Class 7 Social Notes Chapter 8 प्रादेशिक संस्कृति की संरचना

विभिन्न समुदाय की जानकारी हमें उनकी भाषा से मिलती है। जैसे कि गुजराती बोलनेवाला गुजरात का और मराठी बोलनेवाला महाराष्ट्र का। भाषा के साथ-साथ विभिन्न प्रदेशों में अपने-अपने रीतिरिवाज, खानपान, वस्त्र परिधान, काव्य, नृत्य, संगीत और चित्रकला होती है। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की विभिन्न स्थानीय संस्कृतियाँ जिसे हम वहाँ की देशी संस्कृतियाँ कहते हैं, वह हमारे देश में देखने को मिलती है। इन सभी संस्कृतियों के बीच शताब्दियों से आदान-प्रदान होता रहा है। फिर भी कुछ क्षेत्रों की कुछ खास परंपराएँ आज भी उसी तरह बनी हुई हैं।

भारत में प्रांतीय भाषाओं का विकास

मलयालम : नौवीं शताब्दी में स्थापित महोदयपुरम् का चेर राज्य वर्तमान में केरल का एक भाग था। केरल की संस्कृति को उसकी भाषा मलयालम के साथ जोड़ने पर यह संस्कृति मलयालम संस्कृति कहलाती है। मलयालम भाषा केरल में बोली जानेवाली मुख्य भाषा है। उस पर संस्कृत का काफी प्रभाव देखने को मिलता है। चौदहवीं शताब्दी में व्याकरण और काव्यशास्त्र पर लिखा गया ‘लीला तिलकम्’ ग्रंथ मणिप्रवालम् शैली में लिखा गया था।

बंगाली : बंगाली भाषा का उद्भव संस्कृत भाषा में से हुआ है, ऐसा माना जाता है।
पंद्रहवीं शताब्दी तक उपभाषाओं तथा बोलियों ने मिल करके एक सामान्य साहित्यिक भाषा के स्वरूप को धारण किया। जो पश्चिम बंगाल की बोलचाल की भाषा बनी। जनजातीय भाषाओं, पर्शियन (फारसी) भाषा और भारत में अंग्रेजी शासन की शुरुआत बंगाल से होने से वहाँ यूरोपियन भाषाओं का बंगाली भाषा पर प्रभाव देखने को मिलता है।

प्रारंभिक बंगाली साहित्य को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है : संस्कृत से प्रभावित और स्वतंत्र। प्रथम भाग में संस्कृत महाकाव्यों का अनुवाद और दूसरे भाग में नाथ साहित्य का समावेश होता है।

गुजराती : भारत अनेक भाषाओं और बोलियों के साथ जुड़ा हुआ राष्ट्र है। प्राचीनकाल में भारत में संस्कृत, प्राकृत, तमिल जैसी भाषाओं का चलन था। समय के साथ-साथ उनमें से अनेक प्रादेशिक भाषाओं का विकास हुआ। प्रादेशिक राज्यों की स्थापना ने प्रादेशिक भाषाओं के विकास में बल प्रदान किया। संस्कृत में से तथा दक्षिण भारत में तमिल में से कई भाषाओं का जन्म हुआ। आठवीं शताब्दी से प्रादेशिक भाषाओं के विकास में वेग आया और खड़ीबोली, अवधी, बंगाली, गुजराती, मराठी, मलयाली, तेलुगु और कन्नड भाषाएँ विकसित हुईं। ई.सन् की 10वीं और 11वीं शताब्दी में संस्कृत में से उत्पन्न विविध भाषा स्वरूपों में से गुजराती भाषा का विकास हुआ।
अपभ्रंश गुजराती भाषा की जननी है। आचार्य हेमचंद्र से अपभ्रंश भाषा की शुरुआत हुई। संस्कृत-प्राकृतअपभ्रंश भाषा के बाद गुजराती भाषा का विकास हुआ।

गुजराती के लिए कहा जा सकता है कि नया ‘साहित्यिकयुग’ नरसिंह मेहता के हाथ से ही विकसित हुआ है। इस नए युग के सूत्रधार के रूप में नरसिंह मेहता, मीरांबाई और भालण मुख्य हैं। इन तीनों ने भक्ति साहित्य के विकास के साथ गुजराती भाषा का विकास किया।

नरसिंह मेहता ने ‘शामलदासना विवाह’, ‘कुंबरबाईनुं मामेरुं’, ‘हुंडी’, ‘सुदामाचरित्र’, ‘दाणलीला’ आदि कृतियों की रचना की थी। मीराबाई ने भी कृष्णभक्ति को केन्द्र में रखकर बहुत-से पदों की रचना की है। भालण ने सर्वप्रथम अपनी रचनाओं में गुजराती भाषा के लिए ‘गुर्जर भाषा’ की संज्ञा दी थी। वे पाटन के मोढ़ ब्राह्मण थे। उन्हें आख्यान का पिता कहा जाता है। उनकी महत्त्वपूर्ण कृतियों में ध्रुवाख्यान, मुर्गी आख्यान, शिव-भीलड़ी संवाद आदि का समावेश होता है।

भारत के उत्सव

जगन्नाथ रथयात्रा : इस यात्रा के साथ धार्मिक संप्रदाय भी जुड़े हैं। जिनमें ओडिशा के पुरी का जगन्नाथ संप्रदाय सुविख्यात है। जगन्नाथ का अर्थ विश्व का मालिक (जगत का नाथ), जो विष्णु शब्द का समानार्थी है। बारहवीं शताब्दी के गंगवंश के राजा अनंत वर्मन ने पुरी में जगन्नाथ मंदिर का निर्माण करवाने का निर्णय लिया था। 1230 ई. में राजा अनंगभीम तृतीय ने अपना राज्य जगन्नाथ को अर्पण करके स्वयं को उनके प्रतिनिधि के रूप में घोषित किया। ओडिशा जीतनेवाले मुगलों, मराठों और ईस्ट इंडिया कंपनी ने मंदिर पर अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयत्न किया। उनका मानना था कि मंदिर पर नियंत्रण प्राप्त करने से स्थानीय लोग/समुदाय भी उनका शासन स्वीकार करेंगे।

पुरी में प्रति वर्ष एक विशिष्ट रथयात्रा का आयोजन होता है। जिसमें विष्णु के अवतार जगन्नाथजी रथ में बैठकर पुरी में भ्रमण करते हैं। देश-विदेश से अनेक लोग इस उत्सव में सहभागी होने के लिए आते हैं।

होली : होली का त्योहार भारत में मनाया जाता है। परंतु उत्तर भारत में उसका विशेष महत्त्व है। यह त्योहार दो दिन का होता है – पहले दिन होली और दूसरे दिन धुलेंडी।
इस दिन को आसुरी शक्ति पर सात्त्विक-शक्ति की विजय के रूप में मनाया जाता है। इस दिन शाम के समय होली का पूजन करके होली जलाई जाती है। धुलेंडी के दिन एक-दूसरे पर रंग डालकर उत्सव मनाया जाता है।

लट्ठमार होली – बरसाना : बरसाना (उत्तर प्रदेश) की होली ‘लट्ठमार होली’ के रूप में जानी जाती है। बरसाना राधाजी का जन्म स्थल है। यहाँ नंदग्राम (श्रीकृष्ण की भूमि) के पुरुष बरसाना की स्त्रियों के साथ होली खेलने आते हैं और राधाजी के मंदिर पर ध्वजा चढ़ाने का प्रयत्न करते हैं। स्त्रियों द्वारा लट्ठ (लाठी) से पुरुषों का स्वागत किया जाता है, इसीलिए इस होली को लट्ठमार होली कहते हैं।

लोहड़ी (पंजाब) : यह त्योहार होली से मिलता-जुलता है। सिख समुदाय द्वारा यह त्योहार 13 जनवरी के दिन मकरसंक्रांति से एक दिन पहले मनाया जाता है। रात्रि में अग्नि जलाकर उसकी पूजा और प्रदक्षिणा करके अग्नि को मिठाई अर्पण की जाती है। यह त्योहार अंधकार पर प्रकाश के विजय का प्रतीक भी माना जाता है। पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के आस-पास रहनेवाले सिख इस त्योहार को हर्षोल्लास से मनाते हैं।

पोंगल : पोंगल तमिलनाडु राज्य का मुख्य त्योहार है। तमिलनाडु उपरांत कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में भी यह त्योहार मनाया जाता है। पोंगल का उत्सव तमिल महीना ‘थाई’ (जनवरी महीना का मध्यभाग) के प्रथम दिन मनाया जाता है। इस दिन पोंगल नामक व्यंजन बनाया जाता है।

ओणम : ओणम (ओनम) केरल में मनाया जानेवाला महत्त्वपूर्ण त्योहार है। ओणम मलयालम कैलेंडर के प्रथम महीने (अगस्त-सितम्बर महीना) में 10 दिन तक मनाया जाता है। फूलों की सजावट, विविध व्यंजन, नृत्यों की झड़ी और नौका-स्पर्धा इस त्योहार की विशेषता है। ‘नौका-स्पर्धा’ को ‘वल्लमकाली’ भी कहते हैं। इस त्योहार में ‘सादिया’ नामक भोजन लिया जाता है।

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दिवाली : दिवाली भारत में धूमधाम से मनाया जानेवाला त्योहार है। इस त्योहार के साथ वाघबारस, धनतेरस, कालीचौदस, नूतन वर्ष, भाईदूज और लाभपांचम वगैरह त्योहार भी जुड़े हुए हैं। यह त्योहार प्रकाश पर्व भी कहलाता है।

दुर्गापूजा : पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा का विशेष महत्त्व है। दुर्गादेवी ने महिषासुर पर विजय प्राप्त की थी। उसी विजय की याद में दुर्गापूजा का उत्सव मनाया जाता है। यह उत्सव दस दिन चलता है। अंतिम दिन विशिष्ट अनुष्ठान और माताजी की मूर्ति का जल-विसर्जन करके उत्सव को पूर्ण किया जाता है। यह उत्सव लगभग सभी राज्यों में छोटे-बड़े रूप में मनाया जाता है।

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नाताल : ईसा मसीह का जन्मदिन 25 दिसंबर को ईसाई लोग नाताल (क्रिसमस) के रूप में धूम-धाम और श्रद्धा से मनाते हैं। इस त्योहार के दौरान घर और गलियों को क्रिसमस-ट्री तथा अन्य सजावट के सामानों से सजाया जाता है। इस दिन वे लोग चर्च में मोमबत्ती जलाकर प्रार्थना करते हैं तथा एक-दूसरे को उपहार देते हैं। पहली जनवरी के दिन को वे नए वर्ष के रूप में मनाते हैं।

मुहर्रम : हजरत मुहम्मद पैगंबर साहब के दोहित्र की शहादत की याद में मुस्लिम मुहर्रम को शोकदिवस के रूप में मनाते हैं। इस दिन ताजिया निकालते हैं। मुस्लिम लोग काला कपड़ा पहनकर शोक प्रदर्शित करते हैं।

ईद : इस्लाम धर्म में दो ईद मनाई जाती है :
(i) ईद-उल-फित्र और (ii) ईद-उल-अज़हा

ईद-उल-फित्र को रमजान ईद भी कहते हैं। पवित्र रमजान मास का रोजा (उपवास) पूरा होने के बाद रमजान ईद के दिन मुस्लिम समूह में नमाज पढ़ते हैं। नमाज के बाद एक-दूसरे से गले मिलकर ईद मुबारक करते हैं।
ईद-उल-अजहा यानी बलिदान की ईद। यह ईद पवित्र हज (मक्का में स्थित पवित्र काबा की यात्रा) के साथ जुड़ी हुई है।
पतेती : पतेती पारसियों का मुख्य त्योहार है। पारसी-वर्ष में अंतिम पाँच दिन धार्मिक पर्व के रूप में मनाए जाते हैं। इन पाँच दिनों में अंतिम दिन ‘प्रायश्चित का दिन’ – पतेती के रूप में मनाया जाता है। पारसी लोग अपने द्वारा हुई भूल-चूक, गुनाह या पाप के लिए दिल से पश्चाताप करते हैं।

पतेती के दिन पारसी लोग अपने प्रार्थनागृह – अगियारी में जाते हैं। वहाँ ‘अवेस्ता’ नामक प्रार्थनाग्रंथ में से पश्चाताप संबंधी प्रार्थना करते हैं।
पतेती के दूसरे दिन को वे ‘नवरोज’ (नए वर्ष के प्रथम दिन) के रूप में मनाते हैं।

चेटीचंड (चेटीचाँद) : चेटीचंड सिंधी भाई-बहनों का त्योहार है। चैत्र शुक्लपक्ष द्वितीया के दिन सिंधी लोग नूतनवर्ष का प्रथम दिन मनाते हैं। वे एक-दूसरे को नए वर्ष की शुभकामनाएँ देते हैं। इस दिन वे लोग अपने इष्टदेव ‘झूलेलाल’ की शोभायात्रा निकालते हैं और श्रद्धालु ‘ताहिरी’ (मीठे चावल) प्रसाद के रूप में बाँटते हैं।

गुजरात के उत्सव

नवरात्रि : अश्विन शुक्लपक्ष प्रतिपदा से अश्विन शुक्लपक्ष नवमी तक के दिनों को नवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। नवरात्रि शक्ति की आराधना का पर्व है। इन नौ दिनों के दौरान लोग माँ दुर्गा की पूजा करते हैं। नवरात्रि में गरबा और दाँडिया-रास खेला जाता है। गरबा गुजरात की एक विशेष पहचान है।
उत्तरायण : सूर्य का धनराशि में से मकर राशि में आना यानी उत्तरायण। इसे ‘मकरसंक्रांति’ भी कहते हैं।
रथयात्रा : जगन्नाथपुरी की रथयात्रा की तरह भारत के विविध भागों में आषाढ़ महीने के शुक्लपक्ष की द्वितीया को जगन्नाथजी की रथयात्रा निकलती है। जिनमें अहमदाबाद में निकलनेवाली रथयात्रा सविशेष आकर्षक है। इस रथयात्रा में हाथी, घोड़ा, अखाड़ा, साधु-संत सहित लाखों की संख्या में लोग शामिल होते हैं। ‘पहिंदविधि’ करने के बाद रथयात्रा का शुभारंभ किया जाता है। रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, बड़ेभाई बलराम (बलभद्र) और बहन सुभद्रा रथ में सवार होकर नगरचर्या के लिए निकलते हैं।

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मेला : गुजरात के विविध जिलों में आयोजित होनेवाले मेले उस जिले की विशेष पहचान बन चुके हैं। तरणेतर का मेला (सुरेन्द्रनगर), वौठा का मेला (अहमदाबाद), भवनाथ का मेला (जूनागढ़), शामलाजी-गदाधर का मेला (शामलाजी, अरवल्ली), पल्ली का मेला (रूपाल, गांधीनगर), भादरवी पूनम का मेला (अंबाजी, बनासकांठा), सरखेज का मेला (अहमदाबाद), गोल-गधेड़ा का मेला (गरबाड़ा, दाहोद), चित्र-विचित्र का मेला (साबरकांठा), माधवपुर का मेला (माधवपुर, पोरबंदर), मीरादातार का उर्स मुबारक (ऊनावा, महेसाणा) आदि प्रसिद्ध मेले हैं।

भारत के मुख्य शास्त्रीय नृत्य

भारतीय संस्कृति का एक विशिष्ट अंग उसका शास्त्रीय नृत्य है। ये शास्त्रीय नृत्य धर्म के साथ जुड़े हुए हैं। अब, हम भारत के प्रमुख शास्त्रीय नृत्यों के विषय में जानेंगे।

कथक : कथक शब्द ‘कथा’ पर से आया है। कथाकार अपने हावभाव और संगीत से कथा को अलंकृत करते थे। ‘कथन करे सो कथक कहावे’ उक्ति प्रसिद्ध है। विशेष करके पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में भक्ति-आंदोलन के प्रचार के कारण उत्तर भारत में कथा का खूब विकास हुआ। कथक के विषयों में राधा और श्रीकृष्ण की कथाओं (जो रासलीला कहलाती) का समावेश होता था।

मुगल बादशाहों के समय में कथक नृत्य राजदरबारों में प्रस्तुत किया जाता था, जहाँ विशिष्ट नृत्यशैली के रूप में उसका विकास हुआ। पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी के बाद कथक परंपराओं में बँट गया। इस परंपरा को “घराना” कहा जाता है। इन दो परंपराओं में जयपुर और लखनऊ का समावेश होता है। 19वीं शताब्दी में अवध के नवाब वाजिदअली शाह ने अपने दरबार में कथक को आश्रय देकर इस कला को पुनर्जीवन दिया। कथक पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, बिहार और मध्यप्रदेश तक फैल गया।
स्वतंत्रता के बाद कथक को छ: शास्त्रीय नृत्यों में स्थान मिला। आज कथक भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग बन गया है।

कथकली : कथकली केरल की नृत्य परंपरा है। जिसका शाब्दिक अर्थ नाट्यकथा होता है।
अभिनय इस नृत्य की आत्मा है। अभिनय के अलावा रंगसजा और वेशभूषा भी खूब महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। सात्विक, राजसी और तामसी गुणों- वाले पात्रों के अनुसार कलाकारों की रंगसज्जा होती है। पात्र बोलते नहीं, परंतु अपने हाव-भाव से ही अभिव्यक्ति करते हैं।

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मणिपुरी : मणिपुरी नृत्य पूर्व भारत में स्थित मणिपुर राज्य की पहचान है। मणिपुर के लोग प्रत्येक उत्सव-प्रसंग के मौके पर यह नृत्य करते हैं। इस नृत्य में शरीर की गति धीमी होने से उसे भारत के अन्य नृत्यों से अलग माना जाता है। मणिपुरी नृत्य में दो प्रकार हैं – लास्य और तांडव।

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भरतनाट्यम् : भरतमुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र ग्रंथ भारत के शास्त्रीय नृत्यों पर लिखा गया महान ग्रंथ है। इसके अलावा ‘अभिनय दर्पण’ नामक ग्रंथ के रचयिता नन्दीकेश्वर ने भी भारत के मुख्य शास्त्रीय नृत्य के रूप में भरतनाट्यम् की विशद चर्चा की है। तंजौर (तमिलनाडु) में भरतनाट्यम् नृत्य का विकास हुआ।

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कुचीपुड़ी : भारत के अग्रगण्य शास्त्रीय नृत्य कुचीपुड़ी का उद्भव आंध्रप्रदेश के कुचीपुड़ी गाँव में हुआ था। इस गाँव में यक्षगान कहे जानेवाले नृत्य ने 17वीं सदी में कुचीपुड़ी नृत्य का स्वरूप धारण कर लिया। उसके स्थापक वैष्णव कवि सिद्धेन्द्र योगी थे। इस नृत्य के साथ नाटक की परंपरा भी जुड़ी हुई है।

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बिहु : बिहु असम का प्रसिद्ध नृत्य है। उल्लास व्यक्त करने के लिए स्त्री-पुरुषों के समूह द्वारा परंपरागत पोशाक पहनकर यह नृत्य किया जाता है। इस नृत्य में हाथ-पैर का हलन-चलन तथा गति और समूह निर्माण महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ढोल, पेपा (भैंस की सींग में से बनाया गया एक वाद्य) और बाँसुरी जैसे वाद्ययंत्रों का उपयोग इस नृत्य में किया जाता है।

चित्रकला – लघुचित्रों की परंपरा

चित्रकला की परंपरा भारत में सदियों पुरानी है। जिसका एक विशिष्ट भाग लघुचित्रों की परंपरा है। लघुचित्र यानी छोटे आकार के चित्र। लघुचित्र कपड़े और कागज पर पानी के रंगों से तैयार किए जाते थे। प्राचीनतम लघुचित्र हमें ताड़पत्रों और काष्ठ (लकड़ी) पर चित्रित मिले हैं। राजस्थान और गुजरात के जैन ग्रंथों में ऐसे अनेक लघुचित्र देखने को मिलते हैं। मुगलकाल में उसका खूब विकास हुआ क्योंकि मुगल बादशाह अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ ने कुशल चित्रकारों को प्रोत्साहन दिया था तथा चित्रशालाओं की स्थापना करवाई थी। ‘महाभारत’ और ‘पंचतंत्र’ जैसे ग्रंथों तथा ‘अकबरनामा’ में चित्रकारों ने अत्यंत सुंदर लघुचित्र बनाए हैं। राजदरबार के दृश्य, युद्ध के दृश्य, शिकार के दृश्य और सामाजिक जीवन के दृश्य लघुचित्रों के विषय हुआ करते थे। ऐसे चित्र एक-दूसरे को भेट स्वरूप दिए जाते थे तथा बादशाह और उनके नजदीकी लोग ही उसे देख सकते थे।
खंभात के शांतिनाथ भंडार में और पाटन के श्री हेमचंद्राचार्य जैन ज्ञानभंडार के सुरक्षित हस्तप्रतों में लघुचित्र देखने को मिलते हैं। इन चित्रों में गुजरात के संप्रदायों और सामाजिक जीवन के प्रतिबिंब को देख सकते हैं।

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चित्र की शैली (घराना क्षेत्र और आश्रयदाता आधारित कला)

मुगल साम्राज्य के पतन के बाद क्षेत्रीय राज्यों ने चित्रकला को आश्रय दिया। जिनमें राजस्थान और दक्षिण के राज्य मुख्य थे। इन शासकों ने अपने दरबार के दृश्यों का चित्रण करवाया था। मेवाड़, जोधपुर, बूंदी, कोटा और किसनगढ़ जैसे राज्यों ने भारत की पौराणिक कथाओं, महाकाव्यों और देवी-देवताओं के चित्रों का सर्जन करवाया था।

सत्रहवीं शताब्दी के बाद के वर्षों में हिमाचल प्रदेश में भी लघुचित्रकला का खूब विकास हुआ, जिसे ‘बसोहली’ शैली कहा जाता है। भानुदत्त की पुस्तक ‘रसमंजरी’ में ऐसे विशिष्ट चित्र देखने को मिलते हैं। नादिरशाह के आक्रमण और दिल्ली विजय के कारण मुगल कलाकार पहाड़ी क्षेत्रों में जाकर बसे, जिसके परिणाम स्वरूप चित्रकला की ‘कांगड़ा शैली’ का विकास हुआ। इस चित्रकला को पहाड़ी चित्रकला भी कहा जाता है। अठारहवीं शताब्दी के मध्यभाग तक कलाकारों ने वैष्णव संप्रदाय की परंपराओं में से प्रेरणा लेकर एक नई शैली विकसित की। नीले और हरे रंग के साथ कोमल रंगों का उपयोग और विषयों का काव्यात्मक निरूपण कांगड़ाशैली की विशेषता थी।

राजपूतों की वीरगाथा

अंग्रेज शासक आज के राजस्थान को राजपूताना के नाम से जानते थे। राजपूतों ने राजस्थान में एक विशिष्ट संस्कृति का सर्जन किया। राजपूतों की सांस्कृतिक परंपराएँ उनके आदर्शों और वीरता के साथ जुड़ी थीं। उनकी वीरगाथाओं का वर्णन चारण और बारोट काव्य तथा गीतों के माध्यम से करते थे। इन कथाओं में राजपूतों की शूरवीरता के उपरांत स्वामिभक्ति, मित्रता, प्रेम, वीरता, क्रोध वगैरह दर्शाया जाता था।
राजपूत स्त्री, गाय और धर्म के लिए अपना प्राण न्योछावर कर देते थे। राजपूत स्त्रियाँ भी शूरवीरता में कम न थीं। वे जीवन और मरण दोनों में शूरवीर पति के पदचिह्नों पर चलती थी। सतीप्रथा का उल्लेख भी देखने को मिलता है।

पीर : सूफीवाद के मतानुसार धर्म अर्थात् ‘ईश्वर के प्रति प्रेम’ और ‘मानवता की सेवा’। समय के साथ सूफी अलग-अलग सिलसिला (श्रेणी) में बँट गए। हर सिलसिला के पीर (मार्गदर्शक) थे, जो ‘ख्वाजा’ या ‘शेख’ भी कहलाते थे। पीर के शिष्यों को ‘मुरीद’ के नाम से जाना जाता था।
भारतीय पीर परंपरा से जुड़े अग्रगण्य सूफी संतों में अजमेर के प्रसिद्ध सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती की गणना होती है। उन्होंने भारत में चिश्ती संप्रदाय की शुरुआत की थी। वे ‘ख्वाजा’ और ‘औलिया’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। गुजरात में अहमद खटू गंजबख्श महान पीर के रूप में प्रसिद्ध हुए थे।

पालिया : दुश्मनों के सामने पाल (सेना) बनकर खड़े रहनेवाले और युद्ध या लड़ाई में बलिदान देनेवाले वीर शहीदों की याद में जो स्मारक या खंभी खड़ी की जाती है, उसे पालिया कहते हैं। जिन स्त्रियों ने जौहर किया हो या सती हुई हों तो उनका भी पालिया बनाया जाता है, ऐसे पालिया को सती का पालिया कहते हैं।

मंदिर

भारतीय मंदिर-स्थापत्य की शुरुआत गुप्तकाल से हुई। गुप्तकाल को संरचनात्मक मंदिरों का काल भी कहते हैं। मंदिर की स्थापत्य शैली के मुख्य तीन प्रकार हैं, जिसमें नागर शैली, द्रविड़ शैली और वेसर शैली का समावेश होता है।

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नागर शैली : ई.सन् 5वीं सदी के बाद भारत के उत्तर भाग (हिमालय) से लेकर विंध्य तक जिस मंदिर स्थापत्य शैली का विकास हुआ, उसे नागर शैली कहते हैं। ये मंदिर सामान्य रूप से पंचायतन शैली के और अंडाकार शिखरवाले बनाए जाते थे। इस शैली के मंदिरों में जगन्नाथ मंदिर (पुरी), कोणार्क (ओडिशा) और सूर्यमंदिर (मोढेरा, गुजरात) तथा खजुराहो के महादेव मंदिर (मध्यप्रदेश) का समावेश होता है।

द्रविड शैली : दक्षिण भारत में विकसित स्थापत्य की शैली को द्रविड़ शैली कहा जाता है। जिसमें तमिलनाड़, दक्षिण आंध्र, केरल और दक्षिण कर्नाटक जैसे प्रदेशों का समावेश होता है। कृष्णानदी से कन्याकुमारी तक देखने को मिलता है। बृहदेश्वर (राजराजेश्वर) का मंदिर (तमिलनाडु), मीनाक्षी मंदिर (मदुराई), महाबलिपुरम् का रथमंदिर (तमिलनाडु) आदि मंदिर इसी शैली में निर्मित हैं।

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वेसर शैली : मंदिर स्थापत्य की वेसर शैली महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक और विंध्य पर्वतमाला से लेकर कृष्णा नदी तक विकसित हुई थी। वेसर शैली में नागर और द्रविड़ शैली का मिश्रण देखने को मिलता है। यह शैली कर्नाटक शैली भी कहलाती है। इस शैली के मंदिरों में होयसलेश्वर का मंदिर (हलेबिडु, कर्नाटक) और चेन्ना केशव मंदिर (बेलूर, कर्नाटक) वगैरह मंदिरों का समावेश होता है।