Class 11 Political Science Solutions Chapter 31 राज्य विधानमण्डल

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. राज्य की विधानसभा की रचना और शक्तियां बताओ।
(Explain the composition and powers of the State Legislative Assembly.)
उत्तर-सभी राज्यों में कानून-निर्माण के लिए विधानमण्डल की व्यवस्था की गई है। कुछ राज्यों में विधानमण्डल के दो सदन हैं और कुछ में केवल एक ही सदन रखा गया है। विधानसभा दोनों ही प्रकार के विधानमण्डलों में है। विधानसभा विधानमण्डल का निम्न सदन है जो जनता का प्रतिनिधित्व करता है।

रचना (Composition) संविधान में विधानसभा के सदस्यों की संख्या निश्चित नहीं की गई बल्कि अधिकतम और न्यूनतम संख्या निर्धारित की गई है। अनुच्छेद 170 (1) के अनुसार विधानसभा में सदस्यों की संख्या 60 से कम और 500 से अधिक नहीं हो सकती। राज्य की विधानसभा की संख्या राज्य की जनसंख्या के आधार पर निश्चित की जाती है। पंजाब की विधानसभा में 117 सदस्य हैं। सबसे अधिक सदस्य उत्तर प्रदेश में हैं जिसकी विधानसभा की सदस्य संख्या 403 है। विधानसभा के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा वयस्क मताधिकार के आधार पर चुने जाते हैं और भारत के प्रत्येक स्त्री-पुरुष को जिसकी आयु 18 वर्ष या इससे अधिक हो, मत डालने का अधिकार है ! अनुसूचित, आदिम व पिछड़ी हुई जातियों के लिए स्थान तो निश्चित हैं, परन्तु उनका निर्वाचन संयुक्त प्रणाली के आधार पर ही होता है। राज्यपाल एंग्लो-इण्डियन समुदाय का एक सदस्य विधानसभा में मनोनीत कर सकता है, यदि उसकी दृष्टि में इस समुदाय की जनसंख्या राज्य में विद्यमान हो और उसको चुनाव में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिला हो।

योग्यताएं (Qualifications)-राज्य विधानसभा का सदस्य बनने के लिए निम्नलिखित योग्यताओं का होना आवश्यक है-

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. वह 25 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
  3. वह किसी सरकारी लाभदायक पद पर न हो।
  4. संघीय संसद् द्वारा बनाई गई योग्यताएं रखता हो।
  5. वह दिवालिया या पागल न हो तथा।
  6. किसी न्यायालय द्वारा इस पद के लिए अयोग्य घोषित न किया गया हो।

अवधि (Term) विधानसभा की अवधि पांच वर्ष है। इसके सभी सदस्यों का चुनाव एक साथ होता है। राज्यपाल 5 वर्ष से पहले भी जब चाहे विधानसभा को भंग करके दोबारा चुनाव करवा सकता है। संकट के समय विधानसभा की अवधि को बढ़ाया जा सकता है।

अधिवेशन (Sessions)-राज्यपाल विधानसभा और विधानपरिषद् के अधिवेशन किसी समय भी बुला सकता है। परन्तु दो अधिवेशनों के बीच 6 मास से अधिक समय नहीं बीतना चाहिए। राज्यपाल दोनों सदनों का सत्रावसान भी कर सकता है।

गणपूर्ति (Quorum) विधानसभा की बैठकों में कार्यवाही प्रारम्भ होने के लिए यह आवश्यक है कि विधानसभा की कुल सदस्य संख्या का 1/10वां भाग उपस्थित हो।

वेतन और भत्ते (Salary and Allowances)-विधानसभा के सदस्यों के वेतन तथा भत्ते राज्य के विधानमण्डल द्वारा निश्चित किए जाते हैं।

सदस्यों को विशेषाधिकार (Privileges of the Members)-विधानसभा के सदस्यों को लगभग वही विशेषाधिकार प्राप्त हैं जो संसद् के सदस्यों को प्राप्त हैं। विधानसभा के सदस्यों को सदन में भाषण देने की स्वतन्त्रता दी गई है। उनके द्वारा सदन में प्रकट किए गए किसी विचार या कही गई किसी बात के आधार पर किसी न्यायालय में कोई मुकद्दमा नहीं चलाया जा सकता है। विधानसभा के सदस्यों को सदन के अधिवेशन के आरम्भ होने से 40 दिन पहले से लेकर अधिवेशन के समाप्त होने के 40 दिन बाद तक दीवानी मामलों में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।

विधानसभा के पदाधिकारी (Officers of the Legislative Assembly)-विधानसभा का एक अध्यक्ष (Speaker) होता है और एक उपाध्यक्ष। इन दोनों का चुनाव विधानसभा के सदस्यों द्वारा अपने में से ही होता है। अध्यक्ष का काम सभा की बैठकों में सभापतित्व करना, उनमें शान्ति और व्यवस्था को बनाए रखना, सदस्यों को बोलने की स्वीकृति देना, बिलों पर मतदान करवाना तथा निर्णयों की घोषणा करना है।

missing (Powers and Functions of the Legislative Assembly)—fG राज्यों में विधानमण्डल का एक सदन है वहां पर विधानमण्डल की सभी शक्तियों का प्रयोग विधानसभा द्वारा किया जाता है और जिन राज्यों में विधानमण्डल के दो सदन हैं, वहां पर भी विधानसभा अधिक प्रभावशाली है। विधानसभा की मुख्य शक्तियां निम्नलिखित हैं-

1. विधायिनी शक्तियां (Legislative Powers)—विधानसभा को राज्य-सूची तथा समवर्ती सूची के सभी विषयों पर कानून बनाने के लिए बिल पास करने का अधिकार है। यदि विधानमण्डल द्विसदनीय है तो विधेयक वहां से विधानपरिषद् के पास जाता है। विधानपरिषद् यदि उसे रद्द कर दे या तीन महीने तक उस पर कोई कार्यवाही न करे या उसमें ऐसे संशोधन कर दे जो विधानसभा को स्वीकृत न हों तो विधानसभा उस विधेयक को दोबारा पास कर सकती है और उसे विधानपरिषद् के पास भेजा जाता है। यदि विधानपरिषद् उस बिल पर दोबारा एक महीने तक कोई कार्यवाही न करे या उसे रद्द कर दे या उसमें ऐसे संशोधन कर दे जो विधानसभा को स्वीकृत न हों, तो इन अवस्थाओं में वह बिल दोनों सदनों द्वारा पास समझा जाएगा। दोनों सदनों या एक सदन के पास होने के बाद बिल राज्यपाल के पास जाता है।

2. वित्तीय शक्तियां (Financial Powers)-राज्य के वित्त पर विधानसभा का ही नियन्त्रण है। धन-बिल केवल विधानसभा में ही पेश हो सकते हैं। वित्तीय वर्ष के आरम्भ होने से पहले राज्य का वार्षिक बजट भी इसी के सामने प्रस्तुत किया जाता है। विधानसभा की स्वीकृति के बिना राज्य सरकार न कोई टैक्स लगा सकती है और न ही धन खर्च कर सकती है। विधानसभा के पास होने के बाद धन-बिल विधानपरिषद् के पास भेजा जाता है। (यदि विधानमण्डल द्विसदनीय है) जो उसे अधिक-से-अधिक 14 दिन तक पास होने से रोक सकती है। विधानपरिषद् चाहे धन-बिल को रद्द करे या 14 दिन तक उस पर कोई कार्यवाही न करे, तो वह दोनों सदनों द्वारा पास समझा जाता है और राज्यपाल की स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है जिसे धन-बिल पर अपनी स्वीकृति देनी ही पड़ती है।

3. कार्यपालिका पर नियन्त्रण (Control over the Executive)-विधानमण्डल को कार्यकारी शक्तियां भी मिली हुई हैं। विधानसभा का मन्त्रिपरिषद् पर पूर्ण नियन्त्रण है। मन्त्रिपरिषद् अपने समस्त कार्यों व नीतियों के लिए विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है। विधानसभा के सदस्य मन्त्रियों की आलोचना कर सकते हैं, प्रश्न और पूरक प्रश्न पूछ सकते हैं। विधानसभा चाहे तो मन्त्रिपरिषद् को हटा भी सकती है। विधानसभा मन्त्रिपरिषद् के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास करके अथवा धन-बिल को अस्वीकृत करके अथवा मन्त्रियों के वेतन में कटौती करके अथवा सरकार के किसी महत्त्वपूर्ण बिल को अस्वीकृत करके मन्त्रिपरिषद् को त्याग-पत्र देने के लिए मजबूर कर सकती है।

4. संवैधानिक कार्य (Constitutional Functions) संविधान में कई ऐसे अनुच्छेद हैं जिनमें संसद् अकेले संशोधन नहीं कर सकती। ऐसे अनुच्छेदों में संशोधन करने के लिए आधे राज्यों के विधानमण्डलों की स्वीकृति भी आवश्यक होती है। अतः विधानपरिषद् के साथ मिलकर (यदि विधानमण्डल द्विसदनीय है) विधानसभा संविधान के संशोधन में भाग लेती है।

5. चुनाव सम्बन्धी कार्य (Electoral Functions)

  • विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों को राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेने का अधिकार है। यह अधिकार विधानपरिषद् को प्राप्त नहीं है।
  • विधानसभा के सदस्य विधानपरिषद् में 1/3 सदस्यों को चुनते हैं।
  • विधानसभा के सदस्य ही राज्यसभा में राज्य के प्रतिनिधियों को चुन कर भेजते हैं।
  • राज्य विधानसभा के सदस्य अपने में से एक को अध्यक्ष और किसी दूसरे को उपाध्यक्ष चुनते हैं।

6. अन्य कार्य (Other Functions)-राज्य की विधानसभाओं को कुछ और भी कार्य करने पड़ते हैं जोकि इस प्रकार हैं-

  • विधानसभा 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पास करके विधानपरिषद् की स्थापना तथा समाप्ति की प्रार्थना कर सकती है और संसद् इस प्रार्थना के अनुसार कानून बनाती है।
    7 अप्रैल, 1993 को पंजाब की विधानसभा ने विधानपरिषद् की स्थापना के लिए प्रस्ताव पास किया।
  • विधानसभा विधानपरिषद् के साथ मिलकर (यदि विधानपरिषद् हो) लोक सेवा आयोग की शक्तियों को बढ़ा सकती हैं।
  • विधानसभा विधानपरिषद् के साथ मिल कर आकस्मिक कोष स्थापित कर सकती है।
  • राज्य की विधानसभा किसी व्यक्ति को सदन के विशेषाधिकारों के उल्लंघन करने पर दण्ड दे सकती है।
  • यदि कोई सदस्य विधानसभा का अनुशासन भंग करता है और सदन की कार्यवाही शान्तिपूर्वक नहीं चलने देता, तब सदन उस सदस्य को सदन से निलम्बित कर सकता है।
  • विधानसभा विरोधी दल के नेता को सरकारी मान्यता देने के लिए और उसे अन्य सुविधाएं देने के लिए बिल पास कर सकती है।

विधानसभा की स्थिति (Position of the Legislative Assembly)-राज्य के प्रशासन में विधानसभा का विशेष महत्त्व है। जिन राज्यों में विधानमण्डल का एक सदन है जैसे कि पंजाब, हरियाणा में, वहां पर राज्य की समस्त वैधानिक शक्तियां विधानसभा के पास हैं और जहां पर विधानमण्डल के दो सदन हैं, वहां पर भी कानून बनाने में विधानसभा ही प्रभावशाली सदन है। विधानपरिषद् विधानसभा द्वारा पास किए गए बिल को अधिक-से-अधिक चार महीने तक रोक सकती है। राज्य के धन पर पूर्ण नियन्त्रण विधानसभा का है। विधानपरिषद् धन बिल को केवल 14 दिन तक रोक सकती है। विधानसभा की स्वीकृति के बिना न कोई टैक्स लगाया जा सकता है और न ही कोई धन ख़र्च किया जा सकता है। मन्त्रिपरिषद् इसके प्रति उत्तरदायी है और विधानसभा अविश्वास प्रस्ताव पास करके इसको हटा सकती है। यहां तक कि विधानपरिषद् का अस्तित्व भी विधानसभा पर निर्भर करता है। विधानसभा की राज्यों में वही स्थिति है जो केन्द्र में लोकसभा की है।

प्रश्न 2. राज्य की विधानपरिषद् की रचना, शक्तियों और कार्यों का वर्णन करो।
(Discuss the composition, powers and functions of State Legislative Council.)
उत्तर-भारत के अनेक राज्यों में विधानमण्डल के दो सदन पाए जाते हैं जैसे कि उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश एवं तेलंगाना। जिन राज्यों में विधानमण्डल के दो सदन पाए जाते हैं, वहां पर विधानमण्डल के ऊपरि सदन को विधानपरिषद् कहा जाता है। हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश इत्यादि राज्यों में विधानपरिषद् नहीं पाई जाती क्योंकि इन राज्यों में विधानमण्डल का एक ही सदन है। 7 अप्रैल, 1993 को पंजाब की विधानसभा ने विधानपरिषद् की स्थापना के लिए बहुमत से प्रस्ताव पारित किया।

रचना (Composition)—किसी भी राज्य की विधानपरिषद् के सदस्यों की संख्या 40 से कम और विधानसभा के 1/3 भाग से अधिक नहीं हो सकती। परन्तु जम्मू-कश्मीर की विधानपरिषद् में कुल 36 सदस्य हैं। उत्तर प्रदेश की विधानपरिषद् की सदस्य संख्या 100 है। विधानपरिषद् में कुल सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से नहीं चुने जाते बल्कि अप्रत्यक्ष रूप में निम्नलिखित तरीके से चुने जाते हैं-

  1. लगभाग 1/3 सदस्य स्थानीय संस्थाओं के द्वारा चुने जाते हैं।
  2. लगभग 1/3 सदस्य विधानसभा के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं।
  3. लगभग 1/12 सदस्य राज्य में रहने वाले ऐसे व्यक्तियों द्वारा चुने जाते हैं जो कम-से-कम तीन वर्ष से किसी विश्वविद्यालय में स्नातक हों।
  4. लगभग 1/12 सदस्य राज्य की माध्यमिक पाठशालाओं या इससे उच्च शिक्षा संस्थाओं में कम-से-कम तीन वर्ष से अध्यापन कार्य करने वाले अध्यापकों द्वारा चुने जाते हैं।
  5. शेष लगभग 1/6 सदस्य राज्यपाल द्वारा ऐसे व्यक्तियों में से मनोनीत होते हैं जिन्हें विज्ञान, कला, साहित्य, समाज-सेवा आदि के क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या अनुभव प्राप्त हो।

योग्यताएं (Qualifications) विधानपरिषद् का सदस्य निर्वाचित या मनोनीत होने के लिए किसी भी व्यक्ति में निम्नलिखित योग्यताओं का होना आवश्यक है-

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. वह तीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
  3. वह किसी सरकारी लाभदायक पद पर आसीन न हो।
  4. वह विधि द्वारा निश्चित अन्य योग्यताएं रखता हो।
  5. वह संसद् द्वारा बनाए गए किसी कानून के अनुसार विधानपरिषद् का सदस्य बनने के लिए अयोग्य न हो।
  6. वह दिवालिया न हो, पागल न हो और किसी न्यायालय द्वारा अयोग्य घोषित न किया गया हो। यदि निर्वाचित होने के बाद भी उसमें ऐसी कोई अयोग्यता उत्पन्न हो जाए या लगातार 60 दिन तक सदन की स्वीकृति के बिना अधिवेशनों में अनुपस्थित रहे तो उसका स्थान रिक्त घोषित किया जा सकता है।

अवधि (Term)-विधानपरिषद् एक स्थायी सदन है जिसके सदस्य राज्यसभा की भान्ति 6 वर्ष के लिए चुने जाते हैं। परन्तु सभी सदस्य एक साथ नहीं चुने जाते। इनके 1/3 सदस्य प्रति दो वर्ष के पश्चात् अवकाश ग्रहण करते हैं परन्तु अवकाश ग्रहण करने वाले सदस्य दोबारा चुनाव लड़ सकते हैं। राज्यपाल विधानपरिषद् को भंग नहीं कर सकता।

गणपूर्ति (Quorum)-संविधान के अनुसार विधानपरिषद् का अधिवेशन आरम्भ होने के लिए आवश्यक है कि इसके सदस्यों का 1/10वां भाग सदस्य उपस्थित हों।

अधिवेशन (Session)-राज्यपाल विधानपरिषद् का अधिवेशन किसी भी समय बुला सकता है, परन्तु दो अधिवेशनों के बीच 6 मास से अधिक समय नहीं बीतना चाहिए। राज्यपाल प्रायः राज्य के विधानमण्डल के दोनों सदनों का अधिवेशन एक ही समय बुलाता है।

पदाधिकारी (Officials)-विधानसभा का एक सभापति और एक उप-सभापति होता है। इसका चुनाव विधानपरिषद् के सदस्य अपने में से ही करते हैं। इन्हें प्रस्ताव पास करके सदस्यों द्वारा हटाया भी जा सकता है परन्तु ऐसा प्रस्ताव उस समय तक पेश नहीं किया जा सकता जब तक कि इस आशय की पूर्व सूचना कम-से-कम 14 दिन पहले न दी गई हो। सभापति विधानपरिषद् की बैठकों की अध्यक्षता करता है और अनुशासन बनाए रखता है ताकि विधानपरिषद् अपना कार्य ठीक प्रकार से कर सके। सभापति की शक्तियां व कार्य वहीं हैं जोकि विधानसभा के स्पीकर की हैं। सभापति की अनुपस्थिति में उप-सभापति इसकी अध्यक्षता करता है।

वेतन और भत्ते (Salary and Allowances)-विधानपरिषद् के सदस्यों को विधानमण्डल द्वारा निश्चित वेतन और भत्ते मिलते हैं जोकि विधानसभा के सदस्यों के समान होते हैं। इन्हें भी भाषण की स्वतन्त्रता है और सदन में कहे गए किसी शब्द के आधार पर इनके विरुद्ध कोई मुकद्दमा नहीं चलाया जा सकता।

शक्तियां और कार्य (Powers and Functions)-राज्य की विधानपरिषद् को निम्नलिखित शक्तियां प्राप्त हैं

1. विधायिनी शक्तियां (Legislative Powers) विधानपरिषद् में उन सभी विषयों के सम्बन्ध में साधारण बिल पेश किया जा सकता है जिनका वर्णन राज्य सूची और समवर्ती सूची में पेश किया गया है। परन्तु उस बिल को तब तक राज्यपाल के पास नहीं भेजा जा सकता जब तक विधानसभा पास न करे अर्थात् विधानसभा की स्वीकृति के बिना कोई बिल कानून नहीं बन सकता। परन्तु विधानपरिषद् विधानसभा द्वारा पास किए गए बिल को अधिक-से-अधिक चार महीने (पहली बार तीन महीने और दूसरी बार एक महीना) तक रोक सकती है।

2. वित्तीय शक्तियां (Financial Powers)-धन-बिल विधानपरिषद् में पेश नहीं हो सकता। बजट या धन-बिल विधानसभा के पास होने के बाद ही इसके पास आता है। यह बजट और धन-बिल पर विचार कर सकती है, परन्तु उसे रद्द नहीं कर सकती। विधानपरिषद् यदि धन-बिल को रद्द कर दे या 14 दिन तक उस पर कोई कार्यवाही न करे या उसमें ऐसे सुझाव देकर वापस कर दे जो विधानसभा को अस्वीकृत हों, तो वह बिल इन सभी दशाओं में दोनों सदनों द्वारा पास समझा जाएगा। स्पष्ट है कि राज्य के वित्त पर विधानपरिषद् को नाममात्र का अधिकार प्राप्त है।

3. कार्यपालिका शक्तियां (Executive Powers) विधानपरिषद् कार्यपालिका को प्रभावित कर सकती है, परन्तु उस पर नियन्त्रण नहीं रख सकती। विधानपरिषद् के सदस्य मन्त्रियों से प्रश्न पूछ सकते हैं और ‘काम रोको’ प्रस्ताव पेश करके मन्त्रिमण्डल की कमियों और भ्रष्टाचार पर प्रकाश डाल सकते हैं तथा उनकी आलोचना कर सकते हैं। बजट पर विवाद करते हुए भी विधानपरिषद् के सदस्य मन्त्रियों की कड़ी आलोचना कर सकते हैं। परन्तु मन्त्रिपरिषद् सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है और इसलिए विधानसभा मन्त्रिमण्डल के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास कर उसे अपदस्थ नहीं कर सकती।

4. संवैधानिक कार्य (Constitutional Function) विधानपरिषद् विधानसभा के साथ मिलकर संविधान के संशोधन में भाग लेती है परन्तु उसी समय जब कोई संशोधन बिल राज्यों की अनुमति के लिए भेजा जाए। परन्तु संविधान का बहुत कम भाग ऐसा है जिसे इस विधि से बदला जा सकता है।

विधानपरिषद् की स्थिति (Position of the Legislative Council) विधानपरिषद् विधानसभा के मुकाबले में एक बहुत ही गौण सदन है। यह अपने अस्तित्व के लिए विधानसभा पर निर्भर है। विधानसभा विधानपरिषद् की समाप्ति के लिए प्रार्थना कर सकती है और संसद् उस प्रस्ताव के आधार पर कानून बना देगी। इस एकमात्र कारण के आधार पर यह विधानसभा के सामने सिर नहीं उठा सकती, इसका मुकाबला करने की बात तो बहुत दूर की है। इसे न राज्य के कानून-निर्माण में कोई प्रभाव डालने का अधिकार है और न ही राज्य के प्रशासन को भी प्रभावित करने का। विधानपरिषद् विधानसभा की इच्छा के विरुद्ध कोई कानून पास नहीं कर सकती जबकि विधानपरिषद् विधानसभा द्वारा पास किए गए बिल को अधिक-से-अधिक चार मास के लिए रोक सकती है। कार्यपालिका पर विधानपरिषद् का नियन्त्रण नाममात्र का है। विधानपरिषद् के सदस्य मन्त्रियों से प्रश्न पूछ सकते हैं, मन्त्रियों की आलोचना कर सकते हैं, परन्तु अविश्वास प्रस्ताव पास करके हटा नहीं सकते। राज्य के वित्त पर भी इस सदन का कोई नियन्त्रण नहीं है। धनबिल को विधानपरिषद् केवल 14 दिन तक रोक सकती है। संक्षेप में, विधानपरिषद् विधानसभा के मुकाबले में बिल्कुल शक्तिहीन तथा गौण सदन है।

प्रश्न 3. राज्य विधानमण्डल की रचना की व्याख्या करा। राज्य विधानमण्डल की शक्तियां संक्षेप रूप में वर्णित करो।
(Discuss the Composition of State Legislature. Explain briefly the powers of the State Legislature.)
उत्तर-प्रत्येक राज्य में कानून निर्माण के लिए विधानमण्डल की स्थापना की गई है। कुछ राज्यों में विधानमण्डल के दो सदन हैं जबकि कुछ राज्यों में विधानमण्डल का एक सदन है। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, तमिलनाडू, जम्मू-कश्मीर, आन्ध्र प्रदेश एवं तेलंगाना में विधानमण्डल के दो सदन हैं जबकि पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, केरल, आसाम, उड़ीसा इत्यादि में एक सदन है।
विधानमण्डल की रचना (Composition of State Legislature)-जिन राज्यों में द्विसदनीय विधानमण्डल है वहां विधानमण्डल के दो सदन हैं-विधानसभा तथा विधानपरिषद् । एक सदन वाले विधानमण्डल में केवल विधानसभा ही होती है।

(क) विधानसभा (Legislative Assembly)-प्रत्येक विधानण्डल में विधानसभा का होना आवश्यक है। यह सदन जनता का प्रतिनिधित्व करता है और इसके सभी सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं। राज्यपाल को ऐंग्लो-इण्डियन जाति का एक सदस्य मनोनीत करने का अधिकार है, यदि चुनाव में इस समुदाय को पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त न हो सका हो। संविधान के अनुसार विधानसभा में अधिक-से-अधिक 500 तथा कम-से-कम 60 सदस्य हो सकते हैं। पंजाब विधानसभा की सदस्य संख्या 117 है जबकि हरियाणा में 90 सदस्य हैं।
विधानसभा का सदस्य बनने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति-

  1. भारत का नागरिक हो।
  2. 25 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
  3. किसी सरकारी लाभदायक पद पर आसीन न हो।
  4. कानून द्वारा निश्चित अन्य योग्यताएं रखता हो।
  5. पागल, दिवालिया, न्यायालय द्वारा अयोग्य घोषित न किया गया हो।
  6. विधानसभा का चुनाव लड़ने वाले आजाद उम्मीदवार के लिए यह आवश्यक है कि उसका नाम दस प्रस्तावकों द्वारा अनुमोदित किया जाए।

विधानसभा की अवधि 5 वर्ष है। परन्तु राज्यपाल मुख्यमन्त्री की सलाह पर इसे 5 वर्ष की अवधि से पहले भी भंग कर सकता है। संकटकाल में इसकी अवधि को एक वर्ष के लिए बढ़ाया भी जा सकता है। विधानसभा का एक अध्यक्ष (Speaker) और एक उपाध्यक्ष (Deputy Speaker) होता है, जिनका कार्य सदन में शान्ति बनाए रखना तथा सदन के काम का सुचारु रूप से संचालन करना है। ये दोनों अधिकारी विधानसभा के सदस्यों द्वारा अपने में से ही चुने जाते हैं।

(ख) विधानपरिषद् (Legislative Council) विधानपरिषद् राज्य विधानमण्डल का ऊपरि सदन है। इसके सदस्यों की संख्या 40 से कम और विधानसभा की सदस्य संख्या के 1/3 से अधिक नहीं हो सकती। यह जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से नहीं चुने जाते बल्कि इनका चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से निम्नलिखित विधि के आधार पर होता है-

  1. लगभग 1/3 सदस्य विधानसभा के सदस्यों द्वारा निर्वाचित।
  2. लगभग 1/3 सदस्य स्थानीय संस्थाओं द्वारा निर्वाचित।
  3. लगभग 1/2 सदस्य राज्य में रहने वाले ऐसे सदस्यों द्वारा जो कम-से-कम तीन वर्ष से किसी विश्वविद्यालय के स्नातक हों, निर्वाचित।
  4. लगभग 1/12 सदस्य राज्य की माध्यमिक पाठशालाओं या इससे उच्च शिक्षा संस्थाओं में कम-से-कम तीन वर्षों से अध्यापन करने वाले अध्यापकों द्वारा निर्वाचित।
  5. शेष अर्थात् लगभग 1/6 सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत ।

विधानपरिषद् का सदस्य वही नागरिक बन सकता है जिसमें निम्नलिखित योग्यताएं हों-

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. 30 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
  3. वह किसी सरकारी लाभदायक पद पर आसीन न हो।
  4. वह कानून द्वारा निश्चित अन्य योग्यताएं रखता हो।
  5. वह पागल अथवा दिवालिया न हो, किसी न्यायालय द्वारा अयोग्य घोषित न किया गया हो।

विधानपरिषद् एक स्थायी सदन है और इसके सदस्य 6 वर्ष के लिए चुने जाते हैं। राज्यपाल विधानसभा को भंग नहीं कर सकता। विधानपरिषद् का भी एक सभापति तथा एक उप-सभापति होता है जिसका चुनाव इसके सदस्य अपने में से ही करते हैं।

विधानमण्डल की शक्तियां और कार्य (Powers and Functions of the State Legislature)-राज्य विधानमण्डल को संसद् की तरह की प्रकार की शक्तियां प्राप्त हैं जिन्हें निम्नलिखित श्रेणियों के अन्तर्गत बांटा जा सकता है-

1. विधायिनी शक्तियां (Legislative Powers)—राज्य विधानमण्डल उन विषयों पर जो राज्य के अधिकार क्षेत्र में हैं, कानून बना सकता है अर्थात् राज्य सूची तथा समवर्ती सूची में दिए गए सभी विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य विधानमण्डल को है। परन्तु समवर्ती सूची में दिए गए सभी विषयों पर बनाया गया कानून संसद् द्वारा उसी विषय पर पास किए हुए कानून के विरुद्ध नहीं होना चाहिए। विधानमण्डल के द्वारा पास होने के बाद बिल राज्यपाल के पास जाता है और उसकी स्वीकृति मिलने के बाद ही वह कानून बन सकता है। राज्यपाल को साधारण बिलों पर एक बार निषेधाधिकार प्रयोग करने का अधिकार प्राप्त है।

2. वित्तीय शक्तियां (Financial Powers)-राज्य के वित्त पर विधानमण्डल का ही नियन्त्रण है। सरकार विधानमण्डल की स्वीकृति के बिना न कोई टैक्स लगा सकती है और न ही कोई धन ख़र्च कर सकती है। राज्यपाल का यह कर्त्तव्य है कि वह नया वर्ष आरम्भ होने से पहले अगले वर्ष का बजट विधानमण्डल के सामने पेश करवा, विधानमण्डल बजट पर विचार करता है और उसे पास या रद्द कर सकता है। राज्यपाल विधानमण्डल द्वारा पास किए गए धन-विधेयक पर अपनी स्वीकृति देने से इन्कार नहीं कर सकता।

3. कार्यपालिका पर नियन्त्रण (Control over the Executive)-विधानमण्डल के सदस्य मन्त्रियों से प्रशासन के बारे में प्रश्न पूछ सकते हैं, काम रोको प्रस्ताव पेश कर सकते हैं और विभिन्न तरीकों से सरकार के कार्यों तथा नीतियों की आलोचना करके उसे प्रभावित कर सकते हैं। विधानसभा के विश्वास-पर्यन्त ही मन्त्रिपरिषद् अपने पद पर रह सकती है। विधानसभा मन्त्रिपरिषद् के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पास कर दे या किसी मन्त्री के वेतन में कमी करने का प्रस्ताव पास कर दे तो ये बातें मन्त्रिपरिषद् में विधानसभा के अविश्वास की सूचक हैं और मन्त्रिपरिषद् को अपना त्याग-पत्र देना ही पड़ता है।

4. अन्य कार्य (Other Functions)–

  • राज्य विधानमण्डल का निम्न सदन अर्थात् विधानसभा राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेता है। केवल निर्वाचित सदस्य ही भाग लेते हैं ; अनिर्वाचित सदस्यों को यह अधिकार नहीं है।
  • राज्य में विधानपरिषद् में चुने जाने वाले सदस्य भी विधानसभा के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं।
  • राज्य विधानमण्डल संविधान की महत्त्वपूर्ण धाराओं के संशोधन में भाग लेता है। संविधान की महत्त्वपूर्ण धाराओं को संशोधित करने के लिए आवश्यक है कि ऐसा प्रस्ताव संसद् के दोनों सदनों के 2/3 बहुमत से पास होकर राज्यों के पास जाता है और वह उस समय तक लागू नहीं हो सकता जब तक कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमण्डल उसे स्वीकृत न कर लें। 42वें संशोधन और 44वें संशोधन को राज्यों के विधानमण्डलों के पास स्वीकृति के लिए भेजा गया था।

राज्य विधानमण्डल की शक्तियों पर सीमाएं (Limitations on the Powers of the State Legislature)-राज्य विधानमण्डल की शक्तियों पर निम्नलिखित सीमाएं हैं-

  1. राज्य विधानमण्डल एक ऐसी संस्था है जिसके पास पूर्ण अधिकार नहीं हैं क्योंकि ये संविधान में संशोधन नहीं कर सकते।
  2. कई ऐसे बिल भी हैं जो राष्ट्रपति की मंजूरी के बिना विधानमण्डल में पेश नहीं किए जा सकते। उदाहरणस्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की स्वतन्त्रता पर रोक लगाने के विषय में बिल, व्यापार व वाणिज्य पर प्रतिबन्ध लगाने वाले बिल, आदि।
  3. विधानमण्डलों द्वारा पास किए कुछ बिलों को राज्यपाल राष्ट्रपति के विचार के लिए रख सकता है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बिना ये बिल पास नहीं हो सकते।
  4. संसद् राज्य सूची में लिखित विषयों के बारे में कानून बना सकती है। यह तभी होता है जब राज्यसभा इस उद्देश्य का प्रस्ताव पास कर दे कि अमुक विषय राष्ट्रीय महत्त्व का विषय बन गया है।
  5. संवैधानिक संकट के समय संसद् को राज्यसूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार मिल जाता है।
  6. किसी राज्य में संवैधानिक मशीनरी के असफल हो जाने की घोषणा के समय केन्द्रीय संसद् को राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार प्राप्त हो जाता है।
  7. विदेशी शक्तियों से किए गए समझौते अथवा सन्धियों को क्रियात्मक रूप देने के लिए संसद् कोई भी कानून बनाकर राज्यों पर लागू कर सकती है।
  8. राज्यपाल की स्वेच्छाचारी शक्तियां भी राज्य की व्यवस्थापिका की शक्तियों पर प्रतिबन्ध हैं।

प्रश्न 4.
राज्य विधानमण्डल में बिल कैसे पास होता है ?
(How does a Bill become an Act in the State Legislature)

प्रश्न 4. राज्य विधानमण्डल में अपनाई गई विधायिनी प्रक्रिया का वर्णन करो।
(Describe the Legislative procedure adopted in the State Legislative.)
अथवा राज्य विधानमण्डल में एक विधेयक कानून किस तरह बनता है ?
(How does a Bill become an act in the State Legislature ?)
उत्तर-विधानमण्डल का मुख्य कार्य राज्य के लिए कानून बनाना है तथा उसका बहुत समय इस कार्य पर लगता है। संसद् की भान्ति इसमें भी साधारण तथा धन-बिल प्रस्तुत होते हैं तथा भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में से गुज़र कर एक्ट का रूप धारण करते हैं। साधारण बिल न केवल मन्त्रियों अपितु विधानसभा अथवा विधानपरिषद् के सदस्यों द्वारा पेश किए जा सकते हैं। साधारण बिल के पास होने की विधि का वर्णन इस प्रकार है-

1. बिल का प्रस्तुत होना तथा प्रथम वाचन (Introduction of the Bill and its First Reading)-सरकारी बिलों के लिए कोई नोटिस देने की आवश्यकता नहीं है। मन्त्री जब चाहे बिल को पेश कर सकते हैं। परन्तु गैर-सरकारी बिलों के लिए एक महीने का नोटिस देना आवश्यक है। गैर-सरकारी बिल को पेश करने की तिथि निश्चित कर दी जाती है। निश्चित तिथि को बिल पेश करने वाला सदस्य बिल को प्रस्तुत करने के लिए सदन से आज्ञा मांगता है तथा इसके पश्चात् बिल के शीर्षक को पढ़ता है। यदि उचित समझे तो इस अवसर पर बिल के सम्बन्ध में एक छोटा-सा भाषण भी दे सकता है। इसके पश्चात् शीघ्र ही सदन का अध्यक्ष अथवा सभापति उपस्थित सदस्यों की सम्मति लेता है। यदि सदन की बहुसंख्या आज्ञा देने के पक्ष में हो तो बिल प्रस्तुत करने की आज्ञा मिल जाती है। इसके पश्चात् बिल को सरकारी गजट में मुद्रित कर दिया जाता है। सरकारी बिल को बिना नोटिस दिए सरकारी गजट में छाप दिया जाता है। यही बिल का प्रथम वाचन समझा जाता है।

2. द्वितीय वाचन (Second Reading)—प्रथम वाचन के कुछ दिनों के पश्चात् बिल को प्रस्तुत करने वाला व्यक्ति सदन से यह प्रार्थना करता है कि उसके बिल पर विचार किया जाए। इस पर बिल के सिद्धान्तों तथा धाराओं पर साधारण विवाद होता है। इस विवाद के पश्चात् यदि सदन चाहे तो इसको रद्द कर सकता है नहीं तो इसकी प्रत्येक धारा पर विस्तारपूर्वक विचार किया जाता है।

3. समिति अवस्था (Select Committee) कभी-कभी ऐसे बिलों को, जो विचाराधीन हों, प्रवर समिति को सौंप दिया जाता है। प्रवर समिति में विधानमण्डल के 25 से 30 तक सदस्य होते हैं जो बिल की अच्छी प्रकार से छानबीन करते हैं। इसके पश्चात् प्रवर समिति अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करती है, जिस पर सदस्य पुनः विचार करते हैं।

4. प्रतिवेदन अवस्था (Report Stage)-प्रवर समिति में की गई छान-बीन द्वारा संशोधित किया गया बिल समिति के प्रतिवेदन द्वारा पुनः सदन के सम्मुख आता है। इसको प्रतिवेदन अवस्था कहा जाता है। इस अवस्था में कमेटी में दिए प्रत्येक सुझाव पर विचार किया जाता है तथा प्राय: इस समिति के प्रतिवेदन को स्वीकार कर लिया जाता है।

5. तृतीय वाचन (Third Reading) द्वितीय वाचन के पश्चात् बिल प्रस्तुत करने वाला व्यक्ति सदन में यह प्रार्थना करता है कि बिल पास कर दिया जाए। यदि सदस्यों का बहुमत इसके पक्ष में हो (प्रायः यह होता ही है) तो बिल पास हो जाता है तथा सदन का मुख्य अधिकारी इस पर हस्ताक्षर कर देता है। इस दशा में बिल की धाराओं में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता, परन्तु बिल के विषय को अधिक स्पष्ट करने के लिए बिल की भाषा में शब्दों का परिवर्तन हो सकता है। इसको बिल का तृतीय वाचन कहते हैं।

6. बिल दूसरे सदन में (The Bill in the Other House)-जब बिल को एक सदन पास कर देता है तो इसके पश्चात् इसको विधानमण्डल के दूसरे सदन में भेज दिया जाता है। इस सदन में भी बिल के तीन वाचन होते हैं। यदि यह सदन भी बिल को पास कर दे तो उसको राज्यपाल के हस्ताक्षरों के लिए प्रस्तुत किया जाता है। यदि किसी समय विधानपरिषद् इस बिल को पास न करे अथवा इसमें ऐसे संशोधन कर दे, जिससे विधानसभा सहमत न हो अथवा तीन मास तक बिल पर कोई कार्यवाही न करे, तब ऐसी अवस्था में विधानसभा इस बिल पर पुनः विचार करके इसको विधानपरिषद में भेजती है। यदि विधानपरिषद् बिल को अस्वीकार कर दे अथवा इसमें ऐसे संशोधन करे जिससे विधानसभा सहमत न हो अथवा इसको एक मास में पास न करे तो बिल दोनों सदनों द्वारा पास किया हुआ समझा जाता है। इससे स्पष्ट है कि विधानपरिषद् एक बिल को अधिक-से-अधिक चार मास के लिए रोक सकती है। इसलिए उसके पास इससे अधिक अन्य कोई शक्ति नहीं।

7. राज्यपाल की स्वीकृति (Governor’s Assent) जब राज्य विधानमण्डल के दोनों सदन बिल को पास कर देते हैं तो इसको राज्यपाल की स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किया जाता है। या तो राज्यपाल इस पर हस्ताक्षर कर इसको पास कर देता है अथवा अपने सुझावों सहित बिल को विधानमण्डल को पुनः विचार के लिए वापस भेज देता है। यदि राज्य विधानमण्डल इस बिल को राज्यपाल द्वारा दिए गए सुझावों सहित अथवा उनके बिना पुनः पास कर देता है तो राज्यपाल को बिल पर हस्ताक्षर करने ही पड़ते हैं तथा बिल पास हो जाता है। कुछ ऐसे बिल भी होते हैं जिनको राज्यपाल राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेज सकता है तथा राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त करने के पश्चात् ही कानून का रूप धारण करते हैं। जुलाई 1994 को तमिलनाडु विधानसभा ने राज्य में 69 प्रतिशत आरक्षण के वास्ते बिल पास किया और उसे राज्यपाल की मन्जूरी के लिए भेज दिया। राज्यपाल एन० चन्ना रेड्डी ने उस बिल को राष्ट्रपति की मन्जूरी के लिए भेज दिया। राष्ट्रपति की मन्जूरी मिलने पर उस बिल ने कानून का रूप धारण कर लिया।

प्रश्न 5. विधानसभा तथा विधानपरिषद् के पारस्परिक सम्बन्धों का वर्णन करो।
(Explain the mutual relations of Legislative Assembly and Legislative Council.)
उत्तर-राज्य विधानसभा के दोनों सदनों को समान शक्तियां प्राप्त नहीं हैं। दोनों सदनों में विधानसभा अधिक शक्तिशाली है। दोनों सदनों के सम्बन्ध इस प्रकार हैं-

1. साधारण बिलों के सम्बन्धों में (In respect of Oridnary Bills)—साधारण बिल दोनों में से किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। विधानपरिषद् द्वारा पास किया गया साधारण बिल उस समय तक राज्यपाल के पास नहीं भेजा जा सकता जब तक विधान सभा भी उसे पास न कर दे। विधानसभा उसे रद्द कर सकती है। विधानसभा द्वारा पास होने के बाद साधारण बिल विधानपरिषद् के पास आता है, परन्तु वह उसे पूर्ण रूप से रद्द नहीं कर सकती। यदि विधानपरिषद् तीन महीने तक उस पर कोई कार्यवाही न करे या उसमें ऐसे सुझाव देकर वापस कर दे जो विधानसभा को स्वीकृत न हों या उसे रद्द कर दे तो सभी दशाओं में विधानसभा उस बिल को दोबारा साधारण बहुमत से पास कर सकती है और वह बिल फिर विधानपरिषद् के सामने आता है। दूसरी बार विधानपरिषद् यदि उस बिल को रद्द कर दे या एक महीने तक उस पर कोई कार्यवाही न करे या उसमें ऐसे संशोधन कर दे जो विधानसभा को स्वीकृत न हों तो तीनों दशाओं में वह बिल दोनों सदनों द्वारा पास समझा जाएगा। स्पष्ट है कि विधानपरिषद् विधानसभा की इच्छा के विरुद्ध कोई कानून नहीं बना सकती और विधानसभा के रास्ते में अधिक-से-अधिक 4 महीने तक बाधा उत्पन्न कर सकती है।

2. धन-बिलों के सम्बन्ध में (In respect of Money Bills)-राज्य के धन पर वास्तविक नियन्त्रण विधानसभा का है न कि विधानपरिषद् का। धन-बिल केवल विधानसभा में ही पेश हो सकते हैं, विधानपरिषद् में नहीं। यदि विधानपरिषद् धन विधेयक को रद्द कर दे या ऐसे सुझाव देकर वापस कर दे जो विधानसभा को स्वीकृत न हों या 14 दिन तक उस पर कोई कार्यवाही न करे तो इन सभी दशाओं में वह बिल दोनों सदनों द्वारा पास समझा जाएगा। इस प्रकार स्पष्ट है कि राज्य के वित्त पर विधानसभा को ही नियन्त्रण का अधिकार प्राप्त है, विधानपरिषद् को नहीं।

3. कार्यपालिका पर नियन्त्रण (Control over the Executive)—कार्यपालिका पर वास्तविक नियन्त्रण विधानसभा का है न कि विधानपरिषद् का। वैसे तो दोनों सदनों के सदस्यों को मन्त्रिपरिषद् से साधारण प्रश्न और पूरक प्रश्न पूछने, ‘काम रोको’ प्रस्ताव पेश करने और मन्त्रिपरिषद् की नीतियों के कार्यों की आलोचना करके कार्यपालिका को प्रभावित करने का अधिकार है, परन्तु मन्त्रिपरिषद् अपने कार्यों के लिए विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है। मन्त्रिपरिषद् तब तक अपने पद पर रह सकती है जब तक उसे विधानसभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त हो। विधानसभा मन्त्रिपरिषद् के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पास करके उसे अपदस्थ कर सकती है परन्तु विधानपरिषद् को अविश्वास प्रस्ताव पास करके नहीं हटा सकती है।

4. संविधान में संशोधन के सम्बन्ध में संविधान में कुछ अनुच्छेद ऐसे हैं जिनमें संशोधन आधे राज्यों के विधानमण्डलों की स्वीकृति से ही हो सकता है। इस तरह का संशोधन विधेयक दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पास होना आवश्यक है। अतः इस सम्बन्ध में विधानमण्डल के दोनों सदनों की शक्तियां समान हैं।

5. राष्ट्रपति के निर्वाचन के सम्बन्ध में-राष्ट्रपति के चुनाव में विधानसभा के सदस्य भाग लेते हैं, विधानपरिषद् के सदस्य नहीं। दोनों सदनों के पारस्परिक सम्बन्धों से स्पष्ट है कि विधानपरिषद् विधानसभा के मुकाबले में बहुत ही शक्तिहीन सदन है। डॉ० एम० पी० शर्मा के शब्दों में, “जो समानता का ढोंग लोकसभा और राज्यसभा के बीच है, वह विधानसभा और विधानपरिषद् के बीच नहीं।”

प्रश्न 6. राज्य विधानसभा के स्पीकर की नियुक्ति, शक्तियां व स्थिति की व्याख्या करो। (Explain the Election, Powers and Position of Speaker of State Legislative Assembly.)
उत्तर-विधानसभा का एक अध्यक्ष होता है, जिसे स्पीकर कहा जाता है। विधानसभा स्पीकर की अध्यक्षता में ही अपने सभी कार्य करती है।
चुनाव (Election)-स्पीकर का चुनाव विधानसभा के सदस्यों के द्वारा अपने में से ही किया जाता है। वास्तव में बहुमत दल की इच्छानुसार ही कोई व्यक्ति स्पीकर चुना जा सकता है क्योंकि यदि स्पीकर के पद के लिए मुकाबला होता है तो बहुमत दल का उम्मीदवार ही विजयी होता है।

कार्यकाल (Term of Office)-स्पीकर की अवधि 5 वर्ष है। यदि विधानसभा को भंग कर दिया जाए तो स्पीकर अपने पद का त्याग नहीं करता। जून, 1986 को सुरजीत सिंह मिन्हास को पंजाब विधानसभा का स्पीकर चुना गया और वह इस पद पर 24 फरवरी, 1992 तक रहे। स्पीकर को 5 वर्ष की अवधि से पूर्व भी हटाया जा सकता है और स्पीकर स्वयं भी त्याग-पत्र दे सकता है। परन्तु स्पीकर के हटाए जाने का प्रस्ताव विधानसभा में उसी समय पेश हो सकता है जबकि कम-से-कम 14 दिन पहले इस आशय की एक पूर्व सूचना उसे दी जा चुकी हो। हटाए जाने के प्रस्ताव के कारण स्पष्ट होने चाहिए। यदि नहीं हो तो प्रस्ताव पेश करने की आज्ञा नहीं भी दी जा सकती। 20 जून, 1995 को उत्तर प्रदेश विधानसभा ने स्पीकर धनी राम वर्मा के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दिया।

स्पीकर की शक्तियां व कार्य (Powers and Functions of the Speaker)-स्पीकर को विधानसभा का अध्यक्ष होने के नाते कार्य करने पड़ते हैं जोकि मुख्य रूप से निम्नलिखित हैं

  • स्पीकर विधानसभा में शान्ति और व्यवस्था बनाए रखता है।
  • स्पीकर विधानसभा के नेता से सलाह करके सभा का कार्यक्रम निर्धारित करता है।
  • स्पीकर सभा की कार्यवाही-नियमों की व्याख्या करता है।
  • जब किसी बिल पर या विषय पर वाद-विवाद हो जाता हो तो स्पीकर उस पर मतदान करवाता है, वोटों की गिनती करता है तथा परिणाम घोषित करता है।
  • साधारणतः स्पीकर अपना वोट नहीं डालता, परन्तु जब किसी विषय पर वोट समान हों तो वह अपना निर्णायक वोट दे सकता है।
  • प्रस्तावों व व्यवस्था सम्बन्धी मुद्दों को स्वीकार करना।
  • स्पीकर ही इस बात का निश्चय करता है कि सदन की गणपूर्ति के लिए आवश्यक सदस्य उपस्थित हैं अथवा नहीं।
  • स्पीकर सदन के सदस्यों की जानकारी के लिए या किसी विशेष महत्त्व के मामले पर सदन को सम्बोधित करता है।
  • स्पीकर सदन के नेता की सलाह पर सदन की गुप्त बैठक की आज्ञा देता है। (10) स्पीकर की आज्ञा के बिना कोई सदस्य विधानसभा में नहीं बोल सकता।
  • यदि कोई सदस्य सदन में अनुचित शब्दों का प्रयोग करे तो स्पीकर अशिष्ट भाषा का प्रयोग करने वाले सदस्य को अपने शब्द वापस लेने के लिए कह सकता है और वह विधानसभा की कार्यवाही से ऐसे शब्दों को काट सकता है जो उसकी सम्मति में अनुचित तथा असभ्य हों।
  • यदि कोई सदस्य सदन में गड़बड़ करे तो स्पीकर उसको सदन से बाहर जाने के लिए कह सकता है।
  • यदि कोई सदस्य अध्यक्ष के आदेशों का उल्लंघन करे तथा सदन के कार्य में बाधा उत्पन्न करे तो स्पीकर उसे निलम्बित (Suspend) कर सकता है। यदि कोई सदस्य उसके आदेशानुसार सदन से बाहर न जाए तो वह मार्शल की सहायता से उसे बाहर निकाल सकता है।
  • सदन की मीटिंग में गड़बड़ होने की दशा में स्पीकर को सदन का अधिवेशन स्थगित करने का अधिकार है।
  • यदि सदन किसी व्यक्ति को अपने विशेषाधिकार का उल्लंघन करने के लिए दण्ड दे तो उसे लागू करवाना स्पीकर का काम है।
  • स्पीकर का अपना सचिवालय होता है जिसमें काम करने वाले कर्मचारी उसके नियन्त्रण में काम करते हैं।
  • प्रेस तथा जनता के लिए दर्शक गैलरी में व्यवस्था करना स्पीकर का काम है।
  • विधानसभा जब किसी बिल पर प्रस्ताव पास कर देती है तब उसे दूसरे सदन अथवा राज्यपाल के पास स्पीकर ही हस्ताक्षर कर के भेजता है।

अध्यक्ष की स्थिति (Position of the Speaker) विधानसभा के अध्यक्ष का पद बड़ा महत्त्वपूर्ण तथा महान् आदर व गौरव का है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. राज्य विधानमण्डल किसे कहते हैं ?
उत्तर-राज्य में संघात्मक सरकार होने के कारण केन्द्र के अतिरिक्त राज्यों में भी कानून बनाने के लिए राज्य विधानमण्डल की व्यवस्था की गई है। कुछ राज्यों में विधानमण्डल के दो सदन हैं और कुछ राज्यों में एक सदन है। राज्य विधानसभा के निम्न सदन को विधानसभा और ऊपरि सदन को विधानपरिषद् कहते हैं।

प्रश्न 2. राज्य विधानमण्डल का सदस्य बनने के लिए कौन-सी योग्यताओं की आवश्यकता है ?
उत्तर-राज्य विधानमण्डल का सदस्य बनने के लिए निम्नलिखित योग्यताएं होनी चाहिएं-

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • विधानसभा के लिए 25 वर्ष या इससे अधिक और विधान परिषद् के लिए 30 वर्ष या इससे अधिक आयु हो।
  • वह सरकारी पद पर न हो।
  • उसमें वे सभी योग्यताएं होनी चाहिएं जो विधानमण्डल द्वारा निश्चित की गई हों।

प्रश्न 3. विधानसभा की रचना लिखें।
उत्तर-संविधान में विधानसभा के सदस्यों की संख्या निश्चित नहीं की गई बल्कि अधिकतम और न्यूनतम संख्या निर्धारित की गई है। अनुच्छेद 170 (1) के अनुसार विधानसभा के सदस्यों की संख्या 60 से कम और 500 से अधिक नहीं हो सकती। राज्य की विधानसभा की संख्या राज्य की जनसंख्या के आधार पर निश्चित की जाती है। पंजाब की विधानसभा में 117 सदस्य हैं। सबसे अधिक सदस्य उत्तर प्रदेश में हैं जिसकी विधानसभा की निर्वाचित सदस्य संख्या 403 है। विधानसभा के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा वयस्क मताधिकार के आधार पर चुने जाते हैं और भारत के प्रत्येक स्त्री-पुरुष को जिसकी आयु 18 वर्ष या इससे अधिक हो, मत डालने का अधिकार है। अनुसूचित, आदिम व पिछड़ी हुई जातियों के लिए स्थान तो निश्चित हैं, परन्तु उनका निर्वाचन संयुक्त प्रणाली के आधार पर ही होता है।

प्रश्न 4. विधानसभा का सदस्य बनने के लिए क्या योग्यताएं होनी चाहिएं ?
उत्तर-

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • उसकी आयु 25 वर्ष या इससे अधिक हो।
  • वह सरकारी पद पर न हो।
  • न्यायालय द्वारा किसी अपराध के कारण अयोग्य घोषित न किया गया हो।
  • उसमें वे सभी योग्यताएं होनी चाहिएं जो समय-समय पर विधानसभा द्वारा निश्चित की गई हों।
  • विधानसभा का चुनाव लड़ने वाले आजाद उम्मीदवार के लिए यह आवश्यक है कि उसका नाम दस प्रस्तावकों द्वारा प्रस्तावित हो।

प्रश्न 5. विधानसभा की चार शक्तियों का वर्णन करो।
उत्तर-विधानसभा की मुख्य शक्तियां अनलिखित हैं-

  1. विधायिनी शक्तियां-विधानसभा को राज्य सूची तथा समवर्ती सूची के सभी विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है। यदि विधानमण्डल द्वि-सदनीय है तो विधेयक यहां से विधानपरिषद् के पास जाता है।
  2. वित्तीय शक्तियां-राज्य के वित्त पर विधानसभा का ही नियन्त्रण है। धन बिल केवल विधानसभा में ही पेश हो सकते हैं। वित्तीय वर्ष के आरम्भ होने से पहले राज्य का वार्षिक बजट भी इसी के सामने प्रस्तुत किया जाता है। विधानसभा की स्वीकृति के बिना राज्य सरकार कोई टैक्स नहीं लगा सकती और न ही धन खर्च कर सकती है।
  3. कार्यपालिका पर नियन्त्रण-विधानमण्डल को कार्यकारी शक्तियां मिली हुई हैं। विधानसभा का मन्त्रिपरिषद् पर पूर्ण नियन्त्रण है। मन्त्रिपरिषद् अपने समस्त कार्यों के लिए विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है। विधानसभा के सदस्य मन्त्रियों की आलोचना कर सकते हैं। प्रश्न और पूरक प्रश्न पूछ सकते हैं। विधानसभा चाहे तो मन्त्रिपरिषद् को अविश्वास प्रस्ताव पास करके हटा सकती है।
  4. संवैधानिक कार्य-जिन अनुच्छेदों में संशोधन के लिए आधे राज्यों के विधानमण्डलों की स्वीकृति की आवश्यकता होती है, वहां विधानसभा संविधान संशोधन में भाग लेती है।

प्रश्न 6. विधानपरिषद् की रचना लिखें।
उत्तर-किसी भी राज्य को विधानपरिषद् के सदस्यों की संख्या 40 से कम और विधानसभा के 1/3 भाग से अधिक नहीं हो सकती। परन्तु जम्मू-कश्मीर की विधानपरिषद् में कुल 36 सदस्य हैं। विधानपरिषद् में कुल सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से नहीं चुने जाते बल्कि अप्रत्यक्ष रूप में निम्नलिखित तरीके से चुने जाते हैं-

  1. लगभग 1/3 सदस्य स्थानीय संस्थाओं के द्वारा चुने जाते हैं।
  2. लगभग 1/3 सदस्य विधानसभा के सदस्यं द्वारा चुने जाते हैं।
  3. लगभग 1/12 सदस्य राज्य में रहने वाले ऐसे व्यक्तियों द्वारा चुने जाते हैं जो कम-से-कम तीन वर्ष पहले किसी विश्वविद्यालय में स्नातक हों।
  4. लगभग 1/12 सदस्य राज्य की माध्यमिक पाठशालाओं या इससे उच्च शिक्षा संस्थाओं में कम-से-कम तीन वर्ष के अध्यापन-कार्य करने वाले अध्यापकों द्वारा चुने जाते हैं।
  5. शेष लगभग 1/6 सदस्य राज्यपाल द्वारा ऐसे व्यक्तियों में से मनोनीत होते हैं जिन्हें विज्ञान, कला, साहित्य, समाज-सेवा आदि के क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या अनुभव प्राप्त हो।

प्रश्न 7. विधानपरिषद् का सदस्य बनने के लिए कौन-सी योग्यताएं आवश्यक हैं ?
उत्तर-योग्यताएं (Qualifications)-विधानपरिषद् का सदस्य निर्वाचित या मनोनीत होने के लिए किसी भी व्यक्ति में निम्नलिखित योग्यताओं का होना आवश्यक है-

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. वह तीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
  3. वह किसी सरकारी लाभदायक पद पर आसीन न हो।
  4. वह विधि द्वारा निश्चित अन्य योग्यताएं रखता हो।
  5. वह संसद् द्वारा बनाए गए किसी कानून के अनुसार विधानपरिषद् का सदस्य बनने के लिए अयोग्य न हो।
  6. वह दिवालिया न हो, पागल न हो और किसी न्यायालय द्वारा अयोग्य घोषित न किया गया हो। यदि निर्वाचित होने के बाद भी उसमें ऐसी कोई अयोग्यता उत्पन्न हो जाए या लगातार 60 दिन तक सदन की स्वीकृति के बिना अधिवेशनों में अनुपस्थित रहे तो उसका स्थान रिक्त घोषित किया जा सकता है।

प्रश्न 8. विधानपरिषद् की किन्हीं चार उपयोगिताओं का वर्णन करें।
उत्तर-

  1. विधानसभा को स्वेच्छाचारी बनने से रोकती है तथा शक्ति को सन्तुलित बनाए रखती है।
  2. विधानपरिषद् में विज्ञान, साहित्य तथा कला में प्रसिद्ध व्यक्तियों को प्रतिनिधित्व दिया जाता है, जिससे राज्य को उनके ज्ञान में लाभ पहुंचता है।
  3. विधानपरिषद् बिल की त्रुटियों को दूर करती है।
  4. विधानपरिषद् बिल के पास होने में आवश्यक देरी करवाता है। इस देरी का लाभ यह होता है कि जनता उसके गुण-दोषों पर विचार कर सकती है।

प्रश्न 9. विधानपरिषद् की चार शक्तियों का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर-राज्य की विधानपरिषद् को निम्नलिखित शक्तियां प्राप्त हैं-

  1. विधायिनी शक्तियां-विधानपरिषद में उन सभी विषयों के सम्बन्ध में साधारण बिल पेश किया जा सकता है, जिनका वर्णन राज्य सूची और समवर्ती सूची में किया गया है।
  2. वित्तीय शक्तियां-धन-बिल विधानपरिषद् में पेश नहीं हो सकता। यह बजट और धन बिल पर विचार कर सकती है परन्तु उसे रद्द नहीं कर सकती। विधानपरिषद् धन बिल को अधिक-से-अधिक 14 दिन तक रोकने की शक्ति रखती है।
  3. कार्यपालिका शक्तियां-विधानपरिषद् कार्यपालिका को प्रभावित कर सकती है, परन्तु उस पर नियन्त्रण नहीं रख सकती। विधानपरिषद् के सदस्य मन्त्रियों से प्रश्न पूछ सकते हैं और ‘काम रोको’ प्रस्ताव पेश करके मन्त्रिमण्डल की कमियों और भ्रष्टाचार पर प्रकाश डाल सकते हैं तथा उनकी आलोचना कर सकते हैं।
  4. संवैधानिक कार्य-विधानपरिषद् विधानसभा के साथ मिलकर संविधान के संशोधन में भाग लेती है।

प्रश्न 10. विधानपरिषद् को किस प्रकार स्थापित अथवा समाप्त किया जा सकता है ?
उत्तर-अनुच्छेद 169 के अनुसार राज्य विधानसभा अपने कुल सदस्यों के बहुमत से उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास करके राज्य में विधानपरिषद् की स्थापना या समाप्ति के लिए संसद् में प्रार्थना कर सकती है। संसद् राज्य विधानसभा के प्रस्ताव के आधार पर कानून बना देगी। परन्तु यहां पर यह स्पष्ट नहीं है कि क्या राज्य विधानसभा द्वारा विधानपरिषद् की समाप्ति के प्रस्ताव के अनुसार संसद् के लिए कानून बनाना अनिवार्य है या नहीं। यह समस्या 1970 में उत्पन्न हुई थी। 1970 में बिहार विधानसभा ने विधानपरिषद् को समाप्त करने के सम्बन्ध में प्रस्ताव पास किया, परन्तु संसद् ने इस प्रस्ताव के आधार पर कोई कानून नहीं बनाया। 24 नवम्बर, 1970 को लोकसभा के स्पीकर सरदार गुरदियाल सिंह ढिल्लों ने इस बात के स्पष्टीकरण का आदेश दिया। 8 दिसम्बर, 1970 को कानून मन्त्री के० हनुमंतय्या ने लोकसभा में कहा कि विधानसभा के प्रस्ताव के आधार पर कानून बनाना संसद् की इच्छा पर निर्भर करता है। 7 अप्रैल, 1993 को पंजाब विधानसभा ने पंजाब में दुबारा से विधानपरिषद् की स्थापना के लिए एक प्रस्ताव पास किया। इस प्रस्ताव द्वारा जब केन्द्र कानून का निर्माण करेगा उस समय पंजाब विधानपरिषद् की पुनः स्थापना हो जाएगी।

प्रश्न 11. राज्य विधानमण्डल की शक्तियों पर कोई चार सीमाएं बताएं।
उत्तर-राज्य विधानमण्डल की शक्तियों पर निम्नलिखित सीमाएं हैं-

  1. राज्य विधानमण्डल एक ऐसी संस्था है जिसके पास पूर्ण अधिकार नहीं है क्योंकि ये संविधान में संशोधन नहीं कर सकते।
  2. कई ऐसे बिल भी हैं जो राष्ट्रपति की मंजूरी के बिना विधानमण्डल में पेश नहीं किए जा सकते। उदाहरणस्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की स्वतन्त्रता पर रोक लगाने के विषय में बिल, व्यापार और वाणिज्य पर प्रतिबन्ध लागने वाले बिल आदि।
  3. विधानमण्डलों द्वारा पास किए कुछ बिलों को राज्यपाल राष्ट्रपति के विचार के लिए रख सकता है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बिना ये बिल पास नहीं हो सकते।
  4. संसद् राज्य सूची में लिखित विषयों के बारे में कानून बना सकती है। यह तभी होता है जब राज्यसभा इस उद्देश्य का प्रस्ताव पास कर दे कि अमुक विषय राष्ट्रीय महत्त्व का विषय बन गया है।

प्रश्न 12. विधानसभा के स्पीकर का चुनाव तथा कार्यकाल लिखें।
उत्तर-चुनाव-स्पीकर का चुनाव विधानसभा के सदस्यों के द्वारा अपने में से ही किया जाता है। वास्तव में बहुमत दल की इच्छानुसार ही कोई व्यक्ति स्पीकर चुना जा सकता है क्योंकि यदि स्पीकर के पद के लिए मुकाबला होता है तो बहुमत दल का उम्मीदवार ही विजयी होता है।

कार्यकाल-स्पीकर की अवधि 5 वर्ष है। यदि विधानसभा को भंग कर दिया जाए तो स्पीकर अपने पद का त्याग नहीं करता। जून, 1986 में अकाली दल के सुरजीत सिंह मिन्हास पंजाब विधानसभा के स्पीकर चुने गए। अगस्त, 1987 में पंजाब की विधानसभा के भंग होने के बाद भी श्री मिन्हास फरवरी, 1992 तक स्पीकर पद पर बने रहे। स्पीकर को 5 वर्ष की अवधि से पूर्व भी हटाया जा सकता है और स्पीकर स्वयं भी त्याग-पत्र दे सकता है। परन्तु स्पीकर के हटाए जाने का प्रस्ताव विधानसभा में उसी समय पेश हो सकता है जबकि कम-से-कम 14 दिन पहले इस आशय की एक पूर्व सूचना उसे दी जा चुकी हो। हटाए जाने का प्रस्ताव के कारण स्पष्ट होने चाहिएं। यदि नहीं तो प्रस्ताव पेश करने की आज्ञा नहीं भी दी जा सकती। मार्च, 1984 में हरियाणा विधानसभा के स्पीकर तारा सिंह के विरुद्ध भारतीय जनता पार्टी, लोक दल तथा जनता पार्टी ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया परन्तु पास न हो सका। 20 जून, 1995 को उत्तर प्रदेश विधानसभा के स्पीकर धनी राम वर्मा के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास करके उन्हें उनके पद से हटा दिया गया।

प्रश्न 13. विधानसभा और विधानपरिषद् का कार्यकाल बताओ।
उत्तर-विधानसभा का कार्यकाल-विधानसभा का कार्यकाल पांच वर्ष है। इसके सभी सदस्यों का चुनाव एक साथ होता है। राज्यपाल 5 वर्ष से पहले जब चाहे विधानसभा को भंग करके दोबारा चुनाव करवा सकता है। राज्यपाल प्रायः मुख्यमन्त्री की सलाह से विधानसभा को भंग करता है। संकटकाल के समय विधानसभा की अवधि को बढ़ाया भी जा सकता है। यह अवधि एक समय में एक वर्ष के लिए और संकटकाल की स्थिति के समाप्त होने के बाद अधिक-से-अधिक 6 महीने तक बढ़ाई जा सकती है। अवधि बढ़ाने का अधिकार संसद् को है।

विधानपरिषद् का कार्यकाल-विधानपरिषद् एक स्थायी सदन है जिसके सदस्य 6 वर्ष के लिए चुने जाते हैं। परन्तु सभी सदस्य एक साथ नहीं चुने जाते। इसके एक-तिहाई सदस्य प्रति दो वर्ष के पश्चात् अवकाश ग्रहण करते हैं, परन्तु अवकाश ग्रहण करने वाले सदस्य दोबारा चुनाव लड़ सकते हैं। राज्यपाल विधानपरिषद् को भंग नहीं कर सकता है।

प्रश्न 14. विधानसभा के स्पीकर की किन्हीं चार शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-विधानसभा के स्पीकर के पास निम्नलिखित शक्तियां होती हैं-

  1. स्पीकर सदन में शान्ति और व्यवस्था बनाए रखता है।
  2. स्पीकर सभा की कार्यवाही के नियमों की व्याख्या करता है।
  3. स्पीकर वाद-विवाद वाले बिलों पर मतदान करवा कर परिणाम घोषित करता है।
  4. जब किसी विषय के पक्ष और विपक्ष में वोट समान हों तो स्पीकर को निर्णायक मत डालने का अधिकार है।

प्रश्न 15. राज्य में विधानपरिषद् को समाप्त करने के पक्ष में चार तर्क दीजिए।
उत्तर-

  1. विधानपरिषद् के कारण दोनों सदनों में गतिरोध उत्पन्न होने की सम्भावना बनी रहती है।
  2. विधानपरिषद् से खर्चा बढ़ता है जिससे ग़रीब जनता पर बोझ पड़ता है।
  3. दूसरे सदन में प्रायः उन राजनीतिज्ञों को स्थान दिया जाता है जो विधानसभा का चुनाव हार जाते हैं।
  4. विशेष हितों तथा अल्पसंख्यकों को पहले सदन में ही प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. राज्य विधानमण्डल किसे कहते हैं ?
उत्तर-राज्य में संघात्मक सरकार होने के कारण केन्द्र के अतिरिक्त राज्यों में भी कानून बनाने के लिए राज्य विधानमण्डल की व्यवस्था की गई है। कुछ राज्यों में विधानमण्डल के दो सदन हैं और कुछ राज्यों में एक सदन है। राज्य विधानसभा के निम्न सदन को विधानसभा और ऊपरि सदन को विधानपरिषद् कहते हैं।

प्रश्न 2. राज्य विधानमण्डल का सदस्य बनने के लिए कौन-सी योग्यताओं की आवश्यकता है ?
उत्तर-राज्य विधानमण्डल का सदस्य बनने के लिए निम्नलिखित योग्यताएं होनी चाहिएं(1) वह भारत का नागरिक हो। (2) विधानसभा के लिए 25 वर्ष या इससे अधिक और विधान परिषद् के लिए 30 वर्ष या इससे अधिक आयु हो।

प्रश्न 3. विधानसभा की रचना लिखें।
उत्तर-संविधान में विधानसभा के सदस्यों की संख्या निश्चित नहीं की गई बल्कि अधिकतम और न्यूनतम संख्या निर्धारित की गई है। अनुच्छेद 170 (1) के अनुसार विधानसभा के सदस्यों की संख्या 60 से कम और 500 से अधिक नहीं हो सकती। राज्य की विधानसभा की संख्या राज्य की जनसंख्या के आधार पर निश्चित की जाती है। पंजाब की विधानसभा में 117 सदस्य हैं।

प्रश्न 4. विधानसभा का सदस्य बनने के लिए क्या योग्यताएं होनी चाहिएं ?
उत्तर-

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. उसकी आयु 25 वर्ष या इससे अधिक हो।

प्रश्न 5. विधानसभा की दो शक्तियों का वर्णन करो।
उत्तर-

  1.  विधायिनी शक्तियां-विधानसभा को राज्य सूची तथा समवर्ती सूची के सभी विषयों पर कानून बनाने का अधिकार हैं। यदि विधानमण्डल द्वि-सदनीय है तो विधेयक यहां से विधानपरिषद् के पास जाता है।
  2. वित्तीय शक्तियां- राज्य के वित्त पर विधानसभा का ही नियन्त्रण है। धन बिल केवल विधानसभा में ही पेश हो सकते हैं। वित्तीय वर्ष के आरम्भ होने से पहले राज्य का वार्षिक बजट भी इसी के सामने प्रस्तुत किया जाता है।

प्रश्न 6. विधानपरिषद् की रचना लिखें।
उत्तर-किसी भी राज्य को विधानपरिषद् के सदस्यों की संख्या 40 से कम और विधानसभा के 1/3 भाग से अधिक नहीं हो सकती। परन्तु जम्मू-कश्मीर की विधानपरिषद् में कुल 36 सदस्य हैं। विधानपरिषद् में कुल सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से नहीं चुने जाते बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं।

प्रश्न 7. विधानपरिषद् की दो शक्तियों का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर-राज्य की विधानपरिषद् को निम्नलिखित शक्तियां प्राप्त हैं-

  1. विधायिनी शक्तियां-विधानपरिषद् में उन सभी विषयों के सम्बन्ध में साधारण बिल पेश किया जा सकता है, जिनका वर्णन राज्य सूची और समवर्ती सूची में किया गया है।
  2. वित्तीय शक्तियां-धन-बिल विधानपरिषद् में पेश नहीं हो सकता। यह बजट और धन बिल पर विचार कर सकती है परन्तु उसे रद्द नहीं कर सकती। विधानपरिषद् धन बिल को अधिक-से-अधिक 14 दिन तक रोकने की शक्ति रखती है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1. पंजाब में कितने सदनीय विधानमण्डल की व्यवस्था की गई है ?
उत्तर-एक सदनीय।

प्रश्न 2. पंजाब में विधानमण्डल के कितने सदस्य हैं ?
उत्तर-117 सदस्य।

प्रश्न 3. राज्य विधानमण्डल का सदस्य बनने के लिए कितनी आयु होनी चाहिए ?
उत्तर-25 वर्ष।

प्रश्न 4. विधानमण्डल का कोई एक कार्य बताएं।
उत्तर-विधानमण्डल बजट पास करती है।

प्रश्न 5. विधानसभा का सदस्य बनने के लिए कोई एक योग्यता बताएं।
उत्तर-वह भारत का नागरिक हो।

प्रश्न 6. राज्य विधानसभा की कोई एक शक्ति बताएं।
उत्तर-विधानसभा विधानपरिषद् के साथ मिलकर और जहां केवल एक सदन है, वहां विधानसभा अकेले कानून बनाती है।

प्रश्न 7. भारत में उन चार राज्यों के नाम लिखें जहां विधानमण्डल के दो सदन पाए जाते हैं।
उत्तर-बिहार, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश तथा कर्नाटक में विधानमण्डल के दो सदन पाए जाते हैं।

प्रश्न 8. किन्हीं चार राज्यों के नाम लिखें जहां विधानमण्डल का एक सदन पाया जाता है ?
उत्तर-हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश मध्य प्रदेश इत्यादि में विधानमण्डल का एक सदन (विधानसभा) ही पाया ‘जाता है।

प्रश्न 9. विधानपरिषद् के सदस्यों की कोई एक योग्यता बताएं।
उत्तर-वह भारत का नागरिक हो।।

प्रश्न 10. विधानसभा की अवधि कब बढ़ाई जा सकती है ?
उत्तर-विधानसभा की अवधि 5 वर्ष है, परन्तु संकट के समय में इसकी अवधि को बढ़ाया जा सकता है। यह अवधि एक समय में एक वर्ष के लिए और संकटकाल की स्थिति समाप्त होने के बाद अधिक-से-अधिक 6 महीने तक बढ़ाई जा सकती है।

प्रश्न 11. क्या विधानसभा को अवधि से पूर्व भी भंग किया जा सकता है ?
उत्तर-विधानसभा को 5 वर्ष की अवधि से पूर्व भी भंग किया जा सकता है।

प्रश्न 12. राज्य विधानसभा के सदस्यों का चुनाव कैसे होता है ?
उत्तर-विधानसभा के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा वयस्क मताधिकार के आधार पर चुने जाते हैं और भारत के प्रत्येक स्त्री-पुरुष को जिसकी आयु 18 वर्ष या इससे अधिक हो, मत डालने का अधिकार है।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. विधानसभा को ………. तथा समवर्ती सूची के सभी विषयों पर कानून बनाने के लिए बिल पास करने का अधिकार है।
2. विधानसभा के ……….. सदस्यों को राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेने का अधिकार है।
3. विधानसभा के सदस्य विधानपरिषद् में ……… सदस्यों को चुनते हैं।
4. उत्तर प्रदेश में ……………. विधानमण्डल पाया जाता है। 5. विधानपरिषद धन बिल को अधिक-से-अधिक ……… दिनों तक रोक सकती है।
उत्तर-

  1. राज्यसूची
  2. निर्वाचित
  3. 1/3
  4. द्वि-सदनीय
  5. 14.

प्रश्न III. निम्नलिखित में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. स्पीकर विधानसभा के नेता से सलाह करके विधानसभा का कार्यक्रम निर्धारित करता है।
2. धन बिल के सम्बन्ध में विधानसभा एवं विधानपरिषद की शक्तियां समान हैं।
3. विधानसभा कार्यपालिका पर नियन्त्रण रखती है।
4. 30 वर्ष का व्यक्ति ही विधानपरिषद का सदस्य बन सकता है।
5. विधानसभा के सदस्यों का चुनाव जनता द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से होता है।
उत्तर-

  1. सही
  2. ग़लत
  3. सही
  4. सही
  5. ग़लत।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न 1. निम्न में से किस राज्य के विधानसभा के सदस्यों की संख्या सबसे अधिक है?
(क) हरियाणा
(ख) पंजाब
(ग) मध्य प्रदेश
(घ) उत्तर-प्रदेश।
उत्तर-(घ) उत्तर-प्रदेश।

प्रश्न 2. विधानसभा को शक्तियां प्राप्त हैं-
(क) विधायिनी शक्तियां
(ख) वित्तीय शक्तियां
(ग) कार्यपालिका शक्तियां
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 3. विधानपरिषद का सदस्य बनने के लिए क्या होना चाहिए-
(क) वह भारत का नागरिक हो।
(ख) उसकी आयु 30 वर्ष होनी चाहिए।
(ग) वह किसी सरकारी लाभदायक पद पर असीन न हो।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 4. विधानसभा के स्पीकर का चुनाव कौन करता है ?
(क) राज्यपाल
(ख) मुख्यमंत्री
(ग) राष्ट्रपति
(घ) विधानसभा के सदस्य।
उत्तर-(घ) विधानसभा के सदस्य।