Class 12 Political Science Solutions Chapter 15 भारत में दलीय प्रणाली

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. भारतीय दल प्रणाली की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करो। (Explain the main features of the Indian Party System.)
अथवा
भारतीय दल-प्रणाली की छः विशेषताओं का विस्तार से वर्णन करें।। (Explain in detail six features of Indian Party System.)
अथवा
भारतीय दल प्रणाली की कोई छः विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (Describe any six features of Indian Party System.)
उत्तर-वर्तमान युग लोकतन्त्र का युग है। लोकतन्त्र के लिए दल अनिवार्य हैं। दोनों एक-दूसरे का अभिन्न अंग हैं। राजनीतिक दलों के बिना लोकतन्त्रात्मक सरकार नहीं चल सकती और लोकतन्त्र के बिना राजनीतिक दलों का विकास नहीं हो सकता। प्रो० मुनरो के मतानुसार, “स्वतन्त्र राजनीतिक दल ही लोकतन्त्रीय सरकार का दूसरा नाम है।” भारत विश्व में सबसे बड़ा लोकतन्त्रात्मक देश है।

अत: भारत में राजनीतिक दलों का होना स्वाभाविक है। चुनाव आयोग ने 7 राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय दलों के रूप में मान्यता प्रदान की हुई है।
अन्य देशों के राजनीतिक दलों की तरह भारतीय दलीय व्यवस्था की अपनी विशेषताएं हैं जिसमें मुख्य निम्नलिखित हैं

1. राजनीतिक दलों का पंजीकरण (Registration of Political Parties)-जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 (People’s Representative Act) और उसके संशोधित कानून 1988 के अनुसार सभी राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग के पास पंजीकृत करवाना अनिवार्य है। जो दल पंजीकृत नहीं होगा उसे राजनीतिक दल के रूप में मान्यता नहीं मिलेगी। पंजीकरण करवाते समय प्रत्येक राजनीतिक दल को अपने संविधान में प्रावधान शामिल करना होगा- “दल भारत के संविधान में तथा समाजवाद, धर्म-निरपेक्षतावाद, लोकतन्त्र के सिद्धान्तों में पूर्ण आस्था व भक्ति रखेगा और भारत की प्रभुसत्ता एकता व अखण्डता का समर्थन करेगा।”

2. चुनाव आयोग द्वारा दलों को मान्यता (Recognition of Political Parties By Election Commission)-चुनाव आयोग राजनीतिक दलों को मान्यता तथा चुनाव चिह्न प्रदान करता है। चुनाव आयोग के नियमों के तहत किसी दल को राज्य स्तरीय दल का दर्जा तब प्रदान किया जाता है जब उसे लोकसभा अथवा विधानसभा चुनाव में कुल वैध मतों के कम-से-कम छः प्रतिशत मत मिले हों और विधानसभा में कम-से-कम दो सीटें मिली हों अथवा राज्य विधानसभा में कुल सीटों की कम-से-कम तीन प्रतिशत सीटें अथवा कम-से-कम तीन सीटें (इनमें से जो भी अधिक हो) मिली हों अथवा उस दल ने लोकसभा के किसी आम चुनाव में लोकसभा की प्रत्येक 25 सीटों पर एक जीत या इसके किसी अन्य आबंटित हिस्से में इसी अनुपात में जीत हासिल की हो। इसके विकल्प के तौर पर सम्बन्धित राज्य में पार्टी द्वारा खड़े किए गए उम्मीदवारों को सभी संसदीय क्षेत्रों में मतदान का कम-से-कम 6% मत प्राप्त होना चाहिए। इसके अलावा इसी आम चुनाव में पार्टी को राज्य में कम-से-कम एक लोकसभा सीट पर जीत हासिल होनी चाहिए। राष्ट्रीय स्तर का दर्जा प्राप्त करने के लिए पार्टी को लोकसभा अथवा विधानसभा चुनाव में चार अथवा इससे अधिक राज्यों में कम-से-कम छ: प्रतिशत वैध मत प्राप्त करने के साथ ही लोकसभा की कम-से-कम 4 सीटें जीतना आवश्यक है। अथवा कम-से-कम 3 राज्यों में लोकसभा में प्रतिनिधित्व कुल सीटों का दो प्रतिशत (वर्तमान 543 सीटों में से कम-से-कम 11 सीटें) प्राप्त करना आवश्यक है। अथवा उस दल को कम-से-कम चार राज्यों में क्षेत्रीय दल के रूप में मान्यता प्राप्त हो। चुनाव आयोग ने 7 दलों को राष्ट्रीय दलों के रूप में एवं 58 दलों को राज्य स्तरीय दलों के रूप में मान्यता प्रदान की हुई है।

3. बहु-दलीय पद्धति (Multiple Party System)-भारत में स्विट्ज़रलैण्ड की तरह बहु-दलीय प्रणाली है। चुनाव आयोग ने 7 राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय दल के रूप में और 58 राजनीतिक दलों को राज्य स्तर पर आरक्षित चुनाव चिन्ह के साथ मान्यता दी हुई है। राष्ट्रीय स्तर के दल हैं-भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय मार्क्सवादी दल, तृणमूल कांग्रेस पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी।।

4. एक दल की प्रधानता का अन्त (End of Dominance of Single Party)-इसमें कोई सन्देह नहीं है कि भारत में अनेक दल चुनाव में भाग लेते हैं, परन्तु 1967 से पूर्व केन्द्र तथा राज्य में कांग्रेस की प्रधानता ही रही है। 1967 के चुनाव में कांग्रेस को राज्यों में इतनी अधिक सफलता न मिली जिसके फलस्वरूप कई राज्यों में गैर-कांग्रेसी मन्त्रिमण्डलों का निर्माण हुआ। परन्तु गैर-कांग्रेसी नेता इतने मूर्ख निकले कि उन्होंने इस सुनहरी अवसर का पूरा लाभ उठाने की बजाय अपनी हानि ही की। उन्होंने जनता की भलाई न करके अपने स्वार्थ की ही पूर्ति की। अतः गैर-कांग्रेसी सरकार अधिक समय तक न चल सकी। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने 1971 में मध्यावधि चुनाव करवाए जिसमें इन्दिरा कांग्रेस को इतनी सफलता मिली कि कांग्रेस पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली हो गई है।

जनता पार्टी की स्थापना से कांग्रेस का एकाधिकार समाप्त हो गया। मार्च, 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को केवल 153 सीटें मिली जबकि जनता पार्टी को 272 तथा कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी को 28 सीटें मिलीं। इस प्रकार पहली बार केन्द्र में गैर-कांग्रेस पार्टी (जनता पार्टी) की सरकार बनी। 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ा क्योंकि इसे केवल 44 सीटें ही मिलीं, जबकि भाजपा को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत (282 सीटें) प्राप्त हुआ। अब कांग्रेस की पहले जैसी प्रधानता नहीं रही।

5. प्रभावशाली विरोधी दल का उदय (Rise of Effective Opposition)-भारतीय दल प्रणाली की एक यह भी विशेषता रही है कि यहां पर इंग्लैण्ड की भान्ति संगठित विरोधी दल का अभाव रहा है। 1977 से पहले लोकसभा में कोई मान्यता प्राप्त विरोधी दल नहीं था।

मार्च, 1977 के चुनाव में जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ और कांग्रेस को केवल 153 सीटें मिलीं और इस प्रकार कांग्रेस की हार से संगठित विरोधी दल का उदय हुआ। जनता सरकार ने विरोधी दल के नेता को कैबिनेट स्तर के मन्त्री की मान्यता दी। चुनाव के पश्चात् लोकसभा में विरोधी दल के नेता श्री यशवन्त राव चह्वान थे।

पिछले कुछ वर्षों से भारत में प्रभावशाली विरोधी दल पाया जाने लगा है। अप्रैल-मई, 2009 में हुए 15वीं लोकसभा के चुनावों के पश्चात् लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी को विरोधी दल के रूप में मान्यता दी गई, और इस दल के नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी को विरोधी दल के नेता के रूप में मान्यता दी गई। दिसम्बर, 2009 में भारतीय जनता पार्टी ने श्री लाल कृष्ण आडवाणी के स्थान पर श्री मती सुषमा स्वराज को लोकसभा में विपक्ष का नेता नियुक्त किया। 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनावों के पश्चात् किसी भी दल को मान्यता प्राप्त विरोधी दल का दर्जा नहीं दिया गया।

6. साम्प्रदायिक दलों का होना (Existence of Communal Parties) भारतीय दलीय प्रणाली की एक विशेषता साम्प्रदायिक दलों का होना है। यद्यपि धर्म-निरपेक्ष राज्य में साम्प्रदायिक दलों का भविष्य उज्ज्वल नहीं है। तथापि साम्प्रदायिक दलों के प्रचार तथा गतिविधियों से देश का राजनीतिक वातावरण दूषित हो जाता है।

7. प्रादेशिक दलों का होना (Existence of Regional Parties)-साम्प्रदायिक दलों के साथ-साथ भारतीय दलीय प्रणाली की महत्त्वपूर्ण विशेषता प्रादेशिक दलों का होना है। चुनाव आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त प्रादेशिक दलों की संख्या 58 है जिसमें मुख्य हैं शिरोमणि अकाली दल, नैशनल कांफ्रैस, बंगला कांग्रेस, इण्डियन नैशनल लोकदल, झारखण्ड पार्टी, अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (A.D.M.K.), द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (D.M.K.), तेलुगू देशम् (Telgu Desam) तथा राष्ट्रीय जनता दल आदि। चुनाव आयोग ने 58 दलों को राज्य स्तर पर आरक्षित चुनाव चिन्हों के साथ मान्यता दी हुई है। 1996 में संयुक्त मोर्चे में कई क्षेत्रीय दल शामिल थे। सन् 1984 में लोकसभा के चुनाव में क्षेत्रीय दल तेलगू देशम् को सभी विपक्षी दलों से अधिक सीटें मिलीं। प्रादेशिक दल राष्ट्रीय हित के लिए बहुत हानिकारक हैं क्योंकि यह दल राष्ट्र हित में न सोचकर अपने दल और क्षेत्रीय हित को अधिक महत्त्व देते हैं। डी० एम० के० (D.M.K.) के नेताओं ने अपने निजी स्वार्थों के लिए देश के दक्षिणी व उत्तरी भाग में मतभेद उत्पन्न करने की कोशिश की है जोकि देश के हित में नहीं हैं। केन्द्र और राज्यों में तनाव के लिए काफ़ी हद तक क्षेत्रीय दल ज़िम्मेवार हैं क्योंकि क्षेत्रीय दल राज्यों को अधिक स्वायत्तता देने की मांग करते हैं, जोकि केन्द्र ,को स्वीकार नहीं है।

8. स्वतन्त्र सदस्य (Independent Members)-भारत में अनेक दलों के होते हुए भी संसद् तथा राज्य विधानसभाओं में स्वतन्त्र सदस्यों की संख्या बहुत पाई जाती है। 1952 के आम चुनाव में 20 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं ने स्वतन्त्र सदस्यों को वोट डाले। __ परन्तु मार्च, 1977 के लोकसभा चुनाव में और जून, 1977 में राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव में स्वतन्त्र उम्मीदवारों को कोई विशेष सफलता प्राप्त नहीं हुई। लोकतन्त्र की सफलता के लिए आवश्यक है कि स्वतन्त्र उम्मीदवारों को कोई विशेष सफलता नहीं मिलनी चाहिए। 1989 से लेकर 2014 तक के लोकसभा के चुनावों में स्वतन्त्र उम्मीदवारों को कोई विशेष सफलता नहीं मिली।

9. जनता के साथ कम सम्पर्क (Less Contact with the Masses)-भारतीय दल प्रणाली की एक अन्य विशेषता यह है कि दल जनता के साथ सदा सम्पर्क बनाकर नहीं रखते। भारत में कई दल तो बरसाती मेंढकों की तरह चुनाव के समय ही अस्तित्व में आते हैं और चुनाव के साथ प्राय: लुप्त हो जाते हैं। जो दल स्थायी हैं वे भी चुनाव के समय ही अपने दल को संगठित करते हैं तथा जनता के साथ सम्पर्क बनाने का प्रयत्न करते हैं। यहां तक कांग्रेस दल भी चुनाव के पश्चात् जनता के साथ सम्पर्क बनाना अपनी मानहानि समझता है।

10. विक्षुब्ध गुट (Dissidents) भारतीय राजनीतिक दलीय प्रणाली की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता विक्षुब्ध गुटों का पाया जाना है। प्रायः प्रत्येक राज्य में कांग्रेस या जनता पार्टी के अन्दर दो गुट पाए जाते हैं-सत्तारूढ़ (Ministerliasts) तथा विक्षुब्ध (Dissidents) गुट। सत्ता हथियाने के लिए नेताओं में परस्पर इतनी होड़ रहती है कि गुटबन्दी अत्यधिक ज़ोरों पर काम करती है। 1977 तथा 1979 में जनता पार्टी में केन्द्र में भी विक्षुब्ध गुट पाया जाता था जिसका नेतृत्व चौधरी चरण सिंह
और राज नारायण कर रहे थे। प्रत्येक राज्य में जनता पार्टी में विक्षुब्ध गुट पाया जाता था। असन्तुष्ट गुटों के कारण ही प्रधानमन्त्री राजीव गांधी को महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि कांग्रेस सत्तारूढ़ राज्यों में कई बार मुख्यमन्त्री बदलने पड़े ताकि असन्तुष्टों को सन्तुष्ट किया जा सके। 1990 में जनता दल में सत्तारूढ़ और विक्षुब्ध गुट में मतभेद कारण नवम्बर, 1990 में जनता दल का विभाजन हुआ और प्रधानमन्त्री वी० पी० सिंह को त्याग-पत्र देना पड़ा। विक्षुब्ध गुट के कारण ही 19 मई, 1995 को कांग्रेस पार्टी में फूट पड़ गई और कांग्रेस (इ) दो गुटों में बंट गई।

11. दल-बदल (Defection)-भारतीय दलीय प्रणाली की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता तथा दोष दल-बदल’ है। दल-बदल के अनेक उदाहरण हैं। ‘दल-बदल’ ने राज्यों की राजनीति तथा शासन में अस्थिरता ला दी है जिससे भारत में संसदीय लोकतन्त्र को खतरा पैदा हो गया है। जुलाई, 1979 में प्रधानमन्त्री श्री मोरार जी देसाई को भी त्यागपत्र देना पड़ा क्योंकि बहुत-से सदस्यों ने जनता पार्टी को छोड़ दिया था। केन्द्रीय सरकार के इतिहास में यह पहला अवसर था जब किसी प्रधानमन्त्री को अपनी पार्टी के सदस्यों के कारण त्याग-पत्र देना पड़ा। जनवरी, 1980 के लोकसभा के चुनाव से पूर्व और बाद में दल-बदल भारी संख्या में हुआ और यह दल-बदल कांग्रेस (इ) के पक्ष में हुआ। जनवरी, 1985 में संविधान में 52वां तथा दिसम्बर, 2003 में 91वां संशोधन किया गया ताकि दल-बदल की बुराई को समाप्त किया जा सके। इस संशोधन के अन्तर्गत दल-बदल गैर-कानूनी है और इससे संसद् या राज्य विधानमण्डल की सदस्यता समाप्त हो जाती है। इस संशोधन के बावजूद भी दल-बदल की बुराई समाप्त नहीं हुई है।

12. कार्यक्रमों की अपेक्षा नेतृत्व की प्रमुखता (More Emphasis on Leadership than on Programme)-भारत में अनेक राजनीतिक दलों में कार्यक्रम की अपेक्षा नेतृत्व को प्रमुखता दी जाती है और अब भी दी जा रही है। पहले आम चुनावों में कांग्रेस ने पं. जवाहर लाल नेहरू के नाम पर भारी सफलता प्राप्त की। कांग्रेस ने अपने कार्यक्रम का कभी भी प्रचार नहीं किया। 1980 में कांग्रेस (इ) की विजय वास्तव में श्रीमती गांधी की विजय थी। जनता ने इन्दिरा गांधी के नाम पर वोट डाले न कि कांग्रेस (इ) के कार्यक्रम को देखकर। इसी प्रकार दिसम्बर, 1984 में लोकसभा के चुनाव में जनता ने श्री राजीव गांधी के नाम पर वोट डाले न कि कांग्रेस (इ) की कार्यक्रम को देखकर। कांग्रेस (इ) को राजीव गांधी के नेतृत्व में इतनी महान् सफलता मिली जो पहले कभी भी कांग्रेस पार्टी को नहीं मिली। 1989, 1991 और 1996 के लोकसभा के चुनाव में दलों ने कार्यक्रमों की अपेक्षा नेताओं को महत्त्व दिया, फरवरी-मार्च, 1998 एवं सितम्बर-अक्तूबर, 1999 के लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने सोनिया गांधी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जबकि भारतीय जनता पार्टी ने अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत किया। अप्रैल-मई, 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनाव कांग्रेस ने श्रीमती सोनिया गांधी तथा राहुल गांधी एवं भारतीय जनता पार्टी ने श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में लड़े। परन्तु उचित दल प्रणाली के लिए यह आवश्यक है कि दल के कार्यक्रम पर जोर दिया जाए न कि नेता को प्रमुखता दी जाए।

13. अनुशासन का अभाव (Lack of Discipline)-अधिकांश दलों में अनुशासन का अभाव है और अनुशासन को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। दलों के सदस्य अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए दल के अनुशासन की परवाह नहीं करते। यदि किसी सदस्य को चुनाव लड़ने के लिए दल का टिकट नहीं मिलता तो वह सदस्य पार्टी छोड़ देता है और इसके पश्चात् वह या तो अपनी अलग पार्टी बना लेता है या किसी और दल के टिकट पर चुनाव लड़ता है या स्वतन्त्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ता है। मई, 1982 में हरियाणा और हिमाचल प्रदेश की विधानसभाओं के चुनाव में अनेक कांग्रेस (इ) के सदस्यों ने पार्टी के उम्मीदवार के विरुद्ध स्वतन्त्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा। कांग्रेस (इ) हाई कमाण्ड ने विद्रोही कांग्रेसियों को 6 वर्ष के लिए पार्टी से निकाल दिया परन्तु जो विद्रोही कांग्रेस (इ) स्वतन्त्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीत गए उन्हें बड़े सम्मान के साथ दोबारा पार्टी में सम्मिलित कर लिया गया और कुछ को मन्त्री भी बनाया गया। ऐसी परिस्थिति में सदस्यों से अनुशासन की उम्मीद करना बेकार है। अनुशासन ही कमी के कारण ही दल-बदल की बुराई पाई जाती है।

14. राजनीतिक दलों में लोकतन्त्र का अभाव (Lack of Democracy in Political Parties)-जिन राजनीतिक दलों पर लोकतन्त्र की प्रतिष्ठा बनाए रखने का भार है वे स्वयं अपने दलों में लोकतन्त्र की स्थापना नहीं कर सके हैं। राजनीतिक दलों के अपने संगठनात्मक चुनाव 10-10 वर्षों तक नहीं होते हैं। जनता पार्टी की 1977 की स्थापना के बाद कभी भी संगठनात्मक चुनाव नहीं हुए। कांग्रेस (इ) की 1978 की स्थापना के बाद 1991 के अन्त में संगठनात्मक चुनाव हुए हैं। दलों का काम-काज पूर्णतः नामजद व अस्थायी नेतृत्व के द्वारा चलाया जा रहा है। इस स्थिति ने सभी राजनीतिक दलों में दलीय तानाशाही की प्रवृत्ति को उजागर किया है।

15. राजनीतिक दलों के सिद्धान्तहीन समझौते (Non-Principle Aliance of Political Parties)—भारतीय दलीय व्यवस्था की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता और दोष यह है कि राजनीतिक दल अपने हितों की पूर्ति के लिए सिद्धान्तहीन समझौते करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। जनवरी, 1980 के लोकसभा के चुनाव में सभी दलों ने सिद्धान्तहीन समझौते किए। उदाहरण के लिए अन्ना द्रमुक केन्द्रीय स्तर पर लोकदल सरकार में शामिल था और लोकदल के चौधरी चरण सिंह के साथ सहयोग करने के लिए प्रतिबद्ध था, लेकिन दूसरी ओर इस दल ने तमिलनाडु में जनता पार्टी के साथ चुनाव गठबन्धन किया। विचित्र बात यह थी कि यह गठबन्धन उसकी केन्द्रीय सरकार को गिराने के लिए किया गया जिसमें वह शामिल थी। अकाली दल के अध्यक्ष तलवंडी ने लोकदल के साथ गठबन्धन किया जबकि अधिकांश विधायक और मुख्यमन्त्री प्रकाश सिंह बादल जनता पार्टी के साथ गठबन्धन की बातें करते रहे। कांग्रेस (इ) जो अन्य दलों के समझौतों को सिद्धान्तहीन कहती रही, स्वयं तमिलनाडु में द्रमुक (D.M.K.) के साथ चुनाव गठबन्धन कर बैठी। आपात्काल में श्रीमती इन्दिरा गांधी ने द्रमुक की करुणानिधि की सरकार को बर्खास्त कर दिया था। मार्च, 1987 में कांग्रेस (इ) जम्मू-कश्मीर में नैशनल कांफ्रेंस के साथ मिलकर और केरल में कांग्रेस (आई) ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। पिछले कुछ वर्षों में लोकसभा के चुनाव के समय सभी राजनीतिक दलों ने सिद्धान्तहीन समझौते किए।

निष्कर्ष (Conclusion)-भारतीय दलीय प्रणाली की विशेषताओं से स्पष्ट है कि इसमें महत्त्वपूर्ण गुणों की कमी है जो दलीय सरकार की सफलता के लिए अनिवार्य है। बहु-दलीय, सुसंगठित विरोधी दल का न होना, एक दल की प्रधानता, साम्प्रदायिक तथा क्षेत्रीय दलों का होना और दल-बदल भारतीय प्रणाली की कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जो संसदीय शासन प्रणाली की सफलता के लिए घातक सिद्ध हो रही हैं। अत: आवश्यकता इस बात की है कि सामान्य विचारधारा वाले दल मिलकर एक सुसंगठित तथा शक्तिशाली विरोधी दल की स्थापना करें। महान् गठबन्धनों (Grand Alliances) की आवश्यकता नहीं है क्योंकि देश की समस्याओं को हल करने के स्थान पर देश के राजनीतिक वातावरण को दूषित कर देते हैं।

प्रश्न 2. कांग्रेस (आई०) पार्टी की नीतियों और कार्यक्रमों का वर्णन कीजिए। [Explain the policies and programmes of Congress (I) Party.]
अथवा
कांग्रेस दल की नीतियों और कार्यक्रमों का वर्णन कीजिए। (Describe the Policies and Programmes of Congress Party.)
उत्तर-यदि जनवरी, 1977 को जनता पार्टी की स्थापना के लिए भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में सदैव याद रखा जाएगा तो जनवरी, 1978 को कांग्रेस के विभाजन के लिए सदैव स्मरण किया जाएगा। वर्ष का पहला दिन, पहली जनवरी कांग्रेस के एक और विभाजन से प्रारम्भ हुआ जिसका कांग्रेस के प्रायः सभी वरिष्ठ नेताओं को दुःख हुआ। मार्च, 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस को करारी पराजय का सामना करना पड़ा और श्रीमती इन्दिरा गांधी तथा उनके पुत्र संजय गांधी भी चुनाव हार गए। मई, 1977 में जब कांग्रेस महासमिति की बैठक हुई तो श्रीमती इन्दिरा गांधी की रज़ामन्दी से ब्रह्मानन्द रेड्डी अध्यक्ष चुने गए। परन्तु शीघ्र ही इन्दिरा गांधी का यह भ्रम दूर हो गया कि ब्रह्मानन्द रेड्डी उसी गुलाम की भान्ति आचरण करेंगे, जिसका परिचय उन्होंने आपात्काल में दिया था। शीघ्र ही रेड्डी, चह्वान के समर्थकों और इन्दिरा गांधी के समर्थकों में मतभेद पैदा हो गए।

कर्नाटक की समस्या ने स्थिति को इतना तनावपूर्ण बना दिया कि श्रीमती इन्दिरा गांधी ने 1977 को कांग्रेस कार्य समिति से इस्तीफा दे दिया।

इन्दिरा गांधी के समर्थकों ने पहली और 2 जनवरी, 1978 को कांग्रेस-जनों का एक राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजन करने का निश्चय किया। रेड्डी और चह्वान ने इस सम्मेलन को पार्टी विरोधी बताते हुए कांग्रेस-जनों को निर्देश दिया कि वे इन्दिरा गांधी द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग न लें।

राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन श्री मीर कासिम ने किया और पहले दिन अध्यक्षता श्रीमती गांधी ने की। दो जनवरी को साढ़े ग्यारह बजे कमलापति त्रिपाठी ने एक प्रस्ताव रखा जिसमें कहा गया कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करने वाला यह सम्मेलन जिसमें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिकांश सदस्य उपस्थित हैं, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का असली प्रतिनिधि सम्मेलन है। यह सम्मेलन कांग्रेस और राष्ट्र को चुनौतियों का सामना करने के लिए तथा प्रभावशाली नेतृत्व देने के लिए सर्वसम्मति से श्रीमती इन्दिरा गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित करता है। इस प्रस्ताव का अनुमोदन भूतपूर्व केन्द्रीय राज्यमन्त्री अनन्त प्रसाद शर्मा ने किया। इसके पश्चात् विभिन्न प्रदेशों के प्रतिनिधियों ने इसका समर्थन किया। इस प्रकार श्रीमती गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस का विभाजन विट्ठल भाई पटेल भवन के प्रांगण में उसी स्थान पर हुआ जहां 1969 में पार्टी के दो टुकड़े हुए थे।

कांग्रेस कार्यसमिति ने 3 जनवरी को सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास करके श्रीमती गांधी और उनके समर्थकों को दल से निष्कासित कर दिया और इस प्रकार रिक्त स्थानों को भरने का अधिकार कांग्रेस अध्यक्ष ब्रह्मानन्द रेड्डी और जिला प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षों को सौंप दिया।

2 फरवरी, 1978 को चुनाव आयोग ने कांग्रेस (इ) को राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता दे दी और इस दल को चुनाव लड़ने के लिए ‘हाथ’ चुनाव चिन्ह दिया। 23 जून, 1980 को श्रीमती इन्दिरा गांधी के सुपुत्र संजय गांधी का एक विमान दुर्घटना में निधन हो गया। जिससे कांग्रेस (इ) को भारी क्षति पहुंची। मई, 1981 में श्रीमती इन्दिरा गांधी के बड़े सुपुत्र राजीव गांधी ने राजनीति में प्रवेश किया था।

23 जुलाई, 1981 को मुख्य चुनाव आयुक्त ने कांग्रेस (इ) को असली कांग्रेस के रूप में मान्यता दे दी। कांग्रेस (इ) का चुनाव निशान ‘हाथ’ (Hand) है। श्रीमती इन्दिरा गांधी जीवन के अंत तक कांग्रेस (इ) की अध्यक्षा रहीं और उनकी मृत्यु के पश्चात् श्री राजीव गांधी अध्यक्ष बने। वर्तमान अध्यक्ष श्री राहुल गांधी हैं।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का कार्यक्रम (PROGRAMME OF INDIAN NATIONAL CONGRESS)-

अप्रैल-मई, 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनावों के अवसर पर भारतीय, राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने पार्टी का चुनाव घोषणा-पत्र जारी किया था। इसमें देश भर के सभी वरिष्ठ नेताओं के सुझावों को ध्यान में रखा है। कांग्रेस ने स्थिरता, विकास, राष्ट्रीय एकता, धर्म-निरपेक्षता, भ्रष्टाचार उन्मूलन, स्वच्छ तथा जवाबदेह शासन का वायदा किया है। पार्टी ने गैर-कांग्रेसी राज्यों में ठप्प हो गए विकास कार्यक्रमों को नई गति देकर शुरू करने और देश में धर्म-निरपेक्ष लोकतन्त्र की रक्षा के लिए सजग रहने की प्रतिबद्धता दोहराई है। 2014 के लोकसभा के चुनाव के अवसर पर घोषित चुनाव घोषणा-पत्र के आधार पर कांग्रेस का मुख्य कार्यक्रम एवं नीतियां इस प्रकार हैं

1. राजनीतिक कार्यक्रम (POLITICAL PROGRAMMES)

  • कांग्रेस का लोकतन्त्र में अटूट विश्वास है।
  • कांग्रेस लोकतन्त्र के अनिवार्य और अपरिहार्य अंग के रूप में प्रेस की आज़ादी के प्रति वचनबद्ध है।
  • पार्टी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की रक्षा के लिए वचनबद्ध है।
  • कांग्रेस ने देश में स्वच्छ प्रशासन प्रदान करने और सार्वजनिक क्षेत्रों से भ्रष्टाचार को दूर करने का वचन दिया है। भ्रष्टाचार को जन्म देने वाले सभी नियन्त्रण समाप्त कर दिए जाएंगे और भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करने वाली सी० बी० आई० जैसी एजेन्सियों को पूर्ण स्वायत्तता दी जाएगी।
  • संविधान में कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 लागू रहेगी।
  • देश की सुरक्षा के सभी पहलुओं पर गौर करने की दृष्टि से राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् को पुनर्जीवित करने का आश्वासन दिया है। सेनाओं का आधुनिकीकरण किया जाएगा।

2. आर्थिक तथा सामाजिक कार्यक्रम
(ECONOMIC AND SOCIAL PROGRAMME)

1. आत्मनिर्भरता-कांग्रेस का लक्ष्य है भारत को आत्मनिर्भर बनाना। भारत जैसे ग़रीब देश को सम्पन्नता की ओर ले जाना है।
2. ग़रीबी दूर करना-कांग्रेस ग़रीबी को दूर करने के लिए वचनबद्ध है।

3. रोज़गार-कांग्रेस रोजगार के अवसर बढ़ाने पर विशेश ध्यान देगी। कांग्रेस कृषि विकास की दर में वृद्धि करके, निर्यात को प्रोत्साहन देकर तथा आवास और निर्माण के क्षेत्र में विशाल परियोजना चला कर रोज़गार के नए अवसर पैदा करेगी। कांग्रेस शिक्षित बेरोजगारों पर विशेष रूप से ध्यान देगी। बेरोज़गारी को दूर करने के लिए प्रत्येक वर्ष एक करोड़ नए रोजगार उपलब्ध कराए जाएंगे।

4. आर्थिक सुधार–आर्थिक सुधारों की गति बनाए रखी जाएगी ताकि सकल घरेलू उत्पाद की वार्षिक दर 8 से 9 प्रतिशत प्राप्त की जा सके। पार्टी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में राष्ट्रीय सुधारों के अनुरूप बुनियादी परिवर्तन लाने का वायदा किया है ताकि परिवहन, संचार और जीवन की अन्य मूलभूत आवश्यकताओं के मामले में शहर और गांवों का अन्तर कम किया जा सके।

5. कृषि सुधार-घोषणा-पत्र में कृषि पैदावार और किसानों की आर्थिक हालत में सुधार के लिए राज्य सहायता, प्रोत्साहन मूल्य तथा अन्य सम्बन्ध नीतियां जारी रखने और इनमें मज़बूती लाने का वायदा किया गया है। कृषि ऋण प्रणाली मज़बूत बनाई जाएगी तथा समूह ऋण योजना को बढ़ावा दिया जाएगा। सभी सार्वजनिक नलकूपों की हालत सुधारने और उन्हें चालू करने का समयबद्ध कार्यक्रम शुरू किया जाएगा। कांग्रेस काश्तकारों के लिए पट्टेदारी की व्यवस्था, ज़मीन की चकबन्दी और फालतू जमीन के वितरण की व्यवस्था और भूमि रिकार्ड रखने की बेहतर और सही व्यवस्था पर जोर देती रहेगी। कृषि को पूरी तरह से उद्योग का दर्जा दिया जाएगा। किसानों को उचित मज़दूरी दिलाई जाएगी।

6. उद्योग-औद्योगिक क्षेत्र में वृद्धि दर तीव्र की जाएगी। कृषि पर आधारित उद्योगों के विकास पर विशेष बल दिया जाएगा। लघु उद्योगों के विकास की ओर विशेष ध्यान दिया जाएगा। कांग्रेस ने उद्योग और व्यापार के उदारीकरण की जो प्रक्रिया 1991 में की उसे वह जारी रखेगी। कांग्रेस सामरिक और सुरक्षा से सम्बद्ध क्षेत्रों को छोड़कर अन्य सभी उद्योगों में गैर-लाइसैंसीकरण की प्रक्रिया को तेज़ करेगी। कांग्रेस निर्यात को प्रोत्साहन देने को सर्वोच्च प्राथमिकता देगी।

7. आवास-कांग्रेस आवास और निर्माण कार्यों में तेजी लाने के मार्ग में आ रही सभी कानूनी बाधाओं और अप्रभावी कानूनों को दूर करेगी। झुग्गियों और कच्ची बस्तियों को रहने लायक स्थानों परिवर्तित किया जाएगा। सभी बेघरों को घर दिए जाएंगे।

8. सार्वजनिक वितरण प्रणाली-सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विस्तार किया जाएगा कांग्रेस ये सुनिश्चित करेगी कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली का लाभ सिर्फ ग़रीब और जरूरतमंद लोगों को मिले।
9. दोपहर का भोजन-प्राइमरी स्कूलों के सभी बच्चों को दोपहर का भोजन दिया जाएगा।
10. सभी बच्चों के लिए बेहतर स्वास्थ्य व शिक्षा की व्यवस्था की जाएगी।
11. देश में आपरेशन ब्लैक बोर्ड योजना लागू की जाएगी।
12. धर्म-निरपेक्षता-कांग्रेस का धर्म-निरपेक्षता में अटल विश्वास है।

13. अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियां-अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जन-जातियों के कल्याणकारी कार्यक्रम को और तेज़ किया जाएगा। कांग्रेस ये सुनिश्चित करेगी कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए नौकरी और शिक्षा में आरक्षण की वर्तमान नीति को पूरी तरह लागू किया जाए। आरक्षण को वैधानिक रूप देकर उन्हें संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल किया जाएगा। अनुसूचित जाति तथा जनजाति के विद्यार्थियों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रमों का और अधिक विस्तार किया जाएगा। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की समुदायों की लड़कियों को प्रत्येक स्तर पर निःशुल्क शिक्षा दी जाएगी। देश के सभी आदिवासी क्षेत्रों में विशेष न्यायालयों को स्थापित किया जाएगा।

14. महिलाएं-कांग्रेस पार्टी महिलाओं के कल्याण और पुरुषों के समान अधिकार देने के लिए वचनबद्ध है। पार्टी महिलाओं के पूर्ण कानूनी, आर्थिक और राजनीतिक अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष जारी रखेगी। शिक्षा और रोज़गार में लिंग भेद समाप्त कर दिया जाएगा। महिला मृत्यु दर कम करने की दृष्टि से विशेष योजनाएं शुरू की जाएंगी। सती प्रथा, दहेज प्रथा, महिला भ्रूण हत्या और बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं के विरुद्ध समाज सुधार आन्दोलन में कांग्रेस सदैव आगे रहेगी। समूह बचतों और ग्रामीण महिलाओं की गतिविधियों में महिला समृद्धि योजना का विस्तार करके उनके पक्ष में ही खाते खोलने तथा ब्याज के भुगतान की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।

15. अल्पसंख्यक-कांग्रेस अल्पसंख्यकों के आर्थिक और सामाजिक विकास को बढ़ावा देने के लिए वचनबद्ध है। कांग्रेस अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए अपने 15 सूत्री कार्यक्रम की समय-समय पर समीक्षा करेगी और उसमें सुधार करेगी। पार्टी ने अल्पसंख्यकों के व्यक्तिगत कानून के मामले में किसी तरह का हस्तक्षेप न करने का वायदा किया है। कांग्रेस अल्पसंख्यकों और मानवाधिकारों के लिए एक नया मन्त्रालय गठित करेगी, ताकि इन दोनों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित किया जा सके। कांग्रेस उर्दू को उसका उचित स्थान दिलाएगी।

16. विकलांगों का कल्याण-अपंगता से ग्रस्त व्यक्तियों के अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करने तथा उन्हें राष्ट्रीय जीवनधारा में बराबरी का अवसर देने के लिए अलग से पूरा कानून शीघ्र ही बनाने का वायदा किया है।

17. युवा वर्ग-कांग्रेस सभी स्कूलों में एन० सी० सी० को अनिवार्य करेगी। साक्षरता, वनीकरण योजना, परिवार नियोजन कार्यक्रम, समाज सुधार आन्दोलन, कानूनी अधिकारों की जानकारी जैसे आन्दोलन चलाने के लिए शिक्षित युवा जन को संगठित किया जाएगा और इन कार्यों में काम करने के लिए उन्हें उचित पारिश्रमिक दिया जाएगा।

18. बाल मज़दूर-बाल मजदूरी को कम करने के लिए हर सम्भव उपाय किए जाएंगे तथा खतरनाक उद्योगों में बाल मजदूरी को पूरी तरह समाप्त किया जाएगा।

19. बिजली-बिजली का उत्पादन अधिक किया जाएगा।
20. दूर-संचार तथा डाक-कांग्रेस दूर-संचार में एक क्रान्ति लाएगी। सभी गांवों और ग्राम पंचायतों को राष्ट्रीय दूर-संचार जाल तन्त्र से जोड़ दिया जाएगा। डाक प्रणाली को और अधिक कुशल बनाया जाएगा।

21. रेल लाइनें-देशभर में बड़ी रेल लाइनों का जाल बिछाया जाएगा।
22. सभी गांवों को रेल और सड़क मार्गों से जोड़ा जाएगा।
23. कांग्रेस ने असंगठित क्षेत्रों में कर्मचारियों के लिए नई सामाजिक बीमा योजना शुरू करने का वायदा किया है।

24. शिक्षा-कांग्रेस 14 वर्ष तक की अवस्था के बच्चों के लिए नि:शुल्क बुनियादी शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के लिए संविधान में संशोधन करेगी। कांग्रेस प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य बनाने के पक्ष में है। किसी भी विश्व विद्यालय में भर्ती होने वाले अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के विद्यार्थियों को ट्यूशन फ़ीस और गुजारा भत्ता देने की छ: वर्ष की गारंटी दी जाएगी।

25. विदेश नीति-कांग्रेस की गुट-निरपेक्षता की नीति पर पूरा विश्वास है और पार्टी सभी देशों के साथ विशेषकर पड़ोसी देशों के साथ मित्रतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने के पक्ष में है। कांग्रेस नेपाल और बंगलादेश के साथ हिमालय क्षेत्र की नदियों के लिए एक नया एकीकृत विकास कार्यक्रम आरम्भ करेगी। कांग्रेस देश में पाकिस्तान के समर्थन से चलाए जा रहे आतंकवाद का मुकाबला करेगी। साथ ही वह पाकिस्तान के साथ आर्थिक, व्यापार, संस्कृति, शिक्षा और राजनीति के क्षेत्र में नज़दीकी सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास करेगी। भारत रूस के साथ व्यापार और रक्षा के क्षेत्रों में और निकट सम्बन्ध बनाने के प्रयास जारी रखेगा। कांग्रेस अमेरिका के साथ आपसी हित और चिन्ता के सभी मुद्दों पर रचनात्मक बातचीत जारी रखेगी। कांग्रेस पूर्ण निशस्त्रीकरण के पक्ष में है और कांग्रेस सरकार परमाणु हथियारों के निशस्त्रीकरण के लिए अपनी कोशिश जारी रखेगी। हमारी परमाणु नीति हमेशा शान्तिपूर्ण उद्देश्यों के प्रति समर्पित होगी। यदि पाकिस्तान ने परमाणु हथियारों को बनाना जारी रखा तो भारत को भी मजबूर होकर अपनी नीति बदलनी होगी।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा अपनी रणनीति में बदलाव की आवश्यकता-निःसन्देह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारतीय प्रजातन्त्र पर अमिट छाप छोड़ी है। लम्बे अर्से तक भारतीय राजनीतिक व्यवस्था पर छाई रहने वाली कांग्रेस पार्टी ने अन्य राजनीतिक दलों को कभी भी पनपने का अवसर नहीं दिया। दीर्घ काल तक भारतीय प्रजातन्त्र और समूचे राष्ट्र की बागडोर कांग्रेस पार्टी द्वारा संचालित होती रही। लेकिन पिछले एक दशक से कांग्रेस का प्रभुत्व, गरिमा, रणनीति और विश्वास विलुप्त होता जा रहा है। यही कारण है कि 1989 से लेकर 2014 तक के सभी आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी को पर्याप्त बहुमत नहीं मिल सका है जिससे कि वह अपनी सरकार बना सके। पिछले एक दशक से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जनाधार अन्य क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय दलों की ओर चला गया है। विशेषतः दलितों और मुस्लिम मतदाताओं का कांग्रेस पार्टी से मोह भंग हुआ है। दूसरे कांग्रेस पार्टी की कार्यशीलता भी उसकी असफलता के लिए उत्तरदायी रही है। अतः ऐसी परिस्थिति में केन्द्र में सत्ता प्राप्त करने के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को अपनी रणनीति में बदलाव लाना होगा। कांग्रेस को अन्य प्रतिद्वन्द्वी दलों के मुकाबले अपने दाव-पेचों में कुशलता लानी होगी। निःसन्देह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बदलते हुए राजनीतिक वातावरण की आवश्यकताओं के अनुरूप अपनी रणनीति में बदलाव करेगी।

चुनाव सफलता (Election Successes)-1980 के लोकसभा में जिन 525 स्थानों के लिए मतदान हुआ उनमें 351 स्थान कांग्रेस (आई) को मिले। इस प्रकार कांग्रेस (आई) को दो-तिहाई बहुमत प्राप्त हुआ।

मई, 1980 में हुए 9 राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों में कांग्रेस (इ) को तमिलनाडु को छोड़कर शेष अन्य आठ राज्यों-बिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत प्राप्त हुआ और इसकी सरकारें बनीं। 1984 के लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस (इ) को स्वर्गीय श्री राजीव गांधी के नेतृत्व में ऐतिहासिक विजय प्राप्त हुई थी, जो पहले कभी भी कांग्रेस को प्राप्त नहीं हुई थी। कांग्रेस (इ) को 508 सीटों (जिनके लिए चुनाव हुआ) में से 401 सीटें मिलीं। मार्च, 1985 में 11 राज्यों की विधान सभाओं के चुनाव में कांग्रेस (इ) को 8 राज्यों (बिहार, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश) में भारी सफलता मिली और कांग्रेस (इ) की सरकारें बनीं। नवम्बर, 1989 की लोकसभा में कांग्रेस (इ) को केवल 193 सीटें मिलीं। कांग्रेस (इ) पार्टी के नेता राजीव गांधी को लोकसभा के विरोधी दल के नेता के रूप में मान्यता मिली थी। फरवरी, 1990 में 8 राज्य विधान सभाओं के चुनाव में कांग्रेस (इ) को महाराष्ट्र तथा अरुणाचल प्रदेश के अतिरिक्त अन्य राज्यों में कोई विशेष सफलता नहीं मिली। 1991 के लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस को 225 सीटें प्राप्त हुईं और फिर भी इसकी सरकार बनी।

नवम्बर, 1993 में पांच राज्यों-हिमाचल, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा मिज़ोरम में सरकार बनाई। दिल्ली विधानसभा में कांग्रेस को केवल 14 सीटें मिलीं। दिसम्बर, 1993 में जनता दल (अ) के कांग्रेस (इ) में विलय के परिणामस्वरूप कांग्रेस को लोकसभा में बहुमत प्राप्त हुआ। अप्रैल-मई, 1996 में लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस को 144 सीटें मिलीं। इन चुनावों के साथ पांच राज्य विधान सभाओं के भी चुनाव हुए थे। इनमें भी कांग्रेस को भारी पराजय का मुंह देखना पड़ा। सितम्बर-अक्तूबर, 1996 को जम्मू-कश्मीर और उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावों में भी पार्टी को कोई विशेष सफलता प्राप्त नहीं हुई। फरवरी, 1997 में पंजाब राज्य विधानसभा के चुनावों में पार्टी की भारी पराजय हुई। 1998 में 12वीं लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस को केवल 142 सीटें प्राप्त हुईं और कांग्रेस को विरोधी दल के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। जबकि 1999 में 13वीं लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस को केवल 114 सीटें ही प्राप्त हुईं। यह कांग्रेस पार्टी की अब तक की सबसे बुरी पराजय है।

मई, 2001 में चार राज्यों और एक संघीय क्षेत्र (पाण्डिचेरी) की विधानसभाओं के चुनाव के बाद कांग्रेस ने असम और केरल में सरकार का निर्माण किया। फरवरी, 2002 में चार राज्यों-पंजाब, उत्तर प्रदेश, मणिपुर और उत्तराखंड की विधानसभाओं के चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस को पंजाब में 62, उत्तर प्रदेश में 25, मणिपुर में 12 और उत्तराखंड में 36 सीटें प्राप्त की। कांग्रेस ने इन चुनावों के बाद पंजाब, मणिपुर और उत्तराखंड में सरकार बनाई। अप्रैल-मई, 2004 में हुए 14वीं लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस गठबन्धन को 217 सीटें मिलीं। इनमें से कांग्रेस को 145 सीटों पर सफलता प्राप्त हुई। कांग्रेस ने डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में “संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन” की सरकार बनाई। अप्रैल-मई, 2009 में हुए 15वीं लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस गठबन्धन को 261 सीटें मिलीं। इनमें से कांग्रेस को 206 सीटों पर सफलता प्राप्त हुई। अतः कांग्रेस ने पुनः डॉ० मनमोहन सिंह के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की सरकार बनाई। परंतु 2014 में हुए 16वीं लोक सभा के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को केवल 44 सीटें ही मिल पाई थी।

प्रश्न 3. भारतीय जनता पार्टी की नीतियों तथा कार्यक्रमों का वर्णन कीजिए। (Explain the policies and programmes of Bhartiya Janata Party.)
उत्तर-यद्यपि जुलाई, 1979 में जनता पार्टी का विभाजन दोहरी सदस्यता के प्रश्न पर हुआ था, परन्तु विभाजन के बाद भी दोहरी सदस्यता का विवाद समाप्त नहीं हुआ। 19 मार्च, 1980 को जनता पार्टी के केन्द्रीय संसदीय बोर्ड ने बहुमत से यह फैसला किया कि जनता पार्टी का कोई भी अधिकारी, विधायक और संसद् सदस्य राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की रोजमर्रा की गतिविधियों में हिस्सा नहीं ले सकता। बोर्ड की बैठक में श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्री लाल कृष्ण अडवाणी और श्री नाना जी देशमुख ने बोर्ड के इस निर्णय का विरोध किया और इस सम्बन्ध में तैयार किए गए प्रस्ताव में अपना भी मत दर्ज कराया। 4 अप्रैल को जनता पार्टी का एक और विभाजन प्रायः निश्चित हो गया, जब पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने अपने संसदीय बोर्ड के प्रस्ताव का अनुमोदन कर पार्टी के विधायकों और पदाधिकारियों पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यों में भाग लेने पर रोक लगा दी। अनुमोदन प्रस्ताव के पक्ष में 17 सदस्यों ने और विरोध में 14 सदस्यों ने मत दिए। श्री अडवाणी के शब्दों में, “जनता पार्टी की कार्य समिति में पहली बार मतदान हुआ और यह भी किसी एक गुट को पार्टी से निकालने के लिए।”

5 अप्रैल, 1980 को भूतपूर्व जनसंघ के सदस्यों ने नई दिल्ली में दो दिन का सम्मेलन किया और एक नई पार्टी बनाने का निश्चय किया। सम्मेलन की अध्यक्षता श्रीमती विजयराजे सिंधिया ने की। 6 अप्रैल को भूतपूर्व विदेश मन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में लगभग चार हजार प्रतिनिधि शामिल हुए और दो दिन का यह समारोह एक राजनीतिक दल के वार्षिक अधिवेशन की तरह ही संचालित किया गया। ”
भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा (Ideology of Bhartiya Janata Party)–भारतीय जनता पार्टी ने स्वर्गीय लोकनायक श्री जयप्रकाश नारायण के समग्र क्रान्ति के सपनों को साकार करने और राजनीति को सत्ता का खेल न बनाने का संकल्प किया है। 6 अप्रैल शाम को रामलीला मैदान में नई पार्टी के मठन की घोषणा सार्वजनिक रूप से करते हुए श्री वाजपेयी ने कहा कि हमारी पार्टी राष्ट्रीयता, लोकतन्त्र, गांधीवाद, समाजवाद और धर्म-निरपेक्षता में विश्वास करती है और इन सिद्धान्तों पर चल कर रचनात्मक और आन्दोलनात्मक कार्यक्रम अपनाएगी और देश में जन-जागृति का अभियान करेगी।

भारतीय जनता पार्टी की नीतियां एवं कार्यक्रम (Policies and Programme of BhartiyaJanata Party)अप्रैल-मई, 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनाव भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन के एक प्रमुख घटक के रूप में लड़े। भारतीय जनता पार्टी की महत्त्वपूर्ण नीतियों एवं कार्यक्रमों का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है

(क) राजनीतिक कार्यक्रम (Political Programmes)-

1. राज्य की सत्ता की पुनःस्थापना-घोषणा-पत्र में कहा गया है कि पार्टी का सबसे प्रमुख कार्य राज्य और शासन की ‘इज्जत’ और ‘इकबाल’ को पुनः स्थापित करना है।
2. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता-चुनाव घोषणा-पत्र में कहा गया है कि भारतीय जनता पार्टी देश की एकता और अखण्डता की रक्षा के लिए प्रतिज्ञाबद्ध है। यह कश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे भारत को एक देश मानती है तथा सब भारतीयों को, चाहे वे कोई भी भाषा बोलते हों, जाति या धर्म में विश्वास रखते हों, एक जन समझती है।

संवैधानिक सुधार-

  • पार्टी संविधान के अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाएगी।
  • भाजपा विदर्भ की अलग राज्यों के रूप में स्थापना करेगी। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाएगा।
  • विधानमण्डलों सहित सभी निर्वाचित निकायों की निर्धारित अवधि 5 वर्ष सुनिश्चित करने के लिए उपाय किए जाएंगे।

3. सकारात्मक धर्म-निरपेक्षता-भारतीय जनता पार्टी सकारात्मक धर्म-निरपेक्षता में विश्वास रखती है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्महीन राज्य नहीं है। पार्टी सभी धर्मों को समान मानने में विश्वास रखती है। पार्टी देश की संस्कृति में विश्वास रखती है। धर्म-निरपेक्षता को कभी एक सम्प्रदाय को खुश रखने का बहाना अथवा सामूहिक रूप से वोट इकट्ठे करने की घृणित राजनीतिक चाल नहीं बनने देनी चाहिए।

4. केन्द्र और राज्य में सम्बन्ध-घोषणा-पत्र में कहा गया है कि पार्टी देश की एकता और अखण्डता को मज़बूत करने तथा सभी क्षेत्रों का संतुलित विकास सुनिश्चित करने के लिए एक मज़बूत केन्द्र के साथ ही सशक्त स्वायत्तशासी राज्यों का भी पक्षधर है। घोषणा-पत्र में लिखा है कि भारतीय जनता पार्टी केन्द्र और राज्यों के बीच उस सन्तुलन को पुनः स्थापित करेगी जिसकी हमारे संविधान निर्माताओं ने कल्पना की थी और इस उद्देश्य से निम्नलिखित कार्य किए जाएंगे-

  • भारतीय जनता पार्टी सरकारिया आयोग की प्रमुख सिफ़ारिशों को लागू करेगी।
  • पार्टी राज्य सरकारों को बर्खास्त करने और राज्य विधानमण्डलों को भंग करने के लिए अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग को समाप्त करेगी।
  • राज्य सरकारों का समर्थन किया जाएगा और उन्हें शक्तिशाली बनाया जाएगा, उनमें अस्थिरता नहीं लायी जाएगी और न ही उनका तख्ता पलटा जाएगा।
  • राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति राज्य सरकारों की सलाह से की जाएगी।

5. निष्पक्ष चुनाव-चुनाव उद्घोषणा-पत्र में यह स्पष्ट किया गया है कि भारतीय जनता पार्टी चुनावों की श्रेष्ठता को मानती है। इसका विश्वास है कि चुनाव नियमित रूप से तथा बहुत ही निष्पक्षता से कराए जाने चाहिएं और इसलिए चुनाव सम्बन्धी सुधार को उच्च प्राथमिकता देगी।

6. भ्रष्टाचार-घोषणा-पत्र में कहा गया है कि सारे भ्रष्टाचार की जड़ राजनीतिक तथा चुनाव सम्बन्धी भ्रष्टाचार में निहित है जबकि चुनावों को साफ़-सुथरा बनाने के आयोग का पहले वर्णन किया है तो भी राजनीतिक भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में सामान्य रूप से निम्नलिखित कदम उठाए जाएंगे-

  • विदेशों से किए गए समझौतों में भ्रष्टाचार के मामलों पर रक्षा सौदों में कमीशन लेने वालों की जांच की जाएगी और दोषियों को दण्डित किया जाएगा।
  • यह ओम्बुड्समैन-लोकपाल तथा लोकायुक्त तथा नियुक्त करने के लिए कानून बनाएगी और प्रधानमन्त्री तथा मुख्य मन्त्रियों को इनके अन्तर्गत लाया जाएगा।
  • सरकारी तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में क्रय एवं ठेके आदि देने सम्बन्धी प्रक्रिया तथा नियमों को सुचारु बना दिया जाएगा और राजनीतिक अधिकारियों के स्व-विवेक की शक्तियों को विनियमित कर दिया जाएगा।
  • क्रय तथा ठेके आदि देने का काम करने वाले सरकारी विभागों तथा सार्वजनिक क्षेत्रों के निगमों के दैनिक कार्य में राजनीतिक हस्तक्षेप तथा दखल-अन्दाजी को समाप्त कर दिया जाएगा।
  • बचत के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन तथा ईमानदार कर दाता को परेशानी से बचाने के लिए और काले धन को बढ़ने से रोकने के लिए व्यवस्था करके ढांचे को वैज्ञानिक और सुचारु रूप दिया जाएगा।
  • सब मन्त्रियों को प्रति वर्ष अपनी सम्पत्ति के बारे में घोषणा करनी होगी।
  • सरकारी विभागों के खर्चे में कमी की जाएगी।

7. उत्तर-पूर्व क्षेत्र (North-East Region)-उत्तर-पूर्व क्षेत्र की समस्याओं को हल करने के लिए पार्टी विशेष ध्यान देगी। भारत-बंगला देश की सीमा पर कांटेदार तार लगाई जाएगी। बाहर से आए लोगों का पता लगाकर उनका नाम मतदाता सूची से काटा जाएगा। सीमावर्ती राज्यों में सभी नागरिकों को पहचान-पत्र दिए जाएंगे। सीमा पार से प्रशिक्षण शिविरों से आतंकवादियों तथा विदेशी हथियारों को अन्दर आने से रोका जाएगा। सुरक्षा तन्त्र तथा खुफिया नेटवर्क को सुदृढ़ किया जाएगा।

8. जम्मू-कश्मीर-जम्मू-कश्मीर से सभी विदेशियों को निकाला जाएगा। आतंकवाद के खतरे और पाकिस्तान से आ रहे आतंकवादियों से निपटने के लिए सुरक्षा बलों को पूरी स्वतन्त्रता दी जाएगी। डोडा को अशान्त क्षेत्र घोषित किया जाएगा। जम्मू-कश्मीर के सभी आतंकग्रस्त क्षेत्रों के विस्थापितों का पुनर्वास किया जाएगा। राज्य में स्वतन्त्र और निष्पक्ष चुनाव कराए जाएंगे।

9. हिमालय क्षेत्र- भारतीय जनता पार्टी हिमालय क्षेत्र के लिए एक सुरक्षा नीति तैयार करेगी ताकि भारत के राष्ट्रीय हितों की पूरी रक्षा की जा सके।

10. न्यायिक सुधार-भारतीय जनता पार्टी शीघ्र, निष्पक्ष और कम खर्चीले न्याय की व्यवस्था के लिए उचित कदम उठाएगी। न्यायाधीशों के खाली पदों पर तुरन्त नियुक्ति की जाएगी और ऐसा कानून बनाएगी कि मुकद्दमों का निपटारा एक वर्ष में किया जा सके।

11. पुलिस और जनता-पुलिस राज्य का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। पिछले कई वर्षों से पुलिस और जनता के बीच की खाई निरन्तर चौड़ी होती जा रही है। जनता पुलिस के जुल्म की शिकायत करती है और पुलिस राजनीतिक हस्तक्षेप तथा रहन-सहन और काम की खराब हालत की शिकायत करती है। पुलिस आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाएगा।

12. प्रशासनिक सुधार-प्रशासन को जनता का हितैषी, निष्पक्ष और जवाबदेह बनाने के लिए भारतीय जनता पार्टी प्रशासन में महत्त्वपूर्ण सुधार करेगी। हिंसा फैलने के लिए जिला प्रशासन को जिम्मेवार ठहराया जाएगा। नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों का सेवाकाल बढ़ाने का समर्थन नहीं किया जाएगा। केन्द्र और राज्यों में प्रशासनिक सुधार विभाग को सुदृढ़ किया जाएगा।

13. मानव अधिकार आयोग- भारतीय जनता पार्टी वर्तमान प्रभावहीन अल्पसंख्यक आयोग के क्षेत्राधिकार को बढ़ाकर इसे एक मानव अधिकार आयोग के रूप में परिवर्तित कर देगी जिससे वह सभी व्यक्तियों, वर्गों तथा सम्प्रदायों के उचित अधिकारों की देखभाल कर सके।

14. शक्तियों का विकेन्द्रीकरण और पंचायती राज-भारतीय जनता पार्टी शक्तियों के विकेन्द्रीकरण और पंचायती राज संस्थाओं में विश्वास रखती है। पंचायती राज को सुदृढ़ बनाने के लिए 73वें और 74वें संशोधन में उचित परिवर्तन करेगी। पंचायतें को आर्थिक दृष्टि से आत्म-निर्भर बनाया जाएगा।

(ख) राष्ट्रीय अर्थ-व्यवस्था (National Economy)-भारतीय जनता पार्टी के चुनाव घोषणा-पत्र में यह वायदा किया गया है कि देश में मानव हितकारी अर्थव्यवस्था की स्थापना की जाएगी। पार्टी पूर्ण रोजगार प्राप्त करने, अधिकतम उत्पादन करने, मूल्यों को स्थिर रखने और अधिकाधिक लोगों को ग़रीबी की रेखा से ऊपर उठाने के लिए सब आवश्यक कदम उठाएगी, जब तक कि देश से ग़रीबी न समाप्त हो जाए। भारतीय जनता पार्टी स्वदेशी पर जोर देगी। भारतीय जनता पार्टी के आर्थिक कार्यक्रम एवं नीतियां इस प्रकार हैं

1. कृषि और ग्रामीण विकास-घोषणा-पत्र में कहा गया है कि भूमि सम्बन्धी कानूनों को लागू किया जाएगा, चालू बड़ी-बड़ी परियोजनाओं को जल्दी से पूरा किया जाएगा, हज़ारों छोटे-छोटे सिंचाई के कामों को शुरू किया जाएगा, खेती के काम आने वाली चीज़ों को सस्ते दामों में उपलब्ध कराया जाएगा, किसानों को फसल के लाभप्रद मूल्य दिए जाएंगे, कृषिजन्य पदार्थों तथा औद्योगिक वस्तुओं के मूल्यों में समानता स्थापित की जाएगी। पार्टी किसानों, कृषि श्रमिकों और ग्रामीण कारीगरों के कर्जे माफ़ करेगी। पार्टी कृषि-श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी दिलवाएगी। योजना राशि का 60 प्रतिशत कृषि और ग्रामीण विकास के लिए निर्धारित किया जाएगा। प्रत्येक गांव में सड़कों, सिंचाई, पीने के पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। गांव में बेघर लोगों को घर दिए जाएंगे।

2. गौ-रक्षा-पार्टी गायों और गौवंशों के वध पर प्रतिबन्ध लगाएगी, जिसमें बैल और बछड़े भी शामिल होंगे और गौ-मांस के निर्यात सहित इनके व्यापार पर प्रतिबन्ध लगाएगी।

3. उद्योग-चुनाव घोषणा-पत्र में कहा गया है कि भारतीय जनता पार्टी उद्योग का चहुंमुखी विकास करेगी और उन्हें प्रोत्साहन देगी। लघु तथा कुटीर उद्योगों के क्षेत्र को प्रोत्साहन दिया जाएगा। बहु-राष्ट्रीय निगमों, अन्य विदेशी कम्पनियों बड़े उद्योगों, लघु उद्योगों तथा कुटीर उद्योगों का क्षेत्र निर्धारित किया जाएगा। औद्योगिक कारखानों का आधुनिकीकरण किया जाएगा।

4. कर नीति- पार्टी ने कर ढांचे को युक्तिसंगत बनाने तथा चुंगी एवं बिक्री कर को समाप्त करने का पूरा आश्वासन दिया है। पार्टी प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों के दायित्व को स्वेच्छा से पालन करने के लिए एक पद्धति तैयार करेगी। घोषणापत्र में कहा गया है कि कर वंचकों तथा तस्करों से सख्ती के साथ निपटने के लिए नियमों से समुचित प्रावधान करेगी।

5. कीमतों में स्थिरता-घोषणा-पत्र के अनुसार भ्रष्टाचार को समाप्त करके एवं वितरण को सुचारु बनाकर मूल्यों में स्थिरता बनाए रखी जाएगी। यदि मूल्यों में वृद्धि हुई तो महंगाई भत्तों में तुरन्त वृद्धि करके उसके प्रभाव को समाप्त कर दिया जाएगा।

6. उपभोक्ता संरक्षण–पार्टी उपभोक्ता संरक्षण कानून में सुधार करेगी और उसको अच्छे ढंग से लागू करेगी। उपभोक्ता आन्दोलन को बढ़ावा दिया जाएगा।

7. काला धन-पार्टी काले धन के निर्माण को रोकने के कड़े उपाय करेगी।

(ग) सामाजिक कार्यक्रम (Social Programmes)-

1. अनुसूचित जाति एवं जनजाति-पार्टी अस्पृश्यता विरोधक कानूनों को सख्ती से लागू करेगी तथा खेतिहर मजदूरों को भूमि बांटने तथा बेघर लोगों को मकान बनाने के लिए भूमिखण्ड देने के सम्बन्ध में अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी, आदिवासियों के लिए नई वन-नीति बनाएगी। पार्टी आरक्षण सहित सभी विशेष सुविधाओं और वरीयता प्राप्त अवसरों सम्बन्धी प्रावधानों को इस ढंग से लागू करेगी जिससे अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों से जुड़े अधिकसे-अधिक वर्गों और अधिक लोगों को हर तरह से और हर स्तर पर लाभ पहुंचे।

2. पिछड़े वर्ग-भाजपा पिछड़े वर्गों के सामाजिक और आर्थिक न्याय को सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण नीति जारी रहेगी।

3. अल्पसंख्यक-भाजपा अल्पसंख्यक समुदायों को उनकी खुशहाली के लिए समान अवसर प्रदान करेगी तथा उन्हें शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रोत्साहित करेगी।

4. महिलाएं-भारतीय जनता पार्टी लिंग के आधार पर असमानता को समाप्त करेगी और शादी की रजिस्ट्रेशन अनिवार्य करेगी। पार्टी महिलाओं के लिए छात्रावास बनाएगी, बाल-विवाह को रोकेगी, पत्नी को पति की सम्पत्ति तथा आय में बराबर का भागीदार बनाएगी और दहेज के कारण हुई मृत्यु को हत्या माना जाएगा। सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए तीस प्रतिशत आरक्षण करेगी। राज्य विधानसभाओं या संसद् में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित की जाएंगी। तलाक सम्बन्धी कानूनों में भेदभाव पूर्ण धाराओं को हटाया जाएगा और बहु-विवाह को समाप्त किया जाएगा। समान काम के लिए समान वेतन के सिद्धान्त को लागू किया जाएगा। लड़कियों को शिक्षा देने के लिए विशेष सुविधाएं दी जाएंगी।

5. बच्चे-पार्टी बच्चों के विकास के लिए अच्छे विद्यालय खोलेगी, खेल के मैदानों की व्यवस्था करेगी तथा पीने के लिए अच्छे दूध का प्रबन्ध करेगी। प्रत्येक बच्चे की वार्षिक शारीरिक जांच करवाई जाएगी।

6. युवाजन-भारतीय जनता पार्टी युवाजनों को ग़रीबी दूर करने तथा सामाजिक बुराइयों को दूर करने में लगाएगी।

7. घर और शहर विकास-पार्टी प्रत्येक परिवार को घर के लिए सस्ते भाव पर ज़मीन देगी और शहर के विकास के लिए उचित कदम उठाएगी।

8. शिक्षा- भारतीय जनता पार्टी 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देगी और प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम लागू करेगी। पार्टी नैतिक शिक्षा को अनिवार्य करेगी और अध्यापकों के वेतन तथा स्तर में वृद्धि करेगी।

9. भाषा-पार्टी तीन-सूत्रीय भाषा फार्मूला लागू करेगी और सरकारी भाषा पर संसदीय समिति की सिफ़ारिशों को लागू करेगी। पार्टी हिन्दी और संस्कृत का विकास करेगी।

(घ) राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security)—पार्टी राष्ट्रीय सुरक्षा को जिम्मेवारी से निभाने के लिए बड़ी जिम्मेवारी से काम लेगी। पार्टी सामाजिक दृष्टि से संवेदनशील सीमावर्ती राज्यों जैसे-जम्मू और कश्मीर, पंजाब, पूर्वोत्तर प्रदेश तथा असम की सामाजिक तथा राजनीतिक गड़बड़ियों को दूर करने की कोशिश करेगी।

(ङ) विदेश नीति (Foreign Policy)—पार्टी ने स्पष्ट किया है कि वह स्वतन्त्र विदेश नीति अपनाएगी तथा विश्व शान्ति, नि:शस्त्रीकरण तथा नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था पर जोर देगी। भाजपा परमाणु अस्त्र नीति का पुनर्मूल्यांकन करेगी और परमाणु अस्त्र बनाने का विकल्प इस्तेमाल करेगी। पार्टी ने गुट-निरपेक्ष आन्दोलन को मजबूत करने, महाशक्तियों के प्रभुत्त्व को कम करने तथा पड़ोसी देशों के साथ शान्ति और मित्रता की नीति अपनाने का भी वचन दिया है। पार्टी संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में भारत को स्थायी सदस्य का स्थान दिलाने के लिए प्रयास करेगी। विदेशों में गए भारतीयों के लिए दोहरी नागरिकता के प्रश्न पर नए सिरे से विचार किया जाएगा। भाजपा सभी देशों के बीच शान्ति स्थापित करने, विश्व के सभी लोगों की समृद्धि और इस महान् तथा प्राचीन सभ्यता वाले देश के गौरव के अनुरूप विश्व के मामलों में भारत की भूमिका के विस्तार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराती है।

केन्द्र में सत्ता प्राप्ति के सन्दर्भ में भाजपा की क्षमता-भारत में दीर्घ काल तक एक ही राजनीतिक दल का प्रभुत्व बना रहा। अन्य दलों को उभरने का अधिक अवसर नहीं मिला, इसी कारण उनकी केन्द्र में सत्ता प्राप्ति की दावेदारी अल्पकालिक ही रही। इसी दौड़ में भारतीय जनता पार्टी का भी नाम आता है। भारतीय जनता पार्टी पर आरोप लगाया जाता है कि यह हिन्दुवादी और संकीर्ण विचारों वाली पार्टी है। इसे यदि केन्द्र में सत्ता में लाया गया तो भारतीय विविधतापूर्ण समाज को भारी क्षति होगी। आलोचकों का मत है भाजपा की उग्र विचारधारा भारतीय समुदाय के एक बड़े वर्ग को निराश कर देगी जिससे राष्ट्रीय एकता की नींव हिल जाएगी। परन्तु आलोचकों का ऐसा मानना उचित नहीं कहा जा सकता। भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा पुरातन भारतीय संस्कृति का स्पष्टीकरण है। इसकी नीतियां बड़ी सुदृढ़ और कार्यक्रम बहुत व्यापक है।

इसका संगठनात्मक आधार अत्यन्त सुदृढ़ है। इसके नेताओं के पास प्रशासनिक कार्यों का दीर्घकालीन अनुभव है। विशेषतया भूतपूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी की नेतृत्व क्षमता पर किसी को सन्देह नहीं था। इतना ही नहीं इस पार्टी के अनेक नेताओं ने अपनी राजनीतिक क्षमता के कारण ही विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। इस पार्टी ने समाज के हर वर्ग अथवा समुदाय को साथ लेकर चलने तथा आम सहमति से शासन संचालन पर बल दिया। आर्थिक रूप से भी भाजपा की नीतियां राष्ट्र हित को सर्वोपरि मानती हैं। भाजपा द्वारा अपनी नीतियों और कार्यक्रमों मे किए जाने वाले समयानुकूल बदलाव तथा इसकी प्रशासनिक क्षमता को ध्यान में रख कर ही भारतीय मतदाताओं ने 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनावों में इस पार्टी को 282 सीटें जिता दी थी, परिणामस्वरूप इस पार्टी ने श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार का निर्माण किया।

चुनाव सफलताएं (Election Successes) भारतीय जनता पार्टी को चुनाव आयोग ने राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता दी और इसको चुनाव लड़ने के लिए ‘कमल का फूल’ चुनाव चिह्न दिया। दिसम्बर, 1984 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को केवल दो सीटें मिलीं और पार्टी अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी भी चुनाव हार गए। मार्च, 1985 में राज्यों की विधान सभाओं के चुनाव में भी इसको विशेष सफलता नहीं मिली। परन्तु नवम्बर, 1989 के लोकसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 88 सीटें मिलीं और भारतीय जनता पार्टी के समर्थन के कारण ही राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बन सकी। फरवरी, 1990 में हुए 8 राज्यों की विधान सभाओं के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में बहुत अधिक सफलता मिली। मध्य प्रदेश और गुजरात में भारतीय जनता पार्टी ने जनता दल के साथ मिलकर सरकार बनाई। 1991 में दसवीं लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी को 119 सीटें मिली और इसे विरोधी दल के रूप में मान्यता दी गई।

जून, 1991 में उत्तर प्रदेश में पहली बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी। नवम्बर, 1993 में हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मिज़ोरम, मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की विधानसभाओं के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को दिल्ली में सबसे अधिक सफलता मिली और इसकी दिल्ली तथा राजस्थान में सरकार बनी। उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश में इसे उम्मीद से कम सीटें मिली जबकि हिमाचल प्रदेश में इसकी बुरी तरह पराजय हुई। नवम्बर-दिसम्बर, 1994 व फरवरी-मार्च 1995 में दस राज्यों की विधान सभाओं के चुनाव हुए। इन चुनावों में इस दल को अच्छी सफलता प्राप्त हुई। इस दल ने गुजरात में अकेले व महाराष्ट्र में शिव सेना के साथ मिलकर अपनी सरकारें बनाईं। भारतीय जनता पार्टी ने दक्षिणी राज्यों में भी अपने पांव पसारे हैं। 1996 के लोकसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 161 सीटें प्राप्त हुईं।

भारतीय जनता पार्टी लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। राष्ट्रपति ने पार्टी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमन्त्री नियुक्त किया। लोकसभा में बहुमत सिद्ध न होने के कारण अटल बिहारी वाजपेयी को 28 मई, 1996 को प्रधानमन्त्री पद से त्याग-पत्र देना पड़ा। जून, 1996 में भारतीय जनता पार्टी को मान्यता प्राप्त विरोधी दल का दर्जा दिया गया और अटल बिहारी वाजपेयी मान्यता प्राप्त विरोधी नेता बने। फरवरी-मार्च, 1998 में 12वीं लोकसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 182 सीटें प्राप्त हुईं। भारतीय जनता पार्टी ने अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनाई। भारतीय जनता पार्टी ने सितम्बर-अक्तूबर, 1999 में 13वीं लोकसभा का चुनाव राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन के एक महत्त्वपूर्ण घटक के रूप में लड़ा। इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को 182 सीटें प्राप्त हुईं और इसने राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन के दलों के साथ मिलकर सरकार बनाई। मई, 2001 में चार राज्यों (असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल) और एक संघीय क्षेत्र (पाण्डिचेरी) की विधानसभाओं के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को केवल 12 सीटें प्राप्त हुईं।

फरवरी, 2002 में हुए उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर और पंजाब विधानसभाओं के चुनावों में भाजपा को क्रमश: 107, 19, 4 तथा 3 सीटें प्राप्त हुईं। अप्रैल-मई, 2004 में हुए 14वीं लोकसभा के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले ‘राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन’ को केवल 186 सीटें ही मिल पाईं। इसमें से भारतीय जनता पार्टी को केवल 138 सीटें ही मिलीं, जिस कारण इस पार्टी को सत्ता से हटना पड़ा। अप्रैल-मई, 2009 में हए 15वीं लोकसभा के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को केवल 159 सीटें ही मिल पाईं। इसमें से भारतीय जनता पार्टी को केवल 116 सीटें ही मिलीं। 2014 में हुए 16वीं लोकसभा चुनावों में भाजपा को 282 सीटें (राजग को 334 सीटें) मिलीं। अतः इसने श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार का निर्माण किया।

प्रश्न 4. भारतीय साम्यवादी दल के संगठन तथा कार्यक्रमों का वर्णन करो। (Discuss the organisation and programmes of the Communist Party of India.)
अथवा
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पर संक्षिप्त नोट लिखिए। (Write a brief note on the Communist Party of India.)
उत्तर- भारतीय साम्यवादी दल राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक दल है। इसकी स्थापना 1924 में की गई। इसकी स्थापना में मानवेन्द्र नाथ राय (M.N. Roy) का बड़ा हाथ था।
स्वतन्त्रता के पश्चात् इस दल ने बड़ी तेजी से प्रगति की। 1957 में केरल राज्य में इसे सरकार बनाने का अवसर मिला। यह भारत के किसी राज्य में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी। 1959 में इस दल में फूट पड़ गई और उसके दो गुट बन गए। 1962 में जब भारत का चीन के साथ विवाद उठा तो एक गुट ने भारत सरकार को ठीक बताया तथा उसका समर्थन किया परन्तु दूसरे ने चीन को ठीक बताया तथा सरकार पर जोर दिया कि वह चीन के साथ शान्ति वार्ता आरम्भ करे। अप्रैल, 1964 में दल की राष्ट्रीय परिषद् की बैठक में 96 से 32 सदस्य बाहर चले गए। 8 सितम्बर, 1964 को लोकसभा के 32 में से 11 साम्यवादी सदस्यों ने गोपालन के नेतृत्व में अपना एक अलग दल मार्क्सिस्ट (C.P.M.) नाम से संगठित कर लिया और 15 सितम्बर, 1964 को उसे चुनाव आयोग ने भी मान्यता दे दी। आजकल श्री एस. सुधाकर रेड्डी इसके महासचिव हैं।

भारतीय साम्यवादी दल का कार्यक्रम (Programme of the C.P.L.)-अप्रैल-मई, 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनाव के अवसर पर चुनावी घोषणा-पत्र जारी करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन तथा संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की आलोचना की। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने घोषणा-पत्र में राजनीतिक अस्थिरता, निर्धनता, बेरोज़गारी, महंगाई व बढ़ते हुए भ्रष्टाचार के लिए भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस को दोषी ठहराया। पार्टी ने कहा कि कांग्रेस ही केन्द्र में एकमात्र विकल्प नहीं है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का कहना है कि आज की विषम परिस्थितियों में राजनीतिक स्थिरता, एकता, सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक विकास को केवल वामपंथी दल ही सुनिश्चित कर सकते हैं। घोषणा-पत्र में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने मतदाताओं से अपील की कि वे कांग्रेस तथा साम्प्रदायिक शक्तियों को हराएं तथा वामपंथी दलों को सरकार बनाने का अवसर दें।

(क) राजनीतिक कार्यक्रम (Political Programme of the C.P.I.)-पार्टी का राजनीतिक कार्यक्रम एवं नीतियां निम्नलिखित हैं

  • पार्टी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को बनाए रखने के लिए वचनबद्ध है।
  • पार्टी साम्प्रदायिक सद्भावना और धर्म-निरपेक्ष लोकतान्त्रिक व्यवस्था को बनाए रखने के पक्ष में हैं। पार्टी धार्मिक स्थानों का साम्प्रदायिक तथा देश विरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल करने के विरुद्ध है। घोषणा-पत्र में कहा गया है कि धर्म-निरपेक्ष ताकतों की मजबूती के लिए ज़रूरी है कि विध्वंसकारी तत्त्वों पर काबू पाया जाए।
  • पार्टी केन्द्र राज्य सम्बन्धों का पुनर्गठन कर के राज्यों को आर्थिक शक्तियां देने के पक्ष में है।
  • पार्टी अन्तर्राज्य परिषद् को पुनर्गठित करके उसे क्रियाशील बनाएगी।
  • जम्मू कश्मीर के सम्बन्ध में संविधान की धारा 370 की रक्षा की जाएगी।
  • भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए फौरन लोकपाल विधेयक व्यवस्था बनाई जाएगी जिसके अधिकार क्षेत्र में प्रधानमन्त्री को भी लाया जाएगा। भ्रष्टाचार की समाप्ति के लिए कारगर कदम उठाए जाएं।

(ख) आर्थिक कार्यक्रम (Economic Programme)-नौकरशाही नियन्त्रण को समाप्त करने और लाल फीताशाही खत्म करने के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था में व्यापक सुधार की आवश्यकता पर बल देते हुए भारतीय साम्यवादी दल ने अपना निम्न कार्यक्रम प्रस्तुत किया-

  • सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण रोका जाए। दूरसंचार, बिजली आदि नीतियों को बदला जाए। सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को चुस्त-दुरुस्त किया जाए।
  • मौजूदा औद्योगिक नीति को बदला जाए। अंधाधुंध उदारीकरण की नीतियों को बदला जाए जोकि देश की सम्प्रभुता को कमजोर कर रही है।
  • बजट का 50 प्रतिशत कृषि, बागवानी, मत्स्यपालन, पशु-पालन आदि के विकास के लिए आबंटित किया जाएगा और सिंचाई की सुनिश्चित व्यवस्था की जाएगी।
  • किसानों को निर्धारित कीमतों पर कृषि सामानों की आपूर्ति की जाएगी। खासकर छोटे और सीमांत किसानों को सहायता प्राप्त कृषि सामान, कर्ज़, आदि दिया जाएगा।

(ग) सामाजिक कार्यक्रम (Social Programme)-

  • बाल-मज़दूरी और बन्धुआ मज़दूरी जैसी बुराइयों का उन्मूलन किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय बाल मज़दूर एवं बन्धुआ मज़दूर आयोग का गठन हो।
  • सभी लोगों को अवश्य ही संतुलित आहार, स्वच्छ पेयजल के लिए संतुलित सुनिश्चित आर्थिक सुविधा की व्यवस्था की जानी चाहिए।
  • बाल शोषण, खासकर लड़कियों के शारीरिक शोषण के लिए अवश्य ही कठोर सज़ा दी जानी चाहिए।
  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली को अवश्य ही मज़बूत किया जाना चाहिए।
  • काम के अधिकार को संविधान में मौलिक अधिकार के रूप में शामिल करना और बेकारी भत्ता देना चाहिए।
  • सभी गांवों तथा शहरी इलाकों में स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था करना।
  • शिक्षा तथा जन साक्षरता का प्रसार किया जाए। शिक्षा के निजीकरण को रोका जाए।
  • महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लैंगिक समानता सम्बन्धी विश्व महिला सम्मेलन द्वारा स्वीकृत बीजिंग घोषणा 1995 को लागू किया जाए। संविधान के अन्तर्गत दी गई संवैधानिक तथा कानूनी गारंटियों को लागू किया जाए। सभी समुदायों की महिलाओं के लिए समान कानूनी अधिकार प्रदान किए जाएं।
  • श्रमजीवी महिलाओं के लिए होस्टल एवं शिशु-शालाओं की स्थापना की जानी चाहिए।
  • आदिवासियों के खिलाफ अत्याचारों को रोका जाए।

(घ) विदेश नीति (Foreign Policy)—विश्व के बदलते हुए परिवेश में अमेरिका द्वारा विश्व पर अपनी नई विश्व व्यवस्था थोपने और थानेदारी जमाने का दृढ़तापूर्वक प्रतिरोध किया जाएगा। पार्टी विकासशील देशों के आपसी सहयोग पर बल देगी। भारत की परमाणु अप्रसार सन्धि की नीति के प्रति पार्टी को दृढ़ विश्वास है। वर्तमान विश्वसन्दर्भ में गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को और अधिक सशक्त बनाया जाएगा।

चुनाव सफलताएं (Election Successes)-जनवरी, 1980 के लोकसभा के चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को केवल 11 सीटें मिलीं। मई, 1980 में हुए 9 राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों में इसको 54 सीटें मिलीं। दिसम्बर, 1984 के लोकसभा के चुनाव में इसे केवल 8 सीटें मिलीं। 1989 के लोकसभा के चुनाव में पार्टी को केवल 12 सीटें मिलीं। फरवरी, 1990 में हुए 8 राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव में पार्टी को कोई विशेष सफलता नहीं मिली। मई, 1991 में भारतीय साम्यवादी दल ने जनता दल तथा अन्य वामपंथी दलों से मिल-कर चुनाव लड़ा। परन्तु इसे कोई विशेष सफलता नहीं मिली। इसको केवल 13 सीटें प्राप्त हुईं। नवम्बर, 1993 में हुए पांच राज्यों तथा दिल्ली की विधानसभाओं के चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी को विशेष सफलता नहीं मिली।

नवम्बर-दिसम्बर 1994 में हुए और फरवरी-मार्च 1995 में हुए दस राज्य विधानसभा के चुनावों में इसे कोई विशेष सफलता नहीं मिली। आन्ध्र में इसने तेलुगू देशम् के सहयोगी दल के रूप में चुनाव लड़ा। 1996 के लोकसभा के चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को केवल 12 सीटें मिलीं। अन्य दलों के साथ मिलकर कम्युनिस्ट पार्टी पहली बार केन्द्र में मन्त्रिमण्डल में सम्मिलित हुई। पार्टी संयुक्त मोर्चा सरकार में घटक रही है। फरवरी, मार्च 1998 में 12वीं लोकसभा चुनावों में पार्टी को 9 सीटें जबकि 1999 में 13वीं लोकसभा में केवल 4 सीटें प्राप्त हुईं। मई, 2001 में चार राज्यों (असम, केरल, तमिलनाडु और पश्चिमी बंगाल) और एक संघीय क्षेत्र (पाण्डिचेरी) की विधानसभाओं के चुनाव में भारतीय साम्यवादी पार्टी को कोई विशेष सफलता नहीं मिली। अप्रैल-मई, 2004 में हुए 14वीं लोकसभा के चुनावों में भारतीय साम्यवादी पार्टी ने 10 सीटें जीती। इस पार्टी ने कांग्रेस के नेतृत्व में बनी “संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन” की सरकार को बाहर से समर्थन दिया। अप्रैल-मई, 2009 में हुए 15वीं लोकसभा के चुनाव में भारतीय साम्यवादी पार्टी ने केवल 4 सीटें जीतीं। 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनावों में इस दल को केवल एक सीट ही मिल पाई थी।

प्रश्न 5. मार्क्सवादी साम्यवादी दल की नीतियां तथा उसके कार्यक्रमों का वर्णन करो। .
[Describe the policies and programme of C.P.I. (M]
उत्तर-1959 में चीन के साथ सम्बन्धों के बारे में भारतीय साम्यवादी दल में दो गुट बन गए और 1962 के चीन के आक्रमण ने इस मतभेद को और अधिक बढ़ा दिया। एक गुट ने चीन के आक्रमण को आक्रमण कहा और इसका मुकाबला करने के लिए भारत सरकार को पूरी सहायता देने का वचन दिया, परन्तु दूसरे गुट ने जो चीन के प्रभाव में था, इसे सीमा सम्बन्धी विवाद कह कर पुकारा। परिणामस्वरूप 1964 में वामपंथी सदस्य जिनकी संख्या लगभग एकतिहाई थी, भारतीय साम्यवादी दल से अलग हो गए और मार्क्सवादी साम्यवादी दल (C.P.M.) की स्थापना की। आजकल श्री सीता राम यचुरी पार्टी के महासचिव हैं।

मार्क्सवादी पार्टी का कार्यक्रम (PROGRAMME OF MARXIST PARTY)-

अप्रैल-मई, 2014 में हुए 16वीं लोकसभा चुनावों के अवसर पर मार्क्सवादी पार्टी ने चुनाव घोषणा-पत्र जारी किया। मार्क्सवादी पार्टी का कार्यक्रम एवं नीतियां निम्नलिखित हैं

(I) राजनीतिक कार्यक्रम (Political Programmes)-

  • राज्यों को और अधिक शक्तियां देकर केन्द्र राज्य सम्बन्धों का पुनर्गठन किया जाए।
  • राज्यों के पक्ष में और वित्तीय साधनों का वितरण और केन्द्र के हाथों में इन साधनों का अति-केन्द्रीयकरण समाप्त हो।
  • धर्म को राजनीति से अलग रखने सम्बन्धी कानून का निर्माण।
  • अल्पसंख्यकों के जायज अधिकारों की रक्षा की जाए।
  • सभी धार्मिक स्थलों की 15 अगस्त, 1947 को जो स्थिति थी उसे ज्यों का त्यों बनाए रखने की व्यवस्था का कड़ाई से पालन किया जाए। अयोध्या विवाद का जल्दी निपटारा करने के लिए उसे सर्वोच्च न्यायालय को सौंपने का वायदा किया।
  • कश्मीर समस्या के समाधान के लिए सभी राजनीतिक उपायों की घोषणा की जाए। इसके साथ ही धारा-370 की रक्षा की जाए।

(II) आर्थिक कार्यक्रम (Economic Programmes)

  • देश की आर्थिक सम्प्रभुता की रक्षा की जाए और उसकी आत्मनिर्भरता को मजबूत बनाया जाए। अंधाधुंध उदारीकरण की नीतियों को बदला जाए जोकि देश की सम्प्रभुता को कमजोर कर रही है।
  • सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण रोका जाए। दूरसंचार, बिजली आदि नीतियों को बदला जाए। सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को चुस्त दुरस्त किया जाए।
  • मौजूदा औद्योगिक नीति को बदला जाए। नई नीति ऐसी हो जोकि घरेलु उद्योगों को मज़बूती प्रदान करे। विदेशी पूंजी के प्रवेश में इजाज़त देने का फैसला, राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और औद्योगिक सम्बन्धी ज़रूरतों के आधार पर हो।
  • 1970 के भारतीय पेटेंट कानून में ऐसा कोई भी संशोधन न हो जो भारत की सम्प्रभुत्ता को कमजोर करता हो।
  • मज़दूरों को भयानक शोषण से बचाया जाए व पांचवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाए।
  • गुप्त मतदान के जरिए ट्रेड यूनियनों को मान्यता दी जाए।
  • सैनिकों के लिए एक रैंक एक पेन्शन की व्यवस्था लागू की जाए।
  • काम के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी जाए।

(III) कृषि क्षेत्र (Agriculture Area)

  • भूमि सुधारों को ज़ोरों से लागू किया जाए। जोतने वालों में भूमि का वितरण किया जाए।
  • ग़रीब किसानों का कर्ज माफ किया जाए। किसानों को पैदावार के लाभकारी दाम दिए जाएं और उन्हें सस्ते ऋण तथा अनुदान देकर खेती में लगने वाली चीजें उपलब्ध कराई जाएं।
  • सिंचाई के प्रसार के लिए कहीं ज्यादा योजना आबंटन हो, फ़सल बीमा की समुचित योजनाएं हों।
  • समुचित जल संसाधन नीति बनाई जाए ताकि साल दर साल आने वाले सूखे और बाढ़ की आपदा से छुटकारा मिल सके।

(IV) सामाजिक कार्यक्रम (Social Programmes)

  • अनुसूचित जातियों के खिलाफ अत्याचार रोके जाएं। जातिवादी भेदभाव का खात्मा हो, समानता की गारंटी करने वाले कानूनों का कड़ाई से पालन किया जाए।
  • आदिवासियों के खिलाफ अत्याचारों को रोका जाए।
  • अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण लागू किए जाएं। अनुसूचित जातियों में दलित ईसाइयों को भी आरक्षण प्रदान किया जाए।
  • आवास को प्राथमिक अधिकार का दर्जा प्रदान किया जाए।
  • प्राथमिक स्वास्थ्य तथा सफाई की व्यवस्था के प्रबन्ध किए जाएं। स्वास्थ्य रक्षा सुविधाओं की निजीकरण से रक्षा होनी चाहिए।

विदेश नीति-गुट-निरपेक्षता की नीति को मज़बूत किया जाए और विश्व शान्ति का जोरदार समर्थन तथा नाभिकीय युद्ध के खतरे के विरुद्ध संघर्ष किया जाए। विश्व शान्ति व सुरक्षा को प्रोत्साहन दिया जाए। बदलते हुए परिवेश में अमेरिका द्वारा विश्व पर नई विश्व व्यवस्था थोपने का दृढ़तापूर्वक प्रतिरोध किया जाए। विकासशील देशों के आपसी सहयोग पर बल दिया जाए।

चुनाव सफलताएं-दिसम्बर, 1984 के लोकसभा के चुनाव में पार्टी को केवल 20 सीटें मिलीं। मार्च, 1985 में हुए 11 राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव में इसको कोई विशेष सफलता नहीं मिली। मार्च, 1987 में पश्चिमी बंगाल और केरल की विधानसभा के चुनावों में मार्क्सवादी दल को महान् सफलता मिली। नवम्बर, 1989 के लोकसभा के चुनाव में पार्टी को 32 सीटें मिलीं। फरवरी, 1990 में हुए 8 राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव में पार्टी को कोई विशेष सफलता नहीं मिली। 1991 के लोकसभा के चुनाव में मार्क्सवादी पार्टी को 35 सीटें प्राप्त हुईं। पश्चिमी बंगाल में मार्क्सवादी पार्टी 25 वर्ष से सत्ता में है। नवम्बर, 1993 में हुए पांच राज्यों तथा दिल्ली की विधानसभाओं के चुनाव में और नवम्बर-दिसम्बर, 1994 में और फरवरी-मार्च, 1995 में हुए दस राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों में मार्क्सवादी पार्टी को कोई विशेष सफलता नहीं मिली।

1996 के लोकसभा के चुनाव में मार्क्सवादी पार्टी को 32 सीटें प्राप्त हुईं। मार्क्सवादी पार्टी ने अन्य दलों के साथ मिलकर संयुक्त मोर्चा की स्थापना की, परन्तु मार्क्सवादी संयुक्त मोर्चा की सरकार में सम्मिलित नहीं हुआ। मार्क्सवादी पार्टी ने संयुक्त मोर्चा की सरकार बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1998 में 12वीं लोकसभा के चुनाव में मार्क्सवादी पार्टी को 32 सीटें प्राप्त हुईं। 1999 में लोकसभा के चुनावों में मार्क्सवादी पार्टी को 33 सीटें प्राप्त हुईं। मई, 2001 में चार राज्यों (असम, केरल, तमिलनाडु एवं पश्चिम बंगाल) और एक संघीय क्षेत्र (पाण्डिचेरी) की विधानसभाओं के चुनाव में मार्क्सवादी पार्टी को पश्चिम बंगाल की विधानसभा में लगातार छठी बार सफलता प्राप्त हुई और मार्क्सवादी नेता बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में वामपंथी मोर्चा की सरकार बनी।

अप्रैल-मई, 2004 में हुए 14वीं लोकसभा के चुनाव में मार्क्सवादी साम्यवादी दल ने 43 सीटें जीतीं। इस दल ने कांग्रेस के नेतृत्व में “संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन” की सरकार बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अप्रैल-मई, 2009 में हुए 15वीं लोकसभा के चुनावों में इस पार्टी को केवल 16 सीटें ही मिलीं। अप्रैल-मई, 2011 में हुए पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में मार्क्सवादी दल के नेतृत्व में वाममोर्चा को कुल 294 सीटों में से केवल 62 सीटें ही मिलीं। इस प्रकार पिछले 34 सालों से सत्ता में रहे वाममोर्चा को करारी हार का सामना करना पड़ा। 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनावों में इस दल को केवल 9 सीटें ही मिल पाई थीं।

प्रश्न 6. भारत में राजनीतिक दलों की मुख्य समस्याओं की व्याख्या कीजिए। (P.B. 2005) (Discuss the main problems of the Political Parties in India.)
अथवा भारत की दल प्रणाली की समस्याओं का वर्णन करें।
(Discuss the problems facing the Party System of India.)
उत्तर- भारत में संसदीय शासन-प्रणाली की व्यवस्था की गई है। संसदीय शासन-प्रणाली राजनीतिक दलों के बिना नहीं चल सकती। निःसन्देह भारत में संसदीय शासन प्रणाली के सफलतापूर्वक संचालन का श्रेय यहां के राजनीतिक दलों को दिया जाता है। परन्तु भारत में प्रजातन्त्रात्मक व्यवस्था इतनी अधिक सफल नहीं हो पाई है जितनी कि इंग्लैण्ड, अमेरिका, स्विट्ज़रलैण्ड आदि में। इसका प्रमुख कारण राजनीतिक दलों के समक्ष आने वाली समस्याएं हैं। भारत में राजनीतिक दलों को निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है-

1. संगठनात्मक समस्याएं (Organisational Problems)-प्रायः सभी राजनीतिक दलों में संगठनात्मक समस्याएं पाई जाती हैं। 1969 के विभाजन से पूर्व कांग्रेस एक संगठित तथा व्यापक आधारित संगठन था, परन्तु 1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ जिससे दल की संगठनात्मक समस्याएं उभर कर आईं। सत्तारूढ़ कांग्रेस अपने संगठन के बल पर ही 1971 से 1977 तक सत्ता में रही जबकि कांग्रेस (संगठन), संगठन के अभाव में बिखर गई। 1977 में कांग्रेस की पराजय के बाद कांग्रेस में गुटबन्दी ने दल को दोबारा विभाजित कर दिया तथा इस प्रकार दल कमज़ोर हो गया। यद्यपि कांग्रेस (इ) 1980 से नवम्बर, 1989 तक सत्ता में रही और जून, 1991 से मई, 1996 तक सत्ता रही तथापि इस पार्टी का संगठन बहुत संगठित नहीं है। दोनों साम्यवादी दल संगठन पर आधारित दल हैं परन्तु इन दलों का संगठन राष्ट्रव्यापी नहीं है क्योंकि इन दलों का प्रभाव पश्चिमी बंगाल और केरल में ही है। भूतपूर्व जनसंघ और वर्तमान भारतीय जनता पार्टी के पास संगठन है। इसके पास कार्यकर्ताओं की कमी नहीं है, लेकिन इसका प्रभाव उत्तर भारत में अधिक एवं दक्षिण भारत में कम है।

2. गुटबन्दी (Groupism)-प्रायः सभी राजनीतिक दलों में गुटबन्दी पाई जाती है जो दलों के प्रभावशाली संगठन के मार्ग में एक मुख्य बाधा है। गुटबन्दी के कारण ही कांग्रेस का 1969, 1978 तथा 1979 में विभाजन हुआ। भारतीय साम्यवादी दल में गुटबन्दी होने के कारण ही तीन दल बने-भारतीय साम्यवादी दल, मार्क्सवादी दल तथा मार्क्सवादी लेनिनवादी दल। डी० एम० के० का गुटबन्दी के कारण विभाजन हुआ और अन्ना डी० एम० के० का जन्म हुआ। जनता पार्टी जनता (एस) तथा लोकदल। जनता दल में भी गुटबन्दी पाई जाती रही है और इसी गुटबन्दी के कारण ही जनता दल का 1990, फरवरी 1992, जुलाई 1993 और जून 1994, जुलाई 1997, दिसम्बर 1997 और सातवीं बार जुलाई 1999 में विभाजन हुआ। आपसी गुटबन्दी के कारण ही 115 वर्षों से भी अधिक पुरानी कांग्रेस पार्टी में 19 मई, 1995 को तीसरी बार विभाजन हुआ और यह दो गुटों में बंट गई। राजनीतिक दलों में गुटबन्दी सैद्धान्तिक आधारों पर न होकर व्यक्तिगत मतभेदों के कारण है।

3. दल-बदल (Defections)—प्रायः सभी राजनीतिक दलों को दल-बदल की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। अन्तर केवल इतना है कि कभी किसी दल को दल-बदल से लाभ होता है तो कभी किसी को और जिस दल-बदल से लाभ हो रहा होता है वह उस समय दल-बदल को रोकने की मांग नहीं करता जबकि अन्य दल ऐसी मांग करते हैं। संविधान में 52वां तथा 91वां संशोधन करके दल-बदल की बुराई को समाप्त करने का प्रयास किया गया है परन्तु दल-बदल की बुराई आज भी पाई जाती है।

4. नेतृत्व का संकट (A Crisis of Leadership)-प्रायः सभी दलों के नेताओं को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि देश में नीतिवान और युवा नेताओं की बहुत कमी है। राजनीतिक दलों का नेतृत्व प्रायः उन लोगों के हाथों में है जिनकी आयु 60 से 70 वर्ष से ऊपर है ऐसा प्रतीत होता है कि देश के प्रतिभाशाली नौजवान राजनीति में आना पसन्द नहीं करते। श्री राजीव गांधी ने राजनीति में आकर अच्छी शुरुआत की थी।

5. धन सम्बन्धी समस्या (Financial Problems)–संसद् और विधान सभाओं के चुनाव के लिए करोड़ों रुपये की आवश्यकता होती है। राजनीतिक दल अधिक-से-अधिक धन इकट्ठा करने का प्रयास करते हैं ताकि चुनाव में पैसा पानी की तरह बहा सकें। राजनीतिक दलों की आय का मुख्य स्रोत सदस्यता शुल्क, दान तथा कोष-संचालन है। प्रायः सभी दल पूंजीपतियों तथा उद्योगपतियों से धन लेते हैं। जो लोग धन देते हैं, वे बदले में अनुचित लाभ उठाना चाहते हैं इसलिए कहा जाता है कि कोई भी दल सत्ता में क्यों न आए पूंजीपतियों के हित की अवहेलना नहीं हो सकती। इसके अतिरिक्त राजनीतिक दल सदस्यता शुल्क तथा कोष-संचालन के साधनों से प्राप्त धन का ब्योरा भी नहीं प्रकाशित करते। काले धन का भारतीय राजनीति पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है।

6. जाति एवं धर्म का महत्त्व (Importance of Caste and Religion)-यद्यपि भारत धर्म-निरपेक्ष राज्य है और सभी मुख्य राष्ट्रीय राजनीतिक दल जातिवाद के विरुद्ध आवाज़ उठाते हैं, लेकिन व्यवहार में योग्य उम्मीदवारों के बजाय इन लोगों को चुनाव में टिकटें दी जाती हैं जिनकी जाति वालों का उस चुनाव क्षेत्र में बाहुल्य हो। चुनाव प्रसार में प्राय: सभी राजनीतिक दल जातीय और साम्प्रदायिक भावनाओं का लाभ उठाने का प्रयास करते हैं। कई राजनीतिक दल धर्म पर आधारित हैं। जाति की राजनीति भारत के भविष्य के लिए बहुत खतरनाक है।

7. राजनीतिक दलों के सिद्धान्तहीन समझौते (Non-principled Alliance of Political Parties) भारतीय दलीय व्यवस्था की एक महत्त्वपूर्ण समस्या यह है कि राजनीतिक दल अपने हितों की पूर्ति के लिए सिद्धान्तहीन समझौते करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। जनवरी, 1980 के लोकसभा चुनावों में सभी दलों ने सिद्धान्तहीन समझौते किए। उदाहरण के लिए अन्ना डी० एम० के० केन्द्रीय स्तर पर लोकदल सरकार में शामिल था और जनता पार्टी के विरुद्ध चौधरी चरण सिंह के साथ सहयोग करने के लिए प्रतिबद्ध था, लेकिन दूसरी ओर इस दल ने तमिलनाडु में जनता पार्टी के साथ चुनाव गठबन्धन किया। कांग्रेस (इ) जो अन्य दलों के समझौतों को सिद्धान्तहीन कहती रही, स्वयं तमिलनाडु में डी० एम० के० के साथ चुनाव गठबन्धन कर बैठी। आपात्काल में श्रीमती गांधी ने डी० एम० के० के करुणानिधि की सरकार को भ्रष्टाचार के आरोप के कारण बर्खास्त कर दिया था। मार्च, 1987 में कांग्रेस (आई) ने जम्मू-कश्मीर में नेशनल कान्फ्रेंस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और केरल में कांग्रेस (आई) ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। 1999, 2004, 2009 तथा 2014 में हुए लोकसभा के चुनाव के अवसर पर सभी राजनीतिक दलों ने सिद्धान्तहीन समझौते किए।

8. जन-आधार सम्बन्धी समस्या (Problems relating to Masses)-जनता का समर्थन प्राप्त करने के लिए राजनीतिक नेताओं तथा प्रतिनिधियों का आम जनता के साथ सम्पर्क होना अत्यावश्यक है अर्थात् राजनीतिक दलों का जनआधार होना चाहिए। कांग्रेस ही एक ऐसा दल रहा है और आज भी कांग्रेस (इ) है जिसका जन-आधार है और जिसको समाज के सभी वर्गों का समर्थन प्राप्त है। अन्य राजनीतिक दलों का आधार संकुचित है। भारतीय जनता पार्टी का जन-आधार मुख्यतः शहरों में है और वह भी उत्तरी भारत में है। दक्षिण भारत और गांवों में भारतीय जनता पार्टी को बहुत कम समर्थन प्राप्त है। साम्यवादी दल खेतिहर किसानों, कृषक-मजदूरों और शहरी मज़दूरों का नेतृत्व करते हैं।

9. स्पष्ट विचारधारा का अभाव (Absence of well defined Ideology)-भारत में पाए जाने वाले राजनीतिक दलों में विचारधारा एवं सिद्धान्तों का अभाव पाया जाता है। वामपंथी दलों के अतिरिक्त अन्य सभी दलों के प्रायः सभी कार्यक्रम एवं नीतियां एक जैसी हैं। भारत के राजनीतिक दलों में वचनबद्धता का भी अभाव पाया जाता है। राजनीतिक दलों में अस्पष्ट विचारधारा के कारण वे स्वार्थी तथा सिद्धान्तहीन व अवसरवादी प्रतीत होते हैं।

10. राजनीतिक दलों का ग़लत आधार (Wrong Basis of Political Parties)-भारत में राजनीतिक दलों से सम्बन्धित एक अन्य समस्या यह है कि इनका निर्माण ग़लत आधारों पर होता है। किसी भी राजनीतिक दल को भारतीय चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त करने के लिए संविधान के प्रति वफ़ादार बने रहने की तथा धर्म-निरपेक्षता, प्रभुसत्ता तथा देश की एकता एवं अखण्डता में प्रति वचनबद्धता प्रकट करनी पड़ती है। परन्तु भारत में जाति, धर्म, भाषा तथा क्षेत्र इत्यादि के आधार पर राजनीतिक दलों का निर्माण होता है।

11. दल की अपेक्षा व्यक्तियों को महत्त्व (Importance to Individual rather than Party)—भारत में राजनीतिक दलों की एक समस्या है कि यहां पर राजनीतिक दलों की अपेक्षा व्यक्तियों को अधिक महत्त्व दिया जाता है। कांग्रेस में सोनिया गांधी, भारतीय जनता पार्टी, शिरोमणि अकाली दल में प्रकाश सिंह बादल, बहुजन समाज पार्टी में मायावती तथा डी० एम० के० में करुणानिधि को पार्टी की अपेक्षा अधिक महत्त्व दिया जाता है।

12. राजनीतिक दलों में अविश्वास (Lack of Faith in National Parties)-भारतीय राजनीति में राजनीतिक दलों की एक अन्य महत्त्वपूर्ण समस्या यह है, कि भारत में राष्ट्रीय दलों को भी देश के सभी क्षेत्रों में लोगों का विश्वास प्राप्त नहीं है। मार्क्सवादी पार्टी, भारतीय साम्यवादी दल, बहुजन समाज पार्टी तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का प्रभाव पूरे देश में न होकर कहीं-कहीं पर ही है।

13. अनुशासन का अभाव (Lack of discipline)-अनुशासन का अभाव भी राजनीतिक दलों की एक प्रमुख समस्या है। एक ही दल के नेता व्यक्तिगत हितों के लिए एक-दूसरे से विरोधी भावनाएं रखते हैं तथा एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं। यदि उन्हें दल का टिकट न मिले तो वे दूसरे दल में शामिल हो जाते हैं, या स्वतन्त्र चुनाव लड़ते हैं या अलग दल का निर्माण कर लेते हैं। अप्रैल-मई, 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनावों के समय सभी दलों के अधिकांश सदस्यों ने, जिनको दल का टिकट नहीं मिला, अपने ही दल के उम्मीदवार के विरुद्ध चुनाव लड़ा जो कि अनुशासनहीनता का उदाहरण है।

लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. तीन अखिल भारतीय राजनीतिक दलों के नाम लिखिए। किसी राजनीतिक दल को अखिल भारतीय स्तर का घोषित करने का आधार क्या है ? वर्णन करें।
उत्तर-चुनाव आयोग ने 7 राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्रदान की हुई है। इनमें मुख्य अखिल भारतीय दल इस प्रकार हैं__(1) इण्डियन नैशनल कांग्रेस (2) भारतीय जनता पार्टी, (3) बहुजन समाज पार्टी। किसी भी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय स्तर का तभी घोषित किया जाता है यदि उस दल ने पिछले लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव में चार अथवा इससे अधिक राज्यों में कम-से-कम छः प्रतिशत वैध मत हासिल करने के साथ ही लोकसभा की कम-से-कम 4 सीटें जीती हों अथवा कम-से-कम 3 राज्यों से लोकसभा में प्रतिनिधित्व कुल सीटों का दो प्रतिशत (वर्तमान 543 सीटों में से कमसे-कम 11 सीटें) प्राप्त किया हो अथवा कम से कम चार राज्यों में उस दल को क्षेत्रीय दल के रूप में मान्यता प्राप्त
हो।

प्रश्न 2. भारत में किस प्रकार की दल प्रणाली है ?
उत्तर-भारत में बहु-दलीय प्रणाली पाई जाती है। चुनाव आयोग ने 7 राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय स्तर पर और 58 राजनीतिक दलों को राज्य स्तर पर आरक्षित चुनाव चिह्न के साथ मान्यता दी हुई है। राष्ट्रीय स्तर के दल हैं-भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय मार्क्सवादी दल, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, तृणमूल कांग्रेस पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी। क्षेत्रीय दलों की संख्या 58 है।

प्रश्न 3. भारत के सात राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के नाम लिखें।
उत्तर-चुनाव आयोग ने 7 राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय दलों की मान्यता दी है। ये दल हैं-(1) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (2) भारतीय जनता पार्टी (3) भारतीय साम्यवादी दल (4) भारतीय मार्क्सवादी दल (5) राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (6) बहुजन समाज पार्टी (7) तृणमूल कांग्रेस पार्टी।

प्रश्न 4. भारतीय साम्यवादी दल की चार महत्त्वपूर्ण नीतियों का वर्णन करें।
उत्तर-भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का राजनीतिक कार्यक्रम इस प्रकार है-

  • पार्टी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को बनाए रखने के लिए वचनबद्ध है।
  • पार्टी साम्प्रदायिक सद्भावना और धर्म-निरपेक्ष लोकतान्त्रिक व्यवस्था को बनाए रखने की पक्षधर है।
  • पार्टी केन्द्र-राज्य सम्बन्धों का पुनर्गठन करके राज्यों को अधिक शक्तियां देने के पक्ष में है।
  • पार्टी धारा 370 को बनाए रखने के पक्ष में है।

प्रश्न 5. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की आर्थिक नीति के बारे में लिखिए।
उत्तर-

  • भूमि सुधारों को ज़ोरों से लागू किया जाए, जोतने वालों में ज़मीन बांटी जाए, भूमि का केन्द्रीयकरण समाप्त किया जाए और किसानों को सस्ते ऋण तथा अनुदान देकर खेती में लगने वाली चीजें उपलब्ध कराई जाएं।
  • राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को विदेशी प्रभाव से पूरी तरह स्वतन्त्र रखकर मुक्त विकास को ध्यान में रखते हुए नियोजन की प्राथमिकताओं और नीतियों को बदला जाए।
  • पार्टी ने आवास तथा काम करने के अधिकार को संवैधानिक अधिकार बनाने का वायदा किया है। (4) घरेलू उद्योगों को मज़बूती प्रदान की जायेगी।

प्रश्न 6. भारतीय जनता पार्टी की हिन्दुत्व धारणा की व्याख्या करो। (P.B. Sept. 1994, 1995, 1999)
अथवा
भारतीय जनता पार्टी द्वारा हिन्दुत्व की, की गई चर्चा की व्याख्या करो।
उत्तर- भारतीय जनता पार्टी 1951 में डॉ० श्यामा मुखर्जी द्वारा गठित भारतीय जनसंघ का रूपान्तरण है। नौवीं लोकसभा के चुनावों में हिन्दू जनाधार को अपने पक्ष में करने के लिए इसने राम जन्म भूमि पर राम मन्दिर के निर्माण का कार्यक्रम प्रस्तुत किया और इससे हिन्दू जनाधार का समर्थन भी मिला। उसे लोकसभा की 88 सीटें प्राप्त हुईं और इसी के सहयोग से राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार बनी। राम मन्दिर निर्माण के मुद्दे को लेकर अक्तूबर, 1990 को भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार से अपना समर्थन वापिस ले लिया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सहयोग से इसने राम जन्मभूमि पर मन्दिर बनाने के लिए अक्तूबर-नवम्बर, 1990 में दो असफल प्रयास किए। 1991 के चुनावों के समय जारी घोषणा-पत्र में ‘राम राज्य की ओर’ का नारा दिया गया। 6 दिसम्बर, 1992 को हिन्दू कार्यकर्ताओं व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने बाबरी मस्जिद का ढांचा गिरा दिया। जिस कारण भारतीय जनता पार्टी की तीखी आलोचना हुई।

यद्यपि आज यह राष्ट्रीय दल है परन्तु यह दल अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की नीति का विरोधी है जिस कारण संकुचित दृष्टि से सोचने वालों का समर्थन इसे प्राप्त नहीं है। वे इसे हिन्दू पार्टी के नाम से पुकारते हैं क्योंकि इसके 90 प्रतिशत सदस्य हिन्दू ही हैं।

प्रश्न 7. राजनीतिक दलों में व्यक्तित्व पूजा से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर-राजनीतिक दलों में व्यक्तित्व पूजा से अभिप्राय है, कि राजनीतिक दल अपने कार्यक्रमों एवं नीतियों की अपेक्षा अपने नेता को अधिक महत्त्व देते हैं। भारत के लगभग सभी राजनीतिक दल किसी-न-किसी नेता के ईर्द-गिर्द ही घूमते हैं। उदाहरण के लिए कांग्रेस पार्टी पहले पं० नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी तथा श्री राजीव के इर्द-गिर्द घूमती थी, जबकि आजकल श्रीमती सोनिया गांधी एवं श्री राहुल गांधी के आस-पास घूमती है। इसी तरह भारतीय जनता पार्टी भी वर्तमान समय में श्री नरेन्द्र मोदी के आस-पास घूमती है।

प्रश्न 8. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जन्म कब हुआ था ?
उत्तर- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जन्म सन् 1885 में हुआ था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में एक अंग्रेज़ अधिकारी ए० ओ० ह्यम ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का प्रारम्भिक उद्देश्य भारतीयों तथा ब्रिटिश सरकार में अच्छे सम्बन्ध स्थापित करना था। परन्तु धीरे-धीरे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का उद्देश्य बदलकर ‘पूर्ण स्वराज्य की मांग’ हो गया।

प्रश्न 9. कांग्रेस की विदेश नीति के बारे में लिखिए।
अथवा
कांग्रेस पार्टी की विदेश नीति लिखो।
उत्तर-

  • कांग्रेस ने शान्ति, नि:शस्त्रीकरण और पर्यावरण का ध्यान रखते हुए विकास करने के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए गुट-निरपेक्षता की नीति के प्रति अपनी वचनबद्धता को पुनः दोहराया है।
  • कांग्रेस विदेश नीति को देश की आर्थिक प्राथमिकताओं और चिन्ताओं से जोड़ेगी।
  • कांग्रेस दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र (सफ्टा) बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।
  • कांग्रेस पार्टी गुट निरपेक्षता की नीति में विश्वास रखती है।

प्रश्न 10. कांग्रेस (आई) की आर्थिक नीतियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की आर्थिक नीतियां एवं कार्यक्रम इस प्रकार हैं

  • ग़रीबी दूर करना-ग़रीबी दूर करना कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य है और ग़रीबी को जड़ से मिटाने के प्रति कांग्रेस वचनबद्ध है।
  • कृषि किसान तथा खेत मज़दूर-कांग्रेस ने कृषि को उद्योग का दर्जा देने तथा कृषि ऋण प्रणाली को मजबूत बनाने का वायदा किया है। कांग्रेस ने कृषि उत्पादन बढ़ाने और किसान तथा खेत मजदूरों के हितों की रक्षा करने का वायदा किया है।
  • श्रमिक-कांग्रेस बीमार कम्पनियों की हालत सुधारने के लिए कर्मचारियों के संगठनों को सक्रिय रूप से प्रोत्साहन और समर्थन देगी। असंगठित क्षेत्रों में श्रमिकों, विशेष रूप से महिलाओं के लिए सामाजिक सुरक्षा और बीमा योजनाओं को सुदृढ़ किया जाएगा एवं उसका विस्तार किया जाएगा। कांग्रेस प्रबन्ध में श्रमिकों के लिए साझेदारी बढ़ाने को वचनबद्ध है।
  • पार्टी औद्योगिक क्षेत्र में वृद्धि दर को तेज़ करेगी।

प्रश्न 11. भारतीय दलीय प्रणाली की चार विशेषताएं लिखें।
अथवा
भारतीय राजनीतिक दल प्रणाली की कोई चार विशेषताएं लिखिए।
उत्तर-भारतीय दलीय प्रणाली की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं

1. बहु-दलीय प्रणाली-भारत में बहु-दलीय प्रणाली पाई जाती है। चुनाव आयोग ने 7 राष्ट्रीय स्तर के दलों को मान्यता दी हुई है। ये दल इस प्रकार हैं-कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी। राष्ट्रीय दलों के अतिरिक्त अनेक राज्य स्तर के और क्षेत्रीय दल पाए जाते हैं।
2. साम्प्रदायिकता-भारतीय दलीय प्रणाली की प्रमुख विशेषता साम्प्रदायिक दलों का होना है। 3. भारत में क्षेत्रीय दल भी पाए जाते हैं। 4. भारत में कार्यक्रम की अपेक्षा नेतृत्व को प्रमुखता दी जाती है।

प्रश्न 12. भारत में विरोधी दल द्वारा किए जाने वाले मुख्य चार कार्य लिखें।
उत्तर-भारत में विरोधी दल निम्नलिखित कार्य करते हैं-

  • आलोचना-भारत में विरोधी दल का मुख्य कार्य सरकार की नीतियों की आलोचना करना है। विरोधी दल संसद् के अन्दर और संसद् के बाहर सरकार की आलोचना करते हैं।
  • वैकल्पिक सरकार-भारत में संसदीय प्रणाली होने के कारण विरोधी दल वैकल्पिक सरकार बनाने के लिए तैयार रहता है।
  • अस्थिर मतदाता को अपील करना-विरोधी दल सत्तारूढ़ दल को आम चुनाव में हराने का प्रयत्न करता है। इसके लिए विरोधी दल सत्तारूढ़ दल की आलोचना करके मतदाताओं के सामने यह प्रमाणित करने का प्रयत्न करता है कि यदि उसे अवसर दिया जाए तो वह देश का शासन सत्तारूढ़ दल की अपेक्षा अच्छा चला सकता है।
  • विरोधी दल लोकतन्त्र की सुरक्षा करता है।

प्रश्न 13. भारत में साम्यवादी दल की आर्थिक नीति लिखिए।
अथवा
भारतीय साम्यवादी दल की कोई चार नीतियों का वर्णन करें।
उत्तर-भारतीय साम्यवादी दल का आर्थिक कार्यक्रम इस प्रकार है-

  • पार्टी का कहना है कि सार्वजनिक क्षेत्र का पुनर्गठन किया जाए और इसे अधिक मज़बूत बनाने का प्रयास किया जाए।
  • आवास तथा काम के अधिकार को संविधान के मौलिक अधिकारों के अध्याय में अंकित किया जाए।
  • मज़दूरों के सम्बन्ध में कोई भी कानून बनाते समय उनकी सलाह ली जाए।
  • देशभर में फसल तथा पशु बीमा का विस्तार किया जायेगा।

प्रश्न 14. भारतीय दल प्रणाली की कोई चार कमियों (कमजोरियों) को लिखें।
अथवा
भारतीय राजनीतिक दलों की कोई चार कमियां लिखिए।
उत्तर-

  • राजनीतिक दलों का ग़लत आधार-भारत में अनेक राजनीतिक दल धर्म, जाति, क्षेत्र आदि पर आधारित हैं। ऐसे राजनीतिक दल जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, साम्प्रदायिकतावाद आदि को बढ़ावा देते हैं।
  • गुटबन्दी–प्रायः सभी राजनीतिक दलों में गुटबन्दी पाई जाती है जो दलों के प्रभावशाली संगठन के मार्ग में बाधा
  • दल-बदल-भारतीय दलीय प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण दोष दल-बदल है।
  • सिद्धान्तहीन समझौते-भारतीय राजनीतिक दल प्रायः सिद्धान्तहीन समझौते करते रहते हैं।

प्रश्न 15. बहुजन समाज पार्टी के बारे में आप क्या जानते हैं ?
अथवा
भारत में किसने, कब और क्यों बहुजन समाज पार्टी का निर्माण किया था?
उत्तर-बहुजन समाज पार्टी को प्रायः बसपा के नाम से जाना जाता है। यह पार्टी दलित लोगों का प्रतिनिधित्व करती है। बसपा की स्थापना 14 अप्रैल, 1984 को कांशी राम ने की थी। इस पार्टी का पहला नाम डी० एस० 4 (D.S. 4) था। जिसका आधार है-दलित, शोषित समाज संघर्ष समिति (Dalit, Shoshit Samaj Sangharsh Samiti) । कांशीराम के अनुसार अनुसूचित जातियों, अनुसूचित, जन-जातियों, शैक्षणिक तथा सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यक, कारीगर और वे सभी दलित जिनका पूंजीपतियों ने शोषण किया है बहुजन समाज है। इस पार्टी की स्थापना इसलिए की गई थी ताकि दलित वर्ग के लोगों को राजनीति व प्रशासन में समुचित भागीदारी मिल सके। इस पार्टी का उद्देश्य बहुजन समाज का कल्याण करना है।

प्रश्न 16. भारतीय जनता पार्टी की चार महत्त्वपूर्ण नीतियों का वर्णन करें।
उत्तर-

  • उपभोक्ता संरक्षण-पार्टी उपभोक्ता कानून में सुधार करेगी और उसको अच्छे ढंग से लागू करेगी। उपभोक्ता आन्दोलन को बढ़ावा दिया जाएगा।
  • काला धन-पार्टी काले धन के निर्माण को रोकने के कड़े उपाय करेगी।
  • श्रम-घोषणा-पत्र के अनुसार भारतीय जनता पार्टी औद्योगिक क्षेत्र में श्रमिक भागीदारी शुरू करेगी।
  • पूर्ण रोज़गार-पार्टी बेरोज़गारी को दूर करने के लिए हर संभव प्रयास करेगी।

प्रश्न 17. राजनीतिक दलों का पंजीकरण क्यों ज़रूरी है ?
उत्तर-दिसम्बर, 1988 में संसद् ने चुनाव व्यवस्था में सुधार करने के लिए जन प्रतिनिधि कानून 1950 और 1951 में संशोधन किया। इस संशोधन के अनुसार कोई भी गुट, समूह, संघ अथवा संस्था तब तक राजनीतिक दल नहीं बन सकता जब तक कि वह चुनाव आयोग के पास पंजीकृत नहीं होगा। इसके लिए उसे चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करना होगा। राजनीतिक दलों के लिए पंजीकरण (Registration) को इसलिए अनिवार्य माना गया है ताकि चुनाव लड़ने वाले राजनीतिक दलों के सदस्य जन प्रतिनिधि बनने के बाद संविधान के प्रति आस्था रखें। वे प्रजातान्त्रिक मूल्यों को बढ़ावा दें। देश की सुरक्षा, हितों व शान्ति के विरुद्ध कार्य न करें। राजनीतिक दलों का पंजीकरण इसलिए भी ज़रूरी है ताकि कोई संस्था, गुट अथवा समूह असंगठित व अनियन्त्रित लोगों का समूह मात्र बनकर सामाजिक उन्माद न फैला सके। राजनीतिक दल के पंजीकरण द्वारा सरकार को उस दल के पदाधिकारियों, संगठन व आय के स्रोतों का पता चल जाता है। इस प्रकार राजनीतिक दलों को कानून के दायरे में रखने के लिए उनका पंजीकरण अनिवार्य किया जाता है।

प्रश्न 18. भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए भारतीय जनता पार्टी की क्या नीति है ?
उत्तर-भारतीय जनता पार्टी ने अपने घोषणा-पत्र में कहा है कि भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जायेंगे

  • विदेशों से किए गए समझौतों में भ्रष्टाचार के मामलों पर रक्षा सौदों में कमीशन लेने वालों की जांच की जाएगी और दोषियों को दण्डित किया जाएगा।
  • यह ओम्बुड्समैन-लोकपाल तथा लोकायुक्त नियुक्त करने के लिए कानून बनाएगी और प्रधानमन्त्री तथा मुख्य मन्त्रियों को इनके अन्तर्गत लाया जाएगा।
  • क्रय तथा ठेके आदि देने का काम करने वाले सरकारी विभागों तथा सार्वजनिक क्षेत्रों के निगमों के दैनिक कार्य में राजनीतिक हस्तक्षेप तथा दखल-अन्दाजी को समाप्त कर दिया जाएगा।
  • सरकारी विभागों के खर्चों में कमी की जायेगी।

प्रश्न 19. भारत में राजनीतिक दलों के लिए लीडरशिप (नेतृत्व) का क्या संकट है ?
अथवा
भारत में राजनीतिक दलों की नेतत्व की क्या समस्याएं हैं? ।
उत्तर-भारत में प्राय: सभी राजनीतिक दलों में ऐसे नेताओं की कमी है, जो दल एवं देश का कुशलतापूर्वक मार्गदर्शन कर सकें। प्रायः सभी दलों के नेताओं को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि देश में नीतिवान और युवा नेताओं की बहुत कमी है। राजनीतिक दलों का नेतृत्व प्रायः उन लोगों के हाथों में है जिनकी आयु 60 से 70 वर्ष से ऊपर है। ऐसा प्रतीत होता है कि देश के प्रतिभाशाली नौजवान राजनीति में आना पसन्द नहीं करते। श्री राजीव गांधी ने राजनीति में आकर अच्छी शुरुआत की।

प्रश्न 20. राष्ट्रीय राजनीतिक दल किसे कहते हैं ?
उत्तर-चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार किसी भी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय स्तर का दल तभी घोषित किया जाता है यदि उस दल ने लोकसभा अथवा विधानसभा चुनाव में चार अथवा इससे अधिक राज्यों में 6 प्रतिशत वैध मत हासिल करने के साथ-साथ लोकसभा की कम-से-कम 4 सीटें जीती हों अथवा कम-से-कम तीन राज्यों से लोकसभा में प्रतिनिधित्व कुल सीटों का दो प्रतिशत (वर्तमान 543 सीटों में से कम-से-कम 11 सीटें) प्राप्त किया हो अथवा कमसे-कम चार राज्यों में उस दल को क्षेत्रीय दल के रूप में मान्यता प्राप्त हो। इसी आधार पर चुनाव आयोग ने 7 राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता प्रदान की।

प्रश्न 21. राष्ट्रीय राजनीतिक दलों और उनके अध्यक्षों के नाम लिखिए।
उत्तर – दलों के नाम — अध्यक्षों के नाम
(1) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस — श्री राहुल गांधी
(2) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी — श्री एस० सुधाकर रेड्डी
(3) मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी — श्री सीता राम यचुरी
(4) भारतीय जनता पार्टी — श्री अमित शाह
(5) बहुजन समाज पार्टी — सुश्री मायावती
(6) राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी — श्री शरद पवार
(7) तृणमूल कांग्रेस पार्टी — सुश्री ममता बनर्जी

प्रश्न 22. राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के चुनाव निशान लिखें।
अथवा
भारत में पाए जाने वाले चार राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के नाम व चुनाव चिन्ह बताएं।
उत्तर-
दलों का नाम — चुनाव निशान
(1) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस — हाथ
(2) भारतीय जनता पार्टी — कमल का फूल
(3) भारतीय साम्यवादी पार्टी — दराती और गेहूं की बाली
(4) भारतीय मार्क्सवादी पार्टी — दराती, हथौड़ा और तारा
(5) बहुजन समाज पार्टी — हाथी
(6) राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी — घड़ी
(7) तृणमूल कांग्रेस पार्टी — पुष्प एवं घास

अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. राष्ट्रीय राजनीतिक दल किसे कहते हैं ?
उत्तर-किसी भी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय स्तर का दल तभी घोषित किया जाता है यदि उस दल ने पिछले लोकसभा अथवा विधानसभा चुनाव में चार अथवा इससे अधिक राज्यों में कम-से-कम 6% वैध मत हासिल करने के साथ लोकसभा की कम-से-कम 4 सीटें जीती हों, अथवा कम-से-कम 3 राज्यों से लोकसभा में प्रतिनिधित्व कुल सीटों का 2% (वर्तमान 543 सीटों में से कम-से-कम 11 सीटें) प्राप्त किया हो। अथवा कम से कम चार राज्यों में क्षेत्रीय दल के रूप में मान्यता प्राप्त हो।।

प्रश्न 2. भारत में किस प्रकार की राजनीतिक दल प्रणाली है?
उत्तर-भारत में बहु-दलीय प्रणाली पाई जाती है। चुनाव आयोग ने 7 राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय स्तर पर और 58 राजनीतिक दलों को राज्य स्तर पर आरक्षित चुनाव चिन्ह के साथ मान्यता दी हुई है। राष्ट्रीय स्तर के दल हैं-भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, तृणमूल कांग्रेस पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी।

प्रश्न 3. भारतीय दलीय प्रणाली की दो विशेषताएं लिखें।
उत्तर-

  • बहु-दलीय प्रणाली-भारत में बहु-दलीय प्रणाली पाई जाती है।
  • साम्प्रदायिकता-भारतीय दलीय प्रणाली की प्रमुख विशेषता साम्प्रदायिकता दलों का होना है।

प्रश्न 4. भारतीय साम्यवादी दल का आर्थिक कार्यक्रम लिखें।
उत्तर-

  • पार्टी का कहना है कि सार्वजनिक क्षेत्र का पुनर्गठन किया जाए और इसे अधिक मज़बूत बनाने का प्रयास किया जाए।
  • आवास तथा काम के अधिकार को संविधान के मौलिक अधिकारों के अध्याय में अंकित किया जाए।

प्रश्न 5. भारतीय राजनैतिक दलों की कोई दो कमियां लिखिए।
उत्तर-

  1. राजनीतिक दलों का ग़लत आधार-भारत में अनेक राजनीतिक दल धर्म, जाति, क्षेत्र आदि पर आधारित हैं।
  2. गुटबन्दी–प्रायः सभी राजनीतिक दलों में गुटबन्दी पाई जाती है जो दलों के प्रभावशाली संगठन के मार्ग में बाधा है।

प्रश्न 6. बहुजन समाज पार्टी के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-बहुजन समाज पार्टी को प्रायः बसपा के नाम से जाना जाता है। यह पार्टी दलित लोगों का प्रतिनिधित्व करती है। बसपा की स्थापना 14 अप्रैल, 1984 को कांशी राम ने की थी। इस पार्टी का पहला नाम डी० एस० 4 (D.S. 4) तथा जिसका अर्थ है-दलित, शोषित, समाज संघर्ष समिति (Dalit, Shoshit, Samaj Sangharsh Samiti)। इस पार्टी की स्थापना इसलिए की गई थी ताकि दलित वर्ग के लोगों को राजनीति व प्रशासन में समुचित भागीदारी मिल सके। इस पार्टी का उद्देश्य बहुजन समाज का कल्याण करना है।

प्रश्न 7. भारत में कुल कितने क्षेत्रीय दल हैं ?
उत्तर-भारत में अनेक क्षेत्रीय दल पाए जाते हैं। चुनाव आयोग ने 58 राजनीतिक दलों को क्षेत्रीय दलों के रूप में मान्यता प्रदान की हुई है। इनमें से तीन क्षेत्रीय दलों के नाम हैं-

  1. शिरोमणि अकाली दल
  2. नैशनल कान्फ्रैंस
  3. डी० एम० के०।

प्रश्न 8. भारत के दो राष्ट्रीय और दो क्षेत्रीय दलों के नाम लिखें।
उत्तर-राष्ट्रीय दल- 1. भारतीय जनता पार्टी, 2. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस।
क्षेत्रीय दल-1. शिरोमणि अकाली दल, 2. इण्डियन नेशनल लोकदल।

प्रश्न 9. भारत में जाति के आधार पर बने दो राजनीतिक दलों के नाम बताएं।
उत्तर-

  1. डी० एम० के० (D.M.K.)
  2. ए० आई० ए० डी० एम० के० (AIADMK)।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. भारतीय दलीय प्रणाली की मुख्य विशेषता क्या है ?
उत्तर- भारतीय दलीय प्रणाली बहु-दलीय है।

प्रश्न 2. वर्तमान समय में भारत में कितने मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय राजनीतिक दल हैं ?
उत्तर-भारत में 7 मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय राजनीतिक दल हैं।

प्रश्न 3. चुनाव आयोग ने कितने राज्य स्तरीय दलों को मान्यता प्रदान की हुई है?
उत्तर-चुनाव आयोग ने 58 राजनीतिक दलों को राज्य स्तर के रूप में मान्यता दी हुई है।

प्रश्न 4. भारत में दो राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के नाम लिखो।
अथवा
भारत में पाए जाने वाले दो मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के नाम लिखो।
उत्तर-

  1. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
  2. भारतीय जनता पार्टी।

प्रश्न 5. भारत में कोई दो क्षेत्रीय दलों के नाम लिखो।
उत्तर-

  1. इण्डियन नेशनल लोकदल
  2. शिरोमणि अकाली दल।

प्रश्न 6. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना कब की गई थी?
उत्तर-भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना सन् 1924 में की गई।

प्रश्न 7. कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिह्न क्या है ?
उत्तर-कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिह्न ‘हाथ’ है।

प्रश्न 8. बहुजन समाज पार्टी के कार्यक्रम की एक महत्त्वपूर्ण बात लिखें।
उत्तर-छुआछूत को समाप्त करना और छुआछूत का पालन करने वालों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्यवाही करना।

प्रश्न 9. बहुजन समाज पार्टी का चुनाव चिह्न क्या है ?
उत्तर-बहुजन समाज पार्टी का चुनाव चिह्न ‘हाथी’ है।

प्रश्न 10. कांग्रेस पार्टी की वर्तमान अध्यक्ष कौन है ?
उत्तर-कांग्रेस पार्टी के वर्तमान अध्यक्ष श्री राहुल गांधी हैं।

प्रश्न 11. भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान अध्यक्ष कौन हैं ?
उत्तर- भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान अध्यक्ष श्री अमित शाह हैं।

प्रश्न 12. भारतीय जनता पार्टी का चुनाव चिह्न क्या है ?
उत्तर-‘कमल का फूल’ भाजपा का चुनाव चिह्न है।

प्रश्न 13. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का चुनाव चिह्न क्या है ?
उत्तर-मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का चुनाव चिह्न ‘हथौड़ा, दरांती एवं तारा’ है।

प्रश्न 14. बहुजन समाज पार्टी की स्थापना कब की गई थी?
उत्तर-सन् 1984 में।

प्रश्न 15. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की स्थापना कब की गई थी?
उत्तर-सन् 1964 में।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें

1. भारत में …………. प्रणाली पाई जाती है।
2. भारत में ………….. राष्ट्रीय राजनीतिक दल हैं।
3. कांग्रेस पार्टी की स्थापना सन् ……………….. में हुई।
4. कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष श्री. ………………. हैं।
5. भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष ………………. हैं।
उत्तर-

  1. बहुदलीय
  2. 7
  3. 1885
  4. राहुल गांधी
  5. श्री अमित शाह।

प्रश्न III. निम्नलिखित वाक्यों में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें

1. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष श्री राहुल गांधी हैं।
2. भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष श्री अटल बिहारी वाजपेयी हैं।
3. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पूंजीवादी विचारधारा का समर्थन करती है ?
4. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव श्री सीता राम येचुरी हैं।
5. बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष सुश्री मायावती हैं।
6. भारत में एक दलीय प्रणाली है।
उत्तर-

  1. सही
  2. ग़लत
  3. ग़लत
  4. सही
  5. सही
  6. ग़लत।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1. भारत में कौन-सी दल प्रणाली है ?
(क) एक दलीय
(ख) द्वि-दलीय
(ग) बहु दलीय
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर-(ग) बहु दलीय

प्रश्न 2. कौन-सा राजनीतिक दल अनुच्छेद 370 को संविधान में से निलम्बित करना चाहता है ?
(क) भारतीय साम्यवादी दल
(ख) जनता दल
(ग) कांग्रेस
(घ) भारतीय जनता पार्टी।
उत्तर-(घ) भारतीय जनता पार्टी।

प्रश्न 3. भारतीय साम्यवादी दल का दो भागों में विभाजन हुआ।
(क) 1957 में
(ख) 1960 में
(ग) 1952 में
(घ) 1964 में।
उत्तर-(घ) 1964 में।

प्रश्न 4. भारत में कितने मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय राजनीतिक दल हैं ?
(क) 38
(ख) 40
(ग) 58
(घ) 55.
उत्तर-(ग) 58