Class 11 History Solutions Chapter 1 सिन्धु घाटी की सभ्यता

अध्याय का विस्तृत अध्ययन

(विषय-सामग्री की पूर्ण जानकारी के लिए)

प्रश्न 1. नगर योजना, तकनीकी विज्ञान, कृषि तथा व्यापार के बारे में प्राप्त जानकारी के आधार पर सिन्धु घाटी के लोगों के जीवन के बारे में बताएं।
उत्तर-सिन्धु घाटी की सभ्यता से हमारा अभिप्राय उस प्राचीन सभ्यता से है जो सिन्धु नदी की घाटी में फली-फूली। इस सभ्यता के लोगों ने नगर योजना, तकनीकी विज्ञान, कृषि तथा व्यापार के क्षेत्र में पर्याप्त प्रतिभा का परिचय दिया।
श्री के० एम० पानिक्कर के शब्दों में-“सैंधव लोगों ने उच्चकोटि की सभ्यता का विकास कर लिया था।” (“A very high state of civilization had been reached by the people of the Indus.”’) इस सभ्यता के विभिन्न पहलुओं का वर्णन इस प्रकार है :-

I. नगर योजना

1. नगर के दो भाग-मोहनजोदड़ो और हड़प्पा का घेरा चार-पांच किलोमीटर था। ये नगर मुख्यत: दो भागों में बंटे हुए थे-गढ़ी और नगर।

(क) गढ़ी-हड़प्पा की गढ़ी का आकार समानान्तर चतुर्भुज जैसा था। इसकी लम्बाई 410 मीटर और चौड़ाई 195 मीटर थी। इस सभ्यता की अन्य गढ़ियों की तरह इसकी लम्बाई उत्तर से दक्षिण की ओर थी और चौड़ाई पूरब से पश्चिम की ओर। गढ़ी का निर्माण मुख्य रूप से प्रशासकीय एवं धार्मिक कार्यों के लिए किया जाता था। आवश्यकता पड़ने पर इसे सुरक्षा के लिए भी प्रयोग किया जाता था।
(ख) नगर या कस्बा-गढ़ी के नीचे कस्बे की भी चारदीवारी होती थी। कस्बे की योजना भी उत्तम थी। उसकी मुख्य सड़कें काफ़ी चौड़ी थीं। सड़कों की दिशा उत्तर से दक्षिण एवं पूरब से पश्चिम की ओर थी और यह नगर को आयताकार टुकड़ों में बांटती थीं।

2. विशाल भवन-मोहनजोदड़ो की गढ़ी में विशाल अन्न भण्डार था। हड़प्पा में यह भण्डार गढ़ी से बाहर था। इसके अतिरिक्त मोहनजोदड़ो की गढ़ी में एक सरोवर भी मिला है जो 39 फुट लम्बा, 23 फुट चौड़ा और 8 फुट गहरा था। यह उस समय का विशाल स्नानकुंड (Great Bath) था। विशाल स्नानकुंड में पानी निकट स्थित कुएं में से डाला जाता था। स्नानकुंड का फर्श पक्की ईंटों का बना हुआ था। इसमें जाने के लिए ईंटों की सीढ़ियां थीं। ऐसा अनुमान है कि इसका प्रयोग किसी महत्त्वपूर्ण धार्मिक रीति के लिए होता था।

3. निवास स्थान-मकानों के लिए पक्की ईंटों का उपयोग होता था। बड़े मकानों में रसोई, शौचघर एवं कुएं के अतिरिक्त बीस-बीस कमरे थे। परन्तु साधारण मकानों में लगभग आधा दर्जन कमरे थे। कुछ मकानों में केवल एक या दो कमरे भी थे। प्रत्येक मकान में वायु और प्रकाश के लिए दरवाजे और खिड़कियां थीं। स्नान एवं शौचालय के पानी के निकास के लिए ढकी हुई नालियों की उत्तम व्यवस्था थी।

II. तकनीकी विज्ञान

हडप्पा संस्कृति के लोगों के तकनीकी विज्ञान में काफ़ी सीमा तक एकरूपता पाई जाती है। सभी नगरों में लगभग एकसी बनावट के तांबे और कांसे के औज़ार प्रयोग में लाए जाते थे। ये औज़ार नमूने एवं बनावट में सादे थे। नगरों में कुशल शिल्पी तांबे और कांसे के कटोरे, प्याले, थालियां, मनुष्य एवं पशुओं की मूर्तियां और छोटी खिलौना बैल-गाड़ियां बनाते थे। मोहरें बनाने की कला भी अत्यन्त विकसित थी। मनके बनाने का काम भी कम उत्कृष्ट न था, विशेषकर लम्बे इन्द्रगोप (cornelian) के मनके। सिन्धु घाटी के लोगों की बढ़इगिरी में प्रवीणता की जानकारी उनके द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली आरी से मिलती है। इस आरी के दांते ऊंचे-नीचे हैं ताकि लकड़ी का बुरादा आसानी से निकल सके। सच तो यह है कि तकनीकी विज्ञान में हड़प्पा के लोग मिस्र और बेबीलोन वालों से कहीं आगे थे। इतने बड़े इलाके में फैली हुई तकनीकी समरूपता के कारण यह सभ्यता प्राचीन काल में संसार भर में अद्वितीय थी।।

सिन्धु घाटी के लोग शस्त्र निर्माण में भी निपुण थे। उनके मुख्य शस्त्र छोटी तलवार, भाला, तीर का सिरा, कुल्हाड़ी और चाकू थे। ये अधिकतर तांबे और कांसे के बने हुए थे। धातु के हथियारों के अतिरिक्त शत्रु पर वार करने के लिए पत्थर के गदा और आग में पकाई गई गोलियों का प्रयोग किया जाता था। दूर से वार करने के लिए गुलेल प्रयोग में लाई जाती थी।

III. कृषि तथा व्यापार

1. कृषि-सिन्धु नदी का क्षेत्र उपजाऊ था। अत: यहां के लोगों ने कृषि की ओर विशेष ध्यान दिया। वे मुख्यतः गेहूँ और जौ की कृषि करते थे जो उनके मुख्य खाद्यान्न थे। खाने वाली अन्य वस्तुएं दाल और खजूर थीं। तिल और सरसों का तेल भी प्रयोग में आता था। भेड़, बकरियां और मवेशी प्रमुख पालतू पशु थे। इस सभ्यता के लोगों की अति महत्त्वपूर्ण उपज कपास थी जिससे कपड़ा बनाया जाता था। इस समय दुनिया के और किसी भाग में न तो कपास का उत्पादन होता था और न ही कपड़ा बनता था। सिन्धु घाटी की सभ्यता में नहरों द्वारा सिंचाई नहीं होती थी। गहरी खुदाई करने वाले हल से वे अपरिचित
थे। बाढ़ के जल से सिंचाई के लिए बांध बनाए जाते थे। हैरो जैसे यन्त्र का प्रयोग फसल बोने के लिए होता था।

2. व्यापार-सिन्धु घाटी के लोग अनेक वस्तुओं का व्यापार करते थे। व्यापार में कच्चा माल भी शामिल था और तैयार माल भी। व्यापार के लिए भार-वाहक जानवरों, पशु-गाड़ियों तथा छोटी-छोटी नौकाओं का प्रयोग किया जाता था। सिन्धु घाटी से निर्यात होने वाली वस्तुओं में सूती कपड़ा, मोती, हाथी दांत तथा हाथी दांत से बनी वस्तुओं प्रमुख थीं। लंगूर, बन्दर, मोर आदि जीव-जन्तु भी बाहर भेजे जाते थे। लोथल कस्बे से जोकि एक प्रमुख बन्दरगाह थी, मोतियों का निर्यात होता था। सिन्धु घाटी के लोगों के आयात में अनेक बहुमूल्य पदार्थ शामिल थे। वे राजस्थान, मैसूर तथा दक्षिणी भारत से सोना, चाँदी और संगमरमर मंगवाते थे। सोना तथा चाँदी अफ़गानिस्तान से भी मंगवाया जाता था। यहां से तांबा भी आता था। मध्य एशिया से हीरे, फिरोज़े आदि का आयात किया जाता था।
उपर्युक्त बातों से स्पष्ट है कि सिन्धु घाटी की नगर योजना सिन्धु घाटी के लोगों के उच्च जीवन-स्तर की प्रतीक है। उसका तकनीकी ज्ञान मैसोपोटामिया तथा अन्य समकालीन सभ्यताओं से किसी प्रकार कम नहीं था। निःसन्देह सिन्धु घाटी के लोगों ने कृषि तथा व्यापार में भी पर्याप्त उन्नति की थी। संक्षेप में, हम जॉन मार्शल के इन शब्दों से सहमत हैं, “लोग सैधव (अच्छे बने) नगरों में निवास करते थे। उनकी संस्कृति परिपक्व थी जिसमें कला तथा कारीगरी अपने उत्कर्ष पर थी।” (“People lived in well-built cities and had a mature culture with a high standard of art and craftsmanship.”)

प्रश्न 2. सिन्धु घाटी की सभ्यता के धर्म, कला, मुहरों तथा लिपि की विशेषताओं पर लेख लिखें।
उत्तर-सिन्धु घाटी की सभ्यता प्राचीन काल में सिन्धु नदी की घाटी में फली-फूली। इस सभ्यता के लोगों ने जीवन के अन्य क्षेत्रों में विकास के साथ-साथ धर्म, कला, मुहरों तथा लिपि से सम्बद्ध नवीनता का परिचय दिया। इन नवीन तथ्यों का विस्तृत विवरण इस प्रकार है

I. धर्म

सिन्धु घाटी की सभ्यता के धर्म की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं :
1. प्रमुख देवता-सिन्धु घाटी के देवी-देवताओं का पता हमें उनकी मुहरों से लगता है। खुदाई से मिली कुछ मुहरों पर एक देवता की मूर्ति बनी हुई है जिसके तीन मुख हैं। यह चित्र चार पशुओं के साथ योग मुद्रा में दिखाया गया है। इन पशुओं में एक बैल भी है। प्रायः बैल के साथ शिवजी महाराज का नाम जुड़ा हुआ है। इसलिए सर जॉन मार्शल (Sir John Marshall) का अनुमान है कि यह शिवजी की मूर्ति है और सिन्धु घाटी के लोग शिव पूजा में विश्वास रखते थे। खुदाई में मिली मुहरों पर एक अर्द्ध-नग्न नारी भी अंकित है। उसकी कमर पर भाला और शरीर पर विशेष प्रकार का वस्त्र है। सर जॉन मार्शल ने इसे मातृ देवी कहा है। उनका विचार है कि सिन्धु घाटी के लोग मातृ देवी की पूजा किया करते थे।

2. अन्य धार्मिक विश्वास-खुदाई में लिंग तथा योनि की मूर्तियां भी मिली हैं। सिन्धु घाटी के लोग जनन शक्ति के रूप में इन मूर्तियों की पूजा करते थे। इससे यह भी स्पष्ट है कि उनका मूर्ति पूजा में विश्वास था। खुदाई से मिली कुछ मुहरों पर हाथी, बैल, बाघ आदि के चित्र मिले हैं। इस बात से यह संकेत मिलता है कि उनमें पशु-पक्षियों की पूजा प्रचलित थी। पशुओं के अतिरिक्त सिन्धु घाटी के लोग पीपल आदि वृक्षों तथा अग्नि की पूजा करते थे। उनमें सम्भवतः सांपों तथा नदियों की पूजा भी प्रचलित थी। सिन्धु घाटी के लोग अपने मृतकों का संस्कार तीन प्रकार से करते थे। कुछ लोग मुर्दो को धरती में दबा देते थे, परन्तु कुछ उन्हें जला देते थे। कई लोग मुर्दे को जला कर उनकी राख तथा अस्थियों को किसी पात्र में रखकर उसे धरती में दबा देते थे। पात्र के साथ मृतक व्यक्ति की मन पसन्द वस्तुएं भी रख दी जाती थीं।

II. कला

सिन्धु घाटी की सभ्यता के लोगों द्वारा निर्मित कलाकृतियां काफ़ी उच्च स्तर की थीं। नाचती हुई मुद्रा में खड़ी लड़की की लघु कांस्य प्रतिमा इस बात का स्पष्ट प्रमाण है।
वहां की मूर्तिकला के अनेक नमूने उपलब्ध हुए हैं। इनमें मानव एवं पशु दोनों की आकृतियां मिलती हैं। सिर और कंधों की टूटी हुई दाढ़ी वाले व्यक्ति की एक मूर्ति सिन्धु घाटी की कला का प्रभावशाली नमूना है।
सिन्धु घाटी की कुछ मूर्तियां पालथी मारकर बैठी हुई आकृति की हैं। इसे देव प्रतिमा समझा जाता है। वहां से कुछ पशुओं की मूर्तियां भी मिली हैं। उनमें शक्ति
और वीरता झलकती है। खुदाई में एक संयुक्त पशु-मूर्ति भी मिली है जो किसी प्रकार की दैवी प्रतिमा प्रतीत होती है। एक अन्य प्रतिमा शिव के नटाज रूप का आदि स्वरूप प्रतीत होती है।

Class 11 History Solutions Chapter 1 सिन्धु घाटी की सभ्यता 1

पकी मिट्टी की लघु प्रतिमाएं काफ़ी संख्या में मिली हैं। इनमें पशु और मानवीय प्रतिमाएं दोनों शामिल हैं। बहुत-सी लघु प्रतिमाएं स्त्रियों की हैं। इनमें से कुछ बिस्तर नृत्य मुद्रा में खड़ी लड़की पर बच्चों के साथ या अकेली लेटी हुई दिखाई गई हैं। पशुओं की प्रतिमाओं में काफ़ी सारे पशु हैं। इनमें कूबड़ बैल, भैंसा, कुत्ता, भेड़, गैंडा, बन्दर, समुद्री कछुआ और कुछ मानवीय सिरों वाले पशु शामिल हैं। यहां गाय की कोई प्रतिमा नहीं मिली है। ठोस पहियों वाली पकी मिट्टी की बैलगाड़ियां भी मिली हैं। हड़प्पा से तांबे से बनी एक इक्कानुमा गाड़ी मिली है। मिट्टी के बर्तन प्रायः कुम्हार के चाक पर बनाए हुए हैं। उनके हाथ से बने बर्तन भी मिले हैं। सिन्धु घाटी के मिट्टी के बर्तनों में अधिकतर पर फूल, पत्ती, पक्षी और पशुओं के चित्र बने हुए हैं। अंगूठियों और चूड़ियों के अतिरिक्त वहां सोने, चांदी, तांबे, फेस, चाक पत्थर, कीमती पत्थर और शंख के बने अनेक सुन्दर मनके मिले हैं। इन मनकों को पिरो कर माला बनाई जाती थी।
दाढ़ी वाला आदमी (मोहनजोदड़ो)
Class 11 History Solutions Chapter 1 सिन्धु घाटी की सभ्यता 2

III. मोहरें

मोहरें प्राचीन शिल्पकला को सिन्धु घाटी की विशिष्ट देन समझी जाती हैं। केवल मोहनजोदड़ो से ही 1200 से अधिक मोहरें प्राप्त हुई हैं। ये कृतियां भले ही छोटी हैं फिर भी इन की कला इतनी श्रेष्ठ है कि इनके चित्रों में शक्ति और ओज झलकता है। इनका प्रयोग सामान के गट्ठरों या भरे बर्तनों की सुरक्षा के लिए किया जाता था। ऐसा भी विश्वास किया जाता है कि मोहरों का प्रयोग एक प्रकार का प्रतिरोधक (taboo) लगाने के लिए होता था। इन मोहरों से ऐसा भी प्रतीत होता है कि सिन्धु घाटी के समाज में विभिन्न पदवियों और उपाधियों की व्यवस्था प्रचलित थी। इन मोहरों पर पशुओं तथा मनुष्यों की आकृतियां बनी हुई हैं। पशुओं से सम्बन्धित आकृतियां बड़ी कलात्मक हैं। परन्तु मोहरों पर बनी मानवीय आकृतियां उतनी कलात्मकता से नहीं बनी हुई हैं। मोहरों के अधिकांश नमूने उनकी किसी धार्मिक महत्ता के सूचक हैं। एक आकृति के दाईं तरफ हाथी और चीता हैं, बाईं ओर गैंडा और भैंसा हैं। उनके नीचे दो बारहसिंगे या बकरियां हैं। इन ‘पशुओं के स्वामी’ को शिव का पशुपति रूप समझा जाता है। मोहरों पर पीपल के वृक्ष के बहुत चित्र मिले हैं।

IV. लिपि

सिन्धु घाटी के लोगों ने एक विशेष प्रकार की लिपि का आविष्कार किया जो चित्रमय थी। उनकी यह लिपि खुदाई में मिली मोहरों पर अंकित है। यह लिपि बर्तनों तथा दीवारों पर लिखी हुई पाई गई है। इसमें कुल 270 के लगभग वर्ण हैं। इसे बाईं से दाईं ओर लिखा जाता है। यह लिपि आजकल की तथा अन्य ज्ञात लिपियों से काफ़ी भिन्न है। इसलिए इसे पढ़ना बहुत ही कठिन है। भले ही विद्वानों ने इसे पढ़ने के लिए अथक प्रयत्न किए हैं, तो भी वे अब तक इसे पूरी तरह पढ़ नहीं पाए हैं। आज भी इसे पढ़ने के प्रयत्न जारी हैं। अतः जैसे ही इस लिपि को पढ़ लिया जाएगा, सिन्धु घाटी की सभ्यता के अनेक नए तथ्य प्रकाश में आ जाएंगे।

यदि गहनता से सिन्धु घाटी की सभ्यता का अध्ययन किया जाए तो इतिहास की अनेक गुत्थियां सुलझाई जा सकती हैं। सिन्धु घाटी का धर्म आज के हिन्दू धर्म से मेल खाता है। उनकी कला-कृतियां उत्कृष्टता लिए हुए थीं। उनकी लिपि अभी तक पढ़ी नहीं गई। इसे पढ़े जाने पर सिन्धु घाटी का चित्र अधिक स्पष्ट हो जाएगा।

महत्त्वपूर्ण परीक्षा-शैली प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. उत्तर एक शब्द से एक वाक्य तक

प्रश्न 1. सिन्धु घाटी की सभ्यता की खोज कब हुई ?
उत्तर-सिन्धु घाटी की सभ्यता की खोज 1922 ई० में हुई।

प्रश्न 2. सिन्धु घाटी की सभ्यता के दो प्रमुख केन्द्रों के नाम बताओ।
उत्तर-हड़प्पा और मोहनजोदड़ो सिन्धु घाटी की सभ्यता के दो प्रमुख केन्द्र थे।

प्रश्न 3. सिन्धु घाटी के लोगों के दो देवी-देवताओं के नाम लिखो।
उत्तर-पशुपति शिव तथा मातृदेवी।

प्रश्न 4. मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा आजकल किस देश में हैं ?
उत्तर-मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा आजकल पाकिस्तान में हैं।

प्रश्न 5. मोहनजोदड़ो की खोज किसने की थी ?
उत्तर-आर० डी० बैनर्जी ने।

प्रश्न 6. हड़प्पा की खोज करने वाले व्यक्ति का नाम बताओ।
उत्तर-दयाराम साहनी।

प्रश्न 7. मृतकों का टीला किस स्थान के लिए प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर-मोहनजोदड़ो के लिए।

प्रश्न 8. सिन्धु घाटी का पूजनीय पशु कौन-सा था ?
उत्तर-सिन्धु घाटी का पूजनीय पशु कुबड़ा बैल था।

प्रश्न 9. सिन्धु घाटी के नगर मुख्य रूप से कौन-कौन से दो भागों में बंटे हुए थे ?
उत्तर-दुर्ग और सामान्य नगर।

प्रश्न 10. सिन्धु घाटी के धर्म की वे दो विशेषताएं बताओ जो आज भी हिन्दू धर्म का अंग हैं ।
उत्तर-शिव-पूजा तथा पीपल-पूजा।

2. रिक्त स्थानों की पूर्ति-

(i) ………. भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता है।
(ii) सिन्धु घाटी की सभ्यता लगभग …….. वर्ष पुरानी है।
(iii) ……… की सभ्यता सिंधु घाटी की समकालीन सभ्यता थी।
(iv) सिन्धु घाटी के मकान ……… ईंटों के बने हुए थे।
(v) सिन्धु सभ्यता के स्थलों की खुदाई करने वाले पुरातत्ववेत्ता सर ……….. थे।
उत्तर-
(i) सिन्धु घाटी की सभ्यता
(ii) 5,000
(iii) मैसोपोटामिया
(iv) पकी
(v) जॉन मार्शल।

3. सही/ग़लत कथन सही कथनों के लिए (√) तथा ग़लत कथनों के लिए (×) का निशान लगाएं।

(i) सिन्धु घाटी के लोग लिंग और योनि की मूर्तियों की पूजा करते थे। — (√)
(ii) सिन्धु घाटी के लोग शिलाजीत का प्रयोग मसाले के रूप में करते थे।– (×)
(iii) सिन्धु घाटी का विशाल स्नानागार हड़प्पा में मिला है। — (×)
(iv) सिन्धु घाटी के लोगों की लिपि चित्रमय थी। — (√)
(v) पंजाब में संघोल (‘लुधियाना जिले’) में सिंधु सभ्यता के अवशेष मिले हैं। — (√)

4. बहु-विकल्पीय प्रश्न

(i) सिन्धु सभ्यता में लोथल क्या था ?
(A) एक देवता
(B) एक बन्दरगाह
(C) एक स्नानागार
(D) लेखन कला केंद्र।
उत्तर-(C) एक स्नानागार

(ii) सिन्धु सभ्यता का कौन-सा केन्द्र आज पंजाब में स्थित है ?
(A) मोहनजोदड़ो
(B) धौलावीरा
(C) रोपड़
(D) अमरी।
उत्तर-(C) रोपड़

(iii) हरियाणा में स्थित सिन्धु सभ्यता का स्थल है ?
(A) बनावली
(B) मिताथल
(C) राखीगढ़ी
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-(D) उपरोक्त सभी।

(iv) सिन्धु घाटी की खुदाई में मिली नर्तकी की मूर्ति बनी हुई है ?
(A) कांसे की
(B) पीतल की
(C) सोने की
(D) तांबे की।
उत्तर-(A) कांसे की

(v) सिन्धु घाटी की सभ्यता की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है-
(A) ऊंचे भवन
(B) सुनियोजित जल-निकासी व्यवस्था
(C) पॉलिशदार मकान
(D) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-(B) सुनियोजित जल-निकासी व्यवस्था

॥. अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

विशेष नोट-विद्यार्थी प्रत्येक अध्याय में इन प्रश्नों का अध्ययन अवश्य करें। ये प्रश्न उन्हें विषय-वस्तु को बारीकी से समझने में सहायता करेंगे। साथ ही, ये वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को हल करने में उपयोगी सिद्ध होंगे।

प्रश्न 1. सिन्धु घाटी सभ्यता की खुदाई करवाने वाले चार व्यक्तियों के नाम बताओ।
उत्तर-सिन्धु घाटी सभ्यता की खुदाई करवाने वाले चार व्यक्तियों के नाम थे : आर० डी० बनर्जी, एम० एस० वत्स, दया राम साहनी तथा सर जान मार्शल।

प्रश्न 2. वर्तमान भारत के कौन-से चार राज्य हैं, जिनमें सिन्धु घाटी की सभ्यता के केन्द्र मिले हैं ? (Sure)
उत्तर-वर्तमान भारत के चार राज्य पंजाब (रोपड़). राजस्थान (कालीबंगन), उत्तर प्रदेश (आलमगीरपुर) तथा गुजरात में सिन्धु घाटी सभ्यता के केन्द्र मिले हैं।

प्रश्न 3. सिन्धु घाटी की सभ्यता के कोई चार केन्द्रों के नाम बताओ जो अब पाकिस्तान में हैं।
उत्तर-पाकिस्तान में सिन्धु घाटी सभ्यता के चार केन्द्र चन्हुदड़ो, कोटडीजी, मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा हैं।

प्रश्न 4. हडप्पा संस्कृति का काल बताओ।
उत्तर-हड़प्पा संस्कृति का आरम्भ 2300 ई० पू० से भी पहले हुआ और इस संस्कृति का विकास 1900 ई० पू० तक जारी रहा।

प्रश्न 5. सिन्धु घाटी सभ्यता में किन तीन दों या आकारों की बस्तियां मिली हैं और इनमें से सबसे बड़े केन्द्र कौनसे हैं ?
उत्तर-सिन्धु घाटी की सभ्यता गांव, कस्बे तथा शहर-इन तीन दर्जी अथवा आकारों की बस्तियों में विकसित थी। इनमें सबसे बड़े केन्द्र मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा थे।

प्रश्न 6. हड़प्पा की गढ़ी की लम्बाई तथा चौड़ाई बताओ।
उत्तर-हड़प्पा की गढ़ी की लम्बाई 410 मीटर चौड़ाई 195 मीटर थी।

प्रश्न 7. विशाल स्नान-कुण्ड कहां मिला है तथा इसकी लम्बाई, चौड़ाई व गहराई क्या है ?
उत्तर-विशाल स्नान-कुण्ड मोहनजोदड़ो की गढ़ी में मिला है। यह 39 फुट लम्बा, 23 फुट चौड़ा और 8 फुट गहरा है।

प्रश्न 8. मकानों के भीतरी भाग की कोई चार विशेषताएं बताओ।
उत्तर-सिन्धु घाटी के मकान हवादार तथा पकी ईंटों से बने थे। मकानों में रसोई घर, स्नानागार तथा नालियां भी थीं।

प्रश्न 9. सिन्धु सभ्यता के लोगों के प्रयोग में आने वाले किन्हीं चार हथियारों के नाम लिखो।
उत्तर-सिन्धु घाटी सभ्यता के लोगों के प्रयोग में आने वाले हथियारों में छोटी तलवार, भाला, तीर और चाकू थे।

प्रश्न 10. मोहनजोदड़ो की मुख्य सड़कों की दिशा क्या थी ?
उत्तर-मोहनजोदड़ो की सड़कों की दिशा उत्तर से दक्षिण तथा पूर्व से पश्चिम की ओर थी।

प्रश्न 11. सबसे अधिक प्रयोग की जाने वाली धातु के आधार पर सिन्धु सभ्यता को क्या नाम दिया गया है ?
उत्तर-सिन्धु घाटी में सबसे अधिक कांसे का प्रयोग होता था। इसीलिए इस सभ्यता को कांस्य युग की सभ्यता भी कहा गया है।

प्रश्न 12. किन्हीं चार धातुओं के नाम बताओ जिनसे सिन्धु घाटी की सभ्यता के लोग परिचित थे।
उत्तर-सिन्धु घाटी के लोग सोना, चांदी, तांबा तथा कांसे की धातुओं से परिचित थे।

प्रश्न 13. सिन्धु घाटी की दो मुख्य फसलों तथा खाद्य पदार्थों के नाम लिखो।
उत्तर-सिन्धु घाटी की दो मुख्य फसलें गेहूँ और जौ थीं। वहां के दो खाद्य पदार्थ भी गेहूँ और जौ ही थे।

प्रश्न 14. खाद्य पदार्थों के अतिरिक्त सिन्धु घाटी की सभ्यता की सबसे महत्त्वपूर्ण उपज क्या थी और इसका क्या प्रयोग किया जाता था ?
उत्तर-खाद्य पदार्थों के अतिरिक्त सिन्धु घाटी की सभ्यता की सबसे महत्त्वपूर्ण उपज कपास थी। इससे कपड़ा बनाया जाता था।

प्रश्न 15. सिन्धु घाटी की सभ्यता के लोगों द्वारा मिट्टी के बर्तन बनाने की दो विधियां लिखो।
उत्तर-मिट्टी के बर्तन आमतौर पर कुम्हार के चाक पर बनाए जाते थे। वे हाथ से भी बर्तन बनाते थे।

प्रश्न 16. सिन्धु घाटी की सभ्यता के मिट्टी के बर्तनों पर बने चार प्रकार के नमूनों के नाम लिखो।
उत्तर-इन चार प्रकार के नमूनों में फूल, पत्ती, पक्षी और पशुओं के चित्र सम्मिलित हैं।

प्रश्न 17. सिन्धु घाटी की सभ्यता के लोग माला में कौन-कौन से चार प्रकार के मनके पिरोते थे ?
उत्तर-सिन्धु घाटी के लोग सोने, चांदी, तांबे तथा कांसे के मनकों को माला में पिरोते थे।

प्रश्न 18. सिन्धु घाटी में लोथल कस्बा कौन-से दो काम देता था ?
उत्तर-सिन्धु घाटी में लोथल कस्बा बन्दरगाह और गोदाम का काम देता था।

प्रश्न 19. केवल मोहनजोदड़ो से प्राप्त मोहरों की संख्या बताएं। इन मोहरों का प्रयोग किस लिए किया जाता था ?
उत्तर-मोहनजोदड़ो से 1200 से अधिक मोहरें प्राप्त हुई हैं। इनका प्रयोग सामान के गट्ठरों या भरे बर्तनों की सुरक्षा अथवा उन पर ‘सील’ लगाने के लिए किया जाता था।

प्रश्न 20. सिन्धु घाटी से प्राप्त मोहरों पर कौन-कौन से पशुओं के चित्र अंकित हैं ?
उत्तर-सिन्धु घाटी की मोहरों पर सांड, शेर, हाथी तथा बारहसिंगा के चित्र अंकित हैं।

प्रश्न 21. सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि के प्राप्त वर्णों की संख्या तथा यह किन चार चीजों पर मिलती है ?
उत्तर-सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि के अब तक 270 वर्ण प्राप्त हो चुके हैं। यह लिपि फलकों, मिट्टी के बर्तनों, आलेखों और मोहरों पर लिखी है।

प्रश्न 22. भारत तथा एशिया के चार क्षेत्र बताओ जिनके साथ इस सभ्यता के लोगों के व्यापारिक सम्बन्ध थे।
उत्तर-भारत के दो क्षेत्र थे : राजस्थान तथा मैसूर। एशिया के दो क्षेत्रों में अफगानिस्तान तथा मैसोपोटामिया के नाम लिए जा सकते हैं।

प्रश्न 23. सिन्धु घाटी में नर्तकी की धातु की मूर्ति कहां से मिली है ? यह किस धातु की बनी है ?
उत्तर-नर्तकी की धातु की मूर्ति मोहनजोदड़ो से मिली है। यह कांसे की बनी है।

प्रश्न 24. सिन्धु घाटी से निर्यात की जाने वाली चार वस्तुओं के नाम बताओ।
उत्तर-सिन्धु घाटी से मुख्य रूप से सूती कपड़ा, मोती, हाथी दांत और इससे बनी वस्तुएं निर्यात की जाती थीं।

प्रश्न 25. सिन्धु घाटी के लोगों के धर्म की चार विशेषताएं बताओ जो बाद के समय में भी कायम रहीं।
उत्तर-सिन्धु घाटी के धर्म की स्थायी विशेषताओं में पशुपति शिव तथा मातृदेवी की पूजा सम्मिलित थी। वे लोग वृक्षों तथा पशुओं की भी पूजा करते थे।

III. छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1. हड़प्पा संस्कृति की खोज कब हुई ? इसके विस्तार का वर्णन करते हुए बताओ कि इसे हड़प्पा संस्कृति क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-हड़प्पा संस्कृति की खोज 1921 ई० में हुई। इस संस्कृति का विस्तार बहुत अधिक था। इसमें पंजाब, सिन्ध, राजस्थान, गुजरात तथा बिलोचिस्तान के कुछ भाग और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती भाग सम्मिलित थे। इस प्रकार इसका विस्तार उत्तर में जम्मू से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के मुहाने तक और पश्चिम में बिलोचिस्तान के मकरान समुद्र तट से लेकर उत्तर-पूर्व में मेरठ तक था। उस समय कोई अन्य संस्कृति इतने बड़े क्षेत्र में विकसित नहीं थी। इस संस्कृति को हड़प्पा संस्कृति का नाम इसलिए दिया जाता है, क्योंकि सर्वप्रथम इस सभ्यता से सम्बन्धित जिस स्थान की खोज हुई, वह हड़प्पा था। यह स्थान अब पाकिस्तान में स्थित है।

प्रश्न 2. हड़प्पा संस्कृति के मुख्य केन्द्रों का वर्णन करो।
उत्तर-हड़प्पा संस्कृति का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत था। अब तक इस संस्कृति से सम्बन्धित 1000 से भी अधिक केन्द्रों की खोज हो चुकी है। इनमें से 6 केन्द्र विशेष रूप में उल्लेखनीय हैं। ये हैं-हडप्पा, मोहनजोदडो, चन्दडो, लोथल, कालीबंगां
और बनावली। हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो पाकिस्तान में स्थित हैं और इनमें 483 किलोमीटर की दूरी है। हड़प्पा संस्कृति के कुछ अन्य केन्द्र सुतकांगेडोर और सुरकोतड़ा हैं। ये दोनों ही समुद्रतटीय नगर हैं। गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप में रंगपुर और रोजड़ी में हड़प्पा संस्कृति की उत्तर अवस्था के चिन्ह मिलते हैं।

प्रश्न 3. हड़प्पा संस्कृति के लोगों के सामाजिक जीवन की प्रमुख विशेषताएं लिखिए।
उत्तर- हड़प्पा संस्कृति के लोगों के सामाजिक जीवन की मुख्य विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार है :

  • भोजन-ये लोग गेहूँ, चावल, सब्जियां तथा दूध का प्रयोग करते थे। मांस-मछली तथा अण्डे भी भोजन के अंग थे।
  • वेश-भूषा-हड़प्पा संस्कृति के लोग सूती और ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्र पहनते थे। पुरुष प्रायः धोती और शाल धारण करते थे। स्त्रियां प्राय: रंगदार और बेल-बूटों वाले वस्त्र पहनती थीं। स्त्रियां और पुरुष दोनों ही आभूषण पहनने के शौकीन थे।
  • मनोरंजन के साधन-लोगों के मनोरंजन के मुख्य साधन घरेलू खेल थे। वे प्रायः नृत्य, संगीत और चौपड़ आदि खेल कर अपना मन बहलाया करते थे। बच्चों के खेलने के लिए विभिन्न प्रकार के खिलौने थे।

प्रश्न 4. हडप्पा संस्कृति के लोगों के जीवन-यापन के स्त्रोतों का वर्णन करो।
अथवा सिन्धु घाटी के लोगों के आर्थिक जीवन की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करो।
उत्तर-सिन्धु घाटी के लोगों का आर्थिक जीवन अनेक व्यवसायों पर आधारित था। इन्हीं व्यवसायों द्वारा उनका जीवनयापन होता था। इन व्यवसायों का वर्णन इस प्रकार है-

  • कृषि-सिन्धु घाटी के लोगों का प्रमुख व्यवसाय कृषि था। वे लोग मुख्य रूप से गेहूँ, जौ, चावल और कपास की खेती करते थे। खेती के लिए वे लकड़ी के हल का प्रयोग करते थे। उन्होंने सिंचाई की बड़ी अच्छी व्यवस्था की हुई थी।
  • पशु पालन-सिन्धु घाटी के लोगों का दूसरा मुख्य व्यवसाय पशु पालन था। वे मुख्य रूप से गाय, बैल, हाथी, बकरियां, भेड़, कुत्ते आदि पशु पालते थे।
  • व्यापार-व्यापार सिन्धु घाटी के लोगों का मुख्य व्यवसाय था। नगरों में आपसी व्यापार होता था। अफ़गानिस्तान तथा ईराक के साथ भी उनकी व्यापार चलता था।
  • उद्योग-यहां के कुछ लोग छोटे-छोटे उद्योग-धन्धों में भी लगे हुए थे। मिट्टी, तांबा तथा पीतल के बर्तन बनाने में वहां के कारीगर बड़े कुशल थे। वे सोने-चांदी के सुन्दर आभूषण भी बनाते थे। ..

प्रश्न 5. सिन्धु घाटी की सभ्यता अथवा हड़प्पा संस्कृति के कोई ऐसे तत्त्व बताओ जो आज भी भारतीय जीवन में दिखाई देते हैं।
अथवा
भारतीय सभ्यता को हड़प्पा संस्कृति की क्या देन है ?
उत्तर-सिन्धु घाटी की सभ्यता के निम्नलिखित चार तत्त्व आज भी भारतीय जीवन में देखे जा सकते हैं :

  • नगर योजना-सिन्धु घाटी के नगर एक योजना के अनुसार बसाए गए थे। नगर में चौड़ी-चौड़ी सड़कें और गलियां थीं। यह विशेषता आज के नगरों में देखी जा सकती है।
  • निवास स्थान-सिन्धु घाटी के मकानों में आज की भान्ति खिड़कियां और दरवाज़े थे। हर घर में एक आंगन, स्नान गृह तथा छत पर जाने के लिए सीढ़ियां थीं।
  • आभूषण एवं श्रृंगार-आज की स्त्रियों की भान्ति सिन्धु घाटी की स्त्रियां भी श्रृंगार का चाव रखती थीं। वे सुर्जी तथा पाऊडर का प्रयोग करती थीं और विभिन्न प्रकार के आभूषण पहनती थीं। उन्हें बालियां, कड़े तथा गले का हार पहनने का बहुत शौक था।
  • धार्मिक समानता-सिन्धु घाटी के लोगों का धर्म आज के हिन्दू धर्म से बहुत हद तक मेल खाता है। वे शिव, मात देवी तथा अन्य देवी-देवताओं की पूजा करते थे। आज भी हिन्दू लोगों में उनकी पूजा प्रचलित है।

प्रश्न 6. सिन्धु घाटी की सभ्यता की नगर योजना की विशेषताएं क्या थीं ?
उत्तर-सिन्धु घाटी की नगर योजना उच्च कोटि की थी। इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार से है :-
1. नगर के दो भाग-मोहनजोदड़ो और हड़प्पा का घेरा चार-पांच किलोमीटर था। ये नगर मुख्यतः दो भागों में बंटे हुए थे-गढ़ी और नगर।
(क) गढ़ी- हड़प्पा की गढ़ी का आकार समानान्तर चतुर्भुज जैसा था। इसकी लम्बाई 410 मीटर और चौडाई 195 मीटर थी। गढ़ी का निर्माण मुख्य रूप से प्रशासकीय एवं धार्मिक कार्यों के लिए किया जाता था। आवश्यकता पड़ने पर इसे सुरक्षा के लिए भी प्रयोग किया जा सकता था।

(ख) नगर या कस्बा-गढ़ी के नीचे कस्बे की चारदीवारी होती थी । कस्बे की योजना भी उत्तम थी। उसकी मुख्य सड़कें चौड़ी थीं। सड़कों की दिशा उत्तर से दक्षिण एवं पूरब से पश्चिम की ओर थी और नगर को आयताकार टुकड़ों में बांटती थीं।

2. विशाल भवन-मोहनजोदड़ो की गढ़ी में विशाल अन्न भण्डार था। हड़प्पा में यह भण्डार गढ़ी से बाहर था। इसके अतिरिक्त मोहनजोदड़ो की गढ़ी में एक सरोवर भी मिला है जो 39 फुट लम्बा, 23 फुट चौड़ा और 8 फुट गहरा था। यह उस समय का विशाल स्नानकुंड (Great Bath) था। इसका प्रयोग संभवतः किसी महत्त्वपूर्ण धार्मिक रीति के लिए होता था।

3. निवास स्थान-मकानों के लिए पकी ईंटों का उपयोग होता था। बड़े मकानों में रसोई, शौचघर एवं कुएं के अतिरिक्त बीस-बीस कमरे थे। परन्तु कुछ मकानों में केवल एक या दो कमरे भी थे। प्रत्येक में वायु और प्रकाश के लिए दरवाज़े और खिड़कियां थीं। गंदे पानी के निकास के लिए ढकी हुई नालियों की व्यवस्था थी।।

प्रश्न 7. सिन्धु घाटी की सभ्यता का तकनीकी विज्ञान किस प्रकार का था ?
उत्तर-सिन्धु घाटी के लोगों के तकनीकी विज्ञान (तकनॉलोजी) में काफ़ी समरूपता थी। सभी नगरों में तांबे और कांसे के लगभग एक-जैसी बनावट वाले औजार प्रयोग में लाए जाते थे। औज़ार देखने में सादे और काम करने में अच्छे थे। नगरों में कुशल शिल्पी तांबे और कांसे के कटोरे, प्याले, थालियां, मनुष्य एवं पशुओं की मूर्तियों और छोटी खिलौना बैलगाड़ियां बनाते थे। बर्तन बनाने के लिए कुम्हार के चाक का प्रयोग किया जाता था। मुहरें बनाना अत्यन्त विकसित कला थी। मनके बनाने का काम भी कम उत्कृष्ट न था। सिन्धु घाटी सभ्यता के लोगों की बढ़इगिरी में प्रवीणता का पता उनके द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली आरी से चलता है। इस आरी के दांते ऊंचे-नीचे हैं ताकि लकड़ी का बुरादा आसानी से निकल सके। हड़प्पा संस्कृति के लोग नावें तथा अस्त्र-शस्त्र बनाना भी जानते थे। सच तो यह है कि सिन्धु घाटी के निवासी तकनीकी विज्ञान में मिस्र और बेबीलोन वालों से भी आगे थे।

प्रश्न 8. सिन्धु घाटी की सभ्यता के धर्म की विशेषताएं क्या थीं ?
उत्तर-खुदाई में एक मोहर मिली है जिस पर एक देवता की मूर्ति बनी हुई है। देवता के चारों ओर कुछ पशु दिखाए गए हैं। इनमें से एक बैल भी है। सर जॉन मार्शल का कहना है कि यह पशुपति महादेव की मूर्ति है और लोग इसकी पूजा करते थे। खुदाई में मिली एक अन्य मोहर पर एक नारी की मूर्ति बनी हुई है। इसने विशेष प्रकार के वस्त्र पहने हुए हैं। विद्वानों का मत है कि यह धरती माता (मातृ देवी) की मूर्ति है और हड़प्पा संस्कृति के लोगों में इसकी पूजा प्रचलित थी। लोग पशुपक्षियों, वृक्षों तथा लिंग की पूजा में भी विश्वास रखते थे। वे जिन पशुओं की पूजा करते थे, उनमें से कूबड़ वाला बैल, सांप तथा बकरा प्रमुख थे। उनका मुख्य पूजनीय वृक्ष पीपल था। खुदाई में कुछ तावीज़ इस बात का प्रमाण हैं कि सिन्धु घाटी के लोग अन्धविश्वासी थे और जादू-टोनों में विश्वास रखते थे।

प्रश्न 9. सिन्धु घाटी की सभ्यता की कला की क्या विशेषताएँ थीं ?
उत्तर-सिन्धु घाटी सभ्यता के लोगों द्वारा बनी कलाकृतियां उच्चकोटि की थीं। खुदाई में एक लघु कांस्य प्रतिमा मिली है जो नृत्य की मुद्रा में है। इस मूर्ति से उन लोगों की मूर्तिकला में निपुणता का पता चलता है। यहां मूर्तियों के कई नमूने उपलब्ध हुए हैं। इनमें मानव एवं पशु दोनों की आकृतियां मिलती हैं। सिर और कंधों की टूटी हुई दाढ़ी वाले व्यक्ति की एक मूर्ति सिन्धु घाटी की कला का प्रभावशाली नमूना है। यहां की कुछ मूर्तियां पालथी मारकर बैठी हुई आकृति की हैं, जिसको कोई देव प्रतिमा समझा जाता है। यहां से प्राप्त पकी मिट्टी की लघु प्रतिमाओं की संख्या बहुत अधिक है। पशुओं की प्रतिमाओं में कूबड़ वाला बैल, भैंसा, कुत्ता, भेड़, हाथी, गैंडा, बन्दर, समुद्री कछुआ और कुछ मानवीय सिरों वाले-पशु देखे जा सकते हैं। मिट्टी के बर्तन आमतौर पर कुम्हार के चाक पर बनाए हुए हैं। हाथ से बने बर्तन भी मिले हैं। इन बर्तनों में अधिकांश पर फूलपत्ती, पक्षी और पशुओं के चित्र बने हुए हैं। अंगूठियों और चूड़ियों के अतिरिक्त यहां सोने, चांदी, तांबे, फैंस, चाक पत्थर, कीमती पत्थर और शंख बने अनेक सुन्दर मनके हैं। इन मनकों को पिरो कर माला बनाई जाती थी।

प्रश्न 10. सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि के बारे में अब तक क्या पता चल सका है ? ।
उत्तर-सिन्धु घाटी के लोगों ने एक विशेष प्रकार की लिपि का आविष्कार किया जो चित्रमय थी। यह लिपि खुदाई में मिली मोहरों पर अंकित है। यह लिपि बर्तनों तथा दीवारों पर लिखी हुई भी पाई गई है। इनमें 270 के लगभग वर्ण हैं। इसे बाईं से दाईं ओर लिखा जाता है। यह लिपि आजकल की तथा अन्य ज्ञात लिपियों से काफ़ी भिन्न है, इसलिए इसे पढ़ना बहुत ही कठिन है। भले ही विद्वानों ने इसे पढ़ने के लिए अथक प्रयत्न किए हैं तो भी वे अब तक इसे पूरी तरह पढ़ नहीं पाए हैं। आज भी इसे पढ़ने के प्रयत्न जारी हैं। अत: जैसे ही इस लिपि को पढ़ लिया जाएगा, सिन्धु घाटी की सभ्यता के अनेक नए तत्त्व प्रकाश में आएंगे।

प्रश्न 11. मोहनजोदड़ो से किस प्रकार की मोहरें मिली हैं ?
उत्तर-सिन्धु घाटी से मिली मोहरें उनकी उन्नत शिल्पकला की परिचायक हैं। केवल मोहनजोदड़ो से ही 1200 से अधिक मोहरें प्राप्त हुई हैं। इनकी निर्माण कला इतनी श्रेष्ठ है कि छोटा आकार होते हुए भी इनके चित्रों में से शक्ति और ओज झलकता है। इन मोहरों का प्रयोग सामान के गट्ठरों या भरे बर्तनों की सुरक्षा अथवा उन पर ‘सील’ लगाने के लिए किया जाता है। इन पर कई प्रकार से पशु तथा मानवीय एवं अर्द्ध-मानवीय आकृतियां बनी हुई हैं। पशु आकृतियों में छोटे सींगों वाला सांड, शेर, · हाथी, बारहसिंगा, खरगोश, गरुड़ आदि प्रमुख हैं। मोहरों के अधिकांश नमूने लोगों की धार्मिक महत्ता के सूचक हैं। एक आकृति के दाईं तरफ हाथी और चीता है, बाईं ओर गैंडा और भैंसा है। उनके नीचे दो बारहसिंगा या बकरियां हैं। इस पशु स्वामी को शिव का पशुपति रूप माना जाता है।

प्रश्न 12. इस (सिन्धु घाटी की) सभ्यता के पतन के कारण बताओ।
उत्तर- सिन्धु घाटी की सभ्यता के पतन के अनेक कारण बताए जाते हैं :-

  • बाढ़-कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि यह सभ्यता सिन्धु नदी में बाढ़ें आने के कारण लुप्त हुई।
  • बाहरी आक्रमण-कुछ विद्वानों के अनुसार आर्यों तथा अन्य विदेशी जातियों ने यहां के लोगों पर अनेक आक्रमण किए। इन युद्धों में यहां के निवासी हार गए. और इस सभ्यता का अन्त हो गया।
  • वर्षा की कमी-कुछ विद्वानों का कहना है कि इस सभ्यता का अन्त वर्षा की कमी के कारण हुआ। उनका अनुमान है कि इस प्रदेश में काफ़ी लम्बे समय तक वर्षा न होने के कारण भयंकर अकाल पड़ा और इस सभ्यता का अन्त हो गया।
  • भूकम्प-कुछ इतिहासकारों का मत है कि यह सभ्यता भूकम्प आने के कारण नष्ट हुई।
  • अन्य कारण-(i) कुछ विद्वानों के विचार में इस प्रदेश में भयानक महामारियां फैली होंगी। इससे अनेक लोग मारे गए और जो लोग बचे होंगे, वे मृत्यु के भय से यह प्रदेश छोड़ गए होंगे। (ii) एक अन्य मत के अनुसार शायद सिन्धु नदी ने अपना रास्ता बदल लिया होगा जिससे इस प्रदेश की भूमि बंजर हो गई होगी। लोग इस बंजर भूमि को छोड़ कर कहीं और चले गए होंगे।

इन सब कारणों को दृष्टि में रखते हुए बी० जी० गोखले (B.G. Gokhale) ने ठीक कहा है- “मानव और प्रकृति ने सामूहिक रूप से इस सभ्यता का पूर्ण विनाश किया होगा।” (Nature and man must have combined to cause its complete annihilation.)

प्रश्न 13. सिन्धु घाटी के लोगों के किन-से सीधे या अन्य माध्यम द्वारा सम्पर्क थे ?
उत्तर–सिन्धु घाटी के लोगों का विश्व तथा देश के अन्य भागों के निवासियों के साथ सीधा या अन्य माध्यम से सम्पर्क था। राजस्थान, मैसूर तथा दक्षिणी भारत के लोगों के साथ उनका सीधा सम्बन्ध था। देश के इन भागों से वे संगमरमर, चांदी तथा सोना मंगवाते थे। बाहरी देशों जैसे अफ़गानिस्तान, मध्य एशिया तथा सुमेर के लोगों के साथ उनके गहरे सम्बन्ध थे। अफ़गानिस्तान से वे लोग सोना, चांदी और तांबा मंगवाते थे। मध्य एशिया से वे हरे रंग के हीरे, फिरोज़े आदि मंगवाते थे। उनके मैसोपोटामिया के लोगों के साथ भी अप्रत्यक्ष सम्बन्ध थे।

प्रश्न 14. सिन्धु घाटी के लोगों की व्यापारिक वस्तुओं के विषय में तुम क्या जानते हो ?
उत्तर-सिन्धु घाटी के लोग अनेक वस्तुओं का व्यापार करते थे। सिन्धु घाटी से निर्यात होने वाली वस्तुओं में सूती कपड़ा, मोती, हाथी दांत तथा हाथी दांत से बनी वस्तुएं प्रमुख थीं। लंगूर, बन्दर, मोर आदि जीव-जन्तु बाहर भी भेजे जाते थे। लोथल कस्बे से जोकि एक प्रमुख बन्दरगाह थी, मोतियों का निर्यात होता था। सिन्धु घाटी के लोगों के आयात में अनेक बहुमूल्य पदार्थ शामिल थे। वे राजस्थान, मैसूर तथा दक्षिणी भारत से सोना, चांदी और संगमरमर मंगवाते थे। सोना, चांदी तथा तांबा अफ़गानिस्तान से भी मंगवाया जाता था। मध्य एशिया से हीरे, फिरोज़े आदि का आयात किया जाता था।

प्रश्न 15. सिन्धु घाटी के लोग किन हथियारों का प्रयोग करते थे ?
उत्तर-सिन्धु घाटी के लोग तांबे तथा कांसे से बने अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करते थे। बढ़ई का मुख्य हथियार आरी था जिसके दाँत ऊंचे-नीचे होते थे। खेती में मुख्यत: हैरो जैसे यन्त्र का प्रयोग किया जाता था। सिन्धु घाटी के लोग युद्ध-प्रिय न होने के कारण युद्ध-शस्त्रों को अधिक महत्त्व नहीं देते थे। फिर भी वे कुछ युद्ध-शस्त्र अवश्य बनाते थे। इन शस्त्रों में तांबे तथा कांसे की बनी तलवारें, बर्छियां, तीर, कुल्हाड़ियां, गुलेल और चाकू मुख्य थे। इन शस्त्रों के अतिरिक्त शत्रु पर फेंकने के लिए पत्थर के बने भालों का भी प्रयोग किया जाता था।

प्रश्न 16. सिन्धु घाटी की सभ्यता कब फली-फूली ? इसके निर्माता कौन थे ? इस काल में लोगों के सामाजिक जीवन का वर्णन करो।
उत्तर–सिन्धु घाटी की सभ्यता कब पनपी, इस विषय में सभी इतिहासकार एकमत नहीं हैं। कुछ विद्वानों का विचार है कि इस सभ्यता की उत्पत्ति तथा विकास 2500 ई० पू० से 1500 ई० पू० के बीच हुआ। इसके विपरीत सर जॉन मार्शल इस सभ्यता का जन्म आज से लगभग 5 हजार वर्ष पूर्व बताते हैं। प्रायः इसी मत को ठीक माना जाता है। सिन्धु घाटी के लोगों के विषय में भी इतिहासकारों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कुछ विद्वान् उन्हें आर्य जाति का मानते हैं और कुछ उन्हें सुमेरियन जाति का बताते हैं। इस विषय में सबसे अधिक मान्य मत यह है कि सिन्धु घाटी में अनेक जातियों के लोग रहते थे।

IV. निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. सिंधु घाटी के लोगों के सामाजिक जीवन की मुख्य विशेषताएं बताइए।
उत्तर-सिंधु घाटी के लोगों के सामाजिक जीवन की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित थीं-

  • भोजन तथा वस्त्र-सिन्धु घाटी के लोग गेहूँ, चावल, दूध, खजूर तथा सब्जियों का प्रयोग करते थे। वे मांस, मछली और अण्डे भी खाते थे। कुछ घरों में सिल-बट्टे भी मिले हैं। इससे यह अनुमान लगाया गया है कि वे लोग चटनी जैसी कोई चीज़ भी खाते थे। सिन्धु घाटी के लोग सूती तथा ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्र पहनते थे। वे कुर्ता, धोती और कन्धों पर शाल या दुपट्टे आदि का प्रयोग करते थे। कढ़ाई किए हुए शाल ओढ़ने का भी रिवाज था।
  • आभूषण-सिन्धु घाटी के पुरुष और स्त्रियां दोनों ही आभूषण पहनने के शौकीन थे। उस समय हार, बालियां, अंगूठी, कंगन, चूड़ियां और पांवों में कड़े पहनने का रिवाज़ था। धनी लोग सोने, चांदी तथा हाथी दांत के आभूषण पहनते थे। गरीब लोग केवल तांबे आदि के आभूषण ही प्रयोग में लाते थे। आभूषण बनाने वाले कारीगर बड़े निपुण थे। सर जॉन मार्शल लिखते हैं कि सोने-चांदी के इन आभूषणों को देखकर ऐसा लगता है जैसे “ये आज से पांच हजार साल पहले बने हए नहीं सिन्धु घाटी के आभूषण बल्कि अभी लन्दन के जौहरी बाज़ार से खरीदे गए हैं।
  • श्रृंगार-स्त्रियां काजल, सुर्जी, सुगन्धित तेल तथा दर्पण का प्रयोग करती थीं। दर्पण कांसी के बने हए होते थे। वे कई तरीकों से अपने बाल गूंथती थीं। पुरुष दाढ़ी मुंडवाते थे और कई तरह के बाल बनवाते थे। वे बालों को संवारने के लिए कंघी का प्रयोग करते थे।
  • मनोरंजन-सिन्धु घाटी के लोग नाच और गाने से अपना दिल बहलाया करते थे। उन्हें घरों में खेले जाने वाले खेल अधिक पसन्द थे। खुदाई से प्राप्त कुछ मोहरों से पता चलता है कि लोग जुआ भी खेलते थे। उनका एक खेल आधुनिक शतरंज जैसा था। बच्चों के लिए प्रत्येक घर में खिलौने हुआ करते थे। खुदाई में हिरणों तथा बारहसिंगा के सींग भी मिले हैं। इनसे यह अनुमान लगाया गया है कि सिन्धु घाटी के लोगों को शिकार खेलने का भी चाव था।

Class 11 History Solutions Chapter 1 सिन्धु घाटी की सभ्यता 3

प्रश्न 2. सिन्धु घाटी की सभ्यता के आर्थिक तथा धार्मिक जीवन का वर्णन करो।
उत्तर-आर्थिक जीवन-सिन्धु घाटी के लोगों के आर्थिक जीवन का वर्णन इस प्रकार है :

  • कृषि–सिन्धु घाटी के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। वे गेहूँ, जौ, कपास, फल, सब्जियों आदि की खेती करते थे।
  • पशु पालन-सिन्धु घाटी के लोगों का दूसरा बड़ा व्यवसाय पशु पालना था। ये लोग गाय, बैल, भेड़, बकरियां, कुत्ते, सूअर आदि पालते थे।
  • व्यापार—यहां के लोगों का व्यापार काफ़ी उन्नत था। वे विदेशों के साथ भी व्यापार करते थे। प्रोफैसर चाइड लिखते हैं कि सिन्धु घाटी के लोगों द्वारा बनी वस्तुएं दजला और फरात की घाटी के बाजारों में बिका करती थीं। वस्तुओं को तोलने के लिए बाट थे।
  • कुटीर उद्योग-सिन्धु घाटी के कांसी तथा पीतल के बहुत सुन्दर बर्तन बनाते थे। उनके बनाए हुए खिलौने बड़े ही सुन्दर होते थे। सूत कातना, कपड़ा बुनना, आभूषण बनाना, पकी ईंटें बनाना आदि भी उनके प्रमुख उद्योग-धन्धे थे।

धार्मिक जीवन-सिन्धु घाटी के लोगों के धार्मिक जीवन का वर्णन इस प्रकार है :-

  • शिव उपासना-खुदाई में एक ऐसी मूर्ति मिली है जिसकी तीन आँखें और तीन मुँह हैं। इस मूर्ति में एक बैल का चित्र भी है। प्रायः बैल के साथ शिवजी महाराज का नाम जुड़ा हुआ है। इसलिए सर जॉन मार्शल का अनुमान है कि यह शिवजी की मूर्ति है और सिन्धु घाटी के लोग इसकी पूजा किया करते थे।
  • मातृदेवी की पूजा-खुदाई में मिली मोहरों पर एक अर्धनग्न नारी का चित्र बना हुआ है। विद्वानों का विचार है कि यह मातृदेवी की मूर्ति है और सिन्धु घाटी के लोग इसकी पूजा करते थे।
  • मूर्ति पूजा–खुदाई में शिवलिंग तथा कई मूर्तियां मिली हैं। अनुमान है कि सिन्धु घाटी के लोग इन मूर्तियों की पूजा करते थे।
  • पशु पूजा-खुदाई से मिली कुछ मोहरों पर हाथी, बैल, बाघ आदि के चित्र मिले हैं। सिन्धु घाटी के लोग इन पशुओं की भी पूजा किया करते थे।
  • जादू-टोनों में विश्वास-खुदाई में कुछ तावीज़ भी मिले हैं। इनसे यह अनुमान लगाया गया है कि सिन्धु घाटी के लोग जादू-टोनों में भी विश्वास रखते थे।
  • मृतक संस्कार-सिन्धु घाटी के लोग अपने मृतकों का संस्कार तीन प्रकार से किया करते थे। कुछ लोग मुर्दो को धरती में दबा देते थे और कुछ उन्हें जला देते थे। कई लोग मुर्दो को जलाकर उनकी राख तथा अस्थियों को किसी पात्र में रखकर उसे धरती में गाढ़ देते थे।

प्रश्न 3. सिन्धु घाटी की सभ्यता के लुप्त होने के क्या कारण (पतन के कारण) बताए जाते हैं ?
उत्तर-

  • बाढ़ें–कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि सिन्धु नदी की घाटी में आने वाली बाढ़ों ने इस सभ्यता को नष्टभ्रष्ट कर दिया।
  • बाहरी आक्रमण-कुछ विद्वानों के अनुसार आर्यों तथा अन्य विदेशी जातियों ने यहां के लोगों पर अनेक आक्रमण किए। इन युद्धों में यहां के निवासी हार गए इस सभ्यता का अन्त हो गया।
  • वर्षा की कमी-कुछ विद्वानों का कहना है कि इस सभ्यता का अन्त वर्षा की कमी के कारण हुआ। इनका अनुमान है कि इस प्रदेश में काफी लम्बे समय तक वर्षा न होने के कारण भयंकर अकाल पड़ा और इस सभ्यता का अन्त हो गया।
  • भूकम्प-कुछ इतिहासकारों का मत है कि यह सभ्यता भूकम्प आने के कारण नष्ट हुई।
  • अन्य कारण-
    • कुछ विद्वानों के विचार में इस प्रदेश में भयानक महामारियां फैली होंगी। इससे अनेक लोग मारे गए और जो लोग बचे होंगे, वे मृत्यु के भय से यह प्रदेश छोड़ गए होंगे।
    • एक अन्य मत के अनुसार शायद सिन्धु नदी ने अपना रास्ता बदल लिया होगा जिससे इस प्रदेश की भूमि बंजर हो गई होगी। लोग बंजर भूमि को छोड़ कर कहीं और चले गए होंगे।