Class 12 Religion Solutions Chapter 2 अशोक के समय तक बौद्ध धर्म

ESSAY TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. बुद्ध धर्म के उद्भव के समय इसकी धार्मिक परिस्थितियों की चर्चा करें।
(Discuss the contemporary religious conditions of Buddhism at the time of its origin.)
अथवा
उन कारणों का संक्षेप वर्णन कीजिए जो बौद्ध धर्म के उद्भव के लिए उत्तरदायी थे।
(Give a brief account of those factors which led to the birth of Buddhism.)
उत्तर-छठी शताब्दी ई०पू० में भारत के हिंदू समाज एवं धर्म में अनेक अंध-विश्वास तथा कर्मकांड प्रचलित थे। पुरोहित वर्ग ने अपने स्वार्थी हितों के कारण हिंदू धर्म को अधिक जटिल बना दिया था। अतः सामान्यजन इस धर्म के विरुद्ध हो गए थे। इन परिस्थितियों में भारत में कुछ नए धर्मों का जन्म हुआ। इनमें से बौद्ध धर्म सर्वाधिक प्रसिद्ध था। इस धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध थे। इस धर्म के उद्भव के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इन कारणों का संक्षेप वर्णन निम्न अनुसार है:—

  1. हिंदू धर्म में जटिलता (Complexity in the Hindu Religion)-ऋग्वैदिक काल में हिंदू धर्म बिल्कुल सादा था। परंतु कालांतर में यह धर्म अधिकाधिक जटिल होता चला गया। इसमें अंध-विश्वासों और कर्मकांडों का बोलबाला हो गया। यह धर्म केवल एक बाहरी दिखावा मात्र बनता जा रहा था। उपनिषदों तथा अन्य वैदिक ग्रंथों का दर्शन साधारण लोगों की समझ से बाहर था। लोग इस तरह के धर्म से तंग आ चुके थे। वे एक ऐसे धर्म की इच्छा करने लगे जो अंध-विश्वासों से रहित हो और उनको सादा जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दे सके। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ० सतीश के० कपूर के शब्दों में,
    “हिंदू समाज ने अपना प्राचीन गौरव खो दिया था और यह अनगिनत कर्मकांडों तथा अंधविश्वासों से ग्रस्त था।”1
  2. खर्चीला धर्म (Expensive Religion)-आरंभ में हिंदू धर्म अपनी सादगी के कारण लोगों में अत्यंत प्रिय था। उत्तर वैदिक काल के पश्चात् इसकी स्थिति में परिवर्तन आना शुरू हो गया। यह अधिकाधिक जटिल होता चला गया। इसका कारण यह था कि अब हिंदू धर्म में यज्ञों और बलियों पर अधिक जोर दिया जाने लगा था। ये यज्ञ कईकई वर्षों तक चलते रहते थे। इन यज्ञों पर भारी खर्च आता था। ब्राह्मणों को भी भारी दान देना पड़ता थ। इन यज्ञों के अतिरिक्त अनेक ऐसे रीति-रिवाज प्रचलित थे, जिनमें ब्राह्मणों की उपस्थिति आवश्यक होती थी। इन अवसरों पर भी लोगों को काफी धन खर्च करना पड़ता था। इस तरह के खर्च लोगों की पहुँच से बाहर थे। परिणामस्वरूप वे इस धर्म के विरुद्ध हो गए।
  3. ब्राह्मणों का नैतिक पतन (Moral Degeneration of the Brahmanas)-वैदिक काल में ब्राह्मणों का जीवन बहुत पवित्र और आदर्शपूर्ण था। समय के साथ-साथ उनका नैतिक पतन होना शुरू हो गया। वे भ्रष्टाचारी, लालची तथा धोखेबाज़ बन गए थे। वे अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए साधारण लोगों को किसी न किसी बहाने मूर्ख बना कर उनसे अधिक धन बटोरने में लगे रहते थे। इसके अतिरिक्त अब उन्होंने भोग-विलासी जीवन व्यतीत करना आरंभ कर दिया था। इन्हीं कारणों से लोग समाज में ब्राह्मणों के प्रभाव से मुक्त होना चाहते थे।
  4. जाति-प्रथा (Caste System)-छठी शताब्दी ई० पू० तक भारतीय समाज में जाति-प्रथा ने कठोर रूप धारण कर लिया था। ऊँची जातियों के लोग जिन्हें द्विज भी कहा जाता था, शूद्रों के साथ जानवरों से भी अधिक क्रूर व्यवहार करते थे। वे उनकी परछाईं मात्र पड़ जाने से स्वयं को अपवित्र समझने लगते थे। शूद्रों को मंदिरों में जाने, वैदिक साहित्य पढ़ने, यज्ञ करने, कुओं से पानी भरने आदि की आज्ञा नहीं थी। ऐसी परिस्थिति से तंग आकर शूद्र किसी अन्य धर्म के पक्ष में हिंदू धर्म छोड़ने के लिए तैयार हो गए।
  5. कठिन भाषा (Difficult Language)-संस्कृत भाषा के कारण भी इस युग के लोगों में बेचैनी बढ़ गई थी। इस भाषा को बहुत पवित्र माना जाता था, परंतु कठिन होने के कारण यह साधारण लोगों की समझ से बाहर थी। उस समय लिखे गए सभी धार्मिक ग्रंथ जैसे-वेद, उपनिषद्, ब्राह्मण-ग्रंथ, रामायण, महाभारत आदि संस्कृत भाषा में रचित थे। साधारण लोग इन धर्मशास्त्रों को पढ़ने में असमर्थ थे। ब्राह्मणों ने इस स्थिति का लाभ उठा कर धर्मशास्त्रों की मनमानी व्याख्या करनी शुरू कर दी। अतः धर्म का वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने के लिए लोग एक ऐसे धर्म की इच्छा करने लगे जिसके सिद्धांत जन-साधारण की भाषा में हों।
  6. जादू-टोनों में विश्वास (Belief in Charms and Spells)-छठी शताब्दी ई० पू० में लोग बहुत अंधविश्वासी हो गए थे। वे भूत-प्रेतों तथा जादू-टोनों में अधिक विश्वास करने लगे थे। उनका विचार था कि जादूटोनों की सहायता से शत्रुओं पर विजय प्राप्त की जा सकती है, रोगों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है और संतान की प्राप्ति की जा सकती है। जागरूक व्यक्ति समाज को ऐसे अंधविश्वासों से मुक्ति दिलाने के लिए किसी नए धर्म की राह देखने लगे।
  7. महापुरुषों का जन्म (Birth of Great Personalities)-छठी शताब्दी ई० पू० में अनेक महापुरुषों का जन्म हुआ। उन्होंने अंधकार में भटकं रही मानवता को एक नया मार्ग दिखाया। इनमें महावीर तथा महात्मा बुद्ध के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। इनकी सरल शिक्षाओं से प्रभावित होकर बहु-संख्या में लोग उनके अनुयायी बन गए थे। इन्होंने बाद में जैन धर्म और बौद्ध धर्म का रूप धारण कर लिया। जैन धर्म तथा बौद्ध धर्म का उल्लेख करते हुए बी० पी० शाह
    और के० एस० बहेरा लिखते हैं,
    “वास्तव में जैन धर्म तथा बौद्ध धर्म के उदय ने लोगों में एक नया उत्साह भर दिया और उनके सामाजिक तथा धार्मिक जीवन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किया।”2

1. “ The Hindu society had lost its splendour and was plagued with multifarious rituals and superstitions.” Dr. Satish K. Kapoor, The Legacy of Buddha (Chandigarh: The Tribune : April 4, 1977) p. 5.
2. “In fact, birth of Jainism and Buddhism gave a new impetus to the people and significantly moulded social and religious life.” B.P. Saha and K.S. Behera, Ancient History of India (New Delhi : 1988) p. 107.

प्रश्न 2. बौद्ध धर्म के संस्थापक के जीवन के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the life of founder of Buddhism ?)
अथवा
महात्मा बुद्ध के जीवन का वर्णन करें।
(Describe the life of Lord Buddha.)
अथवा
महात्मा बुद्ध के जीवन तथा बौद्ध धर्म के प्रारंभ के बारे प्रकाश डालें।
(Throw light on the life of Mahatma Buddha and the origin of Buddhism.)
उत्तर-
Class 12 Religion Solutions Chapter 2 अशोक के समय तक बौद्ध धर्म 1
LORD BUDDHA

  1. जन्म तथा माता-पिता (Birth and Parents)-महात्मा बुद्ध का जन्म न केवल भारत अपितु समस्त संसार के लिए एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना थी। उनकी जन्म तिथि के संबंध में इतिहासकारों में काफी मतभेद प्रचलित रहे। अधिकाँश इतिहासकार 566 ई०पू० को महात्मा बुद्ध की जन्म तिथि स्वीकार करते हैं। महात्मा बुद्ध के पिता का नाम शुद्धोदन था। शुद्धोदन क्षत्रिय वंश से संबंधित था तथा वह नेपाल की तराई में स्थित एक छोटे से गणराज्य का शासक था। इस गणराज्य की राजधानी का नाम कपिलवस्तु था। शुद्धोदन की दो रानियाँ थीं। इनके नाम महामाया अथवा महादेवी एवं प्रजापति गौतमी थे। ये दोनों बहनें थीं तथा कोलिय गणराज्य की राजकुमारियाँ थीं। महात्मा बुद्ध की माता जी का नाम महामाया था।
    महात्मा बुद्ध का प्रारंभिक नाम सिद्धार्थ था। इस समय राज्य ज्योतिषी आसित ने यह भविष्यवाणी की थी कि यह बालक या तो संसार का एक महान् सम्राट् बनेगा या एक महान् धार्मिक नेता। दुर्भाग्यवश सिद्धार्थ के जन्म के सात दिन बाद उसकी माता की मृत्यु हो गई। इसलिए सिद्धार्थ का पालन-पोषण महामाया की छोटी बहन प्रजापति गौतमी ने किया। इस कारण सिद्धार्थ को गौतम भी कहा जाने लगा।
  2. बाल्यकाल तथा विवाह (Childhood and Marriage)-सिद्धार्थ का पालन-पोषण बहुत लाड-प्यार से हुआ था। उन्हें विभिन्न प्रकार की शिक्षा देने के उचित प्रबंध किए गए। बाल्यावस्था में ही सिद्धार्थ चिंतनशील एवं कोमल स्वभाव के थे। वह बहुधा एकांत में रहना पसंद करते थे। यह देखकर उनके पिता को चिंता हुई। वह सिद्धार्थ का ध्यान आध्यात्मिक विचारों से हटाना चाहते थे ताकि उसका पुत्र एक महान् सम्राट बने। इस उद्देश्य से सिद्धार्थ के भोग-विलास के लिए राजमहल में यथासंभव प्रबंध किए गए। किंतु इन सब राजसी सुखों का सिद्धार्थ के मन पर कोई प्रभाव न पड़ा। जब सिद्धार्थ की आयु 16 वर्ष की हुई तो उनका विवाह एक अति सुंदर राजकुमारी यशोधरा से कर दिया गया। कुछ समय के पश्चात् उनके घर एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम राहुल (बंधन) रखा गया। गृहस्थ जीवन भी सिद्धार्थ को सांसारिक कार्यों की ओर आकर्षित नहीं कर सका।
  3. चार महान् दृश्य तथा महान् त्याग (Four Major Sights and Great Renunciation)-यद्यपि सिद्धार्थ को अति सुंदर महलों में रखा गया था किंतु उनका मन बाहरी संसार को देखने के लिए व्याकुल था। एक दिन वे अपने सारथी चन्न को लेकर राजमहल से बाहर निकले। रास्ते में उन्होंने एक वृद्ध, एक रोगी, एक अर्थी तथा एक साधु को देखा। मानव जीवन के इन विभिन्न दृश्यों को देखकर सिद्धार्थ का मन विचलित हो उठा। उन्होंने यह जान लिया कि संसार दुःखों का घर है। अत: सिद्धार्थ ने गृह-त्याग का निश्चय किया तथा एक रात अपनी पत्नी तथा पुत्र को सोते हुए छोड़ कर सत्य की खोज में निकल पड़े। इस घटना को महान् स्याग कहा जाता है। उस समय सिद्धार्थ की आयु 29 वर्ष थी।
  4. ज्ञान की प्राप्ति (Enlightenment)-गृह त्याग करने के पश्चात् सिद्धार्थ ने सच्चे ज्ञान की खोज आरंभ कर दी। इस उद्देश्य से वह सर्वप्रथम मगध की राजधानी राजगृह पहुंचे। यहाँ उन्होंने अरधकलाम तथा उद्रक रामपुत्र नामक दो प्रसिद्ध विद्वानों से ज्ञान के संबंध में शिक्षा प्राप्त की किंतु उनके मन को संतुष्टि न.हुई। अत: सिद्धार्थ ने राजगृह छोड़ दिया। वह अनेक वनों तथा दुर्गम पहाड़ियों को लांघ अंत गया के समीप उरुवेला वन में पहुँचे। यहाँ सिद्धार्थ की मुलाकात पाँच ब्राह्मण साधुओं से हुई। इन ब्राह्मणों के कहने पर सिद्धार्थ ने कठोर तपस्या आरंभ कर दी। छ: वर्षों की तपस्या के परिणामस्वरूप उनका शरीर सूख कर कांटा हो गया। यहाँ तक कि उनमें दो-चार पग चलने की भी शक्ति न रही। इसके बावजूद उन्हें वांछित ज्ञान नहीं मिल सका । वह इस परिणाम पर पहुँचे कि शरीर को अत्यधिक कष्ट देना निरर्थक है। अतः उन्होंने भोजन ग्रहण किया। इसके पश्चात् सिद्धार्थ ने एक वट वृक्ष के नीचे समाधि लगा ली तथा यह प्रण किया कि जब तक उन्हें ज्ञान प्राप्त नहीं होगा वह वहाँ से नहीं उठेंगे। आठवें दिन वैशाख की पूर्णिमा को सिद्धार्थ को सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हुई। अतः सिद्धार्थ को बुद्ध (जागृत) तथा तथागत (जिसने सत्य को पा लिया हो) भी कहा जाने लगा। जिस वृक्ष के नीचे महात्मा बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था उसे महाबौद्धि वृक्ष तथा गया को बौद्ध गया कहा जाने लगा। ज्ञान प्राप्ति के समय महात्मा बुद्ध की आयु 35 वर्ष थी।
  5. धर्म प्रचार (Religious Preachings)-ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् महात्मा बुद्ध ने पीड़ित मानवता के उद्धार के लिए अपने ज्ञान का प्रचार करने का संकल्प लिया। वह सर्वप्रथम बनारस के निकट सारनाथ पहुँचे । यहाँ महात्मा बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश अपने उन पाँच साथियों को दिया जो गया में उनका साथ छोड़ गए थे। ये सभी बुद्ध के अनुयायी बन गए। इस घटना को धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है। शीघ्र ही महात्मा बुद्ध का यश चारों ओर फैलने लगा तथा उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ने लगी। अत: महात्मा बुद्ध ने अपने धर्म का संगठित ढंग से प्रचार करने के उद्देश्य से मगध में बौद्ध संघ की स्थापना की । महात्मा बुद्ध ने 45 वर्षों तक विभिन्न स्थानों पर जाकर अपने उपदेशों का प्रचार किया। उनके सरल उपदेशों का लोगों के मनों पर गहरा प्रभाव पड़ा तथा वे बुद्ध के अनुयायी बनते चले गए। महात्मा बुद्ध के प्रसिद्ध अनुयायियों में मगध के शासक बिंबिसार तथा उसका पुत्र अजातशत्रु, कोशल का शासक प्रसेनजित, उसकी रानी मल्लिका तथा वहाँ का प्रसिद्ध सेठ अनाथपिंडिक, मल्ल गणराज्य का शासक भद्रिक तथा वहाँ का प्रसिद्ध ब्राह्मण आनंद, कौशांबी का शासक उदयन, वैशाली की प्रसिद्ध वेश्या आम्रपाली तथा कपिलवस्तु के शासक शुद्धोदन (बुद्ध के पिता), उसकी रानी प्रजापती गौतमी, महात्मा बुद्ध की पत्नी यशोधरा तथा उनके पुत्र राहुल के नाम उल्लेखनीय हैं। महात्मा बुद्ध ने अपने परम शिष्य आनंद के आग्रह पर स्त्रियों को भी बौद्ध संघ में सम्मिलित होने की आज्ञा दे दी।
  6. महापरिनिर्वाण ( Mahaparnirvana)-महात्मा बुद्ध ने अपने उपदेशों द्वारा भटकी हुई मानवता को ज्ञान का मार्ग दिखाया। अपने जीवन के अंतिम काल में जब वह पावा पहुंचे तो उन्होंने वहां एक स्वर्णकार के घर भोजन किया। इसके पश्चात् उन्हें पेचिश हो गया। यहां से महात्मा बुद्ध कुशीनगर (मल्ल गणराज्य की राजधानी) पहुँचे। यहाँ 80 वर्ष की आयु में 486 ई० पू० में वैशाख की पूर्णिमा को अपना शरीर त्याग दिया। इस घटना को बौद्ध धर्म में महापरिनिर्वाण कहा जाता है।

प्रश्न 3. महात्मा बुद्ध की प्रमुख शिक्षाओं के बारे में संक्षिप्त चर्चा कीजिए।
(Discuss in brief the basic teachings of Lord Buddha.)
अथवा
बौद्ध धर्म की नैतिक शिक्षाओं के बारे चर्चा करें।
(Discuss the Ethical teachings of Buddhism.)“
अथवा
बौद्ध मत की मूल शिक्षाएँ बताएँ।
(Explain the basic teachings of Buddhism.)
अथवा
बौद्ध धर्म की प्रमुख शिक्षाएँ क्या हैं ?
(What are the main teachings of Buddhism ?)
अथवा
महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the teachings of Lord Buddha.)
उत्तर-महात्मा बुद्ध की शिक्षाएँ बिल्कुल सरल तथा स्पष्ट थीं। उन्होंने लोगों को सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दी। उन्होंने लोगों को यह बताया कि संसार दुःखों का घर है तथा केवल अष्ट मार्ग पर चल कर ही कोई व्यक्ति निर्वाण प्राप्त कर सकता है। उन्होंने समाज में प्रचलित अंध-विश्वासों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने आपसी भ्रातृत्व का प्रचार किया। महात्मा बुद्ध ने अपनी शिक्षाओं का प्रचार लोगों की प्रचलित भाषा पाली में किया। उन्होंने किसी जटिल दर्शन का प्रचार नहीं किया। यही कारण था कि उनकी शिक्षाओं ने लोगों के मनों पर जादुई प्रभाव डाला तथा वे बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म में सम्मिलित हुए।

1. चार महान् सत्य (Four Noble Truths)-महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का सार चार महान् सत्य थे। इन्हें आर्य सत्य भी कहा जाता है क्योंकि यह सच्चाई पर आधारित हैं। ये चार महान् सत्य अग्र हैं—

  • संसार दुःखों से भरा हुआ है (World is full of Sufferings)-महात्मा बुद्ध के अनुसार प्रथम सत्य यह है कि संसार दुःखों से भरा हुआ है। जन्म से लेकर मृत्यु तक मानव के जीवन में दुःख हैं। जन्म, बीमारी, वृद्धावस्था, अमीरी, गरीबी, अधिक संतान, नि:संतान तथा मृत्यु आदि सभी दुःख का कारण हैं।
  • दुःखों का कारण है (There is a cause of Sufferings)-महात्मा बुद्ध का दूसरा सत्य यह है कि दुःखों का कारण है। यह कारण मनुष्य की इच्छाएँ हैं। इन इच्छाओं के कारण मनुष्य आवागमन के चक्कर में भटकता रहता है।
  • दुःखों का अंत किया जा सकता है (Sufferings can be Stopped)- महात्मा बुद्ध का तीसरा सत्य है कि दुःखों का अंत किया जा सकता है। यह अंत इच्छाओं का त्याग करने से हो सकता है।
  • दुःखों का अंत करने का एक मार्ग है (There is a way to stop Sufferings)-महात्मा बुद्ध का चतुर्थ सत्य यह है कि दुःखों का अंत करने का केवल एक मार्ग है। इस मार्ग को अष्ट मार्ग अथवा मध्य मार्ग कहा जाता है। इस मार्ग पर चल कर मनुष्य निर्वाण प्राप्त कर सकता है। प्रसिद्ध विद्वान् जे० पी० सुधा के शब्दों में,

” महात्मा बुद्ध द्वारा प्रचलित चार महान् सत्य उसकी शिक्षाओं का सार हैं। ये मानव जीवन तथा उससे संबंधित समस्याओं के बारे में उसके (बुद्ध) गहन् तथा दृढ़ विश्वास को बताते हैं।”3

3. “ The Four Noble Truths expounded by the Master constitute the core of his teachings. They contain his deepest and most considered convictions about human life and its problems.” J. P. Suda, Religions in India (New Delhi : 1978)p. 82.

2. अष्ट मार्ग (Eightfold Path)- महात्मा बुद्ध ने लोगों को अष्ट मार्ग पर चलने का उपदेश दिया। अष्ट मार्ग को मध्य मार्ग भी कहा जाता है क्योंकि यह कठोर तप तथा ऐश्वर्य के मध्य का मार्ग था। अष्ट मार्ग के सिद्धांत निम्नलिखित थे—

  • सत्य कर्म (Right Action)–मनुष्य के कर्म शुद्ध होने चाहिएँ। उसे चोरी, ऐश्वर्य तथा जीव हत्या से दूर रहना चाहिए। उसे समस्त मानवता से प्रेम करना चाहिए।
  • सत्य विचार (Right Thought)-सभी मनुष्यों के विचार सत्य होने चाहिएँ। उन्हें सांसारिक बुराइयों तथा व्यर्थ के रीति-रिवाज़ों से दूर रहना चाहिए।
  • सत्य विश्वास (Right Belief)-मनुष्य को यह सच्चा विश्वास होना चाहिए कि इच्छाओं का त्याग करने से दुःखों का अंत हो सकता है। उन्हें अष्ट मार्ग से भटकना नहीं चाहिए।
  • सत्य रहन-सहन (Right Living)-सभी मनुष्यों का रहन-सहन सत्य होना चाहिए। उन्हें किसी से हेरा-फेरी नहीं करनी चाहिए।
  • सत्य वचन (Right Speech)-मनुष्य के वचन पवित्र तथा मृदु होने चाहिएँ। उसे किसी की निंदा अथवा चुगली नहीं करनी चाहिए तथा सदा सत्य बोलना चाहिए।
  • सत्य प्रयत्न (Right Efforts)- मनुष्य को बुरे कर्मों के दमन तथा दूसरों के कल्याण हेतु सत्य प्रयत्न करने चाहिएँ।
  • सत्य ध्यान (Right Recollection)-मनुष्य को अपना ध्यान पवित्र तथा सादा जीवन व्यतीत करने में लगाना चाहिए।
  • सत्य समाधि (Right Meditation)- मनुष्य को बुराइयों का ध्यान छोड़कर सत्य समाधि में लीन होना चाहिए। डॉ० एस० बी० शास्त्री के अनुसार,

“यह पवित्र अष्ट मार्ग बुद्ध शिक्षाओं का निष्कर्ष है जिससे मनुष्य जीवन के दुःखों से मुक्ति प्राप्त कर, सकता है।”4

4. “This noble eightfold path forms the keynote of the Buddha’s teachings for emancipating oneself from the ills of life.” Dr. S. B. Shastri, Buddhism (Patiala : 1969) pp. 55-56.

3. कर्म सिद्धांत में विश्वास (Belief in Karma Theory)-महात्मा बुद्ध कर्म सिद्धांत में विश्वास रखते थे। उनका विचार था कि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है। जैसे वह कार्य करता है. वैसा ही वह फल भोगता है। हमें पूर्व कर्मों का फल इस जन्म में मिला है तथा वर्तमान कर्मों का फल अगले जन्म में मिलेगा। जिस प्रकार मनुष्य की परछाईं सदैव उसके साथ रहती है ठीक उसी प्रकार कर्म मनुष्य का पीछा नहीं छोड़ते । महात्मा बुद्ध का कथन था, “व्यक्ति अपने दुष्कर्मों के परिणाम से न तो आकाश में, न समुद्र में तथा न ही किसी पर्वत की गुफा में बच सकता है।”
4. पुनर्जन्म में विश्वास (Belief in Rebirth)~महात्मा बुद्ध पुनर्जन्म में विश्वास रखते थे। उनका कथन था कि मनुष्य अपने कर्मों के कारण पुनः जन्म लेता रहता है। पुनर्जन्म का यह प्रवाह तब तक निरंतर चलता रहता है जब तक मनुष्य की तृष्णा तथा वासना समाप्त नहीं हो जाती। जिस प्रकार तेल तथा बत्ती के जल जाने से दीपक अपने आप शांत हो जाता है उसी प्रकार वासना के अंत से मनुष्य कर्म बंधनों से मुक्त हो जाता है तथा उसे परम शांति प्राप्त हो जाती है।
5. अहिंसा (Ahimsa)-महात्मा बुद्ध अहिंसा में विश्वास रखते थे। उनका विचार था कि मनुष्य को सभी जीवों अर्थात् मनुष्यों, पशु-पक्षियों तथा जीव-जंतुओं से प्रेम तथा सहानुभूति रखनी चाहिए। वह जीव हत्या तो दूर, उन्हें सताना भी पाप समझते थे। इसलिए उन्होंने जीव हत्या करने वालों के विरुद्ध प्रचार किया।
6. तीन लक्षण (Three Marks)- महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं में एक तीन लक्षणों वाला सिद्धांत भी सम्मिलित है, ये तीन लक्षण हैं—

  • सभी प्रतिबंधित वस्तुएँ स्थाई नहीं (अनित) हैं ।
  • सभी प्रतिबंधित वस्तुएँ दुःख ग्रस्त हैं।
  • सभी प्रतिबंधित वस्तुएँ आत्मन नहीं अनात्म हैं।

यह हमारे राजाना जीवन में आने वाले अनुभव हैं। महात्मा बुद्ध के अनुसार उत्पन्न हुई प्रत्येक वस्तु का अंत निश्चित है। भाव वह अग्नि ( अस्थिर) है। जो अस्थिर है वह दुःखी भी है। मनुष्य का जन्म, बीमारी तथा मृत्यु आदि सभी दुःख के कारण हैं । मनुष्य के जीवन में कुछ खुशी के पल ज़रूर आते हैं किंतु इनका समय बहुत अल्प होता है। अनात्म से भाव है स्वयं का न होगा। सभी कुछ जो अस्थिर है वह मेरा नहीं है।

7. पंचशील (Panchsheel)- महात्मा बुद्ध ने प्रत्येक गृहस्थी को पाँच सिद्धांतों का पालन करना आवश्यक बताया है। पंचशील को शिक्षापद के नाम से भी जाना जाता है। यह पाँच नियम ये हैं:—

  • छोटे से छोटे जीव की भी हत्या न करो
  • मुक्त हृदय से दान दो एवं लो, किंतु लालच तथा धोखे से किसी की वस्तु न लो।
  • झूठी गवाही न दो, किसी की निंदा न करो तथा न ही झूठ बोलो।
  • नशीली वस्तुओं से बचें क्योंकि यह आपकी अक्ल पर पर्दा डालती हैं।
  • किसी के लिए भी बुरे विचार दिल में न लाएं शरीर को अयोग्य पापों से बचाएँ।

बौद्ध धर्म में प्रवेश करने वाले भिक्षुओं एक भिक्षुणिओं को पाँच अन्य नियमों का पालन करने का आदेश दिया गया है। ये पाँच नियम हैं।—

  • समय पर भोजन खाएं
  • नाच-गानों आदि से दूर रहें
  • नर्म बिस्तरों पर न सोएँ
  • हार–शृंगार तथा सुगंधित वस्तुओं का प्रयोग न करें।
  • सोने एवं चाँदी के चक्करों में न पड़ें।

8. चार असीम सद्गुण (Four Unlimited Virtues)-महात्मा बुद्ध ने चार सामाजिक सद्गुणों पर विशेष बल दिया। ये गुण हैं-मित्र भावना, दया, हमदर्दी भरी प्रसन्नता एवं निरपेक्षता। ये हमारे व्यवहार का अन्य मनुष्यों के साथ तालमेल करते हैं । मित्र भावना से भाव दूसरों की सहायता करना है । यह आपसी ईर्ष्या का अंत करती है। मनुष्य को अपने दुश्मनों के साथ भी प्यार करना चाहिए। दया हमें अन्य के दु:ख के समय साथ देने की प्रेरणा देती है। हमदर्दी भरी प्रसन्नता एक ऐसा गुण है जो मनुष्य को अन्य की प्रसन्नता में सम्मिलित होने के योग्य बनाती है। जिस व्यक्ति में यह गुण होता है वह किसी अन्य की प्रसन्नता से इर्ष्या नहीं करता। निरपेक्षता की भावना रखने वाला व्यक्ति लालच एवं अन्य कुविचारों से दूर रहता है। वह सभी मनुष्यों को समान समझता है। वास्तव में यह चार असीम सद्गुण बौद्ध धर्म के नैतिक नियमों की नींव हैं।
9. परस्पर भ्रातृ-भाव (Universal Brotherhood)-महात्मा बुद्ध ने लोगों को परस्पर भातृ-भाव का उपदेश दिया। वह चाहते थे कि लोग परस्पर झगड़ों को छोड़कर प्रेमपूर्वक रहें। उनका विचार था कि संसार में घृणा का अंत प्रेम से किया जा सकता है। महात्मा बुद्ध ने अपने धर्म में प्रत्येक वर्ण तथा जाति के लोगों को सम्मिलित करके समाज में प्रचलित ऊँच-नीच की भावना को पर्याप्त सीमा तक दूर किया। महात्मा बुद्ध ने दु:खी तथा रोगी व्यक्तियों की अपने हाथों सेवा करके लोगों के सामने एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत की।
10. यज्ञों तथा बलियों में अविश्वास (Disbelief in Yajnas and Sacrifices)- उस समय हिंदू धर्म में अनेक अंधविश्वास प्रचलित थे। वे मुक्ति प्राप्त करने के लिए यज्ञों तथा बलियों पर बहुत बल देते थे। महात्मा बुद्ध ने इन अंधविश्वासों को ढोंग मात्र बताया। उसका कथन था कि यज्ञों के साथ किसी व्यक्ति के कर्मों को नहीं बदला जा सकता तथा बलियाँ देने से मनुष्य अपने पापों में अधिक वृद्धि कर लेता है। अतः इनसे किसी देवी-देवता को प्रसन्न नहीं किया जा सकता।
11. वेदों तथा संस्कृत में अविश्वास (Disbelief in Vedas and Sanskrit)-महात्मा बुद्ध ने वेदों की पवित्रता को स्वीकार न किया। उन्होंने इस बात का भी खंडन किया कि धर्म ग्रंथों को केवल संस्कृत भाषा में पढ़ने से ही फल की प्राप्ति होती है। उन्होंने अपना प्रचार जन-भाषा पाली में किया।
12. जाति प्रथा में अविश्वास (Disbelief in Caste System)-महात्मा बुद्ध ने हिंदू समाज में व्याप्त जाति प्रथा का कड़े शब्दों में विरोध किया। उनके अनुसार मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार छोटा अथवा बड़ा हो सकता है न कि जन्म से। अत: महात्मा बुद्ध ने अपने धर्म में प्रत्येक जाति के लोगों को सम्मिलित किया। उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, “सभी देशों में जाओ और धर्म के संदेश प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचाओ और कहो कि इस धर्म में छोटे-बड़े और धनवान् तथा निर्धन का कोई प्रश्न नहीं। बौद्ध धर्म सभी जातियों के लिए खुला है। सभी जातियों के लोग इसमें इसी प्रकार मिल सकते हैं जिस प्रकार नदियाँ समुद्र में आकर मिल जाती हैं।”
13. तपस्या में अविश्वास (Disbelief in Penance)-महात्मा बुद्ध का कठोर तपस्या में विश्वास नहीं था। उनके अनुसार व्यर्थ ही भूखा-प्यासा रह कर शरीर को कष्ट देने से कोई लाभ नहीं। उन्होंने स्वयं भी 6 वर्ष तक तपस्या का जीवन व्यतीत किया था परंतु कुछ प्राप्ति न हुई। वह समझते थे कि गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए अष्ट मार्ग पर चल कर निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है।
14. ईश्वर में अविश्वास (Disbelief in God)-महात्मा बुद्ध का ईश्वर के अस्तित्व तथा उसकी सत्ता में विश्वास नहीं था। उनका कथन था कि इस संसार की रचना ईश्वर जैसी किसी शक्ति के द्वारा नहीं की गई है। परंतु वह यह अवश्य मानते थे कि संसार के संचालन में कोई शक्ति अवश्य काम करती है। इस शक्ति को उन्होंने धर्म का नाम दिया। वास्तव में महात्मा बुद्ध ईश्वर संबंधी किसी वाद-विवाद में नहीं पड़ना चाहते थे। उनका मानना था कि जिन विषयों के समाधान के लिए पर्याप्त प्रमाण न हों उनके समाधान की चेष्टा करना व्यर्थ है।
15. निर्वाण (Nirvana) महात्मा बुद्ध के अनुसार मनुष्य के जीवन का परम लक्ष्य निर्वाण प्राप्त करना है। निर्वाण के कारण मनुष्य को सुख, आनंद तथा शाँति की प्राप्ति हो जाती है। उसे आवागमन के चक्कर से सदैव मुक्ति मिल जाती है। यह सभी दुःखों का अंत है। वास्तव में निर्वाण वह अवस्था है जिसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। जो इस सच्चाई का अनुभव करते हैं वे इस संबंध में बात नहीं करते हैं तथा जो इस संबंध में बातें करते हैं उन्हें इस बारे में जानकारी नहीं होती। महात्मा बुद्ध के अनुसार अष्ट मार्ग पर चल कर कोई भी व्यक्ति निर्वाण प्राप्त कर सकता है। अन्य धर्मों में जहाँ निर्वाण मृत्यु के उपरांत प्राप्त होता है वहाँ बौद्ध धर्म में निर्वाण की प्राप्ति इसी जीवन में संभव है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं ने अंधकार में भटक रही मानवता के लिए एक प्रकाश स्तंभ का कार्य किया। अंत में हम डॉ० बी० जिनानंदा के इन शब्दों से सहमत हैं,
“वास्तव में महात्मा बुद्ध की शिक्षाएं एक ओर प्रेम और दूसरी ओर तर्क पर आधारित थीं।”5

5. “In fact, the Buddha’s teachings were based on love on the one hand and on logic on the other.” Dr. B. Jinananda, Buddhism (Patiala : 1969) p. 86.

प्रश्न 4. महात्मा बुद्ध के जीवन तथा शिक्षाओं का वर्णन करें।
(Describe the life and teachings of Mahatma Buddha.)
अथवा
महात्मा बुद्ध के जीवन और शिक्षाओं की चर्चा करें।
(Discuss the life and teachings of Mahatma Buddha.)
उत्तर-

  1. जन्म तथा माता-पिता (Birth and Parents)-महात्मा बुद्ध का जन्म न केवल भारत अपितु समस्त संसार के लिए एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना थी। उनकी जन्म तिथि के संबंध में इतिहासकारों में काफी मतभेद प्रचलित रहे। अधिकाँश इतिहासकार 566 ई०पू० को महात्मा बुद्ध की जन्म तिथि स्वीकार करते हैं। महात्मा बुद्ध के पिता का नाम शुद्धोदन था। शुद्धोदन क्षत्रिय वंश से संबंधित था तथा वह नेपाल की तराई में स्थित एक छोटे से गणराज्य का शासक था। इस गणराज्य की राजधानी का नाम कपिलवस्तु था। शुद्धोदन की दो रानियाँ थीं। इनके नाम महामाया अथवा महादेवी एवं प्रजापति गौतमी थे। ये दोनों बहनें थीं तथा कोलिय गणराज्य की राजकुमारियाँ थीं। महात्मा बुद्ध की माता जी का नाम महामाया था।
    महात्मा बुद्ध का प्रारंभिक नाम सिद्धार्थ था। इस समय राज्य ज्योतिषी आसित ने यह भविष्यवाणी की थी कि यह बालक या तो संसार का एक महान् सम्राट् बनेगा या एक महान् धार्मिक नेता। दुर्भाग्यवश सिद्धार्थ के जन्म के सात दिन बाद उसकी माता की मृत्यु हो गई। इसलिए सिद्धार्थ का पालन-पोषण महामाया की छोटी बहन प्रजापति गौतमी ने किया। इस कारण सिद्धार्थ को गौतम भी कहा जाने लगा।
  2. बाल्यकाल तथा विवाह (Childhood and Marriage)-सिद्धार्थ का पालन-पोषण बहुत लाड-प्यार से हुआ था। उन्हें विभिन्न प्रकार की शिक्षा देने के उचित प्रबंध किए गए। बाल्यावस्था में ही सिद्धार्थ चिंतनशील एवं कोमल स्वभाव के थे। वह बहुधा एकांत में रहना पसंद करते थे। यह देखकर उनके पिता को चिंता हुई। वह सिद्धार्थ का ध्यान आध्यात्मिक विचारों से हटाना चाहते थे ताकि उसका पुत्र एक महान् सम्राट बने। इस उद्देश्य से सिद्धार्थ के भोग-विलास के लिए राजमहल में यथासंभव प्रबंध किए गए। किंतु इन सब राजसी सुखों का सिद्धार्थ के मन पर कोई प्रभाव न पड़ा। जब सिद्धार्थ की आयु 16 वर्ष की हुई तो उनका विवाह एक अति सुंदर राजकुमारी यशोधरा से कर दिया गया। कुछ समय के पश्चात् उनके घर एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम राहुल (बंधन) रखा गया। गृहस्थ जीवन भी सिद्धार्थ को सांसारिक कार्यों की ओर आकर्षित नहीं कर सका।
  3. चार महान् दृश्य तथा महान् त्याग (Four Major Sights and Great Renunciation)-यद्यपि सिद्धार्थ को अति सुंदर महलों में रखा गया था किंतु उनका मन बाहरी संसार को देखने के लिए व्याकुल था। एक दिन वे अपने सारथी चन्न को लेकर राजमहल से बाहर निकले। रास्ते में उन्होंने एक वृद्ध, एक रोगी, एक अर्थी तथा एक साधु को देखा। मानव जीवन के इन विभिन्न दृश्यों को देखकर सिद्धार्थ का मन विचलित हो उठा। उन्होंने यह जान लिया कि संसार दुःखों का घर है। अत: सिद्धार्थ ने गृह-त्याग का निश्चय किया तथा एक रात अपनी पत्नी तथा पुत्र को सोते हुए छोड़ कर सत्य की खोज में निकल पड़े। इस घटना को महान् स्याग कहा जाता है। उस समय सिद्धार्थ की आयु 29 वर्ष थी।
  4. ज्ञान की प्राप्ति (Enlightenment)-गृह त्याग करने के पश्चात् सिद्धार्थ ने सच्चे ज्ञान की खोज आरंभ कर दी। इस उद्देश्य से वह सर्वप्रथम मगध की राजधानी राजगृह पहुंचे। यहाँ उन्होंने अरधकलाम तथा उद्रक रामपुत्र नामक दो प्रसिद्ध विद्वानों से ज्ञान के संबंध में शिक्षा प्राप्त की किंतु उनके मन को संतुष्टि न.हुई। अत: सिद्धार्थ ने राजगृह छोड़ दिया। वह अनेक वनों तथा दुर्गम पहाड़ियों को लांघ अंत गया के समीप उरुवेला वन में पहुँचे। यहाँ सिद्धार्थ की मुलाकात पाँच ब्राह्मण साधुओं से हुई। इन ब्राह्मणों के कहने पर सिद्धार्थ ने कठोर तपस्या आरंभ कर दी। छ: वर्षों की तपस्या के परिणामस्वरूप उनका शरीर सूख कर कांटा हो गया। यहाँ तक कि उनमें दो-चार पग चलने की भी शक्ति न रही। इसके बावजूद उन्हें वांछित ज्ञान नहीं मिल सका । वह इस परिणाम पर पहुँचे कि शरीर को अत्यधिक कष्ट देना निरर्थक है। अतः उन्होंने भोजन ग्रहण किया। इसके पश्चात् सिद्धार्थ ने एक वट वृक्ष के नीचे समाधि लगा ली तथा यह प्रण किया कि जब तक उन्हें ज्ञान प्राप्त नहीं होगा वह वहाँ से नहीं उठेंगे। आठवें दिन वैशाख की पूर्णिमा को सिद्धार्थ को सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हुई। अतः सिद्धार्थ को बुद्ध (जागृत) तथा तथागत (जिसने सत्य को पा लिया हो) भी कहा जाने लगा। जिस वृक्ष के नीचे महात्मा बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था उसे महाबौद्धि वृक्ष तथा गया को बौद्ध गया कहा जाने लगा। ज्ञान प्राप्ति के समय महात्मा बुद्ध की आयु 35 वर्ष थी।
  5. धर्म प्रचार (Religious Preachings)-ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् महात्मा बुद्ध ने पीड़ित मानवता के उद्धार के लिए अपने ज्ञान का प्रचार करने का संकल्प लिया। वह सर्वप्रथम बनारस के निकट सारनाथ पहुँचे । यहाँ महात्मा बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश अपने उन पाँच साथियों को दिया जो गया में उनका साथ छोड़ गए थे। ये सभी बुद्ध के अनुयायी बन गए। इस घटना को धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है। शीघ्र ही महात्मा बुद्ध का यश चारों ओर फैलने लगा तथा उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ने लगी। अत: महात्मा बुद्ध ने अपने धर्म का संगठित ढंग से प्रचार करने के उद्देश्य से मगध में बौद्ध संघ की स्थापना की । महात्मा बुद्ध ने 45 वर्षों तक विभिन्न स्थानों पर जाकर अपने उपदेशों का प्रचार किया। उनके सरल उपदेशों का लोगों के मनों पर गहरा प्रभाव पड़ा तथा वे बुद्ध के अनुयायी बनते चले गए। महात्मा बुद्ध के प्रसिद्ध अनुयायियों में मगध के शासक बिंबिसार तथा उसका पुत्र अजातशत्रु, कोशल का शासक प्रसेनजित, उसकी रानी मल्लिका तथा वहाँ का प्रसिद्ध सेठ अनाथपिंडिक, मल्ल गणराज्य का शासक भद्रिक तथा वहाँ का प्रसिद्ध ब्राह्मण आनंद, कौशांबी का शासक उदयन, वैशाली की प्रसिद्ध वेश्या आम्रपाली तथा कपिलवस्तु के शासक शुद्धोदन (बुद्ध के पिता), उसकी रानी प्रजापती गौतमी, महात्मा बुद्ध की पत्नी यशोधरा तथा उनके पुत्र राहुल के नाम उल्लेखनीय हैं। महात्मा बुद्ध ने अपने परम शिष्य आनंद के आग्रह पर स्त्रियों को भी बौद्ध संघ में सम्मिलित होने की आज्ञा दे दी।
  6. महापरिनिर्वाण ( Mahaparnirvana)-महात्मा बुद्ध ने अपने उपदेशों द्वारा भटकी हुई मानवता को ज्ञान का मार्ग दिखाया। अपने जीवन के अंतिम काल में जब वह पावा पहुंचे तो उन्होंने वहां एक स्वर्णकार के घर भोजन किया। इसके पश्चात् उन्हें पेचिश हो गया। यहां से महात्मा बुद्ध कुशीनगर (मल्ल गणराज्य की राजधानी) पहुँचे। यहाँ 80 वर्ष की आयु में 486 ई० पू० में वैशाख की पूर्णिमा को अपना शरीर त्याग दिया। इस घटना को बौद्ध धर्म में महापरिनिर्वाण कहा जाता है।

महात्मा बुद्ध की शिक्षाएँ बिल्कुल सरल तथा स्पष्ट थीं। उन्होंने लोगों को सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दी। उन्होंने लोगों को यह बताया कि संसार दुःखों का घर है तथा केवल अष्ट मार्ग पर चल कर ही कोई व्यक्ति निर्वाण प्राप्त कर सकता है। उन्होंने समाज में प्रचलित अंध-विश्वासों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने आपसी भ्रातृत्व का प्रचार किया। महात्मा बुद्ध ने अपनी शिक्षाओं का प्रचार लोगों की प्रचलित भाषा पाली में किया। उन्होंने किसी जटिल दर्शन का प्रचार नहीं किया। यही कारण था कि उनकी शिक्षाओं ने लोगों के मनों पर जादुई प्रभाव डाला तथा वे बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म में सम्मिलित हुए।

1. चार महान् सत्य (Four Noble Truths)-महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का सार चार महान् सत्य थे। इन्हें आर्य सत्य भी कहा जाता है क्योंकि यह सच्चाई पर आधारित हैं। ये चार महान् सत्य अग्र हैं—

  1. संसार दुःखों से भरा हुआ है (World is full of Sufferings)-महात्मा बुद्ध के अनुसार प्रथम सत्य यह है कि संसार दुःखों से भरा हुआ है। जन्म से लेकर मृत्यु तक मानव के जीवन में दुःख हैं। जन्म, बीमारी, वृद्धावस्था, अमीरी, गरीबी, अधिक संतान, नि:संतान तथा मृत्यु आदि सभी दुःख का कारण हैं।
  2. दुःखों का कारण है (There is a cause of Sufferings)-महात्मा बुद्ध का दूसरा सत्य यह है कि दुःखों का कारण है। यह कारण मनुष्य की इच्छाएँ हैं। इन इच्छाओं के कारण मनुष्य आवागमन के चक्कर में भटकता रहता है।
  3. दुःखों का अंत किया जा सकता है (Sufferings can be Stopped)- महात्मा बुद्ध का तीसरा सत्य है कि दुःखों का अंत किया जा सकता है। यह अंत इच्छाओं का त्याग करने से हो सकता है।
  4. दुःखों का अंत करने का एक मार्ग है (There is a way to stop Sufferings)-महात्मा बुद्ध का चतुर्थ सत्य यह है कि दुःखों का अंत करने का केवल एक मार्ग है। इस मार्ग को अष्ट मार्ग अथवा मध्य मार्ग कहा जाता है। इस मार्ग पर चल कर मनुष्य निर्वाण प्राप्त कर सकता है। प्रसिद्ध विद्वान् जे० पी० सुधा के शब्दों में,

” महात्मा बुद्ध द्वारा प्रचलित चार महान् सत्य उसकी शिक्षाओं का सार हैं। ये मानव जीवन तथा उससे संबंधित समस्याओं के बारे में उसके (बुद्ध) गहन् तथा दृढ़ विश्वास को बताते हैं।”3

3. “ The Four Noble Truths expounded by the Master constitute the core of his teachings. They contain his deepest and most considered convictions about human life and its problems.” J. P. Suda, Religions in India (New Delhi : 1978)p. 82.

2. अष्ट मार्ग (Eightfold Path)- महात्मा बुद्ध ने लोगों को अष्ट मार्ग पर चलने का उपदेश दिया। अष्ट मार्ग को मध्य मार्ग भी कहा जाता है क्योंकि यह कठोर तप तथा ऐश्वर्य के मध्य का मार्ग था। अष्ट मार्ग के सिद्धांत निम्नलिखित थे—

  1. सत्य कर्म (Right Action)–मनुष्य के कर्म शुद्ध होने चाहिएँ। उसे चोरी, ऐश्वर्य तथा जीव हत्या से दूर रहना चाहिए। उसे समस्त मानवता से प्रेम करना चाहिए।
  2. सत्य विचार (Right Thought)-सभी मनुष्यों के विचार सत्य होने चाहिएँ। उन्हें सांसारिक बुराइयों तथा व्यर्थ के रीति-रिवाज़ों से दूर रहना चाहिए।
  3. सत्य विश्वास (Right Belief)-मनुष्य को यह सच्चा विश्वास होना चाहिए कि इच्छाओं का त्याग करने से दुःखों का अंत हो सकता है। उन्हें अष्ट मार्ग से भटकना नहीं चाहिए।
  4. सत्य रहन-सहन (Right Living)-सभी मनुष्यों का रहन-सहन सत्य होना चाहिए। उन्हें किसी से हेरा-फेरी नहीं करनी चाहिए।
  5. सत्य वचन (Right Speech)-मनुष्य के वचन पवित्र तथा मृदु होने चाहिएँ। उसे किसी की निंदा अथवा चुगली नहीं करनी चाहिए तथा सदा सत्य बोलना चाहिए।
  6. सत्य प्रयत्न (Right Efforts)- मनुष्य को बुरे कर्मों के दमन तथा दूसरों के कल्याण हेतु सत्य प्रयत्न करने चाहिएँ।
  7. सत्य ध्यान (Right Recollection)-मनुष्य को अपना ध्यान पवित्र तथा सादा जीवन व्यतीत करने में लगाना चाहिए।
  8. सत्य समाधि (Right Meditation)- मनुष्य को बुराइयों का ध्यान छोड़कर सत्य समाधि में लीन होना चाहिए। डॉ० एस० बी० शास्त्री के अनुसार,

“यह पवित्र अष्ट मार्ग बुद्ध शिक्षाओं का निष्कर्ष है जिससे मनुष्य जीवन के दुःखों से मुक्ति प्राप्त कर, सकता है।”4

4. “This noble eightfold path forms the keynote of the Buddha’s teachings for emancipating oneself from the ills of life.” Dr. S. B. Shastri, Buddhism (Patiala : 1969) pp. 55-56.

3. कर्म सिद्धांत में विश्वास (Belief in Karma Theory)-महात्मा बुद्ध कर्म सिद्धांत में विश्वास रखते थे। उनका विचार था कि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है। जैसे वह कार्य करता है. वैसा ही वह फल भोगता है। हमें पूर्व कर्मों का फल इस जन्म में मिला है तथा वर्तमान कर्मों का फल अगले जन्म में मिलेगा। जिस प्रकार मनुष्य की परछाईं सदैव उसके साथ रहती है ठीक उसी प्रकार कर्म मनुष्य का पीछा नहीं छोड़ते । महात्मा बुद्ध का कथन था, “व्यक्ति अपने दुष्कर्मों के परिणाम से न तो आकाश में, न समुद्र में तथा न ही किसी पर्वत की गुफा में बच सकता है।”
4. पुनर्जन्म में विश्वास (Belief in Rebirth)~महात्मा बुद्ध पुनर्जन्म में विश्वास रखते थे। उनका कथन था कि मनुष्य अपने कर्मों के कारण पुनः जन्म लेता रहता है। पुनर्जन्म का यह प्रवाह तब तक निरंतर चलता रहता है जब तक मनुष्य की तृष्णा तथा वासना समाप्त नहीं हो जाती। जिस प्रकार तेल तथा बत्ती के जल जाने से दीपक अपने आप शांत हो जाता है उसी प्रकार वासना के अंत से मनुष्य कर्म बंधनों से मुक्त हो जाता है तथा उसे परम शांति प्राप्त हो जाती है।
5. अहिंसा (Ahimsa)-महात्मा बुद्ध अहिंसा में विश्वास रखते थे। उनका विचार था कि मनुष्य को सभी जीवों अर्थात् मनुष्यों, पशु-पक्षियों तथा जीव-जंतुओं से प्रेम तथा सहानुभूति रखनी चाहिए। वह जीव हत्या तो दूर, उन्हें सताना भी पाप समझते थे। इसलिए उन्होंने जीव हत्या करने वालों के विरुद्ध प्रचार किया।
6. तीन लक्षण (Three Marks)- महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं में एक तीन लक्षणों वाला सिद्धांत भी सम्मिलित है, ये तीन लक्षण हैं—

  1. सभी प्रतिबंधित वस्तुएँ स्थाई नहीं (अनित) हैं ।
  2. सभी प्रतिबंधित वस्तुएँ दुःख ग्रस्त हैं।
  3. सभी प्रतिबंधित वस्तुएँ आत्मन नहीं अनात्म हैं।

यह हमारे राजाना जीवन में आने वाले अनुभव हैं। महात्मा बुद्ध के अनुसार उत्पन्न हुई प्रत्येक वस्तु का अंत निश्चित है। भाव वह अग्नि ( अस्थिर) है। जो अस्थिर है वह दुःखी भी है। मनुष्य का जन्म, बीमारी तथा मृत्यु आदि सभी दुःख के कारण हैं । मनुष्य के जीवन में कुछ खुशी के पल ज़रूर आते हैं किंतु इनका समय बहुत अल्प होता है। अनात्म से भाव है स्वयं का न होगा। सभी कुछ जो अस्थिर है वह मेरा नहीं है।

7. पंचशील (Panchsheel)- महात्मा बुद्ध ने प्रत्येक गृहस्थी को पाँच सिद्धांतों का पालन करना आवश्यक बताया है। पंचशील को शिक्षापद के नाम से भी जाना जाता है। यह पाँच नियम ये हैं:—

  1. छोटे से छोटे जीव की भी हत्या न करो
  2. मुक्त हृदय से दान दो एवं लो, किंतु लालच तथा धोखे से किसी की वस्तु न लो।
  3. झूठी गवाही न दो, किसी की निंदा न करो तथा न ही झूठ बोलो।
  4. नशीली वस्तुओं से बचें क्योंकि यह आपकी अक्ल पर पर्दा डालती हैं।
  5. किसी के लिए भी बुरे विचार दिल में न लाएं शरीर को अयोग्य पापों से बचाएँ।

बौद्ध धर्म में प्रवेश करने वाले भिक्षुओं एक भिक्षुणिओं को पाँच अन्य नियमों का पालन करने का आदेश दिया गया है। ये पाँच नियम हैं।—

  1. समय पर भोजन खाएं
  2. नाच-गानों आदि से दूर रहें
  3. नर्म बिस्तरों पर न सोएँ
  4. हार–शृंगार तथा सुगंधित वस्तुओं का प्रयोग न करें।
  5. सोने एवं चाँदी के चक्करों में न पड़ें।

8. चार असीम सद्गुण (Four Unlimited Virtues)-महात्मा बुद्ध ने चार सामाजिक सद्गुणों पर विशेष बल दिया। ये गुण हैं-मित्र भावना, दया, हमदर्दी भरी प्रसन्नता एवं निरपेक्षता। ये हमारे व्यवहार का अन्य मनुष्यों के साथ तालमेल करते हैं । मित्र भावना से भाव दूसरों की सहायता करना है । यह आपसी ईर्ष्या का अंत करती है। मनुष्य को अपने दुश्मनों के साथ भी प्यार करना चाहिए। दया हमें अन्य के दु:ख के समय साथ देने की प्रेरणा देती है। हमदर्दी भरी प्रसन्नता एक ऐसा गुण है जो मनुष्य को अन्य की प्रसन्नता में सम्मिलित होने के योग्य बनाती है। जिस व्यक्ति में यह गुण होता है वह किसी अन्य की प्रसन्नता से इर्ष्या नहीं करता। निरपेक्षता की भावना रखने वाला व्यक्ति लालच एवं अन्य कुविचारों से दूर रहता है। वह सभी मनुष्यों को समान समझता है। वास्तव में यह चार असीम सद्गुण बौद्ध धर्म के नैतिक नियमों की नींव हैं।
9. परस्पर भ्रातृ-भाव (Universal Brotherhood)-महात्मा बुद्ध ने लोगों को परस्पर भातृ-भाव का उपदेश दिया। वह चाहते थे कि लोग परस्पर झगड़ों को छोड़कर प्रेमपूर्वक रहें। उनका विचार था कि संसार में घृणा का अंत प्रेम से किया जा सकता है। महात्मा बुद्ध ने अपने धर्म में प्रत्येक वर्ण तथा जाति के लोगों को सम्मिलित करके समाज में प्रचलित ऊँच-नीच की भावना को पर्याप्त सीमा तक दूर किया। महात्मा बुद्ध ने दु:खी तथा रोगी व्यक्तियों की अपने हाथों सेवा करके लोगों के सामने एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत की।
10. यज्ञों तथा बलियों में अविश्वास (Disbelief in Yajnas and Sacrifices)- उस समय हिंदू धर्म में अनेक अंधविश्वास प्रचलित थे। वे मुक्ति प्राप्त करने के लिए यज्ञों तथा बलियों पर बहुत बल देते थे। महात्मा बुद्ध ने इन अंधविश्वासों को ढोंग मात्र बताया। उसका कथन था कि यज्ञों के साथ किसी व्यक्ति के कर्मों को नहीं बदला जा सकता तथा बलियाँ देने से मनुष्य अपने पापों में अधिक वृद्धि कर लेता है। अतः इनसे किसी देवी-देवता को प्रसन्न नहीं किया जा सकता।
11. वेदों तथा संस्कृत में अविश्वास (Disbelief in Vedas and Sanskrit)-महात्मा बुद्ध ने वेदों की पवित्रता को स्वीकार न किया। उन्होंने इस बात का भी खंडन किया कि धर्म ग्रंथों को केवल संस्कृत भाषा में पढ़ने से ही फल की प्राप्ति होती है। उन्होंने अपना प्रचार जन-भाषा पाली में किया।
12. जाति प्रथा में अविश्वास (Disbelief in Caste System)-महात्मा बुद्ध ने हिंदू समाज में व्याप्त जाति प्रथा का कड़े शब्दों में विरोध किया। उनके अनुसार मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार छोटा अथवा बड़ा हो सकता है न कि जन्म से। अत: महात्मा बुद्ध ने अपने धर्म में प्रत्येक जाति के लोगों को सम्मिलित किया। उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, “सभी देशों में जाओ और धर्म के संदेश प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचाओ और कहो कि इस धर्म में छोटे-बड़े और धनवान् तथा निर्धन का कोई प्रश्न नहीं। बौद्ध धर्म सभी जातियों के लिए खुला है। सभी जातियों के लोग इसमें इसी प्रकार मिल सकते हैं जिस प्रकार नदियाँ समुद्र में आकर मिल जाती हैं।”
13. तपस्या में अविश्वास (Disbelief in Penance)-महात्मा बुद्ध का कठोर तपस्या में विश्वास नहीं था। उनके अनुसार व्यर्थ ही भूखा-प्यासा रह कर शरीर को कष्ट देने से कोई लाभ नहीं। उन्होंने स्वयं भी 6 वर्ष तक तपस्या का जीवन व्यतीत किया था परंतु कुछ प्राप्ति न हुई। वह समझते थे कि गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए अष्ट मार्ग पर चल कर निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है।
14. ईश्वर में अविश्वास (Disbelief in God)-महात्मा बुद्ध का ईश्वर के अस्तित्व तथा उसकी सत्ता में विश्वास नहीं था। उनका कथन था कि इस संसार की रचना ईश्वर जैसी किसी शक्ति के द्वारा नहीं की गई है। परंतु वह यह अवश्य मानते थे कि संसार के संचालन में कोई शक्ति अवश्य काम करती है। इस शक्ति को उन्होंने धर्म का नाम दिया। वास्तव में महात्मा बुद्ध ईश्वर संबंधी किसी वाद-विवाद में नहीं पड़ना चाहते थे। उनका मानना था कि जिन विषयों के समाधान के लिए पर्याप्त प्रमाण न हों उनके समाधान की चेष्टा करना व्यर्थ है।
15. निर्वाण (Nirvana) महात्मा बुद्ध के अनुसार मनुष्य के जीवन का परम लक्ष्य निर्वाण प्राप्त करना है। निर्वाण के कारण मनुष्य को सुख, आनंद तथा शाँति की प्राप्ति हो जाती है। उसे आवागमन के चक्कर से सदैव मुक्ति मिल जाती है। यह सभी दुःखों का अंत है। वास्तव में निर्वाण वह अवस्था है जिसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। जो इस सच्चाई का अनुभव करते हैं वे इस संबंध में बात नहीं करते हैं तथा जो इस संबंध में बातें करते हैं उन्हें इस बारे में जानकारी नहीं होती। महात्मा बुद्ध के अनुसार अष्ट मार्ग पर चल कर कोई भी व्यक्ति निर्वाण प्राप्त कर सकता है। अन्य धर्मों में जहाँ निर्वाण मृत्यु के उपरांत प्राप्त होता है वहाँ बौद्ध धर्म में निर्वाण की प्राप्ति इसी जीवन में संभव है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं ने अंधकार में भटक रही मानवता के लिए एक प्रकाश स्तंभ का कार्य किया। अंत में हम डॉ० बी० जिनानंदा के इन शब्दों से सहमत हैं,
“वास्तव में महात्मा बुद्ध की शिक्षाएं एक ओर प्रेम और दूसरी ओर तर्क पर आधारित थीं।”5

5. “In fact, the Buddha’s teachings were based on love on the one hand and on logic on the other.” Dr. B. Jinananda, Buddhism (Patiala : 1969) p. 86.

प्रश्न 5. बौद्ध संघ की प्रमुख विशेषताएँ बताएँ। (Explain the main features of the Buddhist Sangha.)
अथवा
बौद्ध संघ पर संक्षिप्त नोट लिखो। (Write a short note on the Buddhist Sangha.)
उत्तर- महात्मा बुद्ध ने संगठित ढंग से बौद्ध धर्म का प्रचार करने के उद्देश्य से बौद्ध संघ की स्थापना की। संघ से भाव बौद्ध भिक्षओं के संगठन से था। बौद्ध संघ देश के विभिन्न भागों में स्थापित किए गए थे। धीरे-धीरे ये संघ शक्तिशाली संस्था का रूप धारण कर गए तथा बौद्ध धर्म के प्रसार का प्रमुख केंद्र बन गए। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ० आर० सी० मजूमदार के शब्दों में,
“विशेष धर्म के लोगों का संघ अथवा संगठन की कल्पना नयी न थी। गौतम बुद्ध के पूर्व और उनके समय में भी इस ढंग की अनेक संस्थाएँ थीं, किंतु बुद्ध को इस बात का श्रेय है कि उन्होंने इन संस्थाओं को पूर्ण एवं व्यवस्थित रूप दिया।”6

6.” The idea of a Church, or a corporate body of men following a particular faith, was not certainly a new one and there were many organisations of this type at and before the time of Gautama Buddha. His credit, however, lies in the thorough and systematic character which he gave to these organisations,” Dr. R. C. Majumdar, Ancient India (Delhi : 1991) p. 163.

1. संघ की सदस्यता (Membership of the Sangha)-महात्मा बुद्ध के अनुयायी दो प्रकार के थे। इन्हें उपासक-उपासिकाएँ तथा भिक्षु-भिक्षुणियाँ कहा जाता था। उपासक तथा उपासिकाएं वे थीं जो गृहस्थ जीवन का पालन करते थे। भिक्षु तथा भिक्षुणियाँ गृह त्याग कर संन्यास धारण करते थे। आरंभ में संघ प्रवेश की विधि बहत सरल थी। किंतु जब धीरे-धीरे संघ के सदस्यों की संख्या बढ़ने लगी एवं इसमें लोग प्रवेश पाने लगे जो अज्ञानी तथा अनुशासनहीन थे, जो जनता के दान से विलासमय जीवन व्यतीत करने के इच्छुक थे, जो डाकू, हत्यारे और ऋणी थे तथा जो राजा के दंड से बचना चाहते थे। उस समय ऐसी राजाज्ञा थी कि कोई भी अधिकारी किसी बौद्ध भिक्षु अथवा भिक्षुणी को हानि नहीं पहुँचायेगा। अत: महात्मा बुद्ध ने संघ में प्रवेश करने वाले सदस्यों के लिए कुछ योग्यताएँ निर्धारित कर दीं। इनके अनुसार अब संघ में प्रवेश पाने के लिए किसी भी स्त्री अथवा पुरुष के लिए कम-से-कम आयु 15 वर्ष निश्चित कर दी गई। उन्हें संघ का सदस्य बनने के लिए अपने माता-पिता अथवा अभिभावकों की स्वीकृति लेना आवश्यक था। अपराधी, दास तथा रोगी संघ के सदस्य नहीं बन सकते थे। संघ में किसी भी जाति का व्यक्ति प्रवेश पा सकता था।
संघ में प्रवेश करने वाले भिक्षु अथवा भिक्षुणी का सर्वप्रथम मुंडन किया जाता था तथा उसे पीले वस्त्र धारण करने पड़ते थे। इसके पश्चात् उसे यह शपथ ग्रहण करनी होती थी, “मैं बुद्ध की शरण लेता हूँ, मैं धर्म की शरण लेता हूँ, मैं संघ की शरण लेता हूँ।” तत्पश्चात् उसे संघ के सदस्यों में से किसी एक को अपना गुरु धारण करना पड़ता था तथा 10 वर्षों तक उससे प्रशिक्षण लेना पड़ता था। ऐसे सदस्यों को ‘श्रमण’ कहा जाता था। यदि 10 वर्षों के पश्चात् उसकी योग्यता को स्वीकार कर लिया जाता तो उसे संघ का पूर्ण सदस्य मान लिया जाता तथा उसे भिक्षु अथवा भिक्षुणी की उपाधि प्रदान की जाती।
2. दस आदेश (Ten Commandments)-संघ सदस्यों को बड़ा अनुशासित जीवन व्यतीत करना पड़ता था। प्रत्येक सदस्य को इन नियमों का पालन करना आवश्यक था। ये नियम थे—

  1. ब्रह्मचर्य का पालन करना।
  2. जीवों को कष्ट न देना।
  3. दूसरों की संपत्ति की इच्छा न करना।
  4. सदा सत्य बोलना।
  5. मादक पदार्थों का प्रयोग न करना।
  6. नृत्य-गान में भाग न लेना।
  7. सुगंधित वस्तुओं का प्रयोग न करना।
  8. गद्देदार बिस्तर पर न सोना।
  9. अपने पास धन न रखना तथा
  10. निश्चित समय को छोड़कर किसी अन्य अवसर पर भोजन न करना।

3. भिक्षुणियों के लिए विशेष नियम (Special rules for Nuns)-भिक्षुणियों के लिए बौद्ध संघ भिक्षुओं से पृथक् हुआ करते थे । अतः भिक्षुणियों के लिए कुछ अन्य नियम भी बनाए गए थे। ये नियम इस प्रकार थे—

  1. भिक्षुणियों को अपने कर्तव्यों को भली-भांति समझना चाहिएं।
  2. उन्हें 15 दिनों में एक बार भिक्षा लानी चाहिए।
  3. उन स्थानों पर जहाँ भिक्षु हों उन्हें वर्षाकाल में निवास नहीं करना चाहिए।
  4. उन्हें भिक्षुकों से पृथक् रहना चाहिए ताकि भिक्षु न तो उन्हें तथा न उनके कार्यों को देख सकें।
  5. वे भिक्षुणियों को कुमार्ग पर न डालें।
  6. वे पाप कर्मों तथा क्रोध आदि से मुक्त रहें।
  7. प्रत्येक पखवाड़े वे किसी भिक्षु के समक्ष अपने पापों को स्वीकार करें।
  8. प्रत्येक भिक्षुणी को चाहे वह वयोवृद्ध ही क्यों न हो नवीन भिक्षु के प्रति भी आदर प्रदर्शन करना चाहिए।

4. आवास (Residence)-बौद्ध भिक्षु तथा भिक्षुणियाँ वर्षा काल के तीन माह को छोड़कर देश के विभिन्न भागों का भ्रमण करते रहते थे तथा लोगों को उपदेश देते थे। वर्षा के तीन माह वे एक स्थान पर निवास करते थे तथा अध्ययन का कार्य करते थे। उनके निवास स्थान आवास कहलाते थे। प्रत्येक आवास में अनेक विहार होते थे जहाँ भिक्षुभिक्षुणियों के लिए अलग कमरे होते थे। इन विहारों में जीवन सामूहिक था। प्रत्येक भिक्षु-भिक्षुणी को जो भी भिक्षा मिलती थी वह संघ के समस्त सदस्यों में वितरित की जाती थी। ये बौद्ध विहार धीरे-धीरे बौद्ध धर्म तथा शिक्षा प्रचार के प्रसिद्ध केंद्र बन गए।
5. संघ का संविधान (Constitution of the Sangha)-प्रत्येक बौद्ध संघ लोकतंत्रीय प्रणाली पर आधारित था। इसके सभी सदस्यों के अधिकार समान थे। यहाँ कोई छोटा या बड़ा नहीं समझा जाता था। संघ में भिक्षुगण अपनी वरीयता के अनुसार आसन ग्रहण करते थे। संघ के अधिवेशन के लिए कम-से-कम 20 भिक्षुओं की उपस्थिति __ अनिवार्य थी। इस गणपूर्ति के बिना प्रत्येक अधिवेशन अवैध समझा जाता था। संघ में प्रत्येक विषय पर पूर्व दी गई सूचना के आधार पर प्रस्ताव प्रस्तुत किए. जाते थे। इसके पश्चात् प्रस्ताव पर वाद-विवाद होता था। जिस प्रस्ताव पर सदस्यों में मतभेद होता था वहां मतदान कराया जाता था। मतदान दो प्रकार का होता था-गुप्त तथा प्रत्यक्ष । यदि कोई भिक्षु अनुपस्थित होता था तो वह अपनी सहमति पहले दे जाता था। कभी-कभी कोई प्रस्ताव विशेष विचार के लिए किसी उप-समिति के सुपुर्द कर दिया जाता था। संघ के सभी निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाते थे। प्रत्येक संघ की एक माह में दो बार बैठक अवश्य होती थी। इन बैठकों में धर्म के प्रचार के किए जा रहे प्रयासों तथा संघ के नियमों को भंग करने वाले भिक्षु-भिक्षुणियों को दंडित किया जाता था। प्रत्येक बौद्ध संघ में कुछ ऐसे विशेष अधिकारी होते थे जिन्हें संघ के सदस्य सर्वसम्मति से चुनते थे। ये अधिकारी भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए विहारों तथा उनके लिए भोजन आदि का प्रबंध करते थे। डॉ० अरुण भट्टाचार्जी के शब्दों में,
“अनुशासित संघ बौद्ध धर्म की अद्वितीय सफलता के स्तंभ थे।”7
6. संघ में फूट (Schism in Sangha)–बौद्ध संघों ने बौद्ध धर्म को लोकप्रिय बनाने में प्रशंसनीय भूमिका निभाई थी। किंतु महात्मा बुद्ध के निर्वाण के 100 वर्षों के पश्चात् जब वैशाली में बौद्धों की दूसरी महासभा आयोजित की गई थी तो बौद्ध संघ में फूट पड़ गई। इससे बौद्ध धर्म में एकता न रही। प्रथम शताब्दी ई० में बौद्ध धर्म दो प्रमुख संप्रदायों हीनयान अथवा महायान में बँट गया। बौद्ध संघ की इस फूट ने भारत में बौद्ध धर्म का पतन निश्चित कर दिया।

7. “The well disciplined Sanglia was the pillar of the success of Buddhism.” Dr. Arun Bhattacharjee, History of Ancient India (New Delhi : 1979) p. 122.

प्रश्न 6. बौद्ध धर्म में संघ, निर्वाण एवं पंचशील के संबंध में जानकारी दें। (Write about Sangha, Nirvana and Panchsheel in Buddhism.)
अथवा
बौद्ध धर्म के संघ एवं पंचशील के बारे में जानकारी दें। (Write about Sangha and Panchsheel in Buddhism.)
अथवा
बौद्ध धर्म के निर्वाण के सिद्धांत संबंधी जानकारी दें।
(Write about the concept of Nirvana in Buddhism.)
उत्तर-बौद्ध धर्म में संघ, निर्वाण तथा पंचशील नामक सिद्धांतों का विशेष महत्त्व है। बौद्ध धर्म के विकास में इन्होंने बहुत प्रशंसनीय योगदान दिया। इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित अनुसार है :—
(क) बौद्ध संघ (Buddhist Sangha)
महात्मा बुद्ध ने अपने अनुयायियों को संगठित करने के लिए बौद्ध संघ की स्थापना की थी। संघ से भाव बौद्ध भिक्षुओं के संगठन से था। धीरे-धीरे ये संघ एक शक्तिशाली संस्था का रूप धारण कर गए थे। प्रत्येक पुरुष अथवा स्त्री, जिसकी आयु 15 वर्ष से अधिक थी, बौद्ध संघ का सदस्य बन सकता था। अपराधियों, रोगियों तथा दासों को सदस्य बनने की अनुमति नहीं थी। सदस्य बनने से पूर्व घर वालों से अनुमति लेना आवश्यक था। नए भिक्षु को संघ में प्रवेश के समय मुंडन करवा कर पीले वस्त्र धारण करने पड़ते थे और यह शपथ लेनी पड़ती थी “मैं बुद्ध की शरण लेता हूँ, मैं धर्म की शरण लेता हूं, मैं संघ की शरण लेता हूँ।” संघ के सदस्यों को बड़ा अनुशासित जीवन व्यतीत करना पड़ता था। प्रत्येक सदस्य को इन नियमों का पालन करना आवश्यक था। ये नियम थे—

  1. ब्रह्मचर्य का पालन करना।
  2. जीवों को कष्ट न देना।
  3. दूसरों की संपत्ति की इच्छा न करना।
  4. सदा सत्य बोलना।
  5. मादक पदार्थों का प्रयोग न करना।
  6. नृत्य-गान में भाग न लेना।
  7. सुगंधित वस्तुओं का प्रयोग न करना ।
  8. गद्देदार बिस्तर पर न सोना
  9. अपने पास धन न रखना तथा
  10. निश्चित समय को छोड़कर किसी अन्य अवसर पर भोजन न करना।

संघ में सम्मिलित होने वाले भिक्षु तथा भिक्षुणी को दस वर्ष तक किसी भिक्षु से प्रशिक्षण लेना पड़ता था। इसमें सफल होने पर उन्हें संघ का सदस्य बना लिया जाता था। संघ के सभी सदस्यों को सादा तथा पवित्र जीवन व्यतीत करना पड़ता था। वे अपना निर्वाह भिक्षा माँग कर करते थे। वर्षा ऋतु के तीन महीनों को छोड़ कर संघ के सदस्य सारा वर्ष विभिन्न स्थानों पर जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार करते थे। महत्त्वपूर्ण निर्णयों के लिए संघ की विशेष बैठकें बुलाई जाती थीं। इन बैठकों में सभी सदस्यों को भाग लेने की अनुमति थी। प्रत्येक बैठक में कम-से-कम दस सदस्यों का उपस्थित होना आवश्यक था। सभी निर्णय बहुमत से लिए जाते थे। इस संबंध में गुप्त मतदान करवाया जाता था। सदस्यों में मतभेद होने पर उस विषय का निर्णय इस उद्देश्य के लिए स्थापित उप-समितियों द्वारा किया जाता था। वास्तव में बौद्ध धर्म की प्रगति में इन बौद्ध संघों ने बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ० एस० एन० सेन के अनुसार, “बौद्ध धर्म की अद्वितीय सफलता का कारण संगठित संघ थे।”8

8. “The phenomenal success of Buddhism was due to the organisation of the Sangha.” Dr. S.N. Sen, Ancient Indian History and Civilization (New Delhi : 1988) p. 67.

(ख) निर्वाण (Nirvana)
महात्मा बुद्ध के अनुसार मानव जीवन का उच्चतम उद्देश्य निर्वाण प्राप्त करने से है। बौद्ध धर्म में निर्वाण संबंधी यह विचार दिया गया है कि यह न जीवन है तथा न मृत्यु। यह कोई स्वर्ग नहीं जहां देवते आनंदित हों। इसे शाँति एवं सदैव प्रसन्नता का स्रोत कहा गया है। यह सभी दुःखों, लालसाओं एवं इच्छाओं का अंत है। इसकी वास्तविकता पूरी तरह काल्पनिक है। इसका वर्णन संभव नहीं। निर्वाण की वास्तविकता तथा इसका अर्थ जानने के लिए उसकी प्राप्ति आवश्यक है। जो इस सच्चाई को जानते हैं वे इस संबंध में बातें नहीं करते तथा जो इस संबंध में बातें करते हैं उन्हें इस संबंध में कोई जानकारी नहीं होती। महात्मा बुद्ध के अनुसार अष्ट मार्ग पर चल कर कोई भी व्यक्ति निर्वाण प्राप्त कर सकता है। जहाँ अन्य धर्मों में निर्वाण मृत्यु के पश्चात् प्राप्त होता है वहां बौद्ध धर्म में निर्वाण की प्राप्ति इसी जीवन में भी संभव है।

(ग) पंचशील (Panchsheel)
पंचशील (Panchsheel)- महात्मा बुद्ध ने प्रत्येक गृहस्थी को पाँच सिद्धांतों का पालन करना आवश्यक बताया है। पंचशील को शिक्षापद के नाम से भी जाना जाता है। यह पाँच नियम ये हैं:—

  1. छोटे से छोटे जीव की भी हत्या न करो
  2. मुक्त हृदय से दान दो एवं लो, किंतु लालच तथा धोखे से किसी की वस्तु न लो।
  3. झूठी गवाही न दो, किसी की निंदा न करो तथा न ही झूठ बोलो।
  4. नशीली वस्तुओं से बचें क्योंकि यह आपकी अक्ल पर पर्दा डालती हैं।
  5. किसी के लिए भी बुरे विचार दिल में न लाएं शरीर को अयोग्य पापों से बचाएँ।

बौद्ध धर्म में प्रवेश करने वाले भिक्षुओं एक भिक्षुणिओं को पाँच अन्य नियमों का पालन करने का आदेश दिया गया है। ये पाँच नियम हैं।—

  1. समय पर भोजन खाएं
  2. नाच-गानों आदि से दूर रहें
  3. नर्म बिस्तरों पर न सोएँ
  4. हार–शृंगार तथा सुगंधित वस्तुओं का प्रयोग न करें।
  5. सोने एवं चाँदी के चक्करों में न पड़ें।

प्रश्न 7. बौद्ध धर्म के प्रारंभिक वर्षों में बौद्ध संप्रदायों एवं समकालीन समाज पर विस्तृत नोट लिखिए।
(Write a detailed note on early Buddhist sects and society.)
उत्तर-
(क) प्रारंभिक बौद्ध संप्रदाय
(Early.Buddhist Sects) महात्मा बुद्ध के निर्वाण के पश्चात् बौद्ध धर्म 18 से भी अधिक संप्रदायों में विभाजित हो गया था। इनमें से अनेक संप्रदाय छोटे-छोटे थे तथा उनका कोई विशेष महत्त्व न था। बौद्ध धर्म के प्रमुख संप्रदायों का संक्षिप्त विवरण निम्न अनुसार है:—

  1. स्थविरवादी तथा महासंघिक (Sthaviravadins and Mahasanghika)-महात्मा बुद्ध के निर्वाण के 100 वर्ष पश्चात् 387 ई० पू० में वैशाली में आयोजित की गई दूसरी महासभा में बौद्ध संघ से संबंधित अपनाए गए 10 नियमों के कारण फूट पड़ गई। परिणामस्वरूप स्थविरवादी अथवा थेरावादी एवं महासंघिक अस्तित्व में आए। स्थविरवादी भिक्षु बौद्ध धर्म में चले आ रहे परंपरावादी नियमों के समर्थक थे। वे किसी प्रकार भी इन नियमों में परिवर्तन किए जाने के पक्ष में नहीं थे। महासंघिक नए नियम अपनाए जाने के पक्ष में थे। इस महासभा में स्थविरवादियों की विजय हुई तथा महासंघिक को सभा छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा। शीघ्र ही स्थविरवादी 11 एवं महासंघिक 7 सम्प्रदायों में विभाजित हो गए।
  2. हीनयान तथा महायान (Hinayana and Mahayana)-कनिष्क के शासन काल में प्रथम शताब्दी ई०. में जालंधर में बौद्ध भिक्षुओं की चौथी महासभा आयोजित की गई थी। इस महासभा में हीनयान एवं महायान नामक दो नए बौद्ध संप्रदाय अस्तित्व में आए। यान का शाब्दिक अर्थ था मुक्ति प्राप्ति का ढंग। हीनयाम से अभिप्राय था छोटा यान। महायान से अभिप्राय था बड़ा यान। हीनयान वालों ने बौद्ध धर्म के परंपरावादी नियमों के समर्थन को जारी रखा, जबकि महायान वालों ने नए सिद्धांतों को अपनाया। हीनयान धर्म का प्रसार एशिया के दक्षिणी देशों भारत, श्रीलंका तथा बर्मा (म्यांमार) आदि देशों में हुआ। महायान धर्म का प्रसार एशिया के उत्तरी देशों चीन, जापान, नेपाल तथा तिब्बत आदि में हुआ। हीनयान तथा महायान के मध्य मुख्य अंतर निम्नलिखित थे :—
    • हीनयान संप्रदाय महात्मा बुद्ध को एक पवित्र आत्मा समझते थे, जबकि महायान संप्रदाय उन्हें ईश्वर का एक रूप समझते थे।
    • हीनयान संप्रदाय मूर्ति पूजा के विरुद्ध था, जबकि महायान संप्रदाय मूर्ति पूजा के विरुद्ध नहीं था।
    • हीनयान बोधिसत्वों में विश्वास नहीं रखते थे। उनके अनुसार कोई भी व्यक्ति केवल अपने प्रयासों से ही निर्वाण प्राप्त कर सकता है। कोई भी देवता निर्वाण प्राप्ति में उसकी सहायता नहीं कर सकता। महायान संप्रदाय बोधिसत्वों में पूर्ण विश्वास रखता था। बोधिसत्व वे महान् व्यक्ति थे जो निर्वाण प्राप्ति में दूसरों की सहायता के उद्देश्यों से बार-बार जन्म लेते थे।
    • हीनयान संप्रदाय ने बौद्ध धर्म का प्रचार पाली भाषा में किया जो कि जन-साधारण की भाषा थी। महायान संप्रदाय ने संस्कृत भाषा में बौद्ध धर्म का प्रचार किया।
    • हीनयान संप्रदाय के अनुसार मानव जीवन का परम लक्ष्य निर्वाण को प्राप्त करना है, जबकि महायान संप्रदाय के अनुसार मानव जीवन का परम लक्ष्य स्वर्ग को प्राप्त करना है।
    • हीनयान संप्रदाय का हिंदू धर्म के साथ कोई संबंध न था, जबकि महायान संप्रदाय ने अपने धर्म को लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से हिंदू धर्म के अनेक सिद्धांतों को अपना लिया था।
    • हीनयान संप्रदाय महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं में किसी भी प्रकार के परिवर्तन के विरुद्ध था, जबकि महायान संप्रदाय ने समय के अनुसार बौद्ध धर्म के नियमों में परिवर्तन किए। अतः हीनयान संप्रदाय की अपेक्षा महायान संप्रदाय अधिक लोकप्रिय हुआ।
    • हीनयान संप्रदाय के प्रमुख ग्रंथ त्रिपिटक, मिलिन्दपन्हो तथा महामंगलसूत्र आदि थे। महायान संप्रदाय के प्रमुख ग्रन्थ ललितविस्तार, बुद्धचरित तथा सौंदरानन्द आदि थे।
  3. वज्रयान (Vajrayana)-8वीं शताब्दी में बंगाल तथा बिहार में बौद्ध धर्म का एक नया संप्रदाय अस्तित्व में आया। यह संप्रदाय जादू-टोनों तथा मंत्रों से जुड़ा हुआ था। इस संप्रदाय का विचार था कि जादू की शक्तियों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। इन जादुई शक्तियों को वज्र कहा जाता था। इसलिए इस संप्रदाय का नाम वज्रयान पड़ गया। इस संप्रदाय में सभी जातियों के स्त्री-पुरुष सम्मिलित हो सकते थे। इस संप्रदाय में देवियों का महत्त्व बहुत बढ़ गया था। समझा जाता था कि इन देवियों द्वारा बोधिसत्व तक पहुँचा जा सकता है। इन देवियों को तारा कहा जाता था। ‘महानिर्वाण तंत्र’ वज्रयान की प्रसिद्ध धार्मिक पुस्तक थी । वज्रयान की धार्मिक पद्धति को तांत्रिक भी कहते हैं । बिहार राज्य वज्रयान का सब से महत्त्वपूर्ण विहार विक्रमशिला में स्थित है। वज्रयान शाखा ने अपने अनुयायियों को मादक पदार्थों का सेवन करने, माँस भक्षण तथा स्त्री गमन की अनुमति देकर बौद्ध धर्म के पतन का डंका बजा दिया। एन० एन० घोष के अनुसार,
    “बौद्ध धर्म के पतन का मुख्य कारण वज्रयान का अस्तित्व था जिसने नैतिकता का विनाश करके इसकी नींव को हिला कर रख दिया था।”9

9. “……..the chief cause of disappearance of Buddhism was the prevalence of Vajrayana which sapped its foundation by destroying all moral strength.” N. N. Ghosh, Early History of India (Allahabad : 1951) p. 65.

(ख) समाज
(Society) बौद्ध विचारधारा में एक आदर्श समाज की कल्पना की गई है। इस समाज के प्रमुख नियम ये हैं—

  1. समाज में सामाजिक समानता एवं धार्मिक स्वतंत्रता की स्थापना की गई थी। बौद्ध धर्म में जाति प्रथा की जोरदार शब्दों में आलोचना की गई है। बौद्ध धर्म के द्वार सभी धर्मों, जातियों एवं नस्लों के लिए खुले हैं।
  2. स्त्रियों को पुरुषों के समान दर्जा दिए जाने का प्रचार किया गया है।
  3. बुद्ध के लिए मन की पवित्रता तथा उच्च चरित्र, जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। उसने लोगों को झूठी गवाही न देने, झूठ न बोलने, किसी की चुगली न करने, नशीली वस्तुओं का प्रयोग न करने, चोरी न करने, अन्य पाप न करने तथा छोटे-से-छोटे जीव की भी हत्या न करने के लिए प्रेरित किया। महात्मा बुद्ध का कथन था कि,

“सौ वर्षों का वह जीवन भी तुच्छ है जिसमें परम सत्य की प्राप्ति नहीं होती, पर वह जिसे परम सत्य की प्राप्ति हो जाती है, उसके जीवन का एक दिन भी महान है।”
संक्षेप में यदि महात्मा बुद्ध के इन सिद्धांतों की सच्चे मन से पालना की जाए तो निस्संदेह हमारी यह पृथ्वी एक स्वर्ग का नमूना बन जाए।

प्रश्न 8. बौद्ध धर्म के दो प्रमुख संप्रदायों बारे बताएँ।
(What do you know about the two main sects of Buddhism ?)
अथवा
हीनयान एवं महायान द्वारा प्रतिपादित विचार एवं विचारधारा कौन-सी है ? वर्णन करें।
(What thoughts and ideas are represented by Hinayana and Mahayana ? Discuss.)
अथवा
हीनयान एवं महायान से क्या भाव है ? दोनों के मध्य अंतर बताएं। (What is meant by Hinayana and Mahayana ? Distinguish between the two.)
अथवा
बौद्ध धर्म के महायाम तथा हीमयान संप्रदायों के बारे आप क्या जानते हैं ? (What do you understand by Mahayana and Hinayana sects of Buddhism ?)
अथवा
बौद्ध धर्म के महायान तथा हीनयान संप्रदायों की मूल शिक्षाओं बारे बताएं। (Explain the basic teachings of Mahayana and Hinayana sects of Buddhism.)
अथवा
बौद्ध धर्म के महायान तथा हीनयान संप्रदायों पर विस्तृत नोट लिखें। (Write a detailed note on the Buddhist sects named Mahayana and Hinayana.)
अथवा
बौद्ध धर्म के महायाम संप्रदाय के निकास तथा विकास के बारे में प्रकाश डालें।
(Throw light on the origin and growth of the Mahayana sect of Buddhism.)
अथवा
बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय की प्रगति के बारे आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the development of Mahayana ? Discuss.)
उत्तर-हीनयान तथा महायान (Hinayana and Mahayana)-कनिष्क के शासन काल में प्रथम शताब्दी ई०. में जालंधर में बौद्ध भिक्षुओं की चौथी महासभा आयोजित की गई थी। इस महासभा में हीनयान एवं महायान नामक दो नए बौद्ध संप्रदाय अस्तित्व में आए। यान का शाब्दिक अर्थ था मुक्ति प्राप्ति का ढंग। हीनयाम से अभिप्राय था छोटा यान। महायान से अभिप्राय था बड़ा यान। हीनयान वालों ने बौद्ध धर्म के परंपरावादी नियमों के समर्थन को जारी रखा, जबकि महायान वालों ने नए सिद्धांतों को अपनाया। हीनयान धर्म का प्रसार एशिया के दक्षिणी देशों भारत, श्रीलंका तथा बर्मा (म्यांमार) आदि देशों में हुआ। महायान धर्म का प्रसार एशिया के उत्तरी देशों चीन, जापान, नेपाल तथा तिब्बत आदि में हुआ। हीनयान तथा महायान के मध्य मुख्य अंतर निम्नलिखित थे :—

  1. हीनयान संप्रदाय महात्मा बुद्ध को एक पवित्र आत्मा समझते थे, जबकि महायान संप्रदाय उन्हें ईश्वर का एक रूप समझते थे।
  2. हीनयान संप्रदाय मूर्ति पूजा के विरुद्ध था, जबकि महायान संप्रदाय मूर्ति पूजा के विरुद्ध नहीं था।
  3. हीनयान बोधिसत्वों में विश्वास नहीं रखते थे। उनके अनुसार कोई भी व्यक्ति केवल अपने प्रयासों से ही निर्वाण प्राप्त कर सकता है। कोई भी देवता निर्वाण प्राप्ति में उसकी सहायता नहीं कर सकता। महायान संप्रदाय बोधिसत्वों में पूर्ण विश्वास रखता था। बोधिसत्व वे महान् व्यक्ति थे जो निर्वाण प्राप्ति में दूसरों की सहायता के उद्देश्यों से बार-बार जन्म लेते थे।
  4. हीनयान संप्रदाय ने बौद्ध धर्म का प्रचार पाली भाषा में किया जो कि जन-साधारण की भाषा थी। महायान संप्रदाय ने संस्कृत भाषा में बौद्ध धर्म का प्रचार किया।
  5. हीनयान संप्रदाय के अनुसार मानव जीवन का परम लक्ष्य निर्वाण को प्राप्त करना है, जबकि महायान संप्रदाय के अनुसार मानव जीवन का परम लक्ष्य स्वर्ग को प्राप्त करना है।
  6. हीनयान संप्रदाय का हिंदू धर्म के साथ कोई संबंध न था, जबकि महायान संप्रदाय ने अपने धर्म को लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से हिंदू धर्म के अनेक सिद्धांतों को अपना लिया था।
  7. हीनयान संप्रदाय महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं में किसी भी प्रकार के परिवर्तन के विरुद्ध था, जबकि महायान संप्रदाय ने समय के अनुसार बौद्ध धर्म के नियमों में परिवर्तन किए। अतः हीनयान संप्रदाय की अपेक्षा महायान संप्रदाय अधिक लोकप्रिय हुआ।
  8. हीनयान संप्रदाय के प्रमुख ग्रंथ त्रिपिटक, मिलिन्दपन्हो तथा महामंगलसूत्र आदि थे। महायान संप्रदाय के प्रमुख ग्रन्थ ललितविस्तार, बुद्धचरित तथा सौंदरानन्द आदि थे।

प्रश्न 9. प्रारंभिक बौद्ध ग्रंथों के बारे में संक्षेप जानकारी दें। (Give a brief account of the Early Buddhist scriptures.) –
अथवा
बौद्ध साहित्य के बारे में आप क्या जानते हैं ? वर्णन करें। (What do you know about the Buddhist literature ? Explain.)
उत्तर–बौद्ध साहित्य बौद्ध धर्म की जानकारी के लिए हमारा बहुमूल्य स्रोत है। बौद्ध साहित्य यद्यपि अनेक भाषाओं में लिखा गया, किंतु अधिकतर साहित्य पालि एवं संस्कृत भाषाओं से संबंधित है। बौद्ध धर्म की हीनयान शाखा से संबंधित साहित्य पालि भाषा में तथा महायान शाखा से संबंधित साहित्य संस्कृत भाषा में लिखा गया।
(क) पालि भाषा में लिखा गया साहित्य
(Literature written in Pali)
बौद्ध धर्म से संबंधित प्रारंभिक बौद्ध ग्रंथ पालि भाषा में लिखे गए थे। प्रमुख बौद्ध ग्रंथों का संक्षिप्त ब्यौरा निम्न अनुसार है :—
1. त्रिपिटक (The Tripitakas)–त्रिपिटक बौद्ध धर्म के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं। इनके नाम विनयपिटक, सुत्तपिटक तथा अभिधम्मपिटक हैं। बौद्ध साहित्य में त्रिपिटकों को प्रमुख स्थान प्राप्त है। पिटक का अर्थ है ‘टोकरी’ जिसमें इन ग्रंथों को संभाल कर रखा जाता था।—

(क) विनयपिटक (The Vinayapitaka)–विनयपिटक में बौद्ध भिक्षु तथा भिक्षुणियों के आचरण से संबंधित नियमों पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला गया है। इसके तीन भाग हैं :

  1. सुत्तविभंग (The Suttavibhanga)—इसमें बौद्ध भिक्षु एवं भिक्षुणियों के लिए अपराधों की सूची तथा उनके प्रायश्चित दिए गए हैं। इन नियमों को पातिमोक्ख कहा जाता है।
  2. खंधक (The Khandhaka) खंधक दो भागों-महावग्ग एवं चुल्लवग्ग में विभाजित हैं। इनमें संघ के नियमों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इनके अतिरिक्त इनमें महात्मा बुद्ध से संबंधित अनेक कथाओं की चर्चा भी की गई है।
  3. परिवार (The Parivara)—यह विनयपिटक का अंतिम भाग है। यह प्रथम दो भागों का सारांश है तथा यह प्रश्न-उत्तर के रूप में लिखी गई है।

(ख) सुत्तपिटक (The Suttapitaka)—यह त्रिपिटकों का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग है। यह पांच निकायों अथवा संग्रहों में विभक्त है—

  1. दीघ निकाय (The Digha Nikaya)—इसमें 34 लंबे सूत्र हैं जो स्वयं अपने में पूर्ण हैं । इनमें महात्मा बुद्ध के विभिन्न प्रवचनों का ब्यौरा दिया गया है।
  2. मज्झिम निकाय (The Majjhima Nikaya)—इसमें 152 सूत्र हैं जो दीघ निकाय की अपेक्षा छोटे हैं। इनमें महात्मा बुद्ध के वार्तालापों का वर्णन दिया गया है। इनके अन्त में उपदेश दिए गए हैं।
  3. संयुत निकाय (The Sanyutta Nikaya)—इसमें 7762 सूत्र हैं। इनमें आध्यात्मिक विषयों की चर्चा की गई है। इनमें महात्मा बुद्ध तथा अन्य देवी-देवताओं की कथाएं मिलती हैं। इनके अतिरिक्त इनमें विरोधी धर्मों का खंडन भी किया गया है।
  4. अंगुत्तर निकाय (The Anguttara Nikaya)-इसमें 2308 सूत्र हैं। इसका अधिकतर भाग गद्य में है किंतु कुछ भाग पद्य में भी है। इसमें बौद्ध धर्म तथा इसके दर्शन का वर्णन किया गया है।
  5. खुद्दक निकाय (The Khuddaka Nikaya)-इसमें बौद्ध धर्म से संबंधित विभिन्न विषयों की चर्चा की गई है। इसमें 15 विभिन्न पुस्तकें संकलित हैं। ये पुस्तकें अलग-अलग समय लिखी गईं। इन पुस्तकों में खुद्दक पाठ, धम्मपद, जातक एवं सूत्रनिपात नामक पुस्तकें प्रसिद्ध हैं। खुद्दक पाठ सबसे छोटी रचना है। इसमें 9 सूत्र हैं जो दीक्षा के समय पढ़े जाते हैं। धम्मपद बौद्ध धर्म से संबंधित सबसे पवित्र पुस्तक समझी जाती है। बोद्धि धम्मपद का उसी प्रकार प्रतिदिन पाठ करते हैं जैसे सिख जपुजी साहिब का एवं हिंदू गीता का।धम्मपद बौद्ध गीता के नाम से प्रसिद्ध है। इसका विश्व भर की भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है। जातक में महात्मा बुद्ध के पूर्व जन्म से संबंधित 549 कथाओं का वर्णन किया गया है। सुत्तनिपात कविता रूप में लिखी गई है। इसमें बौद्ध धर्म के प्रारंभिक इतिहास के संबंध में जानकारी दी गई है।

(ग) अभिधम्मपिटक (The Abhidhammapitaka)-अभिधम्म से भाव है ‘उत्तम शिक्षाएँ’। इस ग्रंथ का अधिकतर भाग प्रश्न-उत्तर रूप में लिखा गया है। इसमें आध्यात्मिक विषयों की चर्चा की गई हैं। इसमें 7 पुस्तकों का वर्णन किया गया है। इसमें धम्मसंगनी तथा कथावथु सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। धम्मसंगनी बौद्ध मनोविज्ञान से संबंधित महान् रचना है। कथावथु का लेखक मोग्गलिपुत्त तिस्स था। इसमें बौद्ध धर्म की स्थविरवादी शाखा से संबंधित नियमों का वर्णन किया गया है।
2. मिलिन्द पन्हो (Milind Panho)-यह बौद्ध धर्म से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण रचना है। यह 100 ई०पू० पंजाब में लिखी गई। इसमें पंजाब के एक यूनानी शासक मीनांदर तथा बौद्ध भिक्षु नागसेन के मध्य हुए धार्मिक वार्तालाप का विवरण दिया गया है। इसमें बौद्ध दर्शन के संबंध में महत्त्वपूर्ण प्रकाश डाला गया है।
3. दीपवंश तथा महावंश (Dipavansa and Mahavansa)-इन दोनों बौद्ध ग्रंथों की रचना श्रीलंका में की गई थी। इन्हें पाँचवीं शताब्दी में लिखा गया था। इन बौद्ध ग्रंथों में वहां की बौद्ध कथाओं का विवरण मिलता है।
4. महामंगलसूत्र (Mahamangalsutra)—इस रचना में महात्मा बुद्ध द्वारा दिए गए शुभ एवं अशुभ कर्मों का ब्यौरा दिया गया है। बोद्धि इसका रोज़ाना पाठ करते हैं।

(ख) संस्कृत में लिखा गया साहित्य
(Literature written in Sanskrit)
बौद्ध धर्म का महायान संप्रदाय से संबंधित अधिकतर साहित्य संस्कृत भाषा में लिखा गया है। प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथों का संक्षिप्त विवरण निम्न अनुसार है—

  1. ललितविस्तार (The Lalitvistara) यह बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय से संबंधित प्रारंभिक बौद्ध ग्रंथों में से एक है। इसमें महात्मा बुद्ध के जीवन के बारे में अत्यंत रोचक शैली में वर्णन किया गया है।
  2. लंकावतार (The Lankavatara)—यह महायानियों का एक पवित्र ग्रंथ है। इसका चीन एवं जापान के बोद्धि प्रतिदिन पाठ करते हैं।
  3. सद्धर्मपुण्डरीक (The Saddharmapundarika)-इस प्रसिद्ध ग्रंथ में महायान संप्रदाय के सभी नियमों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इसमें महात्मा बुद्ध को परमात्मा के रूप में दर्शाया गया है जिसने इस संसार की रचना की।
  4. प्रज्ञापारमिता (The Prajnaparamita)—यह महायान संप्रदाय का सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसमें बौद्ध दर्शन का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।
  5. अवदान पुस्तकें (The Avadana Books)—ये वह पुस्तकें हैं जिनमें महायान संप्रदाय से संबंधित बौद्ध संतों, पवित्र पुरुषों एवं स्त्रियों की नैतिक एवं बहादुरी के कारनामों का विस्तारपूर्वक वर्णन दिया गया है। दिव्यावदान तथा अवदान शतक इस श्रेणी की प्रसिद्ध रचनाएँ हैं।
  6. बौद्धचरित (The Buddhacharita)-इस प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना महान् कवि अश्वघोष ने की थी। इसमें महात्मा बुद्ध के जीवन को एक महाकाव्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
  7. सौंदरानन्द (The Saundrananda)-इस ग्रंथ की रचना भी अश्वघोष ने की थी। यह एक उच्च कोटि का ग्रंथ है। इसमें महात्मा बुद्ध के जीवन से संबंधित उन घटनाओं का विवरण विस्तारपूर्वक दिया गया है जिन का बुद्धचरित में संक्षेप अथवा बिल्कुल वर्णन नहीं किया गया है।
  8. मध्यमकसूत्र (The Madhyamaksutra)-यह प्रसिद्ध बोद्धि नागार्जुन की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना है। इसमें इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि सारा संसार एक भ्रम है।
  9. शिक्षासम्मुचय (The Sikshasamuchchaya)-इस प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना शाँति देव ने की थी। इसमें महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का संकलन दिया गया है। इन्हें अनेक महायानी ग्रंथों से लिया गया हैं।
  10. बौधिचर्यावतार (The Bodhicharyavatara) इसकी रचना भी शांति देव ने की थी। यह कविता के रूप में लिखी गई है। इसमें बोधिसत्व के उच्च आदर्शों का वर्णन किया गया है।

प्रश्न 10. बौद्ध धर्म के उद्भव एवं विकास के बारे में चर्चा कीजिए।
(Discuss the origin and development of Buddhism.)
अथवा
अशोक से पूर्व बुद्ध धर्म द्वारा की गई उन्नति के विषय में संक्षिप्त परंतु भावपूर्ण चर्चा कीजिए।
(Discuss in brief, but meaningful the progress made by Buddhism befare Ashoka.)
अथवा
सम्राट अशोक से पहले बौद्ध धर्म की स्थिति बताइए।
(Describe the position of Buddhism’before Samrat Ashoka.)
अथवा
महाराजा अशोक तक बौद्ध धर्म ने जो विकास किया उसके संबंध में विस्तृत जानकारी दें।
(Describe in detail the progress made by Buddhism till the time of King Ashoka.)
अथवा
बौद्ध धर्म के आंदोलन की उत्पत्ति तथा विकास की जानकारी अशोक से पूर्व काल की ब्यान करें।
(Give introductory information about origin and expansion of Buddhism before Ashoka.)
अथवा
बौद्ध धर्म के उद्गम तथा विकास के विषय में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the origin and development of Buddhism ?)
अथवा
बौद्ध धर्म के उद्गम तथा विकास के बारे में एक विस्तृत नोट लिखें।
(Write a detailed note on the origin and development of Buddhism.)
अथवा
अशोक से पूर्व बौद्ध धर्म की उन्नति के बारे में व्याख्या करें।
(Explain the development of Buddhism before Ashoka.)
उत्तर-

I. बौद्ध धर्म का उद्भव ‘ (Origin of Buddhism)
छठी शताब्दी ई०पू० में भारत के हिंदू समाज एवं धर्म में अनेक अंध-विश्वास तथा कर्मकांड प्रचलित थे। पुरोहित वर्ग ने अपने स्वार्थी हितों के कारण हिंदू धर्म को अधिक जटिल बना दिया था। अतः सामान्यजन इस धर्म के विरुद्ध हो गए थे। इन परिस्थितियों में भारत में कुछ नए धर्मों का जन्म हुआ। इनमें से बौद्ध धर्म सर्वाधिक प्रसिद्ध था। इस धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध थे। इस धर्म के उद्भव के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इन कारणों का संक्षेप वर्णन निम्न अनुसार है:—

  1. हिंदू धर्म में जटिलता (Complexity in the Hindu Religion)-ऋग्वैदिक काल में हिंदू धर्म बिल्कुल सादा था। परंतु कालांतर में यह धर्म अधिकाधिक जटिल होता चला गया। इसमें अंध-विश्वासों और कर्मकांडों का बोलबाला हो गया। यह धर्म केवल एक बाहरी दिखावा मात्र बनता जा रहा था। उपनिषदों तथा अन्य वैदिक ग्रंथों का दर्शन साधारण लोगों की समझ से बाहर था। लोग इस तरह के धर्म से तंग आ चुके थे। वे एक ऐसे धर्म की इच्छा करने लगे जो अंध-विश्वासों से रहित हो और उनको सादा जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दे सके। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ० सतीश के० कपूर के शब्दों में,
    “हिंदू समाज ने अपना प्राचीन गौरव खो दिया था और यह अनगिनत कर्मकांडों तथा अंधविश्वासों से ग्रस्त था।”1
  2. खर्चीला धर्म (Expensive Religion)-आरंभ में हिंदू धर्म अपनी सादगी के कारण लोगों में अत्यंत प्रिय था। उत्तर वैदिक काल के पश्चात् इसकी स्थिति में परिवर्तन आना शुरू हो गया। यह अधिकाधिक जटिल होता चला गया। इसका कारण यह था कि अब हिंदू धर्म में यज्ञों और बलियों पर अधिक जोर दिया जाने लगा था। ये यज्ञ कईकई वर्षों तक चलते रहते थे। इन यज्ञों पर भारी खर्च आता था। ब्राह्मणों को भी भारी दान देना पड़ता थ। इन यज्ञों के अतिरिक्त अनेक ऐसे रीति-रिवाज प्रचलित थे, जिनमें ब्राह्मणों की उपस्थिति आवश्यक होती थी। इन अवसरों पर भी लोगों को काफी धन खर्च करना पड़ता था। इस तरह के खर्च लोगों की पहुँच से बाहर थे। परिणामस्वरूप वे इस धर्म के विरुद्ध हो गए।
  3. ब्राह्मणों का नैतिक पतन (Moral Degeneration of the Brahmanas)-वैदिक काल में ब्राह्मणों का जीवन बहुत पवित्र और आदर्शपूर्ण था। समय के साथ-साथ उनका नैतिक पतन होना शुरू हो गया। वे भ्रष्टाचारी, लालची तथा धोखेबाज़ बन गए थे। वे अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए साधारण लोगों को किसी न किसी बहाने मूर्ख बना कर उनसे अधिक धन बटोरने में लगे रहते थे। इसके अतिरिक्त अब उन्होंने भोग-विलासी जीवन व्यतीत करना आरंभ कर दिया था। इन्हीं कारणों से लोग समाज में ब्राह्मणों के प्रभाव से मुक्त होना चाहते थे।
  4. जाति-प्रथा (Caste System)-छठी शताब्दी ई० पू० तक भारतीय समाज में जाति-प्रथा ने कठोर रूप धारण कर लिया था। ऊँची जातियों के लोग जिन्हें द्विज भी कहा जाता था, शूद्रों के साथ जानवरों से भी अधिक क्रूर व्यवहार करते थे। वे उनकी परछाईं मात्र पड़ जाने से स्वयं को अपवित्र समझने लगते थे। शूद्रों को मंदिरों में जाने, वैदिक साहित्य पढ़ने, यज्ञ करने, कुओं से पानी भरने आदि की आज्ञा नहीं थी। ऐसी परिस्थिति से तंग आकर शूद्र किसी अन्य धर्म के पक्ष में हिंदू धर्म छोड़ने के लिए तैयार हो गए।
  5. कठिन भाषा (Difficult Language)-संस्कृत भाषा के कारण भी इस युग के लोगों में बेचैनी बढ़ गई थी। इस भाषा को बहुत पवित्र माना जाता था, परंतु कठिन होने के कारण यह साधारण लोगों की समझ से बाहर थी। उस समय लिखे गए सभी धार्मिक ग्रंथ जैसे-वेद, उपनिषद्, ब्राह्मण-ग्रंथ, रामायण, महाभारत आदि संस्कृत भाषा में रचित थे। साधारण लोग इन धर्मशास्त्रों को पढ़ने में असमर्थ थे। ब्राह्मणों ने इस स्थिति का लाभ उठा कर धर्मशास्त्रों की मनमानी व्याख्या करनी शुरू कर दी। अतः धर्म का वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने के लिए लोग एक ऐसे धर्म की इच्छा करने लगे जिसके सिद्धांत जन-साधारण की भाषा में हों।
  6. जादू-टोनों में विश्वास (Belief in Charms and Spells)-छठी शताब्दी ई० पू० में लोग बहुत अंधविश्वासी हो गए थे। वे भूत-प्रेतों तथा जादू-टोनों में अधिक विश्वास करने लगे थे। उनका विचार था कि जादूटोनों की सहायता से शत्रुओं पर विजय प्राप्त की जा सकती है, रोगों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है और संतान की प्राप्ति की जा सकती है। जागरूक व्यक्ति समाज को ऐसे अंधविश्वासों से मुक्ति दिलाने के लिए किसी नए धर्म की राह देखने लगे।
  7. महापुरुषों का जन्म (Birth of Great Personalities)-छठी शताब्दी ई० पू० में अनेक महापुरुषों का जन्म हुआ। उन्होंने अंधकार में भटकं रही मानवता को एक नया मार्ग दिखाया। इनमें महावीर तथा महात्मा बुद्ध के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। इनकी सरल शिक्षाओं से प्रभावित होकर बहु-संख्या में लोग उनके अनुयायी बन गए थे। इन्होंने बाद में जैन धर्म और बौद्ध धर्म का रूप धारण कर लिया। जैन धर्म तथा बौद्ध धर्म का उल्लेख करते हुए बी० पी० शाह
    और के० एस० बहेरा लिखते हैं,
    “वास्तव में जैन धर्म तथा बौद्ध धर्म के उदय ने लोगों में एक नया उत्साह भर दिया और उनके सामाजिक तथा धार्मिक जीवन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किया।”2

1. “ The Hindu society had lost its splendour and was plagued with multifarious rituals and superstitions.” Dr. Satish K. Kapoor, The Legacy of Buddha (Chandigarh: The Tribune : April 4, 1977) p. 5.
2. “In fact, birth of Jainism and Buddhism gave a new impetus to the people and significantly moulded social and religious life.” B.P. Saha and K.S. Behera, Ancient History of India (New Delhi : 1988) p. 107.

II. बौद्ध धर्म का विकास
(Development of Buddhism)
महात्मा बुद्ध के अथक प्रयासों के कारण उनके जीवन काल में ही बौद्ध धर्म की नींव पूर्वी भारत में मज़बूत हो चुकी थी। उनके निर्वाण के पश्चात् बौद्ध संघों ने महात्मा बुद्ध के सिद्धांतों को एकत्र करने, संघ से संबंधित नवीन नियम बनाने तथा बौद्ध धर्म के प्रसार के उद्देश्य से समय-समय पर चार महासभाओं का आयोजन किया। इन महासभाओं के आयोजन में विभिन्न शासकों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म न केवल भारत अपितु विदेशों में भी फैला।

  1. प्रथम महासभा 487 ई० पू० (First Great Council 487 B.C.)-महात्मा बुद्ध के निर्वाण प्राप्त करने के शीघ्र पश्चात् ही 487 ई० पू० राजगृह में बौद्ध भिक्षुओं की प्रथम महासभा का आयोजन किया गया। राजगृह मगध के शासक अजातशत्रु की राजधानी थी। अजातशत्रु के संरक्षण में ही इस महासभा का आयोजन किया गया था। इस महासभा को आयोजित करने का उद्देश्य महात्मा बुद्ध के प्रमाणिक उपदेशों को एकत्र करना था। इस महासभा में 500 बौद्ध भिक्षुओं ने भाग लिया था। इस महासभा की अध्यक्षता महाकश्यप ने की थी। इस महासभा में त्रिपिटकोंविनयपिटक, सुत्तपिटक तथा अभिधम्मपिटक की रचना की गई। विनयपिटक में बौद्ध भिक्षुओं संबंधी नियम, सुत्तपिटक में महात्मा बुद्ध के उपदेश तथा अभिधम्मपिटक में बौद्ध दर्शन का वर्णन किया गया है। त्रिपिटकों के अतिरिक्त आरोपों की छानबीन करके महात्मा बुद्ध के परम शिष्य आनंद को दोष मुक्त कर दिया गया जबकि सारथी चन्न को उसके उदंड व्यवहार के कारण दंडित किया गया।
  2. दूसरी महासभा 387 ई० पू० (Second Great Council 387 B.C.)-प्रथम महासभा के ठीक 100 वर्षों के पश्चात् 387 ई० पू० में बौद्ध भिक्षुओं की दूसरी महासभा का आयोजन वैशाली में किया गया। इस महासभा का आयोजन मगध शासक कालाशोक ने किया था। इस महासभा में 700 भिक्षुओं ने भाग लिया था। इस महासभा की अध्यक्षता सभाकामी ने की थी। इस सभा का आयोजन करने का कारण यह था कि बौद्ध संघ से संबंधित दस नियमों ने भिक्षुओं में मतभेद उत्पन्न कर दिए थे। इन नियमों के संबंध में काफी दिनों तक वाद-विवाद चलता रहा, किंतु भिक्षुओं के मतभेदूर न हो सके। परिणामस्वरूप बौद्ध भिक्षु दो संप्रदायों में बंट गए। इनके नाम स्थविरवादी अथवा थेरावादी एवं महासंघिक थे। स्थविरवादी नवीन नियमों के विरुद्ध थे। वे बुद्ध के नियमों में कोई परिवर्तन नहीं चाहते थे। महासंघिक परंपरावादी नियमों में कुछ परिवर्तन करना चाहते थे ताकि बौद्ध संघ के अनुशासन की कठोरता को कुछ कम किया जा सके। इस महासभा में स्थविरवादियों की विजय हुई तथा महासंघिक भिक्षुओं को निकाल दिया गया।
  3. तीसरी महासभा 251 ई० पू० (Third Great Council 251 B.C.)-दूसरी महासभा के आयोजन के बाद बौद्ध धर्म 18 शाखाओं में विभाजित हो गया था। इनके आपसी मतभेदों के कारण बौद्ध धर्म की उन्नति को गहरा धक्का लगा। बौद्ध धर्म की पुनः प्रगति के लिए तथा इस धर्म में आई कुप्रथाओं को दूर करने के उद्देश्य से महाराजा अशोक ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र में 251 ई० पू० में बौद्ध भिक्षुओं की तीसरी महासभा का आयोजन किया। इस महासभा में 1000 बौद्ध भिक्षुओं ने भाग लिया। इस महासभा की अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की थी। यह महासभा 9 माह तक चलती रही। यह महासभा बौद्ध धर्म में आई अनेक कुप्रथाओं को दूर करने में काफी सीमा तक सफल रही। इस महासभा से थेरावादी भिक्षुओं के सिद्धांतों को न मानने वाले भिक्षुओं को निकाल दिया गया था। इस महासभा में कथावथु नामक ग्रन्थ की रचना की गई। इस महासभा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण निर्णय विदेशों में बौद्ध प्रचारकों को भेजना था।
  4. चौथी महासभा 100 ई० (Fourth Great Council 100 A.D.)-महाराजा अशोक की मृत्यु के पश्चात् बौद्ध भिक्षुओं के मतभेद पुनः बढ़ गए थे। इन मतभेदों को दूर करने के उद्देश्य से कुषाण शासक कनिष्क ने जालंधर में आयोजन किया था। ईस महासभा में 500 बौद्ध भिक्षुओं ने भाग लिया था। इस महासभा की अध्यक्षता वसुमित्र ने की थी। वसुमित्र ने महाविभाष नामक ग्रंथ की रचना की जिसे बौद्ध धर्म का विश्वकोष कहा जाता है। इस महासभा में सम्मिलित एक अन्य विद्वान् अश्वघोष ने बुद्धचरित नामक ग्रंथ की रचना की। इसमें महात्मा बुद्ध के जीवन का वर्णन किया गया है। इस महासभा में मतभेदों के कारण बौद्ध धर्म दो प्रमुख संप्रदायों हीनयान तथा महायान में विभाजित हो गया। कनिष्क ने महायान संप्रदाय का समर्थन किया।

प्रश्न 11. बौद्ध धर्म के विकास में महाराजा अशोक ने शसक्त भूमिका निभाई। प्रकाश डालिए।
(Maharaja Ashoka performed a strong role for the development of Buddhism. Elucidate.)
अथवा
महाराजा अशोक ने बुद्ध धर्म के विकास में क्या योगदान दिया ?
(What contribution Maharaja Ashoka made for the development of Buddhism ? Discuss.)
अथवा
महाराजा अशोक के समय बौद्ध धर्म के विकास के बारे में चर्चा कीजिए।
(Discuss the development made by Buddhism during the time of Maharaja Ashoka.)
अथवा
बौद्ध धर्म के विकास में अशोक के योगदान के बारे में प्रकाश डालें।
(Throw light on the contribution of Ashoka to the spread of Buddhism.)
अथवा
बौद्ध धर्म के विकास में राजा अशोक की भूमिका का वर्णन करें।
(Discuss the role of Emperor Ashoka in the development of Buddhism. )
अथवा
बौद्ध धर्म के विकास में राजा अशोक का क्या योगदान था ? (Discuss the contribution of Emperor Ashoka in the spread of Buddhism.)
अथवा
बौद्ध धर्म के विकास में राजा अशोक के योगदान का वर्णन करें। (Discuss the contribution of Ashoka in the spread of Buddhism.)
अथवा
बौद्ध धर्म के विकास के लिए अशोक द्वारा की गई सेवाओं का वर्णन कीजिए।
(Describe the services rendered by Ashoka to the development of Buddhism.)
अथवा
अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए किन साधनों का प्रयोग किया ? (What methods were adopted by Ashoka to the spread Buddhism ?)
अथवा
महाराजा अशोक ने बौद्ध धर्म का फैलाव कैसे किया ? (How did Emperor Ashoka spread Buddhism ?)
अथवा
बौद्ध धर्म के प्रसार का वर्णन करें।
(Describe the spread of Buddhism.)
अथवा
“महाराजा अशोक के समय बौद्ध धर्म अधिक विकसित हुआ।” प्रकाश डालिए।
(“Buddhism was more developed during the period of Maharaja Ashoka.” Elucidate.)
उत्तर-अशोक का नाम न केवल भारतीय बल्कि संसार के इतिहास में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए बहुत प्रसिद्ध है। यह उसके अथक यत्नों का ही परिणाम था कि बौद्ध धर्म शीघ्र ही संसार का सबसे लोकप्रिय धर्म बन गया। डॉक्टर डी० सी० सरकार के शब्दों में,
“अशोक बौद्ध धर्म का संरक्षक था तथा वह इस धर्म को जो कि पूर्वी भारत का एक स्थानीय धर्म था को संसार के सर्वाधिक प्रसिद्ध धर्मों में से एक बनने के लिए जिम्मेवार था।”10

  1. निजी उदाहरण (Personal Example)- अशोक के मन पर कलिंग के युद्ध के समय हुए रक्तपात ने गहरा प्रभाव डाला। परिणामस्वरूप अशोक ने हिंदू धर्म को छोड़ कर बौद्ध धर्म को अपना लिया। इस धर्म को फैलाने के लिए अशोक ने लोगों के आगे निजी उदाहरण प्रस्तुत किया। उसने महल की सभी सुख-सुविधाएँ त्याग दी। उसने मांस खाना तथा शिकार खेलना बंद कर दिया। उसने युद्धों से सदा के लिए तौबा कर ली तथा शांति व प्रेम की नीति अपनाई। इस प्रकार अशोक द्वारा बौद्ध धर्म के सिद्धांतों को अपनाने के कारण उसकी प्रजा पर गहरा प्रभाव पड़ा और वह उसके पद चिंहों पर चलने का प्रयास करने लगी।
  2. बौद्ध धर्म को राज्य धर्म घोषित करना (Buddhism was declared as the State Religion)अशोक ने बौद्ध धर्म को अधिक लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से उसको राज्य धर्म घोषित कर दिया। परिणामस्वरूप लोग बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म में सम्मिलित होने आरंभ हो गए। इसका कारण यह था कि उस समय लोग अपने राजा का बहुत सम्मान करते थे तथा उसकी आज्ञा को मानने में वे अपना गर्व समझते थे।
  3. प्रशासनिक पग (AdministrativeSteps)-अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रसार करने के लिए कुछ प्रशासनिक पग भी उठाए। उसने धार्मिक उत्सवों के दौरान दी जाने वाली जानवरों की बलि पर पाबंदी लगा दी। उसने राजकीय रसोईघर में भी किसी प्रकार के जानवरों की हत्या की मनाही कर दी। इसके अतिरिक्त उसने वर्ष में 56 ऐसे दिन निश्चित किए जब जानवरों को मारा नहीं जा सकता था। वह समय-समय पर बुद्ध की शिक्षाओं संबंधी निर्देश जारी करता था। उसने अपने कर्मचारियों को भी लोगों की अधिक से अधिक सेवा करने के आदेश जारी किए।
  4. व्यापक प्रचार (Wide Publicity)-अशोक के बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए इसका व्यापक प्रचार करवाया। बौद्ध धर्म के सिद्धांतों को शिलालेखों, चट्टानों, पत्थरों आदि पर खुदवाया। इनको राज्य की प्रसिद्ध सड़कों तथा विशेष स्थानों पर रखा गया ताकि आने-जाने वाले लोग इनको अच्छी तरह पढ़ सकें। इस प्रकार सरकारी प्रचार भी बौद्ध धर्म को लोकप्रिय बनाने में सहायक सिद्ध हुआ।
  5. धर्म यात्राएँ (Dharma Yatras)-अशोक ने बुद्ध के जीवन से संबंधित सभी स्थानों की यात्रा की। वह लुंबिनी जहां बुद्ध का जन्म हुआ, बौद्ध गया जहाँ बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ, सारनाथ जहाँ बुद्ध ने सबसे पहले प्रवचन दिया था, कुशीनगर जहाँ बुद्ध का निर्वाण (मृत्यु) हुआ, के पवित्र स्थानों पर गया। अशोक की इन यात्राओं के कारण बौद्ध धर्म का गौरव और बढ़ गया।
  6. धर्म महामात्रों की नियुक्ति (Appointment of Dharma Mahamatras)- अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए महामात्र नामक कर्मचारी नियुक्त किए। इन्होंने बौद्ध धर्म का प्रचार करने में कोई प्रयास शेष न छोड़ा। इस कारण बौद्ध धर्म को एक नई प्रेरणा मिली।
  7. विहारों तथा स्तूपों का निर्माण (Building of Viharas and Stupas)-अशोक ने राज्य भर में विहारों (बौद्ध मठों) का निर्माण करवाया। यहाँ आने वाले बौद्ध विद्वानों तथा विद्यार्थियों को राज्य की ओर से खुला संरक्षण दिया गया। इसके अतिरिक्त सारे राज्य में हज़ारों स्तूपों का भी निर्माण किया गया। इन स्तूपों में बुद्ध की निशानियाँ रखी जाती थीं। इन कारणों से बौद्ध धर्म अधिक लोकप्रिय हो सका।
  8. लोक कल्याण के कार्य (Works of Public Welfare)-बौद्ध धर्म को अपनाने के बाद अशोक ने अपना सारा जीवन लोगों के दिलों को जीतने में लगा दिया। प्रजा की सुविधा के लिए अशोक ने सड़कें बनवाईं तथा इसके किनारों पर छायादार वृक्ष लगवाए। पानी पीने के लिए कुएँ खुदवाए। यात्रियों की सुविधा के लिए राज्य भर में सराएँ बनाई गईं। अशोक ने न केवल मनुष्यों के लिए अपितु पशुओं के लिए अस्पताल खुलवाए। अशोक के इन कार्यों के कारण बौद्ध धर्म को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से फैलने का अवसर मिला।।
  9. तीसरी बौद्ध सभा (Third Buddhist Council)- अशोक ने बौद्ध धर्म में चल रहे आपसी मतभेदों को दूर करने के लिए 251 ई० पू० पाटलिपुत्र में बौद्ध धर्म की तीसरी महासभा बुलवाई। इस सभा में अनेक बौद्ध भिक्षुओं ने भाग लिया। मोग्गलिपुत्त तिस्स इस सभा का अध्यक्ष था। यह सभा लगभग 9 माह तक चलती रही। इस सभा में बौद्धों का एक नया ग्रंथ कथावथु लिखा गया। यह सभा बौद्ध भिक्षुओं में एक नया जोश भरने में सफल रही तथा उन्होंने बौद्ध धर्म का प्रचार अधिक ज़ोर-शोर से करना आरंभ कर दिया।
  10. विदेशों में प्रचार (Foreign Missions)-अशोक ने विदेशों में भी बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए अपने प्रचारक भेजे। ये प्रचारक श्रीलंका, बर्मा (म्यनमार), नेपाल, मिस्र व सीरिया आदि देशों में गए। अशोक ने अपनी पुत्री संघमित्रा तथा पुत्र महेंद्र को श्रीलंका में प्रचार करने के लिए भेजा था। इन प्रचारकों का लोगों के दिलों पर गहरा प्रभाव पड़ा तथा वे बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म में सम्मिलित हुए। डॉक्टर आर० सी० मजूमदार का यह कहना पूर्णत: ठीक है,
    “वह (अशोक) एक मार्ग-दर्शक के रूप में प्रकट हुआ जो बुद्ध के संदेश को एक गाँव से दूसरे गाँव, एक नगर से दूसरे नगर, एक प्रांत से दूसरे प्रांत, एक देश से दूसरे देश तथा एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक ले गया।”11

10. “Ashoka was a patron of the Buddha’s doctrine and was responsible for raising Buddhism for the status of a local secretarian creed of Eastern India to that of one of the principal religions of the world.” Dr. D.C. Sircar, Inscriptions of Ashoka (Delhi : 1957) p. 17.
11. “He appeared as the torch bearer, who led the gospel from village to village, from city to city, from province to province, from country to country and from continent to continent.” Dr. R.C. Majumdar, Ancient India (Delhi : 1971) p. 165.

प्रश्न 12. बौद्ध धर्म की भारतीय सभ्यता को क्या देन है ? (What is the legacy of Buddhism to Indian Civilization ?)
अथवा
बौद्ध धर्म की देन का वर्णन करें। (Discuss the legacy of Buddhism.)
उत्तर-यद्यपि बौद्ध धर्म भारत से लुप्त हो चुका है, परंतु जो देन इसने भारतीय सभ्यता और संस्कृति को दी है। उसको कभी भुलाया नहीं जा सकता। बौद्ध धर्म ने भारत को कई क्षेत्रों में बड़ी गौरवपूर्ण धरोहर प्रदान की।

  1. राजनीतिक प्रभाव (Political Impact)—बौद्ध धर्म ने भारत में राजनीतिक स्थिरता, शांति तथा परस्पर एकता बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। बौद्ध धर्म के अहिंसा तथा शांति के सिद्धांतों से उस समय के शक्तिशाली शासक बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने युद्धों का त्याग कर दिया और अपना समय प्रजा के कल्याण में लगा दिया। इससे जहां राज्य में शांति स्थापित हुई वहाँ प्रजा काफी समृद्ध हो गई। अशोक तथा कनिष्क जैसे शासकों ने विदेशों में बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए अपने प्रचारक भेजे। इससे भारत तथा इन देशों में मित्रता स्थापित हुई, परंतु बौद्ध धर्म के अहिंसा के सिद्धांत का भारत के राजनीतिक क्षेत्र में कुछ विनाशकारी प्रभाव भी पड़ा। युद्धों में भाग न लेने के कारण भारतीय सेना बहत दुर्बल हो गई। इस लिए जब बाद में भारतीयों को विदेशी आक्रमणों का सामना करना पड़ा तो उनकी हार हुई। इस पराजयों के कारण भारतीयों ने अपनी स्वतंत्रता गंवा ली और उन्हें चिरकाल तक दासता का जीवन व्यतीत करना पड़ा।
  2. धार्मिक प्रभाव (Religious Impact)—बौद्ध धर्म की धार्मिक क्षेत्र में देन भी बड़ी महत्त्वपूर्ण थी1 बौद्ध धर्म के उदय से पूर्व हिंदू धर्म में अनेक कुप्रथाएँ प्रचलित थीं। लोग धर्म के वास्तविक रूप को भूलकर कर्मकांडों, पाखंडों, यज्ञों, हवनों तथा बलि आदि के चक्करों में फंसे हुए थे। समाज में ब्राह्मणों का बोलबाला था। उनके बिना कोई धार्मिक कार्य पूरा नहीं समझा जाता था, परंतु उस समय ब्राह्मण बहुत लालची तथा भ्रष्टाचारी हो चुके थे। उनका मुख्य उद्देश्य लोगों को किसी-न-किसी बहाने लूटना था। वे लोगों का सही मार्गदर्शन करने की अपेक्षा स्वयं भोग-विलास में डूबे रहते थे। इस प्रकार हिंदू धर्म केवल एक आडंबर बनकर रह गया था। महात्मा बुद्ध ने हिंदू धर्म में प्रचलित इन कुप्रथाओं का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उनका कहना था कि कोई भी व्यक्ति बिना ब्राह्मणों के सहयोग से अपने धार्मिक कार्य संपन्न कर सकता है। उन्होंने संस्कृत भाषा की पवित्रता का भी खंडन किया। इस लिए काफी संख्या में लोग हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म में सम्मिलित होने लगे। इसीलिए हिंदू धर्म ने अपनी लोकप्रियता को बनाए रखने के लिए अनेक आवश्यक सुधार किए। महात्मा बुद्ध के निर्वाण के पश्चात् बौद्ध धर्म के अनुयायियों ने महात्मा बुद्ध तथा बोधिसत्वों की सुंदर मूर्तियां निर्मित करके उनकी पूजा आरंभ कर दी। इस प्रकार बौद्ध धर्म ने भारत में मूर्ति-पूजा का प्रचलन किया जो आज तक जारी है।
  3. सामाजिक प्रभाव Scial Inpact)— सामाजिक क्षेत्र में बौद्ध धर्म की देन बहुत प्रशंसनीय है। बौद्ध धर्म के उदय से पहले हिंद धर्म में जाति प्रथा वही जटिल हो गई थी ! एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से घृणा करते थे। शूद्र मो: न्यास किए जा थे; मात्मा बुद्ध ने जाति प्रथा के विरुद्ध जोरदार प्रचार किया। उन्होंने अपने अनुयाः ” संदेश दिया। महात्मा बुद्ध ने अपने धर्म में सभी जातियों और वर्गों को सम्मिलित क: भारतीय समाज को एक नया रूप प्रदान किया। निम्न वर्ग के लोगों को भी समाज में प्रगति करने का अवसरमा बौद्ध धर्म के प्रभावाधीन गों ने माँस-भक्षण, मदिरापान तथा अन्य नशों का सेवन बंद कर दिया और उन्नत तथा पत्र जीवन व्यती या आरंभ कर दिया। कालांतर में जब हिंदू धर्म पुनः लोकप्रिय होना आरंभ तुना तो बहुत से लोग बौद्ध धर्म को छोड़कर पुनः हिंदू धर्म में आ गए। इससे हिंदू समाज में कई जातियों तथा उप-जातियः अस्तित्व में आई।
  4. सांस्कृतिक प्रभाव : (Cultural Impact)—सांस्कृतिक क्षेत्र में बौद्ध धर्म ने भारत को बहुत ही महत्त्वपूर्ण देन दी। बौद्ध संघों द्वारा न केवल बौद्ध धर्म का प्रचार किया जाता था, अपितु ये शक्षा देने के विख्यात केंद्र भी बन गए। तक्षशिला, नालंदा और त्रिक्रर्माणला नामक बौद्ध विश्वविद्यालयों ने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की। इन विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए बड़ी संख्या में छात्र विदेशों से भी आते थे। बौद्ध विद्वानों द्वारा रचित ग्रंथों जैसे त्रिपिटक, जातक, बुद्धचरित, महाविभास, मिलिंद पहो, सौंदरानंद. ललित विस्तार तथा महामंगल सूत्र इत्यादि ने भातीय साहित्य में बहुमूल्य वृद्धि की। भवन निर्माण कला और मूर्तिकला के क्षेत्रों में बौद्ध धर्म की देन को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। अशोक तथा कनिष्क के राज्य काल में भारत में बड़ी संख्या में स्तूपों तथा विहारों का निर्माण हुआ। महाराजा अशोक द्वारा निर्मित करवाए गए साँची तथा भरहुत स्तूपों की सुंदर कला को देख कर व्यक्ति चकित रह जाता है। कनिष्क के समय गांधार और मथुरा कली का विकास हुआ। इस समय महात्मा बुद्ध तथा बोधिसत्वों की अति सुंदर मूर्तियाँ निर्मित की गईं। इन मतियों को देख कर उस समय भूर्तिकला के क्षेत्र में हुई अद्वितीय उन्नति की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। अजंता तथा जाप की फाओं को देखकर चित्रकला के क्षेत्र में उस समय हुए विकास का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। समय-समय पर बौद्ध भिक्षु धर्म प्रचार करने के लिए विदेशों जैसे-चीन, जापान, श्रीलंका, बर्मा (म्यांमार). इंडानशिया, जावा, सुमात्रा तथा तिब्बत आदि देशों में जाते रहे। इससे न केवल इन देशों में बौद्ध धर्म फैला, अपितु भारतीय संस्कृति का विकास भी हुआ। आज भी इन देशों में कई भारतीय प्रथाएँ प्रचलित हैं। निस्संदेह यह भारतीयों के लिए एक बहुत ही गर्व की बात है। अंत में हम डॉक्टर एस० राधाकृष्णन के इन शब्दों से सहमत हैं,
    “बौद्ध धर्म ने भारतीय संस्कृति पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। इसका प्रभाव सभी ओर देखा जा सकता है।”12

12. Buddhisni da leti pemanen’ mark on the culture of India. Its influence is visible on all sides.” Dr. S. Radhakrishnan, Indian Philosophy Deihi: 1962) p.608.

SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. बौद्ध धर्म का उत्थान। (Emergence of Buddhism.)
उत्तर-6वीं सदी ई० पूर्व हिंदू समाज तथा धर्म में अनगिनत कुरीतियाँ प्रचलित थीं। जाति प्रथा बहुत कठोर रूप धारण कर गई थी। शूद्रों के साथ जानवरों से भी अधिक बुरा व्यवहार किया जाता था। अब लड़की का जन्म लेना दु:ख का कारण समझा जाता था। लोगों में अनेक अंध-विश्वास प्रचलित थे। यज्ञों तथा बलियों के कारण हिंदू धर्म बहुत खर्चीला हो गया था। ब्राह्मण बहुत भ्रष्टाचारी तथा धोखेबाज़ हो गए थे। हिंदू धर्म अब केवल एक बाहरी दिखावा बन कर रह गया था। इन कारणों से बौद्ध धर्म का उत्थान हुआ।

प्रश्न 2. महात्मा बुद्ध के जीवन की संक्षिप्त जानकारी दीजिए। (Give a short account of the life of Lord Buddha.)
उत्तर- महात्मा बुद्ध, बौद्ध धर्म के संस्थापक थे। उनका जन्म 566 ई० पू० में लुंबिनी में हुआ। उनके माता जी का नाम महामाया तथा पिता का नाम शुद्धोधन था। आप का विवाह यशोधरा से हुआ था। आपने 29 वर्ष की आयु में घर त्याग दिया था। 35 वर्ष की आयु में आपको बौद्ध गया में ज्ञान प्राप्त हुआ था। आपने 45 वर्ष तक अपने धर्म का प्रचार किया था। मगध, कौशल, कौशांबी, वैशाली तथा कपिलवस्तु आप के प्रचार के प्रसिद्ध केंद्र थे। 486 ई० पू० में कुशीनगर में आपने निर्वाण प्राप्त किया।

प्रश्न 3. लुंबिनी। (Lumbini.)
उत्तर-लुंबिनी भारत में बौद्ध धर्म के सर्वाधिक पवित्र स्थानों में से एक है। यह स्थान नेपाल की तराई में भारत-नेपाल सीमा से लगभग 10 किलोमीटर दूर भैरवा जिले में स्थित है। इसका आधुनिक नाम रुमिनदेई है। यहाँ 566 ई० पू० वैशाख की पूर्णिमा को महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था। इस बालक के जन्म समय देवताओं ने आकाश से फूलों की वर्षा की। महाराजा अशोक ने यहाँ महात्मा बुद्ध की स्मृति में एक स्तंभ बनवाया था। चीनी यात्रियों फाह्यान एवं ह्यनसांग ने अपने वृत्तांतों में इस स्थान का अति सुंदर वर्णन किया है।

प्रश्न 4. बौद्ध गया। , (Bodh Gaya.)
उत्तर-बौद्ध गया का बौद्ध धर्मावलंबियों में वही स्थान है जो हरिमंदिर साहिब, अमृतसर का सिखों में, बनारस का हिंदुओं में एवं मक्का का मुसलमानों में है। यह स्थान बिहार राज्य के गया नगर से लगभग 13 किलोमीटर दक्षिण की ओर स्थित है। यह वह स्थान है जहाँ एक पीपल के वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ (महात्मा बुद्ध) को ज्ञान प्राप्त हुआ था। उस समय सिद्धार्थ की आयु 35 वर्ष थी। यह घटना वैशाख की पूर्णिमा की थी। यहाँ 170 फीट ऊँचा महाबौद्धि मंदिर बना हुआ है।

प्रश्न 5. सारनाथ। (Sarnath.)
उत्तर-सारनाथ बौद्ध धर्मावलंबियों का एक अन्य पवित्र स्थान है। यह स्थान बनारस से लगभग 7 किलोमीटर उत्तर की दिशा की ओर स्थित है। यह वह स्थान है जहाँ महात्मा बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् अपने पुराने पाँच साथियों को प्रथम उपदेश दिया था। इस घटना को बौद्ध इतिहास में धर्मचक्र प्रवर्तन के नाम से स्मरण किया जाता है। यहाँ महाराजा अशोक ने एक प्रसिद्ध स्तंभ बनवाया था। यहाँ से गुप्त काल एवं कुषाण काल की महात्मा बुद्ध की अति सुंदर मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।

प्रश्न 6. चार महान् दृश्य। (Four Major Sights.)
उत्तर-सिद्धार्थ एक दिन अपने सारथि चन्न को लेकर महल से बाहर निकले। रास्ते में उन्होंने एक बूढ़े, एक रोगी, एक अर्थी तथा एक साधु को देखा। इन दृश्यों का सिद्धार्थ के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने जान लिया कि संसार दु:खों का घर है। इसलिए सिद्धार्थ ने घर त्याग देने का निश्चय किया। इस घटना को महान् त्याग कहा जाता है। उस समय सिद्धार्थ की आयु 29 वर्ष की थी।

प्रश्न 7. धर्म-चक्र प्रवर्तन। (Dharm-Chakra Pravartana.)
उत्तर-ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् महात्मा बुद्ध सर्वप्रथम बनारस के निकट सारनाथ पहुंचे। यहाँ उन्होंने प्रथम उपदेश अपने पुराने पाँच साथियों को दिया। वे बुद्ध के अनुयायी बन गए। इस समय महात्मा बुद्ध ने उन्हें चार महान् सत्य तथा अष्ट मार्ग की जानकारी दी। इस घटना को धर्म-चक्र प्रवर्तन कहा जाता है।

प्रश्न 8. महात्मा बुद्ध की शिक्षाएँ। (Teachings of Lord Buddha.)
उत्तर- महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का आधार चार महान् सत्य तथा अष्ट मार्ग हैं। वे आवागमन, कर्म सिद्धांत, अहिंसा, मनुष्य के परस्पर भ्रातृ-भाव में विश्वास रखते थे। उन्होंने अपने अनुयायियों को पवित्र जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित किया। वे जाति प्रथा, यज्ञों, बलियों, वेदों, संस्कृत भाषा और घोर तपस्या में विश्वास नहीं रखते थे। वह परमात्मा संबंधी चुप रहे।

प्रश्न 9. महात्मा बुद्ध के कर्म सिद्धांत के बारे में क्या विचार थे ? (What were Lord Buddha’s views about Karma theory ?)
उत्तर-महात्मा बुद्ध कर्म सिद्धांत में विश्वास रखते थे। उनका विचार था कि मनुष्य स्वयं अपना भाग्य विधाता है। जैसे कर्म मनुष्य करेगा, उसे वैसा ही फल मिलेगा। हमें पिछले कर्मों का फल इस जन्म में मिला है और अब के कर्मों का फल अगले जन्म में मिलेगा। मनुष्य की परछाईं की तरह कर्म उसका पीछा नहीं छोड़ते।

प्रश्न 10. महात्मा बुद्ध के नैतिक संबंधी क्या विचार थे ? (What were Lord Buddha’s views about Morality ?)
उत्तर-महात्मा बुद्ध नैतिकता पर बहुत बल देते थे। उनके विचार से नैतिकता के बिना धर्म एक ढोंग मात्र रह जाता है। नैतिकता के मार्ग पर चलने के लिए महात्मा बुद्ध ने मनुष्यों को ये सिद्धांत अपनाने पर बल दिया—

  1. सदा सत्य बोलो।
  2. चोरी न करो।
  3. नशीले पदार्थों का सेवन न करो।
  4. स्त्रियों से दूर रहो।
  5. ऐश्वर्य के जीवन से दूर रहो।
  6. नृत्य-गान में रुचि न रखो।
  7. धन से दूर रहो।
  8. सुगंधित वस्तुओं का प्रयोग न करो।
  9. झूठ न बोलो और
  10. किसी को कष्ट न पहुँचाओ।

प्रश्न 11. महात्मा बुद्ध के ईश्वर के संबंध में विचार। (Lord Buddha’s .views about God.)
उत्तर-महात्मा बुद्ध ईश्वर के अस्तित्व तथा उसकी सत्ता में विश्वास नहीं रखते थे। उनका कथन था कि संसार की रचना ईश्वर जैसी किसी शक्ति द्वारा नहीं की गई है परंतु वह यह आवश्यक मानते थे कि संसार के संचालन में कोई शक्ति अवश्य काम करती है। इस शक्ति को उन्होंने धर्म का नाम दिया। वास्तव में महात्मा बुद्ध इस संबंध में किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहते थे।

प्रश्न 12. बौद्ध धर्म में निर्वाण से क्या अभिप्राय है ? (What is meant by Nirvana in Buddhism ?)
उत्तर-महात्मा बुद्ध के अनुसार मनुष्य का सबसे बड़ा उद्देश्य निर्वाण प्राप्त करना है। निर्वाण के कारण मनुष्य को सुख, आनंद और शांति की प्राप्ति हो सकती है। उसे आवागमन के चक्कर से सदा के लिए मुक्ति मिल जाती है। यह सभी दुःखों का अंत है। इस स्थिति का शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 13. हीनयान। (Hinyana.)
उत्तर-हीनयान बौद्ध धर्म का एक प्रमुख संप्रदाय था। हीनयान से अभिप्राय है छोटा चक्कर या छोटा रथ। इस संप्रदाय के लोग महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं में किसी भी प्रकार के परिवर्तन के विरुद्ध थे। वे मूर्ति पूजा के विरुद्ध थे। वे बौद्धिसत्व में विश्वास नहीं रखते थे। वे तर्क तथा अष्ट मार्ग में विश्वास रखते थे। उन्होंने अपना प्रचार पाली भाषा में किया। इनके धार्मिक ग्रंथ भिन्न थे।

प्रश्न 14. महायान। (Mahayana.)
उत्तर-महायान बौद्ध धर्म का प्रमुख संप्रदाय था। महायान से अभिप्राय था बड़ा चक्कर या बड़ा रथ। इस संप्रदाय ने बुद्ध की शिक्षाओं में समय अनुसार परिवर्तन किये। वे मूर्ति पूजा और बौद्धिसत्व में विश्वास रखते थे। वे श्रद्धा पर अधिक बल देते थे। वे पाठ-पूजा को धर्म का आवश्यक अंग मानते थे। उन्होंने अपना प्रचार संस्कृत भाषा में किया। इनके धार्मिक ग्रंथ भिन्न थे।

प्रश्न 15. प्रथम बौद्ध सभा। (First Buddhist Council.)
उत्तर-प्रथम बौद्ध सभा का आयोजन 487 ई० पू० मगध के शासक अजातशत्रु द्वारा राजगृह में किया गया था। इसका उद्देश्य महात्मा बुद्ध के प्रमाणित उपदेशों को एकत्रित करना था। इसमें 500 भिक्षुओं ने भाग लिया था। इसका नेतृत्व महाकश्यप ने किया। इसमें त्रिपिटक नाम के ग्रंथ लिखे गए। इस सभा में महात्मा बुद्ध के शिष्य आनंद पर लगाए गए आरोपों की जांच की गई तथा उसे निर्दोष घोषित किया गया।

प्रश्न 16. दूसरी बौद्ध सभा। (Second Buddhist Council.)
उत्तर-दूसरी बौद्ध सभा का आयोजन 387 ई० पू० में मगध के शासक कालाशौक ने वैशाली में किया था। इसका उद्देश्य बौद्ध भिक्षुओं में संघ के नियमों से संबंधित मतभेदों को दूर करना था। इस सभा में 700 भिक्षुओं ने भाग लिया था। इसकी अध्यक्षता सभाकामी ने की थी। इसके द्वारा अपनाए गए दस नियमों के कारण बौद्ध भिक्ष पूर्वी तथा पश्चिमी नाम के दो वर्गों में विभाजित हो गए। पूर्वी भारत के भिक्षु महासंघिक तथा पश्चिम भारत के भिक्षु थेरावादी कहलाए।

प्रश्न 17. तीसरी बौद्ध सभा। (Third Buddhist Council.)
उत्तर-तीसरी बौद्ध सभा का आयोजन सम्राट अशोक ने 251 ई० पू० में पाटलिपुत्र में किया था। इसका उद्देश्य बुद्ध धर्म में आई कुरीतियों को दूर करना था। इसमें 1000 भिक्षुओं ने भाग लिया। इसका नेतृत्व मोग्गलिपुत्त तिस्स ने किया था। उसने कथावथु नामक ग्रंथ तैयार किया था। इस सभा में बौद्ध प्रचारकों को विदेशों में भेजने का निर्णय किया गया। यह सभा बौद्ध धर्म में आई कुरीतियों को काफ़ी सीमा तक दूर करने में सफल रही।

प्रश्न 18. चौथी बौद्ध सभा। (Fourth Buddhist Council.)
अथवा
चतुर्थ बोद्धी कौंसिल क्यों बुलाई गई ? (Why was the Fourth Buddhist Council convened ?)
उत्तर-चौथी बौद्ध सभा का आयोजन सम्राट कनिष्क ने पहली सदी ई० में कश्मीर में किया था। इस सभा का उद्देश्य बौद्ध भिक्षुओं के आपसी मतभेदों को दूर करना था। इसमें 500 भिक्षुओं ने भाग लिया था। इसकी अध्यक्षता वसुमित्र ने की थी। उसने महाविभाष नामक ग्रंथ तैयार किया था। इस सभा के उप-प्रधान अश्वघोष ने बुद्धचरित नाम के प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की थी। इस सभा के प्रयत्नों के परिणामस्वरूप बौद्ध भिक्षुओं में व्याप्त न केवल आपसी मतभेद समाप्त हुए बल्कि यह मध्य एशिया के देशों में भी फैला।

प्रश्न 19. बौद्ध धर्म में संघ से आपका क्या अभिप्राय है ? (What do you understand by Sangha in Buddhism ?)
उत्तर- महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्यों को संगठित करने के लिए बौद्ध संघ की स्थापना की थी। प्रत्येक पुरुष या स्त्री, जिसकी आयु 15 वर्ष से अधिक हो बौद्ध संघ का सदस्य बन सकता था। अपराधियों, रोगियों, ऋणियों तथा दासों को सदस्य बनने की अनुमति नहीं थी। सदस्य बनने से पहले घर वालों से अनुमति लेना आवश्यक था। नए भिक्षु को संघ में प्रवेश के समय मुंडन करवा कर पीले वस्त्र धारण करने पड़ते थे और यह शपथ लेनी पड़ती थी “मैं बुद्ध की शरण लेता हूँ, मैं धर्म की शरण लेता हूँ, मैं संघ की शरण लेता हूँ।” संघ के सदस्यों को कड़ा अनुशासित जीवन व्यतीत करना पड़ता था। प्रत्येक सदस्य को इन नियमों का पालन करना आवश्यक था। संघ के सभी निर्णय बहुमत से लिए जाते थे।

प्रश्न 20. त्रिपिटक। (The Tripitakas.)
उत्तर-बौद्धि साहित्य में त्रिपिटक नामक ग्रंथ को प्रमुख स्थान प्राप्त है। ये पाली भाषा में लिखे गए हैं। इन के नाम विनयपिटक, सुत्तपिटक, अभिधम्मपिटक हैं। विनयपिटक में बौद्ध भिक्षुओं तथा भिक्षुणियों के प्रतिदिन जीवन से संबंधित नियमों का, सुत्तपिटक में बौद्ध धर्म के सिद्धांतों तथा अभिधम्मपिटक में आध्यात्मिक विषयों का वर्णन किया गया है। त्रिपिटक से अभिप्राय तीन टोकरियों से है जिसमें ग्रंथों को संभाल कर रखा जाता था।

प्रश्न 21. अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए क्या यत्न किए ? (What steps were taken by Ashoka to spread Buddhism ?)
उत्तर-अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए इसको राज्य धर्म घोषित किया। उसने स्वयं इस धर्म को ग्रहण किया। बौद्ध धर्म से संबंधित महत्त्वपूर्ण स्थानों की यात्राएँ कीं। धर्म महामात्रों को नियुक्त किया। बौद्ध विहारों तथा स्तूपों का निर्माण करवाया। पाटलिपुत्र में तीसरी बौद्ध सभा का आयोजन किया गया। विदेशों में बौद्ध प्रचारक भेजें।

प्रश्न 22. बौद्ध धर्म के जन्म के क्या कारण थे ? (What were the reasons of origin of Buddhism ?)
उत्तर-6वीं शताब्दी ई०पू० में भारत में बौद्ध धर्म के उद्भव का मुख्य कारण हिंदू धर्म में प्रचलित बुराइयाँ थीं। उत्तर वैदिक काल में ही हिंदू धर्म में यज्ञों एवं व्यर्थ के रीति-रिवाजों पर बल दिया जाने लगा था। इन यज्ञों में बड़ी संख्या में पुरोहित सम्मिलित होते थे। उन्हें काफ़ी दान देना पड़ता था। वास्तव में हिंदू धर्म इतना खर्चीला हो चुका था कि यह साधारण लोगों की समर्था से बाहर हो चुका था। ब्राह्मण वर्ग बहुत भ्रष्ट एवं लालची हो चुका था। वे साधारण लोगों को किसी-न-किसी बहाने मूर्ख बनाकर लूटने में लगे थे। हिंदुओं के सभी ग्रंथ संस्कृत भाषा में थे। अत: ये साधारण लोगों की समझ से बाहर थे। समाज में जाति प्रथा ने काफ़ी जटिल रूप धारण कर लिया था। एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से घृणा करते थे। शूद्रों के साथ घोर अन्याय किया जाता था। परिणामस्वरूप वे किसी अन्य धर्म के पक्ष में अपना धर्म छोड़ने को तैयार हो गए। उस समय के अनेक शासकों ने बौद्ध धर्म को अपना संरक्षण प्रदान किया। अतः यह धर्म तीव्रता से प्रगति करने लगा।

प्रश्न 23. महात्मा बुद्ध पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on Lord Buddha.)
उत्तर-महात्मा बुद्ध, बौद्ध मत के संस्थापक थे। उनका जन्म 566 ई० पू० कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी में हुआ। उनकी माता का नाम महामाया तथा पिता का नाम शुद्धोदन था। उनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। वह बचपन से ही गंभीर स्वभाव के थे। वह एकांत में रहना अधिक पसंद करते थे। 16 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ की शादी एक सुंदर राजकुमारी से कर दी गई। उनके घर एक पुत्र ने जन्म लिया, जिसका नाम राहुल रखा गया। 29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ने घर त्याग दिया तथा वह सत्य की खोज में निकल पड़े। 35 वर्ष की आयु में उन्हें बोध गया में सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हुई। उन्होंने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ में दिया। इस घटना को धर्म चक्र परिवर्तन कहा जाता है। महात्मा बुद्ध इसी तरह 45 वर्षों तक भिन्न-भिन्न स्थानों पर अपने उपदेशों का प्रचार करते रहे। मगध, कौशल, कौशांबी, वैशाली तथा कपिलवस्तु उनके प्रचार के प्रसिद्ध केंद्र थे। महात्मा बुद्ध ने चार महान् सच्चाइयों, अष्ट मार्ग, अहिंसा, परस्पर भ्रातृत्व की भावना का प्रचार किया। वह यज्ञों, बलियों, जाति प्रथा तथा संस्कृत भाषा की पवित्रता में विश्वास नहीं रखते थे। महात्मा बुद्ध ने 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में महापरिनिर्वाण प्राप्त किया।

प्रश्न 24. महात्मा बुद्ध ने कहाँ तथा कैसे ज्ञान प्राप्त किया ? (How and where the Buddha realised Great Enlightenment?)
उत्तर-सिद्धार्थ ने गृह त्याग करने के पश्चात् सच्चे ज्ञान की खोज आरंभ कर दी। इस उद्देश्य से वह सर्वप्रथम मगध की राजधानी राजगृह पहुँचे। यहाँ उन्होंने अरधकलाम तथा उद्रक रामपुत्र नामक दो प्रसिद्ध विद्वानों से ज्ञान के संबंध में शिक्षा प्राप्त की किंतु उनके मन को संतुष्टि न हुई। अतः सिद्धार्थ ने राजगृह छोड़ दिया। वह अनेक वनों तथा दुर्गम पहाडियों को लांघ कर गया के समीप उरुवेला वन में पहुँचे। यहाँ सिद्धार्थ की मुलाकात पाँच ब्राह्मण साधुओं से हुई। इन ब्राह्मणों के कहने पर सिद्धार्थ ने कठोर तपस्या आरंभ कर दी। छः वर्षों की तपस्या के परिणामस्वरूप उनका शरीर सूख कर काँटा हो गया। यहाँ तक कि उनमें दो-चार पग चलने की भी शक्ति न रही। इसके बावजूद उन्हें वांछित ज्ञान नहीं मिल सका। वह इस परिणाम पर पहुँचे कि शरीर को अत्यधिक कष्ट देना निरर्थक है। अतः उन्होंने भोजन ग्रहण किया। इसके पश्चात् सिद्धार्थ ने एक वट वृक्ष के नीचे समाधि लगा ली तथा यह प्रण किया कि जब तक उन्हें ज्ञान प्राप्त नहीं होगा वह वहाँ से नहीं उठेंगे। आठवें दिन वैशाख की पूर्णिमा को सिद्धार्थ को सच्चे ज्ञान को प्राप्ति हुई। अत: सिद्धार्थ को बुद्ध (जागृत) तथागत (जिसने सत्य को पा लिया हो) भी कहा जाने लगा। जिस वृक्ष के नीचे महात्मा बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था उसे महाबौद्धि वृक्ष तथा गया को बौद्ध गया कहा जाने लगा। ज्ञान प्राप्ति के समय महात्मा बुद्ध की आयु 35 वर्ष थी।

प्रश्न 25. महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। , Discuss briefly the teachings of Lord Buddha.)
अथवा
बौद्ध धर्म की कोई पाँच शिक्षाएँ लिखें।
(Write any five teachings of Buddhism.)
उत्तर- महात्मा बुद्ध की शिक्षाएँ बिल्कुल सरल तथा स्पष्ट थीं। उनकी शिक्षाओं का आधार चार महान् सत्य हैं—

  1. संसार दुःखों का घर है।
  2. इन दुःखों का कारण मनुष्य की इच्छाएँ हैं।
  3. इन इच्छाओं को त्यागने से मनुष्य के दुःखों का अंत हो सकता है।
  4. इच्छाओं का अंत अष्ट मार्ग पर चलकर किया जा सकता है।

वह अंहिसा में विश्वास रखते थे। वह कर्म सिद्धांत तथा पुनर्जन्म में विश्वास रखते थे। उनका कथन था मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार ही फल मिलता है। कर्म परछाईं की तरह मनुष्य का पीछा नहीं छोड़ते। महात्मा बुद्ध ने अपने अनुयायियों को सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दी। उन्होंने जाति प्रथा का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने आपसी भाईचारे की भावना का प्रचार किया। उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा की जा रही लूट-खसूट का विरोध किया। उनके अनुसार मनुष्य यज्ञों और बलि देने से निर्वाण (मुक्ति) की प्राप्ति नहीं कर सकता। वह वेदों और संस्कृत भाषा की पवित्रता में विश्वास नहीं रखते थे। वह कठोर तपस्या के पक्ष में नहीं थे। वह परमात्मा के अस्तित्व के बारे में मौन रहे। उनके अनुसार मानव जीवन का परम उद्देश्य निर्वाण प्राप्त करना है।

प्रश्न 26. बौद्ध धर्म के तीन लक्षणों से क्या अभिप्राय है ? (What is meant by Three Marks in Buddhism ?)
उत्तर-महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं में तीन लक्षणों वाला सिद्धांत भी सम्मिलित है। ये तीन लक्षण हैं—

  1. सभी प्रतिबंधित वस्तुएँ स्थायी नहीं (अनित) हैं।
  2. सभी प्रतिबंधित वस्तुएँ दुःख ग्रस्त हैं।
  3. सभी प्रतिबंधित वस्तुएँ आत्मन नहीं अनात्म हैं। यह हमारे रोज़ाना जीवन में आने वाले अनुभव हैं।

महात्मा बुद्ध के अनुसार उत्पन्न हुई प्रत्येक वस्तु का अंत निश्चित है। भाव वह अग्नि (अस्थिर) है। जो अस्थिर है वह दुःखी भी है। मनुष्य का जन्म, बीमारी तथा मृत्यु आदि सभी दुःख के कारण हैं। मनुष्य के जीवन में कुछ खुशी के पल ज़रूर आते हैं किंतु इनका समय बहुत अल्प होता है। अनात्म से भाव है स्वयं का न होना। सभी कुछ जो अस्थिर है वह मेरा नहीं है।

प्रश्न 27. पंचशील पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on Panchshila.)
उत्तर-महात्मा बुद्ध ने प्रत्येक गृहस्थी को पाँच सिद्धांतों का पालन करना आवश्यक बताया है। यह पाँच नियम ये हैं:—

  1. छोटे-से-छोटे जीव की भी हत्या न करो।
  2. मुक्त हृदय से दान दो एवं लो। किंतु लालच तथा धोखे से किसी की वस्तु न लो।
  3. झूठी गवाही न दो, किसी की निंदा न करो तथा न ही झूठ बोलो।
  4. नशीली वस्तुओं से बचें क्योंकि यह आपकी अक्ल पर पर्दा डालती हैं।
  5. किसी के लिए भी बुरे विचार दिल में न लाएँ। शरीर को अयोग्य पापों से बचाएँ। बौद्ध धर्म में प्रवेश करने वाले भिक्षओं एवं भिक्षणिओं को पाँच अन्य नियमों का पालन करने का आदेश दिया गया है।

ये पाँच नियम हैं—

  1. समय पर भोजन खाएँ
  2. नाच-गानों आदि से दूर रहें
  3. नर्म बिस्तरों पर न सोएँ
  4. हार-श्रृंगार तथा सुगंधित वस्तुओं का प्रयोग न करें।
  5. सोने एवं चाँदी के चक्करों में न पड़ें।

प्रश्न 28. बौद्ध धर्म में चार असीम सद्गुणों से क्या अभिप्राय है ? (What is meant by Four Unlimited Virtues in Buddhism ?)
उत्तर-महात्मा बुद्ध ने चार सामाजिक सद्गुणों पर विशेष बल दिया। ये गुण हैं-मित्र भावना, दया, हमदर्दी भरी प्रसन्नता एवं निरपेक्षता। ये हमारे व्यवहार का अन्य मनुष्यों के साथ तालमेल करते हैं। मित्र भावना से भाव दूसरों की सहायता करना है। यह आपसी ईर्ष्या का अंत करती है। मनुष्य को अपने दुश्मनों के साथ भी प्यार करना चाहिए। दया हमें अन्य के दु:ख के समय साथ देने की प्रेरणा देती है। हमदर्दी भरी प्रसन्नता एक ऐसा गुण है जो मनुष्य को अन्य की प्रसन्नता में सम्मिलित होने के योग्य बनाती है। जिस व्यक्ति में यह गुण होता है वह किसी अन्य की प्रसन्नता से ईर्ष्या नहीं करता। निरपेक्षता की भावना रखने वाला व्यक्ति लालच एवं अन्य कुविचारों से दूर रहता है। वह सभी मनुष्यों को समान समझता है। वास्तव में यह चार असीम सद्गुण बौद्ध धर्म के नैतिक नियमों की नींव हैं।

प्रश्न 29. बौद्ध संघ पर एक नोट लिखें। (Write a note on Buddhist Sangha.)
उत्तर- महात्मा बुद्ध द्वारा स्थापित किए गए संघों में कोई भी पुरुष या स्त्री जिसकी आयु 15 वर्षों से कम न हो इसका सदस्य बन सकता था। सदस्य बनने के लिए उनको घर वालों से आज्ञा लेनी पड़ती थी। किसी भी जाति से संबंधित व्यक्ति संघ का सदस्य बन सकता था, परंतु अपराधियों, रोगियों और दासों को सदस्य नहीं बनाया जाता था। संघ में प्रवेश के समय नए भिक्षु के लिए मुंडन संस्कार करना, तीन पीले कपड़े पहनने और इन शब्दों का उच्चारण करना अनिवार्य था-(i) मैं बुद्ध की शरण लेता हूँ। (ii) मैं ‘धम्म’ की शरण लेता हूँ। (iii) मैं संघ की शरण लेता हूँ। इसके पश्चात् प्रत्येक भिक्षु को 10 आदेशों की पालना करनी पड़ती थी। उसको 10 वर्षों तक किसी भिक्षु से शिक्षा लेनी पड़ती थी। यदि वह अपने नियमों को पूरा करने में सफल हो जाता था तो उसको संघ का सदस्य बना लिया जाता था। नियम का पालन न करने वाले भिक्षुओं को संघ से निकाल दिया जाता था। संघ की सारी कारवाई लोकतंत्रीय नियमों पर आधारित थी।

प्रश्न 30. बौद्ध धर्म में निर्वाण पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a brief note on the Nirvana in Buddhism.)
अथवा
बौद्ध धर्म में निर्वाण से क्या भाव है ?
(What is meant by Nirvana in Buddhism ?)
उत्तर-महात्मा बुद्ध के अनुसार मानव जीवन का उच्चतम उद्देश्य निर्वाण प्राप्त करने से है। बौद्ध धर्म में निर्वाण संबंधी यह विचार दिया गया है कि यह न जीवन है तथा न मृत्यु। यह कोई स्वर्ग नहीं जहाँ देवते आनंदित हों। इसे शाँति एवं सदैव प्रसन्नता का स्रोत कहा गया है। यह सभी दुःखों, लालसाओं एवं इच्छाओं का अंत है। इसकी वास्तविकता पूरी तरह काल्पनिक है। इसका वर्णन संभव नहीं। निर्वाण की वास्तविकता तथा इसका अर्थ जानने के लिए उसकी प्राप्ति आवश्यक है। जो इस सच्चाई को जानते हैं वे इस संबंध में बातें नहीं करते तथा जो इस संबंध में बातें करते हैं उन्हें इस संबंध में कोई जानकारी नहीं होती। महात्मा बुद्ध के अनुसार अष्ट मार्ग पर चल कर कोई भी व्यक्ति निर्वाण प्राप्त कर सकता है। जहाँ अन्य धर्मों में निर्वाण मृत्यु के पश्चात् प्राप्त होता है वहाँ बौद्ध धर्म में निर्वाण की प्राप्ति इसी जीवन में भी संभव है।

प्रश्न 31. हीनयान एवं महायान पर एक नोट लिखें। (Write a note on Hinayana and Mahayana.)
अथवा
बौद्ध धर्म के हीनयान तथा महायान के बारे में जानकारी दें।
(Describe the sect Hinayana and Mahayana of Buddhism.)
उत्तर-कनिष्क के शासनकाल में प्रथम शताब्दी ई० में जालंधर में बौद्ध भिक्षुओं की चौथी महासभा आयोजित की गई थी। इस महासभा में हीनयान एवं महायान नामक दो नए बौद्ध संप्रदाय अस्तित्व में आए। यान का शाब्दिक अर्थ था मुक्ति प्राप्ति का ढंग। हीनयान से अभिप्राय था छोटा यान। महायान से अभिप्राय था बड़ा यान। हीनयान वालों ने बौद्ध धर्म के परंपरावादी नियमों के समर्थन को जारी रखा, जबकि महायान वालों ने नए सिद्धांतों को अपनाया। हीनयान तथा महायान के मध्य मुख्य अंतर निम्नलिखित थे—

  1. हीनयान संप्रदाय महात्मा बुद्ध को एक पवित्र आत्मा समझते थे, जबकि महायान संप्रदाय उन्हें ईश्वर का एक रूप समझते थे।
  2. हीनयान संप्रदाय मूर्ति पूजा के विरुद्ध था, जबकि महायान संप्रदाय मूर्ति पूजा के विरुद्ध नहीं था।
  3. हीनयान बोधिसत्त्वों में विश्वास नहीं रखते थे। महायान संप्रदाय बोधिसत्त्वों में पूर्ण विश्वास रखते थे। बोधिसत्त्व वे महान् व्यक्ति थे जो निर्वाण प्राप्ति में दूसरों की सहायता के उद्देश्यों से बार-बार जन्म लेते थे।
  4. हीनयान संप्रदाय ने बौद्ध धर्म का प्रचार पाली भाषा में किया जोकि जन-साधारण की भाषा थी। महायान संप्रदाय ने संस्कृत भाषा में बौद्ध धर्म का प्रचार किया।
  5. हीनयान संप्रदाय के अनुसार मानव जीवन का परम लक्ष्य निर्वाण को प्राप्त करना है, जबकि महायान संप्रदाय के अनुसार मानव जीवन का परम लक्ष्य स्वर्ग को प्राप्त करना है।
  6. हीनयान संप्रदाय महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं में किसी भी प्रकार के परिवर्तन के विरुद्ध था, जबकि महायान संप्रदाय ने समय के अनुसार बौद्ध धर्म के नियमों में परिवर्तन किए। अत: हीनयान संप्रदाय की अपेक्षा महायान संप्रदाय अधिक लोकप्रिय हुआ।

प्रश्न 32. बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the Vajrayana sect of Buddhism ?)
उत्तर-8वीं शताब्दी में बंगाल तथा बिहार में बौद्ध धर्म का एक नया संप्रदाय अस्तित्व में आया। यह संप्रदाय जादू-टोनों तथा मंत्रों से जुड़ा हुआ था। इस संप्रदाय का विचार था कि जादू की शक्तियों से मुक्ति की प्राप्ति की जा सकती है। इन जादुई शक्तियों को वज्र कहा जाता था। इसलिए इस संप्रदाय का नाम वज्रयान पड़ गया। इस संप्रदाय में सभी जातियों के स्त्री-पुरुष सम्मिलित हो सकते थे। इस संप्रदाय में देवियों का महत्त्व बहुत बढ़ गया था। समझा जाता था कि इन देवियों द्वारा बोधिसत्त्व तक पहुँचा जा सकता है। इन देवियों को तारा कहा जाता था। ‘महानिर्वाण तंत्र’ वज्रयान की प्रसिद्ध धार्मिक पुस्तक थी। वज्रयान की धार्मिक पद्धति को तांत्रिक भी कहते हैं। बिहार राज्य में वज्रयान का सबसे महत्त्वपूर्ण विहार विक्रमशिला में स्थित है। वज्रयान शाखा ने अपने अनुयायियों को मादक पदार्थों का सेवन करने, माँस भक्षण तथा स्त्रीगमन की अनुमति देकर बौद्ध धर्म के पतन का डंका बजा दिया।

प्रश्न 33. बौद्ध स्त्रोत। (Buddhist Sources.)
उत्तर-वैदिक साहित्य की तरह बौद्ध साहित्य भी काफी विस्तृत है। बौद्ध साहित्य की रचना पालि तथा संस्कृत भाषाओं में की गई है। बौद्ध साहित्य में त्रिपिटक को सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। ये बौद्ध धर्म के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं। त्रिपिटकों के नाम सुत्तपिटक, विनयपिटक तथा अभिधम्मपिटक हैं। सुत्तपिटक में महात्मा बुद्ध के उपदेशों, विनयपिटक में भिक्षु-भिक्षुणियों से संबंधित नियमों तथा अभिधम्मपिटक में बौद्ध दर्शन के संबंध में जानकारी दी गई है। जातक कथाएँ जिनकी संख्या 549 है, में महात्मा बुद्ध के पूर्व जन्मों का वर्णन किया गया है। इनमें हमें ईसा पूर्व तीसरी सदी से दूसरी सदी तक की भारतीय समाज की धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक दशा के संबंध में बहुमूल्य जानकारी प्राप्त होती है। मिलिंदपन्हों नामक ग्रंथ से हमें यूनानी शासक मीनांदर के संबंध में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। कथावथु जिसकी रचना मोग्गलीपुत्त तिम्स ने की थी में राजा अशोक पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश डाला गया है। बुद्धचरित सौंदरानंद वथा महाविभाष से हमें कुषाण वंश की जानकारी प्राप्त होती है। दीपवंश एवं महावंश भारत के श्रीलंका के साथ संबंधों पर प्रकाश डालते हैं।

प्रश्न 34. त्रिपिटक क्या हैं ? इनका ऐतिहासिक महत्त्व क्या है ? (What are Tripitakas ? What is their historical importance ?)
अथवा
त्रिपिटक क्या हैं ?
(What are Tripitakas ?)
उत्तर-त्रिपिटक बौद्ध धर्म में सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं। पिटक का अर्थ है ‘टोकरी’ जिसमें इन ग्रंथों को संभाल कर रखा जाता था। त्रिपिटकों के नाम सुत्तपिटक, विनयपिटक तथा अभिधम्मपिटक हैं। ये पालि भाषा में लिखित हैं। सुत्तपिटक को पिटकों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इसमें महात्मा बुद्ध के उपदेशों का वर्णन किया गया है। यह पाँच भागों दीर्घ निकाय, मझिम निकाय, संपुत निकाय, अंगतुर निकाय तथा खुदक निकाय में विभाजित है। खुदक निकाय में धम्मपद का वर्णन किया गया है। धम्मपद का बौद्ध भिक्षु उसी प्रकार रोजाना पाठ करते हैं जैसे सिख जपुजी साहिब का तथा हिंदू गीता का। विनयपिटक में बौद्ध भिक्षुओं तथा भिक्षुणियों के आचरण से संबंधित नियम दिए गए हैं। इसमें इस बात का भी वर्णन किया गया है कि बौद्ध भिक्षुओं के लिए कौन-सी वस्तुएँ पाप हैं तथा उनका प्रायश्चित किस प्रकार किया जा सकता है। अभिधम्मपिटक में बौद्ध दर्शन के संबंध में जानकारी दी गई है। त्रिपिटकों के अध्ययन से हमें केवल बौद्ध धर्म के संबंध में ही नहीं अपितु तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक जीवन में संबंध के भी काफी मूल्यवान् जानकारी प्राप्त होती है।

प्रश्न 35. बौद्ध धर्म की प्रथम महासभा के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the First Great Council of Buddhism ?)
उत्तर-महात्मा बुद्ध के निर्वाण प्राप्त करने के शीघ्र पश्चात् ही 487 ई० पू० राजगृह में बौद्ध भिक्षुओं की प्रथम महासभा का आयोजन किया गया। राजगृह मगध के शासक अजातशत्रु की राजधानी थी। अजातशत्रु के संरक्षण में ही इस महासभा का आयोजन किया गया था। इस महासभा की आयोजित करने का उद्देश्य महात्मा बुद्ध के प्रमाणिक उपदेशों को एकत्र करना था। इस महासभा में 500 बौद्ध भिक्षुओं ने भाग लिया था। इस महासभा की अध्यक्षता महाकश्यप ने की थी। इस महासभा में त्रिपिटकों-विनयपिटक, सुत्तपिटक तथा अभिधम्मपिटक की रचना की गई। विनयपिटक में बौद्ध भिक्षुओं संबंधी नियम, सुत्तपिटक में महात्मा बुद्ध के उपदेश तथा अभिधम्मपिटक में बौद्ध दर्शन का वर्णन किया गया है। त्रिपिटकों के अतिरिक्त आरोपों की छानबीन करके महात्मा बुद्ध के परम शिष्य आनंद को दोष मुक्त कर दिया गया जबकि सारथी चन्न को उसके उदंड व्यवहार के कारण दंडित किया गया।

प्रश्न 36. दूसरी बौद्ध महासभा पर एक संक्षिप्त नोट लिखिए। (Write a short note on the Second Great Council of Buddhism.)
उत्तर-प्रथम महासभा के ठीक 100 वर्षों के पश्चात् 387 ई० पू० में बौद्ध भिक्षुओं की दूसरी महासभा का आयोजन वैशाली में किया गया। इस महासभा का आयोजन मगध शासक कालाशोक ने किया था। इस महासभा में 700 भिक्षुओं ने भाग लिया था। इस महासभा की अध्यक्षता सभाकामी ने की थी। इस सभा का आयोजन करने का कारण यह था कि बौद्ध संघ में संबंधित दस नियमों ने भिक्षुओं में मतभेद उत्पन्न कर दिए थे। इन नियमों के संबंध में काफी दिनों तक वाद-विवाद चलता रहा, किंतु भिक्षुओं के मतभेद दूर न हो सके। परिणामस्वरूप बौद्ध भिक्षु दो संप्रदायों में बंट गए। इनके नाम स्थविरवादी अथवा थेरावादी एवं महासंघिक थे। स्थविरवादी नवीन नियमों के विरुद्ध थे। वे बुद्ध के नियमों में कोई परिवर्तन नहीं चाहते थे। महासंघिक परंपरावादी नियमों में कुछ परिवर्तन करना चाहते थे ताकि बौद्ध संघ के अनुशासन की कठोरता को कुछ कम किया जा सके। इस महासभा में स्थविरवादियों की विजय हुई तथा महासंघिक भिक्षुओं को निकाल दिया गया।

प्रश्न 37. तीसरी बौद्ध महासभा पर एक संक्षिप्त नोट लिखिए। (Write a short note on Third Buddhist Council.)
उत्तर-दूसरी महासभा के आयोजन के बाद बौद्ध धर्म 18 शाखाओं में विभाजित हो गया था। इनके आपसी मतभेदों के कारण बौद्ध धर्म की उन्नति को गहरा धक्का लगा। बौद्ध धर्म की पुनः प्रगति के लिए तथा इस धर्म में आई कुप्रथाओं को दूर करने के उद्देश्य से महाराजा अशोक ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र में 251 ई० पू० में बौद्ध भिक्षुओं की तीसरी महासभा का आयोजन किया। इस महासभा में 1000 बौद्ध भिक्षुओं ने भाग लिया। इस महासभा की अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की थी। यह महासभा 9 माह तक चलती रही। यह महासभा बौद्ध धर्म में आईं अनेक कुप्रथाओं को दूर करने में काफी सीमा तक सफल रही। इस महासभा से थेरावादी भिक्षुओं के सिद्धांतों को न मानने वाले भिक्षुओं को निकाल दिया गया था। इस महासभा में कथावथु नामक ग्रंथ की रचना की गई। इस महासभा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण निर्णय विदेशों में बौद्ध प्रचारकों को भेजना था।

प्रश्न 38. चौथी बौद्ध महासभा के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the Fourth Great Council ?)
उत्तर-महाराजा अशोक की मृत्यु के पश्चात् बौद्ध भिक्षुओं के मतभेद पुन: बढ़ गए थे। इन मतभेदों को दूर करने के उद्देश्य से कुषाण शासक कनिष्क ने जालंधर में बौद्ध भिक्षुओं की चौथी महासभा का आयोजन प्रथम शताब्दी ई० में किया गया था। इस महासभा में 500 बौद्ध भिक्षुओं ने भाग लिया था। इस महासभा की अध्यक्षता वसुमित्र ने की थी। वसुमित्र ने महाविभाष नामक ग्रंथ की रचना की जिसे बौद्ध धर्म का विश्वकोष कहा जाता है। इस महासभा में सम्मिलित एक अन्य विद्वान् अश्वघोष ने बुद्धचरित नामक ग्रंथ की रचना की। इसमें महात्मा बुद्ध के जीवन का वर्णन किया गया है। इस महासभा में मतभेदों के कारण बौद्ध धर्म दो प्रमुख संप्रदायों हीनयान तथा महायान में विभाजित हो गया। कनिष्क ने महायान संप्रदाय का समर्थन किया।

प्रश्न 39. बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए अशोक ने क्या प्रयास किए ? (What steps were taken by Ashoka for the spread of Buddhism ?)
उत्तर-अशोक ने बौद्ध धर्म को फैलाने में बहुत ही महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उससे पहले बौद्ध मत बहुत ही कम लोगों तक सीमित था। अशोक ने इस धर्म को अपनाकर इसमें एक नई रूह फूंक दी। उसने बौद्ध धर्म को लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से इसे राज्य धर्म घोषित किया। इसका सारे राज्य भर में व्यापक प्रचार किया गया। बौद्ध
धर्म के प्रचार के लिए महामात्रों को नियुक्त किया गया। अशोक ने बौद्ध धर्म से संबंधित तीर्थ स्थानों की यात्राएँ की। समस्त राज्य में बौद्ध विहार तथा स्तूप बनवाए। पाटलिपुत्र में बौद्ध धर्म की तीसरी महासभा बुलाई। विदेशों में बौद्ध धर्म के लिए धर्म प्रचारकों को भेजा। श्रीलंका में अशोक का अपना पुत्र महेंद्र तथा पुत्री संघमित्रा गए थे। अशोक के इन अथक यत्नों से बौद्ध धर्म संसार का एक महान् धर्म बन गया।

प्रश्न 40. बौद्ध धर्म की भारतीय संस्कृति को क्या देन है ?
(What is the legacy of Buddhism to Indian Civilization ?)
उत्तर-भारतीय संस्कृति को बौद्ध धर्म की बहुत महत्त्वपूर्ण देन है। समाज में एकता लाने के लिए महात्मा बुद्ध ने प्रत्येक जाति के लोगों को अपने धर्म में सम्मिलित होने की अनुमति दी। स्त्रियों को बौद्ध धर्म में सम्मिलित करके उन्हें एक नया सम्मान दिया। उन्होंने लोगों को व्यर्थ के रीति-रिवाजों को त्यागने और सादा जीवन व्यतीत करने का संदेश दिया। महात्मा बुद्ध ने बौद्ध संघों की स्थापना करके लोकतंत्र प्रणाली की नींव रखी। इन के सदस्य लोगों द्वारा गुप्त मतदान से चुने जाते थे। इनमें निर्णय बहुमत से लिए जाते थे। बौद्ध धर्म की भवन निर्माण कला, मूर्तिकला, चित्रकला के क्षेत्रों में बहुत महान् देन है। गंधार, मथुरा और अमरावती महात्मा बुद्ध की सुंदर मूर्तियों के कारण आज भी प्रसिद्ध हैं। बौद्ध मत के बारे में लिखे गए धार्मिक ग्रंथों से हमें उस समय की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर कई राजाओं अशोक, कनिष्क और हर्ष आदि ने लोक कल्याण के अथक कार्य किए। बौद्ध धर्म के कारण भारत के विदेशों से मित्रतापूर्वक संबंध स्थापित हुए।

प्रश्न 41. स्तूप पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on Stupa.)
उत्तर-स्तूप बुद्ध के परिनिर्वाण (मुक्ति) के चिन्ह थे। यह एक अर्द्ध-गोलाकार गंबद होता था जिसके मध्य में स्थित एक छोटे-से कमरे में बुद्ध के अवशेष रखे जाते थे। कला के पक्ष से इन स्तूपों का बहुत महत्त्व था। अमरावती का स्तूप जोकि तमिलनाडु राज्य में है साँची एवं भरहुत के स्तूप जो मध्य प्रदेश में हैं, की उत्तम कला को देखकर व्यक्ति चकित रह जाता है। स्तूपों पर की गई नक्काशी की कला भी कम प्रभावशाली नहीं है। लकड़ी पर की गई नक्काशी के नमूने तो बहुत देर तक सुरक्षित न रह सके, परंतु अमरावती और साँची की पत्थर से बनी हुई दीवारों पर की गई सुंदर नक्काशी को आज भी देखा जा सकता है। इन पर बुद्ध के जन्म, गृह-त्याग, ज्ञान प्राप्ति, धर्म चक्कर परिवर्तन का पहला प्रवचन और महापरिनिर्वाण से संबंधित चित्रों को बड़े आकर्षक ढंग से दर्शाया गया है।

OBJECTIVE TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. बौद्ध धर्म का संस्थापक कौन था ?
अथवा
बौद्ध धर्म के बानी कौन थे ?
उत्तर-महात्मा बुद्ध।

प्रश्न 2. बौद्ध धर्म कितने वर्ष पुराना है ?
उत्तर-2500 वर्ष।

प्रश्न 3. बौद्ध धर्म का जन्म कब हुआ ?
उत्तर-छठी शताब्दी ई० पू० में।

प्रश्न 4. बौद्ध धर्म के उत्थान का कोई एक कारण लिखो।
उत्तर-हिंदू धर्म की जटिलता।

प्रश्न 5. महात्मा बुद्ध का जन्म कब हुआ ?
उत्तर-566 ई० पू० में।

प्रश्न 6. महात्मा बुद्ध का जन्म कहाँ हुआ ?
उत्तर-लुंबिनी में।

प्रश्न 7. महात्मा बुद्ध का जन्म कब और कहाँ हुआ ?
उत्तर- महात्मा बुद्ध का जन्म 566 ई० पू० में लुंबिनी में हुआ।

प्रश्न 8. महात्मा बुद्ध के पिता जी का नाम बताएँ।
अथवा
महात्मा बुद्ध के पिता जी का क्या नाम था ?
उत्तर-शुद्धोधन।

प्रश्न 9. महात्मा बुद्ध के पिता जी किस गणराज्य के मुखिया थे ?
उत्तर-शाक्य गणराज्य।

प्रश्न 10. महात्मा बुद्ध की माता जी का क्या नाम था ?
उत्तर-महामाया।

प्रश्न 11. महात्मा बुद्ध के जन्म के कितने दिनों के बाद उनकी माता जी की मृत्यु हो गई थी ?
उत्तर-7 दिन।

प्रश्न 12. महात्मा बुद्ध का पालन किसने किया था ?
उत्तर-प्रजापति गौतमी ने।

प्रश्न 13. महात्मा बुद्ध का आरंभिक नाम क्या था ?
उत्तर-सिद्धार्थ।

प्रश्न 14. महात्मा बुद्ध का जन्म स्थान और बचपन का नाम क्या था ?
उत्तर- महात्मा बुद्ध का जन्म लुंबिनी में हुआ तथा उनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था।

प्रश्न 15. महात्मा बुद्ध का विवाह किसके साथ हुआ था ?
उत्तर-यशोधरा के साथ।

प्रश्न 16. महात्मा बुद्ध के पुत्र का क्या नाम था ?
उत्तर-राहुल।

प्रश्न 17. महात्मा बुद्ध की पत्नी तथा पुत्र का क्या नाम था ?
उत्तर- महात्मा बुद्ध की पत्नी का नाम यशोधरा और पुत्र का नाम राहुल था।

प्रश्न 18. महात्मा बुद्ध के रथवान का क्या नाम था ?
उत्तर-चन्न।

प्रश्न 19. महात्मा बुद्ध के जीवन पर कितने दृश्यों का प्रभाव पड़ा?
उत्तर-चार दृश्यों का।

प्रश्न 20. महान् त्याग के समय महात्मा बुद्ध की आयु क्या थी ?
उत्तर-29 वर्ष।

प्रश्न 21. महात्मा बुद्ध ने गृह त्याग के पश्चात् किसे अपना प्रथम गुरु धारण किया ?
उत्तर-अरध कलाम को।

प्रश्न 22. महात्मा बुद्ध को सत्य की प्राप्ति किस स्थान पर हुई ?
उत्तर-बोध गया में।

प्रश्न 23. ज्ञान प्राप्ति के समय महात्मा बुद्ध की आयु क्या थी ?
उत्तर-35 वर्ष।

प्रश्न 24. तथागत से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर- तथागत से अभिप्राय उस व्यक्ति से है जिसने सत्य को प्राप्त कर लिया हो।

प्रश्न 25. महात्मा बुद्ध ने अपना प्रथम प्रवचन किस स्थान पर दिया था ?
उत्तर-सारनाथ में।

प्रश्न 26. धर्मचक्र परिवर्तन किस स्थान पर हुआ ?
उत्तर-सारनाथ में।

प्रश्न 27. धर्मचक्र परिवर्तन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-महात्मा बुद्ध द्वारा पाँच साथियों को बौद्ध धर्म में सम्मिलित करने की घटना को धर्मचक्र परिवर्तन कहा जाता है।

प्रश्न 28. महात्मा बुद्ध के किन्हीं दो प्रसिद्ध प्रचार केंद्रों के नाम बताएँ।
उत्तर-

  1. मगध
  2. वैशाली।

प्रश्न 29. मगध के किन दो शासकों ने बौद्ध धर्म को ग्रहण किया था?
उत्तर-

  1. बिंबिसार
  2. अजातशत्रु।

प्रश्न 30. महात्मा बुद्ध ने कहाँ निर्वाण प्राप्त किया था ?
उत्तर-कुशीनगर में।

प्रश्न 31. महात्मा बुद्ध की निर्वाण प्राप्ति के समय आयु कितनी थी ?
उत्तर-80 वर्ष।

प्रश्न 32. महात्मा बुद्ध ने अपना प्रचार किस भाषा में किया ?
उत्तर–पालि भाषा में।

प्रश्न 33. बौद्ध धर्म कितने महान् सत्यों में विश्वास रखता है ?
उत्तर-चार।

प्रश्न 34. बौद्ध धर्म के किसी एक महान् सत्य के बारे में बताएँ।
उत्तर-संसार दुखों से भरा हुआ है।

प्रश्न 35. बौद्ध धर्म में कितने लक्षणों का वर्णन किया गया है?
उत्तर-तीन।

प्रश्न 36. बौद्ध धर्म में गृहस्थियों के लिए किस सिद्धांत का पालन आवश्यक बताया है ?
उत्तर-पंचशील की।

प्रश्न 37. पंचशील को किस अन्य नाम से भी जाना जाता है ?
उत्तर-शिक्षापद के नाम से।

प्रश्न 38. पंचशील के किसी एक सिद्धांत का वर्णन करें।
उत्तर- छोट-से-छोटे जीव की भी हत्या न करें।

प्रश्न 39. बौद्ध धर्म में कितने असीम सद्गुणों की पालना करने को कहा गया है ?
उत्तर-चार असीम सद्गुणों की।

प्रश्न 40. बौद्ध धर्म के किसी एक असीम सद्गुण का वर्णन कीजिए।
उत्तर-मनुष्य को अपने दुश्मनों के साथ भी प्यार करना चाहिए।

प्रश्न 41. बौद्ध धर्म में निर्वाण से क्या भाव है ?
उत्तर-बौद्ध धर्म में निर्वाण से भाव उस दशा से है जहाँ मनुष्य के सभी दुखों का अंत हो जाता है।

प्रश्न 42. बौद्ध संघ में प्रवेश के समय भिक्षु को क्या शपथ लेनी पड़ती थी ?
उत्तर- “मैं बुद्ध की शरण लेता हूँ, मैं धर्म की शरण लेता हूँ, मैं संघ की शरण लेता हूँ।”

प्रश्न 43. बौद्ध संघ में सम्मिलित होने के लिए किसी व्यक्ति के लिए कम-से-कम कितनी आयु निश्चित की गई थी ?
उत्तर-15 वर्ष।

प्रश्न 44. बौद्ध संघ में सम्मिलित होने वाले सदस्यों के लिए कितने नियमों का पालन आवश्यक था ?
उत्तर-10 नियमों का।

प्रश्न 45. बौद्ध संघ में किनको शामिल नहीं किया जाता था ?
उत्तर-बौद्ध संघ में अपराधियों, रोगियों तथा दासों को शामिल नहीं किया जाता था।

प्रश्न 46. बौद्ध धर्म के दो प्रमुख संप्रदायों के नाम लिखें।
अथवा
बौद्ध धर्म के दो प्रमुख संप्रदाय कौन-कौन से हैं ?
अथवा
बुद्ध धर्म कौन-सी दो शाखाओं में बाँटा गया था ?
उत्तर-हीनयान तथा महायान।

प्रश्न 47. हीनयान से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-हीनयान से अभिप्राय है छोटा चक्कर।

प्रश्न 48. महायान से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-महायान से अभिप्राय है बड़ा चक्कर।

प्रश्न 49. बौद्ध धर्म की महायान शाखा किस सम्राट के शासन काल में अस्तित्व में आई ?
उत्तर-कनिष्क के शासन काल में।

प्रश्न 50. बौद्ध धर्म के त्रिपिटकों के नाम बताएँ।
उत्तर-सुत्तपिटक, विनयपिटक तथा अभिधम्मपिटक।

प्रश्न 51. त्रिपिटक किस भाषा में लिखे गए हैं ?
उत्तर–पालि भाषा में।

प्रश्न 52. किस पिटक में बुद्ध के उपदेशों का वर्णन किया गया है ?
उत्तर-सुत्तपिटक में।

प्रश्न 53. किस पिटक में बौद्ध संघ के नियमों पर प्रकाश डाला गया है ?
उत्तर-विनयपिटक में।

प्रश्न 54. अभिधम्मपिटक का मुख्य विषय क्या है ?
उत्तर-बौद्ध दर्शन।

प्रश्न 55. जातक क्या है ?
उत्तर-जातक में महात्मा बुद्ध के पूर्व जन्म की कथाएँ दी गई हैं।

प्रश्न 56. जातकों की कुल संख्या कितनी है ?
उत्तर-549.

प्रश्न 57. पातीमोख क्या है ?
उत्तर-इसमें विनयपिटक में वर्णित नियमों का संक्षिप्त वर्णन किया गया है।

प्रश्न 58. बौद्ध धर्म के किस ग्रंथ को बौद्ध गीता कहा जाता है ?
उत्तर-धम्मपद ग्रंथ को।

प्रश्न 59. किस बौद्ध ग्रंथ में नागसेन एवं यूनानी शासक मिनांदर के वार्तालाप का वर्णन किया गया है ?
उत्तर-मिलिंदपन्हो में।

प्रश्न 60. बौद्ध धर्म से संबंधित श्रीलंका में किसी एक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की गई ?
उत्तर-दीपवंश।

प्रश्न 61. पालि भाषा में लिखे गए किसी एक प्रसिद्ध ग्रंथ का नाम लिखें।
उत्तर-त्रिपिटक।

प्रश्न 62. संस्कृत भाषा में लिखे गए किसी एक प्रसिद्ध ग्रंथ का नाम लिखें।
उत्तर-बुद्धचरित।

प्रश्न 63. बुद्धचरित का लेखक कौन था ?
उत्तर-अश्वघोष।

प्रश्न 64. नागार्जुन ने किस बौद्ध ग्रंथ की रचना की थी ?
उत्तर-मध्यमकसूत्र।

प्रश्न 65. किसी एक प्रसिद्ध अवदान पुस्तक का नाम लिखें।
उत्तर-दिव्यावदान।

प्रश्न 66. शिक्षा सम्मुचय का लेखक कौन था ?
उत्तर-शाँति देव।

प्रश्न 67. प्रथम बौद्ध महासभा कब आयोजित की गई थी ?
उत्तर-487 ई० पू० में।

प्रश्न 68. प्रथम बौद्ध महासभा का आयोजन कहाँ किया गया था ?
उत्तर-राजगृह में।

प्रश्न 69. प्रथम बौद्ध महासभा का अध्यक्ष कौन था ?
उत्तर-महाकश्यप।

प्रश्न 70. बौद्ध धर्म की प्रथम महासभा किस शासक ने आयोजित की थी ?
उत्तर-अजातशत्रु ने।

प्रश्न 71. बौद्ध धर्म की प्रथम महासभा में कौन-से ग्रंथ तैयार किए गए थे ?
उत्तर-त्रिपिटक।

प्रश्न 72. बौद्ध धर्म की दूसरी महासभा कब आयोजित की गई थी ?
उत्तर-387 ई० पू० में।

प्रश्न 73. बौद्ध धर्म की दूसरी महासभा कहाँ आयोजित की गई थी ?
उत्तर-वैशाली में।

प्रश्न 74. बौद्ध धर्म की दूसरी महासभा में कौन-से दो संप्रदाय अस्तित्व में आए ?
उत्तर-महासंघिक तथा थेरावादी।

प्रश्न 75. बौद्ध धर्म की तीसरी महासभा का आयोजन कहाँ किया गया था ?
उत्तर-पाटलिपुत्र में।

प्रश्न 76. बौद्ध धर्म की तीसरी महासभा का आयोजन कब किया गया था ?
उत्तर-251 ई० पू० में।

प्रश्न 77. बौद्ध धर्म की तीसरी महासभा की अध्यक्षता किसने की थी ?
उत्तर-मोग्गलिपुत्त तिस्स ने।

प्रश्न 78. मोग्गलिपुत्त तिस्स ने किस प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की थी ?
उत्तर-कथावथु नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की।

प्रश्न 79. बौद्ध धर्म की चौथी महासभा का आयोजन किस शासक ने किया था ?
उत्तर-कनिष्क ने।

प्रश्न 80. बौद्ध धर्म की चौथी महासभा का आयोजन कहाँ किया गया था ?
उत्तर-जालंधर में।

प्रश्न 81. बौद्ध धर्म की चौथी महासभा की अध्यक्षता किसने की थी ?
उत्तर-वसुमित्र ने।

प्रश्न 82. वसुमित्र ने किस प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की थी ?
उत्तर-महाविभास नामक ग्रंथ की।

प्रश्न 83. बौद्ध धर्म में बोधिसत्त्व से क्या अभिप्राय है ?
अथवा
बोधिसत्त्व किसको कहते हैं ? ।
उत्तर-बोधिसत्त्व से अभिप्राय उस व्यक्ति से है जो लोगों की भलाई के लिए बार-बार जन्म लेता है।

प्रश्न 84. बौद्ध धर्म का प्रचार कौन-से राजा ने किया ?
उत्तर- बौद्ध धर्म का प्रचार राजा अशोक ने किया।

प्रश्न 85. महाराजा अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए क्या किया ? कोई एक बिंदु दें।
उत्तर-महाराजा अशोक ने बौद्ध धर्म को राज्य धर्म घोषित किया।

प्रश्न 86. महाराजा अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए किसे श्रीलंका भेजा ?
उत्तर-अपनी पुत्री संघमित्रा एवं पत्र महेंद्र को।

प्रश्न 87. बौद्ध धर्म की तीसरी महासभा का आयोजन किस शासक ने किया था ?
अथवा
बौद्ध धर्म की किस राजा ने सरपरस्ती की ?
उत्तर-महाराजा अशोक ने।

प्रश्न 88. कौन-से दो राजाओं ने बौद्ध धर्म का विकास किया ?
उत्तर-महाराजा अशोक और महाराजा कनिष्क।

नोट-रिक्त स्थानों की पूर्ति करें—

प्रश्न 1. महात्मा बुद्ध का जन्म ………… में हुआ।
उत्तर-566 ई०पू०

प्रश्न 2. महात्मा बुद्ध का जन्म …………में हुआ।
उत्तर-लुंबिनी

प्रश्न 3. महात्मा बुद्ध के पिता का नाम ……….. था।
उत्तर-शुद्धोधन

प्रश्न 4. महात्मा बुद्ध की माता का नाम ………… था।
उत्तर-महामाया

प्रश्न 5. महात्मा बुद्ध के बचपन का नाम …………. था।
उत्तर-सिद्धार्थ

प्रश्न 6. महात्मा बुद्ध की पत्नी का नाम ………… था।
उत्तर-यशोधरा

प्रश्न 7. महात्मा बुद्ध के गृह त्याग के समय उनकी आयु ……….. थी।
उत्तर-29 वर्ष

प्रश्न 8. महात्मा बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति ……….. में हुई।
उत्तर-बौद्ध गया

प्रश्न 9. ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश ………. में दिया।
उत्तर-सारनाथ

प्रश्न 10. महात्मा बुद्ध ने महापरिनिर्वाण ……….. में प्राप्त किया था।
उत्तर-कुशीनगर

प्रश्न 11. महात्मा बुद्ध ने ……….. में महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था।
उत्तर-486 ई० पू०

प्रश्न 12. महात्मा बुद्ध ………… महान् सच्चाइयों में विश्वास रखते थे।
उत्तर-चार

प्रश्न 13. अष्ट मार्ग को ………… मार्ग भी कहा जाता है।
उत्तर-मध्य

प्रश्न 14. बौद्ध धर्म …………… लक्षणों में विश्वास रखता है।
उत्तर-तीन

प्रश्न 15. बौद्ध धर्म ………….. नियमों में विश्वास रखता है।
उत्तर-पाँच

प्रश्न 16. बौद्ध धर्म ………… सामाजिक सद्गुणों में विश्वास रखता है।
उत्तर-चार

प्रश्न 17. बौद्ध संघ में शामिल होने के लिए कम से कम आयु ………… वर्ष निश्चित की गई है।
उत्तर-15

प्रश्न 18. बौद्ध संघ के सदस्यों को ………….. नियमों की पालना करनी पड़ती है।
उत्तर-10

प्रश्न 19. ………. के समय बौद्ध धर्म की महायान शाखा का जन्म हुआ।
उत्तर-कनिष्क

प्रश्न 20. ………….. में बौद्धी भिक्षुओं और भिक्षुणियों के दैनिक जीवन संबंधी नियमों का वर्णन किया गया है।
उत्तर-विनयपिटक

प्रश्न 21. जातक कथाओं की कुल संख्या ……….. है।
उत्तर-549

प्रश्न 22. ……….. नामक ग्रंथ की रचना श्री लंका में की गई थी।
उत्तर-दीपवंश

प्रश्न 23. बौद्ध चरित्र का लेखक ……… था।
उत्तर- अश्वघोष

प्रश्न 24. बौद्ध धर्म की पहली महासभा का आयोजन …………. में किया गया।
उत्तर-487 ई० पू०

प्रश्न 25. बौद्ध धर्म की पहली महासभा का आयोजन ………… ने किया था।
उत्तर-अजातशत्रु

प्रश्न 26. बौद्ध धर्म की दूसरी महासभा का आयोजन …………. में हुआ था।
उत्तर-वैशाली

प्रश्न 27. बौद्ध धर्म की तीसरी महासभा का आयोजन ……….. में किया गया था।
उत्तर–पाटलिपुत्र

प्रश्न 28. बौद्ध धर्म की चौथी महासभा का आयोजन ………….. ने किया था।
उत्तर-कनिष्क

प्रश्न 29. बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए महाराजा अशोक ने अपनी पुत्री ……….. को श्री लंका भेजा था।
उत्तर-

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा ग़लत चुनें—

प्रश्न 1. महात्मा बुद्ध बौद्ध धर्म के संस्थापक थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 2. महात्मा बुद्ध का जन्म 546 ई० पू० में हुआ।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 3. महात्मा बुद्ध का जन्म लुंबिनी में हुआ।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 4. महात्मा बुद्ध की पत्नी का नाम महामाया था।
उत्तर- ग़लत

प्रश्न 5. महात्मा बुद्ध के जीवन में चार महान् दृश्यों का गहरा प्रभाव पड़ा।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 6. महात्मा बुद्ध के महान् त्याग के समय उनकी आयु 35 वर्ष थी।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 7. महात्मा बुद्ध को बौद्ध गया में ज्ञान प्राप्त हुआ था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 8. महात्मा बुद्ध को वैसाख की पूर्णमासी वाले दिन ज्ञान प्राप्त हुआ था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 9. महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश वैशाली में दिया था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 10. महात्मा बुद्ध ने 72 वर्ष की आयु में महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 11. महात्मा बुद्ध ने कुशीनगर में महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 12. महात्मा बुद्ध ने अपना प्रचार पालि भाषा में किया था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 13. बौद्ध धर्म पाँच पावन सच्चाइयों में विश्वास रखता है।
उत्तर- ग़लत

प्रश्न 14. बौद्ध धर्म अष्ट मार्ग में विश्वास रखता है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 15. अष्ट मार्ग को मध्य मार्ग भी कहा जाता है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 16. बौद्ध धर्म अहिंसा में विश्वास रखता है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 17. बौद्धी संध में शामिल होने के लिए कम से कम आयु 20 वर्ष निश्चित की गई है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 18. बौद्ध धर्म पँचशील में विश्वास रखता है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 19. बौद्ध धर्म की महायान शाखा का जन्म अशोक के समय हुआ था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 20. बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा जादू-ट्रनों और मंत्रों में विश्वास रखती थी।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 21. बौद्ध धर्म के त्रिपिटक नामक ग्रंथ संस्कृत भाषा में लिखे गए थे।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 22. बौद्धियों के लिए बनाए गए नियम पातीमोख में दिए गए हैं।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 23. धर्मपद बौद्धी गीतों के नाम से प्रसिद्ध है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 24. कथावथु का लेखक मोग्गलिपुत्त तिस्स था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 25. महावंश चीन में लिखी गई बौद्धियों की एक प्रसिद्ध पुस्तक है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 26. अश्वघोष ने बौद्ध चरित की रचना की थी।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 27. लंकावतार महायानियों का एक प्रमुख ग्रंथ है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 28. बौद्ध धर्म की पहली महासभा की अध्यक्षता साबाकामी ने की थी।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 29. बौद्ध धर्म की पहली महासभा का आयोजन 487 ई० पू० में किया गया था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 30. बौद्धियों की दूसरी महासभा का आयोजन वैशाली में किया गया था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 31. बौद्धियों की तीसरी महासभा का आयोजन 251 ई० पू० में हुआ था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 32. बौद्धियों की चौथी महासभा की अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की थी। ,
उत्तर- ग़लत

प्रश्न 33. महाराजा अशोक ने अपनी पुत्र संघमित्रा को चीन में बौद्ध मत के प्रचार के लिए भेजा था।
उत्तर-ग़लत

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर चुनें—

प्रश्न 1. निम्नलिखित में से कौन-सा कारण बौद्ध धर्म के जन्म के लिए उत्तरदायी नहीं था ?
(i) हिंदू धर्म की सादगी
(ii) ब्राह्मणों का नैतिक पतन
(iii) जटिल जाति प्रथा
(iv) महापुरुषों का जन्म।
उत्तर-(i)

प्रश्न 2. महात्मा बुद्ध का जन्म कब हुआ था ?
(i) 466 ई० पू०
(ii) 566 ई० पू०
(iii) 577 ई० पू०
(iv) 599 ई० पू०।
उत्तर-(ii)

प्रश्न 3. महात्मा बुद्ध का जन्म कहाँ हुआ था ?
(i) वैशाली
(ii) कौशल
(iii) कुशीनगर
(iv) लुंबिनी।
उत्तर-(iv)

प्रश्न 4. महात्मा बुद्ध के पिता जी का क्या नाम था ?
(i) शुद्धोधन
(ii) सिद्धार्थ
(iii) गौतम
(iv) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-(i)

प्रश्न 5. महात्मा बुद्ध की माता जी का नाम क्या था ?
(i) महामाया
(ii) प्रजापति गौतमी
(iii) यशोधरा
(iv) देवकी।
उत्तर-(i)

प्रश्न 6. महात्मा बुद्ध का आरंभिक नाम क्या था ?
(i) शुद्धोधन
(ii) वर्धमान
(iii) सिद्धार्थ
(iv) राहुल।
उत्तर-(ii)

प्रश्न 7. महात्मा बुद्ध ने कितने दृश्यों को देखकर ग्रह त्याग का निर्णय किया ?
(i) 3
(ii) 4
(iii) 6
(iv) 8.
उत्तर-(ii)

प्रश्न 8. गृह त्याग के समय महात्मा बुद्ध की आयु कितनी थी ?
(i) 25 वर्ष
(ii) 27 वर्ष
(iii) 29 वर्ष
(iv) 35 वर्ष।
उत्तर-(iii)

प्रश्न 9. निम्नलिखित में से किस स्थान पर महात्मा बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति हुई थी ?
(i) अंग
(ii) राजगृह
(iii) वैशाली
(iv) बौद्धगया।
उत्तर-(iv)

प्रश्न 10. निम्नलिखित में से किस स्थान पर महात्मा बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश दिया ?
(i) कपिलवस्तु
(ii) लुंबिनी
(iii) कुशीनगर
(iv) सारनाथ।
उत्तर-(iv)

प्रश्न 11. निम्नलिखित में से किस स्थान पर महात्मा बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था ?
(i) कुशीनगर
(ii) कौशल
(iii) विदेह
(iv) कपिलवस्तु।
उत्तर-(i)

प्रश्न 12. महापरिनिर्वाण प्राप्ति के समय महात्मा बुद्ध की आयु कितनी थी ?
(i) 45 वर्ष
(ii) 55 वर्ष
(iii) 80 वर्ष
(iv) 85 वर्ष ।
उत्तर-(iii)

प्रश्न 13. बौद्ध धर्म कितनी पावन सच्चाइयों में विश्वास रखता था ?
(i) 4
(ii) 5
(iii) 6
(iv) 7
उत्तर-(i)

प्रश्न 14. अष्टमार्ग का संबंध किस धर्म के साथ है ?
(i) जैन धर्म के साथ
(i) बौद्ध धर्म के साथ
(iii) इस्लाम के साथ
(iv) पारसी धर्म के साथ।
उत्तर-(ii)

प्रश्न 15. बौद्ध धर्म कितने लक्षणों में विश्वास रखता है ?
(i) 3
(ii) 4
(iii) 5
(iv) 6
उत्तर-(i)

प्रश्न 16. निम्नलिखित में से कौन-सा तथ्य ग़लत है ?
(i) महात्मा बुद्ध कर्म सिद्धांत में विश्वास रखते थे।
(ii) वे परस्पर भातृत्व में विश्वास रखते थे।
(iii) वे यज्ञों व बलियों में विश्वास रखते थे।
(iv) वे अहिंसा में विश्वास रखते थे।
उत्तर-(iii)

प्रश्न 17. बौद्ध संघ में शामिल होने के लिए कम-से-कम कितनी आयु निश्चित की गई थी ?
(i) 15
(ii) 20
(iii) 30
(iv) 40
उत्तर-(i)

प्रश्न 18. निम्नलिखित में से किस संप्रदाय का संबंध बौद्ध धर्म के साथ नहीं है ?
(i) हीनयान
(ii) महायान
(iii) दिगंबर
(iv) वज्रयान।
उत्तर-(iii)

प्रश्न 19. निम्नलिखित में से कौन-सा ग्रंथ बौद्ध धर्म के साथ संबंधित नहीं है ?
(i) त्रिपिटक
(ii) आचारंग सूत्र
(iii) दीपवंश
(iv) सौंदरानंद।
उत्तर-(i)

प्रश्न 20. महात्मा बुद्ध ने अपना प्रचार किस भाषा में किया था ?
(i) पालि में
(ii) संस्कृत में
(iii) हिंदी में
(iv) अर्ध मगधी में।
उत्तर-(i)

प्रश्न 21. निम्नलिखित में से कौन बौद्ध चरित का लेखक था ?
(i) महात्मा बुद्ध
(ii) अश्वघोष
(iii) नागार्जुन
(iv) शांति देव।
उत्तर-(i)

प्रश्न 22. निम्नलिखित में से कौन-सी पुस्तक श्रीलंका में लिखी गई थी ?
(i) त्रिपिटक
(i) दीपवंश
(iii) बौद्धचरित
(iv) ललित विस्तार।
उत्तर-(ii)

प्रश्न 23. निम्नलिखित में से कौन-सी पुस्तक बौद्धी गीतों के नाम से प्रसिद्ध है ?
(i) जातक
(ii) पातीमोख
(iii) धमपद
(iv) महावंश।
उत्तर-(iii)

प्रश्न 24. जातक में महात्मा बुद्ध के पूर्व जन्म के साथ संबंधित कितनी कथाएँ प्रचलित हैं ?
(i) 549
(ii) 649
(iii) 749
(iv) 849.
उत्तर-(i)

प्रश्न 25. बौद्ध धर्म की प्रथम महासभा का आयोजन कब किया गया था ?
(i) 485 ई० पू०
(ii) 486 ई० पू०
(iii) 487 ई० पू०
(iv) 488 ई० पू०।
उत्तर-(iii)

प्रश्न 26. बौद्ध धर्म की प्रथम महासभा का आयोजन कहाँ किया गया था ?
(i) राजगृह में
(ii) लुंबिनी में
(iii) कपिलवस्तु में
(iv) कुशीनगर में।
उत्तर-(i)

प्रश्न 27. त्रिपिटक नामक ग्रंथ बौद्ध धर्म की किस महासभा में लिखे गए थे ?
(i) पहली महासभा में
(ii) दूसरी महासभा में
(iii) तीसरी महासभा में
(iv) चौथी महासभा में।
उत्तर-(i)

प्रश्न 28. बौद्ध धर्म की दूसरी महासभा का आयोजन कब किया गया था ?
(i) 384 ई० पू०
(ii) 385 ई० पू०
(iii) 386 ई० पू०
(iv) 387 ई० पू०
उत्तर-(iv)

प्रश्न 29. बौद्ध धर्म की दूसरी महासभा का आयोजन किसने किया था ?
(i) अजातशत्रु
(ii) कालासोक
(iii) महाकश्यप
(iv) अशोक।
उत्तर-(i)

प्रश्न 30. बौद्ध धर्म की तीसरी महासभा का आयोजन किसने किया था ?
(i) 251 ई० पू०
(ii) 254 ई० पू०
(iii) 255 ई० पू०
(iv) 257 ई० पू०।
उत्तर-(i)

प्रश्न 31. बौद्ध धर्म की तीसरी महासभा का आयोजन कहाँ किया गया था ?
(i) पाटलिपुत्र में
(ii) वैशाली में
(iii) राजगृह में
(iv) लुंबिनी में।
उत्तर-(i)

प्रश्न 32. बौद्ध धर्म की तीसरी महासभा का आयोजन किसने किया था ?
(i) अजातशत्रु ने
(ii) अशोक ने
(iii) हर्षवर्धन ने
(iv) कनिष्क ने।
उत्तर-(ii)

प्रश्न 33. बौद्ध धर्म की चौथी महासभा की अध्यक्षता किसने की थी ?
(i) महाकश्यप ने
(ii) सभाकामी ने
(iii) मोग्गलिपुत्त तिस्स ने
(iv) वसुमित्र ने।
उत्तर-(iv)

प्रश्न 34. महाराजा अशोक ने निम्नलिखित में से किसे श्रीलंका में प्रसार के लिए भेजा था ?
(i) राहुल को
(ii) आनंद को
(iii) आम्रपाली को
(iv) महेंद्र को।
उत्तर-(iv)