Class 12 Religion Solutions Chapter 1 सिंधु घाटी के लोगों और प्रारंभिक आर्यों का धार्मिक जीवन

ESSAY TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. हड़प्पा काल के लोगों के धार्मिक जीवन के बारे में संक्षिप्त परंतु भावपूर्ण चर्चा कीजिए।
(Discuss in brief but meaningful the religious life of the people of Harappa Age.)
अथवा
सिंधु घाटी के लोगों के धार्मिक जीवन के बारे आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the religious life of Indus Valley People ? Explain.)
अथवा
हड़प्पा काल में धार्मिक विश्वासों और रीति-रिवाजों का संक्षेप में वर्णन करो।
(Explain in brief the religious faiths and customs of Harappa Age ?)
अथवा
सिंधु घाटी के लोगों के धार्मिक जीवन और विश्वासों के संबंध में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about the life and religious faiths of the people of Indus Valley Civilization ?)
अथवा
सिंधु घाटी की सभ्यता के समय लोगों के धार्मिक विश्वास क्या थे ? चर्चा करो। देवी माता और स्वास्तिक पर संक्षेप में नोट लिखो ।
(What were the religious beliefs of the people in Indus Valley Civilization ? Discuss. Write brief notes on Mother Goddess and Swastik.)
अथवा
सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों के धार्मिक विश्वासों के बारे में जानकारी दें। सप्तऋषि’ तथा ‘पीपल’ पर संक्षेप नोट लिखो।
(Write about the religious beliefs of the people of Indus Valley Civilization. Write brief notes on ‘Saptrishi’ and ‘Peeple’.)
अथवा
सिंध घाटी के लोगों के धार्मिक विश्वासों के बारे में संक्षेप में जानकारी दीजिए। (Give brief information about religious beliefs of the Indus Valley Civilization.)
सिंधु घाटी के लोगों के धार्मिक विश्वासों के बारे में संक्षेप में जानकारी दीजिए।
(Give brief information about religious beliefs of the Indus Valley Civilization.)
अथवा
सिंधु घाटी की सभ्यता के समय लोगों के धार्मिक विश्वास क्या थे ? चर्चा करो। .
(What were the religious beliefs of the people of Indus Valley Civilization ? Discuss.)
अथवा
सिंधु घाटी सभ्यता के समय लोगों के धार्मिक विश्वासों के बारे में विस्तार सहित लिखें।
(Describe the religious beliefs of the people of Indus Valley Civilization.)
अथवा
सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों का धार्मिक जीवन कैसा था ? (What was the religious life of the people of Indus Valley Civilization ?)
उत्तर- सिंधु घाटी की खुदाई से मिली मोहरों, चित्रों और मूर्तियों आदि से सिंधु घाटी के लोगों के धार्मिक जीवन के संबंध में बहुमूल्य जानकारी प्राप्त होती है। इस जानकारी के आधार पर निस्संदेह यह कहा जा सकता है कि सिंधु घाही के लोगों का धार्मिक जीवन काफी उन्नत था। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके बहुत से धार्मिक विश्वास आज के हिंदू धर्म में प्रचलित हैं।—

  1. देवी माँ की पूजा (Worship of Mother Goddess)-सिंधु घाटी के लोग सब से अधिक देवी माँ की पूजा करते थे। इस का अनुमान सिंधु घाटी की खुदाई से मिली देवी माँ की अनेक मूर्तियों, मोहरों और तावीज़ों पर बने उनके चित्रों से लगाया जाता है। कई मूर्तियों पर धुएँ के चिन्ह हैं जिनसे यह परिणाम निकलता है कि लोग देवी माँ की धूप-बाती और तेल से पूजा करते थे। देवी माँ को शक्ति का प्रतीक माना जाता था ।।
  2. शिव की पूजा (Worship of Lord Shiva )-सिंधु घाटी के लोगों में एक देवता की पूजा काफी प्रचलित थी। उस समय की मिली कुछ मोहरों पर एक देव के चित्र अंकित हैं। इस देव को योगी की स्थिति में समाधि लगाये हुए देखा गया है। इस के तीन मुँह दर्शाये गये हैं और सिर पर एक मन को मोह लेने वाला पोश पहना हुआ है। इस योगी के इर्द-गिर्द शेर, हाथी, गैंडे, साँड और हिरण आदि के चित्र अंकित हैं। क्योंकि शिव को त्रिमुखी, पशुपति और योगेश्वर आदि के नामों से जाना जाता है इसलिए इतिहासकारों का विचार है कि यह योगी कोई और नहीं बल्कि शिव ही थे।
  3. पशुओं की पूजा (Worship of Animals)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिलने वाली मोहरों और तावीज़ों आदि से हमें इस बात का संकेत मिलता है कि वे कई तरह के पशुओं की पूजा करते थे । इन पशुओं में मुख्य बैल, हाथी, गैंडा, शेर और मगरमच्छ आदि थे । इनके अतिरिक्त सिंधु घाटी के लोग कुछ पौराणिक प्रकार के पशुओं की भी पूजा करते थे। उदाहरण के लिए हड़प्पा से हमें एक ऐसी मूर्ति मिली है जिस का कुछ भाग हाथी का है और कुछ बैल का है। इन पशुओं को देवी माँ अथवा शिव का वाहन समझा जाता था ।
  4. वृक्षों की पूजा (Worship of Trees)-सिंधु घाटी के लोग वृक्षों की भी पूजा करते थे। इन वृक्षों को वे देवी-देवताओं का निवास स्थान समझते थे। वे वृक्षों को जीवन और ज्ञान देने वाला दाता समझते थे। सिंधु घाटी की खुदाई से हमें जो मोहरें प्राप्त हुई हैं उनमें से अत्यधिक मोहरों पर पीपल के पेड़ के चित्र अंकित हैं जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि वे पीपल के पेड़ को अत्यधिक पवित्र समझते थे। इसके अतिरिक्त वे नीम, खजूर, बबूल और शीशम आदि वृक्षों की भी पूजा करते थे ।
  5. स्वस्तिक की पूजा (Worship of Swastik)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिली अनेक मोहरों पर स्वस्तिक के चिन्ह मिले हैं । इनको अच्छे शगुन वाला समझा जाता था। यह पुजारियों और व्यापारियों में आज भी लोकप्रिय है। व्यापारी कोई भी लेन-देन करते समय सबसे पहले स्वस्तिक चिन्ह को बनाते हैं।
  6. सप्तऋषियों की पूजा (Worship of Sapat-Rishis)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिली मोहरों में से एक पर सात मनुष्य एक वृक्ष के सामने खड़े दिखाये गये हैं। इससे इस बात का अनुमान लगाया जाता है कि शायद सिंधु घाटी के लोग सप्तऋषियों की पूजा करते थे। सप्तऋषियों के नाम पुराणों, हिंदुओं के अन्य धार्मिक ग्रंथों तथा बौद्ध ग्रंथों में मिलते हैं। इन सप्तऋषियों के नाम कश्यप, अतरी, विशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदागनी एवं भारदवाज हैं। उनकी स्वर्ग का प्रतीक समझ कर उपासना की जाती थी।
  7. लिंग और योनि की पूजा (Worship of Linga and Yoni)-सिंधु घाटी की खुदाई से हमें बहुत अधिक मात्रा में नुकीले और छल्लों के आकार के पत्थर मिले हैं । इन्हें देखकर यह बात निश्चित तौर पर कही जा सकती है कि सिंधु घाटी के लोग लिंग और योनि की पूजा करते थे। इनकी पूजा वे संसार की सृजन शक्ति के लिए करते थे।
  8. जल की पूजा (Worship of water)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिले बहुत सारे स्नानागारों से इस बात का अनुमान लगाया गया है कि उस समय के लोगों का जल पूजा में गहरा विश्वास था। उनका विशाल स्तानागार हमें मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुआ है। जल को वे शुद्धता और सफ़ाई का प्रतीक मानते थे ।
  9. साँपों की पूजा (Worship of Snakes)-सिंधु घाटी के लोग साँपों की भी पूजा करते थे । ऐसा अनुमान उस समय की प्राप्त कुछ मोहरों पर अंकित साँपों और फनीअर साँपों के चित्रों से लगाया जाता है। एक मोहर पर एक देवता के सिर पर फन फैलाये नाग को दर्शाया गया है। एक और मोहर पर एक मनुष्य को साँप को दूध पिलाते हुए दिखाया गया है।
  10. जादू-टोनों में विश्वास (Faith in Magic and Charms)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिलने वाले बहुत से तावीज़ों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सिंधु घाटी के लोग जादू-टोनों और भूत-प्रेत में विश्वास रखते थे ।
  11. मृतक संस्कार (The Death Ceremonies)-सिंधु घाटी के लोग आम तौर पर अपने मुर्दो को दफ़ना देते थे। कब्र में मुर्दे का सिर उत्तर की ओर तथा पैर दक्षिण की ओर किये जाते थे। कभी-कभी मुर्दे को खुले स्थान पर पशु-पक्षियों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता था । उस समय मुर्दो का संस्कार करने की प्रथा भी प्रचलित थी।
    उसकी अस्थियों को बड़े बर्तन में डाल कर दफना दिया जाता था। मृतक का अंतिम संस्कार चाहे किसी भी ढंग से किया जाता था पर उसके साथ अथवा उसके पिंजर अथवा अस्थियों के साथ कुछ बर्तनों में खाने-पीने और कुछ आवश्यक वस्तुओं को भी दबाया जाता था । इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु घाटी के लोग मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास रखते थे।
  12. कुछ अन्य धार्मिक विश्वास (Some other Religious Beliefs)-सिंधु घाटी की खुदाई से हमें अनेक अग्निकुण्ड प्राप्त हुए हैं जिस से यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु घाटी के लोग अग्नि की, घुग्घी की और सूर्य आदि की पूजा भी करते थे। सिंधु घाटी के लोगों का आत्मा एवं परमात्मा में भी दृढ़ विश्वास था।

प्रश्न 2.(क) देवी माता और स्वस्तिक के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(ख) हड़प्पा काल के लोगों के मृतक संस्कारों के बारे में जानकारी दो ।
[(a) What do you know about Mother Goddess and Swastik ?
(b) Discuss the death ceremonies of people of Harappa Age.]
उत्तर –
(क)

  1. देवी माँ की पूजा (Worship of Mother Goddess)-सिंधु घाटी के लोग सब से अधिक देवी माँ की पूजा करते थे। इस का अनुमान सिंधु घाटी की खुदाई से मिली देवी माँ की अनेक मूर्तियों, मोहरों और तावीज़ों पर बने उनके चित्रों से लगाया जाता है। कई मूर्तियों पर धुएँ के चिन्ह हैं जिनसे यह परिणाम निकलता है कि लोग देवी माँ की धूप-बाती और तेल से पूजा करते थे। देवी माँ को शक्ति का प्रतीक माना जाता था ।।
  2. स्वस्तिक की पूजा (Worship of Swastik)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिली अनेक मोहरों पर स्वस्तिक के चिन्ह मिले हैं । इनको अच्छे शगुन वाला समझा जाता था। यह पुजारियों और व्यापारियों में आज भी लोकप्रिय है। व्यापारी कोई भी लेन-देन करते समय सबसे पहले स्वस्तिक चिन्ह को बनाते हैं।

(ख)

  1. देवी माँ की पूजा (Worship of Mother Goddess)-सिंधु घाटी के लोग सब से अधिक देवी माँ की पूजा करते थे। इस का अनुमान सिंधु घाटी की खुदाई से मिली देवी माँ की अनेक मूर्तियों, मोहरों और तावीज़ों पर बने उनके चित्रों से लगाया जाता है। कई मूर्तियों पर धुएँ के चिन्ह हैं जिनसे यह परिणाम निकलता है कि लोग देवी माँ की धूप-बाती और तेल से पूजा करते थे। देवी माँ को शक्ति का प्रतीक माना जाता था ।।
  2. मृतक संस्कार (The Death Ceremonies)-सिंधु घाटी के लोग आम तौर पर अपने मुर्दो को दफ़ना देते थे। कब्र में मुर्दे का सिर उत्तर की ओर तथा पैर दक्षिण की ओर किये जाते थे। कभी-कभी मुर्दे को खुले स्थान पर पशु-पक्षियों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता था । उस समय मुर्दो का संस्कार करने की प्रथा भी प्रचलित थी।
    उसकी अस्थियों को बड़े बर्तन में डाल कर दफना दिया जाता था। मृतक का अंतिम संस्कार चाहे किसी भी ढंग से किया जाता था पर उसके साथ अथवा उसके पिंजर अथवा अस्थियों के साथ कुछ बर्तनों में खाने-पीने और कुछ आवश्यक वस्तुओं को भी दबाया जाता था । इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु घाटी के लोग मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास रखते थे।

प्रश्न 3.
(क) हड़प्पा काल के लोगों के मृतक संस्कार क्या थे ?
(ख) पीपल और स्वस्तिक पर नोट लिखें ।
[(a) What were the death ceremonies among the people of Harappa Age ?
(b) Write a note on peepal and Swastik.]
उत्तर-(क)

  1. देवी माँ की पूजा (Worship of Mother Goddess)-सिंधु घाटी के लोग सब से अधिक देवी माँ की पूजा करते थे। इस का अनुमान सिंधु घाटी की खुदाई से मिली देवी माँ की अनेक मूर्तियों, मोहरों और तावीज़ों पर बने उनके चित्रों से लगाया जाता है। कई मूर्तियों पर धुएँ के चिन्ह हैं जिनसे यह परिणाम निकलता है कि लोग देवी माँ की धूप-बाती और तेल से पूजा करते थे। देवी माँ को शक्ति का प्रतीक माना जाता था ।।
  2. मृतक संस्कार (The Death Ceremonies)-सिंधु घाटी के लोग आम तौर पर अपने मुर्दो को दफ़ना देते थे। कब्र में मुर्दे का सिर उत्तर की ओर तथा पैर दक्षिण की ओर किये जाते थे। कभी-कभी मुर्दे को खुले स्थान पर पशु-पक्षियों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता था । उस समय मुर्दो का संस्कार करने की प्रथा भी प्रचलित थी।
    उसकी अस्थियों को बड़े बर्तन में डाल कर दफना दिया जाता था। मृतक का अंतिम संस्कार चाहे किसी भी ढंग से किया जाता था पर उसके साथ अथवा उसके पिंजर अथवा अस्थियों के साथ कुछ बर्तनों में खाने-पीने और कुछ आवश्यक वस्तुओं को भी दबाया जाता था । इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु घाटी के लोग मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास रखते थे।

(ख)

  1. देवी माँ की पूजा (Worship of Mother Goddess)-सिंधु घाटी के लोग सब से अधिक देवी माँ की पूजा करते थे। इस का अनुमान सिंधु घाटी की खुदाई से मिली देवी माँ की अनेक मूर्तियों, मोहरों और तावीज़ों पर बने उनके चित्रों से लगाया जाता है। कई मूर्तियों पर धुएँ के चिन्ह हैं जिनसे यह परिणाम निकलता है कि लोग देवी माँ की धूप-बाती और तेल से पूजा करते थे। देवी माँ को शक्ति का प्रतीक माना जाता था ।।
  2. वृक्षों की पूजा (Worship of Trees)-सिंधु घाटी के लोग वृक्षों की भी पूजा करते थे। इन वृक्षों को वे देवी-देवताओं का निवास स्थान समझते थे। वे वृक्षों को जीवन और ज्ञान देने वाला दाता समझते थे। सिंधु घाटी की खुदाई से हमें जो मोहरें प्राप्त हुई हैं उनमें से अत्यधिक मोहरों पर पीपल के पेड़ के चित्र अंकित हैं जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि वे पीपल के पेड़ को अत्यधिक पवित्र समझते थे। इसके अतिरिक्त वे नीम, खजूर, बबूल और शीशम आदि वृक्षों की भी पूजा करते थे ।
  3. स्वस्तिक की पूजा (Worship of Swastik)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिली अनेक मोहरों पर स्वस्तिक के चिन्ह मिले हैं । इनको अच्छे शगुन वाला समझा जाता था। यह पुजारियों और व्यापारियों में आज भी लोकप्रिय है। व्यापारी कोई भी लेन-देन करते समय सबसे पहले स्वस्तिक चिन्ह को बनाते हैं।

प्रश्न 4. हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ने में मृतक को जलाया या दफनाया जाता था ? बतलाएँ।
(Was the dead buried or burnt in Harappa and Mohenjodaro ? Explain.)
उत्तर-मृतक संस्कार (The Death Ceremonies)-सिंधु घाटी के लोग आम तौर पर अपने मुर्दो को दफ़ना देते थे। कब्र में मुर्दे का सिर उत्तर की ओर तथा पैर दक्षिण की ओर किये जाते थे। कभी-कभी मुर्दे को खुले स्थान पर पशु-पक्षियों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता था । उस समय मुर्दो का संस्कार करने की प्रथा भी प्रचलित थी।
उसकी अस्थियों को बड़े बर्तन में डाल कर दफना दिया जाता था। मृतक का अंतिम संस्कार चाहे किसी भी ढंग से किया जाता था पर उसके साथ अथवा उसके पिंजर अथवा अस्थियों के साथ कुछ बर्तनों में खाने-पीने और कुछ आवश्यक वस्तुओं को भी दबाया जाता था । इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु घाटी के लोग मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास रखते थे।

प्रश्न 5. प्राचीन आर्यों के धार्मिक विश्वासों के बारे में आप क्या जानते हैं ? आर्य लोगों के मृतक संस्कारों के संबंध में जानकारी दो।
(What do you know about the religious beliefs of the Early Aryans ? Also state the method of disposal of the dead Aryans.)
अथवा
आर्य लोगों के धार्मिक संस्कारों के बारे में जानकारी दें।
(Describe the religious ceremonies of Aryan people.)
अथवा आरंभिक आर्यों के धार्मिक जीवन के बारे में बताएँ।
(Explain the religious life of Early Aryans.)
अथवा
पूर्व आर्यों के धार्मिक जीवन का वर्णन करें।
(Describe the religious life of pre-Aryans.)
उत्तर-आरंभिक आर्यों का धार्मिक जीवन कैसा था इसके संबंध में हमें ऋग्वेद से विस्तारपूर्वक जानकारी प्राप्त होती है । निस्संदेह वे बड़ा सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करते थे। उनके धार्मिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:—
1. प्रकृति और प्राकृतिक शक्तियों के पुजारी (Worshippers of Nature and Natural Phenomena)- आरंभिक आर्यों का धार्मिक जीवन बिल्कुल सादा था। वे प्रकृति और प्राकृतिक शक्तियों की पूजा करते थे। वे उन सारी वस्तुओं जो सुंदर विचित्र और भयानक दिखाई देती थीं, को प्राकृतिक शक्तियाँ स्वीकार करते थे। उन्होंने इन प्राकृतिक शक्तियों को अलग-अलग देवी-देवताओं का नाम रखकर उनकी पूजा आरंभ कर दी थी। वे चमकते हुए सूर्य की पूजा करते थे क्योंकि वह पृथ्वी को सजीव रखता था। वे वायु की पूजा करते थे जो संसार भर के मनुष्यों को जीवन देती थी। वे प्रभात की पूजा करते थे जो मनुष्यों को उनकी मीठी नींद से जगाकर उनको उनके कार्यों पर भेजता था। वे नीले आकाश की पूजा करते थे जिसने सारे संसार को घेरा हुआ था।
2. वैदिक देवते (VedicGods) आरंभिक आर्यों के देवताओं की कुल संख्या 33 थी। इन को तीन भागों में बाँटा गया था । ये देवता आकाश, पृथ्वी और आकाश तथा पृथ्वी के मध्य रहते थे । प्रमुख देवी-देवताओं का संक्षेप वर्णन अग्रलिखित है :—

  • वरुण (Varuna)-वरुण आरंभिक आर्यों का सब से बड़ा देवता था । वह सिंहासन पर बैठता था। उसको सत्य और धर्म का स्वामी माना जाता था। उसको आकाश, पृथ्वी, और सूर्य का निर्माता कहा जाता था। वह पापी लोगों को सज़ा देता था। वह जीवन दान दे सकता था और मृत्यु को रद्द कर सकता था। इसलिए पापी लोग उससे क्षमा की याचना करते थे।
  • इंद्र (Indra) -इंद्र आरंभिक आर्यों का दूसरा महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली देवता था। ऋग्वेद में सबसे अधिक (250) मंत्र इस देवता की प्रशंसा में दिये गये हैं। उसको वर्षा और युद्ध का देवता समझा जाता था। आर्य उसकी समय पर वर्षा के लिए और युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करते थे । वह दुश्मनों के दुर्गों को पलक झपकते ही नष्ट कर सकता था ।
  • अग्नि (Agni)-अग्नि आरंभिक आर्यों का एक और प्रमुख देवता था। उसका संबंध विवाह और दाह संस्कारों के साथ था। उसके बिना कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता था। ऋग्वेद में अग्नि देवता की प्रशंसा में 200 मंत्र दिये गये हैं।
  • सूर्य (Sun)-सूर्य भी आरंभिक आर्यों का एक महत्त्वपूर्ण देवता था । वह संसार में से अंधेरे को दूर भगाता था। वह हर रोज़ सात घोड़ों वाले रथ पर सवार होकर आकाश का चक्र काटता था ।
  • रुद्र (Rudra)-रुद्र को आँधी या तूफ़ान का देवता समझा जाता था। वह बहुत ही प्रचंड और विनाशकारी था। लोग उससे बहुत डरते थे और उसको प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते थे।
  • सोम (Soma)-सोम देवता की आरंभिक आर्यों के धार्मिक जीवन में बहुत महत्ता थी। सोम रस को एक ऐसा अमृत समझा जाता था जिसको पीकर देवता अमर हो जाते थे। इस का हवन में प्रयोग किया जाता था और यह देवताओं को भेंट किया जाता था।
  • देवियाँ (Goddesses)-आरंभिक आर्य देवताओं के अतिरिक्त कुछ देवियों की भी पूजा करते थे । परंत देवताओं के मुकाबले इनका महत्त्व कम था । उनके द्वारा पूजी जाने वाली प्रमुख देवियाँ प्रभात की देवी उषा, रात की देवी रात्री, धरती की देवी पृथ्वी, वन देवी आरण्यी, नदी देवी सरस्वती थीं।

3. एक ईश्वर में विश्वास ( Faith in one God) यद्यपि आरंभिक आर्य अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते थे परंतु फिर भी उनका ईश्वर की एकता में दृढ़-विश्वास था। वे सारे देवताओं को महान् समझते थे और किसी को भी छोटा या बड़ा नहीं समझते थे । ऋषि अलग-अलग अवसरों पर अलग-अलग देवी-देवताओं को प्रधान बना देते थे । ऋग्वेद के एक मंत्र में कहा गया है, सब एक ही हैं, केवल ऋषियों ने ही उनका विभिन्न रूपों में वर्णन किया है।” एक और मंत्र में लिखा है, “वह जिसने हमें जीवन बख्शा है, वह जिसने सृष्टि की रचना की है, अनेक देवताओं के नाम के साथ प्रसिद्ध होते हुए भी वह एक है।” स्पष्ट है कि आर्य एक ईश्वर के सिद्धांत को अच्छी तरह जानते
थे।
4. मंदिरों और मूर्ति पूजा का अभाव (Absence of Temples and Idol Worship)-आरंभिक आर्यों ने अपने देवी-देवताओं की याद में न किसी मंदिर का निर्माण किया था और न ही उनकी मूर्तियाँ बनाई गई थीं। मंदिर के निर्माण संबंधी या मूर्तियों के निर्माण संबंधी ऋग्वेद में कहीं भी कोई वर्णन नहीं मिलता। आर्य लोग अपने घरों में खुले वातावरण में चौकड़ी लगा कर बैठ जाते थे और एक मन हो कर अपने देवी-देवताओं की याद में मंत्रों का उच्चारण करते थे और स्तुति करते थे ।
5. यज्ञ और बलियाँ (Yajnas and Sacrifices)-आरंभिक आर्य लोग अपने देवी-देवताओं को खुश करने के लिए कई तरह के यज्ञ करते थे । इन यज्ञों को बड़े ध्यान से किया जाता था, क्योंकि उनको यह डर होता था कि थोड़ीसी गलती से उनके देवता नाराज़ न हो जाएँ। सबसे पहले यज्ञ के लिए वेदी बनाई जाती थी। फिर इसमें पवित्र अग्नि जलाई जाती थी इसमें घी, दूध, चावल और सोमरस डाला जाता था। इन यज्ञों के दौरान कई जानवरों की जैसे भेड़ों, बकरियों और घोड़ों आदि की बलि दी जाती थी। उस समय मनुष्य की बलि देने की प्रथा बिल्कुल नहीं थी। ये यज्ञ कई प्रकार के होते थे । सबसे छोटा यज्ञ पारिवारिक स्तर पर होता था। बड़े-बड़े यज्ञों की तैयारी बहुत पहले ही शुरू हो जाती थी। ऐसे यज्ञ राजाओं और समाज के और अमीर वर्ग द्वारा करवाये जाते थे। इन यज्ञों में बहुत ज्यादा मात्रा में पुरोहित शामिल होते थे। इनको दक्षिणा के तौर पर सोना, पशु या अनाज दिया जाता था। इन यज्ञों और बलियों का प्रमुख उद्देश्य देवताओं को खुश करना था। इनके बदले वे समझते थे कि उनको युद्ध में सफलता प्राप्त होगी, धन प्राप्त होगा, संतान में वृद्धि होगी और लम्बा जीवन मिलेगा। आरंभिक आर्य यह समझते थे कि हर यज्ञ से संसार की नये सिरे से उत्पत्ति होती है और यदि यह यज्ञ न करवाए जायें तो संसार में फिर से अंधकार छा जाएगा । इन यज्ञों के करवाने से गणित, भौतिक ज्ञान और जानवरों की शारीरिक बनावट के ज्ञान में वृद्धि हुई ।
6. पितरों की पूजा (Worship of Forefathers)-आरंभिक आर्य अपने देवी-देवताओं की पूजा के अतिरिक्त अपने पितरों की भी पूजा करते थे । पितर आर्यों के आरंभिक बुर्जुग थे। वे स्वर्गों में निवास करते थे । ऋग्वेद में बहुत से मंत्र पितरों की प्रशंसा में लिखे गये हैं । उनकी पूजा भी अन्य देवी-देवताओं की तरह की जाती थी। पितरों की पूजा इस आशा के साथ की जाती थी कि वे अपने वंश की रक्षा करेंगे, उनका मार्गदर्शन करेंगे, उनके कष्ट दूर करेंगे, उनको धन और शक्ति प्रदान करेंगे तथा अपने बच्चों की दीर्घायु और संतान का वर देंगे।
7. मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास (Belief in Life after Death)-आरंभिक आर्य मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास रखते थे । आवागमन और पुनर्जन्म का सिद्धांत अभी प्रचलित नहीं हुआ था। वैदिक काल के लोगों का विश्वास था कि मृत्यु के समय आत्मा शरीर से अलग हो जाती है। वे आत्मा को अमर समझते थे। स्वर्ग का जीवन खुशियों से भरपूर होता था । यह देवताओं का निवास स्थान था। वे लोग स्वर्ग के अधिकारी समझे जाते थे जो रणभूमि में अपना बलिदान देते थे अथवा भारी तपस्या करते थे अथवा यज्ञ के समय खुले दिल से दान देते थे। ऋग्वेद में नरक का वर्णन कहीं नहीं किया गया है ।
8. मृतक का अंतिम संस्कार (Disposal of Dead)-आरंभिक आर्यों के काल में मृतकों का दाह संस्कार किया जाता था । मृतक को चिता तक ले जाने के लिए उसकी पत्नी और अन्य संबंधी साथ जाते थे। उसके बाद मृतक को चिता पर रख दिया जाता था। यदि मृतक ब्राह्मण होता तो उसके दायें हाथ में एक लाठी पकड़ाई जाती थी, यदि वह क्षत्रिय होता तो उसके हाथ में धनुष और यदि वह वैश्य होता तो उसके हाथ में हल चलाने वाली लकड़ी पकड़ाई जाती थी । उसकी पत्नी तब तक चिता के पास बैठी रहती थी जब तक उसको यह नहीं कहा जाता था ‘अरी महिला उठो और जीवित लोगों में आओ।’ इसके बाद हवन कुंड से लाई गई अग्नि के साथ चिता को आग लगाई जाती थी और वह मंत्र पढ़ा जाता था, “बजुर्गों के मार्ग पर जाओ।” लाश के पूर्ण भस्म हो जाने को बाद अस्थियों को इकट्ठा कर लिया जाता था और उनको एक क्लश में रखकर जमीन में गाढ़ दिया जाता था।
9. रित और धर्मन (Rita and Dharman)-ऋग्वेद और दूसरे वैदिक ग्रंथों में रित और धर्मन शब्दों का बहुत वर्णन मिलता है । रित से भाव उस व्यवस्था से है जिसके अनुसार संसार का प्रबंध चलता है। रित के नियमानुसार ही सुबह पौ फटती है, सूर्य, चाँद और तारे चमकीले नज़र आते हैं। धरती सूर्य के इर्द-गिर्द चक्र लगाती है । सागर में ज्वारभाटे आते हैं। इस तरह रित एक सच्चाई है, इस का विपरीत अनऋत (झूठ) है। ‘धर्मन’ शब्द से भाव कानून है। धर्मन देवताओं द्वारा बनाये जाते हैं । यह भौतिक संसार, मनुष्यों और बलियों पर लागू होता है। वास्तव में धर्मन जीवन और रस्मों रीतों का नियम है। अच्छे मनुष्य अपना जीवन धर्मन अनुसार व्यतीत करते थे।

प्रश्न 6. वरुण तथा अग्नि देवताओं पर एक नोट लिखें । वैदिक बलि की रीति के बारे जानकारी
(Write a brief note on Varuna and Agni. Write about the ritual of Vedic sacrifice.)
उत्तर-(क)

  1. वरुण (Varuna)- वरुण आरंभिक आर्यों का सब से बड़ा देवता था। वह ऊँचे सिंहासन पर बैठता था। उसको सत्य और धर्म का स्वामी माना जाता था। उसको आकाश, पृथ्वी और सूर्य का निर्माता कहा जाता था। उसके आदेशानुसार चाँद चमकता था और तारे टिमटिमाते थे। वह सर्वज्ञापक और सर्व-व्यापक था। वह संसार में घटने वाली हर घटना को जानता था। उसकी सैंकड़ों आँखें थीं। कोई भी पापी उसकी पैनी नज़र से बच नहीं सकता था। वह पापियों को दंड देता था। वह जीवन दान दे सकता था और मृत्यु को रद्द कर सकता था। इसलिए पापी क्षमा के लिए उससे प्रार्थना करते थे।
  2. अग्नि (Agni)- अग्नि आरंभिक आर्यों का एक और प्रमुख देवता था। उसको दो कारणों से अति महत्त्वपूर्ण समझा जाता था। पहला, उसको सब घरों का स्वामी समझा जाता था। उसका संबंध विवाह और दाहसंस्कारों के साथ था। दूसरा, उसके बिना कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता था। वह अपने भक्तों द्वारा दी गई आहुति को देवताओं तक पहुँचाता था। अग्नि देवता की सात जीभे और 1000 आँखें समझी जाती थीं। यदि वह कभी गुस्से में आ जाता तो पल भर में सबको नष्ट कर सकता था। सूखे काष्ठ, घी और मक्खन को इसका मनपसंद भोजन समझा जाता था। ऋग्वेद में अग्नि देवता की प्रशंसा में 200 मंत्र दिये गये हैं।

(ख) यज्ञ और बलियाँ (Yajnas and Sacrifices)-आरंभिक आर्य लोग अपने देवी-देवताओं को खुश करने के लिए कई तरह के यज्ञ करते थे । इन यज्ञों को बड़े ध्यान से किया जाता था, क्योंकि उनको यह डर होता था कि थोड़ीसी गलती से उनके देवता नाराज़ न हो जाएँ। सबसे पहले यज्ञ के लिए वेदी बनाई जाती थी। फिर इसमें पवित्र अग्नि जलाई जाती थी इसमें घी, दूध, चावल और सोमरस डाला जाता था। इन यज्ञों के दौरान कई जानवरों की जैसे भेड़ों, बकरियों और घोड़ों आदि की बलि दी जाती थी। उस समय मनुष्य की बलि देने की प्रथा बिल्कुल नहीं थी। ये यज्ञ कई प्रकार के होते थे । सबसे छोटा यज्ञ पारिवारिक स्तर पर होता था। बड़े-बड़े यज्ञों की तैयारी बहुत पहले ही शुरू हो जाती थी। ऐसे यज्ञ राजाओं और समाज के और अमीर वर्ग द्वारा करवाये जाते थे। इन यज्ञों में बहुत ज्यादा मात्रा में पुरोहित शामिल होते थे। इनको दक्षिणा के तौर पर सोना, पशु या अनाज दिया जाता था। इन यज्ञों और बलियों का प्रमुख उद्देश्य देवताओं को खुश करना था। इनके बदले वे समझते थे कि उनको युद्ध में सफलता प्राप्त होगी, धन प्राप्त होगा, संतान में वृद्धि होगी और लम्बा जीवन मिलेगा। आरंभिक आर्य यह समझते थे कि हर यज्ञ से संसार की नये सिरे से उत्पत्ति होती है और यदि यह यज्ञ न करवाए जायें तो संसार में फिर से अंधकार छा जाएगा । इन यज्ञों के करवाने से गणित, भौतिक ज्ञान और जानवरों की शारीरिक बनावट के ज्ञान में वृद्धि हुई ।

प्रश्न 7. वैदिक देवताओं से क्या भाव है ? इनसे किस प्रकार के वरदान की आशा की जाती थी ?
(What is meant by Vedic gods ? What is expected from them ?)
अथवा
वैदिक देवता कौन थे ? कुछ देवी-देवताओं के नाम लिखो।ये देवता ऐतिहासिक व्यक्ति थे या पौराणिक, स्पष्ट करो।
(Who were Vedic gods ? Write down the names of some gods and goddesses. Whether these gods were historical persons or mythological ? State clearly.)
अथवा
वैदिक देवी-देवताओं के बारे में आप क्या जानते हैं ? वर्णन करो ।
(What do you know about the Vedic gods and goddesses ? Explain.)
अथवा
वैदिक काल में ईश्वर के बारे में बताएँ ।
(Explain about monotheism in Vedic Period.)
अथवा
वैदिक देवी-देवताओं पर एक विस्तृत नोट लिखें ।
(Write a detailed note on Vedic gods and goddesses.)
अथवा
किन्हीं दो वैदिक देवताओं पर संक्षिप्त नोट लिखें।
(Write brief note on any two Vedic gods.)
उत्तर-आरंभिक आर्य बहुत सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करते थे। वे प्रकृति और.उसकी शक्तियों को देवता मान कर उनकी पूजा करते थे। उनके देवताओं की कुल संख्या 33 थी। देवियों की संख्या कम थी और देवताओं के मुकाबले उनका महत्त्व भी कम था। आरंभिक आर्य यद्यपि अपने देवी-देवताओं की पूजा करते थे परंतु वे उनको एक परमेश्वर का रूप समझते थे। वे अपने देवी-देवताओं को खुश करने के लिए और उनसे ज़रूरी वरदान प्राप्त करने के लिए स्तुतियाँ और यज्ञ करते थे और बलियाँ भी देते थे। उस समय मूर्ति पूजा या मंदिर बनवाने की प्रथा प्रचलित नहीं थी।
1. वैदिक देवता (Vedic Gods)—वैदिक देवताओं की नींव कहाँ से रखी गई, उनका स्वभाव क्या था, मनुष्यों के साथ उनके क्या संबंध थे और उनकी संख्या कितनी थी ? इन सारे प्रश्नों के उत्तर हमें ऋग्वेद से प्राप्त होते हैं। ऋग्वेद के मंत्रों (ऋचों) में यह कहा गया है कि देवता संसार की सृजना के बाद पैदा हुए, उनको आम तौर पर आकाश और पृथ्वी की संतान माना जाता था। वे बड़े शक्तिशाली और महान् थे। वे लंबा जीवन व्यतीत करते थे। उन्होंने तपस्या के साथ अथवा सोमरस पी कर अविनाशता प्राप्त कर ली थी। वे अलग-अलग रूप धारण कर सकते थे। ज्यादातर वे मनुष्ययी रूप धारण करते थे। वे अपने दैवीय वाहनों पर चढ़ कर आते थे और घास के आसन पर बैठते थे। वे दुनिया की घटनाओं में अपना हिस्सा डालते थे। वे अपने श्रद्धालुओं की प्रार्थनायें भी सुनते थे और अपने वरदान देते थे। उनकी कुल संख्या 33 थी और उनको तीन भागों में बाँटा गया था। यह बंटन उनके निवास स्थान के आधार पर था जहाँ वे रहते थे। प्रत्येक श्रेणी में 11 देवते शामिल थे। वरुण, सूर्य, विष्णु और उषा आदि आकाश के देवता थे। इंद्र, वायु, रुद्र और मरुत आदि पृथ्वी और आकाश के इर्द-गिर्द रहने वाले देवता थे। अग्नि, पृथ्वी, बृहस्पति, सागर और नदियाँ आदि पृथ्वी के देवता थे। देवियों के मुकाबले देवताओं की संख्या अधिक थी तथा उनको बहुत अधिक महत्त्व प्राप्त था। प्रमुख देवी-देवताओं का संक्षेप वर्णन निम्नलिखित अनुसार है:

  • वरुण (Varuna)- वरुण आरंभिक आर्यों का सब से बड़ा देवता था। वह ऊँचे सिंहासन पर बैठता था। उसको सत्य और धर्म का स्वामी माना जाता था। उसको आकाश, पृथ्वी और सूर्य का निर्माता कहा जाता था। उसके आदेशानुसार चाँद चमकता था और तारे टिमटिमाते थे। वह सर्वज्ञापक और सर्व-व्यापक था। वह संसार में घटने वाली हर घटना को जानता था। उसकी सैंकड़ों आँखें थीं। कोई भी पापी उसकी पैनी नज़र से बच नहीं सकता था। वह पापियों को दंड देता था। वह जीवन दान दे सकता था और मृत्यु को रद्द कर सकता था। इसलिए पापी क्षमा के लिए उससे प्रार्थना करते थे।
  • इंद्र (Indra)- इंद्र आरंभिक आर्यों का दूसरा महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली देवता था। ऋग्वेद में सबसे अधिक (250) मंत्र इस देवता की प्रशंसा में दिये गये हैं। उसका तेज इतना था कि सैंकड़ों सूर्यों का प्रकाश भी उसके आगे मद्धम पड़ जाता था। उसको वर्षा और युद्ध का देवता समझा जाता था। आर्य उसकी समय पर वर्षा के लिए और युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए याचना करते थे। वह इतना बहादुर था कि उसने राक्षसों पर भी विजय प्राप्त की थी। वह दुश्मनों के दुर्गों को पलक झपकते ही नष्ट कर सकता था। वह अंधकार को दूर कर सकता था। वह कई रूप धारण कर सकता था। वह इतना शक्तिशाली था कि सब देवता उस से डरते थे।
  • अग्नि (Agni)- अग्नि आरंभिक आर्यों का एक और प्रमुख देवता था। उसको दो कारणों से अति महत्त्वपूर्ण समझा जाता था। पहला, उसको सब घरों का स्वामी समझा जाता था। उसका संबंध विवाह और दाहसंस्कारों के साथ था। दूसरा, उसके बिना कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता था। वह अपने भक्तों द्वारा दी गई आहुति को देवताओं तक पहुँचाता था। अग्नि देवता की सात जीभे और 1000 आँखें समझी जाती थीं। यदि वह कभी गुस्से में आ जाता तो पल भर में सबको नष्ट कर सकता था। सूखे काष्ठ, घी और मक्खन को इसका मनपसंद भोजन समझा जाता था। ऋग्वेद में अग्नि देवता की प्रशंसा में 200 मंत्र दिये गये हैं।
  • सूर्य (Sun) सूर्य भी आरंभिक आर्यों का एक महत्त्वपूर्ण देवता था। वह संसार में से अंधेरे को दूर भगाता था। उसको आदिति और दिऊस का पुत्र समझा जाता था। वह हर-रोज़ सात घोड़ों के रथ पर सवार होकर आकाश का चक्र काटता था।
  • रुद्र (Rudra)-रुद्र को आँधी या तूफान का देवता समझा जाता था। वह बड़ा प्रचंड और विनाशकारी था। लोग उससे बहुत डरते थे और उसे खुश रखने का प्रयत्न करते थे। उसकी शक्ल राक्षसों जैसी थी और वह पहाड़ों में निवास करता था। उसका पेट काला और पीठ लाल थी।
  • सोम (Soma)-सोम देवता की आरंभिक आर्यों के धार्मिक जीवन में बड़ी महत्ता थी। ऋग्वेद का सारा नवम् मंडल सोम देवता की प्रशंसा में रचा गया है। सोमरस को एक ऐसा अमृत समझा जाता था जिसको पी कर देवता अमर हो जाते थे। इस का हवन में प्रयोग किया जाता था। यह देवताओं को भेंट किया जाता था। सोमरस एक बूटी से प्राप्त किया जाता था जो कि पहाड़ों में मिलती थी।
  • उषा (Usha)-आरंभिक आर्य देवताओं के अतिरिक्त कुछ देवियों की पूजा भी करते थे। परंतु देवताओं के मुकाबले इनका महत्त्व कम था। उनके द्वारा पूजी जाने वाली देवियाँ जैसे रात की देवी रात्री, धरती की देवी पृथ्वी, वन देवी आरण्यी, नदी देवी सरस्वती में से उषा को प्रमुख स्थान प्राप्त था। इस को प्रभात की देवी समझा जाता था। इस का रूप बहुत सुंदर और मन को मोह लेने वाला था। इसको सूर्य की पत्नी समझा जाता था।

2. वैदिक देवते ऐतिहासिक व्यक्ति थे अथवा पौराणिक (Vedic Gods were historical persons or mythological)-आरंभिक आर्य अपने देवी-देवताओं को ऐतिहासिक व्यक्ति समझते थे। इसका कारण यह था कि वे मनुष्यों के समान थे। वे अपने दैवीय वाहनों पर चढ़ कर आते थे और घास के सिंहासन पर बैठते थे। वे अपने श्रद्धालुओं की प्रार्थनायें सुनते थे और उनको वरदान देते थे। वे अपने पुजारियों पर कृपा करते थे। इन देवी-देवताओं को आदिती देवी और दिऊस के पुत्र-पुत्रियाँ समझा जाता था। आरंभ में इन सब को नाशवान् जीव समझा जाता था। अविनाशता उनको बाद में दी गई थी।

प्रश्न 8.
(क) वैदिक काल में बलि की रीति पर प्रकाश डालें।
(ख) वरुण तथा अग्नि देवताओं पर संक्षेप नोट लिखें।
[(a) Throw light on the Vedic ritual sacrifice.
(b) Write brief notes on Varuna and Agni gods.]
उत्तर-(क) बलि की रीति (Sacrifice Ritual)—यज्ञ और बलियाँ (Yajnas and Sacrifices)-आरंभिक आर्य लोग अपने देवी-देवताओं को खुश करने के लिए कई तरह के यज्ञ करते थे । इन यज्ञों को बड़े ध्यान से किया जाता था, क्योंकि उनको यह डर होता था कि थोड़ीसी गलती से उनके देवता नाराज़ न हो जाएँ। सबसे पहले यज्ञ के लिए वेदी बनाई जाती थी। फिर इसमें पवित्र अग्नि जलाई जाती थी इसमें घी, दूध, चावल और सोमरस डाला जाता था। इन यज्ञों के दौरान कई जानवरों की जैसे भेड़ों, बकरियों और घोड़ों आदि की बलि दी जाती थी। उस समय मनुष्य की बलि देने की प्रथा बिल्कुल नहीं थी। ये यज्ञ कई प्रकार के होते थे । सबसे छोटा यज्ञ पारिवारिक स्तर पर होता था। बड़े-बड़े यज्ञों की तैयारी बहुत पहले ही शुरू हो जाती थी। ऐसे यज्ञ राजाओं और समाज के और अमीर वर्ग द्वारा करवाये जाते थे। इन यज्ञों में बहुत ज्यादा मात्रा में पुरोहित शामिल होते थे। इनको दक्षिणा के तौर पर सोना, पशु या अनाज दिया जाता था। इन यज्ञों और बलियों का प्रमुख उद्देश्य देवताओं को खुश करना था। इनके बदले वे समझते थे कि उनको युद्ध में सफलता प्राप्त होगी, धन प्राप्त होगा, संतान में वृद्धि होगी और लम्बा जीवन मिलेगा। आरंभिक आर्य यह समझते थे कि हर यज्ञ से संसार की नये सिरे से उत्पत्ति होती है और यदि यह यज्ञ न करवाए जायें तो संसार में फिर से अंधकार छा जाएगा । इन यज्ञों के करवाने से गणित, भौतिक ज्ञान और जानवरों की शारीरिक बनावट के ज्ञान में वृद्धि हुई ।

(ख) वरुण तथा अग्नि देवता (Varuna and Agni gods)—

  1. वरुण (Varuna)- वरुण आरंभिक आर्यों का सब से बड़ा देवता था। वह ऊँचे सिंहासन पर बैठता था। उसको सत्य और धर्म का स्वामी माना जाता था। उसको आकाश, पृथ्वी और सूर्य का निर्माता कहा जाता था। उसके आदेशानुसार चाँद चमकता था और तारे टिमटिमाते थे। वह सर्वज्ञापक और सर्व-व्यापक था। वह संसार में घटने वाली हर घटना को जानता था। उसकी सैंकड़ों आँखें थीं। कोई भी पापी उसकी पैनी नज़र से बच नहीं सकता था। वह पापियों को दंड देता था। वह जीवन दान दे सकता था और मृत्यु को रद्द कर सकता था। इसलिए पापी क्षमा के लिए उससे प्रार्थना करते थे।
  2. अग्नि (Agni)- अग्नि आरंभिक आर्यों का एक और प्रमुख देवता था। उसको दो कारणों से अति महत्त्वपूर्ण समझा जाता था। पहला, उसको सब घरों का स्वामी समझा जाता था। उसका संबंध विवाह और दाहसंस्कारों के साथ था। दूसरा, उसके बिना कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता था। वह अपने भक्तों द्वारा दी गई आहुति को देवताओं तक पहुँचाता था। अग्नि देवता की सात जीभे और 1000 आँखें समझी जाती थीं। यदि वह कभी गुस्से में आ जाता तो पल भर में सबको नष्ट कर सकता था। सूखे काष्ठ, घी और मक्खन को इसका मनपसंद भोजन समझा जाता था। ऋग्वेद में अग्नि देवता की प्रशंसा में 200 मंत्र दिये गये हैं।

प्रश्न 9. सिंधु घाटी के लोगों तथा आर्य लोगों के धार्मिक जीवन में क्या अंतर था ? स्पष्ट करें।
(Explain the differences of religious life of Indus Valley and Aryan peoples.)
अथवा
सिंधु घाटी के लोगों और आर्य लोगों का धार्मिक जीवन किस तरह का था? जानकारी दीजिए।
(Describe the religious life of the people of Indus Valley and Aryans. Explain.)
उत्तर- सिंधु घाटी की खुदाई से मिली मोहरों, चित्रों और मूर्तियों आदि से सिंधु घाटी के लोगों के धार्मिक जीवन के संबंध में बहुमूल्य जानकारी प्राप्त होती है। इस जानकारी के आधार पर निस्संदेह यह कहा जा सकता है कि सिंधु घाही के लोगों का धार्मिक जीवन काफी उन्नत था। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके बहुत से धार्मिक विश्वास आज के हिंदू धर्म में प्रचलित हैं।—

  1. देवी माँ की पूजा (Worship of Mother Goddess)-सिंधु घाटी के लोग सब से अधिक देवी माँ की पूजा करते थे। इस का अनुमान सिंधु घाटी की खुदाई से मिली देवी माँ की अनेक मूर्तियों, मोहरों और तावीज़ों पर बने उनके चित्रों से लगाया जाता है। कई मूर्तियों पर धुएँ के चिन्ह हैं जिनसे यह परिणाम निकलता है कि लोग देवी माँ की धूप-बाती और तेल से पूजा करते थे। देवी माँ को शक्ति का प्रतीक माना जाता था ।।
  2. शिव की पूजा (Worship of Lord Shiva )-सिंधु घाटी के लोगों में एक देवता की पूजा काफी प्रचलित थी। उस समय की मिली कुछ मोहरों पर एक देव के चित्र अंकित हैं। इस देव को योगी की स्थिति में समाधि लगाये हुए देखा गया है। इस के तीन मुँह दर्शाये गये हैं और सिर पर एक मन को मोह लेने वाला पोश पहना हुआ है। इस योगी के इर्द-गिर्द शेर, हाथी, गैंडे, साँड और हिरण आदि के चित्र अंकित हैं। क्योंकि शिव को त्रिमुखी, पशुपति और योगेश्वर आदि के नामों से जाना जाता है इसलिए इतिहासकारों का विचार है कि यह योगी कोई और नहीं बल्कि शिव ही थे।
  3. पशुओं की पूजा (Worship of Animals)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिलने वाली मोहरों और तावीज़ों आदि से हमें इस बात का संकेत मिलता है कि वे कई तरह के पशुओं की पूजा करते थे । इन पशुओं में मुख्य बैल, हाथी, गैंडा, शेर और मगरमच्छ आदि थे । इनके अतिरिक्त सिंधु घाटी के लोग कुछ पौराणिक प्रकार के पशुओं की भी पूजा करते थे। उदाहरण के लिए हड़प्पा से हमें एक ऐसी मूर्ति मिली है जिस का कुछ भाग हाथी का है और कुछ बैल का है। इन पशुओं को देवी माँ अथवा शिव का वाहन समझा जाता था ।
  4. वृक्षों की पूजा (Worship of Trees)-सिंधु घाटी के लोग वृक्षों की भी पूजा करते थे। इन वृक्षों को वे देवी-देवताओं का निवास स्थान समझते थे। वे वृक्षों को जीवन और ज्ञान देने वाला दाता समझते थे। सिंधु घाटी की खुदाई से हमें जो मोहरें प्राप्त हुई हैं उनमें से अत्यधिक मोहरों पर पीपल के पेड़ के चित्र अंकित हैं जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि वे पीपल के पेड़ को अत्यधिक पवित्र समझते थे। इसके अतिरिक्त वे नीम, खजूर, बबूल और शीशम आदि वृक्षों की भी पूजा करते थे ।
  5. स्वस्तिक की पूजा (Worship of Swastik)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिली अनेक मोहरों पर स्वस्तिक के चिन्ह मिले हैं । इनको अच्छे शगुन वाला समझा जाता था। यह पुजारियों और व्यापारियों में आज भी लोकप्रिय है। व्यापारी कोई भी लेन-देन करते समय सबसे पहले स्वस्तिक चिन्ह को बनाते हैं।
  6. सप्तऋषियों की पूजा (Worship of Sapat-Rishis)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिली मोहरों में से एक पर सात मनुष्य एक वृक्ष के सामने खड़े दिखाये गये हैं। इससे इस बात का अनुमान लगाया जाता है कि शायद सिंधु घाटी के लोग सप्तऋषियों की पूजा करते थे। सप्तऋषियों के नाम पुराणों, हिंदुओं के अन्य धार्मिक ग्रंथों तथा बौद्ध ग्रंथों में मिलते हैं। इन सप्तऋषियों के नाम कश्यप, अतरी, विशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदागनी एवं भारदवाज हैं। उनकी स्वर्ग का प्रतीक समझ कर उपासना की जाती थी।
  7. लिंग और योनि की पूजा (Worship of Linga and Yoni)-सिंधु घाटी की खुदाई से हमें बहुत अधिक मात्रा में नुकीले और छल्लों के आकार के पत्थर मिले हैं । इन्हें देखकर यह बात निश्चित तौर पर कही जा सकती है कि सिंधु घाटी के लोग लिंग और योनि की पूजा करते थे। इनकी पूजा वे संसार की सृजन शक्ति के लिए करते थे।
  8. जल की पूजा (Worship of water)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिले बहुत सारे स्नानागारों से इस बात का अनुमान लगाया गया है कि उस समय के लोगों का जल पूजा में गहरा विश्वास था। उनका विशाल स्तानागार हमें मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुआ है। जल को वे शुद्धता और सफ़ाई का प्रतीक मानते थे ।
  9. साँपों की पूजा (Worship of Snakes)-सिंधु घाटी के लोग साँपों की भी पूजा करते थे । ऐसा अनुमान उस समय की प्राप्त कुछ मोहरों पर अंकित साँपों और फनीअर साँपों के चित्रों से लगाया जाता है। एक मोहर पर एक देवता के सिर पर फन फैलाये नाग को दर्शाया गया है। एक और मोहर पर एक मनुष्य को साँप को दूध पिलाते हुए दिखाया गया है।
  10. जादू-टोनों में विश्वास (Faith in Magic and Charms)-सिंधु घाटी की खुदाई से मिलने वाले बहुत से तावीज़ों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सिंधु घाटी के लोग जादू-टोनों और भूत-प्रेत में विश्वास रखते थे ।
  11. मृतक संस्कार (The Death Ceremonies)-सिंधु घाटी के लोग आम तौर पर अपने मुर्दो को दफ़ना देते थे। कब्र में मुर्दे का सिर उत्तर की ओर तथा पैर दक्षिण की ओर किये जाते थे। कभी-कभी मुर्दे को खुले स्थान पर पशु-पक्षियों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता था । उस समय मुर्दो का संस्कार करने की प्रथा भी प्रचलित थी।
    उसकी अस्थियों को बड़े बर्तन में डाल कर दफना दिया जाता था। मृतक का अंतिम संस्कार चाहे किसी भी ढंग से किया जाता था पर उसके साथ अथवा उसके पिंजर अथवा अस्थियों के साथ कुछ बर्तनों में खाने-पीने और कुछ आवश्यक वस्तुओं को भी दबाया जाता था । इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु घाटी के लोग मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास रखते थे।
  12. कुछ अन्य धार्मिक विश्वास (Some other Religious Beliefs)-सिंधु घाटी की खुदाई से हमें अनेक अग्निकुण्ड प्राप्त हुए हैं जिस से यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु घाटी के लोग अग्नि की, घुग्घी की और सूर्य आदि की पूजा भी करते थे। सिंधु घाटी के लोगों का आत्मा एवं परमात्मा में भी दृढ़ विश्वास था।

आरंभिक आर्यों का धार्मिक जीवन कैसा था इसके संबंध में हमें ऋग्वेद से विस्तारपूर्वक जानकारी प्राप्त होती है । निस्संदेह वे बड़ा सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करते थे। उनके धार्मिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:—
1. प्रकृति और प्राकृतिक शक्तियों के पुजारी (Worshippers of Nature and Natural Phenomena)- आरंभिक आर्यों का धार्मिक जीवन बिल्कुल सादा था। वे प्रकृति और प्राकृतिक शक्तियों की पूजा करते थे। वे उन सारी वस्तुओं जो सुंदर विचित्र और भयानक दिखाई देती थीं, को प्राकृतिक शक्तियाँ स्वीकार करते थे। उन्होंने इन प्राकृतिक शक्तियों को अलग-अलग देवी-देवताओं का नाम रखकर उनकी पूजा आरंभ कर दी थी। वे चमकते हुए सूर्य की पूजा करते थे क्योंकि वह पृथ्वी को सजीव रखता था। वे वायु की पूजा करते थे जो संसार भर के मनुष्यों को जीवन देती थी। वे प्रभात की पूजा करते थे जो मनुष्यों को उनकी मीठी नींद से जगाकर उनको उनके कार्यों पर भेजता था। वे नीले आकाश की पूजा करते थे जिसने सारे संसार को घेरा हुआ था।
2. वैदिक देवते (VedicGods) आरंभिक आर्यों के देवताओं की कुल संख्या 33 थी। इन को तीन भागों में बाँटा गया था । ये देवता आकाश, पृथ्वी और आकाश तथा पृथ्वी के मध्य रहते थे । प्रमुख देवी-देवताओं का संक्षेप वर्णन अग्रलिखित है :—

  • वरुण (Varuna)-वरुण आरंभिक आर्यों का सब से बड़ा देवता था । वह सिंहासन पर बैठता था। उसको सत्य और धर्म का स्वामी माना जाता था। उसको आकाश, पृथ्वी, और सूर्य का निर्माता कहा जाता था। वह पापी लोगों को सज़ा देता था। वह जीवन दान दे सकता था और मृत्यु को रद्द कर सकता था। इसलिए पापी लोग उससे क्षमा की याचना करते थे।
  • इंद्र (Indra) -इंद्र आरंभिक आर्यों का दूसरा महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली देवता था। ऋग्वेद में सबसे अधिक (250) मंत्र इस देवता की प्रशंसा में दिये गये हैं। उसको वर्षा और युद्ध का देवता समझा जाता था। आर्य उसकी समय पर वर्षा के लिए और युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करते थे । वह दुश्मनों के दुर्गों को पलक झपकते ही नष्ट कर सकता था ।
  • अग्नि (Agni)-अग्नि आरंभिक आर्यों का एक और प्रमुख देवता था। उसका संबंध विवाह और दाह संस्कारों के साथ था। उसके बिना कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता था। ऋग्वेद में अग्नि देवता की प्रशंसा में 200 मंत्र दिये गये हैं।
  • सूर्य (Sun)-सूर्य भी आरंभिक आर्यों का एक महत्त्वपूर्ण देवता था । वह संसार में से अंधेरे को दूर भगाता था। वह हर रोज़ सात घोड़ों वाले रथ पर सवार होकर आकाश का चक्र काटता था ।
  • रुद्र (Rudra)-रुद्र को आँधी या तूफ़ान का देवता समझा जाता था। वह बहुत ही प्रचंड और विनाशकारी था। लोग उससे बहुत डरते थे और उसको प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते थे।
  • सोम (Soma)-सोम देवता की आरंभिक आर्यों के धार्मिक जीवन में बहुत महत्ता थी। सोम रस को एक ऐसा अमृत समझा जाता था जिसको पीकर देवता अमर हो जाते थे। इस का हवन में प्रयोग किया जाता था और यह देवताओं को भेंट किया जाता था।
  • देवियाँ (Goddesses)-आरंभिक आर्य देवताओं के अतिरिक्त कुछ देवियों की भी पूजा करते थे । परंत देवताओं के मुकाबले इनका महत्त्व कम था । उनके द्वारा पूजी जाने वाली प्रमुख देवियाँ प्रभात की देवी उषा, रात की देवी रात्री, धरती की देवी पृथ्वी, वन देवी आरण्यी, नदी देवी सरस्वती थीं।

3. एक ईश्वर में विश्वास ( Faith in one God) यद्यपि आरंभिक आर्य अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते थे परंतु फिर भी उनका ईश्वर की एकता में दृढ़-विश्वास था। वे सारे देवताओं को महान् समझते थे और किसी को भी छोटा या बड़ा नहीं समझते थे । ऋषि अलग-अलग अवसरों पर अलग-अलग देवी-देवताओं को प्रधान बना देते थे । ऋग्वेद के एक मंत्र में कहा गया है, सब एक ही हैं, केवल ऋषियों ने ही उनका विभिन्न रूपों में वर्णन किया है।” एक और मंत्र में लिखा है, “वह जिसने हमें जीवन बख्शा है, वह जिसने सृष्टि की रचना की है, अनेक देवताओं .के नाम के साथ प्रसिद्ध होते हुए भी वह एक है।” स्पष्ट है कि आर्य एक ईश्वर के सिद्धांत को अच्छी तरह जानते
थे।
4. मंदिरों और मूर्ति पूजा का अभाव (Absence of Temples and Idol Worship)-आरंभिक आर्यों ने अपने देवी-देवताओं की याद में न किसी मंदिर का निर्माण किया था और न ही उनकी मूर्तियाँ बनाई गई थीं। मंदिर के निर्माण संबंधी या मूर्तियों के निर्माण संबंधी ऋग्वेद में कहीं भी कोई वर्णन नहीं मिलता। आर्य लोग अपने घरों में खुले वातावरण में चौकड़ी लगा कर बैठ जाते थे और एक मन हो कर अपने देवी-देवताओं की याद में मंत्रों का उच्चारण करते थे और स्तुति करते थे ।
5. यज्ञ और बलियाँ (Yajnas and Sacrifices)-आरंभिक आर्य लोग अपने देवी-देवताओं को खुश करने के लिए कई तरह के यज्ञ करते थे । इन यज्ञों को बड़े ध्यान से किया जाता था, क्योंकि उनको यह डर होता था कि थोड़ीसी गलती से उनके देवता नाराज़ न हो जाएँ। सबसे पहले यज्ञ के लिए वेदी बनाई जाती थी। फिर इसमें पवित्र अग्नि जलाई जाती थी इसमें घी, दूध, चावल और सोमरस डाला जाता था। इन यज्ञों के दौरान कई जानवरों की जैसे भेड़ों, बकरियों और घोड़ों आदि की बलि दी जाती थी। उस समय मनुष्य की बलि देने की प्रथा बिल्कुल नहीं थी। ये यज्ञ कई प्रकार के होते थे । सबसे छोटा यज्ञ पारिवारिक स्तर पर होता था। बड़े-बड़े यज्ञों की तैयारी बहुत पहले ही शुरू हो जाती थी। ऐसे यज्ञ राजाओं और समाज के और अमीर वर्ग द्वारा करवाये जाते थे। इन यज्ञों में बहुत ज्यादा मात्रा में पुरोहित शामिल होते थे। इनको दक्षिणा के तौर पर सोना, पशु या अनाज दिया जाता था। इन यज्ञों और बलियों का प्रमुख उद्देश्य देवताओं को खुश करना था। इनके बदले वे समझते थे कि उनको युद्ध में सफलता प्राप्त होगी, धन प्राप्त होगा, संतान में वृद्धि होगी और लम्बा जीवन मिलेगा। आरंभिक आर्य यह समझते थे कि हर यज्ञ से संसार की नये सिरे से उत्पत्ति होती है और यदि यह यज्ञ न करवाए जायें तो संसार में फिर से अंधकार छा जाएगा । इन यज्ञों के करवाने से गणित, भौतिक ज्ञान और जानवरों की शारीरिक बनावट के ज्ञान में वृद्धि हुई ।
6. पितरों की पूजा (Worship of Forefathers)-आरंभिक आर्य अपने देवी-देवताओं की पूजा के अतिरिक्त अपने पितरों की भी पूजा करते थे । पितर आर्यों के आरंभिक बुर्जुग थे। वे स्वर्गों में निवास करते थे । ऋग्वेद में बहुत से मंत्र पितरों की प्रशंसा में लिखे गये हैं । उनकी पूजा भी अन्य देवी-देवताओं की तरह की जाती थी। पितरों की पूजा इस आशा के साथ की जाती थी कि वे अपने वंश की रक्षा करेंगे, उनका मार्गदर्शन करेंगे, उनके कष्ट दूर करेंगे, उनको धन और शक्ति प्रदान करेंगे तथा अपने बच्चों की दीर्घायु और संतान का वर देंगे।
7. मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास (Belief in Life after Death)-आरंभिक आर्य मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास रखते थे । आवागमन और पुनर्जन्म का सिद्धांत अभी प्रचलित नहीं हुआ था। वैदिक काल के लोगों का विश्वास था कि मृत्यु के समय आत्मा शरीर से अलग हो जाती है। वे आत्मा को अमर समझते थे। स्वर्ग का जीवन खुशियों से भरपूर होता था । यह देवताओं का निवास स्थान था। वे लोग स्वर्ग के अधिकारी समझे जाते थे जो रणभूमि में अपना बलिदान देते थे अथवा भारी तपस्या करते थे अथवा यज्ञ के समय खुले दिल से दान देते थे। ऋग्वेद में नरक का वर्णन कहीं नहीं किया गया है ।
8. मृतक का अंतिम संस्कार (Disposal of Dead)-आरंभिक आर्यों के काल में मृतकों का दाह संस्कार किया जाता था । मृतक को चिता तक ले जाने के लिए उसकी पत्नी और अन्य संबंधी साथ जाते थे। उसके बाद मृतक को चिता पर रख दिया जाता था। यदि मृतक ब्राह्मण होता तो उसके दायें हाथ में एक लाठी पकड़ाई जाती थी, यदि वह क्षत्रिय होता तो उसके हाथ में धनुष और यदि वह वैश्य होता तो उसके हाथ में हल चलाने वाली लकड़ी पकड़ाई जाती थी । उसकी पत्नी तब तक चिता के पास बैठी रहती थी जब तक उसको यह नहीं कहा जाता था ‘अरी महिला उठो और जीवित लोगों में आओ।’ इसके बाद हवन कुंड से लाई गई अग्नि के साथ चिता को आग लगाई जाती थी और वह मंत्र पढ़ा जाता था, “बजुर्गों के मार्ग पर जाओ।” लाश के पूर्ण भस्म हो जाने को बाद अस्थियों को इकट्ठा कर लिया जाता था और उनको एक क्लश में रखकर जमीन में गाढ़ दिया जाता था।
9. रित और धर्मन (Rita and Dharman)-ऋग्वेद और दूसरे वैदिक ग्रंथों में रित और धर्मन शब्दों का बहुत वर्णन मिलता है । रित से भाव उस व्यवस्था से है जिसके अनुसार संसार का प्रबंध चलता है। रित के नियमानुसार ही सुबह पौ फटती है, सूर्य, चाँद और तारे चमकीले नज़र आते हैं। धरती सूर्य के इर्द-गिर्द चक्र लगाती है । सागर में ज्वारभाटे आते हैं। इस तरह रित एक सच्चाई है, इस का विपरीत अनऋत (झूठ) है। ‘धर्मन’ शब्द से भाव कानून है। धर्मन देवताओं द्वारा बनाये जाते हैं । यह भौतिक संसार, मनुष्यों और बलियों पर लागू होता है। वास्तव में धर्मन जीवन और रस्मों रीतों का नियम है। अच्छे मनुष्य अपना जीवन धर्मन अनुसार व्यतीत करते थे।

SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. सिंधु घाटी के लोगों की कोई दो विशेषताएँ बताएँ। (Write any two features of religious life of the Indus Valley People.)
उत्तर-

  1. देवी माँ की पूजा-सिंधु घाटी के लोग सबसे अधिक देवी माँ की पूजा करते थे। इस का अनुमान सिंधु घाटी की खुदाई से मिली देवी माँ की अनेक मूर्तियों, मोहरों और तावीज़ों पर बने उनके चित्रों से लगाया जाता है। कई मूर्तियों पर धुएँ के चिन्ह हैं जिनसे यह परिणाम निकलता है कि लोग देवी माँ की धूप-बाती और तेल से पूजा करते थे। देवी माँ को शक्ति का प्रतीक माना जाता था।
  2. शिव की पूजा-सिंधु घाटी के लोगों में एक देवता की पूजा काफ़ी प्रचलित थी। उस समय की मिली कुछ मोहरों पर एक देव के चित्र अंकित हैं। इस देव को योगी की स्थिति में समाधि लगाये हुए देखा गया है। इस के तीन मुँह दर्शाये गए हैं। इसलिए इतिहासकारों का विचार है कि यह योगी कोई और नहीं बल्कि शिव ही थे।

प्रश्न 2. सिंधु घाटी सभ्यता की धार्मिक विशेषताएँ क्या थी ? (What were the characteristics of the religion of the Indus Valley Civilization ?)
उत्तर-सिंधु घाटी की खुदाई से मिली मूर्तियों और तावीज़ों को देखकर हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि सिंधु घाटी के लोग सर्वाधिक देवी माँ की पूजा करते थे। वह शिव की पूजा भी करते थे। इसके अतिरिक्त वह लिंग, योनि, सूर्य, पीपल, बैल, शेर, हाथी आदि की भी पूजा करते थे। वह मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास रखते थे। वह भूत-प्रेतों में भी विश्वास रखते थे तथा उनसे बचने के लिए जादू-टोनों का प्रयोग करते थे।

प्रश्न 3. सिंधु घाटी के लोग अपने मृतकों का संस्कार किस प्रकार करते थे ? (How the people of Indus Valley Civilization disposed off their dead ?)
अथवा
सिंधु घाटी सभ्यता के लोग अपने मृतकों का संस्कार करने के लिए कौन-से दो तरीके अपनाते थे ?
(Which two methods were adopted by the people of Indus Valley to dispose off their dead ?)
अथवा
हड़प्पा काल के लोगों के मृतक संस्कारों के बारे में जानकारी दीजिए। (Describe the death ceremonies of Harappa age people.)
उत्तर-सिंधु घाटी के लोग आम तौर पर अपने मुर्दो को दफ़ना देते थे। कब्र में मुर्दे का सिर उत्तर की ओर तथा पैर दक्षिण की ओर किये जाते थे। कभी-कभी मुर्दे को खुले स्थान पर पशु-पक्षियों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता था तथा जब पिंजर शेष रह जाता था तब उसे एक ताबूत में डाल कर दफना दिया जाता था। उस समय मर्यों का संस्कार करने की प्रथा भी प्रचलित थी। उसकी अस्थियों को बड़े बर्तन में डाल कर दफना दिया जाता था।

प्रश्न 4. प्रारंभिक आर्यों के धार्मिक विश्वासों के बारे में जानकारी दीजिए। (Describe the religious beliefs of early Aryans.)
अथवा
वैदिक आर्यों के धार्मिक विचारों एवं रीति-रिवाजों के बारे में बताएँ। (Discuss the religious ideas and rituals of Vedic Aryans.)
अथवा
ऋग्वैदिक आर्यों के धार्मिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं ? (What were the main features of the religious life of the Rigvedic Aryans ?)
उत्तर-ऋग्वैदिक काल में आर्यों का धर्म बिल्कुल सादा था। आर्य प्राकृतिक शक्तियों को देवता मानकर उनकी उपासना करते थे। उनके सबसे बड़े देवता का नाम वरुण था। वह आकाश का देवता था। इंद्र को द्वितीय स्थान प्राप्त था। वह वर्षा और युद्ध का देवता था। अग्नि देवता भी बहुत महत्त्वपूर्ण था। क्योंकि उसका विवाह तथा दाहसंस्कार के साथ संबंध था। इसके अतिरिक्त आर्य ऊषा, रात्रि, पृथ्वी तथा आरण्यी आदि की भी पूजा करते थे। परंतु देवताओं की अपेक्षा उनका महत्त्व कम था।

प्रश्न 5. वरुण के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about Varuna ?)
अथवा
आर्यों के वरुण देवते बारे जानकारी दें। (Describe the Lord Varuna of the Aryans.)
उत्तर-वरुण आरंभिक आर्यों का सब से बड़ा देवता था। वह ऊँचे सिंहासन पर बैठता था। उसको सत्य और धर्म का स्वामी माना जाता था। उसको आकाश, पृथ्वी और सूर्य का निर्माता कहा जाता था। उसके आदेशानुसार चाँद चमकता था और तारे टिमटिमाते थे। वह सर्वशक्तिशाली और सर्वव्यापक था। वह संसार में घटने वाली हर घटना को जानता था। उसकी सैंकड़ों आँखें थीं। कोई भी पापी उसकी पैनी नज़र से बच नहीं सकता था। वह पापियों को दंड देता था। वह जीवन दान दे सकता था और मृत्यु को रद्द कर सकता था। इसलिए पापी क्षमा के लिए उससे प्रार्थना करते थे।

प्रश्न 6. आरंभिक आर्यों के देवता इंद्र के बारे में जानकारी दीजिए। (Describe god Indra of early Aryans.)
अथवा
इंद्र देवता के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about god Indra ?)
उत्तर-इंद्र आरंभिक आर्यों का दूसरा महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली देवता था। ऋग्वेद में सबसे अधिक (250) मंत्र इस देवता की प्रशंसा में दिये गये हैं। उसका तेज इतना था कि सैंकड़ों सूर्यों का प्रकाश भी उसके आगे मद्धम पड़ जाता था। उसको वर्षा और युद्ध का देवता समझा जाता था। आर्य उसकी समय पर वर्षा के लिए और युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए याचना करते थे। वह इतना बहादुर था कि उसने राक्षसों पर भी विजय प्राप्त की थी। वह दुश्मनों के दुर्गों को पलक झपकते ही नष्ट कर सकता था। वह अंधकार को दूर कर सकता था। वह कई रूप धारण कर सकता था। वह इतना शक्तिशाली था कि सब देवता उससे डरते थे।

प्रश्न 7. आर्यों के देवता अग्नि का वर्णन अपने शब्दों में करें। (Explain in your words the Aryan god ‘Agni’.)
उत्तर- अग्नि आरंभिक आर्यों का प्रमुख देवता था। उसको दो कारणों से अति महत्त्वपूर्ण समझा जाता था। पहला, उसको सब घरों का स्वामी समझा जाता था। उसका संबंध विवाह और दाह-संस्कारों के साथ था। दूसरा, उसके बिना कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता था। वह अपने भक्तों द्वारा दी गई आहुति को देवताओं तक पहुँचाता था। अग्नि देवता की सात जीभें और 1000 आँखें समझी जाती थीं। यदि वह कभी गुस्से में आ जाता तो पल भर में सबको नष्ट कर सकता था। सूखे काष्ठ, घी और मक्खन को इसका मनपसंद भोजन समझा जाता था।

प्रश्न 8. आर्यों की सामाजिक, धार्मिक व्यवस्था में यज्ञों का क्या महत्त्व था ? (What was the importance of Yajnas in the social and religious life of the Aryans ?)
अथवा
ऋग्वैदिक आर्यों की उपासना विधि के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the mode of worship of the Rigvedic Aryans ?)
उत्तर-ऋग्वैदिक आर्यों की उपासना विधि बहुत सरल थी। वे खुले वायुमंडल में एकाग्रचित होकर मंत्रों का उच्चारण करते थे। वे अपने देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार के यज्ञ करते थे। ये यज्ञ बहुत ध्यानपूर्वक किए जाते थे क्योंकि उन्हें यह भय होता था कि कहीं थोड़ी-सी भूल से उनके देवता रुष्ट न हो जाएँ। सबसे पहले यज्ञ के लिए अग्नि प्रज्वलित की जाती थी। फिर उसमें घी, दूध, चावल और सोमरस डाला जाता था। इन यज्ञों में कई पशुओं की बलि भी दी जाती थी। ये यज्ञ कई प्रकार के होते थे। इन यज्ञों तथा बलियों का मुख्य उद्देश्य देवताओं को प्रसन्न करना था।

प्रश्न 9. आरंभिक आर्य अपने मृतकों का अंतिम संस्कार किस प्रकार करते थे? (How did the early Aryan dispose off their dead ?)
उत्तर-आरंभिक आर्यों के काल में मृतकों का दाह-संस्कार किया जाता था। मृतक को चिता तक ले जाने के लिए उसकी पत्नी अथवा अन्य संबंधी साथ जाते थे। उसके बाद मृतक को चिता पर रख दिया जाता था। उसकी पत्नी तब तक चिता के पास बैठी रहती थी जब तक उसको यह नहीं कहा जाता था ‘अरी महिला उठो और जीवित लोगों में आओ।’ इसके बाद हवन कुंड से लाई गई अग्नि के साथ चिता को आग लगाई जाती थी। लाश के पूर्ण भस्म हो जाने के बाद अस्थियों को इकट्ठा कर लिया जाता था और उनको एक क्लश में रखकर जमीन में गाढ़ दिया जाता था।

प्रश्न 10. रित एवं धर्मन से आपका क्या अभिप्राय है ? (What do you mean by Rita and Dharman ?)
उत्तर-ऋग्वेद और दूसरे वैदिक ग्रंथों में रित और धर्मन शब्दों का बहुत वर्णन मिलता है। रित से भाव उस व्यवस्था से जिसके अनुसार संसार का प्रबंध चलता है। रित के नियमानुसार ही सुबह पौ फटती है, सूर्य, चाँद और तारे चमकीले नज़र आते हैं। ‘धर्मन’ शब्द से भाव कानून है। धर्मन देवताओं द्वारा बनाये जाते हैं। यह भौतिक संसार, मनुष्यों और बलियों पर लागू होते थे। अच्छे मनुष्य अपना जीवन धर्मन अनुसार व्यतीत करते थे।

प्रश्न 11. सिंधु घाटी के लोगों की कोई पाँच विशेषताएँ बताएँ। (Write any five features of religious life of the Indus Valley People.)
अथवा
सिंधु घाटी के लोगों के द्वारा किस-किस वस्तु की पूजा होती है ? (What was worshipped by the Indus Valley People ?)
उत्तर-

  1. देवी माँ की पूजा-सिंधु घाटी के लोग सबसे अधिक देवी माँ की पूजा करते थे। इस का अनुमान सिंधु घाटी की खुदाई से मिली देवी माँ की अनेक मूर्तियों, मोहरों और तावीज़ों पर बने उनके चित्रों से लगाया जाता है। कई मूर्तियों पर धुएँ के चिन्ह हैं जिनसे यह परिणाम निकलता है कि लोग देवी माँ की धूप-बाती और तेल से पूजा करते थे। देवी माँ को शक्ति का प्रतीक माना जाता था।
  2. शिव की पूजा-सिंधु घाटी के लोगों में एक देवता की पूजा काफ़ी प्रचलित थी। उस समय की मिली कुछ मोहरों पर एक देव के चित्र अंकित हैं। इस देव को योगी की स्थिति में समाधि लगाये हुए देखा गया है। इस के तीन मुँह दर्शाये गए हैं। इसलिए इतिहासकारों का विचार है कि यह योगी कोई और नहीं बल्कि शिव ही थे।
  3. वृक्षों की पूजा-सिंधु घाटी के लोग वृक्षों की भी पूजा करते थे। इन वृक्षों को वे देवी-देवताओं का निवास स्थान समझते थे। वे वृक्षों को जीवन और ज्ञान देने वाला दाता समझते थे। वे पीपल के पेड़ को अत्यधिक पवित्र समझते थे। इसके अतिरिक्त वे नीम, खजूर, बबूल और शीशम आदि वृक्षों की भी पूजा करते थे।
  4. स्वस्तिक की पूजा-सिंधु घाटी की खुदाई से मिली अनेक मोहरों पर स्वस्तिक के चिन्ह मिले हैं। इनको अच्छे शगुन वाला समझा जाता था। यह पुजारियों और व्यापारियों में आज भी हरमन प्यारा है। व्यापारी कोई भी लेन-देन करते समय सबसे पहले स्वस्तिक चिन्ह को बनाते हैं।
  5. सप्तऋषियों की पूजा–सिंधु घाटी की खुदाई से मिली मोहरों में से एक पर सात मनुष्य एक वृक्ष के सामने खड़े दिखाये गये हैं। इससे इस बात का अनुमान लगाया जाता है कि शायद सिंधु घाटी के लोग सप्तऋषियों की पूजा करते थे।

प्रश्न 12. सिंधु घाटी के लोग अपने मृतकों का संस्कार किस प्रकार करते थे ?
(How the people of Indus Valley Civilization disposed off their dead ?)
अथवा
सिंधु घाटी सभ्यता के लोग अपने मृतकों का संस्कार करने के लिए कौन-से दो तरीके अपनाते थे ?
(Which two methods were adopted by the people of Indus Valley to dispose off their dead ?)
अथवा
हड़प्पा काल के लोगों के मृतक संस्कारों के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the death ceremonies of Harappa age people.)
उत्तर-सिंधु घाटी के लोग आम तौर पर अपने मुर्दो को दफना देते थे। कब्र में मुर्दे का सिर उत्तर की ओर तथा पैर दक्षिण की ओर किये जाते थे। कभी-कभी मुर्दे को खुले स्थान पर पशु-पक्षियों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता था। उस समय मुर्दो का संस्कार करने की प्रथा भी प्रचलित थी। उसकी अस्थियों को बड़े बर्तन में डाल कर दफना दिया जाता था। मृतक का अंतिम संस्कार चाहे किसी भी ढंग से किया जाता था पर उसके साथ अथवा उसके पिंजर अथवा अस्थियों के साथ कुछ बर्तनों में खाने-पीने और कुछ आवश्यक वस्तुओं को भी दबाया जाता था। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु घाटी के लोग मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास रखते थे।

प्रश्न 13. प्रारंभिक आर्यों के धार्मिक विश्वासों के बारे में जानकारी दीजिए। (Describe the religious beliefs of early Aryans.)
अथवा
वैदिक आर्यों के धार्मिक विचारों एवं रीति-रिवाजों के बारे में बताएँ। (Discuss the religious ideas and rituals of Vedic Aryans.)
अथवा
ऋग्वैदिक आर्यों के धार्मिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं ? (What were the main features of the religious life of the Rigvedic Aryans ?)
अथवा आरंभिक आर्य लोगों के धार्मिक विश्वासों के बारे में लिखें।
(Discuss the religious beliefs of the early Aryan people.)
उत्तर-ऋग्वैदिक काल में आर्यों का धर्म बिल्कुल सादा था। आर्य प्राकृतिक शक्तियों को देवता मानकर उनकी उपासना करते थे। वे कई देवी-देवताओं की पूजा करते थे। उनके सबसे बड़े देवता का नाम वरुण था। वह आकाश का देवता था। वह संसार के सभी रहस्यों को जानता था। आर्य उससे अपनी भूल के लिए क्षमा माँगते थे। इंद्र को द्वितीय स्थान प्राप्त था। वह वर्षा और युद्ध का देवता था। आर्य इस देवता की समय पर वर्षा के लिए और युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करते थे। अग्नि देवता भी बहुत महत्त्वपूर्ण था। वह देवताओं और मनुष्यों के बीच संपर्क का साधन था। विवाह अग्नि की उपस्थिति में होते थे और मृतकों का अग्नि के द्वारा दाह-संस्कार किया जाता था। इसके अतिरिक्त आर्य लोग सूर्य, रुद्र, यम, वायु और त्वस्त्र देवताओं की भी पूजा करते थे। वे कई देवियों जैसे कि-प्रातः की देवी ऊषा, रात की देवी रात्रि, भूमि की देवी पृथ्वी, वन देवी आरण्यी आदि की भी पूजा करते थे। परंतु देवियों की संख्या कम थी और देवताओं की अपेक्षा उनका महत्त्व भी कम था। आर्य अपने देवी-देवताओं को एक ही ईश्वर के भिन्न-भिन्न रूप समझते थे। आर्य आवागमन, मुक्ति तथा कर्म सिद्धांतों में भी विश्वास रखते थे। ये सिद्धांत इस काल में अधिक विकसित नहीं हुए थे।

प्रश्न 14. प्रारंभिक आर्यों के प्रमुख देवताओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। (Give a brief account of the main gods of the Early Aryans.)
उत्तर-

  1. वरुण-वरुण प्रारंभिक आर्यों का सबसे बड़ा देवता था। वह सिंहासन पर बैठता था। उसको सत्य और धर्म का स्वामी माना जाता था। उसको आकाश, पृथ्वी और सूर्य का निर्माता कहा जाता था। वह पापी लोगों को सज़ा देता था। वह जीवन दान दे सकता था और मृत्यु को रद्द कर सकता था। इसलिए पापी लोग उससे क्षमा की याचना करते थे।
  2. इंद्र-इंद्र प्रारंभिक आर्थों का दूसरा महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली देवता था। ऋग्वेद में सबसे अधिक (250) मंत्र इस देवता की प्रशंसा में दिये गये हैं। उसको वर्षा और युद्ध का देवता समझा जाता था। आर्य उसकी समय पर वर्षा के लिए और युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करते थे। वह दुश्मनों के दुर्गों को पलक झपकते ही नष्ट कर सकता था।
  3. अग्नि-अग्नि प्रारंभिक आर्यों का एक और प्रमुख देवता था। उसका संबंध विवाह और दाह संस्कार के साथ था। उसके बिना कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता था। ऋग्वेद में अग्नि देवता की प्रशंसा में 200 मंत्र दिये गये हैं।
  4. सूर्य-सूर्य भी प्रारंभिक आर्यों का एक महत्त्वपूर्ण देवता था। वह संसार में से अंधेरे को दूर भगाता था। वह हर रोज़ सात घोड़ों वाले रथ पर सवार होकर आकाश का चक्र काटता था।
  5. रुद्र-रुद्र को आँधी या तूफ़ान का देवता समझा जाता था। वह बहुत ही प्रचंड और विनाशकारी था। लोग उससे बहुत डरते थे और उसको प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते थे।
  6. सोम-सोम देवता की प्रारंभिक आर्यों के धार्मिक जीवन में बहत महत्ता थी। सोम रस को एक ऐसा अमृत समझा जाता था जिसको पीकर देवता अमर हो जाते थे। इस का हवन में प्रयोग किया जाता था और यह देवताओं को भेंट किया जाता।

प्रश्न 15. वरुण और इंद्र के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about Varuna and Indra ?)
अथवा
वरुण के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about Varuna ?)
अथवा
आर्यों के वरुण देवते बारे जानकारी दें।
(Describe the Lord Varuna of the Aryans.)
अथवा
आरंभिक आर्यों के देवता इंद्र के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe god Indra of early Aryans.)
अथवा
इंद्र देवता के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about God Indra ?)
उत्तर-

  1. वरुण-वरुण आरंभिक आर्यों का सब से बड़ा देवता था। वह ऊँचे सिंहासन पर बैठता था उसको सत्य और धर्म का स्वामी माना जाता था। उसको आकाश, पृथ्वी और सूर्य का निर्माता कहा जाता था। उसके आदेशानुसार चाँद चमकता था और तारे टिमटिमाते थे। वह सर्वशक्तिशाली और सर्वव्यापक था। वह संसार में घटने वाली हर घटना को जानता था। उसकी सैंकड़ों आँखें थीं। कोई भी पापी उसकी पैनी नज़र से बच नहीं सकता था। वह पापियों को दंड देता था। वह जीवन दान दे सकता था और मृत्यु को रद्द कर सकता था। इसलिए पापी क्षमा के लिए उससे प्रार्थना करते थे।
  2. इंद्र-इंद्र आरंभिक आर्यों का दूसरा महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली देवता था। ऋग्वेद में सबसे अधिक (250) मंत्र इस देवता की प्रशंसा में दिये गये हैं। उसका तेज इतना था कि सैंकड़ों सूर्यों का प्रकाश भी उसके आगे मद्धम पड़ जाता था। उसको वर्षा और युद्ध का देवता समझा जाता था। आर्य उसकी समय पर वर्षा के लिए और युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए याचना करते थे। वह इतना बहादुर था कि उसने राक्षसों पर भी विजय प्राप्त की थी। वह दुश्मनों के दुर्गों को पलक झपकते ही नष्ट कर सकता था। वह अंधकार को दूर कर सकता था। वह कई रूप धारण कर सकता था। वह इतना शक्तिशाली था कि सब देवता उससे डरते थे।

प्रश्न 16. आर्यों के देवता अग्नि का वर्णन अपने शब्दों में करें। (Explain in your words the Aryan god ‘Agni’.)
उत्तर-अग्नि आरंभिक आर्यों का एक और प्रमुख देवता था। उसको दो कारणों से अति महत्त्वपूर्ण समझा जाता था। पहला, उसको सब घरों का स्वामी समझा जाता था। उसका संबंध विवाह और दाह-संस्कारों के साथ था। दूसरा, उसके बिना कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता था। वह अपने भक्तों द्वारा दी गई आहुति को देवताओं तक पहुँचाता था। अग्नि देवता की सात जी) और 1000 आँखें समझी जाती थीं। यदि वह कभी गुस्से में आ जाता तो पल भर में सबको नष्ट कर सकता था। सूखे काष्ठ, घी और मक्खन को इसका मनपसंद भोजन समझा जाता था। ऋग्वेद में अग्नि देवता की प्रशंसा में 200 मंत्र दिये गये हैं।

प्रश्न 17. आर्यों की सामाजिक, धार्मिक व्यवस्था में यज्ञों का क्या महत्त्व था ? (What was the importance of Yajnas in the social and religious life of the Aryans ?)
अथवा
ऋग्वैदिक आर्यों की उपासना विधि के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about the mode of worship of the Rigvedic Aryans ?)
उत्तर-ऋवैदिक आर्यों की उपासना विधि बहुत सरल थी। वे खुले वायुमंडल में एकाग्रचित होकर मंत्रों का उच्चारण करते थे। वे अपने देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार के यज्ञ करते थे। ये यज्ञ बहुत ध्यानपूर्वक किए जाते थे क्योंकि उन्हें यह भय होता था कि कहीं थोड़ी-सी भूल से उनके देवता रुष्ट न हो जाएँ। सबसे पहले यज्ञ के लिए अग्नि प्रज्वलित की जाती थी। फिर उसमें घी, दूध, चावल और सोमरस डाला जाता था। इन यज्ञों में कई पशुओं की बलि भी दी जाती थी। ये यज्ञ कई प्रकार के होते थे। सबसे छोटा यज्ञ पारिवारिक स्तर पर होता था। बड़े यज्ञों की तैयारी बहुत पहले से आरंभ कर दी जाती थी। धनवान् लोग इन यज्ञों में भारी दान देते थे। इन यज्ञों तथा बलियों का मुख्य उद्देश्य देवताओं को प्रसन्न करना था। आर्य ये समझते थे कि इनके बदले में उन्हें लड़ाई में विजय प्राप्त होगी, धन प्राप्त होगा, संतान वृद्धि होगी तथा सुखमय दीर्घ जीवन मिलेगा। वे यह समझते थे कि प्रत्येक यज्ञ से संसार की फिर से उत्पत्ति होती है और यदि ये यज्ञ न कराए जाएँ तो संसार में अंधकार फैल जाएगा। इन यज्ञों के कारण गणित, खगोल विद्या तथा जानवरों की शारीरिक संरचना के ज्ञान के संबंध में वृद्धि हुई।

प्रश्न 18. आरंभिक आर्य अपने मृतकों का अंतिम संस्कार किस प्रकार करते थे? (How did the early Aryan dispose off their dead ?)
उत्तर-आरंभिक आर्यों के काल में मृतकों का दाह-संस्कार किया जाता था। मृतक को चिता तक ले जाने के लिए उसकी पत्नी और अन्य संबंधी साथ जाते थे। उसके बाद मृतक को चिता पर रख दिया जाता था। यदि मृतक ब्राह्मण होता तो उसके दायें हाथ में एक लाठी पकड़ाई जाती थी, यदि वह क्षत्रिय होता तो उसके हाथ में धनुष और यदि वह वैश्य होता तो उसके हाथ में हल चलाने वाली लकड़ी पकड़ाई जाती थी। उसकी पत्नी तब तक चिता के पास बैठी रहती थी जब तक उसको यह नहीं कहा जाता था ‘अरी महिला उठो और जीवित लोगों में आओ।’ इसके बाद हवन कुंड से लाई गई अग्नि के साथ चिता को आग लगाई जाती थी और यह मंत्र पढ़ा जाता था, “बजुर्गों के मार्ग पर जाओ”। लाश के पूर्ण भस्म हो जाने के बाद अस्थियों को इकट्ठा कर लिया जाता था और उनको एक क्लश में रखकर ज़मीन में गाढ़ दिया जाता था।

प्रश्न 19. रित एवं धर्मन से आपका क्या अभिप्राय है ? (What do you mean by Rita and Dharman ?)
उत्तर-ऋग्वेद और दूसरे वैदिक ग्रंथों में रित और धर्मन शब्दों का बहुत वर्णन मिलता है। रित से भाव उस व्यवस्था से जिसके अनुसार संसार का प्रबंध चलता है। रित के नियमानुसार ही सुबह पौ फटती है, सूर्य, चाँद और तारे चमकीले नज़र आते हैं। धरती सूर्य के इर्द-गिर्द चक्र लगाती है। सागर में.ज्वारभाटे आते हैं। इस तरह रित एक सच्चाई है। इसका विपरीत अनऋत (झूठ) है। ‘धर्मन’ शब्द से भाव कानून है। धर्मन देवताओं द्वारा बनाये जाते हैं। यह भौतिक संसार, मनुष्यों और बलियों पर लागू होता है। वास्तव में धर्मन जीवन और रस्मों रीतों का नियम है। अच्छे मनुष्य अपना जीवन धर्मन अनुसार व्यतीत करते थे।

OBJECTIVE TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. सिंधु घाटी की सभ्यता कितनी पुरानी है ?
अथवा
सिंधु घाटी की सभ्यता कितनी पुरानी मानी जाती है ?
उत्तर-5000 वर्ष।

प्रश्न 2. सिंधु घाटी सभ्यता की खोज कब हुई थी ?
उत्तर-1921 ई०।

प्रश्न 3. सिंधु घाटी के लोग किस देवी की सबसे अधिक पूजा करते थे ?
उत्तर-मातृदेवी की।

प्रश्न 4. मातृदेवी को किसका प्रतीक समझा जाता था ?
अथवा
सिंधु घाटी के लोग मातृ देवी को किस चीज़ का प्रतीक मानते थे ?
उत्तर-मातृदेवी को शक्ति का प्रतीक समझा जाता था।

प्रश्न 5. सिंधु घाटी के लोग किस देवता की सर्वाधिक उपासना करते थे ?
उत्तर-शिव देवता की।

प्रश्न 6. सिंधु घाटी के लोग कौन-से देवी एवं देवता की ज्यादा पूजा करते थे ?
उत्तर-सिंधु घाटी के लोग मातृदेवी एवं शिव जी की ज्यादा पूजा करते थे।

प्रश्न 7. सिंधु घाटी सभ्यता की शिव जी की योगी के रूप में मिली मूर्ति के कितने मुख हैं ?
उत्तर-तीन।

प्रश्न 8. सिंधु घाटी के लोगों द्वारा पूजा किए जाने वाले जानवरों के नाम बताएँ।
अथवा
सिंधु घाटी के लोग किन जानवरों की अधिक पूजा करते थे ?
उत्तर-सिंधु घाटी के लोगों द्वारा पूजा किए जाने वाले जानवरों के नाम शेर, हाथी, बैल एवं गैंडा थे।

प्रश्न 9. सिंधु घाटी के लोग सर्वाधिक किस जानवर की उपासना करते थे ?
उत्तर-बैल की।

प्रश्न 10. सिंधु घाटी के लोग वक्षों की उपासना क्यों करते थे ?
उत्तर-क्योंकि वे उन्हें देवी-देवताओं का निवास स्थान समझते थे।

प्रश्न 11. सिंधु घाटी के लोग किस वृक्ष को सर्वाधिक पवित्र समझते थे ?
उत्तर-पीपल के वृक्ष को।

प्रश्न 12. सिंधु घाटी के लोग कौन-से दो मुख्य वक्षों की पूजा करते थे ?
अथवा
सिंधु घाटी के लोग कौन-से दो वृक्षों की पूजा करते थे ?
उत्तर-पीपल एवं नीम।

प्रश्न 13. सिंधु घाटी के लोग किस पक्षी को पवित्र मान कर पूजते थे ?
उत्तर-सिंधु घाटी के लोग घुग्घी को पवित्र मान कर पूजते थे।

प्रश्न 14. सिंधु घाटी के लोग किस चिन्ह को बहुत पवित्र मानते थे ?
उत्तर-सिंधु घाटी के लोग स्वास्तिक चिन्ह को बहुत पवित्र मानते थे।

प्रश्न 15. सिंधु घाटी के लोग कितने ऋषियों की उपासना करते थे ?
उत्तर-सप्तऋषि की।

प्रश्न 16. सप्तऋषियों में से किन्हीं दो ऋषियों के नाम लिखें।
उत्तर-

  1. विशिष्ठ
  2. विश्वामित्र।

प्रश्न 17. सिंधु घाटी के लोग जल की उपासना क्यों करते थे ?
उत्तर-सिंधु घाटी के लोग जल को सफाई एवं शुद्धता का प्रतीक समझते थे।

प्रश्न 18. विशाल स्नानागार हमें कहाँ से प्राप्त हुआ है ?
उत्तर-मोहनजोदड़ो से।

प्रश्न 19. सिंधु घाटी के लोग अपने मृतकों का संस्कार कैसे करते थे ?
उत्तर-सिंधु घाटी के लोग अपने मृतकों का संस्कार उन्हें दफना कर करते थे।

प्रश्न 20. हडप्पा से हमें कितनी कबें मिली हैं?
उत्तर-57.

प्रश्न 21. सिंधु घाटी के किस केंद्र से हमें सती प्रथा के प्रचलन के संकेत मिले हैं ?
उत्तर-लोथल।

प्रश्न 22. किस बात से यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु घाटी के लोग मृत्यु के उपरांत जीवन में विश्वास रखते थे ?
उत्तर-वे मुर्दो के साथ खाने-पीने की वस्तुओं को भी दफनाते थे।

प्रश्न 23. प्रारंभिक आर्य किस की उपासना करते थे ?
उत्तर-प्रकृति तथा उसकी शक्तियों की।

प्रश्न 24. वैदिक देवताओं से क्या भाव है ?
उत्तर-वैदिक देवताओं से भाव उन देवताओं से था जो संसार की रचना के पश्चात् अस्तित्व में आए।

प्रश्न 25. प्रारंभिक आर्यों द्वारा पूजे जाने वाले देवताओं की कुल संख्या बताओ।
उत्तर-33.

प्रश्न 26. वैदिक देवताओं को कितनी श्रेणियों में बाँटा गया है?
उत्तर-तीन।

प्रश्न 27. वैदिक देवता कौन थे ?
अथवा
प्रारंभिक आर्यों के मुख्य देवता कौन-कौन है, उन पाँचों के नाम बताएँ ।
अथवा
प्रारंभिक आर्यों के मुख्य देवता कौन थे ?
उत्तर-वैदिक देवता वरुण, इंद्र, अग्नि, सूर्य एवं रुद्र थे।

प्रश्न 28. प्रारंभिक आर्यों के दो प्रमुख देवता कौन थे ?
उत्तर-प्रारंभिक आर्यों के दो प्रमुख देवता वरुण एवं इंद्र थे।

प्रश्न 29. वरुण कौन था ?
उत्तर-वरुण प्रारंभिक आर्यों का सबसे प्रमुख देवता था।

प्रश्न 30. लोगों का वर्षा का देवता कौन है ?
उत्तर-आर्य लोगों का वर्षा का देवता इंद्र है।

प्रश्न 31. प्रारंभिक आर्यों के वर्षा देवता और अग्नि देवता कौन थे ?
उत्तर-प्रारंभिक आर्यों का वर्षा देवता इंद्र और अग्नि देवता को अग्नि देवता कहते थे।

प्रश्न 32. वरुण देवता का कोई एक कार्य बताएँ।
उत्तर-वह पापियों को सज़ा देता था।

प्रश्न 33. इंद्र कौन था ?
उत्तर-इंद्र वैदिक आर्यों का युद्ध एवं वर्षा का देवता था।

प्रश्न 34. ऋग्वेद में इंद्र की प्रशंसा में कितने मंत्र दिए गए थे ?
उत्तर-250.

प्रश्न 35. अग्नि देवता से क्या भाव है ?
उत्तर-अग्नि देवता का संबंध विवाह तथा दाह संस्कारों से था।

प्रश्न 36. आर्य लोग किस देवता को घरों का स्वामी मानते थे ?
उत्तर-आर्य लोग अग्नि देवता को घरों का स्वामी मानते थे।

प्रश्न 37. ऋग्वेद में अग्नि देवता की प्रशंसा में कितने मंत्र दिए गए हैं ?
उत्तर-200.

प्रश्न 38. प्रारंभिक आर्य सूर्य को किसका पुत्र मानते थे ?
उत्तर-प्रारंभिक आर्य सूर्य को आदिती तथा दियोस का पुत्र मानते थे।

प्रश्न 39. रुद्र कौन था ?
उत्तर-वह प्रारंभिक आर्यों का तूफ़ान का देवता था।

प्रश्न 40. प्रारंभिक आर्यों की दो प्रमुख देवियों के नाम बताएँ।
उत्तर-ऊषा तथा पृथ्वी।

प्रश्न 41. प्रारंभिक आर्य लोग ऊषा को किसकी देवी मानते थे ?
उत्तर-प्रारंभिक आर्य लोग ऊषा को सुबह की देवी मानते थे।

प्रश्न 42. वैदिक देवताओं से किस प्रकार के वरदान की आशा की जाती थी ?
उत्तर-सफलता, धन की प्राप्ति, संतान में बढ़ौत्तरी तथा लंबे जीवन के वरदान की।

प्रश्न 43. प्रारंभिक आर्य काल में क्या मानव बलि प्रचलित थी ?
उत्तर-नहीं।

प्रश्न 44. प्रारंभिक आर्य लोग देवताओं को प्रसन्न करने के लिए क्या करते थे ?
उत्तर-यज्ञ।

प्रश्न 45. प्रारंभिक आर्य काल में यज्ञों के समय जिन जानवरों की बलि दी जाती थी, उनमें से किन्हीं दो के नाम बताएँ।
उत्तर-

  1. घोड़े
  2. बकरियाँ ।

प्रश्न 46. यज्ञों के समय मंत्र उच्चारण करने वाले पुरोहित क्या कहलाते थे ?
उत्तर-उदगात्री।

प्रश्न 47. यज्ञों के समय आहूति देने वाले पुरोहित क्या कहलाते थे?
उत्तर-होतरी।

प्रश्न 48. प्रारंभिक आर्य अपने मृतकों का संस्कार कैसे करते थे ?
उत्तर-प्रारंभिक आर्य अपने मृतकों का दाह-संस्कार करते थे।

प्रश्न 49. रित से क्या भाव है ?
उत्तर-रित से भाव उस व्यवस्था से है जिसके अनुसार संसार का प्रबंध चलता है।

प्रश्न 50. धर्मन से क्या भाव है ?
उत्तर-धर्मन से भाव उन कानूनों से है जो देवताओं द्वारा बनाए जाते थे।

नोट-रिक्त स्थानों की पूर्ति करें—

प्रश्न 1. सिंधु घाटी के लोग सर्वाधिक ……… की पूजा करते थे।
उत्तर-देवी माँ

प्रश्न 2. सिंधु घाटी के लोग ………….. नामक देवता की पूजा करते थे।
उत्तर-शिव

प्रश्न 3. सिंधु घाटी के लोग ………….. वृक्ष की सर्वाधिक पूजा करते थे।
उत्तर-पीपल

प्रश्न 4. सिंधु घाटी के लोग सप्त ऋषि को …………… का प्रतीक मानते थे।
उत्तर-स्वर्ग

प्रश्न 5. सिंधु घाटी के लोग जल को ………… का प्रतीक मानते थे।
उत्तर-शुद्धता

प्रश्न 6. सिंधु घाटी के लोग मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास ………… थे।
उत्तर-रखते

प्रश्न 7. प्रारंभिक आर्यों के देवताओं की कुल गिनती ………… थी।
उत्तर-33

प्रश्न 8. प्रारंभिक आर्यों का सबसे बड़ा देवता ……….. था।
उत्तर-वरुण

प्रश्न 9. ऋग्वेद में इंद्र देवता की प्रशंसा में ………. मंत्र दिए गए हैं।
उत्तर-250

प्रश्न 10. ……….. देवता का संबंध विवाह और दाह संस्कार के साथ था।
उत्तर-अग्नि

प्रश्न 11. रुद्र को ………….. का देवता समझा जाता था।
उत्तर-आँधी

प्रश्न 12. प्रारंभिक आर्य नदी देवी को ………… कहते थे।
उत्तर-सरस्वती

प्रश्न 13. उस व्यवस्था को जिसके अनुसार संसार का प्रबंध चलता था ………… कहा जाता था।
उत्तर-रित

प्रश्न 14. धर्मन शब्द से भाव ………….. है।
उत्तर-कानून

प्रश्न 15. प्रारंभिक आर्य अपने देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए ………. करते थे।
उत्तर-यज्ञ

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा ग़लत चुनें—

प्रश्न 1. सिंधु घाटी के लोग देवी माँ को कोई विशेष महत्त्व नहीं देते थे।
उत्तर- ग़लत

प्रश्न 2. सिंधु घाटी के लोग शिव देवता की पूजा करते थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 3. सिंधु घाटी के लोग मगरमच्छ की पूजा करते थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 4. सिंधु घाटी के लोग पीपल वृक्ष को पवित्र नहीं समझते थे।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 5. सिंधु घाटी के लोग सप्त ऋषियों की पूजा करते थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 6. सिंधु घाटी के लोगों का यज्ञ पूजा में गहरा विश्वास था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 7. सिंधु घाटी के लोगों का जादू-टोनों और भूत-प्रेतों में बिल्कुल विश्वास नहीं था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 8. सिंधु घाटी के लोग सामान्यतः अपने मुर्दो को दफना देते थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 9. आरंभिक आर्यों के देवताओं की कुल संख्या 33 करोड़ थी।
उत्तर- ग़लत

प्रश्न 10. प्रारंभिक आर्यों के सबसे बड़े देवता का नाम इंद्र था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 11. ऋग्वेद में अग्नि देवता की प्रशंसा में 200 मंत्र दिए गए हैं।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 12. प्रारंभिक आर्य सुबह की देवी ऊषा में विश्वास रखते थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 13. प्रारंभिक आर्यों का ईश्वर की एकता में पूर्ण विश्वास था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 14. प्रारंभिक आर्य अपने देवी-देवताओं की याद में मंदिरों का निर्माण करते थे।
उत्तर- ग़लत

प्रश्न 15. प्रारंभिक आर्य अपने देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार के यज्ञ करते थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 16. प्रारंभिक आर्य अपने पितरों की पूजा करते थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 17. वैदिक साहित्य में स्वस्विक किसी देवते का नाम है।
उत्तर-ग़लत

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर चुनें—

प्रश्न 1. सिंधु घाटी के लोग सर्वाधिक किसकी पूजा करते थे ?
(i) शिव की
(ii) देवी माँ की
(iii) वृक्षों की
(iv) साँपों की।
उत्तर-(i)

प्रश्न 2. सिंधु घाटी के लोग किस देवता की पूजा करते थे ?
(i) वरुण की
(ii) इंद्र की
(iii) शिव की
(iv) अग्नि की।
उत्तर-(iii)

प्रश्न 3. सिंधु घाटी के लोग निम्नलिखित में से किस पशु की पूजा नहीं करते थे ?
(i) हाथी
(ii) शेर
(iii) बैल
(iv) घोड़ा।
उत्तर-(iv)

प्रश्न 4. सिंधु घाटी के लोग निम्नलिखित में से किस वृक्ष को सर्वाधिक पवित्र मानते थे ?
(i) पीपल
(ii) आम
(iii) नीम
(iv) खजूर।
उत्तर-(i)

प्रश्न 5. निम्नलिखित में से कौन सप्तऋषियों में शामिल नहीं थे ?
(i) विश्वामित्र
(ii) विशिष्ठ
(iii) जमदागनी
(iv) इंद्र।
उत्तर-(iv)

प्रश्न 6. निम्नलिखित में से कौन-सा तथ्य ग़लत है
(i) सिंधु घाटी के लोग स्वास्तिक की पूजा करते थे।
(ii) सिंधु घाटी के लोग लिंग तथा योनि की पूजा करते थे।
(iii) सिंधु घाटी के लोग जादू-टोनों में विश्वास रखते थे।
(iv) सिंधु घाटी के लोग पितरों की पूजा करते थे।
उत्तर-(iv)

प्रश्न 7. सिंधु घाटी के लोग निम्नलिखित में से किसकी पूजा करते थे ?
(i) घुग्गी
(ii) बाज
(iii) कबूतर
(iv) तोता।
उत्तर-(i)

प्रश्न 8. प्रारंभिक आर्य कुल कितने देवताओं की पूजा करते थे ?
(i) 11
(ii) 22
(iii) 33
(iv) 44
उत्तर-(iii)

प्रश्न 9. प्रारंभिक आर्यों का सबसे प्रारंभिक देवता कौन था ?
(i) इंद्र
(ii) वरुण
(iii) अग्नि
(iv) रुद्र।
उत्तर-(ii)

प्रश्न 10. निम्नलिखित में से किस देवता की प्रशंसा में ऋग्वेद में सर्वाधिक मंत्र दिए गए हैं ?
(i) वरुण
(ii) इंद्र
(iii) अग्नि
(iv) रुद्र।
उत्तर-(i)

प्रश्न 11. निम्नलिखित में से कौन-सा देवता वर्षा और युद्ध का देवता माना जाता था ?
(i) सोम
(ii) रुद्र
(iii) सूर्य
(iv) इंद्र।
उत्तर-(iv)

प्रश्न 12. निम्नलिखित में से कौन-सा देवता विवाह और दाह-संस्कार के साथ संबंधित था ?
(i) अग्नि
(ii) सोम
(iii) वरुण
(iv) विष्णु।
उत्तर-(i)

प्रश्न 13. प्रारंभिक आर्यों का निम्नलिखित में से कौन-सा देवता आकाश का देवता नहीं था ?
(i) वरुण
(ii) सूर्य
(iii) इंद्र
(iv) मित्र।
उत्तर-(iii)

प्रश्न 14. निम्नलिखित में से किस देवी को सुबह की देवी कहा जाता था ?
(i) उमा
(ii) ऊषा
(iii) रात्रि
(iv) सरस्वती।
उत्तर-(ii)