Class 11 History Solutions Chapter 11 श्री गुरु नानक देव जी और सिक्ख पंथ की स्थापना

अध्याय का विस्तृत अध्ययन

(विषय-सामग्री की पूर्ण जानकारी के लिए)

प्रश्न 1. गुरु नानक देव जी के जीवन तथा सन्देश की चर्चा करें।
उत्तर-श्री गुरु नानक देव जी सिक्ख धर्म के प्रवर्तक थे। इतिहास में उन्हें महान् स्थान प्राप्त है। उन्होंने अपने जीवन में भटके लोगों को सत्य का मार्ग दिखाया और धर्मान्धता से पीड़ित समाज को राहत दिलाई। जिस समय श्री गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ, उस समय पंजाब का सामाजिक तथा धार्मिक वातावरण अन्धकार में लिप्त था। लोग अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते थे। हिन्दू और मुसलमानों में बड़ा भेदभाव था। श्री गुरु नानक देव जी ने इन सभी बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया। उन्होंने ‘सत्यनाम’ का उपदेश दिया और लोगों को धर्म का सच्चा मार्ग दिखाया। उनके जीवन तथा शिक्षाओं का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है :-

जन्म तथा माता-पिता-श्री गुरु नानक देव जी का जन्म 15 अप्रैल, 1469 ई० को तलवण्डी (वर्तमान में ननकाना साहिब, पाकिस्तान) में हुआ। उनके पिता का नाम मेहता कालू जी तथा माता का नाम तृप्ता जी था। आपकी बहन का नाम बेबे नानकी जी था।

बाल्यकाल, शिक्षा तथा व्यावसायिक जीवन-बचपन से ही श्री गुरु नानक देव जी दयावान थे। दीन-दुःखियों को देखकर उनका मन पिघल जाता था। 7 वर्ष की आयु में उन्हें पण्डित गोपाल की पाठशाला में पढ़ने के लिए भेजा गया। पण्डित जी उन्हें सन्तुष्ट न कर सके। तत्पश्चात् उन्हें पं० बृज नाथ के पास पढ़ने के लिए भेजा गया। वहां गुरु जी ने ‘ओ३म्’ शब्द का वास्तविक अर्थ बता कर पण्डित जी को चकित कर दिया। पढ़ाई में गुरु नानक देव जी की रुचि न देखकर उनके पिता जी ने उन्हें पशु चराने के लिए भेजा। वहां भी गुरु नानक देव जी प्रभु चिन्तन में मग्न रहते और पशु दूसरे किसानों के खेतों में चरते रहते थे। किसानों की शिकायतों से तंग आकर मेहता कालू जी ने श्री गुरु नानक देव जी को व्यापार में लगाने का प्रयास किया। उन्होंने श्री गुरु नानक देव जी को 20 रुपए देकर व्यापार करने भेजा। परन्तु गुरु जी ने ये रुपये भूखे साधुओं को भोजन खिलाने में व्यय कर दिये और इस व्यापार को सच्चा सौदा कहा।

विवाह-अपने पुत्र की सांसारिक विषयों में रुचि न देखकर मेहता कालू जी निराश हो गए। उन्होंने गुरु जी का विवाह बटाला के क्षत्रिय मूलचंद की सुपुत्री सुलक्खणी जी से कर दिया। उस समय गुरु जी की आयु केवल 14 वर्ष की थी। उनके यहां श्री चन्द और लखमी दास नामक दो पुत्र भी पैदा हुए। विवाह के पश्चात् गुरु नानक देव जी सुल्तानपुर लोधी चले गये। वहां उन्हें नवाब दौलत खां के अनाज घर में नौकरी मिल गई। उन्होंने पूरी ईमानदारी से काम किया। फिर भी वहां उनके विरुद्ध नवाब से शिकायत की गई। परन्तु जब जांच-पड़ताल हुई तो हिसाब-किताब बिल्कुल ठीक था। इस प्रकार अपनी ईमानदारी से वहां भी उन्होंने यश प्राप्त किया।

ज्ञान प्राप्ति, उदासियां तथा ज्योति जोत समाना-अपने जीवन के अगले 21 वर्षों में उन्होंने अनेक स्थानों का भ्रमण करके ज्ञान का प्रचार किया। वह लंका, तिब्बत, मक्का, कामरूप तथा भारत के कई नगरों में गए। उनकी यात्राओं को उदासियां कहा जाता है। अपनी यात्राओं के मध्य उन्होंने लोगों को जीवन का सच्चा मार्ग दिखाया। आप ने 1521 ई० में रावी नदी के किनारे करतारपुर साहिब नगर बसाया। यहां ही आप ने अपने जीवन के अंतिम समय धर्म प्रचार किया। अपना अन्त समय निकट आया देखकर गुरु जी ने अपना उत्तराधिकारी चुनना उचित समझा। उन्होंने अपने सेवक भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। उनके बाद भाई लहना ने गुरु अंगद देव जी के नाम से गुरु पद संभाला। 1539 ई० में श्री गुरु नानक देव जी ज्योति जोत समा गए।

सन्देश-श्री गुरु नानक देव जी का सन्देश बड़ा आदर्श था। उन्होंने अपनी शिक्षाओं द्वारा पथ-विचलित जनता को जीवन का सच्चा मार्ग दिखाया। उनकी मुख्य शिक्षाओं का वर्णन इस प्रकार है :-

1. ईश्वर सम्बन्धी विचार-श्री गुरु नानक देव जी ने इस बात का प्रचार किया कि ईश्वर एक है। वह अवतारवाद को स्वीकार नहीं करते थे। उन्होंने ईश्वर को निराकार बताया। उनके अनुसार परमात्मा स्वयं-भू है। अतः इसकी मूर्ति बनाकर पूजा नहीं की जानी चाहिए। उनके अनुसार ईश्वर सर्वव्यापी तथा सर्वशक्तिमान् है। वह संसार के कण-कण में रहता है। सारा संसार उसी की शक्ति से ही चल रहा है।

2. परमात्मा के नाम का जाप-श्री गुरु नानक देव जी ने परमात्मा के जाप पर बल दिया। उनके अनुसार गुरु सबसे महान् है। उसके बिना ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती। गुरु रूपी जहाज़ में सवार होकर ही संसार रूपी सागर को पार किया जा सकता है। अतः वह मनुष्य बड़ा भाग्यशाली है, जिसे सच्चा गुरु मिल जाता है।

3. अन्य शिक्षाएं-

  • जाति-पाति का खण्डन-श्री गुरु नानक देव जी रंग, धर्म तथा जाति के भेदभावों में विश्वास नहीं रखते थे। उनका कहना था कि हम सभी एक ही ईश्वर की सन्तान हैं। इसलिए हम सब भाई-भाई हैं।
  • यज्ञ, बलि आदि का विरोध-श्री गुरु नानक देव जी ने यज्ञ, बलि, व्रत आदि कर्मकाण्डों को व्यर्थ बताया।
  • मानव-प्रेम और समाज सेवा-श्री गुरु नानक देव जी के अनुसार जो व्यक्ति ईश्वर के प्राणियों से प्रेम नहीं करता, उसे ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती। उन्होंने अपने अनुयायियों को मानव-प्रेम और समाज-सेवा का उपदेश दिया।
  • उच्च नैतिक जीवन-श्री गुरु नानक देव जी ने लोगों को नैतिक जीवन व्यतीत करने का उपदेश दिया। उन्होंने कहा कि सदा सत्य बोलो, नाम जपो, मिल-बाँट कर छको, ईमानदारी की कमाई खाओ और दूसरे की भावनाओं को कभी ठेस मत पहुंचाओ।
  • गृहस्थ जीवन-गुरु नानक देव जी मुक्ति प्राप्त करने के लिए गृहस्थ जीवन को त्यागने के हक में नहीं थे। आप अंजन में निरंजन के समर्थक थे।

गुरु नानक देव जी का सन्देश निःसन्देह बड़ा महान् था। प्रत्येक स्त्री-पुरुष उनके बताए मार्ग को अपना सकता था। इसमें जाति-पाति या धर्म का कोई भेदभाव न था। उन्होंने सभी के लिए मुक्ति का मार्ग खोलकर सभी नर-नारियों के मन में एकता का भाव दृढ़ किया। इस प्रकार वर्ण-व्यवस्था के जटिल बन्धन टूटने लगे और लोगों में समानता की भावना का संचार हुआ। उन्होंने अपने समय के शासन में प्रचलित अन्याय, दमन और भ्रष्टाचार का बड़ा जोरदार खण्डन किया। फलस्वरूप समाज अनेक कुरीतियों से मुक्त हो गया।

प्रश्न 2. गुरु नानक देव जी, गुरु अंगद देव जी, गुरु अमरदास जी, गुरु रामदास जी तथा गुरु अर्जन देव जी की सिक्ख पंथ के विकास की चर्चा करें।
उत्तर-गुरु नानक देव जी-श्री गुरु नानक देव जी सिक्ख धर्म के संस्थापक थे। उनके सरल सन्देश से प्रभावित हो कर अनेक लोग उनके अनुयायी बन गए थे। उन्होंने अपने जीवन काल में ही अपने एक सिक्ख भाई लहना जी को गुरुगद्दी पर नियुक्त किया। इस प्रकार गुरु और सिक्ख की स्थिति परस्पर परिवर्तनशील बन गई। आगे चलकर सिक्ख इतिहास में यह विचार गुरु-पंथ के सिद्धान्त के रूप में विकसित हुआ। भाई लहना गुरु अंगद देव जी कहलाये।

गुरु अंगद देव जी-गुरु अंगद देव जी सिक्खों के दूसरे गुरु थे। उन्होंने अमृतसर जिले में स्थित खडूर साहिब में अपना प्रचार कार्य आरम्भ किया। उन्होंने गुरु नानक देव जी की वाणी को एकत्रित किया और उसे गुरुमुखी लिपि मे लिखा। यह वाणी बाद में गुरु ग्रन्थ साहिब के संकलन में सहायक सिद्ध हुई। गुरु अंगद देव जी ने स्वयं भी गुरु नानक देव जी के नाम पर वाणी लिखी। इससे गुरु पद की एकता दृढ़ हुई। उन्होंने संगत और लंगर की संस्थाओं को भी दृढ़ बनाया। गुरु नानक देव जी के पदचिन्हों पर चलते हुए 1552 ई० में गुरु अंगद देव जी ने भी अपने एक शिष्य अमरदास जी को गुरुगद्दी सौंप दी और स्वयं ज्योति-जोत समा गए। इस प्रकार गुरु अमरदास जी ने गुरु-पद संभाला।

गुरु अमरदास जी-गुरु अमरदास जी ने लगभग 22 वर्ष तक सिक्खों का पथ-प्रदर्शन किया। इस अवधि में उन्होंने सिक्ख पंथ में अनेक नई बातों का समावेश किया। गुरु अंगद देव जी की भान्ति उन्होंने भी गुरु नानक देव जी के नाम पर वाणी की रचना की। उन्होंने खडूर साहिब को छोड़कर गोइन्दवाल साहिब को अपना प्रचार केन्द्र बना लिया। वहां उन्होंने बन रही बावली (बाऊली) का निर्माण कार्य पूरा करवाया। गुरु अमरदास जी ने जन्म, विवाह तथा अन्य अवसरों पर पढ़ने के लिये आनन्द साहिब नामक वाणी की रचना की। उनके समय में सिक्खों की संख्या काफ़ी बढ़ गई। इसलिए उन्होंने गोइन्दवाल साहिब के बाहर भी प्रचार कार्य के लिए अपने प्रतिनिधि नियुक्त किये। फलस्वरूप सिक्खों की संख्या और भी बढ़ने लगी। उन्होंने पाठ-कीर्तन के लिए स्थान-स्थान पर अपनी धर्मशालाएं स्थापित की। उन्होंने लंगर प्रथा का विस्तार भी किया।

गुरु रामदास जी-गुरु रामदास जी सिखों के चौथे गुरु थे। वह 1574 ई० से 1581 ई० तक गुरु पद पर रहे। उन्होंने सिख धर्म के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया (1) उनका सबसे बड़ा योगदान रामदास पुर शहर की नींव डालना था। वह स्वयं भी यहीं रह कर प्रचार कार्य करने लगे। (2) उन्होंने अमृतसर तथा संतोखसर नामक दो सरोवर खुदवाए। (3) उन्होंने मसंद प्रथा प्रारम्भ की। मसंद उनके लिए उनके सिक्खों से भेंट एकत्रित करके लाते थे। (4) उनके समय में सिक्खों तथा उदासियों में समझौता हो गया। (5) गुरु रामदास जी ने अपने सबसे छोटे परन्तु योग्य पुत्र अर्जन देव जी को गुरुपद सौंपा।

गुरु अर्जन देव जी-गुरु अर्जन देव जी सिक्खों के पांचवें गुरु थे। आप 1581 ई० से 1606 ई० तक गुरुगद्दी पर रहे। सिक्ख धर्म के विकास में उन्होंने निम्नलिखित योगदान दिया

1. हरिमंदर साहिब का निर्माण-गुरु रामदास जी ने अमृतसर तथा सन्तोखसर नामक दो सरोवरों की खुदवाई का कार्य आरम्भ किया था, परन्तु उनके ज्योति जोत समाने के कारण यह कार्य पूरा न हो सका था। अब यह कार्य गुरु अर्जन देव जी ने अपने हाथों में ले लिया। उन्होंने बाबा बुड्डा जी तथा अन्य सिक्खों के सहयोग से इन दोनों सरोवरों का निर्माण कार्य पूरा किया। उन्होंने ‘अमृतसर’ सरोवर के बीच हरिमंदर साहिब का निर्माण करवाया। जो कि सिक्खों का पवित्र धार्मिक स्थान बन गया।

2. तरनतारन की स्थापना तथा लाहौर में बावली का निर्माण-गुरु अर्जन देव जी ने अमृतसर के अतिरिक्त अन्य अनेक नगरों, सरोवरों का निर्माण करवाया। तरनतारन भी इनमें से एक था। अमृतसर की भान्ति तरनतारन भी सिक्खों का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान बन गया। गुरु अर्जन देव जी ने अपनी लाहौर यात्रा के मध्य डब्बी बाजार में एक बावली का निर्माण करवाया। इसके निर्माण से बावली के निकटवर्ती प्रदेशों के सिक्खों को एक तीर्थ स्थान की प्राप्ति हुई।

3. हरगोबिन्दपुर तथा छहरटा की स्थापना और करतारपुर की नींव-गुरु जी ने अपने पुत्र हरगोबिन्द के जन्म के उपलक्ष्य में ब्यास नदी के तट पर हरगोबिन्द नामक नगर की स्थापना की। इसके अतिरिक्त उन्होंने अमृतसर के निकट पानी की कमी को दूर करने के लिए एक कुएं का निर्माण करवाया। इस कुएं पर छ: रहट चलते थे। इसलिए इसको छहरटा के नाम से पुकारा जाने लगा। धीरे-धीरे यहां पर एक नगर बस गया जो आज भी विद्यमान है। गुरु जी ने 1593 ई० में जालन्धर दोआब में एक नगर की स्थापना की जिसका नाम करतारपुर रखा गया।

4. मसन्द प्रथा का विकास-मसन्द प्रथा का आरम्भ गुरु रामदास जी ने किया था। गुरु अर्जन देव जी ने इस प्रथा में सुधार लाने की आवश्यकता अनुभव की। उन्होंने सिक्खों को आदेश दिया कि वे अपनी आय का 1/10 भाग आवश्यक रूप से मसन्दों को जमा कराएं। मसन्द वैशाखी के दिन इस राशि को अमृतसर में गुरु जी के केन्द्रीय कोष में जमा करवा देते थे।
राशि को एकत्रित करने के लिए वे अपने प्रतिनिधि नियुक्त करने लगे। इन्हें ‘संगती’ कहते थे। मसन्द दशांश इकट्ठा करने के अतिरिक्त अपने क्षेत्र में सिक्ख धर्म का प्रचार भी करते थे।

5. आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन-गुरु अर्जन देव जी ने ‘आदि ग्रन्थ’ साहिब का संकलन करके सिक्खों को एक धार्मिक ग्रन्थ प्रदान किया। इस पवित्र ग्रन्थ में उन्होंने अपने से पहले चार गुरु साहिबान की वाणी, फिर भक्तों की वाणी तथा उसके पश्चात् भाटों की वाणी का संग्रह किया। इसमें भक्त कबीर, बाबा फरीद, संत रविदास, जयदेव, रामानन्द तथा सूरदास जी की वाणी को भी स्थान दिया गया। गुरु गोबिंद सिंह जी के समय इस ग्रन्थ साहिब में गुरु तेग बहादुर जी की बाणी शामिल की गई तथा आदि ग्रन्थ को गुरु ग्रन्थ साहिब का दर्जा दिया गया। गुरु अर्जन देव जी ने धर्म पर दृढ़ रहकर अपने जीवन का बलिदान (1606) भी दिया। इस शहीदी से सिक्खों में एक नवीन उत्साह पैदा हुआ।

प्रश्न 3. गुरु अर्जन देव जी, गुरु हरगोबिन्द जी, गुरु तेग बहादुर जी तथा गुरु गोबिन्द सिंह जी के सिक्ख पंथ के रूपान्तरण में योगदान की चर्चा करें।
उत्तर-सिक्ख पंथ के विकास का आधार गुरु नानक देव जी के सरल एवं प्रभावशाली सन्देश थे। एक लम्बे समय तक यह पंथ शान्तिमय रूप धारण किए रहा। परन्तु गुरु अर्जन देव जी के समय में मुग़लों के धार्मिक अत्याचार बढ़ने लगे। उनके अत्याचारों का सामना शान्तिमय ढंग से करना असम्भव हो गया था। अतः सिक्ख पंथ का रूपान्तरण करना आवश्यक हो गया। इस कार्य में गुरु अर्जन देव जी, गुरु हरगोबिन्द जी, गुरु तेग बहादुर जी तथा गुरु गोबिन्द सिंह जी ने अपना-अपना योगदान दिया, जिसका वर्णन इस प्रकार है: –

I. गुरु अर्जन देव जी के अधीन-

मुग़ल सम्राट अकबर के गुरु अर्जन देव जी के साथ बहुत अच्छे सम्बन्ध थे। परन्तु अकबर की मृत्यु के पश्चात् जहांगीर ने सहनशीलता की नीति को छोड़ दिया। ।

जहांगीर की धर्मान्धता चरम सीमा पर पहुंच गई। अत: जहांगीर ने अपने पुत्र को आशीर्वाद देने के जुर्म में गुरु अर्जन देव जी को कठोर शारीरिक कष्ट देने का आदेश जारी कर दिया। सिक्ख परम्पराओं के अनुसार गुरु जी को गर्म लौह पर बिठाया गया और उनके शरीर पर तपती हुई रेत डाली गई। फिर उन्हें उबलते पानी की देश में डाला गया। आप इन तसीहों को परमात्मा का हुक्म समझ कर सहते रहे। आप 30 मई, 1606 ई० को लाहौर में शहीद हो गये।

गुरु अर्जन देव जी की शहीदी से महत्त्वपूर्ण प्रतिक्रिया हुई : (1) गुरु अर्जन देव जी ने अपनी शहीदी से पहले अपने पुत्र हरगोबिन्द के नाम यह सन्देश दिया, “वह समय बड़ी तेजी से आ रहा है, जब भलाई और बुराई की शक्तियों की टक्कर होगी। अत: मेरे पुत्र तैयार हो जा, आप शस्त्र पहन और अपने अनुयायियों को शस्त्र पहना। अत्याचारी का सामना तब तक करो जब तक कि वह अपने आपको सुधार न ले।” गुरु जी के इन अन्तिम शब्दों ने सिक्खों में सैनिक भावना को जागृत कर दिया। (2) गुरु जी की शहीदी ने सिक्खों की धार्मिक भावनाओं को भड़का दिया और उनके मन में मुगल राज्य के प्रति घृणा उत्पन्न हो गई। (3) इस शहीदी से सिक्ख धर्म को लोकप्रियता मिली। सिक्ख अब अपने धर्म के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए तैयार हो गए। निःसन्देह गुरु अर्जन देव जी की शहीदी सिक्ख इतिहास में एक नया मोड़ सिद्ध हुई।

II. गुरु हरगोबिन्द जी के अधीन-

गुरु हरगोबिन्द जी सिक्खों के छठे गुरु थे। उनके पिता गुरु अर्जन देव जी को मुग़ल सम्राट जहांगीर ने शहीद करवा दिया था। उनकी शहीदी से सिक्खों के मन में गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने अनुभव किया कि यदि उन्हें अपने धर्म की रक्षा करनी है तो उन्हें माला के साथ-साथ शस्त्र भी धारण करने पड़ेंगे। इस उद्देश्य से गुरु हरगोबिन्द जी ने नवीन नीति अपनाई।

नवीन नीति की कार्यवाहियां-

  • गुरुगद्दी पर बैठते समय गुरु हरगोबिन्द जी ने तलवारें धारण की और इस अवसर पर उन्होंने यह घोषणा की कि अब सिक्ख सत्यनाम का जाप करने के साथ-साथ अत्याचार के विरुद्ध लड़ने के लिए भी सदा तैयार रहेंगे। यह गुरु जी की नवीन नीति का आरम्भ था।
  • नवीन नीति का अनुसरण करते हुए गुरु हरगोबिन्द जी ने ‘सच्चे पातशाह’ की उपाधि धारण की। उन्होंने दो तलवारें, छत्र और कलगी धारण कर ली।
  • गुरु हरगोबिन्द जी अब सिक्खों के आध्यात्मिक नेता होने के साथ-साथ उनके सैनिक नेता भी बन गए। वे सिक्खों के पीर भी थे और मीर भी। इन बातों को स्पष्ट करते हुए उन्होंने पीरी और मीरी नामक दो तलवारें धारण की।
  • गुरु जी सिक्खों को धार्मिक शिक्षा देते थे। परन्तु सांसारिक विषयों में सिक्खों का पथ-प्रदर्शन करने के लिए उन्होंने हरिमंदर साहिब के सामने एक नया भवन बनवाया जिसका नाम ‘अकाल तख्त’ (ईश्वर की गद्दी) रखा गया।

गुरु हरगोबिन्द जी ने आत्मरक्षा के लिए एक सेना का संगठन किया। इस सेना में अनेक शस्त्रधारी सैनिक तथा स्वयंसेवक सम्मिलित थे। गुरु हरगोबिन्द जी ने अपनी नवीन नीति को अधिक सफल बनाने के लिए एक अन्य महत्त्वपूर्ण पग उठाया। उन्होंने अपने मसन्दों को सन्देश भेजा कि यदि धन के बजाय घोड़े तथा सैनिक शस्त्र उपहार अथवा भेंट के रूप में भेजें। परिणामस्वरूप काफ़ी मात्रा में सैनिक सामग्री इकट्ठी हो गई। सुरक्षा के लिए रामदासपुर (अमृतसर) के चारों ओर एक दीवार भी बनवाई गई। इस नगर में एक दुर्ग का निर्माण भी किया गया, जिसे लोहगढ़ का नाम दिया गया। इस प्रकार के कार्यों से सिक्खों में धार्मिक भावना के साथ-साथ सैनिक गुणों का भी विकास हुआ। फलस्वरूप उन्होंने मुगल अत्याचारों का डटकर सामना किया।

III. गुरु तेग़ बहादुर जी के अधीन-

नौवें सिक्ख गुरु तेग़ बहादुर जी के समय में कई मुसलमानों ने सिक्ख धर्म स्वीकार कर लिया। औरंगज़ेब इस बात को सहन नहीं कर सकता था; इसलिए उसने गुरु तेग़ बहादुर जी को दण्ड देने का निश्चय कर लिया। इन्हीं दिनों मुग़ल अत्याचारों से तंग आकर कुछ कश्मीरी ब्राह्मण गुरु जी की शरण में आए। उन्होंने गुरु जी को बताया कि उनको ज़बरदस्ती मुसलमान बनाया जा रहा है। यह सुनकर गुरु जी ने कहा कि सम्राट् से कहो कि यदि तुम हमारे गुरु साहिब जी को मुसलमान बना लोगे तो वे भी इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लेंगे। उन्होंने ऐसा ही किया। अतः गुरु जी को 1675 ई० मे दिल्ली बुलाया गया और उन्हें इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए विवश किया गया, परन्तु गुरु जी अपने धर्म पर अटल रहे। क्रोध में आकर औरंगजेब ने 11 नवम्बर, 1675 ई० को उन्हें शहीद करवा दिया। गुरु तेग़ बहादुर जी की शहीदी से सिक्खों में एक नवीन जागृति आई।

IV. गुरु गोबिन्द सिंह जी के अधीन-

गुरु तेग़ बहादुर जी के पश्चात् गुरु गोबिन्द सिंह जी सिक्खों के गुरु बने। उन्होंने सिक्ख धर्म की उन्नति के लिए विशेष प्रयत्न किए। उन्होंने मुग़ल अत्याचारों के विरुद्ध तलवार उठाई। वे अपने शिष्यों से भी भेंट के रूप में घोड़े तथा शस्त्र लेने लगे। उन्होंने सिक्खों को स्थायी सैनिक का रूप देने के लिए 1699 में खालसा की स्थापना की। इस प्रकार गुरु गोबिन्द सिंह जी ने एक विशाल सेना तैयार कर ली। गुरु जी ने साधारण व्यक्तियों को वीर सैनिकों में परिवर्तित कर दिया। इस प्रकार वह राजनीतिक शक्ति में संगठित हुए और उन्होंने समय-समय पर मुग़लों से अनेक युद्ध किए।

महत्त्वपूर्ण परीक्षा-शैली प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. उत्तर एक शब्द से एक वाक्य तक

प्रश्न 1. ‘सच्चा सौदा’ किस सिक्ख गुरु से सम्बन्धित है ?
उत्तर-श्री गुरु नानक देव जी से।

प्रश्न 2. श्री गुरु नानक देव जी का जन्म कहां हुआ था ?
उत्तर-लाहौर के समीप तलवंडी नामक गांव में।

प्रश्न 3. श्री गुरु नानक देव जी की माता का क्या नाम था?
उत्तर-माता तृप्ता जी।

प्रश्न 4. अमृतसर नगर किसने बसाया?
उत्तर-गुरु रामदास जी।

प्रश्न 5. ‘आदि ग्रंथ साहिब’ का संकलन किस गुरु साहिब ने किया?
उत्तर-गुरु अर्जन देव जी ने।

प्रश्न 6. कौन-से गुरु ‘बाल गुरु’ के नाम से प्रसिद्ध हैं ?
उत्तर-श्री गुरु हरकृष्ण जी।

प्रश्न 7. सिक्खों के नौंवें गुरु कौन थे ?
उत्तर-श्री गुरु तेग बहादुर जी।

प्रश्न 8. शहीदी देने वाले दो सिक्ख गुरुओं के नाम बताओ।
उत्तर-श्री गुरु अर्जन देव जी तथा श्री गुरु तेग़ बहादुर जी।

प्रश्न 9. गुरु गोबिन्द राय जी का जन्म कब और कहां हुआ? (ii) उनके माता-पिता का नाम बताओ।
उत्तर-(i) 22 दिसम्बर, 1666 ई० को पटना में (ii) उनकी माता का नाम गुजरी जी और पिता का नाम श्री गुरु तेग़ बहादुर जी था।

प्रश्न 10. भंगानी की विजय के बाद गुरु गोबिंद सिंह जी ने कौन-कौन से किले बनवाए ?
उत्तर-आनन्दगढ़, केसगढ़, लोहगढ़ तथा फतेहगढ़।

प्रश्न 11. पांच प्यारों के नाम लिखिए।
उत्तर-भाई दया सिंह, भाई धर्म सिंह, भाई मोहकम सिंह, भाई साहब सिंह तथा भाई हिम्मत सिंह।

प्रश्न 12. खालसा का सृजन कब और कहां किया गया?
उत्तर-1699 ई० में आनन्दपुर साहिब में।

2. रिक्त स्थान भरें

(i) ……………….. गुरु नानक देव जी की पत्नी थीं।
(ii) गुरु नानक देव जी के पुत्रों के नाम …………………… तथा ……………….
(iii) गुरु नानक देव जी द्वारा रचित चार बाणियां वार मल्हार, वार आसा, ……………… और …………..
(iv) ……………… का पहला नाम भाई लहना था।
(v) ………….. सिक्खों के चौथे गुरु थे।
(vi) ……………. नामक नगर की स्थापना गुरु अंगद देव जी ने की।
(vii) गुरु हरगोबिन्द जी ने अपने जीवन के अंतिम दस वर्ष …………… में धर्म-प्रचार में व्यतीत किए।
(viii) उदासी’ मत गुरु नानक देव जी के बड़े पुत्र ………………. जी ने स्थापित किया।
(ix) मंजियों की स्थापना श्री गुरु ………………. ने की।
(x) गुरु अर्जन देव जी का जन्म 15 अप्रैल, 1563 ई० को ……….. में हुआ।
(xi) हरमंदिर साहिब का निर्माण कार्य ….. ……. ई० में पूरा हुआ।
उत्तर-
(i) बीबी सुलखनी
(ii) श्रीचंद, लखमी दास
(iii) जपुजी साहिब, बारहमाहा
(iv) गुरु अंगद साहिब
(v) गुरु रामदास जी
(vi) गोइन्दवाल साहिब
(vii) कीरतपुर साहिब
(viii) बाबा श्रीचंद जी
(ix) अमरदास जी
(x) गोइन्दवाल साहिब
(xi) 1601.

3. सही/गलत कथन

(i) औरंगजेब कश्मीरी पंडितों को ज़बरदस्ती मुसलमान बनाना चाहता था। — (√)
(ii) गुरु गोबिंद सिंह जी ने काजी पीर मुहम्मद से शिक्षा लेने से इन्कार कर दिया। — (×)
(iii) खालसा की स्थापना श्री गुरु हरगोबिंद जी ने की। — (×)
(iv) गुरु गोबिंद सिंह जी ने ‘ज़फरनामा’ नामक पत्र मुग़ल सम्राट औरंगजेब को लिखा। — (√)
(v) दिल्ली में गुरु हरराय जी राजा जयसिंह के यहां ठहरे थे। — (×)

4. बहुविकल्पीय प्रश्न

(i) गोइन्दवाल साहिब में बाऊली (जल-स्रोत) का निर्माण किसने करवाया ?
(A) गुरु अर्जन देव जी ने
(B) गुरु नानक देव जी ने ।
(C) गुरु अमरदास जी ने
(D) गुरु तेग़ बहादुर जी ने।
उत्तर-(C) गुरु अमरदास जी ने

(ii) गुरु अर्जन देव जी ने रावी तथा ब्यास के बीच किस नगर की नींव रखी ?
(A) जालंधर
(B) गोइन्दवाल साहिब
(C) अमृतसर
(D) तरनतारन।
उत्तर-(D) तरनतारन।

(iii) जहांगीर के काल में शहीद होने वाले सिक्ख गुरु थे –
(A) गुरु अंगद देव जी
(B) गुरु अमरदास जी
(C) गुरु अर्जन देव जी
(D) गुरु रामदास जी।
उत्तर-(C) गुरु अर्जन देव जी

(iv) गुरु हरकृष्ण जी गुरु गद्दी पर बैठे-
(A) 1661 ई० में
(B) 1670 ई० में
(C) 1666 ई० में
(D) 1538 ई० में।
उत्तर-(A) 1661 ई० में

(v) ‘बाबा बकाला’ वास्तव में थे
(A) गुरु तेग़ बहादुर जी
(B) गुरु हरकृष्ण जी
(C) गुरु गोबिन्द सिंह जी
(D) गुरु अमरदास जी।
उत्तर-(A) गुरु तेग़ बहादुर जी

(vi) गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म हुआ
(A) कीरतपुर साहिब में
(B) पटना में
(C) दिल्ली में
(D) तरनतारन में।
उत्तर-(B) पटना में

(vii) गुरु गद्दी को पैतृक रूप दिया
(A) गुरु अमरदास जी ने
(B) गुरु रामदास जी ने
(C) गुरु गोबिन्द सिंह जी ने
(D) गुरु तेग़ बहादुर जी ने।
उत्तर-(A) गुरु अमरदास जी ने

(viii) हरमंदिर साहिब का पहला मुख्य ग्रन्थी नियुक्त किया गया
(A) भाई पृथिया को
(B) श्री महादेव जी को
(C) बाबा बुड्डा जी को
(D) नत्था मल जी को।
उत्तर-(C) बाबा बुड्डा जी को

II. अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1. सिक्ख पंथ के बारे में जानकारी के गुरुमुखी लिपि में चार महत्त्वपूर्ण स्रोत कौन-से हैं ?
उत्तर-सिक्ख पंथ के बारे में जानकारी के गुरुमुखी लिपि में चार महत्त्वपूर्ण स्रोत गुरु ग्रन्थ साहिब, भाई गुरदास की वारें, जन्मसाखियां तथा गुरसोभा हैं।

प्रश्न 2. कौन-से दो गुरु साहिबान के हुक्मनामे उपलब्ध हैं ?
उत्तर-हमें गुरु तेग़ बहादुर जी तथा गुरु गोबिन्द सिंह जी के हुक्मनामे उपलब्ध हैं।

प्रश्न 3. गुरु नानक देव जी का जीवन मुख्य रूप से कौन-से तीन भागों में बाँटा जा सकता है ?
उत्तर-गुरु नानक देव जी का जीवन मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा जा सकता है-आरम्भिक जीवन तथा सुल्तानपुर लोधी में ज्ञान प्राप्ति, उनकी यात्राएँ अथवा उदासियाँ तथा करतारपुर में एक नये भाईचारे की स्थापना।

प्रश्न 4. गुरु नानक देव जी का जन्म कब और कहाँ हुआ ?
उत्तर-गुरु नानक देव जी का जन्म 1469 ई० में तलवण्डी नामक स्थान पर हुआ।

प्रश्न 5. सुल्तानपुर लोधी में गुरु नानक देव जी ने किस लोधी अधिकारी के अधीन, किस विभाग में कितने वर्ष काम किया ?
उत्तर-सुल्तानपुर लोधी में गुरु नानक देव जी ने दौलत खाँ लोधी के अधीन काम किया। उन्होंने मोदीखाने में दस वर्ष . तक कार्य किया।

प्रश्न 6. गुरु नानक देव जी को सत्य की प्राप्ति कहाँ और लगभग किस आयु में हुई ?
उत्तर-गुरु नानक देव जी को सुल्तानपुर लोधी में सत्य की प्राप्ति हुई। इस समय उनकी आयु 30 वर्ष की थी।

प्रश्न 7. गुरु नानक देव जी ने एक नये भाईचारे का आरम्भ कहाँ और किन दो संस्थाओं द्वारा किया ?
उत्तर-गुरु नानक देव जी ने एक नये भाईचारे का आरम्भ करतारपुर में संगत तथा लंगर नामक दो संस्थाओं द्वारा किया।

प्रश्न 8. गुरु नानक देव जी मनुष्य के किन पांच शत्रुओं की बात करते हैं ?
उत्तर-गुरु नानक देव जी मनुष्य के पांच शत्रुओं काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार की बात करते हैं।

प्रश्न 9. गुरु नानक देव जी के अनुसार सच्चा गुरु कौन है और वह किसके द्वारा शिक्षा देता है ?
उत्तर-गुरु नानक देव जी के अनुसार सच्चा गुरु परमात्मा है। परमात्मा ‘शब्द’ के द्वारा शिक्षा देता है।

प्रश्न 10. गुरु नानक देव जी के अनुसार सही आचरण की आधारशिला क्या है तथा उसके लिए क्या करना आवश्यक है ?
उत्तर-गुरु नानक देव जी के अनुसार सही आचरण की आधारशिला दूसरों की सेवा है। उसके लिए मेहनत की कमाई करना आवश्यक है।

प्रश्न 11. गुरु अंगद देव जी का आरम्भिक नाम क्या था और वे कब से कब तक गुरुगद्दी पर रहे ?
उत्तर-गुरु अंगद देव जी का आरम्भिक नाम भाई लहना था। वह 1539 से 1552 तक गुरुगद्दी पर रहे।

प्रश्न 12. गुरु अंगद देव जी की धार्मिक गतिविधियों का केन्द्र कौन-सा स्थान था तथा उन्होंने कौन-से कस्बे का निर्माण किया ?
उत्तर-गुरु अंगद देव जी की धार्मिक गतिविधियों का केन्द्र अमृतसर जिले में खडूर साहिब था। उन्होंने गोइन्दवाल साहिब कस्बे का निर्माण किया।

प्रश्न 13. गुरु अंगद देव जी ने किस नाम से वाणी रची और उन्होंने गुरुगद्दी के लिए किसको मनोनीत किया ?
उत्तर-गुरु अंगद देव जी ने नानक नाम से वाणी की रचना की। उन्होंने गुरुगद्दी के लिए गुरु अमरदास जी को मनोनीत किया।

प्रश्न 14. गुरु अमरदास जी ने बावली का निर्माण कहां करवाया तथा इसमें कितनी सीढ़ियां हैं ?
उत्तर-गुरु अमरदास जी ने गोइन्दवाल साहिब में बावली का निर्माण कराया, जिसमें 84 सीढ़ियां हैं।

प्रश्न 15. गुरु अमरदास जी ने साधारण जीवन के किन दो अवसरों के लिए सिक्खों के लिए विशिष्ट रीतियां निश्चित की ?
उत्तर-गुरु अमरदास जी ने जन्म तथा मरण के मौकों पर सिक्खों के लिए विशिष्ट रीतियाँ निश्चित की।

प्रश्न 16. मंजियों की स्थापना किन गुरु साहिब ने की और वे कब-से-कब तक गुरुगद्दी पर रहे ?
उत्तर-मंजियों की स्थापना गुरु अमरदास जी ने की। वे 1552 ई० से 1574 ई० तक गुरुगद्दी पर रहे।

प्रश्न 17. अमृतसर की स्थापना करने वाले तथा सरोवर की खुदवाई करवाने वाले दो गुरु साहिबानों के नाम बताएं।
उत्तर-अमृतसर की स्थापना गुरु रामदास जी ने की थी। गुरु रामदास जी तथा गुरु अर्जन देव जी ने सरोवर की खुदाई कराई थी।

प्रश्न 18. गुरु अमरदास जी के उत्तराधिकारी कौन थे ? उनका आरम्भिक नाम तथा गुरुआई का समय बताएं।
उत्तर-गुरु अमरदास जी के उत्तराधिकारी गुरु रामदास जी थे। इनका आरम्भिक नाम भाई जेठा जी था। उनकी गुरुआई का समय 1574 ई० से 1581 ई० तक था।

प्रश्न 19. अमृत सरोवर में ‘धर्मशाला’ किन्होंने बनवाई तथा इसे क्या नाम दिया ?
उत्तर-अमृत सरोवर में गुरु अर्जन देव जी ने धर्मशाला बनवाई थी और इसको हरमंदर साहिब का नाम दिया।

प्रश्न 20. गुरु अर्जन देव जी ने किन तीन नगरों की नींव रखी और यह कौन-से दो दोआबों में हैं ?
उत्तर-गुरु अर्जन देव जी ने बारी दोआब में तरनतारन तथा श्री हरगोबिन्दपुर और जालन्धर दोआब में करतारपुर की नींव रखी।

प्रश्न 21. गुरु के प्रतिनिधियों को क्या कहा जाता था और ये संगतों से उनकी आय का कौन-सा भाग एकत्र करते थे ?
उत्तर-गुरु के प्रतिनिधियों को मसन्द कहा जाता था। ये संगतों से उनकी आय का दसवां भाग एकत्र करते थे।

प्रश्न 22. आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन किन्होंने और कब सम्पूर्ण किया ?
उत्तर-आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन गुरु अर्जन देव जी ने 1604 ई० में सम्पूर्ण किया।

प्रश्न 23. आदि ग्रन्थ साहिब में जिन गुरुओं की वाणी सम्मिलित है, उनके नाम बताएं।
उत्तर-आदि ग्रन्थ साहिब में गुरु नानक देव जी, गुरु अंगद देव जी, गुरु अमरदास जी, गुरु रामदास जी तथा गुरु अर्जन देव जी की वाणी सम्मिलित है। बाद में गुरु तेग बहादुर जी की वाणी भी सम्मिलित की गई।

प्रश्न 24. ‘मीरी’ और ‘पीरी’ की तलवारें किसने धारण की और ये किसकी प्रतीक थीं ?
उत्तर-‘मीरी’ और ‘पीरी’ की तलवारें गुरु हरगोबिन्द जी ने धारण की। ‘पीरी’ की तलवार आध्यात्मिक नेतृत्व की प्रतीक थी और ‘मीरी’ की तलवार सांसारिक नेतृत्व की।

प्रश्न 25. गुरु हरगोबिन्द जी की गुरुगद्दी का समय क्या था और उन्होंने अमृतसर में कौन-से दो महत्त्वपूर्ण भवन बनवाए ?
उत्तर-गुरु हरगोबिन्द जी की गुरुगद्दी का समय 1606 ई० से 1645 ई० तक था। उन्होंने अमृतसर में लोहगढ़ का किला बनवाया तथा हरमंदर साहिब के सामने अकाल तख्त बनवाया।

प्रश्न 26. गुरु हरगोबिन्द जी को किस मुग़ल बादशाह ने कौन-से किले में नजरबन्द करवाया ?
उत्तर-गुरु हरगोबिन्द जी को जहांगीर ने ग्वालियर के किले में नजरबन्द करवाया।

प्रश्न 27. गुरु हरगोबिन्द जी ने लाहौर प्रान्त को छोड़कर किस इलाके में किस स्थान पर रहने का फैसला किया ?
उत्तर-गुरु हरगोबिन्द जी ने लाहौर प्रान्त को छोड़कर कीरतपुर साहिब के स्थान पर रहने का फैसला किया।

प्रश्न 28. पिरथी चन्द कौन था तथा उसके अनुयायियों को क्या कहा जाता था ?
उत्तर-पिरथी चन्द गुरु हरगोबिन्द जी का चाचा था। उसके अनुयायियों को ‘मीणे’ कहा जाता था।

प्रश्न 29. मिहरबान का आरम्भिक नाम क्या था तथा वह किसका पुत्र था ?
उत्तर-मिहरबान का आरम्भिक नाम मनोहर दास था। वह पिरथी चन्द का पुत्र था।

प्रश्न 30. धीरमल किसका पौत्र था तथा वह किस स्थान पर रहने लगा था ?
उत्तर-धीरमल गुरु हरगोबिन्द जी का पौत्र था। वह करतारपुर में रहने लगा था।

प्रश्न 31. गुरु हर राय जी किनके पौत्र थे और वे गुरुगद्दी पर कब से कब तक रहे ?
उत्तर-गुरु हर राय जी गुरु हरगोबिन्द जी के पौत्र थे। वे 1645 ई० से 1661 ई० तक गुरुगद्दी पर रहे।

प्रश्न 32. गुरु हर राय जी पर किस मुग़ल बादशाह ने किस शहज़ादे की सहायता करने का आरोप लगाया ?
उत्तर-गुरु हर राय जी पर औरंगजेब ने शहज़ादा दारा शिकोह की सहायता करने का आरोप लगाया।

प्रश्न 33. गुरु हर राय जी के दो बेटों के नाम बताएं तथा उनमें से किन को गुरुगद्दी दी गई ?
उत्तर-गुरु हर राय जी के दो बेटों के नाम थे-रामराय जी तथा हरकृष्ण जी। गुरुगद्दी हरकृष्ण जी को दी गई थी।

प्रश्न 34. गुरु तेग़ बहादुर जी ने किस वर्ष में गुरुआई सम्भाली और इस समय वे किस गांव में थे तथा यह किन दो नगरों के मध्य स्थित है ?
उत्तर-गुरु तेग़ बहादुर जी ने 1664 ई० में गुरुआई सम्भाली। इस समय वह बकाला में थे जो अमृतसर तथा जालन्धर के मध्य में है।

प्रश्न 35. गुरु तेग़ बहादुर जी ने किस पहाड़ी रियासत के इलाके में किस नये कस्बे की नींव रखी और यह बाद में किस नाम से प्रसिद्ध हुआ ?
उत्तर-गुरु तेग़ बहादुर जी ने बिलासपुर रियासत में माखोवाल कस्बे की नींव रखी। यह बाद में आनन्दपुर साहिब के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

प्रश्न 36. गुरु तेग बहादुर जी अपनी यात्रा के दौरान किन चार नगरों में गये तथा गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म कौन-से नगर में हुआ ?
उत्तर-गुरु तेग़ बहादुर जी अपनी यात्रा के दौरान आगरा, बनारस तथा गया में गये। गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म पटना में हुआ।

प्रश्न 37. गुरु तेग़ बहादुर जी को किस वर्ष में, किस शहर में, किस स्थान पर शहीद किया गया ?
उत्तर-गुरु तेग़ बहादुर जी को 1675 ई० में दिल्ली में चांदनी चौक में शहीद किया गया।

प्रश्न 38. गुरु गोबिन्द सिंह जी ने अपने पूर्वजों में से किन की नीति अपनाने का निश्चय किया तथा उन्होंने भेंट में किन दो वस्तुओं को प्राप्त करने को अधिक महत्त्व दिया ?
उत्तर-गुरु गोबिन्द सिंह जी ने गुरु हरगोबिन्द जी की नीति अपनाने का निश्चय किया। उन्होंने भेंट में शस्त्र तथा घोड़े प्राप्त करने को अधिक महत्त्व दिया।

प्रश्न 39. गुरु गोबिन्द सिंह जी का पहला युद्ध किस वर्ष में, किस स्थान पर और कहां के राजा के विरुद्ध हुआ ?
उत्तर-गुरु गोबिन्द सिंह जी का पहला युद्ध श्रीनगर के राजा के साथ 1686 ई० में भंगाणी नामक स्थान पर हुआ।

प्रश्न 40. किस पहाड़ी राजा के कहने पर गुरु गोबिन्द सिंह जी ने मुगलों के विरुद्ध कौन-सी लड़ाई लड़ी तथा इसमें किसकी जीत हुई ?
उत्तर-गुरु गोबिन्द सिंह जी ने पहाड़ी राजा भीमचन्द के कहने पर मुगलों के विरुद्ध नादौन की लड़ाई लड़ी। इसमें पहाड़ी राजाओं की जीत हुई।

प्रश्न 41. गुरु गोबिन्द सिंह जी ने आनन्दपुर की सुरक्षा के लिए किन चार किलों का निर्माण किया था ?
उत्तर-गुरु गोबिन्द सिंह जी ने आनन्दपुर की सुरक्षा के लिए आनन्दगढ़, केसगढ़, लोहगढ़ तथा फतेहगढ़ किलों का निर्माण किया था।

प्रश्न 42. गुरु गोबिन्द सिंह जी ने कौन-से वर्ष, किस दिन और कहां पर खालसा की साजना की ?
उत्तर-गुरु गोबिन्द सिंह जी ने 1699 ई० में वैसाखी के दिन आनन्दपुर साहिब में खालसा की साजना की।

III. छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1. गुरु नानक देव जी की यात्राओं अथवा उदासियों के बारे में बताएं।
उत्तर-गुरु नानक देव जी ने अपने सन्देश के प्रसार के लिए कुछ यात्राएं कीं। उनकी इन यात्राओं को उदासियां भी कहा जाता है। इन यात्राओं को तीन या चार हिस्सों अथवा उदासियों में बांटा जाता है। यह समझा जाता है कि इस दौरान गुरु नानक देव जी ने उत्तर में कैलाश पर्वत से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम् तक तथा पश्चिम में पाकपटन से लेकर पूर्व में असम तक की यात्रा की थी। वह सम्भवत: भारत से बाहर लंका, मक्का, मदीना तथा बगदाद भी गये थे। उनके जीवन के लगभग बीस वर्ष ‘उदासियों’ में गुजरे। अपनी सुदूर ‘उदासियों’ में गुरु साहिब विभिन्न धार्मिक विश्वासों वाले अनेक लोगों के सम्पर्क में आये। ये लोग भान्ति-भान्ति की संस्कार विधियों और रस्मों का पालन करते थे। गुरु नानक साहिब ने इन सभी लोगों को धर्म का सच्चा मार्ग दिखाया।

प्रश्न 2. गुरु नानक देव जी का माया का संकल्प क्या है ?
उत्तर-गुरु नानक देव जी के अनुसार ‘माया’ मुक्ति के मार्ग की एक बहुत बड़ी बाधा है। उनका माया का संकल्प वास्तविक है। यह वेदान्त की भान्ति ब्रह्माण्डीय भ्रम डालने वाला नहीं है। उनके अनुसार प्रभु ने ब्रह्माण्ड की रचना स्वयं को रूपवान करने के लिए की है। अतः रचनाकार और रचना में अन्तर जानना आवश्यक है। मनुष्य के मलिन भाव और ऐन्द्रिक सुख मनुष्य को माया से बाँध कर रखते हैं। इसलिए वह परमात्मा से दूर रहता है। इसी सन्दर्भ में ही गुरु नानक देव जी मनुष्य के पांच शत्रुओं की बात करते हैं, जिनके नाम हैं-काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार। मनुष्य में अहं अथवा ‘हउमै’ की अभिव्यक्ति है। यह परमात्मा और मनुष्य के बीच एक सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दीवार है। मनुष्य की ‘मनमुखता’ ही उसके लिए यह समझना कठिन कर देती है कि केवल परमात्मा ही एक सर्वशक्तिमान् सत्ता है।

प्रश्न 3. गुरु नानक देव जी ने किन प्रचलित धार्मिक विश्वासों तथा व्यवहारों का खण्डन किया ?
उत्तर-गुरु नानक देव जी ने अनेक व्यर्थ के धार्मिक विश्वासों एवं व्यवहारों का खण्डन किया। उन्होंने अनुभव किया कि ब्राह्मण बाहरी कर्मकाण्ड में रत हैं जिनमें सही आत्मिक जिज्ञासा या धार्मिक श्रद्धा-भक्ति के लिए कोई स्थान नहीं है। उन्होंने मूर्ति पूजा, तीर्थ यात्रा और मानव जीवन के महत्त्वपूर्ण अवसरों से सम्बन्धित संस्कार-विधियां और रीति-रिवाजों का खंडन किया। गुरु नानक देव जी ने जोगियों की पद्धति को भी अस्वीकार कर दिया। इसके दो मुख्य कारण थे : जोगियों द्वारा परमात्मा के प्रति व्यवहार में श्रद्धा-भक्ति का अभाव और अपने मठवासी जीवन में सामाजिक दायित्व से विमुखता। गुरु नानक देव जी ने वैष्णव भक्ति को भी अस्वीकृत किया और अपनी विचारधारा में अवतारवाद को कोई स्थान न दिया। उन्होंने मुल्ला लोगों के विश्वासों, रस्मों एवं व्यवहारों का खण्डन किया।

प्रश्न 4. गुरु नानक देव जी के सन्देश के सामाजिक अर्थ क्या थे ?
उत्तर-गुरु नानक देव जी के सन्देश के सामाजिक अर्थ बड़े महत्त्वपूर्ण थे। उनका सन्देश सभी के लिए था। प्रत्येक स्त्रीपुरुष उनके बताये मार्ग को अपना सकता था। इसमें जाति-पाति या धर्म का कोई भेदभाव न था। उन्होंने सभी के लिए मुक्ति का मार्ग खोलकर सभी नर-नारियों के मन में एकता का भाव दृढ़ किया। इस प्रकार वर्ण-व्यवस्था के जटिल बन्धन टूटने लगे और लोगों में समानता की भावना का संचार हुआ। उनके अनुयायियों में समानता के विचार को वास्तविक रूप संगत और लंगर की संस्थाओं में मिला। इसलिए यह समझना कठिन नहीं है कि गुरु नानक देव जी ने जात-पात पर आधारित भेदभावों का बड़े स्पष्ट शब्दों में खण्डन क्यों किया। उन्होंने अपने आपको जनसाधारण के साथ सम्बन्धित किया। इस स्थिति में उन्होंने अपने समय के शासकों में प्रचलित अन्याय, दमन और भ्रष्टाचार का बड़ा जोरदार खण्डन किया। फलस्वरूप समाज अनेक कुरीतियों से मुक्त हो गया।

प्रश्न 5. गुरु नानक देव जी ने ब्राह्मणों तथा मुल्लाओं का खण्डन क्यों किया ?
उत्तर-गुरु नानक देव जी ने ब्राह्मणों तथा मुल्लाओं का जोरदार खण्डन किया। ब्राह्मण दिखावे के कर्मकाण्डों में लिप्त थे। वे लोग वेद, शास्त्रों, मूर्ति पूजा, तीर्थ यात्रा तथा जन्म-मरण के अवसर पर विभिन्न धार्मिक संस्कारों पर भी बड़ा बल देते हैं। वह स्वयं सच्ची प्रभु भक्ति में विश्वास रखते थे। इसी कारण उन्होंने ब्राह्मणों तथा उनकी धार्मिक पद्धति का कड़ा विरोध किया। इस्लाम धर्म में मुल्ला लोगों ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया हुआ था। वे अपने आपको इस्लाम का रक्षक समझते थे
और इसके सिद्धान्तों को बाहरी रूप से अपनाने पर बड़ा बल देते थे। गुरु नानक देव जी को दिखावे का यह जीवन बिल्कुल पसन्द नहीं था। अत: उन्होंने उस समय ब्राह्मणों के साथ-साथ मुल्लाओं के आडंबरों का भी विरोध किया।

प्रश्न 6. गुरु अमरदास जी पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-गुरु अमरदास जी सिक्खों के तीसरे गुरु थे। आपका जन्म अमृतसर जिले में हुआ था। आपने गुरु अंगद देव जी की सेवा बहुत श्रद्धा और प्यार से की। इसी के फलस्वरूप आपको गुरुगद्दी प्राप्त हुई। गुरु अमरदास जी गुरुगद्दी पर बीस वर्ष रहे। उन्होंने सिक्ख पंथ के विकास के लिए अनेक कार्य किये।

  • गुरु अंगद देव जी की भान्ति गुरु अमरदास जी ने भी श्री गुरु नानक देव जी के नाम से वाणी की रचना की।
  • उन्होंने गोइन्दवाल साहिब में एक बावली बनवाई, जिसमें उनके सिक्ख (शिष्य) धार्मिक अवसरों पर स्नान करते थे। इस बावली की 84 सीढ़ियां हैं।
  • गुरु अमरदास जी ने जन्म, विवाह तथा अन्य अवसरों पर पढ़ने के लिये आनन्द साहिब नामक वाणी की रचना की।
  • उन्होंने गोइन्दवाल साहिब के बाहर प्रचार कार्य के लिए अपने प्रतिनिधि नियुक्त किए। फलस्वरूप सिक्खों की संख्या बढ़ने लगी।
  • उन्होंने पाठ-कीर्तन के लिए स्थान-स्थान पर अपनी धर्मशालाएं स्थापित की।

प्रश्न 7. गुरु रामदास जी ने सिक्ख धर्म के विकास में क्या योगदान दिया ?
उत्तर-गुरु रामदास जी सिखों के चौथे गुरु थे। वह 1574 से 1581 तक गुरु पद पर रहे। उन्होंने सिख धर्म के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया-

  • उनका सबसे बड़ा योगदान रामदास पुर शहर की नींव डालना था। वह स्वयं भी यहीं कह कर प्रचार कार्य करने लगे।
  • उन्होंने अमृतसर तथा संतोखसर नामक दो सरोवर खुदवाए।
  • उन्होंने मसंद प्रथा प्रारम्भ की। मसंद उनके लिए उनके सिक्खों से भेंट एकत्रित करके लाते थे।
  • उनके समय में सिक्खों तथा उदासियों में समझौता हो गया।

प्रश्न 8. आदि ग्रन्थ साहिब के संकलन तथा महत्त्व के बारे में बताएं।
उत्तर-गुरु अर्जन देव जी द्वारा आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन सिक्ख पंथ के विकास में सबसे महत्त्वपूर्ण पड़ाव था। इसके लिए तैयारी पहले गुरु साहिबान के समय में आरम्भ हो चुकी थी। गुरु अर्जन देव जी ने गुरु अमरदास जी के बड़े पुत्र से पहले तीन गुरु साहिबान तथा कुछ भक्तों की वाणी की पोथियां प्राप्त की। इसमें उन्होंने गुरु रामदास जी तथा अपनी वाणी के साथ-साथ और कुछ अन्य सन्तों, भक्तों एवं सूफ़ी शेखों की रचनायें शामिल की। यह काम 1604 ई० तक सम्पूर्ण कर लिया गया। आदि ग्रन्थ साहिब की हरिमंदर साहिब में स्थापना की गई और बाबा बुड्डा जी इसके पहले ग्रन्थी नियुक्त हुए। आदि ग्रन्थ साहिब को गुरु ग्रन्थ साहिब का दर्जा दिया गया और यह सिक्ख धर्म का मूल स्रोत बन गया। गुरु गोबिन्द सिंह जी के समय ही आदि ग्रन्थ साहिब में गुरु तेग़ बहादुर जी की वाणी भी सम्मिलित कर ली गई। आदि ग्रन्थ साहिब का महत्त्व इस बात से जाना जा सकता है कि इस ग्रन्थ में भक्तों तथा सन्तों के साथ-साथ गुरु साहिबानों की वाणी सामूहिक रूप में प्राप्त हुई जो सिक्ख पंथ का सच्चा मार्गदर्शन करने लगी।

प्रश्न 9. गुरु अर्जन देव जी की शहीदी ने सिक्ख पंथ के इतिहास पर क्या प्रभाव डाला?
उत्तर-गुरु अर्जन देव जी की शहीदी सिक्ख पंथ के इतिहास में एक नया मोड़ सिद्ध हुई।

  • गुरु अर्जन देव जी ने अपनी शहीदी से पहले अपने पुत्र हरगोबिन्द के नाम यह सन्देश छोड़ा, “वह समय बड़ी तेजी से आ रहा है जब भलाई और बुराई की शक्तियों की टक्कर होगी। अतः मेरे पुत्र तैयार हो जाओ, आप शस्त्र पहन और अपने अनुयायियों को शस्त्र पहना। अत्याचारी का सामना तब तक करो जब तक कि वह अपने आपको सुधार न ले।” गुरु जी के इन अन्तिम शब्दों ने सिक्खों में सैनिक भावना को जागृत कर दिया।
  • गुरु जी की शहीदी ने सिक्खों के मन में मुगल राज्य के प्रति घृणा उत्पन्न कर दी।
  • इस शहीदी से सिक्ख धर्म को लोकप्रियता मिली। सिक्ख अब अपने धर्म के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए तैयार हो गए।

प्रश्न 10. गुरु हरगोबिन्द साहिब की नई नीति तथा गतिविधियों के क्या परिणाम निकले ?
उत्तर-गुरु हरगोबिन्द साहिब की नवीन नीति तथा गतिविधियों के महत्त्वपूर्ण परिणाम निकले। गुरु साहिब ने आत्मरक्षा के लिए एक सेना का संगठन किया। इस सेना में अनेक शस्त्रधारी सैनिक तथा स्वयंसेवक सम्मिलित थे। गुरु हरगोबिन्द जी ने अपनी नवीन नीति को अधिक सफल बनाने के लिए एक अन्य महत्त्वपूर्ण पग उठाया। उन्होंने अपने मसन्दों को सन्देश भेजा कि वह धन के बजाय घोड़े तथा शस्त्र उपहार अथवा भेंट के रूप में भेजें। सिक्खों की सुरक्षा के लिए रामदासपुर (अमृतसर) के चारों ओर एक दीवार बनवाई गई। इस नगर में एक दुर्ग का निर्माण भी किया गया, जिसे लोहगढ़ का नाम दिया गया। इस प्रकार के कार्यों से सिक्खों में धार्मिक भावना के साथ-साथ सैनिक गुणों का भी विकास हुआ। फलस्वरूप उन्होंने मुग़ल अत्याचारों का डटकर सामना किया।

प्रश्न 11. गुरु गोबिन्द सिंह जी ने सिक्ख पंथ में साम्प्रदायिक विभाजन तथा बाहरी खतरे की समस्या को कैसे हल किया?
उत्तर-गुरु गोबिन्द सिंह जी ने सिक्ख धर्म में विद्यमान अनेक सम्प्रदायों की तथा बाहरी खतरों की समस्या को भी बड़ी कुशलता से निपटाया। सर्वप्रथम गुरु जी ने पहाड़ी राजाओं से अनेक युद्ध किए और उन्हें पराजित किया। उन्होंने अत्याचारी मुग़लों का भी सफल विरोध किया। 1699 ई० में गुरु गोबिन्द सिंह साहिब ने खालसा की स्थापना करके अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए एक और महत्त्वपूर्ण पग उठाया। खालसा की स्थापना के परिणामस्वरूप सिक्खों ने शस्त्रधारी का रूप धारण कर लिया। खालसा की स्थापना से गुरु जी को सिक्ख धर्म में विद्यमान् विभिन्न सम्प्रदायों से निपटने का अवसर भी मिला। गुरु जी ने घोषणा की कि सभी सिक्ख ‘खालसा’ का रूप हैं और उनके साथ जुड़े हुए हैं। इस प्रकार मसन्दों का महत्त्व समाप्त हो गया और सिक्ख धर्म के विभिन्न सम्प्रदाय खालसा में विलीन हो गए।

IV. निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. गुरु नानक देव जी की मुख्य शिक्षाओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
ईश्वर के बारे में गुरु नानक देव जी के विचारों का वर्णन करते हुए उनकी किन्हीं पांच शिक्षाओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-गुरु नानक देव जी की शिक्षाएं उतनी ही आदर्श थीं जितना कि उनका जीवन। वह कर्मकाण्ड, जाति-पाति, ऊंच-नीच आदि संकीर्ण विचारों से कोसों दूर थे। उन्हें तो सत्यनाम से प्रेम था और इसी का सन्देश उन्होंने अपने सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक प्राणी को दिया। उनकी मुख्य शिक्षाओं का वर्णन इस प्रकार है :

1. ईश्वर की महिमा-गुरु साहिब ने ईश्वर की महिमा का बखान अपने निम्नलिखित विचारों द्वारा किया है :

  • एक ईश्वर में विश्वास-श्री गुरु नानक देव जी ने इस बात का प्रचार किया कि ईश्वर एक है। वह अवतारवाद को स्वीकार नहीं करते थे।
  • ईश्वर निराकार तथा स्वयं-भू है-श्री गुरु नानक देव जी ने ईश्वर को निराकार बताया। उनके अनुसार परमात्मा स्वयं-भू है। अत: उसकी मूर्ति बनाकर पूजा नहीं की जानी चाहिए।
  • ईश्वर सर्वव्यापी तथा सर्वशक्तिमान् है- श्री गुरु नानक देव जी ने ईश्वर को सर्वव्यापी तथा सर्वशक्तिमान् बताया। उनके अनुसार ईश्वर संसार के कण-कण में विद्यमान है। सारा संसार उसी की शक्ति पर चल रहा है।
  • ईश्वर दयालु है-श्री गुरु नानक देव जी का कहना था कि ईश्वर दयालु है। वह अपने भक्तों के पास हर पल रहता है। उनके सभी काम आप संवारता है।

2. सतनाम के जाप पर बल–श्री गुरु नानक देव जी ने सतनाम के जाप पर बल दिया। वह कहते थे कि आत्मा की बुरे विचारों रूपी मैल को सतनाम के जाप से ही धोया जा सकता है।

3. गुरु का महत्त्व-गुरु नानक देव जी के अनुसार ईश्वर प्राप्ति के लिए गुरु की बहुत आवश्यकता है। गुरु रूपी जहाज़ में सवार होकर संसार रूपी सागर को पार किया जा सकता है। उनका कथन है कि “सच्चे गुरु की सहायता के बिना किसी ने भी ईश्वर को प्राप्त नहीं किया।” गुरु ही मुक्ति तक ले जाने वाली वास्तविक सीढ़ी है।

4. कर्म सिद्धान्त में विश्वास-गुरु नानक देव जी का विश्वास था कि मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार बार-बार जन्म लेता है और मृत्यु को प्राप्त होता है। उनके अनुसार बुरे कर्म करने वाले व्यक्ति को अपने कर्मों का फल भुगतने के लिए बार-बार जन्म लेना पड़ता है। इसके विपरीत, शुभ कर्म करने वाला व्यक्ति जन्म-मरण के चक्कर से छूट जाता है और निर्वाण प्राप्त करता है।

5. आदर्श गृहस्थ जीवन पर बल-गुरु नानक देव जी ने आदर्श गृहस्थ जीवन पर बल दिया है। उन्होंने लोगों को संसार में रहकर अच्छा जीवन व्यतीत करने और पवित्र बनने का सन्देश दिया है। उन्होंने इस धारणा को सर्वथा गलत सिद्ध कर दिखाया कि संसार माया जाल है और उसका त्याग किए बिना व्यक्ति मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता। उनके शब्दों में, “अंजन माहि निरंजन रहिए” अर्थात् संसार में रहकर भी मनुष्य को पृथक् और पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए।

6. मनुष्य-मात्र से प्रेम-गुरु नानक देव जी रंग-रूप के भेद-भावों में विश्वास नहीं रखते थे। उनके अनुसार एक ईश्वर की सन्तान होने के नाते सभी मनुष्य भाई-भाई हैं। वह कहते थे, “मैं सभी मनुष्यों को महान् समझता हूँ और किसी को भी नीचा नहीं समझता क्योंकि सभी मनुष्यों को बनाने वाला एक ही है।” अतः उन्होंने लोगों को मनुष्य-मात्र से प्रेम करने का सन्देश दिया।

7. जाति-पाति का खण्डन-गुरु नानक देव जी ने जाति-पाति का घोर विरोध किया। उनकी दृष्टि में न कोई हिन्दू था और न कोई मुसलमान। उनके अनुसार सभी जातियों तथा धर्मों में मौलिक एकता और समानता विद्यमान है।

8. समाज सेवा-गुरु नानक देव जी के अनुसार जो व्यक्ति ईश्वर प्राणियों से प्रेम नहीं करता, उसे ईश्वर की प्राप्ति कदापि नहीं हो सकती। उन्होंने अपने अनुयायियों को निःस्वार्थ भाव से मानव प्रेम और समाज सेवा करने का उपदेश दिया। उनके अनुसार मानवता के प्रति प्रेम, ईश्वर के प्रति प्रेम का ही प्रतीक है।

9. मूर्ति-पूजा का खण्डन-गुरु नानक देव जी ने मूर्ति-पूजा का कड़े शब्दों में खण्डन किया। उनके अनुसार ईश्वर की मूर्तियां बनाकर पूजा करना व्यर्थ है, क्योंकि ईश्वर अमूर्त तथा निराकार है।

10. यज्ञ, बलि तथा व्यर्थ के कर्मकाण्डों में अविश्वास-गुरु नानक देव जी ने व्यर्थ के कर्मकाण्डों का घोर खण्डन किया और ईश्वर की प्राप्ति के लिए यज्ञों तथा बलि आदि को व्यर्थ बताया। उनके अनुसार बाहरी दिखावे का प्रभु भक्ति में कोई स्थान नहीं है।

11. सर्वोच्च आनन्द (सचखण्ड) की प्राप्ति-गुरु नानक देव जी के अनुसार मनुष्य जीवन का उद्देश्य सर्वोच्च आनन्द (सचखण्ड) की प्राप्ति है। सर्वोच्च आनन्द वह मानसिक स्थिति है जहां मनुष्य सभी चिन्ताओं तथा कष्टों से मुक्त हो जाता है। उसका दुःखी हृदय शान्त हो जाता है। ऐसी अवस्था में मनुष्य की आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती है।

12. नैतिक जीवन पर बल-गुरु नानक देव जी ने लोगों को नैतिक जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने आदर्श जीवन के लिए कई सिद्धान्त प्रस्तुत किए-

  • सदा सत्य बोलना।
  • नाम जपना।
  • नेक कमाई खाना।
  • दूसरों की भावनाओं को कभी ठेस न पहुंचाना
  • मिल-बाँट कर छकना। ‘किरत करना, वंड खाना तथा नाम जपना’ इस सिद्धान्त का मूल सार है।
    सच तो यह है कि गुरु नानक देव जी एक महान् सन्त और समाज सुधारक थे।

प्रश्न 2. गुरु अर्जन देव जी ने सिक्ख धर्म के विकास में क्या योगदान दिया ?
अथवा
सिख धर्म के प्रसार के लिए श्री गुरु अर्जन देव जी द्वारा किए गए किन्हीं पांच कार्यों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-गुरु अर्जन देव जी के गुरुगद्दी सम्भालते ही सिक्ख धर्म के इतिहास ने नवीन दौर में प्रवेश किया। उनके प्रयास से हरिमंदर साहिब बना और सिक्खों को अनेक तीर्थ स्थान मिले। यही नहीं उन्होंने गुरु ग्रन्थ साहिब का संकलन किया जिसे सिक्ख धर्म में सबसे अधिक पूजनीय स्थान प्राप्त है। संक्षेप में, गुरु अर्जन देव जी के कार्यों तथा सफलताओं का वर्णन इस प्रकार है :-

1. हरिमंदर साहिब का निर्माण-गुरु रामदास जी के ज्योति जोत समाने के पश्चात् गुरु अर्जन देव जी ने अमृतसर तथा सन्तोखसर नामक सरोवरों का निर्माण कार्य पूरा किया। उन्होंने ‘अमृतसर’ तालाब के बीच हरिमंदर साहिब का निर्माण करवाया। गुरु जी ने इसके चारों ओर एक-एक द्वार रखवाया। ये द्वार इस बात का प्रतीक हैं कि हरिमंदर साहिब सभी जातियों तथा धर्मों के लोगों के लिए खुला है।

2. तरनतारन की स्थापना-गुरु अर्जन देव जी ने अमृतसर के अतिरिक्त अन्य अनेक नगरों, सरोवरों तथा स्मारकों का निर्माण करवाया। तरनतारन भी इनमें से एक था। उन्होंने इसका निर्माण प्रदेश के ठीक मध्य में करवाया। अमृतसर की भान्ति तरनतारन भी सिक्खों का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान बन गया।

3. लाहौर में बाऊली का निर्माण-गुरु अर्जन देव जी ने अपनी लाहौर यात्रा के दौरान डब्बी बाज़ार में एक बाऊली का निर्माण करवाया। इसके निर्माण से बाऊली के निकटवर्ती प्रदेशों के सिक्खों को एक तीर्थ स्थान की प्राप्ति हुई।

4. हरगोबिन्दपुर तथा छहरटा की स्थापना-गुरु जी ने अपने पुत्र हरगोबिन्द के जन्म की खुशी में ब्यास नदी के तट पर हरगोबिन्दपुर नामक नगर की स्थापना की। इसके अतिरिक्त उन्होंने अमृतसर के निकट पानी की कमी को दूर करने के लिए एक कुएं का निर्माण करवाया। इस कुएं पर छः रहट चलते थे। इसलिए इसे छहरटा के नाम से पुकारा जाने लगा।

5. करतारपुर की नींव रखना-गुरु जी ने 1539 ई० में जालन्धर दोआब में एक नगर की स्थापना की जिसका नाम करतारपुर रखा गया। यहां उन्होंने एक सरोवर का निर्माण करवाया जो गंगसर के नाम से प्रसिद्ध है।

6. मसन्द प्रथा का विकास-गुरु अर्जन देव जी ने मसन्द प्रथा में सुधार लाने की आवश्यकता अनुभव की। उन्होंने सिक्खों को आदेश दिया कि वह अपनी आय का 1/10 भाग आवश्यक रूप से मसन्दों को जमा कराएं। मसन्द वैशाखी के दिन इस राशि को अमृतसर के केन्द्रीय कोष में जमा करवा देते थे। राशि को एकत्रित करने के लिए वे अपने प्रतिनिधि नियुक्त करने लगे। इन्हे ‘संगती’ कहते थे। दशांश इकट्ठा करने के अतिरिक्त मसन्द उस क्षेत्र में सिक्ख धर्म का प्रचार करते थे।

7. आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन-गुरु अर्जन देव जी ने आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन करके सिक्खों को एक महान् धार्मिक ग्रन्थ प्रदान किया। गुरु जी ने आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन कार्य रामसर में आरम्भ किया। इस कार्य में भाई गुरदास जी ने गुरु जी को सहयोग दिया। अन्त में 1604 ई० में आदि ग्रन्थ साहिब की रचना का कार्य सम्पन्न हुआ। इस पवित्र ग्रन्थ में उन्होंने अपने से पहले चार गुरु साहिबान की वाणी, फिर भक्तों की वाणी तथा उसके पश्चात् भाटों की वाणी का संग्रह किया।

8. घोड़ों का व्यापार-गुरु जी ने सिक्खों को घोड़ों का व्यापार करने के लिए प्रेरित किया। इससे सिक्खों को निम्नलिखित लाभ हुए :

  • उस समय घोड़ों के व्यापार से बहुत लाभ होता था। परिणामस्वरूप सिक्ख धनी हो गए। अब उनके लिए दसवंद (1/10) देना कठिन न रहा।
  • इस व्यापार से सिक्खों को घोड़ों की अच्छी परख हो गई। यह बात उनके लिए सेना संगठन के कार्य में बड़ी काम आई।

9. धर्म प्रचार कार्य-गुरु अर्जन देव जी ने धर्म-प्रचार द्वारा भी अनेक लोगों को अपना शिष्य बना लिया। उन्होंने अपनी आदर्श शिक्षाओं, सद्व्यवहार, नम्र स्वभाव तथा सहनशीलता से अनेक लोगों को प्रभावित किया। उनके प्रभाव में आकर हज़ारों लोग उनके अनुयायी बन गए। इनमें कुछ मुसलमान भी सम्मिलित थे।
संक्षेप में, इतना कहना ही काफ़ी है कि गुरु अर्जन देव जी के काल में सिक्ख धर्म ने बहुत प्रगति की। आदि ग्रन्थ साहिब की रचना हुई, तरनतारन, करतारपुर तथा छहरटा अस्तित्व में आए तथा हरिमंदर साहिब सिक्ख धर्म की शोभा बन गया।

प्रश्न 3. आदि ग्रन्थ साहिब पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो।
उत्तर-आदि ग्रन्थ साहिब सिक्खों का पवित्र धार्मिक ग्रन्थ है। वे इसका ‘गुरु ग्रन्थ साहिब’ कहकर आदर करते हैं। इस ग्रन्थ का संकलन श्री गुरु अर्जन देव जी ने किया था।
आदि ग्रन्थ साहिब की रचना (संकलन) के कारण-आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन कई कारणों से किया गया-

  • गुरु अर्जन देव जी के पहले के चार गुरु साहिबान की रचनाएं बिखरी पड़ी थीं। गुरु अर्जन देव जी ने इन रचनाओं को सुरक्षित करने के लिए इनका संग्रह आवश्यक समझा।
  • गुरु अर्जन देव जी के बड़े भाई पृथिया ने सिक्ख गुरु साहिबान के नाम पर अनेक गीतों की रचना कर ली थी। अतः एक साधारण सिक्ख के लिए गुरु साहिबान के वास्तविक शबदों को ढूंढ़ना बड़ा कठिन हो गया था। इस बात को ध्यान में रखते हुए गुरु साहिबान की वास्तविक वाणी का संग्रह करना आवश्यक था।
  • गुरु अर्जन देव जी सिक्खों के पथ-प्रदर्शन के लिए कुछ विशेष नियम बनाना चाहते थे। अतः उनके मन में एक नियमपुस्तक तैयार करने का विचार उत्पन्न हुआ।
  • सिक्खों के पास अपनी लिपि तथा भाषा पहले ही थी। अब गुरु अर्जन देव जी ने यह अनुभव किया कि उन्हें उनकी बोलचाल की भाषा में एक धार्मिक ग्रन्थ दिया जाना चाहिए।

आदि ग्रन्थ साहिब की रचना-सिक्खों के तीसरे गुरु अमरदास जी के पुत्र बाबा मोहन गोइन्दवाल साहिब में पहले तीन गुरु साहिबान की रचनाओं को लिपिबद्ध कर रहे थे। यह रचनाएं प्राप्त करने के लिए गुरु अर्जन देव जी स्वयं नंगे पांव चलकर गोइन्दवाल साहिब गए। बाबा मोहन जी गुरु जी की विनम्रता से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने सारी वाणी गुरु अर्जन देव जी को सौंप दी। गुरु जी ने अनेक हिन्दू और मुसलमान विद्वानों को भी आदि ग्रन्थ साहिब की रचना में सहायता देने के लिए आमन्त्रित किया।

प्रारम्भिक तैयारी के पश्चात् गुरु अर्जन देव जी ने अमृतसर से लगभग पांच मील दक्षिण की ओर एक एकान्त स्थान पर आदि ग्रन्थ साहिब की रचना का कार्य आरम्भ किया। 1604 ई० में यह कार्य मुकम्मल हो गया। इसको अमृतसर के हरिमंदर साहिब में प्रतिष्ठित किया गया। बाबा बुड्डा जी को वहां का पहला मुख्य ग्रन्थी नियुक्त किया गया।

विषय-वस्तु-आदि ग्रन्थ साहिब में पहले पांच सिक्ख गुरु साहिबान की बाणी सम्मिलित है। बाद में गुरु गोबिंद सिंह जी के समय में गुरु तेग़ बहादुर जी की बाणी भी इसमें शामिल कर ली गई। इसमें कुछ हिन्द्र तथा मुसलमान सन्तों और फ़कीरों तथा प्रसिद्ध भाटों की रचनाएं भी शामिल हैं।

प्रश्न 4. गुरु अर्जन देव जी का बलिदान क्यों हुआ ? इसकी क्या प्रतिक्रिया हुई ?
उत्तर-गुरु अर्जन देव जी का बलिदान मुग़ल सम्राट जहांगीर के समय में जून 1606 ई० को हुआ।
कारण-(1) गुरु साहिब की शहीदी के पीछे मुख्यतः जहांगीर की कट्टर धार्मिक नीति का हाथ था। वह कट्टर मुसलमान था।
(2) गुरु जी द्वारा आदि ग्रन्थ साहिब की रचना ने जहांगीर के सन्देह को और बढ़ा दिया। गुरु जी के शत्रुओं ने जहांगीर को बताया कि आदि ग्रन्थ साहिब में इस्लाम धर्म के विरुद्ध काफ़ी कुछ लिखा गया है। यह सुनकर मुग़ल सम्राट का क्रोध काफ़ी बढ़ गया। उसने श्री गुरु अर्जन देव जी को कठोर शारीरिक कष्ट देने का आदेश जारी कर दिया। बाद में लाहौर के मुसलमान फकीर मियांमीर के प्रयत्नों से इस दण्ड को दो लाख रुपए के जुर्माने में बदल दिया गया। परन्तु गुरु जी ने जुर्माना देना स्वीकार नहीं किया। वह अपने धन का प्रयोग केवल निर्धनों एवं अनाथों की सेवा के लिए ही व्यय करना चाहते थे। अतः मुग़ल सम्राट ने क्रोध में आकर गुरु जी के लिए फिर से मृत्यु दण्ड का आदेश जारी कर दिया। सिक्ख परम्पराओं के अनुसार गुरु जी को क्रूर यातनाएं दी गईं। उनके शरीर पर गर्म रेत डाली गई और उन्हें उबलते पानी में डाला गया। कुछ विद्वानों के अनुसार गुरु जी ने यातनाओं के बीच रावी नदी में स्नान करने की इच्छा प्रकट की और वहां उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।

शहीदी की प्रतिक्रिया-गुरु अर्जन देव जी की शहीदी से महत्त्वपूर्ण प्रतिक्रिया हुई :

  • गुरु अर्जन देव जी ने अपनी शहीदी से पहले अपने पुत्र हरगोबिन्द के नाम यह सन्देश छोड़ा, “वह समय बड़ी तेजी से आ रहा है जब भलाई और बुराई की शक्तियों की टक्कर होगी। अतः मेरे पुत्र तैयार हो जा, आप शस्त्र पहन और अपने अनुयायियों को शस्त्र पहना। अत्याचारी का सामना तब तक करो जब तक कि वह अपने आपको सुधार न ले।” गुरु जी के इन अन्तिम शब्दों ने सिक्खों में सैनिक भावना को जागृत कर दिया।
  • गुरु जी की शहीदी से सिक्खों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहंची और उनके मन में मुस्लिम राज्य के प्रति घृणा उत्पन्न हो गई।
  • इस शहीदी से सिक्ख धर्म को लोकप्रियता मिली। सिक्ख अब अपने धर्म के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिये तैयार हो गए। निःसन्देह गुरु अर्जन देव जी की शहीदी सिक्ख इतिहास में एक नया मोड़ सिद्ध हुई।

प्रश्न 5. गुरु हरगोबिन्द जी की नई नीति का वर्णन करो।
अथवा
श्री गुरु हरगोबिन्द साहिब की नई नीति की पांच मुख्य विशेषताएं बताइए।
उत्तर- गुरु अर्जन देव जी की शहीदी के पश्चात् उनके पुत्र हरगोबिन्द जी सिक्खों के छठे गुरु बने। उन्होंने एक नई नीति को जन्म दिया। इस नीति का प्रमुख उद्देश्य सिक्खों को शान्ति-प्रिय होने के साथ निडर तथा साहसी बनाना था। गुरु साहिब द्वारा अपनाई गई नवीन नीति की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित थीं:

1. राजसी चिन्ह तथा ‘सच्चे पातशाह’ की उपाधि धारण करना-नवीन नीति का अनुसरण करते हुए गुरु हरगोबिन्द जी ने ‘सच्चे पातशाह’ की उपाधि धारण की तथा अनेक राजसी चिन्ह धारण करने आरम्भ कर दिए। उन्होंने शाही वस्त्र धारण किए और सेली तथा टोपी की जगह दो तलवारें, छत्र और कलगी धारण कर ली। गुरु जी अब अपने अंगरक्षक भी रखने लगे।

2. मीरी तथा पीरी-गुरु हरगोबिन्द जी अब सिक्खों के आध्यात्मिक नेता होने के साथ-साथ उनके सैनिक नेता भी बन गए। वे सिक्खों के पीर भी थे और मीर भी। इन दोनों बातों को स्पष्ट करते हुए उन्होंने पीरी तथा मीरी नामक दो तलवारें धारण की। उन्होंने सिक्खों की शारीरिक उन्नति पर विशेष बल दिया। उन्होंने सिक्खों को व्यायाम करने, कुश्तियां लड़ने, शिकार खेलने तथा घुड़सवारी करने की प्रेरणा दी। इस प्रकार उन्होंने सन्त सिक्खों को सन्त सिपाहियों का रूप भी दे दिया।

3. अकाल तख्त का निर्माण-गुरु जी सिक्खों को आध्यात्मिक शिक्षा देने के अतिरिक्त सांसारिक विषयों में भी उनका पथ-प्रदर्शन करना चाहते थे। हरिमंदर साहिब में वे सिक्खों को धार्मिक शिक्षा देने लगे। परन्तु सांसारिक विषयों में सिक्खों का पथ-प्रदर्शन करने के लिए उन्होंने हरिमंदर साहिब के सामने एक नया भवन बनाया जिसका नाम अकाल तख्त (ईश्वर की गद्दी) रखा गया। इस प्रकार भवन के अन्दर निर्मित 12 फुट ऊंचे चबूतरे पर बैठकर वे सिक्खों की सैनिक तथा राजनीतिक समस्याओं का समाधान करने लगे।

4. सेना का संगठन-गुरु हरगोबिन्द जी ने आत्मरक्षा के लिए सेना का संगठन किया। इस सेना में अनेक शस्त्रधारी सैनिक सम्मिलित थे। माझा के अनेक युद्ध प्रिय लोग गुरु जी की सेना में भर्ती हो गए। मोहसिन फ़ानी के मतानुसार, गुरु जी ने सेना में 800 घोड़े 300,घुड़सवार तथा 60 बन्दूकची थे। उनके पास 500 ऐसे स्वयं सेवक भी थे जो वेतन नहीं लेते थे। इसके अतिरिक्त पैंदे खां नामक पठान के अधीन पठानों की एक पृथक् सेना थी।

5. घोड़ों तथा शस्त्रों का संग्रह-गुरु हरगोबिन्द जी ने अपनी नवीन-नीति को अधिक सफल बनाने के लिए एक अन्य महत्त्वपूर्ण पग उठाया। उन्होंने अपने सिक्खों से आग्रह किया कि जहां तक सम्भव हो वे शस्त्र तथा घोड़े ही भेंट में दे। परिणामस्वरूप गुरु जी के पास काफ़ी मात्रा में सैनिक सामग्री इकट्ठी हो गई।

6. अमृतसर की किलेबन्दी-गुर जी ने सिक्खों की सुरक्षा के लिए रामदासपुर (अमृत्सर) के चारों ओर एक दीवार बनवाई । इस नगर में दुर्ग का निर्माण भी किया गया जिसे लोहगढ़ का नाम दिया गया। इस किले में काफ़ी सैनिक सामग्री रखी गई।

7. गुरु जी की दिनचर्या में परिवर्तन-गुरु हरिगोबिन्द जी की नवीन नीति के अनुसार उनकी दिनचर्या में भी कुछ परिवर्तन आए। नई दिनचर्या के अनुसार वे प्रातःकाल स्नान आदि करके हरिमंदर साहिब में धार्मिक उपदेश देने के लिए चले जाते थे और फिर अपने सैनिकों में प्रात:काल का भोजन बांटते थे। इसके पश्चात् वे कुछ समय के लिए विश्राम करके शिकार के लिए निकल पड़ते थे। गुरु जी ने अब्दुल तथा नत्थामल को जोशीले गीत ऊंचे स्वर में गाने के लिए नियुक्त किया। उन्होंने दुर्बल मन को सबल बनाने के लिए अनेक गीत मण्डलियां बनाईं। इस प्रकार गुरु जी ने सिक्खों में नवीन चेतना और नये उत्साह का संचार किया।

8. आत्मरक्षा की भावना-गुरु हरिगोबिन्द जी की नवीन नीति आत्मरक्षा की भावना पर आधारित थी। वह सैनिक बल पर न तो किसी के प्रदेश पर अधिकार करने के पक्ष में थे और न ही किसी पर ज़बरदस्ती आक्रमण करने के पक्ष में थे। यह सच है कि उन्होंने मुग़लों के विरुद्ध अनेक युद्ध लड़े। परन्तु इन युद्धों का उद्देश्य मुग़लों के प्रदेश छीनना नहीं था बल्कि उनसे अपनी रक्षा करना था।

प्रश्न 6. (क) उन परिस्थितियों का वर्णन करो जो गुरु तेग बहादुर जी की शहीदी के लिए उत्तरदायी थीं।
(ख) सिक्ख इतिहास में उनकी शहीदी का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-(क) परिस्थितियां-गुरु तेग़ बहादुर जी की शहीदी निम्नलिखित परिस्थितियों में हुई :

1. सिक्खों और मुग़लों में बढ़ता हुआ विरोध-अकबर के शासनकाल के बाद मुग़लों और सिक्खों के आपसी सम्बन्ध बिगड़ने लगे, परन्तु जहांगीर के समय से मुग़लों और सिक्खों में आपसी शत्रुता शुरू हो गई। जहांगीर ने सिक्ख गुरु अर्जन देव जी को शहीद कर दिया था। अतः सिक्खों ने भी आत्मरक्षा के लिए शस्त्र धारण करने आरम्भ कर दिए थे। उनके शस्त्र धारण करते ही मुग़लों तथा सिक्खों में शत्रुता इतनी गहरी हो गई जो आगे चलकर गुरु तेग़ बहादुर जी के बलिदान का कारण बनी।

2. औरंगजेब की असहनशीलता की नीति-औरंगज़ेब एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसने अपनी हिन्दू जनता पर अत्याचार करने शुरु कर दिए और उन पर अनेक प्रतिबन्ध लगा दिए गए। उन्हें ज़बरदस्ती मुसलमान बनाने का प्रयास भी किया। औरंगज़ेब द्वारा निर्दोष लोगों पर लगाए जा रहे प्रतिबन्धों ने गुरु तेग़ बहादुर जी के मन पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला और उन्होंने निश्चय कर लिया कि वे अपनी जान देकर भी इन अत्याचारों से लोगों की रक्षा करेंगे। आखिर उन्होंने यही किया।

3. सिक्ख धर्म का उत्साहपूर्ण प्रचार-गुरु नानक देव जी के पश्चात् गुरु तेग़ बहादुर जी ने भी स्थान-स्थान पर भ्रमण करके सिक्ख मत का प्रचार किया। औरंगज़ेब सिक्ख धर्म के इस प्रचार को सहन न कर सका। वह मन ही मन सिक्ख गुरु तेग़ बहादुर जी से ईर्ष्या करने लगा।

4. राम राय की शत्रुता-गुरु हरकृष्ण जी के भाई राम राय ने औरंगजेब से शिकायत की कि गुरु जी का धर्म प्रचार का कार्य राष्ट्र हित के विरुद्ध है। उसकी बातों में आकर औरंगजेब ने गुरु जी को सफ़ाई पेश करने के लिए मुग़ल दरबार में (दिल्ली) बुलाया और जहां गुरु जी ने अपने प्राणों की आहुति दे दी।

5. कश्मीरी ब्राह्मणों की पुकार-कुछ कश्मीरी ब्राह्मण मुग़ल अत्याचारों से तंग आ चुके थे। उन्हें कश्मीर का मुग़ल गवर्नर ज़बरदस्ती मुसलमान बनाना चाहता था। उन्होंने गुरु जी से यह प्रार्थना की कि वे उनकी रक्षा करें। ब्राह्मणों की दुःख भरी कहानी सुनकर गुरु जी ने कहा कि इस समय धर्म को बलिदान की आवश्यकता है। अतः उन्होंने ब्राह्मणों से कहा कि वे औरंगजेब से जाकर कहें कि “पहले हमारे गुरु साहिब को मुसलमान बनाओ, फिर हम सब लोग भी आपके धर्म को स्वीकार कर लेंगे।” इस प्रकार आत्म-बलिदान की भावना से प्रेरित होकर गुरु तेग़ बहादुर जी दिल्ली की ओर चल पड़े जहां उन्हें शहीद कर दिया गया।

(ख) शहीदी का महत्त्व-इतिहास में गुरु तेग़ बहादुर जी की शहीदी के महत्त्व को निम्नलिखित बातों के आधार पर जाना जा सकता है-

  • धर्म के प्रति बलिदान की परम्परा को बनाये रखना-गुरु तेग़ बहादुर जी ने धर्म के प्रति अपने जीवन का बलिदान देकर गुरु साहिबान के बलिदान की परम्परा को बनाए रखा। उनसे पहले गुरु अर्जन देव जी ने धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया था।
  • खालसा की स्थापना- गुरु तेग़ बहादुर जी के बलिदान से गुरु गोबिन्द सिंह जी इस परिणाम पर पहुंचे कि जब तक भारत में मुग़ल राज्य रहेगा, तब धार्मिक अत्याचार समाप्त नहीं होंगे। मुग़ल अत्याचारों का सामना करने के लिए उन्होंने 1699 ई में आनन्दपुर साहिब में खालसा की स्थापना की।
  • मुग़लों के विरुद्ध घृणा तथा बदले की भावनाएं-गुरु तेग़ बहादुर जी के बलिदान से मुग़लों के अत्याचारों के विरुद्ध घृणा तथा बदले की भावनाएं भड़क उठीं।
  • मुग़ल साम्राज्य को धक्का-गुरु तेग़ बहादुर जी के बलिदान ने मुग़ल साम्राज्य की नींव हिला दी। गुरु गोबिन्द सिंह जी के वीर खालसा मुग़ल साम्राज्य से निरन्तर जूझते रहे जिससे मुग़लों की शक्ति को भारी धक्का पहुंचा।

प्रश्न 7. गुरु गोबिन्द सिंह जी के जीवन तथा पूर्व खालसा काल में सफलताओं का सक्षिप्त वर्णन कीजिए।
अथवा
निम्नलिखित पर नोट लिखिए : (क) भंगानी तथा नादौन के युद्ध (ख) खालसा की स्थापना।
उत्तर-गुरु गोबिन्द सिंह जी सिक्खों के दसवें तथा अन्तिम गुरु थे। वे अद्भुत प्रतिभा के स्वामी थे। उनमें एक साथ अनेक योग्यताएं विद्यमान् थीं। वह एक महान् आध्यात्मिक नेता जन्मजात सेनानायक, कुशल संगठनकर्ता और प्रतिभाशाली विद्वान् थे। डॉ० इन्दु भूषण बैनर्जी के शब्दों में “गुरु गोबिन्द सिंह जी की गणना सभी युगों के सबसे महान् भारतीयों में की जानी चाहिए। वे नौवें गुरु तेग बहादुर जी के इकलौते पुत्र थे। इनका जन्म 22 दिसम्बर, 1666 ई० को पटना में हुआ। उनके बचपन के 6 वर्ष पटना में व्यतीत हुए।
शिक्षा तथा पिता की शहीदी- 1673 ई० में गुरु तेग बहादुर जी पटना से मक्खोवाल आ गए। वहां गोबिन्द राय जी को घुड़सवारी तथा युद्ध कला की शिक्षा दी गई। इन्होंने अरबी तथा फ़ारसी तथा गुरुमुखी का ज्ञान प्राप्त किया।

गोबिन्द राय अभी 9 वर्ष के ही थे कि इनके पिता गुरु तेग़ बहादुर को हिन्दू धर्म के लिए शहीदी देनी पड़ी। इस शहीदी का गोबिन्द राय पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। गुरुगद्दी सम्भालते ही उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए सैनिक तैयारियां आरम्भ कर दी। डॉ० इन्दु भूषण बैनर्जी ने गुरु गोबिन्द सिंह जी के जीवन को दो कालों में बांटा है-(क) पूर्व खालसा काल (ख) उत्तर खालसा काल।

(क) पूर्व खालसा काल (1675-1699) –

पूर्व खालसा काल में गुरु जी ने सर्वप्रथम अपनी एक सेना तैयार करनी आरम्भ की और कुछ ही समय में उन्होंने एक शक्तिशाली सेना तैयार कर ली। गुरु जी ने एक नगारा भी बनवाया जिसे रणजीत नगारा के नाम से पुकारा जाता था।
बिलासपुर का राजा भीमचन्द गुरु जी की बढ़ती हुई सैनिक शक्ति से घबरा उठा और वह उनके विरुद्ध युद्ध की तैयारी करने लगा। श्रीनगर के राजा का ‘बिलासपुर से सम्बन्ध होने से दोनों की शक्ति बढ़ गई। यह बात नाहन के राजा मेदिनी प्रकाश के लिए चिन्ताजनक थी। उसने गुरु जी से सम्बन्ध बढ़ाने चाहे और गुरु जी को अपने यहां आमन्त्रित किया। गुरु जी ने उसके निमन्त्रण को स्वीकार कर लिया। वहां उन्होंने पौण्टा नामक किले का निर्माण करवाया। पौण्टा में गुरु जी ने फिर से सेना का संगठन आरम्भ कर दिया।

भंगानी तथा नादौन के युद्ध-1688 ई० में बिलासपुर के राजा भीमचन्द ने अन्य पहाड़ी राजाओं के साथ मिल कर गुरु जी पर आक्रमण कर दिया। पौण्टा से लगभग 6 मील दूर भंगानी के स्थान पर पहाड़ी राजाओं तथा सिक्खों में घमासान युद्ध हुआ। युद्ध में पठान तथा उदासी सैनिक गुरु जी का साथ छोड़ गए। परन्तु ठीक इसी समय पर सढौरा का पीर बुद्धशाह गुरु जी की सहायता के लिए आ पहुंचा। उनकी सहायता से गुरु जी ने पहाड़ी राजाओं को बुरी तरह परास्त किया। यह गुरु जी की पहली महत्त्वपूर्ण विजय थी। भंगानी विजय के पश्चात् गुरु जी आनन्दपुर वापस आ गए। उन्होंने आनन्दपुर को अपना कार्य-क्षेत्र बनाया। उन्होंने लोहगढ़, केसगढ़, आनन्दगढ़ तथा फतेहगढ़ नामक चार दुर्गों का निर्माण भी करवाया।

उनकी बढ़ती हुई शक्ति को देखकर भीमचन्द तथा अन्य पहाड़ी राजाओं ने गुरु जी से मित्रता कर लेने में ही अपनी भलाई समझी। अब वे इतने निश्चिन्त हो गए कि उन्होंने मुग़ल सम्राट् को वार्षिक कर देना भी बन्द कर दिया। मुग़ल सम्राट् इसे सहन न कर सका। उसने सरहिन्द के मुग़ल गवर्नर को पहाड़ी राजाओं के विरुद्ध कार्यवाही करने का आदेश दिया। शीघ्र ही सरहिन्द के मुग़ल-गवर्नर ने अलिफ खां के नेतृत्व में पहाड़ी राजाओं तथा गुरु जी के विरुद्ध एक विशाल सेना भेज दी। कांगड़ा से 20 मील दूर नादौन के स्थान पर घमासान युद्ध हुआ। मुग़ल बुरी तरह पराजित हुए। कुछ समय पश्चात् सरहिन्द के गवर्नर ने गुरु जी के विरुद्ध एक बार फिर सेना भेजी, परन्तु अब भी उसे पराजय ही हाथ लगी। अन्त में औरंगजेब के बेटे राजकुमार मुअज्जम ने मिर्जाबेग के नेतृत्व में एक भारी सेना गुरु जी के विरुद्ध भेजी। गुरु जी ने मिर्जाबेग को भी पराजित कर दिया।

Class 11 History Solutions Chapter 11 श्री गुरु नानक देव जी और सिक्ख पंथ की स्थापना 1

खालसा की स्थापना-1699 ई० को वैशाखी के दिन गुरु गोबिन्द सिंह जी ने आनन्दपुर साहिब में एक विशाल सभा बुलवाई। इस सभा में लगभग 80 हज़ार लोग शामिल हुए। जब सभी लोग अपने स्थान पर बैठ गए तो गुरु जी ने नंगी तलवार घुमाते हुए कहा-“क्या आप में कोई ऐसा सिक्ख है जो धर्म के लिए अपना सिर दे सके ?” सारी सभा में सन्नाटा छा गया। गुरु जी ने इस वाक्य को तीन बार दोहराया। तब लाहौर निवासी दयाराम ने अपने आपको बलिदान के लिए प्रस्तुत किया। गुरु जी उसे शिविर में ले गए और खून से लथपथ तलवार लेकर बाहर आए। एक बार फिर उन्होंने बलिदान की मांग की। इस प्रकार यह मांग बार-बार दोहराई गई। क्रमश: धर्मदास, मोहकम चन्द, साहिब चन्द तथा हिम्मत राय ने अपने आपको बलिदान के लिए प्रस्तुत किया। सिक्ख इतिहास में इन पांचों व्यक्तियों को पांच प्यारे’ कह कर पुकारा जाता है। गुरु जी ने दोधारी तलवार (खण्डा) से पाहुल तैयार करके इन पांचों व्यक्तियों को अमृत पान करवाया। इस प्रकार वे ‘खालसा’ कहलाए और सिंह बन गए। गुरु जी ने स्वयं भी उनके हाथों से अमृत पान किया। इस प्रकार वे भी गोबिन्द राय से गोबिन्द सिंह बन गए। गुरु जी द्वारा खालसा की स्थापना के विषय में डॉ० इन्दू बनर्जी ने लिखा है-
“उन्होंने खालसा नामक एक नवीन संगठन को जन्म देकर भारतीय इतिहास में एक सक्रिय शक्ति का समावेश fanelli” (“He brought a new people (Khalsa) into being and released a new dynamic force into the arena of Indian History.”)

प्रश्न 8. उत्तर खालसा काल में गुरु गोबिन्द सिंह जी की गतिविधियों एवं सफलताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-गुरु गोबिन्द सिंह जी के जीवन की 1699 ई० के पश्चात् की अवधि उत्तर खालसा काल के नाम से प्रसिद्ध है। इस काल में गुरु साहिब की गतिविधियों एवं सफलताओं का वर्णन इस प्रकार है :-

आनन्दपुर साहिब का प्रथम (1701 ई० ) तथा दूसरा युद्ध ( 1703 ई०)-खालसा की स्थापना से पहाड़ी राजा घबरा गए। अतः भीमचन्द ने अन्य पहाड़ी राजाओं के साथ मिलकर आनन्दपुर साहिब पर आक्रमण कर दिया। कम सैनिकों के होने पर भी गुरु जी ने उनका डटकर सामना किया। पहाड़ी राजा पराजित हुए। परन्तु कुछ समय पश्चात् पहाड़ी राजाओं ने मुग़लों से सहायता प्राप्त करके आनन्दपुर साहिब पर एक बार फिर आक्रमण कर दिया। इस बार भी उन्हें कोई सफलता न मिली। विवश होकर उन्हें गुरु जी से सन्धि करनी पड़ी। पहाड़ी राजा सन्धि के बाद भी सैनिक तैयारियां करते रहे। उन्होंने गुजरों को अपने साथ मिला लिया। मुग़ल सम्राट ने भी उनकी, सहायता की प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। 1703 ई० में सरहिन्द के गवर्नर वज़ीर खां ने सिक्खों की शक्ति को कुचलने के लिए एक विशाल सेना भेजी। सभी ने मिलकर आनन्दपुर साहिब को घेरा डाल दिया।

गुरु जी ने अपने वीर सिक्खों की सहायता से मुग़लों का डट कर सामना किया। परन्तु अन्त में गुरु जी को आनन्दपुर साहिब छोड़ना पड़ा। मुग़ल सैनिकों ने गुरु जी का पीछा किया। जब वे सिरसा नदी पार कर रहे थे तो सेना में भगदड़ मच जाने के कारण गुरु जी की माता जी तथा उनके दो छोटे पुत्र जुझार सिंह तथा फतेह सिंह उनसे बिछुड़ गए। गुरु जी के पुराने रसोइए गंगू ने गुरु जी से विश्वासघात किया और गुरु पुत्रों को मुग़लों के हवाले कर दिया। सरहिन्द के सूबेदार वज़ीर खां ने उन्हें मुसलमान बनने को कहा, परन्तु निडर साहिबजादों ने अपना धर्म बदलने से स्पष्ट इन्कार कर दिया। परिणामस्वरूप उन्हें दीवार में चिनवा दिया गया और वे शहीदी को प्राप्त हुए।

चमकौर साहिब (1704 ई०) तथा खिदराना ( 1705 ई०) के युद्ध-सिरसा नदी को पार करके गुरु जी चमकौर पहुंचे। पहाड़ी राजाओं तथा मुग़ल सेनाओं ने उन्हें यहां भी आ घेरा। उस समय गुरु जी के साथ उनके दो पुत्र अजीत सिंह तथा जोरावर सिंह के अतिरिक्त केवल 40 सिक्ख थे। उन्होंने मुग़लों का डटकर सामना किया। गुरु जी के दोनों पुत्र और 35 सिक्ख सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। सिक्खों के प्रार्थना करने पर गुरु जी अपने 5 साथियों सहित माछीवाड़ा के जंगलों में चले गए। इसके बाद गुरु जी कोटकपूरा पहुंचे। मुग़ल सेना अब भी उनके पीछे थी। इसलिए कोटकपूरा के चौधरी ने गुरु जी को शरण देने से इन्कार कर दिया। गुरु जी वहां से सीधे खिदराना पहुंचे । यहा मुग़लों के साथ उनका अन्तिम युद्ध हुआ। इस युद्ध में वे चालीस सिक्ख भी गुरु जी से आ मिले जो आनन्दपुर साहिब के युद्ध में उनका साथ छोड़ गये थे। इस बार वे बड़ी वीरता से लड़े और लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए। उन्होंने इन शहीदों को अपनी पिछली भूल के लिए क्षमा कर दिया और उनकी मुक्ति के लिए प्रार्थना भी की । इसलिए खिदराना का नाम ‘श्री मुक्तसर साहिब’ पड़ गया।

ज्योति जोत समाना-गुरु जी ने अपने जीवन के अन्तिम कुछ वर्ष तलवण्डी साबो में व्यतीत किए। 1707 ई० में बहादुरशाह सम्राट् बना। वह गुरु साहिब को अपना मित्र समझता था क्योंकि उत्तराधिकार के युद्ध में गुरु साहिब ने उसकी सहायता की थी। 1708 ई० में गुरु जी बहादुर शाह के साथ दक्षिण की ओर गए। मार्ग में वह कुछ समय के लिए नांदेड नामक स्थान पर ठहरे। यहां एक पठान ने उन पर छुरे से वार कर दिया। अतः 1708 ई० को वे ज्योति जोत समा गए।

इस प्रकार गुरु गोबिन्द सिंह जी का जीवन संघर्ष और बलिदान की एक अनोखी गाथा है। डॉ० हरि राम गुप्ता के शब्दों में, “गुरु साहिब के आदर्श तथा कारनामें उनकी पीढ़ी में ही लोगों के धार्मिक, सैनिक तथा राजनीतिक जीवन में एक परिवर्तन ले आये।”<sup>1</sup>

प्रश्न 9. गुरु गोबिन्द सिंह जी ने खालसा पंथ की नींव कैसे रखी ?
अथवा
खालसा पंथ की स्थापना के लिए कौन-सी परिस्थितियां उत्तरदायी थीं ?
उत्तर–गुरु गोबिन्द सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना 1699 ई० में वैशाखी के दिन की। इसके लिए अनेक परिस्थितियां उत्तरदायी थीं :
(1) गुरु गोबिन्द सिंह जी के समय में भारत की राजनीतिक दशा बड़ी शोचनीय थी। मुग़लों के अत्याचार दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे थे। गुरु जी यह सब देखकर बहुत दु:खी हुए। काफ़ी विचार के पश्चात् वे इस निर्णय पर पहुंचे कि मुग़लों के अत्याचारों से बचने के लिए स्थायी रूप से शस्त्र उठाना आवश्यक है। इसीलिए गुरु जी ने खालसा पंथ की स्थापना की।

(2) भारतीय समाज में अभी बहुत-सी बुराइयां चली आ रही थीं। इनमें से एक बुराई जाति-प्रथा थी। डॉ० गंडा सिंह के मतानुसार जाति-प्रथा राष्ट्रीय एकता के मार्ग में एक बहुत बड़ी बाधा बन गई थी। कई जातियों के लोगों में काफ़ी अन्तर आ चुका था। इस अन्तर को मिटाने के लिए ही गुरु गोबिन्द सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की।

(3) खालसा की स्थापना से पहले गुरु गोबिन्द सिंह जी पहाड़ी राजाओं के साथ मिलकर अत्याचारी मुग़ल साम्राज्य के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा बनाना चाहते थे। परन्तु शीघ्र ही गुरु जी को यह पता चल गया कि पहाड़ी राजाओं पर विश्वास करना ठीक नहीं है। अनेक अवसरों पर पहाड़ी राजा गुरु जी के विरुद्ध मुग़ल सरकार से जा मिले। ऐसी दशा में औरंगज़ेब के अत्याचारों का सामना करने के लिए अपने सैनिकों का दल होना आवश्यक था। अतः उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की।

(4) खालसा पंथ की स्थापना का एक और कारण सिक्ख धर्म की आन्तरिक दशा भी थी। रामराय और धीरमल के अनुयायी गुरु जी को बहुत तंग कर रहे थे। गुरु तेग़ बहादुर जी भी रामराइयों तथा धीरमल्लियों से तंग आकर आनन्दपुर साहिब चले गए थे। गुरु गोबिन्द सिंह जी बुरे लोगों से सिक्ख धर्म की रक्षा करना चाहते थे। इसलिए भी उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की।

(5) गुरु अर्जन देव जी के समय में मसन्द भेंट इकट्ठा करने के साथ-साथ प्रचार कार्यों में बड़ी रुचि लेते थे। परन्त धीरे-धीरे मसन्द प्रथा में दोष आ गए। मसन्द भेंट से प्राप्त धन का दुरुपयोग करने लगे थे और अपने आपको स्वतन्त्र समझने लगे थे। गुरु गोबिन्द सिंह जी ने यह अनुभव किया कि जब तक इस प्रथा का अन्त नहीं किया जाता तब तक सिक्ख धर्म उन्नति नहीं कर सकता । अतः गुरु जी ने मसन्दों के प्रभाव को समाप्त करने के लिए नए वर्ग खालसा की स्थापना की।

पांच प्यारों का चुनाव- 1699 ई० में बैशाखी के दिन गुरु गोबिन्द सिंह जी ने खालसा पंथ का निर्माण किया। इस वर्ष उन्होंने बैशाखी के दिन आनन्दपुर साहिब में सिक्ख धर्म के अनुयायियों की एक महान् सभा बुलाई। इस सभा में विभिन्न प्रदेशों से 80,000 के लगभग लोग इकट्ठे हुए। जब सब लोग सभा में बैठ गए तो गुरु जी सभा में पधारे । उन्होंने तलवार को म्यान से निकाल कर घुमाया और ललकार कर कहा-“कोई ऐसा सिक्ख है जो धर्म के लिए अपना सीस भेंट कर सकता है। यह सुनकर सभा में सन्नाटा छा गया। गुरु जी ने अपने शब्दों को तीन बार दोहराया। अन्त में दयाराम नामक एक क्षत्रिय ने अपने आपको बलिदान के लिए प्रस्तुत किया। गुरु जी उसे समीप लगे एक तम्बू में ले गए । तंबू से बाहर आकर उन्होंने एक अन्य बलिदान की मांग की। इस बार दिल्ली निवासी धर्मदास ने अपने आपको भेंट किया। गुरु गोबिन्द सिंह जी ने यह क्रम तीन बार फिर दोहराया। गुरु जी की आज्ञा का पालन करते हुए क्रमश: मोहकम चन्द, साहिब चन्द तथा हिम्मत राय नामक तीन और व्यक्तियों ने अपने आपको बलिदान के लिए प्रस्तुत किया। यहां यह स्पष्ट करना उचित होगा कि गुरु जी ने यह सब कुछ अपने अनुयायियों की परीक्षा लेने के लिए किया था। अन्त में गुरु जी पांचों व्यक्तियों को सभा के सामने लाए और उन्हें पांच प्यारे’ का नाम दिया।

खण्डे का पाहुल-गुरु जी ने पांच प्यारों का चुनाव करने के पश्चात् पांच प्यारों को अमृतपान करवाया जिसे ‘खण्डे का. पाहुल’ कहा जाता है। गुरु जी ने इन्हें आपस में मिलते समय ‘श्री वाहिगुरु जी का खालसा, श्री वाहिगुरु जी की फतेह’ कहने का आदेश दिया। इसी समय गुरु जी ने बारी-बारी पांचों प्यारों की आंखों तथा केशों पर अमृत के छींटे डाले और उन्हें (प्रत्येक प्यारे को) ‘खालसा’ का नाम दिया। सभी प्यारों के नाम के पीछे ‘सिंह’ शब्द जोड़ दिया गया। फिर गुरु जी ने पांच प्यारों के हाथ से स्वयं अमृत ग्रहण किया। इस प्रकार ‘खालसा’ का जन्म हुआ। गुरु जी का कथन था कि उन्होंने यह सब ईश्वर के आदेश से किया है। खालसा की स्थापना के अवसर पर गुरु जी ने ये शब्द कहे-“खालसा गुरु है और गुरु खालसा है। तुम्हारे और मेरे बीच अब कोई अन्तर नहीं है।”

प्रश्न 10. खालसा की स्थापना का क्या महत्त्व था ?
अथवा
खालसा की स्थापना सिख शक्ति के उत्थान में किस प्रकार सहायक सिद्ध हुई ? किन्हीं पांच तथ्यों के आधार पर इसकी विवेचना कीजिए।
उत्तर-खालसा की स्थापना सिक्ख इतिहास की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटना मानी जाती है। डॉ० हरिराम गुप्ता के शब्दों में “खालसा की स्थापना देश के धार्मिक तथा राजनीतिक इतिहास की एक युग-प्रवर्तक घटना थी।” (“The creation of the Khalsa was an epoch making event in the religious and political history of the country.”)

इस घटना का महत्त्व निम्नलिखित बातों से जाना जाता है :-

  • गुरु नानक देव जी द्वारा प्रारम्भ किए गए कार्यों की पूर्ति-गुरु नानक देव जी ने सिक्ख धर्म की नींव रखी थी। उनके सभी उत्तराधिकारियों ने सिक्ख धर्म के विकास के लिए महत्त्वपूर्ण काम किए। गुरु गोबिन्द सिंह जी ने खालसा का सृजन करके उनके द्वारा प्रारम्भ किए गए कार्य को सम्पन्न किया।
  • मसन्द प्रथा का अन्त-चौथे गुरु रामदास जी ने मसन्द प्रथा का आरम्भ किया था। कुछ समय तक मसन्दों ने सिक्ख धर्म के प्रचार तथा प्रसार में उल्लेखनीय योगदान दिया। परन्तु गुरु तेग़ बहादुर जी के समय तक मसन्द लोग स्वार्थी, लोभी तथा भ्रष्टाचारी हो गए। इसलिए गुरु गोबिन्द सिंह जी ने धीरे-धीरे मसन्द प्रथा का अंत कर दिया।
  • खालसा संगतों के महत्त्व में वृद्धि-गुरु गोबिन्द सिंह साहिब ने खालसा संगत को खण्डे का पाहुल छकाने का अधिकार दिया। उन्हें आपस में मिलकर निर्णय करने का अधिकार भी दिया गया। परिणामस्वरूप खालसा संगतों का महत्त्व बढ़ गया।
  • सिक्खों की संख्या में वृद्धि-गुरु गोबिन्द सिंह जी ने सिक्खों को अमृत छका कर खालसा बनाया। इसके उपरान्त गुरु साहिब ने यह आदेश दिया कि खालसा के कोई पाँच सिंह अमृत छका कर किसी को भी खालसा में शामिल कर सकते हैं। फलस्वरूप सिक्खों की संख्या में निरन्तर वृद्धि होने लगी।
  • सिक्खों में नई शक्ति का संचार-खालसा की स्थापना से सिक्खों में एक नई शक्ति का संचार हुआ। अमृत छकने के बाद वे स्वयं को सिंह कहलाने लगे। सिंह कहलाने के कारण उनमें भय तथा कायरता का कोई अंश न रहा। वे अपना चरित्र भी शुद्ध रखने लगे। इसके अतिरिक्त खालसा जाति-पाति का भेदभाव समाप्त हो जाने से सिंहों में एकता की भावना मज़बूत हुई।
  • मुगलों का सफलतापूर्वक विरोध-गुरु गोबिन्द सिंह जी ने खालसा का सृजन करके सिक्खों में वीरता तथा साहस की भावनाएं भर दीं। उन्होंने चिड़िया को बाज़ से तथा एक सिक्ख को एक लाख से लड़ना सिखाया। परिणामस्वरूप गुरु जी के सिक्खों ने 1699 ई० से 1708 ई० तक मुग़लों के साथ कई सफलतापूर्वक युद्ध लड़े।
  • गुरु साहिब के पहाड़ी राजाओं से युद्ध-खालसा की स्थापना से पहाड़ी राजा भी घबरा गए। विशेष रूप में बिलासपुर का राजा भीमचन्द गुरु साहिब की सैनिक कार्यवाहियों को देख कर भयभीत हो उठा। उसने कई अन्य पहाड़ी राजाओं से गठजोड़ करके गुरु साहिब की शक्ति को दबाने का प्रयास किया। अतः गुरु साहिब को पहाड़ी राजाओं से कई युद्ध करने पड़े।
  • सिक्ख सम्प्रदाय का पृथक स्वरूप-गुरु गोबिन्द सिंह जी के काल तक सिक्खों के अपने कई तीर्थ-स्थान बन गए थे। उनके लिए पवित्र ग्रन्थ ‘आदि ग्रन्थ’ साहिब का संकलन भी हो चुका था। वे अपने ही ढंग से तीज-त्योहार मनाते थे। अब खालसा की स्थापना से सिक्खों ने पाँच ‘ककारों’ का पालन करना आरम्भ कर दिया। इस प्रकार उन्होंने अपने बाहरी स्वरूप को भी जन-साधारण से अलग कर लिया।
  • हिन्दू धर्म की रक्षा-औरंगज़ेब हिन्दुओं पर अत्यधिक अत्याचार कर रहा था। खालसा के सिंह इन अत्याचारों का डट कर सामना करने लगे। खालसा से प्रभावित होकर देश के अन्य राज्यों के लोग भी औरंगजेब के अत्याचारों के विरुद्ध उठ खड़े हुए। परिणामस्वरूप हिन्दू धर्म मिटने से बच गया।
  • अन्ध-विश्वासों का अन्त-खालसा हिन्दुओं में प्रचलित अन्ध-विश्वासों को नहीं मानता था। उन्होंने यज्ञ, बलि, व्रत, मूर्ति पूजा तथा अन्य कई अन्ध-विश्वासों से नाता तोड़ लिया। इस प्रकार खालसा की साजना से अंध-विश्वासों तथा अज्ञान का नाश हुआ।
  • सिक्खों की राजनीतिक शक्ति का उत्थान-खालसा के संगठन से सिक्खों में वीरता, निडरता, हिम्मत तथा आत्म-बलिदान की भावनाएँ जागृत हो उठीं। परिणामस्वरूप उन्होंने गुरु जी के ज्योति जोत समाने के पश्चात् भी मुग़लों से संघर्ष जारी रखा। अंतत: बन्दा बहादुर के नेतृत्व में उन्होंने पंजाब के बहुत-से प्रदेशों पर अपना अधिकार कर लिया। बन्दा . बहादुर के बाद सिक्खों को भले ही भयंकर कष्टों और भीषण संकट से गुज़रना पड़ा, तो भी उन्होंने बड़े साहस तथा दृढ़ संकल्प का परिचय दिया। अंतत: पंजाब के विभिन्न भागों में छोटे-छोटे स्वतन्त्र सिक्ख राज्य (मिसलें) स्थापित हो गए।
    सच तो यह है कि खालसा की स्थापना ने ‘सिंहों’ को ऐसा अडिग विश्वास प्रदान किया जिसे कभी भी विचलित नहीं किया जा सकता।