल-मंडल, थल-मंडल और वायु-मंडल मिलते हों।

प्रश्न 3. ब्रेकर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-लहरों का वह भाग, जो तट से टकराता है।

प्रश्न 4. सागरीय जल किन चट्टानों पर घुलनशील क्रिया करता है ?
उत्तर-चूने का पत्थर, डोलोमाइट और चॉक।

प्रश्न 5. क्लिफ किसे कहते हैं ?
उत्तर-तट पर खड़ी ढलान वाली चट्टान।

प्रश्न 6. गुफ़ा से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-क्लिफ़ के नीचे बने कटाव।

प्रश्न 7. गुफ़ा कैसे बनती है ?
उत्तर-Notch के बड़ा हो जाने पर।

प्रश्न 8. स्टैक कैसे बनते हैं ?
उत्तर-कठोर चट्टानों के बचे-खुचे भाग।

प्रश्न 9. भारत के पूर्वी तट पर किन्हीं दो लैगून झीलों के नाम बताएँ।
उत्तर-चिलका झील और पुलीकट झील।

प्रश्न 10. भारत के पश्चिमी तट पर किसी एक लैगून झील का नाम बताएँ।
उत्तर-वेंबनाद झील।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-3 वाक्यों में दें-

प्रश्न 1. सागरीय लहरों के तीन प्रकार बताएँ।
उत्तर-

  1. ब्रेकर
  2. स्वैश
  3. कवाश।

प्रश्न 2. Under Tow से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-तट से टकराकर मुड़ती हुई लहर के नीचे के जल को Under Tow कहते हैं।

प्रश्न 3. लहरों के अपरदन की क्रियाएँ बताएँ।
उत्तर-

  • जलीय दबाव क्रिया
  • घर्षण क्रिया
  • सहघर्षण क्रिया
  • घुलनशील क्रिया।

प्रश्न 4. समुद्री क्लिफ (Cliff) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-समुद्र तट पर खड़े ढलान वाले खंड को Cliff कहते हैं।

प्रश्न 5. सागरीय लहरों का अपरदन किन तत्त्वों पर निर्भर करता है ?
उत्तर-

  • तरंग की ऊँचाई
  • चट्टानों का झुकाव
  • चट्टानों की रचना
  • लहरों की दिशा।

प्रश्न 6. समुद्री किनारे के सुराख (Blow-hole) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-तट के निकट गुफाओं की छत पर जल सुराख कर देता है, जिसमें से वायु गुज़रती है, उसे समुद्री किनारे के सुराख कहते हैं।

प्रश्न 7. स्टैक से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-सागरीय तट पर कठोर चट्टानों के बचे-खुचे भाग को स्टैक कहते हैं।

प्रश्न 8. बीच किसे कहते हैं ?
उत्तर-तट के साथ-साथ मलबे के निक्षेप से बनी श्रेणियों को बीच कहते हैं।

प्रश्न 9. रोधक किसे कहते हैं ?
उत्तर-तट के समानांतर रेत की श्रेणी, जो रोकने का काम करती है, रोधक कहलाती है।

प्रश्न 10. लैगून से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-रोधक और तट के बीच बनी झील को लैगून कहते हैं।

प्रश्न 11. स्पिट से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-स्पिट रेत की एक श्रेणी होती है, जिसका एक सिरा तट से जुड़ा होता है और दूसरा सिरा खुले सागर में होता है।

प्रश्न 12. मेहराब कैसे बनती है ?
उत्तर-दो गुफ़ाओं के मिलने से छत एक ढक्कन के समान खड़ी रहती है, जिसे मेहराब (Arch) कहते हैं।

प्रश्न 13. तमबोलो से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-जब कोई रेत, रोधक तट को किसी वायु के साथ जोड़ती है, उसे तमबोलो कहते हैं।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न: (Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 60-80 शब्दों में दें-

प्रश्न 1. लहरों के द्वारा अपरदन के अलग-अलग रूप बताएँ।
उत्तर-अपरदन (Erosion)-तट पर तोड़-फोड़ का काम आमतौर पर सर्फ (Surf), लहरों या तूफ़ानी लहरों द्वारा ही होता है। समुद्री लहरों द्वारा अपरदन अधिक-से-अधिक 200 मीटर की गहराई तक होता है। यह अपरदन चार प्रकार से होता है-

  1. जल-दबाव क्रिया (Water Pressure)-सुराखों में जल के दबाव से चट्टानें टूटने और बिखरने लगती हैं।
  2. अपघर्षण (Abrasion)-बड़े-बड़े पत्थर चट्टानों से टकराकर उन्हें तोड़ते रहते हैं।
  3. टूट-फूट (Attrition)-पत्थरों के टुकड़े आपस में टकराकर टूटते रहते हैं।
  4. घुलनशील क्रिया (Solution)—समुद्री जल चूने वाली चट्टानों को घोलकर अलग कर देता है।

प्रश्न 2. लहरों द्वारा अपरदन किन तत्त्वों पर निर्भर करता है ? उत्तर-लहरों द्वारा अपरदन कई तत्त्वों पर निर्भर करता है- .

  1. चट्टानों की प्रकृति (Nature of Rocks)—तट पर स्थित कठोर चट्टानों की तुलना में कमज़ोर चट्टानें जल्दी ही टूट जाती हैं।
  2. लहरों का वेग और ऊँचाई (Speed and Height of Waves)-बड़ी और ऊँची लहरें अधिक कटाव करती हैं।
  3. तट के सागर की ओर ढलान (Slope) और ऊँचाई-कम ढलान वाले मैदानी तटों पर कटाव कम होता है।
  4. चट्टानों में सुराख (holes) और दरारों (Faults) का होना- यदि तटों की चट्टानों में सुराख और दरारें हों, तो तट का कटाव आसानी से होता है।
  5. जल की गहराई (Depth of water)-लहरें 30 फुट की गहराई तक ही कटाव करती हैं।

प्रश्न 3. समुद्री गुफाएँ कैसे बनती हैं ?
उत्तर-समुद्री गुफाएँ (Sea Caves)-आधार की कोमल चट्टानों के टूटने या घुल जाने पर तट के पास खोखले स्थान बन जाते हैं। लहरों द्वारा हवा के बार-बार घूमने और निकलने की क्रिया से ये स्थान चौड़े हो जाते हैं और गुफाएँ बन जाती हैं। इन गुफाओं की ऊपरी छत कठोर चट्टानों से बनी होती है। दो पड़ोसी गुफ़ाओं के बीच की दीवार टूट जाने से मेहराब (Arch) बन जाती है। इसे प्राकृतिक पुल भी कहते हैं।

प्रश्न 4. भू-जीभ (Spit) और भित्ती (Bar) में अंतर बताएँ।
उत्तर –
भू-जीभ (Spit)-

  1. मलबे के निक्षेप से बनी श्रेणी को भू-जीभ कहते हैं, जिसका एक सिरा तट से जुड़ा होता है और दूसरा सिरा खुले समुद्र में डूबा होता है।
  2. इसकी शक्ल एक जीभ के समान होती है।
  3. यह पानी में डूबी होती है और फिर से हुक (Hook) भी बन जाती है।

भित्ती (Bar)-

  1. लहरों द्वारा तट या खाड़ी के समानांतर निक्षेप से रेत की बनी ऊँची श्रेणी या रोक को भित्ती कहते हैं।
  2. यह रोक तट के समानांतर होती है।
  3. यह पानी से बाहर बनती है और इसके पीछे एक लैगून झील बन जाती है।

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 150-250 शब्दों में दें-

प्रश्न 1. तरंगों के प्रकारों और उनके अपरदन कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर-समुद्र का अपरदन, परिवहन और निक्षेपण कार्य, इसके जल में उत्पन्न होने वाली तीन गतियों – तरंगों या लहरों, ज्वारभाटा और जल-धाराओं द्वारा होता है। इनमें से तरंगें सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।

समुद्री तरंगें (Sea Waves)- पवनों के प्रभाव से सागरीय जल के तल के ऊँचा-नीचा होने को तरंग (Waves) कहते हैं। तरंग में जल अपने मूल स्थान से आगे नहीं बढ़ता, बल्कि अपने स्थान पर ही ऊपर-नीचे होता रहता है। महासागरों में पवनें बड़ी तेज़ी से चलती हैं। इस कारण कई बार 5 से 10 मीटर तक ऊँची तरंगें उठती हैं।

समुद्री तरंगों द्वारा अपरदन को नियंत्रित करने वाले कारक (Factors controlling the Erosion by Sea Waves)-

तरंगों द्वारा अपरदन सभी तटों पर एक समान नहीं होता, क्योंकि इनकी परिस्थितियाँ अलग-अलग स्थानों पर भिन्नभिन्न होती हैं। तरंगों द्वारा अपरदन को नीचे लिखे कारक प्रभावित करते हैं-

  • 1. तरंगों की ऊँचाई (Height of the Waves) तरंगों की ऊँचाई के अनुसार ही तट पर जल आता है। ऊँची तरंगें तट पर ही अधिक जल फेंकती हैं। यह जल अधिक मात्रा में कंकड़, रेत आदि को प्रभावित करता है और तटों से टकराकर अधिक अपरदन करता है।
  • तटीय चट्टानों का झुकाव (Inclination of Coastal Rocks)—जिन तटों पर चट्टानों की परतों का – झुकाव समुद्र की ओर होता है, उन परतों के जोड़ तरंगों के सामने होते हैं, जिसके कारण उनका अपरदन आसान हो जाता है।
  • तटीय चट्टानों की संरचना (Structure of Coastal Rocks) चट्टानों की संरचना अपरदन को बहुत प्रभावित करती है। नर्म चट्टानें जल्दी टूटती हैं। कार्स्ट तटों पर तरंगें तेज़ गति से अपरदन करती हैं।
  • तरंगों की दिशा (Direction of Waves)-तटीय चट्टानों पर सीधी आकर टकराने वाली तरंगें अधिक अपरदन करती हैं।
  • वनस्पति फैलाव (Vegetation Cover)-तटों पर उगे पेड़-पौधों की जड़ें चट्टानों को खोखला कर देती हैं, जिस कारण तरंगों द्वारा तटों पर अपरदन आसान हो जाता है।

6. तरंगों की गहराई (Depth of Waves) तरंगों का अधिक कटाव 10 मीटर की गहराई तक ही होता है।

समुद्री लहरें (Sea Waves)-

समुद्री लहरों का काम समुद्री तटों तक ही सीमित रहता है। हवा के प्रभाव से समुद्र के पानी में लहरें पैदा होती हैं। हवा की शक्ति से समुद्र के पानी का कुछ भाग ऊपर उठ आता है और कुछ भाग नीचे दब जाता है। सबसे ऊँचे उठे हुए भाग को Crest और सबसे नीचे दबे भाग को ट्रफ (Trough) कहते हैं। महासागरों में लहरों की ऊँचाई 10 मीटर तक होती है, पर तूफान के समय लहरों की ऊँचाई 20 मीटर तक ऊँची हो जाती है।

लहरों के प्रकार (Types of Waves) –

  1. ब्रेकर (Breaker)-समुद्र तट पर लहरों का उच्च भाग टूटकर तट की ओर आगे बढ़ता है। इसे ब्रेकर या सर्फ (Surf) या स्वैश (Swash) कहते हैं।
  2. बैकवॉश (Backwash)-तट से टकराकर पानी वापिस जाती हुई लहर के नीचे-नीचे चलता है। इस वापिस जाते हुए जल को (Under Tow) या उतार (backwash) कहते हैं।

Class 11 Geography Solutions Chapter 3(v) समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य 4

समुद्री लहरों का कार्य (Work of Sea Waves)-दूसरे साधनों के समान लहरें भी अपरदन, परिवहन और निक्षेप का कार्य करती हैं।
अपरदन (Erosion)-तट पर तोड़-फोड़ का काम आमतौर पर सर्फ (Surf) लहरों या तूफानी लहरों द्वारा ही होता है। समुद्री लहरों द्वारा अपरदन अधिक-से-अधिक 200 मीटर की गहराई तक होता है। यह अपरदन चार प्रकार से होता है –

  1. जल-दबाव क्रिया (Water Pressure)-सुराखों में जल के दबाव से चट्टानें टूटने और बिखरने लगती हैं।
  2. अपघर्षण (Abrasion)-बड़े-बड़े पत्थर चट्टानों से टकराकर उन्हें तोड़ते रहते हैं।
  3. तोड़-फोड़ (Attrition)—पत्थरों के टुकड़े आपस में टकराकर टूटते रहते हैं।
  4. घुलनशील क्रिया (Solution)-समुद्री जल चूने वाली चट्टानों को घोलकर अलग कर देता है।

प्रश्न 2. समुद्री लहरों के निक्षेप से बनने वाली भू-आकृतियों का वर्णन करें।
उत्तर-
समुद्री तरंगों के निक्षेप द्वारा उत्पन्न भू-आकृतियां (Landforms Produced by Deposition of Sea Waves) – समुद्री तरंगों के निक्षेप द्वारा नीचे लिखी भू-आकृतियों का निर्माण होता है-

1. तरंग-निर्मित चबूतरा (Wave-built Platform)-तटों का अपरदन करके तरंगें, जिन पदार्थों को प्राप्त करती हैं, उनमें से हल्के पदार्थों को दूर ले जाकर पानी में डूबे हुए ढलान वाले तट पर निक्षेप कर देती हैं, जिससे वह भाग एक समतल चबूतरे का रूप धारण कर लेता है। यहाँ निक्षेप के कारण सागर गहरा हो जाता है। कभी-कभी यह चबूतरा पानी से बाहर भी दिखाई देने लग जाता है। इस चबूतरे को तरंग-निर्मित चबूतरा कहते हैं।

Class 11 Geography Solutions Chapter 3(v) समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य 5

2. बीच (Beach)—सागरीय तरंगों द्वारा अपरदन के भारी पदार्थों; जैसे-पत्थर, कंकड़ आदि को तट के पास ही अधिक मात्रा में ढेरी कर दिया जाता है, जिससे यह भाग थोड़ा ऊँचा और ढलान वाला हो जाता है। तट के इस क्षेत्र को बीच कहा जाता है। यहाँ पर ऊँची तरंगों के समय ही जल पहुँचता है। ये प्रदेश बड़े ज्वार (High Tides) और छोटे ज्वार (Low Tides) के मध्य में स्थित होते हैं। तट के पास ये ऊँचे प्रदेश खेलों के उत्तम स्थल बन जाते हैं, जैसे-मुंबई में जुहू बीच और चेन्नई में मरीना बीच।

3. अपतटीय रेत भित्तियाँ (Offshore Sand-bars) तरंगें तट से अपरदित किए पदार्थ विशेष रूप से रेत को तट के समानांतर पानी में डूबे भाग पर एक श्रेणी के रूप में ढेरी कर देती हैं। रेत की इस श्रेणी को अपतटीय रेत भित्ती कहते हैं। इसका ऊपरी भाग पानी के तल से भी ऊपर दिखाई देता है। ये रोधक का काम करती हैं।

4. भू-जीभ या स्पिट (Spits) – कभी-कभी तरंगों द्वारा बनाई किसी रेत भित्ती का एक सिरा स्थल से जुड़ा होता है और दूसरा समुद्र की ओर बढ़ा रहता है। उसे भू-जीभ या स्पिट कहते हैं। कभी-कभी इसका समुद्र की ओर का सिरा नुकीला हो जाता है, तो इसे कस्प (cusp) कहते हैं।

Class 11 Geography Solutions Chapter 3(v) समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य 6

5. हुक (Hook)-स्पिट का सिरा कभी-कभी समुद्री धाराओं या फिर तिरछी तरंगों के प्रभाव के कारण तट की ओर मुड़ जाता है। इसे हुक (Hook) कहते हैं।

6. संयोजक भित्ती या तमबोलो (Connecting bar or Tombolo)—कभी-कभी स्पिट द्वारा दो द्वीप या मुख्य स्थल किसी टापू के साथ जुड़ जाते हैं। ऐसी भित्ती को संयोजक भित्ती कहते हैं । इटली में इन्हें तमबोलो का नाम दिया जाता है। यदि स्पिट का बाहरी सिरा संयोजक भित्ती का रूप ग्रहण करते-करते तट की ओर मुड़कर उसके साथ आकर जुड़ जाए तो उसे Looped bar के नाम से पुकारा जाता है।

7. लैगून झीलें (Lagoons)—कई तटों पर रेत की श्रेणियों के पीछे झीलें बन जाती हैं, जिन्हें लैगून कहते हैं। भारत के पूर्वी तट पर चिल्का (Chilka) और पुलीकट (Pulikat) तथा केरल के तट पर वेबनाद झील. इसके उदाहरण हैं।

Class 11 Geography Solutions Chapter 5(ii) भूचाल या भूकंप

भूचाल या भूकंप Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1. भूचाल (भूकंप) क्या होते हैं ?
उत्तर-धरती पर अचानक झटकों को भूचाल (भूकंप) कहते हैं।

प्रश्न 2. हाईपोसैंटर क्या होता है ?
उत्तर-भूचाल के केंद्र को हाईपोसैंटर कहते हैं।

प्रश्न 3. अधिकेंद्र या ऐपीसैंटर क्या होता है ?
उत्तर-धरती के ऊपर जिस स्थान पर भूचाल पैदा होता है, उसे अधिकेंद्र या एपीसैंटर कहते हैं।

प्रश्न 4. फोकस और अधिकेंद्र क्या होते हैं ? इनके चित्र भी बनाएँ।
उत्तर-भूचाल जिस स्थान से आरंभ होता है, उसे फोकस कहते हैं। धरातल के जिस स्थान पर सबसे पहले भूचाल अनुभव होता है, उसे अधिकेंद्र कहते हैं।
(नोट-चित्र के लिए देखें अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के लघूत्तरात्मक प्रश्न)

प्रश्न 5. भूचाल मापने वाले यंत्र को क्या कहा जाता है ?
उत्तर-सिस्मोग्राफ।

प्रश्न 6. भूचाल आने के कारणों को विस्तार से लिखें।
उत्तर-(उत्तर के लिए देखें-अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के लघूत्तरात्मक प्रश्न-1)

प्रश्न 7. प्लेट टैक्टॉनिक का सिद्धांत क्या है ?
उत्तर-पृथ्वी का क्रस्ट कई प्लेटों में बँटा हुआ है। ये प्लेटें खिसकती रहती हैं। इन्हें प्लेट टैक्टॉनिक कहते हैं।

प्रश्न 8. मानवीय कारण भूचाल के लिए कैसे ज़िम्मेदार हैं ?
उत्तर-खानों को गहरा करने, डैम, सड़कों और रेल पटरियों को बिछाने के लिए ऐटमी धमाके करने से भूचाल आते हैं।

प्रश्न 9. भूचाल की तीव्रता क्या होती है? भूचाल की तीव्रता कैसे मापी जाती है ?
उत्तर- भूचाल की तीव्रता मापने के लिए रिक्टर पैमाने का प्रयोग किया जाता है। भूचाल की तीव्रता उसमें पैदा हुई शक्ति को कहा जाता है।

प्रश्न 10. अग्नि-चक्र क्या है ?
उत्तर-प्रशांत महासागर के इर्द-गिर्द ज्वालामुखियों की श्रृंखला को अग्नि-चक्र कहते हैं।

प्रश्न 11. भूचालों के विश्व-विभाजन का वर्णन करें।
उत्तर-(उत्तर के लिए देखें-अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नों में निबंधात्मक प्रश्न सं.-2)

प्रश्न 12. भारत में भूचाल क्षेत्रों के बारे में लिखें।
उत्तर- भारत में प्रायद्वीप पठार स्थित खंड भूचाल रहित होते हैं। अधिकतर भूचाल हिमालय पर्वत, गंगा के मैदान और पश्चिमी तट पर आते हैं।

प्रश्न 13. सुनामी से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-सागर तल पर आए भूचाल (भूकंप) के कारण उत्पन्न हुई विशाल लहरों को सुनामी कहा जाता है।

प्रश्न 14. क्या भूचालों की भविष्यवाणी की जा सकती है ?
उत्तर- भूचालों की भविष्यवाणी करना भूचाल वैज्ञानिकों के लिए बहुत मुश्किल काम है या यह कह लीजिए कि लगभग असंभव है। केवल आम भूचालों से ग्रस्त क्षेत्र और धरती की पपड़ी पर प्लेट टैक्टॉनिक का नक्शा और प्लेट सीमा का गहन अध्ययन भूचालों के बारे में अनुमान लगाना आसान कर सकता है।

भूचाल या भूकंप Important Questions and Answers

लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 60-80 शब्दों में दें-

प्रश्न 1. भूचाल आने के कारणों को विस्तार से लिखें।
उत्तर-भूचाल के कारण (Causes of Earthquakes)-प्राचीन काल में लोग भूचाल को भगवान का क्रोध मानते थे। धार्मिक विचारों के अनुसार, जब मानवीय पाप बढ़ जाते हैं, तो पापों के भार से धरती काँप उठती है। परंतु वैज्ञानिकों के अनुसार भूचाल के नीचे लिखे कारण हैं-

  • ज्वालामुखी विस्फोट (Volcanic Eruption)–ज्वालामुखी विस्फोट से आस-पास के क्षेत्र काँप उठते हैं और हिलने लगते हैं। अधिक विस्फोटक शक्ति के कारण खतरनाक भूचाल आते हैं। 1883 ई० में काराकटोआ विस्फोट से पैदा हुए भूचाल का प्रभाव ऑस्ट्रेलिया और दक्षिणी अमेरिका तक अनुभव किया गया था।
  • दरारें (Faults)-धरती की हलचल के कारण धरातल पर खिंचाव या दबाव के कारण दरारें पड़ जाती हैं। इन्हीं के सहारे भू-भाग ऊपर या नीचे की ओर सरक जाते हैं और जिससे भूचाल पैदा होते हैं। 1923 में कैलीफोर्निया का भयानक भूचाल ‘सेन ऐंडरीयास-दरार’ (San Andreas Faults) के कारण हुआ था। 11 दिसंबर, 1927 में कोयना (महाराष्ट्र) का भूचाल भी इसी कारण आया था।
  • धरती का सिकुड़ना (Contraction of Earth)-धरती अपनी मूल अवस्था में गर्म थी, परंतु अब धीरे धीरे यह ठंडी हो रही है। तापमान कम होने से धरती सिकुड़ती है और चट्टानों में हलचल होती है।
  • गैसों का फैलना (Expansion of Gases)-धरती के भीतरी भाग से गैसें और भाप बाहर आने का यत्न करती हैं। इनके दबाव से भूचाल आते हैं।
  • चट्टानों की लचक शक्ति (Elasticity of Rocks)-जब किसी चट्टान पर दबाव पड़ता है, तो वह चट्टान उस दबाव को वापस धकेलती है, इससे भू-भाग हिल जाते हैं। .

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 150-250 शब्दों में दें-

प्रश्न 1. भूचाल के अलग-अलग प्रकार बताएँ। भूचाली लहरों का वर्णन करें।
उत्तर-
भूचाल के प्रकार (Types of Earthquakes) –
भूचाल के पैदा होने के कई कारण होते हैं-
गहराई के आधार पर भूचाल के प्रकार (Types of Earthquakes according to Depth)-प्रसिद्ध वैज्ञानिकों गुटनबर्ग (Gutenberg) और रिचर (Ritchter) ने गहराई के आधार पर भूचालों को तीन वर्गों में बाँटा है।
जिन भूचालों की लहरें (Shock) 50 किलोमीटर या इससे कम गहराई पर उत्पन्न होती हैं, उन्हें साधारण भूचाल (Normal Earthquakes) कहते हैं। जब लहरें 70 से 250 किलोमीटर की गहराई से उत्पन्न होती हैं, तो इन्हें मध्यवर्ती भूचाल (Intermediate Earthquakes) कहते हैं। जब लहरों की उत्पत्ति 250 से 700 किलोमीटर की गहराई के बीच होती है तो इन्हें गहरे केंद्रीय भूचाल (Deep Focus earthquakes) कहते हैं।

भूमि-कंपन लहरें (Earthquake Waves) –
भूचाल संबंधी ज्ञान को भूचाल विज्ञान (Semology) कहते हैं। भूचाल की तीव्रता और उत्पत्ति-स्थान की तीव्रता पता करने के लिए भूचाल मापक-यंत्र (Seismograph) की खोज हुई है। इस यंत्र में लगी एक सूई द्वारा ग्राफ पेपर के ऊपर भूचाल के साथ-साथ ऊँची-नीची (लहरों के रूप में) रेखाएँ बनती रहती हैं। जिस स्थान-बिंदु से भूचाल आरंभ होता है, उसे भूचाल उत्पत्ति केंद्र (Seismic Focus) कहते हैं। भू-तल पर जिस स्थान-बिंदु पर भूचाल का अनुभव सबसे पहले होता है, उसे अधिकेंद्र (Epicentre) कहते हैं। यह भूचाल उत्पत्ति केंद्र के ठीक ऊपर से आरंभ होता है। भूचाल लहरें (Earthquake Waves) उत्पत्ति केंद्र में उत्पन्न होकर शैलों में कंपन करती हुई सबसे पहले अधिकेंद्र और इसके निकटवर्ती क्षेत्र में पहुँचती हैं। परंतु भूचाल का सबसे अधिक प्रभाव अधिकेंद्र और इसके निकटवर्ती क्षेत्र पर पड़ता है।

Class 11 Geography Solutions Chapter 5(ii) भूचाल या भूकंप 1

भूचाली लहरों को रेखाओं में लिया जाता है, जोकि अक्सर अंडे के आकार (Elliptical) की होती हैं। इन्हें भूचाल उत्पत्ति रेखाएँ (Homoseismal lines) कहा जाता है। ऐसे स्थानों को, जिन्हें एक जैसी लहरों के पहुँचने के कारण एक जैसी हानि हुई हो, तो मानचित्र पर रेखाओं द्वारा मिला दिया जाता है। इन रेखाओं को सम-भूचाल रेखाएँ (Isoseismal lines) कहते हैं।

भूचाल लहरें-उत्पत्ति केंद्र से उत्पन्न होने वाली भूमि-कंपन लहरें एक जैसी नहीं होती और न ही इनकी गति में समानता होती है। इन तथ्यों को आधार मानकर इन तरंगों को नीचे लिखे तीन भागों में बाँटा गया है-

Class 11 Geography Solutions Chapter 5(ii) भूचाल या भूकंप 2

1. प्राथमिक लहरें (Primary or Push or ‘P’ waves)—ये लहरें ध्वनि लहरों (Sound waves) के समान आगे-पीछे (to and fro) होती हुई आगे बढ़ती हैं। ये ठोस भागों में तीव्र गति से आगे बढ़ती हैं और अन्य प्रकार की लहरों की अपेक्षा तीव्र चलने वाली लहरें होती हैं। इनकी गति 8 से 14 कि०मी० प्रति सैकिंड होती है। प्राथमिक लहरें तरल और ठोस पदार्थों को एक समान रूप में पार करती हैं।

2. गौण लहरें (Secondary or ‘S’ Waves)-ये लहरें ऊपर-नीचे (Up and down) होती हुई आगे बढ़ती _हैं। इनकी गति 4 से 6 किलोमीटर प्रति सैकिंड होती है। ये द्रव्य पदार्थों को पार करने में असमर्थ होती हैं और ये उसमें ही अलोप हो जाती हैं।

3. धरातलीय लहरें (Surface or ‘L’ waves)-इनकी गति 3 से 5 किलोमीटर प्रति सैकिंड होती है। ये धरती की ऊपरी परतों में ही चलती हैं अर्थात् ये भू-गर्भ की गहराइयों में प्रवेश नहीं करतीं। ये अत्यंत ऊँची और नीची होकर चलती हैं जिससे भू-तल पर अपार धन-माल की हानि होती है।

प्रश्न 2. भूचाल किसे कहते हैं ? भूचालों की उत्पत्ति के क्या कारण हैं ? विश्व में भूचाल क्षेत्रों के विभाजन के बारे में बताएँ।
उत्तर-जब धरातल का कोई भाग अचानक काँप उठता है, तो उसे भूचाल कहते हैं। इस हलचल के कारण धरती हिलने लगती है और आगे-पीछे, ऊपर-नीचे सकरती है। इन्हें झटके (Termors) कहते हैं। (An Earthquake is a simple shiver on the skin of our planet.)
भूचाल के कारण (Causes of Earthquakes)—प्राचीन काल में लोग भूचाल को भगवान का क्रोध मानते थे। धार्मिक विचारों के अनुसार जब मानवीय पाप बढ़ जाते हैं, तो पापों के भार से धरती काँप उठती है। परंतु वैज्ञानिकों के अनुसार भूचाल के लिए उत्तरदायी कारण नीचे लिखे हैं-

1. ज्वालामुखी विस्फोट (Volcanic Eruption)-ज्वालामुखी विस्फोट से आस-पास के क्षेत्र काँप उठते हैं
और हिलने लगते हैं। अधिक विस्फोटक शक्ति के कारण खतरनाक भूचाल आते हैं। 1883 में काराकाटोआ विस्फोट से पैदा हुए भूचाल का प्रभाव ऑस्ट्रेलिया और दक्षिणी अमेरिका तक अनुभव किया गया।

2. दरारें (Faults)-धरती की हलचल के कारण धरातल पर खिंचाव या दबाव के कारण दरारें पड़ जाती हैं। इनके सहारे भूमि-भाग ऊपर या नीचे की ओर सरकने से भूचाल पैदा होते हैं। 1923 में कैलीफोर्निया का भयानक भूचाल “सेन ऐंडरीयास-दरार’ (San Andreas Faults) के कारण हुआ था। 11 दिसंबर, 1927 में कोयना (महाराष्ट्र) का भूचाल भी इसी कारण आया था।

3. धरती का सिकुड़ना (Contraction of Earth) धरती अपनी मूल अवस्था में गर्म थी, परन्तु अब धीरे धीरे ठंडी हो रही है। तापमान कम होने से धरती सिकुड़ती है और चट्टानों में हलचल होती है।

4. गैसों का फैलना (Expansion of Gases)-धरती के भीतरी भाग से गैसें और भाप बाहर आने का यत्न करती हैं इनके दबाव से भूचाल आते हैं।

5. चट्टानों की लचक-शक्ति (Elasticity of Rocks)-जब किसी चट्टान पर दबाव पड़ता है, तो वह चट्टान उस दबाव को वापस धकेलती है, इससे भू-भाग हिल जाते हैं।

6. साधारण कारण (General Causes)-हल्के या छोटे भूचाल कई कारणों से पैदा हो जाते हैं-

  • पहाड़ी भागों में भू-स्खलन (Landslide) और हिम-स्खलन (Avalanche) होने से।
  • गुफाओं की छतों के बह जाने से।
  • समुद्री तटों से तूफानी लहरों के टकराने से।
  • धरती के तेज़ घूमने से।
  • अणु-बमों (Atom Bombs) के विस्फोट और परीक्षण से।
  • रेलों, ट्रकों और टैंकों के चलने से।

विश्व के भूचाल-क्षेत्र (Earthquake Zones of the World)-

  1. ज्वालामुखी क्षेत्रों में।
  2. नवीन बलदार पहाड़ों के क्षेत्रों में।
  3. समुद्र तट के क्षेत्र में।

भूचाल कुछ निश्चित पेटियों (Belts) में मिलते हैं-

  • प्रशांत महासागरीय पेटी (Circum Pacific Belt)—यह विशाल भूचाल क्षेत्र प्रशांत महासागर के दोनों तटों (अमेरिकी और एशियाई) के साथ-साथ फैला हुआ है। यहाँ विश्व के 68% भूचाल आते हैं। इसमें कैलीफोर्निया, अलास्का, चिली, जापान, फिलीपाइन प्रमुख क्षेत्र हैं। जापान में तो हर रोज़ लगभग 4 भूचाल आते हैं। हर तीसरे दिन एक बड़ा भूचाल आता है।
  • मध्य-महाद्वीपीय पेटी (Mid-world Belt)—यह पेटी यूरोप और एशिया महाद्वीप के बीच बलदार पर्वतों (अल्पस और हिमालय) के सहारे पूर्व-पश्चिम दिशा में फैली है। यहाँ संसार के 11% भूचाल आते हैं। भारत के भूचाल-क्षेत्र 1. भारत के उत्तरी भाग में अधिक भूचाल आते हैं। 2. मध्यवर्ती मैदानी-क्षेत्र में कम भूचाल अनुभव होते हैं।
  • दक्षिणी भारत एक स्थिर भाग है। यहाँ भूचाल बहुत कम आते हैं।
  • भारत में आए हुए प्रसिद्ध भूचाल हैंकच्छ (1819), असम (1897), कांगड़ा (1903), बिहार (1934)।

प्रश्न 3. मानवीय जीवन पर भूचाल के प्रभाव बताएँ।
उत्तर-भूचाल के प्रभाव (Effects of Earthquakes)-भूचाल पृथ्वी की एक भीतरी शक्ति है, जो अचानक (Sudden) परिवर्तन ले आती है। यह जादू के खेल के समान क्षण-भर में अनेक परिवर्तन ले आती है। भूचाल मनुष्य के लिए लाभदायक और हानिकारक दोनों ही है। विनाशकारी प्रभाव के कारण इसे शाप माना गया है, परंतु इसके कई लाभ भी हैं। भूचालों से होने वाली हानियों व लाभों का वर्णन नीचे दिया गया है-

हानियाँ (Disadvantages)-

  • जान व माल का नाश (Loss of Life and Property)-भूचाल से जान व माल की बहुत हानि होती है। 1935 में क्वेटा के भूचाल से 60,000 लोग मारे गए थे। एक अनुमान के अनुसार पिछले 4000 वर्षों में 1/2 करोड़ आदमी भूचाल के कारण मारे जा चुके हैं।
  • नगरों का नष्ट होना (Distruction of Cities) भूचाल से पूरे के पूरे नगर नष्ट हो जाते हैं। पुल टूट जाते हैं, सड़कें टूट जाती हैं, रेल की पटरियाँ टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं जिससे आवाजाही रुक जाती है।
  • आग का लगना (Fire Incidents)-भूचाल से अचानक आग लग जाती है। 18 अप्रैल, 1906 ई० में सैन फ्रांसिस्को में आग से शहर का काफी बड़ा भाग जल गया था।
  • दरारों का निर्माण (Formation of Faults)-धरातल फटने से दरारें बनती हैं। असम में 1897 ई० के भूचाल के कारण 11 किलोमीटर चौड़ी और 20 किलोमीटर लंबी दरार बन गई थी।
  • भू-स्खलन (Landslide)-पहाड़ी क्षेत्रों के अलग-अलग शिलाखंड और हिमखंड (Avalanche) टूटकर नीचे गिरते रहते हैं। समुद्र में बर्फ के शैल (Iceberge) तैरने लगते हैं।
  • बाढ़ें (Floods)-नदियों के रास्ते बदलने से बाढ़ें आती हैं। 1950 ई० में असम में भूचाल से ब्रह्मपुत्र नदी में बाढ़ आई थी।
  • तूफानी लहरें (Tidal waves)-समुद्र में तूफानी लहरें तटों पर नुकसान करती हैं। इन्हें सुनामी (Tsunami) कहते हैं। 1775 ई० में लिस्बन (पुर्तगाल) में भूचाल से 12 मीटर ऊँची लहरों के कारण वह शहर नष्ट हो गया था।
  • तटीय भाग का धंसना (Sinking of the Coast)-भूचाल से तटीय भाग नीचे धंस जाते हैं। जापान में ____1923 ई० के संगामी खाड़ी के भूचाल से सागर तल का कुछ भाग 300 मीटर नीचे धंस गया था।

लाभ (Advantages)-

  • भूचाल से निचले पठारों, द्वीपों और झीलों की रचना होती है।
  • भूचाल से कई चश्मों का (Springs) का जन्म होता है।
  • तटीय भागों में गहरी खाइयाँ बन जाती हैं, जहाँ प्राकृतिक बंदरगाह बन जाते हैं।
  • भूचाल द्वारा अनेक खनिज पदार्थ धरातल पर आ जाते हैं।
  • कृषि के लिए नवीन उपजाऊ क्षेत्र बन जाते हैं।
  • भूचाली लहरों द्वारा धरती के भू-गर्भ (Interior) के बारे में जानकारी मिलती है।
  • चट्टानों के टूटने से उपजाऊ मिट्टी का निर्माण होता है।

प्रश्न 4. सुनामी से क्या अभिप्राय है ? इसके प्रभाव बताएँ।
उत्तर-सुनामी (Tsunami)—’सुनामी’ जापानी भाषा का एक शब्द है, जिसका अर्थ है-‘तटीय लहरें’। ‘TSU’ , शब्द का अर्थ है-तट और ‘Nami’ शब्द का अर्थ है-तरंगें। इन्हें ज्वारीय लहरें (Tidal waves) या भूचाली तरंगें (Seismic Waves) भी कहा जाता है।

सुनामी अचानक ऊँची उठने वाली विनाशकारी तरंगें हैं। इससे गहरे पानी में हिलजुल होती है। इसकी ऊँचाई आमतौर पर 10 मीटर तक होती है। सुनामी उस हालत में पैदा होती है, जब सागर के तल में भूचाली क्रिया के कारण हिलजुल होती है और महासागर में सतह के पानी का लंब रूप में विस्थापन होता है। हिंद महासागर में सुनामी तरंगें बहुत कम महसूस की गई हैं। अधिकतर सुनामी प्रशांत महासागर में घटित होती है।

सुनामी की उत्पत्ति (Origin of Tsunami)-भीतरी दृष्टि से पृथ्वी एक क्रियाशील ग्रह है। अधिकतर भूचाल टैक्टॉनिक प्लेटों (Tectonic Plates) की सीमाओं पर पैदा होते हैं। सुनामी अधिकतर सबडक्शन जोन (Subduction Zone) के भूचाल के कारण पैदा होती है। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ दो प्लेटें एक-दूसरे में विलीन (Coverage) हो जाती हैं। भारी पदार्थों से बनी प्लेटें हल्की प्लेटों के नीचे खिसक जाती हैं। समुद्र के गहरे तल का विस्तार होता है। यह क्रिया एक कम गहरे भूचाल को पैदा करती है।

26 दिसंबर, 2004 की सुनामी आपदा (Tsunami Disaster of 26th December, 2004)-प्रातः 7.58 बजे, एक काले रविवार (Black Sunday) 26 दिसंबर, 2004 को, क्रिसमस से एक दिन बाद सुनामी दुर्घटना घटी। यह विशाल, विनाशकारी सुनामी लहर हिंद महासागर के तटीय प्रदेश से टकराई। इस लहर के कारण इंडोनेशिया से लेकर भारत तक के देशों में 3 लाख आदमी विनाश के शिकार हुए थे।

महासागरीय तल पर एक भूचाल पैदा हुआ, जिसका अधिकेंद्र सुमात्रा (इंडोनेशिया) के 257 कि०मी० दक्षिण-पूर्व में था। यह भूचाल रिक्टर पैमाने पर 8.9 शक्ति का था। इन लहरों के ऊँचे उठने पर पानी की एक ऊँची दीवार बन गई थी।

आधुनिक युग के इतिहास में यह एक महान् दुर्घटना के रूप में लिखी जाएगी। सन् 1900 के बाद, यह चौथा बड़ा भूचाल था। इस भूचाल के कारण पैदा हुई सुनामी लहरों से हिरोशिमा बम की तुलना में लाखों गुणा अधिक ऊर्जा का विस्फोट हुआ था। इसलिए इसे भूचाल प्रेरित विनाशकारी लहर भी कहा जाता है। यह भारत और म्यांमार के प्लेटों के

मिलन स्थान पर घटी थी, जहाँ लगभग 1000 किलोमीटर प्लेट-सीमा खिसक गई थी। इसके प्रभाव से सागर तल 10 मीटर ऊपर उठ गया और ऊपरी पानी हज़ारों घन मीटर की मात्रा में विस्थापित हो गया था। इसकी गति लगभग 700 कि०मी० प्रति घंटा थी। इसे अपने उत्पत्ति स्थान से भारतीय तट तक पहुँचने में दो घंटे का समय लगा। इस दुर्घटना ने तटीय प्रदेशों के इतिहास और भूगोल को बदलकर रख दिया है।

सुनामी दुर्घटना के प्रभाव (Effects of Tsunami Disaster)-
हिंद महासागर के तटीय देशों इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, म्याँमार, भारत, श्रीलंका और मालदीव में सनामी दुर्घटना के विनाशकारी प्रभाव पड़े। भारत में तमिलनाडु, पांडेचेरी, आंध्र-प्रदेश, केरल आदि राज्य सबसे अधिक प्रभावित हुए। अंडमान और निकोबार द्वीप में इस लहर का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा। इंडोनेशिया में लगभग 1 लाख आदमी, थाईलैंड में 10,000 आदमी, श्रीलंका में 30,000 आदमी तथा भारत में 15,000 आदमी इस विनाश के शिकार हुए।

भारत में सबसे अधिक नुकसान तमिलनाडु के नागापट्नम जिले में हुआ, जहाँ पानी शहर के 1.5 कि०मी० अंदर तक पहुँच गया था। संचार, परिवहन के साधन और बिजली की सप्लाई में भी मुश्किलें पैदा हुईं। अधिकतर श्रद्धालु वेलान कन्नी (Velan Kanni) के तट (Beach) के सागरीय पानी में बह गए। तट की विनाशकारी वापिस लौटती हुई लहरें हज़ारों लोगों को बहाकर ले गईं। मरीना तट (एशिया का सबसे बड़ा तट) पर 3 कि०मी० लंबे क्षेत्र में सैंकड़ों लोग सागर की चपेट में आ गए। यहाँ लाखों रुपयों के चल व अचल संसाधनों की बर्बादी हुई।

Class 11 Geography Solutions Chapter 5(ii) भूचाल या भूकंप 3

कलपक्कम अणु-ऊर्जा केंद्र में पानी प्रवेश करने पर अणु-ऊर्जा के रिएक्टरों को बंद करना पड़ा। मामलापुरम् के विश्व प्रसिद्ध मंदिर को तूफानी लहरों से बहुत नुकसान हुआ। सबसे अधिक मौतें अंडमान-निकोबार द्वीप पर हुईं। ग्रेट निकोबार के दक्षिणी द्वीप पर, जोकि भूचाल के केंद्र से केवल 150 कि०मी० दूर था, सबसे अधिक प्रभाव पड़ा। निकोबार द्वीप पर भारतीय नौसेना का एक अड्डा नष्ट हो गया। ऐसा लगता है कि इन द्वीपों का अधिकांश क्षेत्र समुद्र ने निगल लिया हो। इस प्रकार सुनामी लहरों ने इन द्वीप समूहों के भूगोल को बदल दिया है और यहाँ फिर से मानचित्रण करना पड़ेगा। इस देश की मुसीबतों के शब्दकोश में एक नया शब्द ‘सुनामी मुसीबत’ जुड़ गया है। अमेरिकी वैज्ञानिकों के अनुसार इस कारण पृथ्वी अपनी धुरी से हिल गई और इसका परिभ्रमण तेज़ हो गया है, जिस कारण दिन हमेशा के लिए एक सैकंड कम हो गया है। सुनामी लहरें सचमुच ही प्रकृति का कहर होती हैं।