Class 11 History Solutions Chapter 14 दक्षिण में नई शक्तियों का उदय

अध्याय का विस्तृत अध्ययन

(विषय सामग्री की पूर्ण जानकारी के लिए)

प्रश्न 1. शिवाजी के उत्थान व शासन-प्रबन्ध के सन्दर्भ में 1713 ई० तक के मराठों के इतिहास की प्रमुख राजनीतिक घटनाओं की चर्चा करें ।
उत्तर-मराठे दक्षिण में महाराष्ट्र के रहने वाले थे । वे सर्वप्रथम शिवाजी के अधीन एक शक्ति के रूप में उभरे । शिवाजी को शक्तिशाली बनाने में अनेक बातों ने योगदान दिया । सर्वप्रथम इस दिशा में उनकी मां ने भूमिका निभाई । उन्होंने शिवाजी को महापुरुषों की कहानियां सुना-सुना कर उनमें देशभक्ति की भावना भरी । समरथ गुरु रामदास ने उनका चरित्र-निर्माण किया । दादा कोण्ड देव ने उन्हें तीर, तलवार तथा घुड़सवारी की शिक्षा दी । महाराष्ट्र की पहाड़ियों ने उन्हें परिश्रमी तथा वीर बनाया । दक्षिण की मुस्लिम रियासतों ने मराठों को सैनिक शिक्षा दी और ये प्रशिक्षित सैनिक शिवाजी की शक्ति का आधार बने । वैसे भी सन्त एकनाथ तथा तुकाराम के उपदेशों ने महाराष्ट्र में एकता का संचार किया और इस एकता ने शिवाजी को बल प्रदान किया । परिस्थितियों ने तो शिवाजी को शक्ति प्रदान की ही थी, साथ ही उनके अपने कार्यों ने भी उन्हें शक्तिशाली बनाया । उन्होंने मुट्ठी भर सैनिक लेकर 19 वर्ष की आयु में तोरण का किला जीता । इसके बाद उन्होंने सिंहगढ़, पुरन्धर तथा अन्य दुर्गों पर विजय पाई । इन विजयों से उन्हें धन भी प्राप्त हुआ और यश भी । धन का प्रयोग उन्होंने अपनी सैनिक शक्ति को बढ़ाने के लिए किया । संक्षेप में, शिवाजी के उत्थान, शासन-प्रबन्ध तथा 1713 ई० तक मराठा इतिहास की प्रमुख घटनाओं का वर्णन इस प्रकार है :-

शिवाजी का उत्थान (विजयें)-

शिवाजी एक महान् मराठा सरदार थे । सबसे पहले उन्होंने बिखरी हुई मराठा शक्ति को संगठित करके एक विशाल सेना तैयार की। उन्होंने 1646 ई० में अपना विजय अभियान आरम्भ कर दिया । शिवाजी की पहली विजय तोरण दुर्ग पर थी । इसके बाद उन्होंने चाकन, सिंहगढ़, पुरन्धर तथा कोन्द्रन के दुर्गों पर अपना अधिकार जमा लिया । उन्होंने जावली के सरदार
चन्द्र राव को मरवा कर जावली को भी अपने अधिकार में ले लिया । शिवाजी की बढ़ती हुई शक्ति को देखकर बीजापुर का सुल्तान चिन्ता में पड़ गया । उसने शिवाजी के विरुद्ध अपने सेनापति अफ़जल खां को भेजा । अफ़जल खां ने धोखे से शिवाजी को मारने का प्रयत्न किया परन्तु इस प्रयास में वह स्वयं मारा गया । अब शिवाजी ने मुग़ल प्रदेशों में लूटमार आरम्भ कर दी जिससे मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब को चिन्ता हुई । अतः 1660 ई० में उसने दक्षिण के सूबेदार शाइस्ता खां को शिवाजी के विरुद्ध भेजा । वह बढ़ता हुआ पूना तक जा पहुंचा, परन्तु शिवाजी ने उसे यहां से भागने पर विवश कर दिया ।

अब शिवाजी ने सूरत के समृद्ध नगर पर आक्रमण कर दिया और वहां खूब लूटमार की । इससे औरंगज़ेब की चिन्ता और भी बढ़ गई । उसने राजा जयसिंह तथा दिलेर खां को शिवाजी के विरुद्ध भेजा । उनके नेतृत्व में मुग़ल सेनाओं ने मराठों के अनेक किले जीत लिए । विवश होकर शिवाजी ने मुग़लों के साथ सन्धि कर ली । सन्धि के बाद शिवाजी आगरा में मुग़ल दरबार में पहुंचे । वहां उन्हें बन्दी बना लिया गया । परन्तु शिवाजी बड़ी चालाकी से मुग़लों की कैद से भाग निकले । 1676 ई० में उन्होंने रायगढ़ में अपना राज्याभिषेक किया । इस अवसर पर उन्होंने छत्रपति की उपाधि धारण की । राज्याभिषेक के पश्चात् उन्होंने कर्नाटक के समृद्ध प्रदेशों जिंजी और वैलोर पर भी अपना अधिकार कर लिया । इस तरह वह दक्षिण भारत में एक स्वतन्त्र मराठा राज्य स्थापित करने में सफल हुए ।

शासन प्रबन्ध-

शिवाजी ने उच्चकोटि के शासन-प्रबन्ध द्वारा भी मराठों को एकता के सूत्र में बांधा । केन्द्रीय शासन का मुखिया छत्रपति (शिवाजी) स्वयं था । राज्य की सभी शक्तियां उसके हाथ में थीं । छत्रपति को शासन कार्यों में सलाह देने के लिए आठ मन्त्रियों का एक मन्त्रिमण्डल था । इसे अष्ट-प्रधान कहते थे । प्रत्येक मन्त्री के पास एक अलग विभाग था । शिवाजी ने अपने राज्य को तीन प्रान्तों में बांटा हुआ था। प्रत्येक प्रान्त एक सूबेदार के अधीन था । प्रान्त आगे चलकर परगनों अथवा तर्कों में बंटे हुए थे । शासन की सबसे छोटी इकाई गांव थी।

शिवाजी की न्याय-प्रणाली बड़ी साधारण थी । परन्तु यह लोगों की आवश्यकता के अनुरूप थी । मुकद्दमों का निर्णय प्रायः हिन्दू धर्म की प्राचीन परम्पराओं के अनुसार ही किया जाता था । राज्य की आय के मुख्य साधन भूमि-कर, चौथ तथा सरदेशमुखी थे । शिवाजी ने एक शक्तिशाली सेना का संगठन किया । उनकी सेना में घुड़सवार तथा पैदल सैनिक शामिल थे । उनके पास एक शक्तिशाली समुद्री बेड़ा, हाथी तथा तोपें भी थीं । सैनिकों को नकद वेतन दिया जाता था । उनकी सेना की सबसे बड़ी विशेषता अनुशासन थी । शिवाजी एक उच्च चरित्र के स्वामी थे । वह एक आदर्श पुरुष, वीर योद्धा, सफल विजेता तथा उच्च कोटि के शासन प्रबन्धक थे । धार्मिक सहनशीलता तथा देश-प्रेम उनके चरित्र के विशेष गुण थे । देशप्रेम से प्रेरित होकर उन्होंने मराठा जाति को संगठित किया और एक स्वतन्त्र हिन्दू राज्य की स्थापना की ।

शिवाजी के पश्चात् 1713 ई० तक मराठा-इतिहास –

शिवाजी के जीवन काल में औरंगजेब ने यह प्रयत्न किया था कि शिवाजी या तो मुग़ल साम्राज्य के मनसबदार बन जाएं या सामन्त । परन्तु वह अपने उद्देश्य में सफल न हो सका । 1680 ई० के पश्चात् तो स्थिति और भी बदल गई । औरंगजेब के पुत्र शहज़ादा अकबर ने बादशाह होने की घोषणा कर दी और वह शिवाजी के उत्तराधिकारी शम्भाजी की शरण में चला गया । औरंगजेब ने शम्भा जी के विरुद्ध अभियान भेजे किन्तु वह सफल न हुआ । बीजापुर तथा गोलकुण्डा के सुल्तान मराठों की सहायता करते रहे. । औरंगज़ेब ने बीजापुर और गोलकुण्डा दोनों को जीत लिया । इस प्रकार 1686-87 ई० तक दक्कन में केवल मराठे ही ऐसे लोग रह गए जो अभी तक स्वतन्त्र थे । औरंगज़ेब ने उन्हें अपने अधीन करने का निर्णय किया । उसने 1689 ई० में शम्भा जी को गिरफ्तार कर लिया तथा उनके पुत्र शाहू को भी पकड़ लिया गया । परन्तु शिवाजी का दूसरा पुत्र राजा राम मुग़लों के विरुद्ध जिंजी के किले से युद्ध करता रहा । 1700 ई० में राजाराम की भी मृत्यु हो गई । परन्तु अब उसकी पत्नी ताराबाई ने कोल्हापुर से संघर्ष जारी रखा । इस समय तक स्वराज्यी एवं मुगलई का अन्तर मिट गया था । मराठों के पास राज्य नहीं रहा था किन्तु बहुत से किले और छोटे-छोटे इलाके अब भी उनके अधिकार में आते रहे । इस प्रकार मराठे 1713 ई० तक मुग़लों से अपने प्रदेश वापस छीनने के लिए प्रयत्नशील रहे ।

प्रश्न 2. 18वीं सदी में पेशवाओं तथा मराठा सरदारों के अधीन मराठा शक्ति के उत्थान की रूप-रेखा बताएं।
उत्तर-शिवाजी की मृत्यु के पश्चात् उनके पुत्र शम्भाजी का वध कर दिया गया और उनके पौत्र शाहूजी को दिल्ली में बन्दी बना लिया गया । उसकी अनुपस्थिति में राजाराम की विधवा ताराबाई अपने पुत्र की संरक्षिका बन कर शासन करने लगी। मुग़लों ने मराठों को आपस में लड़ाने के लिए शाहूजी को बन्दीगृह से मुक्त कर दिया । शाहूजी के महाराष्ट्र पहुंचते ही बालाजी विश्वनाथ नामक ब्राह्मण ने उसकी सहायता की । उसने अन्य मराठा सरदारों को भी शाहूजी के साथ मिला दिया । प्रसन्न होकर शाहजी ने उसे अपना पेशवा नियुक्त कर लिया । बालाजी विश्वनाथ ने 1719 ई० में मुग़ल बादशाह से एक सन्धि की जिसके कारण शाहूजी को मुग़लों से वे सभी प्रदेश वापस मिल गए जो शिवाजी के अधीन स्वराज्य प्रदेश कहलाते थे । इसके अतिरिक्त मराठों को वे प्रदेश भी मिल गए जो कभी उन्होंने खानदेश, बरार, गोंडवाना, गोलकुण्डा तथा कर्नाटक में विजय किए थे।

1719 ई० में बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र बाजीराव प्रथम को पेशवा बनाया गया । 1740 ई० में उसकी भी मृत्यु हो गई और बालाजी बाजीराव पेशवा बना । वह 1761 ई० तक पेश्वा के पद पर आसीन रहा । इन दो पेशवाओं के अधीन मराठों ने लगभग समस्त भारत पर अपना अधिकार कर लिया और मराठा झण्डा अटक की दीवारों तक फहराने लगा । 1757 ई० तक वे मुग़ल बादशाह के भी संरक्षक बन गए । इसी कारण जब 1757 ई० में अहमदशाह ने लाहौर तथा सरहिन्द के प्रान्त पर आक्रमण किया, तो मराठों ने पंजाब पर आक्रमण कर दिया और अहमदशाह अब्दाली के पुत्र तैमूरशाह को पंजाब से मार भगाया । इसी बीच कई अन्य मराठा सरदारों ने कई प्रदेश जीते और मराठा राज्य की शक्ति में वृद्धि की । – पेशवाओं के पराक्रम से शाहूजी बड़े प्रसन्न थे । उन्होंने राज्यकर्म का सारा भार उन्हीं पर छोड़ दिया । धीरे-धीरे पेशवा ही राज्य के शासक बन गए । 1751 ई० में शाहूजी की मृत्यु के पश्चात् छत्रपति की शक्ति नाममात्र रह गई और पेशवा ही वास्तविक शासक बन गए । 1772 ई० के पश्चात् मराठा राजनीति का केन्द्र बिन्दु ‘पेशवा’ बन गया और स्वयं अंग्रेज़ भी उन्हीं से सन्धियां करने लगे । इस प्रकार मुख्यमन्त्री के रूप में कार्य करने वाला ‘पेशवा’ समय की गति के साथ-साथ राज्य की वास्तविक शक्ति बन गया ।

पेशवाओं तथा मराठा सरदारों के कार्य-पेशवाओं तथा मराठा सरदारों द्वारा शक्ति के विकास के लिए किए गए कार्यों का विस्तृत वर्णन इस प्रकार है-

बालाजी विश्वनाथ पेशवा वंश का संस्थापक था । शाहूजी ने उसे 1713 ई० में पेशवा नियुक्त किया । बालाजी विश्वनाथ ने मुग़ल राज परिवार के आपसी झगड़ों का लाभ उठाया । उसने 1719 ई० में मुग़लों से एक सन्धि की, जिसकी शर्ते ये थीं : (क) शाहूजी को ‘स्वराज्य प्रदेशों’ का शासक स्वीकार कर लिया । (ख) शाहूजी दक्षिण के 6 मुग़ल प्रदेशों से ‘चौथ’ तथा ‘सरदेशमुखी’ एकत्र कर सकेंगे । ये सूबे थे-खानदेश, बीदर, बरार, बीजापुर, गोलकुण्डा तथा औरंगाबाद । (ग) शाहूजी मुग़लों की सहायता के लिए एक सेना तैयार रखेंगे जिसमें 15 हज़ार सैनिक होंगे । इस सन्धि द्वारा वास्तव में शाहू जी को मराठों का राजा मान लिया गया । अतः मराठा सरदारों की शक्ति अब शाहू के विरुद्ध लड़ने की बजाय दूर स्थित प्रदेशों को । जीतने में लग गई । धीरे-धीरे पेशवा की शक्ति इतनी बढ़ गई कि वह शासन का सर्वेसर्वा हो गया ।

बाजीराव प्रथम-बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र बाजीराव प्रथम पेशवा बना । उसने निज़ाम हैदराबाद को 1728 ई० में ‘मालखेद’ के स्थान पर पराजित किया और उसके साथ मुजीशिव गांव की सन्धि की । उसने 1738 ई० में एक बार फिर निज़ाम को भोपाल के समीप पराजित किया । निजाम तथा मुग़लों ने नर्मदा और चम्बल के बीच का प्रदेश मराठों को दे दिया । बाजीराव प्रथम ने बुन्देल सरदार छत्रसाल की सहायता करके बुन्देलखण्ड के कुछ भाग पर अधिकार कर लिया । उसने दिल्ली के समीप मुग़ल सेना को पराजित किया । उसने अपने भाई ‘चिमनाजी आपे’ की सहायता से पुर्तगालियों को पराजित करके थाना, सालसट तथा बसीन के प्रदेश जीत लिए । इस प्रकार बाजीराव प्रथम ने एक के बाद दूसरा प्रर्देश जीता
और चारों दिशाओं में मराठा शक्ति का विकास किया। निःसन्देह वह एक महान् सेनानायक था ।

बालाजी बाजीराव तथा मराठा सरदार-बालाजी बाजीराव अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् पेशवा नियुक्त हुआ । उस समय उसकी आयु 18 वर्ष की थी । उसके काल में जहां मराठा शक्ति का उत्थान हुआ, वहां मराठा सरदारों की स्वतन्त्र सत्ता का भी विकास हुआ । उसके काल की मुख्य घटनाएं थीं : (i) मराठा सरदार सिंधिया तथा होल्कर ने जयपुर के शासक ईश्वर सिंह से ‘चौथ’ मांगा । ईश्वर सिंह कर देने में असमर्थ था इसलिए तंग आकर उसने विष खा कर आत्म-हत्या कर ली । यह मराठों की एक बहुत बड़ी भूल थी जिसके परिणामस्वरूप मराठों को राजपूतों की सहानुभूति से वंचित होना पड़ा । (ii) 1758 ई० में सदाशिव राव ने 40 हज़ार सैनिकों की सहायता से निज़ाम पर आक्रमण किया । उदयगीर में निज़ाम पराजित हुआ । सन्धि के अनुसार निज़ाम को बीजापुर, औरंगाबाद, बीदर तथा दौलताबाद से हाथ धोना पड़ा । (iii) मराठों ने उत्तर में भी अपने राज्य का विस्तार आरम्भ कर दिया । सितम्बर, 1751 ई० में मलहार राव होल्कर तथा रघुनाथ राव दिल्ली की ओर बढ़े । उन्होंने अब्दाली के प्रतिनिधि को गिरफ्तार कर लिया और दिल्ली का प्रबन्ध वज़ीर इमान को सौंप दिया । तत्पश्चात् वे पंजाब की ओर बढ़े । मार्च, 1758 ई० में इन्होंने सरहिन्द पर अधिकार कर लिया और अप्रैल में लाहौर पर । उन्होंने अब्दाली के पुत्र तैमूर शाह तथा उसके जरनैल जमाल खां को मार भगाया । (iv) शाहूजी भौंसले ने कटक पर अधिकार कर लिया और अलीवरदी खां से 20 लाख रुपया प्राप्त किया (v) सदाशिव राव ने कर्नाटक पर अधिकार कर लिया । इस प्रकार हम देखते हैं कि बालाजी बाजीराव के अधीन मराठा शक्ति अपनी चरम सीमा पर पहुंच गई । मराठा पताका अटक तक फहराने लगी।

प्रश्न 3. 18वीं सदी में हैदराबाद एवं मैसूर के नए-नए राज्यों के उत्थान और मराठों के साथ उनके सम्बन्धों के बारे में बताएं।
उत्तर-18वीं शताब्दी में उत्तरी तथा दक्षिणी भारत में अनेक नई शक्तियों का उदय हुआ । इनमें से हैदराबाद तथा मैसूर की रियासतें काफ़ी महत्त्वपूर्ण थीं । इन रियासतों के उत्थान तथा मराठों के साथ उनके सम्बन्धों का वर्णन इस प्रकार है :-

1. हैदराबाद-

हैदराबाद 18वीं शताब्दी में दक्षिण भारत की एक बहुत ही शक्तिशाली रियासत थी । इसकी स्थापना किलिच खां ने की। वह 1713 ई० में दक्षिण का मुग़ल सूबेदार बना और सम्राट ने उसे निजाम-उल-मुल्क की उपाधि प्रदान की । वह बड़ा ही महत्त्वाकांक्षी था। वह दक्षिण भारत का स्वतन्त्र शासक बनना चाहता था । इसलिए 1724 ई० में उसने मुग़ल सम्राट के मुख्य वज़ीर से लड़ाई की और उसे हरा कर दक्षिण पर अपना अधिकार जमा लिया । अत: मुग़ल सम्राट् मुहम्मद शाह ने उसे दक्षिण का सूबेदार मान लिया और 1725 ई० में उसे आसफजाह की उपाधि से सुशोभित किया । परन्तु सम्राट का यह काम दिखावा मात्र था । आसफजाह अब तक दक्षिण का शासक बन चुका था । वह और उसके उत्तराधिकारी हैदराबाद के निज़ाम के नाम से प्रसिद्ध हुए ।

निजाम-उल-मुल्क आसफजाह दक्षिण के सारे मुग़ल प्रदेशों में अपनी शक्ति स्थापित न कर सका । मरने से पहले उसके पास केवल वही राज्य रह गया था जो सबसे पहले मुग़ल साम्राज्य का गोलकुण्डा प्रान्त था । उसकी राजधानी भी गोलकुण्डा की पुरानी राजधानी हैदराबाद ही थी । 1719 में बाला जी विश्वनाथ ने बादशाह के साथ राजा शाहू के नाम से एक सन्धि करके दक्षिण के मुग़ल सूबे से चौथ तथा सरदेशमुखी एकत्रित करने का अधिकार प्राप्त कर लिया था । परन्तु अब निजाम-उलमुल्क आसफजाह मराठों के इस अधिकार को स्वीकार नहीं कर सकता था । इसलिए मराठों से उसकी लड़ाई होनी आवश्यक हो गई थी । उसने राजा शाहू के विरुद्ध उसके कोल्हापुर वाले सम्बन्धियों को भड़काना आरम्भ कर दिया । उसने कुछ मराठा सरदारों को भी पेशवा के विरुद्ध उत्तेजित किया । स्वयं 1728 ई० में निज़ाम-उल-मुल्क ने पेशवा के साथ लड़ाई की जो मालखेद में हुई। परन्तु इस लड़ाई में निजाम-उल-मुल्क पराजित हुआ और उसने शाहू को छत्रपति मान लिया । उसने छत्रपति को चौथ और सरदेशमुखी देना भी स्वीकार कर लिया ।

निजाम-उल-मुल्क अब भी यह नहीं चाहता था कि मराठों की शक्ति का अधिक विस्तार हो । उसको यह भय था कि मराठे उत्तरी भारत में अपनी शक्ति बढ़ा कर और मुग़ल सम्राट् से अधिकार प्राप्त करके हैदरबाद की रियासत को समाप्त करने का प्रयत्न करेंगे । इसलिए यह आवश्यक था कि वह मालवा पर अपना अधिकार स्थापित करते । परन्तु 1738 ई० में वह भोपाल के निकट मराठों से एक बार फिर हार गया । अब वह इस योग्य न रहा कि मराठों को उत्तरी-भारत में शक्ति बढ़ाने से रोक सके । मुग़ल सम्राट की दृष्टि में भी उसकी शक्ति स्पष्ट रूप से मराठों से क्षीण हो गई थी । उसकी 1748 ई० में मृत्यु हो गई । इस समय तक वह हैदराबाद का एक स्वतन्त्र शासक बन चुका था ।

निज़ाम-उल-मुल्क की मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्रों तथा निकट सम्बन्धियों के बीच हैदराबाद की राजगद्दी के लिए आपसी संघर्ष छिड़ गया । फलस्वरूप लगभग दस-बारह वर्षों तक हैदराबाद की राजनीतिक दशा बड़ी शोचनीय रही । परन्तु 1761 ई० में उसके पुत्र निज़ाम अली ने अपनी शक्ति बढ़ा ली और मुग़ल सम्राट् से हैदराबाद पर अपने अधिकार का अनुमति पत्र प्राप्त कर लिया । सम्राट ने उसे भी निज़ाम-उल-मुल्क तथा आसफजाह की उपाधि प्रदान की । इतना होने पर भी निज़ाम अली हैदराबाद की शक्ति को और अधिक न बढ़ा सका । कई वर्षों तक उसे मैसूर के शासक हैदर अली की ओर से खतरा बना रहा । समय-समय पर हैदरअली के साथ उसकी लड़ाई भी हुई परन्तु किसी को भी निर्णायक विजय प्राप्त न हो सकी। कुछ अन्य पड़ोसी शक्तियों से भी उसका संघर्ष चलता रहा। इन परिस्थितियों में उसने 1798 ई० में अंग्रेजों के साथ एक सन्धि की और उनकी अधीनता स्वीकार कर ली । इस प्रकार हैदराबाद की रियासत अंग्रेजों की अधीनता में आ गई।

2. मैसूर-

मैसूर रियासत का उदय विजयनगर राज्य के पतन के बाद हुआ । 1600 ई० के लगभग उदियार नामक एक व्यक्ति ने विजयनगर के सामन्त के रूप में मैसूर में अपना राज्य स्थापित कर लिया था । लगभग 1700 ई० में उदियार का एक अधिकारी मैसूर का स्वतन्त्र शासक बन गया । उसका नाम देव राय था । लगभग आधी शताब्दी तक उसके उत्तराधिकारियों ने इस रियासत को स्थाई रखा । परन्तु वे धीरे-धीरे निर्बल होते गए और उनके मन्त्री शक्तिशाली हो गए । 1750 ई० से कुछ समय पश्चात् मैसूर के एक मन्त्री नन्दराज के संरक्षण में हैदरअली नामक एक सेनानायक मैसूर का मुख्य सेनापति बन गया । वह 1761 ई० नन्दराज से भी अधिक शक्तिशाली हो गया । इसके दो वर्ष बाद उसने मराठों के कुछ राज्यों को अपने अधीन करना आरम्भ कर दिया । इसीलिए मराठों से उसकी टक्कर होनी आवश्यक हो गई ।

1764 से 1770 के बीच मराठों ने कई बार मैसूर पर आक्रमण किया और हैदरअली को पराजित किया । परन्तु मराठा सरदार आपसी झगड़ों के कारण मैसूर का अन्त न कर सके । 1770 ई० में उन्होंने हैदरअली से सन्धि कर ली । इस सन्धि से भी हैदरअली की कठिनाइयों का अन्त न हुआ । उसे मराठों के अतिरिक्त हैदराबाद, कर्नाटक तथा अंग्रेजों से भी निपटना पड़ा । इस प्रकार अपनी मृत्यु तक वह किसी-न-किसी लड़ाई में ही उलझा रहा । उसके बाद उसके पुत्र टीपू ने एक स्वतन्त्र शासक के रूप में मैसूर की राजगद्दी सम्भाली । उसे भी अंग्रेजों से टक्कर लेनी पड़ी । 1799 ई० में वह अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ता हुआ मारा गया । अंग्रेजों ने मैसूर के बहुत से प्रदेशों पर अपना अधिकार कर लिया और शेष राज्य उदियार वंश के एक राजकुमार को दे दिया । हैदराबाद की भान्ति मैसूर की रियासत भी अंग्रेजों के अधीन 1947 ई० तक स्थापित रही ।

महत्त्वपूर्ण परीक्षा-शैली प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. उत्तर एक शब्द से एक वाक्य तक

प्रश्न 1. शिवाजी का जन्म कब तथा कहां हुआ ?
उत्तर-शिवाजी का जन्म 1627 ई० में पूना के निकट शिवनेरी के दुर्ग में हुआ।

प्रश्न 2. शिवाजी के माता-पिता का क्या नाम था ?
उत्तर-शिवाजी की माता का नाम जीजाबाई तथा पिता का नाम शाह जी भौंसले था ।

प्रश्न 3. शाइस्ता खां कौन था ?
उत्तर-शाइस्ता खां औरंगजेब का मामा था जो एक योग्य सेनानायक था।

प्रश्न 4. पुरन्धर की सन्धि किस-किस के बीच हुई ?
उत्तर-पुरन्धर की सन्धि मुग़ल सेनानायक मिर्जा राजा जयसिंह तथा शिवाजी के बीच में हुई।

प्रश्न 5. ताराबाई कौन थी ?
उत्तर-ताराबाई छत्रपति शिवाजी के पुत्र की पत्नी अर्थात् शिवाजी की पुत्रवधू थी। वह अपने पुत्र शिवाजी द्वितीय की संरक्षिका थी।

2. रिक्त स्थानों की पूर्ति

(i) शाहू ………. का पुत्र था ।
(ii) पानीपत का तीसरा युद्ध ……… ई० में हुआ था।
(iii) टीपू सुल्तान ………… का पुत्र तथा उत्तराधिकारी था।
(iv) हैदराबाद रियासत का संस्थापक ………… था।
(v) अंग्रेजों ने दिल्ली पर ………. ई० में अधिकार किया।
उत्तर-

(i) शम्भा जी
(ii) 1761
(iii) हैदरअली
(iv) चिन किलिच खान
(v) 1803 ।

3. सही/ग़लत कथन

(i) पानीपत का तीसरा युद्ध अहमदशाह अब्दाली तथा शिवाजी के बीच हुआ। — (✗)
(ii) होल्कर सरदारों की राजधानी इंदौर थी। — (✓)
(iii) हैदरअली मैसूर का मुख्य सेनापति था। — (✓)
(iv) शिण्डे सरदार मालवा पर शासन करते थे। — (✗)
(v) शिण्डे सरदारों की राजधानी ग्वालियर थी। — (✓)

4. बहु-विकल्पीय प्रश्न

(i) मिर्जा राजा जयसिंह किसका सेनापति था?
(A) अकबर
(B) औरंगजेब
(C) शिवाजी
(D) हैदरअली ।
उत्तर-(B) औरंगजेब

(ii) निम्न में से कौन सा अंग शिवाजी की सेना का नहीं था?
(A) पैदल सैनिक
(B) तोपखाना
(C) घुड़सवार
(D) अश्व सेना ।
उत्तर-(D) अश्व सेना ।

(iii) निम्न लड़ाई मराठों के लिए बहुत घातक सिद्ध हुई-
(A) पानीपत की पहली लड़ाई
(B) पानीपत की दूसरी लड़ाई
(C) पानीपत की तीसरी लड़ाई
(D) उपरोक्त सभी ।
उत्तर-(C) पानीपत की तीसरी लड़ाई

(iv) शिवाजी के ‘अष्ट प्रधान’ का मुखिया कहलाता था-
(A) पेशवा
(B) पण्डित राव
(C) पाटिल
(D) इनमें से कोई नहीं ।
उत्तर-(A) पेशवा

(v) हैदरअली की मृत्यु हुई-
(A) 1702
(B) 1707
(C) 1761
(D) 1782.
उत्तर-(D) 1782.

II. अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1. मराठों के इतिहास की जानकारी के स्रोतों के चार मुख्य प्रकारों के नाम बताओ ।
उत्तर-मराठों के इतिहास की जानकारी के चार प्रकार के स्रोत हैं-मराठी में लिखे गए वृत्तान्त, मराठा सरकार के रिकार्ड, फ़ारसी एवं राजस्थानी में भेजे गए पत्र और तत्कालीन अखबार ।

प्रश्न 2. इतिहासकार कौन-सी सदी को ‘मराठों का युग’ कहते हैं और क्यों ?
उत्तर- इतिहासकार 18वीं सदी को मराठों का युग कहते हैं क्योंकि इस सदी में मराठे सबसे अधिक शक्तिशाली थे ।

प्रश्न 3. शिवाजी का जन्म कब हुआ और उन्होंने राज्य स्थापना का प्रयत्न कब आरम्भ किया ?
उत्तर-शिवाजी का जन्म 1627 ई० में हुआ । उन्होंने राज्य स्थापना का प्रयत्न 1646 ई० में आरम्भ किया ।

प्रश्न 4. शिवाजी के पिता का क्या नाम था और उन्होंने दक्कन के किन सुल्तानों से जागीरें प्राप्त की थी ?
उत्तर-शिवाजी के पिता का नाम शाहजी था । उन्होंने अहमदनगर तथा बीजापुर के सुल्तानों से जागीरें प्राप्त की ।

प्रश्न 5. शिवाजी ने अपनी विजय किस प्रदेश से आरम्भ की तथा 1646 ई० में किस किले पर अधिकार किया ?
उत्तर-शिवाजी ने अपनी विजय पश्चिमी घाट के कोंकण प्रदेश से आरम्भ की । उन्होंने 1646 ई० में तोरण के किले पर अधिकार किया ।

प्रश्न 6. शिवाजी ने दक्षिण के कौन-से चार राज्यों के क्षेत्रों में विजय प्राप्त की ?
उत्तर-शिवाजी ने दक्षिण के अहमदनगर, बीजापुर, मैसूर तथा कर्नाटक राज्यों के क्षेत्रों में विजय प्राप्त की ।

प्रश्न 7. शिवाजी ने कौन-सी प्रसिद्ध मुगल बन्दरगाह को लूटा तथा किस मुगल सेनापति को हराया ?
उत्तर-शिवाजी ने मुग़लों की प्रसिद्ध बन्दरगाह सूरत को लूटा । उन्होंने मुग़ल सेनापति शाइस्ता खाँ को हराया ।

प्रश्न 8. शिवाजी ने मुग़लों के साथ कौन-सी सन्धि की तथा यह किसके प्रयासों से हुई ?
उत्तर-शिवाजी ने मुग़लों से पुरन्धर की सन्धि की । यह सन्धि मुग़ल सेनापति जयसिंह के प्रयासों से हुई ।

प्रश्न 9. शिवाजी औरंगजेब को कहां और कौन-से वर्ष में मिले थे ?
उत्तर-शिवाजी औरंगजेब को 1666 ई० में आगरा में मिले थे ।

प्रश्न 10. शिवाजी का राज्याभिषेक कब और कहां हुआ तथा उन्होंने कौन-सी उपाधि धारण की ?
उत्तर-शिवाजी का राज्याभिषेक 16 जून, 1676 को रायगढ़ में हुआ । उन्होंने ‘छत्रपति’ की उपाधि धारण की ।

प्रश्न 11. शिवाजी की मृत्यु कब हुई तथा उनका उत्तराधिकारी कौन था ?
उत्तर-शिवाजी की मृत्यु 1680 ई० में हुई । उनका उत्तराधिकारी शम्भाजी था ।

प्रश्न 12. शिवाजी का राज्य कितने प्रशासनिक भागों में बंटा हुआ था ?
उत्तर-शिवाजी का राज्य ‘प्रान्तों’, ‘परगनों’, ‘तरफों’ तथा गांवों में बंटा हुआ था । इस प्रकार उनका राज्य चार प्रशासनिक भागों में विभाजित था ।

प्रश्न 13. शिवाजी के मन्त्रिमण्डल को क्या कहा जाता था तथा उनका प्रधान कौन था ?
उत्तर- शिवाजी के मन्त्रिमण्डल को ‘अष्ट प्रधान’ कहा जाता था । ‘अष्ट प्रधान’ का मुखिया (प्रधान) पेशवा होता था ।

प्रश्न 14. शिवाजी की सेना में कौन-से चार अंग थे ?
उत्तर-शिवाजी की सेना के चार अंग थे-‘घुड़सवार’, ‘पैदल सैनिक’, ‘तोपखाना’ तथा ‘समुद्री बेड़ा’।

प्रश्न 15. स्वराजीय तथा मुगलई से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-स्वराजीय वे प्रदेश थे जो सीधे तौर पर शिवाजी के अधीन थे । मुग़लई वे प्रदेश थे जहां से शिवाजी चौथ तथा सरदेशमुखी नामक कर वसूल करते थे ।

प्रश्न 16. चौथ तथा सरदेशमुखी लगान के कौन-से भाग थे ?
उत्तर-चौथ लगान का चौथा भाग तथा सरदेशमुखी लगान का दसवां भाग होता था ।

प्रश्न 17. शिवाजी के दो पुत्रों के नाम बताएं और ताराबाई किसकी पत्नी थी और वह कहां से राज्य करती थी ?
उत्तर-शिवाजी के दो पुत्रों के नाम थे-शम्भाजी तथा राजाराम । ताराबाई राजाराम की पत्नी थी जो कोल्हापुर से राज्य करती थी।

प्रश्न 18. शाहू किसका पुत्र था तथा उसने अपनी राजधानी कौन-सी बनाई ?
उत्तर- शाहू शम्भाजी का पुत्र था । उसने सतारा को अपनी राजधानी बनाया ।

प्रश्न 19. शाहू ने अपना पेशवा कब और किसको बनाया ?
उत्तर-शाहू ने 1713 ई० में बालाजी विश्वनाथ को अपना पेशवा बनाया ।

प्रश्न 20. शाहू तथा मुगल बादशाह में सन्धि कब हुई तथा इसमें शाहू का प्रतिनिधित्व किसने किया ?
उत्तर-शाहू तथा मुग़ल बादशाह में 1719 ई० में सन्धि हुई । इसमें शाहू का प्रतिनिधित्व बालाजी विश्वनाथ ने किया ।

प्रश्न 21. मुगल बादशाह के साथ सन्धि के द्वारा शाहू ने कितने घुड़सवार रखना और कितना खिराज देना स्वीकार किया ?
उत्तर- इस सन्धि द्वारा शाहू ने 15,000 घुड़सवार रखना तथा दस लाख रुपया वार्षिक खिराज देना स्वीकार किया ।

प्रश्न 22. 18वीं सदी के चार महत्त्वपूर्ण पेशवाओं के नाम बताएं । .
उत्तर-18वीं सदी के चार महत्त्वपूर्ण पेशवा थे-बालाजी विश्वनाथ, बाजीराव, बालाजी बाजीराव और माधोराव ।

प्रश्न 23. किन दो पेशवाओं के समय में मराठों की शक्ति अपने शिखर पर पहुंची तथा उनका कार्यकाल क्या था ?
उत्तर-बालाजी विश्वनाथ तथा बाजीराव के समय में मराठों की शक्ति अपने शिखर पर पहुंची । बालाजी विश्वनाथ का कार्यकाल 1713 ई० से 1719 ई० तथा बाजीराव का कार्यकाल 1719 ई० से 1740 ई० तक था ।

प्रश्न 24. मराठों ने दक्षिण के किन दो शासकों से खिराज वसूल किया ?
उत्तर-मराठों ने दक्षिण में हैदराबाद तथा कर्नाटक के शासकों से खिराज वसूल किया ।

प्रश्न 25. मराठों ने पुर्तगालियों से कौन-से दो स्थान जीते ?
उत्तर-मराठों ने पुर्तगालियों से सालसैट और बसीन के प्रदेश जीते ।

प्रश्न 26. 1740 ई० से पूर्व मराठों ने उत्तरी भारत के कौन-कौन से दो प्रदेशों पर अपनी प्रभुसत्ता स्थापित कर ली ?
उत्तर-1740 ई० से पूर्व मराठों ने उत्तरी भारत के मालवा और बुन्देलखण्ड प्रदेशों में अपनी प्रभुसत्ता स्थापित की ।

प्रश्न 27. 1740 ई० से पूर्व मराठों ने कौन-से चार प्रदेशों से चौथ एवं सरदेशमुखी वसूल किया ?
उत्तर-1740 ई० से पूर्व मराठों ने हैदराबाद, कर्नाटक, मालवा और बुन्देलखण्ड के प्रदेशों से चौथ एवं सरदेशमुखी वसूल किया ।

प्रश्न 28. कौन-से वर्ष में मराठे मुग़ल बादशाह के रक्षक बन गए तथा उन्होंने अहमदशाह अब्दाली के पुत्र को पंजाब से कब खदेड़ा ?
उत्तर-मराठे 1757 ई० में मुग़ल बादशाह के रक्षक बन गए । उन्होंने अहमदशाह अब्दाली के पुत्र को 1758 ई० में पंजाब से खदेड़ा।

प्रश्न 29. पानीपत का तीसरा युद्ध कब और किनके बीच हुआ?
उत्तर-पानीपत का तीसरा युद्ध 1761 ई० में हुआ । यह युद्ध अहमदशाह अब्दाली तथा मराठों के बीच हुआ ।

प्रश्न 30. पानीपत की तीसरी लड़ाई के बाद किन पांच इलाकों में मराठों की सत्ता समाप्त हो गई ?
उत्तर-पानीपत की तीसरी लड़ाई के बाद मराठा सत्ता बंगाल, बिहार, अवध, पंजाब और मैसूर में समाप्त हो गई ।

प्रश्न 31. गुजरात पर कौन-से मराठा सरदारों का अधिकार था और उनकी राजधानी कौन-सी थी ?
उत्तर-गुजरात पर गायकवाड़ सरदारों का अधिकार था । उनकी राजधानी बड़ौदा थी ।

प्रश्न 32. उड़ीसा तथा मध्य भारत पर कौन-से मराठा सरदारों का अधिकार था तथा उनकी राजधानी कौन-सी थी?
उत्तर-उड़ीसा तथा मध्य भारत पर भौंसला सरदारों का शासन था । उनकी राजधानी नागपुर थी ।

प्रश्न 33. होल्कर सरदार किस प्रदेश पर शासन करते थे तथा उनकी राजधानी कौन-सी थी ?
उत्तर-होल्कर सरदार मालवा में शासन करते थे । उनकी राजधानी इन्दौर थी ।

प्रश्न 34. शिण्डे सरदार किस प्रदेश पर शासन करते थे तथा उनकी राजधानी कौन-सी थी ?
उत्तर-शिण्डे सरदार बुन्देलखण्ड पर शासन करते थे । उनकी राजधानी ग्वालियर थी ।

प्रश्न 35: पानीपत के युद्ध के बाद नए पेशवा का क्या नाम था तथा उसकी राजधानी कहां थी ?
उत्तर-पानीपत के युद्ध के बाद नए पेशवा का नाम माधोराव था । उसकी राजधानी पूना थी ।

प्रश्न 36. मराठे कौन-से मुगल बादशाह को और कब दिल्ली में लाए ?
उत्तर-मराठे मुग़ल बादशाह शाह आलम द्वितीय को 1772 ई० में दिल्ली लाए ।

प्रश्न 37. उत्तर भारत में सबसे शक्तिशाली मराठा सरदार कौन था तथा उसे मुग़ल बादशाह से कौन-सी पदवियां मिलीं ?
उत्तर-उत्तर भारत में सबसे शक्तिशाली मराठा सरदार महादजी शिण्डे था । उसे मुग़ल बादशाह से ‘वकील-ए-मुतलक’ तथा ‘मीर बख्शी’ की पदवियां मिलीं ।

प्रश्न 38. अंग्रेजों ने 1802-03 ई० में कौन-से चार मराठा सरदारों के साथ सन्धियां की ?
उत्तर-अंग्रेजों ने 1802-03 ई० में जिन चार मराठा सरदारों से सन्धियां कीं, वे थे-गायकवाड़, भौंसले, शिण्डे तथा स्वयं पेशवा ।

प्रश्न 39. अंग्रेजों ने दिल्ली पर कब अधिकार किया और किस मुग़ल बादशाह को अपने प्रभाव अधीन लिया ?
उत्तर-अंग्रेज़ों ने दिल्ली पर 1803 ई० में अधिकार किया । इस प्रकार उन्होंने मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय को अपने प्रभाव अधीन कर लिया ।

प्रश्न 40. 18वीं सदी में मराठों के बाद दक्षिण की सबसे शक्तिशाली रियासत कौन-सी थी तथा इसके आरम्भिक संस्थापक का नाम क्या था ?
उत्तर-18वीं सदी में मराठों के बाद दक्षिण की सबसे शक्तिशाली रियासत हैदराबाद थी । इसके आरम्भिक संस्थापक का नाम चिन किलिच खान था ।

प्रश्न 41. हैदराबाद के शासक को मुगल बादशाह की ओर से कौन-सी दो उपाधियां और कब दी गईं ?
उत्तर-हैदराबाद के शासक को मुग़ल बादशाह की ओर से ‘निजामुलमुल्क’ तथा ‘आसफ़जाह’ की उपाधियां दी गईं। उसे पहली उपाधि 1713 ई० में और दूसरी उपाधि 1725 ई० में दी गई ।

प्रश्न 42. निजामुलमुल्क मराठों से किन दो लड़ाइयों में तथा कब पराजित हुआ ?
उत्तर-निज़ामुलमुल्क मराठों से मालखेद तथा भोपाल के निकट लड़ी गई लड़ाइयों में क्रमश: 1728 ई० तथा 1738 ई० में पराजित हुआ ।

प्रश्न 43. निज़ामअली किसका पुत्र था तथा उसने कब सत्ता प्राप्त की ?
उत्तर-निज़ामअली आसफजाह (निजामुलमुल्क) का पुत्र था । उसने 1761 ई० में सत्ता प्राप्त की ।

प्रश्न 44. हैदरअली कब और किस राज्य का मुख्य सेनापति बना ?
उत्तर-हैदरअली 1750 ई० से कुछ समय पश्चात् मैसूर राज्य का मुख्य सेनापति बना ।

प्रश्न 45. हैदरअली की दक्षिण की कौन-सी चार शक्तियों के साथ लड़ाई रही ?
उत्तर-हैदरअली की दक्षिण की जिन शक्तियों के साथ लड़ाई रही, वे थीं-मराठे, हैदराबाद का शासक, कर्नाटक का नवाब और अंग्रेज़ ।

प्रश्न 46. हैदरअली ने मराठों के साथ समझौता कब किया और कितना रुपया देना स्वीकार किया ?
उत्तर-हैदरअली ने 1770 ई० में मराठों के साथ समझौता किया और उन्हें 31 लाख रुपया देना स्वीकार किया ।

प्रश्न 47. हैदरअली की मृत्यु कब हुई तथा उसके उत्तराधिकारी का नाम क्या था ?
उत्तर-हैदरअली की मृत्यु 1782 ई० में हुई । उसके उत्तराधिकारी का नाम टीपू सुल्तान था ।

प्रश्न 48. टीपू सुल्तान ने अपने आपको एक स्वतन्त्र शासक कब घोषित किया तथा उसकी मृत्यु कब और किससे लड़ते समय हुई ?
उत्तर-टीपू सुल्तान ने 1786 ई० में अपने आपको स्वतन्त्र शासक घोषित किया । उसकी मृत्यु 1799 ई० में अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ते समय हुई ।

III. छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1. 18वीं शताब्दी में दक्षिणी भारत की नई रियासतें कौन-सी थीं ?
उत्तर-18वीं शताब्दी में मुग़ल साम्राज्य के पतन के बाद दक्षिण में अनेक नई रियासतों का उदय हुआ । इनमें से मराठा राज्य, हैदराबाद और मैसूर प्रमुख थीं । मराठा राज्य यूं तो 17वीं शताब्दी में ही शिवाजी के अधीन शक्तिशाली हो गया था परन्तु इसके उत्तराधिकारियों के समय तथा पानीपत के तीसरे युद्ध के बाद इस राज्य की शक्ति छिन्न-भिन्न हो गई । हैदराबाद राज्य की स्थापना चिन-किलिच खान ने की थी । सम्राट् मुहम्मद शाह ने 1725 ई० में इसे आसफजाह की उपाधि दी जो कि एक दिखावा मात्र थी । वास्तव में आसफजाह निज़ाम के नाम से प्रसिद्ध हुए । 1798 ई० में हैदराबाद के शासक ने अंग्रेजों के साथ सन्धि कर ली और उनकी शरण ले ली । इसके बाद भारत के स्वतन्त्र होने तक यह रियासत अंग्रेजों की अधीनता में ही स्थापित रही ।

मैसूर रियासत का उदय विजयनगर राज्य के पतन के बाद हुआ । इस राज्य के प्रसिद्ध शासक थे-हैदरअली और टीपू सुल्तान । अंग्रेजों ने 1799 ई० में टीपू सुल्तान को हराकर मैसूर के बहुत-से प्रदेशों पर अपना अधिकार कर लिया और शेष राज्य उदियार वंश के एक राजकुमार को दे दिया । हैदराबाद की भान्ति मैसूर की रिसायत भी अंग्रेजों के अधीन 1947 ई० तक स्थापित रही।

प्रश्न 2. दक्षिण में मराठा शक्ति के उदय के कारण लिखो ।
उत्तर-मराठे महाराष्ट्र के रहने वाले थे । इस प्रदेश में पश्चिमी घाट की पहाड़ियां स्थित हैं । अतः मराठों को आजीविका कमाने के लिए कठोर परिश्रम करना पड़ता था । परिश्रम के जीवन ने उन्हें वीर तथा साहसी बनाया । दक्षिण के मुसलमान राज्यों में रह कर उनके सैनिक गुणों का विकास हुआ । यहां के मुसलमान शासकों ने उन्हें सेना में भर्ती किया और उनकी सहायता से अनेक युद्ध जीते । इस प्रकार मराठों को अपनी सैनिक शक्ति का पूर्णतया आभास हो गया । 15वीं तथा 16वीं शताब्दी में मराठा प्रदेश में धार्मिक पुनर्जागरण हुआ । तुकाराम, एकनाथ, रामदास तथा वामन पण्डित आदि सन्तों ने मराठों में एकता और समानता की भावना का प्रचार किया । परिणामस्वरूप मराठे जाति-पाति के भेदभाव भूल कर एक हो गए । मराठा शक्ति के उत्थान में सबसे अधिक योगदान शिवाजी का था। उन्होंने अपनी योग्यता और वीरता से बिखरी हुई मराठा शक्ति को एक लड़ी में पिरोया । अन्त में शिवाजी के नेतृत्व में मराठे दक्षिण भारत में सबसे अधिक शक्तिशाली हो गए ।

प्रश्न 3. बाजीराव के नेतृत्व में मराठा शक्ति के उत्तरी भारत में विस्तार का वर्णन कीजिए।
उत्तर-बाजीराव 1719 ई० में पेशवा बना । मराठा इतिहास में उसे सबसे महान् पेशवा कहा जाता है । वह मराठा राज्य का विस्तार सारे भारत में करना चाहता था । उसने निज़ाम हैदराबाद को 1728 ई० में पराजित किया और उसके साथ एक सन्धि की । सन्धि के अनुसार निज़ाम ने शाहू जी को एकमात्र मराठा राजा स्वीकार किया और वचन दिया कि वह शम्भूजी का पक्ष नहीं लेगा । 1738 ई० में भोपाल के समीप बाजीराव ने पुनः निज़ाम को पराजित किया । निज़ाम तथा मुगलों ने नर्मदा और चम्बल के बीच का प्रदेश मराठों को दे दिया । इसके अतिरिक्त पेशवा के भाई चिमना जी आपे ने मालवा के गवर्नर गिरधर बहादुर को पराजित किया । पेशवा ने बुन्देल सरदार छत्रसाल की सहायता करके बुन्देलखण्ड के कुछ भाग पर भी अधिकार कर लिया । उसने दिल्ली के समीप मुग़ल सेना को हराया। तत्पश्चात् उसने अपने भाई चिमना जी आपे की सहायता से पुर्तगालियों को पराजित करके थाना, सालसेट तथा बसीन के प्रदेशों पर भी विजय प्राप्त की । इस प्रकार बाजीराव प्रथम ने अनेक प्रदेश विजित किए और मराठा राज्य का विस्तार किया ।

प्रश्न 4. पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठों की पराजय के कारणों की समीक्षा कीजिए ।
उत्तर-पानीपत की तीसरी लड़ाई में अनेक कारणों से मराठों की पराजय हुई । प्रथम, मराठा सरदार सदाशिव राव बड़ा ही हठी स्वभाव का व्यक्ति था। अपने हठी स्वभाव के कारण ही उसने राजपूतों को अपना शत्रु बना लिया था। परिणामस्वरूप पानीपत के युद्ध में मराठों को राजपूतों की सहायता न मिल सकी। दूसरे, युद्ध में मराठा सरदार विश्वास राव की मृत्यु के कारण सदाशिव राव चुपचाप हाथी से नीचे उतर आया। उसके सैनिकों ने जब उसे हाथी पर न देखा तो उनका धैर्य टूट गया। तीसरे, मराठा सरदारों में आपसी एकता नहीं थी। एकता के अभाव में उन्हें पराजित होना पड़ा । चौथे, मराठा सैनिक छापामार युद्ध करने में अधिक कुशल थे। वे इस आमने-सामने के युद्ध में शत्रु सेना का पूरी तरह सामना न कर सके । पांचवें, इस युद्ध में अब्दाली को अवध के नवाब तथा रुहेला सरदारों ने भी सहायता दी, जिससे उसकी शक्ति बढ़ गई । छठे, युद्ध में मराठा सेना की रसद का प्रबन्ध ठीक न होने के कारण उन्हें कई बार भूखा रहना पड़ा । यह बात भी उनकी पराजय का कारण बनी।

प्रश्न 5. मराठे एक शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित करने में क्यों असफल रहे ?
उत्तर-मराठे कई कारणों से भारत में शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित करने में असफल रहे । प्रथम, शिवाजी अपने सैनिकों को नकद वेतन देते थे । परन्तु पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने जागीर प्रथा आरम्भ कर दी । परिणाम यह हुआ कि मराठा सरदार शक्तिशाली हो गए और केन्द्रीय सत्ता निर्बल हो गई । दूसरे, पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों के लगभग 70 हज़ार सैनिक मारे गये। इस प्रकार उनकी सैनिक शक्ति लगभग नष्ट हो गई । तीसरे, मराठों के पास अंग्रेज़ों की तरह अच्छे शस्त्र नहीं थे। उनकी सेना भी अंग्रेज़ों जैसी संगठित नहीं थी। इस कारण वे अंग्रेजों के विरुद्ध पराजित हुए । चौथे, मराठे गुरिल्ला युद्ध प्रणाली में कुशल थे। परन्तु उन्हें अंग्रेजों के विरुद्ध मैदानी युद्ध करने पड़े । पांचवें, मराठा सरदारों में एकता का अभाव था। इस स्थिति में शक्तिशाली राज्य स्थापित करना असम्भव था । छठे, मराठों ने शासन-व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने की ओर विशेष ध्यान न दिया। वे अधिकतर लूटमार में ही अपना समय बिताते थे । इस कारण उनकी प्रजा उनसे नाराज़ हो गई और मराठा राज्य का पतन हो गया ।

प्रश्न 6. मैसूर में हैदरअली और टीपू सुल्तान की सफलताओं का वर्णन करो ।
उत्तर-हैदरअली मैसूर का शासक था । उसने यहां का शासन 1761 ई० में मैसूर के एक हिन्दू राजा से प्राप्त किया था। वह एक वीर तथा साहसी व्यक्ति था । वह पक्का देशभक्त था । वह अंग्रेज़ों का घोर शत्रु था और उनकी कूटनीति को खूब समझता था । इसलिए वह इन्हें भारत से बाहर निकालना चाहता था । इस उद्देश्य से उसने अंग्रेजों के साथ दो युद्ध किए । प्रथम युद्ध में तो उसे कुछ सफलता मिली परन्तु दूसरे युद्ध के दौरान उसकी मृत्यु हो गई । परिणामस्वरूप वह अपना उद्देश्य पूरा न कर सका ।

टीपू सुल्तान एक योग्य शासक, कुशल सेनापति और महान् प्रशासक था । टीपू सुल्तान ने एक नवीन कैलेंडर लागू किया और सिक्के ढालने की एक नई प्रणाली आरम्भ की । उसने मापतोल के नये पैमाने भी अपनाए । उसने अपने पुस्तकालय में धर्म, इतिहास, सैन्य विज्ञान, औषधि विज्ञान और गणित आदि विषयों की पुस्तकों का समावेश किया । उसने अपनी सेना को यूरोपीय ढंग से संगठित किया। उसने व्यापार तथा औद्योगिक विकास की ओर पूरा ध्यान दिया । संक्षेप में, उसकी उपलब्धियां अपने युग के अन्य शासकों की तुलना में महान् थीं। .

प्रश्न 7. शिवाजी के राज्य प्रबन्ध की मुख्य विशेषताएं बताएं ।
उत्तर-शिवाजी का राज्य प्रबन्ध प्राचीन हिन्दू नियमों पर आधारित था । शासन के मुखिया वह स्वयं थे । उनकी सहायता तथा परामर्श के लिए 8 मन्त्रियों की राजसभा थी, जिसे अष्ट-प्रधान कहते थे । इसका मुखिया ‘पेशवा’ कहलाता था । प्रत्येक मन्त्री के अधीन अलग-अलग विभाग थे । प्रशासन की सुविधा के लिए राज्य को चार प्रान्तों में बांटा गया था । प्रत्येक प्रान्त एक सूबेदार के अधीन था। प्रान्त परगनों में बंटे हुए थे । शासन की सबसे छोटी इकाई गांव थी । इसका प्रबन्ध ‘पाटिल’ करते थे । शिवाजी के राज्य की आय का सबसे बड़ा साधन भूमिकर था । भूमि-कर के अतिरिक्त चौथ, सरदेशमुखी तथा कुछ अन्य कर भी राज्य की आय के मुख्य साधन थे । न्याय के लिए पंचायतों की व्यवस्था थी। शिवाजी ने एक शक्तिशाली सेना का संगठन भी किया । उन्होंने घुड़सवार सेना भी तैयार की। घुड़सवार सिपाही पहाड़ी प्रदेशों में लड़ने में फुर्तीले होते थे । शिवाजी के पास एक समुद्री बेड़ा भी था ।

प्रश्न 8. चौथ तथा सरदेशमुखी से क्या अभिप्राय था तथा इसका क्या महत्त्व था ?
उत्तर–चौथ तथा सरदेशमुखी दो प्रकार के कर थे । शिवाजी कर निश्चित इलाकों से प्राप्त किया करते थे । उनके प्रभावाधीन दो तरह के क्षेत्र थे-एक वे प्रदेश जो सीधे तौर पर शिवाजी के राज्य में शामिल थे । इन प्रदेशों को स्वराज्यी कहा जाता था । दूसरे प्रकार के प्रदेश इसके चारों ओर के इलाके में फैला था । इसे मुग़लई कहते थे । मुगलई इलाकों से चौथ अथवा लगान का एक चौथाई भाग और सरदेशमुखी अथवा लगान का दसवां भाग तलवार के ज़ोर से वसूल किया जाता था । शिवाजी छत्रपति होने के अतिरिक्त स्वयं को महाराष्ट्र का सरदेशमुख (सबसे बड़ा देशमुख) भी कहलाते थे । अतः लगान का दसवां हिस्सा लेना वे अपना अधिकार समझते थे । चौथ और सरदेशमुखी मराठा शक्ति के चिन्ह भाग बन गए । इनके कारण मराठा शक्ति का क्षेत्र अधिक विस्तृत दिखाई देता था ।

प्रश्न 9. बालाजी विश्वनाथ ने राजा शाहू की स्थिति को सुदृढ़ करने में क्या योगदान दिया ?
उत्तर-बालाजी ने शाहू जी के लिए अनेक कार्य किए । उसने ताराबाई तथा अन्य सरदारों को पराजित करके शाहूजी की स्थिति सुदृढ़ की । अत: शाहूजी ने उसे 1713 ई० में पेशवा नियुक्त किया । पेशवा के रूप में बालाजी ने न केवल मराठा सत्ता को सुदृढ़ किया बल्कि अपने परिवार के लिए पेशवा की गद्दी सदा के लिए सुरक्षित कर ली । बाला जी विश्वनाथ ने मुग़ल राज परिवार के आपसी झगड़ों का लाभ उठाया । उसने 1719 में मुग़लों से एक सन्धि की । इस सन्धि के अनुसार शाहूजी को ‘स्वराज प्रदेशों’ का शासक स्वीकार कर लिया गया और उसे दक्षिण के मुग़ल प्रदेशों से ‘चौथ’ तथा ‘सरदेशमुखी’ वसूल करने का अधिकार भी मिल गया । यह निर्णय भी किया गया कि शाहूजी मुग़लों की सहायता के लिए सेना तैयार रखेंगे जिसमें 15 हज़ार सैनिक होंगे । बालाजी ने शाहूजी की माता तथा मराठा राज-परिवार के अन्य सदस्यों को मुग़ल कैद से छुड़ाने में भी सफलता प्राप्त की । उसने शाहूजी को दक्षिण में मुग़ल शासन का प्रतिनिधि बनवा दिया और ताराबाई की सत्ता का अन्त कर दिया ।

प्रश्न 10. इतिहास में पानीपत के तीसरे युद्ध का क्या महत्त्व है ?
उत्तर- पानीपत का तीसरा युद्ध 1761 ई० में अहमदशाह अब्दाली तथा मराठों के बीच हुआ । अहमदशाह को तो इस युद्ध से कोई विशेष लाभ न हुआ, परन्तु मराठा शक्ति पर इस युद्ध का बहुत बुरा प्रभाव पड़ा । युद्ध में लगभग दो लाख मराठा सैनिक तथा अन्य लोग मारे गए । पेशवा बालाजी बाजीराव इस पराजय के शोक से मर गए । फलस्वरूप भारत में मराठों का अदबा लगभग समाप्त हो गया। बंगाल, बिहार, अवध, पंजाब और मैसूर में उनकी सत्ता समाप्त हो गई । पेशवा पद का महत्त्व इतना कम हो गया कि मराठा सरदार अपनी मनमानी करने लगे । मराठों की इस कमज़ोरी का लाभ अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजी सत्ता को पहुँचा ।

प्रश्न 11. प्रमुख मराठा सरदार तथा उनके राज्य क्षेत्र कौन-से थे ?
उत्तर-मराठा राज्य में बड़े-बड़े मराठा सरदारों ने अपने राज्य क्षेत्र अलग-अलग स्थापित किए हुए थे । ज्यों-ज्यों पेशवा की शक्ति बढ़ी त्यों-त्यों मराठा सरदारों का अधिकार क्षेत्र भी बढ़ा । पानीपत के युद्ध से पूर्व ही पांच अलग-अलग मराठा राज्य क्षेत्र अस्तित्व में आ चुके थे । पूना से पेशवा स्वयं महाराष्ट्र पर शासन करता था । गुजरात में गायकवाड़ सरदार प्रधान थे। उनकी राजधानी बड़ौदा थी। उड़ीसा को मिलाकर मध्य भारत पर भौंसला सरदारों का शासन था । उनकी राजधानी नागपुर थी। मालवा में होल्कर सरदार इन्दौर से शासन करते थे। इसी तरह बुन्देलखण्ड में ग्वालियर से शिंडे सरदार राज्य करते थे। पानीपत के युद्ध के पश्चात् कुछ सरदारों ने नए पेशवा माधोराव का विरोध करना आरम्भ कर दिया । परन्तु महादजी शिंडे की सहायता से उसकी स्थिति बनी रही। 1772 में माधोराव की मृत्यु के पश्चात् पेशवा की ओर से नाना फड़नवीस ने 1800 तक मराठा सरदारों को एक सूत्र में बांधे रखा। बाद में मराठा सरदारों की नई पीढ़ियां लगभग स्वतन्त्र हो गईं ।

IV. निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. (क) शिवाजी के नेतृत्व में मराठों के उत्थान का वर्णन कीजिए ।(ख) मराठों की शक्ति को रोकने के लिए औरंगजेब को किस सीमा तक सफलता मिली ? .
अथवा शिवाजी की विजयों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-(क) शिवाजी के नेतृत्व में मराठों का उत्थान-शिवाजी एक महान् मराठा सरदार थे । उन्होंने मराठों को एक सूत्र में बांधने के अनेक प्रयत्न किए । सबसे पहले उन्होंने बिखरी हुई मराठा शक्ति को संगठित करके एक विशाल सेना तैयार की । 1646 ई० में उन्होंने अपना विजय-अभियान आरम्भ किया ।
विजयें-शिवाजी की पहली विजय तोरण दुर्ग पर थी । इसके बाद उन्होंने चाकन, सिंहगढ़, पुरन्धर तथा कोंकण के दुर्ग पर अपना अधिकार जमा लिया । उन्होंने जावली के सरदार चन्दराव को मरवा कर जावली को भी अपने अधिकार में ले लिया । शिवाजी की बढ़ती हुई शक्ति को देखकर बीजापुर का सुल्तान चिन्ता में पड़ गया । उसने शिवाजी के विरुद्ध अपने सेनापति अफज़ल खां को भेजा। अफज़ल खां ने धोखे से शिवाजी को मारने का प्रयत्न किया । परन्तु इस प्रयास में वह स्वयं मारा गया । अब शिवाजी ने मुग़ल प्रदेशों में लूट-मार आरम्भ कर दी जिससे मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब को चिन्ता हुई । अतः 1660 ई० में उसने दक्षिण के सूबेदार शाइस्ता खां को शिवाजी के विरुद्ध भेजा । वह बढ़ता हुआ पूना तक जा पहुंचा । परन्तु शिवाजी ने उसे वहां से भागने पर विवश कर दिया ।

अब शिवाजी ने सूरत के समृद्ध नगर पर आक्रमण कर दिया और वहां खूब लूट-मार की । इससे औरंगजेब की चिन्ता और बढ़ गई। उसने राजा जयसिंह तथा दिलेर खां को शिवाजी के विरुद्ध भेजा । उनके नेतृत्व में मुग़ल सेनाओं ने मराठों के अनेक किले जीत लिए । विवश होकर शिवाजी ने मुगलों के साथ सन्धि कर ली । सन्धि के बाद शिवाजी आगरा में मुग़लदरबार में पहुंचे । वहां उन्हें बन्दी बना लिया गया । परन्तु शिवाजी बड़ी चालाकी से मुग़लों की कैद से बच निकले । 1674 ई० में उन्होंने रायगढ़ में अपना राज्याभिषेक किया। इस अवसर पर उन्होंने छत्रपति की उपाधि भी धारण की । राज्याभिषेक के पश्चात् उन्होंने कर्नाटक के समृद्ध प्रदेशों जिंजी और वैलोर पर भी अपना अधिकार कर लिया । इस तरह वह दक्षिणी भारत में एक स्वतन्त्र मराठा राज्य स्थापित करने में सफल हुए।

(ख) औरंगज़ेब द्वारा मराठा शक्ति को रोकने के उपाय-औरंगज़ेब ने मराठा शक्ति को दबाने के अनेक कार्य किए–

  • सबसे पहले उसने 1660 ई० में दक्षिण के सूबेदार शाइस्ता खां को शिवाजी के विरुद्ध भेजा। वह बढ़ता हुआ पूना जा पहुंचा। परन्तु उसे वहां से भागने पर विवश कर दिया।
  • शाइस्ता खां की पराजय के पश्चात् औरंगज़ेब ने राजा जयसिंह को शिवाजी के विरुद्ध भेजा । उसने मराठों के अनेक किले जीत लिए । विवश हो कर शिवाजी ने मुग़लों के साथ सन्धि कर ली । सन्धि के बाद वह आगरा में मुग़ल दरबार में पहुंचे जहां उन्हें बन्दी बना लिया गया परन्तु शिवाजी बड़ी चालाकी से मुग़लों की कैद से भाग गए।
  • 1689 ई० में औरंगज़ेब नए मराठा शासक शम्भाजी को बन्दी बनाने में सफल हो गया और उसका वध कर दिया।
  • शम्भा जी के वध के पश्चात् औरंगज़ेब ने उसके पुत्र शाहूजी को भी कैद कर लिया। उसे पूरी तरह विलासी बना दिया गया ताकि वह शासन करने के योग्य न रहे।
  • शाहूजी के पश्चात् शिवाजी के दूसरे पुत्र राजा राम ने मुग़लों से संघर्ष किया । उसने मुग़लों के अनेक दुर्ग जीत लिए । उसकी विजयों को देखते हुए औरंगजेब ने मराठों के साथ सन्धि कर ली।
  • राजाराम की 1707 ई० में मृत्यु हो गई और उसकी विधवा ताराबाई ने बड़ी कुशलता से मराठों का नेतृत्व किया। औरंगजेब ने उसकी शक्ति को कुचलने का काफ़ी प्रयास किया, परन्तु असफल रहा । 1707 ई० में औरंगजेब की मृत्यु हो गई।

प्रश्न 2. शिवाजी की शासन व्यवस्था का वर्णन कीजिए ।
अथवा
शिवाजी के असैनिक तथा सैनिक शासन प्रबंध की अलग-अलग चर्चा कीजिए।
उत्तर-शिवाजी ने एक उच्च कोटि के शासन प्रबन्ध की व्यवस्था की। उनके शासन-प्रबन्ध की रूप-रेखा इस प्रकार थी –

असैनिक प्रबन्ध-

  • केन्द्रीय शासन–केन्द्रीय शासन का मुखिया छत्रपति (शिवाजी) था । राज्य की सभी शक्तियां उसके हाथ में थीं । छत्रपति को शासन-कार्यों में सलाह देने के लिए आठ मन्त्रियों का एक मन्त्रिमण्डल था । इसे अष्ट-प्रधान कहते थे । प्रत्येक मन्त्री के अधीन एक विभाग होता था ।।
  • प्रान्तीय शासन-शिवाजी ने अपने राज्य को तीन प्रान्तों में बांटा हुआ था । प्रत्येक प्रान्त एक सूबेदार के अधीन था। प्रान्त आगे चलकर परगनों तथा तर्कों में बंटे हुए थे । शासन की सबसे छोटी इकाई गांव थी ।
  • न्याय-प्रणाली-शिवाजी की न्याय-प्रणाली बड़ी साधारण थी, परन्तु यह लोगों की आवश्यकता के अनुरूप थी । मुकद्दमों का निर्णय प्रायः हिन्दू धर्म की प्राचीन परम्पराओं के अनुसार ही किया जाता था ।
  • कर प्रणाली-शिवाजी ने राज्य की आय को बढ़ाने के लिए कृषि को विशेष प्रोत्साहन दिया । सारी भूमि की पैमाइश करवाई गई और उपज का 2/5 भाग ‘भूमि-कर’ निश्चित किया गया । यह कर नकद अथवा उपज दोनों रूप में दिया जा सकता था। भूमि-कर के अतिरिक्त चौथ तथा सरदेशमुखी नामक कर भी राज्य की आय के महत्त्वपूर्ण स्रोत थे ।

सैनिक प्रबन्ध-

शिवाजी ने एक शक्तिशाली सेना का संगठन किया । इसके प्रमुख अंगों तथा विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार है

  • घुड़सवार सेना-घुड़सवार सैनिक शिवाजी की सेना का महत्त्वपूर्ण अंग थे । उनकी सेना में घुड़सवारों की संख्या लगभग 45,000 थी । इस सेना को ‘पागा’ कहा जाता था । पागा कई टुकड़ियों में बंटी हुई थी । सबसे छोटी टुकड़ी 25 सैनिकों की होती थी, जिसके मुखिया को ‘हवलदार’ कहा जाता था । घुड़सवार सेना का सबसे बड़ा अधिकारी ‘पांच हज़ारी’ कहलाता था ।
  • पैदल सेना-शिवाजी की पैदल सेना में लगभग 10,000 सैनिक थे । यह भी कई टुकड़ियों में विभक्त थे । सबसे छोटी टुकड़ी 9 सैनिकों की होती थी । इसके मुखिया को ‘नायक’ कहते थे । पैदल सेना का सबसे बड़ा अधिकारी ‘सरए-नौबत’ कहलाता था ।
  • हाथी सेना-शिवाजी की सेना में हाथी भी सम्मिलित थे । हाथियों की संख्या लगभग 1,260 थी ।
  • जल सेना-शिवाजी ने जल सेना की व्यवस्था भी की हुई थी । इस सेना में कुल 200 जल सैनिक थे । उसके पास एक जहाज़ी बेड़ा भी था ।।
  • तोपखाना-तोपखाना शिवाजी की सेना का विशेष अंग था ।
  • दुर्ग अथवा किले-शिवाजी के राज्य में किलों की संख्या 280 थी । संकट के समय मराठा सैनिक इन्हीं किलों में रहते थे । शिवाजी ने इन किलों का प्रबन्ध भी बड़े अच्छे ढंग से किया हुआ था ।