Class 12 Sociology Solutions Chapter 2 ग्रामीण समाज

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (TEXTUAL QUESTIONS)

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

A. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1. ग्रामीण समाज दो वर्गों में विभाजित है-
(क) स्वामी एवं दास
(ख) शोषक वर्ग तथा शोषित वर्ग
(ग) उच्च वर्ग तथा निम्न वर्ग
(घ) पूँजीपति तथा मज़दूर।
उत्तर-(ख) शोषक वर्ग तथा शोषित वर्ग।

प्रश्न 2. अधिक अनाज पैदावार हेतु नई तकनीकों के परिचय में सहायक है।
(क) श्वेत क्रान्ति
(ख) नीली क्रान्ति
(ग) पीत क्रान्ति
(घ) हरित क्रान्ति।
उत्तर-(घ) हरित क्रान्ति।

प्रश्न 3. समूह में ही साथी का चुनाव कहलाता है
अथवा
समूह के अन्दर साथी के चुनाव को कहते हैं
(क) बहिर्विवाह
(ख) अन्तर्विवाह
(ग) समूह विवाह
(घ) एकल विवाह।
उत्तर-(ख) अन्तर्विवाह।

प्रश्न 4. जजमानी व्यवस्था किसके संबंध पर आधारित है ?
(क) जजमान
(ख) कामीन
(ग) जजमान तथा कामीन
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-(ग) जजमान तथा कामीन।

प्रश्न 5. ग्रामीण समाज में ऋणग्रस्तता का कारण है
(क) विकास
(ख) गरीबी तथा घाटे वाली व्यवस्था
(ग) आत्मनिर्भरता
(घ) जीविका अर्थव्यवस्था।
उत्तर-(ख) गरीबी तथा घाटे वाली व्यवस्था।

प्रश्न 6. नवीन कृषि तकनीक ने किसानों को बना दिया है-
(क) बाज़ारोन्मुख
(ख) श्रमिक वर्ग
(ग) आत्मपर्याप्त
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-(क) बाज़ारोन्मुख।

B. रिक्त स्थान भरें-

1. ग्राम के मुखिया को …………… जाना जाता था।
2. ग्रामीण समाज आकार में …………. है।
3. …………. व्यवस्था कमीन के शोषण पर आधारित है।
4. ग्रामीण समाज में सामाजिक नियन्त्रण ………… प्रकृति में है।
5. ………. तथा ………… ग्रामीण समाज में सामाजिक अपेक्षा के उदाहरणों में प्रयोग किया जाता है।
उत्तर-

  1. ग्रामिणी
  2. छोटा
  3. जजमानी
  4. अनौपचारिक
  5. जाति पंचायत तथा ग्राम पंचायत।

C. सही/गलत पर निशान लगाएं-

1. ग्राम भारत की सामाजिक व राजनीतिक संगठन की इकाई है।
2. ग्रामीण ऋणग्रस्तता कमज़ोर वित्तीय ढाँचे की सूचक है।
3. कृषि में साधनों तथा खादों, कीटनाशकों, कृषि संयंत्रों इत्यादि का प्रयोग किया जाता है।
4. ग्रामों में पंचायतों की स्थापना से राजनीतिक जागृति में वृद्धि हुई है।
5. नई तकनीक अपनाने से कृषि रोज़गार के प्रोत्साहन को तीव्रता प्रदान की है।
उत्तर-

  • सही
  • सही
  • सही
  • सही
  • गलत।

D. निम्नलिखित शब्दों का मिलान करें-

कॉलम ‘ए’ — कॉलम ‘बी’
प्रत्यक्ष सम्बन्ध — ऋणग्रस्तता
परिवार का मुखिया — उच्च पैदावार विविधता बीज
समूह के अन्दर विवाह — प्रगाढ़ सम्बन्ध
मुकद्दमेबाज़ी — कर्ता
गेहूँ, चावल व अन्य फसलें — अन्तर्विवाह।
उत्तर-
कॉलम ‘ए’ — कॉलम ‘बी’
प्रत्यक्ष सम्बन्ध — प्रगाढ़ सम्बन्ध
परिवार का मुखिया — कर्ता
समूह के अन्दर विवाह — अन्तर्विवाह।
मुकद्दमेबाज़ी — ऋणग्रस्तता
गेहूँ, चावल व अन्य फसलें — उच्च पैदावार विविधता बीज

II अति लघु उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1. “वास्तविक भारत गाँवों में बसता है।” किसका कथन है ?
उत्तर-महात्मा गाँधी का।

प्रश्न 2. भारत में पूंजीवादी कृषि की वृद्धि में किस क्रान्ति ने सहायता प्रदान की?
उत्तर- हरित क्रान्ति ने।

प्रश्न 3. किस कमीशन ने ठीक कहा है कि, “भारतीय किसान ऋण में पैदा होता है, ऋण में रहता है तथा ऋण में मर जाता है।”
उत्तर-रॉयल कमीशन (Royal Commission) ने।

प्रश्न 4. उच्च पैदावार विविधता उत्पादों के कृषि उत्पादन में कौन-सी क्रान्ति पैदा की है?
उत्तर-हरित क्रान्ति।

प्रश्न 5. अपने समूह से बाहर विवाह क्या कहलाता है ?
उत्तर-बहिर्विवाह।

प्रश्न 6. प्राचीन समय के दौरान गाँव के मुखिया को कैसे जाना जाता था?
उत्तर-प्राचीन समय में गाँव के मुखिया को ग्रामीणी कहते थे।

प्रश्न 7. किसने कहा “वास्तविक भारत इसके गाँवों में बसता है।”
उत्तर-यह शब्द महात्मा गाँधी के थे।

प्रश्न 8. जजमानी व्यवस्था किसके मध्य संबंधों पर आधारित है ?
उत्तर-जजमानी व्यवस्था जजमानी तथा कमीन के बीच रिश्तों पर आधारित है।

प्रश्न 9. HYV’s का पूर्ण रूप क्या है ?
उत्तर-HYV’s का पूरा अर्थ है High Yielding Variety Seeds.

प्रश्न 10. क्या गरीबी ऋणग्रस्तता का मुख्य कारण है ?
उत्तर-जी हाँ, निर्धनता ऋणग्रस्तता के मुख्य कारणों में से एक है।

III. लघु उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1. संयुक्त परिवार क्या है ?
उत्तर-संयुक्त परिवार, परिवार का वह प्रकार है जिसमें कम-से-कम तीन पीढ़ियों के लोग इकट्ठे मिल कर एक ही छत के नीचे रहते हैं। वह एक ही रसोई में बना खाना खाते हैं तथा एक ही कार्य-कृषि करते हैं। वह सभी साझी सम्पत्ति का प्रयोग करते हैं तथा घर के मुखिया का कहना मानते हैं।

प्रश्न 2. ऋणग्रस्तता क्या है ?
उत्तर-जब एक व्यक्ति किसी कार्य को करने के लिए दूसरे व्यक्ति से कुछ पैसे ब्याज पर उधार लेता है तो इसे ऋण कहते हैं। जब पहला व्यक्ति ऋण वापस नहीं कर पाता तथा ब्याज लग कर ऋण बढ़ता जाता है तो इसे ऋणग्रस्तता कहते हैं।

प्रश्न 3. ग्रामीण ऋणग्रस्तता के दो कारण लिखिए।
उत्तर-

  • निर्धनता के कारण ऋण बढ़ता है। कम वर्षा के कारण या जब बारिश नहीं होती तो किसान को नई फसल तैयार करने के लिए ऋण लेना पड़ता है।
  • किसानों का अपने रिश्तेदारों के साथ भूमि के लिए मुकद्दमा चलता रहता है जिस कारण उन्हें साहूकारों से ऋण लेना पड़ता है।

प्रश्न 4. मुकद्दमेबाजी के बारे आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर-गाँव के लोग साधारणतया किसी मुसीबत में फंसे रहते हैं जैसे कि पारिवारिक विवाद, फसल की चोरी, भूमि का विभाजन। इस कारण उन्हें अदालत में मुकद्दमे करने पड़ते हैं, इसे ही मुकद्दमेबाज़ी कहते हैं। इस कारण भी ऋणग्रस्तता की समस्या बढ़ती है।

प्रश्न 5. हरित क्रान्ति क्या है ? ।
उत्तर-1960 के दशक में कृषि का उत्पादन बढ़ाने के लिए एक कार्यक्रम चलाया गया जिसे हरित क्रान्ति कहते हैं। इसमें HYV बीजों का प्रयोग, कीटनाशकों तथा नए उर्वरकों का प्रयोग, आधुनिक मशीनों का प्रयोग तथा सिंचाई के आधुनिक साधनों का प्रयोग शामिल था।

प्रश्न 6. ग्रामीण समाज में हुए दो परिवर्तनों के बारे लिखो।
उत्तर-

  1. अब ग्रामीण समाजों में संयुक्त परिवार खत्म हो रहे हैं तथा उनके स्थान पर केन्द्रीय परिवार सामने आ रहे हैं।
  2. अब ग्रामीण लोग अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं जिस कारण वे धीरे-धीरे नगरों की तरफ बढ़ रहे हैं।

IV. दीर्घ उत्तरों वाले प्रश्न –

प्रश्न 1. ग्रामीण समाज।
उत्तर-ग्रामीण समाज एक ऐसा क्षेत्र होता है जहाँ तकनीक का कम प्रयोग, प्राथमिक सम्बन्धों की प्रधानता, छोटा आकार होता है तथा जहाँ की अधिकतर जनसंख्या कृषि पर निर्भर करती है। इस प्रकार ग्रामीण समुदाय वे समुदाय होते हैं जो एक निश्चित स्थान पर रहते हैं, आकार में बहुत छोटे होते हैं, जहाँ नज़दीक के तथा प्राथमिक सम्बन्ध पाए जाते हैं। लोग एक-दूसरे को नज़दीक से जानते हैं तथा लोगों का मुख्य पेशा कृषि या कृषि से सम्बन्धित होता है।

प्रश्न 2. ग्रामीण समाज की तीन विशेषताएं लिखिए।
उत्तर-

  • ग्रामीण समाज का मुख्य पेशा कृषि या उस पर आधारित कार्य होते हैं क्योंकि ग्रामीण समाज प्रकृति के काफ़ी नज़दीक होता है। लगभग सभी लोग ही कृषि या सम्बन्धित कार्यों में लगे होते हैं।
  • ग्रामीण लोगों का जीवन काफ़ी साधारण तथा सरल होता है क्योंकि उनका जीवन प्रकृति से गहरे रूप से जुड़ा होता है। __ (iii) गांवों की जनसंख्या नगरों की तुलना में काफ़ी कम होती है। लोग दूर-दूर तक छोटे-छोटे समूह बना कर बसे होते हैं तथा इन समूहों को ही गाँव का नाम दिया जाता है।

प्रश्न 3. ऋणग्रस्तता के लिए उत्तरदायी तीन कारण लिखिए।
उत्तर-

  • निर्धनता-गाँव के लोग निर्धन होते हैं तथा उन्हें बीज, मशीनें, जानवर इत्यादि खरीदने के लिए ऋण लेना पड़ता है तथा वे ऋणग्रस्त हो जाते हैं।
  • बुजुर्गों का ऋण-कई लोगों को अपने पिता या दादा द्वारा लिया गया ऋण भी उतारना पड़ता है जिस कारण वे निर्धन ही रह जाते हैं।
  • कृषि का पिछड़ापन-भारतीय कृषि मानसून पर आधारित है तथा अभी भी कृषि की पुरानी तकनीक का प्रयोग किया जाता है। इस कारण कृषि का उत्पादन कम होता है तथा किसान अधिक पैसा नहीं कमा सकते।

प्रश्न 4. पंजाब में हरित क्रान्ति पर लघु टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-देश में कृषि के विकास के मामले में पंजाब ने असाधारण प्रगति की है। पंजाब की कृषि में विकास मुख्य रूप से हरित क्रान्ति से गहरे रूप से सम्बन्धित है। इसमें गेहूँ, चावल तथा अन्य फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए अधिक उत्पादन वाले बीजों (HYV Seeds) का उत्पादन तथा प्रयोग किया गया। इस कारण ही 1966 के बाद पंजाब में गेहूँ तथा चावल का उत्पादन काफ़ी अधिक बढ़ गया। पंजाब की आर्थिक प्रगति कई चीजों में प्रयोग, तकनीकी आविष्कारों के कारण हुई जिनमें अधिक उत्पादन वाले बीजों का प्रयोग, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, ट्यूबवैल, डीज़ल पम्प, ट्रैक्टर कंबाइन इत्यादि शामिल हैं।

प्रश्न 5. हरित क्रान्ति के दो सकारात्मक कारणों तथा व नकारात्मक कारणों के बारे में लिखिए।
अथवा
हरित क्रान्ति के कोई दो प्रभाव लिखो।
उत्तर-सकारात्मक परिणाम-

  • हरित क्रान्ति की प्रमुख सफलता यह थी कि इससे गेहूँ व चावल के उत्पादन में असाधारण बढ़ौतरी हुई।
  • हरित क्रान्ति के कारण खेतों में मजदूरों की माँग काफ़ी बढ़ गई जिस कारण बहुत से लोगों को कृषि के क्षेत्र में रोजगार मिल गया।
    नकारात्मक परिणाम-(i) हरित क्रान्ति का लाभ केवल अमीर किसानों को हुआ जिन्होंने अपने पैसे के बल पर आधुनिक तकनीकों का प्रयोग किया। निर्धन किसानों को इसका काफ़ी कम लाभ हुआ।
  • हरित क्रान्ति के कारण लोगों की आय में काफ़ी अन्तर बढ़ गया। अमीर अधिक अमीर हो गए तथा निर्धन और निर्धन हो गए।

अति दीर्घ उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1. ग्रामीण समाज से आपका क्या आशय है ? इसकी विशेषताओं का विस्तृत विवेचन करें।
अथवा
ग्रामीण समाज को परिभाषित कीजिए। ग्रामीण समाज की विशेषताओं की व्याख्या कीजिए।
अथवा
ग्रामीण समाज को परिभाषित कीजिए।
उत्तर-भारत एक ग्रामीण देश है जहां की अधिकतर जनसंख्या गांवों में रहती है। ग्रामीण क्षेत्र एक ऐसा क्षेत्र होता है जहां तकनीक का कम प्रयोग, प्राथमिक सम्बन्धों की प्राथमिकता, आकार में छोटा होता है तथा जहां पर अधिकतर जनसंख्या कृषि पर निर्भर करती है। ग्रामीण संस्कृति शहरी संस्कृति से बिल्कुल ही अलग होती है। चाहे ग्रामीण तथा शहरी संस्कृति एक सी नहीं होती परन्तु फिर भी इन में अन्तर्सम्बन्धता ज़रूर होती है। यह कई कारणों के कारण शहरी समाज से अलग होता है। चाहे यह सम्पूर्ण समाज का ही हिस्सा होता है। इसमें मिलने वाले कई प्रकार के कारक जैसे कि आर्थिक, भौगोलिक, सामाजिक इत्यादि इसे शहरी समाज से अलग करते हैं। कई विद्वानों ने ग्रामीण समाज को परिभाषित करने का प्रयास किया है जिनका वर्णन इस प्रकार है :

  • ए० आर० देसाई (A.R. Desai) के अनुसार, “ग्रामीण समाज गांव की एक इकाई होता है। यह एक थियेटर है, जिसमें ग्रामीण जीवन अधिक मात्रा में अपने आप को तथा कार्यों को प्रकट करता है।”
  • आर० एन० मुखर्जी (R.N. Mukherjee) के अनुसार, “गांव वह समुदाय है जिसके विशेष लक्षण सापेक्ष, एकरूपता, सादगी, प्राथमिक समूहों की प्रधानता, जनसंख्या की कम घनता तथा कृषि मुख्य पेशा होता है।”
  • पीक (Peake) के अनुसार, “ग्रामीण समुदाय सम्बन्धित तथा असम्बन्धित व्यक्तियों का समूह है जो एक परिवार से बड़ा विस्तृत एक बहुत बड़े घर में या परस्पर साथ-साथ स्थित घरों में या कभी अनियमित रूप से तथा कभी एक गली में रहता है, जो मूल रूप से कृषि योग्य भूमि पर साधारण तौर पर कृषि करता है। मैदानी भूमि को आपस में बांटता है तथा इर्द-गिर्द की बेकार भूमि पर पशु चरवाता है तथा जिसके ऊपर निकटवर्ती समुदायों की सीमाओं तक वह अपने अधिकार का दावा करता है।”

इस तरह इन परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि ग्रामीण समुदाय वह समुदाय होते हैं जो एक निश्चित स्थान पर रहते हैं, आकार में बहुत छोटे-छोटे होते हैं, निकट सम्बन्ध पाए जाते हैं तथा प्राथमिक सम्बन्ध पाए जाते हैं। लोग एक-दूसरे को नज़दीक से जानते हैं तथा लोगों का मुख्य पेशा कृषि या कृषि से सम्बन्धित होता है।

ग्रामीण समाज की विशेषताएं (Characteristics of Rural Society)-

1. कृषि-मुख्य पेशा (Agriculture-Main Occupation)—ग्रामीण समाज का मुख्य व्यवसाय कृषि पेशा या उस पर आधारित कार्य होते हैं क्योंकि ग्रामीण समाज प्रकृति के बहुत ही नज़दीक होता है। क्योंकि इनमें प्रकृति के साथ बहुत ही नज़दीकी के सम्बन्ध होते हैं इस कारण यह जीवन को एक अलग ही दृष्टिकोण से देखते हैं। चाहे गांवों में और पेशों को अपनाने वाले लोग भी होते हैं जैसे कि बढ़ई, लोहार इत्यादि परन्तु यह बहुत कम संख्या में होते हैं तथा यह भी कृषि से सम्बन्धित चीजें ही बनाते हैं। ग्रामीण समाज में भूमि को बहुत ही महत्त्वपूर्ण समझा जाता है तथा लोग यहीं पर रहना पसन्द करते हैं क्योंकि उनका जीवन भूमि पर ही निर्भर होता है। यहां तक कि लोगों तथा गांव की आर्थिक व्यवस्था तथा विकास कृषि पर निर्भर करता है।

2. साधारण जीवन (Simple Life)-गांव के लोगों का जीवन बहुत ही सादा तथा सरल होता है। प्राचीन ग्रामीण समाजों में लोग अपनी ज़रूरतें पूर्ण करने के लिए कड़ा परिश्रम करते थे तथा इस परिश्रम के कारण वह ऐशो-आराम से बहुत दूर थे। लोग अपने बच्चों को भी कृषि के कार्यों में ही लगा देते थे क्योंकि वह शिक्षा ग्रहण नहीं करते थे। उनमें मानसिक संघर्ष भी नहीं होता था। गांव के लोग आज भी एक-दूसरे से बहुत प्यार से रहते हैं। एक-दूसरे के सुख-दुःख में वह एक-दूसरे की पूरी मदद करते हैं। किसी की बहू-बेटी को गांव की बहू-बेटी माना जाता है। लोगों की ज़रूरतें भी सीमित होती हैं क्योंकि उनकी आय भी सीमित होती है। लोग साधारण तथा सादा जीवन जीते हैं।

3. कम जनसंख्या तथा एकरूपता (Scarcity of Population and Homogeneity)-गांव की जनसंख्या शहरों की तुलना में काफ़ी कम होती है। लोग दूर-दूर तक छोटे-छोटे समूह बनाकर बसे होते हैं तथा इन समूहों को ही गांव का नाम दे दिया जाता है। गांव में कृषि के अलावा और पेशे कम ही होते हैं जिस कारण लोग शहरों की तरफ भागते हैं तथा जनसंख्या भी कम ही होती है। लोगों के बीच नज़दीकी के सम्बन्ध होते हैं तथा समान पेशा, कृषि, होने के कारण उनके दृष्टिकोण भी एक जैसे ही होते हैं। गांव के लोगों की लोक रीतियां, रूढ़ियां, परम्पराएं इत्यादि एक जैसी ही होती हैं तथा उनके आर्थिक, नैतिक, धार्मिक जीवन में कोई विशेष अंतर नहीं होता है। गांव में लोग किसी दूर के इलाके से रहने नहीं आते बल्कि यह तो गांव में रहने वाले मूल निवासी ही होते हैं या फिर नज़दीक रहने वाले लोग होते हैं। इस कारण लोगों में एकरूपता पायी जाती है।

पड़ोस का महत्त्व (Importance of Neighbourhood) ग्रामीण समाज में पड़ोस का बहुत महत्त्व होता है। लोगों का मुख्य पेशा कृषि होता है जिसमें काफ़ी समय खाली मिल जाता है। इस पेशे में ज्यादा समय नहीं लगता है। इस कारण लोग एक-दूसरे से मिलते रहते हैं, बातें करते रहते हैं, एक-दूसरे से सहयोग करते रहते हैं। लोगों के अपने पड़ोसियों से बहुत गहरे सम्बन्ध होते हैं। पड़ोस में जाति समानता होती है जिस कारण उनकी स्थिति बराबर होती है। लोग वैसे भी पड़ोसियों का सम्मान करना, उनको सम्मान देना अपना फर्ज समझते हैं। एक दूसरे के सुख-दुःख में पड़ोसी ही सबसे पहले आते हैं, रिश्तेदार तो बाद में आते हैं। इस कारण पड़ोस का बहुत महत्त्व होता है।

5. परिवार का नियन्त्रण (Control of Family)-ग्रामीण समाजों में परिवार का व्यक्ति पर पूरा नियन्त्रण होता है। गांवों में ज्यादातर पितृसत्तात्मक परिवार होते हैं तथा परिवार का प्रत्येक छोटा बड़ा निर्णय परिवार का मुखिया ही लेता है। गांवों में तथा परिवार में श्रम विभाजन लिंग के आधार पर होता है। आदमी कृषि करते हैं या फिर घर से बाहर जाकर पैसा कमाते हैं तथा औरतें घर में रहकर घर की देखभाल करती हैं। गांवों में संयुक्त परिवार प्रथा होती है तथा व्यक्ति परिवार के परम्परागत पेशे को अपनाता है। सभी व्यक्ति परिवार में मिल कर कार्य करते हैं जिस कारण उनमें सामुदायिक भावना भी होती है। परिवार को प्राथमिक समूह कहा जाता है। छोटे बड़ों का आदर करना अपना फर्ज समझते हैं। एक ही पेशा होने के कारण उनमें सहयोग भी काफी होता है। परिवार के सभी सदस्य त्योहारों, धार्मिक क्रियाओं इत्यादि में मिलकर भाग लेते हैं। व्यक्ति को कोई भी कार्य करने से पहले परिवार की सलाह लेनी पड़ती है। इस तरह उस पर परिवार का सम्पूर्ण नियन्त्रण होता है।

6. समान संस्कृति (Common Culture)-गांवों के लोग कहीं बाहर से रहने नहीं आते बल्कि गाँव के ही मूल निवासी होते हैं जिस कारण उनकी संस्कृति एक ही होती है। उनकी संस्कृति, रीति-रिवाज, परम्पराएं इत्यादि भी समान ही होती हैं।

7. सामुदायिक भावना (Community Feeling)-ग्रामीण समाज में लोगों के बीच आपसी सम्बन्ध सहयोग पर आधारित होते हैं जिस कारण वहां पर सामुदायिक भावना पायी जाती है। गांव के सभी व्यक्ति ज़रूरत पड़ने पर एक-दूसरे की मदद करने को तैयार रहते हैं। यहां पर लोगों में एकता की भावना होती है क्योंकि लोगों के बीच सीधे तथा प्रत्यक्ष सम्बन्ध होते हैं। अगर गांव के ऊपर तथा गांव के किसी व्यक्ति पर कोई मुश्किल आती है तो सभी व्यक्ति उसका इकट्ठे होकर सामना करते हैं। सभी गांव के रीति-रिवाजों और परम्पराओं का सम्मान करते हैं तथा एक-दूसरे के सुख-दुःख में शामिल होते हैं।

8. स्थिरता (Stability) ग्रामीण समाज एक स्थिर समाज होता है क्योंकि यहां पर गतिशीलता बहुत ही कम होती है। ग्रामीण समाज के भौगोलिक अथवा बहुत-से ऐसे कारण हैं जिनके कारण यह और समाजों से बिल्कुल ही अलग होता है। यह स्थिर समाज होते हैं क्योंकि यह अपने आप में स्व: निर्भर होते हैं।

प्रश्न 2. ऋणग्रस्तता क्या है ? ऋणग्रस्तता के लिए उत्तरदायी कारक कौन से हैं ?
अथवा
ग्रामीण ऋणग्रस्तता क्या है ? ग्रामीण ऋणग्रस्तता के लिए जिम्मेवार कारण लिखो।
उत्तर-ग्रामीण आर्थिक व्यवस्था में आढ़ती का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। अधिकतर क्षेत्रों में साहूकार शब्द उस व्यक्ति के लिए प्रयोग किया जाता है जो ब्याज पर पैसे अथवा ऋण देता है। अलग-अलग स्थानों पर इसे अलगअलग नामों से पुकारा जाता है। प्राचीन भारतीय समाज में ऋण लेने तथा देने की व्यवस्था कानूनों पर आधारित नहीं थी। इस प्रकार ऋण लेने वाले तथा देने वाले के बीच बहुत अच्छे आपसी रिश्ते होते थे। अंग्रेज़ों के आने के बाद जब समझौतों (agreements) के लिए नए कानून बनें तो ऋण देने वालों को जल्दी अमीर बनने का मौका प्राप्त हुआ। अब ऋण लेने तथा देने वाले के रिश्ते व्यक्तिगत न रहे। यह कानून तथा पैसे पर आधारित हो गए।

चाहे प्राचीन भारतीय समाज में किसानों की स्थिति बहुत अच्छी थी परन्तु अंग्रेज़ी राज्य के दौरान उनकी आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर हो गई तथा आज भी हालात उसी प्रकार चल रहे हैं। साधारणतया भारत में किसान ग़रीब होते हैं। परन्तु इसके साथ ही वह समाज में अपनी स्थिति तथा इज्ज़त बना कर रखना चाहते हैं जिसके लिए वह कुछ मौकों पर, विशेषतया विवाहों पर, अपनी हैसियत से अधिक भी खर्च कर देते हैं। इस प्रकार ऋणग्रस्तता भारत में आवश्यक रूप में मौजूद है। भारत के लगभग सभी राज्यों में ऐसे किसान हैं जो सदियों से कर्जे के बोझ के नीचे दबे चले आ रहे हैं। इसके साथ ही खर्च भी बढ़ रहे हैं। जनसंख्या में हरेक बढ़ौतरी के साथ उसी अनुपात में भूमि पर भी बोझ बढ़ता है। आमतौर पर लोग अपनी लड़कियों के विवाह के लिए कर्जा लेते हैं तथा उनमें से अधिकतर वह कर्जा वापिस नहीं कर पाते हैं। भारत में कृषि वर्षा पर आधारित है तथा अगर वर्षा कम हो तो स्थिति और भी खराब हो जाती है। कम वर्षा के कारण उत्पादन कम होता है जिस कारण किसान को ऋण लेना पड़ता है तथा वह और कर्जे के नीचे दब जाता है।

ऋणग्रस्तता की समस्या (Problem of Indebtedness)-आमतौर पर ऋण व्यक्तिगत सम्बन्धों के आधार पर दिए जाते है। परन्तु अब ऋण किसान की भूमि पर दिया जाता है। Indian Agreement Act तथा Civil Procedure Code से ऋण देने वाले के हाथ मज़बूत हुए हैं। इससे साहूकार को न केवल उस किसान की भूमि पर कब्जा करने का अधिकार प्राप्त हुआ जोकि निश्चित समय में ऋण वापिस न कर सके तथा साथ ही साथ उसको किसान के घर की वस्तुओं पर भी कब्जा लेने का अधिकार प्राप्त हुआ। साहूकार उन पर केस चलवाकर जेल भी करवा सकता है। इस प्रकार The Registration of Document Act of 1864 तथा The Transfer of Property Act of 1882 ने साहूकारों की काफ़ी मदद की। इन कानूनों के पास होने के बाद साहूकार और अमीर होते गए तथा ऋणग्रस्तता की भूमि साहूकारों के हाथों में जाने लग गई। इसके साथ ही साहूकारों की संख्या तथा ऋण में भी बढ़ौतरी हो गई। 1911 में ग्रामीण ऋण लगभग 300 करोड़ रुपये था। सर एम० एल० डार्लिंग (Sir. M. L. Darling) के अनुसार 1924 में यह 600 करोड़ के लगभग था जो 1930 में 900 करोड़ रुपये में लगभग हो गया। डॉ० राधा कमल मुखर्जी के अनुसार 1955 में यह 1200 करोड़ रुपये था। उन आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि अंग्रेज़ी राज्य के दौरान यह ऋण तेज़ी से बढ़ा है। उसके बाद तो इसमें तेजी से बढ़ौतरी हुई है।

ऋणग्रस्तता के कारण (Causes of Indebtedness):
ऋणग्रस्तता के बढ़ने के कई कारण हैं जिनका वर्णन इस प्रकार हैं

1. आवश्यक कानूनों की कमी (Absence of Necessary Laws)-ऋणग्रस्तता का सबसे बड़ा कारण है ऋण के बोझ के नीचे दबे व्यक्ति की सुरक्षा के लिए आवश्यक कानूनों की कमी। अपनी उच्च स्थिति के कारण साहूकार किसी भी ऋणग्रस्तता को अपने ऋण में से नहीं निकलने देते जिसने उन से ऋण लिया होता है। गांवों में अगर कोई व्यक्ति एक बार ऋण ले लेता है वह अपनी तमाम उम्र के दौरान ऋण के चक्र में से नहीं निकल सकता है।

2. सरकार द्वारा बेरुखी (Neglect by Government)-ब्रिटिश सरकार ने किसानों को साहूकारों के हाथों में से बचाने के लिए अधिक कोशिशें नहीं की, चाहे बहुत-से समाज सुधारकों ने सरकार को इसके बारे में कई बार चेताया। स्वतन्त्रता के बाद भारत सरकार ने कई कानून इस मामले में बनाए ताकि किसानों को साहूकारों के हाथों से बचाया जा सके। परन्तु इन कानूनों की कुछ कमियों के कारण तथा साहूकारों द्वारा अपने पैसे की मदद से इन कानूनों का ही शोषण होता रहा। किसान इस प्रकार साहूकारों में ऋण के नीचे दबे रहे।

3. आर्थिक अस्थिरता (Economic Disturbances)-1929 में आर्थिक अस्थिरता आई जिससे किसानों की स्थिति और खराब हो गई तथा वह ऋण के नीचे दबे रहे। इसके बाद वह कभी भी ऋण में से बाहर न निकल सके। स्वतन्त्रता के बाद कृषि की लागत बढ़ने के कारण, महंगाई के कारण, बिजली के न होने के कारण तथा डीज़ल पर निर्भर होने के कारण भी वह हमेशा ही साहूकारों में ऋण के नीचे ही दबे रहे।

4. आवश्यकता से अधिक खर्चे (More Expenditure)-चाहे बहुत-से किसान निर्धन होते हैं तथा ऐशो आराम की चीजें खरीदना उनकी हैसियत में नहीं होता है परन्तु फिर भी वह आराम की चीजें खरीदते हैं। इसके अतिरिक्त ग्रामीण समाजों में अपनी हैसियत से बढ़कर खर्च करने की आदत होती है। वह विवाहों विशेषतया लड़की के विवाह पर ज़रूरत से अधिक खर्च करते हैं तथा अपनी हैसियत से बढ़कर दहेज भी देते हैं। इसलिए उनको ऋण लेना पड़ता है। इस तरह इस कारण भी उन पर ऋण बढ़ता है।

5. ऋण लेने की सहूलियत (Facility in taking Loans)-जिस आसानी से गांव के लोगों को ऋण प्राप्त हो जाता है उससे भी किसान ऋण लेने के लिए प्रोत्साहित होते हैं। अगर हम किसी बैंक के पास ऋण लेने चले जाएं तो हमें बैंक की बहुत-सी Formalities पूरी करनी पड़ती हैं। परन्तु साहूकारों से ऋण लेते समय ऐसी कोई समस्या नहीं आती है। वहां केवल व्यक्तिगत जान-पहचान तथा अंगूठा लगा देने से ही ऋण प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार ऋण मिलने में आने वाली आसानी भी ऋण लेने के लिए प्रोत्साहित करती है।

6. साहूकारों की चालाकियां (Tricks of Money-lenders)-साहूकारों की चालाकियों ने भी ऋणग्रस्तता की प्रथा को हमारे देश में बढ़ाया है। आमतौर पर साहूकार ऋण पर बहुत अधिक ब्याज लेते हैं जिस कारण व्यक्ति उस को वापिस नहीं कर सकता है। कई बार तो ऋण देते समय साहूकार पहले ही मूल धन में से ब्याज काट लेते हैं जिस कारण किसान को बहुत ही कम पैसे प्राप्त होते हैं। इस प्रकार कुछ ही समय में ऋण ब्याज से दोगुना अथवा तीन गुना हो जाता है जिस कारण किसानों के लिए ब्याज देना ही मुश्किल हो जाता है।

इसके साथ ही ग्रामीण लोगों में एक आदत होती है कि वह अपने बुजुर्गों द्वारा लिए ऋण को वापस करना अपना फर्ज़ समझते हैं। इस प्रकार ऋण पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। ग्रामीण लोगों की अनपढ़ता भी ऋणग्रस्तता का महत्त्वपूर्ण कारण है। साहूकार ऋण तो कम देते हैं तथा पैसे अधिक लिख लेते हैं तथा उसकी अनपढ़ता का लाभ उठाते हैं। वह किसान से एक कोरे कागज़ पर अंगूठा लगवा लेते हैं तथा इसकी मदद से कुछ समय बाद किसान का सारा कुछ अपने नाम कर लेते हैं। भारतीय गांवों में साहूकार आमतौर पर उच्च जातियों से सम्बन्धित होते हैं तथा अन्य जातियों के लोग में इतनी शक्ति नहीं होती कि वह उच्च जाति के लोगों का विरोध कर सकें इस तरह इन कारणों के कारण भी ऋणग्रस्तता की समस्या बढ़ती है।

प्रश्न 3. हरित क्रान्ति की परिभाषा दें। इसके घटकों का विस्तार से विवेचन करें।
उत्तर-हरित क्रान्ति कृषि उत्पादन को बढ़ाने का एक नियोजित तथा वैज्ञानिक तरीका है। पंचवर्षीय योजनाओं का मूल्यांकन करने के पश्चात् यह साफ हो गया कि अगर हमें फसलों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करनी है तो उत्पादन सम्बन्धी नए तरीकों तथा तकनीकों का प्रयोग करना पड़ेगा। इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए भारत में 1966-67 में कृषि में तकनीकी परिवर्तन शुरू हुए। इसमें अधिक उत्पादन वाले बीजों, सिंचाई के विकसित साधनों, रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों का प्रयोग किया जाने लगा। कृषि में विकसित साधनों के प्रयोग को ही हरित क्रान्ति का नाम दिया गया। यहां शब्द ‘हरित’ को ग्रामीण क्षेत्रों के हरे-भरे खेतों के लिए प्रयोग किया गया तथा ‘क्रान्ति’ शब्द बहुपक्षीय परिवर्तन को दर्शाता है। हरित क्रान्ति के प्रथम भाग में ‘गहन कृषि जिला कार्यक्रम’ शुरू किए गए जिसमें पहले तीन ज़िलों तथा बाद में 16 जिलों को शामिल किया गया। चुने हुए जिलों में कृषि की उन्नत विधियों, उर्वरक, बीजों, सिंचाई के साधनों का प्रयोग किया गया।

1967-68 में इस कार्यक्रम को देश के अन्य भागों में भी लागू कर दिया गया। इस कार्यक्रम में किसानों में कृषि सम्बन्धी नई तकनीक, ज्ञान व उत्पादन के नए साधन बांटे गए ताकि उत्पादन में बढ़ौतरी की जा सके। सरकार ने इस कार्यक्रम को पूर्णतया सहायता दी तथा यह कामयाब हो गया। देश गेहूँ तथा चावल के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो गया।
हरित क्रान्ति के मुख्य तत्त्व (Major Elements of Green Revolution) हरित क्रान्ति के मुख्य तत्त्वों का वर्णन इस प्रकार है-

  • अधिक उत्पादन वाले बीजों के प्रयोग से फसलों का उत्पादन बढ़ गया।
  • रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों के प्रयोग ने भी कृषि उत्पादन को बढ़ाने में प्रमुख भूमिका अदा की।
  • आधुनिक कृषि की मशीनें जैसे कि ट्रैक्टर, थ्रेशर, कंबाइन, पंप सैट, स्परेयर (Eprayer) इत्यादि ने भी उत्पादन बढ़ाने में योगदान दिया।
  • कृषि के बढ़िया ढंगों विशेषतया जापानी ढंग के प्रयोग ने भी उत्पादन बढ़ाया।
  • किसानों को नई सिंचाई सुविधाओं के बारे में बताया गया जिससे कृषि उत्पादन बढ़ गया।
  • एक वर्ष में कई बार फसल बीजने तथा काटने की प्रक्रिया ने भी उत्पादन बढ़ाने में योगदान दिया।
  • किसानों को सस्ते ब्याज पर ऋण देने के लिए कई संस्थाओं की स्थापना की गई ; जैसे कि को-आप्रेटिव सोसायटी, ग्रामीण बैंक, इत्यादि। इनसे ऋण लेकर किसान कृषि उत्पादन बढ़ा सकते हैं।
  • सरकार द्वारा किसानों को फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) देने का विश्वास दिलाया गया जिस कारण किसानों ने उत्पादन बढ़ाया।
  • Soil Conservation जैसे कार्यक्रमों ने भूमि की उत्पादन शक्ति को संभालने तथा बढ़ाने में सहायता की।
  • कृषि के सामान की बिक्री के लिए मार्किट कमेटियों, को-आप्रेटिव मार्केटिंग सोसायटियां बनाई गईं ताकि उत्पादन बढ़ाया जा सके।
  • सरकार ने भूमि सुधारों पर काम किया ताकि बिचौलियों का खात्मा, कार्य की सुरक्षा, किसानों को मालिकाना अधिकार, भूमि की चकबन्दी इत्यादि ने भी उत्पादन बढ़ाने में सहायता दी।
  • सरकार ने ग्रामीण समाज से सम्बन्धित कई प्रकार के कार्यक्रम चलाए ताकि उत्पादन बढ़ाया जा सके।

प्रश्न 4. हरित क्रान्ति क्या है ? इसके प्रभावों का विस्तार से विवेचन करें।
उत्तर- हरित क्रान्ति कृषि उत्पादन को बढ़ाने का एक नियोजित तथा वैज्ञानिक तरीका है। पंचवर्षीय योजनाओं का मूल्यांकन करने के पश्चात् यह साफ हो गया कि अगर हमें फसलों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करनी है तो उत्पादन सम्बन्धी नए तरीकों तथा तकनीकों का प्रयोग करना पड़ेगा। इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए भारत में 1966-67 में कृषि में तकनीकी परिवर्तन शुरू हुए। इसमें अधिक उत्पादन वाले बीजों, सिंचाई के विकसित साधनों, रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों का प्रयोग किया जाने लगा। कृषि में विकसित साधनों के प्रयोग को ही हरित क्रान्ति का नाम दिया गया। यहां शब्द ‘हरित’ को ग्रामीण क्षेत्रों के हरे-भरे खेतों के लिए प्रयोग किया गया तथा ‘क्रान्ति’ शब्द बहुपक्षीय परिवर्तन को दर्शाता है। हरित क्रान्ति के प्रथम भाग में ‘गहन कृषि जिला कार्यक्रम’ शुरू किए गए जिसमें पहले तीन ज़िलों तथा बाद में 16 जिलों को शामिल किया गया। चुने हुए जिलों में कृषि की उन्नत विधियों, उर्वरक, बीजों, सिंचाई के साधनों का प्रयोग किया गया।

1967-68 में इस कार्यक्रम को देश के अन्य भागों में भी लागू कर दिया गया। इस कार्यक्रम में किसानों में कृषि सम्बन्धी नई तकनीक, ज्ञान व उत्पादन के नए साधन बांटे गए ताकि उत्पादन में बढ़ौतरी की जा सके। सरकार ने इस कार्यक्रम को पूर्णतया सहायता दी तथा यह कामयाब हो गया। देश गेहूँ तथा चावल के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो गया।
हरित क्रान्ति के मुख्य तत्त्व (Major Elements of Green Revolution) हरित क्रान्ति के मुख्य तत्त्वों का वर्णन इस प्रकार है-

  • अधिक उत्पादन वाले बीजों के प्रयोग से फसलों का उत्पादन बढ़ गया।
  • रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों के प्रयोग ने भी कृषि उत्पादन को बढ़ाने में प्रमुख भूमिका अदा की।
  • आधुनिक कृषि की मशीनें जैसे कि ट्रैक्टर, थ्रेशर, कंबाइन, पंप सैट, स्परेयर (Eprayer) इत्यादि ने भी उत्पादन बढ़ाने में योगदान दिया।
  • कृषि के बढ़िया ढंगों विशेषतया जापानी ढंग के प्रयोग ने भी उत्पादन बढ़ाया।
  • किसानों को नई सिंचाई सुविधाओं के बारे में बताया गया जिससे कृषि उत्पादन बढ़ गया।
  • एक वर्ष में कई बार फसल बीजने तथा काटने की प्रक्रिया ने भी उत्पादन बढ़ाने में योगदान दिया।
  • किसानों को सस्ते ब्याज पर ऋण देने के लिए कई संस्थाओं की स्थापना की गई ; जैसे कि को-आप्रेटिव सोसायटी, ग्रामीण बैंक, इत्यादि। इनसे ऋण लेकर किसान कृषि उत्पादन बढ़ा सकते हैं।
  • सरकार द्वारा किसानों को फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) देने का विश्वास दिलाया गया जिस कारण किसानों ने उत्पादन बढ़ाया।
  • Soil Conservation जैसे कार्यक्रमों ने भूमि की उत्पादन शक्ति को संभालने तथा बढ़ाने में सहायता की।
  • कृषि के सामान की बिक्री के लिए मार्किट कमेटियों, को-आप्रेटिव मार्केटिंग सोसायटियां बनाई गईं ताकि उत्पादन बढ़ाया जा सके।
  • सरकार ने भूमि सुधारों पर काम किया ताकि बिचौलियों का खात्मा, कार्य की सुरक्षा, किसानों को मालिकाना अधिकार, भूमि की चकबन्दी इत्यादि ने भी उत्पादन बढ़ाने में सहायता दी।
  • सरकार ने ग्रामीण समाज से सम्बन्धित कई प्रकार के कार्यक्रम चलाए ताकि उत्पादन बढ़ाया जा सके।

हरित क्रान्ति के प्रभाव-हरित क्रान्ति के प्रभावों को हम दो भागों में बाँट सकते हैं-सकारात्मक व नकारात्मक। इनका वर्णन इस प्रकार है-

1. सकारात्मक प्रभाव-

  • अनाज के उत्पादन में बढ़ौतरी-इस कार्यक्रम की सबसे प्रमुख सफलता यह थी कि इसने अनाज, विशेषतया चावल तथा गेहूँ के उत्पादन में काफ़ी अधिक बढ़ौतरी कर दी। चाहे चावल का उत्पादन पहले भी अच्छा हो रहा था परन्तु गेहूँ के उत्पादन में बेतहाशा वृद्धि हुई। हरित क्रान्ति में मक्की, ज्वार, बाजरा, रागी तथा अन्य फसलों को शामिल नहीं किया गया।
  • व्यापारिक फसलों में उत्पादन में बढ़ौतरी-हरित क्रान्ति को लाने का मुख्य उद्देश्य अनाज के उत्पादन में बढ़ौतरी करना था। शुरू में इस क्रान्ति से व्यापारिक फसलों के उत्पादन में कोई बढ़ौतरी नहीं हुई जैसे कि गन्ना, कपास, जूट, तेल के बीज, आलू इत्यादि। परन्तु 1973-74 के बाद गन्ने के उत्पादन में काफ़ी बढ़ौतरी हुई। इस तरह तेल के बीजों तथा आलू के उत्पादन में बाद में काफ़ी बढ़ौतरी हुई।
  • फसलों की संरचना में परिवर्तन-हरित क्रान्ति के कारण फसलें बीजने की संरचना में भी बहुत बड़ा परिवर्तन आया। सबसे पहले तो अनाज के उत्पादन में 3%-4% प्रतिवर्ष की दर से बढ़ौतरी होने लग गई परन्तु दाल का उत्पादन या तो वहीं रह गया या कम हो गया। दूसरा अनाज उत्पादन में चावल का हिस्सा कम हो गया तथा गेहूँ का हिस्सा काफ़ी बढ़ गया।
  • रोज़गार को बढ़ावा-नई तकनीक के प्रयोग के कारण कृषि से सम्बन्धित रोज़गार में भी काफ़ी बढ़ौतरी हो गई। इससे कई प्रकार की तथा प्रत्येक वर्ष में कई फसलें बीजने के कारण नई नौकरियां बढ़ गईं। साथ ही मशीनों के प्रयोग से कृषि से सम्बन्धित मजदूरों को भी काम से निकाल दिया गया।

2. नकारात्मक प्रभाव-

  • भारत में पूँजीपति कृषि की शुरुआत-नए कृषि के कार्यक्रम में काफ़ी अधिक पैसे में निवेश की आवश्यकता थी जैसे कि बीज, उर्वरक, कीटनाशक, सिंचाई के साधनों पर। यह निवेश छोटे तथा मध्यम किसान नहीं कर सकते थे। इस प्रकार इसने देश में पूँजीपति कृषि की शुरुआत की। निर्धन तथा छोटे किसानों को हरित क्रान्ति का कोई सीधा लाभ न हुआ।
  • भारतीय कृषि का संस्थागत सुधारों से दूर होना-नई कृषि के प्रोग्राम में कृषि के संस्थागत सुधारों की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया गया। बहुत बड़ी संख्या में किसानों के पास भूमि की मलकियत नहीं थी। बड़े स्तर पर भूमि को खाली करवाया गया। इस कारण किसानों को फसल को बाँटने की स्थिति माननी पड़ी।
  • आय में अन्तर का बढ़ना-कृषि में तकनीकी परिवर्तनों ने ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की आय में अन्तर बढ़ा दिया। बड़े किसानों ने नई तकनीकों का प्रयोग करके अपनी आय कई गुणा बढ़ा ली परन्तु छोटे किसान ऐसा न कर सके। इस प्रकार मजदूरों की स्थिति और भी खराब हो गई।
  • श्रमिकों को उजाड़ने की समस्या-हरित क्रान्ति के साथ-साथ देश में उद्योग लगाने पर भी बल दिया गया। कृषि वाली भूमि पर उद्योग लगाए गए जिस कारण कृषि श्रमिक बेरोज़गार हो गए। इस बेरोज़गारी की समस्या ने आर्थिक व राजनीतिक मोर्चे पर कई प्रकार की नई समस्याएं उत्पन्न की। देश के कई भागों में चल रहा नक्सली आन्दोलन इसका ही परिणाम है।

प्रश्न 5. ग्रामीण समाज की परिभाषा दें। ग्रामीण समाज में हो रहे विविध परिवर्तनों का विवेचन करें।
अथवा
ग्रामीण समाज में आ रहे परिवर्तनों को बताइए।
अथवा
ग्रामीण समाज में आ रहे परिवर्तनों को दर्शाइए।
उत्तर-ग्रामीण समाज की परिभाषा-देखें प्रश्न 1-अति दीर्घ उत्तरों वाले प्रश्न।
परिवर्तन-परिवर्तन प्रकृति का नियम है। इसे कोई नहीं बदल सकता है। संसार की प्रत्येक वस्तु में परिवर्तन आता है। इस प्रकार ही ग्रामीण समाज भी परिवर्तन की प्रक्रिया में से गुज़र रहा है। आधुनिक समाज तथा तकनीक ने ग्रामीण समाज के प्रत्येक पक्ष में परिवर्तन ला दिया है। इन परिवर्तनों का वर्णन इस प्रकार है-

1. कम होते ग्रामीण शहरी अन्तर (Decreasing Rural-Urban Differences)—पहले ग्रामीण समाज तथा शहरी समाज में बहुत अन्तर हुआ करते थे। परन्तु अब दोनों समाजों में धीरे-धीरे अन्तर कम हो रहे हैं। यह इस कारण नहीं है कि ग्रामीण लोग शहरी लोगों की नकल करते हैं बल्कि इस कारण है कि खुली मण्डी व्यवस्था के कारण ग्रामीण लोगों के शहरों के लोगों के साथ सम्बन्ध बढ़ रहे हैं। वह अपना उत्पादन शहर में जाकर बेचते हैं तथा वह नए पेशे अपना रहे हैं जिस कारण उनके बाहर के लोगों से सम्पर्क बढ़ रहे हैं। इस कारण ही ग्रामीण लोगों के रहने-सहने, खानेपीने, सोचने, जीवन जीने के ढंग शहरी लोगों की तरह बनते जा रहे हैं। यातायात तथा संचार के साधनों के कारण गांव शहरों में मिलने वाली हरेक सहूलियत को प्राप्त कर रहे हैं। पेशों की गतिशीलता के कारण शहरों जैसा वातावरण बढ़ रहा है तथा ग्रामीण शहरी अन्तर कम हो रहे हैं।

2. कम होता अन्तर (Decreasing difference of area)-ग्रामीण समाज में सबसे महत्त्वपूर्ण परिवर्तन यह आ रहा है कि गांवों तथा शहरों में अन्तर धीरे-धीरे कम हो रहे हैं। शहर धीरे-धीरे बढ़कर गांवों की तरफ जा रहे हैं तथा गांव शहरों के नज़दीक आ रहे हैं। यातायात के साधन, पक्की सड़कें, शिक्षा के प्रसार तथा संचार के साधनों ने गांव को शहरों के काफ़ी नज़दीक ला दिया है। अब ग्रामीण लोग भी शहरों की तरफ तेज़ी से बढ़ रहे हैं। वह शहरों में अपना कार्य करके एक ही दिन में गांव में वापस चले जाते हैं।

3. कृषि के ढांचे में परिवर्तन तथा कृषि का व्यापारीकरण (Change in the structure of agriculture and marketization of Agriculture)-अगर हम प्राचीन समय की तरफ देखें तो हमें पता चलता है कि हमारे देश में कृषि का उत्पादन केवल अपनी आवश्यकताएं पूर्ण करने के लिए होता था। उत्पादन के साधन बहुत ही साधारण तथा प्रकृति के नज़दीक थे। कृषि का कार्य हल तथा बैल की मदद से होता था। कृषि के सभी कार्य हाथों से ही होते थे। यहां तक कि नहरों का, कुओं आदि को खुदवाने का कार्य बेगार (forced labour) से ही पूर्ण होता था। लोग स्थानीय स्तर पर ही अपनी ज़रूरतें पूर्ण कर लेते हैं तथा चीज़ों और सेवाओं का लेन-देन ही होता था।

परन्तु तकनीक तथा विज्ञान के आने से तथा कृषि से सम्बन्धित संस्थाओं के शुरू होने से कृषि का ढांचा ही बदल गया है। नई मशीनों जैसे कि ट्रैक्टर, थ्रेशर इत्यादि के आने से सिंचाई की सहूलियतें बढ़ने से, नहरों तथा Drip irrigation के बढ़ने से नए बीजों तथा रासायनिक उर्वरकों के आने से तथा मण्डियों के बढ़ने से कृषि अब जीवन निर्वाह के स्तर से व्यापारिक स्तर अथवा मण्डी के स्तर पर पहुँच गई है। अब कृषि केवल आवश्यकताएं पूर्ण करने के लिए नहीं होती बल्कि लाभ कमाने के लिए होती है। अब चीज़ों के विनिमय की जगह पैसे की मदद से लेन-देन होने लग गया है। अब साल में लोग 4-4 फसलें पैदा कर लेते हैं। उत्पादन बहुत बढ़ गया है। पहले अनाज आयात होता था अब निर्यात होता है।

विज्ञान की मदद से कृषि का कार्य आसान हो गया है। अब कृषि का कार्य शारीरिक शक्ति से नहीं बल्कि मशीनों से होना शुरू हो गया है। कृषि के संस्थात्मक ढांचे जैसे कि ज़मींदारी, रैय्यतवाड़ी, महलवाड़ी इत्यादि खत्म हो गए हैं। कृषि से सम्बन्धित सहायक पेशे जैसे कि डेयरी, पिगरी, पोलट्री, मछली पालन इत्यादि खुल गए हैं।

4. धर्म का कम होता प्रभाव (Decreasing effect of Religion)-प्राचीन समय में ग्रामीण लोगों पर धर्म का बहुत प्रभाव होता था। कृषि की प्रत्येक गतिविधि के ऊपर धर्म का प्रभाव होता था जोकि अब खत्म हो चुका है। पहले कई पेड़ों, पक्षियों, जानवरों इत्यादि को पवित्र समझा जाता था परन्तु आजकल के समय में यह कम हो गया है। ग्रामीण लोगों के धार्मिक विश्वासों, रस्मों-रिवाजों में बहुत परिवर्तन आया है। आजकल के मशीनी युग में ग्रामीण समाज का रोज़ाना जीवन मन्दिरों, गुरुद्वारों इत्यादि के प्रभाव से दूर होता जा रहा है।

5. ग्रामीण सामाजिक संरचना में परिवर्तन (Change in Rural Social Structure)—मार्क्स का कहना था कि आर्थिक ढांचे में परिवर्तन से सामाजिक परिवर्तन होता है। यह बात आजकल ग्रामीण समाज में देखी जा सकती है। कृषि के व्यापारीकरण तथा मशीनीकरण से न केवल आर्थिक खुशहाली आई है बल्कि पुराने रिश्तों में भी परिवर्तन आ रहा है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। माता-पिता के अधिकार तथा सम्मान कम हो रहा है, तर्कशील सोच के कारण नयी तथा पुरानी पीढ़ी में टकराव बढ़ रहा है, कृषि के कार्यों के विभाजन में परिवर्तन आ रहा है, सामाजिक कद्रों-कीमतों में गिरावट आ रही है, मानसिक तनाव बढ़ रहा है, औरतों की स्थिति में परिवर्तन इत्यादि जैसे कई पक्ष हैं जिन में हम परिवर्तन देख रहे हैं।

जन्म, विवाह, मृत्यु से सम्बन्धित रस्मों का समय भी बहुत कम हो रहा है। जजमानी व्यवस्था खत्म हो रही है, सामाजिक नातेदारी का प्रभाव कम हो रहा है, प्राथमिक समूहों का महत्त्व भी कम हो रहा है। लोग रिश्तों की जगह पदार्थक खुशी की तरफ बढ़ रहे हैं। जातियों के सम्बन्धों में भी बहुत परिवर्तन आ गए हैं। ब्राह्मणों की सर्वोच्चता खत्म हो गई है। लोग परम्परागत पेशों को छोड़ कर और पेशों को अपना रहे हैं। अस्पृश्यता खत्म हो गई है। जाति व्यवस्था के खत्म होने के कारण पेशों की गतिशीलता भी बढ़ रही है। अब ग्रामीण लोग अपनी मर्जी से पेशा बदलते हैं।

6. विज्ञान का बढ़ता प्रभाव (Increasing effect of Science)-प्राचीन समय में ऋतुओं, वातावरण सम्बन्ध विश्वास प्रकृति पर निर्धारित होते थे तथा ग्रामीण जीवन का आधार होते थे। भूमि को पवित्र माना जाता था। फसल की बिजाई समय को सामने रख कर की जाती थी परन्तु आजकल प्राचीन लोक विश्वास खत्म हो रहे हैं। किसान चाहे वैज्ञानिक नहीं हैं परन्तु फिर भी वैज्ञानिक ढंगों के प्रयोग के कारण वह प्राचीन विश्वास भूलते जा रहे हैं। पहले लोग अपनी भूमि पर रासायनिक उर्वरक डालने से कतराते थे, अब वह अधिक-से-अधिक उर्वरकों तथा मशीनों का प्रयोग करते हैं ताकि उत्पादन को बढ़ाया जा सके।

7. प्रकृति पर कम होती निर्भरता (Decreasing dependency on Nature)—प्राचीन समय में किसान कृषि के उत्पादन के लिए केवल प्रकृति पर ही निर्भर रहता था। जैसे अगर किसी वर्ष बारिश नहीं पड़ती थी तो भूमि से उत्पादन लेना असम्भव होता था। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक शक्तियों से व्यक्ति संघर्ष नहीं कर सकता था परन्तु आजकल के समय में ऐसा नहीं है। आजकल लोग सिंचाई के लिए वर्षा की जगह नहरों, ट्यूबवैल इत्यादि का प्रयोग कर रहे हैं। फसलों से उत्पादन नए ढंगों से लिया जा रहा है। अब लोगों में गर्मी, सर्दी, बाढ़ इत्यादि से बचने का सामर्थ्य है। अब मौसम विभाग पहले ही बाढ़, सूखे, कम, अधिक वर्षा के बारे में पहले से ही सूचना दे देता है जिस कारण किसान उससे निपटने के लिए पहले ही तैयार हो जाता है। .

8. ग्रामीण जीवन स्तर में सुधार (Change in the level of Rural Life)-ग्रामीण समाज में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन देखने में आया है तथा वह है ग्रामीण जीवन स्तर में सुधार। आंकड़े बताते हैं कि कुछ वर्गों को छोड़कर सम्पूर्ण ग्रामीण जीवन में सुधार आया है। शिक्षा के प्रसार से, विज्ञान के आने से तथा सरकारी और गैर-सरकारी कोशिशों से मनुष्य का जीवन लम्बा हो गया है तथा बहुत-सी बीमारियां तो खत्म हो गई हैं। रहने-सहने के स्थानों में भी सुधार हुआ है। पक्के मकान, पक्की नालियां, गलियां, सड़कें, स्ट्रीट लाइटें, स्कूल, डिस्पेंसरियां इत्यादि आम गांव में भी देखी जा सकती हैं। मनोरंजन के साधन बढ़ रहे हैं तथा खेलों की सहूलियतें बढ़ रही हैं। निरक्षरता कम हो रही है। इस तरह ग्रामीण जीवन में सकारात्मक परिवर्तन हुआ है।

9. खाने-पीने तथा पहरावे में परिवर्तन (Change in Feeding and Wearing)-प्राचीन समय में जाति व्यवस्था के प्रभाव के कारण कुछ जातियां कुछ विशेष वस्तुओं का सेवन नहीं करती थीं तथा पहरावा भी सादा तथा विशेष प्रकार का पहनते थे। आजकल के समय में जाति प्रथा के प्रभाव के घटने के कारण लोगों की खाने-पीने तथा पहनने की आदतों में परिवर्तन आ गया है। आजकल ब्राह्मण भी मीट अथवा शराब का प्रयोग करते हैं। लोग अब सादे खाने की जगह बनावटी खाना जैसे कि बर्गर, पिज़्ज़ा, हाट डॉग, नूडल्ज़ इत्यादि का प्रयोग कर रहे हैं। पहले लोग धोती तथा कुर्ते पहनते थे परन्तु अब पैंटें, जीन्स, कमीजें इत्यादि पहनते हैं। अब स्त्रियां आधुनिक गहने डालती हैं। पर्दे की प्रथा तो लगभग खत्म हो गयी है।

प्रश्न 6. ग्रामीण समाज पर एक नोट लिखें।
उत्तर-

ग्रामीण सामाजिक संरचना में परिवार का बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है क्योंकि कृषि प्रधान समाजों में परिवार का बहुत महत्त्व होता है। वैसे तो गांवों में परिवार के कई स्वरूप देखने को मिलते हैं परन्तु संयुक्त परिवार ही ऐसा परिवार है जो सभी ग्रामीण समाजों में पाया जाता है। भारत के बहुत-से क्षेत्रों में पितृ प्रधान संयुक्त परिवार पाए जाते हैं। इसलिए हम ग्रामीण समाज में मिलने वाले संयुक्त परिवार का वर्णन करेंगे।
संयुक्त परिवार एक ऐसा समूह है जिसमें कई पुश्तों के सदस्य इकट्ठे रहते हैं। इसका अर्थ है कि दादा-दादी, माता-पिता, चाचा-चाची, उनके बच्चे, लड़कों की पत्नियां तथा बिन ब्याहे बच्चे इत्यादि सभी एक ही निवास स्थान पर रहते हैं।

कार्वे (Karve) के अनुसार, “संयुक्त परिवार उन व्यक्तियों का समूह होता है जिसमें साधारणतया सभी एक ही घर में रहते हैं, जोकि साझी रसोई में पका भोजन खाते हैं तथा साझी जायदाद के मालिक होते हैं तथा जो किसी न किसी प्रकार से दूसरे व्यक्ति के रक्त से सम्बन्धित होते हैं।”

आई०पी० देसाई (I.P. Desai) के अनुसार, “हम उस परिवार को संयुक्त परिवार कहते हैं जिसमें मूल परिवार से अधिक पीढ़ियों के सदस्य शामिल होते हैं तथा यह सदस्य आपकी जायदाद, आय तथा आपसी अधिकारों और फर्जी से सम्बन्धित हों।”

इस प्रकार इन परिभाषाओं को देखकर हम संयुक्त परिवार के निम्नलिखित लक्षणों के बारे में बता सकते हैं:

  1. इनका आकार बड़ा होता है।
  2. इस परिवार के सदस्यों में सहयोग की भावना होती है।
  3. परिवार में जायदाद पर सभी का समान अधिकार होता है।
  4. परिवार के सभी सदस्य एक ही निवास स्थान पर रहते हैं।
  5. परिवार के सभी सदस्यों की आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक गतिविधियां एक जैसी ही होती हैं।

देसाई का कहना है कि जिस किसी भी समाज में कृषि से सम्बन्धित पेशे बहुत अधिक होते हैं वहां पितृ प्रधान संयुक्त परिवार होते हैं। कृषि प्रधान समाजों में संयुक्त परिवार एक आर्थिक सम्पत्ति की तरह कार्य करता है। पितृ प्रधान ग्रामीण संयुक्त परिवार के बहुत-से ऐसे पहलू हैं, जैसे कि क्रियात्मक, राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक इत्यादि जो इसको शहरी परिवार व्यवस्था से अलग करते हैं।
इस तरह इस चर्चा से स्पष्ट है कि ग्रामीण समाजों में साधारणतया पितृ प्रधान संयुक्त परिवार ही पाए जाते हैं। इन परिवारों की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं :

ग्रामीण परिवार की विशेषताएं (Characteristics of Rural Family)-

  1. बड़ा आकार।
  2. कृषि पर निर्भरता।
  3. अधिक सामूहिक भावना अथवा एकता।
  4. अधिक अन्तर्निर्भरता तथा अनुशासन।
  5. पारिवारिक अहं का अधिक होना।
  6. पिता का अधिक अधिकार।।
  7. पारिवारिक कार्यों में अधिक हिस्सेदारी। अब हम इनका वर्णन विस्तार से करेंगे।

1. बड़ा आकार (Large in Size) ग्रामीण परिवार की सबसे पहली विशेषता यह है कि यह आकार में काफ़ी बड़े होते हैं क्योंकि इसमें कई पीढ़ियों के सदस्य एक ही जगह पर इकट्ठे रहते हैं। हमारे देश की बढ़ती जनसंख्या भी इस बड़े आकार के लिए उत्तरदायी है। कई स्थानों पर तो कई परिवारों के सदस्यों की संख्या 60-70 तक भी पहुंच जाती है। परन्तु साधारणतया एक ग्रामीण परिवार में 6 से 15 तक सदस्य होते हैं जिस कारण यह आकार में बड़े होते हैं।

2. कृषि पर निर्भरता (Dependency upon Agriculture) ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों का मुख्य पेशा कृषि होता है जिस कारण ग्रामीण परिवार के सभी सदस्य कृषि के कार्यों में लगे रहते हैं। उदाहरण के लिए खेत में हल चलाने का कार्य कोई और करता है तथा पशुओं का चारा काटने के लिए कोई और कार्य करता है। ग्रामीण परिवार में स्त्रियां खेतों में कार्य करती हैं जिस कारण ही ग्रामीण परिवार शहरी परिवार से अलग होता है। बहुत-सी स्त्रियां खेतों में अपने पतियों की मदद करने के लिए तथा मजदूरों की कमी को पूरा करने के लिए कार्य करती हैं। इसके साथ ही घर में रहने वाली स्त्रियां भी बिना किसी कार्य के नहीं बैठती हैं। वह पशुओं को चारा डालने तथा पानी पिलाने का कार्य करती रहती हैं। खेतों में इकट्ठे कार्य करने के कारण उनकी सोच तथा विचार एक जैसे ही हो जाते हैं।

3. अधिक एकता (Greater Unity)-ग्रामीण परिवार की एक और महत्त्वपूर्ण विशेषता इस में एकता का होना है। ग्रामीण परिवारों में शहरी परिवारों की तुलना में अधिक एकता होती है। जैसे पति-पत्नी, दादा-पोता, माता-पिता में अधिक भावनात्मक तथा गहरे रिश्ते पाए जाते हैं। अगर ग्रामीण क्षेत्रों की तरफ ध्यान से देखें तो यह पता चलता है कि ग्रामीण लोग समहों में रहना अधिक पसन्द करते हैं तथा उनमें एकता किसी खुशी अथवा दु:ख के मौके पर देखी जा सकती है। ग्रामीण परिवार के सदस्यों की इच्छाएं, विचार, कार्य, गतिविधियां तथा भावनाएं एक जैसी ही होती हैं। वह लगभग एक जैसे कार्य करते हैं तथा एक जैसा ही सोचते हैं। सदस्य के निजी जीवन का महत्त्व परिवार से कम होता है। सभी सदस्य एक ही सूत्र में बन्धे होते हैं तथा परिवार के आदर्शों और परम्पराओं के अनुसार ही अपना जीवन जीते हैं।

4. अधिक अन्तर्निर्भरता तथा अनुशासन (More Inter-dependency and Discipline)-शहरी परिवारों के सदस्यों की तुलना में ग्रामीण परिवार के सदस्य एक-दूसरे पर अधिक निर्भर होते हैं। शहरों में मनुष्य की बहुत-सी आवश्यकताएं परिवार से बाहर ही पूर्ण हो जाती हैं। परन्तु ग्रामीण परिवार में मनुष्य की आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक इत्यादि आवश्यकताएं परिवार में ही पूर्ण होती हैं। इसका कारण यह है कि इन आवश्यकताओं की पूर्ति गांवों में परिवार के अतिरिक्त और कोई साधन नहीं कर सकता है तथा व्यक्ति अकेले ही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता है। जैसे गांव में कोई लड़का तथा लड़की अपने आप ही विवाह नहीं करवा सकते बल्कि उनके परिवार ही विवाह का प्रबन्ध करते हैं। अधिक अन्तर्निर्भरता के कारण परिवार के सदस्य अपने बड़ों के नियन्त्रण के अन्तर्गत तथा अनुशासन में रहते हैं। परिवार का छोटा सदस्य बड़े सदस्य की प्रत्येक बात मानता है चाहे बड़ा सदस्य गलत ही क्यों न हो।

5. पारिवारिक अहं का अधिक होना (More Pride of Family)-ग्रामीण परिवार का एक और महत्त्वपूर्ण लक्षण परिवार के अहं का अधिक होना है। परिवार के सदस्यों की अधिक अन्तर्निर्भता तथा एकता के कारण ग्रामीण परिवार एक ऐसी इकाई का रूप ले लेता है जिसमें एक सदस्य की जगह परिवार का अधिक महत्त्व होता है। साधारण शब्दों में ग्रामीण परिवार में परिवार का महत्त्व अधिक तथा एक सदस्य का महत्त्व कम होता है। परिवार के किसी भी सदस्य की तरफ से किया गया कोई भी अच्छा या गलत कार्य परिवार के सम्मान या कलंक का कारण बनता है। परिवार के प्रत्येक सदस्य से यह आशा की जाती है कि वह परिवार के सम्मान को बरकरार रखे। पारिवारिक अहं की उदाहरण हम देख सकते हैं कि परिवार के सम्मान के लिए कई बार गांव के अलग-अलग परिवारों में झगड़े भी हो जाते हैं तथा कत्ल भी हो जाते हैं।

6. पिता के अधिक अधिकार (More Powers of Father)-ग्रामीण परिवारों में पिता के अधिकार अधिक होते हैं। पिता ही पूर्ण परिवार का कर्ता-धर्ता होता है। परिवार के सदस्यों को लिंग तथा उम्र के आधार पर कार्यों के विभाजन, बच्चों के विवाह करने, आय का ध्यान रखना, सम्पूर्ण घर को सही प्रकार से चलाना इत्यादि कई ऐसे कार्य हैं जो पिता अपने ढंग से करता है। पिता का ग्रामीण परिवार पर इतना अधिक प्रभाव होता है कि परिवार का कोई भी सदस्य उसके आगे बोल नहीं सकता है। ग्रामीण परिवार शहरी परिवारों के बिल्कुल ही विपरीत होते हैं जहां परिवार के प्रत्येक सदस्य का अपना ही महत्त्व होता है।

7. पारिवारिक कार्यों में अधिक भागीदारी (More participation in Household Affairs)-ग्रामीण परिवार की एक और महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि परिवार के सभी सदस्य परिवार के कार्यों में गहरे रूप से शामिल होते हैं। कृषि ढांचा होने के कारण परिवार के सभी सदस्य अपना अधिकतर समय एक-दूसरे के साथ व्यतीत करते हैं जिस कारण परिवार के सदस्य घर की प्रत्येक गतिविधि तथा कार्य में भाग लेते हैं। दिन के समय खेतों में इकट्ठे कार्य करने के कारण तथा रात के समय घर के कार्य इकट्ठे करने के कारण सभी सदस्य एक-दूसरे के बहुत ही नज़दीक होते हैं।

इन विशेषताओं के अतिरिक्त ग्रामीण परिवार की और भी विशेषताएं हो सकती हैं जैसे कि :

  1. धर्म का अधिक महत्त्व।
  2. स्त्रियों की निम्न स्थिति।
  3. पूर्वजों की पूजा।
  4. संयुक्त परिवारों का महत्त्व। इस प्रकार ऊपर ग्रामीण परिवार की विशेषताओं का वर्णन किया गया है।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न (OTHER IMPORTANT QUESTIONS)

v. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

A. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1. ग्रामीण समाज का किससे सीधा सम्बन्ध होता है ?
(क) प्रकृति
(ख) पड़ोस
(ग) नगर
(घ) महानगर।
उत्तर-(क) प्रकृति।

प्रश्न 2. हमारे देश की कितनी जनसंख्या गाँवों तथा नगरों में रहती है ?
(क) 70% व 30%
(ख) 32% व 68%
(ग) 68% व 32%
(घ) 25% व 75%.
उत्तर-(ग) 68% व 32%.

प्रश्न 3. ग्रामीण समाज का मुख्य पेशा क्या होता है ?
(क) उद्योग
(ख) अलग-अलग पेशे
(ग) तकनीक
(घ) कृषि।
उत्तर-(घ) कृषि।

प्रश्न 4. जजमानी व्यवस्था में सेवा देने वाले को क्या कहते हैं ?
(क) जजमान
(ख) प्रजा
(ग) कमीन
(घ) कोई नहीं।
उत्तर–(ग) कमीन।

प्रश्न 5. जजमानी व्यवस्था में सेवा लेने वाले को क्या कहते हैं ?
(क) राजा
(ख) जजमान
(ग) प्रजा
(घ) कमीन।
उत्तर-(ख) जजमान।

प्रश्न 6. किसने कहा था कि, “वास्तविक भारत गाँव में बसता है।”
(क) महात्मा गाँधी
(ख) जवाहर लाल नेहरू
(ग) बी० आर० अम्बेदकर
(घ) सरदार पटेल।
उत्तर-(क) महात्मा गाँधी।

B. रिक्त स्थान भरें-

1. गाँव के मुखिया को …………. कहते थे।
2. 2011 में ………… करोड़ लोग गाँवों में रहते थे।
3. ……..ई० में ग्रामीण समाजशास्त्र की प्रथम पुस्तक छपी थी।
4. ग्रामीण समाज के लोगों का मुख्य पेशा ……….. होता है।
5. ग्रामीण समाज में ………….. परिवार पाए जाते हैं।
उत्तर-

  1. ग्रामिणी
  2. 83.3
  3. 1916
  4. कृषि
  5. संयुक्त ।

C. सही/ग़लत पर निशान लगाएं-

1. ग्रामीण लोग उद्योगों में अधिक कार्य करते हैं।
2. जजमान सेवा ग्रहण करता है।
3. हरित् क्रान्ति 1956 में शुरू हुई थी।
4. ऋणग्रस्तता के कारण बहुत से किसान आत्महत्या कर रहे हैं।
5. ग्रामीण समाज में बहुत से परिवर्तन आ रहे हैं।
6. पंचायत गांव की सरकार का कार्य करती है।
उत्तर-

  1. ग़लत,
  2. सही,
  3. ग़लत,
  4. सही,
  5. सही,
  6. सही।

II. एक शब्द/एक पंक्ति वाले प्रश्न उत्तर-

प्रश्न 1. भारत की कितने प्रतिशत जनसंख्या गाँवों में रहती है ?
उत्तर-भारत की 68.84% जनसंख्या गांवों में रहती है।

प्रश्न 2. राबर्ट रैडफील्ड ने ग्रामीण समाज की कितनी विशेषताएं दी हैं ?
उत्तर-राबर्ट रैडफील्ड के अनुसार ग्रामीण समाज की मुख्य विशेषताएँ हैं-छोटा आकार, अलगपन, समानता व स्व: निर्भरता।

प्रश्न 3. गाँवों की कितने प्रतिशत जनसंख्या कृषि या सम्बन्धित कार्यों में लगी हुई है ?
उत्तर-गाँवों की कम-से-कम 75% जनसंख्या कृषि या सम्बन्धित कार्यों में लगी हुई है।

प्रश्न 4. 2011 में गाँवों में कितने लोग रहते थे ?
उत्तर-2011 में 83.3 करोड़ लोग गाँवों में रहते थे।

प्रश्न 5. ग्रामीण समाजशास्त्र के इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटना क्या थी ?
उत्तर-अमेरिका में Country Life कमीशन की स्थापना ग्रामीण समाजशास्त्र के इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटना थी।

प्रश्न 6. ग्रामीण समाजशास्त्र की सबसे प्रथम पुस्तक किसने तथा कब छापी थी ?
उत्तर-ग्रामीण समाजशास्त्र की सबसे प्रथम पुस्तक J.N.Gillettee ने 1916 में छापी थी।

प्रश्न 7. ग्रामीण समाजशास्त्र से सम्बन्धित कुछ महत्त्वपूर्ण समाजशास्त्रियों के नाम बताएं।
उत्तर-एस० सी० दूबे, ऑस्कर लेविस, एम० एन० श्रीनिवास, मैरीयट, बैली, गॅफ, के० एल० शर्मा, आन्द्रे बेते इत्यादि।

प्रश्न 8. ग्रामीण समाज की जनसंख्या कैसी होती है ?
उत्तर-ग्रामीण समाज की जनसंख्या नगरों की तुलना में काफ़ी कम होती है।

प्रश्न 9. ग्रामीण समाज के लोगों के बीच किस प्रकार के सम्बन्ध होते हैं ?
उत्तर–ग्रामीण समाज के लोगों में काफ़ी गहरे व आमने-सामने के सम्बन्ध पाए जाते हैं।

प्रश्न 10. ग्रामीण समाज में किस प्रकार के परिवार मिलते हैं ?
उत्तर-ग्रामीण समाज में संयुक्त परिवार मिलते हैं।

प्रश्न 11. संयुक्त परिवार क्या है ?
उत्तर-वे परिवार जिसमें तीन या अधिक पीढ़ियों के लोग एक ही छत के नीचे रहते तथा एक ही रसोई में खाना खाते हैं।

प्रश्न 12. गांवों में कौन-सा विवाह सबसे अधिक मिलता है ?
उत्तर-गांवों में एक विवाह सबसे अधिक मिलता है।

प्रश्न 13. 73वां संवैधानिक संशोधन कब हआ था ?
उत्तर-73वां संवैधानिक संशोधन 1992 में हुआ था।

प्रश्न 14. ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे छोटी राजनीतिक इकाई कौन-सी है?
उत्तर-ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे छोटी राजनीतिक इकाई पंचायत है।

प्रश्न 15. पंचायती राज्य के तीन स्तरों के नाम बताएं।
उत्तर-पंचायत-ग्राम स्तर पर, ब्लॉक समिति-ब्लॉक स्तर पर तथा जिला परिषद्-जिला स्तर पर।

प्रश्न 16. ग्रामीण समाज में सामने आए दो मुख्य मुद्दे क्या हैं ?
उत्तर- गाँव में सामने आए दो मुख्य मुद्दे हैं-ऋणग्रस्तता की समस्या तथा हरित क्रान्ति के प्रभाव।

प्रश्न 17. ऋणग्रस्तता क्या है ?
उत्तर-जब एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से किसी कार्य के लिए पैसे लेता है तो इसे ऋणग्रस्तता कहते हैं।

प्रश्न 18. HYV बीज का क्या अर्थ है ?
उत्तर-अधिक उत्पादन देने वाले बीजों को HYV बीज कहते हैं।

प्रश्न 19. किसे भारत में हरित क्रान्ति का पिता कहा जाता है ?
उत्तर-प्रो० स्वामीनाथन को भारत में हरित क्रान्ति का पिता कहा जाता है।

प्रश्न 20. IADP का क्या अर्थ है ?
उत्तर-IADP का अर्थ है Intensive Agriculture District Programme.

प्रश्न 21. हरित क्रान्ति कब शुरू हुई थी ?
उत्तर-हरित क्रान्ति 1966 में शुरू हुई थी।

प्रश्न 22. हरित क्रान्ति के कुछ महत्त्वपूर्ण तत्त्व बताएं।
उत्तर-HYV बीज, उर्वरक, कीटनाशक, मशीनें, नए सिंचाई के साधनों का प्रयोग इत्यादि।

प्रश्न 23. ग्रामीण समाज की एक विशेषता बताएँ।
उत्तर-ग्रामीण समाज आकार में छोटे होते हैं तथा वहाँ पर सामाजिक एकरूपता होती है।

प्रश्न 24. पन्निकर ने किसे भारतीय सामाजिक व्यवस्था का सशक्त आधार माना है?
उत्तर-जाति व्यवस्था, ग्रामीण जीवन व्यवस्था व संयुक्त परिवार व्यवस्था को पन्निकर ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था का आधार माना है।

प्रश्न 25. किसे ग्रामीण क्षेत्रों में अनाचार के लिए जाना जाता है?
उत्तर-साहूकारों को ग्रामीण क्षेत्रों में अनाचार के लिए जाना जाता है।

प्रश्न 26. ऋणग्रस्तता का एक परिणाम बताएँ।
उत्तर–किसान ऋण के जाल में फंस जाता है तथा अंत में उसकी जमीन साहूकार के कब्जे में चली जाती है।

प्रश्न 27. पंजाब में हरित क्रान्ति से किन फ़सलों का उत्पादन काफ़ी बढ़ गया?
उत्तर-पंजाब में हरित क्रान्ति के कारण गेहूँ तथा चावल का उत्पादन काफ़ी बढ़ गया।

III. अति लघु उत्तरों वाले प्रश्न-

प्रश्न 1. ग्रामीण समाज।
उत्तर-ग्रामीण समाज वह समाज होता है जो प्रकृति के काफ़ी नज़दीक होता है, जिसमें लोगों का मुख्य पेशा कृषि होता है, जहाँ के लोगों के बीच नज़दीक के सम्बन्ध तथा समानता होती है, जो एक विशेष क्षेत्र में रहते हैं तथा काफ़ी हद तक आत्मनिर्भर होते हैं।

प्रश्न 2. ग्रामीण समाज की दो विशेषताएं।
उत्तर-

  1. ग्रामीण समाज नगरीय समाज की तुलना में छोटे आकार के होते हैं तथा इनकी जनसंख्या भी कम होती है।
  2. यहाँ रहने वाले लोगों के बीच गहरे व सीधे सम्बन्ध होते हैं।

प्रश्न 3. जाति पंचायत।
उत्तर-पुराने समय की जाति व्यवस्था में प्रत्येक जाति की एक पंचायत होती थी जो जाति के सदस्यों के बीच के मामले सुलझाती थी। इसके पास प्रत्येक प्रकार की न्याय करने की तथा जुर्माना लगाने की शक्ति होती थी।

प्रश्न 4. संयुक्त परिवार।
उत्तर-संयुक्त परिवार ऐसा परिवार होता है जिसमें तीन या अधिक पीढ़ियों के लोग इकट्ठे मिलकर एक ही छत के नीचे रहते हैं, एक ही साझी रसोई में खाना खाते हैं तथा परिवार की सम्पत्ति पर समान अधिकार होता है।

प्रश्न 5. पंचायत।
उत्तर- गाँव के स्तर पर जिस स्थानीय सरकार का गठन किया गया है, उसे पंचायत कहते हैं। इसके सदस्यों का चुनाव गाँव की ग्राम सभा करती है तथा इसे निश्चित समय अर्थात् 5 वर्ष के लिए चुना जाता है। यह गाँव का विकास करती है।

प्रश्न 6. अन्तर्विवाह।
उत्तर-जब व्यक्ति को एक विशेष समूह में ही विवाह करवाना पड़ता है तथा इस प्रकार के विवाह को अन्तर्विवाह कहते हैं। पुराने नियमों के अनुसार व्यक्ति को अपनी ही जाति या उपजाति में ही विवाह करवाना पड़ता था नहीं तो उसे जाति से बाहर निकाल दिया जाता था।

प्रश्न 7. बहिर्विवाह।
उत्तर-जब व्यक्ति को एक विशेष समूह से बाहर विवाह करवाना पड़ता है तो इस प्रकार के व्यक्ति को बहिर्विवाह कहते हैं। इस नियम के अनुसार व्यक्ति को अपने परिवार, रिश्तेदारी, गोत्र इत्यादि से बाहर विवाह करवाना पड़ता है।

IV. लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. ग्रामीण समाज।
उत्तर-ग्रामीण समाज एक ऐसा क्षेत्र होता है जहां तकनीक का कम प्रयोग, प्राथमिक सम्बन्धों की प्राथमिकता, छोटा आकार होता है तथा जहां अधिकतर जनसंख्या कृषि पर निर्भर करती है। इस प्रकार ग्रामीण समुदाय वह समुदाय होते हैं जो एक निश्चित स्थान पर रहते हैं, आकार में बहुत छोटे होते हैं, नज़दीक के सम्बन्ध पाए जाते हैं तथा प्राथमिक सम्बन्ध पाए जाते हैं। लोग एक-दूसरे को नज़दीक से जानते हैं तथा लोगों का मुख्य पेशा कृषि अथवा कृषि से सम्बन्धित होता है।

प्रश्न 2. ग्रामीण समाज की दो परिभाषाएं।
उत्तर-ए० आर० देसाई (A. R. Desai) के अनुसार, “ग्रामीण समाज गांव की एक इकाई है। यह एक थियेटर है जिसमें ग्रामीण जीवन अधिक मात्रा में अपने आपको तथा कार्यों को प्रकट करता है।”
आर० एन० मुखर्जी (R. N. Mukherjee) के अनुसार, “गांव वह समुदाय है जिसके विशेष लक्षण सापेक्ष एकरूपता, सादगी, प्राथमिक समूहों की प्रधानता, जनसंख्या का कम घनत्व तथा कृषि मुख्य पेशा होता है।”

प्रश्न 3. ग्रामीण समुदाय-मुख्य पेशा कृषि।
उत्तर-ग्रामीण समाज का मुख्य पेशा कृषि अथवा कृषि पर आधारित कार्य होते हैं क्योंकि ग्रामीण समाज प्रकृति के काफ़ी नज़दीक होते हैं। यह प्रकृति के काफ़ी नज़दीक होते हैं इसलिए यह जीवन को अलग ही दृष्टि से देखते हैं। चाहे गांवों में और भी पेशे होते हैं परन्तु वह काफ़ी कम संख्या में होते हैं तथा वह कृषि से सम्बन्धित चीजें भी बनाते हैं। ग्रामीण समाज में भूमि को बहुत ही महत्त्वपूर्ण वस्तु समझा जाता है तथा लोग यहां ही रहना पसन्द करते हैं क्योंकि उनका जीवन भूमि पर ही निर्भर होता है। यहां तक कि लोगों तथा गांवों की आर्थिक व्यवस्था तथा विकास भी कृषि पर ही निर्भर करता है।

प्रश्न 4. ग्रामीण समुदाय-कम जनसंख्या तथा एकरूपता।
उत्तर-गांवों की जनसंख्या शहरों की तुलना में बहुत कम होती है। लोग दूर-दूर तक छोटे-छोटे समूह बना कर बसे होते हैं तथा इन समूहों को गांव का नाम दिया जाता है। गांव में कृषि के अतिरिक्त और पेशे कम ही होते हैं जिस कारण लोग शहरों की तरफ भागते हैं तथा जनसंख्या भी कम ही होती है। लोगों के बीच नज़दीक के सम्बन्ध होते हैं तथा एक जैसा पेशा, कृषि होने के कारण उनके विचार भी एक जैसे ही होते हैं। गांव के लोगों की लोक-रीतियां, रूढ़ियां, परम्पराएं इत्यादि भी एक जैसे ही होते हैं तथा उनके आर्थिक, नैतिक, धार्मिक जीवन में कोई विशेष अन्तर नहीं होता है। गांव में लोग किसी दूर के क्षेत्र से रहने नहीं आते हैं, बल्कि यह तो गांव में रहने वाले मूल निवासी ही होते हैं अथवा नज़दीक रहने वाले लोग होते हैं। इस कारण लोगों में एकरूपता होती है।

प्रश्न 5. ग्रामीण समुदाय-पड़ोस का महत्त्व।
उत्तर-ग्रामीण समाज में पड़ोस का बहुत महत्त्व होता है। लोगों का मुख्य पेशा कृषि होता है जिसमें उन्हें काफ़ी समय खाली मिल जाता है। कृषि के पेशे में अधिक समय नहीं लगता है। इस कारण लोग एक-दूसरे से मिलते रहते हैं, बातें करते हैं, एक-दूसरे से सहयोग करते रहते हैं। लोगों के अपने पड़ोसियों से बहुत गहरे सम्बन्ध होते हैं। पड़ोस में जातीय समानता होती है जिस कारण उनकी स्थिति भी समान होती है। लोग वैसे तो पड़ोसियों का सम्मान, उनका आदर करना अपना फर्ज़ समझते हैं परन्तु इसके साथ ही एक-दूसरे के सुख-दुःख में पड़ोसी ही सबसे पहले आते हैं, रिश्तेदार तो बाद में आते हैं। इस कारण पड़ोस का काफ़ी महत्त्व होता है।

प्रश्न 6. ग्रामीण समाज में परिवार का नियन्त्रण।
उत्तर-ग्रामीण समाजों में परिवार का व्यक्ति पर पूर्ण नियन्त्रण होता है। गांवों में अधिकतर पितृसत्तात्मक परिवार होते हैं तथा परिवार का प्रत्येक छोटा-बड़ा निर्णय परिवार का मुखिया ही लेता है। गांव में तथा परिवार में श्रम विभाजन लिंग के आधार पर होता है। मर्द कृषि करते हैं अथवा घर से बाहर जाकर पैसा कमाते हैं तथा स्त्रियां घर में रह कर घर की देखभाल करती हैं। गांवों में संयुक्त परिवार प्रथा होती है। सभी व्यक्ति परिवार में मिल कर कार्य करते हैं। परिवार के सभी सदस्य त्योहारों, धार्मिक क्रियाओं इत्यादि में मिलकर भाग लेते हैं। व्यक्ति को कोई भी कार्य करने से पहले परिवार की सलाह लेनी पड़ती है। इस प्रकार उसके ऊपर परिवार का पूर्ण नियन्त्रण होता है।

प्रश्न 7. ग्रामीण समाज तथा प्रकृति से निकटता।
उत्तर-गांवों में लोग कृत्रिम वातावरण से दूर रहते हैं इसलिए इनका प्रकृति से गहरा सम्बन्ध होता है। इनका मुख्य पेशा कृषि होता है इसलिए यह प्रकृति से प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित होते हैं। इनका जीवन प्रकृति पर ही निर्भर करता है इसलिए यह सूर्य, वरुण, इन्द्र देवता इत्यादि की पूजा करते हैं। यह लोग प्राकृतिक शक्तियों जैसे कि वर्षा, बाढ़, सूखा इत्यादि से बहुत डरते हैं क्योंकि इन पर ही कृषि निर्भर करती है। यह प्राकृतिक शक्तियां इनके पूर्ण वर्ष के परिश्रम को तबाह कर सकती हैं। इस कारण ही यह लोग रूढ़िवादी होते हैं तथा इनका दृष्टिकोण भी सीमित होता है। इस तरह यह प्रकृति के निकट होते हैं। .

प्रश्न 8. ग्रामीण समाज-स्त्रियों की निम्न स्थिति।
उत्तर-गांवों में स्त्रियों की स्थिति काफ़ी निम्न होती है क्योंकि स्त्रियां केवल घरेलू कार्य करने तक ही सीमित होती हैं। प्राचीन समय में तो गांवों में श्रम विभाजन लिंग के आधार पर ही होता था। स्त्रियां घर का कार्य करती थीं तथा मर्द घर से बाहर का कार्य करते थे। उनको घर से बाहर निकलने की आज्ञा नहीं थी। उसको कोई भी अधिकार नहीं थे। घर के निर्णय करते समय उनसे पूछा भी नहीं जाता था। उसको केवल पैर की जूती समझा जाता था। चाहे अब समय बदल रहा है तथा लोग अपनी लड़कियों को पढ़ा रहे हैं परन्तु स्त्रियों के प्रति उनका दृष्टिकोण अब भी वही है।

प्रश्न 9. ग्रामीण समाज में आ रहे परिवर्तन।
उत्तर-

  • ग्रामीण समाज तथा शहरी समाजों में अन्तर कम हो रहे हैं।
  • कृषि के ढांचे में परिवर्तन तथा कृषि का व्यापारीकरण।
  • धर्म का कम होता प्रभाव।
  • विज्ञान का प्रभाव बढ़ रहा है।
  • प्रकृति पर किसानों की निर्भरता कम हो रही है।
  • शिक्षा का स्तर धीरे-धीरे बढ़ रहा है।

प्रश्न 10. ग्रामीण समाज-धर्म का कम होता प्रभाव।
उत्तर-प्राचीन समय में ग्रामीण लोगों पर धर्म का बहुत प्रभाव होता था। कृषि की प्रत्येक गतिविधि पर धर्म का प्रभाव होता था परन्तु अब यह खत्म हो चुका है। पहले कई पेड़ों, पक्षियों तथा जानवरों इत्यादि को पवित्र समझा जाता था परन्तु आजकल के समय में यह कम हो गया है। ग्रामीण लोगों के धार्मिक विश्वासों, रस्मों-रिवाजों में बहुत परिवर्तन आ गया है तथा नई पीढ़ी ने इन्हें मानना बन्द कर दिया है। आजकल के मशीनी युग में ग्रामीण समाज का रोज़ाना जीवन मन्दिरों, गुरद्वारों के प्रभाव से दूर होता जा रहा है।

प्रश्न 11. ग्रामीण परिवार।
अथवा
संयुक्त परिवार।
उत्तर-ग्रामीण परिवार आमतौर पर पितृसत्तात्मक तथा संयुक्त परिवार होते हैं। ग्रामीण परिवारों में पिता की सत्ता चलती है तथा परिवार के सभी सदस्य एक ही घर में रहते हैं। एक ही घर में रहने के कारण एक ही चूल्हे में खाना बनता है तथा सामुदायिक भावना बहुत अधिक होती है। इस प्रकार ग्रामीण समाजों में संयुक्त परिवार पाए जाते हैं जिस में कई पीढ़ियों के सदस्य इकट्ठे रहते हैं। यह आकार में बड़े होते हैं तथा इनमें सम्पत्ति पर भी सभी का बराबर अधिकार होता है।

प्रश्न 12. ग्रामीण परिवार-पितृसत्तात्मक परिवार।
अथवा ग्रामीण परिवारों में पिता का अधिक अधिकार।
उत्तर-ग्रामीण परिवारों में पिता के अधिकार अधिक होते हैं। पिता ही पूर्ण परिवार का कर्ता-धर्ता होता है। परिवार के सदस्यों को लिंग तथा आयु के आधार पर कार्यों का विभाजन, बच्चों के विवाह करने, आय का ध्यान रखना, सारे घर को ठीक ढंग से चलाना इत्यादि जैसे कई कार्य हैं जो पिता अपने तरीके से करता है। पिता का ग्रामीण परिवार पर इतना अधिक प्रभाव होता है कि परिवार का कोई भी सदस्य उसके आगे बोल नहीं सकता है। ग्रामीण परिवार शहरी परिवारों के बिल्कुल विपरीत होते हैं। इनमें तो पिता की इच्छा का ही महत्त्व होता है।

प्रश्न 13. ग्रामीण परिवार की विशेषताएं।
अथवा संयुक्त परिवार की चार विशेषताएं लिखिए।
उत्तर-(i) ग्रामीण परिवार आकार में बड़े होते हैं। (ii) ग्रामीण परिवार कृषि पर निर्भर करते होते हैं। (iii) ग्रामीण परिवारों में अधिक सामूहिक भावना अथवा एकता होती है। (iv) ग्रामीण परिवारों में अधिक अन्तर्निर्भरता तथा अनुशासन होता है। (v) पिता को अधिक अधिकार प्राप्त होते हैं। (vi) पारिवारिक कार्यों में व्यक्ति की अधिक भागीदारी होती है।

प्रश्न 14. ग्रामीण परिवारवाद।
उत्तर-गांवों में मिलने वाली प्रत्येक प्रकार की संस्था के ऊपर ग्रामीण परिवार का काफ़ी प्रभाव होता है। इस कारण ही ग्रामीण समाज में परिवार को अधिक महत्त्व प्राप्त होता है तथा व्यक्ति को कम। इसको ही परिवारवाद कहते हैं। जब एक या दो व्यक्तियों की जगह पूरे परिवार को महत्त्व दिया जाए तो उसको परिवारवाद कहते हैं। पारिवारिक गुणों के सामाजिक, राजनीतिक संगठनों पर प्रभाव को भी परिवारवाद कहा जाता है।

प्रश्न 15. ग्रामीण विवाह।
उत्तर-कृषि प्रधान समाजों में विवाह को काफ़ी आवश्यक समझा जाता है क्योंकि इसे धार्मिक संस्कारों को पूरा करने तथा खानदान को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक समझा जाता है। इस प्रकार ग्रामीण विवाह आदमी तथा औरत के बीच बनाया गया रिश्ता है जिसका उद्देश्य परिवार बनाना, घर बसाना, बच्चे पैदा करना, समाज को आगे बढ़ाना तथा धार्मिक संस्कारों को पूर्ण करना है। ग्रामीण विवाह में दो परिवार इकट्ठे होते हैं तथा लड़का-लड़की की सहायता से एक-दूसरे से सम्बन्ध बनाते हैं। ग्रामीण समाज में गोत्र से बाहर तथा जाति के अन्दर विवाह करवाना आवश्यक समझा जाता है।

प्रश्न 16. ग्रामीण विवाह एक धार्मिक संस्कार होता है।
उत्तर-ग्रामीण समाजों में विवाह को धार्मिक संस्कार माना जाता है क्योंकि इसका उद्देश्य धार्मिक होता है। धार्मिक ग्रन्थों में लिखा हुआ है कि व्यक्ति विवाह करके अपना घर बसाएगा, सन्तान पैदा करके समाज को आगे बढ़ाएगा तथा अपने ऋण उतारेगा। व्यक्ति अपने ऋण केवल विवाह करके तथा सन्तान पैदा करके ही उतार सकता है। ग्रामीण समाज में व्यक्ति को जन्म से लेकर मृत्यु तक कई संस्कारों में से निकलना पड़ता है। इस कारण ही इसे धार्मिक संस्कार माना गया है।

प्रश्न 17. व्यवस्थित विवाह।
उत्तर-ग्रामीण समाजों में विवाह को एक मर्द तथा स्त्री का मेल नहीं, बल्कि दो परिवारों, दो समूहों अथवा दो गांवों का मेल समझा जाता है। इस कारण माता-पिता अपने बच्चों का साथी ढूंढ़ने के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस प्रकार जो विवाह माता-पिता द्वारा निश्चित किया जाए उसे व्यवस्थित विवाह कहते हैं। विवाह निश्चित करने के लिए परिवार के आकार, स्थिति, नातेदारी तथा आर्थिक स्थिति को काफ़ी महत्त्व दिया जाता है। इसके साथ-साथ बच्चे के निजी गुणों को भी ध्यान में रखा जाता है। यदि बच्चे में कोई निजी कमी है तो उसका विवाह करने में काफ़ी समस्या आती है। माता-पिता ही बच्चों का विवाह करते हैं तथा धूमधाम से विवाह करने का प्रयास करते हैं।

प्रश्न 18. ग्रामीण क्षेत्र में साथी के चुनाव की कसौटियां।
उत्तर-ग्रामीण क्षेत्रों में साथी के चुनाव के लिए कपाड़िया ने तीन नियम दिए हैं तथा वे निम्नलिखित हैं(i) चुनाव का क्षेत्र (The field of selection) (ii) चुनाव करने के लिए विरोधी पार्टी (Parties for selection) (iii) चुनाव की कसौटियां (Criteria of selection)।

प्रश्न 19. गांव बहिर्विवाह।
अथवा ग्रामीण विजातीय विवाह।
उत्तर-गांव बहिर्विवाह के नियम के अनुसार एक गांव के व्यक्ति आपस में विवाह नहीं करवा सकते। व्यक्ति को अपने गांव से बाहर विवाह करवाना पड़ता है। यह समझा जाता है कि गांव में रहने वाले सभी व्यक्ति एक ही मातापिता की सन्तान हैं। एक गांव के व्यक्तियों को आपस में सगे-सम्बन्धी समझा जाता है। पंजाब के गांवों में यह शब्द आम सुने जा सकते हैं कि गांव की बेटी, बहन सब की साझी बेटी, बहन होती है। इसलिए व्यक्ति को अपने गांव से बाहर विवाह करना पड़ता है। इसे ही गांव बहिर्विवाह कहते हैं।

प्रश्न 20. दहेज।
उत्तर-परम्परागत भारतीय समाज में विवाह के समय लड़की को दहेज देने की प्रथा चली आ रही है। विवाह के समय माता-पिता लड़की को लड़के के घर भेजते समय लड़के तथा उसके माता-पिता को कुछ उपहार भी देते हैं। इन उपहारों को ही दहेज का नाम दिया जाता है। प्रत्येक परिवार अपनी आर्थिक स्थिति तथा लड़के वालों की सामाजिक स्थिति के अनुसार दहेज देता है। जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति अच्छी होती है वह अधिक दहेज देते हैं तथा जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति कमज़ोर होती है वह कम दहेज देते हैं। आजकल के समय में यह प्रथा काफ़ी बढ़ गई है तथा सभी भारतीय समाजों में समान रूप से प्रचलित है।

प्रश्न 21. ग्रामीण अर्थव्यवस्था।
उत्तर-ग्रामीण अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित होती है तथा कृषि भूमि पर निर्भर होती है। इसलिए ग्रामीण समाज तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भूमि का सबसे अधिक महत्त्व होता है। हमारे देश की लगभग 70% जनसंख्या कृषि अथवा
कृषि से सम्बन्धित पेशों में लगी हुई है। चाहे और पेशे भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में होते हैं परन्तु कृषि का महत्त्व सबसे . अधिक होता है। लोग भूमि पर फसल उत्पन्न करके उत्पादन करते हैं। उत्पादन की विधि अभी भी प्राचीन है। चाहे देश
के कुछ भागों में मशीनों तथा आधुनिक तकनीक की सहायता से कृषि हो रही है परन्तु फिर भी देश के अधिकतर भागों में कृषि के लिए पुराने ढंगों का प्रयोग होता है।

प्रश्न 22. ऋणग्रस्तता।
उत्तर-ग्रामीण अर्थव्यवस्था की एक मुख्य विशेषता किसानों का ऋणग्रस्त होना है। ग्रामीण परिवार आकार में बड़े होते हैं। उनकी आय चाहे कम होती है परन्तु बड़ा परिवार होने के कारण खर्चे बहुत अधिक होते हैं। खर्चे पूरे करने के लिए उन्हें ब्याज पर साहूकार से कर्जा लेना पड़ता है। इस तरह वह ऋणग्रस्त हो जाते हैं। वैसे भी आजकल कृषि पर खर्चा बहुत बढ़ गया है जैसे कि उर्वरकों तथा बीजों के बढ़े हुए दाम, डीज़ल का खर्चा, पानी के लिए पम्पों का प्रयोग, उत्पादन का कम मूल्य इत्यादि। इन सबके कारण उसके खर्चे पूर्ण नहीं हो पाते हैं तथा उन्हें बैंकों अथवा साहूकारों से ऋण लेना पड़ता है।

प्रश्न 23. जजमानी व्यवस्था।
उत्तर-ग्रामीण अर्थव्यवस्था में जजमानी व्यवस्था का काफ़ी महत्त्वपूर्ण स्थान है। जजमान का अर्थ है सेवा करने वाला अथवा यज्ञ करने वाला। समय के साथ-साथ यह शब्द उन लोगों के लिए प्रयोग किया जाने लगा जो दूसरे लोगों से सेवाएं ग्रहण करते हैं। इस सेवा को ग्रहण करने तथा सेवा करने के अलग-अलग जातियों के पुश्तैनी सम्बन्धों को ही जजमानी व्यवस्था कहते हैं। इस व्यवस्था के अनुसार पुजारी, दस्तकार तथा और निम्न जातियों के लोग उच्च जातियों को अपनी सेवाएं देते थे। इनकी सेवाओं की एवज में उस घर अथवा किसान से उत्पादन में से हिस्सा ले लेते हैं। इस तरह मनुष्यों के जीवन की ज़रूरतें स्थानीय स्तर पर ही पूर्ण हो जाती हैं। इस तरह जजमानी व्यवस्था से ग्रामीण अर्थव्यवस्था सही ढंग से चलती रहती है।

प्रश्न 24. ग्रामीण अर्थव्यवस्था की विशेषताएं।
उत्तर-

  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था में लोगों का मुख्य पेशा कृषि होता है तथा लोगों का जीवन है इस पर ही आधारित होता है।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उत्पादन कृषि से होता है तथा उत्पादन के ढंग अभी प्राचीन ही हैं।
  • ग्रामीण समाज में भूमि ही सभी प्रकार के सम्बन्धों का आधार होती है तथा भूमि पर किसान का अधिकार होता है।
  • ग्रामीण जनसंख्या अधिक होती है जिस कारण भूमि पर अधिक उत्पादन करने के लिए दबाव बढ़ता है। (v) ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कर्जे की बहुत समस्या होती है तथा किसान हमेशा ही कर्जे में डूबे रहते हैं।

प्रश्न 25. ग्रामीण समाज में ऋणग्रस्तता के कारण।
उत्तर-

  • किसानों की आय के साधन अस्थिर होते हैं जिस कारण उन्हें आवश्यकता पड़ने पर ऋण लेना पड़ता है।
  • किसानों के परिवारों की जनसंख्या अधिक परन्तु आय सीमित ही होती है जिस कारण उन्हें ऋण लेना पड़ता है।
  • किसानों को दिखावा करने की आदत होती है जिस कारण वह आवश्यकता से अधिक खर्च करते हैं। इसलिए उन्हें ऋण लेना पड़ता है।
  • किसानों को साहूकारों से आसानी से ऋण प्राप्त हो जाता है जिस कारण वह ऋण लेने के लिए उत्साहित होते हैं।
  • साहूकार भी ऋणग्रस्त किसान को आसानी से अपने चंगुल से निकलने नहीं देते। इस कारण भी किसान इस चक्र में फंसे रहते हैं।

प्रश्न 26. ज़मींदारी प्रथा।
उत्तर-भारत की स्वतन्त्रता से पहले हमारे देश के ग्रामीण समाज में ज़मींदारी प्रथा चल रही थी। इस प्रथा में भूमि के बहुत ही बड़े टुकड़े का स्वामी एक व्यक्ति अर्थात् ज़मींदार होता था। वह स्वयं तो ऐश करता था तथा स्वयं कोई भी कार्य नहीं करता था। परन्तु वह अपनी भूमि छोटे किसानों को काश्त करने के लिए दे देता था। उत्पादन का थोड़ा-सा हिस्सा वह उन छोटे किसानों को दे देता था। इस प्रकार बिना परिश्रम किए वह बहुत साधन प्राप्त कर लेता था तथा ऐश करता था। स्वतन्त्रता के बाद इस प्रथा को खत्म कर दिया गया था।

प्रश्न 27. मज़दूरी से सम्बन्धित सुधार।
उत्तर-पंचवर्षीय योजनाओं में मजदूरी से सम्बन्धित सुधारों के मुख्य उद्देश्य थे-(i) मज़दूरों की सुरक्षा। (ii) किराए को कम करना (iii) मज़दूर की मल्कीयत। ज़मींदारी प्रथा के खात्मे के बाद भी बहुत बड़े क्षेत्र पर मज़दूरी ही चलती रही। इसलिए कई राज्यों में इससे सम्बन्धित कदम उठाए गए जिन्हें Tenancy Reforms कहा जाता है। उदाहरण के तौर पर मजदूरों की सुरक्षा तथा सही किराए को निश्चित करना जिस से मज़दूर प्रत्यक्ष रूप से राज्य के सम्पर्क में आ गए। इन सुधारों को नवम्बर, 1969 तथा सितम्बर, 1970 में हुई मुख्यमन्त्रियों की बैठकों में Revive किया गया तथा यह सिफ़ारिश की गई कि सरकारी प्रयास अधिक होने चाहिएं ताकि मजदूरों की स्थिति में सुधार हो सके।

प्रश्न 28. पंचायती राज्य संस्थाएं।
उत्तर-हमारे देश में स्थानीय क्षेत्रों का विकास करने के लिए दो प्रकार के ढंग हैं। शहरी क्षेत्रों का विकास करने के लिए स्थानीय सरकारें होती हैं तथा ग्रामीण क्षेत्रों का विकास करने के लिए पंचायती राज्य संस्थाएं होती हैं। हमारे देश की लगभग 70% जनता ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों का विकास करने के लिए जो संस्थाएं बनाई गई हैं उन्हें पंचायती राज्य संस्थाएं कहते हैं। इसमें तीन स्तर होते हैं। ग्राम स्तर पर विकास करने के लिए पंचायत होती है, ब्लॉक स्तर पर विकास करने के लिए ब्लॉक समिति होती है तथा जिला स्तर पर विकास करने के लिए जिला परिषद् होती है। इन सभी के सदस्य चुने भी जाते हैं तथा मनोनीत भी होते हैं।

प्रश्न 29. ग्राम सभा।
उत्तर-गांव की पूरी जनसंख्या में से बालिग व्यक्ति जिस संस्था का निर्माण करते हैं उसे ग्राम सभा कहते हैं। गांव के सभी वयस्क व्यक्ति इसके सदस्य होते हैं तथा यह गांव की पूर्ण जनसंख्या की एक सम्पूर्ण इकाई है। यह वह मूल इकाई है जिस पर हमारे लोकतन्त्र का ढांचा टिका हुआ है। जिस गांव की जनसंख्या 250 से अधिक होती है वहां ग्राम सभा बन सकती है। यदि एक गांव की जनसंख्या कम है तो दो गांव मिलकर ग्राम सभा बनाते हैं। ग्राम सभा में गांव का प्रत्येक वह बालिग अथवा वयस्क व्यक्ति सदस्य होता है जिसे वोट देने का अधिकार प्राप्त होता है। प्रत्येक ग्राम सभा का एक प्रधान तथा कुछ सदस्य होते हैं जो 5 वर्ष के लिए चुने जाते हैं।

प्रश्न 30. ग्राम पंचायत।
उत्तर-प्रत्येक ग्राम सभा अपने क्षेत्र में से एक ग्राम पंचायत का चुनाव करती है। इस प्रकार ग्राम सभा एक कार्यकारी संस्था है जो ग्राम पंचायत के सदस्यों का चुनाव करती है। इस में एक सरपंच तथा 5 से 13 तक पंच होते हैं। यह 5 वर्ष के लिए चुनी जाती है परन्तु यदि यह अपने अधिकारों का गलत प्रयोग करे तो उसे 5 वर्ष से पहले भी भंग किया जा सकता है। पंचायत में पिछड़ी श्रेणियों तथा स्त्रियों के लिए स्थान आरक्षित हैं। ग्राम पंचायत में सरकारी कर्मचारी तथा मानसिक तौर पर बीमार व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकते। ग्राम पंचायत गांव में सफाई, मनोरंजन, उद्योग तथा यातायात के साधनों का विकास करती है तथा गांव की समस्याएं दूर करती है।

प्रश्न 31. ग्राम पंचायत के कार्य।
उत्तर-

  • ग्राम पंचायत का सबसे पहला कार्य गांव के लोगों के सामाजिक तथा आर्थिक जीवन के स्तर को ऊँचा उठाना होता है।
  • गांव की पंचायत गांव में स्कूल खुलवाने तथा लोगों को अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करती है।
  • ग्राम पंचायत ग्रामीण समाज में मनोरंजन के साधन जैसे कि फिल्में, मेले लगवाने तथा लाइब्रेरी खुलवाने का भी प्रबन्ध करती है।
  • पंचायत लोगों को कृषि की नई तकनीकों के बारे में बताती है, नए बीजों, उन्नत उर्वरकों का भी प्रबन्ध करती है।
  • यह गांव में कुएं, ट्यूबवैल इत्यादि लगवाने का प्रबन्ध करती है तथा नदियों के पानी की भी व्यवस्था करती है।
  • यह गांवों का औद्योगिक विकास करने के लिए गांव में उद्योग लगवाने का भी प्रबन्ध करती है।

प्रश्न 32. न्याय पंचायत।
उत्तर-गांवों के लोगों में झगड़े होते रहते हैं जिस कारण उनके झगड़ों का निपटारा करना आवश्यक होता है। इसलिए 5-10 ग्राम सभाओं के लिए एक न्याय पंचायत का निर्माण किया जाता है। न्याय पंचायत लोगों के बीच होने वाले झगड़ों को खत्म करने में सहायता करती है। इसके सदस्य चुने जाते हैं तथा सरपंच पांच सदस्यों की एक कमेटी बनाता है। इन सदस्यों को पंचायत से प्रश्न पूछने का भी अधिकार होता है।

प्रश्न 33. पंचायत समिति अथवा ब्लॉक समिति।
उत्तर-पंचायती राज्य संस्थाओं के तीन स्तर होते हैं। सबसे निचले गांव के स्तर पर पंचायत होती है। दूसरा स्तर ब्लॉक का होता है जहां पर ब्लॉक समिति अथवा पंचायत समिति का निर्माण किया जाता है। एक ब्लॉक में आने वाली पंचायतें, पंचायत समिति के सदस्य होते हैं तथा इन पंचायतों के प्रधान अथवा सरपंच इसके सदस्य होते हैं।

पंचायत समिति के इन सदस्यों के अतिरिक्त और सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष तौर पर किया जाता है। पंचायत समिति अपने क्षेत्र में आने वाली पंचायतों के कार्यों का ध्यान रखती है। यह गांवों के विकास के कार्यक्रमों को चैक करती है तथा पंचायतों को गांव के कल्याण करने के लिए निर्देश देती है। यह पंचायती राज्य के दूसरे स्तर पर है।

प्रश्न 34. जिला परिषद्।
उत्तर-पंचायती राज्य के सबसे ऊंचे स्तर पर है ज़िला परिषद् जो कि जिले के बीच आने वाली पंचायतों के कार्यों का ध्यान रखती है। यह भी एक प्रकार की कार्यकारी संस्था होती है। पंचायत समितियों के चेयरमैन चुने हुए सदस्य, उस क्षेत्र के लोक सभा, राज्य सभा तथा विधान सभा के सदस्य सभी जिला परिषद् के सदस्य होते हैं। यह सभी जिले में आने वाले गांवों के विकास का ध्यान रखते हैं। जिला परिषद् कृषि में सुधार, ग्रामीण बिजलीकरण, भूमि सुधार, सिंचाई, बीजों तथा उर्वरकों को उपलब्ध करवाना, शिक्षा, उद्योग लगवाने जैसे कार्य करती है।

V. बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1. ग्रामीण परिवार क्या होता है ? इसकी विशेषताओं का वर्णन करो।
उत्तर-ग्रामीण सामाजिक संरचना में परिवार का बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है क्योंकि कृषि प्रधान समाजों में परिवार का बहुत महत्त्व होता है। वैसे तो गांवों में परिवार के कई स्वरूप देखने को मिलते हैं परन्तु संयुक्त परिवार ही ऐसा परिवार है जो सभी ग्रामीण समाजों में पाया जाता है। भारत के बहुत-से क्षेत्रों में पितृ प्रधान संयुक्त परिवार पाए जाते हैं। इसलिए हम ग्रामीण समाज में मिलने वाले संयुक्त परिवार का वर्णन करेंगे।
संयुक्त परिवार एक ऐसा समूह है जिसमें कई पुश्तों के सदस्य इकट्ठे रहते हैं। इसका अर्थ है कि दादा-दादी, माता-पिता, चाचा-चाची, उनके बच्चे, लड़कों की पत्नियां तथा बिन ब्याहे बच्चे इत्यादि सभी एक ही निवास स्थान पर रहते हैं।

कार्वे (Karve) के अनुसार, “संयुक्त परिवार उन व्यक्तियों का समूह होता है जिसमें साधारणतया सभी एक ही घर में रहते हैं, जोकि साझी रसोई में पका भोजन खाते हैं तथा साझी जायदाद के मालिक होते हैं तथा जो किसी न किसी प्रकार से दूसरे व्यक्ति के रक्त से सम्बन्धित होते हैं।”

आई०पी० देसाई (I.P. Desai) के अनुसार, “हम उस परिवार को संयुक्त परिवार कहते हैं जिसमें मूल परिवार से अधिक पीढ़ियों के सदस्य शामिल होते हैं तथा यह सदस्य आपकी जायदाद, आय तथा आपसी अधिकारों और फर्जी से सम्बन्धित हों।”

इस प्रकार इन परिभाषाओं को देखकर हम संयुक्त परिवार के निम्नलिखित लक्षणों के बारे में बता सकते हैं:

  1. इनका आकार बड़ा होता है।
  2. इस परिवार के सदस्यों में सहयोग की भावना होती है।
  3. परिवार में जायदाद पर सभी का समान अधिकार होता है।
  4. परिवार के सभी सदस्य एक ही निवास स्थान पर रहते हैं।
  5. परिवार के सभी सदस्यों की आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक गतिविधियां एक जैसी ही होती हैं।

देसाई का कहना है कि जिस किसी भी समाज में कृषि से सम्बन्धित पेशे बहुत अधिक होते हैं वहां पितृ प्रधान संयुक्त परिवार होते हैं। कृषि प्रधान समाजों में संयुक्त परिवार एक आर्थिक सम्पत्ति की तरह कार्य करता है। पितृ प्रधान ग्रामीण संयुक्त परिवार के बहुत-से ऐसे पहलू हैं, जैसे कि क्रियात्मक, राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक इत्यादि जो इसको शहरी परिवार व्यवस्था से अलग करते हैं।
इस तरह इस चर्चा से स्पष्ट है कि ग्रामीण समाजों में साधारणतया पितृ प्रधान संयुक्त परिवार ही पाए जाते हैं। इन परिवारों की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं :

ग्रामीण परिवार की विशेषताएं (Characteristics of Rural Family)-

  1. बड़ा आकार।
  2. कृषि पर निर्भरता।
  3. अधिक सामूहिक भावना अथवा एकता।
  4. अधिक अन्तर्निर्भरता तथा अनुशासन।
  5. पारिवारिक अहं का अधिक होना।
  6. पिता का अधिक अधिकार।।
  7. पारिवारिक कार्यों में अधिक हिस्सेदारी। अब हम इनका वर्णन विस्तार से करेंगे।

1. बड़ा आकार (Large in Size) ग्रामीण परिवार की सबसे पहली विशेषता यह है कि यह आकार में काफ़ी बड़े होते हैं क्योंकि इसमें कई पीढ़ियों के सदस्य एक ही जगह पर इकट्ठे रहते हैं। हमारे देश की बढ़ती जनसंख्या भी इस बड़े आकार के लिए उत्तरदायी है। कई स्थानों पर तो कई परिवारों के सदस्यों की संख्या 60-70 तक भी पहुंच जाती है। परन्तु साधारणतया एक ग्रामीण परिवार में 6 से 15 तक सदस्य होते हैं जिस कारण यह आकार में बड़े होते हैं।

2. कृषि पर निर्भरता (Dependency upon Agriculture) ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों का मुख्य पेशा कृषि होता है जिस कारण ग्रामीण परिवार के सभी सदस्य कृषि के कार्यों में लगे रहते हैं। उदाहरण के लिए खेत में हल चलाने का कार्य कोई और करता है तथा पशुओं का चारा काटने के लिए कोई और कार्य करता है। ग्रामीण परिवार में स्त्रियां खेतों में कार्य करती हैं जिस कारण ही ग्रामीण परिवार शहरी परिवार से अलग होता है। बहुत-सी स्त्रियां खेतों में अपने पतियों की मदद करने के लिए तथा मजदूरों की कमी को पूरा करने के लिए कार्य करती हैं। इसके साथ ही घर में रहने वाली स्त्रियां भी बिना किसी कार्य के नहीं बैठती हैं। वह पशुओं को चारा डालने तथा पानी पिलाने का कार्य करती रहती हैं। खेतों में इकट्ठे कार्य करने के कारण उनकी सोच तथा विचार एक जैसे ही हो जाते हैं।

3. अधिक एकता (Greater Unity)-ग्रामीण परिवार की एक और महत्त्वपूर्ण विशेषता इस में एकता का होना है। ग्रामीण परिवारों में शहरी परिवारों की तुलना में अधिक एकता होती है। जैसे पति-पत्नी, दादा-पोता, माता-पिता में अधिक भावनात्मक तथा गहरे रिश्ते पाए जाते हैं। अगर ग्रामीण क्षेत्रों की तरफ ध्यान से देखें तो यह पता चलता है कि ग्रामीण लोग समहों में रहना अधिक पसन्द करते हैं तथा उनमें एकता किसी खुशी अथवा दु:ख के मौके पर देखी जा सकती है। ग्रामीण परिवार के सदस्यों की इच्छाएं, विचार, कार्य, गतिविधियां तथा भावनाएं एक जैसी ही होती हैं। वह लगभग एक जैसे कार्य करते हैं तथा एक जैसा ही सोचते हैं। सदस्य के निजी जीवन का महत्त्व परिवार से कम होता है। सभी सदस्य एक ही सूत्र में बन्धे होते हैं तथा परिवार के आदर्शों और परम्पराओं के अनुसार ही अपना जीवन जीते हैं।

4. अधिक अन्तर्निर्भरता तथा अनुशासन (More Inter-dependency and Discipline)-शहरी परिवारों के सदस्यों की तुलना में ग्रामीण परिवार के सदस्य एक-दूसरे पर अधिक निर्भर होते हैं। शहरों में मनुष्य की बहुत-सी आवश्यकताएं परिवार से बाहर ही पूर्ण हो जाती हैं। परन्तु ग्रामीण परिवार में मनुष्य की आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक इत्यादि आवश्यकताएं परिवार में ही पूर्ण होती हैं। इसका कारण यह है कि इन आवश्यकताओं की पूर्ति गांवों में परिवार के अतिरिक्त और कोई साधन नहीं कर सकता है तथा व्यक्ति अकेले ही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता है। जैसे गांव में कोई लड़का तथा लड़की अपने आप ही विवाह नहीं करवा सकते बल्कि उनके परिवार ही विवाह का प्रबन्ध करते हैं। अधिक अन्तर्निर्भरता के कारण परिवार के सदस्य अपने बड़ों के नियन्त्रण के अन्तर्गत तथा अनुशासन में रहते हैं। परिवार का छोटा सदस्य बड़े सदस्य की प्रत्येक बात मानता है चाहे बड़ा सदस्य गलत ही क्यों न हो।

5. पारिवारिक अहं का अधिक होना (More Pride of Family)-ग्रामीण परिवार का एक और महत्त्वपूर्ण लक्षण परिवार के अहं का अधिक होना है। परिवार के सदस्यों की अधिक अन्तर्निर्भता तथा एकता के कारण ग्रामीण परिवार एक ऐसी इकाई का रूप ले लेता है जिसमें एक सदस्य की जगह परिवार का अधिक महत्त्व होता है। साधारण शब्दों में ग्रामीण परिवार में परिवार का महत्त्व अधिक तथा एक सदस्य का महत्त्व कम होता है। परिवार के किसी भी सदस्य की तरफ से किया गया कोई भी अच्छा या गलत कार्य परिवार के सम्मान या कलंक का कारण बनता है। परिवार के प्रत्येक सदस्य से यह आशा की जाती है कि वह परिवार के सम्मान को बरकरार रखे। पारिवारिक अहं की उदाहरण हम देख सकते हैं कि परिवार के सम्मान के लिए कई बार गांव के अलग-अलग परिवारों में झगड़े भी हो जाते हैं तथा कत्ल भी हो जाते हैं।

6. पिता के अधिक अधिकार (More Powers of Father)-ग्रामीण परिवारों में पिता के अधिकार अधिक होते हैं। पिता ही पूर्ण परिवार का कर्ता-धर्ता होता है। परिवार के सदस्यों को लिंग तथा उम्र के आधार पर कार्यों के विभाजन, बच्चों के विवाह करने, आय का ध्यान रखना, सम्पूर्ण घर को सही प्रकार से चलाना इत्यादि कई ऐसे कार्य हैं जो पिता अपने ढंग से करता है। पिता का ग्रामीण परिवार पर इतना अधिक प्रभाव होता है कि परिवार का कोई भी सदस्य उसके आगे बोल नहीं सकता है। ग्रामीण परिवार शहरी परिवारों के बिल्कुल ही विपरीत होते हैं जहां परिवार के प्रत्येक सदस्य का अपना ही महत्त्व होता है।

7. पारिवारिक कार्यों में अधिक भागीदारी (More participation in Household Affairs)-ग्रामीण परिवार की एक और महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि परिवार के सभी सदस्य परिवार के कार्यों में गहरे रूप से शामिल होते हैं। कृषि ढांचा होने के कारण परिवार के सभी सदस्य अपना अधिकतर समय एक-दूसरे के साथ व्यतीत करते हैं जिस कारण परिवार के सदस्य घर की प्रत्येक गतिविधि तथा कार्य में भाग लेते हैं। दिन के समय खेतों में इकट्ठे कार्य करने के कारण तथा रात के समय घर के कार्य इकट्ठे करने के कारण सभी सदस्य एक-दूसरे के बहुत ही नज़दीक होते हैं।

इन विशेषताओं के अतिरिक्त ग्रामीण परिवार की और भी विशेषताएं हो सकती हैं जैसे कि :

  1. धर्म का अधिक महत्त्व।
  2. स्त्रियों की निम्न स्थिति।
  3. पूर्वजों की पूजा।
  4. संयुक्त परिवारों का महत्त्व। इस प्रकार ऊपर ग्रामीण परिवार की विशेषताओं का वर्णन किया गया है।

प्रश्न 2. ग्रामीण परिवारवाद के बारे में आप क्या जानते हैं ? वर्णन करो।
उत्तर-ग्रामीण सामाजिक संरचना में परिवार एक महत्त्वपूर्ण इकाई होता है। गांवों में मिलने वाली प्रत्येक प्रकार की संस्था के ऊपर ग्रामीण परिवार का बहुत अधिक प्रभाव होता है। इस कारण ही ग्रामीण समाज में परिवार को अधिक महत्त्व प्राप्त होता है तथा व्यक्ति को कम महत्त्व प्राप्त होता है। इसको ही परिवारवाद कहते हैं। जब एक या दो व्यक्तियों की जगह पूर्ण परिवार को महत्त्व दिया जाए तो इसको परिवारवाद कहते हैं। ___ समाजशास्त्रियों का कहना है कि कृषि प्रधान समाजों में सामाजिक तथा राजनीतिक संगठनों में परिवार के गुण पाए जाते हैं जोकि ग्रामीण समाज की प्राथमिक तथा सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई है। पारिवारिक गुणों के सामाजिक, राजनीतिक संगठनों पर प्रभाव को ही परिवारवाद कहा जाता है।

सोरोकिन (Sorokin) के अनुसार, “क्योंकि परिवार ग्रामीण समाज की प्राथमिक सामाजिक संस्था है, इसलिए स्वाभाविक ही यह आशा की जाती है कि कृषि समूहों के ऊपर सामाजिक संस्थाओं तथा ग्रामीण परिवारों की विशेषताओं की छाप हो। दूसरे शब्दों में ग्रामीण समाज के सभी सामाजिक संगठनों के प्राथमिक सामाजिक सम्बन्धों के नमूने, ग्रामीण पारिवारिक सम्बन्धों के अनुसार बने होते हैं। परिवारवाद शब्द ऐसे ही सामाजिक संगठनों के लिए प्रयोग किया गया है।”
इस प्रकार जब गांव की राजनीतिक तथा सामाजिक संस्थाओं के ऊपर परिवार का प्रभाव हो तो इसको परिवारवाद कहते हैं। परिवारवाद की विशेषताएं इस प्रकार हैं :

1. परिवार एक आदर्श के रूप में (Family in the form of an Ideal)-परिवार को समाज के एक आदर्श के रूप में देखा जाता है। परिवार में नैतिक माप दण्ड, धार्मिक विश्वास, सामाजिक धारणाएं होती हैं तथा अगर कोई इनको तोड़ने तथा परिवार की स्थिरता को कमजोर करने की कोशिश करता है तो उसकी निन्दा की जाती है।

2. परिवार सामाजिक उत्तरदायित्व की इकाई (Family a unit of Social Responsibility)-किसी भी ग्रामीण समाज की प्राथमिक इकाई परिवार होता है। इसकी सभी ज़िम्मेदारियां परिवार ही निभाता है तथा परिवार ही सामूहिक रूप से कर अदा करता है। गांव में किसी व्यक्ति की पहचान भी उसके परिवार से ही होती है। किसी भी व्यक्ति को निजी तौर पर पहचाना नहीं जाता है।

3. परिवार का राजनीतिक संस्थाओं पर प्रभाव (Effect of family on Political Institutions)-कृषि प्रधान समाजों में राजनीतिक संस्थाओं का रूप भी ग्रामीण परिवारों जैसा ही होता है। शासक तथा आम लोगों के बीच का रिश्ता परिवार के मुखिया तथा सदस्यों के बीच के रिश्ते जैसा होता है। राजा, शासक इत्यादि को पिता प्रधान परिवार के मुखिया के जैसा ही समझा जाता है। गांव की राजनीतिक गतिविधियों में परिवार का मुखिया ही परिवार का प्रतिनिधि होता है। परिवार जहां पर भी कह दे सदस्य वहीं पर ही वोट भी डालते हैं।

4. सहयोग से भरपूर रिश्ते (Relations full of Co-operation)-शहरी समाजों में रिश्ते सहयोग वाले नहीं बल्कि समझौते पर आधारित होते हैं। व्यक्ति कार्य खत्म होने के बाद रिश्ता भी खत्म कर देता है। परन्तु कृषि प्रधान तथा ग्रामीण समाजों में रिश्ते समझौते पर आधारित न होकर बल्कि सहयोग, हमदर्दी, प्यार तथा मेल मिलाप वाले होते हैं। इकट्ठे रहने, इकट्ठे कार्य करने, एक जैसे विचारों तथा विश्वासों को मानने तथा परिवार के प्रति निष्ठा और एकता के कारण सहयोग से भरपूर रिश्ते सामने आते हैं।

5. परिवार-उत्पादन, उपभोग तथा विभाजन की इकाई (Family a unit of Production, Consumption and Exchange) ग्रामीण समाज के आर्थिक ढांचे में भी ग्रामीण परिवार के गुण पाए जाते हैं। ग्रामीण परिवार में ही उत्पादन होता है तथा उपभोग भी। इसका अर्थ है कि परिवार की आवश्यकताओं के अनुसार ही उत्पादन किया जाता है तथा परिवार ही उस उत्पादन का उपभोग करता है। गांव में विभाजन बहुत ही साधारण तरीके से होता है। पैसे के लेन-देन की जगह चीज़ों का लेन-देन कर लिया जाता है। परिवार ही विनिमय का आधार होता है।

6. बहुत अधिक प्रथाएं (Many Customs)-कृषि प्रधान समाजों में सभी ही ग्रामीण जीवन की प्रक्रियाएं प्रथाओं के इर्द-गिर्द ही चलती हैं। जीवन के प्रत्येक पक्ष से सम्बन्धित प्रथाएं ग्रामीण समाज में मौजूद होती हैं तथा यह व्यक्ति के जीवन में हरेक पक्ष को प्रभावित करती रहती हैं।

7. पितृ पूजा की प्रमुखता (Dominance of Ancestoral Worship)-ग्रामीण समाज में धर्म का बहुत अधिक महत्त्व होता है। परिवार के सभी सदस्यों को परिवार की प्रथाओं, परम्पराओं इत्यादि को मानना ही पड़ता है। ग्रामीण परिवारों में पूजा बहुत होती है। बुजुर्गों की पूजा ग्रामीण समाज का महत्त्वपूर्ण अंग है। लोग देवी-देवताओं की पूजा के साथ-साथ पूर्वजों की पूजा भी कर लेते हैं।
इस प्रकार जिन समाजों में परिवारवाद की प्रधानता होती है वहां परिवार की अपनी ही कुछ विशेषताएं होती हैं।

प्रश्न 3. ग्रामीण विवाह क्या होता है ? इसकी विशेषताओं का वर्णन करो।
उत्तर-साधारणतया किसी भी समाज में विवाह करवाना आवश्यक समझा जाता है क्योंकि समाज को आगे बढ़ाने के लिए विवाह करवाना आवश्यक है। विवाह के बिना पैदा हई सन्तान को समाज की तरफ से मान्यता प्राप्त नहीं होती है। कृषि प्रधान समाजों में तो इसको बहुत ही आवश्यक समझा जाता है। ग्रामीण समाजों में बच्चों का विवाह करना आवश्यक समझा जाता है। लड़की को तो एक बोझ ही समझा जाता है। इस कारण ही लड़की का विवाह जल्दी कर दिया जाता है। इस प्रकार विवाह पुरुष तथा स्त्री के बीच बनाया गया रिश्ता है जिसका उद्देश्य परिवार बनाना, घर बसाना, बच्चे पैदा करना तथा समाज को आगे बढ़ाना है।।

विवाह व्यक्ति के जीवन का बहुत महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। भारतीय समाज काफ़ी हद तक एक ग्रामीण समाज है जिस कारण ग्रामीण विवाह में विवाह को पारिवारिक मामला समझा जाता है। विवाह से दो परिवार इकट्ठे होते हैं तथा लड़का-लड़की एक दूसरे से सम्बन्ध बनाते हैं। ग्रामीण समाज में गोत्र से बाहर विवाह करवाना तथा जाति के अंदर विवाह करवाना आवश्यक समझा जाता है। विवाह से दो परिवारों की स्थिति का पता चलता है।
ग्रामीण समाजों में विवाह को एक समझौता नहीं बल्कि धार्मिक संस्कार समझा जाता है। गांवों में विवाह परम्परागत ढंग से तथा पूर्ण रीति-रिवाजों से किए जाते हैं। विवाह से पहले देवी-देवताओं की पूजा होती है। लड़की के घर बारात जाती है, विवाह से सम्बन्धित कई प्रकार की रस्में पूर्ण की जाती हैं तथा विवाह सम्पन्न होता है। चाहे शहरों में रस्में कम होती जा रही हैं परन्तु ग्रामीण समाजों में विवाह पूर्ण संस्कारों तथा रीति-रिवाजों के साथ होते हैं। ग्रामीण विवाह में शहरों जैसी तड़क-भड़क (Pomp and Show) तो नज़र नहीं आती परन्तु यह होता पूर्ण परम्परा से है।
इस प्रकार ग्रामीण समाजों में जो विवाह पूर्ण धार्मिक संस्कारों, रीति-रिवाजों, परम्पराओं इत्यादि के साथ होता है उसको ग्रामीण विवाह का नाम दिया जाता है। इस विवाह से न केवल धर्म की पालना की जाती है बल्कि यौन सन्तुष्टि तथा सन्तान पैदा करना भी इसके उद्देश्य हैं।

ग्रामीण विवाह की विशेषताएँ (Characteristics of Rural Marriage)-

1. धार्मिक संस्कार (Religious Sacrament) ग्रामीण समाजों में विवाह को धार्मिक संस्कार माना जाता है क्योंकि इसका उद्देश्य धार्मिक होता है। धार्मिक ग्रन्थों में लिखा हुआ है कि व्यक्ति विवाह करके अपनी गृहस्थी बसाएगा, सन्तान पैदा करके समाज को आगे बढ़ाएगा तथा अपने ऋण उतारेगा। व्यक्ति अपने ऋण केवल विवाह करके तथा सन्तान पैदा करके ही उतार सकता है। ग्रामीण समाज में व्यक्ति को जन्म से लेकर मृत्यु तक कई संस्कारों में से गुजरना पड़ता है। इस कारण ही इसे धार्मिक संस्कार माना जाता है।

2. धर्म से सम्बन्धित (Related with Religion)-ग्रामीण विवाह हमेशा धर्म से सम्बन्धित होता है क्योंकि ग्रामीण विवाह पूर्ण धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ पूर्ण किया जाता है। चाहे शहरों में धार्मिक रीति-रिवाज कम हो गए हैं परन्तु ग्रामीण समाजों में यह अभी भी चल रहे हैं। धार्मिक रीति-रिवाज पूर्ण करने के कारण व्यक्ति के बहुत-से कर्तव्य बन जाते हैं। उदाहरण के तौर पर व्यक्ति ने अपने जीवन में कई ऋण उतारने हैं तथा कई प्रकार के यज्ञ करने हैं। यज्ञ पूर्ण करने के लिए विवाह करना आवश्यक होता है क्योंकि विवाह के बिना व्यक्ति यज्ञ नहीं कर सकता है। इस प्रकार ग्रामीण विवाह धर्म से सम्बन्धित होता है।

3. परम्पराओं से विवाह करना (Marriage to be done with full Traditions)-ग्रामीण समाज में परम्परागत रूप से तथा पूर्ण परम्पराएं निभा कर विवाह किया जाता है। परम्पराएं जैसे कि लड़के का घोड़ी पर चढ़ कर बारात लेकर लड़की के घर जाना, बारातियों का नाचते हुए जाना, लड़की से फेरे लेने, लड़की का डोली में बैठकर लड़के के घर जाना, वहां कई प्रकार की रस्में पूर्ण करना इत्यादि हैं जिनसे कि ग्रामीण विवाह पूर्ण होता है। ये प्रथाएं तथा परम्पराएं न केवल ग्रामीण विवाह में बल्कि हिंदू विवाह में भी मौजूद होती हैं। इन परम्पराओं तथा रीति-रिवाजों को पूर्ण किए बिना ग्रामीण समाजों में विवाह को पूर्ण नहीं समझा जाता है।

4. विवाह टूट नहीं सकता है (Marriage cannot be Broken)-ग्रामीण समाज में विवाह को समझौता नहीं बल्कि धार्मिक संस्कार समझा जाता है। अगर इसको समझौता समझा जाए तो इसको कभी भी तोड़ा जा सकता है जैसे कि शहरी समाजों में होता है। परन्तु ग्रामीण समाजों में विवाह को धार्मिक संस्कार समझा जाता है जिसको कभी भी तोड़ा नहीं जा सकता। विवाह को तो सात जन्मों का बन्धन समझा जाता है जो कि कभी भी तोड़ा नहीं जा सकता।

5. विवाह आवश्यक है (Marriage is Necessary) ग्रामीण समाजों में विवाह को बहुत ही आवश्यक समझा जाता है क्योंकि बिन ब्याहे बच्चों को माता-पिता पर बोझ समझा जाता है। विशेषतया लड़कियों के लिए तो विवाह बहुत ही आवश्यक है क्योंकि अगर लड़की का विवाह नहीं होता तो यह समझा जाता है कि माता-पिता अपना फर्ज़ पूर्ण नहीं कर रहे हैं। ग्रामीण समाजों में यह समझा जाता है कि स्त्रियों के लिए मां बनना बहुत ज़रूरी होता है क्योंकि इसके साथ ही समाज आगे चलता है। लड़के के विवाह से लड़की का विवाह आवश्यक समझा जाता है क्योंकि लड़के के चाल चलन के बारे में कोई डर नहीं होता परन्तु लड़की के बारे में यह डर होता है तथा लड़की के गलत चाल चलन से परिवार की स्थिति निम्न हो सकती है।

6. माता-पिता द्वारा व्यवस्थित विवाह (Arranged marriage by Parents)-ग्रामीण समाजों में विवाह को एक पुरुष तथा स्त्री का मेल नहीं बल्कि दो परिवारों, दो समूहों अथवा दो गांवों का मेल समझा जाता है। इस कारण माता-पिता अपने बच्चे का साथी ढूंढ़ने के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विवाह निश्चित करने के लिए परिवार के आकार, परिवार की स्थिति, नातेदारी तथा परिवार की आर्थिक स्थिति को बहुत महत्त्व दिया जाता है। इसके साथसाथ बच्चे के निजी गुणों को भी ध्यान में रखा जाता है। अगर बच्चे में कोई व्यक्तिगत कमी है तो उसका विवाह करने में काफ़ी मुश्किल आती है। माता-पिता ही बच्चे का विवाह करते हैं तथा कोशिश यह ही होती है कि विवाह धूमधाम से किया जाए।

7. धार्मिक व्यक्ति की भूमिका (Role of Priest)—विवाह में पण्डित की बहुत बड़ी भूमिका होती है। लगभग सभी समाजों में ही विवाह को निश्चित करने से पहले लड़के तथा लड़की की जन्म पत्री पण्डित को दिखाई जाती है। अगर कुण्डली मिलती है तो विवाह पक्का कर दिया जाता है। परन्तु अगर कुण्डली नहीं मिलती है तो विवाह पक्का नहीं किया जाता है। विवाह पक्का करने के बाद शगुन लेने-देने, मंगनी के समय तथा विवाह करवाने में पण्डित की बहुत बड़ी भूमिका होती है क्योंकि पण्डित ने ही सभी धार्मिक क्रियाओं को पूर्ण करने के बाद ही विवाह करवाना है। पण्डित मन्त्र पढ़कर तथा पूर्ण विधि विधान से विवाह करवाता है। इस प्रकार ग्रामीण विवाह में पण्डित या धार्मिक व्यक्ति की बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

इसके साथ ही एक महत्त्वपूर्ण चीज़ यह है कि गांव में मंगनी के बाद तथा विवाह से पहले लड़के लड़की को मिलने की इजाजत नहीं होती है। चाहे शहरों में यह बात आम हो गई है। इस समय को बहुत ही नाजुक समझा जाता है क्योंकि लड़का-लड़की में किसी बात पर तकरार होने पर रिश्ता टूट भी सकता है। इस तरह ग्रामीण समाज में विवाह से पहले लड़का तथा लड़की पर बहुत पाबन्दियां होती हैं।

प्रश्न 4. ग्रामीण समाज में साथी के चुनाव के कौन-कौन से नियम हैं ? उनका वर्णन करो।
उत्तर-किसी भी समाज में बुजुर्ग माता-पिता के सामने सबसे बड़ा प्रश्न अपने बच्चों के विवाह करने का होता है। विवाह के लिए साथी की आवश्यकता होती है तथा साथी का चुनाव ही सबसे बड़ी मुश्किल होती है। साथी चुनाव का अर्थ होने वाले जीवन-साथी के चुनाव से है। साथी के चुनाव के लिए यह आवश्यक है कि चुनाव के क्षेत्र का निर्धारण हो कि कहां पर विवाह करना है तथा कहां पर विवाह नहीं करना है। साथी के चुनाव के लिए हमारे समाजों में कुछ नियम बनाए गए हैं कि गोत्र, सपिण्ड इत्यादि में विवाह नहीं करना है परन्तु जाति अथवा उपजाति के अन्दर ही विवाह करना है। वैसे तो नियम प्रत्येक समाज के अलग-अलग होते हैं तथा यह समय तथा समाज के अनुसार बदलते रहते हैं। साथी का चुनाव व्यक्ति की इच्छा पर ही आधारित नहीं होता बल्कि समाज द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार . भी होता है। इसलिए कपाडिया (Kapadia) ने साथी के चुनाव को तीन भागों में बांटा है
1. चुनाव का क्षेत्र (The field of Selection) 2. चुनाव करने के लिए दूसरा पक्ष (Parties for Selection) 3. hra o ab Hifzui (Criteria of Selection)! अब हम इसका वर्णन विस्तार से करेंगे

1. चुनाव का क्षेत्र (Field of Selection)-हिन्दू समाज में विवाह करने के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं जैसे कि अन्तर्विवाह तथा बहिर्विवाह। इन नियमों को मानने के साथ विवाह का क्षेत्र सीमित हो जाता है। अन्तर्विवाह तथा बहिर्विवाह के नियम इस प्रकार हैं

(i) अन्तर्विवाह (Endogamy)-अन्तर्विवाह के नियम के द्वारा व्यक्ति को अपनी जाति में ही विवाह करवाना पड़ता था। जाति आगे उपजातियों में (Sub-caste) बंटी हुई थी। व्यक्ति को उपजाति में ही विवाह करवाना पड़ता था। जाति प्रथा के समय अन्तर्विवाह के इस नियम को बहुत सख्ती से लागू किया गया था। यदि कोई व्यक्ति इस नियम की उल्लंघना करता था तो उसको जाति में से बाहर निकाल दिया जाता था व उससे हर तरह के सम्बन्ध तोड़ लिए जाते थे। धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार समाज को चार जातियों में बांटा हुआ था तथा ये जातियां आगे उप-जातियों में बंटी हुई थीं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी उप-जाति में ही विवाह करवाता था। होइबल (Hoebal) के अनुसार, “आन्तरिक विवाह एक सामाजिक नियम है जो यह मांग करता है कि व्यक्ति अपने सामाजिक समूह में जिसका वह सदस्य है विवाह करवाए।”

अन्तर्विवाह के भारत में पाए जाने वाले रूप(1) कबाइली अन्तर्विवाह। (2) जाति अन्तर्विवाह। (3) वर्ग-अन्तर्विवाह। (4) उप-जाति अन्तर्विवाह। (5) नस्ली अन्तर्विवाह।

(ii) बहिर्विवाह (Exogamy)-विवाह की संस्था एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक संस्था है। कोई भी समाज किसी जोड़े को बिना विवाह के पति-पत्नी के सम्बन्धों को स्थापित करने की स्वीकृति नहीं देता। इसी कारण प्रत्येक समाज विवाह स्थापित करने के लिए कुछ नियम बना लेता है। सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य साथी का चुनाव करना होता है। बहिर्विवाह में भी साथी के चुनाव करने का नियम होता है। कई समाजों में जिन व्यक्तियों में खून के सम्बन्ध होते हैं या अन्य किसी किस्म से वह एक-दूसरे से सम्बन्धित हों तो ऐसी अवस्था में उन्हें विवाह करने की स्वीकृति नहीं दी जाती। इस प्रकार बहिर्विवाह का अर्थ यह होता है कि व्यक्ति को अपने समूह में विवाह करवाने की मनाही होती है। एक ही माता-पिता के बच्चों को आपस में विवाह करने से रोका जाता है। मुसलमानों में माता-पिता के रिश्तेदारों में विवाह करने की इजाज़त दी जाती है। इंग्लैंड के रोमन कैथोलिक चर्च (Roman Catholic Church) में व्यक्ति को अपनी पत्नी की मौत के पश्चात् अपनी साली से विवाह करने की आज्ञा नहीं दी जाती। ऑस्ट्रेलिया में लड़का अपने पिता की पत्नी से विवाह कर सकता है यदि वह उसकी सगी मां नहीं है।

बहिर्विवाह के नियम अनुसार व्यक्ति को अपनी जाति, गोत्र, स्पर्वर, सपिण्ड आदि में विवाह करवाने की आज्ञा नहीं दी जाती। इसके कुछ प्रकार निम्नलिखित हैं

  • गोत्र बहिर्विवाह।
  • स्पर्वर बहिर्विवाह।
  • सपिण्ड बहिर्विवाह।
  • गांव से बहिर्विवाह।
  • टोटम बहिर्विवाह।

2. चुनाव करने के लिए दूसरा पक्ष (Parties for Selection)–विवाह करने के लिए साथी के चुनाव के क्षेत्र के नियम तो समाज ने बना दिए हैं परन्तु विवाह करने के लिए दूसरे पक्ष का होना भी आवश्यक है। दूसरा पक्ष ढूंढ़ने के लिए कई प्रकार के ढंग प्रचलित हैं। सबसे पहला ढंग तो यह है कि विवाह के लिए साथी का चुनाव लड़के अथवा लड़की के रिश्तेदार करें। वह अपने लड़के या लड़की के लिए रिश्ते ढूंढें, घर-बार देखने के बाद ही रिश्ता पक्का करें। इस को व्यवस्थित विवाह (Arranged marriage) भी कहा जाता है। दूसरी प्रकार में विवाह के लिए साथी का चुनाव अपने मित्रों, रिश्तेदारों की सलाह से किया जाता है। भारतीय समाज की उच्च श्रेणी में इस प्रकार का विवाह प्रचलित है। तीसरी प्रकार में लड़का या लड़की अपनी पसन्द का साथी चुनते हैं तथा उससे विवाह करते हैं। इसको प्रेम विवाह (Love Marriage) भी कहा जाता है।

विवाह के साथी का चुनाव करने में रिश्तेदार तथा मित्र बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तो विवाह के लिए माता-पिता किसी मध्यस्थ अथवा रिश्तेदार को भी कह देते हैं ताकि वह उनके बच्चों के लिए साथी चुन सके। नाई अथवा ब्राह्मण भी इस समय महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं क्योंकि वह अलग-अलग गांवों में जाते रहते हैं तथा उनको गांव के बिन ब्याहे लड़के तथा लड़कियों के बारे में पता होता है। घर के मर्दो का इस सम्बन्ध में निर्णय अन्तिम होता है। अगर कोई मध्यस्थ विवाह करवाने में सफल हो जाता है तो उसको दोनों परिवारों की तरफ से ईनाम दिया जाता है। क्योंकि ग्रामीण समाजों में गांव में विवाह करवाना मना होता है इसलिए वह गांव, गोत्र, स्पर्वर इत्यादि से बाहर ही रिश्ता ढूंढ़ते हैं। यह प्रक्रिया काफ़ी समय तक चलती रहती है। चाहे आजकल मध्यस्थों का महत्त्व कम हो गया है तथा यातायात और संचार के साधनों के बढ़ने के कारण माता-पिता अपने आप ही रिश्ता तथा उनके बारे में पूछताछ करने लग गए हैं। · वैसे तो आजकल के समय में माता-पिता बच्चे से पूछ कर उसकी पसन्द के अनुसार विवाह करवाना ही पसन्द करते हैं। आजकल लड़का तथा लड़की अपनी मर्जी से विवाह करवाना ही पसन्द करते हैं जिस कारण प्रेम विवाहों का चलन भी बढ़ रहा है। प्रेम विवाह के कारण अन्तर्जातीय विवाह आगे आ रहे हैं।

3. चुनाव की कसौटियां (Criteria of Selection)-यह ठीक है कि विवाह के लिए साथी का चुनाव करने के नियम भी हैं तथा पक्ष भी हैं परन्तु इन पक्षों को निश्चित करने के लिए कुछ कसौटियां भी होती हैं। ये कसौटियां दूसरे पक्ष से सम्बन्धित होती हैं। जैसे कि दूसरे पक्ष का परिवार, व्यक्तिगत, गुण, दहेज इत्यादि। उनका वर्णन इस प्रकार है-

(i) परिवार (Family)—प्राचीन समय में विवाह करने के लिए लड़का-लड़की को कम बल्कि परिवार को अधिक महत्त्व दिया जाता था। यह देखा जाता था कि परिवार अपने धार्मिक कर्तव्यों को पूर्ण कर रहा है अथवा नहीं। अगर परिवार अपने धार्मिक कर्त्तव्यों को पूर्ण कर रहा होता था तो उस परिवार को विवाह के लिए सही माना जाता था तथा विवाह हो जाता था नहीं तो उस परिवार को विवाह के लिए शुभ नहीं समझा जाता था। इसके साथ ही इस बात का ध्यान भी रखा जाता था कि परिवार की समाज में कोई स्थिति भी हो।

ग्रामीण समाजों में विवाह को केवल लड़के तथा लड़की के बीच ही रिश्ता नहीं समझा जाता बल्कि इसको दो परिवारों, दो समूहों तथा दो गांवों में रिश्ता समझा जाता है। परिवार के बड़े बुजुर्ग विवाह में बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लड़के लड़की की अपनी पसन्द को बहुत ही कम महत्त्व दिया जाता है। विवाह केवल सामाजिक तथा धार्मिक कर्त्तव्य पूर्ण करने के लिए किए जाते हैं। इस कारण ही विवाह में व्यक्तिगत पसन्द का महत्त्व कम तथा बड़े बुजुर्गों की मर्जी अधिक होती है। विवाह के लिए साथी के चुनाव के समय दूसरे पक्ष के परिवार की सामाजिक स्थिति, आर्थिक स्थिति, परिवार का आकार, परिवार की रिश्तेदारी इत्यादि को मुख्य रखा जाता है। इसके साथ ही यह भी देखा जाता है कि दूसरे पक्ष के पास कृषि योग्य कितनी भूमि है।

(ii) साथी के व्यक्तिगत गुण (Individual abilities of the Mate)-जीवन साथी के चुनाव के लिए परिवार देखने के साथ-साथ साथी के व्यक्तिगत गुणों को भी देखा जाता है। आजकल के समय में ग्रामीण समाजों में भी बच्चे पढ़-लिख रहे हैं जिस कारण वह होने वाले साथी के व्यक्तिगत गुणों को भी बहुत महत्त्व देते हैं। यह गुण हैं जैसे कि साथी का चरित्र, उसकी उम्र, शिक्षा का स्तर, आय, रंग, ऊंचाई, सुन्दरता, स्वभाव, घर के कार्य करने आना इत्यादि। अगर लड़का ढूंढ़ना होता है तो यह देखा जाता है कि वह कोई नशा तो नहीं करता है अथवा उसकी दोस्ती ठीक है अथवा नहीं। अगर लड़के अथवा लड़की की सुन्दरता कम है अथवा रंग काला है, अपाहिज है, बहुत गुस्सा आता है तो ऐसे हालातों में साथी ढूंढ़ने के मौके बहुत कम हो जाते हैं।

(iii) दहेज (Dowry)-परम्परागत भारतीय समाज में विवाह के समय लड़की को दहेज देने की प्रथा चली आ रही है। विवाह के समय माता-पिता लड़की को लड़के के घर भेजते समय लड़की, लड़के तथा लड़के के माता-पिता को कुछ उपहार भी देते हैं। इन उपहारों को ही दहेज का नाम दिया जाता है। हरेक परिवार अपनी आर्थिक स्थिति तथा लड़के वालों की सामाजिक स्थिति के अनुसार दहेज देता है। जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति अच्छी होती है वह अधिक दहेज देते हैं तथा जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति कमज़ोर होती है वह कम दहेज देते हैं।

आजकल के समय में यह प्रथा काफ़ी बढ़ गई है तथा यह सम्पूर्ण भारतीय समाज में समान रूप से प्रचलित है। चाहे 1961 के Dowry Prohibition Act के अनुसार दहेज लेना तथा देना गैर-कानूनी है तथा दहेज लेने तथा देने वाले को सज़ा भी हो सकती है परन्तु यह प्रथा ज़ोर-शोर से चल रही है। इस प्रथा के कारण साथी के चुनाव का क्षेत्र काफ़ी सीमित हो गया है। इसका कारण यह है कि सभी लोग अधिक-से-अधिक दहेज प्राप्त करना चाहते हैं तथा सभी लोग अधिक दहेज दे नहीं सकते हैं। इस दहेज प्रथा के कारण सैकड़ों लड़कियां प्रत्येक वर्ष मर जाती हैं। ग्रामीण समाजों में दहेज लेने का चलन भी काफ़ी अधिक है। साथी का चुनाव करते समय यह देखा जाता है कि कौन-सा परिवार कितना दहेज दे सकता है। . इस प्रकार इन आधारों के आधार पर ग्रामीण समाजों में साथी का चुनाव किया जाता है। चाहे अब बढ़ती शिक्षा के कारण, कई प्रकार के कानूनों के कारण तथा पश्चिमीकरण के प्रभाव के कारण इन नियमों का महत्त्व कम हो रहा है तथा अन्तर्जातीय विवाह बढ़ रहे हैं परन्तु फिर भी यह नियम विवाह के समय बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

प्रश्न 5. ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बारे में आप क्या जानते हैं ? वर्णन करें।
अथवा ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं की विशेषताओं का वर्णन करो।
उत्तर-अगर हम ग्रामीण समाज का अध्ययन करना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बारे में समझना पड़ेगा क्योंकि ग्रामीण समाजों में सम्बन्धों के आर्थिक आधार का बहुत महत्त्व है। ग्रामीण समाज में भूमि को बहुत महत्त्व दिया जाता है क्योंकि ग्रामीण आर्थिकता का मुख्य आधार ही भूमि होती है। हमारे देश की लगभग 70% के करीब जनसंख्या कृषि अथवा कृषि से सम्बन्धित कार्यों में लगी हुई है तथा कृषि प्रत्यक्ष रूप से भूमि से सम्बन्धित कार्यों में लगी हुई है। भूमि का ग्रामीण समाज की आर्थिक तथा सामाजिक संरचना पर सीधा प्रभाव पड़ता है।

देश की अधिकतर जनसंख्या के कृषि में लगे होने के कारण हमारे देश की आर्थिकता भी मुख्य रूप से कृषि पर ही निर्भर करती है। देश की लगभग आधी आय कृषि से सम्बन्धित कार्यों से ही आती है। चाहे गांवों में और बहुत-से पेशे होते हैं परन्तु वह प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कृषि से सम्बन्धित होते हैं। गांव की कई जातियां कई और जातियों को अपनी सेवाएँ भी देती हैं तथा उसकी एवज़ में उन्हें पैसा अथवा उत्पादन में से हिस्सा मिलता है। गांवों में अगर शारीरिक तौर पर कार्य करते हैं तो वह भी कृषि से ही सम्बन्धित होते हैं जैसे कि कृषि क्षेत्र में कार्य करने वाले मजदूर। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि गांवों में लगभग सभी कार्य कृषि से सम्बन्धित होते हैं इसलिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था की विशेषताएं भी कृषि अथवा भूमि से सम्बन्धित होती हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार है :

1. मुख्य पेशा-कृषि (Main occupation-Agriculture) हमारे देश में ग्रामीण लोगों का मुख्य पेशा कृषि है तथा कृषि ही शहरी तथा ग्रामीण समाजों की आर्थिकता का मुख्य अन्तर है। साधारण ग्रामीण लोगों के लिए जीने का ढंग भी कृषि है। ग्रामीण लोगों के रहने सहने, रोज़ाना के कार्य, विचार, आदतें, सोच इत्यादि सभी कुछ कृषि पर आधारित होते हैं। ग्रामीण समाज में उत्पादन का मुख्य साधन कृषि ही है तथा भूमि को सामाजिक स्थिति का निर्धारण समझा जाता है। भूमि के साथ-साथ पशुओं को भी सम्पत्ति के रूप में गिना जाता है। कई प्रकार के और पेशे जैसे कि बढ़ई, लोहार, दस्तकारी के कार्य इत्यादि भी ग्रामीण समाज की आर्थिकता का हिस्सा हैं।

2. उत्पादन तथा उत्पादन की विधि (Production and Method of Production)—चाहे प्राचीन समय में ग्रामीण समाजों में कृषि का कार्य हल तथा बैलों की मदद से होता था परन्तु आजकल कृषि का कार्य ट्रैक्टरों, थ्रेशरों, कम्बाइनों इत्यादि से होता है। किसान गेहूँ, ज्वार, मकई, चावल, कपास इत्यादि का उत्पादन करते हैं परन्तु अब किसान और कई प्रकार की फसलें उगाने लग गए हैं। इनके साथ ही वह कई प्रकार की सब्जियां तथा फल भी उत्पन्न करने लग गए हैं। लोग अब सहायक पेशे जैसे कि पिगरी, पोलट्री, डेयरी, मछली पालन इत्यादि जैसे कार्य कर रहे हैं। सिंचाई के लिए नहरों, ट्यूबवैल इत्यादि का प्रयोग किया जाता है। वैसे तो बहुत-से किसान अपनी भूमि पर कृषि करते हैं परन्तु कई किसान अपनी भूमि को और किसानों को ठेके पर कृषि करने के लिए दे देते हैं। हरित क्रान्ति से पहले भूमि से उत्पादन काफ़ी कम था परन्तु हरित क्रान्ति के आने के बाद नए बीजों तथा उर्वरकों के प्रयोग से उत्पादन काफ़ी बढ़ गया है। अब किसान रासायनिक उर्वरकों तथा नए बीजों का प्रयोग कर रहे हैं।

3. भूमि की मल्कियत (Ownership of Land)—प्राचीन समय में भारत में जमींदारी, रैय्यतवाड़ी तथा महलवाड़ी प्रथाएं प्रचलित थीं जिन के अनुसार किसान केवल भूमि पर कृषि करते थे। वह भूमि के मालिक नहीं थे। परन्तु स्वतन्त्रता के पश्चात् इन प्रथाओं को खत्म कर दिया गया। अब किसान स्वयं ही मालिक तथा स्वयं ही काश्तकार हैं। बड़े किसान बहुत ही कम जनसंख्या में हैं जिनके पास बहुत अधिक भूमि है। सीमान्त अथवा छोटे किसानों की संख्या बहुत अधिक है जिनके पास भूमि के छोटे-छोटे टुकड़े हैं। जनसंख्या के बढ़ने के कारण किसानों की भूमि उनके बच्चों में बँटती जा रही है। कई किसानों के पास तो इतनी कम भूमि रह गई है कि उनके लिए अपने जीवन का निर्वाह करना मुश्किल हो गया है। इनके लिए सरकार ने बहुत-से कार्यक्रम चलाए हैं ताकि उनकी आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सके।

4. अधिक जनसंख्या (More Population)-ग्रामीण समाजों में बहुत ही अधिक जनसंख्या होती है। हमारे देश की लगभग 2/3 जनसंख्या गांवों में रहती है। सम्पूर्ण संसार में जनसंख्या के हिसाब से हमारा देश चीन के बाद दूसरे स्थान पर आता है। क्योंकि बहुत-से लोग ग्रामीण समाजों में रहते हैं तथा कृषि पर निर्भर करते हैं इसलिए देश की आर्थिकता भी कृषि पर निर्भर करती है। हमारे देश की लगभग आधी आय कृषि अथवा उससे सम्बन्धित पेशों पर निर्भर करती है। जनसंख्या के अधिक होने के कारण अलग-अलग क्षेत्रों में विकास हमें न के बराबर ही नज़र आता है।

5. ऋण (Indebtedness)-भारतीय ग्रामीण समाज की आर्थिकता की एक और मुख्य विशेषता किसानों के ऊपर ऋण का होना है। किसानों के ऊपर ऋण होने के बहुत-से कारण है। ग्रामीण परिवार आकार में बड़े होते हैं। उनकी आय तो चाहे कम होती है परन्तु बड़ा परिवार होने के कारण खर्चे बहुत ही अधिक होते हैं। खर्चे पूर्ण करने के लिए उनको साहूकारों से ब्याज पर पैसा लेना पड़ता है जिस कारण वह ऋणग्रस्त हो जाते हैं। आजकल कृषि करने में व्यय भी काफ़ी बढ़ गया है जैसे आधुनिक उर्वरकों तथा नए बीजों के मूल्य बढ़ गए हैं, बिजली के न होने के कारण उन्हें डीज़ल के पंपों से पानी का प्रबन्ध करना पड़ता है, वर्षा न होने के कारण कृषि का खर्चा बढ़ जाता है, फसल के अच्छे दामों पर न बिकने के कारण घाटा अथवा उत्पादन की गुणवत्ता अच्छी न होने के कारण कम मूल्य मिलना इत्यादि ऐसे कारण है जिन की वजह से किसान अपने खर्चे पूर्ण नहीं कर सकता है। इस कारण उनको बैंकों से अथवा साहूकारों से ऋण लेना पड़ता है। वह ब्याज अधिक होने के कारण ऋण वापिस नहीं कर सकते तथा धीरे-धीरे ऋण में फँस जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, पंजाब, हरियाणा इत्यादि जैसे प्रदेशों में किसानों में ऋण के कारण आत्म हत्या करने की प्रवृत्ति तथा संख्या बढ़ रही है। इस प्रकार ग्रामीण आर्थिकता में ऋण एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है।

6. ग्रामीण उद्योग (Rural Industries)—ग्रामीण आर्थिकता का एक और महत्त्वपूर्ण पहलू है ग्रामीण उद्योगों का होना। यह ग्रामीण उद्योग छोटे-छोटे होते हैं। प्राचीन समय में छोटे उद्योग तो जाति पर आधारित होते थे परन्तु आजकल के ग्रामीण उद्योग विज्ञान पर आधारित होते हैं। जनसंख्या के बढ़ने के कारण तथा गरीबों की बढ़ रही जनसंख्या को देखते हुए सरकार भी ग्रामीण समाजों में लोगों को स्वैः रोज़गार देने के लिए छोटे तथा लघु उद्योगों को प्रोत्साहित कर रही है। दरियां, खेस तथा और कपड़ों की बुनाई, सिलाई, कढ़ाई तथा और कई प्रकार के उद्योग हैं जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन गए हैं।

7. उत्पादन सम्बन्ध (Production Relations)-कृषि उत्पादन में संस्थात्मक सम्बन्धों का विशेष स्थान है। अच्छे सम्बन्ध उत्पादन को बढ़ा सकते हैं तथा खराब सम्बन्ध उत्पादन को कम कर सकते हैं। चाहे आजकल के समय में कृषि के संस्थात्मक सम्बन्धों में बहुत परिवर्तन आ गए हैं परन्तु फिर भी भारतीय ग्रामीण आर्थिकता में इन सम्बन्धों का बहुत महत्त्व है। इन सम्बन्धों में जजमानी व्यवस्था सबसे महत्त्वपूर्ण है।

जजमान का अर्थ है सेवा करने वाला अथवा यज्ञ करने वाला। समय के साथ-साथ यह शब्द उन लोगों के लिए प्रयोग किया जाने लग गया जो दूसरे लोगों से सेवाएं ग्रहण करते थे। इस सेवा ग्रहण करने तथा सेवा करने के अलगअलग जातियों में पुश्तैनी सम्बन्धों को ही जजमानी व्यवस्था कहते हैं। इस व्यवस्था के अनुसार पुजारी, दस्तकार तथा और छोटी जातियों के लोग उच्च जातियों के लोगों को अपनी सेवाएं देते हैं। जैसे कोई पण्डित किसी विशेष जाति के लिए पुरोहित अथवा पुजारी का कार्य करता है, नाई उसकी दाढ़ी बनाता तथा बाल काटता है तथा धोबी उस जाति के कपड़े धोता है। इस तरह उस जाति के सभी सदस्य उस ब्राह्मण, धोबी तथा नाई के जजमान हैं।

जजमानी व्यवस्था में सम्पूर्ण ग्रामीण आर्थिकता कृषि तथा किसान के इर्द-गिर्द घूमती हैं। किसान का ग्रामीण आर्थिकता में सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान है तथा और जातियों के सहायक पेशे किसानों के सहायक जैसे होते हैं। किसान तो भूमि को कृषि के योग्य बनाता है परन्तु दूसरी जातियां कृषि के कार्यों को पूर्ण करने के लिए अपनी सेवाएँ देती हैं। बदले में उन्हें किसान से उत्पादन में से हिस्सा मिलता है। लोहार कृषि से सम्बन्धित औजार बनाता है, चर्मकार जूते बनाता है इत्यादि। जजमानी व्यवस्था की मुख्य विशेषता यह है कि मनुष्य के जीवन की आवश्यकताएं स्थानीय स्तर पर ही पूर्ण हो जाती हैं। इस प्रकार जजमानी व्यवस्था से ग्रामीण अर्थव्यवस्था ठीक प्रकार से चलती रहती है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में किसान-आढ़ती अथवा किसान-बनिए का सम्बन्ध भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। इतिहास को देखने से हमें पता चलता है कि भारतीय किसान सदियों से आढ़तियों के कर्जे के नीचे दबा हुआ है। किसान को अलग-अलग कार्यों जैसे कि विवाह, मृत्यु इत्यादि के लिए पैसे की ज़रूरत पड़ती है तथा उसकी यह आवश्यकता आढ़ती पूर्ण करता है। यह कहा जाता है कि किसान आढ़ती के कर्जे के नीचे पैदा होता है, पलता है, बड़ा होता है तथा मरता भी कर्जे के नीचे ही है। इस प्रकार ग्रामीण आर्थिकता में यह सम्बन्ध भी बहुत महत्त्वपूर्ण है।

इसके साथ-साथ किसान तथा मजदूर का सम्बन्ध भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। पहले मज़दूर जातियां जजमानी व्यवस्था के अनुसार अपने जजमानों के लिए मजदूरी करती थीं तथा किसान उनकी मज़दूरी के लिए उत्पादन में से कुछ हिस्सा उनको देते थे। परन्तु अब जजमानी व्यवस्था के कम होते प्रभाव तथा पैसे से सम्बन्धित आर्थिकता के बढ़ने के कारण इन सम्बन्धों में बहुत परिवर्तन आया है। आजकल मज़दूर किसान के पास कार्य करने के लिए नकद पैसे लेता है। अब जजमानी व्यवस्था की जगह समझौते की भावना वाले सम्बन्ध आगे आ चुके हैं।

ग्रामीण आर्थिकता का प्रकृति से भी बहुत गहरा सम्बन्ध है। उदाहरण के लिए अगर वर्षा अच्छी हो जाती है तो उत्पादन भी काफ़ी अच्छा हो जाता है। परन्तु अगर वर्षा कम होती है तो सूखे जैसी स्थिति पैदा हो जाती है और उत्पादन भी कम होता है। यहां तक कि विज्ञान भी किसान की प्रकृति के ऊपर निर्भरता कम नहीं कर सका है। इस प्रकार ग्रामीण आर्थिकता में इन सम्बन्धों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। – इस प्रकार इन विशेषताओं को देख कर हम कह सकते हैं कि ग्रामीण समाज की आर्थिकता मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर करती है। ग्रामीण समाज में मिलने वाले सभी प्रकार के सम्बन्ध कृषि से ही सम्बन्धित होते हैं।

प्रश्न 6. ऋणग्रस्तता के परिणामों तथा इसे दूर करने के तरीके बताएं।
उत्तर-ऋणग्रस्तता के परिणाम (Results of Indebtedness)-भारत के बहुत-से गांवों में हम बढ़ती ऋणग्रस्तता के परिणामों को देख सकते हैं। ऋणग्रस्तता के कुछ परिणामों का वर्णन इस प्रकार है
1. गुलामी (Slavery)-ऋणग्रस्तता का सबसे बुरा परिणाम देखने को मिलता है भूमिहीन मज़दूरों की बढ़ती संख्या में। साहूकार अनपढ़ तथा लाचार किसानों की अज्ञानता का लाभ उठाते हैं तथा उनकी भूमि छीन लेते है। इस प्रकार एक किसान मज़दूर बन जाता हैं तथा अपनी ही भूमि दर साहूकार के पास अपना ऋण उतारने के लिए कार्य करना पड़ता हैं तथा यह स्थिति नौकर से ऊपर नहीं होती है। कई गांवों में तो यह प्रथा है कि माता-पिता साहूकारों से कर्जा लेते हैं तथा अपने बच्चे को कार्य करने के लिए साहूकारों के पास भेज देते हैं। इन बच्चों की स्थिति गुलामों के जैसे होती है। इस प्रकार इस ऋणग्रस्तता की समस्या ने हज़ारों किसानों को गुलामी का जीवन जीने के लिए मजबूर किया है।

2. निर्धनता का बढ़ना (Increase in Poverty)-ऋणग्रस्तता का सबसे बुरा परिणाम लोगों की निर्धनता के बढ़ने में देखने को मिलता है। अगर एक व्यक्ति एक बार ऋण के चक्र में फंस गया तो वह जितने मर्जी प्रयास कर ले, ऋण के चक्र में से निकल नहीं सकता तथा वह हमेशा निर्धन ही रहेगा। उसके लिए ऋण उतारना बहुत ही मुश्किल होता है। कई परिवारों में तो दादा का ऋण उसका पौत्र उतारता है।

3. कृषि का नुकसान (Deterioration of Agriculture)-ऋणग्रस्तता के परिणामस्वरूप कृषि की स्थिति भी दयनीय होती है क्योंकि किसान को साहूकार की भूमि पर नौकर बन कर कार्य करना पड़ता है। इस कारण किसान कृषि की तरफ अधिक ध्यान नहीं देते जोकि वह अपनी भूमि पर कार्य करते हुए देते हैं। इससे उत्पादन भी कम होता है तथा भूमि की उत्पादन शक्ति भी कम होती है।

4. आत्महत्याएं (Suicides) अगर एक किसान ऋण के नीचे आ जाता है तो वह दिन-प्रतिदिन कमज़ोर होता जाता है क्योंकि उसे हमेशा ऋण वापिस करने की चिन्ता लगी रहती है। कई लोग तो ऋण उतारने के लिए ज़रूरत से अधिक परिश्रम करते हैं। परन्तु जब उन्हें मनचाहा परिणाम नहीं मिलता तो उनकी मानसिक स्थिति बिगड़ जाती है। इस प्रकार ऋणग्रस्तता से व्यक्ति आत्महत्या भी कर लेते हैं।

ऋणग्रस्तता दूर करने के उपाय (Ways to Remove Indebtedness)-

ऋणग्रस्तता की समस्या को दूर करने के लिए कई प्रकार के सुझाव आगे आए हैं जिन का वर्णन इस प्रकार है:

  • कम ब्याज पर सरकारी ऋण (Governmental loans at Low Interest)-सरकार को कम ब्याज पर सरकारी कर्जे उपलब्ध करवाने चाहिएं ताकि किसान ऊँचे ब्याज वाले साहूकारों के ऋण वापिस कर सकें। सरकारी ऋण को वापिस करने के लिए भी छोटी-छोटी किश्तें बाँध देनी चाहिए ताकि किसान आसानी से सरकारी ऋण उतार सकें।
  • सहकारी संस्थाएं तथा बैंक (Co-operative Societies and Banks)-गांव के स्तर पर ही सरकारी ऋण उपलब्ध करवाने के लिए गांव में ही सहकारी संस्थाएं तथा सहकारी बैंक खुलवाने चाहिएं। इससे किसानों को कम ब्याज पर आसानी से गांव में ही ऋण प्राप्त हो सकता है।
  • दिवालिया घोषित करने का प्रबन्ध (Arrangement for declaration of Bankruptcy)-कई बार किसानों पर ऋण, ऋण का ब्याज तथा ऋण पर ब्याज इतना अधिक हो जाता है कि उसके लिए अपना ऋण लगभग असम्भव हो जाता है। इसलिए उनको दिवालिया घोषित करने का भी प्रबन्ध किया जाना चाहिए ताकि किसान से उसकी भूमि न छीनी जा सके तथा वह कम-से-कम अपनी रोजी-रोटी कमा सके।
  • भूमि का कब्जा लेने से रोकने के लिए कानून (Law for preventing possession of Land)-सरकार को ऐसे कानून बनाने चाहिएं कि अगर कोई साहूकार किसी किसान की भूमि पर ऋण के कारण कब्जा करने की कोशिश करता है तो उसको कानून की मदद से रोका जा सके।
  • ब्याज की दर पर नियन्त्रण (Control over Rate of Interest) साहूकार किसानों से बहुत अधिक ब्याज लेते हैं। कई स्थितियों में तो यह 5-10% प्रति माह भी हो जाता है। सरकार को गांवों में अधिक-से-अधिक लेने वाली ब्याज दर को निश्चित करना चाहिए। जो साहूकार अधिक ब्याज लेते हैं उनसे सख्ती से पेश आना चाहिए।
  • साहकारों की किताबें चैक करना (Checking of accounts of the Money-lenders) सरकार को साहूकारों को अपने खाते तथा किताबें सही प्रकार से बना कर रखने के लिए कानून बनाने चाहिएं तथा समय-समय पर उनके खातों तथा किताबों को चैक करना चाहिए। अगर किसी भी साहूकार के खाते में हेर-फेर हो तो उसके विरुद्ध सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।
    इस प्रकार इन ढंगों की सहायता से वह काफ़ी हद तक ऋणग्रस्तता की समस्या को नियन्त्रण में रख सकते हैं।

प्रश्न 7. पंचायती राज्य की धारणा के बारे में आप क्या जानते हैं ? विस्तार से लिखें।
उत्तर-हमारे देश में स्थानीय क्षेत्रों के विकास के लिए दो प्रकार की पद्धतियां हैं। शहरी क्षेत्रों का विकास करने के लिए स्थानीय सरकारें होती हैं तथा ग्रामीण क्षेत्रों का विकास करने के लिए पंचायती राज्य की संस्थाएं होती हैं। स्थानीय सरकार की संस्थाएं श्रम विभाजन के सिद्धान्त पर आधारित होती हैं क्योंकि इनमें सरकार तथा स्थानीय समूहों में कार्यों को बांटा जाता है। हमारे देश की 70% जनता ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। ग्रामीण क्षेत्रों को जिस स्थानीय सरकार की संस्था द्वारा शासित किया जाता है उसे पंचायत कहते हैं। पंचायती राज्य सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों के संस्थागत ढांचे को ही दर्शाता है।

जब भारत में अंग्रेजी राज्य स्थापित हुआ था तो सारे देश में सामन्तशाही का बोलबाला था। 1935 में भारत सरकार ने एक कानून पास किया जिसने प्रान्तों को पूर्ण स्वायत्तता दी तथा पंचायती कानूनों को एक नया रूप दिया गया। पंजाब में 1939 में पंचायती एक्ट पास हुआ जिसका उद्देश्य पंचायतों को लोकतान्त्रिक आधार पर चुनी हुई संस्थाएं बना कर ऐसी शक्तियां प्रदान करना था जो उनके स्वः शासन की इकाई के रूप में निभायी जाने वाली भूमिका के लिए ज़रूरी थीं। 2 अक्तूबर, 1961 ई० को पंचायती राज्य का तीन स्तरीय ढांचा औपचारिक रूप से लागू किया गया। 1992 में 73वां संवैधानिक संशोधन हुआ जिनमें शक्तियों का स्थानीय स्तर तक विकेन्द्रीकरण कर दिया गया। इससे पंचायती राज्य को बहुत-सी वित्तीय तथा अन्य शक्तियां दी गईं।

भारत के ग्रामीण समुदाय में पिछले 50 सालों में बहुत-से परिवर्तन आए हैं। अंग्रेजों ने भारतीय पंचायतों से सभी प्रकार के अधिकार छीन लिए थे। वह अपनी मर्जी के अनुसार गांवों को चलाना चाहते थे जिस कारण उन्होंने गांवों में एक नई तथा समान कानून व्यवस्था लागू की। आजकल की पंचायतें तो आजादी के बाद ही कानून के तहत सामने आयी हैं।

ए० एस० अलटेकर (A.S. Altekar) के अनुसार, “प्राचीन भारत में सुरक्षा, लगान इकट्ठा करना, कर लगाने तथा लोक कल्याण के कार्यक्रमों को लागू करना इत्यादि जैसे अलग-अलग कार्यों की ज़िम्मेदारी गांव की पंचायत की होती थी। इसलिए ग्रामीण पंचायतें विकेन्द्रीकरण, प्रशासन तथा शक्ति की बहुत ही महत्त्वपूर्ण संस्थाएं हैं।”

के० एम० पानीकर (K.M. Pannikar) के अनुसार, “ये पंचायतें प्राचीन भारत के इतिहास का पक्का आधार हैं। इन संस्थाओं ने देश की खुशहाली को मज़बूत आधार प्रदान किया है।”

संविधान के Article 30 के चौथे हिस्से में कहा गया है कि, “गांव की पंचायतों का संगठन-राज्य को गांव की पंचायतों के संगठन को सत्ता तथा शक्ति प्रदान की जानी चाहिए ताकि ये स्वः सरकार की इकाई के रूप में कार्य कर सकें।”
गांवों की पंचायतें गांव के विकास के लिए बहुत-से कार्य करती हैं जिस लिए पंचायतों के कुछ मुख्य उद्देश्य रखे गए हैं जिनका वर्णन इस प्रकार है-

पंचायतों के उद्देश्य (Aims of Panchayats) :

  • पंचायतों को स्थापित करने का सबसे पहला उद्देश्य है लोगों की समस्याओं को स्थानीय स्तर पर ही हल करना। ये पंचायतें लोगों के बीच के झगड़ों तथा समस्याओं को हल करती हैं।
  • गांव की पंचायतें लोगों के बीच सहयोग, हमदर्दी, प्यार की भावनाएं पैदा करती हैं ताकि सभी लोग गांव की प्रगति में योगदान दे सकें।
  • पंचायतों को गठित करने का एक और उद्देश्य है लोगों को तथा पंचायत के सदस्यों को पंचायत का प्रशासन ठीक प्रकार से चलाने के लिए शिक्षित करना ताकि सभी लोग मिल कर गांव की समस्याओं के हल निकाल सकें। इस तरह लोक कल्याण का कार्य भी पूर्ण हो जाता है।

गांवों की पंचायतों का संगठन (Organisation of Village Panchayats)-गांवों में दो प्रकार की पंचायतें होती हैं। पहली प्रकार की पंचायतें वे होती हैं जो सरकार द्वारा बनाए कानूनों अनुसार चुनी जाती हैं तथा ये औपचारिक होती हैं। दूसरी पंचायतें वे होती हैं जो अनौपचारिक होती हैं तथा इन्हें जाति पंचायतें भी कहा जाता है। इनकी कोई कानूनी स्थिति नहीं होती है परन्तु यह सामाजिक नियन्त्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

पंचायतों में तीन तरह का संगठन पाया जाता है-

  1. ग्राम सभा (Gram Sabha)
  2. ग्राम पंचायत (Gram Panchayat)
  3. न्याय पंचायत (Nyaya Panchayat)।

1. ग्राम सभा (Gram Sabha)–गांव की सम्पूर्ण जनसंख्या में से बालिग व्यक्ति इस ग्राम सभा का सदस्य होता है तथा यह गांव की सम्पूर्ण जनसंख्या की एक सम्पूर्ण इकाई है। यह वह मूल इकाई है जिसके ऊपर हमारे लोकतन्त्र का ढांचा टिका हुआ है। जिस ग्राम की जनसंख्या 250 से अधिक होती है वहां ग्राम सभा बन सकती है। अगर एक गांव की जनसंख्या कम है तो दो गांव मिलकर ग्राम सभा का निर्माण करते हैं। ग्राम सभा में गांव का प्रत्येक वह बालिग़ सदस्य होता है जिस को वोट देने का अधिकार होता है। प्रत्येक ग्राम सभा का एक प्रधान तथा कुछ सदस्य होते हैं। यह पांच वर्षों के लिए चुने जाते हैं।

ग्राम सभा के कार्य (Functions of Gram Sabha)—पंचायत के सालाना बजट तथा विकास के लिए किए जाने वाले कार्यक्षेत्रों को ग्राम सभा पेश करती है तथा उन्हें लागू करने में मदद करती है। यह समाज कल्याण के कार्य, प्रौढ़ शिक्षा के कार्यक्रम तथा परिवार कल्याण के कार्यों को करने में मदद करती है। यह गांवों में एकता रखने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

2. ग्राम पंचायत (Gram Panchayat) हर एक ग्राम सभा अपने क्षेत्र में से एक ग्राम पंचायत को चुनती है। इस तरह ग्राम सभा एक कार्यकारिणी संस्था है जो ग्राम पंचायत के लिए सदस्य चुनती है। इनमें 1 सरपंच तथा 5 से लेकर 13 पंच होते हैं। पंचों की संख्या गांव की जनसंख्या के ऊपर निर्भर करती है। पंचायत में पिछड़ी श्रेणियों तथा औरतों के लिए स्थान आरक्षित होते हैं। यह 5 वर्ष के लिए चुनी जाती है। परन्तु अगर पंचायत अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करे तो राज्य सरकार उसे 5 वर्ष से पहले भी भंग कर सकती है। अगर किसी ग्राम पंचायत को भंग कर दिया जाता है तो उसके सभी पद भी अपने आप ही समाप्त हो जाते हैं। ग्राम पंचायत के चुनाव तथा पंचों को चुनने के लिए गांव को अलग-अलग हिस्सों में बांट लिया जाता है। फिर ग्राम सभा के सदस्य पंचों तथा सरपंच का चुनाव करते हैं। ग्राम पंचायत में स्त्रियों के लिए आरक्षित सीटें कुल सीटों का एक तिहाई (1/3) होती हैं तथा पिछड़ी जाति के लिए आरक्षित सीटें गांव या उस क्षेत्र में उनकी जनसंख्या के अनुपात के अनुसार होती हैं। ग्राम पंचायत में सरकारी नौकर तथा मानसिक तौर पर बीमार व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकते । ग्राम पंचायतें गांव में सफ़ाई, मनोरंजन, उद्योग, संचार तथा यातायात के साधनों का विकास करती हैं तथा गांव की समस्याओं का समाधान करती हैं।

पंचायतों के कार्य (Functions of Panchayats)-ग्राम पंचायत गांव के लिए बहुत-से कार्य करती है जिनका वर्णन इस प्रकार है

  • ग्राम पंचायत का सबसे पहला कार्य गांव के लोगों के सामाजिक तथा आर्थिक जीवन के स्तर को ऊँचा उठाना होता है। गांव में बहुत-सी सामाजिक बुराइयां भी पायी जाती हैं। पंचायत लोगों को इन बुराइयों को दूर करने के लिए प्रेरित करती है तथा उनके परम्परागत दृष्टिकोण को बदलने का प्रयास करती हैं।
  • किसी भी क्षेत्र के सर्वपक्षीय विकास के लिए यह आवश्यक है कि उस क्षेत्र से अनपढ़ता ख़त्म हो जाए तथा भारतीय समाज के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण भी यही है। भारतीय गांव भी इसी कारण पिछड़े हुए हैं। गांव की पंचायत गांव में स्कूल खुलवाने तथा लोगों को अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करती है। बालिगों को पढ़ाने के लिए प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र खुलवाने का भी प्रबन्ध करती है।
  • गांव की पंचायत गांव की स्त्रियों तथा बच्चों की भलाई के लिए भी कार्य करती है। वह औरतों को शिक्षा दिलाने का प्रबन्ध करती है। बच्चों को अच्छी खुराक तथा उनके मनोरंजन के कार्य का प्रबन्ध भी पंचायत ही करती है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में मनोरंजन के साधन नहीं होते हैं। इसलिए पंचायतें ग्रामीण समाजों में मनोरंजन के साधन उपलब्ध करवाने का प्रबन्ध भी करती है। पंचायतें गांव में फिल्मों का प्रबन्ध, मेले लगवाने तथा लाइब्रेरी इत्यादि खुलवाने का प्रबन्ध करती हैं।
  • कृषि प्रधान देश में उन्नति के लिए कृषि के उत्पादन में बढ़ोत्तरी होनी ज़रूरी होती है। पंचायतें लोगों को नई तकनीकों के बारे में बताती है, उनके लिए नए बीजों, उन्नत उर्वरकों का भी प्रबन्ध करती है ताकि उनके कृषि उत्पादन में भी बढ़ौतरी हो सके।
  • गांवों के सर्वपक्षीय विकास के लिए गांवों में छोटे-छोटे उद्योग लगवाना भी जरूरी होता है। इसलिए पंचायतें गांव में सरकारी मदद से छोटे-छोटे उद्योग लगवाने का प्रबन्ध करती हैं। इससे गांव की आर्थिक उन्नति भी होती है तथा लोगों को रोज़गार भी प्राप्त होता है।
  • कृषि के अच्छे उत्पादन में सिंचाई के साधनों का अहम रोल होता है। ग्राम पंचायत गांव में कुएँ, ट्यूबवैल इत्यादि लगवाने का प्रबन्ध करती है तथा नहरों के पानी की भी व्यवस्था करती है ताकि लोग आसानी से अपने खेतों की सिंचाई कर सकें।
  • गांव में लोगों में आमतौर पर झगड़े होते रहते हैं। पंचायतें उन झगड़ों को ख़त्म करके उनकी समस्याओं को हल करने का प्रयास करती हैं।

इन कार्यों के अलावा पंचायत और बहुत-से कार्य करती है जैसे कि

  1. डेयरी, पशुपालन तथा मुर्गीखाने से सम्बन्धित कार्य।
  2. छोटे उद्योगों की स्थापना।
  3. घरेलू दस्तकारी।
  4. सड़कों तथा यातायात के साधनों का प्रबन्ध।
  5. अनौपचारिक तथा औपचारिक शिक्षा का प्रबन्ध ।
  6. सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रबन्ध इत्यादि।

भारत में 21 अप्रैल, 1994 को पंचायती राज्य अधिनियम लागू किया गया। इस एक्ट से तीन स्तरीय पंचायती राज्य लागू हुआ। इन से ग्रामीण समुदाय में बहुत-से परिवर्तन आए। पंचायती राज्य से गांवों की आर्थिकता का काफ़ी सुधार हुआ। पंचायतें गांव की भलाई के प्रत्येक प्रकार के कार्य करती हैं।

3. न्याय पंचायत (Nayaya Panchayat)-गांव के लोगों में झगड़े होते रहते हैं। न्याय पंचायत लोगों के बीच होने वाले झगड़ों का निपटारा करती है। 5-10 ग्राम सभाओं के लिए एक न्याय पंचायत बनायी जाती है। इसके सदस्य चुने जाते हैं तथा सरपंच 5 सदस्यों की एक कमेटी बनाता है। इन को पंचायतों से प्रश्न पूछने का भी अधिकार होता है।

पंचायत समिति (Panchayat Samiti)-एक ब्लॉक में आने वाली पंचायतें पंचायत समिति की सदस्य होती हैं तथा इन पंचायतों के सरपंच इसके सदस्य होते हैं। पंचायत समिति के सदस्यों का सीधा-चुनाव होता है। पंचायत समिति अपने क्षेत्र में आने वाली पंचायतों के कार्यों का ध्यान रखती है, गांवों के विकास कार्यों को चैक करती है तथा पंचायतों को गांव के कल्याण के लिए निर्देश भी देती है। यह पंचायती राज्य के दूसरे स्तर पर है।

जिला परिषद् (Zila Parishad)—पंचायती राज्य का सबसे ऊँचा स्तर है जिला परिषद् जोकि जिले में आने वाली पंचायतों के कार्यों का ध्यान रखती है। यह भी एक कार्यकारी संस्था होती है। पंचायत समितियों के चेयरमैन, चुने हुए सदस्य, लोक सभा, राज्य सभा, विधान सभा के सदस्य सभी जिला परिषद् के सदस्य होते हैं। यह सभी जिले में पड़ते गांवों के विकास कार्यों का ध्यान रखते हैं। जिला परिषद् कृषि में सुधार, ग्रामीण बिजलीकरण, भूमि सुधार, सिंचाई बीजों तथा उर्वरकों को उपलब्ध करवाना, शिक्षा, उद्योग लगवाने इत्यादि जैसे कार्य करती है।

प्रश्न 8. 73वें संवैधानिक संशोधन में पंचायती राज्य सम्बन्धी विशेषताओं का वर्णन करो।
उत्तर-दिसम्बर, 1992 में 73वां संवैधानिक संशोधन संसद् में पास हुआ तथा अप्रैल, 1993 में राष्ट्रपति ने इस संशोधन को मान्यता दे दी। इस संवैधानिक संशोधन द्वारा जो पंचायती राज्य प्रणाली स्थापित की गयी, उसकी विशेषताएं निम्नलिखित हैं

  • 73वीं संवैधानिक संशोधन से पहले स्थानीय स्तर पर स्वः-शासन के सम्बन्ध में संविधान में कोई व्यवस्था नहीं थी। इस संशोधन से संविधान में नयी अनुसूची तथा नया भाग जोड़ा गया। इस अनुसूची तथा भाग में सम्पूर्ण व्यवस्थाएं पंचायती राज्य प्रणाली से सम्बन्धित हैं कि नयी व्यवस्था में किस तरह की व्यवस्थाएं हैं।
  • इस संशोधन से संविधान में ग्राम सभा की परिभाषा दी गई है जिसके अनुसार पंचायत के क्षेत्र में आने वाले गांव या गांव के जिन लोगों का नाम वोटर सूची में दर्ज है, वह सभी लोग ग्राम सभा के सदस्य होंगे। राज्य विधानमण्डल कानून द्वारा ग्राम सभा की व्यवस्था कर सकता है तथा उसको कुछ कार्य सौंप सकता है। इस तरह ग्राम सभा की स्थापना राज्य विधानमण्डल की तरफ से पास किए गए कानून के द्वारा होगी तथा वह ही उसके कार्य भी निश्चित करेगा।
  • ग्राम सभा की परिभाषा के साथ ही पंचायत की परिभाषा दी गयी है तथा कहा गया कि पंचायत स्व:-शासन पर आधारित ऐसी संस्था है जिस की स्थापना ग्रामीण क्षेत्र में राज्य सरकार द्वारा की जाती है।
  • इस संवैधानिक संशोधन द्वारा संविधान में यह व्यवस्था की गई है कि अब ग्रामीण क्षेत्र में स्व:-शासन की तीन स्तरीय पंचायती राज्य प्रणाली की स्थापना की जाएगी। सबसे निम्न स्तर गांव पर पंचायत, बीच के स्तर ब्लॉक पर ब्लॉक समिति तथा जिला स्तर पर जिला परिषद् होगी परन्तु राज्य सरकार इन को कोई और नाम भी दे सकती है।
  • इस संवैधानिक संशोधन में यह कहा गया है कि नयी प्रणाली के अन्तर्गत सम्पूर्ण जिले को पंचायती स्तर पर चुनाव क्षेत्रों में बाँटा जाएगा तथा पंचायतों, ब्लॉक समिति तथा जिला परिषद् के सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से होगा अर्थात् वह प्रत्यक्षं तौर पर लोगों द्वारा बालिग वोट अधिकार के आधार पर चुने जाएंगे।
  • इस संशोधन के अनुसार पंचायत के अलग-अलग स्तरों पर चुनाव के लिए, वोटरों की संख्या तथा सूची तैयार करवाने की ज़िम्मेदारी राज्य चुनाव आयोग की होगी। इस आयोग में राज्य चुनाव कमिश्नर को राज्य का राज्यपाल नियुक्त करेगा। उसका कार्यकाल, सेवा की शर्ते इत्यादि भी राज्य विधान मण्डल की तरफ से बनाए गए नियमों के अनुसार निश्चित किए जाएंगे। राज्य चुनाव कमिश्नर को उस तरीके से हटाया जा सकता है जैसे उच्च न्यायालय के जज को हटाया जा सकता है।
  • गाँव की पंचायत के प्रधान के बारे में 73वीं शोध में यह व्यवस्था की गई है कि गाँव की पंचायत के प्रधान का चुनाव सीधे तौर पर लोगों द्वारा किया जाएगा।
  • गाँव की पंचायत के प्रधान का चुनाव करने के साथ-साथ यह भी व्यवस्था की गई है कि पंचायत के प्रधान को उसके कार्यकाल खत्म होने से पहले भी हटाया जा सकता है और उसको हटाने का अधिकार ग्राम सभा को दिया गया है।
  • ग्राम सभा सरपंच को तब ही उसके पद से हटा सकती है यदि उस क्षेत्र की पंचायत इस बात की सिफारिश करे। इस प्रकार की सिफ़ारिश के लिए यह ज़रूरी है कि उस सिफ़ारिश के पीछे पंचायत के सभी सदस्यों का बहुमत
    और मौजूदगी अनिवार्य है। इसके लिए एक विशेष बैठक बुलाई जाएगी और इस बैठक में ग्राम सभा के 50% सदस्य होने ज़रूरी हैं। यदि इस बैठक में ग्राम सभा उस सिफ़ारिश को मौजूद सदस्यों के बहुमत के साथ पास कर दे तो सरपंच या प्रधान को हटाया जा सकता है।
  • इसी तरह पंचायती समिति या ब्लॉक समिति और जिला परिषद् के सदस्य भी लोगों द्वारा चुने जाएंगे और इनके प्रधान इनके सदस्यों द्वारा और उनके बीच में से ही चुने जाएंगे। पंचायत की तरह इनके प्रधानों को भी हटाया जा सकता है। प्रधान को दो-तिहाई बहुमत से हटाया जा सकता है।

इन तीनों स्तरों पर स्थान भी आरक्षित रखे गए हैं।

  • निम्न जातियों एवं कबीलों में प्रत्येक पंचायत में स्थान आरक्षित रखे गए हैं। आरक्षित करने की गिनती उनके उस क्षेत्र की उपज के अनुपात में होगी।
  • इन आरक्षित स्थानों में एक-तिहाई सीटें औरतों के लिए आरक्षित रखी जाएंगी।
  • पंचायतों, ब्लॉक समितियों और जिला परिषदों में भी स्त्रियों के लिए एक-तिहाई स्थान आरक्षित रखे जाएंगे। इसके साथ-साथ इन संस्थाओं के प्रधानों के लिए भी स्थान औरतों के लिए आरक्षित रखे जाएंगे।

(11) इस शोध के अनुसार इन सभी संस्थाओं का कार्यकाल 5 सालों के लिए निश्चित कर दिया गया। किसी भी संस्था का कार्यकाल 5 साल से ज्यादा नहीं हो सकता। यदि राज्य सरकार को किसी पंचायत के अव्यवस्थित प्रबंधन के बारे में पता चले तो वह उसको 5 साल से पहले ही भंग कर सकती है परन्तु 6 महीने के अंदर उसका दोबारा चुनाव किया जाना जरूरी है। यदि कोई पंचायत 5 साल से पहले भंग हो तो नई चुनी गई पंचायत बाकी रहता कार्यकाल पूरा
करेगी।

(12) यदि कोई व्यक्ति राज्य के कानून अधीन राज्य विधान सभा का चुनाव नहीं लड़ सकता तो वह पंचायत का चुनाव भी नहीं लड़ सकता परन्तु यहां उम्र में फ़र्क है। राज्य विधान सभा का चुनाव लड़ने हेतु 25 साल की उम्र होना आवश्यक है परन्तु पंचायत के चुनाव के लिए 21 वर्ष की आयु निश्चित की गई है।

(13) राज्य विधान मण्डल के कानून के अधीन पंचायत को कुछ अधिकार एवं ज़िम्मेदारियाँ दी जाएंगी। पंचायत को आर्थिक विकास एवं सामाजिक न्याय हेतु योजनाएं तैयार करने और लागू करने के अधिकार दिए गए हैं।

(14) इसके साथ-साथ राज्य विधान मण्डल कानून पास करके पंचायत को कुछ छोटे-छोटे टैक्स लगाने की शक्ति भी दे सकता है ताकि वह अपनी आमदनी में भी वृद्धि कर सकें। इसके साथ राज्य सरकार अपने द्वारा लगाए टैक्सों अथवा शुल्कों में से कुछ हिस्सा पंचायतों को भी देगी और साथ ही उनको गांवों के विकास के लिए सहायता के रूप में ग्रांट देने की व्यवस्था भी करेगी। – इस प्रकार हम देख सकते हैं कि 73वीं संवैधानिक शोध द्वारा पंचायती राज के लिए कई महत्त्वपूर्ण व्यवस्थाएं की गई हैं जिसके साथ पंचायती राज्य की महत्ता काफ़ी बढ़ गई है। नई व्यवस्था को प्रभावशाली बनाने हेतु कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं और अब पंचायती राज्य प्रणाली काफ़ी प्रभावशाली बन गई है।

ग्रामीण समाज Notes

  • भारत एक कृषि प्रधान देश है जिसकी लगभग 70% (68.84%) जनसंख्या गाँवों में रहती है। गाँव में रहने वाले
    लोग साधारण जीवन व्यतीत करते हैं, एक-दूसरे से काफ़ी कुछ साझा करते हैं तथा उनमें काफ़ी समानताएँ होती हैं। महात्मा गांधी ने भी कहा था कि, “वास्तविक भारत तो गांवों में रहता है।”
  • ग्रामीण समाज की कई विशेषताएँ होती हैं, जैसे कि छोटा आकार, सामाजिक समानता, एक-दूसरे से नज़दीक
    के रिश्ते, संयुक्त परिवार प्रथा, कम सामाजिक गतिशीलता, कृषि मुख्य पेशा, धर्म का अधिक प्रभाव इत्यादि।
  • ग्रामीण समाजों में संयुक्त परिवार की प्रधानता होती है जिसमें कम-से-कम तीन पीढ़ियों के लोग इकट्ठे मिल कर रहते हैं। ये परिवार आकार में बड़े होते हैं तथा एक ही छत के नीचे रहते हैं।
  • 1992 में 73वां संवैधानिक संशोधन हुआ तथा देश में तीन स्तरीय पंचायती राज्य व्यवस्था लागू की गई। यह तीन स्तर हैं – गाँव के स्तर पर पंचायत, ब्लॉक के स्तर पर ब्लॉक समिति तथा जिले के स्तर पर जिला परिषद् । इनका प्रमुख कार्य ग्रामीण क्षेत्रों का बहुपक्षीय विकास करना है।
  • 1960 के दशक में देश में हरित क्रान्ति लाई गई ताकि किसानों को अपने खेतों से उत्पादन बढ़ाने में सहायता मिल सके। इस क्रान्ति में काफ़ी सकारात्मक परिणाम सामने आए जैसे कि इसका लाभ केवल अमीर किसानों को हुआ, अमीर तथा गरीब किसानों में अन्तर बढ़ गया इत्यादि।
  • गांवों के किसान आजकल एक बहुत ही गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं तथा वह है ऋणग्रस्तता की समस्या। बहुत से किसान ऋणग्रस्तता के कारण आत्महत्या कर रहे हैं। ऋणग्रस्तता के कई कारण हैं, जैसे कि निर्धनता, पिता की ऋणग्रस्तता, मुकद्दमे, कृषि का पिछड़ापन, आवश्यकता से अधिक खर्चा, ऋण पर अधिक ब्याज इत्यादि।
  • आजकल ग्रामीण समाज परिवर्तन के दौर से निकल रहा है। अब पुराने रिश्ते-नाते खत्म हो रहे हैं, जाति पंचायतों
    का नियन्त्रण खत्म हो रहा है, अपराध बढ़ रहे हैं, जजमानी व्यवस्था तो खत्म ही हो गई है, शिक्षा बढ़ने के कारण लोग नगरों की तरफ बढ़ रहे हैं इत्यादि।
  • ग्रामीण समाज (Rural Society) वह समाज जो ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है तथा जिसकी कुछ विशेषताएं होती हैं जैसे कि छोटा आकार, जनसंख्या का कम घनत्व, कृषि-मुख्य पेशा, जनसंख्या में समानता, जाति आधारित स्तरीकरण, संयुक्त परिवार इत्यादि।
  • अन्तर्विवाह (Endogamy) विवाह का वह प्रकार जिसमें व्यक्ति को अपने समूह में ही विवाह करवाना पड़ता है जैसे कि जाति या उपजाति। समूह से बाहर विवाह करवाने की आज्ञा नहीं होती है।
  • बहिर्विवाह (Exogamy) विवाह का वह प्रकार जिसमें व्यक्ति को एक विशेष समूह से बाहर ही विवाह करवाना पड़ता है; जैसे कि परिवार, गोत्र, रिश्तेदारी इत्यादि। व्यक्ति अपने समूह में विवाह नहीं करवा सकता।
  • हरित क्रान्ति (Green Revolution)-अधिक उत्पादन वाले बीजों की सहायता से कृषि के उत्पादन में जो बढ़ौतरी हुई है उसे हरित् क्रान्ति कहते हैं।
  • ऋणग्रस्तता (Indebtedness) कृषि अथवा अन्य किसी कारण की वजह से किसी व्यक्ति से पैसे उधार लेने ‘ को ऋणग्रस्तता कहते हैं। किसान कृषि के अतिरिक्त अन्य कार्यों के लिए भी ऋण लेते हैं, जैसे कि जन्म, विवाह तथा मृत्यु पर होने वाले खर्चे के कारण, मुकद्दमा लड़ने के लिए। इस ऋणों के कारण ही उत्पादन में बढ़ौतरी नहीं होती जिस कारण ग्रामीण लोग इस समस्या में फंस जाते हैं।
  • संयुक्त परिवार (Joint Family)—वह परिवार जिसमें कम-से-कम तीन पीढ़ियों के लोग रहते हैं, जैसे कि दादा-दादी, माता-पिता व उनके बच्चे। वह एक ही छत के नीचे रहते हैं, एक ही रसोई में खाना खाते हैं तथा एक ही प्रकार के आर्थिक कार्य करते हैं।
    पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (TEXTUAL QUESTIONS)