Class 7 Social Notes Chapter 6 विचरती और विमुक्त जातियाँ

भारत विविधतापूर्ण सांस्कृतिक विरासत वाला देश है। राष्ट्र की भौगोलिक विविधता देखते हुए समग्र राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधने का भगीरथ कार्य अनेक रूपों में हुआ है। हमसे भिन्न भाषा या रहन-सहन वालों के प्रति भी हम अपनेपन की भावना से जुड़े हुए हैं। इस तरह विविध संस्कृतियों को जोड़ती विचरती और विमुक्त जातियों के संबंध में हम अध्ययन करेंगे।

विचरती और विमुक्त जातियाँ व्यवसाय तथा विविध उद्देश्यों के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान पर सतत भ्रमण करती रहती थीं। 1857 ई. के विप्लव में इन जातियों की भूमिका देखकर तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने इन जातियों को अन्य समुदाय से अलग करने के लिए 1871 ई. में ‘क्रिमिनल ट्राइब्ज़ एक्ट-1871’ के अंतर्गत कई जातियों पर झूठे आरोप लगाकर गुनहगार समुदाय घोषित कर दिया। इस दुष्प्रचार की सच्चाई सामने आने में बहुत समय लगा।

भारत सरकार ने स्वतंत्रता के बाद 1952 ई. में इस काले कानून में से इन जातियों को मुक्त किया। उन्हें ‘विमुक्त जाति’ के रूप में सम्मान मिला।

विचरती और विमुक्त जातियाँ : लाक्षणिकता और जीवनशैली

कई जातियाँ जीवन निर्वाह के लिए एक जगह से दूसरी जगह निरंतर घूमती रहती थीं। जिन्हें हम विचरती या विमुक्त जाति कहते हैं। लगभग समग्र भारत में फैली यह जाति छोटे-मोटे व्यवसाय करके जीवननिर्वाह करती थी। उनका जीवन ज्यादातर वन्य संसाधन और पशुपालन पर आधारित था। विचरती और विमुक्ति जाति के लोग अपने पशुओं के साथ दूर-दूर तक घूमते रहते थे। वे स्थायी किसानों के पास से अनाज, कपड़ा, बर्तन और अन्य वस्तुओं के लिए ऊन, घी वगैरह वस्तुओं का विनिमय भी करते थे। कई विचरती जातियाँ जानवरों पर सामान लादकर एक जगह से दूसरी जगह ले जाकर वस्तुओं का क्रय-विक्रय करती थीं।

कई विचरती विमुक्त जातियाँ भेड़-बकरी, घोड़ा, गाय, भैंस, गधा, ऊँट, भैंसा, बैल वगैरह के व्यापार के साथ भी जुड़ी थीं। विविध जाति के छोटे-बड़े फेरीवाले एक गाँव से दूसरे गाँव जाकर रस्सी, घास की चटाई और बड़े थैले बेचते थे। कई विचरती विमुक्त जातियों में कांगसिया और मोडवानो का समावेश होता था। जो चूड़ी और सौंदर्य प्रसाधनों के व्यापार के साथ जुड़े थे।

इन जातियों की विशिष्ट पहचान यह थी कि उनकी भाषा और सामाजिक बातें तथा रहन-सहन भी समान रहता था। स्थायी समाज व्यवस्था के अभाव में अन्य समाजों की अपेक्षा भिन्न कक्षा का जीवन जीते थे। सान्सी, कंजर जैसी जातियाँ तथा बंजारा, कर्कमुंडी, हिरनशिकारी जैसे समूहों को विचरती और विमुक्त जातियों में रखकर उनके विकास के लिए सरकार ने विशेष कदम उठाए हैं। उनके विकास के लिए और उनकी संस्कृति के संरक्षण के लिए सरकार ने उन पर विशेष अध्ययन करवाकर 2008 ई. में एक विस्तृत अहवाल (रिपोर्ट) तैयार करवाया है। उन्हें संवैधानिक रूप से विचरती और विमुक्त जातियों का दर्जा देकर मानव अधिकार देने का प्रयत्न किया है।

भारत की विचरती जातियों में अघोरी, बहुरूपी, बंजारा, बरंडा, भामटा, भोवी चितोडिया, हेलवा, ईरानी, जातिगर, कोटवालिया, बैरागी, पारधी, तलवार, कामती आदि का समावेश होता है।

गुजरात में विचरती जातियों में बजाणिया, गारुड़ी, बाँसफोड़ा, भवैया, रावलिया, कांगसिया, चामठा, सलाट आदि जातियों का समावेश होता है। तो विमुक्त जातियों में छारा, डफेर, मियाणा, वाघेर, देवीपूजक, संधि वगैरह का समावेश होता है। इन सभी जातियों को भारत सरकार ने अति पिछड़ी और अधिक पिछड़ी जाति में रखकर उनके विकास के लिए विशिष्ट योजनाएँ बनाई हैं। इन योजनाओं में सतत स्थानांतरित होने वाले इन समूहों को स्थायी करने की बात की गई है। उनके बच्चों के लिए खास आश्रमशालाओं और छात्रालयों की स्थापना की गई है।
कुछ विचरती और विमुक्त जातियों की जीवनशैली को हम भारत और गुजरात के संदर्भ में जानने का प्रयत्न करेंगे।

(1) देवीपूजक : गुजरात में विमुक्त जातियों में से देवीपूजक जाति राज्य के अधिकांश क्षेत्रों में देखने को मिलती है। साग-सब्जी के उत्पादन और व्यापार के उपरांत कई परंपरागत व्यवसायों से ये लोग जुड़े हुए हैं। इस समाज में शिक्षा का निम्न प्रमाण, जागृति का अभाव होने से अंधश्रद्धा और कई कुप्रथाएँ आज भी कहीं-कहीं देखने को मिलती हैं। परिणामस्वरूप समाज में गरीबी देखने को मिलती है। __इस समाज में सामाजिक विवादों और पारिवारिक समस्याओं में जातिगत पंचों की पंचायत प्रभावशाली भूमिका निभाती है। उनके द्वारा समस्याओं का निराकरण किए जाने से अदालतों में उनके आंतरिक प्रश्नों से संबंधित मुकदमे शायद ही देखने को मिलते हैं। वर्तमान समय में इस समाज में शिक्षा का प्रमाण बढ़ने से उनके सामाजिक और आर्थिक पहलू में सुधारात्मक परिवर्तन देखने को मिलता है।

(2) बंजारा : बंजार के साथ जुड़े लोग अर्थात् बंजारा। विचरती विमुक्त जातियों में बंजारे सबसे महत्त्वपूर्ण थे। प्राचीनकाल से भारतीय समाज व्यवस्था का एक प्रसिद्ध नाम है। अधिकांशतः बंजारे व्यापारियों के सामान की गाँठों को पशुओं द्वारा लाने-लेजाने का कार्य करते थे। उनके इस समूह को ‘बंजार’ (टांडु) कहते थे। अलाउद्दीन खिल्जी दिल्ली के बाजारों तक अनाज और चीज-वस्तुएँ लाने-लेजाने के लिए उनका उपयोग करता था। बादशाह जहाँगीर ने भी बंजारों द्वारा बैलों पर अनाज लादकर शहर में बेचने संबंधी उनके कार्य का उल्लेख किया है। विशेष बात तो यह है कि युद्ध दौरान बंजारे बैलों के समूह द्वारा मुगल सेना के लिए अनाज और चीज-वस्तुएँ लाते थे। एक तरह से देखें तो बंजारे भारत और विश्व के बीच की कड़ी थे। मध्य एशिया से अनेक चीज-वस्तुएँ उनके द्वारा भारत में आती और भारत से बाहर जाती थीं।

वे भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक देखने को मिलते हैं। अंग्रेजों के शासन के बाद यह समाज बिखर गया। गरीब बंजारे चूड़ी, कंघी के व्यापारी हो गए तो कुछ मजदूर हो गए। कुछ मिट्टी के कार्य से भी जुड़ गए। जबकि स्वतंत्र भारत में शिक्षा और अन्य योजनाकीय लाभ लेकर वे विकसित हुए हैं।

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अन्य विचरती और विमक्त जातियाँ

(3) मालधारी : गुजरात में गीर, बरडा, आलेच और कच्छ के रणप्रदेश में रहनेवाले मालधारी विचरती और विमुक्त जाति के रूप में जाने जाते हैं। गीर और बरडा पहाड़ के जंगलों में वे नेस (घास-फूस से बने घरोंवाले छोटे गाँव) में रहते हैं और ज्यादातर पशुपालन पर अपना जीवननिर्वाह करते हैं। कच्छ के रबारी गर्मियों में कच्छ से मध्य गुजरात तक स्थानांतरित होते रहते हैं। उनके साथ ऊँट और भेड़-बकरियाँ बड़ी संख्या में होती हैं। स्त्री और पुरुष भेंड़ के ऊन और बकरे के बाल काटने का कार्य करते हैं। उसी पर उनका जीवननिर्वाह आधारित होता है।

(4) नट : हम कई बार बाजार में रास्ते पर करतब कर रहे नट को देखते हैं। वे अलग-अलग करतब करके पेट भरते हैं। जबकि अंग करतब की बहुत-सी कलाएँ वे जानते हैं। जादू करना, रस्सी पर चलना, लकड़ी पर चलना जैसे करतबों से वे लोगों का मनोरंजन करते हैं। परंतु गरीब और अशिक्षित होने से समाज के मूल प्रवाह से वे दूर रहते हैं। निरंतर स्थानांतरित होना भी उनके विकास में बाधक रहा है। अब तो उनका यह परंपरागत व्यवसाय भी बंद हो गया है और देश के मुख्य प्रवाह में उनका शामिल होना शुरू हो गया है।

(5) कांगसिया और अन्य : विचरती और विमुक्त जातियों में कांगसिया, वेडवा, मदारी, डफेर आदि का समावेश होता है। कांगसिया ज्यादातर कंघी और सौंदर्य प्रसाधन बेचने का काम करते हैं। वे भी एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित होते रहने के कारण और परंपरागत व्यवसाय बंद होने के कारण अविकसित परिस्थिति में जीते हैं। इन सभी जातियों की जीवन-शैली ज्यादातर कबीला प्रथा (परिवार अथवा कुटुंब) प्रकार की देखने को मिलती है। वे दूर-दूर क्षेत्र में रहते हैं फिर भी उनकी भाषा और जीवन-शैली समान देखने को मिलती है। उनका भोजन और पहनावा भी लगभग समान होता है।

बदलते समय के साथ परिवर्तन

केन्द्र सरकार और राज्य सरकार ने ऐसी जातियों के उत्कर्ष के लिए कुछ विशिष्ट योजनाओं द्वारा उन्हें सामान्य प्रवाह में शामिल करने का प्रयत्न किया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, मकान वगैरह की सुविधाएँ देकर उन्हें रोजगार मिले ऐसा वातावरण तैयार किया है। वादी, बजाणिया, मदारी अब रास्ते पर करतब करते दिखाई नहीं देते हैं। एक समय था जब ये मनोरंजन के मुख्य प्रवाह में थे लेकिन बदले समय के प्रभाव से ये अपनी पहचान खो बैठे हैं। सरकार ने विज्ञान और टेक्नोलॉजी के साथ उन्हें जोड़कर समुचित विकास का प्रयत्न किया है। परंतु अभी भी शिक्षा और जागृति के अभाव में विचरती और विमुक्त जातियों में गरीबी और बेरोजगारी देखने को मिलती है। इससे पता चलता है कि उनके उत्थान के लिए विशेष प्रयत्न की आवश्यकता है।