Class 12 Political Science Solutions Chapter 10 जनमत

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. लोकमत का क्या अर्थ है ? इसकी मुख्य विशेषताओं की चर्चा कीजिए।
(What is meant by Public Opinion ? Discuss its main characteristics.)
अथवा
जनमत की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करो। (Explain the main characteristics of Public Opinion.)
उत्तर-लोकतन्त्र सरकार को प्रायः लोकमत राज्य भी कहा जाता है। जो सरकार लोकमत के अनुसार काम नहीं करती, वह बहुत समय तक नहीं चल सकती। इसका कारण यह है कि लोकतन्त्रीय राज्य में सर्वोच्च शक्ति जनता के हाथों में होती है। रूसो (Rousseau) के शब्दों में, “जनता की आवाज़ वास्तव में भगवान् की आवाज़ होती है।” यदि लोगों का सरकार के प्रति विश्वास न रहे तो बड़ी-से-बड़ी शक्ति भी सरकार को अस्तित्व में नहीं रख सकती। उदाहरणस्वरूप 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के लोकमत ने पाकिस्तान की सैनिक तानाशाही के विरुद्ध आवाज़ उठाई और बंगला देश के नाम से एक स्वतन्त्र राज्य बन गया। . नेपोलियन (Napolean) जैसे तानाशाह ने भी एक बार कहा था, “एक लाख तलवारों की अपेक्षा मुझे तीन समाचार-पत्रों से अधिक भय है।” _जनमत का अर्थ (Meaning of Public Opinion)-जनमत क्या है ? जनमत सार्वजनिक मामलों पर जनता की राय को कहते हैं। परन्तु किसी भी विषय पर समस्त नागरिक एकमत नहीं हो सकते। समाज के सामने कोई समस्या हो, उसके समाधान के बारे में लोगों के अलग-अलग मत हो सकते हैं और होते हैं। तो क्या ऐसे समाज में राज्य को बहुमत के कार्य करने चाहिएं ? परन्तु बहुमत ‘बहुमत’ है, जनमत नहीं। जनमत के लिए बहुमत का होना काफ़ी नहीं है क्योंकि बहुमत में बहुमत संख्या का अपना दृष्टिकोण रहता है, समस्त राष्ट्र का नहीं। इसलिए केवल बहुमत को जनमत का नाम नहीं दिया जा सकता। जनमत की विद्वानों ने विभिन्न परिभाषाएं दी हैं, जिनमें कुछ निम्नलिखित हैं-

1. लॉर्ड ब्राइस (Lord Bryce) का कहना है कि, “समस्त समाज से सम्बन्धित किसी समस्या पर जनता के सामूहिक विचारों को जनमत कहा जा सकता है।” (“Public opinion is commonly used to denote the aggregate of the views, which men hold regarding matters that effect or interest the community.”)
2. लावेल (Lowell) का कहना है कि, “जनमत बनाने के लिए केवल बहुमत काफ़ी नहीं और सर्वसम्मति आवश्यक नहीं, परन्तु राय ऐसी होनी चाहिए जिससे अल्पसंख्यक वर्ग बेशक सहमत न हों, लेकिन फिर भी वे भय के कारण नहीं बल्कि विश्वास से मानने को तैयार हों।” (“In order that opinion may be public, a majority is not enough and unanimity is not required, but the opinion must be such that while the minority may not share it they feel bound by conviction and not by fear to accept it.”’)
3. कैरोल (Carrol) के अनुसार, “साधारण प्रयोग में जनमत साधारण जनता की मिली-जुली प्रतिक्रिया को कहा जाता है।” (“In its common use it refers to composite reactions of the general public.”)
4. डॉ० बेनी प्रसाद (Dr. Beni Prasad) का कहना है, “केवल उसी राय को वास्तविक जनमत कहा जा सकता है जिसका उद्देश्य जनता का कल्याण हो। हम कह सकते हैं कि सार्वजनिक मामलों पर बहुसंख्यक का वह मत जिसे अल्पसंख्यक भी अपने हितों के विरुद्ध नहीं मानते, जनमत कहलाता है।” (“Opinion may be regarded as truly public, when it is motivated by a regard for the welfare of the whole of the society.”)
5. डॉ० इकबाल नारायण (Dr. Iqbal Narayan) के अनुसार, “जनमत सार्वजनिक मामलों पर जनता का वह मत है, जो किसी समुदाय अथवा वर्ग विशेष का न होकर जन-साधारण का हो। जो किसी क्षणिक आवेश का परिणाम न होकर स्थायी हो और जिसमें लोक कल्याण की भावना निहित हो।” ___ उपर्युक्त दी गई परिभाषाओं के अनुसार भिन्न-भिन्न विद्वान् आपस में एकमत नहीं हैं। परन्तु इनमें कुछ एक बातों पर सहमति होनी आवश्यक है जैसे कि लोकमत के लिए अधिक-से-अधिक लोगों में उस पर सहमति होनी चाहिए। उस प्रस्ताव में समाज के अधिक भाग की भलाई की बात होनी चाहिए। चाहे इस लोकमत की गणना कोई अलग कार्य नहीं, परन्तु फिर भी लोगों में प्रायः किसी बात की सहमति के बारे में एकत्रित होना आवश्यक है।

प्रश्न 2. लोकतन्त्रीय राज्य में जनमत के महत्त्व का वर्णन करें। (Discuss the importance of Public Opinion in a democratic state.)
उत्तर-जनमत का महत्त्व मनुष्य के समाज के अस्तित्व में आने से ही माना जाता है। यह एक मानी हुई बात है
जाती है। आज के लोकतन्त्रीय युग में तो इसकी महानता को और भी अधिक माना जाता है। लोकतन्त्र में राज्य प्रबन्ध सदा लोगों की इच्छानुसार चलता है। अतः प्रत्येक राजनीतिक दल और सरकार चला रहा दल जनमत को अपने पक्ष में करने का यत्न करता है। जिस राजनीतिक दल की विचारधारा लोगों को अच्छी लगती है, लोग उसको शक्ति दे देते हैं। लोकतन्त्र में जनमत का महत्त्व निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट हो जाता है-

1. लोकतन्त्र शासन-प्रणाली में सरकार का आधार जनमत होता है (Public Opinion is the basis of Government in a democratic set up)-सरकार जनता के प्रतिनिधियों द्वारा बनाई जाती है। कोई भी सरकार जनमत के विरुद्ध नहीं जा सकती। सरकार सदैव जनमत को अपने पक्ष में कायम रखने के लिए जनता में अपनी नीतियों का प्रचार करती रहती है। विरोधी दल जनमत को अपने पक्ष में करने का सदैव प्रयत्न करते रहते हैं ताकि सत्तारूढ़ दल को हटा कर अपनी सरकार बना सकें। जो सरकार जनमत के विरोध में काम करती है, वह शीघ्र ही हटा दी जाती है। यदि लोकतन्त्र सरकार जनमत के विरुद्ध कानून पास करती है तो उस कानून को सफलता प्राप्त नहीं होती। वास्तव में लोकतन्त्र में जनमत का शासन होता है। यदि हम जनमत को लोकतन्त्र सरकार की आत्मा कहें तो गलत न होगा।

2. जनमत सरकार की मार्गदर्शक है (Public Opinion is a guide to the Government)-जनमत लोकतन्त्र सरकार का आधार ही नहीं बल्कि जनमत लोकतन्त्र सरकार का मार्गदर्शक भी है। जनमत सरकार को रास्ता दिखाता है कि उसे क्या करना है और किस तरह करना है। सरकार कानूनों का निर्माण करते समय जनमत का ध्यान अवश्य रखती है। यदि सरकार को पता हो कि किसी कानून का जनमत विरोध करेगा तो सरकार ऐसे कानून को वापस ले लेती है। कई बार तो सरकार किसी विशेष समस्या को हल करने से पहले जनमत को जानना चाहती है। जनमत लोकतन्त्र सरकार में अध्यापक की तरह कार्य करता है। जिस प्रकार अध्यापक ‘अपने शिष्यों को रास्ता दिखाता है, उसी प्रकार जनमत लोकतन्त्र को रास्ता दिखाता है।’

3. जनता प्रतिनिधियों की निरंकुशता को नियन्त्रित करता है (Public Opinion checks the Despotism of the Representatives) लोकतन्त्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनकर भेजती है और जनमत जिस दल के पक्ष में होता है, उसी दल की सरकार बनती है। कोई भी प्रतिनिधि अथवा मन्त्री अपनी मनमानी नहीं कर सकता। उन्हें सदैव जनमत का डर रहता है। प्रतिनिधि को पता होता है कि यदि जनमत उसके विरुद्ध हो गया तो वह चुनाव नहीं जीत सकेगा। इसलिए प्रतिनिधि सदा जनमत के अनुसार कार्य करता है। इस प्रकार जनमत प्रतिनिधियों को तथा सरकार को मनमानी करने से रोकता है।

4. कानून निर्माण में सहायक (Helpful in Law-making)-लोकतन्त्र में कानून निर्माण में जनमत का महत्त्वपूर्ण हाथ होता है। विधानमण्डल कानूनों का निर्माण करते समय जनमत को अवश्य ही ध्यान में रखता है। कोई भी लोकतान्त्रिक सरकार ऐसा कोई कानून नहीं बना सकती जो जनमत के विरुद्ध हो। जो कानून जनमत के विरुद्ध होता है, उसकी जनता द्वारा अवहेलना की जाती है। कई बार विधानमण्डल कानून बनाने से पहले या किसी विधेयक को पास करने से पहले उस पर जनमत जानने के लिए उसे समाचार-पत्रों में प्रकाशित करता है। जनमत जानने के पश्चात् विधेयक में आवश्यक परिवर्तन किए जाते हैं।

5. नीति-निर्माण में सहायक (Helpful in Policy-making) सरकार गृह और विदेश नीति निर्माण करते समय जनमत से बहुत अधिक प्रभावित होती है। सरकार देश की आन्तरिक समस्याओं जैसे कि बेरोजगारी, ग़रीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार आदि को हल करने के लिए नीति-निर्माण करती है और नीति-निर्माण करते समय सरकार जनमत को अवश्य ध्यान में रखती है। सरकार दूसरे देशों के साथ सम्बन्ध स्थापित करते समय, महान् शक्तियों के प्रति दृष्टिकोण अपनाते समय तथा संयुक्त राष्ट्र संघ और अन्य विश्व संस्थाओं में भूमिका निभाते समय जनमत को ध्यान में रखती है। जनमत के विरुद्ध सरकार किसी नीति का निर्माण नहीं करती।

6. जनमत सरकार का उत्साह बढ़ता है (Public Opinion encourages the Govt.)-जब प्रतिनिधि सरकार कोई अच्छा कार्य करती है तो जनता उस सरकार को प्रोत्साहन देती है। जब इन्दिरा सरकार ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया तो जनमत ने सरकार को उत्साहित किया कि वह ऐसे ही और कार्य करे जिससे समाज की भलाई हो।

7. जनमत अधिकारों की रक्षा करता है (Public Opinion protects the Rights)-लोकतन्त्र शासन प्रणाली में नागरिकों को सामाजिक तथा राजनीतिक अधिकार प्राप्त होते हैं। इन अधिकारों की रक्षा जनमत के द्वारा की जाती है। जनमत सरकार को ऐसा कानून नहीं बनाने देता जिससे जनता के अधिकारों में हस्तक्षेप हो। जब सरकार कोई ऐसा कार्य करती है जिससे जनता की स्वतन्त्रता समाप्त हो तो जनमत उस सरकार की आलोचना करता है और लोकतन्त्र में कोई भी सरकार जनमत की आलोचना का सामना करने को तैयार नहीं होती।

8. यह सरकार को दृढ़ बनाता है (It makes the Government Strong)-जनमत से सरकार को बल मिलता है और वह दृढ़ बन जाती है। जब सरकार को यह विश्वास हो कि जनमत उनके साथ है तो वह मज़बूती से अपनी नीतियों को लागू कर सकती है और प्रगतिशील काम भी कर सकती है।

9. सामाजिक क्षेत्र में जनमत का महत्त्व (Its importance in Social Field)—प्रत्येक समाज में कुछ बुराइयां पाई जाती हैं और सरकार केवल कानून निर्माण द्वारा उन बुराइयों को दूर नहीं कर सकती। सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए जनमत की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। भारत में आज अनेक सामाजिक बुराइयां पाई जाती हैं जैसे कि दहेज प्रथा, छुआछूत, जातिवाद, सती प्रथा आदि। ये बुराइयां तब तक समाप्त नहीं हो सकती जब तक इनके लिए जनमत तैयार नहीं किया जाता। सरकार जनमत से प्रेरणा लेकर ही इन बुराइयों के विरुद्ध जंग छेड़ती है।

10. अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में जनमत का महत्त्व (Importance of Public Opinion in International Field)आधुनिक युग न केवल लोकतन्त्र का युग है बल्कि अन्तर्राष्ट्रीयवाद का युग है। कोई भी देश जनमत की अवहेलना नहीं कर सकता और जनमत अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि कोई देश मानव अधिकारों का उल्लंघन करता है और अपने नागरिकों पर अत्याचार करता है तो इसमें विश्व जनमत उस देश के विरुद्ध हो जाता है और उस देश को अपनी नीति बदलने के लिए मजबूर कर देता है। आज शक्तिशाली राज्य भी विश्व जनमत की अवहेलना करने की हिम्मत नहीं करता क्योंकि कोई भी राज्य यह नहीं चाहता है कि विश्व जनमत उसके विरुद्ध हो जाए। अफ़गानिस्तान से सोवियत संघ की सेना की वापसी इस बात का सबूत है। विश्व जनमत ने सोवियत संघ को ऐसा करने के लिए मजबूर कर दिया था।

निष्कर्ष (Conclusion)-संक्षेप में, लोकतन्त्र शासन प्रणाली में जनमत का विशेष महत्त्व है। सरकार का आधार जनमत ही होता है जो सरकार को रास्ता दिखाता है। सरकार जनमत की अवहेलना नहीं कर सकती और यदि करती है तो आने वाले चुनावों में उसे हटा दिया जाता है। इसलिए कहा जाता है कि लोकतन्त्र के लिए एक सचेत जनमत पहली आवश्यकता है। (An alert and enlightened public opinion is the first essential of democracy.)

प्रश्न 3. जनमत से क्या अभिप्राय है ? जनमत के निर्माण में राजनीतिक दल, शिक्षा संस्थाएं व आधुनिक श्रव्य-दृश्य (बिजली) साधन क्या भूमिका निभा सकते हैं ? .
(What do you understand by word-Public Opinion ? What is the role performed by Political Parties, educational institutions and modern Audio-visual (Electrical) media in forming in Public Opinion ?)
अथवा
जनमत के निर्माण और अभिव्यक्ति के साधनों का वर्णन करो। (Explain the means of the formation and expression of Public Opinion.)
उत्तर-जनमत के निर्माण में कई साधन भाग लेते हैं और जनमत कई साधनों द्वारा प्रकट होता है। जनमत कैसे बनता है, इसके बारे में लॉर्ड ब्राइस (Lord Bryce) बताते हैं कि समाज में तीन प्रकार के लोग होते हैं जो कि जनमत के बनने और सामने आने में सहायता करते हैं जैसे कि (क) जो जनमत को उत्पन्न करते हैं, (ख) जो इसको परिवर्तित करते हैं और (ग) जो इसको उतारते हैं। प्रथम प्रकार में तो बहुत कम लोग जैसे संसद् के प्रतिनिधि और पत्रकार आदि ही आते हैं। यह अपने इर्द-गिर्द की घटनाओं का अध्ययन करते हैं और विचारानुसार लोगों के सामने रखते हैं। यह अपने विचारों को प्रेस और राज्यों द्वारा दर्शाते हैं। दूसरी प्रकार के लोगों में वे व्यक्ति आते हैं जो राजनीतिक और सामाजिक कार्यों में बहुत रुचि रखते हैं। इस प्रकार के लोग देश में हो रही घटनाओं को अख़बार और वाद-विवाद के स्रोतों से पहचानते हैं और अपने ज्ञानानुसार उनकी अभिव्यक्ति करते हैं। तीसरी प्रकार में वे लोग आते हैं जो कि ऊपरिलिखित दोनों प्रकारों में नहीं आते। इस श्रेणी में सबसे अधिक लोग आते हैं। ये लोग अखबार तथा दूसरा साहित्य आदि पढ़ने में कम रुचि रखते हैं। ये लोग जलसों और नारों आदि से बहुत प्रभावित होते हैं। ये लोग किसी भी विचारधारा की आलोचना नहीं करते बल्कि हर प्रकार की विचारधारा मानने में विश्वास रखते हैं।

एक सफल लोकतन्त्र में यह आवश्यक है कि दूसरी प्रकार के लोग अधिक होने चाहिएं। ये लोग अखबारों और नई-नई समस्याओं के साथ अधिक सम्बन्धित होते हैं। इस प्रकार ये लोग देश में हो रही भिन्न-भिन्न घटनाओं का आलोचनात्मक अध्ययन करते हैं और ठीक रूप से और उचित रूप से अपना मत बनाकर जनता के सम्मुख प्रस्तुत करते हैं और तीसरी प्रकार के लोगों को प्रभावित करते हैं।

एक अच्छा और स्वस्थ जनमत बनाने के लिए आवश्यक है कि नागरिक पढ़े-लिखे हों और राजनीतिक मामलों में अधिक-से-अधिक रुचि रखते हों। भारत में इस प्रकार के लोग बहुत कम संख्या में हैं और भारतीय जनमत के विकास में यह एक बड़ी बाधा है। लोकतन्त्रीय सरकारें चाहे सफल हैं या असफल परन्तु जनमत का इसमें महत्त्वपूर्ण स्थान है।

जनमत के उत्थान के लिए वर्तमान युग में निम्नलिखित साधन हैं –

1. प्रैस (Press)-जनमत प्रकट करने तथा जनमत निर्माण करने में प्रेस का महत्त्वपूर्ण हाथ है। प्रैस का अर्थ छापाखाना नहीं बल्कि प्रैस से अभिप्रायः वे सभी प्रकाशित साधन हैं जिनके द्वारा मत प्रकट किए जाते हैं जैसे कि समाचार-पत्र, पत्रिकाएं, पुस्तकें । समाचार-पत्र दैनिक भी होते हैं, साप्ताहिक भी और मासिक भी। लोकतन्त्र के निर्माण में समाचार-पत्र महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। गैटेल (Gettell) का कहना है, “समाचार-पत्र सम्पादकीय लेखों और समाचारों द्वारा अपने विचार प्रकट करते हैं और अनेक तथ्यों पर टिप्पणियां करते हैं। यदि लोगों के सामने तथ्य ठीक प्रकार से और निष्पक्षता के साथ रखे जाएं तो समाचार-पत्र लोगों को दैनिक समस्याओं से परिचय करने में अमूल्य सेवा करते हैं।” समाचार-पत्र निम्नलिखित तरीकों द्वारा सार्वजनिक मामलों पर जनमत तैयार करते हैं-

(1) समाचार-पत्र जनता को दैनिक घटनाओं और समाचारों से परिचित रखता है। समाचार-पत्रों में देशविदेश में कहीं भी घटी घटनाओं का वर्णन होता है। देश की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक समस्याओं, उनके समाधान के बारे में विभिन्न नेताओं के विचारों, सरकार की नीतियों और कार्यों की जानकारी समाचार-पत्रों की सहायता से मिल जाती है।

(2) समाचार-पत्र और पत्रिकाएं सरकार के कार्यों पर टीका-टिप्पणी करते हैं और उसके कार्यों की प्रशंसा तथा आलोचना करते हैं। सम्पादकीय लेखों से शिक्षित जनता को अपना मत बनाने में सहायता मिलती है।

(3) समाचार-पत्र सरकार की गलत नीतियों की आलोचना करते हैं ताकि लोग सरकार को अपनी नीतियां बदलने के लिए मजबूर कर सकें।

(4) समाचार-पत्र प्रचार का भी मुख्य साधन है। राजनीतिक नेता प्रायः प्रैस सम्मेलन बुलाते हैं, जहां वे देश-विदेश की विभिन्न समस्याओं पर अपने विचार प्रेस प्रतिनिधियों के सामने रखते हैं।

(5) समाचार-पत्र लोगों की शिकायतें सरकार तक पहुंचाते हैं। जनता क्या चाहती है, उसकी क्या इच्छा है ? इन समस्याओं के बारे में उसकी क्या राय है ? उसे कैसा कानून चाहिए ? इन सब बातों को सरकार तक पहुंचाने का काम भी समाचार-पत्र ही सम्पादित करते हैं। सरकार की नीति और उसके कार्यों की जानकारी समाचार-पत्रों द्वारा ही जनता तक पहुंचाई जाती है।

(6) समाचार-पत्र जनमत को शिक्षित, सुचेत तथा संगठित करते हैं।

2. सार्वजनिक सभाएं (Public Meetings) सार्वजनिक सभाएं जनमत निर्माण में महत्त्वपूर्ण साधन हैं। सत्तारूढ़ दल सरकार की नीतियों का प्रचार करने के लिए सार्वजनिक सभाओं का सहारा लेते हैं। मन्त्री अपनी नीतियों की प्रशंसा करते हैं और जनमत को अपने पक्ष में कायम करने का प्रयत्न करते हैं जबकि विरोधी दल इन सभाओं में सरकार की कड़ी आलोचना करते हैं और सरकार की नीतियों के बुरे प्रभावों को जनता के सम्मुख रखते हैं। सार्वजनिक सभाएं अनपढ़ व्यक्तियों को बहुत प्रभावित करती हैं क्योंकि अनपढ़ व्यक्ति समाचार-पत्र अथवा पुस्तक इत्यादि नहीं पढ़ सकता। अनपढ़ व्यक्ति लीडरों के भाषण सुनकर अपनी राय बनाता है। सार्वजनिक सभाओं के द्वारा जनमत प्रकट होता है।

3. राजनीतिक दल (Political Parties) लोकतन्त्र सरकार में राजनीतिक दलों का बहुत महत्त्व होता है। वास्तविकता यह है कि बिना राजनीतिक दलों के लोकतन्त्र सरकार चल ही नहीं सकती। राजनीतिक दलों का उद्देश्य सरकार पर नियन्त्रण करना होता है ताकि अपने सिद्धान्तों को लागू कर सके। राजनीतिक दल सरकार की सत्ता को तभी नियन्त्रित कर सकते हैं जब जनमत उनके पक्ष में हो। इसलिए प्रत्येक राजनीतिक दल जनमत को अपने पक्ष में करने का प्रयत्न करता है। राजनीतिक दल समाचार-पत्रों द्वारा सार्वजनिक सभाओं द्वारा, रेडियो द्वारा तथा घर-घर जाकर अपने सिद्धान्तों का प्रचार करते हैं। देश की समस्याओं पर अपने विचार जनता को बताते हैं। चुनाव के दिनों में तो विशेषकर राजनीतिक दल अपने सिद्धान्तों का प्रचार करते हैं और अपने सिद्धान्तों से जनता को सहमत करवाने का यत्न करते हैं ताकि अधिक वोट प्राप्त कर सकें।

4. रेडियो और टेलीविज़न (Radio and Television)-आधुनिक युग में जनमत के निर्माण में रेडियो और टेलीविज़न महत्त्वपूर्ण साधन हैं। रेडियो और टेलीविज़न जनता का मनोरंजन ही नहीं करते बल्कि जनता को देश की समस्या से भी अवगत कराते हैं। राजनीतिक दलों के नेता तथा बड़े-बड़े विद्वान् अपने विचारों को रेडियो द्वारा जनता तक पहुंचाते हैं। अनपढ़ व्यक्ति रेडियो तथा टेलीविज़न द्वारा काफ़ी प्रभावित होते हैं।

5. विधानमण्डल (Legislature)-विधानमण्डल जनमत के निर्माण तथा प्रकट करने का महत्त्वपूर्ण साधन है। विधानमण्डल के सदस्य विभिन्न समस्याओं पर अपने विचार प्रकट करते हैं। वाद-विवाद के पश्चात् कानूनों का निर्माण किया जाता है। विरोधी दल के सदस्य और कई बार सत्तारूढ़ दल के सदस्य सरकार के कार्यों की आलोचना करते हैं, मन्त्रियों से प्रश्न पूछे जाते हैं जिनके उन्हें उत्तर देने पड़ते हैं। विधानमण्डल में जब बजट पेश होता है तब सरकार के प्रत्येक विभाग की कड़ी आलोचना की जाती है। विधानमण्डल की समस्त कार्यवाही समाचार-पत्रों में प्रकाशित होती है जिनको पढ़कर जनता अपने मत का निर्माण करती है।

6. शिक्षा संस्थाएं (Education Institutions)—आज के विद्यार्थी कल के नागरिक हैं। विद्यार्थी अपने मत का निर्माण प्रायः अपने अध्यापकों के विचारों को सुनकर करते हैं। स्कूलों और कॉलेजों में इतिहास, नागरिक शास्त्र, अर्थशास्त्र आदि अनेक विषय पढ़ाए जाते हैं, जिससे विद्यार्थियों के विचारों पर बहुत प्रभाव पड़ता है। नागरिक शास्त्र के अध्यापक विशेषकर पढ़ाते समय सरकार के कार्यों के उदाहरण देते हैं और कई अध्यापक सरकार की कड़ी आलोचना करते हैं और अपने विचारों को प्रकट करते हैं। अध्यापकों के विचारों का विद्यार्थी के मन पर बहुत प्रभाव पड़ता है।

7. चुनाव (Election)-लोकतन्त्र में चार-पांच वर्ष पश्चात् चुनाव होते रहते हैं। चुनावों के समय राजनीतिक दल देश की समस्याओं को जनता के सामने प्रस्तुत करते हैं और अपने सिद्धान्तों का प्रचार करते हैं। प्रत्येक उम्मीदवार चुनाव जीतने के लिए जनता को अधिक-से-अधिक प्रभावित करने का यत्न करता है। स्वतन्त्र उम्मीदवार तथा राजनीतिक दल सार्वजनिक सभाओं द्वारा समाचार-पत्रों द्वारा अपने विचारों का प्रचार करते हैं। आजकल तो चुनाव के समय उम्मीदवार तथा उसके समर्थक घर-घर जाकर नागरिकों को अपने विचारों को बताते हैं। इश्तिहार छपवाकर सड़कों तथा गलियों में लगवाए जाते हैं। इस प्रकार चुनाव जनमत के निर्माण में महत्त्वपूर्ण साधन है।

8. सिनेमा (Cinema) सिनेमा भी जनमत निर्माण करने में महत्त्वपूर्ण साधन है। सरकार चल-चित्रों (News Reels) द्वारा देश की विभिन्न समस्याओं के सम्बन्ध में जनता को शिक्षित करती है।

9. धार्मिक संस्थाएं (Religious Institutions) धर्म का राजनीति पर बहुत प्रभाव पड़ता है। विभिन्न धार्मिक संस्थाएं समाज की बुराइयों को जनता के सामने पेश करती हैं और उन बुराइयों को समाप्त करने के लिए जनमत को तैयार करती हैं।

10. साहित्य (Literature)-साहित्य भी लोकमत के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। महान् लेखकों एवं विद्वानों के विचारों को जनता बड़े उत्साह से पढ़ती है जिसका आम जनता पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।

11. अन्य संस्थाएं (Other Institutions)-ऊपरिलिखित भिन्न-भिन्न साधनों के अतिरिक्त और भी बहुत-सी संस्थाएं हैं, जो जनमत के उत्थान में अपना भाग डालती हैं। कई बार विशेष समस्या के उत्पन्न होने से भी उसके समाधान के लिए कई प्रकार के गुट अस्तित्व में आ जाते हैं। ये लोगों में अपने विचारों का प्रचार करते हैं और सरकार को कई प्रकार के प्रार्थना-पत्र आदि भेजते हैं। वह सरकार का ध्यान उन समस्याओं की ओर आकर्षित करने की चेष्टा करते हैं। इसकी कार्यवाहियों को समाचार-पत्रों और सार्वजनिक सभाओं द्वारा प्रसारित किया जाता है। कई बार ये गुट बड़ी राजनीतिक पार्टियों से जनता को झंझोड़ने में अधिक सफल हो जाते हैं और जनता के विचारों को प्रभावित करते हैं। इनको आजकल हम ‘दबाव समूह’ (Pressure Groups) भी कहते हैं।
अतः ऊपरलिखित सभी संस्थाएं जनमत के प्रचार में बढ़-चढ़ कर भाग लेती हैं।

प्रश्न 4. लोकमत के निर्माण के रास्ते में आने वाली रुकावटों का वर्णन करो। (Explain the hindrances in the way of formation of Public Opinion.)
अथवा
जनमत के निर्माण के मार्ग में बाधाओं का वर्णन करो। (Explain the hindrances in the way of the formation of Public Opinion.)
उत्तर-लोकतन्त्र शासन प्रणाली का आधार जनमत है। जिस दल के पक्ष में जनमत होता है, उसी दल की सरकार बनती है। पर लोकतन्त्र सरकार की सफलता और समाज की भलाई के लिए यह आवश्यक है कि जनमत शुद्ध हो । यदि जनमत शुद्ध न होगा तो लोकतन्त्र सरकार का आधार भी गलत होगा। शुद्ध जनमत के निर्माण में निम्नलिखित बाधाएं आती हैं-

1. अनपढ़ता एवं अज्ञानता (Imliteracy and Ignorance)-अनपढ़ता तथा अज्ञानता शुद्ध जनमत के निर्माण में बहुत बड़ी रुकावट है। अनपढ़ता और अज्ञानता के फलस्वरूप जनता की सोचने की शक्ति तथा मनोवृत्ति संकुचित हो जाती है। अनपढ़ नागरिक अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों को भली-भान्ति नहीं जानते। वे अपनी समस्याओं को समझ नहीं पाते तो वे सार्वजनिक समस्याओं पर क्या विचार करेंगे ? आधुनिक राज्य की समस्याएं बहुत जटिल हैं जिन्हें अनपढ़ व्यक्ति समझ नहीं सकता और न ही उनमें उन समस्याओं के बारे में सोचने की शक्ति होती है। अनपढ़ व्यक्ति शीघ्र ही अपने नेताओं के भड़कीले भाषण में आ जाता है और भावनाओं के आधार पर अपने मत का निर्माण कर लेता है। जिस देश की अधिकांश जनता अनपढ़ एवं अज्ञानी है वहां पर स्वस्थ जनमत का निर्माण नहीं हो सकता।

2. पक्षपाती प्रैस (Partial Press)-जो प्रैस पार्टियों द्वारा अथवा पूंजीपतियों द्वारा चलाए जाते हैं वे निष्पक्ष नहीं होते। ऐसे प्रैस सदा अपनी पार्टियों की प्रशंसा करते रहते हैं और दूसरी पार्टियों की निन्दा करते रहते हैं। ऐसे प्रैसों के समाचार-पत्रों में झूठी खबरें छपती रहती हैं जिससे साधारण जनता गुमराह हो जाती. है। पक्षपाती प्रैस देश का हित न सोचकर साम्प्रदायिकता की भावना को उत्साहित करते रहते हैं। भारत में ऐसे कई प्रैस हैं जो समस्त समाज का हित न सोचकर अपने सम्प्रदाय के हित के लिए उचित-अनुचित समाचार छापते हैं।

3. निर्धनता (Poverty)-निर्धनता भी शुद्ध जनमत के निर्माण में बहुत बड़ी बाधा है। निर्धन व्यक्ति को सदा रोटी की चिन्ता रहती है और इन्हीं उलझनों में फंसा रहता है। जिससे उसे समाज तथा देश की समस्याओं पर विचार करने का समय नहीं मिलता। एक भूखा व्यक्ति रोटी की खातिर अपने देश का अहित भी करने के लिए तैयार हो जाता है। वह अपने वोट को बेच देता है। निर्धन व्यक्ति का अपना कोई मत नहीं होता।

4. आलस्य और उदासीनता (Indolence and Indifference)-आलस्य और उदासीनता भी शुद्ध जनमत निर्माण में रुकावट डालते हैं। यदि किसी देश के नागरिक आलसी और सार्वजनिक समस्याओं के प्रति उदासीन हों तो शुद्ध जनमत का निर्माण नहीं हो पाता। भारत के नागरिक बहुत आलसी हैं। वे वोट डालने के लिए भी जाने के लिए तैयार नहीं होते। साधारण नागरिक यह सोचता है कि यदि वह वोट न डालेगा तो क्या अन्तर पड़ेगा, जिसने चुनाव जीतना है वह जीत ही जाएगा। अतः नागरिकों में राजनीतिक चेतना का अभाव शुद्ध जनमत के निर्माण में बाधा है।

5. रूढ़िवादिता (Conservatism)-रूढ़िवादिता से अभिप्रायः है पुरानी घिसी-पिटी परम्पराओं का पालन करते जाना। रूढ़िवादिता प्रगतिशील दृष्टिकोण के मार्ग में बहुत बड़ी बाधा है। रूढ़िवादी सामाजिक बुराइयों को दूर करने का प्रयास नहीं करते और अन्य लोगों को सुधार करने से रोकते हैं। अत: वे सामाजिक परिस्थितियों को आर्थिक दृष्टिकोण से नहीं समझते जिस कारण एक निष्पक्ष और बौद्धिक जनमत के निर्माण में बाधा उत्पन्न होती है। ___6. गलत सिद्धान्तों पर आधारित राजनीतिक दल (Political Parties based on wrong Principles)जो राजनीतिक दल आर्थिक सिद्धान्तों और राजनीतिक सिद्धान्तों पर आधारित न होकर धर्म या जाति पर आधारित होते हैं, वे शुद्ध जनमत के निर्माण में बाधा डालते हैं। ऐसे राजनीतिक दल देश के हित की परवाह न करके अपनी जाति या सम्प्रदाय के लिए गलत बातों का प्रचार करते रहते हैं और एक सम्प्रदाय में दूसरे सम्प्रदाय के विरुद्ध नफरत की भावना पैदा करते रहते हैं। इन दलों से प्रभावित जनता शुद्ध जनमत का निर्माण नहीं कर सकती।

7. दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली (Defective Education System)—जिन देशों में दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली होती है वहां पर भी शुद्ध जनमत का निर्माण नहीं होता है। यदि स्कूल-कॉलेजों में धर्म पर आधारित शिक्षा दी जाए और विद्यार्थियों के दिलों में साम्प्रदायिकता की भावना को भर दिया जाए तो विद्यार्थी नागरिक बनकर प्रत्येक समस्या को धर्म अथवा सम्प्रदाय की दृष्टि से सुलझाना चाहेंगे जिससे शुद्ध जनमत का निर्माण नहीं हो सकेगा।

8. निरंकुश सरकार (Autocratic Governments)-लोकराज के उत्थान में निरंकुश सरकारें भी बाधा बनती हैं क्योंकि निरंकुश सरकारों में व्यक्तियों को विचार प्रकट करने और प्रेस की स्वतन्त्रता नहीं होती। यह केवल उन्हीं विचारों को प्रकट कर सकते हैं जो सरकार या शासकों के पक्ष में हों। शासकों के विरुद्ध मुंह खोलने की स्वतन्त्रता नहीं होती। व्यक्तियों को अपने विचारों को दबाना पड़ता है। ठीक जनमत के उत्थान के लिए लोकराज्यीय सरकारें बहुत सहायक होती हैं क्योंकि लोकराज्यीय सरकारों में वह सब वातावरण मिलता है जो शुद्ध जनमत के उत्थान के लिए आवश्यक है। निरंकुश सरकारों में प्रचार के सब साधनों पर सरकार का नियन्त्रण होता है।

9. अधिकारों और स्वतन्त्रताओं की अनुपस्थिति (Absence of Right and Liberties)-जहां लोगों को अधिकारों और स्वतन्त्रताओं की प्राप्ति नहीं है वहां भी जनमत का उत्थान करना सम्भव नहीं होता। अधिकार और स्वतन्त्रताएं एक ऐसा वातावरण उत्पन्न करते हैं जिनके अनुसार व्यक्ति अपने विचारों का ठीक प्रसार कर सकता है। यदि लोगों के विचारों को दबाया जाए और स्वतन्त्रता के साथ सोचने की स्वतन्त्रता न हो तो जनमत भी शुद्ध नहीं बन सकेगा। लोगों को ठीक विचारों का पता नहीं लग सकेगा और न ही वे ठीक रूप से सरकार की आलोचना ही कर सकेंगे। और वे गलत धारणाएं बना लेंगे। जितनी गलत धारणाएं बनेंगी उतना ही गलत जनमत तैयार होगा।

10. सामाजिक असमानता (Social Inequality)-समाज में सामाजिक असमानताएं भी जनमत के मार्ग में बाधा बनती हैं। सामाजिक असमानता वाले देशों में लोगों के मध्य जाति-पाति, धर्म, रंग, नस्ल के आधार पर भेदभाव किए जाते हैं। कुछ लोगों को नीचा समझा जाता है ओर कुछ व्यक्ति समाज में शेष लोगों से ऊंचे होते हैं। ऊंचे व्यक्ति निम्न व्यक्तियों पर अपना नियन्त्रण रखते हैं और अपने विचारों को निम्न के विचारों पर ठोंसते हैं। ऐसी दशा में तैयार किया गया जनमत कभी भी शुद्ध और निष्पक्ष नहीं हो सकता।

ऊपरिलिखित शुद्ध जनमत की बाधाओं को पढ़कर हम इस परिणाम पर पहुंचते हैं कि ठीक जनमत के उत्थान के लिए एक विशेष प्रकार के जनमत की आवश्यकता है। ऐसा वातावरण तभी तैयार हो सकता है यदि ऊपरिलिखित सब बाधाओं को दूर करने का यत्न किया जाए। शुद्ध जनमत लोकराज्यीय सरकार का प्राण है क्योंकि लोकराज्यीय सरकार जनमत पर ही आधारित होती है। यदि जनमत गलत और अशुद्ध है तो स्वाभाविक ही है कि नीतियां भी ठीक नहीं होंगी और राज्य प्रबन्ध भी ठीक नहीं होगा।

प्रश्न 5. स्वस्थ लोकमत के निर्माण के लिए कौन-सी शर्ते आवश्यक हैं ? (What conditions are essential for the formulation of Sound Public Opinion ?)
उत्तर- शुद्ध जनमत के निर्माण के लिए विशेष अवस्थाओं की आवश्यकता होती है। शुद्ध जनमत के निर्माण में जो बाधाएं आती हैं, उनको दूर करके ही अवस्थाओं को उत्पन्न किया जा सकता है। शुद्ध जनमत के निर्माण के लिए अग्रलिखित अवस्थाएं आवश्यक हैं

1. शिक्षित जनता (Educated People)-शुद्ध जनमत के निर्माण के लिए जनता का होना आवश्यक है। शिक्षित नागरिक देश की समस्याओं को समझ सकता है और वह नेताओं के भड़कीले भाषणों को सुनकर अपने मत का निर्माण नहीं करता। वह सच, झूठ में अन्तर कर सकता है और वह प्रत्येक तर्क से काम लेता है। शिक्षित नागरिक देश की समस्याओं को सुलझाने के लिए अपने सुझाव भी दे सकता है अतः सरकार को चाहिए कि वह नागरिकों को शिक्षित करे।

2. निष्पक्ष प्रेस (Impartial Press)—शुद्ध जनमत के निर्माण के लिए निष्पक्ष प्रेस का होना आवश्यक है। प्रेस दलों और पूंजीपतियों से स्वतन्त्र होने चाहिएं ताकि सच्चे समाचार दे सकें और सरकार के अच्छे कार्यों की प्रशंसा कर सकें। सरकार का प्रेस पर कोई नियन्त्रण नहीं होना चाहिए ताकि प्रेस स्वतन्त्रतापूर्वक काम कर सके और सरकार बुरे कार्यों की आलोचना कर सके। पर सरकार को उन प्रेसों को बन्द कर देना चाहिए जो धर्म अथवा जाति पर आधारित होते हैं या जो पूंजीपतियों के हाथों की कठपुतली होते हैं। शुद्ध जनमत के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि प्रेस ईमानदार, निष्पक्ष और साम्प्रदायिक भावनाओं से ऊपर हों।

3. गरीबी का अन्त (End of Poverty)-शुद्ध जनमत के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि गरीबी का अन्त किया जाए। गरीब व्यक्ति, जिसे 24 घण्टे रोटी की चिन्ता रहती है, देश की समस्याओं पर नहीं सोच सकता। भूखा व्यक्ति उसी उम्मीदवार को अच्छा मानता है जो उसे रोटी-कपड़ा दे, चाहे वह उम्मीदवार देशद्रोही ही क्यों न हो। गरीब व्यक्ति अपने वोट को बेचने को सदा तैयार रहता है जिससे जनमत पूंजीपतियों के हाथों में आ जाता है। अतः शुद्ध जनमत के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि जनता को भर पेट भोजन मिलता हो, मज़दूरों का शोषण न होता हो और अकाल न पड़ते हों। ..

4. आदर्श शिक्षा प्रणाली (Ideal Education System)-देश की शिक्षा प्रणाली ऐसी होनी चाहिए कि विद्यार्थियों का दृष्टिकोण विशाल बन सके और वे साम्प्रदायिक भावनाओं से ऊपर उठकर देश के हित में सोच सकें अर्थात् आदर्श नागरिकों बन सकें।

5. राजनीतिक दल आर्थिक तथा राजनीतिक सिद्धान्तों पर आधारित होने चाहिएं (Political Parties should be based on Economic and Political Principles)-शुद्ध जनमत के निर्माण में राजनीतिक दलों का महत्त्वपूर्ण हाथ होता है। राजनीतिक दल धर्म अथवा जाति पर आधारित न होकर आर्थिक तथा राजनीतिक सिद्धान्तों पर आधारित होने चाहिएं। जो दल धर्म अथवा जाति पर आधारित होते हैं, वे अपने दल के हित में ही सोचते हैं न कि देश के हित में। ऐसे दल समाज में साम्प्रदायिक भावना का प्रचार करके जनता को गुमराह करते हैं।

6. धार्मिक सहिष्णुता (Religious Toleration)—शुद्ध जनमत के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि जनता में धार्मिक सहिष्णुता होनी चाहिए। नागरिक प्रत्येक समस्या पर उसके गुण तथा अवगुण के आधार पर अपने मत का निर्माण करे न कि धर्म की दृष्टि से प्रत्येक समस्या पर विचार करे। नागरिकों को धर्म, जाति, भाषा आदि से ऊपर उठ कर अपने मत का निर्माण करना चाहिए।

7. भाषण तथा विचार प्रकट करने की स्वतन्त्रता (Freedom of Speech and Expression)-शुद्ध जनमत के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि नागरिकों को भाषण देने तथा अपने विचार प्रकट करने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए। नागरिकों को स्वतन्त्रता प्राप्त होनी चाहिए कि वे सरकार के बुरे कार्यों की आलोचना कर सकें और देश की समस्याओं को सुलझाने के लिए अपने सुझाव दे सकें। साधारण जनता विद्वानों तथा नेताओं के विचार सुनकर अपने मत का निर्माण करती है। यदि भाषण देने की स्वतन्त्रता नहीं होगी तो साधारण नागरिकों को विद्वानों और नेताओं के विचारों का ज्ञान न होगा जिससे शुद्ध जनमत का निर्माण नहीं हो सकेगा।

8. नागरिकों का उच्च चरित्र (High Character of the Citizens)-शुद्ध जनमत के निर्माण के लिए नागरिकों का चरित्र भी ऊंचा होना चाहिए। नागरिकों में सामाजिक एकता की भावना होनी चाहिए और उन्हें प्रत्येक समस्या पर राष्ट्रीय हित में सोचना चाहिए। उच्च चरित्र का नागरिक अपने वोट को नहीं बेचता और न ही झूठी बातों का प्रचार करता है। वह उन्हीं बातों तथा सिद्धान्तों का प्रचार करता है जिन्हें वह ठीक समझता है।

9. राष्ट्रीय आदर्शों की समरूपता (Uniformity over National Ideals)-स्वस्थ जनमत के निर्माण के लिए एक अनिवार्य तत्त्व यह है कि राष्ट्र के राज्य सम्बन्धी आदर्शों में जनता के मध्य अत्यधिक मतभेद नहीं होना चाहिए। जनता में राष्ट्रीय आदर्शों के विषय में एकता न होने की अवस्था में पारस्परिक कटुता और वैमनस्य इतना बढ़ जाएगा कि अराजकता फैलने की स्थिति आ जाएगी। ऐसी अवस्था में स्वस्थ जनमत का निर्माण नहीं हो सकता। इसके साथ ही राष्ट्र के तत्त्वों कम-से-कम विभिन्नता होनी चाहिए। जिस राष्ट्र में धर्म, भाषा, संस्कृति, प्राचीन इतिहास तथा राजनीतिक परम्पराओं के मध्य विभिन्नता होगी, वहां इन विषयों से सम्बद्ध सार्वजनिक नीतियों के सम्बन्ध में स्वस्थ जनमत के निर्माण में बड़ी बाधा पहुंचती है। उदाहरण के लिए भारत में भाषा की समस्या का हल अभी तक सन्तोषजनक नहीं हुआ है। स्वतन्त्रता के इतने वर्ष के पश्चात् भी अंग्रेजी की समाप्ति के प्रश्न पर स्वस्थ जनमत का निर्माण नहीं हो पाया है।

10. सहनशीलता एवं सहयोग की भावना (Spirit of toleration and co-operation)-शुद्ध जनमत के निर्माण के लिए लोगों में एक दूसरे के प्रति सहनशीलता एवं सहयोग की भावना का होना आवश्यक है। इन भावनाओं के अभाव में व्यक्ति दूसरे के विचार को नहीं सुन सकेगा जबकि उचित विचार वाद-विवाद के बाद ही सामने आते हैं। अतः सहनशीलता एवं परस्पर सहयोग की भावनाओं का विकास किया जाना चाहिए।

11. स्वस्थ दलीय प्रणाली (Healthy Party System)–लोकतान्त्रिक राज्यों में स्वस्थ दलीय प्रणाली भी जनमत बनाने में सहायक होती है। अतः राजनीतिक दलों का आधार ठीक होना चाहिए।
ऊपरलिखित अवस्थाओं के होने से ही शुद्ध जनमत का निर्माण हो सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. जनमत से आपका क्या भाव है ?
(P.B. 2008) उत्तर-जनमत सार्वजनिक मामलों पर जनता की राय को कहते हैं, परन्तु किसी भी विषय पर समस्त नागरिक एकमत नहीं हो सकते । जनमत बहुमत नहीं है क्योंकि बहुमत में बहुमत संख्या का अपना दृष्टिकोण रहता है, समस्त राष्ट्र का नहीं। बहुमत का मत जनमत बन सकता है यदि उसमें जनसाधारण की भलाई छिपी हुई हो। डॉ० बेनी प्रसाद ने ठीक ही कहा है कि, “केवल उसी मत को वास्तविक जनमत कहा जा सकता है जिसका उद्देश्य जनता का कल्याण है।” लॉर्ड ब्राइस के अनुसार, “समस्त समाज से सम्बन्धित किसी समस्या पर जनता के सामूहिक विचारों को जनमत कहा जा सकता है” लावेल के अनुसार, “जनमत बनाने के लिए केवल बहुमत काफ़ी नहीं और सर्वसम्मति आवश्यक नहीं, परन्तु राय ऐसी होनी चाहिए जिससे अल्पसंख्यक वर्ग बेशक सहमत न हो, लेकिन फिर भी वह भय के कारण नहीं बल्कि विश्वास से मानने को तैयार हो।” इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सार्वजनिक मामलों पर बहुसंख्यक का वह मत जिसे अल्पसंख्यक भी अपने हितों के विरुद्ध नहीं मानते, जनमत कहलाता है।

प्रश्न 2. जनमत की कोई चार विशेषताएं लिखें।
उत्तर-

  • आम सहमति-जनमत की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें आम सहमति होनी चाहिए। इसका अर्थ यह है कि किसी मामले पर सभी लोगों की एक राय हो।
  • जनता की भलाई-जनमत की दूसरी विशेषता जनता की भलाई है। जिस मत में जनता की भलाई निहित न हो वह मत जनमत नहीं बन सकता है।
  • तथ्यों पर आधारित-जनमत तथ्यों पर आधारित और तर्कों से भरपूर होना चाहिए। आम जनता को जनमत को स्वीकार करते समय यह देखना चाहिए कि यह तर्क पर आधारित है या नहीं।
  • जनमत का रूप सकारात्मक होता है।

प्रश्न 3. जनमत के निर्माण में शैक्षणिक संस्थाएं क्या भूमिका निभाती हैं ?
अथवा
लोकमत के निर्माण में शिक्षा संस्थानों की क्या भूमिका है?
उत्तर-आज के विद्यार्थी कल के नागरिक हैं। विद्यार्थी अपने मत का प्रयोग प्रायः अपने अध्यापकों के विचारों को सुन कर करते हैं। स्कूलों और कॉलेजों में इतिहास, नागरिक शास्त्र, अर्थशास्त्र आदि अनेक विषय पढ़ाए जाते हैं, जिससे विद्यार्थियों के विचारों पर बहुत प्रभाव पड़ता है। नागरिक शास्त्र के अध्यापक विशेषकर पढ़ाते समय सरकार के कार्यों के उदाहरण देते हैं और कई अध्यापक सरकार की कड़ी आलोचना करते हैं तथा अपने विचारों को प्रकट करते हैं। अध्यापकों के विचारों का विद्यार्थी के मन पर बहुत प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त स्कूलों और कॉलेजों में विभिन्न विषयों और समस्याओं पर वाद-विवाद तथा भाषण प्रतियोगिता होती रहती है। साहित्यिक गोष्ठियां (Study Circles) भी होती रहती हैं जिनमें विद्वानों तथा नेताओं को बुलाया जाता है। इस प्रकार शिक्षण संस्थाएं विद्यार्थियों के विचारों को बहुत प्रभावित करती हैं।

प्रश्न 4. स्वस्थ लोकमत के निर्माण के लिए चार ज़रूरी शर्ते लिखो।
अथवा
स्वस्थ जनमत के निर्माण के लिए आवश्यक चार शर्ते लिखो। ।
उत्तर-

  • शिक्षित जनता-स्वस्थ जनमत के निर्माण के लिए जनता का शिक्षित होना आवश्यक है। शिक्षित नागरिक देश की समस्याओं को समझ सकता है तथा समस्याओं को हल करने के लिए सुझाव भी दे सकता है।
  • निष्पक्ष प्रेस-स्वस्थ जनमत के निर्माण के लिए निष्पक्ष प्रेस का होना आवश्यक है। प्रेस अर्थात् समाचार-पत्र राजनीतिक दलों और पूंजीपतियों से स्वतन्त्र होने चाहिए ताकि सच्चे समाचार दे सकें और सरकार के अच्छे कार्यों की प्रशंसा कर सकें। स्वस्थ जनमत के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि प्रेस ईमानदार, निष्पक्ष और साम्प्रदायिक भावनाओं से ऊपर हो।
  • ग़रीबी का अन्त-शुद्ध जनमत के निर्माण के लिए आवश्यक है कि ग़रीबी का अन्त किया जाए। ग़रीब व्यक्ति जिसे 24 घण्टे रोटी की चिन्ता रहती है, देश की समस्याओं पर नहीं सोच सकता। अतः शुद्ध जनमत के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि जनता को भर पेट भोजन मिलता हो, मजदूरों का शोषण न होता हो और अकाल न पड़ते हों।
  • राजनीतिक दल आर्थिक तथा राजनीतिक सिद्धान्तों पर आधारित होने चाहिए।

प्रश्न 5. दबाव समूह कानून निर्माण में किस प्रकार सहायता करते हैं ?
उत्तर-वर्तमान समय में दबाव समूह सरकार की कानून निर्माण में काफ़ी सहायता करते हैं । जब संसद् की विभिन्न समितियाँ किसी बिल पर विचार-विमर्श कर रही होती है, तब वे अलग-अलग दबाव समूहों को अपना पक्ष रखने के लिए कहती हैं। दबाव समूह उस बिल के कारण उन पर पड़ने वाले सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव की बात कहते हैं। इस प्रकार अपने दृढ़ पक्ष से दबाव समूह कानून निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संसद् की विभिन्न समितियां भी इनके विचारों, तर्कों एवं आंकड़ों को महत्त्व देती हैं।

प्रश्न 6. स्वस्थ जनमत के निर्माण के रास्ते में आने वाली चार बाधाएं लिखो।
उत्तर- स्वस्थ जनमत के निर्माण में मुख्य बाधाएं निम्नलिखित हैं –

  • अनपढ़ता तथा अज्ञानता-अनपढ़ता तथा अज्ञानता स्वस्थ जनमत के निर्माण में बहुत बड़ी बाधा है। अनपढ़ता और अज्ञानता के फलस्वरूप जनता की सोचने की शक्ति तथा मनोवृत्ति संकुचित हो जाती है।
  • निर्धनता-निर्धनता स्वस्थ जनमत के मार्ग में एक महत्त्वपूर्ण बाधा है। निर्धन व्यक्ति आर्थिक समस्याओं में जकड़ा रहता है। जहां ग़रीबी होती है वहां जनमत का निर्माण नहीं हो पाता।
  • आलस्य और उदासीनता-आलस्य और उदासीनता स्वस्थ जनमत के निर्माण में बाधा है। यदि किसी देश के नागरिक आलसी और सार्वजनिक समस्या के प्रति उदासीन हों तो शुद्ध जनमत का निर्माण नहीं हो पाता।
  • दोषणपूर्ण शिक्षा प्रणाली भी स्वस्थ लोकमत के निर्माण में एक बाधा है।

प्रश्न 7. लोकतन्त्र में लोकमत की क्या भूमिका है ?
उत्तर-लोकतन्त्रीय राज्य में जनमत का बहुत अधिक महत्त्व है। रूसो के शब्दों में, “जनता की आवाज़ वास्तव में भगवान् की आवाज़ होती है।” लोकतन्त्र में जनमत का महत्त्व निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट हो जाता है-

  • लोकतन्त्र शासन प्रणाली में सरकार का आधार जनमत होता है-लोकतन्त्र में सरकार जनता के प्रतिनिधियों द्वारा बनाई जाती है। कोई भी सरकार जनमत के विरुद्ध नहीं जा सकती। सरकार सदैव जनमत को अपने पक्ष में रखने के लिए जनता में अपनी नीतियों का प्रचार करती रहती है। जो सरकार जनमत के विरुद्ध काम करती है वह शीघ्र ही हटा दी जाती है।
  • जनमत सरकार का मार्गदर्शक है-जनमत लोकतन्त्रीय सरकार का आधार ही नहीं बल्कि मार्गदर्शक भी है। जनमत सरकार को रास्ता दिखाता है कि उसे क्या करना है और किस तरह करना है। सरकार कानूनों का निर्माण करते समय जनमत का ध्यान अवश्य रखती है।
  • जनमत प्रतिनिधियों की निरंकुशता को नियन्त्रित करता है-लोकतन्त्र में जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है और जिस दल के पक्ष में जनमत होता है, उस दल की सरकार बनती है। कोई भी प्रतिनिधि अथवा मन्त्री अपनी मनमानी नहीं कर सकता। उन्हें सदैव जनमत के विरोध का डर रहता है।
  • लोकतन्त्र में कानून निर्माण में जनमत का महत्त्वपूर्ण हाथ होता है।’

प्रश्न 8. जनमत के निर्माण और अभिव्यक्ति के कोई चार साधन लिखें।
अथवा
जनमत के निर्माण में प्रेस, रेडियो और टेलीविज़न की क्या भूमिका है।
अथवा
जनमत के निर्माण और अभिव्यक्ति के कोई तीन साधन लिखो।
उत्तर-लोकमत के निर्माण में प्रेस, राजनीतिक दल, टेलीविज़न इत्यादि महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

  • प्रेस-समाचार-पत्र, पत्र-पत्रिकाएं इत्यादि जनमत के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समाचार-पत्र लाखों व्यक्ति पढ़ते हैं उनके मतों पर समाचार-पत्रों का बहुत प्रभाव पड़ता है।
  • राजनीतिक दल-राजनीतिक दल जनमत को अपने पक्ष में करने का प्रयत्न करते हैं। राजनीतिक दल समाचारपत्रों द्वारा, सार्वजनिक सभाओं द्वारा, रेडियो द्वारा तथा घर-घर जाकर अपने सिद्धान्तों का प्रचार करते हैं। देश की समस्याओं पर अपने विचार जनमत को बताते हैं। राजनीतिक दल अपने सिद्धान्तों का प्रचार करते हैं। इन सब तरीकों से जनमत के निर्माण में सहायता मिलती है।
  • रेडियो और टेलीविज़न-रेडियो और टेलीविज़न जनता का मनोरंजन ही नहीं करते बल्कि जनता को देश-विदेश की समस्याओं से भी अवगत कराते हैं। राजनीतिक दलों के नेता, प्रधानमन्त्री, राष्ट्रपति तथा बड़े-बड़े विद्वान् अपने विचारों को रेडियो तथा टेलीविज़न द्वारा जनता तक पहुंचाते हैं। अनपढ़ व्यक्ति विशेषकर रेडियो तथा टेलीविज़न से काफ़ी प्रभावित होते हैं।
  • शैक्षिक संस्थाएं-शैक्षिक संस्थाएं भी जनमत निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं । अध्यापक अध्यापन के समय कई महत्त्वपूर्ण मामलों सम्बन्धी अपने विचार भी अभिव्यक्त करते हैं जिनका विद्यार्थियों पर व्यापक प्रभाव पड़ता है।
    सहा

अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. जनमत क्या होता है?
उत्तर-जनमत सार्वजनिक मामलों पर जनता की राय को कहते हैं, परन्तु किसी भी विषय पर समस्त नागरिक एकमत नहीं हो सकते । जनमत बहुमत नहीं है क्योंकि बहुमत में बहुमत संख्या का अपना दृष्टिकोण रहता है, समस्त राष्ट्र का नहीं। बहुमत का मत जनमत बन सकता है यदि उसमें जनसाधारण की भलाई छिपी हुई हो।

प्रश्न 2. जनमत की दो परिभाषाएं लिखें।
उत्तर-

  1. डॉ० बेनी प्रसाद के अनुसार, “केवल उसी मत को वास्तविक जनमत कहा जा सकता है जिसका उद्देश्य जनता का कल्याण है।”
  2. लॉर्ड ब्राइस के अनुसार, “समस्त समाज से सम्बन्धित किसी समस्या पर जनता के सामूहिक विचारों को जनमत कहा जा सकता है।”

प्रश्न 3. जनमत की कोई दो विशेषताएं लिखें।
उत्तर-

  • आम सहमति-जनमत की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें आम सहमति होनी चाहिए। इसका अर्थ यह कि किसी मामले पर सभी लोगों की एक राय हो।
  • जनता की भलाई-जनमत की दूसरी विशेषता जनता की भलाई है। जिस मत में जनता की भलाई निहित न हो वह मत जनमत नहीं बन सकता है।

प्रश्न 4. अच्छे व स्वस्थ लोकमत (जनमत) के लिए दो जरूरी शर्ते बताएं।
उत्तर-

  • शिक्षित जनता-स्वस्थ जनमत के निर्माण के लिए जनता का शिक्षित होना आवश्यक है। शिक्षित नागरिक देश की समस्याओं को समझ सकता है और समस्याओं को हल करने के लिए सुझाव भी दे सकता है।
  • निष्पक्ष प्रेस-स्वस्थ जनमत के निर्माण के लिए निष्पक्ष प्रेस का होना आवश्यक है। प्रेस अर्थात् समाचार-पत्र राजनीतिक दलों और पूंजीपतियों से स्वतन्त्र होने चाहिएं ताकि सच्चे समाचार दे सकें और सरकार के अच्छे कार्यों की प्रशंसा कर सकें।

प्रश्न 5. स्वस्थ लोकमत के निर्माण में आने वाली किन्हीं जो रुकावटों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-

  • अनपढ़ता तथा अज्ञानता-अनपढ़ता तथा अज्ञानता स्वस्थ जनमत के निर्माण में बहुत बड़ी बाधा हैं। अनपढ़ता और अज्ञानता के फलस्वरूप जनता की सोचने की शक्ति तथा मनोवृत्ति संकुचित हो जाती है।
  • निर्धनता-निर्धनता स्वस्थ जनमत के मार्ग में एक महत्त्वपूर्ण बाधा है। निर्धन व्यक्ति आर्थिक समस्याओं में जकड़ा रहता है। जहां ग़रीबी होती है वहां जनमत का निर्माण नहीं हो पाता।

प्रश्न 6. लोकतन्त्र में लोकमत का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-

  • लोकतन्त्र शासन प्रणाली में सरकार का आधार जनमत होता है-लोकतन्त्र में सरकार जनता के प्रतिनिधियों द्वारा बनाई जाती है। कोई भी सरकार जनमत के विरुद्ध नहीं जा सकती है। जो सरकार जनमत के विरुद्ध काम करती है वह शीघ्र ही हटा दी जाती है।
  • जनमत सरकार का मार्गदर्शक है-जनमत लोकतन्त्रीय सरकार का आधार ही नहीं बल्कि मार्गदर्शक भी है।

प्रश्न 7. जनमत के निर्माण और अभिव्यक्ति के कोई दो साधन लिखो।
उत्तर-1. प्रेस-समाचार-पत्र, पत्र-पत्रिकाएं इत्यादि जनमत के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समाचारपत्रों में देश-विदेश की घटनाओं और समस्याओं को छापा जाता है। समाचार-पत्र जनता की शिकायतें सरकार तक पहुंचाते हैं और सरकार की गलत नीतियों की आलोचना करते हैं। समाचार-पत्र लाखों व्यक्ति पढ़ते हैं। उनके मतों पर समाचार-पत्र का बहुत प्रभाव पड़ता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. जनमत से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-जनमत से हमारा अभिप्राय सार्वजनिक मामलों पर जनता की राय से है।

प्रश्न 2. लोकमत की एक परिभाषा लिखो।
उत्तर-प्रो० ब्राईस के अनुसार, “समस्त समाज से सम्बन्धित समस्या पर जनता के सामूहिक विचारों को जनमत कहा जाता है।”

प्रश्न 3. क्या बहुमत की राय को जनमत कहा जा सकता है? ,
उत्तर-केवल बहुमत की राय को ही जनमत नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न 4. प्रेस जनमत के निर्माण में क्या भूमिका निभाता है ?
उत्तर-प्रेस जनता को दैनिक घटनाओं और समाचारों से परिचित रखता है। ये सरकार के कार्यों पर टीका-टिप्पणी करते हैं और उनके कार्यों की प्रशंसा और आलोचना करते हैं।

प्रश्न 5. जनमत के निर्माण में राजनीतिक दल क्या भूमिका निभाते हैं ? .
उत्तर-राजनीतिक दल लोगों के सामने देश की विभिन्न समस्याओं पर अपने विचार रखते हैं और समस्याओं को हल करने के लिए अपना कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं।

प्रश्न 6. स्वस्थ लोकमत के निर्माण के मार्ग में कोई दो कठिनाइयां लिखो।
अथवा लोकमत निर्माण में एक रुकावट लिखो।
उत्तर-(i) अनपढ़ता (ii) पक्षपाती प्रेस।

प्रश्न 7. जनमत के निर्माण का कोई एक साधन लिखो।
उत्तर-राजनीतिक दल।

प्रश्न 8. रेडियो तथा टेलीविज़न जनमत के निर्माण में कैसे सहायक होते हैं ?
उत्तर-रेडियो तथा टेलीविज़न द्वारा नेताओं के विचार लोगों तक पहुँचते हैं, तथा लोगों को राजनीतिक शिक्षा मिलती है।

प्रश्न 9. जनमत की कोई एक विशेषता लिखो।
उत्तर-जनमत तर्कसंगत होता है।

प्रश्न 10. लोकमत के निर्माण और प्रकटावे के दो साधन लिखो।
अथवा जनमत के निर्माण के दो साधन लिखें।
उत्तर-(1) प्रेस (2) राजनीतिक दल।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. ………… की आवाज परमात्मा की ……………. होती है।
2. नेपोलियन के अनुसार एक लाख तलवारों की अपेक्षा मुझे तीन ………… से अधिक भय है।
3. ……….. सार्वजनिक मामलों पर जनता की राय को कहते हैं।
4. कैरोल के अनुसार साधारण प्रयोग में जनमत साधारण जनता की ……… को कहते हैं।
5. ………. में लोकमत को बढ़ावा मिलता है।
6. लोकतन्त्र शासन प्रणाली में …………. का आधार जनमत होता है।
उत्तर-

  1. जनता, आवाज
  2. समाचार-पत्रों
  3. जनमत
  4. मिली-जुली प्रतिक्रिया
  5. लोकतन्त्र
  6. सरकार।

प्रश्न III. निम्नलिखित वाक्यों में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. जनमत सरकार को निरंकुश बनने से रोकता है।
2. देश की बहुसंख्यक जनता के मत को जनमत कहते हैं।
3. जनमत नागरिकों के अधिकारों और स्वतन्त्रता को सुरक्षा प्रदान करता है।
4. श्रेष्ठ जनमत के निर्माण के लिए सबसे आवश्यक शर्त जनता का अशिक्षित होना है।
5. रेडियो और सिनेमा जनमत के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उत्तर-

सही
ग़लत
सही
ग़लत
सही।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न 1. निम्नलिखित में से कौन-सा तत्त्व स्वस्थ जनमत को बढ़ावा देता है ?
(क) साम्यवाद
(ख) जातिवाद
(ग) क्षेत्रवाद
(घ) स्वतन्त्र प्रेस।
उत्तर-(घ) स्वतन्त्र प्रेस।

प्रश्न 2. निम्नलिखित में जनमत निर्माण का साधन है-
(क) प्रेस
(ख) सार्वजनिक सभाएं
(ग) राजनीतिक
(घ) उपरोक्त।
उत्तर-(घ) उपरोक्त।

प्रश्न 3. लोकतान्त्रिक सरकार की सफलता किस पर निर्भर करती है ?
(क) तानाशाह पर
(ख) क्षेत्रवाद पर
(ग) जातिवाद पर
(घ) जनमत पर।
उत्तर-(घ) जनमत पर।

प्रश्न 4. “एक लाख तलवारों की अपेक्षा मुझे तीन समाचार-पत्रों से अधिक भय है।” यह किसका कथन है?
(क) नेपोलियन
(ख) रूसो
(ग) हिटलर
(घ) मुसोलिनी।
उत्तर-(क) नेपोलियन

5. जनमत बनाने के लिए केवल बहुमत काफ़ी नहीं और सर्वसम्मति आवश्यक नहीं है।” यह किसका कथन
(क) डॉ० बेनी प्रसाद
(ख) लावेल
(ग) श्रीनिवास शास्त्री
(घ) लॉस्की ।
उत्तर- (ख) लावेल