Class 7 Social Notes Chapter 4 मध्ययुगीन स्थापत्य, शहर, व्यापारी और कारीगर

मध्ययुगीन स्थापत्य

भारतीय शिल्पस्थापत्य-कलाओं की अद्वितीय और लंबी ऐतिहासिक विरासत है। भारत कला और स्थापत्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध है। प्राचीन समय से लेकर विविध समयकाल दौरान विभिन्न प्रांतों में मौर्ययुग दौरान स्तूपों तथा स्तंभलेखों, अनुमौर्ययुग दौरान गांधार तथा मथुराशैली में स्तूपों, गुप्तसमय दौरान राजमहल, स्तूपों, स्तंभों, विहारों, भवनों तथा मंदिरों का निर्माण हुआ था। मध्ययुग दौरान पाल, प्रतिहार, राष्ट्रकूट, राजपूत, दिल्ली सल्तनत तथा मुगल साम्राज्य द्वारा विविध स्थलों पर बनवाए गए स्थापत्यों में वाव (बावड़ी), तालाब, मंदिर और मस्जिद आदि अधिक संख्या में हैं। भारत के विविध प्रांतों ने विरासत में मिली स्थापत्यकला को अपनेअपने ढंग से विकसित किया है।

शिल्पकला : शिल्पी के मन में जन्म लेनेवाले भावों को छेनी, हथौड़ी द्वारा पत्थर, लकड़ी, धातु पर उत्कीर्ण करने की कला अर्थात् शिल्पकला।
स्थापत्य : स्थापत्य के लिए ‘शिल्पशास्त्र’ शब्द का भी उपयोग होता है। स्थापत्य का सरल अर्थ निर्माण होता है। मकान, नगर, कुंआ, किला, मीनार, मंदिर, मस्जिद, मकबरा, बावड़ी आदि के निर्माण को स्थापत्य कहते हैं। स्थापत्यकला में निपुण व्यक्ति को ‘स्थपति’ कहते हैं।

भारत के स्थापत्य

700 ई. से 1200 ई. तक राजपूत-युग था। राजपूतकालीन स्थापत्य में मंदिर की नागरशैली उत्तर भारत में प्रचलित थी। खजुराहो के मंदिर, पुरी का लिंगराज मंदिर तथा सौराष्ट्र के गोप के मंदिरों का समावेश होता है। दिल्ली सल्तनत के समयकाल में इस्लाम से संबद्ध नई स्थापत्यशैली देखने को मिलती है, जिसमें शुरुआत में अरबशैली प्रमुख है। इस स्थापत्य में मस्जिद, मकबरा और रोजा ये तीन स्थापत्य मुख्य हैं। दिल्ली के स्थापत्यों में जामा मस्जिद, कुतुबमीनार, हौज-ए-खास, अलाई दरवाजा, सीरी का किला मुख्य है। फिरोजशाह तुगलक द्वारा बनवाई गई मस्जिदें और नहरें विशिष्ट हैं। गुजरात, बंगाल और मालवा के मुस्लिम शासकों ने इस दौरान कई स्थापत्य तैयार करवाए थे। जिनमें अहमदाबाद में भद्र का किला और जामामस्जिद, बंगाल में सोना मस्जिद महत्त्वपूर्ण हैं। इस समय हिंदू स्थापत्यों में राणा कुंभा द्वारा बनवाया गया कुंभलगढ़ का दुर्ग और चितौड़ का कीर्तिस्तंभ या विजयस्तंभ महत्त्वपूर्ण है।

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13वीं शताब्दी में निर्मित कोणार्क का सूर्यमंदिर और कर्नाटक का हौशलेश्वर मंदिर सबसे विशिष्ट प्रकार के स्थापत्य हैं।

ओडिशा राज्य के पुरी जिले में बंगाल की खाड़ी के पास कोणार्क का सूर्यमंदिर है। इस मंदिर का निर्माण 13वीं शताब्दी में गंगवंश के राजा नरसिंह वर्मन प्रथम के समय हुआ था। यह रथमंदिर सात अश्वों द्वारा खींचे जा रहे सूर्य के रथ जैसे निर्मित किया गया है। इसमें 12 विशाल पहिए हैं। इस मंदिर का निर्माण काले पत्थरों में से किया गया है, इसलिए उसे ‘काला पेगोड़ा’ के नाम से भी जाना जाता है।

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उत्तर भारत में मंदिरों की विशेषता उनके गोल शिखरों (गुम्बदों) और स्तंभ बिना के कक्षों के कारण है। दक्षिण भारत में शंकु आकार के नोकदार शिखरोंवाले मंदिर बनाए गए। दक्षिण भारत में गोपुरम् (मंदिर का प्रवेश-द्वार) मंदिर की विशेषता है।

मंदिर में गर्भगृह, अंतराल, मंडप, शृंगार-चौकी या मुख-मंडप होता है। मंदिर का प्रदक्षिणा-पथ होता है।
इस समयकाल में कई महत्त्वपूर्ण मंदिरों में पल्लव-कालीन रथमंदिरों और तंजौर के राजराजेश्वर मंदिर की गणना की जाती है। तंजौर का राजराजेश्वर मंदिर उस समय का सबसे ऊँचा मंदिर माना जाता था।
मुगल स्थापत्यकला एकदम विशिष्ट थी। मुगल स्थापत्यकला का विशेष नमूना हुमायूँ के मकबरे में देखने को मिलता है।
अकबर ने आगरा का किला और फतेहपुर सीकरी का किला बनवाया था। शेरशाह का सासाराम का मकबरा इस समय का विशिष्ट स्थापत्य है। मुगलों ने बाग-बगीचे की एक पूरी परंपरा शुरू की थी। जिसमें कश्मीर के निशातबाग, लाहौर के शालीमार बाग और आगरा के आरामबाग का समावेश होता है।

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मुगल स्थापत्यकला का सर्वोच्च शिखर शाहजहाँ निर्मित आगरा के ताजमहल में देखने को मिलता है। विश्व के सात अजूबों में से एक ताजमहल है। जो उत्तरप्रदेश के आगरा में यमुना नदी के किनारे स्थित है। ताजमहल का निर्माण मुगल बादशाह शाहजहाँ ने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में करवाया था। ताजमहल भारत के स्थापत्यकला की विरासत को गौरवान्वित करता है और देश-विदेश के पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है।

इसके उपरांत दिल्ली स्थित लालकिला का निर्माण शाहजहाँ ने करवाया था। लाल पत्थरों से तैयार इस किले में दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, रंगमहल जैसी मनोहर इमारतें बनवाई थीं। उसकी सजावट में सोना, चाँदी और कीमती पत्थरों का अद्भुत समन्वय है। इसी किले में शाहजहाँ ने कलात्मक मयूरासन बनवाया था।

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इसी समय सिख संप्रदाय के श्रेष्ठतम स्थापत्य स्वर्णमंदिर का निर्माण अमृतसर में किया गया।

गुजरात के स्थापत्य

गुजरात में सोलंकी शासनकाल और सल्तनतयुग दौरान अत्यंत उच्चकोटि के स्थापत्य का निर्माण हुआ था। सोलंकी कालीन स्थापत्यों में 11वीं शताब्दी में भीमदेव द्वारा सोमनाथ के मंदिर का जीर्णोद्धार और मोढेरा के सूर्यमंदिर का समावेश होता है।

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गीर सोमनाथ जिले में वेरावल के पास आए हुए प्रभासपाटन में सोमनाथ मंदिर है। सोमनाथ शैवपंथ का एक अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और महत्त्वपूर्ण केन्द्र है। आज पुराने मंदिर का मात्र स्थान देखने को मिलता है। अंत में 1951 में इस नए मंदिर का निर्माण हुआ था। भारत में अत्यंत पवित्र 12 ज्योतिर्लिंगों में से सोमनाथ एक है।

जूनागढ़ शहर में उपरकोट का किला है। उपरकोट का मूल नाम गिरिदुर्ग था। रा’खेंगार ने उसमें अड़ी-कड़ी वाव और नवघण का कुँआ बनवाकर पानी की व्यवस्था की थी। एक उक्ति है कि, ‘अड़ी-कड़ी वाव और नवघण कुँआ, जिसने न देखा वह जीते मुआ।’

सोलंकीयुग में राजा भीमदेव प्रथम के शासनकाल में गुजरात के महेसाणा जिले में मोढ़ेरा का सूर्यमंदिर बना था। इस मंदिर के पूर्व दिशा का प्रवेशद्वार इस तरह बना था कि, सूर्य की प्रथम किरण मंदिर के अंदर गर्भगृह तक फैलकर सूर्यप्रतिमा के मुकुट के मध्य में लगी मणि पर पड़ने से समग्रमंदिर प्रकाश से जगमगा उठे। परिणाम स्वरूप समग्र वातावरण में दिव्यता की अनुभूति होती थी। मंदिर में अंकित सूर्य की बारह विविध मूर्तियाँ आज भी देखी जा सकती हैं। मंदिर के बाहर के जलकुंड के चारों ओर छोटे-छोटे 108 मंदिर हैं, जो उषा और संध्याकाल में जलती दीपमालाओं के कारण एक नयनरम्य दृश्य प्रकट करते हैं।

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भीमदेव प्रथम की रानी उदयमति द्वारा बनवाई गई रानी की वाव विश्वप्रसिद्ध वाव का नमूना है। शिल्प-स्थापत्य के बेजोड़ रचना समान तथा अजूबा समान सात मंजिली रानी की वाव आज भी गुजरात की प्राचीन राजधानी पाटन में है। राजा भीमदेव की रानी उदयमति ने भीमदेव की मृत्यु के बाद उसका निर्माण करवाया था। युनेस्को ने इस वाव को वर्ल्ड हेरिटेज साइट का दर्जा दिया है।

सिद्धराज जयसिंह द्वारा स्थापित सिद्धपुर का रुद्रमहालय गुजरात का विशिष्ट स्थापत्य माना जाता है। स्वयं शैवपंथी होने से सिद्धराज ने अपने इस महालय का नाम रुद्र के साथ जोड़ा था। कुछ इतिहासकारों के मतानुसार वह सात मंजिला झरोखे से जुड़ा महल होना चाहिए। जबकि इस समय एक मंजिले रुद्रमहालय का अस्तित्व है। उसमें स्तंभों और तोरणों के स्थापत्य का समावेश होता है।

सिद्धराज की माता मीनलदेवी के कहने से धोलका में मलाव तालाब और वीरमगाम में मुनसर तालाब निर्मित करवाया गया था। सिद्धराज जयसिंह के शासन दौरान पाटन में सहस्रलिंग तालाब बनवाया गया था। इसके उपरांत वड़नगर में कीर्तितोरण और शर्मिष्ठा तालाब देखने लायक है।

अहमदाबाद शहर की स्थापना अहमदशाह द्वारा 1411 ई. में की गई। सल्तनतकाल दौरान गुजरात के अहमदाबाद में राजधानी का स्थानांतरण हुआ। अहमदाबाद में विशिष्ट स्थापत्यों में अहमदाबाद का कोट, भद्रकाली का किला और जामामस्जिद मुख्य हैं। किला वैश्विक विरासत के स्थलों में शामिल है।

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चांपानेर में जामामस्जिद और चांपानेर का किला तथा अडालज की रानी रूडादेवी की वाव प्रसिद्ध स्थापत्य है। गुजरात के अन्य स्थापत्यों में हौजे-कुतुब यानी काँकरिया तालाब और नगीनावाड़ी, डभोई का किला, खंभात और धोलका की मस्जिदों की गणना प्रमुख स्थापत्यों में की जा सकती है।

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अहमदाबाद के विशिष्ट स्थापत्यों में सीदी सैयद की जाली विश्वविख्यात है। उसकी खिड़कियों में विशिष्ट प्रकार की जालियों की नक्काशी देखने को मिलती है। पत्थर को तराशकर अत्यंत बारीक नक्काशी की गई है, जिसे विश्व का उत्कृष्ट स्थापत्यकला का नमूना माना जाता है।

पादलिप्तसूरि नामक जैन मुनि ने पालीताणा के शत्रुजय पर्वत पर जैनमंदिरों का निर्माण करवाया। दुनिया में एक ही जगह पहाड़ पर सबसे अधिक मंदिर हों, ऐसे स्थलों का नाम पावापुरी और पालीताणा है। चौबीसवें तीर्थंकर यहीं विराजमान हैं। पावापुरी और समेत शिखर की तरह ही पालीताणा भी जैनों का महान तीर्थधाम है।

गुजरात में एक विशिष्ट स्थापत्य के रूप में पालिया (विशिष्ट स्मारकीय समाधि संरचना) का समावेश होता है। पालिया के साथ कोई वीरगाथा जुड़ी होती है। अधिकांशतः ऐसे योद्धाओं का पालिया युद्धस्थल अथवा उनके मृत्युस्थल पर बनाया जाता है। उनकी पुण्यतिथि अनुसार इस पालिया की वर्ष में पूजा-अर्चना की जाती है। गुजरात में पालिया के श्रेष्ठतम उदाहरणों में जामनगर के पास भूचर मोरी, सूरज कुंवरबा और सोमनाथ मंदिर के पास हमीरजी गोहिल के पालिया का समावेश होता है।

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चित्रकला :
बाबर के समय से चित्रकला का विकास देखने को मिलता है। चित्रकला पर ‘गुलशन चित्रावलि’ और ‘हम्ज़नामा’ विशिष्ट ग्रंथ थे। आकारिज़ा नामक महान चित्रकार के नेतृत्व में आगरा में एक चित्रशाला की स्थापना की गई थी। इस समय के चित्रकारों ने पशु-पक्षियों के चित्रों और पुष्पों के चित्रों को विशिष्ट रूप से चित्रित किया है। अकबर के समय से छविचित्रों की शुरुआत हुई, तो जहाँगीर के समय में विशिष्ट त्योहारों और प्रसंगों के चित्र भी बनाए जाने लगे।

मुगल चित्रकला की तरह ही राजस्थान में मेवाड़, जयपुर, मारवाड़ और कोटा की शैली सुविख्यात थी। गुजराती शैली देसी, सादी और कथाप्रसंग को विशदता से प्रस्तुत करनेवाली और लोकजीवन की धड़कन को महसूस करनेवाली सजीवकला थी।

संगीत :
सल्तनतकाल में भारतीय संगीत के साथ-साथ इस्लामिक सूफी संगीत की शुरुआत हुई। इस क्षेत्र में अमीर खुसरो ने कव्वाली की खोज की और ध्रुपद के बदले ख्यालपद्धति दाखिल की थी। देवगिरि के सारंगदेव ने ‘संगीत रत्नाकर’ और गुजरात में हरिपालदेव ने ‘संगीत सुधाकर’ नामक ग्रंथ लिखा था। अकबर के समय में तानसेन शास्त्रीय संगीत से जुड़े सबसे महान कलाकार थे।

साहित्य :
मध्ययुग में बहुत-से साहित्यकारों ने भिन्न-भिन्न विषयों में मंथन करके उल्लेखनीय ग्रंथों की रचना की है। कुछ ग्रंथों की जानकारी निम्नानुसार है :

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लोकनृत्य और हस्तकला

गुजरात अपनी लोक संस्कृति, लोकनृत्य तथा कशीदेकारी जैसी हस्तकला कारीगरी के लिए समग्र विश्व में प्रसिद्ध है। जिसमें भवाई, नाटक जैसे प्रकारों का भी समावेश होता है। भवाई लेखन और अभिनय का श्रेय असाइत ठाकर को दिया जाता है।
झालावाड़ विस्तार में पशुपालक एक विशिष्ट प्रकार की रास (आनंदमय खेल) खेलते हैं, जिसे ‘हुडो’ कहते हैं। तरणेतर के मेले में हुडो रास को देखने के लिए देश-विदेश से लोग आते हैं।

गुजरात में नवरात्रि गरबा-उत्सव महत्त्वपूर्ण है। गरबी शब्द पर से बना गरबा शक्ति की आराधना और स्तुति के साथ जुड़ा हुआ है। दयाराम के समय से ही गरबी का खूब विकास हुआ। स्त्री-पुरुष दोनों नवरात्रि में गरबा, गरबी और रास द्वारा इस उत्सव को मनाते हैं।

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गुजरात के पहनावे में भी कई तरह की विशेषताएँ देखने को मिलती हैं। जिसमें कच्छ की कशीदेकारी, मोतीकाम, पाटन का पटोला, जामनगर और जेतपुर की बाँधणी विश्वविख्यात है। कच्छ के बन्नी और खदिर विस्तार में कच्छी स्त्रियों द्वारा तैयार किए गए कशीदेकारीवाले वस्त्रों की विश्वभर में माँग रही है। इसी तरह पाटन में 11वीं-12वीं शताब्दी से विशिष्ट बुनाई के साथ जुड़े पटोले भी विश्वविख्यात हुए हैं।

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शहरीकरण

यह समय शहरों के पुनःउत्थान और विकास का था। गुप्तकाल के शहरों की जगह नवीन शहरों का उदय हुआ। राजपूत-युग की राजधानियाँ ज्यादातर शहरों में बदलती गईं। गुजरात में अणहिलवाड़ पाटन, चाँपानेर, अहमदाबाद, सूरत और खंभात का सविशेष विकास हुआ।

शहरीकरण का चरमबिन्दु हमें दिल्ली में देखने को मिलता है। राजपूतकाल से मुगलकाल तक विकसित ही होता गया। जहाँगीर और शाहजहाँ के समय दौरान दिल्ली राजधानी और व्यापार-वाणिज्य का बड़ा केन्द्र था। शाहजहाँ ने लालकिला का निर्माण करवाकर उसे विशाल बनवाया था।

इस समय के लाहौर, जौनपुर और ढाका व्यापारी-मार्ग पर स्थित थे, इसलिए उनका शहर के रूप में विकास हुआ था। सिखधर्म के कारण अमृतसर भी महत्त्वपूर्ण शहरी केन्द्र था। दक्षिण भारत में देवगिरि (दौलताबाद) उत्तर और दक्षिण को जोड़नेवाला समृद्ध शहरीकेन्द्र था। मराठा साम्राज्य में पुणे, सतारा, ग्वालियर और वडोदरा जैसे शहरों का विकास हुआ था, तो यूरोपियन कंपनियों के आगमन के कारण दीव, दमन, गोवा, मुंबई, चेन्नई, पुडुच्चेरी, कोची, चंद्रनगर और सूरत का शहरीकेन्द्र के रूप में विशिष्ट विकास हुआ था।

विजयनगर की राजधानी हम्पी थी। हम्पी में आए विदेशी यात्रियों ने हम्पी के विशिष्ट हुनर उद्योगों की जानकारी दी है। विजयनगर से सूती कपड़ा, रेशमी कपड़ा और मसाला आदि वस्तुएँ यूरोप तक जाती थीं। हम्पी से तीन प्रकार के स्वर्ण सिक्के मिले हैं, जिनसे पता चलता है कि हम्पी हस्तकला और व्यापार-वाणिज्य का बड़ा केन्द्र था।

गुजरात के भरूच और खंभात बंदरगाह के बाद विशेष करके सोलहवीं शताब्दी में सूरत भारत का महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र था। वीरजी वोरा और गोपी मलिक जैसे विश्वविख्यात सौदागर सूरत में रहते थे। सूरत में सत्रहवीं शताब्दी में मलमल, सूती कपड़ा और जहाज बनाने के उद्योग विकसित हुए थे। कढ़ाईवाले कपड़े का विश्वभर में सबसे बड़ा व्यापार सूरत से होता था। सूरत एक अंतर्राष्ट्रीय बंदरगाह होने से भारतीय और यूरोपीय व्यापारियों के अनेक व्यापारिक संस्थान यहाँ मौजूद थे। सूरत में मिर्च-मसाले, सूती और रेशमी कपड़े तथा नील के बड़े गोदाम भी थे। सूरत में चल रहे उद्योग-धंधों के कारण और विदेशी व्यापार के परिणाम स्वरूप आनुषंगिक हस्तकला-उद्योग जैसे कि गोदाम, पैकिंग, जहाज निर्माण उद्योग, निवास की व्यवस्था, बुनाई काम, छपाई काम और धातुकाम का व्यापक विकास हुआ था।