Class 11 History Solutions Chapter 4 मौर्य युग

अध्याय का विस्तृत अध्ययन

(विषय सामग्री की पूर्ण जानकारी के लिए)

प्रश्न 1. मौर्य साम्राज्य की स्थापना एवं प्रशासनिक संगठन की चर्चा करें।
उत्तर-मौर्य साम्राज्य की स्थापना चन्द्रगुप्त मौर्य ने की थी और उसी ने ही इस साम्राज्य को सुदृढ़ प्रशासनिक ढांचा प्रदान किया। उससे पहले देश में अनेक छोटे-छोटे राज्य तथा शक्तिशाली कबीले थे। विदेशी सत्ता भी पांव जमाए हुए. थी। इन कठिनाइयों में चन्द्रगुप्त का एकमात्र शस्त्र था-चाणक्य। उसने चाणक्य की सहायता से अनेक प्रदेशों को विजय किया और उन्हें संगठित करके भारत में विशाल साम्राज्य की स्थापना की। उसका साम्राज्य भारत का पहला महान् साम्राज्य माना जाता है। अशोक ने कलिंग प्रदेश को विजय करके मौर्य साम्राज्य में वृद्धि की। उसने प्रशासन को पूर्ण रूप से जन-हितकारी बनाने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक परिवर्तन भी किए। संक्षेप में, मौर्य साम्राज्य की स्थापना एवं प्रशासनिक संगठन का वर्णन इस प्रकार है

I. साम्राज्य की स्थापना

1. पंजाब विजय-चन्द्रगुप्त मौर्य ने सबसे पहले पंजाब को जीता। यह प्रदेश उन दिनों सिकन्दर के प्रतिनिधि फिलिप के अधीन था। परन्तु 325 ई० पू० में फिलिप का वध कर दिया गया जिससे राज्य में असंतोष फैल गया। 323 ई० पू० में सिकन्दर की भी मृत्यु हो गई। अवसर का लाभ उठा कर चन्द्रगुप्त ने पंजाब पर आक्रमण कर दिया और उस पर अपना अधिकार कर लिया।
2. उत्तर-पश्चिमी भारत की विजय-पंजाब-विजय के पश्चात् चन्द्रगुप्त ने उत्तर-पश्चिमी भारत पर आक्रमण किया और यह प्रदेश भी अपने अधिकार में ले लिया। इस प्रकार उसके राज्य की सीमा सिन्धु नदी के पूर्वी तट को छूने लगी।

3. मगध विजय-मगध उत्तरी भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य था। वहां नन्द वंश का शासन था। कहते हैं कि नन्द राजाओं की सेना में 6 लाख पैदल, 12 हज़ार घुड़सवार, 2 हजार चार-चार घोड़ों वाले रथ तथा 3 हज़ार हाथी शामिल थे, परन्तु इस शक्तिशाली राज्य से युद्ध करना चन्द्रगुप्त का सबसे बड़ा उद्देश्य था। इसका कारण यह था कि जहां के एक नन्द शासक ने चन्द्रगुप्त के गुरु चाणक्य का अपमान किया था और चाणक्य ने नन्द वंश का समूल नाश करने की शपथ ले रखी थी।
मगध विजय के लिए एक बड़ा भयंकर युद्ध लड़ा गया। इस युद्ध में राजा घनानन्द, उसके परिवार के कई सदस्य और और अनगिनत सैनिक मारे गए। कहते हैं कि नन्द वंश का केवल एक ही व्यक्ति बचा था जो संन्यासी बनकर जंगलों में चला गया। परन्तु चाणक्य ने इसका भी पीछा किया और इसका नाश करके अपनी शपथ पूरी की।
मगध विजय के बाद (321 ई० पू० में) चन्द्रगुप्त राजसिंहासन पर बैठा।

4. बंगाल विजय-चन्द्रगुप्त ने अब अपना ध्यान अन्य पूर्वी राज्यों की ओर लगाया। कुछ समय पश्चात् उसने बंगाल पर भी अधिकार कर लिया।

5. सैल्यूकस की पराजय-सैल्यूकस सिकन्दर का सेनापति था। सिकन्दर की मृत्यु के बाद उसने लगभग पूरे पश्चिमी तथा मध्य एशिया पर अपना अधिकार कर लिया था। अब वह भारत के उन सभी प्रदेशों को भी विजय करना चाहता था जो कभी सिकन्दर के अधीन थे। 305 ई० पू० में उसने भारत पर आक्रमण कर दिया। चन्द्रगुप्त ने इसका बड़ी वीरता से सामना किया। यूनानी लेखकों के विवरण से पता चलता है कि सैल्यूकस इस युद्ध में पराजित हुआ और उसे चन्द्रगुप्त के साथ इन शर्तों पर सन्धि करनी पड़ी-(i) सैल्यूकस ने आधुनिक काबुल, कन्धार तथा बिलोचिस्तान के प्रदेश चन्द्रगुप्त को दे दिए। (ii) मैगस्थनीज़ सैल्यूकस की ओर से राजदूत के रूप में पाटलिपुत्र आया। (iii) चन्द्रगुप्त ने सैल्यूकस को उपहार के रूप में 500 हाथी दिए। (iv) सैल्यूकस ने अपनी पुत्री हेलन का विवाह चन्द्रगुप्त से कर दिया।

6. अन्य विजयें-चन्द्रगुप्त ने कुछ अन्य प्रदेशों पर भी विजय प्राप्त की। ऐसा समझा जाता है कि सौराष्ट्र का प्रदेश चन्द्रगुप्त के अधीन था। जैन तथा तमिल साहित्य के अनुसार तो चन्द्रगुप्त का साम्राज्य दक्षिण में उत्तरी मैसूर (कर्नाटक) तक फैला हुआ था। __इस प्रकार चन्द्रगुप्त ने भारत में एक महान् साम्राज्य की नींव रखी। उसका साम्राज्य उत्तर में हिमाचल से लेकर दक्षिण में उत्तरी मैसूर (कर्नाटक) तक फैला हुआ था। पूर्व में बंगाल तथा पश्चिम में हिन्दकुश पर्वत उसके राज्य की सीमाएं थीं। उसके साम्राज्य में अफगानिस्तान, बिलोचिस्तान, समस्त उत्तरी मैदान, सौराष्ट्र, मैसूर (कर्नाटक) आदि प्रदेश सम्मिलित थे। पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) इस साम्राज्य की राजधानी थी।

II. प्रशासनिक संगठन

1. केन्द्रीय शासन-मौर्य शासन चार मौलिक इकाइयों में बंटा हुआ था। केन्द्रीय शासन का मुखिया स्वयं सम्राट् होता था। उसकी शक्तियां असीम थीं, परन्तु वह मुख्य रूप से सात कार्य करता था : (i) कानून बनाना तथा कर लगाना। (ii) न्याय की व्यवस्था करना । (iii) कानून लागू करवाना तथा कर एकत्रित करवाना। (iv) सेनापति के रूप में सेना का संगठन तथा संचालन करना। (v) प्रजा की भलाई के लिए कार्य करना । (vi) शासन कार्यों की देखभाल करना तथा गुप्तचरों की सूचना के अनुसार कार्यवाही करना। (vii) मन्त्रियों, कुमारों, राजदूतों तथा राज्य के अन्य अधिकारियों की नियुक्ति करना। सम्राट् ने राज्य कार्यों में अपनी सहायता तथा परामर्श के लिए एक मन्त्रिपरिषद् की स्थापना की व्यवस्था हुई थी। परन्तु राजा मन्त्रिपरिषद् का निर्णय मानने के लिए बाध्य नहीं था। मन्त्रियों को अलग-अलग विभाग सौंपे गए थे। उसके प्रसिद्ध मन्त्री थे-पुरोहित, सेनापति, समाहर्ता, सन्निधाता अथवा कोषाध्यक्ष, दुर्गपाल, दण्डपाल तथा व्यावहारिक। कौटिल्य उसका प्रधानमन्त्री था। मन्त्रियों में पुरोहित का बड़ा आदर था। मन्त्रियों के अतिरिक्त कुछ अन्य अधिकारी भी थे। इनमें आमात्य, महामात्र तथा अध्यक्ष प्रमुख थे। अशोक के समय में राजुक, प्रादेशिक, युक्त नामक अधिकारी भी नियुक्त किए जाने लगे थे। इनका कार्य मन्त्रियों की सहायता करना था।

2. प्रान्तीय शासन-प्रान्तीय शासन का मुखिया ‘कुमार’ कहलाता था। यह पद प्रायः राज-घराने के किसी व्यक्ति को ही सौंपा जाता था। उसका मुख्य कार्य प्रान्त में शान्ति और व्यवस्था बनाए रखना तथा राज्यादेशों का पालन करवाना था। उसकी सहायता के लिए अनेक कर्मचारी होते थे। चन्द्रगुप्त ने अपने साम्राज्य को चार प्रान्तों में विभक्त किया हुआ था। (i) मगध प्रान्त- इस प्रान्त में मगध प्रदेश सम्मिलित था। इस प्रान्त का शासन सीधा राजा के हाथों में था। (ii) पश्चिमी प्रान्तइस प्रान्त में गुजरात तथा मालवा के प्रदेश सम्मिलित थे। उज्जैन इस प्रान्त की राजधानी थी। (iii) उत्तर-पश्चिमी प्रान्तइस प्रान्त में अफगानिस्तान, बिलोचिस्तान, पंजाब आदि प्रदेश शामिल थे। इनकी राजधानी तक्षशिला थी। (iv) दक्षिणी प्रान्त-इस प्रान्त में विन्ध्याचल पर्वत से उत्तरी मैसूर तक का प्रदेश सम्मिलित था। यहां की राजधानी स्वर्णगिरि थी।

3. स्थानीय शासन-नगर का प्रबन्ध नगर अध्यक्ष’ के अधीन होता था। उसका कार्य नगर में शान्ति की स्थापना करना, कर इकट्ठा करना तथा शिक्षा का प्रबन्ध करना था। ‘नगर अध्यक्ष’ की सहायता के लिए ‘स्थानिक’ तथा ‘गोप’ नामक दो कर्मचारी होते थे। पाटलिपुत्र, तक्षशिला तथा उज्जैन जैसे बड़े-बड़े नगरों के प्रबन्ध के लिए परिषदें स्थापित की गई थीं। प्रत्येक नगर की परिषद् में 30 सदस्य होते थे और प्रत्येक परिषद् 6 समितियों में विभाजित थी। प्रत्येक समिति में पांच सदस्य होते थे। पहली समिति का कार्य शिल्पकारों के हितों की रक्षा करना था। उनके वेतन भी यही समिति नियत करती थी। उन व्यक्तियों को मृत्युदण्ड दिया जाता था जो किसी शिल्पकार को हाथों या आंखों से वंचित करते थे। दूसरी समिति विदेशियों के हितों की रक्षा करती थी। तीसरी समिति जन्म-मरण का विवरण रखती थी। चौथी समिति का कार्य व्यापार तथा व्यापारियों के नियम लागू करना था। पांचवीं समिति तैयार माल का निरीक्षण करती थी। वस्तुओं में मिलावट करने वालों को जुर्माना किया जाता था। छठी समिति का कार्य बिक्री कर एकत्रित करना था। नगर की शिक्षा, अस्पतालों, मन्दिरों तथा अन्य जन-कल्याण सम्बन्धी संस्थाओं का प्रबन्ध परिषद् के 30 सदस्य मिलकर करते थे।

ग्राम का प्रबन्ध पंचायतों के हाथ में था। ग्राम का मुखिया ‘ग्रामिक’ अथवा ‘ग्रामिणी’ कहलाता था। उसका चुनाव ग्राम के लोगों द्वारा ही होता था। केन्द्रीय सरकार पंचायत के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करती थी। लगभग 10 ग्रामों के ऊपर ‘गोप’ नाम का अधिकारी होता था।

4. सैनिक संगठन – मौर्य साम्राटों ने एक विशाल सेना का आयोजन कर रखा था | मैगस्थनीज़ के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य की सेना में 6 लाख पैदल, 30 हज़ार घुड़सवार, 9 हज़ार हाथी तथा 8 हज़ार रथ सम्मिलित थे। प्रत्येक रथ में तीन तथा प्रत्येक हाथी पर चार सैनिक होते थे। कृषक वर्ग को छोड़ कर सैनिकों की संख्या राज्य के अन्य सभी वर्गों में सबसे अधिक थी। उनका काम केवल लड़ाई करना था तथा उन्हें शान्ति के समय भी नियमित रूप से नकद वेतन दिया जाता था। सेना के प्रबन्ध के लिए तीस सदस्यों की परिषद् की व्यवस्था थी। इस परिषद् को आगे 6 समितियों में बांटा हुआ था। प्रत्येक समिति में पांच सदस्य होते थे और प्रत्येक समिति का अपना अलग कार्य था। (क) पहली समिति का कार्य उन जहाजों की देखभाल करना था जो समुद्री लुटेरों को दण्ड देने के लिए होते थे। यह व्यापारियों से कर भी वसूल करती थी। इनके अध्यक्ष को ‘नावाध्यक्ष’ कहते थे। (ख) दूसरी समिति का कार्य सेना को माल पहुंचाने वाली बैलगाड़ियों की देख-रेख करना था। इसके अध्यक्ष को ‘गो-अध्यक्ष’ कहते थे। (ग) तीसरी समिति पैदल सैनिकों के हितों की रक्षा करती थी। (घ) चौथी समिति का कार्य घुड़सवार सैनिकों की देखभाल करना था। इसके अध्यक्ष को ‘अश्वाध्यक्ष’ कहते थे। (ङ) पांचवीं समिति हाथियों का प्रबन्ध करती थी तथा उनकी देखभाल करती थी। इसके अध्यक्ष को ‘हस्तीध्यक्ष’ कहते थे। (च) छठी समिति का काम युद्ध में प्रयोग किए जाने वाले रथों का प्रबन्ध करना था। इसके अध्यक्ष को ‘अश्वाध्यक्ष’ कहते थे।

सच तो यह है कि चन्द्रगुप्त मौर्य एक महान् विजेता था। उसी के प्रयत्नों से ही भारत में महान् मौर्य साम्राज्य की स्थापना हुई। साम्राज्य का प्रशासनिक ढांचा भी आदर्श था। केन्द्रीय तथा प्रान्तीय शासन पूरी तरह से उसके नियन्त्रण में था। नगर तथा ग्राम प्रशासन भी उच्च आदर्शों पर आधारित था। न्याय निष्पक्ष था और सैनिक प्रबन्ध में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं थी। प्रजा के हितों का विशेष रूप से ध्यान रखा जाता था। चन्द्रगुप्त मौर्य की सराहना करते हुए श्री भार्गव ने ठीक ही कहा है, “निःसन्देह वह अपने समय का सबसे शक्तिशाली शासक था।”

प्रश्न 2. मौर्य काल के समाज एवं अर्थव्यवस्था की चर्चा करें।
उत्तर-मौर्यकालीन भारत की सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था की जानकारी हमें कौटिल्य के अर्थशास्त्र, मैगस्थनीज़ के वृत्तान्त तथा अशोक के अभिलेखों से मिलती है। इसका वर्णन इस प्रकार है

I. सामाजिक अवस्था

1. जाति-प्रथा-मौर्य काल में जाति-प्रथा भारतीय समाज का अभिन्न अंग बन चुकी थी। अर्थशास्त्र में चारों वर्गों का उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक वर्ण के कर्तव्यों का भी वर्णन किया गया है। अशोक के शिलालेखों से भी जातिप्रथा का बोध होता है। शिलालेख V में कहा गया है कि महामात्रों की नियुक्ति ब्राह्मणों, विटों (अर्थात् वैश्यों), अनाथों आदि के हित के लिए की गई है। इस बात से स्पष्ट हो जाता है कि मौर्य समाज में कई जातियां थीं। समाज में ब्राह्मणों का आदर था। मैगस्थनीज़ लिखता है कि ब्राह्मणों को न तो कर देने पड़ते थे और न ही विवाह सम्बन्धी विषयों में उन पर कोई रोक थी। वे अपनी जाति से बाहर भी विवाह कर सकते थे। ब्राह्मणों के अतिरिक्त वैश्वों का भी समाज में आदर था। शूद्रों पर दया की जाती थी। शिलालेखों में अशोक ने आदेश दिया कि लोग उनसे अच्छा व्यवहार करें। मैगस्थनीज़ ने भी सात जातियों का वर्णन किया है। ये सात जातियां हैं-दार्शनिक, कृषक, सैनिक, शिकारी, शिल्पकार, निम्न श्रेणी के कर्मचारी, मन्त्री व उच्च अधिकारी। इससे स्पष्ट है कि उसे भारतीय जाति-प्रथा का ज्ञान था।

2. स्त्री का स्थान तथा विवाह व्यवस्था-मौर्यकालीन समाज में स्त्रियों की दशा अधिक अच्छी नहीं थी। पर्दा प्रथा प्रचलित थी। उन्हें उच्च शिक्षा नहीं दी जाती थी। वेश्यावृत्ति भी प्रचलित थी। कई वेश्याएं तो गुप्तचरों के रूप में कार्य करती थीं। स्त्रियों में जन्म, विवाह तथा रोगों सम्बन्धी अन्धविश्वास प्रचलित थे। इतना होने पर भी मौर्यकाल में स्त्रियों ने अपनी स्थिति को संवारा हुआ था। उन्हें पारिवारिक सम्पत्ति में भाग (Share) मिलता था। दहेज प्रथा प्रचलित थी। दुराचारी पति को तलाक दिया जा सकता था। विधवाएं पुनः विवाह कर सकती थीं। स्त्रियां अंग-रक्षिकाएं हुआ करती थीं। कुछ स्त्रियां उद्योग-धंधों में भी निपुण थीं। उन दिनों आठ प्रकार के विवाह प्रचलित थे। अर्थशास्त्र में उन विवाहों का वर्णन आता है। लड़की की शादी की आयु 12 वर्ष थी लड़के की 16 वर्ष होती थी। उच्च समाज में बहु-विवाह की प्रथा प्रचलित थी। बिन्दुसार की 16 पत्नियों का तथा अशोक की 5 पत्नियों का उल्लेख मिलता है। मैगस्थनीज़ भी लिखता है कि भारत के कुछ धनी लोग कई स्त्रियों से विवाह करते थे।

3. भोजन, आमोद-प्रमोद तथा अन्य तथ्य-अधिकतम लोग मांसाहारी थे। वे अनेक पशु-पक्षियों का मांस प्रयोग करते थे। परन्तु बौद्ध धर्म के प्रसार के कारण शाकाहारी लोगों की संख्या बढ़ने लगी थी। स्वयं अशोक ने शाही रसोई के लिए पशुओं का वध बंद करवा दिया था। शाकाहारी लोग गेहूँ की चपातियां तथा सब्जियों का प्रयोग करते थे। लोगों के आमोद-प्रमोद के कई साधन थे। राजा शिकार से अपना दिल बहलाया करता था। शिकार पर जाता हुआ राजा पूरी सज-धज से निकलता था। उसके साथ-साथ अंग-रक्षिकाएं, सैनिक तथा अनेक लोग जाते थे। नट, वादक, नर्तक आदि अपने-अपने ढंग से जनता का मनोरंजन करते थे। ग्रामों में अनेक प्रकार के खेल-तमाशे होते थे। जुआ खेलने का भी रिवाज था। उस समय भारतीय लोग सौंदर्य प्रेमी थे। पुरुषों तथा स्त्रियों में आभूषण पहनने का रिवाज था। वस्त्रों पर सोने की कढ़ाई का काम होता था। अधिक धनी लोग रत्न आदि धारण करते थे। राज्य के बड़े-बड़े अधिकारी छत्र धारण करके सवारियों पर निकलते थे।

II. अर्थव्यवस्था

1. कृषि-मौर्य काल में भी आज की भान्ति लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। मैगस्थनीज़ के अनुसार देश में कृषक वर्ग की संख्या सबसे अधिक थी। खेत जोतने के लिए हल तथा बैलों की जोड़ी से काम किया जाता था। सिंचाई के लिए किसानों को केवल वर्षा पर ही निर्भर नहीं रहना पड़ता था। कृषकों को सिंचाई सुविधाएं प्रदान करने के लिए मौर्य शासकों ने कई नहरों तथा झीलों का निर्माण करवाया। चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा सौराष्ट्र में बनवाई गई सुदर्शन झील इस बात की पुष्टि करती है कि मौर्य शासक अपने कृषकों को सिंचाई सुविधाएं प्रदान करना अपना परम कर्तव्य समझते थे। भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए खाद का प्रयोग होता था। उस समय की मुख्य उपजें गेहूँ, चावल, चना, गन्ना मटर, कपास आदि थीं।

2. व्यापार-मौर्य काल में आन्तरिक तथा विदेशी व्यापार दोनों ही उन्नति की चरम सीमा पर पहुंच चुके थे। आन्तस्कि व्यापार मुख्यतः स्थल मार्गों द्वारा होता था। पाटलिपुत्र देश के सभी भागों से इन्हीं मार्गों द्वारा जुड़ा हुआ था। इन मार्गों की देखभाल के लिए विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी। स्थल मार्गों के अतिरिक्त नदियों द्वारा भी कुछ आंतरिक व्यापार किया जाता था। उस समय देश के विभिन्न भाग विभिन्न वस्तुओं के लिए प्रसिद्ध थे। यदि कश्मीर अपने हीरों के लिए प्रसिद्ध था तो बंगाल मलमल के लिए। इसी प्रकार यदि हिमाचल प्रदेश चमड़े के लिए प्रसिद्ध था तो नेपाल अपनी ऊनी वस्तुओं के लिए। विदेशी व्यापार जल तथा स्थल दोनों मार्गों द्वारा होता था। उस समय हमारे व्यापारिक सम्बन्ध चीन, ईरान तथा मित्र आदि देशों से थे। चीन में रेशमी कपड़ा तथा ईरान से मोती भारत में आते थे। भारत से मिस्र को नील, हाथी दांत तथा मोती आदि भेजे जाते थे।

3. अन्य उद्योग-धन्धे-कृषि तथा व्यापार के अतिरिक्त मौर्य काल के लोग कुछ अन्य उद्योग-धन्धे भी करते थे। उस समय सूती कपड़ा, ऊनी कपड़ा तथा रेशमी कपड़ा उद्योग विशेष रूप से चमका हुआ था। मथुरा, काशी तथा वत्स आदि सूती कपड़ा उद्योग के मुख्य केन्द्र बन गए थे। लोग कपड़ों पर सोने तथा चांदी की कढ़ाई का भी काम बड़े सुन्दर ढंग से करते थे। बहुत-से लोग अपनी आजीविका वनों से प्राप्त करते थे। लकड़ी काटना, ढोना, उससे दैनिक प्रयोग की वस्तुएं तैयार करना उनके प्रमुख कार्य थे। कुछ लोग धातुओं से बर्तन तथा आभूषण बनाने का कार्य करते थे। उस समय भारत में सोना, चांदी, तांबा और लोहा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध थे। लोहे तथा तांबे का प्रयोग अस्त्र-शस्त्र में और सोने-चांदी का प्रयोग आभूषणों में होता था। मौर्य काल में चमड़े का उद्योग भी खूब पनपा हुआ था। चमड़े का प्रयोग जूते बनाने तथा शस्त्र बनाने में किया जाता था। लोगों को विभिन्न रंगों के जूते पहनने का बड़ा चाव था। – सच तो यह है कि मौर्यकालीन समाज उच्च तथा निम्न तथ्यों का मिश्रण था। लोग मांसाहारी भी थे तथा शाकाहारी भी। कुछ क्षेत्रों में स्त्रियों की दशा बहुत अच्छी थी तो कुछ में नहीं। कृषि के अतिरिक्त कई अन्य व्यवसाय भी प्रचलित थे। कौटिल्य का अर्थशास्त्र, मैगस्थनीज़ का वृत्तान्त तथा पुराण इस बात के साक्षी हैं कि मौर्यकालीन भारत की सामाजिक तथा आर्थिक अवस्था अन्य युगों से यदि अच्छी नहीं थी तो खराब भी नहीं थी।

महत्त्वपूर्ण परीक्षा-शैली प्रश्न ||

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. उत्तर एक शब्द से एक वाक्य तक

प्रश्न 1. मौर्य वंश के इतिहास की जानकारी के दो महत्त्वपूर्ण स्रोत बताओ।
उत्तर-इण्डिका तथा अर्थशास्त्र मौर्य वंश की जानकारी के दो महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।

प्रश्न 2. मैगस्थनीज कब से कब तक मौर्य दरबार में रहा ?
उत्तर-मैगस्थनीज 302 ई० पू० से 298 ई० पू० तक मौर्य दरबार में रहा।

प्रश्न 3. विशाखदत्त का “मुद्राराक्षस” मौर्य वंश से संबंधित किस घटना पर प्रकाश डालता है ?
उत्तर-विशाखदत्त का “मुद्राराक्षस” मौर्य वंश की स्थापना पर प्रकाश डालता है।

प्रश्न 4. चन्द्रगुप्त मौर्य को राजगद्दी दिलाने में किस व्यक्ति का सबसे अधिक योगदान था ?
उत्तर-चन्द्रगुप्त मौर्य को राजगद्दी दिलाने में कौटिल्य का सबसे अधिक योगदान था।

प्रश्न 5. कौटिल्य ने मगध के किस राजवंश का समूल नाश किया ?
उत्तर-कौटिल्य ने मगध के नन्द वंश का समूल नाश किया।

प्रश्न 6. मौर्य वंश की स्थापना से भारत में किस विदेशी सत्ता का अन्त हुआ ?
उत्तर-मौर्य वंश की स्थापना से भारत में यूनानी सत्ता का अन्त हुआ।

प्रश्न 7. चन्द्रगुप्त मौर्य और सैल्यूकस के बीच युद्ध कब हुआ ?
उत्तर-चन्द्रगुप्त मौर्य और सैल्यूकस के बीच युद्ध 305 ई० पू० में हुआ।

प्रश्न 8. मौर्य काल में स्थायी गुप्तचरों को क्या कहते थे ?
उत्तर-मौर्य काल में स्थायी गुप्तचरों को ‘समस्त’ कहते थे।

प्रश्न 9. मौर्यवंश का दूसरा शासक कौन था ?
उत्तर-मौर्यवंश का दूसरा शासक बिन्दुसार था।

प्रश्न 10. अशोक महान् का सिंहासनारोहण कब हुआ ?
उत्तर-अशोक महान् का सिंहासनारोहण 273 ई० पू० में हुआ।

प्रश्न 11. अशोक ने कौन-सा प्रदेश जीता ?
उत्तर-अशोक ने कलिंग प्रदेश जीता।

प्रश्न 12. कलिंग युद्ध के परिणामस्वरूप अशोक ने कौन-सा धर्म अपनाया ?
उत्तर-कलिंग युद्ध के परिणामस्वरूप अशोक ने बुद्ध धर्म अपनाया।

2. रिक्त स्थानों की पूर्ति

(i) मकदूनिया के शासक सिकंदर ने …………….. ई० पू० में भारत पर आक्रमण किया।
(ii) …………… मगध का अंतिम राजवंश था।
(iii) मौर्य वंश का संस्थापक …………… था।
(iv) चन्द्रगुप्त मौर्य के अधीन मगध की राजधानी ………….. थी।
(v) अशोक ने …………… बौद्ध सभा बुलवाई।
उत्तर-
(i) 326
(ii) नंद वंश
(iii) चन्द्रगुप्त मौर्य
(iv) पाटलिपुत्र
(v) तीसरी।

3. सही/ग़लत कथन-

(i) सैल्यकस ने चन्द्रगप्त मौर्य को पराजित किया। — (×)
(ii) अशोक ने लोहे के विशाल स्तम्भ बनवाए। — (×)
(iii) महामात्र सिकन्दर के अफ़सर थे। — (×)
(iv) अशोक ने कलिंग युद्ध के पश्चात् बौद्ध धर्म अपनाया। — (√)
(v) अजातशत्रु ने सुदर्शन झील का निर्माण करवाया। — (√)

4. बहु-विकल्पीय प्रश्न

(i) ‘इण्डिका’ का लेखक था-
(A) चन्द्रगुप्त मौर्य
(B) मैगस्थनीज़
(C) कौटिल्य
(D) जीवक।
उत्तर-(C) कौटिल्य

(ii) ‘अर्थशास्त्र’ का लेखक था-
(A) मैगस्थनीज़
(B) सैल्यूकस
(C) कौटिल्य
(D) नागार्जुन।
उत्तर-(B) सैल्यूकस

(iii) ‘सांची’ का स्तूप बनवाया था-
(A) अशोक
(B) चन्द्रगुप्त मौर्य
(C) हर्षवर्धन
(D) समुद्रगुप्त।
उत्तर-(A) अशोक

(iv) चार शेरों वाला अशोक स्तम्भ है-
(A) इलाहाबाद स्तंभ
(B) महरौली का स्तंभ
(C) देवगिरी का स्तंभ
(D) सारनाथ का स्तंभ।
उत्तर-(D) सारनाथ का स्तंभ।

(v) चन्द्रगुप्त के दरबार में यूनानी राजदूत था-
(A) सैल्यूकस
(B) मैगस्थनीज़
(C) कंटकशोधन
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-(A) सैल्यूकस

II. अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1. गांधार की राजधानी का क्या नाम था तथा इससे सम्बन्धित दो ईरानी शासकों के नाम बताएं।
उत्तर-गांधार की राजधानी तक्षशिला थी। इससे सम्बन्धित दो ईरानी शासक थे-सायरेस तथा डोरिअस प्रथम।

प्रश्न 2. सिंध नदी के उस पार के क्षेत्र में प्रयोग की जाने वाली लिपि का नाम बताएं तथा इस पर किस देश की लिपि का प्रभाव था ?
उत्तर-सिंध नदी के उस पार के क्षेत्र में खरोष्ठी लिपि का प्रयोग किया जाता था। इस लिपि पर ईरान की अरामी लिपि का प्रभाव था।

प्रश्न 3. संसार के सबसे पहले इतिहासकार का नाम क्या था तथा वह भारतीयों के बारे में कौन-सी दो दिलचस्प बातें बताता है ?
उत्तर-संसार का सबसे पहला इतिहासकार हैरोडोटस था। वह बताता है कि अकीमानी सेना के हिन्दुस्तानी सिपाहियों के वस्त्र सूती थे और तीर लोहे के नोक वाले थे।

प्रश्न 4. सिकन्दर के सम्पर्क में आए पंजाब के दो राज्यों के नाम।
उत्तर-सिकन्दर के सम्पर्क में आए पंजाब के दो राज्य थे-पुरु तथा छोटा पुरु।

प्रश्न 5. सिकन्दर किन लोगों के साथ युद्ध में घायल हुआ और ये किस इलाके के रहने वाले थे ?
उत्तर-सिकन्दर मल्लों के साथ युद्ध में बुरी तरह घायल हुआ और ये लोग मध्य सिन्धु घाटी में रहते थे।

प्रश्न 6. सिकन्दर की मृत्यु कब और कहां हुई ?
उत्तर-सिकन्दर की मृत्यु 323 ई० पू० में बेबिलोन के स्थान पर हुई।

प्रश्न 7. सिकन्दर कब से कब तक भारत में रहा तथा भारतीय इतिहास के तिथि क्रम के लिए सिकन्दर के आक्रमण का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-सिकन्दर 327 ई० पू० से 325 ई० पू० तक भारत में रहा। उसके आक्रमण की तिथि भारतीय इतिहास के तिथि क्रम की पहली निश्चित घटना मानी जाती है और इसे भारतीय इतिहास के तिथि क्रम का आधार माना जाता है।

प्रश्न 8. सिकन्दर के आक्रमण के समय मगध के शासक का नाम तथा उसकी राजधानी का नाम क्या था ?
उत्तर-सिकन्दर के आक्रमण के समय मगध का शासक महापद्मनन्द था। उसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी।

प्रश्न 9. चन्द्रगुप्त का सम्बन्ध किस कबीले तथा वर्ण के साथ माना जाता है ?
उत्तर-चन्द्रगुप्त का सम्बन्ध मौर्य कबीले से तथा वैश्व वर्ण से था।

प्रश्न 10. चन्द्रगुप्त ने अपने राजनीतिक जीवन के आरम्भ में उत्तर-पश्चिम में कौन-से दो प्रदेश जीते तथा वहां वह किस विजेता को मिला था ?
उत्तर-चन्द्रगुप्त ने उत्तर-पश्चिम में पंजाब तथा सिन्ध के प्रदेश जीते। यहां वह महान् विजेता सिकन्दर से मिला था।

प्रश्न 11. चन्द्रगुप्त के दो उत्तराधिकारियों के नाम बताएं।
उत्तर-चन्द्रगुप्त के दो उत्तराधिकारी थे-बिन्दुसार और अशोक।

प्रश्न 12. चन्द्रगुप्त के मुख्य सलाहकार तथा उसकी पुस्तक का क्या नाम था ?
उत्तर-चन्द्रगुप्त के मुख्य सलाहकार का नाम कौटिल्य (चाणक्य) था। कौटिल्य की प्रसिद्ध पुस्तक अर्थशास्त्र है।

प्रश्न 13. चन्द्रगुप्त के दरबार में आए यूनानी राजदूत तथा उसकी किताब का नाम बताओ।
उत्तर-चन्द्रगुप्त के दराबर में आए यूनानी राजदूत का नाम मैगस्थनीज़ था। उसकी पुस्तक का नाम था-इण्डिका।

प्रश्न 14. कलिंग विजय करने वाले मौर्य शासक का नाम क्या था और यह विजय कब की गई ?
उत्तर-कलिंग को विजय करने वाला मौर्य शासक अशोक था। यह विजय 261 ई० पू० में की गई।

प्रश्न 15. मौर्य सैनिक प्रबन्ध के चार मुख्य भाग कौन-से थे ?
उत्तर-मौर्य सैनिक प्रबन्ध के चार मुख्य भाग थे-प्यादे (पैदल), घुड़सवार, रथ, हाथी, सवार एवं शस्त्रागार।

प्रश्न 16. मौर्य साम्राज्य के उपराज्यों की राजधानियों के नाम बताओ।
उत्तर-मौर्य साम्राज्य उपराज्यों में बंटा हुआ था। केन्द्रीय प्रान्त की राजधानी पाटलिपुत्र, उत्तर-पश्चिमी प्रान्त की तक्षशिला, पश्चिमी प्रान्त की उज्जैन, पूर्वी प्रान्त की तोशाली तथा दक्षिणी प्रान्त की राजधानी सुवर्णगिरि थी।

प्रश्न 17. मौर्य प्रशासन में जिले को क्या कहा जाता था तथा इसके तीन प्रमुख अधिकारियों के नाम।
उत्तर-मौर्य प्रशासन में जिले को जनपद कहा जाता था। इसके तीन प्रमुख अधिकारी प्रादेशिक, राजुक तथा युक्त थे।

प्रश्न 18. मौर्य काल में सिक्के का नाम क्या था ?
उत्तर-मौर्य काल में प्रचलित सिक्के का नाम ‘पण’ था।

प्रश्न 19. मौर्य काल में महामंत्री तथा सेनापति को क्या वेतन मिलता था ?
उत्तर-मौर्य काल में महामन्त्री तथा सेनापति दोनों को ही 48,000 पण वेतन के रूप में मिलते थे।

प्रश्न 20. ठप्पों वाले सिक्के पर मिलने वाले कुछ सांकेतिक चिन्ह।
उत्तर-ठप्पों वाले सिक्कों पर मुख्य रूप से सूर्य, पर्वत, चांद, पशु, हथियार आदि के सांकेतिक चिन्ह मिलते हैं।

प्रश्न 21. मौर्य काल में शिल्पकारों की श्रेणियों की कौन-सी तीन विशेषताएं थीं ?
उत्तर-मौर्य काल में शिल्पकारों की श्रेणियों की तीन विशेषताएं थीं-धंधे का स्थानीयकरण, व्यवसाय का पैतृक होना तथा एक सरकार के नेतृत्व में काम करना।

प्रश्न 22. मौर्य काल में पशुचार कबीले कौन-से चार पशु पालते थे ?
उत्तर-मौर्य काल में पशुचार कबीले गाय, भैंस, बकरी और भेड़ पालते थे।

प्रश्न 23. मौर्य काल में अस्तित्व में आई चार जातियों के नाम लिखिए।
उत्तर-मौर्य काल में अस्तित्व में आई चार जातियां थीं-कुम्हार, जुलाहे, नाई और नर्तकियां।

प्रश्न 24. अशोक के शिलालेख कौन-सी दो लिपियों में हैं ?
उत्तर-अशोक के शिलालेख ब्राह्मी तथा खरोष्ठी लिपियों में हैं।

प्रश्न 25. अशोक के लौरिया नन्दनगढ़ तथा सारनाथ के स्तम्भों के सिरों पर कौन-से जानवर की मूर्ति बनी हुई है तथा ये स्तम्भ वर्तमान भारत के किन दो राज्यों में हैं ?
उत्तर-अशोक के लौरिया नन्दनगढ़ सारनाथ के स्तम्भों पर शेर की मूर्ति बनी हुई है। ये वर्तमान भारत के बिहार तथा उत्तर प्रदेश में है।

प्रश्न 26. मौर्य काल में इतिहास की जानकारी के चार प्रकार के स्रोतों का नाम बताएं।
उत्तर-मौर्य काल के इतिहास की जानकारी के चार स्रोत हैं-कौटिल्य का अर्थशास्त्र, मैगस्थनीज़ की इण्डिका, अशोक के अभिलेख तथा समकालीन सिक्के।

III. छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1. क्या सिकन्दर का आक्रमण भारत के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण घटना है ?
उत्तर- सिकन्दर के आक्रमण का भारतीय इतिहास पर सीधे तौर पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। सिकन्दर की मृत्यु के पश्चात् उसके सेनापति पंजाब के किसी भी भाग को अपने अधीन रखने में असफल रहे। वे दस वर्षों के अन्दर-अन्दर गांधार भी खाली कर गए। संभवतः यही कारण है कि प्राचीन भारतीय साहित्य में सिकन्दर के नाम का कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता। इतना अवश्य है कि उसके सेनापति सैल्यूकस ने ईरान और बल्ख में अपना राज्य स्थापित कर लिया और उसके राज्य का मौर्य साम्राज्य के साथ सम्पर्क तथा आदान-प्रदान रहा। इसका व्यापार तथा कला के क्षेत्र में कुछ प्रभाव अवश्य पड़ा। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सिकन्दर के आक्रमण की तिथि भारतीय इतिहास के तिथिक्रम में पहली निश्चित घटना मानी जाती है। इसलिए इसे भारतीय इतिहास के तिथिक्रम का आधार माना जाता है।

प्रश्न 2. मौर्य कालीन धार्मिक उच्च वर्ग के विषय में चर्चा करो।
उत्तर- मौर्य काल की सामाजिक व्यवस्था में सैद्धान्तिक रूप से सबसे ऊंचा पद ब्राह्मणों का था। व्यावहारिक रूप में भी उनके कुछ विशेष अधिकार समझे जाते थे। चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रमुख सलाहकार कौटिल्य था जोकि एक ब्राह्मण था। मैगस्थनीज़ के अनुसार ब्राह्मण एक छोटा किन्तु प्रभावशाली वर्ग था। इस वर्ग का कार्य मुख्यतः यज्ञ करना, मृतक संस्कार करना और ज्योतिष लगाना था। मैगस्थनीज़ के अनुसार वह दर्शन में जीवन को एक स्वप्न की भांति मानते थे। संभवतः यह संकेत दार्शनिकों की ओर है। परन्तु दार्शनिकों के अतिरिक्त मैगस्थनीज़ ब्राह्मणों और श्रमणों का भी उल्लेख करता है। अशोक के शिला आदेशों में भी ब्राह्मणों एवं श्रमणों का उल्लेख प्रायः साथ-साथ इकट्ठा किया गया है। इससे हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि उस समय बौद्ध, जैन और आजीविक भिक्षुओं का महत्त्व उतना ही था जितना कि ब्राह्मणों का ।

प्रश्न 3. सैल्यूकस पर एक नोट लिखो।
उत्तर- सैल्यूकस सिकन्दर का सेनापति था। सिकन्दर की मृत्यु के पश्चात् उसने सम्पूर्ण पश्चिमी तथा मध्य एशिया पर अपनी सत्ता स्थापित कर ली थी। 305 ई० पू० में उसने भारत पर आक्रमण कर दिया। भारत में उस समय चन्द्रगुप्त मौर्य अपनी शक्ति बढ़ा रहा था। उसने सैल्यूकस का सामना किया और उसे पराजित किया। अतः सैल्यूकस को चन्द्रगुप्त के साथ संधि करनी पड़ी । संधि के अनुसार सैल्यूकस ने आधुनिक काबुल, कन्धार तथा बिलोचिस्तान के प्रदेश चन्द्रगुप्त को दे दिए। मैगस्थनीज़ सैल्यूकस का राजदूत बनकर चन्द्रगुप्त मौर्य की राजधानी में आया। बदले में चन्द्रगुप्त ने सैल्यूकस को उपहार के रूप में 500 हाथी दिए।

प्रश्न 4. चन्द्रगुप्त मौर्य की प्रमुख विजयों का संक्षिप्त वर्णन करो।
अथवा
चन्द्रगुप्त मौर्य ने किस प्रकार मौर्य राजवंश का शासन स्थापित किया ?
उत्तर-चन्द्रगुप्त मौर्य एक महान् विजेता था। उसने अनेक विजय प्राप्त की और भारत में मौर्य साम्राज्य की नींव रखी। सबसे पहले उसने 326 ई० पू०में पंजाब पर आक्रमण किया और इसे यूनानियों के अधिकार से मुक्त कराया। इसके बाद उसने उत्तर-पश्चिमी भारत पर विजय प्राप्त की। उसकी सबसे बड़ी विजय मगध के नन्दों के विरुद्ध थी। मगध पर उसने 324 ई० पू० में अधिकार किया। यही प्रदेश भारत में मौर्य साम्राज्य की आधारशिला बना। मगध के बाद चन्द्रगुप्त ने बंगाल पर विजय प्राप्त की और फिर सैल्यूकस से युद्ध किया। युद्ध में सैल्यूकस बुरी तरह से पराजित हुआ। चन्द्रगुप्त मौर्य ने सौराष्ट्र और मैसूर को भी विजय किया।

प्रश्न 5. चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन-प्रबन्ध की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-चन्द्रगुप्त मौर्य ने एक कुशल शासन-प्रणाली की नींव रखी। केन्द्रीय शासन का मुखिया स्वयं सम्राट् था। उसकी शक्तियां असीम थीं। अपनी सहायता के लिए उसने अनेक मंत्रियों की नियुक्ति की हुई थी। सारा शासन चार प्रान्तों में बंटा हुआ था। प्रान्त के मुखिया को कुमार कहते थे। वह प्रायः राजघराने का ही कोई व्यक्ति होता था। नगरों का प्रबन्ध नगर अध्यक्ष के अधीन था। बड़े-बड़े नगरों के प्रबन्ध के लिए 30-30 सदस्यों की परिषदें थीं। प्रत्येक परिषद् पांच-पांच सदस्यों के छ: बोर्डों में बंटी हुई थी। गाँवों का शासन पंचायतों के हाथ में था। न्याय के लिए दीवानी और फौजदारी अदालतें थीं। प्रजा के हितों की ओर विशेष ध्यान दिया जाता था। चन्द्रगुप्त मौर्य का सैनिक संगठन भी उच्चकोटि का था। सेना में 6 लाख पैदल, 30 हजार घुड़सवार , 9 हज़ार हाथी और 8 हज़ार रथ शामिल थे।

प्रश्न 6. मैगस्थनीज़ कौन था ? उसने भारतीय समाज के बारे में क्या लिखा है ?
अथवा
मैगस्थनीज़ पर एक टिप्पणी लिखो।
उत्तर-मैगस्थनीज़ चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में एक यूनानी राजदूत था। वह चन्द्रगुप्त मौर्य की राजधानी पाटलिपुत्र में 302 ई० पू० से 298 ई० पू० तक रहा। इन पांच वर्षों में उसने भारत में जो कुछ सुना, देखा अथवा अनुभव किया, उसका वर्णन उसने ‘इण्डिका’ नामक एक पुस्तक में किया है। उसके अनुसार मौर्य काल में भारतीय समाज 7 वर्गों में बंटा हुआ था। ब्राह्मणों तथा दार्शनिकों को समाज में उच्च स्थान प्राप्त था। भारत में दास-प्रथा प्रचलित नहीं थी। लोगों का मुख्य भोजन गेहूँ, फल, चावल तथा दूध था। यज्ञ तथा बलि के अवसर पर लोग मदिरापान भी करते थे। उस समय लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। कृषि काफ़ी उन्नत थी। सिंचाई का प्रबन्ध राज्य करता था। कुछ लोग व्यापार भी करते थे। वस्र बनाने का उद्योग काफ़ी उन्नत था।

प्रश्न 7. कौटिल्य का अर्थशास्त्र क्या है ? भारतीय इतिहास में इसका क्या महत्त्व है ?
अथवा
कौटिल्य के अर्थशास्त्र पर एक टिप्पणी लिखो।
उत्तर- कौटिल्य का अर्थशास्त्र राजनीति से सम्बन्धित एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। इसकी रचना कौटिल्य ने की थी जो एक बहुत बड़ा विद्वान् और चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रधानमन्त्री था। उसने इस ग्रंथ में प्रशासन के सिद्धान्तों का वर्णन किया है। इस ग्रंथ का भारतीय इतिहास में बहुत महत्त्व है। यह ग्रंथ मौर्य काल का सुन्दर चित्र प्रस्तुत करता है। इसमें हमें चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन प्रबन्ध तथा उसके चारित्रिक गुणों की जानकारी मिलती है। यह ग्रंथ मौर्य काल के समाज पर भी प्रकाश डालता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें दिए गए शासन के सिद्धान्तों की झलक आज के भारतीय शासन में भी देखी जा सकती है।

प्रश्न 8. महाराजा अशोक ने बौद्ध धर्म को फैलाने के लिए क्या-क्या कार्य किए ?
अथवा
अशोक ने किस प्रकार बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया ?
उत्तर- कलिंग युद्ध के बाद महाराजा अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपना तन, मन, धन, सब कुछ लगा दिया। उसने जिन सिद्धान्तों का प्रचार किया, उनका पालन स्वयं भी किया। उसने इस धर्म के नियमों को स्तम्भों, शिलाओं तथा गुफाओं पर खुदवाया। ये नियम आम बोल-चाल की भाषा में खुदवाए गए ताकि साधारण लोग भी इन्हें पढ़ सकें। उसने अनेक स्तूप तथा विहार बनवाए जो बौद्ध धर्म के प्रचार का केन्द्र बने। उसने बौद्ध भिक्षुओं को आर्थिक सहायता दी। उसने बौद्ध धर्म के तीर्थस्थानों की यात्रा की। अशोक का पुत्र महेन्द्र तथा उसकी पुत्री संघमित्रा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए लंका में गए। इस प्रकार अशोक ने बौद्ध धर्म को विश्व धर्म बना दिया।

प्रश्न 9. कलिंग युद्ध के कारण अशोक के जीवन में क्या-क्या परिवर्तन आए ?
अथवा कलिंग युद्ध के महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर-कलिंग युद्ध 260 ई० पू० में हुआ। भले ही इस युद्ध में अशोक विजयी रहा तो भी युद्ध में हुए रक्तपात को देखकर अशोक का जीवन बिल्कुल ही बदल गया। उसके जीवन में आए कुछ महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों का वर्णन इस प्रकार है

  • कलिंग युद्ध में हुए रक्तपात को देखकर अशोक शांतिप्रिय बन गया और उसने बौद्ध धर्म को ग्रहण कर लिया।
  • कलिंग के युद्ध के बाद अशोक प्रजापालक बन गया। उसने प्रदेशों को जीतने के स्थान पर लोगों के दिलों को जीतना अपना उद्देश्य बना लिया।
  • इस युद्ध के पश्चात् अशोक अंहिसा का पुजारी बन गया। उसने मांस खाना छोड़ दिया और शिकार खेलना बन्द कर दिया। उसने युद्धों को भी त्याग दिया।
  • अशोक अब बौद्ध धर्म के प्रचार कार्य में जुट गया। उसने इसे राजधर्म घोषित कर दिया। उसने बौद्ध धर्म के प्रचार
    के लिए विदेशों में भी प्रचारक भेजे।

प्रश्न 10. गुप्तचर व्यवस्था ने मौर्य साम्राज्य की किस प्रकार सहायता की ?
उत्तर- गुप्तचर व्यवस्था ने मौर्य सम्राट को देश में शांति तथा व्यवस्था बनाए रखने में बहुत सहायता की। चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रधानमंत्री कौटिल्य का विचार था कि राजा को साम्राज्य में गुप्तचरों का एक जाल बिछा देना चाहिए। इन्हें राज्य में हो रही छोटी-बड़ी घटनाओं का पता लगाकर राजा को सूचित करना चाहिए । यहां तक कि मंत्रियों तथा राजकुमारों पर भी गुप्तचरों की निगरानी होनी चाहिए। इन बातों को ध्यान में रखते हुए चन्द्रगुप्त मौर्य ने एक गुप्तचर विभाग की स्थापना की। वह गुप्तचरों से प्राप्त सूचनाओं पर तुरन्त कार्यवाही करता था जिससे राज्य में शांति-व्यवस्था भंग नहीं हो सकती थी। अशोक के समय में गुप्तचरों को ‘परिवारिक’ कहा जाता था। चन्द्रगुप्त मौर्य की भांति वह भी गुप्तचरों से प्राप्त सूचनाओं को बहुत महत्त्व देता था। वास्तव में मौर्य साम्राज्य की सफलता में गुप्तचरों का बड़ा हाथ था।

प्रश्न 11. मौर्य साम्राज्य में अधिकारियों को वेतन किस प्रकार मिलता था ? अधिक वेतन के क्या सामाजिक तथा आर्थिक परिणाम निकले ?
उत्तर-मौर्य साम्राज्य कई प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित था। प्रत्येक प्रशासनिक इकाई के प्रबन्ध के लिए अनेक अधिकारी नियुक्त थे। अधिकारियों का वेतन बहुत अधिक होता था। उदाहरणस्वरूप प्रधानमंत्री तथा सेनापति दोनों को 48 हज़ार पण वेतन मिलता था। राजसभा अधिकारी तथा संगृहिती का वेतन 24-24 हज़ार पण था। अन्य अधिकारियों को 500500 पण वेतन मिलता था। अधिक वेतनों का देश की सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा । इससे जहां राजकोष पर बोझ बढ़ा, वहां देश में अमीर-गरीब का अन्तर भी बढ़ने लगा। अधिकारियों को वेतन देने के लिए अधिक कर लगाने पड़े जिससे साधारण जनता दिन-प्रतिदिन निर्धन होने लगी।

प्रश्न 12. मौर्य काल में भाषा तथा साहित्य के विकास के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-मौर्य काल साहित्यिक दृष्टि से काफ़ी महत्त्वपूर्ण था। तत्कालीन साहित्य से ज्ञात होता है कि उस समय संस्कृत भाषा के साथ-साथ ‘प्राकृत भाषा’ का भी काफ़ी विकास हो रहा था, परन्तु संस्कृत भाषा का महत्त्व अधिक था। इस काल का मुख्य ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ संस्कृत में ही लिखा गया था। इसे चन्द्रगुप्त मौर्य के गुरु कौटिल्य ने लिखा था। प्राकृत भाषा का प्रयोग मुख्य रूप से उस समय के वंश साहित्य में मिलता है। जातक कथाओं की भाषा प्राकृत ही है। प्राकृत भाषा की लोकप्रियता का पता हमें इस बात से लगता है कि सम्राट अशोक ने अपने राज्यादेशों में इसी भाषा का प्रयोग किया है। इसके लिए ब्राह्मी लिपि अपनाई गई। गांधार प्रदेश में अशोक ने अपने शिलालेखों में खरोष्ठी लिपि का प्रयोग किया।

प्रश्न 13. मैगस्थनीज़ पाटलिपुत्र नगर के प्रशासन के बारे में क्या बताता है ?
उत्तर-मैगस्थनीज़ के अनुसार पाटलिपुत्र नगर का प्रशासन अन्य बड़े नगरों की भांति चलता था। इसके प्रबन्ध के लिए ‘नागरिक’ नामक अधिकारी होता था। उसकी सहायता के लिए ‘स्थानिक ‘ तथा ‘गोप’ नामक दो कर्मचारी होते थे। एक न्याय अधिकारी भी उसकी सहायता करता था। मैगस्थनीज़ ने नगर प्रबन्ध के लिए अधिकारियों की छः समितियों का उल्लेख भी किया है। प्रत्येक समिति में पांच सदस्य होते थे। पहली तथा दूसरी समिति क्रमश: शिल्पकारों तथा विदेशियों के हितों की रक्षा करती थी। तीसरी समिति जन्म-मरण का विवरण रखती थी। चौथी समिति का कार्य व्यापार तथा व्यापारियों के लिए नियम लाग करना था। पांचवीं समिति तैयार माल का निरीक्षण करती थी। छठी समिति का कार्य बिक्री कर एकत्रित करना था। नगर की शिक्षा, अस्पतालों, मंदिरों तथा अन्य जन-कल्याण सम्बन्धी संस्थाओं का प्रबन्ध परिषद् के 30 सदस्य मिलकर करते थे।

प्रश्न 14. मौर्यकाल में कृषकों तथा खेती-बाड़ी की क्या स्थिति थी ?
उत्तर-मौर्य साम्राज्य में किसानों की स्थिति काफ़ी महत्त्वपूर्ण थी तथा सामाजिक वर्गों में उनको दूसरा स्थान प्राप्त था। किसानों की कई श्रेणियां थीं। इनमें छोटे ज़मींदार तथा खेतीहर किसान प्रमुख थे। किसान उपज का चौथा हिस्सा कर के रूप में देते थे। कुछ किसानों को राज्य की ओर से सिंचाई की सुविधाएं भी प्राप्त थीं। इसलिए इन किसानों को कुछ अधिक कर भी देना पड़ता था। सरकार खेती के काम की ओर विशेष रूप से ध्यान देती थी। अभी ज़मींदारी व्यवस्था पूर्णतः अस्तित्व में नहीं आई थी। इसलिए किसानों का सरकार से सीधा सम्पर्क’ था। सरकार द्वारा किसी बस्ती या ग्राम से सामूहिक कर वसूल नहीं किया जाता था। प्रत्येक किसान को अपना पृथक्-पृथक् कर चुकाना पड़ता था। कर वसूल करने वाले कर्मचारी ईमानदार होते थे तथा किसानों से अच्छा व्यवहार करते थे।

प्रश्न 15. मौर्यकाल में शिल्पकारों का संगठन कैसा था ?
उत्तर-किसानों की भांति मौर्य काल के कारीगरों तथा शिल्पियों की स्थिति भी बहुत महत्त्वपूर्ण थी। मैंगस्थनीज़ ने तत्कालीन सामाजिक वर्गीकरण में इन्हें चौथा स्थान दिया है। व्यापार की उन्नति के कारण शिल्पियों तथा कारीगरों की संख्या काफ़ी बढ़ गई थी। प्रत्येक श्रेणी के शिल्पकारों ने अपना संगठन भी बना लिया था। प्रत्येक संगठन का एक नेता होता था । शिल्पकारों की प्रत्येक श्रेणी के लोगों का अपना पृथक् धंधा होता था। यदि एक श्रेणी के कारीगर खेती-बाड़ी के यन्त्र बनाते थे तो दूसरी श्रेणी के शिल्पकार घरेलू प्रयोग के बर्तन आदि बनाते थे। इसी प्रकार स्वर्णकारों, मूर्तिकारों, जुलाहों , कुम्हारों , लोहारों तथा हाथी दांत का काम करने वालों की अपनी- अपनी श्रेणियां थीं।

प्रश्न 16. मौर्य कला की विशेषताएं क्या थी ?
उत्तर-मौर्य युग की कला एवं भवन निर्माण के बहुत ही कम नमूने हम तक पहुंचे हैं। हमें उस समय के कुछ विवरणों से ही मौर्य कला एवं भवन निर्माण कला की उत्कृष्टता की जानकारी मिलती है। उस समय अधिकतर भवन लकड़ी से बनाए जाते थे। इसलिए वे शीघ्र ही नष्ट हो गए। लकड़ी के स्थान पर पत्थर का प्रयोग अशोक के शासनकाल में शुरू हुआ। उसने अपने महल के स्तम्भ पत्थरों से बनवाए जिनकी शिल्पकला अति सुन्दर थी। अनुमान है कि यह काम गांधार के संगतराशों ने किया जो पत्थर के काम में काफी निपुण थे। मौर्य कला का सर्वोत्तम नमूना उड़ीसा में धौलि में स्थित हाथी की मूर्ति है। इस मूर्ति में कलात्मक दक्षता से भी अधिक सजीवता एवं ओज झलकता है । पुरातात्विक खुदाइयों द्वारा कई स्थानों से देवी की मिट्टी की प्रतिमाएं भी मिली हैं। इनका रूप तथा सच्चा दर्शनीय है।

प्रश्न 17. मौर्य साम्राज्य के पतन के क्या कारण थे ?
उत्तर- मौर्य साम्राज्य के पतन के मुख्य कारण निम्नलिखित थे

  • अशोक के बाद राज्य की बागडोर दशरथ, सम्पति और बृहद्रथ जैसे राजाओं के हाथ में आ गई। ये सभी शासक शासन चलाने के अयोग्य थे।
  • मौर्य वंश में उत्तराधिकारी का कोई विशेष नियम नहीं था । अत: एक शासक के मरते ही राजकुमारों में राजगद्दी के लिए युद्ध छिड़ जाता था।
  • अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार तथा जनहित कार्यों पर बड़ी उदारता से धन खर्च किया। फलस्वरूप राजकोष खाली हो गया और धन के अभाव में न तो प्रशासन को ठीक ढंग से चलाया जा सका और न ही विद्रोहों को दबाया जा सका।
  • कलिंग युद्ध के पश्चात् अशोक ने युद्ध न करने का निर्णय किया। उसने सैनिक शक्ति का विस्तार करना भी छोड़ दिया। परिणामस्वरूप मौर्य वंश की सैनिक शक्ति कम हो गई।
  • मौर्य राज्य को निर्बल होते देखकर विदेशी आक्रमणकारियों ने भी भारत के सीमान्त प्रदेशों पर आक्रमण करने आरम्भ कर दिए। उनके आक्रमणों से मौर्य शक्ति को बड़ी क्षति पहुंची ।

IV. निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. सिकन्दर कौन था ? उसके आक्रमण के समय भारत की राजनीतिक दशा का वर्णन करें ।
उत्तर-सिकन्दर मकदूनिया के शासक फिलिप का पुत्र था। पिता की मृत्यु के पश्चात् वह 336 ई० पूर्व में गद्दी पर बैठा। सिंहासन पर बैठते ही उसने एक विशाल सेना साथ लेकर अपना विश्व विजय अभियान आरम्भ किया। सबसे पहले उसने पश्चिमी एशिया और मिस्र को विजय किया। मिस्र को विजय करने के पश्चात् अपने नाम को अमर बनाने के लिए सिकन्दर ने वहां सिकन्दरिया नामक नगर बसाया जो आज भी इसी नाम से पुकारा जाता है। इसके पश्चात् उसने अरबेला की लड़ाई में ईरान के सम्राट को पराजित किया। इस प्रकार 11 वर्ष में सिकन्दर ने ईरान से लेकर अफगानिस्तान तक के समस्त प्रदेश पर अपना झंडा फहराया। तत्पश्चात् उसने हिन्दूकुश पर्वत को पार करके भारत में प्रवेश किया।

सिकन्दर के आक्रमण के समय भारत की राजनीतिक दशा-सिकन्दर के आक्रमण के समय भारत की राजनीतिक दशा बड़ी शोचनीय थी। देश में अनेक छोटे-छोटे स्वतन्त्र राज्य थे जो प्रायः आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे। भारत का कुछ भाग (उत्तरी-पश्चिमी) छोटे-छोटे स्वतन्त्र कबीलों के अधीन भी था। इन कबीलों के लोग बड़े वीर तथा युद्धप्रिय थे परन्तु उनमें भी एकता का अभाव था। देश में कुछ गणतन्त्र भी थे। इन राज्यों तथा गणतन्त्रों का वर्णन इस प्रकार है-

  • राजा आम्भी-आम्भी का राज्य सिन्ध तथा जेहलम नदियों के बीच में स्थित था। आम्भी अपने पड़ोसी राजा पुरु अथवा पोरस का घोर शत्रु था। वह सिकन्दर के साथ मिलकर पोरस को नीचा दिखाना चाहता था। अतः उसने सिकन्दर से युद्ध करने की बजाय उसका स्वागत किया और कीमती उपहार भेंट किए।
  • पुरु अथवा पोरस-पोरस का राज्य जेहलम और चिनाब नदियों के बीच में था। उसने सिकन्दर का डट कर सामना किया । परन्तु युद्ध में पोरस की हार हुई।
  • छोटे पुरु (पोरस) का राज्य-छोटे पुरु का राज्य चिनाब नदी के पार स्थित था। सिकन्दर के आने का समाचार सुनकर वह पहले ही नन्द राज्य के प्रदेश में भाग गया ।
  • मगध-यह राज्य ब्यास नदी के पार स्थित था। यहां नन्द वंश का शासन था। नन्द शासक के पास एक शक्तिशाली सेना थी। सिकन्दर के सैनिक इस सेना के साथ युद्ध करने से डरते थे। इसलिए सिकन्दर को ब्यास नदी पार किये बिना ही वापस लौटना पड़ा।
  • अन्य राज्य–सिकन्दर के आक्रमण के समय कुछ अन्य जातियां तथा कबीले भी थे। इनमें कठ, आरेष्ट, निसा, कष्टक आदि जातियाँ प्रमुख थीं।

प्रश्न 2. सिकन्दर के (क) भारतीय अभियान का वर्णन करते हुए भारत में (ख) उसकी विजय के कारण बताओ।
उत्तर-(क) सिकन्दर के भारतीय अभियान-सिकन्दर के भारतीय अभियानों का वर्णन इस प्रकार है-

1. अश्वक जाति से टक्कर-सिकन्दर को सर्वप्रथम भारत के उत्तर में रहने वाली अश्वक जाति से टक्कर लेनी पड़ी। ये लोग वर्तमान स्वात तथा कुमाऊं की घाटियों में रहते थे। सिकन्दर अश्वक जाति को पराजित करने में सफल रहा।

2. राजा आम्भी द्वारा सिकन्दर का स्वागत-326 ई० पू० में सिकन्दर ने अपनी सेना सहित सिन्धु नदी को पार किया और आम्भी के राज्य में जा पहुंचा। आम्भी ने ही सिकन्दर को भारत पर आक्रमण करने का निमन्त्रण दिया था। आम्भी की अपने पड़ोसी राजा पुरु से शत्रुता थी, अतः उसने सिकन्दर को पुरु पर आक्रमण करने के लिए भी प्रोत्साहित किया। आम्भी के राज्य में सिकन्दर का शानदार स्वागत किया गया।’

3. पोरस से युद्ध और मित्रता-पोरस का राज्य जेहलम और चिनाब नदियों के मध्य स्थित था। जेहलम नदी के तट पर सिकन्दर और पोरस की सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ। इस युद्ध में पोरस पराजित हुआ और उसे बन्दी बना लिया गया। बन्दी के रूप में उसे सिकन्दर के सामने लाया गया । सिकन्दर ने पूछा, “तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया जाए ?” पोरस ने बड़ी वीरता से उत्तर दिया- “जैसा एक राजा को दूसरे राजा से करना चाहिए।” पोरस के इस निर्भीक उत्तर से सिकन्दर बहुत प्रभावित हुआ। फलस्वरूप उसने पोरस का राज्य उसे लौटा दिया और उससे मित्रता कर ली।

4. छोटे पोरस के राज्य पर अधिकार-पोरस से मित्रता स्थापित करने के पश्चात् सिकन्दर छोटे पुरु के राज्य में पहुंचा। वह इतना कायर था कि वह सिकन्दर के आक्रमण का समाचार सुनते ही नन्द राज्य के प्रदेश में भाग गया। सिकन्दर ने उसके राज्य पर अधिकार कर लिया और वह प्रदेश अपने मित्र पोरस को दे दिया।

5. अन्य जातियों से टक्कर-सिकन्दर ने अपने मार्ग में आने वाली अद्रेष्ट, कठ, मलोई आदि जातियों को भी पराजित किया। इनमें से अद्रेष्ट तथा कठ जातियां बड़ी वीर थीं। यद्यपि सिकन्दर ने इन जातियों पर विजय प्राप्त कर ली परन्तु उसे बड़ी हानि उठानी पड़ी।
सिकन्दर की वापसी तथा मृत्यु-आद्रेष्ट और कठ जातियों को पराजित करने के पश्चात् सिकन्दर ने ब्यास नदी पार करने का निश्चय किया और उसके पश्चिमी तट पर आ डटा। ब्यास नदी के पूर्व में मगध का विशाल राज्य स्थित था। सिकन्दर इस विशाल राज्य को विजय करना चाहता था, परन्तु उसके सैनिकों ने आगे बढ़ने से इन्कार कर दिया। इसका कारण यह था कि सिकन्दर के सैनिक लगातार युद्धों से थक चुके थे, इसलिए वे अब स्वदेश लौटना चाहते थे। फिर भारत की जलवायु भी उनके अनुकूल न थी। इसके अतिरिक्त सिकन्दर के सैनिक मगध जैसे शक्तिशाली राज्य से टक्कर नहीं लेना चाहते थे। अत: सिकन्दर को ब्यास नदी से ही वापस लौटना पड़ा । मार्ग में बेबीलोन के स्थान पर उसकी मृत्यु हो गई।

(ख) सिकन्दर की विजय के कारण-भारत में सिकन्दर की विजय तथा भारतीयों की पराजय के मुख्य कारण निम्नलिखित थे-

  • भारत में राजनीतिक एकता का अभाव-सिकन्दर की विजय का मुख्य कारण भारतीय शासकों की आपसी फूट थी। भारत के लगभग सभी शासक एक-दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयत्न करते रहते थे। सिकन्दर ने उनकी फूट का लाभ उठाया और एक-एक करके सभी शासकों को पराजित कर दिया।
  • सिकन्दर का उच्च कोटि का नेतृत्व-सिकन्दर एक वीर तथा अनुभवी योद्धा था । वह सेना का नेतृत्व करना भलीभांति जानता था। उसके कुशल नेतृत्व ने भारत में उसे विजय दिलाई।
  • युद्ध करने का अच्छा ढंग-भारतीयों की अपेक्षा यूनानियों का युद्ध करने का ढंग अच्छा था।
  • वर्षा–युद्ध के समय लगातार वर्षा होने लगी जिससे युद्ध के मैदान में दलदल हो गई। भारतीय रथों के पहिए इस दलदल में धंस गए। इसके अतिरिक्त दलदल और फिसलन के कारण भारतीय सैनिक अपने धनुष बाण का ठीक प्रयोग न कर सके।
    सच तो यह है कि सिकन्दर की सफलता का कोई महत्त्व नहीं था। वह इस देश में थोड़े समय के लिए रहा । उसके जाते ही उसका राज्य भारतीय राजाओं ने फिर विजय कर लिया।

प्रश्न 3. चन्द्रगुप्त मौर्य की विजयों का वर्णन कीजिए । उसने भारत में राजनीतिक एकता किस प्रकार स्थापित की ?
अथवा
चन्द्रगुप्त मौर्य की पंजाब तथा सेल्यूकस पर विजय की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-चन्द्रगुप्त मौर्य न केवल एक सफल विजेता ही था बल्कि एक कुशल शासन प्रबन्धक भी था। उसका जन्म 345 ई० पू० में हुआ। कहते हैं कि चन्द्रगुप्त के जन्म से पहले ही उसके पिता का देहान्त हो गया था और उसकी मां अपने भाइयों के साथ पाटलिपुत्र आ गई थी। यहीं पर उसने चन्द्रगुप्त को जन्म दिया। सुरक्षा के लिए उसकी मां ने बालक को एक ग्वाले को सौंप दिया परन्तु उस ग्वाले ने चन्द्रगुप्त को एक शिकारी के हाथ बेच दिया। शिकारी ने उसे पशु चराने के लिए लगा दिया । वह गांव के खाली स्थान पर दिन भर बच्चों के साथ खेला करता था । इन खेलों में प्रायः वह राजा बनता था और न्याय करता था । एक दिन चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को ऐसा खेल खेलते देखा । वह उसकी योग्यता से इतना प्रभावित हुआ कि उसने तुरन्त शिकारी को 1000 कार्षापन देकर चन्द्रगुप्त को खरीद लिया। वह उसे शिक्षा दिलवाने के लिए तक्षशिला ले आया। चाणक्य से सात-आठ वर्ष तक शिक्षा पा कर चन्द्रगुप्त युद्ध-कला तथा शासन-कार्यों में पूरी तरह निपुण हो गया। . चन्द्रगुप्त मौर्य की विजयें-चन्द्रगुप्त मौर्य एक सफल विजेता था। विजेता के रूप में उसकी तुलना नेपोलियन तथा अकबर के साथ की जाती है। वह बड़ा ही वीर और साहसी था। उसने एक विशाल सेना का गठन किया जिसमें 6 लाख पैदल, 30 हज़ार घुड़सवार, 9 हज़ार हाथी और 8 हज़ार रथ शामिल थे। इस सेना की सहायता से उसने निम्नलिखित विजय प्राप्त की-

1. पंजाब विजय-चन्द्रगुप्त मौर्य ने सबसे पहले पंजाब को जीता। यह प्रदेश उन दिनों सिकन्दर के प्रतिनिधि फिलिप के अधीन था। परन्तु 325 ई० पू० में फिलिप का वध कर दिया गया जिससे राज्य में असन्तोष फैल गया। 323 ई० पू० में सिकन्दर की भी मृत्यु हो गई। अवसर का लाभ उठाकर चन्द्रगुप्त ने पंजाब पर आक्रमण कर दिया और उस पर अपना अधिकार कर लिया।

2. उत्तरी-पश्चिमी भारत की विजय-पंजाब-विजय के पश्चात् चन्द्रगुप्त ने उत्तर-पश्चिमी भारत पर आक्रमण किया और यह प्रदेश भी अपने अधिकार में ले लिया । इस प्रकार उसके राज्य की सीमा सिन्धु नदी के पूर्वी तट को छूने लगी।

3. मगध विजय-मगध उत्तरी भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य था। यहां नन्द वंश का शासन था। कहते हैं कि नन्द राजाओं की सेना में 6 लाख पैदल, 10 हजार घुड़सवार, 2 हज़ार चार-चार घोड़ों वाले रथ तथा 3 हज़ार हाथी शामिल थे परन्तु इस शक्तिशाली राज्य से युद्ध करना चन्द्रगुप्त का एक सबसे बड़ा उद्देश्य था। वह यह था कि यहां के एक नन्द शासक ने चन्द्रगुप्त के गुरु चाणक्य का अपमान किया था और चाणक्य ने नन्द वंश का समूल नाश करने की शपथ ले रखी थी।

मगध की विजय के लिए एक बड़ा भयंकर युद्ध लड़ा गया। इस युद्ध में राजा घनानन्द, उसके परिवार के कई सदस्य और अनगिनत सैनिक मारे गए। कहते हैं कि नन्द वंश का केवल एक ही व्यक्ति बचा था जो संन्यासी बन कर जंगलों में चला गया परन्तु चाणक्य ने उसका भी पीछा किया और उसका नाश करके अपनी शपथ पूरी की । – मगध विजय के बाद (321 ई०पू० में) चन्द्रगुप्त राजसिंहासन पर बैठा।

4. बंगाल विजय-चन्द्रगुप्त ने अब अपना ध्यान अन्य पूर्वी राज्यों की ओर लगाया। कुछ समय पश्चात् उसने बंगाल पर भी अधिकार कर लिया।

5. सैल्यूकस की पराजय-सैल्यूकस सिकन्दर का सेनापति था। सिकन्दर की मृत्यु के बाद उसने लगभग पूरे पश्चिमी तथा मध्य एशिया पर अपना अधिकार कर लिया था। अब वह भारत के उन सभी प्रदेशों को भी विजय करना चाहता था जो कभी सिकन्दर के अधीन थे। 305 ई०पू० में उसने भारत पर आक्रमण कर दिया। चन्द्रगुप्त ने उसका बड़ी वीरता से सामना किया। यूनानी लेखकों के विवरण से पता चलता है कि सैल्यूकस इस युद्ध में पराजित हुआ और उसे चन्द्रगुप्त के साथ इन शर्तों पर सन्धि करनी पड़ी– (i) सैल्यूकस ने आधुनिक काबुल, कन्धार तथा बिलोचिस्तान के प्रदेश चन्द्रगुप्त को दे दिए। (i) मैगस्थनीज़ सैल्यूकस की ओर से राजदूत के रूप में पाटलिपुत्र आया। (iii) चन्द्रगुप्त ने सैल्यूकस को उपहार के रूप में 500 हाथी दिए । (iv) सैल्यूकस ने अपनी पुत्री हेलन का विवाह चन्द्रगुप्त से कर दिया।

6. अन्य विजयें-चन्द्रगुप्त ने कुछ अन्य प्रदेशों पर भी विजय प्राप्त की। ऐसा समझा जाता है कि सौराष्ट्र का प्रदेश चन्द्रगुप्त के अधीन था। जैन तथा तमिल साहित्य के अनुसार तो चन्द्रगुप्त का साम्राज्य दक्षिण में उत्तरी मैसूर (कर्नाटक) तक फैला हुआ था।

प्रश्न 4. चन्द्रगुप्त मौर्य के (क) असैनिक व (ख) सैनिक शासन का वर्णन करो।।
उत्तर-चन्द्रगुप्त मौर्य एक कुशल शासन प्रबन्धक था। उसका शासन प्रबन्ध उच्चकोटि का था जिसका वर्णन इस प्रकार

(क) असैनिक प्रशासन-

1. केन्द्रीय शासन-केन्द्रीय शासन का मुखिया सम्राट् था। वह सेना का मुख्य सेनापति, न्याय का स्रोत तथा सुचारु शासन के लिए उत्तरदायी था। उसकी सहायता के लिए मन्त्रियों की एक परिषद् थी । मन्त्री उच्च कुल से सम्बन्धित होते थे और मन्त्रि परिषद की बैठकें गुप्त होती थीं। राजा का मुख्य काम जनता की भलाई करना था।
2. प्रान्तीय प्रबन्ध-चन्द्रगुप्त ने अपने साम्राज्य को चार प्रान्तों में विभक्त किया हुआ था- मध्य प्रान्त, पश्चिमी प्रान्त, उत्तरी-पश्चिमी प्रान्त तथा दक्षिणी प्रान्त। प्रान्त का मुखिया ‘कुमार’ कहलाता था। कुमार राजघराने से सम्बन्ध रखता था।
3. नगर प्रबन्ध-नगर का प्रबन्ध ‘नगर अध्यक्ष ‘ के अधीन होता था परन्तु पाटिलपुत्र तथा तक्षशिला जैसे बड़े नगरों का प्रबन्ध 30 सदस्यों की एक परिषद् के हाथ में होता था । परिषद् को 6 समितियों में बांटा हुआ था। इन समितियों का काम विदेशियों का ब्यौरा, जन्म-मरण का हिसाब, व्यापार आदि की सुरक्षा करना था।
4. अन्य विशेषताएं-

  • ग्राम का प्रशासन पंचायतों के हाथ में था। लगभग 10 ग्रामों के ऊपर ‘गोप’ नाम का अधिकारी होता था।
  • राज्यों मे दो प्रकार के न्यायालय थे। धर्मस्थायी (दीवानी) तथा ‘कृष्टकशोधन’ (फौजदारी) । दण्ड बड़े कठोर थे। चोरी करने, डाका डालने तथा किसी की हत्या करने पर मृत्यु-दण्ड दिया जाता था।
  • साम्राज्य को सुदृढ़ बनाने के लिए चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने सारे राज्य में गुप्तचर छोड़ रखे थे। स्त्रियां भी गुप्तचरों के रूप में कार्य करती थीं।
  • चन्द्रगुप्त मौर्य ने प्रजा के हितों को ध्यान में रखते हुए सिंचाई की उचित व्यवस्था की सड़कें बनवाईं, उनके दोनों ओर छायादार वृक्ष लगवाये, धर्मशालाएं बनवाईं तथा कुएं खुदवाये।
  • राज्य की आय का प्रमुख स्रोत भूमि-कर था जो उपज का 1/6 भाग होता था।

(ख) सैनिक प्रबन्ध चन्द्रगुप्त मौर्य ने एक विशाल सेना का संगठन किया हुआ था। उसकी सेना में 6 लाख पैदल सैनिक, 30 हजार घुड़सवार, १ हज़ार हाथी और 8 हजार रथ सम्मिलित थे। इस विशाल सेना के प्रबन्ध के लिए 30 सदस्यों की एक समिति नियुक्त की गई थी।

युद्ध में तलवार,धनुष-बाण, कवच आदि शत्रों का प्रयोग किया जाता था। इस विशाल सेना के प्रबन्ध के लिए 30 सदस्यों की एक परिषद् नियुक्त की गई थी। यह परिषद् पांच-पांच सदस्यों की 6 समितियों में विभाजित थीं-

  • पहली समिति का कार्य उन जहाजों की देखभाल करना था जो समुद्री लुटेरों को दण्ड देने के लिए होते थे । यह समिति व्यापारियों से कर भी वसूल करती थी ।
  • दूसरी समिति का कार्य सेना को माल पहुंचाने वाली बैलगाड़ियों की देख-रेख करना था। इसका अध्यक्ष गोपाध्यक्ष’ कहलाता था ।
  • तीसरी समिति का कार्य पैदल सैनिकों के हितों की रक्षा करना था।
  • चौथी समिति का कार्य घुड़सवारों की देखभाल करना था। इनके अध्यक्ष को ‘अश्वाध्यक्ष’ कहते थे।
  • पांचवीं समिति का कार्य हाथियों का प्रबन्ध तथा उनकी देखभाल करना था।
  • छठी समिति युद्ध में प्रयोग होने वाले रथों का प्रबन्ध करती थी । इसका अध्यक्ष ‘रथाध्यक्ष’ कहलाता था।

सच तो यह है कि चन्द्रगुप्त एक सफल शासक सिद्ध हुआ। उसके प्रशासनिक प्रबन्ध को देखते हुए डॉ० वी० ए० स्मिथ कहते हैं,”कही भी ऐसे संगठन का उदाहरण मिलना कठिन है।”
(“ No similar organisation is recorded elsewhere.”)

प्रश्न 5. सम्राट अशोक की कलिंग विजय का वर्णन करो और इसके परिणाम बताओ।
अथवा
अशोक की कलिंग विजय के कोई पांच महत्त्वपूर्ण परिणाम लिखिए।
उत्तर- कलिंग विजय-राजतिलक के बाद अशोक ने अपने साम्राज्य का विस्तार करने की नीति अपनाई। चन्द्रगुप्त मौर्य की दक्षिण विजय अधूरी रह गई थी, क्योंकि कलिंग का राज्य अभी तक स्वतन्त्र था। अतः अशोक ने कलिंग पर विजय करने का निश्चय किया और 261 ई०पू० में एक विशाल सेना के साथ कलिंग पर आक्रमण कर दिया। कलिंग के राजा के पास भी एक विशाल सेना थी। मैगस्थनीज़ के अनुसार उसकी सेना में 60 हज़ार पैदल, एक हजार घुड़सवार तथा 700 हाथी थे। अशोक और कलिंग के राजा के बीच बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में अशोक की जीत हुई। अशोक के एक अभिलेख से पता चलता है कि युद्ध में लगभग एक लाख व्यक्ति मारे गए तथा उससे कहीं अधिक घायल हुए। इस युद्ध में डेढ़ लाख व्यक्तियों को बन्दी भी बनाया गया।

परिणाम-कलिंग युद्ध के बड़े भयंकर परिणाम निकले। युद्ध में एक लाख व्यक्ति मारे गए और लगभग डेढ़ लाख व्यक्ति बन्दी बनाए गए। इससे भी अधिक व्यक्ति महामारी के कारण मर गए। कलिंग की गलियां रक्त और लाशों से भर गईं। अशोक ने जब यह मार्मिक दृश्य देखा तो उसका मन तड़प उठा। फलस्वरूप अशोक का जीवन ही बदल गया। उसके जीवन में एक ऐसी क्रान्ति आई कि वह कठोर राजा से दयालु सम्राट् बन गया। संक्षेप में इस युद्ध के कारण अशोक के जीवन में निम्नलिखित परिवर्तन हुए-

  • बौद्ध बनना-कलिंग के युद्ध में हुए रक्तपात ने अशोक को शान्तिप्रय बना दिया। वह बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया, क्योंकि इस धर्म का अहिंसा सम्बन्धी सिद्धान्त उसे युद्धों से दूर रख सकता था।
  • अहिंसा का अनुसरण-अशोक के दिल में युद्ध का स्थान ‘अहिंसा ‘ ने ले लिया । उसने मांस खाना और शिकार खेलना बन्द कर दिया।
  • बौद्ध धर्म का प्रचार-अशोक ने अब बौद्ध धर्म का प्रचार करना आरम्भ कर दिया। उसने इसे राजधर्म बनाया। बौद्ध भिक्षुओं के लिए मठ तथा विहार बनवाए और बौद्ध धर्म की शिक्षाओं को स्तम्भों पर खुदवाया। अशोक ने बौद्ध-धर्म के प्रचार के लिए विदेशों में प्रचारक भेजे। इस प्रकार बौद्ध-धर्म एक विश्व-धर्म बन गया।
  • प्रजापालक बनना-कलिंग के युद्ध ने अशोक को प्रजापालक बना दिया। अब वह किसी प्रदेश को जीतने की बजाय लोगों के दिलों को जीतना चाहता था। इसलिए उसने लोगों की भलाई के लिए अनेक कार्य किए। उसने सड़कें बनवाई तथा उनके दोनों ओर वृक्ष लगवाए। उसने बहुत-से कुएं खुदवाए और अस्पताल तथा विश्राम-गृह बनवाए।
  • धर्म महापात्रों की नियुक्ति-अशोक ने अपनी जनता के चरित्र को ऊंचा उठाने के लिए धर्म महापात्र नियुक्त किए। नये कर्मचारी गांव-गांव तथा नगर-नगर में घूमते थे और लोगों को नैतिक शिक्षा देते थे।
  • तीर्थ यात्राएं-कलिंग युद्ध के पश्चात् अशोक ने अनेक तीर्थ यात्राएं की। वह जहां भी जाता, जनता को अहिंसा और नैतिकता का उपदेश देता था।

संक्षेप में, इतना ही काफ़ी है कि कलिंग युद्ध के कारण अशोक दया, धर्म और सच्चाई का पुजारी बन गया। उसने जनता का कल्याण करना अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। इस प्रकार देश में एक नवीन युग का आरम्भ हुआ- ” ऐसे युग का आरम्भ जो शान्ति और सामाजिक उत्थान का युग था।”

प्रश्न 6. (क) अशोक के धम्म से आप क्या समझते हैं ?
(ख) इसका अशोक की साम्राज्य नीति पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर-(क) अशोक का धम्म-अशोक ने अपनी प्रजा के नैतिक उत्थान के लिए कुछ सिद्धान्त बनाए। इन सिद्धान्तों को अशोक का ‘धम्म’ अथवा ‘धर्म’ कहा जाता है। अशोक के धर्म (धम्म) के मुख्य सिद्धान्तों का वर्णन इस प्रकार है-

  • बड़ों का आदर-अशोक के धर्म के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपने माता-पिता और गुरुओं का आदर करना चाहिए।
  • छोटों के प्रति सद्भाव-अशोक के धर्म में अपने से छोटों, नौकरों तथा दासों के साथ अच्छा व्यवहार करने की शिक्षा दी गई है। इसके अनुसार, धनी लोगों को निर्धनों की सहायता करनी चाहिए।
  • अहिंसा-अशोक के धर्म में अहिंसा पर बल दिया गया है। इसके अनुसार किसी भी प्राणी को दुःख नहीं देना चाहिए। अशोक ने स्वयं भी शिकार खेलना तथा मांस खाना छोड़ दिया।
  • पाप-रहित जीवन-मनुष्य को पाप से दूर रहना चाहिए। ईर्ष्या, क्रोध, अहंकार और झूठ पाप हैं। मनुष्य को इन दोषों से बचना चाहिए।
  • दान-अशोक के धर्म के अनुसार दान का बहुत महत्त्व है। इस धर्म में ज्ञान के प्रसार को सबसे बड़ा दान माना गया
  • सत्य बोलना-मनुष्य को झूठ से बच कर रहना चाहिए और सदा सत्य बोलना चाहिए।
  • सहनशीलता-अशोक के धर्म के अनुसार सभी धर्म बराबर हैं अतः हमें सभी धर्मों का समान आदर करना चाहिए।
  • सच्चे रीति-रिवाज-मनुष्य को सदाचारी जीवन बिताना चाहिए और नेक काम करने चाहिएं। यही सच्चे रीति-रिवाज
  • कर्म सिद्धान्त-अशोक के अनुसार हम सबको अपने कर्मों का फल अगले जन्म में भुगतना पड़ता है। इसलिए हमें सदा अच्छे कर्म करने चाहिएं।
  • आत्म-विश्लेषण-मनुष्य को समय-समय पर आत्म-विश्लेषण करना चाहिए। यही मार्ग है जिस पर चलकर मनुष्य अपनी बुराइयों को दूर कर सकता है।

(ख) अशोक के धम्म का उसकी साम्राज्य नीति पर प्रभाव-अशोक के धम्म ने उसकी साम्राज्य नीति पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डाले। धम्म के प्रचार से देश में शांति, समृद्धि और नैतिकता के एक नए युग का प्रारम्भ हुआ। संक्षेप में अशोक के धर्म ने उसकी साम्राज्य नीति पर निम्नलिखित प्रभाव डाले-

  • धार्मिक एकता-अशोक के धर्म में सभी धर्मों के मुख्य सिद्धान्त सम्मिलित थे। इस धर्म को अपनाकर लोहन धार्मिक भेदभाव भूल कर एकता के सूत्र में बंध गए। सभी लोग एक-दूसरे के धर्म का आदर करने लगे।
  • प्रजाहितार्थ कार्य-अशोक के धर्म का उसकी साम्राज्य नीति पर मुख्य प्रभाव यह भी पड़ा कि सभी राज्याधिकारी प्रजा के साथ नम्रता तथा दयालुता का व्यवहार करने लगे। प्रजा की भलाई के लिए अनगिनत कार्य किए गए। परिणामस्वरूप प्रजा सुखी तथा समृद्ध जीवन व्यतीत करने लगी। .
  • अपराधों का अन्त-अशोक के धर्म के फलस्वरूप राज्य में अपराधों का अन्त हो गया। इसका करण यह था कि सभी लोग सुखी थे। किसी को भी किसी प्रकार की कमी अथवा कष्ट नहीं था। . .
  • धर्म विजय-अशोक अपना तथा अपनी प्रजा का परलोक सुधारना चाहता था। कलिंग विजय के बाद उसने अपना शेष जीवन अपने धर्म के प्रचार में लगा दिया। अब ‘दिग्विजय’ के स्थान पर ‘धर्म-विजय’ उसके जीवन का लक्ष्य बन गया।
  • सदाचार का जीवन-अशोक का धर्म नैतिक सिद्धान्तों का संग्रह था। इसे अपनाकर उसकी प्रजा का नैतिक उत्थान हुआ। सभी लोग सदाचार का जीवन व्यतीत करने लगे।
  • अशोक महान्-अशोक ने स्वयं को भी इन सिद्धान्तों के आधार पर ढाला। फलस्वरूप उसका व्यक्तित्व निखर उठा और उसकी गणना संसार के महान् सम्राटों में की जाने लगी।
  • सच तो यह है कि अशोक के धम्म के कारण उसकी प्रजा में एकता आई और लोग एक-दूसरे के धर्म का आदर करने लगे। राजा स्वयं प्रजापालक बन गया और वह दिन-रात प्रजा की भलाई के कार्य करने लगा। राजा की भांति जनता का भी नैतिक उत्थान हुआ और देश में शांति तथा समृद्धि का युग आरम्भ हुआ।

प्रश्न 7. अशोक ने बौद्ध धर्म को किस प्रकार बढ़ाया ? धर्म के विषय में अशोक की धारणा क्या थी ?
अथवा
अशोक द्वारा बौद्ध धर्म के प्रचार एवं प्रसार के लिए किए गए किन्हीं पांच कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-अशोक ने बौद्ध-धर्म की बड़ी सेवा की। कलिंग युद्ध से उसके हृदय को बड़ी ठेस लगी थी। उस समय बौद्धधर्म के सरल सिद्धान्तों के कारण ही उसके मन को शान्ति मिली। उसने बौद्ध-धर्म स्वीकार कर लिया और अपना सारा जीवन इसके प्रचार कार्य में लगा दिया। उसके द्वारा इस धर्म के लिए किए गए प्रचार कार्यों का वर्णन इस प्रकार है-

  • व्यक्तिगत आदर्श-राजा अशोक ने अपने व्यक्तिगत उदाहरण द्वारा लोगों को बौद्ध-धर्म स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया। उसने जिन सिद्धान्तों को अपने लोगों में प्रचार किया, उनका स्वयं भी पालन किया।
  • बौद्ध-धर्म का अनुयायी बनना-कलिंग युद्ध के पश्चात् अशोक स्वयं बौद्ध बन गया। वह सच्चे मन से इस धर्म के प्रचार कार्य में जुट गया। अपने सम्राट को एक भिक्षु के रूप में देख कर जनता बहुत प्रभावित हुई। फलस्वरूप अनेक लोग बौद्ध-धर्म के अनुयायी बन गए।
  • राज्यादेश-बौद्ध-धर्म के प्रसार के लिए अशोक ने इस धर्म के नियमों को स्तम्भों, गुफाओं तथा शिलाओं पर खुदवाया। जनता इन नियमों से प्रभावित हो कर बौद्ध-धर्म को ग्रहण करने लगी।
  • विहार और स्तूप बनवाना-अशोक ने बौद्ध-धर्म के प्रचार के लिए अनेक विहार तथा स्तूप बनवाए। ये स्तूप तथा विहार बौद्ध-धर्म के प्रचार के केन्द्र बने।
  • तीसरी बौद्ध सभा-अशोक ने 252 ई० पू० में बौद्ध-धर्म की तीसरी सभा पाटलिपुत्र में बुलाई। इस सभा के कारण बौद्धों में एकता स्थापित हुई और यह धर्म अधिक लोकप्रिय हुआ।
  • धार्मिक नाटक-अशोक ने धार्मिक नाटकों द्वारा जनता को यह समझाने का प्रयत्न किया कि बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों के अनुसार पवित्र जीवन व्यतीत करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इस प्रकार के दृश्यों से प्रभावित होकर अनेक लोगों ने बौद्धधर्म अपना लिया।
  • धार्मिक यात्राएं-अशोक की धार्मिक यात्राएं भी बौद्ध-धर्म के प्रचार में बड़ी सहायक सिद्ध हुईं। बौद्ध-धर्म ग्रहण करने के पश्चात् उसने बौद्ध-धर्म से सम्बन्धित स्थानों की यात्राएं कीं। मार्ग में उसने अनेक सभाओं का आयोजन करके बौद्धधर्म के सिद्धान्तों का प्रचार किया।
  • धर्म महापात्रों की नियुक्ति-अशोक ने धर्म का प्रचार करने के लिए ‘धर्म महापात्र’ नामक विशेष कर्मचारियों की नियुक्ति की। वे देश के विभिन्न भागों में जाकर नैतिक सिद्धान्तों का प्रचार करते थे। अप्रत्यक्ष रूप से इससे भी बौद्ध-धर्म के प्रचार कार्य में सहायता मिली।
  • बोलचाल की भाषा में प्रचार-अशोक ने पाली भाषा में शिलाओं, स्तम्भों आदि पर बौद्ध मत की शिक्षाएं खुदवाईं। उसने कुछ प्रसिद्ध बौद्ध ग्रन्थों का अनुवाद भी पाली भाषा में करवाया क्योंकि पाली भाषा उस समय की बोलचाल की भाषा थी। इसलिए जनसाधारण तक बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों तथा भिक्षुओं को पहुंचाना सरल हो गया।
  • विदेशों में प्रचार-अशोक ने बौद्ध-धर्म का प्रचार केवल अपने ही देश में नहीं बल्कि विदेशों में भी किया। उसने अपने प्रचारकों को श्रीलंका, चीन, सीरिया, मिस्र आदि देशों में भेजा। अशोक का पुत्र महेन्द्र तथा पुत्री संघमित्रा बौद्ध-धर्म के प्रचार के लिए श्रीलंका गए। इस प्रकार अशोक के प्रयत्नों से अनेक देशों में बौद्ध-धर्म लोकप्रिय हुआ।

सच तो यह है कि अशोक ने बौद्ध-धर्म के प्रचार में बड़ा उत्साह दिखाया। उसने एक साधारण धर्म का विश्व स्तर पर धर्म बना दिया। बौद्ध-धर्म के प्रति उनकी सेवाओं को देखते हुए यह बात ठीक जान पड़ती है, “बौद्ध धर्म के इतिहास में धर्म के संस्थापक के बाद दूसरा स्थान अशोक को ही प्राप्त है।”

प्रश्न 8. सम्राट अशोक का मूल्यांकन करें। क्या वह वास्तव में ही महान् था ? कोई पांच तर्क दीजिए।
अथवा
अशोक को एक महान् सम्राट् क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-अशोक निःसन्देह एक महान् सम्राट् था। उसकी महानता तक संसार का कोई अन्य सम्राट नहीं पहुंच सका। जहां अन्य सम्राट तलवार के बल पर राज्य करना चाहते थे, वहां अशोक लोगों के दिलों पर राज्य करना चाहता था और वह भी प्रेम और सहानुभूति से। अन्त में अशोक अपने मनोरथ में सफल हुआ। आज भी हम उसे एक महान् सम्राट् कहते हैं। जिन बातों ने अशोक को एक महान् सम्राट् बना दिया, वे निम्नलिखित हैं-

1. मानवता की सेवा-कलिंग के युद्ध के पश्चात् अशोक ने अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य मानवता की सेवा करना बना लिया। उसने ऐश्वर्य के जीवन का त्याग कर दिया और शिकार खेलने की बजा धार्मिक भ्रमण करके लोगों को उपदेश देने प्रारम्भ कर दिए। उसने स्वयं मांस खाना छोड़ दिया। कितना महान् था यह आदर्श। संसार के इतिहास में ऐसा उदाहरण मिलना कठिन है। किसी ने ठीक ही कहा है, “अपनी जनता के आध्यात्मिक और नैतिक कल्याण के लिए किए जाने वाले प्रयत्नों से वह अथक था और साहस में अटल।”

2. पशुओं की रक्षा-अशोक प्रथम सम्राट् था जिसने न केवल मनुष्यों के लिए अपितु पशुओं के लिए भी अस्पताल खुलवाए। उसके राज्य में जानवरों का शिकार सर्वथा निषिद्ध था। 243 ई० पू० अशोक ने घोषणा की, जिसके अनुसार वर्ष में 56 दिन ऐसे निश्चित किए गए जब उसके राज्य का कोई भी व्यक्ति किसी भी दशा में पशु-वध नहीं कर सकता था। अशोक चाहता था कि उसके राज्य में कोई भी व्यक्ति किसी प्राणी को कष्ट न पहुंचाए। अशोक प्रचार करता था, “प्रत्येक जीव को प्रकृति द्वारा निर्धारित उसके अन्तिम क्षण तक श्वास लेने का अधिकार है। जिस सम्राट् का इतना आदर्श हो उसे कौन महान् नहीं कहेगा।

3. प्रजा हितार्थ कार्य-अशोक अपनी प्रजा को अपनी सन्तान समझता था। प्रजा की भलाई के लिए उसने अपने राज्य में सड़कों का निर्माण करवाया। इनके किनारों पर छायादार वृक्ष लगवाए, धर्मशालाएं बनवाईं, अस्पताल खुलवाए। इन अस्पतालों में रोगियों को मुफ्त दवा दी जाती थी।

4. आदर्श प्रशासन-अशोक का शासन प्रबन्ध उच्चकोटि का था। उसने महामात्रों की नियुक्त की हुई थी जो राजा को प्रजा के कष्टों की सूचना देते रहते थे। न्याय करते समय किसी के साथ पक्षपात नहीं किया जाता था।

5. बौद्ध-धर्म का प्रचार-कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने बौद्ध-धर्म अपना लिया। उसने इस धर्म के प्रचार के लिए दूसरे देशों में भी प्रचारक भेजे। एक छोटे-से धर्म को विश्व धर्म बनाना अशोक जैसे महान् सम्राट् का ही कार्य था।

6. शान्तिप्रिय-कलिंग युद्ध के पश्चात् अशोक को युद्धों से घृणा हो गई। उसने युद्धों को त्याग दिया और शान्ति का पुजारी बन गया।

7. कला-अशोक के राज्यकाल में कला में बहुत उन्नति हुई। उसने अनेक स्तूपों और विहारों का निर्माण करवाया। उसने श्रीनगर और देवपटन नामक दो नए नगर भी बसाए।

8. अशोक धम्म-अशोक ने अपने प्रजा के नैतिक उत्थान के लिए धम्म का प्रचार किया। इसके अनुसार मनुष्य को सदाचार का जीवन बिताना चाहिए और माता-पिता तथा गुरुजनों का सत्कार करना चाहिए।

9. धार्मिक सहनशीलता-अशोक सभी धर्मों का एक समान आदर करता था। इसलिए उसने बौद्ध-धर्म के प्रचार के साथ-साथ अन्य धर्मों की सहायता की। इस बात से उसकी महानता का पता चलता है।

10. विशाल साम्राज्य-अशोक का राज्य विशाल था। उसने शासक बनने के बाद इसका और भी विस्तार किया। उसका राज्य हिमालय से लेकर कर्नाटक तक, खाड़ी बंगाल से हिन्दुकुश तक और पश्चिम में अरब सागर तक फैला हुआ था।
“Every creature has the right to retain the breath of life until the last moment permitted by nature.”

11. पड़ोसी राज्यों की सहायता-अशोक ने पड़ोसी राज्यों में सेनाएं भेजने की बजाय प्रचारक भेजे। उसने दूसरे देशों को दवाइयां आदि भेज कर भी उनकी सहायता की। यह बात उसकी महानता की प्रतीक है।
इन कार्यों को देखते हुए हम कह सकते हैं कि अशोक वास्तव में ही इतिहास के महान् सम्राटों में से एक था। डॉ० आर० के० मुखर्जी ने ठीक ही कहा है, “विश्व के इतिहास में अशोक के समान कोई उदाहरण मिलना कठिन है।”

प्रश्न 9. मौर्य साम्राज्य के पतन के कारणों का विश्लेषण करें। ब्राह्मणों की इसमें क्या भूमिका थी ?
उत्तर-मौर्य साम्राज्य के पतन के कारणों का वर्णन इस प्रकार है

  • अयोग्य उत्तराधिकारी-अशोक के बाद राज्य की बागडोर दशरथ, सम्प्रति और वृहद्रथ जैसे राजाओं के हाथों में आ गई। ये सभी शासक शासन चलाने के अयोग्य थे।
  • विस्तृत साम्राज्य-अशोक के समय में मौर्य साम्राज्य काफ़ी विस्तृत हो गया था। अशोक के निर्बल उत्तराधिकारी इस विशाल साम्राज्य की रक्षा न कर सके।
  • उत्तराधिकारी के नियम का अभाव-मौर्य वंश के उत्तराधिकारी का कोई विशेष निवेश नहीं था। अतः एक शासक के मरते ही राजकुमारों में राजगद्दी के लिए युद्ध छिड़ जाता था। स्वयं अशोक ने अपने 99 भाइयों का वध करके राजगद्दी प्राप्त की थी। इन गृह-युद्धों के कारण मौर्य शक्ति क्षीण होती गई।
  • आन्तरिक विद्रोह-अशोक की मृत्यु के बाद उसके साम्राज्य में आन्तरिक विद्रोह आरम्भ हो गया। अनेक प्रान्तीय गवर्नरों ने अपने आपको स्वतन्त्र घोषित कर दिया। फलस्वरूप मौर्य साम्राज्य छिन्न-भिन्न होने लगा।
  • धन का अभाव-राज्य को चलाने के लिए धन का बड़ा महत्त्व होता है, परन्तु अशोक ने बौद्ध-धर्म के प्रचार तथा जनहित कार्यों पर बड़ी उदारता से खर्च किया। फलस्वरूप राजकोश खाली हो गया और धन के अभाव में न तो प्रशासन को ठीक ढंग से चलाया जा सका और न ही विद्रोहों को दबाया जा सका।
  • कर्मचारियों के अत्याचार-मौर्य साम्राज्य के दूर स्थित प्रान्तों का शासन प्रबन्ध अच्छा नहीं था। वहां सरकारी कर्मचारी लोगों पर बड़े अत्याचार करते थे। धीरे-धीरे ये अत्याचार इतने अधिक बढ़ गए कि लोग विद्रोह करने पर उतर आए।
  • सैनिक शक्ति की कमी-कलिंग युद्ध के पश्चात् अशोक ने युद्ध न करने का निर्णय किया। उसने सैनिक शक्ति बढ़ाने की ओर ध्यान देना भी छोड़ दिया। परिणामस्वरूप मौर्य वंश की सैनिक शक्ति कम हो गई।
  • विदेशी आक्रमण-मौर्य राज्य को निर्बल होते देखकर विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत के सीमान्त प्रदेशों पर आक्रमण करने आरम्भ कर दिए। उनके आक्रमणों से मौर्य शक्ति को बड़ी क्षति पहुंची। इस प्रकार मौर्य वंश का धीरे-धीरे अन्त हो गया।
  • ब्राह्मणों की शत्रुता-अशोक के समय हिन्दू-धर्म का काफ़ी पतन हुआ। ब्राह्मण इस बात को सहन न कर सके और वे मौर्य वंश के विरुद्ध हो गए। आखिर एक ब्राह्मण सेनापति ने मौर्य वंश के अन्तिम शासक का वध कर दिया। इस प्रकार मौर्य वंश का पूरी तरह पतन हो गया।