Class 12 Sociology Solutions Chapter 5 वर्ग असमानताएं

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (TEXTUAL QUESTIONS)

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

A. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1. ‘सभी समाजों के अस्तित्व का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है।’ किसका कथन है :
(क) कार्ल मार्क्स
(ख) वी० आई० लेनिन
(ग) एनटोनियो ग्रामसी
(घ) रोसा लक्समबर्ग।
उत्तर-(क) कार्ल मार्क्स।

प्रश्न 2. ‘अपने आप में वर्ग’ और ‘अपने आप के लिए वर्ग’ की अवधारणा किसने दी है ?
(क) मार्क्स
(ख) वैबर
(ग) सोरोकिन
(घ) कोई भी नहीं।
उत्तर-(क) मार्क्स।

प्रश्न 3. ऐरिक आलिन राइट द्वारा दिया गया वर्ग सिद्धान्त किनके विचारों का संश्लेषण करते हैं ?
(क) मार्क्स और दुखीम
(ख) मार्क्स और वैबर
(ग) मार्क्स और स्पैंसर
(घ) मार्क्स और एंजेल्स।
उत्तर-(क) मार्क्स और दुर्थीम।

प्रश्न 4. सम्पत्तिविहीन सफेदपोश व्यावसायिक वर्ग की एक वर्ग के रूप में चर्चा किसने की है ?
(क) कार्ल मार्क्स
(ख) मैक्स वैबर
(ग) लॉयड वार्नर
(घ) विलफ्रिडो-पेरिटो।
उत्तर-(ख) मैक्स वैबर।

प्रश्न 5. जाति व वर्ग में भिन्नता को कौन नहीं दर्शाता :
(क) आरोपित व उपलब्धियां
(ख) बंद व मुक्त गतिशीलता
(ग) पवित्र व धर्म निरपेक्ष
(घ) शासक एवं शासित।
उत्तर-(घ) शासक एवं शासित।

प्रश्न 6. निम्नलिखित में कौन-सा उत्पादन का साधन नहीं है ?
(क) भूमि
(ख) संस्कृति
(ग) श्रम
(घ) पूंजी।
उत्तर-(ख) संस्कृति।

प्रश्न 7. निम्नलिखित में से कौन जीवन अवसरों व बाजार स्थितियों को वर्ग विश्लेषण के लिए महत्त्व देते हैं ?
(क) कार्ल मार्क्स
(ख) मैक्स वैबर
(ग) एलफ्रेड वेबर
(घ) सी० डब्ल्यू० मिल्स।
उत्तर-(क) कार्ल मार्क्स।

प्रश्न 8. भारत में उत्पादन के संसाधनों के स्वामित्व का निर्णायक कारण कौन-सा है ?
(क) स्थिति समूह
(ख) वर्ग
(ग) जाति
(घ) सामाजिक श्रेणी।
उत्तर-(ग) जाति।

प्रश्न 9. कृषिदास (खेतीहर मज़दूर) वर्ग का विरोधी है :
(क) सामंत
(ख) छोटे स्तर के पूंजीपति
(ग) बुर्जुआ
(घ) स्वामी।
उत्तर-(क) सामंत।

B. रिक्त स्थान भरें-

1. वर्ग प्रणाली स्वभाव में ……………… है।
2. वर्ग प्रणाली स्तर में ………………..
3. वैबर ने वर्ग के …………………… पद पर विचार किया है।
4. व्यक्ति का वर्ग स्तर …………………… एवं …………………… द्वारा निर्धारित होता है।
उत्तर-

  1. सार्वभौमिक,
  2. मुक्त,
  3. आर्थिक,
  4. शिक्षा, व्यवसाय।

C. सही/ग़लत पर निशान लगाएं

1. सामाजिक वर्ग दासता, दर्जा, जागीरदारी तथा जाति की तरह स्तरीकरण का ही एक रूप है।
2. एक सामाजिक वर्ग अनिवार्य रूप से एक स्थिति समूह होता है।
3. वैबर के अनुसार धन, शक्ति तथा स्थिति असमानता के रूप हैं।
4. सामाजिक वर्ग मुक्त समूह हैं।
उत्तर-

  1.  सही
  2. सही
  3. सही
  4. सही।

D. निम्नलिखित शब्दों का मिलान करें-

कॉलम ‘ए’ — कॉलम ‘बी’
सामाजिक वर्ग — बुर्जुआ
पूंजीपति — विशेष वर्ग की जीवन शैली
वर्ग के निर्धारक — मुक्त समूह
कॉलम ‘ए’ — कॉलम ‘बी’
वर्ग चेतना — व्यवसाय
जीने का ढंग — आत्म जागरुकता
उत्तर-
कॉलम ‘ए’ — कॉलम ‘बी’
सामाजिक वर्ग — मुक्त समूह
पूंजीपति — बुर्जुआ
वर्ग के निर्धारक — व्यवसाय
वर्ग चेतना — आत्म जागरुकता
जीने का ढंग — विशेष वर्ग की जीवन शैली

II. अति लघु उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1. किस सामाजिक समूह में सदस्यों का उत्पादन की शक्तियों के साथ समान सम्बन्ध होता है ?
उत्तर-पूंजीपति वर्ग में।

प्रश्न 2. क्या वर्ग में किसी की उर्ध्वगामी व निम्नगामी गतिशीलता हो सकता है ?
उत्तर-जी हाँ, यह मुमकिन है।

प्रश्न 3. विभिन्न सामाजिक आर्थिक स्थितियों में समूहों के विभाजन को क्या कहा जाता है ?
उत्तर-वर्ग व्यवस्था।

प्रश्न 4. व्यक्तियों का कौन-सा सामाजिक वर्ग नीले कॉलर अथवा श्रम व्यवसाय की रचना करता है ?
उत्तर-श्रमिक वर्ग या मज़दूर वर्ग।

प्रश्न 5. वर्ग की दो महत्त्वपूर्ण विशेषताओं को दर्शाइए।
उत्तर-(i) वर्ग व्यवस्था के कई आधार होते हैं। (ii) वर्ग के लोगों में अपने वर्ग के प्रति चेतना होती है।

प्रश्न 6. आप संसाधनों के स्वामित्व से क्या समझते हैं ?
उत्तर- इसका अर्थ है कि साधनों पर किसी-न-किसी का व्यक्तिगत अधिकार होता है तथा वह ही उसका मालिक होता है।

प्रश्न 7. उत्पादन के साधनों को पहचानें।
उत्तर-वह साधन जो किसी न किसी वस्तु के उत्पादन में सहायता करते हैं, उत्पादन के साधन होते हैं जैसे कि मशीनें, उद्योग, औज़ार इत्यादि।

प्रश्न 8. उन दो वर्गों के नाम दें जो दासता के समय पाए गए।
उत्तर-दासता के समय दो वर्ग होते थे तथा वे थे गुलाम तथा स्वामी।

प्रश्न 9. बुर्जुआ कौन है ?
उत्तर-जिसके हाथों में उत्पादन के साधन होते हैं तथा जो उन साधनों की सहायता से अन्य वर्गों का शोषण करता है उसे बुर्जुआ कहते हैं। जैसे कि उद्योगपति।

III. लघु उत्तरों वाले प्रश्न-

प्रश्न 1. वर्ग से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-वर्ग ऐसे व्यक्तियों का समूह है जो एक-दूसरे को समान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेणी की स्थिति समाज में अपनी ही होती है। इसके अनुसार वर्ग के प्रत्येक सदस्य को कुछ विशेष उत्तरादियत्व, अधिकार तथा शक्तियां भी प्राप्त होती हैं।

प्रश्न 2. जाति व वर्ग में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर-

  • जाति में व्यक्ति की स्थिति प्रदत्त होती है, जबकि वर्ग में यह अर्जित होती है।
  • व्यक्ति अपनी जाति को परिवर्तित नहीं कर सकता जबकि वर्ग को कर सकता है।
  • मुख्यतः चार प्रकार की जातियां होती हैं जबकि वर्ग हज़ारों की संख्या में हो सकते हैं।

प्रश्न 3. ग्रामीण भारत में पाए जाने वाले वर्गों की पहचान करें।
उत्तर-बड़े ज़मींदार, गैर-हाज़िर ज़मींदार, पूँजीपति किसान, किसान, ठेका आधारित ठेकेदार, सीमांत किसान, भूमिविहीन कृषक, साहूकार, छोटे व्यापारी, स्वैः नियुक्त व्यक्ति इत्यादि।

प्रश्न 4. मार्क्स के इस कथन का क्या अभिप्राय है कि ‘सभी मौजूद समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है।’
उत्तर-मार्क्स के अनुसार आज तक जितने भी समाज हुए हैं उनमें मुख्य रूप से दो समूह हुए हैं-प्रथम वह जिसके पास उत्पादन के साधन हैं तथा द्वितीय वह जिसके पास नहीं है। इस कारण दोनों में संघर्ष चलता रहा है। इस कारण मार्क्स ने कहा था कि सभी मौजूद समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है।

प्रश्न 5. मैक्स वैबर द्वारा वर्णित किए गए वर्गों के नाम लिखें।
उत्तर-

  • पूंजीपति बुर्जुआ वर्ग
  • सम्पत्ति विहीन सफेद पोश कार्यकारी वर्ग
  • मध्यवर्गीय वर्ग
  • औद्योगिक कार्यकारी वर्ग।

IV. दीर्घ उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1. ऐरिक ओलिन राइट के वर्ग विषयक विचारों की चर्चा करें।
उत्तर-ऐरिक ओलिन राइट ने वर्ग का सिद्धांत दिया है तथा यह सिद्धांत मार्क्स वैबर के विचारों का मिश्रण है। राइट के अनुसार पूँजीपति समाज में आर्थिक साधनों पर नियंत्रण के लिए तीन मापदण्ड हैं तथा वह हैं-

  • पैसा या पूँजी पर नियन्त्रण ।
  • ज़मीन, फैक्टरी तथा दफ्तरों पर नियन्त्रण
  • मज़दूरों पर नियन्त्रण।।

यह मापदण्ड ही कई वर्गों का निर्माण करते हैं जैसे कि नीली वर्दी वाले कर्मी, श्वेत कालर कर्मी, व्यावसायिक कर्मचारी व शारीरिक कार्य करने वाले कर्मी इत्यादि। उसके अनुसार मध्य वर्ग के वर्करों (प्रबन्धक व निरीक्षक) का मालिकों से सीधा रिश्ता होता है जबकि मजदूर वर्ग का शोषण होता है।

प्रश्न 2. जाति व वर्ग में संबंध स्पष्ट करें।
अथवा
जाति तथा वर्ग किस प्रकार परस्पर सम्बन्धित है ? वर्णन कीजिए।
उत्तर-

  • जाति जन्म पर आधारित होती है जबकि वर्ग व्यवसाय तथा व्यक्तिगत योग्यता पर आधारित होता है।
  • जाति में प्रदत्त स्थिति प्राप्त होती है जबकि वर्ग में स्थिति अर्जित की जाती है।
  • जाति अन्तर्वैवाहिक समूह होती है, जबकि वर्ग बर्हिविवाही समूह होता है।
  • जाति को वैधता हिंदू धार्मिक क्रियाओं से मिलती है परन्तु वर्ग को वैधता उसकी व्यक्तिगत योग्यता तथा पूँजीवादी व्यवस्था से मिलती है।
  • जाति में गतिशीलता नहीं होती है क्योंकि यह एक बंद व्यवस्था है परन्तु वर्ग में गतिशीलता होती है क्योंकि यह एक मुक्त व्यवस्था है।

प्रश्न 3. ग्रामीण भारत में पाए जाने वाले वर्गों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर-बड़े ज़मींदार, गैर-हाज़िर ज़मींदार, पूँजीपति किसान, किसान, ठेका आधारित ठेकेदार, सीमांत किसान, भूमिविहीन कृषक, साहूकार, छोटे व्यापारी, स्वैः नियुक्त व्यक्ति इत्यादि।

प्रश्न 4. शहरी भारत में पाए जाने वाले वर्गों का संक्षेप में वर्णन करें।
अथवा
नगरीय भारत में पाए जाने वाले वर्गों को लिखिए।
उत्तर-

  • कार्पोरेट पूंजीपति।
  • औद्योगिक पूंजीपति।
  • आर्थिक पूंजीपति।
  • नौकरशाह।
  • सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा आर्थिक अभिजात वर्ग।
  • मध्य वर्ग-मैनेजर, व्यापारी, छोटे दुकानदार, स्वै-कार्यरत व्यक्ति, बैंकर।
  • निम्न वर्ग-सहायक, मिस्त्री, निम्न स्तरीय निरीक्षक।
  • संगठित क्षेत्र में औद्योगिक कार्यरत वर्ग।
  • असंगठित/अर्द्ध संगठित क्षेत्र में कार्यरत वर्ग।
  • दिहाड़ीदार मज़दूर।
  • बेरोज़गार व्यक्ति।

प्रश्न 5. मध्य वर्ग पर कुछ टिप्पणी कीजिए।
उत्तर-अमीर तथा निर्धन व्यक्तियों के बीच एक अन्य वर्ग आता है जिसे मध्य वर्ग का नाम दिया जाता है। यह वर्ग साधारणतया तथा नौकरी करने वालों, छोटे दुकानदारों या व्यापारी लोगों का होता है। यह वर्ग या तो उच्च वर्ग के लोगों के पास नौकरी करता है या सरकारी नौकरी करता है। छोटे-बड़े व्यापारी, छोटे-बड़े दुकानदार, क्लर्क, छोटे-बड़े अफसर, छोटे-बड़े किसान, ठेकेदार, जायदाद का कार्य करने वाले लोग, छोटे-मोटे कलाकार इत्यादि सभी इस वर्ग में आते हैं। उच्च वर्ग इस वर्ग की सहायता से निम्न वर्ग पर अपना अधिकार कायम रखता है।

V. अति दीर्घ उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1. मार्क्सवादी के वर्ग सिद्धान्त का वर्णन करें।
अथवा
वर्ग के मार्क्सवादी सिद्धान्त को बताइए।
उत्तर-कार्ल मार्क्स ने सामाजिक स्तरीकरण का संघर्षवाद का सिद्धान्त दिया है और यह सिद्धान्त 19वीं शताब्दी के राजनीतिक और सामाजिक संघर्षों के कारण ही आगे आया है। मार्क्स ने केवल सामाजिक कारकों को ही सामाजिक स्तरीकरण एवं अलग-अलग वर्गों में संघर्ष का सिद्धान्त माना है। ___ मार्क्स ने यह सिद्धान्त श्रम विभाजन के आधार पर दिया। उसके अनुसार श्रम दो प्रकार का होता है-शारीरिक एवं बौद्धिक श्रम और यही अन्तर ही सामाजिक वर्गों में संघर्ष का कारण बना।

मार्क्स का कहना है कि समाज में साधारणतः दो वर्ग होते हैं। पहला वर्ग उत्पादन के साधनों का स्वामी होता है। दूसरा वर्ग उत्पादन के साधनों का मालिक नहीं होता है। इस मलकीयत के आधार पर ही पहला वर्ग उच्च स्थिति में एवं दूसरा वर्ग निम्न स्थिति में होता है। मार्क्स पहले (मालिक) वर्ग को पूंजीपति वर्ग और दूसरे (गैर-मालिक) वर्ग को मज़दूर वर्ग कहता है। पूंजीपति वर्ग, मजदूर वर्ग का आर्थिक रूप से शोषण करता है और मज़दूर वर्ग अपने आर्थिक अधिकारों की प्राप्ति हेतु पूंजीपति वर्ग से संघर्ष करता है। यही स्तरीकरण का परिणाम है।

मार्क्स का कहना है कि स्तरीकरण के आने का कारण ही सम्पत्ति का असमान विभाजन है। स्तरीकरण की प्रकृति उस समाज के वर्गों पर निर्भर करती है और वर्गों की प्रकृति उत्पादन के तरीकों पर उत्पादन का तरीका तकनीक पर निर्भर करता है। वर्ग एक समूह होता है जिसके सदस्यों के सम्बन्ध उत्पादन की शक्तियों के समान होते हैं, इस तरह वह सभी व्यक्ति जो उत्पादन की शक्तियों पर नियन्त्रण रखते हैं। वह पहला वर्ग यानि कि पूंजीपति वर्ग होता है जो उत्पादन की शक्तियों का मालिक होता है। दूसरा वर्ग वह है तो उत्पादन की शक्तियों का मालिक नहीं है बल्कि वह मजदूरी या मेहनत करके अपना समय व्यतीत करता है यानि कि यह मजदूर वर्ग कहलाता है। अलग-अलग समाजों में इनके अलगअलग नाम हैं जिनमें ज़मींदारी समाज में ज़मींदार और खेतीहर मज़दूर और पूंजीपति समाज में पूंजीपति एवं मजदूर। पूंजीपति वर्ग के पास उत्पादन की शक्ति होती है और मजदूर वर्ग के पास केवल मज़दूरी होती है जिसकी सहायता के साथ वह अपना गुजारा करता है। इस प्रकार उत्पादन के तरीकों एवं सम्पत्ति के समान विभाजन के आधार पर बने वर्गों को मार्क्स ने सामाजिक वर्ग का नाम दिया है।

मार्क्स के अनुसार “आज का समाज चार युगों में से गुजर कर हमारे सामने आया है।”

(a) प्राचीन समाजवादी युग (Primitive Ancient Society or Communism)
(b) प्राचीन समाज (Ancient Society)
(c) सामन्तवादी युग (Feudal Society)
(d) पूंजीवाद युग (Capitalist Society)।

मार्क्स के अनुसार पहले प्रकार के समाज में वर्ग अस्तित्व में नहीं आये थे। परन्तु उसके पश्चात् के समाजों में दो प्रमुख वर्ग हमारे सामने आये। प्राचीन समाज में मालिक एवं दास। सामन्तवादी में सामन्त एवं खेतीहारी मज़दूर वर्ग। पूंजीवादी समाज में पूंजीवादी एवं मज़दूर वर्ग। प्रायः समाज में मजदूरी का कार्य दूसरे वर्ग के द्वारा ही किया गया। मजदूर वर्ग बहुसंख्यक होता है और पूंजीवादी वर्ग कम संख्या वाला।

मार्क्स ने प्रत्येक समाज में दो प्रकार के वर्गों का अनुभव किया है। परन्तु मार्क्स के फिर भी इस मामले में विचार एक समान नहीं है। मार्क्स कहता है कि पूंजीवादी समाज में तीन वर्ग होते हैं। मज़दूर, सामन्त एवं ज़मीन के मालिक (land owners) मार्क्स ने इन तीनों में से अन्तर आय के साधनों, लाभ एवं ज़मीन के किराये के आधार पर किया है। परन्तु मार्क्स की तीन पक्षीय व्यवस्था इंग्लैण्ड में कभी सामने नहीं आई।

मार्क्स ने कहा था कि पूंजीवाद के विकास के साथ-साथ तीन वर्गीय व्यवस्था दो वर्गीय व्यवस्था में परिवर्तित हो जायेगी एवं मध्यम वर्ग समाप्त हो जायेगा। इस बारे में उसने कम्युनिष्ट घोषणा पत्र में कहा है। मार्क्स ने विशेष समाज के अन्य वर्गों का उल्लेख भी किया है। जैसे बुर्जुआ या पूंजीपति वर्ग को उसने दो उपवर्ग जैसे प्रभावी बुर्जुआ और छोटे बुर्जुआ वर्गों में बांटा है। प्रभावी बुर्जुआ वे होते हैं जो बड़े-बड़े पूंजीपति व उद्योगपति होते हैं और जो हज़ारों की संख्या में मजदूरों को कार्य करने को देते हैं। छोटे बुर्जुआ वे छोटे उद्योगपति या दुकानदार होते हैं जिनके व्यापार छोटे स्तर पर होते हैं और वे बहुत अधिक मज़दूरों को कार्य नहीं दे सकते। वे काफ़ी सीमा तक स्वयं ही कार्य करते हैं। मार्क्स यहां पर फिर कहता है कि पूंजीवाद के विकसित होने के साथ-साथ मध्यम वर्ग व छोटी-छोटी बुर्जुआ उप-जातियां समाप्त हो जाएंगी या फिर मज़दूर वर्ग में मिल जाएंगी। इस तरह समाज में पूंजीपति व मजदूर वर्ग रह जाएगा।

वर्गों के बीच सम्बन्ध (Relationship between Classes) –

मार्क्स के अनुसार “पूंजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग का आर्थिक शोषण करता रहता है और मज़दूर वर्ग अपने अधिकारों के लिये संघर्ष करता रहता है। इस कारण दोनों वर्गों के बीच के सम्बन्ध विरोध वाले होते हैं। यद्यपि कुछ समय के लिये दोनों वर्गों के बीच का विरोध शान्त हो जाता है परन्तु वह विरोध चलता रहता है। यह आवश्यक नहीं कि यह विरोध ऊपरी तौर पर ही दिखाई दे। परन्तु उनको इस विरोध का अहसास तो होता ही रहता है।”

मार्क्स के अनुसार वर्गों के बीच आपसी सम्बन्ध, आपसी निर्भरता एवं संघर्ष पर आधारित होते हैं। हम उदाहरण ले सकते हैं पूंजीवादी समाज के दो वर्गों का। एक वर्ग पूंजीपति का होता है दूसरा वर्ग मज़दूर का होता है। यह दोनों वर्ग अपने अस्तित्व के लिये एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। मज़दूर वर्ग के पास उत्पादन की शक्तियां एक मलकीयत नहीं होती हैं। उसके पास रोटी कमाने हेतु अपनी मेहनत के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। वह रोटी कमाने के लिये पूंजीपति वर्ग के पास अपनी मेहनत बेचते हैं और उन पर ही निर्भर करते हैं। वह अपनी मजदूरी पूंजीपतियों के पास बेचते हैं जिसके बदले पूंजीपति उनको मेहनत का किराया देता है। इसी किराये के साथ मज़दूर अपना पेट पालता है। पूंजीपति भी मज़दूरों की मेहनत पर ही निर्भर करता है। क्योंकि मजदूरों के बिना कार्य किये न तो उसका उत्पादन हो सकता है और न ही उसके पास पूंजी एकत्रित हो सकती है। – इस प्रकार दोनों वर्ग एक-दूसरे के ऊपर निर्भर हैं। परन्तु इस निर्भरता का अर्थ यह नहीं है कि उनमें सम्बन्ध एक समान होते हैं।

पूंजीपति वर्ग मजदूर वर्ग का शोषण करता है। वह कम धन खर्च करके अधिक उत्पादन करना चाहता है ताकि उसका स्वयं का लाभ बढ़ सके। मज़दूर अधिक मज़दूरी मांगता है ताकि वह अपना व परिवार का पेट पाल सके। उधर पूंजीपति मज़दूरों को कम मजदूरी देकर वस्तुओं को ऊँची कीमत पर बेचने की कोशिश करता है ताकि उसका लाभ बढ़ सके। इस प्रकार दोनों वर्गों के भीतर अपने-अपने हितों के लिये संघर्ष (Conflict of Interest) चलता रहता है। यह संघर्ष अन्ततः समतावादी व्यवस्था (Communism) को जन्म देगा जिसमें न तो विरोध होगा न ही किसी का शोषण होगा, न ही किसी के ऊपर अत्याचार होगा, न ही हितों का संघर्ष होगा और यह समाज वर्ग रहित समाज होगा।

कार्ल मार्क्स ने ऐतिहासिक आधार पर स्तरीकरण के संघर्ष सिद्धान्त की व्याख्या की है। मार्क्स के स्तरीकरण के संघर्ष के सिद्धान्त में निम्नलिखित बातें मुख्य हैं-

1. समाज में दो वर्ग (Two classes in society) मार्क्स का कहना था कि प्रत्येक प्रकार के समाज में साधारणत: दो वर्ग पाए जाते हैं। पहला तो वह जिसके हाथों में उत्पादन के साधन होते हैं तथा जिसे हम आज पूंजीपति के नाम से जानते हैं। दूसरा वर्ग वह होता है जिसके पास उत्पादन के साधन नहीं होते तथा जो अपना श्रम बेचकर गुज़ारा करता है। इसको मज़दूर वर्ग का नाम दिया जाता है। पहला वर्ग शोषण करता है तथा दूसरा वर्ग शोषित होता है।

2. उत्पादन के साधनों पर अधिकार (Right over means of production)-मार्क्स ने स्तरीकरण की ऐतिहासिक आधार पर व्याख्या करते हुए कहा है कि समाज में स्तरीकरण उत्पादन के साधनों पर अधिकार के आधार पर होता है। प्रत्येक समाज में इस आधार पर दो वर्ग पाए जाते हैं। पहला वर्ग वह होता है जिसके पास उत्पादन के साधनों पर अधिकार होता है। दूसरा वर्ग वह होता है जिसके पास उत्पादन के साधन नहीं होते तथा जो अपना श्रम बेचकर रोज़ी कमाता है।

3. उत्पादन की व्यवस्था (Modes of Production)-उत्पादन की व्यवस्था पर ही सामाजिक स्तरीकरण का स्वरूप निर्भर करता है। जिस वर्ग के पास उत्पादन के साधन होते हैं उसकी स्थिति अन्य वर्गों से उच्च होती है। इस वर्ग को मार्क्स ने पूंजीपति या बुर्जुआ (Bourgeoisie) का नाम दिया है। दूसरा वर्ग वह होता है जिसके पास उत्पादन के साधन नहीं होते, जो अपनी स्थिति से सन्तुष्ट नहीं होता तथा अपनी स्थिति को बदलना चाहता है। इसको मार्क्स ने मज़दूर या प्रोलतारी (Proletariat) का नाम दिया है।

4. मनुष्यों का इतिहास-वर्ग संघर्ष का इतिहास (Human history-History of Class Struggle)-मार्क्स का कहना है कि मनुष्यों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है। हम किसी भी समाज की उदाहरण ले सकते हैं। प्रत्येक समाज में अलग-अलग वर्गों में किसी-न-किसी रूप में संघर्ष तो चलता ही रहा है। __ इस तरह मार्क्स का कहना था कि सभी समाजों में साधारणतः पर दो वर्ग रहे हैं-मज़दूर तथा पूंजीपति वर्ग। दोनों में वर्ग संघर्ष चलता ही रहता है। इन में वर्ग संघर्ष के कई कारण होते हैं जैसे कि दोनों वर्गों में बहुत ज्यादा आर्थिक अन्तर होता है जिस कारण वह एक-दूसरे का विरोध करते हैं। पूंजीपति वर्ग बिना परिश्रम किए ही अमीर होता चला जाता है तथा मज़दूर वर्ग सारा दिन परिश्रम करने के बाद भी ग़रीब ही बना रहता है।

समय के साथ-साथ मज़दूर वर्ग अपने हितों की रक्षा के लिए संगठन बना लेता है तथा यह संगठन पूंजीपतियों से अपने अधिकार लेने के लिए संघर्ष करते हैं। इस संघर्ष का परिणाम यह होता है कि समय आने पर मज़दूर वर्ग पूंजीपति वर्ग के विरुद्ध क्रान्ति कर देता है तथा क्रान्ति के बाद पूंजीपतियों का खात्मा करके अपनी सत्ता स्थापित कर लेते हैं। पूंजीपति अपने पैसे की मदद से प्रति क्रान्ति की कोशिश करेंगे परन्तु उनकी प्रति क्रान्ति को दबा दिया जाएगा तथा मजदूरों की सत्ता स्थापित हो जाएगी। पहले साम्यवाद तथा फिर समाजवाद की स्थिति आएगी जिसमें हरेक को उसकी ज़रूरत तथा योग्यता के अनुसार मिलेगा। समाज में कोई वर्ग नहीं होगा तथा यह वर्गहीन समाज होगा जिसमें सभी को बराबर का हिस्सा मिलेगा। कोई भी उच्च या निम्न नहीं होगा तथा मज़दूर वर्ग की सत्ता स्थापित रहेगी। मार्क्स का कहना था कि चाहे यह स्थिति अभी नहीं आयी है परन्तु जल्द ही यह स्थिति आ जाएगी तथा समाज में से स्तरीकरण खत्म हो जाएगा।

प्रश्न 2. वैबर के वर्ग सिद्धान्त का वर्णन करें।
अथवा
वर्ग के वैबर सिद्धान्त की चर्चा कीजिए।
अथवा
वैबर के वर्ग सिद्धान्त की चर्चा करें।
उत्तर-मैक्स वैबर ने वर्ग का सिद्धान्त दिया था जिसमें उसने वर्ग, स्थिति समूह तथा दल की अलग-अलग व्याख्या की थी। वैबर का स्तरीकरण का सिद्धान्त तर्कसंगत तथा व्यावहारिक माना जाता है। यही कारण है कि अमेरिकी समाजशास्त्रियों ने इस सिद्धान्त को काफ़ी महत्त्व प्रदान किया है। वैबर ने स्तरीकरण को तीन पक्षों से समझाया है तथा वह है वर्ग, स्थिति तथा दल। इन तीनों ही समूहों को एक प्रकार से हित समूह कहा जा सकता है जो न केवल अपने अंदर लड़ सकते हैं बल्कि यह एक-दूसरे के विरुद्ध भी लड़ सकते हैं। यह एक विशेष सत्ता के बारे में बताते हैं तथा आपस में एक-दूसरे से संबंधित भी होते हैं। अब हम इन तीनों का अलग-अलग विस्तार से वर्णन करेंगे।

वर्ग (Class)-मार्ल मार्क्स ने वर्ग की परिभाषा आर्थिक आधार पर दी थी तथा उसी प्रकार वैबर ने भी वर्ग की धारणा आर्थिक आधार पर दी है। वैबर के अनुसार, “वर्ग ऐसे लोगों का समूह होता है जो किसी समाज के आर्थिक मौकों की संरचना में समान स्थिति में होता है तथा जो समान स्थिति में रहते हैं। “यह स्थितियां उनकी आर्थिक शक्ति के रूप तथा मात्रा पर निर्भर करती है।” इस प्रकार वैबर ऐसे वर्ग की बात करता है जिसमें लोगों की एक विशेष संख्या के लिए जीवन के मौके एक समान होते हैं। चाहे वैबर की यह धारणा मार्क्स की वर्ग की धारणा से अलग नहीं है परन्तु वैबर ने वर्ग की कल्पना समान आर्थिक स्थितियों में रहने वाले लोगों के रूप में की है आत्म चेतनता समूह के रूप में नहीं। वैबर ने वर्ग के तीन प्रकार बताए हैं जोकि निम्नलिखित हैं :

(1) सम्पत्ति वर्ग (A Property Class)
(2) अधिग्रहण वर्ग (An Acquisition Class)
(3) सामाजिक वर्ग (A Social Class)।

1. सम्पत्ति वर्ग (A Property Class)-सम्पत्ति वर्ग वह वर्ग होता है जिस की स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि उनके पास कितनी सम्पत्ति अथवा जायदाद है। यह वर्ग आगे दो भागों में बांटा गया है-

(i) सकारात्मक रूप से विशेष अधिकार प्राप्त सम्पत्ति वर्ग (The Positively Privileged Property Class)—इस वर्ग के पास काफ़ी सम्पत्ति तथा जायदाद होती है तथा यह इस जायदाद से हुई आय पर अपना गुज़ारा करता है। यह वर्ग उपभोग करने वाली वस्तुओं के खरीदने या बेचने, जायदाद इकट्ठी करके अथवा शिक्षा लेने के ऊपर अपना एकाधिकार कर सकता है।
(ii) नकारात्मक रूप से विशेष अधिकार प्राप्त सम्पत्ति वर्ग (The Negatively Privileged Property Class)—इस वर्ग के मुख्य सदस्य अनपढ़, निर्धन, सम्पत्तिहीन तथा कर्जे के बोझ नीचे दबे हुए लोग होते हैं। इन दोनों समूहों के साथ एक विशेष अधिकार प्राप्त मध्य वर्ग भी होता है जिसमें ऊपर वाले दोनों वर्गों के लोग शामिल होते हैं। वैबर के अनुसार पूंजीपति अपनी विशेष स्थिति होने के कारण तथा मज़दूर अपनी नकारात्मक रूप से विशेष स्थिति होने के कारण इस समूह में शामिल होता है।

2. अधिग्रहण वर्ग (An Acquisition Class)-यह उस प्रकार का समूह होता है जिस की स्थिति बाज़ार में मौजूदा सेवाओं का लाभ उठाने के मौकों के साथ निर्धारित होती है। यह समूह आगे तीन प्रकार का होता है-

  • सकारात्मक रूप से विशेष अधिकार प्राप्त अधिग्रहण वर्ग (The Positively Privileged Acquisition Class) इस वर्ग का उत्पादक फैक्टरी वालों के प्रबंध पर एकाधिकार होता है। यह फैक्ट्रियों वाले बैंकर, उद्योगपति, फाईनेंसर इत्यादि होते हैं। यह लोग प्रबंधकीय व्यवस्था को नियन्त्रण में रखने के साथ-साथ सरकारी आर्थिक नीतियों . पर भीषण प्रभाव डालते हैं।
  • विशेषाधिकार प्राप्त मध्य अधिग्रहण वर्ग (The Middle Privileged Acquisition Class)—यह वर्ग मध्य वर्ग के लोगों का वर्ग होता है जिसमें छोटे पेशेवर लोग, कारीगर, स्वतन्त्र किसान इत्यादि शामिल होते हैं।
  • नकारात्मक रूप से विशेष अधिकार प्राप्त अधिग्रहण वर्ग (The Negatively Privileged Acquisition Class)-इस वर्ग में छोटे वर्गों के लोग विशेषतया कुशल, अर्द्ध-कुशल तथा अकुशल मजदूर शामिल होते हैं।

3. सामाजिक वर्ग (Social Class)—इस वर्ग की संख्या काफी अधिक होती है। इसमें अलग-अलग पीढ़ियों की तरक्की के कारण निश्चित रूप से परिवर्तन दिखाई देता है। परन्तु वैबर सामाजिक वर्ग की व्याख्या विशेष अधिकारों के अनुसार नहीं करता। उसके अनुसार मजदूर वर्ग, निम्न मध्य वर्ग, बुद्धिजीवी वर्ग, सम्पत्ति वाले लोग इत्यादि इसमें शामिल होते हैं।

वैबर के अनुसार किन्हीं विशेष स्थितियों में वर्ग के लोग मिलजुल कर कार्य करते हैं तथा इस कार्य करने की प्रक्रिया को वैबर ने वर्ग क्रिया का नाम दिया है। वैबर के अनुसार अपनी संबंधित होने की भावना से वर्ग क्रिया उत्पन्न होती है। वैबर के अनुसार अपनी संबंधित होने की भावना से वर्ग क्रिया उत्पन्न होती है। वैबर ने इस बात पर विश्वास नहीं किया कि वर्ग क्रिया जैसी बात अक्सर हो सकती है। वैबर का कहना था कि वर्ग में वर्ग चेतनता नहीं होती बल्कि उनकी प्रकृति पूर्णतया आर्थिक होती है। उनमें इस बात की भी संभावना नहीं होती कि वह अपने हितों को प्राप्त करने के लिए इकट्ठे होकर संघर्ष करेंगे। एक वर्ग लोगों का केवल एक समूह होता है जिनकी आर्थिक स्थिति बाज़ार में एक जैसी होती है। वह उन चीजों को इकट्ठे करने में जीवन के ऐसे परिवर्तनों को महसूस करते हैं, जिनकी समाज में कोई इज्जत होती है तथा उनमें किसी विशेष स्थिति में वर्ग चेतना विकसित होने की तथा इकट्ठे होकर क्रिया करने की संभावना होती है। वैबर का कहना था कि अगर ऐसा होता है तो वर्ग एक समुदाय का रूप ले लेता है।

स्थिति समूह (Status Group)—स्थिति समूह को साधारणतया आर्थिक वर्ग स्तरीकरण के विपरीत समझा जाता है। वर्ग केवल आर्थिक मान्यताओं पर आधारित होता है जोकि समान बाज़ारी स्थितियों के कारण समान हितों वाला समूह है। परन्तु दूसरी तरफ स्थिति समूह सांस्कृतिक क्षेत्र में पाया जाता है यह केवल संख्यक श्रेणियों के नहीं होते बल्कि यह असल में वह समूह होते हैं जिनकी समान जीवन शैली होती है, संसार के प्रति समान दृष्टिकोण होता है तथा ये लोग आपस में एकता भी रखते हैं।

वैबर के अनुसार वर्ग तथा स्थिति समूह में अंतर होता है। हरेक का अपना ढंग होता है तथा इनमें लोग असमान हो सकते हैं। उदाहरण के लिए किसी स्कूल का अध्यापक। चाहे उसकी आय 8-10 हज़ार रुपये प्रति माह होगी जोकि आज के समय में कम है परन्तु उसकी स्थिति ऊंची है। परन्तु एक स्मगलर या वेश्या चाहे माह में लाखों कमा रहे हों परन्तु उनका स्थिति समूह निम्न ही रहेगी क्योंकि उनके पेशे को समाज मान्यता नहीं देता। इस प्रकार दोनों के समूहों में अंतर होता है। किसी पेशे समूह को भी स्थिति समूह का नाम दिया जाता है क्योंकि हरेक प्रकार के पेशे में उस पेशे से संबंधित लोगों के लिए पैसा कमाने के समान मौके होते हैं। यही समूह उनकी जीवन शैली को समान भी बनाते हैं। एक पेशा समूह के सदस्य एक-दूसरे के नज़दीक रहते हैं, एक ही प्रकार के कपड़े पहनते हैं तथा उनके मूल्य भी एक जैसे ही होते हैं। यही कारण है कि इसके सदस्यों का दायरा विशाल हो जाता है।

दल (Party) वैबर के अनुसार दल वर्ग स्थिति के साथ निर्धारित हितों का प्रतिनिधित्व करता है। यह दल किसी न किसी स्थिति में उन सदस्यों की भर्ती करता है जिनकी विचारधारा दल की विचारधारा से मिलती हो। परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि उनके लिए दल स्थिति दल ही बने। वैबर का कहना है कि दल हमेशा इस ताक में रहते हैं कि सत्ता उनके हाथ में आए अर्थात् राज्य या सरकार की शक्ति उनके हाथों में हो। वैबर का कहना है कि चाहे दल राजनीतिक सत्ता का एक हिस्सा होते हैं परन्तु फिर भी सत्ता कई प्रकार से प्राप्त की जा सकती है जैसे कि पैसा, अधिकार, प्रभाव, दबाव इत्यादि। दल राज्य की सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं तथा राज्य एक संगठन होता है। दल की हरेक प्रकार की क्रिया इस बात की तरफ ध्यान देती है कि सत्ता किस प्रकार प्राप्त की जाए। वैबर ने राज्य का विश्लेषण किया तथा इससे ही उसने नौकरशाही का सिद्धान्त पेश किया।

वैबर के अनुसार दल दो प्रकार के होते हैं। पहला है सरप्रस्ती का दल (Patronage Party) जिनके लिए कोई स्पष्ट नियम, संकल्प इत्यादि नहीं होते। यह किसी विशेष मौके के लिए बनाए जाते हैं तथा हितों की पूर्ति के बाद इन्हें छोड़ दिया जाता है। दूसरी प्रकार का दल है सिद्धान्तों का दल (Party of Principles) जिसमें स्पष्ट या मज़बूत नियम या सिद्धान्त होते हैं। यह दल किसी विशेष अवसर के लिए नहीं बनाए जाते। वैबर के अनुसार चाहे इन तीनों वर्ग, स्थिति समूह तथा दल में काफी अन्तर होता है परन्तु फिर भी इनमें आपसी संबंध भी मौजूद होता है।

प्रश्न 3. वर्ग, सामाजिक गतिशीलता व सामाजिक स्तरीकरण में पारस्परिक सम्बन्ध क्या है ? वर्णन करें।
उत्तर-वर्ग, सामाजिक गतिशीलता व सामाजिक स्तरीकरण में काफ़ी गहरा सम्बन्ध है परन्तु इस सम्बन्ध का जानने से पहले हमें इसका अर्थ देखना पड़ेगा।

  • वर्ग-वर्ग ऐसे लोगों का समूह है जो किसी-न-किसी आधार पर अन्य समूहों से अलग होता है। वर्ग के सदस्य अपने वर्ग के प्रति चेतन होते हैं तथा अन्य वर्गों के लोगों को अपने वर्ग में आसानी से नहीं आने देते। वर्ग के कई आधार होते हैं जैसे कि धन, सम्पत्ति, व्यवसाय इत्यादि।
  • सामाजिक गतिशीलता-सम्पूर्ण समाज अलग-अलग वर्गों में विभाजित होता है तथा इन वर्गों के लोगों के अपना वर्ग छोड़ कर दूसरे वर्ग में जाने की प्रक्रिया को सामाजिक गतिशीलता कहते हैं। लोग अपनी व्यक्तिगत योग्यता से अपना वर्ग परिवर्तित कर लेते हैं तथा इस कारण गतिशीलता की प्रक्रिया चलती रहती है।
  • सामाजिक स्तरीकरण-समाज को अलग-अलग स्तरों अथवा वर्गों में विभाजित करने की प्रक्रिया को सामाजिक स्तरीकरण कहते हैं। समाज को अलग-अलग आधारों पर विभाजित किया जाता है जैसे कि आय, जाति, लिंग, आयु, शिक्षा, धन इत्यादि।

अगर हम इन तीन संकल्पों के अर्थ को ध्यान से देखें तो हमें पता चलता है कि इन तीनों का आपस में काफ़ी गहरा सम्बन्ध है। समाज को अलग-अलग वर्गों अथवा स्तरों में विभाजित करने की प्रक्रिया को स्तरीकरण कहते हैं तथा लोग अपना वर्ग परिवर्तित करते रहते हैं। लोग अपनी व्यक्तिगत योग्यता से अपना वर्ग परिवर्तित कर लेते हैं तथा एक वर्ग से दूसरे वर्ग में जाने की प्रक्रिया को गतिशीलता कहते हैं।

आजकल के समय में लोग शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं तथा अलग-अलग व्यवसाय अपना रहे हैं। शिक्षा लेने के कारण उनकी सामाजिक स्थिति ऊँची हो जाती है तथा वह अच्छी नौकरी करने लग जाते हैं। अच्छी नौकरी के कारण उनके पास पैसा आ जाता है तथा वह सामाजिक स्तरीकरण में उच्च स्तर पर पहुँच जाते हैं। धीरे-धीरे वह तरक्की प्राप्त करने के लिए नौकरी ही बदल लेते हैं तथा अधिक पैसा कमाने लग जाते हैं। इस प्रकार वह समय के साथ अलग-अलग वर्गों के सदस्य बनते हैं जिस कारण समाज में गतिशीलता चलती रहती है।

इस व्याख्या को देखने के पश्चात् हम कह सकते हैं कि वर्ग, गतिशीलता तथा स्तरीकरण में काफ़ी गहरा सम्बन्ध होता है। इस कारण ही समाज प्रगति की तरफ बढ़ता है तथा लोग प्रगति करते रहते हैं।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न (OTHER IMPORTANT QUESTIONS)

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

A. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1. इनमें से कौन-सी वर्ग की विशेषता नहीं है ?
(क) अर्जित स्थिति
(ख) मुक्त व्यवस्था
(ग) जन्म पर आधारित
(घ) समूहों में उच्च निम्न स्थिति।
उत्तर-(ग) जन्म पर आधारित।

प्रश्न 2. कौन-सी वर्ग की विशेषता है ?
(क) उच्च निम्न की भावना
(ख) सामाजिक गतिशीलता
(ग) उपवर्गों का विकास
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 3. उस व्यवस्था को क्या कहते हैं जिसमें समाज के व्यक्तियों को अलग-अलग आधारों पर विशेष
सामाजिक स्थिति प्राप्त होती है ?
(क) जाति व्यवस्था
(ख) वर्ग व्यवस्था
(ग) सामुदायिक व्यवस्था
(घ) सामाजिक व्यवस्था।
उत्तर-(ख) वर्ग व्यवस्था।

प्रश्न 4. वर्ग व्यवस्था का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
(क) जाति व्यवस्था कमजोर हो रही है।
(ख) निम्न जातियों के लोग उच्च स्तर पर पहुँच रहे हैं।
(ग) व्यक्ति को अपनी योग्यता दिखाने का मौका मिलता है।
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 5. वर्ग तथा जाति में क्या अंतर है ?
(क) जाति जन्म व वर्ग योग्यता पर आधारित होता है।
(ख) व्यक्ति वर्ग बदल सकता है पर जाति नहीं।
(ग) जाति में कई प्रकार के प्रतिबन्ध होते हैं पर वर्ग में नहीं।
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 6. वर्ग संघर्ष का सिद्धांत किसने दिया था ?
(क) कार्ल मार्क्स
(ख) मैक्स वैबर
(ग) राईट
(घ) वार्नर।
उत्तर-(क) कार्ल मार्क्स।

प्रश्न 7. वर्ग चेतना तथा वर्ग संघर्ष की अवधारणा किसने दी है ?
(क) कार्ल मार्क्स
(ख) मैक्स वैबर
(ग) दुर्थीम
(घ) कोई भी नहीं।
उत्तर-(क) कार्ल मार्क्स।

B. रिक्त स्थान भरें-

1. वर्ग की सदस्या व्यक्ति की …….. पर निर्भर करती है।
2. वर्ग संघर्ष का सिद्धांत .. ………………… ने दिया था।
3. मार्क्स के अनुसार संसार में …. …. प्रकार के वर्ग होते हैं।
4. ……………… को बुर्जुआ कहते हैं।
5. ……………….. वर्ग को सर्वहारा कहते हैं।
उत्तर-

  1. योग्यता
  2. कार्ल मार्क्स
  3. दो
  4. पूँजीपति
  5. मज़दूर।

C. सही/ग़लत पर निशान लगाएं-

1. सभी वर्गों में वर्ग चेतना मौजूद होती है।
2. वर्ग में स्थिति अर्जित की जाती है।
3. आय, व्यवसाय, धन तथा शिक्षा व्यक्ति का वर्ग निर्धारित करते हैं।
4. वैबर के अनुसार धन, सत्ता तथा स्थिति असमानता के आधार हैं।
5. वार्नर ने भारत की वर्ग संरचना का अध्ययन किया था।
उत्तर-

  1. सही
  2. सही
  3. सही
  4. सही
  5. गलत।

II. एक शब्द/एक पंक्ति वाले प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. वर्ग की सदस्यता किस पर निर्भर करती है ?
उत्तर-वर्ग की सदस्यता व्यक्ति की योग्यता पर निर्भर करती है।

प्रश्न 2. आजकल वर्ग का निर्धारण किस आधार पर होता है ?
उत्तर-आजकल वर्ग का निर्धारण शिक्षा, धन, व्यवसाय, नातेदारी इत्यादि के आधार पर होता है।

प्रश्न 3. वर्ग संघर्ष का सिद्धांत किसने दिया था ?
उत्तर-वर्ग संघर्ष का सिद्धांत कार्ल मार्क्स ने दिया था।

प्रश्न 4. धन के आधार पर हम लोगों को कितने वर्गों में बाँट सकते हैं ?
उत्तर-धन के आधार पर हम लोगों को उच्च वर्ग, मध्य वर्ग तथा श्रमिक वर्ग में बाँट सकते हैं।

प्रश्न 5. गाँव में मिलने वाले मुख्य वर्ग बताएँ।
उत्तर- गाँव में हमें ज़मींदार वर्ग, किसान वर्ग व मज़दूर वर्ग मुख्यतः मिल जाते हैं।

प्रश्न 6. वर्ग व्यवस्था क्या होती है ?
उत्तर-जब समाज में अलग-अलग आधारों पर कई प्रकार के समूह बन जाते हैं उसे वर्ग व्यवस्था कहते हैं।

प्रश्न 7. वर्ग किस प्रकार का समूह है ?
उत्तर-वर्ग एक मुक्त समूह होता है जिसकी सदस्यता व्यक्ति की योग्यता पर निर्भर करती है।

प्रश्न 8. वर्ग में किस प्रकार के संबंध पाए जाते हैं ?
उत्तर-वर्ग में औपचारिक, अस्थाई तथा सीमित संबंध पाए जाते हैं।

प्रश्न 9. मार्क्स के अनुसार वर्ग का आधार क्या होता है ?
उत्तर-मार्क्स के अनुसार वर्ग का आधार आर्थिक अर्थात् धन होता है।

प्रश्न 10. मार्क्स के अनुसार संसार में कितने वर्ग होते हैं ?
उत्तर-मार्क्स के अनुसार संसार में दो वर्ग होते हैं-पूँजीपति तथा मज़दूर।

प्रश्न 11. वैबर के अनुसार असमानता का आधार क्या होता है ?
उत्तर-वैबर के अनुसार धन, सत्ता तथा स्थिति असमानता के आधार होते हैं।

प्रश्न 12. बुर्जुआ क्या होता है ?
उत्तर-जिस वर्ग के पास उत्पादन के साधन होते हैं उसे बुर्जुआ कहते हैं।

प्रश्न 13. सर्वहारा क्या होता है ?
उत्तर-वह वर्ग जिसके पास उत्पादन के साधन नहीं होते, अपना परिश्रम बेचने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता, उसे सर्वहारा कहते हैं।

प्रश्न 14. वर्गहीन समाज कौन-सा होता है ?
उत्तर-वह समाज जहाँ वर्ग नहीं होते, वह वर्गहीन समाज होता है।

प्रश्न 15. जाति व वर्ग में एक अंतर बताएं।
उत्तर-जाति जन्म पर आधारित होती है परन्तु वर्ग योग्यता पर आधारित होता है।

III. अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न ।

प्रश्न 1. वर्ग क्या होता है ?
अथवा
वर्ग से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर-समाज में जब अलग-अलग व्यक्तियों को विशेष सामाजिक स्थिति प्राप्त होती है तो उसे विशेष सामाजिक स्थिति वाले समूह को वर्ग कहते हैं। मार्क्स के अनुसार, “एक सामाजिक वर्ग को उसके उत्पादन के साधनों तथा सम्पत्ति के विभाजन से स्थापित होने वाले संबंधों के संदर्भ में परिभाषित किया जा सकता है।”

प्रश्न 2. वर्ग की दो विशेषताएं बताएं।
उत्तर-

  • वर्ग के सभी सदस्यों की समाज में स्थिति लगभग समान ही होती है जैसे अमीर वर्ग के सदस्यों को समाज में उच्च स्थिति प्राप्त होती है।
  • वर्गों का निर्माण अलग-अलग आधारों पर होता है जैसे कि शिक्षा, पैसा, व्यवसाय, राजनीति, धर्म इत्यादि।

प्रश्न 3. वर्ग व्यवस्था के कोई तीन प्रभाव बताएं।
उत्तर-

  • वर्ग व्यवस्था से जाति व्यवस्था कमजोर हो गई है।
  • वर्ग व्यवस्था से निम्न जातियों के लोग उच्च स्तर पर पहुंच रहे हैं।
  • वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति को अपनी योग्यता दिखाने का मौका प्राप्त होता है।

प्रश्न 4. नगरों में मुख्य रूप से कौन-से तीन वर्ग देखने को मिल जाते हैं ?
उत्तर-

  • उच्च वर्ग-वह वर्ग जो अमीर व ताकतवर होता है।
  • मध्य वर्ग-डॉक्टर, इंजीनियर, अध्यापक, नौकरी पेशा लोग, दुकानदार इसमें आते हैं।
  • निम्न वर्ग-इसमें वे मज़दूर आते हैं जो अपना परिश्रम बेच कर गुज़ारा करते हैं।

IV. लघ उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. श्रेणी व्यवस्था या वर्ग व्यवस्था।
उत्तर-श्रेणी व्यवस्था ऐसे व्यक्तियों का समूह है जो एक-दूसरे को समान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेणी की स्थिति समाज में अपनी ही होती है। इसके अनुसार श्रेणी के प्रत्येक सदस्य को कुछ विशेष कर्त्तव्य, अधिकार तथा शक्तियां प्राप्त होती हैं। श्रेणी चेतनता ही श्रेणी की मुख्य ज़रूरत होती है। श्रेणी के बीच व्यक्ति अपने आप को कुछ सदस्यों से उच्च तथा कुछ से निम्न समझता है।

प्रश्न 2. वर्ग की दो विशेषताएं।
अथवा सामाजिक वर्ग की विशेषताएं लिखें।
उत्तर-

  • वर्ग चेतनता-प्रत्येक वर्ग में इस बात की चेतनता होती है कि उसका पद या आदर दूसरी श्रेणी की तुलना में अधिक है। अर्थात् व्यक्ति को उच्च, निम्न या समानता के बारे में पूरी चेतनता होती है।
  • सीमित सामाजिक सम्बन्ध-वर्ग व्यवस्था में लोग अपने ही वर्ग के सदस्यों से गहरे सम्बन्ध रखता है तथा दूसरी श्रेणी के लोगों के साथ उसके सम्बन्ध सीमित होते हैं।

प्रश्न 3. मुक्त व्यवस्था।
उत्तर-श्रेणी व्यवस्था के बीच व्यक्ति अपनी योग्यता के आधार पर निम्न या उच्च स्थिति की तरफ परिवर्तन कर सकता है। वह ग़रीब से अमीर तथा अमीर से ग़रीब हो सकता है। खुलेपन से अभिप्राय व्यक्तियों को बराबर अवसर प्राप्त होने से है। वह पूरी तरह अपनी योग्यता का प्रयोग कर सकता है।

प्रश्न 4. धन तथा आय वर्ग व्यवस्था के निर्धारक।
उत्तर-समाज के बीच उच्च श्रेणी की स्थिति का सदस्य बनने के लिए पैसे की ज़रूरत होती है। परन्तु पैसे के साथ व्यक्ति आप ही उच्च स्थिति प्राप्त नहीं कर सकता परन्तु उसकी अगली पीढ़ी के लिए उच्च स्थिति निश्चित हो जाती है। आय के साथ भी व्यक्ति को समाज में उच्च स्थिति प्राप्त होती है क्योंकि ज्यादा आमदनी से ज्यादा पैसा आता है। परन्तु इसके लिए यह देखना ज़रूरी है कि व्यक्ति की आय ईमानदारी की है या काले धन्धे द्वारा प्राप्त है।

प्रश्न 5. जाति तथा वर्ग में कोई चार अन्तर।
उत्तर-

  • जाति व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता जन्म पर आधारित होती है तथा वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता उसकी योग्यता पर आधारित होती है।
  • जाति व्यवस्था में पेशा जन्म पर ही निश्चित होता है। वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति अपनी इच्छा से कोई भी पेशा अपना सकता है।
  • जाति बन्द व्यवस्था है पर वर्ग खुली व्यवस्था है।
  • जाति में कई पाबन्दियां होती हैं परन्तु वर्ग में नहीं।

प्रश्न 6. जाति-बन्द स्तरीकरण का आधार।
उत्तर-जाति व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता उसके जन्म से सम्बन्धित होती है। जिस जाति में वह पैदा होता है वह उसके घेरे में बंध जाता है। यहां तक कि वह अपनी योग्यता का सम्पूर्ण इस्तेमाल नहीं कर सकता है। उसको न तो कार्य करने की स्वतन्त्रता होती है तथा न ही वह दूसरी जातियों से सम्पर्क स्थापित कर सकता है। यदि वह जाति के नियमों को तोड़ता है तो उसको जाति से बाहर निकाल दिया जाता है। इस कारण जाति को बन्द स्तरीकरण का आधार माना जाता है।

प्रश्न 7. मार्क्स के अनुसार स्तरीकरण का परिणाम क्या है ?
उत्तर-मार्क्स का कहना है, कि समाज में दो वर्ग होते हैं। पहला वर्ग उत्पादन के साधनों का मालिक होता है तथा दूसरा वर्ग उत्पादन के साधनों का मालिक नहीं होता। इस मलकीयत के आधार पर ही मालिक वर्ग की स्थिति उच्च तथा गैर-मालिक वर्ग की स्थिति निम्न होती है। मालिक वर्ग को मार्क्स पूंजीपति वर्ग तथा गैर-मालिक वर्ग को मज़दूर वर्ग कहता है। पूंजीपति वर्ग मजदूर वर्ग का आर्थिक रूप से शोषण करता है तथा मजदूर वर्ग अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए पूंजीपति वर्ग से संघर्ष करता है। यह ही स्तरीकरण का परिणाम है।

प्रश्न 8. वर्गों में आपसी सम्बन्ध किस तरह के होते हैं ?
उत्तर-मार्क्स के अनुसार वर्गों में आपसी सम्बन्ध, आपसी निर्भरता तथा संघर्ष वाले होते हैं। पूंजीपति तथा मजदूर दोनों अपने अस्तित्व के लिए एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। मजदूर वर्ग को रोटी कमाने के लिए अपना परिश्रम बेचना पड़ता है। वह पूंजीपति को अपना परिश्रम बेचते हैं तथा रोटी कमाने के लिए उस पर निर्भर करते हैं। उसकी मजदूरी के एवज में पूंजीपति उनको मज़दूरी का किराया देते हैं। पूंजीपति भी मज़दूरों पर निर्भर करता है, क्योंकि मज़दूर के कार्य किए बिना उसका न तो उत्पादन हो सकता है तथा न ही उसके पास पूंजी इकट्ठी हो सकती है। परन्तु निर्भरता के साथ संघर्ष भी चलता रहता है क्योंकि मजदूर अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए उससे संघर्ष करता रहता है।

प्रश्न 9. मार्क्स के वर्ग के सिद्धान्त में कौन-सी बातें मुख्य हैं ?
उत्तर-

  • सबसे पहले प्रत्येक प्रकार के समाज में मुख्य तौर पर दो वर्ग होते हैं। एक वर्ग के पास उत्पादन के साधन होते हैं तथा दूसरे के पास नहीं होते हैं।
  • मार्क्स के अनुसार समाज में स्तरीकरण उत्पादन के साधनों पर अधिकार के आधार पर होता है। जिस वर्ग के पास उत्पादन के साधन होते हैं उसकी स्थिति उच्च होती है तथा जिस के पास साधन नहीं होते उसकी स्थिति निम्न होती है।
  • सामाजिक स्तरीकरण का स्वरूप उत्पादन की व्यवस्था पर निर्भर करता है।
  • मार्क्स के अनुसार मनुष्यों के समाज का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है। वर्ग संघर्ष किसी-न-किसी रूप में प्रत्येक समाज में मौजूद रहा है।

प्रश्न 10. वर्ग संघर्ष।
उत्तर-कार्ल मार्क्स ने प्रत्येक समाज में दो वर्गों की विवेचना की है। उसके अनुसार, प्रत्येक समाज में दो विरोधी वर्गएक शोषण करने वाला तथा दूसरा शोषित होने वाला वर्ग होते हैं। इनमें संघर्ष होता है जिसे मार्क्स ने वर्ग संघर्ष का नाम दिया है। शोषण करने वाला पूंजीपति वर्ग होता है जिसके पास उत्पादन के साधन होते हैं तथा वह इन उत्पादन के साधनों के साथ अन्य वर्गों को दबाता है। दूसरा वर्ग मज़दूर वर्ग होता है जिसके पास उत्पादन के कोई साधन नहीं होते हैं। इसके पास रोटी कमाने के लिए अपना परिश्रम बेचने के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं होता है। यह वर्ग पहले वर्ग से हमेशा शोषित होता है जिस कारण दोनों वर्गों के बीच संघर्ष चलता रहता है। इस संघर्ष को ही मार्क्स ने वर्ग संघर्ष का नाम दिया है।

प्रश्न 11. उत्पादन के साधन।
उत्तर-उत्पादन के साधन वे साधन हैं जिसकी सहायता से कार्य करके पैसा कमाया जाता है तथा अच्छा जीवन व्यतीत किया जाता है। मनुष्य उत्पादन के साधनों का प्रयोग करके अपने उत्पादन कौशल के आधार पर ही भौतिक वस्तुओं का उत्पादन करता है तथा यह सभी तत्व इकट्ठे मिलकर उत्पादन शक्तियों का निर्माण करते हैं। उत्पादन के तरीकों पर पूँजीपति का अधिकार होता है तथा वह इनकी सहायता से अतिरिक्त मूल्य का निर्माण करके मज़दूर वर्ग का शोषण करता है। इन उत्पादन के साधनों की सहायता से वह अधिक अमीर होता जाता है जिसका प्रयोग वह मजदूर वर्ग को दबाने के लिए करता है।

प्रश्न 12. सामाजिक गतिशीलता।
उत्तर-समाज मनुष्यों के बीच सम्बन्धों से बनता है। समाज में प्रत्येक मनुष्य की अपनी एक सामाजिक स्थिति होती है तथा यह स्थिति कुछ आधारों पर निर्भर करती है। कुछ समाजों में यह जन्म तथा कुछ में यह कर्म पर आधारित होती है। समाज में कुछ परिवर्तन होते रहते हैं। जन्म के आधार पर यह परिवर्तन सम्भव नहीं है क्योंकि जाति जन्म के आधार पर निश्चित होती है जिसमें परिवर्तन सम्भव नहीं है। परन्तु पेशों, कार्य, पैसे इत्यादि के आधार पर वर्ग परिवर्तन मुमकिन है। समाज में किसी भी सदस्य द्वारा अपनी सामाजिक स्थिति के आधार पर परिवर्तन करना ही सामाजिक गतिशीलता है।

प्रश्न 13. गतिशीलता की दो परिभाषाएं।
उत्तर-फेयरचाइल्ड के अनुसार, “मनुष्यों द्वारा अपने समूह को परिवर्तित करना ही सामाजिक गतिशीलता है। सामाजिक गतिशीलता का अर्थ व्यक्तियों की एक समूह से दूसरे समूह की तरफ की गति है।”
बोगार्डस के अनुसार, “सामाजिक पदवी में कोई भी परिवर्तन सामाजिक गतिशीलता है।”

प्रश्न 14. शिक्षा-सामाजिक गतिशीलता का सूचक।
उत्तर-शिक्षा को सामाजिक गतिशीलता का महत्त्वपूर्ण साधन माना जाता है। यह कहा जाता है कि व्यक्ति जितनी अधिक शिक्षा प्राप्त करेगा उतना ही अधिक जीवन में सफल होगा। शिक्षा व्यक्ति के बजुर्गों द्वारा किए गलत कार्यों को भी ठीक कर देती है। यह माना जाता है कि शिक्षा को नौकरी का साधन नहीं समझा जाना चाहिए, क्योंकि शिक्षा प्रत्यक्ष रूप से ऊपर की तरफ की गतिशीलता की तरफ नहीं लेकर जाती। शिक्षा तो व्यक्ति के लिए उस समय मौजूद मौके अर्जित करने के लिए व्यक्ति की योग्यता को बढ़ाती है। शिक्षा वह तरीके बताती है जो किसी भी पेशे को अपनाने के लिए ज़रूरी होते हैं, परन्तु यह उन तरीकों को प्रयोग करने के मौके प्रदान नहीं करती।

प्रश्न 15. आय-सामाजिक गतिशीलता का सूचक।
उत्तर-व्यक्ति की आय गतिशीलता का एक महत्त्वपूर्ण सूचक है। व्यक्ति की आय उसकी सामाजिक स्थिति को उच्च अथवा निम्न करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जिसकी आय अधिक होती है उसका सामाजिक रुतबा भी उच्च होता है तथा जिसकी आय कम होती है उसका सामाजिक रुतबा भी निम्न होता है। आय बढ़ने से लोग अपनी जीवन शैली बढ़िया कर लेते हैं तथा गतिशील होकर वर्ग व्यवस्था में ऊँचे हो जाते हैं। इस तरह आय गतिशीलता का महत्त्वपूर्ण सूचक है।

V. बड़े उत्तरों वाले प्रश्न-

प्रश्न 1. वर्ग के बारे में आप क्या जानते हैं ? विस्तार से लिखें ।
अथवा
वर्ग क्या होता है ? इसकी विशेषताओं का वर्णन करो।
उत्तर-सामाजिक स्तरीकरण का आधार वर्ग होता है। वर्ग में व्यक्ति की स्थिति उसके वर्ग की भूमिका के अनुसार होती है। मानवीय समाज में सभी मनुष्यों की स्थिति बराबर या समान नहीं होती। किसी-न-किसी आधार पर असमानता पाई जाती रही है व इसी असमानता की भावना के कारण ही वर्ग पहचान में आए हैं। विशेषकर पश्चिमीकरण, औद्योगीकरण, शिक्षा प्रणाली, आधुनिकीकरण के कारण समाज भारत में वर्ग व्यवस्था आगे आई है। पश्चिमी देशों में भी स्तरीकरण वर्ग व्यवस्था पर आधारित होता है। भारत में भी बहुत सारे वर्ग पहचान में आए हैं जैसे अध्यापक वर्ग, व्यापार वर्ग, डॉक्टर वर्ग आदि।

वर्ग का अर्थ व परिभाषाएं (Meaning & Definitions of Class):

प्रत्येक समाज कई वर्गों में विभाजित होता है व प्रत्येक वर्ग की समाज में भिन्न-भिन्न स्थिति होती है। इस स्थिति के आधार पर ही व्यक्ति को उच्च या निम्न जाना जाता है। वर्ग की मुख्य विशेषता वर्ग चेतनता होती है। इस प्रकार समाज में जब विभिन्न व्यक्तियों को विशेष सामाजिक स्थिति प्राप्त होती है तो उसको वर्ग व्यवस्था कहते हैं। प्रत्येक वर्ग आर्थिक पक्ष से एक-दूसरे से अलग होता है।

  • मैकाइवर (Maclver) ने वर्ग को सामाजिक आधार पर बताया है। उस के अनुसार, “सामाजिक वर्ग एकत्रता वह हिस्सा होता है जिसको सामाजिक स्थिति के आधार पर बचे हुए हिस्से से अलग कर दिया जाता है।”
  • मोरिस जिन्सबर्ग (Morris Ginsberg) के अनुसार, “वर्ग व्यक्तियों का ऐसा समूह है जो सांझे वंशक्रम, व्यापार सम्पत्ति के द्वारा एक सा जीवन ढंग, एक से विचारों का स्टाफ, भावनाएं, व्यवहार के रूप में रखते हों व जो इनमें से कुछ या सारे आधार पर एक-दूसरे से समान रूप में अलग-अलग मात्रा में पाई जाती हो।”
  • गिलबर्ट (Gilbert) के अनुसार, “एक सामाजिक वर्ग व्यक्तियों की एकत्र विशेष श्रेणी है जिस की समाज में एक विशेष स्थिति होती है, यह विशेष स्थिति ही दूसरे समूहों से उनके सम्बन्ध निर्धारित करती है।”
  • कार्ल मार्क्स (Karl Marx) के विचार अनुसार, “एक सामाजिक वर्ग को उसके उत्पादन के साधनों व सम्पत्ति के विभाजन से स्थापित होने वाले सम्बन्धों के सन्दर्भ में भी परिभाषित किया जा सकता है।”
  • आगबन व निमकौफ (Ogburn & Nimkoff) के अनुसार, “एक सामाजिक वर्ग की मौलिक विशेषता दुसरे सामाजिक वर्गों की तुलना में उसकी उच्च व निम्न सामाजिक स्थिति होती है।”

उपरोक्त विवरण के आधार पर हम कह सकते हैं कि सामाजिक वर्ग कई व्यक्तियों का वर्ग होता है, जिसको समय विशेष में एक विशेष स्थिति प्राप्त होती है। इसी कारण उनको कुछ विशेष शक्ति, अधिकार व उत्तरदायित्व भी मिलते हैं। वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति की योग्यता महत्त्वपूर्ण होती है। इस कारण हर व्यक्ति परिश्रम करके सामाजिक वर्ग में अपनी स्थिति को ऊँची करना चाहता है। प्रत्येक समाज विभिन्न वर्गों में विभाजित होता है। वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति की स्थिति निश्चित नहीं होती। उसकी स्थिति में गतिशीलता पाई जाती है। इस कारण इसे खुला स्तरीकरण भी कहते हैं। व्यक्ति अपनी वर्ग स्थिति स्वयं निर्धारित करता है। यह जन्म पर आधारित नहीं होता।

वर्ग की विशेषताएं (Characteristics of Class):

1. श्रेष्ठता व हीनता की भावना (Feeling of Superiority and Inferiority)—वर्ग व्यवस्था में भी ऊँच व नीच के सम्बन्ध पाए जाते हैं। उदाहरणतः उच्च वर्ग के लोग निम्न वर्ग के लोगों से अपने आप को अलग व ऊँचा महसूस करते हैं। ऊँचे वर्ग में अमीर लोग आ जाते हैं व निम्न वर्ग में ग़रीब लोग। अमीर लोगों की समाज में उच्च स्थिति होती है व ग़रीब लोग भिन्न-भिन्न निवास स्थान पर रहते हैं। उन निवास स्थानों को देखकर ही पता लग जाता है कि वह अमीर वर्ग से सम्बन्धित हैं या ग़रीब वर्ग से।

2. सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility)—वर्ग व्यवस्था किसी भी व्यक्ति के लिए निश्चित नहीं होती। वह बदलती रहती है। व्यक्ति अपनी मेहनत से निम्न से उच्च स्थिति को प्राप्त कर लेता है व अपने गलत कार्यों के परिणामस्वरूप ऊंची से निम्न स्थिति पर भी पहुंच जाता है। प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी आधार पर समाज में अपनी इज्जत बढ़ाना चाहता है। इसी कारण वर्ग व्यवस्था व्यक्ति को क्रियाशील भी रखती है। उदाहरणतः एक आम दफ़तर में लगा क्लर्क यदि परिश्रम करके I.A.S. इम्तिहान में आगे बढ़ जाता है तो उसकी स्थिति बिल्कुल ही बदल जाती है।

3. खुलापन (Openness)—वर्ग व्यवस्था में खुलापन पाया जाता है क्योंकि इसमें व्यक्ति को पूरी आज़ादी होती है कि वह कुछ भी कर सके। वह अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी व्यापार को अपना सकता है। किसी भी जाति का व्यक्ति किसी भी वर्ग का सदस्य अपनी योग्यता के आधार पर बन सकता है। निम्न वर्ग के लोग मेहनत करके उच्च वर्ग में आ सकते हैं। इसमें व्यक्ति के जन्म की कोई महत्ता नहीं होती। व्यक्ति की स्थिति उसकी योग्यता पर निर्भर करती है। एक अमीर मां-बाप का लड़का तब तक अमीर बना रहेगा जब तक उसके माता-पिता की सम्पत्ति समाप्त नहीं हो जाती। बाद में हो सकता है कि यदि वह मेहनत न करे तो भूखा भी मर सकता है। यह वर्ग व्यवस्था प्रत्येक व्यक्ति को आगे बढ़ने के समान आर्थिक मौके भी प्रदान करती है। इस प्रकार इसमें खुलापन पाया जाता है।

4. सीमित सामाजिक सम्बन्ध (Limited Social Relations) वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति के सामाजिक सम्बन्ध सीमित होते हैं। प्रत्येक वर्ग के लोग अपने बराबर के वर्ग के लोगों से सम्बन्ध रखना अधिक ठीक समझते हैं। प्रत्येक वर्ग अपने ही लोगों से नज़दीकी रखना चाहता है। वह दूसरे वर्ग से सम्बन्ध नहीं रखना चाहता।

5. उपवर्गों का विकास (Development of Sub-Classes)-आर्थिक दृष्टिकोण से हम वर्ग व्यवस्था को तीन भागों में बाँटते हैं

(i) उच्च वर्ग (Upper Class)
(ii) मध्य वर्ग (Middle Class)
(iii) निम्न वर्ग (Lower Class)।

परन्तु आगे हर वर्ग कई और उपवर्गों में बाँटा होता है, जैसे एक अमीर वर्ग में भी भिन्नता नज़र आती है। कुछ लोग बहुत अमीर हैं, कुछ उससे कम व कुछ सबसे कम। इसी प्रकार मध्य वर्ग व निम्न वर्ग में भी उप-वर्ग पाए जाते हैं। हर वर्ग के उप-वर्गों में भी अन्तर पाया जाता है। इस प्रकार वर्ग, उप वर्गों से मिल कर बनता है।

6. विभिन्न आधार (Different Bases)—जैसे हम शुरू में ही विभिन्न समाज वैज्ञानिकों के विचारों से यह परिणाम निकाल चुके हैं कि वर्ग के भिन्न-भिन्न आधार हैं। प्रसिद्ध समाज वैज्ञानिक कार्ल मार्क्स ने आर्थिक आधार को वर्ग व्यवस्था का मुख्य आधार माना है। उसके अनुसार समाज में केवल दो वर्ग पाए गए हैं। एक तो पूंजीपति वर्ग, दूसरा श्रमिक वर्ग। हर्टन व हंट के अनुसार हमें याद रखना चाहिए कि वर्ग मूल में, विशेष जीवन ढंग है। ऑगबर्न व निमकौफ़, मैकाइवर गिलबर्ट ने वर्ग के लिए सामाजिक आधार को मुख्य माना है। जिन्ज़बर्ग, लेपियर जैसे वैज्ञानिकों ने सांस्कृतिक आधार को ही वर्ग व्यवस्था का मुख्य आधार माना है।
इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि वर्ग के निर्धारण करने का कोई एक आधार नहीं, बल्कि कई अलग-अलग आधार हैं। जैसे पढ़ा-लिखा वर्ग, अमीर वर्ग, डॉक्टर वर्ग आदि। इस प्रकार वर्ग कई आधारों के परिणामस्वरूप पाया गया है।

7. वर्ग पहचान (Identification of Class)—वर्ग व्यवस्था में बाहरी दृष्टिकोण भी महत्त्वपूर्ण होता है। कई बार हम देख कर यह अनुमान लगा लेते हैं कि यह व्यक्ति उच्च वर्ग का है या निम्न का। हमारे आधुनिक समाज में कोठी, कार, स्कूटर, टी० वी०, वी० सी० आर०, फ्रिज आदि व्यक्ति के स्थिति चिन्ह को निर्धारित करते हैं। इस प्रकार बाहरी संकेतों से हमें वर्ग भिन्नता का पता चल जाता है।
प्रत्येक वर्ग के लोगों का जीवन ढंग लगभग एक सा ही होता है। मैक्स वैबर के अनुसार, “हम एक समूह को तो ही वर्ग कह सकते हैं जब उस समूह के लोगों को जीवन के कुछ ख़ास मौके न प्राप्त हों।” इस प्रकार हर वर्ग के सदस्यों की ज़रूरतें भी एक सी ही होती हैं।

8. वर्ग चेतनता (Class Consciousness)-प्रत्येक सदस्य अपनी वर्ग स्थिति के प्रति पूरी तरह चेतन होता है। इसी कारण वर्ग चेतना, वर्ग व्यवस्था की मुख्य विशेषता है। वर्ग चेतना व्यक्ति को आगे बढ़ने के मौके प्रदान करती है क्योंकि चेतना के आधार पर ही हम एक वर्ग को दूसरे वर्ग से अलग करते हैं। व्यक्ति का व्यवहार भी इसके द्वारा ही निश्चित होता है।

9. उतार-चढ़ाव का क्रम (Hierarchical Order)-प्रत्येक समाज में भिन्न-भिन्न स्थिति रखने वाले वर्ग पाए जाते हैं। स्थिति का उतार-चढ़ाव चलता रहता है व भिन्न-भिन्न वर्गों का निर्माण होता रहता है। साधारणत: यह देखने में आया है कि समाज में उच्च वर्ग के लोगों की गणना कम होती है व मध्यम व निम्न वर्गों के लोगों की गणना अधिक होती है। प्रत्येक वर्ग के लोग अपनी मेहनत व योग्यता से अपने से उच्च वर्ग में जाने की कोशिश करते रहते हैं।

10. आपसी निर्भरता (Mutual Dependence) समाज के सभी वर्गों में आपसी निर्भरता होती है व वह एकदूसरे पर निर्भर होते हैं। उच्च वर्ग को अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए मध्यम वर्ग की ज़रूरत पड़ती है व इसी तरह मध्यम वर्ग को अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए निम्न वर्ग की ज़रूरत पड़ती है। इसी तरह उल्टा भी होता है। इस प्रकार यह सारे वर्ग अपनी पहचान बनाए रखने के लिए एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं।

11. वर्ग एक खुली व्यवस्था है (Class is an open system)-वर्ग एक खुली व्यवस्था होती है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रत्येक वर्ग के दरवाजे खुले होते हैं। व्यक्ति अपनी मेहनत, योग्यता व कोशिशों से अपना वर्ग बदल भी सकता है व कोशिशें न करके छोटे वर्ग में भी पहुँच सकता है। उसके रास्ते में जाति कोई रुकावट नहीं डालती। उदाहरणत: निम्न जाति का व्यक्ति भी परिश्रम करके उच्च वर्ग में पहुँच सकता है।

12. वर्ग की स्थिति (Status of Class)—प्रत्येक वर्ग की स्थितियों में कुछ समानता होती है। इस समानता के कारण ही प्रत्येक वर्ग के प्रत्येक व्यक्ति को उन्नति करने के समान मौके प्राप्त होते हैं। व्यक्ति की शिक्षा, उसके रहने का स्थान, अन्य चीजें आदि उसके वर्ग की स्थिति अनुसार होती हैं।

प्रश्न 2. वर्ग के विभाजन के अलग-अलग आधारों का वर्णन करो।
अथवा वर्ग के सह-संबंधों की व्याख्या करें।
अथवा आय तथा व्यवसाय की वर्ग निर्धारक के रूप में चर्चा कीजिए।
उत्तर-वर्ग की व्याख्या व विशेषताओं के आधार पर हम वर्ग के विभाजन के कुछ आधारों का जिक्र कर सकते हैं जिनका वर्णन नीचे दिया गया है
(1) परिवार व रिश्तेदार (2) सम्पत्ति व आय, पैसा (3) व्यापार (4) रहने के स्थान की दिशा (5) शिक्षा (6) शक्ति (7) धर्म (8) प्रजाति (9) जाति (10) स्थिति चिन्ह।

1. परिवार व रिश्तेदारी (Family and Kinship) परिवार व रिश्तेदारी भी वर्ग की स्थिति निर्धारित करने के लिए जिम्मेवार होता है। बीयरस्टेड के अनुसार, “सामाजिक वर्ग की कसौटी के रूप में परिवार व रिश्तेदारी का महत्त्व सारे समाज में बराबर नहीं होता, बल्कि यह तो अनेक आधारों में एक विशेष आधार है जिसका उपयोग सम्पूर्ण व्यवस्था में एक अंग के रूप में किया जा सकता है। परिवार के द्वारा प्राप्त स्थिति पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है। जैसे टाटा बिरला आदि के परिवार में पैदा हुई सन्तान पूंजीपति ही रहती है क्योंकि उनके बुजुर्गों ने इतना पैसा कमाया होता है कि कई पीढ़ियां यदि न भी मेहनत करें तो भी खा सकती हैं। इस प्रकार अमीर परिवार में पैदा हुए व्यक्ति को भी वर्ग व्यवस्था में उच्च स्थिति प्राप्त होती है। इस प्रकार परिवार व रिश्तेदारी की स्थिति के आधार पर भी व्यक्ति को वर्ग व्यवस्था में उच्च स्थिति प्राप्त होती है।।

2. सम्पत्ति, आय व पैसा (Property, Income and Money)-वर्ग के आधार पर सम्पत्ति, पैसे व आय को प्रत्येक समाज में महत्त्वपूर्ण जगह प्राप्त होती है। आधुनिक समाज को इसी कारण पूंजीवादी समाज कहा गया है। पैसा एक ऐसा स्रोत है जो व्यक्ति को समाज में बहुत तेज़ी से उच्च सामाजिक स्थिति की ओर ले जाता है। मार्टिनडेल व मोनाचेसी (Martindal and Monachesi) के अनुसार, “उत्पादन के साधनों व उत्पादित पदार्थों पर व्यक्ति का काबू जितना अधिक होगा उसको उतनी ही उच्च वर्ग वाली स्थिति प्राप्त होती है।” प्रसिद्ध समाज वैज्ञानिक कार्ल मार्क्स ने पैसे को ही वर्ग निर्धारण के लिए मुख्य माना। अधिक पैसा होने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति अमीर है। उनकी आय भी अधिक होती है। इस प्रकार धन, सम्पत्ति व आय के आधार पर भी वर्ग निर्धारित होता है।

3. पेशा (Occupation)—सामाजिक वर्ग को निर्धारक पेशा भी माना जाता है। व्यक्ति समाज में किस तरह का पेशा कर रहा है, यह भी वर्ग व्यवस्था से सम्बन्धित है। क्योंकि हमारी वर्ग व्यवस्था के बीच कुछ पेशे बहुत ही महत्त्वपूर्ण पाए गए हैं व कुछ पेशे कम महत्त्वपूर्ण। इस प्रकार हम देखते हैं कि डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफैसर आदि की पारिवारिक स्थिति चाहे जैसी भी हो परन्तु पेशे के आधार पर उनकी सामाजिक स्थिति उच्च ही रहती है। लोग उनका आदर-सम्मान भी पूरा करते हैं। इस प्रकार कम पढ़े-लिखे व्यक्ति का पेशा समाज में निम्न रहता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि पेशा भी वर्ग व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण निर्धारक होता है। प्रत्येक व्यक्ति को जीवन जीने के लिए कोई-न-कोई काम करना पड़ता है। इस प्रकार यह काम व्यक्ति अपनी योग्यता अनुसार करता है। वह जिस तरह का पेशा करता है समाज में उसे उसी तरह की स्थिति प्राप्त हो जाती है। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति गलत पेशे को अपनाकर पैसा इकट्ठा कर भी लेता है तो उसकी समाज में कोई इज्ज़त नहीं होती। आधुनिक समाज में शिक्षा से सम्बन्धित पेशे की अधिक महत्ता पाई जाती है।

4. रहने के स्थान की दिशा (Location of residence)—व्यक्ति किस जगह पर रहता है, यह भी उसकी वर्ग स्थिति को निर्धारित करता है। शहरों में हम आम देखते हैं कि लोग अपनी वर्ग स्थिति को देखते हुए, रहने के स्थान का चुनाव करते हैं। जैसे हम समाज में कुछ स्थानों के लिए (Posh areas) शब्द भी प्रयोग करते हैं। वार्नर के अनुसार जो परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी शहर के काल में पुश्तैनी घर में रहते हैं उनकी स्थिति भी उच्च होती है। कहने से भाव यह है कि कुछ लोग पुराने समय से अपने बड़े-बड़े पुश्तैनी घरों में ही रह जाते हैं। इस कारण भी वर्ग व्यवस्था में उनकी स्थिति उच्च ही बनी रहती है। बड़े-बड़े शहरों में व्यक्तियों के निवास स्थान के लिए भिन्न-भिन्न कालोनियां बनी रहती हैं। मज़दूर वर्ग के लोगों के रहने के स्थान अलग होते हैं। वहां अधिक गन्दगी भी पाई जाती है। अमीर लोग बड़े घरों में व साफ़-सुथरी जगह पर रहते हैं जबकि ग़रीब लोग झोंपड़ियों या गन्दी बस्तियों में रहते हैं।

5. शिक्षा (Education)-आधुनिक समाज शिक्षा के आधार पर दो वर्गों में विभाजित होता है-

(i) शिक्षित वर्ग (Literate Class)
(ii) अनपढ़ वर्ग (Illiterate Class)।

शिक्षा की महत्ता प्रत्येक वर्ग में पाई जाती है। साधारणतः पर हम देखते हैं कि पढ़े-लिखे व्यक्ति को समाज में इज्जत की नज़र से देखा जाता है। चाहे उनके पास पैसा भी न हो। इस कारण प्रत्येक व्यक्ति वर्तमान सामाजिक स्थिति अनुसार शिक्षा की प्राप्ति को ज़रूरी समझने लगा है। शिक्षा की प्रकृति भी व्यक्ति की वर्ग स्थिति के निर्धारण के लिए जिम्मेवार होती है। औद्योगीकृत समाज में तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाले व्यक्तियों की सामाजिक स्थिति काफ़ी ऊँची होती है।

6. शक्ति (Power)—आजकल औद्योगीकरण के विकास के कारण व लोकतन्त्र के आने से शक्ति भी वर्ग संरचना का आधार बन गई है। अधिक शक्ति का होना या न होना व्यक्ति के वर्ग का निर्धारण करती है। शक्ति से व्यक्ति की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक स्थिति का भी निर्धारण होता है। शक्ति कुछ श्रेष्ठ लोगों के हाथ में होती है व वह श्रेष्ठ लोग नेता, अधिकारी, सैनिक अधिकारी, अमीर लोग होते हैं। हमने उदाहरण ली है आज की भारत सरकार की। नरेंद्र मोदी की स्थिति निश्चय ही सोनिया गांधी व मनमोहन सिंह से ऊँची होगी क्योंकि उनके पास शक्ति है, सत्ता उनके हाथ में है, परन्तु मनमोहन सिंह के पास नहीं है। इस प्रकार आज भाजपा की स्थिति कांग्रेस से उच्च है क्योंकि केन्द्र में भाजपा पार्टी की सरकार है।

7. धर्म (Religion)-राबर्ट बियरस्टड ने धर्म को भी सामाजिक स्थिति का महत्त्वपूर्ण निर्धारक माना है। कई समाज ऐसे हैं जहां परम्परावादी रूढ़िवादी विचारों का अधिक प्रभाव पाया जाता है। उच्च धर्म के आधार पर स्थिति निर्धारित होती है। आधुनिक समय में समाज उन्नति के रास्ते पर चल रहा है जिस कारण धर्म की महत्ता उतनी नहीं जितनी पहले होती थी। प्राचीन भारतीय समाज में ब्राह्मणों की स्थिति उच्च होती थी परन्तु आजकल नहीं। पाकिस्तान में मुसलमानों की स्थिति निश्चित रूप से हिन्दुओं व ईसाइयों से बढ़िया है क्योंकि वहां राज्य का धर्म ही इस्लाम है। इस प्रकार कई बार धर्म भी वर्ग स्थिति का निर्धारण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

8. प्रजाति (Race) दुनिया से कई समाज में प्रजाति भी वर्ग निर्माण या वर्ग की स्थिति बताने में सहायक होती है। गोरे लोगों को उच्च वर्ग का व काले लोगों को निम्न वर्ग का समझा जाता है। अमेरिका, इंग्लैण्ड आदि देशों में एशिया के देशों के लोगों को बुरी निगाह से देखा जाता है। इन देशों में प्रजातीय हिंसा आम देखने को मिलती है। दक्षिणी अफ्रीका में रंगभेद की नीति काफ़ी चली है।

9. जाति (Caste)-भारत जैसे देश में जहां जाति प्रथा सदियों से भारतीय समाज में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती आ रही है, जाति वर्ग निर्धारण का बहुत
महत्त्वपूर्ण आधार रही है। जाति जन्म पर आधारित होती है। जिस जाति में व्यक्ति ने जन्म लिया है वह अपनी योग्यता से भी उसे परिवर्तित नहीं सकता।

10. स्थिति चिन्ह (Status Symbol)—स्थिति चिन्ह लगभग हर एक समाज में व्यक्ति की वर्ग व्यवस्था को निर्धारित करता है। आजकल के समय, कोठी, कार, टी० वी०, टैलीफोन, फ्रिज आदि का होना व्यक्ति की स्थिति को निर्धारित करता है। इस प्रकार किसी व्यक्ति के पास अच्छी ज़िन्दगी को बिताने वाली कितनी सुविधाएं हैं। यह सब स्थिति चिन्हों में शामिल होती हैं, जो व्यक्ति की स्थिति को निर्धारित करते हैं।
इस विवरण के आधार पर हम इस परिणाम पर पहुँचे हैं कि व्यक्ति के वर्ग के निर्धारण में केवल एक कारक ही जिम्मेवार नहीं होता, बल्कि कई कारक जिम्मेवार होते हैं।

प्रश्न 3. जाति व वर्ग में अन्तर बताओ।
उत्तर-सामाजिक स्तरीकरण के दो मुख्य आधार जाति व वर्ग हैं। जाति को एक बन्द व्यवस्था व वर्ग को एक खुली व्यवस्था कहा जाता है। पर वर्ग अधिक खुली अवस्था नहीं है क्योंकि किसी भी वर्ग को अन्दर जाने के लिए सख्त मेहनत करनी पड़ती है व उस वर्ग के सदस्य रास्ते में काफ़ी रोड़े अटकाते हैं। कई विद्वान् यह कहते हैं कि जाति व वर्ग में कोई विशेष अन्तर नहीं है परन्तु दोनों का यदि गहराई से अध्ययन किया जाए तो यह पता चलेगा कि दोनों में काफ़ी अन्तर है। इनका वर्णन इस प्रकार है-

1. जाति जन्म पर आधारित होती है पर वर्ग का आधार कर्म होता है (Caste is based on birth but class is based on action)-जाति व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता जन्म पर आधारित होती थी। व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता था, वह सारी ही उम्र उसी से जुड़ा होता था।
वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता शिक्षा, आय, व्यापार योग्यता पर आधारित होती है। व्यक्ति जब चाहे अपनी सदस्यता बदल सकता है। एक ग़रीब वर्ग से सम्बन्धित व्यक्ति परिश्रम करके अपनी सदस्यता अमीर वर्ग से ही जोड़ सकता है। वर्ग की सदस्यता योग्यता पर आधारित होती है। यदि व्यक्ति में योग्यता नहीं है व वह कर्म नहीं करता है तो वह उच्च स्थिति से निम्न स्थिति में भी जा सकता है। यदि वह कर्म करता है तो वह निम्न स्थिति से उच्च स्थिति में भी जा सकता है। जिस प्रकार जाति धर्म पर आधारित है पर वर्ग कर्म पर आधारित होता है।

2. जाति का पेशा निश्चित होता है पर वर्ग का नहीं (Occupation of caste is determined but not of class) जाति प्रथा में पेशे की व्यवस्था भी व्यक्ति के जन्म पर ही आधारित होती थी अर्थात् विभिन्न जातियों से सम्बन्धित पेशे होते थे। व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता था, उसको जाति से सम्बन्धित पेशा अपनाना होता था। वह सारी उम्र उस पेशे को बदल कर कोई दूसरा कार्य भी नहीं अपना सकता था। इस प्रकार न चाहते हुए भी उसको अपनी जाति के पेशे को ही अपनाना पड़ता था।

वर्ग व्यवस्था में पेशे के चुनाव का क्षेत्र बहुत विशाल है। व्यक्ति की अपनी इच्छा होती है कि वह किसी भी पेशे को अपना ले। विशेष रूप से व्यक्ति जिस पेशे में माहिर होता था कि वह किसी भी पेशे को अपना लेता है। विशेष रूप से पर व्यक्ति जिस पेशे में माहिर होता है वह उसी पेशे को अपनाता है क्योंकि उसका विशेष उद्देश्य लाभ प्राप्ति की ओर होता था व कई बार यदि वह एक पेशे को करते हुए तंग आ जाता है तो वह दूसरे किसी और पेशे को भी अपना सकता है। इस प्रकार पेशे को अपनाना व्यक्ति की योग्यता पर आधारित होता है।

3. जाति की सदस्यता प्रदत्त होती है पर वर्ग की सदस्यता अर्जित होती है (Membership of caste is ascribed but membership of class is achieved)-सम्बन्धित होती थी भाव कि स्थिति वह खुद प्राप्त नहीं करता था बल्कि जन्म से ही सम्बन्धित होती थी। इसी कारण व्यक्ति की स्थिति के लिए ‘प्रदत्त’ (ascribed) शब्द का उपयोग किया जाता था। इसी कारण जाति व्यवस्था में स्थिरता बनी रहती थी। व्यक्ति का पद वह ही होता था जो उसके परिवार का हो। वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति की स्थिति ‘अर्जित’ (achieved) होती है अर्थात् उसको समाज में अपनी स्थिति प्राप्त करनी पड़ती है। इस कारण व्यक्ति शुरू से ही परिश्रम करनी शुरू कर देता है। व्यक्ति अपनी योग्यता के आधार पर निम्न स्थिति से उच्च स्थिति भी प्राप्त कर लेता है। इसमें व्यक्ति के जन्म का कोई महत्त्व नहीं होता। बल्कि परिश्रम व योग्यता उसके वर्ग व स्थिति के बदलने में महत्त्वपूर्ण होती है।

4. जाति बन्द व्यवस्था है व वर्ग खुली व्यवस्था है (Caste is a closed system but class is an open system)-जाति प्रथा स्तरीकरण का बन्द समूह होता है क्योंकि व्यक्ति को सारी उम्र सीमाओं में बन्ध कर रहना पड़ता है। न तो वह जाति बदल सकता है न ही पेशा। श्रेणी व्यवस्था स्तरीकरण का खुला समूह होता है। इस प्रकार व्यक्ति को हर किस्म की आज़ादी होती है। वह किसी भी क्षेत्र में मेहनत करके आगे बढ़ सकता है। उसको समाज में अपनी निम्न स्थिति से ऊपर की स्थिति की ओर बढ़ने के पूरे मौके भी प्राप्त होते हैं। वर्ग का दरवाज़ा प्रत्येक के लिए खुला होता है। व्यक्ति अपनी योग्यता, सम्पत्ति, परिश्रम के अनुसार किसी भी वर्ग का सदस्य बन सकता है व वह अपनी सारी उम्र में कई वर्गों का सदस्य बनता है।

5. जाति व्यवस्था में कई पाबन्दियां होती हैं परन्तु वर्ग में कोई नहीं होती (There are many restrictions in caste system but not in any class)-जाति प्रथा द्वारा अपने सदस्यों पर कई पाबन्दियां लगाई जाती थीं। खान-पान सम्बन्धी, विवाह, सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करने आदि सम्बन्धी बहुत पाबन्दियां थीं। व्यक्ति की ज़िन्दगी पर जाति का पूरा नियन्त्रण होता था। वह उन पाबन्दियां को तोड़ भी नहीं सकता था। ___ वर्ग व्यवस्था में व्यक्तिगत आज़ादी होती थी। भोजन, विवाह आदि सम्बन्धी किसी प्रकार का कोई नियन्त्रण नहीं होता था। किसी भी वर्ग का व्यक्ति दूसरे वर्ग के व्यक्ति से सामाजिक सम्बन्ध स्थापित कर सकता था।

6. जाति में चेतनता नहीं होती पर वर्ग में चेतनता होती है (There is no caste consciousness but there is class consciousness) —जाति व्यवस्था में जाति चेतनता नहीं पाई जाती थी। इसका एक कारण तो था कि चाहे निम्न जाति के व्यक्ति को पता था कि उच्च जातियों की स्थिति उच्च है, परन्तु फिर भी वह इस सम्बन्धी कुछ नहीं कर सकता था। इसी कारण वह मेहनत करनी भी बन्द कर देता था। उसको अपनी योग्यता अनुसार समाज में कुछ भी प्राप्त नहीं होता था।

वर्ग के सदस्यों में वर्ग चेतनता पाई जाती थी। इसी चेतनता के आधार पर तो वर्ग का निर्माण होता था। व्यक्ति इस सम्बन्धी पूरा चेतन होता था कि वह कितनी मेहनत करे ताकि उच्च वर्ग स्थिति को प्राप्त कर सके। इसी प्रकार वह हमेशा अपनी योग्यता को बढ़ाने की ओर ही लगा रहता था।

उपरोक्त विवरण के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि जाति व्यवस्था का केवल एक ही आधार होता है, वह था सांस्कृतिक। परन्तु वर्ग व्यवस्था के कई आधार पाए जाते हैं। हर आधार अनुसार वर्ग विभाजन अलग होता है। आर्थिक कारणों का वर्ग व्यवस्था पर अधिक प्रभाव होता था। व्यक्ति की आर्थिकता में परिवर्तन आने से उसकी सदस्यता बदल जाती है। परन्तु जाति व्यवस्था में आर्थिकता का कोई महत्त्व नहीं होता। यह एक बन्द व्यवस्था थी। भाव कि एक वर्ग व दूसरे वर्ग में जाति प्रथा वाली ही भिन्नता है, लेकिन जाति को व्यक्ति बदल नहीं सकता था जबकि वर्ग व्यवस्था को बदल सकता है।

प्रश्न 4. सामाजिक वर्ग के अलग-अलग संकेतकों का वर्णन करें।
उत्तर-एक सूचक वह वस्तु है, जो किसी लक्षण के अतिरिक्त उस बारे में बताता है, कि वह उसके बारे में पूरी तरह बताता है। सामाजिक गतिशीलता के कई सूचक हैं जिनमें से शिक्षा, व्यवसाय एवं आय प्रमुख हैं। इनका वर्णन निम्न प्रकार का है

1. शिक्षा (Education) शिक्षा को सामाजिक वर्ग का महत्त्वपूर्ण साधन माना गया है। यह कहा जाता है कि व्यक्ति जितनी अधिक शिक्षा प्राप्त करेगा, वह उतना ही ज़िन्दगी में सफल होगा। शिक्षा व्यक्ति के बुजुर्गों द्वारा किये गये गलत कार्यों को भी ठीक कर देती है। यह माना जाता है कि शिक्षा को केवल नौकरी का साधन मात्र नहीं समझा जाना चाहिए क्योंकि शिक्षा सीधे तौर पर ऊपर की तरफ गतिशीलता को लेकर जाती है। शिक्षा तो व्यक्ति के लिए उस समय उपस्थित अवसर प्राप्त करने के लिए व्यक्ति की योग्यता को बढ़ाती है। शिक्षा वह रास्ता बताती है, जो किसी भी व्यवसाय को अपनाने के लिए आवश्यक होते हैं, परन्तु यह उन रास्तों को प्रयोग करने के अवसर प्रदान नहीं करती है। शिक्षा गतिशीलता के साधन के रूप में कई कार्य करती है जैसे कि

  • शिक्षा व्यक्ति को मज़दूर से मैनेजर तक का रास्ता दिखाती है। कोई भी मज़दूर शिक्षा प्राप्त करने के बाद मैनेजर की पदवी तक पहुंच सकता है।
  • शिक्षा किसी को भी व्यवसाय प्राप्त करने के बारे में बताती है। व्यक्ति को अच्छी आय वाला रोजगार प्रदान करती है।
  • शिक्षा व्यक्ति की अधिक आय और नौकरी वाली पदवियां अर्जित करने में सहायता करती है। साधारणतः सरकारी नौकरी अच्छी शिक्षा द्वारा प्राप्त की जाती है। इसलिए अधिक तनख्वाह (Salary) के लिए अच्छी शिक्षा ग्रहण करना आवश्यक है।

यह माना जाता है कि व्यक्ति जितना अधिक समय पढ़ाई में लगाता है, उसकी अधिक आय एवं सामाजिक गतिशीलता में ऊपर की तरफ बढ़ने के अधिक अवसर आते हैं। शिक्षा व्यक्ति को कई प्रकार के व्यवसाय प्राप्त करने के अवसर प्रदान करती है। कई प्रकार के अध्ययनों से यह पता चला है कि शिक्षा न केवल व्यक्ति को ऊंची पदवी प्राप्त करने का अवसर देती है, बल्कि इसके साथ व्यक्ति समाज के बीच रहने एवं व्यवहार करने के तरीकों के बारे में बतलाती है। ऐसा सीखने से व्यक्ति के लिए सफलता प्राप्ति के अवसर बढ़ जाते हैं। इस तरह शिक्षा व्यक्ति के लिए सामाजिक गतिशीलता में ऊपर बढ़ने के अवसर प्रदान करती है।

शिक्षा एक विद्यार्थी के जीवन में अवसर प्राप्त करने के अवसरों में वृद्धि प्रदान करती है। शिक्षा प्राप्ति के पश्चात् व्यक्ति में धन प्राप्ति हेतु समर्था में वृद्धि होती है। जो बच्चे पढ़ाई की तरफ ध्यान नहीं देते हैं, उनका जीवन काफ़ी कठिनाइयों वाला व संघर्षपूर्ण हो जाता है। परन्तु जो बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं और अपना अधिक समय पढ़ाई में व्यतीत करते हैं वे बड़े होकर अधिक धन की प्राप्ति करते हैं।

बच्चों की पृष्ठभूमि (Background History) भी उनकी वर्तमान प्राप्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जिन बच्चों के माता-पिता अधिक पढ़े-लिखे होते हैं और ऊंची पदवी पर कार्य कर रहे होते हैं उनको घर में ही शिक्षा का अच्छा वातावरण प्राप्त होता है, उन बच्चों के माता-पिता उन बच्चों के लिए आदर्श बन जाते हैं। माता-पिता बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने की महत्ता के बारे में बतला कर उनको शिक्षा प्राप्ति के लिए प्रेरित करते हैं। इस तरह पढ़ाई के पश्चात् उनमें सामाजिक पदवी प्राप्त करने की लालसा बढ़ जाती है और वे ऊंची पदवी प्राप्त करके समाज में ऊंचा उठ जाते हैं। इस प्रकार शिक्षा गतिशीलता का एक महत्त्वपूर्ण सूचक है।

यहां एक बात साफ कर देनी ज़रूरी है कि व्यक्ति जितनी अधिक शिक्षा प्राप्त करता है, उसको जीवन में उन्नति करने के उतने ही मौके बढ़ जाते हैं। जितना अधिक समय तथा पैसा व्यक्ति शिक्षा में निवेश करता है, उतने ही उसको अच्छी नौकरी अथवा व्यापार करने के अधिक मौके प्राप्त होंगे। उदाहरणत: यदि किसी विद्यार्थी ने बी० कॉम (B.Com.) की डिग्री प्राप्त करने के बाद पढ़ाई छोड़ दी है तो उसको अच्छी नौकरी मिलने के बहुत ही कम मौके प्राप्त होंगे। परन्तु उसने B.Com. के बाद किसी I.I.M. से M.B.A. कर ली है तो उसको बहुत ही अच्छी नौकरी तथा बहुत ही अच्छा वेतन प्राप्त हो सकता है। इस तरह जितना अधिक समय तथा पैसा शिक्षा पर खर्च किया जाएगा, उतने अधिक मौके बढ़िया नौकरी के लिए प्राप्त होंगे।

अन्त में हम कह सकते हैं कि चाहे शिक्षा गतिशीलता का एक सीधा रास्ता नहीं है परन्तु यह व्यक्ति को उसके पेशे को बदलने तथा उससे लाभ उठाने में बहुत ज्यादा मदद करती है। शिक्षा व्यक्ति को गतिशील होने के लिए प्रेरित करती है तथा जीवन में ऊपर उठने के मौके प्रदान करती है।

2. व्यवसाय (Occupation)-गतिशीलता के कारण ही समाज को पता चलता है कि किस पद पर किस व्यक्ति को बिठाया जाए। इस प्रकार समाज प्रत्येक पद पर योग्य व्यक्ति को ही बिठाता है। इस तरह यह व्यक्ति को उसके लक्ष्य प्राप्ति हेतु सहायता करती है। व्यवसाय के आधार पर समाज को हम दो तरह के समाजों में बांट सकते हैं। (1) बन्द समाज एवं खुला समाज। इन समाजों की गतिशीलता में व्यवसाय का महत्त्व इस प्रकार है

(i) बन्द समाज (Closed Society)-भारत पुराने समाज में बन्द समाजों की उदाहरण है। पुराने समाज में चार प्रकार की जातियां थीं, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं निम्न जातियां। प्रत्येक जाति का एक निश्चित व्यवसाय होता था।
ब्राह्मणों का कार्य पढ़ाना था, जिस कारण उसकी सामाजिक स्थिति सबसे ऊंची थी। उसके पश्चात् क्षत्रिय आते थे, जिनका कार्य देश की रक्षा करना था और राज्य चलाना था। तीसरे स्थान पर वैश्य थे जिनका कार्य व्यापार एवं कृषि करना था। सबसे निम्न स्थान निम्न जातियों का था, जिनका कार्य उपरोक्त तीनों जातियों की सेवा करना था।

प्रत्येक व्यक्ति का व्यवसाय उसकी जाति एवं जन्म से सम्बन्धित होता था। प्रत्येक जाति के लोग अपने-अपने विशेष कार्य करते थे। जाति अपने सदस्यों को अन्य व्यवसायों को अपनाने के लिए रोकती थी। क्योंकि इसके साथ जाति के आर्थिक एवं धार्मिक बन्धन टूटते थे। यदि कोई जाति के बन्धनों को तोड़ता भी था तो उसे जाति में ही से बाहर निकाल दिया जाता था। इस प्रकार जाति एवं उपजाति अपने-अपने भिन्न-भिन्न कार्यों को करती थी।

हमारे देश में स्वतन्त्रता के पश्चात् आधुनिकीकरण एवं औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया आरम्भ हुई। जिस कारण लोगों को अपने व्यवसायों को बदलने के अवसर प्राप्त हुए। लोगों के व्यवसाय से सम्बन्धित बन्धन समाप्त हो गये। उन्होंने अन्य व्यवसाय अपना लिये। इस प्रकार बन्द समाजों में गतिशीलता व्यवसायों के कारण आरम्भ हुई और वह अब भी चल रही है।

इस तरह हम कह सकते हैं कि बन्द समाजों में पेशा व्यक्ति को अपनी योग्यता के आधार पर प्राप्त नहीं होता था बल्कि उसको जन्म के आधार पर प्राप्त होता था। व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता था उसको उस जाति से सम्बन्धित पेशा अपनाना ही पड़ता था। चाहे कुछ पेशे जैसे कि सेना में नौकरी करना, कृषि करना, व्यापार इत्यादि में कुछ प्रतिबन्ध कम थे, परन्तु फिर भी व्यक्तियों के ऊपर पेशा अपनाने की बन्दिशें थीं। यदि कोई पेशे से सम्बन्धित जाति के नियमों के विरुद्ध जाता था तो उसको जाति में से निकाल दिया जाता था। इस तरह बन्द समाजों में पेशा व्यक्ति की योग्यता पर नहीं बल्कि जन्म के आधार पर प्राप्त होता था। परन्तु हमारे देश की स्वतन्त्रता के पश्चात् बहुत से कारणों के कारण गतिशीलता की प्रक्रिया शुरू हुई जैसे कि आधुनिकीकरण, पश्चिमीकरण, औद्योगीकरण, शहरीकरण इत्यादि तथा धीरे-धीरे पेशे से सम्बन्धित गतिशीलता शुरू हो गई है। अब तो भारत जैसे बन्द समाजों में भी पेशे पर आधारित गतिशीलता शुरू हो गई है। लोग अब अपनी मर्जी तथा योग्यता के अनुसार पेशा अपनाने लग गए हैं। पेशे से सम्बन्धित पाबन्दियां बहुत ही कम हो गई हैं।

(ii) खुला समाज (Open Society)-खुले समाज के भीतर समूह कट्टर नहीं होते हैं। व्यक्ति को अपना कोई भी व्यवसाय अपनाने की स्वतन्त्रता होती है। वह कोई भी व्यवसाय स्वः इच्छा से अपना सकता है। ऐसे समाजों में ऊंची पदवी वाले व्यवसायों में श्रम की मांग में वृद्धि होने के कारण गतिशीलता भी बढ़ जाती है। परन्तु ऊंची पदवी केवल योग्य व्यक्तियों को ही प्राप्त होती है। यद्यपि अब मशीनों के बढ़ने के कारण मजदूरों की मांग कम हो गई है। परन्तु तकनीकी शिक्षा प्राप्त व योग्य कर्मियों (कर्मचारियों) की मांग अब तक भी है। इस प्रकार तकनीकी शिक्षा प्राप्त योग्य व्यक्तियों के लिए रोजगार के अवसर अब बढ़ रहे हैं। लोग अलग-अलग कार्यों को अपना रहे हैं जिस कारण समाजों में गतिशीलता भी बढ़ रही है। इस तरह खुले समाजों में आधुनिकीकरण एवं औद्योगिकीकरण के कारण गतिशीलता भी बढ़ रही है।

खुले समाजों में व्यक्ति की जाति अथवा जन्म नहीं बल्कि उसकी योग्यता की महत्ता होती है। व्यक्ति में जिस प्रकार की योग्यता होती है वह उस प्रकार का पेशा अपनाता है। खुले समाजों में व्यक्ति की जाति का महत्त्व नहीं है कि उसने किस जाति में जन्म लिया है बल्कि महत्त्व इस बात का है कि उसमें किस कार्य को करने की योग्यता है। नाई का पुत्र बड़ा अफ़सर बन सकता है तथा अफसर का पुत्र कोई व्यापार कर सकता है। व्यक्ति अपनी मर्जी का पेशा अपना सकता है, उसके ऊपर किसी प्रकार का कोई बन्धन नहीं होता है कि वह किस प्रकार का पेशा अपनाए। वह अलग-अलग प्रकार की तकनीकी शिक्षा प्राप्त करके अलग-अलग प्रकार के पेशे अपना सकता है। कोई छोटा सा कोर्स करते ही व्यक्ति के लिए नौकरी प्राप्त करने के मौके बढ़ जाते हैं। लोग अलग-अलग पेशे अपना रहे हैं। कंपनियां अधिक वेतन तथा अच्छी स्थिति का प्रलोभन देती हैं जिस कारण लोग पुरानी नौकरी छोड़कर अधिक वेतन वाली नौकरी कर लेते हैं जिस कारण समाज में गतिशीलता बढ़ रही है। आधुनिकीकरण तथा औद्योगीकरण ने तो गतिशीलता को बहुत ही अधिक बढ़ा दिया है। इस तरह खुले समाजों में पेशे के आधार पर गतिशीलता बहुत अधिक बढ़ रही है।

3. आय (Income)—व्यक्ति की आय गतिशीलता का एक महत्त्वपूर्ण सूचक है। व्यक्ति की आय उसकी सामाजिक स्थिति को ऊंचा व निम्न रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अपनाती है। जिसकी आय अधिक होती है उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा अधिक होती है। परन्तु जिसकी आय कम होती है उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा भी कम होती है।

आजकल का समाज वर्ग प्रणाली पर आधारित है। इस प्रणाली में धन एवं आय की महत्ता अधिक है। व्यक्ति अपनी योग्यता के कारण सामाजिक स्तरीकरण में ऊंचा स्थान प्राप्त करता है। व्यक्ति अपने आपके साथ, अपनी आर्थिक स्थिति अन्य लोगों के मुकाबले सुधार लेता है और अपनी जीवन शैली भी बदल लेता है। खुले समाजों में अधिक आय वाले को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। सामाजिक वर्ग के निर्धारण हेतु आय एक महत्त्वपूर्ण कारक है। आमदनी (आय) के कारण ही व्यक्ति अपनी जीवन शैली बढ़िया कर लेता है। अमीर व्यक्तियों के पास पैसा तो काफ़ी अधिक होता है। परन्तु उनके जीवन शैली भिन्न-भिन्न प्रकार की हो सकती है। नये बने अमीरों को अमीरों की जीवन शैली सीखने में काफ़ी समय लग जाता है। चाहे वह व्यक्ति स्वयं अमीरों की जीवन शैली न सीख सके। परन्तु उसके बच्चे अवश्य अमीरों की शैली सीख जाते हैं। इस प्रकार अमीर व्यक्ति के बच्चों का सामाजिक जीवन स्तर काफ़ी ऊंचा उठ जाता है। धन के कारण उसके बच्चे अमीरों की जीवन शैली अपना लेते हैं और उनके बच्चों को यह शैली विरासत में मिल जाती है।

इस प्रकार आमदनी के तरीकों से ही सामाजिक प्रतिष्ठा होती है। एक व्यापारी की कमाई को इज्जत प्राप्त होती है। परन्तु एक वेश्या या स्मगलर के द्वारा कमाये धन को इज्ज़त की दृष्टि से नहीं देखा जाता है। आय में वृद्धि के साथ व्यक्ति अपनी प्रतिष्ठा, वर्ग, रहने-सहने का तरीका बदल लेता है जिस कारण सामाजिक गतिशीलता भी बढ़ती है।

व्यक्ति की आय बढ़ने से उसकी स्थिति में अपने आप ही परिवर्तन आ जाता है। लोग उसको इज्जत की नज़रों से देखना शुरू कर देते हैं। लोगों की नज़रों में अब वह एक अमीर आदमी बन जाता है तथा उसको समाज में प्रतिष्ठा हासिल हो जाती है। परन्तु एक बात ध्यान रखने वाली है कि आमदनी प्राप्त करने के ढंग समाज द्वारा मान्यता प्राप्त होने चाहिए, गैर-मान्यता प्राप्त नहीं। पैसा आने से तथा आय बढ़ने से व्यक्ति अपने आराम की चीजें खरीदना शुरू कर देता है-जिससे उसके रुतबे तथा सामाजिक स्थिति में बढ़ोत्तरी होनी शुरू हो जाती है। वह अपना जीवन ऐश से जीना शुरू कर देता है। इस तरह आय बढ़ने से उसकी समाज में स्थिति निम्न से उच्च हो जाती है तथा यह ही गतिशीलता का सूचक है।
इस तरह इस व्याख्या से स्पष्ट है कि शिक्षा, पेशा तथा आय सामाजिक गतिशीलता के प्रमुख सूचक हैं।

वर्ग असमानताएं Notes

  • हमें हमारे समाज में कई सामाजिक समूह मिल जाएंगे जो अन्य समूहों से अधिक अमीर, इज्ज़तदार तथा शक्तिशाली होते हैं। यह अलग-अलग समूह समाज के स्तरीकरण का निर्माण करते हैं।
  • प्रत्येक समाज में बहुत से वर्ग होते हैं जो अलग-अलग आधारों के अनुसार निर्मित होते हैं तथा यह एक-दूसरे से किसी न किसी आधार पर अलग होते हैं।
  • कार्ल मार्क्स ने चाहे वर्ग की परिभाषा कहीं पर भी नहीं दी है परन्तु उसके अनुसार समाज में दो प्रकार के वर्ग होते हैं। पहला जिसके पास सब कुछ होता है (Haves) तथा दूसरा वह जिसके पास कुछ भी नहीं होता (Have nots)
  • वर्ग की कई विशेषताएं होती हैं जैसे कि यह प्रत्येक स्थान पर पाए जाते हैं, इसमें स्थिति अर्जित की जाती है, यह खुला समूह होता है, आर्थिकता इसका प्रमुख आधार होता है, यह स्थायी होते हैं इत्यादि।
  • कार्ल मार्क्स का कहना था कि वर्गों में चेतनता होती है जिस कारण समाज के अलग-अलग वर्गों में वर्ग संघर्ष चलता रहता है।
  • मार्क्स के अनुसार अलग-अलग समय में अलग-अलग समाजों में दो प्रकार के समूह पाए जाते हैं। प्रथम वर्ग वह है जिसके पास उत्पादन के साधन होते हैं जिसे पूँजीपति कहते हैं। दूसरा वर्ग वह है जिसके पास अपना परिश्रम बेचने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता। उसे मज़दूर वर्ग कहते हैं।
  • मैक्स वैबर के अनुसार पैसा, शक्ति तथा प्रतिष्ठा असमानता के आधार हैं। वर्ग कई चीज़ों से जुड़ा होता है जैसे कि आर्थिकता, समाज में स्थिति तथा राजनीति में सत्ता। वैबर के अनुसार एक वर्ग के व्यक्तियों का जीवन जीने का ढंग एक जैसा ही होता है।
  • वार्नर ने अमेरिका में वर्ग व्यवस्था का अध्ययन किया तथा कहा कि तीन प्रकार के वर्ग होते हैं-उच्च वर्ग, मध्य वर्ग तथा निम्न वर्ग। यह तीनों वर्ग आगे जाकर उच्च, मध्य तथा निम्न में विभाजित होते हैं। वार्नर ने वर्ग संरचना की आय तथा धन के आधार पर व्याख्या की है।
  • अगर आजकल के समय में देखें तो वर्ग कई आधारों पर बनते हैं परन्तु शिक्षा, पेशा तथा आय इसके प्रमुख आधार हैं।
  • वर्ग तथा जाति एक-दूसरे से काफ़ी अलग होते हैं जैसे कि वर्ग एक खुली व्यवस्था है परन्तु जाति एक बंद वर्ग है, वर्ग में स्थिति अर्जित की जाती है परन्तु जाति में यह प्रदत्त होती है, वर्ग में गतिशीलता होती है परन्तु जाति में नहीं इत्यादि।
  •  वर्ग संघर्ष (Class Struggle)- यह एक प्रकार का तनाव है जो सामाजिक आर्थिक हितों तथा अलग-अलग समूहों के लोगों के हितों के कारण समाज में मौजूद होता है।
  • बुर्जुआ (Bourgeoisie)-यह एक प्रकार का सामाजिक वर्ग है जो उत्पादन के साधनों का मालिक होता है तथा जो अपने साधनों की सहायता से समाज के अन्य समूहों का आर्थिक शोषण करता है।
  • संभ्रांत वर्ग (Elite) यह उच्च विशिष्ट लोग होते हैं जो अपने समूह तथा समाज में नेता की भूमिका तथा रास्ता दिखाने की भूमिका निभाते हैं। उनकी भूमिका या नेतृत्व सामाजिक परिवर्तन को उत्पन्न करता है।
  • सर्वहारा (Proletariat)—पूँजीवादी समाज में इस शब्द को उस वर्ग के लिए प्रयोग किया जाता है जो श्रमिकों व औद्योगिक मजदूरों के लिए प्रयोग किया जाता है। इनके पास अपना परिश्रम बेचने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता।
  • सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility)—इस शब्द को व्यक्तियों अथवा समूहों को अलग-अलग सामाजिक आर्थिक पदों पर जाने के लिए प्रयोग किया जाता है।
  • दासत्व (Slavery)—यह सामाजिक स्तरीकरण का एक रूप है जिसमें कुछ व्यक्तियों के ऊपर अन्य व्यक्ति अपनी जायदाद की तरह स्वामित्व रखते हैं।
  • छोटे दुकानदार (Petty Bourgeoisie)—यह एक फ्रैंच शब्द है जो एक सामाजिक वर्ग के लिए प्रयोग किया
    जाता है जिसमें छोटे-छोटे पूँजीपतियों जैसे कि दुकानदार तथा वर्कर आ जाते हैं जो उत्पादन, विभाजन तथा वस्तुओं के विनिमय तथा बुर्जुआ मालिकों द्वारा स्वीकृत किए जाते हैं।