Class 11 History Solutions Chapter 19 अंग्रेजी साम्राज्य के समय में आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन

अध्याय का विस्तृत अध्ययन

(विषय-सामग्री की पूर्ण जानकारी के लिए)

प्रश्न 1. अंग्रेजी साम्राज्य की व्यापारिक, औद्योगिक तथा लगान सम्बन्धी नीतियों का भारत की अर्थ-व्यवस्था तथा समाज पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर-भारत मे ब्रिटिश राज्य की व्यापारिक, औद्योगिक तथा लगान सम्बन्धी नीतियों का भारत के सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्र पर बहुत प्रभाव पड़ा। भारत जो कि कृषि प्रधान देश था, कई बार अकाल का शिकार हुआ। किसानों की दशा दिन-प्रतिदिन बिगड़ने लगी। ब्रिटिश सरकार ने कृषक तथा कृषि की ओर कोई ध्यान न दिया। देश में जो थोड़े बहुत कुटीर-उद्योग थे, उन्हें भी इंग्लैंड की औद्योगिक उन्नति के लिए नष्ट कर दिया गया। ब्रिटिश राज्य में भारत आर्थिक रूप से ऐसा पिछड़ा कि आज तक भी नहीं सम्भल सका। भारतीय अर्थ-व्यवस्था पर ब्रिटिश राज्य का प्रभाव निम्नलिखित बातों से जाना जा सकता है

I. कृषि पर प्रभाव –

1. भूमि का स्वामित्व-अंग्रेज़ों से पूर्व भारत में भूमि आजीविका कमाने का साधन था । इसे न तो खरीदा जा सकता था और न बेचा जा सकता था। भूमि पर कृषि करने वाले उपज का एक निश्चित भाग भूमि-कर के रूप में सरकार को दे दिया करते थे, परन्तु अंग्रेजों ने इस आदर्श प्रणाली को समाप्त कर दिया। लॉर्ड कार्नवालिस ने बंगाल में भूमि का स्थायी बन्दोबस्त किया। इसके अनुसार भूमि सदा के लिए ज़मींदारों को दे दी गई। उन्हें सरकारी खज़ानों में निश्चित कर जमा करना होता था। वे यह ज़मीन अपनी इच्छानुसार किसी भी व्यक्ति को दे सकते थे। इस तरह भूमि पर कृषि करने वालों का दर्जा एक नौकर के समान हो गया। स्वामी सेवक बन गए और भूमि-कर उगाहने वाले सेवक स्वामी बन गए।

2. कृषकों का शोषण- अंग्रेजी शासन के अधीन भूमि की पट्टेदारी की तीन विधियां आरम्भ की गईं-स्थायी प्रबन्ध, रैय्यतवाड़ी प्रबन्ध तथा महलवाड़ी प्रबन्ध । इन तीनों विधियों के अन्तर्गत किसानों को ऐसे अनेक कष्ट सहने पड़े। भूमि का स्वामी किसानों को जब चाहे भूमि से बेदखल कर सकता था। इस नियम का सहारा लेकर वह किसानों से मनमानी रकम ऐंठने लगा। भूमि की सारी अतिरिक्त उपज वह स्वयं हड़प जाते थे। किसानों के पास इतना अनाज भी नहीं बचा था कि उन्हें पेट भर भोजन मिल सके। रैयतवाड़ी प्रथा के अनुसार तो किसानों को और भी अधिक कष्ट उठाने पड़े। किसान भूमि के स्वामी तो मान लिए गए, परन्तु कर की दर इतनी अधिक थी कि इनके लिए कर चुकाना भी कठिन था। कर चुकाने के लिए किसान साहूकारों से ऋण ले लिया करते थे और सदा के लिए साहूकार के चंगुल में फंस जाते थे। वास्तव में वह किसान जो भूस्वामी हुआ करता था, अंग्रेज़ी राज्य की छाया में मजदूर बन कर रह गया।

3. कृषि का पिछड़ापन- अंग्रेज़ी शासन के अधीन कृषक के साथ-साथ कृषि की दशा भी बिगड़ने लगी। कृषक पर भारी कर लगा दिए गए। ज़मींदार उससे बड़ी निर्दयता से रकम ऐंठता था। ज़मीदार स्वयं तो शहरों में रहते थे । उनके मध्यस्थ किसानों की उपज का अधिकतर भाग ले जाते थे। ज़मींदार की दिलचस्पी पैसा कमाने में थी। वह भूमि सुधारने में विश्वास नहीं रखता था। इधर किसान दिन-प्रतिदिन निर्धन तथा निर्बल होता जा रहा था। अत: वह भूमि में धन तथा श्रम दोनों ही नहीं लगा पा रहा था। उसे एक और भी हानि हुई। इंग्लैंड का मशीनी माल आ जाने से ग्रामीण उद्योग-धन्धे नष्ट हो गए। अतः खाली समय में वह इन उद्योगों द्वारा जो पैसे कमाया करता था, अब बन्द हो गया। अब मुकद्दमेबाज़ी उसके जीवन का अंग बन गई । इन मुकद्दमों पर उसका समय तथा धन दोनों ही नष्ट होने लगे और कृषि पिछड़ने लगी। संक्षेप में, अंग्रेज़ों की भूराजनीति ने कृषक के उत्साह को बड़ी ठेस पहुंचाई जो कृषि के लिए हानिकारक सिद्ध हुई।

II. उद्योगों पर प्रभाव-

1. भारतीय सूती कपड़े के उद्योग का विनाश- अंग्रेजी राज्य स्थापित होने से पूर्व भारतीय सूती कपड़ा उद्योग उन्नति की चरम सीमा पर पंहुचा हुआ था। भारत में बने सूती कपड़े की इंग्लैंड में बड़ी मांग थी। इंग्लैंड की स्त्रियां भारत के बेलबूटेदार वस्त्रों को बहुत पसन्द करती थीं। कम्पनी ने आरम्भिक अवस्था में कपड़े का निर्यात करके खूब पैसा कमाया। परन्तु 1760 तक इंग्लैंड ने ऐसे कानून पास कर दिए जिनके अनुसार रंगे कपड़े पहनने की मनाही कर दी गई। इंग्लैंड की एक महिला को केवल इसलिए 200 पौंड जुर्माना किया गया था क्योंकि उसके पास विदेशी रूमाल पाया गया था। इंग्लैंड का व्यापारी तथा औद्योगिक वर्ग कम्पनी की व्यापारिक नीति की निन्दा करने लगा। विवश होकर कम्पनी को वे विशेषज्ञ इंग्लैंड वापस भेजने पड़े जो भारतीय जुलाहों को अंग्रेजों की मांगों तथा रुचियों से परिचित करवाते थे। इंग्लैंड की सरकार ने भारतीय कपड़े पर आयात कर बढ़ा दिया और कम्पनी की कपड़ा सम्बन्धी आयात नीति पर अनेक प्रतिबन्ध लगा दिए। इन सब बातों के परिणामस्वरूप भारत के सूती वस्त्र उद्योग को भारी क्षति पहुंची।

2. निर्धनता, बेकारी तथा अकाल- अंग्रेजी राज्य की स्थापना से भारत में निर्धनता का अध्याय आरम्भ हुआ। किसान भारी करों के बोझ तले दबने लगे। उनके गाढ़े पसीने की कमाई ज़मींदार, साहूकार तथा सरकार लूटने लगी। उन्हें पेट भर रोटी नसीब नहीं होती थी। इधर आर्थिक शोषण, करों की ऊंची दर तथा भारतीय धन की निकासी के कारण भी निर्धनता बढ़ने लगी। गरीबी की चरम सीमा उस समय देखने को मिली जब भारत 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अकालों की लपेट में आ गया। उत्तर प्रदेश के अकाल (1860-61 ई०) में 2 लाख लोग मरे। पूर्वी प्रान्तों में फैले अकाल (1865-66 ई०) में 20 लाख लोगों की जानें गईं। दस लाख लोग केवल उड़ीसा राज्य में मरे। राजपूताना की रियासतों की जनसंख्या का तीसरा या चौथा भाग अकाल की भेंट चढ़ गया। 1876-78 ई० के अकाल ने तो त्राहि-त्राहि मचा दी। इस अकाल के कारण महाराष्ट्र के आठ लाख, मद्रास के तैंतीस लाख तथा मैसूर के लगभग 20 % लोग मृत्यु का ग्रास बने। ब्रिटिश राज्य में इन भयानक-दृश्यों के साथ-साथ बेकारी का दौर भी जारी रहा। अनेक कारीगर बेकार थे। व्यापारियों का व्यापार नष्ट हो चुका था। लाखों किसान अपनी ज़मीनें छोड़ कर भाग गए थे।

3. ग्रामीण उद्योगों का विनाश- अंग्रेजी राज्य स्थापित होने से अंग्रेजी माल भारतीय गांवों में पहुंचने लगा। यह माल बढ़िया तथा सस्ता होता था। परिणामस्वरूप ग्रामीण उद्योगों को बड़ा धक्का लगा। ग्रामीण कारीगरों के हाथों से ग्राहक निकलने लगे और वे (कारीगर) अपना धंधा छोड़ काश्तकार के रूप में मजदूरी करने लगे। 19वीं शताब्दी के पहले 50 वर्षों में ऐसे दृश्य आम देखे जाते थे कि कैसे एक जुलाहा अपनी खड्डी छोड़कर हल धारण कर रहा है। यह परिवर्तन उन लोगों के लिए कितना दुःखदायी होगा जिनकी पीढ़ियां इन उद्योगों को अर्पित हो गई थीं। श्री ताराचन्द लिखते हैं, “उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में यहां के गांवों के श्रमिक समाज में उजड़े हुए किसानों के बाद बुनकरों तथा गांव के अन्य कारीगरों का स्थान सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण था।” यह सब अंग्रेजी शासन का ही प्रभाव था।

III. व्यापार पर प्रभाव-

अंग्रेज़ी राज्य स्थापित होने से कृषि तथा उद्योगों के साथ-साथ भारतीय व्यापार को भी हानि पहुंची। कम्पनी ने भारतीय व्यापार पर पूरा नियन्त्रण कर लिया। भारतीय तथा विदेशी व्यापारियों को विधिवत् रूप से व्यापार करने से रोक दिया गया। सारा व्यापार कम्पनी के हाथ में आ गया। कम्पनी के बड़े-बड़े कर्मचारियों ने अपने अलग व्यापारिक संस्थान खोल लिए और उनका देश के उत्पादित माल पर पूर्ण अधिकार हो गया। इस व्यापार का सारा लाभ कम्पनी के कर्मचारियों की जेब में जाता था। कम्पनी के बड़े-बड़े कर्मचारी मालामाल हो गए थे। गवर्नर-जनरल तक भी खूब हाथ रंगते थे। इस व्यापारिक धांधली के कारण न केवल भारतीयों को आन्तरिक व्यापार से बाहर ही निकाल दिया गया,बल्कि उत्पादक तथा उपभोक्ता दोनों के साथ छल भी किया गया। उन्हें सस्ते दामों पर कच्चा माल बेच कर महंगे दामों पर तैयार माल खरीदने के लिए बाध्य किया । व्यापार के इसी एकाधिकारपूर्ण नियम के कारण बंगाल अकाल की लपेट में आ गया। भारतीय माल पर करों की दर बढ़ा दी गई ताकि कोई विदेशी या भारतीय व्यापारी भारतीय माल का व्यापार न कर सके। इस प्रकार अंग्रेज़ी शासन के अधीन भारतीय व्यापार बिल्कुल नष्ट हो गया।

प्रश्न 2. इंग्लैंड में नई विचारधारा के संदर्भ में भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के अधीन सामाजिक सुधार तथा शिक्षा के विकास की चर्चा करें।
उत्तर-इंग्लैंड में नवीन विचारधारा के कारण यह विश्वास दृढ़ हो गया कि भारत के परम्परावादी सामाजिक ढांचे में परिवर्तन होना चाहिए। इस संदर्भ में भारतीय समाज में अनेक परिवर्तन हुए और शिक्षा में पाश्चात्य विचारों का समावेश हुआ। इस तरह देश के सामाजिक तथा शिक्षा के क्षेत्र में नवीन परिवर्तन हुए जिनका वर्णन इस प्रकार है

1. सती प्रथा का अन्त- सती-प्रथा हिन्दू समाज में प्रचलित एक बहुत बुरी प्रथा थी। हिन्दू स्त्रियां पति की मृत्यु पर उसके साथ ही जीवित जल जाया करती थीं। राजा राममोहन राय ने इस कुप्रथा के विरुद्ध आवाज़ उठाई। उनकी प्रार्थना पर विलियम बैंटिंक ने इस कुप्रथा का अन्त करने के लिए 1829 ई० में एक कानून बनाया। इस प्रकार सती-प्रथा को कानून के विरुद्ध घोषित कर दिया गया।

2. बाल हत्या पर रोक-कुछ हिन्दू जातियां अपने देवताओं को प्रसन्न करने के लिए अपने बच्चों को बलि चढ़ा दिया करती थीं। 1802 ई० में वैल्जेली ने इस प्रथा के विरुद्ध एक कानून पास किया। इसके अनुसार बाल-हत्या पर रोक लगा दी गई।

3. विधवा-विवाह- भारत में विधवाओं की दशा बड़ी खराब थी। उन्हें पुनः विवाह की आज्ञा नहीं थी। अतः अनेक युवा विधवाओं को दुःख और कठिनाई भरा जीवन व्यतीत करना पड़ता था । उनकी दुर्दशा को देखते हुए राजा राममोहन राय, महात्मा फूले, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर तथा महर्षि कर्वे ने विधवा-विवाह के पक्ष में जोरदार आवाज़ उठाई। फलस्वरूप 1856 में विधवा-विवाह वैध घोषित कर दिया गया।

4. दास प्रथा का अन्त- भारत में ज़मींदारी प्रथा के कारण किसान बहुत ही निर्धन हो गए थे। इन किसानों को दास बना कर ब्रिटिश उपनिवेशों में भेजा जाने लगा। इसके अतिरिक्त कुछ अंग्रेज़ भी भारतीयों से दासों जैसा व्यवहार करते थे और उनसे बेगार लेते थे। 1843 ई० में कानून द्वारा इस प्रथा का अन्त कर दिया गया। .

5. स्त्री शिक्षा का विकास- स्त्री-शिक्षा के लिए भारतीय महापुरुषों ने विशेष प्रयत्न किए। उनके प्रयत्नों से स्त्रियां कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में प्रवेश पाने लगीं। फलस्वरूप देश में शिक्षित स्त्रियों की संख्या बढ़ने लगी।

6. जाति बन्धन में ढील- अंग्रेजी शिक्षा तथा ईसाई पादरियों के प्रचार के कारण भारत में जाति बन्धन टूटने लगे। ईसाई पादरी ऊंच-नीच की परवाह नहीं करते थे। इससे प्रभावित होकर निम्न जातियों के लोग ईसाई धर्म स्वीकार करने लगे। यह बात हिन्दू समाज के लिए बहुत बड़ा खतरा बन गई। अतः उस समय के समाज-सुधारकों ने जाति-प्रथा की निन्दा की। परिणामस्वरूप जाति बन्धन काफ़ी ढीले हो गए।

भारत में अंग्रेजी शिक्षा का विकास- भारत में अंग्रेजी शिक्षा के विस्तार की वास्तविक कहानी 1813 ई० से आरम्भ होती है। इससे पहले कम्पनी ने इस दिशा में कोई कार्य नहीं किया। यदि कुछ कार्य हुए भी तो वे ईसाई पादरियों की ओर से हुए, परन्तु 1813 ई० में शिक्षा का विकास विधिवत् रूप से होने लगा। 1813 ई० में चार्टर एक्ट पास हुआ। इसमें कहा गया कि भारतीयों की शिक्षा पर हर वर्ष एक लाख रुपया खर्च किया जाएगा। यह भी कहा गया कि 50 वर्ष के अन्दर -अन्दर पूरे भारत में शिक्षा के प्रसार का कार्य सुचारू रूप से होने लगेगा। देश में कुछ स्कूल तथा कॉलेज भी खोले गए। परन्तु शीघ्र ही यह विवाद उठ खड़ा हुआ कि यह धन किस शिक्षा पर व्यय किया जाए-भारतीय भाषाओं की शिक्षा पर अथवा अंग्रेज़ी शिक्षा पर।

शिक्षा के माध्यम का विवाद धीरे-धीरे गम्भीर रूप धारण कर गया। कुछ लोग अंग्रेज़ी को शिक्षा का माध्यम बनाना चाहते थे जबकि दूसरे लोग देशी भाषाओं को ही माध्यम बनाने के पक्ष में थे। आखिर अंग्रेजी माध्यम का पक्ष भारी रहा और इसे ही स्वीकार कर लिया गया। 1854 ई० में चार्ल्स वुड समिति बनाई गई। इस समिति ने शिक्षा के क्षेत्र में सुधार लाने के लिए ये सुझाव दिए- (i) भारत में लन्दन विश्वविद्यालय के ढंग पर विश्वविद्यालय खोले जाएं। (ii) विश्वविद्यालय के अधीन कॉलेज खोले जाएं। (iii) प्रत्येक प्रान्त में एक शिक्षा-विभाग खोला जाए। वुड समिति की इन सिफ़ारिशों के कारण शिक्षा प्रणाली में महत्त्वपूर्ण उन्नति हुई। 1882 ई० में हण्टर आयोग की नियुक्ति की गई। इस आयोग ने बड़े अच्छे सुझाव दिए। सरकार ने हण्टर आयोग की सभी सिफ़ारिशों को स्वीकार कर लिया। देश में नए-नए कॉलेज तथा स्कूल खुलने लगे। 1882 ई० में पंजाब विश्वविद्यालय की स्थापना की गई।

लॉर्ड कर्जन के शासनकाल में विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियन्त्रण बढ़ गया। विश्वविद्यालयों के क्षेत्र नियत कर दिए गए। अध्यापकों आदि की नियुक्ति का काम भी विश्वविद्यालयों को सौंप दिया गया। लॉर्ड कर्जन के इस एक्ट की भारतीयों ने बड़ी निन्दा की। 1917 ई० में भारत सरकार ने शिक्षा सुधार के लिए एक और आयोग नियुक्त किया जिसके अध्यक्ष मि० सैडलर थे। इस आयोग ने ये सिफ़ारिशें की- (i) विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियन्त्रण कम कर दिया जाए। (ii) माध्यमिक तथा इन्टरमीडियेट शिक्षा विद्यालय के नियन्त्रण में नहीं रहनी चाहिए। (iii) कॉलेजों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी होना चाहिए। इस प्रकार इस आयोग की सिफ़ारिशों के कारण देश में अनेक विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई। मैसूर, उस्मानिया, अलीगढ़, दिल्ली, नागपुर आदि नगरों में विश्वविद्यालय खोले गए। इसके अतिरिक्त शिक्षा के प्रसार के लिए और कई पग उठाए गए। 1928 ई० में हरयेग कमेटी नियुक्त की गई। 1944 ई० में सार्जेन्ट योजना पर अमल किया गया। इस प्रकार भारत में अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार होने लगा।

महत्त्वपूर्ण परीक्षा-शैली प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. उत्तर एक शब्द से एक वाक्य तक

प्रश्न 1. भारत में पहली तार लाइन कब स्थापित की गई?
उत्तर-1833 ई० में।

प्रश्न 2. जी० टी० रोड का आधुनिक नाम क्या है?
उत्तर-शेरशाह सूरी मार्ग।

प्रश्न 3. भारत में कॉफी के बाग़ कब लगाने शुरू हुए?
उत्तर-1860 ई० के पश्चात्।

प्रश्न 4. कलकत्ता मदरसा किस अंग्रेज़ गवर्नर-जनरल ने स्थापित किया?
उत्तर-लार्ड हेस्टिग्ज ने।

प्रश्न 5. सती प्रथा को किसने अवैध घोषित किया?
उत्तर-लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने।

2. रिक्त स्थानों की पूर्ति

(i) लाहौर में गवर्नमेंट कॉलेज की स्थापना …………. ई० में हुई।
(ii) भारत में ईसाई मिशनरियों द्वारा स्थापित स्कूलों में …………. ढंग की शिक्षा दी जाती थी।
(iii) बंगाल में स्थायी बंदोबस्त …………….. में लागू हुआ।
(iv) सती प्रथा के विरुद्ध कानून ………………. के प्रभाव अधीन बना।
(v) भारत में पहली आधुनिक जहाज़रानी कम्पनी ………….. ई० में खोली गई।
उत्तर-
(i) 1864
(ii) अंग्रेजी
(iii) 1793
(iv) ईसाई मिशनरियों
(v) 1919.

3. सही/गलत कथन

(i) पंजाब यूनिवर्सिटी 1888 में बनी। — (√)
(ii) बंगाल में स्थायी बंदोबस्त लॉर्ड कार्नवालिस ने लागू किया। — (√)
(iii) भारत में पहली रेलवे लाइन की लंबाई 121 मील थी। — (×)
(iv) इंग्लैंड से बहुत-सा धन भारत लाया गया। — (×)
(v) भारत में सीमेंट तथा शीशा बनाने के उद्योग 1930 के बाद विकसित हुए। — (√)

4. बहु-विकल्पीय प्रश्न

(i) 1791 में संस्कृत कॉलेज की स्थापना की गई
(A) कलकत्ता में
(B) बनारस में
(C) बम्बई में
(D) मद्रास में।
उत्तर-(B) बनारस में

(ii) 1857 में किस नगर में विश्वविद्यालय स्थापित हुआ?
(A) मद्रास
(B) बंबई
(C) कलकत्ता
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-(D) उपरोक्त सभी।

(iii) निम्न स्थान भूमि के स्थायी बंदोबस्त के अंतर्गत नहीं आता था-
(A) मद्रास
(B) उड़ीसा
(C) उत्तरी सरकार
(D) बनारस।
उत्तर-(A) मद्रास

(iv) 1857 ई० में इंजीनियरिंग कॉलेज स्थापित किया गया-
(A) रिवाड़ी में
(B) दिल्ली में
(C) रुड़की में
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-(C) रुड़की में

(v) अंग्रेजी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाया गया-
(A) 1935
(B) 1835
(C) 1857
(D) 1891.
उत्तर-(B) 1835

II. अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1. इंग्लैंड में औद्योगिक क्रान्ति किन दो वर्षों के मध्य प्रफुल्लित हुई ?
उत्तर- इंग्लैंड में औद्योगिक क्रान्ति सन् 1760 से 1830 के मध्य प्रफुल्लित हुई।

प्रश्न 2. बर्तानिया के उद्योगपतियों को भारत में बिना कर व्यापार करने की छूट किस वर्ष में मिली तथा इस वर्ष कितने लाख-पौंड मूल्य का अंग्रेजी मशीनी कपड़ा भारत में आया ।
उत्तर- बर्तानिया के उद्योगपतियों को भारत में बिना कर व्यापार करने की छूट 1813 में मिली। उस वर्ष 11 लाख पौंड का अंग्रेजी मशीनी कपडा भारत में आया।

प्रश्न 3. 1856 में बर्तानिया की मिलों में बना हुआ किस मूल्य का कपड़ा भारत में आया तथा किस मूल्य का कपड़ा भारत से बाहर भेजा गया ? ‘
उत्तर- 1856 में साठ लाख पौंड का कपड़ा भारत आया और 8 लाख पौंड मूल्य का कपड़ा बाहर भेजा गया।

प्रश्न 4. 1856 में कितने मूल्य की कपास तथा अनाज भारत से बाहर भेजे गए ?
उत्तर- 1856 में 43 लाख पौंड की कपास भारत से बाहर भेजी गई। 29 लाख पौंड का अनाज भी भारत से बाहर भेजा गया।

प्रश्न 5. भारत में पहली कपड़ा मिल कब, किसने और कहां लगवाई? .
उत्तर – कपड़े की पहली मिल मुम्बई में कावासजी नानाबाई ने 1853 में स्थापित की।

प्रश्न 6. 1880 तक भारत में कितनी कपड़ा मिलें थीं तथा उनमें कितने मजदूर काम करते थे ?
उत्तर- 1880 तक भारत में 56 कपड़ा मिलें थीं । इनमें 43 हजार मजदूर काम करते थे ।

प्रश्न 7. पटसन (जूट) के सबसे अधिक कारखाने भारत के किस प्रान्त में थे तथा बीसवीं सदी के शुरू में इनकी गिनती कितनी हो गई ?
उत्तर- पटसन (जूट) के सब से अधिक कारखाने बंगाल प्रान्त में थे। बीसवीं सदी के आरम्भ में इन की गिनती 36 हो गई।

प्रश्न 8. बीसवीं सदी में कौन से चार प्रकार के उद्योग भारत में विकसित हुए ?
उत्तर-बीसवीं सदी में भारत में ऊनी कपड़ा बनाने का उद्योग, कागज़ बनाने का उद्योग, चीनी बनाने का उद्योग तथा सूती धागा बनाने का उद्योग विकसित हुए।

प्रश्न 9. 1930 के बाद विकसित होने वाले दो उद्योगों के नाम बताएं।
उत्तर- 1930 के पश्चात् भारत में सीमेंट तथा शीशा बनाने के उद्योग विकसित हुए।

प्रश्न 10. भारत में नील की खेती कब शुरू हुई तथा यह किसके हाथों में थी ?
उत्तर- भारत में नील की खेती 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध में आरम्भ हुई। यह विदेशियों के हाथों में थी।

प्रश्न 11. 1825 में भारत में नील की खेती के अधीन कुल क्षेत्र कितना था तथा 1915 में नील की खेती लगभग कितने क्षेत्र में सीमित रह गई थी एवं इसके कम होने का क्या कारण था ?
उत्तर-1825 में 35 लाख बीघा भूमि नील उत्पादन के अन्तर्गत थी और 1915 में नील की खेती तीन चार लाख बीघे तक सीमित रह गई। इस का कारण भूमि की कमी थी।

प्रश्न 12. अंग्रेज़ी कम्पनी का चीन की चाय का एकाधिकार कब समाप्त हुआ तथा ‘आसाम टी कम्पनी’ कब बनाई गई ?
उत्तर- अंग्रेज़ी कम्पनी का चीन की चाय का एकाधिकार 1833 में समाप्त हो गया। 1839 में आसाम टी कम्पनी बनाई गई।

प्रश्न 13. 1920 तक कितनी भूमि चाय की खेती के अधीन थी तथा कितने मूल्य की चाय भारत से बाहर भेजी जाती थी ?
उत्तर- 1920 तक 7 लाख एकड़ भूमि चाय की खेती के अधीन थी। उस समय तक 34 करोड़ पौंड मूल्य की चाय भारत से बाहर भेजी जाती थी ।

प्रश्न 14. कॉफी के बाग कब लगने शुरू हुए तथा किस देश की कॉफी मण्डी में आने से भारत को नुकसान हुआ ?
उत्तर- कॉफी के बाग 1860 के पश्चात् लगने आरम्भ हुए। ब्राजील की कॉफी मण्डी में आने से भारत को नुकसान पहुंचा।

प्रश्न 15. भारत में पहली तार लाइन कब और किन दो नगरों के बीच स्थापित की गई ?
उत्तर-पहली तार लाइन कलकत्ता (कोलकाता) से आगरा के बीच 1853 में स्थापित की गई ।

प्रश्न 16. किस गवर्नर जनरल ने एक ही मूल्य का डाक टिकट शुरू किया तथा इसका मूल्य क्या था ?
उत्तर- लॉर्ड डल्हौजी ने एक ही मूल्य का डाक टिकट आरम्भ किया था। इस टिकट का मूल्य आधा आना था।

प्रश्न 17. जी० टी० रोड किन दो शहरों को जोड़ती थी तथा इसका आधुनिक नाम क्या है ?
उत्तर- जी० टी० रोड पेशावर (पाकिस्तान) तथा कलकत्ता (कोलकाता) को जोड़ती थी। इस का आधुनिक नाम शेरशाह सूरी मार्ग है ।

प्रश्न 18. जी० टी० रोड किन वर्षों में पक्की की गई तथा 1947 में भारत में सड़कों की कुल लम्बाई कितनी थी ?
उत्तर- जी० टी० रोड 1839 से लेकर 1864 तक के समय के बीच पक्की की गई। 1947 में भारत में सड़कों की कुल लम्बाई 2,96,000 मील थी ।

प्रश्न 19. भारत में पहली आधुनिक जहाजरानी कम्पनी कब खोली गई ?
उत्तर- भारत में पहली आधुनिक जहाजरानी कम्पनी 1919 में खोली गई ।

प्रश्न 20. भारत में हवाई यातायात की ओर कब ध्यान देना आरम्भ किया गया ? इससे पहले हवाई जहाजों का प्रयोग किस लिए किया जाता था ?
उत्तर- भारत में हवाई यायायात की ओर 1930 के बाद ध्यान दिया गया । इससे पहले हवाई जहाज़ों का प्रयोग अधिकतर डाक तथा सामान ले जाने के लिए किया जाता था।

प्रश्न 21. भारत में पहली रेलवे लाइन किन दो शहरों के बीच एवं कब बनी तथा इसकी लम्बाई कितनी थी ?
उत्तर-भारत में पहली रेलवे लाइन 1853 में मुम्बई तथा थाना के बीच बनी । इसकी लम्बाई 21 मील थी ।।

प्रश्न 22. 1947 में भारत में रेलवे लाइन की कुल लम्बाई कितनी थी तथा रेलवे के कारण किन दो प्रकार के माल के निर्यात तथा आयात में तेजी से वृद्धि हुई ?
उत्तर-1947 में भारत में रेलवे लाइन की कुल लम्बाई 40,000 मील थी। रेलों के कारण कच्चे माल के निर्यात तथा मशीनी चीजों के आयात में तेजी से वृद्धि हुई ।

प्रश्न 23. किस वर्ष में भारत से धन की निकासी शुरू हुई तथा दादा भाई नौरोजी के अनुसार देश से हर वर्ष कितनी धन राशि इंग्लैंड भेजी जाती थी ?
उत्तर-1757 से धन की निकासी आरम्भ हो गई। दादा भाई नौरोजी के अनुसार प्रति वर्ष 3-4 करोड़ पौंड की राशि भारत से इंग्लैंड भेजी जाती थी ।

प्रश्न 24. स्थायी बन्दोबस्त किसने शुरू किया तथा यह कब और किस वर्ग के साथ किया गया ?
उत्तर- स्थायी बन्दोबस्त लार्ड कार्नवालिस ने 1793 में शुरू किया। यह बन्दोबस्त मध्यवर्ती ज़मींदार वर्ग के साथ किया गया।

प्रश्न 25. स्थायी बन्दोबस्त के अन्तर्गत इलाकों के नाम बताएं।
उत्तर-स्थायी बन्दोबस्त के अन्तर्गत उड़ीसा, उत्तरी सरकार तथा बनारस थे।

प्रश्न 26. रैय्यतवाड़ी प्रबन्ध किन दो प्रान्तों में तथा किस वर्ग पर लागू किया गया तथा उससे सम्बन्धित अंग्रेज़ अफसर का नाम क्या था?
उत्तर-रैय्यतवाड़ी प्रबन्ध मद्रास तथा महाराष्ट्र में किसानों पर लागू किया गया। इसे अंग्रेज अफसर मुनरो ने लागू किया था।

प्रश्न 27. महलवाड़ी प्रबन्ध कौन से तीन क्षेत्रों में लागू किया गया तथा इसके अन्तर्गत लगान उगाहने की इकाई कौन-सी थी ?
उत्तर-महलवाड़ी प्रबन्ध वर्तमान उत्तर प्रदेश में लागू किया गया । इसमें लगान उगाहने की इकाई ‘महल’ थी।

प्रश्न 28. अंग्रेजों के अधीन लगान प्रबन्ध की सभी व्यवस्थाओं से भारत के किस वर्ग को विशेष लाभ हुआ ?
उत्तर-अंग्रेजों के अधीन लगान प्रबन्ध की सभी व्यवस्थाओं से भारत के ज़मींदार वर्ग को विशेष लाभ हुआ ।

प्रश्न 29. 1905 तक सरकार ने रेलों तथा सिंचाई के विकास पर कितना धन खर्च किया था ?
उत्तर-1905 तक सरकार ने रेलों तथा सिंचाई के विकास पर 360 करोड़ रुपये खर्च किये।

प्रश्न 30. 1951 तक भारत में किन दो प्रकार के हल प्रचलित थे तथा इनमें से किसका प्रयोग बहुत अधिक किया जाता था ?
उत्तर-1951 तक भारत में लकड़ी तथा लोहे के फाले वाले हल प्रचलित थे। इन में से लोहे के फाले वाले हलों का प्रयोग बहुत अधिक किया जाता था ।

प्रश्न 31. 1939 में भारत में कितने कृषि कॉलेज थे तथा उनमें विद्यार्थियों की कुल संख्या कितनी थी ?
उत्तर–1939 में भारत में केवल छः कृषि कॉलेज थे। उनमें विद्यार्थियों की कुल संख्या 1300 के लगभग थी।

प्रश्न 32. भारत में ईसाई मिशनरियों को अपने केन्द्र स्थापित करने की छूट कब मिली तथा इनके स्कूल-कॉलेज में किस ढंग की शिक्षा दी जाती थी ?
उत्तर-1813 में ईसाई मिशनरियों को अपने केन्द्र स्थापित करने की छूट मिल गई। इनके स्कूल-कॉलेज में अंग्रेज़ी ढंग की शिक्षा दी जाती थी।

प्रश्न 33. मिशनरियों के प्रभाव अधीन कौन-सा कानून बना ?
उत्तर-मिशनरियों के प्रभाव अधीन सती प्रथा का अन्त करने का कानून बना ।।

प्रश्न 34. भारत में सती प्रथा को कब और किस गवर्नर-जनरल ने गैर कानूनी घोषित किया ?
उत्तर-भारत में सती प्रथा को 1829 में गवर्नर-जनरल विलियम बैंटिंक ने गैर कानूनी घोषित किया।

प्रश्न 35. सती प्रथा का प्रचलन कौन से वर्ग तथा जातियों में था ?
उत्तर-सती प्रथा का प्रचलन राजघरानों, उच्च वर्गों अथवा ब्राह्मणों में था ।

प्रश्न 36. “कलकत्ता (कोलकाता) मदरसा” कब और किसने स्थापित किया ?
उत्तर-कलकत्ता (कोलकाता) मदरसा 1781 में गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्ज़ ने स्थापित किया ।

प्रश्न 37. संस्कृत कॉलेज की स्थापना कब और कहां की गई ?
उत्तर-संस्कृत कॉलेज की स्थापना 1791 में बनारस में की गई ।

प्रश्न 38. 1835 में शिक्षा सम्बन्धी क्या फैसला किया गया तथा इससे सम्बन्धित अंग्रेज अधिकारी का नाम क्या था ?
उत्तर-1835 में शिक्षा सम्बन्धी यह निर्णय किया गया कि सरकार विज्ञान तथा पश्चिमी ढंग की शिक्षा अंग्रेज़ी भाषा में देने के लिये धन खर्च करेगी। इससे सम्बन्धित अंग्रेज़ अधिकारी का नाम ‘मैकाले’ था ।

प्रश्न 39. 1857 में किन तीन नगरों में विश्वविद्यालय स्थापित हुए ?
उत्तर-1857 में बम्बई (मुम्बई), कलकत्ता (कोलकाता) और मद्रास (चेन्नई) में विश्वविद्यालय स्थापित हुए ।

प्रश्न 40. 1857 में मैडिकल कॉलेज कौन से तीन नगरों में थे तथा इंजीनियरिंग कॉलेज किस स्थान पर स्थापित किया गया ?
उत्तर-1857 में मैडिकल कॉलेज बम्बई (मुम्बई), कलकत्ता (कोलकाता) तथा मद्रास, (चेन्नई) में थे। इंजीनियरिंग कॉलेज रुड़की में स्थापित किया गया।

प्रश्न 41. लाहौर में गवर्नमैंट कॉलेज तथा पंजाब यूनिवर्सिटी किन वर्षों में बने ?
उत्तर-लाहौर में गवर्नमेंट कॉलेज 1864 में तथा पंजाब यूनिवर्सिटी 1888 में बने।

प्रश्न 42. अंग्रेजी साम्राज्य का सबसे अधिक लाभ किस नये वर्ग को हुआ तथा इस वर्ग से सम्बन्धित चार व्यवसायों के नाम बताएं।
उत्तर-अंग्रेज़ी साम्राज्य का सबसे अधिक लाभ मध्य वर्ग को हुआ । इस वर्ग से सम्बन्धित चार व्यवसायों के नाम थेसाहूकार, डॉक्टर, अध्यापक तथा वकील ।

III. छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1. अंग्रेजी साम्राज्य ने भारत में विदेशी पूंजीपतियों की सहायता किस प्रकार की ?
उत्तर भारत में अंग्रेजी साम्राज्य ने विदेशी पूंजीपतियों की बड़ी सहायता की। देशी उद्योगों को नष्ट किया गया। इनके स्थान पर विदेशी पूंजीपतियों को प्रोत्साहित किया गया । इंग्लैंड की औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् इंग्लैंड के पूंजीपतियों ने यहां कारखाने लगाए। उन्हें यहां सस्ते मज़दूर मिलते थे और सरकार से पूरा सहयोग मिलता था। विदेशी पूंजीपतियों ने यहां रेलवे लाइनों में भी खूब पूंजी लगाई। वैसे भी उद्योग स्थापित करने की सुविधाएं भी उन्हें ही दी जाती थीं। कर की व्यवस्था भी उन के पक्ष में थी। विदेशी माल पर कर नहीं लगता था जबकि भारतीय माल पर शुल्क की दर बढ़ा दी गई थी। रेलों की स्थापना भी विदेशी व्यापार को सुविधा पहुंचाने के लिए की गई थी । सच तो यह है कि अंग्रेजी साम्राज्य ने विदेशी पूंजीपतियों की खूब सहायता की ।

प्रश्न 2. भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के अधीन रेलों के विस्तार के कारण तथा उनका महत्त्व बताएं ।
उत्तर-भारत में पहली रेलवे लाइन (1853) में डल्हौजी के समय में मुम्बई से थाना तक आरम्भ की गई । इसकी लम्बाई 21 मील थी। 1905 ई० तक लगभग 28,000 मील लम्बी रेलवे लाइन बनकर तैयार हो गई थी। रेलें यातायात का महत्त्वपूर्ण साधन सिद्ध हुईं । रेलों के कारण अन्तरिक सुरक्षा मजबूत हुई । सेना को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने में सुविधा हो गई। रेलों के कारण कच्चा माल बन्दरगाहों से कारखानों तक सफलतापूर्वक ले जाया जाने लगा और तैयार माल कारखानों से विभिन्न मण्डियों में भेजा जाने लगा। रेलों के कारण मशीनी चीजों के आयात में वृद्धि हुई । उदाहरण के लिए कपास का निर्यात पहले से तीन गुणा अधिक होने लगा और कपड़े का आयात पहले से दो गुणा ज्यादा हो गया । सच तो यह है कि रेलों के
और पूंजीपतियों को हुआ।

प्रश्न 3. भारत में धन की निकासी किन तरीकों से होती थी ?
उत्तर-अंग्रेजों की आर्थिक नीति के कारण भारत को बहुत हानि हुई। देश का धन देश के काम आने के स्थान पर विदेशियों के काम आने लगा। 1757 के पश्चात् ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा इसके कर्मचारियों ने भारत से प्राप्त धन को इंग्लैण्ड भेजना आरम्भ कर दिया। कहते हैं कि 1756 ई० से 1765 तक लगभग 60 लाख पौंड की राशि भारत से बाहर गई। और तो और लगान आदि से प्राप्त राशि भी भारतीय माल खरीदने में व्यय की गई। अतिरिक्त सिविल सर्विस और सेना के उच्च अफसरों के वेतन का पैसा भी देश से बाहर जाता था। औद्योगिक विकास का भी अधिक लाभ विदेशियों को ही हुआ। विदेशी पूंजीपति इस देश पर धन लगाते थे और लाभ की रकम इंग्लैण्ड में ले जाते थे। इस तरह भारत का धन कई प्रकार से विदेशों में जाने लगा।

प्रश्न 4. स्थायी बन्दोबस्त क्या था तथा उसके क्या आर्थिक प्रभाव थे ?
उत्तर-अंग्रेज़ शासक कृषि के क्षेत्र में भी भूमि से अधिक से अधिक आय प्राप्त करना चाहते थे। इसी उद्देश्य को सामने रख कर लगान व्यवस्था का पुनर्गठन किया गया। कार्नवालिस ने 1793 में बंगाल और बिहार में ‘परमानेंट सेटलमैंट’ अथवा स्थायी व्यवस्था की। इसके अन्तर्गत लगान वसूल करने वाले ज़मींदार भूमि के स्वामी बना दिये गये। इस व्यवस्था के महत्त्वपूर्ण आर्थिक प्रभाव पड़े। इस प्रकार सरकार की वार्षिक आय भी निश्चित हो गई जिस से बजट बनाना सरल हो गया। परन्तु किसानों की स्थिति केवल मुज़ारों की ही बन कर रह गई। ज़मींदार उन के साथ जैसा चाहे व्यवहार कर सकता था। सभी ज़मींदारों के लिए निश्चित लगान देना इतना सुगम सिद्ध न हुआ। बहुत से ज़मींदारों को अपनी भूमि बेचनी पड़ी। ये भूमि व्यापारी वर्ग के धनी साहूकारों ने खरीद ली। ये नये ज़मींदार शहरों में रहते थे तथा इनके गुमाश्ते किसानों के साथ दुर्व्यवहार करते थे। भूमि से उपज कम होने लगी। परिणामस्वरूप कृषि और कृषक की दशा खराब हो गई।

प्रश्न 5. कौन-से नए विचारों के प्रभावाधीन भारत में सामाजिक सुधार लाने के प्रयास किए गए ?
उत्तर-आरम्भ में कम्पनी के शासकों ने भारतीय समाज के प्रति विशेष रुचि न दिखाई। उनमें से अधिकांश का विचार था कि एक पुरानी सभ्यता होने के कारण भारतीय सभ्यता में परिवर्तन नहीं होना चाहिये। परन्तु 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में एक नई विचारधारा बल पकड़ने लगी। विज्ञान और यान्त्रिकी की उन्नति के साथ लोगों के विचारों और सामाजिक मूल्यों पर भी प्रभाव पड़ा। परिणामस्वरूप यह रुचि बढ़ने लगी कि समाज को बदला जाये। ऐसे कानून बनाये जायें जिनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति न्याय प्राप्त करने में बराबर का अधिकारी हो। ऐसी आर्थिक नीतियां अपनाई जाएं जिनसे आर्थिक प्रगति हो और जनसाधारण जीवन की आरम्भिक आवश्यकताओं का आनन्द भोग सकें। ऐसे रीति-रिवाजों का अन्त किया जाये जो अन्धविश्वासों पर आधारित थे। इसके साथ इंग्लैण्ड में ईसाई मत के प्रचार के समर्थक भी इस बात पर जोर देते थे कि भारतीय समाज को नवीन रंग में रंगा जाये।

प्रश्न 6. भारत में अंग्रेजों ने शिक्षा सम्बन्धी क्या नीति अपनाई ?
उत्तर-1813 में यह निर्णय किया गया कि भारतीयों को विज्ञान की शिक्षा भी दी जाये। बीस वर्ष तक यह विवाद चलता रहा कि अंग्रेजी साम्राज्य में शिक्षा भारतीय संस्कृति के अनुसार दी जाये अथवा पश्चिमी संस्कृति के आधार पर। 1835 में यह निर्णय हुआ कि पश्चिमी ढंग की शिक्षा अंग्रेजी भाषा के माध्यम द्वारा उच्च स्तर पर दी जाये। इसी नीति के आधार पर 1857 में बम्बई (मुम्बई), कलकत्ता (कोलकाता) और मद्रास (चेन्नई) में विश्वविद्यालय स्थापित किये गये। इसके बाद धीरे-धीरे अन्य शहरों में भी विश्वविद्यालय और कॉलेज स्थापित हुए। नवीन शिक्षा नीति अपनाये जाने के अनेक कारण थे –

  • अंग्रेज़ अफसरों की बहुसंख्या इस बात में विश्वास रखती थी कि आधुनिक यूरोपीय सभ्यता विश्व की अन्य सभ्यताओं की तुलना में उत्तम है।
  • सरकारी कार्यों के लिए शिक्षित भारतीयों की आवश्यकता थी।
  • ईसाई पादरियों का विचार था कि अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् भारतीय जल्दी ही ईसाई बन जायेंगे।
  • कुछ का विश्वास था कि भारतीय अंग्रेज़ी रहन-सहन अपना लेंगे तो वे इंग्लैण्ड में बनी वस्तुओं का अधिक प्रयोग करेंगे और इस प्रकार अंग्रेजों के व्यापार में भी वृद्धि होगी।
  • बहुत-से भारतीय भी यह मांग करने लगे थे कि अंग्रेजी भाषा के द्वारा ही विज्ञान और साहित्य की शिक्षा दी जाये।

प्रश्न 7. अंग्रेजी साम्राज्य ने भारत में मध्य वर्ग के उत्थान में क्या योगदान दिया ?
उत्तर-अंग्रेजी साम्राज्य की समृद्धि के कारण भारत में मध्य वर्ग का जन्म हुआ। कम्पनी को अपने व्यापार की वृद्धि के लिये भारतीय व्यापारियों की सहायता की आवश्यकता थी। इसलिए जैसे-जैसे अंग्रेज़ी व्यापार का विकास हुआ, भारतीय व्यापारी भी धनी बने और उन का महत्त्व भी बढ़ा। इन्हीं व्यापरियों ने साहूकारी शुरू कर ऋण दिये। इन्होंने ही भूमि खरीदने की ओर ध्यान दिया। अधिक धनी साहूकारों ने निजी उद्योग स्थापित किये। इनमें से बहुत से लोग अंग्रेज़ी शिक्षा के पक्ष में थे। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने के बाद सरकारी नौकरियों में भी उनकी संख्या में वृद्धि हुई। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी शिक्षा पाकर मध्य वर्गों के लोग डॉक्टर, अध्यापक और वकील बने। इस प्रकार मध्य वर्ग का प्रभाव बढ़ता गया।

प्रश्न 8. अंग्रेजी साम्राज्य में सामाजिक सुधारों का वर्णन करो।
अथवा
अंग्रेजी साम्राज्य में भारत में किस प्रकार के सामाजिक परिवर्तन हुए ?
उत्तर-अंग्रेजों ने 19वीं शताब्दी के आरम्भ में समाज सुधार की ओर ध्यान दिया। उन्होंने 1829 ई० में सती-प्रथा पर रोक लगा दी। उस समय राजपूत लोग लड़कियों को पैदा होते ही मार देते थे। इसी तरह कुछ अन्य लोग देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए अपने बच्चों की बलि दे देते थे। अतः पहले लॉर्ड विलियम बैंटिंक और फिर लॉर्ड हार्डिंग ने बाल हत्या पर रोक लगी दी। उस समय विधवाओं को समाज में घृणा की दृष्टि से देखा जाता था। उन्हें पुनः विवाह करने की आज्ञा नहीं थी। अतः 1856 ई० में लॉर्ड डल्हौज़ी ने एक कानून द्वारा विधवाओं को पुनः विवाह करने की आज्ञा दे दी। अंग्रेज़ों का विचार था कि भारतीय समाज की गिरी हुई दशा को केवल पश्चिमी शिक्षा के प्रसार से ही सुधारा जा सकता है। अतः भारत में अंग्रेजी भाषा को शिक्षा का माध्यम बना दिया गया। अंग्रेजों के प्रयत्नों से भारत में स्त्री शिक्षा का प्रसार भी हुआ।

प्रश्न 9. रैय्यतवाड़ी लगान व्यवस्था की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-1820 ई० में थामस मुनरो मद्रास का गवर्नर नियुक्त हुआ। उसने भूमि का प्रबन्ध एक नए ढंग से किया जिसे रैय्यतवाड़ी प्रथा के नाम से पुकारा जाता है। यह प्रबन्ध पहले-पहल दक्षिण के प्रान्तों में लागू किया। सरकार ने भूमि-कर उन लोगों से लेने का निश्चय किया जो अपने हाथों से कृषि करते थे। अतः सरकार तथा कृषकों के बीच जितने भी मध्यस्थ थे उन्हें हटा दिया। यह प्रबन्ध स्थायी प्रबन्ध की अपेक्षा अधिक लाभदायक था क्योंकि इससे कृषकों के अधिकार बढ़ गए तथा सरकारी आय में वृद्धि हुई। इस प्रथा में कुछ दोष भी थे-जो भूमि कृषि के बिना रह जाती थी उसे सरकारी भूमि समझा जाता था। ऐसी भूमि में कृषि करने का अधिकार किसी भी किसान को न था। फलस्वरूप यह भूमि प्रायः खाली पड़ी रहती थी। इस प्रथा के कारण गांव का भाई-चारा समाप्त होने लगा। गांव की पंचायतों का महत्त्व भी कम हो गया। प्रत्येक किसान एक पृथक् व्यक्तित्व बन कर रह गया।

प्रश्न 10. महलवाड़ी भूमि-प्रबन्ध की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-रैय्यतवाड़ी प्रथा के दोषों को दूर करने के लिए उत्तर-पश्चिमी प्रान्त में एक और नया प्रयोग किया गया जिसे महलवाड़ी प्रबन्ध कहा जाता है। इस प्रबन्ध की विशेषता यह थी कि इसके द्वारा भूमि का सम्बन्ध न तो किसी बड़े ज़मींदार के साथ जोड़ा जाता था और न ही किसी कृषक के साथ। यह प्रबन्ध वास्तव में गांव के समूचे भाई-चारे के साथ होता था। यदि कोई किसान अपना भाग नहीं देता था तो उसकी वसूली गांव के भाई-चारे से की जाती थी। ऐसे प्रबन्ध के कारण सरकार को कभी हानि नहीं होती थी। प्रत्येक गांव में जो भूमि अविभाजित रह जाती थी, उसे भाई-चारे की संयुक्त सम्पत्ति माना जाता था। ऐसी भूमि को ‘शामलात भूमि’ कहते थे। इस प्रबन्ध को सबसे अच्छा प्रबन्ध माना जाता है क्योंकि इसमें पहले के दोनों प्रबन्धों के गुण विद्यमान थे। इस प्रबन्ध में केवल एक ही दोष था। वह यह था कि इसके अनुसार लोगों को बहुत अधिक भूमि-कर देना पड़ता था।

प्रश्न 11. ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय किसानों की निर्धनता के क्या कारण थे ?
उत्तर-ब्रिटिश शासनकाल में किसानों की दशा बड़ी ही शोचनीय थी। उनकी निर्धनता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। उनकी निर्धनता के कारणों का वर्णन इस प्रकार है-(1) ब्रिटिश शासन काल में ज़मींदारी प्रथा प्रचलित थी। भूमि के स्वामी बड़े-बड़े ज़मींदार होते थे जो किसानों का बहुत शोषण करते थे। वे उनसे बेगार भी लेते थे। (2) किसानों के खेती करने के ढंग बहुत पुराने थे। कृषि के लिए अच्छे बीज तथा खाद की कोई व्यवस्था नहीं थी। सिंचाई के उपयुक्त साधन उपलब्ध न होने के कारण किसानों को केवल वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता था। (3) ब्रिटिश सरकार ने किसानों की दशा सुधारने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। (4) किसान प्रायः साहूकारों से ऋण लेता था जिस पर उसे भारी ब्याज देना पड़ता था। सरकार की ओर से उन्हें ऋण देने का कोई प्रबन्ध नहीं था। (5) किसानों को बहुत अधिक भूमि-कर देना पड़ता था। यह भी उनकी निर्धनता का एक बहुत बड़ा कारण था।

IV. निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. अंग्रेजी कम्पनी की व्यापारिक नीति कैसी थी और भारत पर इसका क्या आर्थिक प्रभाव पड़ा ?
उत्तर-अंग्रेजों की व्यापारिक नीति से अभिप्राय उस नीति से है जो उन्होंने भारत के देशी तथा विदेशी व्यापार के प्रति अपनाई। आरम्भ में अंग्रेजी ईस्ट इण्डिया कम्पनी का मुख्य ध्येय भारतीय कपड़े को सस्ते दामों पर खरीद कर विदेशी मण्डियों में महंगे दामों पर बेचना था। परन्तु जब कम्पनी की लाभ नीति इंग्लैण्ड के उद्योगों के लिए घातक सिद्ध हुई, तो कम्पनी को अपनी नीति में परिवर्तन लाना पड़ा। औद्योगिक क्रान्ति के कारण इंग्लैण्ड में मशीनों द्वारा अधिक से अधिक माल तैयार होने लगा। इस सारे माल की खपत के लिए इंग्लैण्ड के व्यापारियों को अधिक से अधिक मण्डियों की आवश्यकता थी। अतः वहां के व्यापारी वर्ग ने इंग्लैण्ड की सरकार पर ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त करने के लिए दबाव डालना आरम्भ कर दिया। फलस्वरूप 1813 ई० में कम्पनी के व्यापारिक एकाधिकार छीन लिए गए और भारत को एक स्वतन्त्र व्यापार क्षेत्र घोषित कर दिया। भारत के द्वार विदेशी वस्तुओं के लिए खोल दिये गये। उधर ब्रिटेन ने भारत के बने माल पर प्रतिवर्ष कर बढ़ाने आरम्भ कर दिये। 1824 ई० में भारतीय कैलिको पर 65[latex]\frac{1}{2}[/latex]% और भारतीय मलमल पर 37[latex]\frac{1}{2}[/latex]% शुल्क देना पड़ता था। भारतीय चीनी पर उसकी लागत से तीन गुणा अधिक कर देना पड़ता था। ऐसी भी कुछ भारतीय वस्तुएं थीं जिन पर इंग्लैण्ड ने 400% शुल्क लगा दिया। स्पष्ट है कि स्वतन्त्र व्यापारिक नीति ने भारत के व्यापारिक हितों को बड़ी हानि पहुंचाई।

नीति का आर्थिक प्रभाव-अंग्रेजी कम्पनी की व्यापारिक नीति का भारत की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। भारत के देशी उद्योग नष्ट हो गये। भारतीय मजदूर तथा कारीगर बेकार हो गए और वे निर्धनता में अपना जीवन व्यतीत करने लगे। अधिक आयात के कारण भारत धन का भुगतान करने में असमर्थ हो गया। भारत के व्यापारिक असन्तुलन के कारण अनेक अंग्रेज़ उद्योगपतियों को अपनी पूंजी भारत में लगाने के लिए प्रेरित किया गया। परिणामस्वरूप देश में रेलों तथा सड़कों का जाल बिछ गया। परन्तु इससे भी अंग्रेजों को ही लाभ पहुंचा। __

प्रश्न 2. अंग्रेजी साम्राज्य की व्यापारिक, औद्योगिक और भूमि-कर सम्बन्धी नीतियों का भारत की अर्थ-व्यवस्था तथा समाज पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर-अंग्रेजी साम्राज्य की व्यापारिक, औद्योगिक तथा भूमि-कर सम्बन्धी नीतियों का भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा। उनके अधीन भूमि का क्रय-विक्रय आरम्भ हो गया। अंग्रेजों ने भारत में भूमि की पट्टेदारी नए ढंग से आरम्भ की। बंगाल के स्थायी बन्दोबस्त द्वारा ज़मींदारों को भूमि का स्वामी स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार सरकार को लगान देने वाले ठेकेदार भूमि के स्वामी बन गए। पट्टेदारी की प्रचलित सभी विधियां किसानों के हितों के विरुद्ध थीं। जमींदार किसी भी समय कृषकों को बेदखल कर सकता था। इस नियम की आड़ में वे कृषकों से मनचाही रकम बटोरने लगे। रैय्यतवाड़ी प्रथा के अनुसार यद्यपि भूमि का स्वामी किसान को मान लिया गया तथापि कर की दर इतनी अधिक थी कि किसानों को साहूकारों से धन ब्याज पर लेना पड़ता था। अंग्रेज़ी शासन का भारत की कृषि पर भी बहुत प्रभाव पड़ा। ज़मींदार किसानों से पैसा तो खूब ऐंठते थे, परन्तु भूमि सुधार की ओर ज़रा भी ध्यान नहीं देते थे। किसान के पास इतना भी धन नहीं रह पाता था कि वह स्वयं भूमि का सुधार कर सके। फलस्वरूप भारतीय कृषि पिछड़ने लगी।

अंग्रेजी शासन के अधीन भारतीय उद्योग-धन्धे भी नष्ट हो गए। भारत का सूती कपड़ा उद्योग बिल्कुल ठप्प हो गया। भारत में बने सूती कपड़े की इंग्लैण्ड में बड़ी मांग थी। परन्तु इंग्लैण्ड की सरकार ने भारतीय कपड़े पर आयात कर बढ़ा दिया और कम्पनी की कपड़ा सम्बन्धी आयात नीति पर अनेक प्रतिबन्ध लगा दिए। धीरे-धीरे इंग्लैण्ड की सरकार ने ऐसे नियम बना दिए कि भारत का माल इंग्लैंड में बिकने की बजाय इंग्लैंड का माल भारत में बिकने लगा। इंग्लैण्ड में औद्योगिक विकास के कारण इंग्लैंड की आयात-निर्यात की नीति में भारी परिवर्तन आया। भारत से कच्चा माल आयात करना तथा तैयार माल का निर्यात करना उनका उद्देश्य बन गया। अंग्रेजी शासन के कारण भारत का काफ़ी सारा धन प्रति-वर्ष इंग्लैण्ड जाने लगा। अंग्रेजी राज्य के अधीन भारत में बेकारी और निर्धनता का वातावरण पैदा हो गया। कृषकों पर अधिक करों तथा भारतीय उद्योग-धन्धों की समाप्ति के कारण अनेक लोग बेकार हो गए। अंग्रेज़ी शासन के कारण भारतीय व्यापार भी ठप्प हो गया। कम्पनी ने भारतीय व्यापार पर पूरी तरह अपना नियन्त्रण स्थापित कर लिया।

प्रश्न 3. ब्रिटिश काल में उद्योगों के विकास की कमजोरियों का वर्णन कीजिए।
अथवा अंग्रेज़ी शासन के अधीन औद्योगिक विकास के मार्ग की किन्हीं पांच बाधाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-ब्रिटिश शासन के आरम्भ के साथ उद्योगों में तीन बातें घटित हुईं। पहली यह कि उन्होंने भारतीय कुटीर उद्योगों को नष्ट कर दिया। दूसरे, इस देश को इंग्लैण्ड के औद्योगिक माल की मण्डी बना दिया। तीसरे, इस देश में कुछ नए उद्योग आरम्भ किए गए। अब देखना यह है कि इस औद्योगिक विकास की कमजोरियां क्या थीं-

  • भारी उद्योगों का अभाव-अंग्रेजों ने भारत में मूल उद्योग आरम्भ न किए। यदि ऐसा होता तो भारत में औद्योगिक विकास की आधारशिला तैयार हो जाती। परन्तु अंग्रेज़ भारत को उन्नत औद्योगिक राष्ट्र के रूप में देखना ही नहीं चाहते थे।
  • कम्पनी की आवश्यकताओं को प्राथमिकता-अंग्रेजों ने भारत में केवल वही उद्योग स्थापित किए जिनके उत्पादों की उन्हें आवश्यकता थी।
  • उद्योगों का एकाधिकार-सभी बड़े-बड़े उद्योगों का स्वामित्व अंग्रेजों को दिया गया। बहुत कम भारतीयों को उद्योग स्थापित करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  • उद्योगों का असमान वितरण-अंग्रेज़ों ने भारत के कुछ ही भागों में उद्योग स्थापित किए। शेष भाग उद्योगों से वंचित रहे।
  • कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन न देना-अंग्रेजों ने भारत में छोटे तथा कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन न दिया। ऐसे उद्योगों द्वारा ही भारत की अधिकांश जनता को लाभ पहुँच सकता था।
  • कच्चे माल का निर्यात-अंग्रेज़ इंग्लैण्ड के हित में काम करते थे। वे इस देश से कच्चा माल इंग्लैण्ड को सस्ते दामों पर निर्यात करते थे और फिर तैयार माल लाकर भारत में महँगे दामों पर बेचते थे।
  • प्रशिक्षण का अभाव-अंग्रेजों ने न अधिक इंजीनियरिंग कॉलेज स्थापित किए और न ही श्रमिकों के प्रशिक्षण के लिए ही कोई प्रबन्ध किया। ऐसी अवस्था में उद्योगों का पूर्ण विकास नहीं हो सकता था।
  • दूषित कर-प्रणाली-अंग्रेजों ने कर प्रणाली भी इंग्लैण्ड के पक्ष में ही स्थापित की। उन्होंने इंग्लैण्ड से आने वाले माल पर कस्टम ड्यूटी माफ कर दी। इसके विपरीत भारतीय माल पर इंग्लैण्ड में भारी कर लगा दिए। परिणामस्वरूप पहले भारतीय उद्योगों का विनाश हुआ और बाद में भारत इंग्लैण्ड के तैयार माल की मण्डी बन गया।

सच तो यह है कि अंग्रेजों ने भारत में औद्योगिक विकास की दृष्टि से उद्योग स्थापित न किए थे। उनका मुख्य उद्देश्य इंग्लैण्ड को लाभ पहुँचाना था।

प्रश्न 4. 18वीं तथा 19वीं शताब्दी में भारत के आर्थिक शोषण की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
ईस्ट इण्डिया कम्पनी की आर्थिक नीति की विवेचना कीजिए जिसके फलस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था की बरबादी हुई।
उत्तर-18वीं शताब्दी में भारत का शासन ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथ में आ गया। कम्पनी सरकार ने अपने स्वार्थ तथा इंग्लैण्ड के हितों को बढ़ावा देने के लिए भारत तथा भारतीयों का खूब आर्थिक शोषण किया। इस उद्देश्य से अंग्रेज़ों ने निम्नलिखित कार्य किए-

1. ग्रामीण कपड़ा उद्योगों का विनाश-अंग्रेजी सरकार अपने गुमाश्तों द्वारा भारतीय जुलाहों से कपड़े का सस्ते दामों पर जबरदस्ती सौदा कर लेती थी। सौदा करने के लिए जुलाहों को पेशगी राशि दे दी जाती थी। यदि वे पेशगी लेने से इन्कार करते तो उन्हें पीटा जाता था और कोड़े लगाए जाते थे। इस प्रकार जुलाहे अपना माल कम्पनी को छोड़कर किसी के पास नहीं बेच सकते थे, भले ही उन्हें वहाँ से कितनी ही अधिक राशि क्यों न मिलती हो। परिणामस्वरूप धीरे-धीरे भारतीय जुलाहों की कपड़ा उद्योग में रुचि समाप्त हो गई और भारतीय कपड़ा उद्योग समाप्त हो गया।

2. इंग्लैण्ड में भारतीय माल पर अधिक कर-इंग्लैण्ड में भारतीय कपड़े की बड़ी माँग थी। परन्तु इंग्लैण्ड की सरकार ने भारतीय कपड़े पर भारी आयात कर लगा दिया। फलस्वरूप इंग्लैण्ड पहुँचते-पहुँचते भारतीय कपड़ा इतना महँगा हो जाता था कि वहां के लोग इसे खरीदने से भी डरने लगे। अतः इंग्लैण्ड में भारतीय कपड़े की माँग बिल्कुल समाप्त हो गई।

3. भारत का मण्डी के रूप में प्रयोग-इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति के बाद अनेक कारखाने खुल गए और भारी मात्रा में उत्पादन होने लगा। इन कारखानों को कच्चा माल जुटाने तथा वहाँ के तैयार माल को बेचने के लिए अंग्रेजों ने भारत को एक मण्डी बना दिया। वे यहाँ का सारा कच्चा माल सस्ते दामों पर खरीद कर इंग्लैण्ड भेजने लगे। इंग्लैण्ड का तैयार माल भारत में बिना रोक-टोक आने लगा और यहाँ उसे महँगे दामों पर बेचा जाने लगा। परिणामस्वरूप भारत का धन निरन्तर इंग्लैण्ड पहुँचने लगा।

4. व्यापार पर एकाधिकार-अंग्रेजी कम्पनी ने भारतीय व्यापार पर एकाधिकार स्थापित कर लिया। एक ओर तो वे भारतीय जुलाहों से सस्ते दामों पर कपड़े का सौदा कर लेते थे, दूसरी ओर सारा कच्चा माल पहले से ही खरीदकर अपने गोदामों में भर लेते थे। विवश होकर भारतीय जुलाहों को किया गया सौदा पूरा करने के लिए महंगे दामों पर अंग्रेजों से कच्चा माल खरीदना पड़ता था। परिणामस्वरूप देखते ही देखते देश में निर्धनता और बेकारी फैल गई।

5. इंग्लैण्ड के हित में नए उद्योग-अंग्रेजों ने भारत में कुछ नए उद्योग भी लगाए। परन्तु इनका उद्देश्य भी भारत का आर्थिक शोषण करना ही था। उदाहरण के लिए, इंग्लैण्ड में चाय की माँग थी तो भारत में बड़े पैमाने पर चाय के बागान लगाए गए। इसी प्रकार कपास तथा पटसन आदि की खेती, नील उद्योग आदि सभी इंग्लैण्ड के हितों की ही पूर्ति करते थे। इन उद्योगों के आरम्भ से भारत आवश्यक उद्योगों में पिछड़ गया।
सच तो यह है कि अंग्रेज़ी सरकार ने अपनी प्रत्येक नीति भारत का धन हड़पने के लिए ही निर्धारित की।

प्रश्न 5. अंग्रेजों के अधीन भारत के सामाजिक जीवन में क्या-क्या परिवर्तन हुए ? किन्हीं पांच परिवर्तनों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-अंग्रेज़ इस देश में व्यापारी तथा शासक के रूप में लगभग 350 वर्ष तक रहे। उन्होंने लगभग 200 वर्ष तक यहां शासन भी किया। इस देश में उनका मुख्य उद्देश्य अंग्रेज़ी सत्ता को दृढ़ करना था। इसलिए उन्होंने हमारे सामाजिक क्षेत्रों में काफी परिवर्तन किए। इन परिवर्तनों का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-

1. आधुनिक शिक्षा का आरम्भ-आधुनिक शिक्षा प्रणाली अंग्रेजों की देन है। 1835 ई० में यह निर्णय लिया गया कि भारत में शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी होगा। 1854 ई० में वुड डिस्पैच तथा 1882 ई० में हण्टर आयोग के सुझावों को स्वीकार किया गया। इनके अनुसार देश में शिक्षा विभाग की स्थापना हुई, विश्वविद्यालय खोले गए तथा अनेक स्कूलों तथा कॉलेजों की व्यवस्था की गई। प्राइवेट स्कूलों को अनुदान देने की प्रणाली आरम्भ की गई। अध्यापकों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई। इस प्रकार भारत में शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी उन्नति हुई।

2. जाति बन्धन में ढील तथा सती प्रथा का अन्त-अंग्रेजी शिक्षा तथा ईसाई पादरियों के प्रचार के कारण भारत में जाति बन्धन टूटने लगे। ईसाई पादरी ऊंच-नीच की परवाह नहीं करते थे। इससे प्रभावित होकर निम्न जातियों के लोग ईसाई धर्म स्वीकार करने लगे। यह बात हिन्दू समाज के लिए बहुत बड़ा खतरा बन गई। इस खतरे को टालने के लिए उस समय के समाज-सुधारकों ने जाति-प्रथा की निन्दा की। परिणामस्वरूप जाति बन्धन काफ़ी ढीले हो गए। उस समय हिन्दू समाज में सती-प्रथा भी प्रचलित थी। इस अमानवीय प्रथा के विरुद्ध लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने दिसम्बर, 1829 में एक कानून पास किया और सती-प्रथा को कानून के विरुद्ध घोषित कर दिया।

3. बाल-हत्या तथा नर-बलि पर रोक, विधवा विवाह की आज्ञा-मध्य भारत की कुछ जातियां दहेज आदि की कठिनाई से बचने के लिए कन्याओं को पैदा होते ही मार डालती थीं। इस पर रोक लगाने के लिए लॉर्ड वैल्ज़ली ने 1802 में एक कानून पास किया। इसके अनुसार बाल-हत्या पर रोक लगा दी गई। भारत के कुछ भागों में देवताओं को प्रसन्न करने के लिए नर-बलि दी जाती थी। यह प्रथा मद्रास में विशेष रूप से प्रचलित थी। विलियम बैंटिंक ने इस क्रूर प्रथा का भी अन्त कर दिया। विधवाओं की स्थिति सुधारने के लिए जुलाई, 1856 ई० में सरकार ने विधवा-विवाह को कानून द्वारा वैध घोषित कर दिया।

4. स्त्री शिक्षा का प्रसार-राजा राम मोहन राय, जगन्नाथ शंकर सेठ, रानाडे, महात्मा फूले तथा ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के प्रयत्नों के फलस्वरूप स्त्रियों को ये सुविधाएं मिलीं-(i) उन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने की आज्ञा दे दी गई, (ii) उनके लिए अलग कॉलेजों की व्यवस्था की गई, (iii) उन्हें विश्वविद्यालयों में भी प्रवेश पाने की आज्ञा दे दी गई।

5. साम्प्रदायिकता का आरम्भ-अंग्रेजों ने अपनी सत्ता को दृढ़ बनाए रखने के लिए “फूट डालो और राज्य करो” की नीति अपनाई। इस नीति से देश में साम्प्रदायिकता का विष फैलने लगा।

6. भारतीय सभ्यता और संस्कृति का ह्रास-भारत में अंग्रेज़ी शासन स्थापित होने से भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति को भारी धक्का लगा। अंग्रेजों ने इस बात का प्रचार किया कि भारतीय असभ्य हैं और अंग्रेज़ उन्हें सभ्यता का पाठ पढ़ाने आए हैं। अत: भारतीय उनकी सभ्यता को उच्च मानकर उसी के प्रभाव में बहने लगे। इस प्रकार एक लम्बे समय तक भारतीय सभ्यता और संस्कृति का विकास रुका रहा।

7. भारतीय मध्यम वर्ग का उदय-अंग्रेज़ी राज्य की स्थापना से भारत में मध्यम वर्ग का उदय हुआ। नवीन भूमि कानूनों के कारण ज़मींदार, महाजन तथा व्यापारी लोग अस्तित्व में आये। यही लोग बीसवीं शताब्दी में भारत की मध्यम श्रेणी के रूप में उभरे। पैसा अधिक होने के कारण इस श्रेणी के लोगों ने पाश्चात्य शिक्षा ग्रहण की और राष्ट्रीय आन्दोलन में लोगों का नेतृत्व किया।

प्रश्न 6. अंग्रेजों के आगमन से पूर्व भारत की कृषि की क्या दशा थी ? अंग्रेज़ी राज्य में इसमें कौन-कौन से परिवर्तन आए ? कोई पांच परिवर्तन लिखिए।
उत्तर-अंग्रेजों के आगमन से पूर्व कृषि की दशा-अंग्रेजों के आगमन से पूर्व खेती-बाड़ी की दशा अधिक अच्छी नहीं थी। कृषि का उद्देश्य केवल किसानों की आवश्यकताओं को पूरा करना था। किसान को जिस चीज़ की जितनी मात्रा में आवश्यकता होती, वह केवल उतनी ही वस्तु का उत्पादन करता था। वह खाने के लिए अनाज, तेल के लिए सरसों, तोरिया, तिल, तारामीरा आदि तथा मीठे के लिए गन्ना उगा लेता था। वह वस्त्रों के लिए कपास और अपने पशुओं के लिए आवश्यक चारा भी उगा लेता था। अपनी आवश्यकता से अधिक वह किसी भी चीज़ का उत्पादन नहीं करता था।
उस समय की खेती में कुछ अन्य त्रुटियां भी थीं। खेती करने का ढंग पुराना था। सिंचाई के साधन भी अधिक विकसित नहीं थे। किसानों को सिंचाई के लिए अधिकतर वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता था। यदि वर्षा ठीक समय पर उचित मात्रा में हो जाती तो उपज अच्छी हो जाती थी। इसके विपरीत वर्षा कम होने पर सूखा पड़ जाता और अधिक होने पर बाढ़ आ जाती थी। परिणामस्वरूप फसलें नष्ट हो जाती थीं और लोगों को भयंकर अकाल का सामना करना पड़ता था।

अंग्रेजी राज्य में कृषि में परिवर्तन-18वीं शताब्दी में इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति आई और वहां अनेक कारखाने खुल गए। इन कारखानों को चलाने के लिए अंग्रेजों को कच्चे माल की आवश्यकता थी। यह कच्चा माल भारतीय कृषि से मिल सकता था। इसलिए उन्होंने भारत की कृषि को उन्नत करने में रुचि ली और इसमें निम्नलिखित परिवर्तन किए-

  • यातायात के साधनों का विकास-उन्होंने यातायात के साधनों का विकास किया। उन्होंने किसान को अधिक उत्पादन करने के लिए प्रेरित किया ताकि वे अतिरिक्त उपज को बेच कर अधिक धन कमा सकें। कमाई के अच्छे अवसर देखकर किसान अपनी कृषि में सुधार लाने लगे।
  • आदर्श कृषि फार्म-देश में बड़े-बड़े फार्म खोले गए जिनमें नमूने की (आदर्श) खेती की जाती थी। इन्हें देखकर किसान भी अपनी खेती में सुधार लाने का प्रयत्न करने लगे।
  • सिंचाई के साधनों का विकास-सिंचाई के लिए देश के विभिन्न भागों में नहरें तथा कुएं खोदे गए। देश के दक्षिणी भागों में वर्षा का पानी इकट्ठा करके अथवा नदियों से पानी लेकर सिंचाई के लिए बड़े-बड़े तालाब बनाए गए।
  • नई फसलों का उत्पादन सरकार ने ऐसी फसलों के उत्पादन पर अधिक बल दिया जिनका प्रयोग कच्चे माल के रूप में हो सकता था। उन्होंने बाहर से भी कुछ नई फसलें लाकर भारत में बोई। इन फसलों में अमेरिकन कपास, आलू, सिनकोना आदि प्रमुख थीं।
  • नये कृषि यन्त्र-कृषि के औजारों में परिवर्तन किया गया। अब लकड़ी के पुराने हलों के स्थान पर लोहे के नये हल चलाए गए।
  • उत्तम प्रकार के बीज-उत्तम प्रकार के बीज पैदा करने के लिए पूना में एक अनुसंधान विभाग खोला गया।
  • ऋण संस्थाएं-किसानों की सहायता के लिए कुछ संस्थाएं खोली गईं ताकि किसान धनवान महाजनों के चंगुल से बचें।

प्रश्न 7. व्याख्या सहित बताओ कि अंग्रेजी शासन ने ग्रामों की आर्थिकता में कौन-कौन से परिवर्तन किए ?
उत्तर-अंग्रेज़ी राज्य की स्थापना के समय भारत की लगभग 95 प्रतिशत जनसंख्या गांवों में ही रहती थी। उस समय प्रत्येक गांव अपने आप में एक इकाई था। ग्रामीण आर्थिकता का आधार आत्म-निर्भरता थी। गांव के किसान खेती करते थे और अन्य लोग उनकी खेती सम्बन्धी तथा अन्य आवश्यकताओं को पूरा करते थे। उदाहरण के लिए जुलाहे उनके लिए कपड़ा बुनते थे, कुम्हार उन्हें बर्तन आदि देते थे और बढ़ई तथा लुहार उनके लिए हल, पंजालियां आदि बनाते थे। इसके बदले में किसान केवल वही वस्तुएं उगाते थे जिनकी उन्हें या गांववासियों को आवश्यकता होती थी। आवश्यकता से अधिक किसी भी वस्तु का उत्पादन नहीं किया जाता था। देश में अंग्रेजी राज्य स्थापित होने के कारण ग्रामों की आर्थिकता में कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आए जिनका वर्णन इस प्रकार है-

1. व्यापारिक उपजों पर बल-इंग्लैंड के कारखानों को चलाने के लिए अधिक मात्रा में कच्चे माल की आवश्यकता थी। इसके अतिरिक्त इंग्लैण्ड में अधिक अन्न भी चाहिए था। अंग्रेजों ने यह कच्चा माल और अनाज भारत से प्राप्त करने का प्रयत्न किया। उन्होंने सबसे पहले सड़कों, रेलों तथा भाप से चलने वाले जहाजों में सुधार किया ताकि देश के भिन्न-भिन्न भागों से माल को इंग्लैंड तक आसानी से पहुंचाया जा सके। इसके साथ ही भारतीय किसानों को व्यापारिक फसलें उगाने के लिए प्रेरित किया गया ताकि इंग्लैंड में उनकी मांग को पूरा किया जा सके। फलस्वरूप गांवों में व्यापारिक फसलों की खेती होने लगी।

2. सिक्के का प्रसार-व्यापार आरम्भ होने से सिक्के का प्रसार बढ़ गया। अब किसान अपनी उपज बेचकर धन कमाने लगे और गांव में कई सेवाओं के बदले वे अनाज के स्थान पर नकद पैसे देने लगे। गांवों से कई लोग अधिक धन कमाने की इच्छा से नगरों में आकर भी काम करने लगे।

3. नए भूमि-प्रबन्ध-ग्रामों की आर्थिकता में सबसे बड़ा परिवर्तन नए भूमि-प्रबन्ध आरम्भ होने से आया। बंगाल, बिहार और उड़ीसा में भूमि का स्थायी बन्दोबस्त लागू किया गया। इसमें बड़े-बड़े ज़मींदारों को भूमि का स्वामी बना दिया गया और सदियों से भूमि पर खेती करने वाले किसान भूमि-हीन हो गए। वे अपने ज़मींदारों की इच्छा के दास थे। फलस्वरूप उनके मन में खेती के प्रति उत्साह कम हो गया। नए भूमि-प्रबन्ध के कारण ग्रामों की आर्थिकता पर बड़ा बुरा प्रभाव पड़ा।

4. नई न्याय प्रणाली-गांवों की आर्थिकता में पंचायतों का बड़ा महत्त्व था। प्रत्येक गांव में झगड़ों का निपटारा पंचायतें ही करती थीं और सभी को उसका निर्णय मानना पड़ता था। इसलिए झगड़ों के निपटारे पर अधिक धन और समय नष्ट नहीं होता था, परन्तु अंग्रेजों ने एक नई न्याय-प्रणाली आरम्भ की। इसके अनुसार अब गांव के झगड़ों का निपटारा पंचायतें नहीं कर सकती थीं। फलस्वरूप गांव के लोगों को भारी हानि उठानी पड़ी।

सच तो यह है कि अंग्रेजों के शासन काल में ग्रामीण आर्थिकता का रूप बिल्कुल बदल गया।