Class 11 Political Science Solutions Chapter 30 राज्य कार्यपालिका

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. राज्यपाल की नियक्ति, शक्तियों तथा स्थिति का वर्णन करें।
(Explain the appointment, powers and position of the Governor of a state.)
अथवा
राज्यपाल की नियुक्ति कैसे होती है ? (How is the Governor of a State appointed ?)
अथवा
राज्यपाल की वास्तविक स्थिति की संक्षिप्त व्याख्या करें। (Explain briefly the actual position of a State Governor.)
अथवा
आपके राज्य में राज्यपाल की नियुक्ति कैसे होती है ? उसकी शक्तियों और स्थिति का वर्णन करें।
(How is the Governor of a State appointed ? Discuss his powers and position.)
उत्तर-भारत में संघीय प्रणाली की व्यवस्था होने के कारण राज्यों की अलग-अलग सरकारें हैं। राज्य की सरकारों का संगठन बहुत कुछ संघीय सरकार से मिलता-जुलता है। संविधान के अनुच्छेद 153 में अंकित है कि “प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा और एक ही व्यक्ति दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल हो सकता है।” राज्य का शासन राज्यपाल के नाम पर चलता है जो राज्य का अध्यक्ष है, परन्तु राज्यों में भी केन्द्र की तरह संसदीय शासन-व्यवस्था होने के कारण राज्यपाल नाममात्र का तथा संवैधानिक अध्यक्ष है। राज्य का मन्त्रिमण्डल ही राज्य की वास्तविक कार्यपालिका है और राज्यपाल की शक्तियों का प्रयोग करता है। राज्यपाल की स्थिति बहुत कुछ वैसी ही है जैसी कि केन्द्र में राष्ट्रपति की। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 153 से 160 राज्यपाल की नियुक्ति तथा कार्यो का वर्णन किया गया है।

राज्यपाल की नियुक्ति (Appointment)-प्रत्येक राज्य के राज्यपाल को राष्ट्रपति नियुक्त करता है तथा वह राष्ट्रपति की कृपा दृष्टि (During the pleasure of the President) तक ही अपने पद पर रह सकता है। व्यवहार में राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की सलाह से ही राज्यपाल को नियुक्त करता है। 18 अगस्त, 2016 को श्री वी० पी० सिंह बदनौर (Sh. V.P. Singh Badnore) को पंजाब का राज्यपाल नियुक्त किया गया।

राज्यपाल की नियुक्ति के सम्बन्ध में कुछ प्रथाएं स्थापित की गई हैं, जिनमें मुख्य निम्न प्रकार की हैं-

  • प्रथम परम्परा तो यह है कि ऐसे व्यक्ति को किसी राज्य में राज्यपाल नियुक्त किया जाता है जो उस राज्य का निवासी न हो।
  • दूसरे राष्ट्रपति किसी राज्यपाल को नियुक्त करने से पहले उस राज्य के मुख्यमन्त्री से भी इस बात का परामर्श लेता है।

योग्यताएं (Qualifications)-अनुच्छेद 157 के अन्तर्गत राज्यपाल के पद के लिए निम्नलिखित योग्यताएं निश्चित की गई हैं-

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • उसकी आयु 35 वर्ष से कम न हो।
  • वह किसी राज्य में विधानमण्डल अथवा संसद् का सदस्य न हो तथा यदि हो, तो राज्यपाल का पद ग्रहण करने के समय उसका सदन वाला स्थान रिक्त समझा जाएगा।
  • राज्यपाल अपने पद पर नियुक्त होने के बाद किसी अन्य लाभदायक पद पर नहीं रह सकता।
  • वह किसी न्यायालय द्वारा दिवालिया घोषित न किया गया हो।

वेतन तथा भत्ते (Salary and Allowances)-राज्यपाल के वेतन, भत्ते तथा अन्य सुविधाओं को निश्चित करने का अधिकार संसद् को दिया गया है, परन्तु राज्यपाल की नियुक्ति के बाद उसके वेतन तथा अन्य सुविधाओं में उसके कार्यकाल में ऐसा कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता जिससे उसकी हानि हो। प्रत्येक राज्य के राज्यपाल को 3,50,000 रु० मासिक, नि:शुल्क सरकारी कोठी तथा कुछ भत्ते भी मिलते हैं। भत्तों की राशि समस्त राज्यों में एक जैसी नहीं है। राज्य के वातावरण तथा आवश्यकताओं के अनुसार भत्ते अधिक तथा कम दिये जाते हैं।

कार्यकाल (Term) साधारणतया राज्यपाल को 5 वर्ष के लिए नियुक्त किया जाता है और वह अपने पद पर तब तक रह सकता है जब तक उसे राष्ट्रपति चाहे। राष्ट्रपति 5 वर्ष की अवधि समाप्त होने से पूर्व भी राज्यपाल को हटा सकता है। 27 अक्तूबर, 1980 को राष्ट्रपति ने तामिलनाडु के राज्यपाल प्रभुदास पटवारी को बर्खास्त किया। जनवरी, 1990 में राष्ट्रपति वेंकटरमण ने राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार की सलाह पर सभी राज्यपालों को त्याग-पत्र देने को कहा। अधिकतर राज्यपालों ने तुरन्त अपने त्याग-पत्र भेज दिए। राज्यपाल चाहे तो स्वयं भी 5 वर्ष से पूर्व त्याग-पत्र दे सकता है। 22 जून, 1991 को पंजाब के राज्यपाल जनरल ओ० पी० मल्होत्रा (O.P. Malhotra) ने पंजाब में चुनाव स्थगित किए जाने के विरोध में त्याग-पत्र दे दिया।

न्यायिक सुविधाएं (Immunities)-राज्यपाल को संविधान द्वारा कुछ न्यायिक सुविधाएं भी मिली हुई हैं-

  • उसको अपने पद की शक्तियों के प्रयोग तथा कर्तव्यों का पालन करने के लिए किसी भी न्यायालय के सम्मुख उत्तरदायी नहीं होना पड़ता।
  • उसके कार्यकाल में उसके विरुद्ध कोई फौजदारी अभियोग नहीं चलाया जा सकता।
  • अपने कार्यकाल के दौरान किसी भी न्यायालय को उसे नजरबन्द करने की आज्ञा जारी करने का अधिकार नहीं है।
  • यदि किसी ने राज्यपाल के विरुद्ध दीवानी मुकद्दमा करना हो तो दो मास का नोटिस देना ज़रूरी है।

राज्यपाल का स्थानान्तरण (Transfer of Governor)-राष्ट्रपति जब चाहे किसी राज्य के राज्यपाल को दूसरे राज्य में स्थानान्तरण कर सकता है। उदाहरणस्वरूप 13 सितम्बर, 1977 को हरियाणा के राज्यपाल जय सुखलाल हाथी को पंजाब का राज्यपाल नियुक्त किया गया और उड़ीसा के राज्यपाल हरचरण सिंह बराड़ को हरियाणा का राज्यपाल नियुक्त किया गया। 8 अक्तूबर, 1983 को पश्चिमी बंगाल के राज्यपाल भैरव दत्त पांडे को पंजाब का राज्यपाल व पंजाब के राज्यपाल ए० पी० शर्मा को पश्चिमी बंगाल का राज्यपाल नियुक्त किया गया।

राज्यपाल की शक्तियां तथा कार्य (Powers and Functions of the Governor) –
राज्यपाल को लगभग वही शक्तियां तथा कार्य प्राप्त हैं जो केन्द्र में राष्ट्रपति को प्राप्त हैं। डी० डी० वसु (D.D. Basu) के शब्दों में, “राष्ट्रपति की आपात्कालीन शक्तियों और कूटनीतिक व सैनिक शक्तियों को छोड़ कर राज्यप्रशासन में शेष शक्तियां राष्ट्रपति की भांति राज्यपाल को भी प्राप्त हैं।”

राज्यपाल की शक्तियां तथा कार्य निम्नलिखित हैं-

(क) कार्यपालिका शक्तियां (Executive Powers)-संविधान के अनुच्छेद 154 के अनुसार राज्य की कार्यपालिका शक्तियां राज्यपाल में निहित की गई हैं जिनका प्रयोग या तो स्वयं प्रत्यक्ष रूप से करता है या अपने अधीन कार्यपालिका द्वारा करता है। राज्यपाल को निम्नलिखित कार्यपालिका शक्तियां प्राप्त हैं

  • राज्य का समस्त शासन गवर्नर के नाम से चलाया जाता है।
  • राज्यपाल मुख्यमन्त्री की नियुक्ति करता है और उसकी सलाह से अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है।
  • मन्त्री अपने पद पर राज्यपाल की कृपा-पर्यन्त रहते हैं। राज्यपाल भी मन्त्री को मुख्यमन्त्री की सलाह से हटा सकता है।
  • वह शासन के कार्य को सुविधापूर्वक चलाने के लिए तथा उस कार्य को मन्त्रियों में बांटने के लिए नियम बनाता है।
  • वह राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) और राज्य लोकसेवा आयोग के सभापति तथा अन्य सदस्यों की नियुक्ति करता है। राज्यों में बड़े-बड़े पदाधिकारियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा ही की जाती है।
  • राष्ट्रपति उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति के समय राज्यपाल की सलाह लेता है।
  • राज्यपाल मन्त्री के किसी निर्णय को मन्त्रिपरिषद् के पास विचार करने के लिए वापिस भेज सकता है।
  • वह प्रशासन के बारे में मुख्यमन्त्री से कोई भी जानकारी प्राप्त कर सकता है।
  • असम के राज्यपाल को यह अधिकार दिया गया है कि वह अनुसूचित कबीलों का ध्यान रखे।
  • राज्यपाल जब यह अनुभव करे कि राज्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो चुकी है कि राज्य प्रशासन लोकतन्त्रात्मक परम्पराओं के अनुसार नहीं चलाया जा सकता, तब वह राष्ट्रपति को इस सम्बन्ध में रिपोर्ट भेजता है और राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक संकट की घोषणा पर वह राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में राज्य का शासन चलाता है।

(ख) विधायिनी शक्तियां (Legislative Powers)–राज्यपाल विधानमण्डल का सदस्य नहीं, फिर भी कानूननिर्माण में उसका महत्त्वपूर्ण हाथ है और इसलिए उसे विधानमण्डल का एक अंग माना जाता है। उसे निम्नलिखित विधायिनी शक्तियां प्राप्त हैं-

  1. राज्यपाल विधानमण्डल का अधिवेशन बुला सकता है, स्थगित कर सकता है तथा इसकी अवधि बढ़ा सकता है।
  2. वह विधानमण्डल के दोनों सदनों में भाषण दे सकता है तथा उनको सन्देश भेज सकता है।
  3. वह विधानमण्डल के निम्न सदन विधानसभा को जब चाहे, भंग कर सकता है। अपने इस अधिकार का प्रयोग वह साधारणतया मुख्यमन्त्री के परामर्श पर ही करता है।
  4. प्रत्येक वर्ष विधानमण्डल का अधिवेशन राज्यपाल के भाषण से प्रारम्भ होता है जिसमें राज्य की नीति का वर्णन होता है।
  5. यदि राज्य विधानमण्डल में ऐंग्लो-इण्डियन जाति को उचित प्रतिनिधित्व न मिले, तो राज्यपाल उस जाति के एक सदस्य को विधानसभा में मनोनीत करता है।
  6. राज्य विधानमण्डल द्वारा पास हुआ बिल उतनी देर तक कानून नहीं बन सकता जब तक राज्यपाल अपनी स्वीकृति न दे दे। धन बिलों को राज्यपाल स्वीकृति देने से इन्कार नहीं कर सकता परन्तु साधारण बिलों को पुनर्विचार करने के लिए वापस भेज सकता है। यदि विधानमण्डल साधारण बिल दोबारा पास कर दे तो राज्यपाल को अपनी स्वीकृति देनी पड़ती है। राज्यपाल कुछ बिलों को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित रख सकता है।
  7. वह राज्य विधानमण्डल के उपरि सदन (विधानपरिषद्) के 1/6 सदस्यों को मनोनीत करता है। राज्यपाल ऐसे व्यक्तियों को मनोनीत करता है जिन्होंने विज्ञान, कला, साहित्य, समाज-सेवा आदि के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त की हो।
  8. राज्यपाल को अध्यादेश जारी करने का भी अधिकार प्राप्त है। अध्यादेश को उसी प्रकार लागू किया जाता है जिस प्रकार विधानमण्डल के बनाए हुए कानून को, परन्तु यह अध्यादेश विधानमण्डल की बैठक आरम्भ होने के 6 सप्ताह के पश्चात् लागू नहीं रह सकता। यदि विधानमण्डल इस समय से पूर्व ही इसको समाप्त करने का प्रस्ताव पास कर दे, तो ऐसे अध्यादेशों का प्रभाव तुरन्त समाप्त हो जाता है। राज्यपाल स्वयं भी अध्यादेश वापस ले सकता है।
  9. राज्यपाल विधानपरिषद् के सभापति तथा उप-राष्ट्रपति के पद रिक्त होने पर किसी भी सदस्य को विधानपरिषद् की अध्यक्षता करने को कह सकता है।

(ग) वित्तीय शक्तियां (Financial Powers)-राज्यपाल को निम्नलिखित वित्तीय शक्तियां प्राप्त हैं-

  • राज्यपाल की सिफ़ारिश के बिना कोई धन-बिल विधानसभा में पेश नहीं किया जा सकता।
  • राज्यपाल वित्त मन्त्री द्वारा वार्षिक बजट विधानसभा में पेश करवाता है। कोई भी अनुदान की मांग (Demand for Grant) बजट में बिना राज्यपाल की आज्ञा के प्रस्तुत नहीं हो सकती।
  • राज्य की आकस्मिक निधि (Contingency Fund of the State) पर राज्यपाल का ही नियन्त्रण है। यदि संकट के समय आवश्यकता पड़े, तो राज्यपाल इसमें से आवश्यकतानुसार व्यय कर लेता है तथा उसके पश्चात् विधानमण्डल से उस व्यय की स्वीकृति ले लेता है।

(घ) न्यायिक शक्तियां (Judicial Powers)-राज्यपाल को निम्नलिखित न्यायिक शक्तियां प्राप्त हैं

  • उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति राज्यपाल की सलाह लेता है।
  • जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति और पदोन्नति राज्यपाल ही करता है।
  • राज्यपाल उस अपराधी के दण्ड को क्षमा कर सकता है, घटा सकता है तथा कुछ समय के लिए स्थगित कर सकता है, जिसे राज्य से कानून के विरुद्ध अपराध करने पर दण्ड मिला हो।
  • राज्यपाल यह भी देखता है कि किसी न्यायालय के पास अधिक कार्य तो नहीं है। यदि हो, तो वह आवश्यकतानुसार अधिक न्यायाधीशों को नियुक्त कर सकता है।

(ङ) स्वैच्छिक अधिकार (Discretionary Powers)-राज्यपाल को कुछ स्वविवेकी शक्तियां भी प्राप्त हैं। स्वविवेकी शक्तियों का प्रयोग राज्यपाल अपनी इच्छा से करता है न कि मन्त्रिमण्डल के परामर्श से। राज्यपाल की मुख्य स्वविवेकी शक्तियां निम्नलिखित हैं-

  • संघीय क्षेत्र के प्रशासक के रूप में यदि राष्ट्रपति ने राज्यपाल के समीप संघीय क्षेत्र (Union Territory) का प्रशासक भी नियुक्त कर दिया है तो उस क्षेत्र का प्रशासन स्वविवेक से चलाता है।
  • असम में आदिम जातियों के प्रशासन के सम्बन्ध में- असम राज्य के राज्यपाल को आदिम जातियों के सम्बन्ध में स्वविवेक से कार्य करने का अधिकार दिया गया है।
  • सिक्किम के राज्यपाल के विशेष उत्तरदायित्व-सिक्किम राज्य में शान्ति बनाए रखने के लिए तथा सिक्किम को जनसंख्या के सब वर्गों के सामाजिक तथा आर्थिक विकास के लिए सिक्किम के राज्यपाल को विशेष उत्तरदायित्व सौंपा गया है।
  • राज्य में संवैधानिक संकट होने पर-प्रत्येक राज्यपाल अपने राज्य में संवैधानिक मशीनरी के फेल हो जाने का प्रतिवेदन राष्ट्रपति को करता है जिस पर वह संकटकाल की घोषणा करता है। इस दशा में मन्त्रिपरिषद् को भंग कर दिया जाता है तथा वह राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है।
  • राज्यपाल अपने राज्य के विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति होता है।

राज्यपाल की स्थिति (Position of the Governor) – राज्यपाल एक संवैधानिक मुखिया के रूप में राज्य में राज्यपाल की स्थिति लगभग वही है जो कि संघीय सरकार में राष्ट्रपति की है। संविधान के दृष्टिकोण से सरकार की समस्त शक्तियां राज्यपाल में निहित हैं तथा मन्त्रिपरिषद् का कार्य उसको शासन में सहायता तथा परामर्श देना है। वह एक संवैधानिक शासक है तथा राज्य का सम्पूर्ण कार्य उसके नाम पर चलाया जाता है। राज्यपाल को जितनी भी शक्तियां प्राप्त हैं, उनका प्रयोग वह राज्य की मन्त्रिपरिषद् द्वारा करता है। हमारे संविधान में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि राज्यपाल के मन्त्रिपरिषद् के परामर्श को स्वीकार करना आवश्यक है अथवा नहीं, परन्तु देश तथा राज्यों में संसदीय प्रकार की सरकार स्थापित होने के कारण राज्यपाल को मन्त्रिपरिषद् की सम्मति से राज्य का प्रबन्ध चलाना पड़ता है। वास्तव में राज्यपाल की स्थिति एक संवैधानिक प्रमुख अथवा नाम मात्र प्रशासक की भान्ति है तथा राज्य की वास्तविक शक्ति मन्त्रिपरिषद् के पास है।

राज्यपाल केवल एक संवैधानिक मुखिया नहीं बल्कि वह एक प्रभावशाली अधिकारी है।
राज्यपाल के संवैधानिक प्रमुख होने का यह अर्थ नहीं कि उसका पद बिल्कुल ही प्रभावहीन है। चाहे उसकी शक्तियों का प्रयोग मन्त्रिपरिषद् ही करती है फिर भी राज्यपाल शासन का महत्त्वपूर्ण अधिकारी होता है। वह राष्ट्रपति का प्रतिनिधि तथा राज्य में केन्द्रीय सरकार का प्रतिनिधि है। वह केन्द्रीय सरकार को अपने राज्यों के विषयों के सम्बन्ध में सूचित करता है। वह मन्त्रिपरिषद् को परामर्श देने, चेतावनी देने तथा उत्साह देने का अधिकार रखता है। वर्तमान संविधान के अधीन कुछ ऐसी परिस्थितियां भी हैं जिनके अनुसार राज्यपाल अपनी शक्तियों का प्रयोग अपनी इच्छानुसार कर सकता है, जो कि इस प्रकार हैं-

  • जब राष्ट्रपति संकटकालीन घोषणा करता है तो राज्यपाल राष्ट्रपति का प्रतिनिधि बन जाता है। उसको राष्ट्रपति की आज्ञाओं का पालन करना पड़ता है।
  • जब राज्यपाल राष्ट्रपति को यह रिपोर्ट भेजता है कि राज्य-कार्य संविधान की धाराओं के अनुसार नहीं चलाया जा रहा, तो राज्य में संवैधानिक मशीनरी फेल हो जाने के कारण राज्यपाल केन्द्रीय सरकार के प्रतिनिधि (Agent) की स्थिति में राज्य सरकार के वास्तविक शासक (Real Ruler) के रूप में कार्य करता है। जब राज्यपाल राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट भेजता है तब वह किसी दल का पक्ष भी ले सकता है।
  • जब विधानसभा के चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता तब राज्यपाल अपनी इच्छा से मुख्यमन्त्री को नियुक्त करता है।
  • मन्त्रिपरिषद् को भंग करते समय राज्यपाल अपनी इच्छा का प्रयोग कर सकता है। 1967 के चुनाव के बाद पश्चिमी बंगाल के राज्यपाल धर्मवीर ने अजय मुखर्जी के मन्त्रिमण्डल को भंग कर दिया और विधानसभा का अधिवेशन बुला कर यह तक नहीं देखा कि उनको विधानसभा में बहुमत प्राप्त है या नहीं।
  • विधानसभा का विघटन (Dissolution) करते समय जब तक बहुतम दल का नेता विधानसभा को भंग करने की सलाह राज्यपाल को देता है तब तो राज्यपाल को वह सलाह माननी पड़ती है, परन्तु इस सम्बन्ध में राज्यपाल को स्वविवेक का प्रयोग करने का अवसर तब प्राप्त होता है जबकि दल-बदल के कारण या अन्य किसी कारण से सरकार अल्पमत में रह गई हो।
  • राज्यपाल मुख्यमन्त्री से प्रशासन सम्बन्धी तथा वैधानिक कार्यों के सम्बन्ध में सूचना प्राप्त करने का अधिकार रखता है।
  • विधानमण्डल द्वारा पास किए बिल को अस्वीकार करते समय अथवा उसको विधानमण्डल के पुनर्विचार के लिए भेजते समय।
  • राज्य विधानमण्डल द्वारा पास किए बिल को राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजते समय।
  • इसके अतिरिक्त असम के राज्यपाल को कुछ अधिक स्वैच्छिक (Discretionary) अधिकार प्राप्त हैं। उसको कुछ विशेष कबीलों तथा क्षेत्रों के राज्य-प्रबन्ध के लिए अपनी स्वेच्छानुसार कार्य करने की स्वतन्त्रता है।

पायली ने ठीक ही कहा है कि, “राज्यपाल न तो नाममात्र का अध्यक्ष है, न ही रबड़ की मोहर है बल्कि एक ऐसा अधिकारी है जो राज्य के प्रशासन और जीवन में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाला है।” राज्यपाल के कर्त्तव्यों के विषय में स्वर्गीय राष्ट्रपति श्री वी० वी० गिरि के शब्दों में, “राज्यपालों को संविधान के उपबन्धों, अपनी श्रेष्ठ बुद्धि और योग्यता के अनुसार जनता के हितों के लिए काम करना चाहिए।”

प्रश्न 2. मन्त्रिपरिषद् का निर्माण किस तरह होता है ? मन्त्रिपरिषद् की शक्तियों का वर्णन करें।
(How is the Council of Ministers formed ? Explain its powers.)
उत्तर-हमारे संविधान में केन्द्र तथा प्रान्तों में संसदीय शासन-व्यवस्था का प्रबन्ध किया गया है। अनुच्छेद 163 में लिखा हुआ है कि राज्यपाल की सहायता तथा उसको परामर्श देने के लिए एक मन्त्रिपरिषद् होगी, जिसका मुखिया मुख्यमन्त्री होगा। राज्यपाल के कुछ अधिकारों को छोड़ कर शेष सभी अधिकारों का प्रयोग करने का अधिकार मन्त्रिपरिषद् को ही है। अतः केन्द्र की तरह प्रान्तों को शासन वास्तव में मन्त्रिपरिषद् द्वारा ही चलाया जा सकता है।

मन्त्रिपरिषद् का निर्माण (Formation of the Council of Ministers)–मन्त्रिपरिषद् के निर्माण के लिए सबसे पहला महत्त्वपूर्ण पग मुख्यमन्त्री की नियुक्ति है। राज्यपाल मन्त्रिपरिषद् के अध्यक्ष मुख्यमन्त्री को सर्वप्रथम नियुक्त करता है, परन्तु राज्यपाल उसे अपनी इच्छा से नियुक्त नहीं कर सकता। जिस दल को विधानसभा में बहुमत प्राप्त होता है, उसी दल के नेता को मुख्यमन्त्री नियुक्त किया जाता है। मुख्यमन्त्री की सलाह से राज्यपाल अन्य मन्त्रियों को नियुक्त करता है। मन्त्रियों के लिए विधानमण्डल के दोनों सदनों में से किसी एक का सदस्य होना अनिवार्य है। यदि किसी ऐसे व्यक्ति को मन्त्री नियुक्त किया जाए जो किसी भी सदन का सदस्य न हो, तो उसको 6 महीने के के अन्दर-अन्दर विधानमण्डल के किसी एक सदन का सदस्य बनना पड़ता है। दिसम्बर, 2003 में पारित 91वें संवैधानिक संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई है, कि राज्य मन्त्रिपरिषद का आकार विधानपालिका के निचले सदन (विधानसभा) की कुल सदस्य संख्या का 15% होगा। मार्च, 2017 में पंजाब के मुख्यमन्त्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने अपने 9 सदस्यीय मन्त्रिपरिषद् का निर्माण किया।
विभागों का वितरण (Distribution of Portfolios)—संविधान के अनुसार मन्त्रियों में विभागों का विभाजन करने का उत्तरदायित्व राज्यपाल का है, परन्तु वास्तव में यह कार्य मुख्यमन्त्री द्वारा किया जाता है। मुख्यमन्त्री जब चाहे अपने मन्त्रियों के विभागों को बदल सकता है।

कार्यकाल (Term of Office) मन्त्रिपरिषद् का कार्यकाल निश्चित नहीं है। वह अपने कार्यों के लिए सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है अर्थात् मन्त्रिपरिषद् उसी समय तक अपने पद पर रह सकती है जब तक कि उसे विधानसभा का विश्वास प्राप्त हो।

मन्त्रिपरिषद् की शक्तियां और कार्य (Powers and Functions of the Council of Ministers) राज्य की मन्त्रिपरिषद् की शक्तियां और कार्य भी संघीय मन्त्रिपरिषद् के कार्यों से मिलते-जुलते हैं। इसकी शक्तियों और कार्यों का उल्लेख निम्नलिखित कई श्रेणियों में किया जा सकता है-

  • नीति का निर्धारण (Determination of Policy)-मन्त्रिपरिषद् का मुख्य कार्य प्रशासन चलाने के लिए नीति निर्धारित करना है। मन्त्रिपरिषद् राज्य की राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक समस्याओं का हल निकालती है। नीतियां बनाते समय मन्त्रिपरिषद् अपने दल के कार्यक्रम व नीतियों को ध्यान में रखती है। मन्त्रिपरिषद् केवल नीति का निर्णय नहीं करती बल्कि उसे विधानमण्डल की स्वीकृति के लिए भी प्रस्तुत करती है।
  • प्रशासन पर नियन्त्रण (Control over Administration)—शासन को अच्छी प्रकार चलाने के लिए कई विभागों में बांटा जाता है और प्रत्येक विभाग किसी-न-किसी मन्त्री के अधीन होता है। विभाग में मन्त्री के अधीन कई सरकारी कर्मचारी होते हैं जो उसकी आज्ञानुसार कार्य करते हैं। मन्त्री को अपने विभाग का शासन मन्त्रिपरिषद् की निश्चित नीति के अनुसार चलाना पड़ता है। मन्त्रिपरिषद् प्रशासन चलाने के लिए विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है।
  • कानून को लागू करना तथा व्यवस्था को बनाए रखना (Enforcement of Law and Maintenance of Order)-राज्य के विधानमण्डल द्वारा बनाए गए कानून को लागू करना मन्त्रिपरिषद् की ज़िम्मेवारी है। कानून का तब तक कोई महत्त्व नहीं है जब तक उसे लागू न किया जाए और कानूनों को सख्ती से अथवा नर्मी से लागू करना मन्त्रिपरिषद् पर निर्भर करता है। राज्य के अन्दर शान्ति को बनाए रखना मन्त्रिपरिषद् का कार्य है।
  • नियुक्तियां (Appointments)-राज्य की सभी महत्त्वपूर्ण नियुक्तियां राज्यपाल मन्त्रिमण्डल के परामर्श से करता है। वास्तव में नियुक्तियों के सम्बन्ध में सभी निर्णय मन्त्रिमण्डल के द्वारा लिए जाते हैं और राज्यपाल उन सभी निर्णयों के अनुसार नियुक्तियां करता है। इन नियुक्तियों में एडवोकेट जनरल, राज्य के लोक-सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्य, राज्य में विश्वविद्यालयों के उपकुलपतियों के पद इत्यादि सम्मिलित हैं।
  • विधायिनी शक्तियां (Legislative Powers)-राज्य के कानून निर्माण में मन्त्रिपरिषद् का मुख्य हाथ होता है। मन्त्रिपरिषद के सभी सदस्य विधानमण्डल के सदस्य होते हैं। ये विधानमण्डल की बैठकों में भाग लेते हैं तथा वोट डालते हैं। सभी महत्त्वपूर्ण बिल मन्त्रिपरिषद् द्वारा तैयार किये जाते हैं और किसी-न-किसी मन्त्री द्वारा विधानमण्डल में पेश किए जाते हैं। मन्त्रिपरिषद् को विधानमण्डल में बहुमत प्राप्त होता है, जिस कारण इसके द्वारा पेश किए गए सभी बिल पास हो जाते हैं। मन्त्रिपरिषद् की इच्छा के विरुद्ध कोई कानून पास नहीं हो सकता।
  • वित्तीय शक्तियां (Financial Powers)-राज्य का बजट मन्त्रिमण्डल द्वारा ही तैयार किया जाता है। मन्त्रिपरिषद् ही इस बात का निर्णय करती है कि कौन से नए कर लगाए जाएं और किस कर में कमी या बढ़ौतरी की जाए। बहुमत का समर्थन प्राप्त होने के कारण यह अपनी इच्छानुसार उन्हें पास करवा लेती है।
  • विभागों में तालमेल (Coordination among the Departments)-मन्त्रिपरिषद् का कार्य राज्य का प्रशासन ठीक प्रकार से चलाना है तथा मन्त्रिमण्डल का मुख्य कार्य भिन्न-भिन्न विभागों में तालमेल उत्पन्न करना है ताकि राज्य का प्रशासन-प्रबन्ध अच्छी तरह से चलाया जा सके। विभिन्न विभागों के मतभेदों को दूर करना मन्त्रिमण्डल का कार्य है।

मन्त्रिपरिषद् की स्थिति (Position of the Council of Ministers)—निःसन्देह मन्त्रिपरिषद् ही राज्य की वास्तविक शासक है। राज्य के कानून बनवाने, उन्हें लागू करने तथा शासन करने में उसकी इच्छा ही प्रधान रहती है। मन्त्रिपरिषद् को वास्तविक स्थिति कुछ कारकों पर निर्भर है-(क) यदि मन्त्रिपरिषद् केवल एक दल से ही सम्बन्धित है और उस दल को विधानसभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त है तथा इसके साथ-साथ दलीय अनुशासन दृढ़ होने के नाते दलबदली की सम्भावना कम है तो मन्त्रिपरिषद् वास्तविक शासक होती है। (ख) यदि मन्त्रिपरिषद् मिली-जुली (Coalition) हो तो यह इतनी सुदृढ़ और शक्तिशाली नहीं होती (ग) धारा 356 के अन्तर्गत संकटकालीन घोषणा के दौरान तो मन्त्रिपरिषद् होती ही नहीं।

प्रश्न 3. भारतीय संघ के राज्यों में नाममात्र कार्यपालिका तथा वास्तविक कार्यपालिका कौन होता है ? वास्तविक कार्यपालिका की शक्तियों की व्याख्या करे।
(Who is the Nominal Executive and Real Executive in the States of the Indian Union ? Explain the powers and position of the Real Executive.)
उत्तर-भारतीय संघ के राज्यों में केन्द्र की तरह संसदीय प्रणाली की व्यवस्था की गई है। जिस तरह केन्द्र में राष्ट्रपति नाममात्र की कार्यपालिका है, उसी तरह राज्यों में राज्यपाल नाममात्र की कार्यपालिका है। राज्य का शासन राज्यपाल के नाम पर चलता है जो राज्य का अध्यक्ष परन्तु राज्यपाल नाममात्र का तथा संवैधानिक अध्यक्ष है। राज्य का मन्त्रिमण्डल ही राज्य की वास्तविक कार्यपालिका है और राज्यपाल की शक्तियों का प्रयोग करता है। केन्द्र की तरह राज्यों का शासन वास्तव में मन्त्रिपरिषद् द्वारा चलाया जाता है।
वास्तविक कार्यपालिका की शक्तियां एवं स्थिति-इसके लिए पिछला प्रश्न देखिए।

प्रश्न 4. मुख्यमन्त्री को कौन नियुक्त करता है ? उसकी शक्तियों तथा स्थिति की व्याख्या करें।
(Who appoints the Chief Minister ? Discuss his powers and position.)
उत्तर-राज्य का समस्त प्रशासन राज्यपाल के नाम पर ही चलाया जाता है परन्तु वास्तव में प्रशासन को राज्यपाल अपनी इच्छा के अनुसार न चला कर मन्त्रिमण्डल की सलाह के अनुसार चलाता है और मन्त्रिमण्डल मुख्यमन्त्री के नेतृत्व में कार्य करता है। राज्य में मुख्यमन्त्री की लगभग वही स्थिति है जो केन्द्र में प्रधानमन्त्री की अर्थात् देश का वास्तविक शासक प्रधानमन्त्री तथा राज्य का वास्तविक शासक मुख्यमन्त्री है।

नियुक्ति (Appointment)-मुख्यमन्त्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है परन्तु राज्यपाल जिस व्यक्ति को चाहे, मुख्यमन्त्री नियुक्त नहीं कर सकता। राज्यपाल को विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को ही मुख्यमन्त्री बनाना पड़ता है। राज्यपाल को अपने स्वविवेक से नियुक्त करने का अवसर तभी प्राप्त है जब किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता। ऐसी स्थिति में राज्यपाल को या तो विधानसभा में सबसे अधिक स्थान प्राप्त दल के नेता को अथवा यदि कुछ दलों ने मिलकर सभा में सबसे अधिक स्थान प्राप्त दल के नेता को अथवा यदि कुछ दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा और उन्हें स्पष्ट बहुमत प्राप्त हो गया तो ऐसे मिले-जुले दलों के नेता को मुख्यमन्त्री पद पर नियुक्त करना चाहिए। फरवरी, 1992 में पंजाब विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस (ई) को भारी बहुमत प्राप्त हुआ और राज्यपाल ने कांग्रेस (इ) के नेता बेअन्त सिंह को मुख्यमन्त्री नियुक्त किया। फरवरी, 1997 की पंजाब राज्य विधानसभा के चुनावों के पश्चात् अकाली दल व भारतीय जनता पार्टी गठजोड़ को भारी सफलता प्राप्त हुई और सरदार प्रकाश सिंह बादल राज्य के मुख्यमन्त्री बने। फरवरी, 2002 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ और राज्यपाल ने कांग्रेस के कैप्टन अमरिन्दर सिंह को मुख्यमन्त्री नियुक्त किया। फरवरी, 2017 में हुए पंजाब विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को भारी सफलता प्राप्त हुई तथा कैप्टन अमरिन्दर सिंह राज्य के मुख्यमन्त्री नियुक्त किये गए।

वेतन और भत्ते (Salary and Allowances)—मुख्यमन्त्री के वेतन तथा भत्ते राज्य विधानमण्डल द्वारा निश्चित किए जाते हैं।
अवधि (Term of Office)-मुख्यमन्त्री का कोई निश्चित कार्यकाल नहीं है। वह उसी समय तक अपने पद पर रह सकता है जब तक कि विधानसभा का बहुमत उसके साथ है। राज्यपाल अपनी इच्छानुसार जब चाहे उसे अपदस्थ नहीं कर सकता और बहुमत का समर्थन खोने पर वह पद पर नहीं रह सकता। मुख्यमन्त्री स्वयं भी जब चाहे, त्यागपत्र दे सकता है। 21 नवम्बर, 1996 को पंजाब के मुख्यमन्त्री हरचरण सिंह बराड़ ने अपना त्याग-पत्र राज्यपाल छिब्बर को दे दिया।

मुख्यमन्त्री की शक्तियां तथा कार्य (Powers and Functions of the Chief Minister)-मुख्यमन्त्री की शक्तियों और कार्यों को निम्नलिखित कई भागों में बांटा जा सकता है-

1. मुख्यमन्त्री तथा मन्त्रिपरिषद् (Chief Minister and the Council of Minister)-मुख्यमन्त्री के बिना मन्त्रिपरिषद् का कोई अस्तित्व नहीं है। प्रधानमन्त्री की तरह उसे भी ‘मन्त्रिमण्डल रूपी मेहराब की आधारशिला’ (Keystone of the Cabinet arch) कहा जा सकता है। मुख्यमन्त्री की मन्त्रिपरिषद् से सम्बन्धित शक्तियां निम्नलिखित हैं-

(क) मन्त्रिपरिषद् का निर्माण (Formation of the Council of Ministers)-राज्य में मन्त्रिपरिषद् का निर्माण राज्यपाल मुख्यमन्त्री के परामर्श से करता है। मुख्यमन्त्री अपनी नियुक्ति के पश्चात् उन व्यक्तियों की सूची तैयार करता है जिन्हें वह मन्त्रिपरिषद् में लेना चाहता है। मुख्यमन्त्री मन्त्रियों की सूची तैयार करके राज्यपाल को भेजता है और राज्यपाल की स्वीकृति के पश्चात् सूची में दिए गए व्यक्ति मन्त्री नियुक्त कर दिए जाते हैं। राज्यपाल सूची में दिए गए व्यक्ति को मन्त्री नियुक्त करने से इन्कार नहीं कर सकता। मन्त्रिपरिषद् के निर्माण का वास्तविक कार्य मुख्यमन्त्री का है। दिसम्बर, 2003 में पारित 91वें संवैधानिक संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई है, कि राज्य मन्त्रिपरिषद् का आकार विधानपालिका के निचले सदन (विधानसभा) की कुल सदस्य संख्या का 15% होगा। मार्च, 2017 में पंजाब के मुख्यमन्त्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने अपने 9 सदस्यीय मन्त्रिपरिषद् का निर्माण किया।

(ख) मन्त्रियों की पदच्युति (Removal of Ministers)—मुख्यमन्त्री मन्त्रियों को अपने पद से हटा भी सकता है। यदि वह किसी मन्त्री के काम से प्रसन्न न हो या उसके विचार मन्त्री के विचारों से मेल न खाते हों, तो वह उस मन्त्री को त्याग-पत्र देने के लिए कह सकता है। यदि मन्त्री त्याग-पत्र न दे, तो मुख्यमन्त्री राज्यपाल को सलाह देकर उस मन्त्री को बर्खास्त करवा सकता है। यदि मन्त्री उसकी इच्छानुसार त्याग-पत्र न दे तो वह स्वयं भी अपना त्यागपत्र दे सकता है जिसका अर्थ यह होगा समस्त मन्त्रिपरिषद् का त्याग-पत्र। बहुमत दल का नेता होने के कारण जब दोबारा मन्त्रिमण्डल बनाने लगे, तो उस मन्त्री को छोड़कर अन्य सभी मन्त्रियों को मन्त्रिपरिषद् में ले सकता है। 16 फरवरी, 1993 को हरियाणा के मुख्यमन्त्री भजनलाल की सलाह पर राज्यपाल ने विज्ञान एवं टेकनालोजी राज्यमन्त्री डॉ० राम प्रकाश को बर्खास्त कर दिया।

(ग) विभागों का वितरण (Distribution of Portfolios)-मुख्यमन्त्री मन्त्रियों को केवल नियुक्त ही नहीं करता बल्कि उनमें विभागों का वितरण भी करता है। वह किसी भी मन्त्री को कोई भी विभाग दे सकता है। कोई भी मन्त्री यह मांग नहीं कर सकता कि उसे कोई विशेष विभाग मिलना चाहिए। मुख्यमन्त्री जब चाहे मन्त्रियों के विभागों में परिवर्तन कर सकता है। उदाहरणस्वरूप पंजाब के मुख्यमन्त्री हरचरण सिंह बराड़ ने 7 फरवरी, 1996 को अपने मन्त्रिमण्डल का विस्तार किया और मन्त्रियों के विभागों में परिवर्तन किया था।

(घ) मन्त्रिपरिषद् का अध्यक्ष (Chairman of the Council of Ministers)-मन्त्रिपरिषद् अपना समस्त कार्य मुख्यमन्त्री के नेतृत्व में ही करती है। मुख्यमन्त्री ही परिषद् की बैठक बुलाता है और इस बात का निश्चय करता है कि बैठक कब और कहां बुलाई जाए तथा उसमें किस विषय पर विचार किया जाएगा। मुख्यमन्त्री मन्त्रिपरिषद् की बैठकों की अध्यक्षता करता है और मन्त्रिपरिषद् के निर्णय भी अधिकतर मुख्यमन्त्री की इच्छानुसार ही होते हैं।

(ङ) मन्त्रिमण्डल का नेतृत्व एवं प्रतिनिधित्व (Leadership and Representative of Cabinet)-मुख्यमन्त्री मन्त्रिमण्डल का नेतृत्व और प्रतिनिधित्व करता है। इसके महत्त्वपूर्ण निर्णयों की घोषणा जनता तथा विधानमण्डल के सामने मुख्यमन्त्री के द्वारा ही की जाती है। शासन की नीति पर मुख्यमन्त्री ही प्रकाश डालता है और उस पर उत्पन्न हुए मतभेदों का स्पष्टीकरण करता है।

2. राज्यपाल और मन्त्रिपरिषद के बीच कड़ी (Link between the Governor and Council of Ministers)-मुख्यमन्त्री ही मन्त्रिपरिषद् तथा राज्यपाल के बीच कड़ी है। कोई भी मन्त्री मुख्यमन्त्री की आज्ञा के बिना राज्यपाल से मिलकर प्रशासनिक मामलों के बारे में बातचीत नहीं कर सकता। मन्त्रिपरिषद् के बारे में मुख्यमन्त्री ही राज्यपाल को सूचित करता है। राज्यपाल भी, यदि उसे प्रशासन के बारे में कोई सूचना चाहिए, मुख्यमन्त्री के द्वारा ही प्राप्त कर सकता है।

3. शासन के विभिन्न विभागों में समन्वय (Co-ordination among the different Departments)शासन के विभिन्न विभागों में तालमेल होना आवश्यक है क्योंकि एक विभाग की नीतियों का दूसरे विभाग पर आवश्यक प्रभाव पड़ता है। यह तालमेल मुख्यमन्त्री द्वारा पैदा किया जाता है। मुख्यमन्त्री विभिन्न विभागों की देख-रेख करता है
और इस बात का ध्यान रखता है कि किसी विभाग की नीति का दूसरे विभाग पर बुरा प्रभाव न पड़े।

4. राज्यपाल का मुख्य सलाहकार (Principal Adviser of the Governor)—मुख्यमन्त्री राज्यपाल का मुख्य सलाहकार है और सभी विषयों पर मुख्यमन्त्री राज्यपाल को सलाह देता है। राज्यपाल प्रायः सभी विषयों पर मुख्यमन्त्री की सलाह मान लेता है सिवाय उन विषयों को छोड़कर, जब वह केन्द्रीय सरकार के निर्देशन में काम कर रहा हो।

5. विधानमण्डल का नेता (Leader of the State Legislature)-मुख्यमन्त्री विधानमण्डल का नेता समझा जाता है जिसके नेतृत्व तथा मार्गदर्शन में विधान मण्डल अपना काम करता है। वह विधानसभा में बहुमत दल का नेता होता है और इसलिए विधानसभा उसकी इच्छा के विरुद्ध कुछ नहीं कर सकती। किसी गम्भीर समस्या के होने पर विधानमण्डल तथा पथ-प्रदर्शन के लिए मुख्यमन्त्री की ओर ही देखता है। दूसरे मन्त्रियों की ओर से दिए गए वक्तव्यों को स्पष्ट करना तथा यदि कोई ग़लत बात हो गई हो तो उसे ठीक करने का अधिकार भी मुख्यमन्त्री को ही है।

6. विधानसभा का विघटन (Dissolution of the Legislative Assembly)-मुख्यमन्त्री विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है और जब इस सदन में उसे बहुमत प्राप्त न रहे तब उसके सामने दो रास्ते होते हैं। प्रथम, या तो वह त्यागपत्र दे दे। द्वितीय, या फिर वह राज्यपाल को सलाह देकर सदन को विघटित कर सकता है। प्रायः राज्यपाल विघटन की मांग को अस्वीकार नहीं करता।

7. नियुक्तियां (Appointments)-राज्य में होने वाली सभी बड़ी-बड़ी नियुक्तियां मुख्यमन्त्री के हाथों में हैं। मन्त्री, एडवोकेट जनरल, लोकसेवा आयोग का अध्यक्ष तथा अन्य सदस्य, राज्य में स्थित यूनिवर्सिटियों के उप-कुलपति आदि की नियुक्तियां राज्यपाल मुख्यमन्त्री की सलाह के अनुसार करता है।

8. जनता का नेता (Leader of People)-मुख्यमन्त्री उसी प्रकार से राज्य की जनता का नेता है जिस प्रकार प्रधानमन्त्री समस्त राष्ट्र का नेता माना जाता है। राज्य की जनता का उसमें दृढ़ विश्वास रहता है और इस कारण उसकी स्थिति और भी महत्त्वपूर्ण बन जाती है। राज्य में होने वाले सामाजिक समारोहों का नेतृत्व भी मुख्यमन्त्री करता है। जैसे ज्ञानी जैलसिंह ने हरमन्दिर साहिब में हुई कार सेवा, गुरु गोबिन्द मार्ग की महायात्रा और रामचरित मानस की चार सौ साला शताब्दी के समारोहों का नेतृत्व किया।

9. दल का नेता (Leader of the Party)-मुख्यमन्त्री अपने दल का राज्य में नेतृत्व करता है, राज्य में दलों को संचालित करता है और नीतियां बनाता तथा उसका प्रचार करना उसी का कार्य है। चुनाव में मुख्यमन्त्री अपने दल का मुख्य वक्ता बन जाता है और अपने दल के उम्मीदवारों को चुनावों में विजयी करवाने में भरसक प्रयत्न करता है।

मुख्यमन्त्री की स्थिति (Position of the Chief Minister) राज्य में मुख्यमन्त्री की वही स्थिति है जोकि केन्द्र में प्रधानमन्त्री की है। राज्य में समस्त प्रशासन पर उसका प्रभाव रहता है। उसकी इच्छा के विरुद्ध न कोई कानून बन सकता है और न ही कोई टैक्स आदि लगाया जा सकता है। उसके मुकाबले में अन्य मन्त्रियों की स्थिति कुछ महत्त्व नहीं रखती। परन्तु मुख्यमन्त्री की वास्तविक स्थिति इस पर निर्भर करती है कि उसके राजनीतिक दल को विधानसभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त हो।

मुख्यमन्त्री की वास्तविक स्थिति न केवल अपने दल के विधानसभा में बहुमत पर निर्भर करती है बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसके दल के सदस्य उसे कितना सहयोग देते हैं। मुख्यमन्त्री की स्थिति पार्टी की हाईकमान और प्रधानमन्त्री के समर्थन पर भी निर्भर करती है।

मुख्यमन्त्री की स्थिति उसके अपने व्यक्तित्व तथा राज्यपाल के व्यक्तित्व पर भी निर्भर करती है। चाहे मुख्यमन्त्री एक ही दल का नेता हो और उसे अपने दल का भी सहयोग प्राप्त हो, तब भी वह तानाशाह नहीं बन सकता, क्योंकि उसकी शक्तियों पर निम्नलिखित सीमाएं हैं जो उसे तानाशाह बनने नहीं देती-

  • विरोधी दल (Opposition Parties)-मुख्यमन्त्री को विरोधी दलों के होते हुए शासन चलाना होता है और विरोधी दल मुख्यमन्त्री की विधानमण्डल के अन्दर तथा बाहर आलोचना करके उसको तानाशाह बनने से रोकते हैं।
  • राज्य विधानमण्डल (State Legislature)-मुख्यमन्त्री राज्य विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी होता है और विधानसभा अविश्वास प्रस्ताव पास करके मुख्यमन्त्री को हटा सकती है।
  • गवर्नर (Governor)–यदि मुख्यमन्त्री जनता के हित के विरुद्ध कार्य करे तथा प्रजातन्त्र के सिद्धान्तों के विरुद्ध चले, तो गवर्नर अपनी स्वेच्छाचारी शक्तियों का प्रयोग मुख्यमन्त्री के विरुद्ध कर सकता है।
    संक्षेप में, मुख्यमन्त्री की स्थिति उसके अपने व्यक्तित्व और उसके दल के समर्थन पर निर्भर करती है।

प्रश्न 5. मुख्यमन्त्री तथा राज्यपाल के पारस्परिक सम्बन्धों की व्याख्या करें।
(Discuss the relations between Chief Minister and Governor.)
उत्तर-मुख्यमन्त्री तथा राज्यपाल में घनिष्ठ सम्बन्ध है। राज्यपाल राज्य का मुखिया है जबकि मुख्यमन्त्री सरकार का मुखिया है।

  • मुख्यमन्त्री की नियुक्ति-मुख्यमन्त्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है परन्तु राज्यपाल जिस व्यक्ति को चाहे मुख्यमन्त्री नियुक्त नहीं कर सकता। राज्यपाल को विधानसभा में बहुमत दल के नेता को ही मुख्यमन्त्री बनाना पड़ता हैं। राज्यपाल को अपने स्वविवेक से नियुक्त करने का अवसर तभी प्राप्त होता है जब किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता है।
  • मुख्यमन्त्री को हटाना-राज्यपाल मुख्यमन्त्री को जब चाहे अपनी इच्छानुसार अपदस्थ नहीं कर सकता है। मुख्यमन्त्री बहुमत का समर्थन प्राप्त न होने पर पद पर नहीं रह सकता। यदि मुख्यमन्त्री विधानसभा को यह अवसर नहीं देता कि विधानसभा उसके विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पास कर सके तो राज्यपाल उसे हटा सकता है।
  • मन्त्रियों की नियुक्ति-मन्त्रियों की नियुक्ति राज्यपाल मुख्यमन्त्री की सलाह से करता है। मुख्यमन्त्री मन्त्रियों की सूची तैयार करके राज्यपाल को भेजता है और राज्यपाल सूची में दिए गए व्यक्तियों को मन्त्री नियुक्त करता है।
  • मन्त्रियों की पच्युति-राज्यपाल मुख्यमन्त्री की सलाह से मन्त्रियों को हटा सकता है। परन्तु यदि मुख्यमन्त्री ने अपने मन्त्रिमण्डल में किसी ऐसे व्यक्ति को मन्त्री रखा हुआ है जिसके विरुद्ध रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार आदि के दोष हों तो राज्यपाल उसे पद से हटा सकता है, बेशक मुख्यमन्त्री का विश्वास अभी भी उस मन्त्री में हो।
  • मुख्यमन्त्री राज्यपाल का सलाहकार-मुख्यमन्त्री राज्यपाल का मुख्य सलाहकार है और सभी विषयों पर मुख्यमन्त्री राज्यपाल को सलाह देता है। राज्यपाल प्रायः सभी विषयों पर मुख्यमन्त्री की सलाह मान लेता है। सिवाय उन विषयों को छोड़कर जब वह केन्द्रीय सरकार के निर्देशन में काम कर रहा हो।
  • राज्यपाल का प्रशासनिक सूचना प्राप्त करने का अधिकार-राज्यपाल को यह अधिकार प्राप्त है कि वह समय-समय पर प्रशासनिक मामलों में जानकारी प्राप्त करने के लिए मुख्यमन्त्री से आवश्यक जानकारी प्राप्त कर सकता है। मुख्यमन्त्री का भी यह कर्त्तव्य है कि मन्त्रिपरिषद् के सभी निर्णयों की सूचना राज्यपाल को दे। वह मुख्यमन्त्री को किसी ऐसे मामले के लिए जिस पर एक मन्त्री ने निर्णय लिया हो, समस्त मन्त्रिपरिषद् के सम्मुख विचार के लिए रखने को कह सकता है। इस प्रकार राज्यपाल मन्त्रिपरिषद् को सलाह भी दे सकता है, प्रोत्साहन और चेतावनी भी।
  • नियुक्तियां- राज्य में होने वाली सभी महत्त्वपूर्ण नियुक्तियां राज्यपाल मुख्यमन्त्री की सलाह से करता है।
  • विधानसभा का विघटन–मुख्यमन्त्री राज्यपाल को सलाह देकर विधानसभा को भंग करवा सकता है। प्रायः राज्यपाल मुख्यमन्त्री की सलाह मान लेता है परन्तु कई स्थितियों में सलाह मानने से इन्कार कर सकता है। 1967 में पंजाब में राज्यपाल ने विधानसभा को भंग करने की मुख्यमन्त्री गुरनाम सिंह की सिफ़ारिश को नहीं माना।
  • स्वैच्छिक अधिकार-राज्यपाल को कुछ स्वैच्छिक अधिकार प्राप्त होते हैं जिनका प्रयोग वह अपनी इच्छानुसार करता है न कि मुख्यमन्त्री की सलाह से।

प्रश्न 6. भारतीय संघ के राज्यों में मन्त्रिमण्डल प्रणाली की कार्य-विधि की व्याख्या कीजिए।
(Explain the working principles of the cabinet system in the states of the Indian Union.)
उत्तर-राज्यों में संसदीय शासन व्यवस्था है। मन्त्रिमण्डल ही राज्यों का वास्तविक शासक है और उसकी सलाह के बिना तथा सलाह के विरुद्ध राज्यपाल कोई कार्य नहीं कर सकता। मन्त्रिमण्डल के महत्त्व के कारण संसदीय शासन प्रणाली को मन्त्रिमण्डल शासन प्रणाली भी कहा जाता है। राज्यों की मन्त्रिमण्डल प्रणाली की निम्नलिखित विशेषताएं हैं

  • नाममात्र का अध्यक्ष (Nominal Head)-राज्यपाल नाममात्र का अध्यक्ष है। समस्त शासन उसी के नाम से चलाया जाता है परन्तु वास्तव में शासन मन्त्रिमण्डल द्वारा चलाया जाता है। वह राज्य का मुखिया है, सरकार का नहीं। सरकार का मुख्यिा मुख्यमन्त्री है।
  • कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठता (Close Relation between the Executive and Legislature)-राज्यों की विधानपालिका और मन्त्रिमण्डल में घनिष्ठ सम्बन्ध है। मन्त्रिमण्डल के सभी सदस्य विधानमण्डल के सदस्य होते हैं। मन्त्रिमण्डल के सदस्य विधानमण्डल की बैठकों में भाग लेते हैं, वाद-विवाद में हिस्सा लेते हैं, बिल पेश करते हैं, बिलों को पास कराते और मतदान कराते हैं।
  • मुख्यमन्त्री का नेतृत्व (Leadership of the Chief Minister)-राज्यों के मन्त्रिमण्डल अपना समस्त कार्य मुख्यमन्त्री के नेतृत्व में करते हैं। मुख्यमन्त्री ही अन्य मन्त्रियों की नियुक्तियां करता है। मुख्यमन्त्री ही मन्त्रियों में विभागों का बंटवारा करता है और जब चाहे विभाग बदल सकता है। उनके कार्यों की देख-भाल मुख्यमन्त्री ही करता है। मन्त्रिमण्डल की बैठकें मुख्यमन्त्री के द्वारा ही बुलाई जाती हैं और वही अध्यक्षता करता है। मुख्यमन्त्री का त्याग-पत्र समस्त मन्त्रिमण्डल का त्याग-पत्र समझा जाता है।
  • राजनीतिक एकता (Political Homogeneity)—कैबिनेट प्रणाली में मन्त्रिपरिषद् के सभी सदस्य एक ही दल से लिए जाते हैं। इसके फलस्वरूप उनके विचार तथा सिद्धान्तों में एकता होती है। राज्यों में प्रायः मन्त्रिमण्डल के सदस्य एक ही राजनीतिक दल से लिए जाते हैं।
  • मन्त्रिमण्डल की एकता (Unity of the Cabinet) राज्य मन्त्रिमण्डल प्रणाली की एक यह भी विशेषता है कि मन्त्रिमण्डल एक इकाई के रूप में काम करता है। मन्त्रिमण्डल के सभी सदस्य “इकडे आते और इकटे जाते हैं।” किसी एक मन्त्री के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास होने पर सभी मन्त्रियों को अपना त्याग-पत्र देना पड़ता है। मन्त्री इकट्ठे तैरते हैं और इकट्ठे डूबते हैं।
  • गोपनीयता (Secrecy)-मन्त्रिमण्डल की कार्यवाहियों की गोपनीयता शासन प्रणाली की एक विशेषता है। कोई भी मन्त्री मन्त्रिमण्डल की बैठक में हुए गुप्त वाद-विवाद तथा निर्णय आदि को सार्वजनिक तौर पर प्रकाशित नहीं कर सकता और न ही किसी को बता सकता है।
  • मन्त्रिमण्डल का उत्तरदायित्व (Responsibility of the Cabinet)-मन्त्रिमण्डल की एक यह भी विशेषता है कि वह अपने कार्यों के लिए विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है। मन्त्रिमण्डल को मनमानी करने का अधिकार नहीं है। विधानमण्डल के सदस्य मन्त्रियों से उनके प्रशासकीय विभागों के सम्बन्ध और पूरक प्रश्न (Supplementary questions) पूछ सकते हैं जिनका उन्हें उत्तर देना पड़ता है। यदि विधानसभा में मन्त्रिमण्डल बहुमत का समर्थन खो बैठे तो उसे त्याग-पत्र देना पड़ता है।
  • मन्त्रिमण्डल की समितियां (Committees in the Cabinet) राज्यों के मन्त्रिमण्डल में भिन्न-भिन्न विषयों में कई समितियां स्थापित की गई हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. राज्यपाल की नियुक्ति का वर्णन करें।
उत्तर-राज्यपाल की नियुक्ति–प्रत्येक राज्य के राज्यपाल को राष्ट्रपति नियुक्त करता है तथा वह राष्ट्रपति की कृपा दृष्टि तक ही अपने पद पर रह सकता है। व्यवहार में राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की सलाह से ही राज्यपाल को नियुक्त करता है।
राज्यपाल की नियुक्ति के सम्बन्ध में कुछ प्रथाएं स्थापित हो गई हैं, जिनमें मुख्य निम्न प्रकार हैं-

  • प्रथम परम्परा तो यह है कि ऐसे व्यक्ति को किसी राज्य में राज्यपाल नियुक्त किया जाता है जो उस राज्य का निवासी न हो।
  • दूसरे, राष्ट्रपति किसी राज्यपाल की नियुक्ति करने से पहले उस राज्य के मुख्यमन्त्री से भी इस बात का परामर्श लेता है।

प्रश्न 2. राज्यपाल पद के लिए चार आवश्यक योग्यताएं लिखें।
उत्तर-योग्यताएं- अनुच्छेद 157 के अन्तर्गत राज्यपाल के पद के लिए निम्नलिखित योग्यताएं निश्चित की गई हैं-

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. उसकी आयु 35 वर्ष से कम न हो।
  3. वह किसी राज्य में विधानमण्डल अथवा संसद् का सदस्य न हो तथा यदि हो, तो राज्यपाल का पद ग्रहण करने के समय उसका सदन वाला स्थान रिक्त समझा जाएगा।
  4. राज्यपाल अपने पद पर नियुक्त होने के पश्चात् किसी अन्य लाभदायक पद पर नहीं रह सकता।

प्रश्न 3. राज्यपाल के चार कार्यकाल का वर्णन करो।
उत्तर-कार्यकाल-साधारणतया राज्यपाल को 5 वर्ष के लिए नियुक्त किया जाता है और वह अपने पद पर तब तक रह सकता है जब तक राष्ट्रपति चाहे । राष्ट्रपति 5 वर्ष की अवधि समाप्त होने से पूर्व भी राज्यपाल को हटा सकता है। 27 अक्तूबर, 1980 को राष्ट्रपति ने तमिलनाडु के राज्यपाल प्रभुदास पटवारी को बर्खास्त कर दिया। जनवरी, 1990 में राष्ट्रपति वेंकटरमन ने राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार की सलाह पर सभी राज्यपालों को त्याग-पत्र देने को कहा। अधिकतर राज्यपालों ने तुरन्त अपने त्याग-पत्र भेज दिये। राज्यपाल चाहे तो स्वयं भी 5 वर्ष से पूर्व त्याग-पत्र दे सकता है। 23 जून, 1991 को पंजाब के राज्यपाल जनरल ओ०पी० मल्होत्रा ने त्याग-पत्र दे दिया।

प्रश्न 4. राज्यपाल की चार कार्यपालिका शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-राज्यपाल को निम्नलिखित कार्यपालिका शक्तियां प्राप्त हैं-

  1. राज्य का समस्त शासन राज्यपाल के नाम पर चलाया जाता है।
  2. राज्यपाल मुख्यमन्त्री की नियुक्ति करता है तथा उसकी सलाह से अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है।
  3. राज्यपाल मुख्यमन्त्री की सलाह पर किसी भी मन्त्री को अपदस्थ कर सकता है।
  4. वह शासन के कार्य को सुविधापूर्वक चलाने के लिए तथा मन्त्रियों में बांटने के लिये नियम बनाता है।

प्रश्न 5. राज्यपाल की चार वैधानिक शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-राज्यपाल के पास निम्नलिखित वैधानिक शक्तियां हैं-

  1. राज्यपाल विधानमण्डल का अधिवेशन बुला सकता है, स्थगित कर सकता है तथा इसकी अवधि बढ़ा सकता
  2. वह विधानमण्डल के दोनों सदनों में भाषण दे सकता है।
  3. वह विधानमण्डल के निम्न सदन को मुख्यमन्त्री की सलाह पर भंग कर सकता है।
  4. प्रत्येक वर्ष विधानमण्डल का अधिवेशन राज्यपाल के भाषण से प्रारम्भ होता है।

प्रश्न 6. राज्यपाल की चार स्वेच्छिक शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-राज्यपाल को कुछ स्वविवेकी शक्तियां भी प्राप्त हैं। स्वविवेकी शक्तियों का प्रयोग राज्यपाल अपनी इच्छा से करता है न कि मन्त्रिमण्डल के परामर्श से। राज्यपाल की मुख्य स्वविवेकी शक्तियां निम्नलिखित हैं-

  1. संघीय क्षेत्र के प्रशासक के रूप में- यदि राष्ट्रपति ने राज्यपाल को राज्य के समीप के संघीय क्षेत्र का प्रशासक भी नियुक्त कर दिया है तो उस क्षेत्र का प्रशासन स्वविवेक से चलाता है।
  2. असम में आदिम जातियों के प्रशासन के सम्बन्ध में-असम राज्य के राज्यपाल को आदिम जातियों के प्रशासन के सम्बन्ध में स्वविवेक से कार्य करने का अधिकार दिया गया है।
  3. सिक्किम के राज्यपाल के विशेष उत्तरदायित्व-सिक्किम राज्य में शान्ति बनाए रखने के लिए तथा सिक्किम की जनसंख्या के सब वर्गों के सामाजिक तथा आर्थिक विकास के लिए सिक्किम के राज्यपाल को विशेष उत्तरदायित्व सौंपा गया है।
  4. राज्य में संवैधानिक संकट होने पर-प्रत्येक राज्यपाल अपने राज्य में संवैधानिक मशीनरी के फेल हो जाने का प्रतिवेदन राष्ट्रपति को करता है जिस पर वह संकटकाल की घोषणा करता है। इस दशा में मन्त्रिपरिषद् को भंग कर दिया जाता है तथा वह राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है।

प्रश्न 7. राज्यपाल की स्थिति का वर्णन करें।
उत्तर-राज्य का समस्त शासन राज्यपाल के नाम पर चलता है, परन्तु शासन चलाने वाला वह स्वयं नहीं है। संविधान में राज्यपाल को जो शक्तियां प्राप्त हैं, व्यवहार में उनका प्रयोग मन्त्रिमण्डल करता है। राज्यपाल कार्यपालिका का संवैधानिक अध्यक्ष है। परन्तु जब वह केन्द्रीय सरकार के एजेन्ट के रूप में काम करता है तो वह अधिक शक्तियों को प्रयोग कर सकता है। उस समय वह केन्द्रीय सरकार के आदेश के अनुसार काम करता है। वर्तमान समय में राज्यपाल के दायित्व पहले से अधिक बढ़ चुके हैं।

प्रश्न 8. राज्य में मन्त्रिपरिषद् का निर्माण कैसे होता है ?
उत्तर-मन्त्रिपरिषद् के निर्माण के लिए सबसे पहला महत्त्वपूर्ण पग मुख्यमन्त्री की नियुक्ति है। राज्यपाल मन्त्रिपरिषद् के अध्यक्ष को सर्वप्रथम मुख्यमन्त्री नियुक्त करता है, परन्तु राज्यपाल उसे अपनी इच्छा से नियुक्त नहीं कर सकता। जिस दल को विधानसभा में बहुमत प्राप्त होता है, उसी दल के नेता को मुख्यमन्त्री नियुक्त किया जाता है। मुख्यमन्त्री की सलाह से राज्यपाल अन्य मन्त्रियों को नियुक्त करता है। मन्त्रियों के लिए विधानमण्डल के दोनों सदनों में से किसी एक का सदस्य होना अनिवार्य है। यदि किसी ऐसे व्यक्ति को मन्त्री नियुक्त किया जाए जो किसी भी सदन का सदस्य न हो, तो उसको 6 महीने के अन्दर-अन्दर विधानमण्डल के किसी एक सदन का सदस्य बनना पड़ता है। मन्त्रिपरिषद् की सदस्य संख्या भी मुख्यमन्त्री द्वारा निश्चित की जाती है।

प्रश्न 9. मन्त्रिपरिषद् की चार शक्तियों का वर्णन करो।
उत्तर-

  1. नीति का निर्धारण-मन्त्रिपरिषद् का मुख्य कार्य प्रशासन चलाने के लिए नीति निर्धारित करना है।
  2. प्रशासन पर नियन्त्रण-शासन को अच्छी प्रकार चलाने के लिए कई विभागों में बांटा जाता है और प्रत्येक विभाग किसी-न-किसी मन्त्री के अधीन होता है। विभाग में मन्त्री के अधीन कई सरकारी कर्मचारी होते हैं जो उसकी आज्ञानुसार कार्य करते हैं। मन्त्री को अपने विभाग का शासन मन्त्रिपरिषद् की निश्चित नीति के अनुसार चलाना पड़ता है। मन्त्रिपरिषद् प्रशासन चलाने के लिए विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है।
  3. कानून को लागू करना तथा व्यवस्था को बनाए रखना- राज्य के विधानमण्डल द्वारा बनाए गए कानून को लागू करना मन्त्रिपरिषद् की ज़िम्मेवारी है। कानून का तब तक कोई महत्त्व नहीं है जब तक उसे लागू न किया जाए
    और कानूनों को सख्ती से अथवा नर्मी से लागू करना मन्त्रिपरिषद् पर निर्भर करता है। राज्य के अन्दर शान्ति को बनाए रखना मन्त्रिपरिषद् का कार्य है।
  4. नियुक्तियां-राज्य की सभी महत्त्वपूर्ण नियुक्यिां राज्यपाल मन्त्रिमण्डल के परामर्श से करता है।

प्रश्न 10. मुख्यमन्त्री की नियुक्ति कैसे होती है ?
उत्तर-मुख्यमन्त्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है परन्तु राज्यपाल जिस व्यक्ति को चाहे, मुख्यमन्त्री नियुक्त नहीं कर सकता। राज्यपाल को विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को ही मुख्यमन्त्री बनाना पड़ता है। राज्यपाल को अपने स्वविवेक से नियुक्त करने का अवसर तभी प्राप्त है जब किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता। ऐसी स्थिति में राज्यपाल को या तो विधानसभा में सबसे अधिक स्थान प्राप्त दल के नेता को अथवा यदि कुछ दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा है और उन्हें स्पष्ट बहुमत प्राप्त हो गया है तो ऐसे मिले-जुले दलों के नेता को मुख्यमन्त्री पद पर नियुक्त करना चाहिए। फरवरी, 2017 के पंजाब विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत प्राप्त हुआ और कैप्टन अमरिन्दर सिंह पंजाब के मुख्यमन्त्री बने।

प्रश्न 11. मुख्यमन्त्री की चार शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-मुख्यमन्त्री को निम्नलिखित शक्तियां प्राप्त हैं-

  1. मन्त्रिपरिषद् का निर्माण-राज्य में मन्त्रिपरिषद् का निर्माण राज्यपाल मुख्यमन्त्री के परामर्श से करता है। मुख्यमन्त्री अपने साथियों की एक सूची तैयार करके राज्यपाल के पास भेज देता है तथा राज्यपाल की स्वीकृति के पश्चात् वे व्यक्ति मन्त्री बन जाते हैं।
  2. मन्त्रियों की पदच्युति-मुख्यमन्त्री किसी भी मन्त्री को उसके पद से अपदस्थ कर सकता है। यदि मुख्यमन्त्री किसी मन्त्री के कार्यों से प्रसन्न न हो और उसके विचार उस मन्त्री के विचारों से मेल न खाते हों तो मुख्यमन्त्री राज्यपाल को सलाह देकर उस मन्त्री को हटा सकता है।
  3. मन्त्रियों में विभागों का वितरण-मुख्यमन्त्री केवल मन्त्रियों की नियुक्ति ही नहीं करता बल्कि उनमें विभागों का वितरण भी करता है। मुख्यमन्त्री जब चाहे उनके विभागों को बदल भी सकता है।
  4. राज्यपाल का मुख्य सलाहकार-मुख्यमन्त्री राज्यपाल का मुख्य सलाहकार है।

प्रश्न 12. मुख्यमन्त्री का कार्यकाल क्या है ?
उत्तर-मुख्यमन्त्री का कार्यकाल निश्चित नहीं है। मुख्यमन्त्री उस समय तक अपने पद पर रहता है जब तक विधानसभा का बहुमत उसके साथ हो। परन्तु चौथे आम चुनाव के बाद नई परिस्थितियां उत्पन्न हुईं जिनके अधीन राज्यपाल ने विधानसभा द्वारा अविश्वास के प्रस्ताव की प्रतीक्षा किए बिना ही मुख्यमन्त्री को पदच्युत कर दिया। हरियाणा के राजनीतिक भ्रष्टाचार और प्रशासन में कुशलता के ह्रास के कारण राज्य के राज्यपाल श्री चक्रवर्ती ने मुख्यमन्त्री राव वीरेन्द्र सिंह को पदच्युत कर दिया था।

प्रश्न 13. राज्य में मुख्यमन्त्री ही शक्तिशाली व्यक्ति है। कैसे ?
उत्तर-केन्द्र की तरह राज्यों में संसदीय प्रणाली को अपनाया गया है। राज्य में राज्यपाल संवैधानिक मुखिया है जबकि मुख्यमन्त्री वास्तविक शासक है। राज्य का समस्त शासन राज्यपाल के नाम पर चलाया जाता है परन्तु वास्तविकता में राज्यपाल मुख्यमन्त्री की सलाह से शासन चलाता है। मुख्यमन्त्री मन्त्रिपरिषद् का निर्माण करता है और जब चाहे किसी मन्त्री को पद से हटा सकता है। मन्त्रिपरिषद् मुख्यमन्त्री के नेतृत्व में कार्य करता है। राज्य में सभी महत्त्वपूर्ण नियुक्तियां मुख्यमन्त्री द्वारा की जाती हैं। 5 वर्ष की अवधि से पूर्व यह विधानसभा को राज्यपाल को सलाह देकर भंग करवा सकता है। राज्य का सारा शासन मुख्यमन्त्री के इर्द-गिर्द घूमता है।

प्रश्न 14. मुख्यमन्त्री के मन्त्रिपरिषद् के साथ चार सम्बन्ध बताएं।
उत्तर-मुख्यमन्त्री के बिना मन्त्रिपरिषद् का कोई अस्तित्व नहीं है। मुख्यमन्त्री तथा मन्त्रिपरिषद् में महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध निम्नलिखित हैं-

  1. मन्त्रिपरिषद् का निर्माण-मुख्यमन्त्री अपनी नियुक्ति के पश्चात् उन व्यक्तियों की सूची तैयार करता है जिन्हें वह मन्त्रिपरिषद् में लेना चाहता है। मुख्यमन्त्री सूची तैयार करके राज्यपाल के पास भेजता है और राज्यपाल उस सूची के अनुसार ही मन्त्री नियुक्त करता है।
  2. विभागों का बंटवारा-मुख्यमन्त्री मन्त्रियों में विभागों का बंटवारा करता है। वह किसी भी मन्त्री को कोई भी विभाग दे सकता है। मुख्यमन्त्री जब चाहे मन्त्रियों के विभागों में परिवर्तन कर सकता है।
  3. मन्त्रियों की पदच्युति-मुख्यमन्त्री यदि किसी मन्त्री के कार्यों से अप्रसन्न हो और उसके विचार उस मन्त्री के विचारों से मेल न खाते हों तो मुख्यमन्त्री राज्यपाल को सलाह देकर उस मन्त्री को उसके पद से अपदस्थ कर सकता है।
  4. मन्त्रिपरिषद् का अध्यक्ष–मन्त्रिपरिषद् अपना समस्त कार्य मुख्यमन्त्री के नेतृत्व में ही करती है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. राज्यपाल की नियुक्ति का वर्णन करें।
उत्तर-प्रत्येक राज्य के राज्यपाल को राष्ट्रपति नियुक्त करता है तथा वह राष्ट्रपति की कृपा दृष्टि तक ही अपने पद पर रह सकता है। व्यवहार में राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की सलाह से ही राज्यपाल को नियुक्त करता है।

प्रश्न 2. राज्यपाल पद के लिए कोई दो आवश्यक योग्यताएं लिखें।
उत्तर-योग्यताएं-अनुच्छेद 157 के अन्तर्गत राज्यपाल के पद के लिए निम्नलिखित योग्यताएं निश्चित की गई हैं

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. उसकी आयु 35 वर्ष से कम न हो।

प्रश्न 3. राज्यपाल के कार्यकाल का वर्णन करो।
उत्तर-साधारणतया राज्यपाल को 5 वर्ष के लिए नियुक्त किया जाता है और वह अपने पद पर तब तक रह सकता है जब तक राष्ट्रपति चाहे। राष्ट्रपति 5 वर्ष की अवधि समाप्त होने से पूर्व भी राज्यपाल को हटा सकता है।

प्रश्न 4. राज्यपाल की कोई दो कार्यपालिका शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर- राज्यपाल को निम्नलिखित कार्यपालिका शक्तियां प्राप्त हैं-

  1. राज्य का समस्त शासन राज्यपाल के नाम पर चलाया जाता है।
  2. राज्यपाल मुख्यमन्त्री की नियुक्ति करता है तथा उसकी सलाह से अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है।

प्रश्न 5. राज्यपाल की कोई दो वैधानिक शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-

  1. राज्यपाल विधानमण्डल का अधिवेशन बुला सकता है, स्थगित कर सकता है तथा इसकी अवधि बढ़ा सकता है।
  2. वह विधानमण्डल के दोनों सदनों में भाषण दे सकता है।

प्रश्न 6. राज्यपाल की स्वेच्छिक शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-

  1. संघीय क्षेत्र के प्रशासक के रूप में-यदि राष्ट्रपति ने राज्यपाल को राज्य के समीप के संघीय क्षेत्र का प्रशासक भी नियुक्त कर दिया है तो उस क्षेत्र का प्रशासन स्वविवेक से चलाता है।
  2. असम में आदिम जातियों के प्रशासन के सम्बन्ध में- असम राज्य के राज्यपाल को आदिम जातियों के प्रशासन के सम्बन्ध में स्वविवेक से कार्य करने का अधिकार दिया गया है।

प्रश्न 7. राज्य में मन्त्रिपरिषद् का निर्माण कैसे होता है ?
उत्तर-मन्त्रिपरिषद् के निर्माण के लिए सबसे पहला महत्त्वपूर्ण पग मुख्यमन्त्री की नियुक्ति है। मुख्यमन्त्री की सलाह से राज्यपाल अन्य मन्त्रियों को नियुक्त करता है। मन्त्रियों के लिए विधानमण्डल के दोनों सदनों में से किसी एक का सदस्य होना अनिवार्य है। यदि किसी ऐसे व्यक्ति को मन्त्री नियुक्त किया जाए जो किसी भी सदन का सदस्य न हो, तो उसको 6 महीने के अन्दर-अन्दर विधानमण्डल के किसी एक सदन का सदस्य बनना पड़ता है। मन्त्रिपरिषद् की सदस्य संख्या भी मुख्यमन्त्री द्वारा निश्चित की जाती है।

प्रश्न 8. मन्त्रिपरिषद् की दो शक्तियों का वर्णन करो।
उत्तर-

  1. नीति का निर्धारण (Determination of Policy)-मन्त्रिपरिषद् का मुख्य कार्य प्रशासन चलाने के लिए नीति निर्धारित करना है।
  2. प्रशासन पर नियन्त्रण (Control over Administration)-शासन को अच्छी प्रकार चलाने के लिए कई विभागों में बांटा जाता है और प्रत्येक विभाग किसी-न-किसी मन्त्री के अधीन होता है।

प्रश्न 9. मुख्यमन्त्री की नियुक्ति कैसे होती है ?
उत्तर-मुख्यमन्त्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है परन्तु राज्यपाल जिस व्यक्ति को चाहे, मुख्यमन्त्री नियुक्त नहीं कर सकता। राज्यपाल को विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को ही मुख्यमन्त्री बनाना पड़ता है। राज्यपाल को अपने स्वविवेक से नियुक्त करने का अवसर तभी प्राप्त है जब किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता।

प्रश्न 10. मुख्यमन्त्री की कोई दो शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-

  1. मन्त्रिपरिषद् का निर्माण राज्य में मन्त्रिपरिषद् का निर्माण राज्यपाल मुख्यमन्त्री के परामर्श से करता है। मुख्यमन्त्री अपने साथियों की एक सूची तैयार करके राज्यपाल के पास भेज देता है तथा राज्यपाल की स्वीकृति के पश्चात् वे व्यक्ति मन्त्री बन जाते हैं।
  2. मन्त्रियों की पदच्युति-मुख्यमन्त्री किसी भी मन्त्री को उसके पद से अपदस्थ कर सकता है। यदि मुख्यमन्त्री किसी मन्त्री के कार्यों से प्रसन्न न हो और उसके विचार उस मन्त्री के विचारों से मेल न खाते हों तो मुख्यमन्त्री राज्यपाल को सलाह देकर उस मन्त्री को हटा सकता है।

प्रश्न 11. मुख्यमन्त्री के मन्त्रिपरिषद् के साथ सम्बन्ध बताएं।
उत्तर-

  1. मन्त्रिपरिषद् का निर्माण-मुख्यमन्त्री अपनी नियुक्ति के पश्चात् उन व्यक्तियों की सूची तैयार करता है जिन्हें वह मन्त्रिपरिषद् में लेना चाहता है। मुख्यमन्त्री सूची तैयार करके राज्यपाल के पास भेजता है और राज्यपाल उस सूची के अनुसार ही मन्त्री नियुक्त करता है।
  2. विभागों का बंटवारा-मुख्यमन्त्री मन्त्रियों में विभागों का बंटवारा करता है। वह किसी भी मन्त्री को कोई भी विभाग दे सकता है। मुख्यमन्त्री जब चाहे मन्त्रियों के विभागों में परिवर्तन कर सकता है।

प्रश्न 12. पंजाब के राज्यपाल एवं उसका वेतन तथा मुख्यमन्त्री का नाम बताएं।
उत्तर-पंजाब के वर्तमान राज्यपाल श्री वी०पी० सिंह बदनौर हैं, एवं उनका वेतन 3,50,000 रु० मासिक है। पंजाब के वर्तमान मुख्यमन्त्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1. राज्यपाल की नियुक्ति कौन करता है ?
उत्तर-राष्ट्रपति।

प्रश्न 2. राज्यपाल का मासिक वेतन कितना है ?
उत्तर-3,50,000 रु० ।

प्रश्न 3. राज्यपाल बनने के लिए कितनी आयु होनी चाहिए ?
उत्तर-35 वर्ष।

प्रश्न 4. मुख्यमन्त्री की नियुक्ति कौन करता है ?
उत्तर-राज्यपाल।

प्रश्न 5. राज्यपाल की कोई एक वैधानिक शक्ति लिखिए।
उत्तर- राज्यपाल विधानमण्डल का अधिवेशन बुला सकता है, स्थगित कर सकता है तथा इसकी अवधि बढ़ा सकता है।

प्रश्न 6. राज्यपाल की एक कार्यपालिका शक्ति का वर्णन करो।
उत्तर-राज्यपाल मुख्यमन्त्री की नियुक्ति करता है और उसकी सलाह से अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है।

प्रश्न 7. राज्य में संवैधानिक संकट के समय राज्यपाल की स्थिति क्या होती है ?
उत्तर-उस समय राज्यपाल केन्द्रीय सरकार के प्रतिनिधि के रूप में राज्य का वास्तविक शासक बन जाता है। राज्यपाल कार्यपालिका की सभी शक्तियों का प्रयोग करता है और प्रशासन चलाने की जिम्मेदारी उसी की होती है।

प्रश्न 8. राज्यपाल कब तक अपने पद पर रहता है ?
उत्तर-राज्यपाल की नियुक्ति केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। राज्यपाल राष्ट्रपति की इच्छा पर्यंत अपने पद पर रहता है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति जब चाहे राज्यपाल को उसके पद से हटा सकता है।

प्रश्न 9. मन्त्रिपरिषद् का निर्माण कौन करता है?
उत्तर- मुख्यमन्त्री अपनी नियुक्ति के पश्चात् मन्त्रियों की सूची तैयार करके राज्यपाल के पास भेजता है। राज्यपाल उस सूची में दिए गए व्यक्तियों को मन्त्री नियुक्त करता है।

प्रश्न 10. मन्त्रिमण्डल तथा मन्त्रिपरिषद् में अन्तर बताइए।
उत्तर-मन्त्रिपरिषद् का वर्णन संविधान में किया गया है जबकि मन्त्रिमण्डल शब्द संविधान में नहीं मिलता।

प्रश्न 11. मुख्यमन्त्री की नियुक्ति कैसे की जाती है?
उत्तर-मुख्यमन्त्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है परन्तु राज्यपाल मुख्यमन्त्री की नियुक्ति में अपनी इच्छा का प्रयोग नहीं कर सकता। राज्यपाल को विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल या गठबन्धन के नेता को ही मुख्यमन्त्री बनाना पड़ता है।

प्रश्न 12. राज्यपाल की एक स्वैच्छिक शक्ति बताइए।
उत्तर-जब राज्य विधानसभा में किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता तब राज्यपाल अपनी इच्छा से मुख्यमन्त्री को नियुक्त करता है।

प्रश्न 13. मन्त्रिपरिषद् की एक शक्ति का वर्णन करें।
उत्तर-मन्त्रिपरिषद् प्रशासन चलाने के लिए नीति निर्धारित करती है।

प्रश्न 14. मुख्यमन्त्री की एक शक्ति का वर्णन करें।
उत्तर-मन्त्रिपरिषद् का निर्माण मुख्यमन्त्री द्वारा किया जाता है।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. राज्य मन्त्रिपरिषद् का निर्माण ………….. करता है।
2. मुख्यमन्त्री …………… की अध्यक्षता करता है।
3. राज्य विधानमण्डल का नेता ……………. होता है।
4. राज्यपाल का मुख्य सलाहकार ………….. होता है।
उत्तर-

  1. मुख्यमन्त्री
  2. मन्त्रिपरिषद
  3. मुख्यमन्त्री
  4. मुख्यमन्त्री।

प्रश्न III. निम्नलिखित कथनों में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. राज्य का समस्त शासन राज्यपाल के नाम से चलाया जाता है।
2. राज्यपाल प्रशासन के बारे में मुख्यमन्त्री से कोई भी जानकारी प्राप्त कर सकता है।
3. राज्यपाल तानाशाह बन सकता है।
4. मुख्यमन्त्री राज्यपाल की नियुक्ति करता है।
5. मन्त्रिपरिषद नीति का निर्धारण करती है।
उत्तर-

  1. सही
  2. सही
  3. ग़लत
  4. ग़लत
  5. सही।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न 1. मुख्यमन्त्री को नियुक्त करता है
(क) राष्ट्रपति
(ख) राज्यपाल
(ग) प्रधानमन्त्री
(घ) विधानमण्डल।
उत्तर-(ख) राज्यपाल ।

प्रश्न 2. मुख्यमन्त्री की अवधि कितनी है ?
(क)5 वर्ष
(ख) निश्चित नहीं
(ग) 4 वर्ष
(घ) 3 वर्ष।
उत्तर-(ख) निश्चित नहीं ।

प्रश्न 3. राज्यपाल निम्नलिखित में से किसके प्रति उत्तरदायी है ?
(क) राज्य के लोगों के प्रति
(ख) राष्ट्रपति के प्रति
(ग) प्रधानमन्त्री के प्रति
(घ) लोकसभा के प्रति।
उत्तर-(ख) राष्ट्रपति के प्रति ।

प्रश्न 4. विधानसभा का नेता है-
(क) मुख्यमन्त्री
(ख) राज्यपाल
(ग) स्पीकर
(घ) प्रधानमन्त्री।
उत्तर-(क) मुख्यमन्त्री।