Class 11 Political Science Solutions Chapter 8 न्याय

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. न्याय से आप क्या समझते हैं ? इसके आधारभूत तत्त्वों का उल्लेख करो। (What do you understand by Justice ? Explain its basic postulates.)
उत्तर-राजनीति विज्ञान में न्याय का विशेष महत्त्व है। न्याय का अस्तित्व उतना ही प्राचीन है, जितना कि मानव समाज का। प्रत्येक युग में समाज में ‘न्याय’ की मांग रही है। इतिहास में न्याय की अनेक प्रकार से व्याख्या की गई है। भारतीय चिन्तन में ‘न्याय’ को धर्म का पर्यायवाची माना गया है। प्लेटो ने ‘न्याय’ के सिद्धान्त की विस्तार से चर्चा की है। प्लेटो ने न्याय को आध्यात्मिक तथा सत्यता का रूप दिया। एबेन्सटीन (Ebenstein) के अनुसार, “प्लेटो के न्याय-सम्बन्धी विवेचन में उसके राजनीतिक दर्शन के समस्त तत्त्व शामिल थे।” अनेक विद्वानों ने समयानुसार न्याय का अर्थ एवं परिभाषा दी है।

न्याय का अर्थ एवं परिभाषाएं (Meaning and Definitions of Justice)-न्याय को अंग्रेज़ी में Justice कहते हैं। Justice शब्द लैटिन भाषा के शब्द Jus से बना है जिसका अर्थ होता है बन्धन या बान्धना (Bond or Tie)। इसका अभिप्राय यह है कि ‘न्याय’ उस व्यवस्था का नाम है जिसके द्वारा एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से जुड़ा हुआ है। न्याय की परिभाषा का इस बात से सम्बन्ध है कि एक व्यक्ति के दूसरे के साथ नैतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा कानूनी सम्बन्ध क्या हैं ? आधुनिक न्यायशास्त्र में न्याय का अर्थ सामाजिक जीवन की उस अवस्था से है जिसमें वैयक्तिक अधिकारों का सामाजिक कल्याण के साथ समन्वय स्थापित किया गया हो। न्याय की मुख्य परिभाषाएं निम्नलिखित हैं

  • प्लेटो (Plato) के अनुसार, “न्याय वह गुण है जो अन्य गणों के मध्य सामंजस्य स्थापित करता है।”
  • जे० एस० मिल (J.S. Mill) के अनुसार, “न्याय उन नैतिक नियमों का नाम है जो मानव-कल्याण की धारणाओं से सम्बन्धित हैं और इसलिए जीवन के पथ-प्रदर्शन के लिए किसी भी अन्य नियम से महत्त्वपूर्ण कर्त्तव्य हैं।”
  • बैन तथा पीटर्स (Bennand Peters) के अनुसार, “न्यायपूर्वक कार्य करने का अर्थ यह है कि जब तक भेदभाव किए जाने का कोई उचित कारण न हो, तब तक सभी व्यक्तियों से एक-सा व्यवहार किया जाए।” (“To act justly, then is to treat all men alike except where there are relevant differences between them.”)
  • सालमण्ड (Salmond) के अनुसार, “न्याय का अर्थ है, प्रत्येक व्यक्ति को उसका भाग प्रदान करना।”
  • लॉस्की (Laski) के शब्दों में, “न्याय का अर्थ व्यक्ति को उसका देय (Due) प्रदान करना है जो कि उसकी क्षमता तथा योग्यता और राज्य के स्थायित्व विकास अथवा महानता के स्थापन में उसके योगदान के अनुरूप हैं।”
  • सेबाइन (Sabine) के अनुसार, “न्याय एक ऐसी कड़ी है जो व्यक्तियों को समरूप समाज के रूप में एकत्रित करती है।”
  • प्रो० मेरियम (Merriam) ने कहा है कि “न्याय मान्यताओं और प्रक्रियाओं की वह प्रणाली है जिसके माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति को वे सभी अधिकार व सुविधाएं दी जाती हैं जिन्हें समाज उचित मानता हो।”

मेरियम की न्याय की परिभाषा निम्नलिखित चार बातों पर प्रकाश डालती है-

  1. प्रथम, न्याय का सम्बन्ध समाज की नैतिक मान्यताओं और मूल्यों से होता है।
  2. द्वितीय, न्याय का सम्बन्ध क्रियाविधियों (Procedures) से भी है। न्याय की प्राप्ति के लिए कानून और न्यायालयों की स्थापना की जाती है।
  3. तृतीय, न्याय का उद्देश्य मनुष्यों के लिए अधिकार और सुविधाएं जुटाना है।
  4. चौथे, एक ही समय पर एक समाज के विभिन्न वर्गों में उचित अधिकार और सुविधाओं की धारणाएं भी भिन्न हो सकती हैं।

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि न्याय ऐसी व्यवस्था है जिसमें एक व्यवस्थित और अनुशासित जीवन व्यतीत करने तथा उन कर्त्तव्यों का पालन करने की मांग की जाती है जो उस व्यवस्था के अनुसार उचित हों।

न्याय के आधारभूत तत्त्व (Fundamental Postulates of Justice)-

यद्यपि न्याय का महत्त्व प्रत्येक युग में रहा है तथापि न्याय का रूप प्रत्येक युग में अलग रहा है। न्याय का रूप स्थान, परिस्थितियां, समाज के ढांचे और राजनीतिक व्यवस्था पर निर्भर करता है। परन्तु कुछ ऐसे तत्त्व हैं जो न्याय की सभी धारणाओं में विद्यमान हैं और इन तत्त्वों को न्याय के आधारभूत तत्त्व कहा जा सकता है। ऑर्नाल्ड बैचट (Arnold Brecht) ने न्याय के निम्नलिखित आधारभूत तत्त्वों का वर्णन किया है-

  • सत्य (Truth)-सत्य न्याय का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। सत्य का अर्थ है घटना का ज्यों का त्यों प्रस्तुतीकरण करना। वस्तुनिष्ठ रूप कथन (Objective Sense) में न्याय की मांग है कि तथ्य और सम्बन्ध विषयक अपने सभी कथनों में हम सत्य का प्रयोग करें। न्यायालयों में तथ्यों की सत्यता का विशेष महत्त्व है।
  • मूल्यों के आधारभूतक्रम की सामान्यता (Generality of the Systems of Value)-इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक मामले में न्याय की एक ही धारणा लागू की जानी चाहिए। अलग-अलग मामलों में न्याय की विभिन्न धारणाओं को लागू करना उचित नहीं है।
  • कानून के समक्ष समानता (Equality before Law)-कानून के समक्ष सभी नागरिक समान होने चाहिएं। नागरिकों के साथ जाति, धर्म, रंग, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। सभी नागरिकों को उन्नति तथा विकास के समान अवसर प्राप्त होने चाहिए।
  • स्वतन्त्रता (Freedom)-न्याय और स्वतन्त्रता में घनिष्ठ सम्बन्ध है। उदारवादियों का विचार है कि स्वच्छन्द वातावरण में ही मनुष्य न्याय प्राप्त कर सकता है। स्वतन्त्रता पर अनुचित प्रतिबन्ध लगाना अन्याय है। सामाजिक हित और राष्ट्र हित के लिए ही स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध होने चाहिएं।
  • प्रकृति की अनिवार्यताओं के प्रति सम्मान-जो कार्य व्यक्ति की सामर्थ्य से बाहर हैं और जो कार्य प्रकृति की ओर से व्यक्ति के लिए असम्भव हैं, उन्हें करने के लिए व्यक्ति को मज़बूर करना न्याय की भावना के विरुद्ध है। उदाहरण के लिए किसी बीमार या बूढ़े व्यक्ति से भारी शारीरिक काम लेना अन्याय है।

स्थानीय, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय सभी क्षेत्रों में न्याय प्राप्त करने के लिए उपयुक्त पांच आधारभूत तत्त्वों का पालन करना आवश्यक है।

प्रश्न 2. सामाजिक न्याय का अर्थ और महत्त्व का वर्णन करें।
(Discuss the meaning and importance of Social Justice.)
अथवा
सामाजिक न्याय क्या है ? सामाजिक न्याय को प्राप्त करने के लिए किन तत्त्वों का होना आवश्यक है ?
(What is Social Justice ? What conditions are required for Social Justice ?)
उत्तर-आधुनिक युग में सामाजिक न्याय का विचार बहुत लोकप्रिय है और सामाजिक न्याय पर बल देने के कारण ही विश्व के करोड़ों लोगों ने समाजवाद या मार्क्सवाद को अपनाया है। पं० नेहरू ने एक बार कहा था कि

3. जाति प्रथा का अन्त (End of Caste System)-संसार के अधिकांश देशों में जाति-प्रथा पाई जाती है और एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से घृणा करते हैं। उच्च जाति के लोग छोटी जाति के लोगों से मिलना-जुलना पसन्द नहीं करते और जाति के आधार पर लोगों में भेदभाव किया जाता है। भारत में हरिजनों के साथ भेदभाव किया जाता है। सामाजिक न्याय की प्राप्ति के लिए जाति-प्रथा को समाप्त करना आवश्यक है।

4. पिछड़े वर्ग के लोगों को विशेष सुविधाएं (Special Privileges to the Backward Sections of Society)-सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए आवश्यक है कि पिछड़े वर्ग के लोगों का विकास करने के लिए कुछ विशेष सुविधाएं प्रदान की जाएं। परन्तु ये विशेष सुविधाएं कुछ समय के लिए होनी चाहिएं, न कि स्थायी तौर पर। इन विशेष सुविधाओं को देने का उद्देश्य यह होता है कि पिछड़े वर्ग के लोग इन विशेष सुविधाओं के आधार पर अपना विकास कर दूसरे उन्नत वर्गों के लोगों के समान विकास कर सकें। भारत में अनुसूचित जातियों और पिछड़े कबीलों के लोगों को संविधान के अन्तर्गत कई विशेष सुविधाएं प्रदान की गई हैं।

5. समान अधिकार (Equal Rights)—सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए यह आवश्यक है कि सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त होने चाहिएं । अधिकार किसी विशेष वर्ग की निजी सम्पत्ति नहीं होनी चाहिए। सभी लोगों को बिना किसी भेदभाव के समान अधिकार प्राप्त होने चाहिएं। यदि किसी वर्ग अथवा व्यक्ति को रंग, जाति, वंश, धर्म और लिंग आदि के आधार पर अधिकारों से वंचित किया जाता है, वहां पर सामाजिक न्याय नहीं हो सकता है।

6. लोकतान्त्रिक प्रणाली (Democratic System)-सामाजिक न्याय की स्थापना लोकतान्त्रिक प्रणाली में ही की जा सकती है। लोकतान्त्रिक प्रणाली में सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए जाते हैं और किसी वर्ग अथवा व्यक्ति को विशेष अधिकार प्राप्त नहीं होते हैं । लोकतान्त्रिक प्रणाली में निश्चित अवधि के पश्चात् चुनाव होते हैं और सभी नागरिक बिना किसी भेदभाव के चुनाव में भाग लेते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. न्याय क्या है ?
उत्तर-न्याय को अंग्रेज़ी में Justice कहते हैं। Justice शब्द लैटिन भाषा के शब्द Jus’ से बना है जिसका अर्थ होता है-बन्ध या बांधना। इसका अभिप्राय यह है कि न्याय उस व्यवस्था का नाम है जिसके द्वारा एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से जुड़ा हुआ है। न्याय की भाषा का इस बात से सम्बन्ध है कि एक व्यक्ति के दूसरे के साथ नैतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा कानूनी सम्बन्ध क्या हैं। प्रो० मेरियम ने कहा है कि, “न्याय मान्यताओं और प्रक्रियाओं की वह प्रणाली है जिसके माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति को वे सभी अधिकार व सुविधाएं दी जाती हैं जिन्हें समाज उचित मानता है।” प्लेटो के अनुसार, “न्याय वह गुण है जो अन्य गुणों के मध्य सामंजस्य स्थापित करता है।” आधुनिक न्यायशास्त्र में न्याय का अर्थ सामाजिक जीवन की उस व्यवस्था से है, जिसमें वैयक्तिक अधिकारों का सामाजिक कल्याण के साथ समन्वय स्थापित किया गया है।

प्रश्न 2. न्याय के मूलभूत तत्त्वों का वर्णन करें।
अथवा
न्याय के किन्हीं दो आधारों का वर्णन करो।
उत्तर-ऑर्नाल्ड ब्रेचट (Arnold Brecht) ने न्याय के निम्नलिखित आधारभूत तत्त्वों का वर्णन किया है

  • सत्य-सत्य न्याय का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। सत्य का अर्थ है घटना का ज्यों-का-त्यों प्रस्तुतीकरण करना। वस्तुनिष्ठ रूप कथन (Objective Sense) में न्याय की मांग है कि तथ्य और सम्बन्ध विषयक अपने कभी कथनों में हम सत्य का प्रयोग करें। न्यायालयों में तथ्यों की सत्यता का विशेष महत्त्व है।
  • मूल्यों के आधारभूत क्रम की मान्यता- इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक मामले में न्याय की एक ही धारणा लाग की जानी चाहिए। अलग-अलग मामलों में न्याय की विभिन्न धारणों को लागू करना उचित नहीं है।
  • कानून के समक्ष समानता-कानून के समक्ष सभी नागरिक समान होने चाहिएं। नागरिकों के साथ जाति, धर्म, रंग, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। सभी नागरिकों को उन्नति तथा विकास के समान अवसर प्राप्त होने चाहिए।
  • स्वतन्त्रता-न्याय और स्वतन्त्रता में घनिष्ठ सम्बन्ध है। उदारवादियों का विचार है कि स्वच्छन्द वातावरण में ही मनुष्य न्याय प्राप्त कर सकता है। स्वतन्त्रता पर अनुचित प्रतिबन्ध लगाना अन्याय है। सामाजिक हित और राष्ट्र हित के लिए ही स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध होने चाहिए।

प्रश्न 3. न्याय के दो आयामों (Dimension) का वर्णन कीजिए।
उत्तर-1. न्याय का कानूनी पक्ष-न्याय के कानूनी पक्ष का अर्थ है कि न्याय कानून के अनुसार होना चाहिए। कानून के अनुसार न्याय का अभिप्राय यह है कि कानून को न्यायपूर्ण तरीके से लागू किया जाए। कानूनी न्याय के इस अर्थ की व्याख्या करते हुए मोरिस गिन्ज़बर्ग का कहना है कि, “एक वैधानिक व्यवस्था की धारणा का यह अर्थ है कि निर्णय मनमानी से नहीं अपितु साधारण नियमों के अनुसार किए जाएंगे और उन साधारण नियमों के अधीन आने वाले अभियोगों की श्रेणी निश्चित कर ली जाएगी और उन नियमों पर न्यायाधीश के वैयक्तिक प्रतिक्रमों का कोई प्रभाव नहीं होगा। अत: न्याय प्रचलित कानूनों के अनुसार होगा।” कानूनी न्याय राज्य में कानून द्वारा स्थापित सिद्धान्त व प्रक्रिया से सम्बन्धित है।

2. न्याय का सामाजिक पक्ष-न्याय के सामाजिक पक्ष को सीमित तथा व्यापक अर्थ में लिया जा सकता है। सीमित अर्थ में सामाजिक न्याय का अर्थ यह है कि व्यक्ति के व्यक्तिगत सम्बन्धों में व्याप्त अन्याय का सुधार हो। व्यापक अर्थ में सामाजिक न्याय का अर्थ है कि व्यक्तियों में राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक जीवन में असन्तुलनों को दूर किया जाए। मनुष्यों के साथ जाति, धर्म, रंग, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, सामाजिक समानता सामाजिक न्याय का आधार है।

प्रश्न 4. न्याय के राजनीतिक पक्ष का वर्णन करो।
उत्तर-न्याय के राजनीतिक पक्ष का अर्थ यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के राजनीतिक अधिकार प्राप्त होने चाहिए। उसके साथ धर्म, भाषा, जाति, वंश, लिंग आदि के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को ऊंचे से ऊंचा राजनीतिक पद प्राप्त करने के लिए समान अवसर प्राप्त होने चाहिएं। वोट का अधिकार, चुने जाने का अधिकार, प्रार्थना-पत्र देने का अधिकार सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के समान रूप से प्राप्त होने चाहिएं। राजनीतिक न्याय की प्राप्ति के लिए निम्नलिखित व्यवस्थाओं का होना आवश्यक है-

  • राजनीतिक प्रणाली,
  • राजनीतिक अधिकारों की व्यवस्था,
  • राजनीतिक अधिकारों की सुरक्षा,
  • राजनीतिक दलों के निर्माण की आज्ञा,
  • अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा,
  • कमजोर वर्गों के विकास के लिए विशेष सुविधाओं का प्रबन्ध है।

प्रश्न 5. ‘सामाजिक न्याय’ का अर्थ क्या है ?
उत्तर-सामाजिक न्याय का अर्थ है कि समाज में रहने वाले सभी व्यक्ति समान हैं और मनुष्य के परस्पर सामाजिक सम्बन्धों में किसी प्रकार का भेदभाव न हो। मनुष्यों के साथ जाति, धर्म, रंग, लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। सामाजिक समानता सामाजिक न्याय का आधार है। सभी नागरिकों को अधिकार एवं स्वतन्त्रताएं समान रूप से प्राप्त होनी चाहिएं। सार्वजनिक स्थानों, धार्मिक स्थानों तथा मनोरंजन के स्थानों को प्रयोग करने की सभी व्यक्तियों को समान सुविधा होनी चाहिए। राज्य को रंग, भेद तथा छुआछूत की नीति का पालन नहीं करना चाहिए। एक मनुष्य का अन्य मनुष्यों द्वारा शोषण नहीं होना चाहिए। अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा होनी चाहिए।

प्रश्न 6. सामाजिक न्याय से आप क्या समझते हैं ? सामाजिक न्याय का क्या महत्त्व है ? उत्तर-सामाजिक न्याय का अर्थ- इसके लिए प्रश्न नं० 5 देखिए।
सामाजिक न्याय का महत्त्व-प्रत्येक समाज के लिए सामाजिक न्याय का विशिष्ट महत्त्व होता है। सामाजिक न्याय के लिए ही विश्व के विभिन्न समाजों में अनेक प्रकार की व्यवस्थाएं अपनाई गई हैं। यदि किसी समाज में जाति, धर्म, वर्ग, लिंग, नस्ल या अन्य किसी आधार पर लोगों में आपसी भेदभाव पाया जाता है तो ऐसा समाज प्रगति नहीं कर सकता। मानवता के कल्याण, सामाजिक सौहार्द और राष्ट्र निर्माण के लिए आवश्यक है कि समाज में सभी व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए और सभी को अपने व्यक्तित्व के विकास के बराबर अवसर मिलने चाहिएं। अत: सामाजिक न्याय के बिना एक सभ्य समाज की कल्पना करना व्यर्थ है।

प्रश्न 7. सामाजिक न्याय की प्राप्ति के लिए चार साधन बताइए।
उत्तर-

  • कानून के समक्ष समानता-सामाजिक न्याय की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि सभी व्यक्ति कानून के सामने बिना किसी भेदभाव के समान होने चाहिएं।
  • विशेषाधिकारों का अभाव-सामाजिक न्याय की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि समाज के किसी वर्ग को अथवा व्यक्ति को रंग, जन्म, वंश, जाति, लिंग आदि के आधार पर विशेषाधिकार प्राप्त नहीं होने चाहिएं।
  • जाति प्रथा का अन्त–अधिकांश देशों में जाति प्रथा पाई जाती है और एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से घृणा करते हैं। सामाजिक न्याय की प्राप्ति के लिए जाति प्रथा को समाप्त करना आवश्यक है।
  • पिछड़े वर्ग के लोगों को विशेष सुविधाएं-सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए आवश्यक है कि पिछड़े वर्ग के लोगों को विकास करने के लिए कुछ विशेष सुविधाएं प्रदान की जाएं।

प्रश्न 8. भारत में अपने नागरिकों को सामाजिक न्याय सुलभ कराने के लिए जो व्यवस्थाएं की हैं उनमें से किन्हीं चार का वर्णन करें।
उत्तर- भारत में सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए संविधान में निम्नलिखित व्यवस्थाएं की गई हैं-

  • अनुच्छेद 14 के अनुसार कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं और किसी भी नागरिक को विशेषाधिकार प्राप्त नहीं हैं।
  • अनुच्छेद 15 के अनुसार राज्य किसी भी नागरिक के साथ धर्म, वंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान इत्यादि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा। सार्वजनिक दुकानों, भोजनालयों, होटलों तथा मनोरंजन आदि के साधनों का प्रयोग सभी नागरिक कर सकते हैं।
  • अनुच्छेद 17 के अनुसार छुआछूत को समाप्त कर दिया गया है।
  • अनुच्छेद 18 के अन्तर्गत उपाधियों को समाप्त कर दिया गया है।

प्रश्न 9. आर्थिक न्याय से आप क्या समझते हैं ? आर्थिक न्याय की प्राप्ति के दो साधन बताएं।
अथवा
न्याय के आर्थिक पक्ष का वर्णन करो।
उत्तर-आर्थिक न्याय का अर्थ यह है कि देश के भौतिक साधनों का उचित बंटवारा हो तथा अधिक-से-अधिक लोगों के हित में उनका उपयोग हो सके। नागरिकों को धन प्राप्त करने तथा जीवन में उसका प्रयोग करने के समान अवसर प्राप्त होने चाहिएं। जो व्यक्ति वृद्ध हों, असहाय हों तथा काम न कर सकते हों, समाज को उनकी आर्थिक सहायता करनी चाहिए।

आर्थिक न्याय की प्राप्ति के लिए निम्नलिखित व्यवस्थाओं का होना आवश्यक है-

  • आर्थिक सुरक्षा-आर्थिक न्याय की स्थापना के लिए यह आवश्यक है कि राज्य लोगों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करे। नागरिकों को वृद्धावस्था में, बीमारी की अवस्था में और पूर्ण या आंशिक अक्षमता या रोटी कमाने वाले की मृत्यु की स्थिति में राज्य की ओर से आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए। श्रमिकों को बीमारी की हालत में वेतन सहित छुट्टी मिलनी चाहिए और अंगहीन होने पर शेष आयु के लिए पेंशन मिलनी चाहिए। रिटायर होने के पश्चात् पेंशन मिलनी चाहिए और वृद्धावस्था में सभी को पेंशन मिलनी चाहिए।
  • आर्थिक असमानताओं को कम करना-आर्थिक न्याय की स्थापना के लिए यह आवश्यक है कि आर्थिक असमानताओं को कम किया जाए। जब तक समाज में बड़े-बड़े पूंजीपति और अमीर लोग होंगे तथा दूसरी ओर ग़रीब जनता होगी, तब तक आर्थिक न्याय की स्थापना नहीं की जा सकती है।

प्रश्न 10. आर्थिक न्याय के महत्त्वपूर्ण तत्त्व बताओ।
उत्तर-

  • सभी नागरिकों की मूल आवश्यकताएं पूरी होनी चाहिएं।
  • प्रत्येक व्यक्ति को आजीविका के साधन उपलब्ध होने चाहिएं और व्यक्ति को अपने काम के लिए उचित मज़दूरी मिलनी चाहिए। किसी विशेष का शोषण नहीं होना चाहिए।
  • आर्थिक न्याय का यह भी अर्थ है कि विशेष परिस्थितियों में राजकीय सहायता प्राप्त करने का अधिकार हो। बुढ़ापे, बेरोज़गारी तथा असमर्थता की स्थिति में राज्य सामाजिक एवं आर्थिक संरक्षण प्रदान करे।
  • स्त्रियों और पुरुषों को समान कार्य के लिए समान वेतन मिलना चाहिए। (5) सम्पत्ति और उत्पादन के साधनों के नियन्त्रण के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद पाया जाता है।

प्रश्न 11. न्याय के चार प्रकारों का वर्णन करो।
उत्तर-

  1. प्राकृतिक न्याय-जो न्याय प्राकृतिक नियमों तथा तर्क पर आधारित हो, उसे प्राकृतिक न्याय कहा जाता है। यदि किसी व्यक्ति को बगैर अपना पक्ष पेश किये दण्ड दे दिया जाए, तो न्यायालय उसे प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध मानकर रद्द कर देते हैं।
  2. सामाजिक न्याय-न्याय का एक और प्रकार सामाजिक न्याय है, जिसका लक्ष्य समाज में व्याप्त असमानताओं, भेदभाव तथा अन्याय को मिटाना है।
  3. राजनीतिक न्याय-न्याय के राजनीतिक रूप के अन्तर्गत प्रत्येक नागरिक को मत डालने, चुनाव लड़ने तथा किसी भी सार्वजनिक पद को प्राप्त करने की स्वतन्त्रता होती है।
  4. आर्थिक न्याय–सभी लोगों को काम मिलना, काम के अधिक-से-अधिक घण्टे तथा न्यूनतम मजदूरी निश्चित करना, आर्थिक विषमताओं को दूर करना तथा आर्थिक शोषण से मुक्ति, ये सभी आर्थिक न्याय से सम्बन्धित हैं।

प्रश्न 12. लोकतन्त्र में न्याय का क्या महत्त्व है ? स्पष्ट करें।
उत्तर-

  • इससे जहां व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है वहां वह समाज के विकास में भी सहायक होता है।
  • न्याय का महत्त्व इस बात में भी है कि समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों में एकता स्थापित होती है जो राष्ट्रों की एकता के लिए बहुत आवश्यक है।
  • न्याय द्वारा समाज में पिछड़े हुए वर्ग को विकास के अवसर प्रदान किए जाते हैं जिससे कि वे दूसरों के समान स्तर पर आ जाएं।
  • न्याय लोकतन्त्र के लिए बहुत आवश्यक है। लोकतन्त्र में यह आवश्यक है कि समाज के सभी लोग देश के शासन में सक्रिय भाग लें। न्याय के बिना यह सम्भव नहीं हो सकता।
  • न्याय का एक महत्त्व यह भी है कि समाज में प्रचलित छुआछूत जैसी बुराइयां इसी की स्थापना से दूर हो जाती हैं।

प्रश्न 13. सामाजिक न्याय तथा आर्थिक न्याय के सम्बन्धों का वर्णन करें।
उत्तर-सामाजिक न्याय तथा आर्थिक न्याय में गहरा सम्बन्ध है। एक के बिना दूसरी धारणा की प्रासंगिकता समाप्त हो जाती है। यदि समाज में सभी लोगों को आर्थिक विकास के समान अवसर प्रदान किये जाते हैं, तो इससे सामाजिक न्याय की स्थापना में सहायता मिलेगी। वर्तमान समय में अधिकांश राज्य किसी तरह के सामाजिक भेदभाव के बिना सभी लोगों को व्यवसाय उपलब्ध करवाने की कोशिश करता है। समाज में आर्थिक रूप से सम्पन्न व्यक्तियों को इज्जत की नज़र से देखा जाता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि सामाजिक न्याय एवं आर्थिक न्याय में गहरा सम्बन्ध है।

प्रश्न 14. सामाजिक न्याय की विशेषताओं का वर्णन करो।
उत्तर-

  • सामाजिक न्याय सभी व्यक्तियों को सामाजिक क्षेत्र में समान अवसर प्रदान करता है।
  • सामाजिक न्याय प्रत्येक व्यक्ति में निहित गुणों का विकास करता है।
  • सामाजिक न्याय सभी क्षेत्रों में पाये जाने वाले असन्तुलन को दूर करता है।
  • सामाजिक न्याय के अन्तर्गत किसी भी व्यक्ति से जाति, धर्म, भाषा, लिंग एवं क्षेत्र के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता है।
  • सामाजिक न्याय एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति के शोषण को रोकता है।

प्रश्न 15. वैधानिक न्याय की अनिवार्य शर्तों का वर्णन करें।
उत्तर-वैधानिक न्याय की निम्नलिखित अनिवार्य शर्ते हैं-

  1. न्यायपूर्ण कानून का निर्माण-न्यायपूर्ण कानून के निर्माण का अर्थ है न्याय पर आधारित कानून का निर्माण। न्याय की स्थापना के लिए यह आवश्यक है कि कानून न्यायसंगत तथा तर्कसंगत हो।
  2. कानून के अनुसार न्याय-कानूनी न्याय का दूसरा पहलू है कि न्याय कानून के अनुसार हो। कानून के अनुसार न्याय का अर्थ यह है कि कानून को न्यायपूर्ण तरीके से लागू किया जाए।
  3. न्यायिक प्रक्रिया सरल और सस्ती-न्यायिक प्रक्रिया सरल तथा सस्ती होनी चाहिए ताकि ग़रीब व्यक्ति भी न्याय प्राप्त कर सके। पूंजीवादी राज्यों में न्यायिक प्रक्रिया जटिल और खर्चीली है, जिस कारण ग़रीब व्यक्ति न्यायालयों में जाने से घबराता है।
  4. स्वतन्त्रता और निष्पक्ष न्यायपालिका-न्यायालय का स्वतन्त्र और निष्पक्ष होना भी अनिवार्य है। यदि न्यायाधीश स्वतन्त्र और निष्पक्ष नहीं होंगे तो ग़रीब और अनपढ़ व्यक्ति को कानून के अनुसार न्याय नहीं मिलेगा।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. न्याय से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-न्याय को अंग्रेज़ी में Justice कहते हैं। Justice शब्द लैटिन भाषा के शब्द Jus’ से बना है जिसका अर्थ होता है-बन्ध या बांधना। इसका अभिप्राय यह है कि न्याय उस व्यवस्था का नाम है जिसके द्वारा एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से जुड़ा हुआ है। न्याय की भाषा का इस बात से सम्बन्ध है कि एक व्यक्ति के दूसरे के साथ नैतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा कानूनी सम्बन्ध क्या हैं। आधुनिक न्यायशास्त्र में न्याय का अर्थ सामाजिक जीवन की उस व्यवस्था से है, जिसमें वैयक्तिक अधिकारों का सामाजिक कल्याण के साथ समन्वय स्थापित किया गया है।

प्रश्न 2. न्याय के दो मूलभूत तत्त्वों का वर्णन करें।
उत्तर-

  1. सत्य-सत्य न्याय का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। सत्य का अर्थ है घटना का ज्यों-का-त्यों प्रस्तुतीकरण करना। वस्तुनिष्ठ रूप कथन (Objective Sense) में न्याय की मांग है कि तथ्य और सम्बन्ध विषयक अपने कभी कथनों में हम सत्य का प्रयोग करें। न्यायालयों में तथ्यों की सत्यता का विशेष महत्त्व है।
  2. मूल्यों के आधारभूत क्रम की मान्यता- इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक मामले में न्याय की एक ही धारणा लागू की जानी चाहिए। अलग-अलग मामलों में न्याय की विभिन्न धारणों को लागू करना उचित नहीं है।

प्रश्न 3. न्याय के राजनीतिक पक्ष का वर्णन करो।
उत्तर-न्याय के राजनीतिक पक्ष का अर्थ यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के राजनीतिक अधिकार प्राप्त होने चाहिए। वोट का अधिकार, चुने जाने का अधिकार, प्रार्थना-पत्र देने का अधिकार सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के समान रूप से प्राप्त होने चाहिएं।

प्रश्न 4. ‘सामाजिक न्याय’ का अर्थ क्या है ?
उत्तर-सामाजिक न्याय का अर्थ है कि समाज में रहने वाले सभी व्यक्ति समान हैं और मनुष्य के परस्पर सामाजिक सम्बन्धों में किसी प्रकार का भेदभाव न हो। मनुष्यों के साथ जाति, धर्म, रंग, लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। सामाजिक समानता सामाजिक न्याय का आधार है। सभी नागरिकों को अधिकार एवं स्वतन्त्रताएं समान रूप से प्राप्त होनी चाहिएं।

प्रश्न 5. सामाजिक न्याय की प्राप्ति के लिए दो साधन बताइए।
उत्तर-

  1. कानून के समक्ष समानता-सामाजिक न्याय की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि सभी व्यक्ति कानून के सामने बिना किसी भेदभाव के समान होने चाहिएं।
  2. विशेषाधिकारों का अभाव-सामाजिक न्याय की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि समाज के किसी वर्ग को अथवा व्यक्ति को रंग, जन्म, वंश, जाति, लिंग आदि के आधार पर विशेषाधिकार प्राप्त नहीं होने चाहिएं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1. न्याय (Justice) शब्द की उत्पत्ति किस भाषा और शब्द से हुई है ?
उत्तर- न्याय (Justice) शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘Jus’ शब्द से हुई है।

प्रश्न 2. न्याय का अर्थ लिखिए।
उत्तर-न्याय को अंग्रेज़ी में ‘Justice’ कहते हैं जिसका अर्थ होता है-बंधन या बांधना।

प्रश्न 3. न्याय की एक परिभाषा लिखें।
उत्तर-प्लेटो के अनुसार, “न्याय वह गुण है जो अन्य गुणों के मध्य सामंजस्य स्थापित करता है।”

प्रश्न 4. ‘न्याय’ की सालमंड की परिभाषा लिखें।
उत्तर-सालमंड के अनुसार, “न्याय का अर्थ है प्रत्येक व्यक्ति को उसका भाग प्रदान करना।”

प्रश्न 5. न्याय के दो आधारभूत तत्त्वों के नाम लिखें।
उत्तर-

  1. सत्य
  2. स्वतन्त्रता।

प्रश्न 6. न्याय के विभिन्न पक्षों के नाम लिखें।
उत्तर-

  1. कानूनी न्याय।
  2. सामाजिक न्याय।
  3. आर्थिक न्याय।
  4. राजनीतिक न्याय।

प्रश्न 7. राजनीतिक न्याय की प्राप्ति के लिए किन्हीं दो साधनों के नाम लिखें।
उत्तर-

  1. लोकतन्त्रीय प्रणाली।
  2. राजनीतिक अधिकार।

प्रश्न 8. सामाजिक न्याय से क्या तात्पर्य है?
उत्तर–सामाजिक न्याय का अर्थ है कि समाज में रहने वाले सभी व्यक्ति समान हैं और व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्धों में किसी प्रकार का भेदभाव न हो।

प्रश्न 9. आर्थिक न्याय का अर्थ बताओ।
उत्तर-देश के भौतिक साधनों का उचित बंटवारा हो तथा अधिक-से-अधिक लोगों के हित में उनका प्रयोग हो सके।

प्रश्न 10. कानूनी न्याय किसे कहते हैं ?
उत्तर-कानूनी न्याय राज्य में कानून द्वारा स्थापित सिद्धान्त व प्रक्रिया से सम्बन्धित है।

प्रश्न 11. राज्यनीति के निर्देशक सिद्धान्तों में वर्णित किसी एक सामाजिक न्याय का वर्णन करें।
उत्तर- अनुच्छेद 38 के अनुसार, राज्य. ऐसी सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करेगा, जिसमें सभी नागरिकों को राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक न्याय प्राप्त हो।

प्रश्न 12. लोकतन्त्र में न्याय का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-न्याय से जहां व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है वहां वह समाज के विकास में भी सहायक होता है।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. सत्य और स्वतन्त्रता न्याय के आधारभूत …………… में शामिल है।
2. भारतीय संविधान के …………. के अनुसार, राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करेगा, जिसमें सभी नागरिकों को राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक न्याय प्राप्त हो।
3. जॉन राल्स ने …………. के सिद्धान्त का वर्णन किया।
4. जॉन राल्स ने अपनी पुस्तक ………….. में वितरणात्मक न्याय का वर्णन किया।
5. प्लेटो की पुस्तक ‘Republic’ का उपशीर्षक ………….. रखा गया।
उत्तर-

  1. तत्त्वों
  2. अनुच्छेद 38
  3. वितरणात्मक न्याय
  4. A Theory of Justice
  5. न्याय से सम्बन्धित।

प्रश्न III. निम्नलिखित में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. ‘Jus’ का अर्थ है-बंधन।
2. जॉन राल्स ने विकासवादी न्याय का वर्णन किया है।
3. जॉन राल्स ने वितरणात्मक न्याय का वर्णन अपनी पुस्तक Anarchy, State and Utopia में किया गया है।
4. प्लेटो की पुस्तक ‘Republic’ का उपशीर्षक भी न्याय से सम्बन्धित है।
5. समाज में सामाजिक न्याय का विशेष महत्त्व नहीं होता।
उत्तर-

  1. सही
  2. ग़लत
  3. ग़लत
  4. सही
  5. ग़लत।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न 1. Justice शब्द किस भाषा से निकला है ?
(क) यूनानी
(ख) लैटिन
(ग) जर्मन
(घ) अरबी।
उत्तर-(ख) लैटिन

प्रश्न 2. न्याय की यह परिभाषा किसने दी है-“न्याय वह गुण है जो अन्य गुणों के मध्य सामंजस्य स्थापित करता है” ?
(क) प्लेटो
(ख) अरस्तु
(ग) लॉस्की
(घ) लॉक।
उत्तर-(क) प्लेटो

प्रश्न 3. न्याय का कौन-सा तत्त्व है ?
(क) बेइमानी
(ख) सत्य
(ग) असत्य
(घ) विशेषाधिकार।
उत्तर-(ख) सत्य

प्रश्न 4. ‘न्यायपूर्ण कानून का निर्माण’ किस न्याय का पहलू है ?
(क) सामाजिक न्याय
(ख) आर्थिक न्याय
(ग) राजनीतिक न्याय
(घ) कानूनी न्याय।
उत्तर-(घ) कानूनी न्याय।