Class 7 Social Notes Chapter 13 आपदा प्रबंधन

आपदा शब्द कान में पड़ने के साथ हमारे मन में भय और डर का भाव उत्पन्न होता है। आपदा को सामान्य व्यवहार में हम आपत्ति, विपदा या प्रकोप जैसे शब्दों से भी पहचानते हैं। आपदा के साथ विनाश और नुकसान की कल्पना भी हमें आए बिना नहीं रहती। आपदा के जोखिम की हमें जानकारी है। बचाव और राहत कार्य के आयोजन के लिए उसके जवाबदार संयोगों की बातें ध्यान में लेनी पड़ेगी, यह जानकारी हमें बचाव के लिए बहुत ही उपयोगी है। आपदा प्रबंधन के विशेषज्ञों ने आपदा को दो भागों में बाँटा है। इसके प्रकार और इसके विविध स्वरूप विस्तार से जानें :

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उपर्युक्त घटनाएँ भारी विनाश और हानि पहुँचानेवाली होती हैं। बाढ़, त्सुनामी, चक्रवात और अकाल का पूर्व अनुमान संभव है। जिससे उसका बचाव करने का समय मिल जाता है। और जानहानि को बचा सकते हैं। जबकि भूकंप, ज्वालामुखी और दावानल की भविष्यवाणी नहीं कर सकते, जिससे उसके द्वारा भारी विनाश होने की संभावना होती है।

यहाँ हम प्राकृतिक आपदाओं जैसे भूकंप, चक्रवात, त्सुनामी, बाढ़ और अकाल के विषय में जानेंगे।

भूकंप

सामान्य रूप से पृथ्वी के धरातल का कांपना भूकंप कहलाता है। इस घटना के लिए पृथ्वी के गर्भ में होने- वाली भूगर्भिक क्रियाएँ जिम्मेदार हैं जिस क्षेत्र का भू-पृष्ठ कमजोर होता है वे भूकंप संभावित क्षेत्र माने जाते हैं। ऐसे क्षेत्रों को अलग किया जा सकता है परंतु भूकंप की निश्चित भविष्यवाणी संभव नहीं है। इसलिए जब यह आपदा आए तब भारी जान-माल का नुकसान होता है।

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चक्रवात

वातावरण में वायु दाब में होनेवाले असंतुलन की परिस्थिति से प्रचंड वातावरणीय तूफान उद्भव होते है, जिन्हें चक्रवात कहते हैं। ये तूफानी वातावरणीय पवनें जिस क्षेत्र से गुजरती हैं वहाँ भारी प्रचंड विनाश करती हैं। भारत में पूर्वीतट और मलबार तट तथा गुजरात में कच्छ और सौराष्ट्र के किनारों पर इससे हुए भारी विनाशक प्रभाव दिखाई देते हैं।

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त्सुनामी

समुद्र या महासागर के तल में होनेवाले भूकंप और ज्वालामुखी प्रस्फोटन से अथवा समुद्र में बड़े स्तर पर होनेवाले भूस्खलन से पैदा होनेवाली विनाशक लहरों को त्सुनामी कहते हैं। हालांकि त्सुनामी की उत्पत्ति के लिए सागर तल में आनेवाले भूकंप उत्तरदायी हैं। संक्षिप्त में भूकंपीय समुद्री-लहरें त्सुनामी के रूप में पहचानी जाती हैं। ये लहरें अपने उत्पत्तिस्थान से वलय आकार में गति करती किनारे पर आएँ तब भारी विनाशकारी बन जाती हैं। इसकी किनारे पर गति कम होते ही ये अधिक ऊँचाई धारण करती हैं। किनारे पर पानी की दीवार बनकर आगे बढ़कर भारी विध्वंस मचाती हैं। हालांकि अब आधुनिक उपग्रह आधारित साधनों की मदद से त्सुनामी का निश्चित अनुमान लगा सकने के कारण सूचित प्रभाववाले क्षेत्रों में से लोगों को समय पर स्थलांतरित करके जानहानि को रोक सकते हैं। हालांकि ऐसी टेक्नोलॉजी/साधन सभी देशों के पास नहीं है यह वास्तविकता है।

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जानकर अच्छा लगेगा 26 दिसम्बर, 2004 के दिन आए हुए महाविनाशक त्सुनामी में से हिन्द महासागर के तटवर्ती देशों में से थाईलैण्ड, इन्डोनेशिया, भारत, श्रीलंका आदि देशों में लगभग 2 लाख लोगों ने जीवन गँवाया था।

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जानना अच्छा लगेगा-
इस प्रकार का चिह्न त्सुनामी आने की संभावना दर्शानेवाले क्षेत्रों की निशानी है।

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बाढ़

लगातार बरसात या अतिवृष्टि के परिणामस्वरूप विशाल भू-क्षेत्र जलमग्न हो जाएँ, उसे बाढ़ कहते हैं। सामान्य रूप से हम इन घटनाओं को नदी के साथ जोड़ते हैं। बाढ़ के लिए प्राकृतिक ढलानों पर बनाए गए बांध, प्राकृतिक जलनिकास के मार्गों में अवरोध जैसे मानवसर्जित कारण भी जिम्मेदार है। बड़े शहरों में कभी जल भराव की स्थिति बाढ़ का रूप धारण कर लेती है।

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क्रिया-कलाप- दिए गए गुजरात के मानचित्र के आधार पर बाढ़ संभावित क्षेत्रों की जानकारी अपने शिक्षक की सहायता से प्राप्त करें।

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क्रिया-कलाप

  • आपके गाँव/शहर में पानी भरता हो, ऐसे क्षेत्रों की सूची बनाइए।
  • आपके गाँव/शहर में बरसात के पानी का निकास कैसे होता है, उसकी जानकारी प्राप्त कीजिए।
  • बाढ़ की समस्या हल करने के लिए क्या-क्या कदम उठाने पड़ते हैं, इसकी चर्चा कीजिए।

अकाल

अकाल एक विनाशकारी और लम्बे समय तक अपना प्रभाव छोड़े, ऐसी प्राकृतिक आपदा है। यह आपदा समग्र जीवसृष्टि के अस्तित्व के लिए अत्यंत आवश्यक पानी और भोजन के साथ जुड़ी है। मौसमी जलवायु में समयांतर में अकाल पड़ना, यह एक लक्षण है। जिस वर्ष वर्षा कम पड़े या बिलकुल ही ना हो तब यह समस्या | उद्भव होती है। इस कमी की स्थिति में कृषि और जीवसृष्टि को पानी का अभाव भारी हानि पहुँचाता है और मनुष्य के लिए अनाज की समस्या तथा पालतू प्राणियों के लिए चारे की समस्या सर्जित होती है। पहले अकाल में भुखमरी से भारी जानहानि होती थी परंतु आधुनिक समय में व्यवस्थित प्रबंधन से जानहानि को रोक सकते हैं।

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आपदा के प्रभाव

  • भूकंप, बाढ़, त्सुनामी, चक्रवात जैसी आपत्तियाँ भारी मात्रा में जान-माल को नुकसान पहुँचाती है।
  • आपदाग्रस्त क्षेत्रों में मार्ग, मकान, सार्वजनिक सुविधा के मकान आदि पुनः बनाने में बहुत साल निकल जाते हैं।
  • जिन लोगों ने अपने स्वजनों को आपदा में खोया हो, ऐसे लोगों को भारी शोक और हताशा घेर लेती है।
  • जिन परिवारों ने कमानेवाले व्यक्ति खोये हों उनकी स्थिति बेहाल हो जाती है।
  • आपदा में जो लोग स्थायी विकलांग हुए हों, उनके पुनर्वास की समस्या भारी विकट होती है।

इस प्रकार के मुख्य प्रभाव देखने को मिलते हैं। आपदा का प्रभाव कम-अधिक मात्रा में सभी लोगों पर पड़ता है परंतु इसका सबसे गंभीर प्रभाव गरीबों और अभाव ग्रस्तों पर पड़ता है। मानवजीवन पर इनके गंभीर प्रभाव कम करने के लिए सावधानी, लोकजागृति और तंत्र को सतर्क करने जैसे कदम उठाने से उनकी विनाशक तीव्रता कम की जा सकती है। आपदाओं तथा दुर्घटनाओं में कुछ घटनाएँ मानव सर्जित होती हैं, यदि हम समझदारी और पूर्वसावधानी रखें तो ऐसी घटनाओं को टाला जा सकता है। कई बार आपदा के समय लोग राहत तथा बचाव कार्य में सहायक बनने के बदले उस कार्य में अवरोध या विलंब हो इस तरह वाहन खड़े करके मोबाइल फोन से वीडियो बनाने लग जाते हैं। जिसके कारण प्रभावित लोगों के जीवन में जोखिम उत्पन्न हो जाता है। ऐसे समय में हमें राहत और बचाव कार्य में तंत्र को सहायक बनना चाहिए।

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टिड्डी : प्रकोप-जैविक आपदा

टिड्डी एक कीट वर्ग में आती है। जिसकी 11,000 प्रजातियाँ होती हैं। वे झुण्ड में रहना पसंद करती हैं। 2019-20 में गुजरात के रेगिस्तानी क्षेत्र और रेगिस्तानी किनारों में कच्छ-बनासकांठापाटण जिले के कुछ क्षेत्रों में उनका उपद्रव दिखाई दिया था। गुजरात में पाई गई टिड्डी, रेगिस्तानी टिड्डी, खाउंधरा टिड्डी के नाम से पहचानी जाती है। इस प्रकार की टिड्डी करोड़ों की संख्या में झुंड में टूट पड़ती है। अपने जीवनकाल में अपने वजन टिड्डी से हजारगुना खा जाती है। वह अपने स्थलांतर मार्ग में जहाँ ऊतरती है; वहाँ कृषि फसल – हरी वनस्पति – वृक्षों के पत्ते आहार बनाकर उस क्षेत्र की फसलों को चट कर जाती है। जिन क्षेत्रों में टिड्डी का उपद्रव होता है वहाँ फसलों के अभाव से अनाज के अकाल की स्थिति सर्जित हो जाती है। यद्यपि वर्तमान में आधुनिक वाहन-व्यवहार की सुविधा के समय में अन्य प्रदेश से अनाज लाकर कमी दूर की जा सकती है।
खेती-बाड़ी विभाग की सूचना अनुसार खास दवाओं का छिड़काव करके टिड्डी का नाश कर सकते हैं।

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