Class 7 Social Notes Chapter 14 संसाधनों की देखभाल और संरक्षण

संसाधन

पृथ्वी पर प्राप्त होनेवाले मानव उपयोगी प्राकृतिक पदार्थों को संसाधन कहते हैं। वायु, जल, जमीन, वनस्पति और खनिजों के स्वरूप में हमें प्राप्त प्राकृतिक भेट अर्थात् प्राकृतिक संसाधन। संसाधन राष्ट्रीय अर्थतंत्र की रीड की हड्डी है। वह लोगों की शक्ति और समृद्धि का आधार स्तंभ है। संसाधनों की कुछ निश्चित विशेषताएँ और उपयोगिताएँ हैं। सामान्य रूप से संसाधन मर्यादित मात्रा में उपलब्ध हैं। इन संसाधनों को अधिक उपयोगी बनाने के लिए हमें विविध तकनीकों का उपयोग करना चाहिए।

संसाधनों के प्रकार

संसाधनों का हम विविध रूप से उपयोग करते हैं। कृषि से लेकर उद्योग और परिवहन की प्रवृत्ति तक सभी प्रवृत्तियों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हम प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते हैं। भोजन के रूप में, जमीन और वनस्पति में से प्राप्त होती विविध सामग्री ईंधन और ऊर्जा के रूप में उपयोग करते हैं।

संसाधन सामान्यतः दो भागों में विभाजित किए जाते हैं : प्राकृतिक और मानवनिर्मित। भूमि, जल, खनिज और जंगलों का प्राकृतिक संसाधनों में समावेश होता है। इसमें भी दो प्रकार हैं : जैविक और अजैविक। भूमि, हवा, जल, जमीन अजैविक संसाधन हैं, जबकि जंगल और प्राणी जैविक संसाधन हैं। मानवसर्जित उद्योग, स्मारक, चित्रकला और सामाजिक संस्थाएँ आदि मानवनिर्मित संसाधन हैं। मनुष्य में रहे ज्ञान, बुद्धि, कौशल, स्वास्थ्य और अन्य गुणों का समावेश मानवसंसाधन में होता है। प्राकृतिक संसाधनों के विकास के लिए मानवसंसाधन होना आवश्यक है।

कुछ ऐसे संसाधन हैं जो निश्चित समय में स्वयंनिर्मित होते हैं। वृक्ष-पत्ते, पशु-पक्षी आदि में स्वयं उत्पन्न होने की क्षमता होती है। इस तरह वन और वन्यजीवन निश्चित समय में निर्मित होते हैं।

संसाधनों का संरक्षण

प्राकृतिक संसाधन मर्यादित हैं, जबकि मानव की आवश्यकताएँ असीमित हैं। पिछले कुछ वर्षों से तकनीकि क्षेत्र में हुए असाधारण विकास और जनसंख्या विस्फोट से संसाधनों का उपयोग खूब बढ़ गया है। इस परिस्थिति के संदर्भ में गंभीरता से नहीं विचार करेंगे तो उसके गंभीर परिणाम हमें भोगने पड़ेंगे। इसलिए भविष्य की पीढ़ियों के लिए संसाधनों का संरक्षण करना हम सबका कर्तव्य है। संसाधनों का संरक्षण अर्थात् संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग। कुछ संसाधन स्वयं निश्चित समय में अपनी पूर्ति करते हैं अथवा समाप्त नहीं होते हैं जिन्हें नवीनीकरणीय संसाधन कहते हैं। जैसे कि जंगल, सूर्यप्रकाश। एकबार उपयोग के बाद पुन: उपयोग में नहीं लिए जा सकते या बना नहीं सकते उन्हें अनवीनीकरणीय संसाधन कहते हैं। जैसे पेट्रोलियम, खनिज कोयला, प्राकृतिक गैस।

संसाधन

  • भूमि-संसाधन
  • जल-संसाधन
  • जंगल संसाधन
  • कृषि-संसाधन
  • प्राणी (वन्यजीव) संसाधन
  • खनिज संसाधन

इसके अलावा मनुष्य स्वयं भी एक संसाधन है। खनिजों को मालिकी, पुनःप्राप्यता वितरण क्षेत्र के आधार पर भी वर्गीकृत किया जाता है।

भूमि-संसाधन

जमीन निर्माण : सामान्य रूप से भू-धरातल की ऊपरी परत जिसमें वनस्पति उगती है, उसे हम जमीन कहते हैं। जमीन पृथ्वी की पपड़ी के अनेकविध कणों से बनी एक पतली परत है। चट्टानों के छोटे-बड़े टुकड़ों, कंकड़, मिट्टी के रज कण जो अजैविक हैं, उन्हें ‘रेगोलिथ’ कहते हैं। जिसमें जैविक द्रव्य हवा और पानी मिलने से ‘जमीन’ बनती है। कृषि के संदर्भ में किसी भी देश का आर्थिक विकास उस देश की जमीन की गुणवत्ता और प्रकार पर निर्भर करता है।

मिट्टी (जमीन) के प्रकार : भारतीय कृषि संशोधन परिषद (ICAR) द्वारा भारतीय जमीन को कुल आठ भागों में बाँटा गया है : (1) कांप की जमीन (2) लाल जमीन (3) काली जमीन (4) लैटेराइट जमीन (5) मरुस्थलीय जमीन (6) पर्वतीय जमीन (7) जंगलीय जमीन (8) दलदली जमीन।

मिट्टी का कटाव और संरक्षण : गतिशील पानी या हवा से मिट्टी का कटाव होता है। मिट्टी के ऊपरी कणों का तेजी से प्राकृतिक बलों द्वारा अन्यत्र स्थलांतरण होना मिट्टी का कटाव कहलाता है। ऐसा होने से कृषि की उपज में कमी होती है। जिसे रोकना चाहिए।

मिट्टी के कटाव को रोकने के उपाय : बंजर जमीन में वृक्षारोपण करना चाहिए। जहाँ ढालू जमीन है, वहाँ सीढ़ीनुमा खेत बनाकर कृषि करनी चाहिए। चेक डेम बनाने चाहिए। मिट्टी पर चरागाह प्रवृत्ति को नियंत्रण में लेना चाहिए।

भूमि-संरक्षण

भूमि संरक्षण अर्थात् मिट्टी के कटाव को रोककर, उसकी गुणवत्ता बनाए रखना। नदी की घाटियों और पहाड़ी ढलानों पर वृक्ष लगाना। रेगिस्तान के नज़दीक के क्षेत्रों में बहते पवनों को रोकने के लिए वृक्षों की श्रृंखलाएँ उगाना। अनियंत्रित चरागाह को रोकना चाहिए। उपजाऊपन खो-बैठी जमीन में पुनः सेन्द्रिय पदार्थों को मिलाना चाहिए। इसमें सबको मिलकर सामूहिक प्रयत्न करना चाहिए।

जल-संसाधन

पृथ्वी पर पीने लायक पानी की मात्रा लगभग 3 % है। पृथ्वी के एक तिहाई भाग पर जल क्षेत्र है।
जल प्रकृति से प्राप्त अनमोल भेट है। जल मानव-जीवन के प्राथमिक दैनिक जीवन की प्रवृत्तियों, उद्योगों और कृषि के लिए खूब ही उपयोगी स्रोत है। जल संसाधनों में महासागर, उपसागर, नदी, झील, भूमिगत जल आदि का समावेश होता है। पृथ्वी पर जल संसाधन का मुख्य स्रोत बरसात है। सभी जल स्रोत बरसात के आभारी हैं। पृष्ठीय जलस्रोतों में नदी, सरोवर, तालाब, झरने आदि का समावेश होता है, जिनमें मुख्य स्रोत नदी मानी जाती है।

जलसंकट

पानी प्राकृतिक उपहार है। बढ़ती जनसंख्या के लिए अनाज की बढ़ती माँग, व्यापारिक फसलें उगाने, शहरीकरण और उच्च जीवनशैली के परिणाम स्वरूप पानी की माँग निरंतर बढ़ती जाती है। पानी गंदगी की सफाई के लिए भी जरूरी है। वर्तमान समय में हमारे देश के अनेक भागों में जलसंकट बढ़ता जा रहा है। पेयजल की कमी पाई जाती है। वर्तमान समय में भूमिगतजल ट्यूबवेलों द्वारा बाहर निकालने से भूमिगत जल स्तर नीचे चला गया है। आज देश में पानी की घटती उपलब्धता और बढ़ती कमी जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

जल-संसाधनों की सुरक्षा और व्यवस्थापन

आज उपलब्ध जल मर्यादित मात्रा में है। प्रदूषित जल की विकट समस्या है। जिससे उसका विवेकपूर्ण उपयोग और उसके संरक्षण के उपाय करना अनिवार्य बन गया है। जल हमारी सामूहिक संपत्ति है। जलसंरक्षण के लिए सामान्य उपाय जैसे कि अधिक जलाशयों का निर्माण करना, भूमिगत जल को ऊपर लाने के प्रयत्न करना, नदियों के पानी को रोककर जल-संचय करने की आवश्यकता है। बरसात के पानी को रोककर संग्रह करने के उपाय भी करने चाहिए। जैसेकि बांध बनाना, शोषणकुएँ बनाना, खेत-तालाब बनाना आदि कार्य करने चाहिए। इसके अलावा लोकजागृति लाकर जल-संरक्षण में लोक भागीदारी बढ़ाना। बाग-बगीचे, शौचालयों में पानी का उपयोग मितव्ययितापूर्ण करना चाहिए। जलाशयों, नदियों को प्रदूषण से बचाना। भूमिगत जल का उपयोग करनेवाली इकाइयों पर ध्यान रखना चाहिए।

खनिज संसाधन

वर्षों पहले मनुष्य शिकार करने के लिए पत्थर से बने औजारों का उपयोग करता था। इस प्रकार मनुष्य का खनिज के साथ संबंध खूब ही प्राचीन और गहरा है। मानव-संस्कृति में मानव-विकास के युगों के नाम खनिज पर रखे गये हैं। जैसे पाषाणयुग, ताम्रयुग, कांस्ययुग, लौहयुग, वर्तमान समय को अणुयुग कहते हैं। औद्योगिक क्रांति के बाद खनिजों का महत्त्व अनेक गुना बढ़ गया है। भारत के पास पर्याप्त मात्रा में खनिज सम्पत्ति होने से विश्व के देशों के साथ कदम मिलाने के लिए आगे बढ़ रहा है।

खनिज-संरक्षण

औद्योगिक क्रांति के बाद तकनीकि और बढ़ती जनसंख्या की माँग के कारण प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग चरम सीमा तक पहुँच गया है। जिससे कुछ खनिजों के समाप्त होने का भय उत्पन्न हो गया है। खनिज सम्पत्ति का वर्तमान में खूब उपयोग होने लगा है। पेट्रोलियम जैसे खनिज पदार्थ समाप्त होने के स्तर पर आ गए हैं।
इसलिए खनिज संसाधनों का मितव्ययितापूर्ण उपयोग करना चाहिए। उनका संरक्षण एक प्रकार की बचत है। समाप्त होनेवाले खनिजों का विकल्प खोजना भी जरूरी है। जहाँ तक संभव हो खनिजों का पुन: उपयोग करने की प्रक्रिया करनी चाहिए।

वन और वन्यजीव संसाधन

मानवजीवन का अस्तित्व और प्रगति विविध संसाधनों का आभारी है। प्रकृति से हम विविध चीजें प्राप्त कर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। जिनमें जंगल अति महत्त्वपूर्ण संसाधन हैं। साथ ही वन्यजीवन भी अजीब और वैविध्यपूर्ण है। भारतीय संस्कृति में भी वनों का खूब महत्त्व दर्शाया है।

जंगलों का महत्त्व :
जंगल हमें अनेक तरह से उपयोगी है। जंगलों से प्राप्त होनेवाली साग और साल की लकड़ी इमारती लकड़ी के रूप में उपयोगी होती है। जिससे घर का फर्निचर आदि बनाया जाता है। देवदार और चीड़ की लकड़ी से खेल सामग्री बनती है। बाँस से टोकरा-टोकरी, कागज, रेयॉन आदि बना सकते हैं। जंगल से लाख, गोंद, शहद, औषधियाँ आदि हमें मिलती हैं। जंगलों में रहनेवाली प्रजा को आजीविका देते हैं।

जंगलों के आर्थिक महत्त्व के साथ पर्यावरणीय महत्त्व भी विशेष है। जंगल जलवायु को विषम बनने से रोककर नमी बनाए रखते हैं। वर्षा लाने में सहायक हैं। भूमिगत जल को टिकाए रखने में भी सहायक होते हैं तथा मिट्टी के कटाव को भी रोकते हैं। वातावरण में ऑक्सिजन और कार्बन-डायोक्साइड का संतुलन बनाए रखने में सहायक हैं।

भारत में जंगलों की मात्रा अत्यंत कम है। सबसे अधिक जंगल अंदमान-निकोबार द्वीपसमूह में तथा मिज़ोरम, मणिपुर, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश राज्यों में हैं। उत्तर-पूर्व के पर्वतीय क्षेत्रों में जंगलों की मात्रा 60 % से अधिक है। गुजरात में उसके कुल क्षेत्रफल के (स्टेट फोरेस्ट डिपार्टमेन्ट 2017-18 की रिपोर्ट के अनुसार) 11.18 % क्षेत्र में जंगल हैं। राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार कुल भू-भाग के 33 % भाग में जंगल होने चाहिए। भारत में लगभग 23 % भू-भाग पर जंगल है।

वन-संरक्षण

वर्तमान में जंगल तीव्रता से नष्ट हो रहे हैं। जंगलों की घटती संख्या विश्व की बड़ी समस्या बन गई है। वनों के घटने के अनेक कारण हैं। जैसे कि मानव की जमीन प्राप्त करने की लालसा, उद्योगों के लिए कच्चा माल प्राप्त करना, इमारती लकड़ी प्राप्त करना, शहरीकरण आदि के कारण जंगल तीव्रता से कम हो रहे हैं।

जंगलों के अंधाधुंध विनाश से पर्यावरण को कुछ गंभीर परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं : (1) प्रदूषण में वृद्धि (2) बरसात का प्रमाण घटना (3) अकाल (4) जमीन का कटाव (5) निराश्रित वन्य पशु और उनकी घटती संख्या (6) वैश्विक तापमान में वृद्धि (7) प्राकृतिक सौंदर्य का नष्ट होना आदि। भारतीय संविधान में वनों, झीलों, नदियों, वन्य प्राणियों सहित प्राकृतिक पर्यावरण का रक्षण करना और उनमें सुधार करना तथा जीवों के प्रति अनुकंपा दर्शाना नागरिक का मूलभूत कर्तव्य है। वन और वन्यजीवन को कानून द्वारा भी सुरक्षा प्रदान की गई है, इसमें सजा का भी प्रावधान किया गया है।

वन-संरक्षण के कुछ उपाय निम्नानुसार हैं :-

  • पर्यावरण-शिक्षण और पर्यावरणीय जागृति लाने से वन-संरक्षण कर सकते हैं।
  • विविध स्पर्धाओं, प्रवृत्तियों द्वारा जंगलों का महत्त्व समझाना।
  • जंगल विभाग के कार्यक्षेत्र को गुणवत्तायुक्त बनाना।
  • बंजर भूमि पर वृक्षारोपण करना।।
  • विद्यालय में इको-क्लब की रचना कर विविध प्रवृत्तियाँ करना।
  • वृक्षारोपण, वन-महोत्सव जैसे कार्यक्रमों को महत्त्व देना।

उत्सव के विविध दिन

  • 21 मार्च : विश्व वन दिवस
  • 4 अक्टूबर : वन्य प्राणी दिवस
  • 5 जून : विश्व पर्यावरण दिवस
  • 29 दिसम्बर : जैवविविधता दिवस

वन्यजीव संसाधन

भारत का वन्यजीवन वैविध्यपूर्ण है। विश्व के विविध जंतुओं और अनेक प्राणियों की प्रजातियाँ भारत में पाई जाती हैं। पक्षियों और मछलियों की प्रजाति में भी काफी वैविध्य पाया जाता है। सरीसृपों, स्तनधारियों और उभयजीवी प्राणियों में भी काफी वैविध्य पाया जाता है।

  • जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में कश्मीरी मृग, जंगली बकरी पाई जाती है।
  • उत्तराखण्ड, कर्णाटक, केरल, असम आदि राज्यों में हाथी पाया जाता है।
  • एक सिंगी गैंडा भारत का विशिष्ट प्राणी है। वह असम और पश्चिम बंगाल के दलदलीय क्षेत्रों में बसते हैं।
  • कच्छ के छोटे रेगिस्तान में और उससे लगे क्षेत्रों में घुड़खर (जंगली गधा) पाया जाता है।

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  • भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ सिंह, तेंदुआ और बाघ तीनों पाए जाते हैं। सिंह गुजरात के गीर के जंगलों में बसता है। बाघ पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्णाटक, राजस्थान, हिमालय के क्षेत्रों आदि में पाया जाता है। रोयल बंगाल टाईगर (बंगाल का बाघ) विश्व की आठ जातियों में से एक है।
  • दांता, जेसोर, विजयनगर, गुजरात के डेडियापाड़ा और रतनमहाल क्षेत्रों में भालू (रीछ) पाया जाता है।
  • भारत में बतख, तोता, काबर, कबूतर, मैना आदि जाति के पक्षी बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। गुजरात के नल सरोवर में सर्दियों में ऐसे प्रवासी पक्षी आते हैं। सुरखाब गुजरात का राज्य पक्षी है। भारत के समुद्री किनारे पर मेकरल, झिंगा, बूमला, शार्क, डोल्फिन, सालमन आदि प्रजातियों की मछलियाँ पाई जाती हैं।
  • भारत में विविध प्रकार के हिरण और साँप की अनेक प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
  • हिमालय के शीत वनों में लाल पांडा पाया जाता है।

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लुप्त होता वन्यजीवन

गुजरात के वनों में से बाघ और भारत के वनों में से तेंदुआ लुप्त हो गया है। कुछ पक्षी जिनमें गौरैया, गीध, सारस, उल्लू, घोराड़ (सोहन चिड़िया) और घड़ियाल, गंगेय डॉल्फिन जैसे प्राणी लुप्त होने के कगार पर हैं। गुजरात की नर्मदा, तापी, साबरमती आदि नदियों में पाए जानेवाले ऊदबिलाव संकट में हैं।

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वन्यजीवन संरक्षण

सदियों से वन्यजीवन संरक्षण के लिए कानून बनते रहे हैं। सम्राट अशोक द्वारा वन्यजीवन संरक्षण के लिए कानून बनवाने की जानकारी इतिहास से प्राप्त होती है। आज भी इसके लिए कानून है। अधिकांश राज्यों में ‘स्टेट वाइल्ड लाइफ’ की रचना हुई है। अन्य स्वैच्छिक संस्थाएँ भी इसके लिए कार्य कर रही हैं।

वन्यजीव संरक्षण के लिए निम्नानुसार कानूनी कदम उठाने चाहिए :

  • वन्यजीवों पर होनेवाले अत्याचार और शिकार प्रवृत्ति को रोकने के लिए कड़क अमल करना।
  • जंगल के प्राणियों की गिनती समयांतर करनी चाहिए।
  • जंगल वन्यजीवों को प्राकृतिक संरक्षण देते हैं। इसलिए जंगलों का विनाश रोकना चाहिए।
  • लोगों को वन्यजीवों का महत्त्व समझाकर वन्यजीव संरक्षण की जानकारी देनी चाहिए।
  • जंगलों में लगती आग को रोकने के शीघ्र प्रयत्न करने चाहिए।
  • वन्यजीवों को डॉक्टरी सुविधा मिले, ऐसा प्रयत्न करना चाहिए।
  • वन्यजीवों के लिए संरक्षित क्षेत्रों का विकास करना चाहिए।
  • प्रचार-प्रसार माध्यमों द्वारा जागृति लानी चाहिए।
  • वन्यजीवों के संदर्भ में वन्यजीवों की आवश्यकताएँ जैसे पानी, खुराक, प्राकृतिक आवास पर्याप्त मात्रा में मिले, ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए।

रेगिस्तान का जीवन

(1) सहारा का रेगिस्तान : सहारा का रेगिस्तान विश्व का सबसे बड़ा रेगिस्तान है। यह रेगिस्तान अधिक विशाल है।
सहारा की जलवायु गरम और शुष्क है। बरसात बहुत ही कम पड़ती है। वनस्पति रहित इस प्रदेश में दिन का तापमान 50° से तक पहुँच जाता है, तो रात्रि में 0° से नीचे तक भी हो जाता है।

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वनस्पति और प्राणीजगत

सहारा के रेगिस्तान में कंटीली वनस्पति, खजूर के वृक्ष आदि पाए जाते हैं। रेगिस्तानी प्रदेश होने से बहुत कम वनस्पति देखने को मिलती है। रेगिस्तान में खजूर के वृक्षों से घिरे रेगिस्तानी द्वीप है। लोमड़ी, लकड़बग्धा, रेगिस्तान के बिच्छू, गिरगिट, रेगिस्तानी गोह और साँप जैसे प्राणी रेगिस्तान में पाए जाते हैं।

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लोकजीवन

सहारा की विषम जलवायु में भी लोकजीवन सक्रिय पाया जाता है। जिनमें बेदुईन, तुआरेंग और बर्बर जैसी जनजाति के लोग निवास करते हैं। अधिकांक्ष लोग भेड़-बकरी और ऊँट जैसे प्राणी पालते हैं। जिनसे वे दूध, चमड़ा और ऊन जैसे उत्पाद प्राप्त करके जीवन की आवश्यक चीजवस्तुएँ जैसे कालीन, वस्त्र, गरम कंबल बनाते हैं। रेगिस्तानी क्षेत्र में आई नीलघाटी में जल उपलब्ध होने से यहाँ खजूर और गेहूँ जैसी फसलें ली जाती हैं।
सहारा के रेगिस्तानी क्षेत्र में खनिज तेल मिलता है। इसके उपरांत इन क्षेत्रों में से लोहा, फास्फोरस, मैंगेनीज और युरेनियम जैसे खनिज भी मिलते हैं। खनिजों का अधिकमात्रा में उत्पादन होने से कई क्षेत्रों के लोकजीवन में बड़े परिवर्तन होने लगे हैं। कच्चे मिट्टी के मकानों के बदले पक्के मकान और सड़क मार्ग बनने से शहरीकरण भी हो रहा है। विदेशों से भी कई लोग यहाँ के तेलक्षेत्र में रोजगार के लिए आते हैं।

(2) लद्दाख का रेगिस्तान
भारत के उत्तर में लद्दाख केन्द्रशासित प्रदेश हैं। लद्दाख भारत का ठण्डा रेगिस्तान है। जिसके उत्तर में काराकोरम पर्वत श्रेणी और दक्षिण में जास्कर पर्वत श्रेणी है। इस क्षेत्र की मुख्य नदी सिंधु है। ऊँचाई के कारण यहाँ हवा अत्यंत पतली है। और जलवायु ठण्डी और शुष्क है। यहाँ गरमी में दिन का तापमान 0° से. से ऊपर और रात्रि में –30° से. भी नीचे उतर सकता है। यहाँ बरसात की मात्रा अत्यंत ही कम रहती है।

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वनस्पति और वन्यजीवन

लद्दाख का ठण्डा रेगिस्तान शुष्क वातावरणवाला होने से वहाँ बहुत कम वनस्पति होती है। केवल छोटी घास पाई जाती है। जो पालतू प्राणियों को चराने के लिए उपयोग में ली जाती है। घाटी के प्रदेशों में देवदार और पॉप्लर (चिनार) के वृक्ष हैं। लद्दाख में पक्षियों की विभिन्न प्रजातियाँ जैसे कि देवचिड़िया, रेडस्टार्ट, चुकार, शैला, स्नो पाट्रिज, तिब्बत का स्नोकोक, रैवेन तथा हॉप पाए जाते हैं। जबकि प्राणियों में हिमतेंदुआ, लाल लोमड़ी, मर्मोट (बड़ी गिलहरी), गेरुए रंग का रीछ और हिमालयी ताहर पाए जाते हैं। दूध और माँस प्राप्त करने के लिए जंगली बकरी, भेड़ और याक जैसे प्राणी पाले जाते हैं। याक के दूध से वे पनीर बनाते हैं और भेड़-बकरी तथा याक के ऊन का उपयोग करके गरम कपड़े बनाए जाते हैं।

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लोग (लोकजीवन)

लद्दाख अपने पहाड़ी सौंदर्य और संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ अधिकांश इण्डो आर्यन, तिब्बतियन, लद्दाखी प्रजाति के लोग बसते हैं। जिनमें अधिकांश लोग बौद्ध धर्म का पालन करते हैं। लद्दाख क्षेत्र में अनेक बौद्ध मठ स्थित हैं। जिसमें हेमिस, थिक्से, रॉ आदि हैं।

गरमी की ऋतु में यहाँ जौ, आलू, मटर आदि की खेती करते हैं। महिलाएँ गृहकार्य, कृषि के साथ-साथ छोटे व्यवसाय जैसे की दुकान खोलना, गरम कपड़े बुनना आदि भी करती हैं। यहाँ तिब्बतियन संस्कृति के मोटे तौर पर फैलाव के कारण इसे ‘छोटे तिब्बत’ के रूप में भी पहचाना जाता है।

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यहाँ के लोग सादा और सरल जीवन जीते हैं। यहाँ के अधिकांश लोगों के रोजगार का मुख्य साधन पर्यटन है। देश-विदेश के लोग यहाँ घूमने आते हैं। यहाँ मठ, घास के मैदान और हिमनदियाँ देखने लायक हैं। साथ ही यहाँ के लोगों के उत्सव और धार्मिक अनुष्ठान देखने लायक हैं। इस तरह लद्दाख के लोगों का जीवन देखना एक अद्भुत अनुभव है।

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लद्दाख का मुख्य शहर लेह है। जो वायु और जमीन मार्ग से जुड़ा है। जहाँ से राष्ट्रीय राजमार्ग नं. 1A गुजरता है।
आधुनिकीकरण से यहाँ, जीवन में भी परिवर्तन आने लगा है। इसके उपरांत यहाँ लोग प्रकृति के साथ कदम मिलाकर चलते हैं। प्राकृतिक वस्तुओं का खूब मितव्ययिता से उपयोग करके अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

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(3) कच्छ का रेगिस्तान

गुजरात राज्य के उत्तर-पश्चिम में कच्छ का रेगिस्तान है। कच्छ के रेगिस्तान के पश्चिम में पाकिस्तान देश तथा उत्तर-पूर्व में राजस्थान राज्य है। इसके दो भाग हैं : छोटा और बड़ा रेगिस्तान। ऐसा प्रतीत होता है कि महाद्वीपीय शेल्फ ऊपर उठने से बना है। गुजरात के कच्छ जिला में स्थित रेगिस्तान थार के रेगिस्तान का एक भाग है। यहाँ सफेद रेगिस्तान भी है। यहाँ की जलवायु गरम और शुष्क है।

वनस्पति और प्राणीजीवन

कच्छ के रेगिस्तान में ‘बन्नी’ क्षेत्र है। यहाँ विविध प्रकार के घास और कंटीली झाड़ियाँ पाई जाती हैं। कच्छ के रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकने के लिए बबूल के वृक्ष लगाए गए हैं।

कच्छ के बड़े रेगिस्तान में सुरखाब (फ्लेमिंगो) पाया जाता है। इसके उपरांत लावरी, घोराड़, कुंज, सारस आदि अन्य पक्षी पाए जाते हैं। घोराड़ पक्षी लुप्त होने की कगार पर है। यहाँ घुड़खर (जंगली गधा), नीलगाय, सुनहरी लोमड़ी, जंगली बिल्ली, भेड़िया, बिल्ली, लकड़बग्धा, चिंकारा, कलियार (कृष्णमृग) आदि भी पाए जाते हैं।

लोक जीवन

कच्छ का लोकजीवन वैविध्यपूर्ण है। यहाँ के लोग भेड़-बकरी, ऊँट, गाय-भैंस, गधा जैसे प्राणियों का पालन करते हैं। समुद्री किनारे के लोग जलपरिवहन, मछली पकड़ने, झींगा पकड़ने के व्यवसाय से रोजगारी प्राप्त करते हैं। कई क्षेत्रों में विशिष्ट जलवायु होने से खजूर, अनार, नारियल और कच्छी केसर आम की फसल ली जाती है। यहाँ की मुख्य फसल बाजरी है।

कच्छ के कुछ लोग विशिष्ट भरतकार्य (दस्तकारी) और हस्तकला के व्यवसाय से जुड़े हैं। आधुनिक उद्योगों के विकास से रोजगारी भी बढ़ जाती है। यहाँ पर्यटन उद्योग भी खूब तेजी से विकसित हो रहा है। जिसमें से भी अनेक लोग रोजगार प्राप्त करते हैं। कच्छ की भौगोलिक समतल परिस्थिति होने से पैरा ग्लाइडिंग जैसी साहसिक प्रवृत्तियाँ विकसित हो रही हैं।