Class 7 Social Notes Chapter 5 आदिवासी (अनुसूचित जनजाति)

भारत की विशिष्ट पहचान और संस्कृति को संरक्षित करने का काम कुछ समूहों ने अच्छी तरह से किया है। यहाँ की ऋषि-संस्कृति, कृषि-संस्कृति से लेकर वन-संस्कृति का संरक्षण करनेवाले विविध समूहों ने वास्तव में प्रशंसनीय काम किया है। इतना ही नहीं इन समूहों ने भारत के विकास में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे कई समूहों का परिचय इस प्रकरण में प्राप्त करेंगे।

आदिवासी (अनुसूचित जनजाति)

भारत के संविधान में परम्परागत संस्कृति की रक्षा कर रही विशिष्ट आदिवासी जातियों को अनुसूची में शामिल किया गया है। ये जातियाँ अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) के नाम से जानी जाती हैं।

भारत के आदिवासियों की जीवन शैली को देखें तो उनके विविध उत्सव, रूढ़िगत परंपराएँ, भोजन, पहनावा, बोली, चित्र-संगीत और नृत्य की कलाएँ उनकी विशिष्ट पहचान प्रस्तुत करती हैं। स्वतंत्रता से पूर्व यह समाज कुछ हद तक अन्य समाज से अलग था। फिर भी भारतीय व्यवस्था में उनका योगदान महत्त्वपूर्ण रहा है। शाब्दिक रूप से देखें तो आदि यानी प्राचीन काल से और वासी यानी निवास करनेवाले। यह नाम हमारी प्राचीन संस्कृति से जुड़ा है।

सभी जनजातियों के सदस्य कबीलाई (परिवार अथवा कुटुंब) प्रथा से एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए थे। वे शिकार और पशुपालन तो कुछ अंश तक खेती द्वारा अपना जीवन निर्वाह करते थे। जंगल और प्रकृति उनके जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करनेवाले परिबल थे। उनके घर प्राकृतिक संसाधनों से ही बने थे। जनजाति के लोग जमीन और जमीन उत्पादों पर संयुक्त रूप से अधिकार रखते थे। और अपने द्वारा बनाए गए नियमों के आधार पर परिवार में उनका बँटवारा करते थे। उनका जीवन सामूहिक स्वरूपवाला था। अतः उनकी अर्थव्यस्था में भी सामूहिकता का सिद्धांत देखने को मिलता है। भिन्न-भिन्न समुदायों में सामाजिक समानता देखने को मिलती है।

उपखंड के विविध भागों में कई जनजातियों का विकास हुआ। सामान्य रूप से वे जंगलों, पहाड़ों, रेगिस्तान और दुर्गम स्थानों पर निवास करते थे। कई बार शासकों के साथ उनका संघर्ष भी हुआ। फिर भी जनजातियों ने अपनी स्वतंत्रता और संस्कृति को बनाए रखा।

सामान्य रूप से भारत के विविध समुदाय अपनी जरूरतों के लिए एक-दूसरे पर निर्भर थे। इस निर्भरता के संबंध के कारण इन जातियों में धीरे-धीरे परिवर्तन आया।
समकालीन इतिहासकारों और यात्रियों ने जनजातियों के संबंध में बहुत कम जानकारियाँ दी हैं। कुछ अपवादों को छोड़कर जनजाति के लोगों के पास लिखित दस्तावेज नहीं मिलते हैं। परंतु आदिवासी के नाम से पहचानी जानेवाली जनजाति प्रजा अपने समृद्ध रीति-रिवाजों और परंपराओं का रक्षण करती थी। ये परंपराएँ नई पीढ़ी को विरासत में मिलती थीं। वर्तमान इतिहासकार जनजातियों के इतिहास को लिखने के लिए ऐसी मौखिक परंपराओं का भी उपयोग करते हैं।

जीवनशैली और संस्कृति

आदिवासी समाज अन्य समाज की तुलना में कुछ बातों में भिन्न है, जो उसकी विशिष्ट पहचान है। तो कुछ सांस्कृतिक बातों में उनकी मान्यताएँ अन्य समाज से मिलती-जुलती भी हैं।

आदिवासी समूह अपने जीवननिर्वाह के लिए पहले के समय में वन उत्पादों तथा स्थानीय रूप से होनेवाली खेती पर निर्भर था। तो उनके कला कौशल से उत्पादित होनेवाली साधन-सामग्री भी उनकी आर्थिक आय का अत्यंत महत्त्वपूर्ण साधन था। एकत्रित वन उत्पाद भी उनकी आय बढ़ाते थे। पशुपालन उनके जीवननिर्वाह का एक महत्त्वपूर्ण भाग था।

गुजरात के विविध भागों में रहनेवाली आदिवासी प्रजा अपने पोषाक तथा गहनों से विशिष्ट पहचान रखती थी। उत्तर गुजरात में पुरुष धोती, कमीज और फाणिया (फ्रॉक जैसा कुर्ता) पहनते थे। पूर्व पट्टी में काली बंडी और पोतड़ी (साफा) पहनना प्रचलित था तो दक्षिण गुजरात में कुछ जातियों में धोती/पैजामा उनके पोशाक का भाग था। महिलाएँ भी उत्तर गुजरात में झूलड़ी पहनती थीं। वर्तमान समय में ज्यादातर आदिवासी समुदाय ने सामान्य समाज जैसा ही पहनावा अपना लिया है। अपने विशेष उत्सव के समय ही वे परंपरागत पोशाक पहनते हैं। विविध प्रसंगों पर उनके वाद्य और नृत्य आज भी आकर्षण पैदा करते हैं।

आदिवासियों के समूह की सबसे बड़ी पहचान उनकी विशिष्ट परंपराओं, बोलियों तथा उत्सवों में देखने को मिलता है। आदिवासी समूह प्रकृति का प्रेमी और संवर्धक रहा है। वे प्रकृति तत्त्व और भिन्न-भिन्न स्वरूप में देवीदेवताओं में श्रद्धा रखते हैं, उन्हें प्रसन्न करने के लिए अनुष्ठान करते हैं, विवाह के संबंध में भी इस समाज में विशिष्ट रीति-रिवाज देखने को मिलते हैं। प्रत्येक जनजाति में उनके समाज के पंच महत्त्वपूर्ण होते हैं, वे अपनी परंपराओं को बचाए रखने का काम करते हैं।

वर्तमान समय में सरकार की विविध योजनाओं, शिक्षा के प्रसार, तकनीकी विकास के कारण दूसरे समाज की तरह आदिवासी समाज में भी परिवर्तन आया है। झोंपड़ियों के स्थान पर पक्के मकान, शिक्षा की सुविधा, आधुनिक पहनावा और सामाजिक चेतना देखने को मिलती है।

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जनजातियों में आया सांस्कृतिक परिवर्तन

अर्थव्यवस्था और समाज की जरूरतें बढ़ने से नए कला-कौशल युक्त लोगों की आवश्यकता बढ़ी है। समाज भिन्न-भिन्न जातियों में विभाजित हुआ। दूसरी तरफ कई जनजातियों और सामाजिक समूहों को जाति का दर्जा दिया गया। ऐसी जातियों में विशिष्ट कौशलवाला समूह मुख्य है। अब वर्ण के बदले जाति समाज के संगठन का आधार बन गया है।

भारत की मुख्य जनजाति के क्षेत्र

भारत के अधिकांश क्षेत्रों में जनजाति की संख्या है। जनजाति का क्षेत्र और प्रभाव समय के साथ बदलता रहता है। कुछ जनजातियाँ अत्यंत शक्तिशाली होने से बड़े प्रदेशों पर नियंत्रण रखती थीं। जैसे कि तेरहवीं-चौदहवीं सदी दौरान पंजाब में खोखर जनजाति और गख्खर जनजाति मुख्य थी। इसी जनजाति के कमालखाँ गख्खर को अकबर ने मनसबदार बनाया था। मुगलों से पूर्व मुल्तान और सिंध में लंघा और अरघुन जनजातियों का अधिपत्य था। भारत के उत्तर-पश्चिम भाग में बलोच जनजाति सबसे शक्तिशाली थी। वह विविध नेताओं वाले छोटे-छोटे कुलों में विभाजित थी। पश्चिम हिमालय में रहनेवाली गद्दी गडरिया नामक जनजाति मुख्य थी। जबकि भारत के उत्तर-पूर्व भाग में नागा, कूकी, मीजो, अहोम और अन्य जनजातियों का प्रभुत्व था।

बिहार और झारखंड के कई क्षेत्रों में बारहवीं सदी तक चेर सरदारों का आधिपत्य था। 1591 ई. में अकबर के सेनापति राजा मानसिंह ने चेर जाति पर हमला करके पराजित किया। परंतु संपूर्ण रूप से उन्हें अधीन नहीं बना सके। औरंगजेब के समय में मुगल सेना ने चेर जाति के कई किलों पर कब्जा करके, उन पर प्रभुत्व स्थापित कर लिया। इस क्षेत्र की दो महत्त्वपूर्ण जनजातियाँ मुंडा और संथाल थीं। ये जनजातियाँ इस क्षेत्र के उपरांत ओडिशा और बंगाल में भी रहती थीं।

कर्नाटक और महाराष्ट्र के पहाड़ी क्षेत्रों में कोली, बराद और दूसरी कई जनजातियाँ रहती थीं। दक्षिण भारत में कोरागा, वेतर, मारवार और दूसरी जनजाति के लोग बड़ी संख्या में रहते थे।

भील इन जनजातियों में गिने जाते थे। जो पश्चिम और मध्य भारत में फैले हुए थे। गुजरात और मध्यप्रदेश राज्य में भील सरदारों के राज्य थे। सोलहवीं सदी के अंत तक कबीलों में से कई किसान और जमीनदार के रूप में स्थायी हो चुके थे। जबकि कुछ भील कुल शिकार और अन्नसंग्रह जैसी प्रवृत्तियों के साथ जुड़े रहे।

गोंड और अहोम

गोंड : भारत के गोंडवाना नामक विशाल वनप्रदेश में रहनेवाली प्रजा गोंड कहलाती है। जो भारत की पुरानी जनजातियों में से एक है। वे स्थांतरित खेती करते थे। छोटे-छोटे कुलों में बँटी विशाल गोंड जाति में प्रत्येक कुल में एक-एक राजा थे। अकबरनामा में उल्लेख किया गया है कि गढ़कटंगा के गोंड राज्य में 70,000 गाँवों का समावेश था। इस समय छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में गोंड लोगों की जनसंख्या अधिक है।

उनकी राज्य-व्यवस्था केन्द्रीकृत थी। राज्य गढ़ में बँटा हुआ था। प्रत्येक गढ़ पर एक खास गोंड कुल का आधिपत्य था। प्रत्येक गढ़ 84 गाँवों की एक इकाई में बँटा था, जिसे चौरासी कहा जाता था। प्रत्येक चौरासी बारह-बारह गाँवों के एक उप इकाई बारहोतो में बाँटा जाता था।

बड़े राज्यों के उदय के साथ गोंड समाज में भी परिवर्तन आया। मूलभूत राजपूत रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए गढ़कटंगा के गोंड राजा अमनदास ने संग्रामशाह की पदवी धारण की। उनके पुत्र दलपत ने महोबा के चंदेल राजपूत राजा की राजकुमारी दुर्गावती के साथ विवाह किया।

युवावस्था में ही दलपत की मृत्यु हो जाने से दुर्गावती ने पाँच वर्ष के पुत्र वीरनारायण के नाम से शासन की बागडोर संभाली। 1565 ई. में आसिफखान के नेतृत्व में मुगल सेना ने दुर्गावती को हराया। रानी और उनके पुत्र युद्ध में लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए।

गढ़कटंगा राज्य हाथियों के व्यापार से खूब धन कमाता था। गढ़कटंगा पर विजय प्राप्त करके मुगलों ने खूब धन और हाथी प्राप्त किया। उन्होंने राज्य का अधिकांश भाग अपने नियंत्रण में रखा, जबकि शेष भाग वीरनारायण के चाचा चंदरशाह को सौंप दिया। गढ़कटंगा के पतन के बाद निर्बल बना गोंड राज्य शक्तिशाली बुंदेलों और मराठों के आक्रमण के सामने नहीं टिक सका।

अहोम :

अहोम लोग तेरहवीं सदी में वर्तमान म्यानमार से आकर असम की ब्रह्मपुत्र नदी के घाटी क्षेत्र में बसे। उन्होंने भुइया (भूस्वामी/जमीनदार) की पुरानी राजनैतिक व्यवस्था को बदलकर एक नए राज्य की स्थापना की। सोलहवीं सदी में चूटियो (1523 ई.) और कोच-हाजो (1581 ई.) राज्य को अपने राज्य में मिला लिया और आसपास की जनजातियों को जीतकर एक विशाल अहोम राज्य की स्थापना की थी। सत्रहवीं सदी में तो वे गोला-बारूद और तोपों का निर्माण भी कर सकते थे।
जबकि दक्षिण-पश्चिम से अहोम लोगों पर खूब आक्रमण हुए। 1662 ई. में मीर जुमला के नेतृत्व में मुगल सेना से बहादुरी से लड़ने पर भी वे हार गए। परंतु इस क्षेत्र पर मुगलों का प्रत्यक्ष प्रभुत्व लंबे समय तक नहीं रह सका।

अहोम राज्य जबरदस्ती पूर्वक श्रम (Forced Labour) पर आधारित था। जो लोगों से राज्य के लिए जबरदस्ती काम करवाता था, जिसे ‘पाइक’ कहते थे। प्रत्येक गाँव से निश्चित संख्या में ‘पाइक’ भेजना पड़ता था। जनगणना के आधार पर अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्रों से कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों में लोगों को स्थानांतरित करने से अहोम कुल का विभाजन हो गया। सत्रहवीं सदी के प्रथम दशक में प्रशासनिक व्यवस्था केन्द्रीकृत बन गई। वर्तमान कानून और व्यवस्था के अनुसार किसी व्यक्ति से जबरदस्ती काम करवाना गुनाह है, जो हम सब जानते हैं।

इस जनजाति के पुरुष युद्ध के समय सेना में जुड़ जाते थे और अन्य समय में खेती एवं सिंचाई व्यवस्था जैसे सार्वजनिक कार्य करते थे। अहोम लोगों ने चावल की खेती की नवीन पद्धति अपनाई।

अहोम समाज कुल में बँटा हुआ था। उनके कुल को ‘खेल’ कहा जाता था। बहुत-से गाँवों पर खेल का नियंत्रण रहता था। किसान को गाँव के समाज द्वारा दी गई जमीन ग्रामसमाज की अनुमति के बिना राजा भी वापस नहीं ले सकता था।

प्रारंभ में अहोम लोग जनजातीय देवताओं (प्रकृति के देवताओं) की उपासना करते थे। राजा द्वारा मंदिरों और ब्राह्मणों को जमीन दान दी जाती थी। सिबसिंह (1714 ई. से 1744 ई.) के समय में हिंदू धर्म वहाँ का मुख्य धर्म बन गया था। हिंदू धर्म अपनाने के बाद भी अहोम राजाओं ने अपनी परंपरागत मान्यताओं को सम्पूर्ण रूप से नहीं छोड़ा।

अहोम समाज सुसंस्कृत समाज था। कवियों और विद्वानों को जमीन दान में दी जाती थी। नाट्यप्रवृत्ति को प्रोत्साहन दिया जाता था। संस्कृत की महत्त्वपूर्ण साहित्यिक कृतियों का स्थानीय भाषा में अनुवाद किया गया था। ‘बुरंजी’ नाम ऐतिहासिक कृति को पहले अहोम भाषा में और फिर आसामी भाषा में लिखा गया था।

बदलते समय : नई जनजातियों की संरचना

16वीं और 17वीं सदी तक के जनजाति के इतिहास को हमने समझने का प्रयत्न किया। कालांतर में अनेक जनजातियों में व्यापक परिवर्तन आया। वर्ण आधारित समाज और आदिवासी समाज के लोगों के एक दूसरे के साथ संपर्क होने से दोनों समाज में परिवर्तन आया। विविध जनजातियों ने भिन्न-भिन्न आजीविका अपनाई। समय के साथसाथ उनमें से कई जनजातियाँ जाति आधारित समाज का भाग बन गईं। जबकि कई जनजातियाँ हिंदू धर्म और जाति व्यवस्था से अधिकांशतः दूर रहीं। कुछ जनजातियों ने सुसंगठित प्रशासनिक व्यवस्थावाले बड़े शक्तिशाली राज्यों की स्थापना की। जिससे बड़े साम्राज्यों के साथ उनका संघर्ष हुआ।