Class 12 Religion Solutions Chapter 5 पुराणों, उपनिषदों और शास्त्रों की सामान्य जानकारी

ESSAY TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. पुराणों की हिंदू धर्म में विशेषता और इसके प्रमुख लक्षणों की जानकारी दीजिए।
(Describe the importance of Puranas in Hinduism and their basic salient features.)
अथवा
पुराण साहित्य के प्रमुख लक्षणों और इनका हिंदू धर्म में महत्त्व के बारे में संक्षेप में और भावपूर्ण चर्चा कीजिए।
(Discuss in brief but meaningful the salient features of Purana literature and its importance in Hinduism.)
अथवा
पुराणों से क्या भाव है ? विभिन्न पुराणों का संक्षेप में वर्णन दो। (What is meant by Puranas ? Give a brief account of the various Puranas.)
अथवा
प्रसिद्ध पुराणों के विषय में संक्षिप्त जानकारी दें।
(Give a brief account of important Puranas.)
अथवा
पुराणों की विषय-वस्तु एवं महत्ता के बारे में संक्षिप्त परंतु भावपूर्ण चर्चा कीजिए।
(Discuss in brief but meaningful the subject-matter of Puranas.)
अथवा
पुराणों की रचना किस प्रकार हुई ? जानकारी दें। (Explain how Puranas were written ?)
अथवा
पुराण साहित्य के मुख्य विषयों के बारे में जानकारी दें। (Describe the main contents of Purana literature.)
अथवा
पौराणिक साहित्य की महत्ता के बारे में जानकारी दीजिए। (Discuss the importance of Pauranic Literature.)
अथवा
पुराणों बारे संक्षिप्त जानकारी दें।
(Write in brief about the Puranas.)
पथवा प्रसिद्ध पाँच पुराणों के बारे में जानकारी दें। (Give information about famous five Puranas.)
उत्तर-पुराण हिंदू धर्म के पुरातन ग्रंथ हैं। पुराण से भाव है प्राचीन। ये संस्कृत भाषा में लिखे गये हैं। ये कब लिखे गये इस का कोई पक्का उत्तर अभी तक नहीं मिला है। ये किसी एक शताब्दी की रचना नहीं हैं। इनका वर्णन अथर्ववेद, उपनिषदों और महाकाव्यों आदि में आता है। समय-समय पर इनमें तबदीलियाँ की जाती रहीं और नये अध्यायों को जोड़ा जाता रहा। गुप्त काल में पुराणों को अंतिम रूप दिया गया। इस तरह पुराणों की रचना अनेक लेखकों द्वारा की गई है। पुराणों को “पाँचवां वेद” कहा जाता था और शूद्रों को इनको पढ़ने की आज्ञा दी गई थी।
पुराणों की कुल संख्या 18 है। यह पुराण तीन भागों में बाँटे गये हैं। प्रत्येक भाग में 6 पुराण आते हैं और यह शिव, वैष्णव और ब्रह्म पुराण कहलाते हैं।
इनके भाग इस तरह हैं :—

  1. शिव पुराण—
    • वायु,
    • लिंग,
    • स्कंद,
    • अग्नि,
    • मत्स्य और
    • कूर्म।
  2. वैष्णव पुराण—
    • विष्णु,
    • भगवद्,
    • नारद,
    • गरुड़,
    • पद्म और
    • वराह
  3. ब्रह्म पुराण—
    • ब्रह्मा,
    • ब्रह्मांड,
    • ब्रह्मावैव्रत,
    • मारकंडेय,
    • भविष्य और
    • वामन।

पुराणों में लोगों में प्रचलित वैदिक और अवैदिक धार्मिक विश्वास, मिथिहास और कहानियाँ संकलित हैं। मिथिहास वह कथा कहानियाँ होती हैं जिनका कोई प्रमाण नहीं होता परंतु वे लोगों में बहुत प्रचलित होती हैं। प्रत्येक पुराण पाँच भागों में बाँटा होता था। ये भाग हैं-
(1) सर्ग-इसमें संसार की उत्पत्ति बारे वर्णन किया गया था।
(2) प्रतिसर्ग-इसमें संसार के विकास, नष्ट होने और फिर से उत्पत्ति के बारे वर्णन किया गया था।
(3) वंश-इसमें प्रसिद्ध राजाओं और ऋषियों के वंशों का वर्णन किया गया था।
(4) मनवंतर-इसमें संसार के महायुद्धों और प्रत्येक युद्ध की महत्त्वपूर्ण घटना का वर्णन किया गया था।
(5) वंशानचित-इसमें प्रसिद्ध वंशों के राजाओं और ऋषियों के कारनामों का वर्णन किया गया था। यह बात यहाँ याद रखने योग्य है कि हमें मूल पुराण उपलब्ध नहीं हैं। ये पुराण हमें आजकल जिस स्वरूप में उपलब्ध हैं उनमें यह जरूरी नहीं कि उनमें दिया गया वर्णन इस बाँट अनुसार हो। पुराणों का संक्षेप वर्णन निम्नलिखित अनुसार है :—

  1. ब्रह्म पुराण (The Brahman Purana)-इसको आदि पुराण भी कहा जाता है। इस में 14,000 श्लोक हैं। इस के अधिकाँश भाग में भारत के पवित्र तीर्थ स्थानों का वर्णन किया गया है। इस के अतिरिक्त इस में कृष्ण, राम, सूर्य, पूजा, प्रसिद्ध राजवंशों, पृथ्वी, नरक, विभिन्न जातियों, वर्ण, आश्रम व्यवस्था और श्राद्धों आदि का वर्णन दिया गया है।
  2. पद्म पुराण (The Padma Purana)-यह सबसे विशाल पुराण है। इस में लगभग 55,000 श्लोक दिये गये हैं। इस में सृष्टि खंड, भूमि खंड, स्वर्ग खंड और पाताल खंड का वर्णन दिया गया है। इसमें विष्णु कथा और राम कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इन के अतिरिक्त इस पुराण में अनेक तीर्थ स्थानों और व्रतों का भी वर्णन मिलता है। इस में अनेकों मिथिहासिक कथायें भी दर्ज हैं।
  3. विष्णु पुराण (The Vishnu Purana)-इस पुराण में 23,000 श्लोक दिये गये हैं। इसमें यह बताया गया है कि विष्णु ही सर्वोच्च देवता है। उसने ही संसार की रचना की और इसका पालनहार है। इसमें दी गई कथाओं में प्रह्लाद और ध्रुव की कथायें प्रसिद्ध हैं। इस में इस संसार और स्वर्ग के लोगों की अनेकों विचित्र बातों का भी वर्णन है। इस में कई प्रसिद्ध वंशों का भी वर्णन मिलता है। पाँचवें और अंतिम खंड में कृष्ण की अनेक अलौकिक लीलाओं की चर्चा की गई है।
  4. वायु पुराण (The Vayu Purana)-इस पुराण में 11,000 श्लोक हैं । इस में शिव की महिमा के साथ संबंधित अनेक कथाओं का वर्णन किया गया है। इस लिए इस को शिव पुराण भी कहते हैं। इस में अनेक वंशों का वर्णन किया गया है। प्रामाणिक तथ्यों पर आधारित होने के कारण इन की बहुत ऐतिहासिक महत्ता है। इसमें दिया गया भूगौलिक वर्णन भी बड़ा लाभदायक है।
  5. भगवद् पुराण (The Bhagavata Purana)-विष्णु देवता के साथ संबंधित पुराणों में भगवद् पुराण सब से अधिक लोकप्रिय है। इस में कृष्ण के जीवन से संबंधित अनेक कथाओं का वर्णन किया गया है। इसमें महात्मा बुद्ध और साक्ष्य दर्शन के संस्थापक कपिल को विष्णु का अवतार बताया गया है। ऐतिहासिक पक्ष से इस पुराण का कोई विशेष महत्त्व नहीं है।
  6. नारद पुराण (The Narada Purana)-इस पुराण में 25,000 श्लोक दिये गये हैं। यह विष्ण भक्ति से संबंधित पुराण है। इस में प्राचीन कालीन भारत में प्रचलित विद्या के बारे काफी विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला गया है। इस में वंशों का विवरण नहीं मिलता।
  7. मारकंडेय पुराण (The Markandeya Purana)-इस पुराण में 900 श्लोक दिये गये हैं। इस में वैदिक देवताओं इंद्र, सूर्य और अग्नि आदि का विस्तारपूर्वक वर्णन दिया गया है। इस में कई प्रसिद्ध वंशों का भी वर्णन मिलता है।
  8. अग्नि पुराण (The Agni Purana)-इस पुराण में 15,400 श्लोक दिये गये हैं। एक परंपरा के अनुसार इस पुराण को अग्नि देवता ने आप ऋषि विशिष्ट को सुनाया था। यह शिव धर्म से संबंधित पुराण है। इस में अनेक महत्त्वपूर्ण विषयों जैसे युद्धनीति, यज्ञ विधि, ज्योतिष, भूगोल, राजनीति, कानून, छंद शास्त्र, व्याकरण, चिकित्सा, व्रत, दान, श्राद्ध और विवाह आदि पर भरपूर प्रकाश डाला गया है। निस्संदेह यह पुराण एक विश्वकोष की तरह
  9. भविष्य पुराण (The Bhavishya Purana)—इस पुराण में 14,000 श्लोक दिये गये हैं। इस में ब्रह्म, विष्ण, शिव और सूर्य देवताओं से संबंधित अनेक कथायें दी गई हैं। इस में अनेक प्राचीन राजवंशों और ऋषियों का भी वर्णन मिलता है। इनके अतिरिक्त इस में अनेक कर्मकांडों की भी चर्चा की गई है।
  10. ब्रह्मावैव्रत पुराण (The Brahmavaivarta Purana)—इस पुराण में 18,000 श्लोक दिये गये हैं। इस पुराण में ब्रह्म को इस संसार का रचयिता कहा गया है। इस में कृष्ण के जीवन का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इस में राधा का वर्णन भी आता है। इस में गणेश को कृष्ण का अवतार कहा गया है।
  11. लिंग पुराण (The Linga Purana)-इस पुराण में 11,000 श्लोक दिये गये हैं। यह शिव धर्म से संबंधित पुराण है। इस में शिव अवतारों, व्रतों तथा तीर्थों का वर्णन किया गया है। इस में लिंग की शिव के रूप में उपासना का उपदेश दिया गया है।
  12. वराह पुराण (The Varaha Purana)-इस में 10,700 श्लोक दिये गये हैं। इस में विष्णु की तरह वराह अवतार के रूप में पूजा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इस में शिव, दुर्गा और गणेश से संबंधित वर्णन . भी दिया गया है।
  13. स्कंद पुराण (The Skanda Purana)—यह एक विशाल पुराण था। इस में 51,000 श्लोकों का वर्णन किया गया था। यह पुराण आजकल उपलब्ध नहीं है। इस के बारे में जानकारी अन्य ग्रंथों में दी गई उदाहरणों से प्राप्त होती है। इस पुराण में मुख्य तौर पर शिव की पूजा के बारे बताया गया है। इस के अतिरिक्त इस में भारत के अनेक तीर्थ स्थानों और मंदिरों के बारे बहुत महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान की गई है।
  14. वामन पुराण (The Vamana Purana)इस पुराण में 10,000 श्लोक दिये गये हैं। इस पुराण के अधिकतर भाग में शिव, विष्णु और गणेश आदि देवताओं की पूजा के बारे वर्णन किया गया है। इस में अनेक मिथिहासिक कथाओं का भी वर्णन मिलता है।
  15. कूर्म पुराण (The Kurma Purana)-इस पुराण में 18,000 श्लोक दिये गये हैं। इस में विष्णु के कुर्म अवतार की पूजा का वर्णन है। इस में अनेक मिथिहासिक कथाओं का वर्णन भी मिलता है।
  16. मत्स्य पुराण (The Matsya Purana)-इस पुराण में 14,000 श्लोक दिये गये हैं। यह पुराण मत्स्य (मछली) तथा मनु के मध्य एक वार्तालाप है। जब इस संसार का विनाश हुआ तब इस मछली ने मनु की सुरक्षा की थी। इस में अनेक प्रसिद्ध राजवंशों का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है। इनके अतिरिक्त इस में अनेक मेलों और तीर्थ स्थानों का भी वर्णन है।
  17. गरुढ़ पुराण (The Garuda Purana)-इस पुराण में 18,000 श्लोक दिये गये हैं। इस में विष्णु की पूजा से संबंधित अनेक विधियों का वर्णन है। इस में यज्ञ विद्या, छंद शास्त्र, ज्योतिष, व्याकरण, खगोल विज्ञान, शारीरिक विज्ञान और भूत-प्रेतों के बारे जानकारी दी गई है। इस में अंतिम संस्कार संबंधी, सती संबंधी और पितर श्राद्धों के संबंध में विस्तावपूर्वक जानकारी दी गई है।
  18. ब्रह्माण्ड पुराण (The Brahmanda Purana)—इस पुराण में 12,000 श्लोक दिये गये हैं। इस पुराण को ब्रह्मा ने पढ़ के सुनाया था। इस में अनेक राजवंशों और तीर्थ स्थानों का वर्णन किया गया है।

पुराणों का महत्त्व
(Importance of the Puranas)
पुराण भारतीय संस्कृति का व्यापक चित्र पेश करते हैं। आज के हिंदू धर्म में जो रीति-रिवाज प्रचलित हैं वह इन पुराणों की ही देन हैं । इन पुराणों में हिंदुओं के धार्मिक विश्वासों, देवी-देवताओं की पूजा विधियों, व्रतों, श्राद्धों, जन्म, विवाह और मृत्यु के समय किये जाने वाले संस्कारों के बारे भरपूर प्रकाश डाला गया है। मूर्ति पूजा तथा अवतारवाद की कल्पना इन पुराणों की ही देन है। इन पुराणों ने भारत में पितर पूजा के रिवाज को अधिक प्रचलित किया। लोगों को दान देने के लिए प्रेरित किया गया। पुराणों में दिये गये प्रसिद्ध राजवंशों का वर्णन ऐतिहासिक पक्ष से काफी लाभदायक सिद्ध हुआ है। इन में तीर्थ स्थानों और मंदिरों के विवरण से हमें उस समय की कला के बारे महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। इन के अतिरिक्त ये पुराण प्राचीन कालीन भारत की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अवस्था के बारे काफी विस्तारपूर्वक प्रकाश डालते हैं। निस्संदेह यदि पुराणों को भारतीय संस्कृति का विश्वकोष कह दिया जाये तो इस में कोई अतिकथनी नहीं होगी। डॉक्टर आर० सी० हाज़रा का यह कहना बिल्कुल ठीक है,
“पुराणों ने हिंदुओं के जीवन में दो हज़ार से अधिक वर्षों तक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने आम लोगों तक उच्च दर्जे के ऋषियों के विचारों को बिना किसी मतभेद के पहुँचाया। इन ग्रंथों के लेखकों ने प्रत्येक व्यक्ति को ध्यान में रखते हुए ऐसे नुस्खे बताये जो उनके सामाजिक और धार्मिक जीवन के लिए लाभदायक सिद्ध हों।”1

1. “The Puranas have played a very important part in the life of the Hindus for more than two thousand years. They have brought home to the common man the wisdom of the saints of the highest order without creating any discord. The authors of these works took every individual into consideration and made such prescriptions as would benefit him in his social and religious life.” Dr. R. C. Hazra, The Cultural Heritage of India (Colcutta : 1975) Vol. 2, p. 269.

प्रश्न 2. उपनिषदों की विषयवस्तु और महत्त्व के विषय में संक्षिप्त भावपूर्ण चर्चा कीजिए।
(Discuss in brief but meaningful the subject matter and importance of Upanishads.)
अथवा
‘उपनिषद्’ शब्द के अर्थ तथा महत्त्व के बारे में संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
(Give a brief account of importance and meaning of Upanishad.)
अथवा
उपनिषदों की विषय-वस्तु एवं महत्ता के बारे में चर्चा कीजिए। (Discuss the contents of Upanishads and their importance.)
अथवा
उपनिषदों का विषय-वस्तु क्या है ? उल्लेख करें।
(Explain the subject matter of Upanishads.)
अथवा
उपनिषद् साहित बारे भावपूर्ण संक्षिप्त जानकारी दें।
(Describe briefly meaningful about the Upanishad literature.)
उपनिषदों की प्रमुख शिक्षाओं पर एक नोट लिखो।
(Write a short note on the main teachings of the Upanishads.)
अथवा
उपनिषदों की प्रमुख शिक्षाओं का वर्णन करो।
(Discuss the main teachings of the Upanishads.)
अथवा
उपनिषदों की प्रमुख शिक्षाओं के बारे आप क्या जानते हो ?
(What do you know about the main teachings of the Upanishads ?)
अथवा
उपनिषदों के प्रमुख सिद्धांतों के बारे आप क्या जानते हो ?
(What do you know about the main doctrines of the Upanishads ?)
अथवा
उपनिषद् से क्या भाव है ? इनकी मुख्य विशेषताओं का संक्षेप में वर्णन करो।
(What is meant by Upanishads ? Give a brief account of their main features.)
अथवा
उपनिषदों के बारे में संक्षिप्त जानकारी दें।
(Give brief introduction about the Upanishads.)
अथवा
उपनिषदों की प्रमुख शिक्षाओं के बारे में जानकारी दें। दो प्रथम उपनिषदों के नाम बताएँ।
(Write about the main teachings of the Upanishads. Name two earliest Upanishads.)
अथवा
उपनिषदों की प्रमुख शिक्षाओं पर नोट लिखो ।
(Write a note on the main teachings of the Upanishads.)
अथवा
उपनिषदों से क्या अभिप्राय है ? किन्हीं दो उपनिषदों के बारे में भावपूर्ण जानकारी दें।
(What is meant by Upanishads ? Describe any two of them in brief.)
अथवा
उपनिषद से क्या भाव है ? कोई एक प्रसिद्ध उपनिषद के बारे में जानकारी दीजिए।
(What is meant by Upanishads ? Describe any one popular Upanishads.)
उत्तर- भारतीय दर्शन प्रणाली का वास्तविक आरंभ उपनिषदों से माना जाता है। उपनिषद् वे ग्रंथ हैं जिनमें दुनिया के सबसे ऊँचे आध्यात्मिक ज्ञान के मोती पिरोये हुए हैं। इन मोतियों की चमक से मनुष्य का आंतरिक अंधेरा दूर हो जाता है और ऐसा प्रकाश होता है जिस के आगे सूर्य का प्रकाश भी कम हो जाता है। यदि उपनिषदों को भारतीय दर्शन का मूल स्रोत कह दिया जाये तो इस में कोई अतिकथनी नहीं होगी। उपनिषद् तीन शब्दों के मेल से बना है। ‘उप’ से भाव है नज़दीक, ‘नि’ से भाव है श्रद्धा और ‘षद्’ से भाव है बैठना। इस तरह उपनिषद् से भाव है श्रद्धा भाव से नज़दीक बैठना। वास्तव में उपनिषद् एक ऐसा ज्ञान है जो एक गुरु अपने पास (समीप) बैठे हुए शिष्य को गुप्त रूप से प्रदान करता है। उपनिषदों को वेदांत भी कहा जाता है क्योंकि इनको वेदों का अंतिम भाग समझा जाता है। वेदांत से भाव अंतिम ज्ञान है। इसका भाव यह है कि उपनिषदों में ऐसा ज्ञान दिया गया है जिस के बाद और अन्य कोई ज्ञान नहीं है। उपनिषदों की रचना अलग-अलग ऋषियों द्वारा 550 ई० पू० से 100 ई०पू० के मध्य की गई। उपनिषदों की कुल संख्या 108 है। इनमें से ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मुंडुक्य, तैतरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, ब्रहदआरण्यक, श्वेताश्वतर नामों के उपनिषदों को सब से महत्त्वपूर्ण माना जाता है। छांदोगय एवं ब्रहदआरण्यक नामक उपनिषदों की रचना सबसे पहले हुई थी। इनकी रचना 550 ई० पू० से 450 ई० पू० के मध्य हुई। उपनिषदों की मुख्य शिक्षाएँ निम्नलिखित हैं—

  1. आत्मा का स्वरूप (Nature of Self)-उपनिषदों में आत्मा शब्द का बहुत अधिक प्रयोग किया गया है क्योंकि इसको संपूर्ण ज्ञान का भंडार समझा जाता है। आत्मा सर्वव्यापक चेतन तत्त्व है। यह तत्त्व ही सारे तत्त्वों का मूल आधार है। यही जीव रूप धारण करके सब के हृदयों में निवास करता है। यही ब्रह्म या परमात्मा है। इसी कारण आत्मा को सभी ज्योतियों की ज्योति माना जाता है। उपनिषदों के अनुसार केवल आत्मा ही एक ऐसी वस्तु है जिस पर कभी संदेह नहीं किया जा सकता। आत्मा एक निश्चित सत्ता है। आत्मा नित भी है। यह परिवर्तनशील नहीं है। यह स्वयं परिवर्तनशील वस्तुओं का आधार है। इसलिए उसका अपना परिवर्तन नहीं हो सकता।
  2. ब्रह्म का स्वरूप (Nature of the Absolute)-‘ब्रह्म’ शब्द संस्कृत भाषा की एक धातु ‘बृह’ से निकला है जिस का अर्थ है उगना और बढ़ना। इससे यह दार्शनिक भाव निकाला जा सकता है कि ब्रह्म वह तत्त्व है जिस से दृष्टिमान जगत् की उत्पत्ति हुई। ब्रह्म को व्यक्ति और प्रकृति की शक्ति का रूप माना जा सकता है। उसकी शक्तियाँ असीमित (असीम) हैं क्योंकि वह स्वयं असीम है। उसको सर्व रूप और ज्योतियों की ज्योति कहा गया है। वह सब गुणों का आधार होते हुए भी निर्गुण माना गया है। वह संपूर्ण ज्ञान का भंडार है। उस के ज्ञान का शब्दों में वर्णन करना असंभव है। निस्संदेह वह सारे संसार का मूल कारण और आधार है।
  3. आत्मा और ब्रह्म की अभेदता (Identity of Self and the Absolute)-उपनिषदों में, ऋषियों ने आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं किया। वे इनको एक ही मूल तत्त्व समझते थे। इस कारण वे उपनिषदों में बहुत बार आत्मा की जगह ब्रह्म और ब्रह्म शब्द की जगह आत्मा का प्रयोग करते हैं। भेद केवल शब्दों का है परंतु अर्थ अथवा तत्त्व का भेद नहीं है। जगत् का मूल तत्त्व एक ही है। उसी को कभी आत्मा और कभी ब्रह्म कहा जाता है। जैसे कोई नदी सागर में मिलकर एक हो जाती है ठीक उसी तरह आत्मा परमात्मा में मिलकर एक हो जाती है। क्योंकि आत्मा और ब्रह्म एक ही है इस लिए उनमें भेद नहीं किया जा सकता। संक्षेप में एक बूंद में सागर और सागर में बूंद को देखना ही उपनिषदक दर्शन है।
  4. सृष्टि की रचना (Creation of the World)-उपनिषदों में सृष्टि की रचना संबंधी अनेक वर्णन मिलते हैं। इन में बताया गया है कि ब्रह्म ने सृष्टि की रचना की। सृष्टि की रचना से पहले ब्रह्म अपने आप में मौजूद था। फिर ब्रह्म ने सोचा कि वह अनेक रूपों में प्रगट हो जाये। परिणामस्वरूप उसने तेज़ पैदा किया। उत्पन्न होने वाले तेज़ ने भी संकल्प किया कि मैं अनेक रूपों वाला हो जाऊँ। फलस्वरूप उसने जल की सृजना की। जल ने अनेक जीव जंतु और अन्न को पैदा किया। इस तरह सृष्टि की रचना आरंभ हुई।
  5. कर्म सिद्धांत में विश्वास (Belief in Karma Theory)–उपनिषद् कर्म सिद्धांत में विश्वास रखते थे। इनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को उस द्वारा किये गये कर्मों का फल ज़रूर भुगतना पड़ता है। जैसे कर्म हमने पिछले जन्म में किये हैं वैसा फल हमें इस जीवन में प्राप्त होगा। इस जन्म में किये गये कर्मों का फल हमें अगले जीवन में प्राप्त होगा। इसलिए हमारे जीवन के सुख अथवा दुःख हमारे किये गये कर्मों पर ही निर्भर करते हैं। इसलिए हमें सदा शुभ कर्मों की ओर ध्यान देना चाहिए और पाप कर्मों से दूर रहना चाहिए। मनुष्य अपने बुरे कर्मों के कारण परमात्मा से बिछड़ा रहता है और वह बार-बार जन्म-मरण के चक्र में आता रहता है।
  6. नैतिक गुण (Moral Virtues)-उपनिषदों में मनुष्यों के नैतिक गुणों पर बहुत ज़ोर दिया गया है। इन गुणों को अपना कर मनुष्य इस भवसागर से पार हो सकता है। ये गुण हैं—
    • सदा सच बोलो
    • सभी जीवों से प्यार करो।
    • दूसरों के दुःखों को अपना दुःख समझें।
    • अहंकार, लालच और बुरी इच्छाओं से कोसों दूर रहो।
    • चोरी और ठगी आदि न करो।
    • धर्म का पालन करो।
    • वेदों के अध्ययन, शिक्षा, देवताओं और पितरों की ओर लापरवाही न दिखाओ।
    • लोक कल्याण की ओर लापरवाही का प्रयोग न करो।
    • अध्यापक का पूरा आदर करो।
  7. माया (Maya) उपनिषदों में पहली बार माया के सिद्धाँत पर अच्छा प्रकाश डाला गया है। इस जगत् और उसके पदार्थों को माया कहा गया है। अज्ञानी पुरुष जगत् के आकर्षक पदार्थों के पीछे दौड़ते हैं। इनको प्राप्त करने के उद्देश्य से वे बुरे से बुरा ढंग अपनाने से भी नहीं डरते। इस माया के कारण उस की बुद्धि पर पर्दा पड़ा रहता है और वह हमेशा जन्म-मरण के चक्रों में फिरता रहता है। ज्ञानी पुरुष माया के रहस्य को समझते हैं नतीजे के तौर पर वह ज़हर रूपी माया से प्यार नहीं करते। ऐसे व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त करते हैं।
  8. मोक्ष (Moksha)-मोक्ष प्राप्ति मनुष्य के जीवन का परम उद्देश्य है। कर्म करने से मनुष्य जन्म-मरण के चक्र में फंस जाता है। शरीर में कैद आत्मा दुःख और सुख की भागी है। जब तक आत्मा शरीर की कैद में है इस को दुःख सुख से छुटकारा नहीं मिल सकता। अविद्या अथवा अज्ञानता ही मनुष्य के बंधन का प्रमुख कारण है। जब यह अज्ञान नष्ट हो जाता है तो मनुष्य को बंधनों से छुटकारा मिल जाता है और वह मोक्ष प्राप्त करता है। मोक्ष मनुष्य के ज्ञान की अंतिम सीढ़ी है जिस पर पहुँच कर मनुष्य सब कुछ जान लेता है और सब कुछ पा लेता है। मोक्ष के आनंद के आगे संसार के सभी आनंद घटिया हैं। उपनिषदों के अनुसार मोक्ष केवल ज्ञान के मार्ग द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर एस० एन० सेन का यह कहना बिल्कुल ठीक है,
    “उपनिषदों में बड़े गहरे दार्शनिक विचार दिये गये हैं और जो बाद में दर्शन के विकास का मूल आधार बने।”2

2. “The Upanishads are rich in deep philosophical content and are the bed-rock on which all the latter philosophical development rests.” Dr. S.N. Sen, Ancient Indian History and Civilization (New Delhi : 1988) p.4.

प्रश्न 3. उपनिषदों के अनुसार आत्मा और ब्रह्म से भाव और स्वरूप का वर्णन करो। (Explain the meaning and nature of Self and the Absolute.)
अथवा
आत्मा और ब्रह्म के मध्य क्या संबंध है ? व्याख्या करो। (What is the relationship between Self and the Absolute ? Explain.)
उत्तर-उपनिषदों में आत्मा और ब्रह्म के संबंध में विस्तारपूर्वक जानकारी दी गई है। आत्मा क्या है ? ब्रह्म से क्या भाव है ? इन दोनों का स्वरूप क्या है और उन दोनों के मध्य क्या संबंध हैं इस संबंध में संक्षेप वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—
(क) आत्मा का स्वरूप
(Nature of Self)
उपनिषदों में आत्मा शब्द का बहुत ज्यादा प्रयोग किया गया है क्योंकि इसे संपूर्ण ज्ञान का भंडार समझा जाता है। आत्मा सर्वव्यापक चेतन तत्त्व है। यह तत्त्व ही सब तत्त्वों का मूल आधार है। यही जीव रूप धारण करके सब के हृदयों में निवास करता है। यही ब्रह्म या परमात्मा है। इसी कारण आत्मा को सभी ज्योतियों की ज्योति माना जाता है। आत्मा के स्वरूप को उपनिषदों में अग्रलिखित ढंगों से प्रकट किया गया है—

  1. आत्मा निश्चित सत्ता है (Self is certain Being) उपनिषदों के अनुसार केवल आत्मा ही एक ऐसी वस्तु है जिस पर कभी संदेह नहीं किया जा सकता। आत्मा एक निश्चित सत्ता है। इस लिए इस को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं क्योंकि यह स्वयं सिद्ध है। इस को सभी भौतिक और अभौतिक तत्त्वों का आधार माना गया है। कोई भी अनुभव आत्मा के बिना नहीं हो सकता परंतु वह अनुभव कर्ता नहीं है। वह स्वयं अनुभव अतीत है भाव ज्ञाता ज्ञात नहीं। वह तो समूचे अनुभव का साक्षी है।
  2. आत्मा नित्य है (Self is Permanent)-आत्मा नित्य है। यह परिवर्तनशील नहीं है। यह स्वयं परिवर्तनशील वस्तुओं का आधार है। इसलिए उसका अपना परिवर्तन नहीं हो सकता। यह सारी मानसिक क्रियाओं से दूर है इसलिए उस पर सांसारिक परिवर्तनों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वास्तव में यह परिवर्तन की सृजना करती है परंतु उससे अतीत रहती है। इस तरह आत्मा की नित्यता से इंकार नहीं किया जा सकता।
  3. पाँच कोषों का सिद्धांत (The Doctrine of Five Layers)-आत्मा के स्वरूप को समझने के लिए तैतरीय उपनिषद् में पाँच कोषों का सिद्धांत पेश किया गया है। ये पाँच कोष हैं—
    • अन्नमयी कोष—यह अचेतन और निर्जीव पदार्थ है। यह भौतिक स्तर पर आता है।
    • प्राणमयी कोष-यह जीवन स्तर पर आता है। इस में सारी वनस्पति और पशु शामिल है।
    • मनोमयी कोष-यह चेतना का स्तर है। यह जीवन का उद्देश्य है । जीवन चेतना तक पहुँच कर खुश होता है।
    • विज्ञानमयी कोष-यह आत्म चेतन का स्तर है। इस में चेतना अपने अंदर तार्किक बुद्धि का विकास करती है।
    • आनंदमयी कोष-यह आत्मा का वास्तविक स्तर है।
      इस में अनेकता और भेद की भावना नष्ट हो जाती है। पहले चारों कोष इस आनंद में लीन हो जाते हैं जो उनके विकास की अंतिम मंज़िल है। इस तरह पाँच कोष सिद्धांत यह सिद्ध करता है कि आत्मा शुद्ध चेतन आनंद स्वरूप है।
  4. चार अवस्थायें (The Four Stages)–मांडूक्य उपनिषद् आत्मा के असली स्वरूप को समझाने के लिए चेतना के आधार पर आत्मा की चार अवस्थाओं का विश्लेषण करता है। चार अवस्थायें ये हैं—
    • जागृत अवस्था-इस में मन इंद्रियों के सहारे जगत् की वस्तुओं का आनंद अनुभव करता है।
    • स्वप्न अवस्था-इस में चेतना अपने अंदर से ही अनेक तरह के चित्रों (प्रतिबिंबों) के रूप में प्रकट होती है।
    • सुंसप्ति अवस्था-यह गहरी नींद की अवस्था है। इस में अनुभव किये आनंद को वास्तविक नहीं माना जा सकता।
    • तुरीय अवस्था-यह धर्म अवस्था है। इसमें अज्ञान नष्ट हो जाता है। आत्मा जिस आनंदमयी अवस्था में पहुँचती है उसका वर्णन करना असंभव है।

(ख) ब्रह्म का स्वरूप (Nature of the Absolute)
‘ब्रह्म’ शब्द संस्कृत भाषा के एक धातु “बृह” से निकला है जिस का अर्थ है उगना, बढ़ना और फूट निकलना। इस से यह दार्शनिक भाव निकाला जा सकता है कि ब्रह्म वह तत्त्व है जिस से दृष्टिमान जगत् की उत्पत्ति हुई। ब्रह्म को व्यक्ति और प्रकृति की शक्ति का रूप माना जा सकता है। उस की शक्तियाँ असीम हैं क्योंकि वह स्वयं असीम है। उस को सर्व रूप और ज्योतियों की ज्योति कहा गया है। वह सभी गुणों का आधार होते हुए भी निर्गुण माना गया है। वह संपूर्ण ज्ञान का भंडार है। उसके ज्ञान का शब्दों में वर्णन करना असंभव है। निस्संदेह वह सारे संसार का मूल कारण और आधार है। ब्रह्म के स्वरूप का विश्लेषण निम्नलिखित ढंग के अनुसार किया जा सकता है—

  1. ब्रह्म सर्व रूप है (Absolute is Qualified Essence)-उपनिषदों में ऋषियों ने अनेक स्थानों पर ब्रह्म को सर्वरूप बताया है। मुंडक उपनिषद् में ब्रह्म के स्वरूप के बारे में कहा गया है कि ब्रह्म ही हमारे सामने, पीछे, दक्षिण-उत्तर, पश्चिम-पूर्व, ऊपर तथा नीचे है। ब्रह्म ही विश्व है। वृहद्-आरण्यक उपनिषद् में कहा गया है कि पहले ब्रह्म ही था और जब उस ने अपने स्वरूप को रूपमान किया तो वह सर्वरूप हो गया। छांदोग्य उपनिषद् में आता है कि ब्रह्म सभी कारवाइयों, सभी इच्छाओं, सभी गंधों और सभी स्वादों को चखता हुआ सब तक पहुँचता है। भाव यह कि ब्रह्म सब कुछ है।
  2. ब्रह्म निर्गुण स्वरूप है (Absolute is Attributeless Essence)-उपनिषदों में ब्रह्म को निर्गुण स्वरूप भी बताया गया है। उसका कोई भी रूप, रंग, आकार आदि नहीं है। इसी कारण उसको न देखा जा सकता है और न ही समझा जा सकता है। मुंडक उपनिषद् में ब्रह्म को न देखने योग्य, न ग्रहण करने योग्य और बिना गोत्र, आँखों, कान, हाथ, पैर आदि वाला बताया गया है। शंकर का कहना है कि ब्रह्म जगत् का कारण तो है परंतु यह जगत् में परिवर्तित नहीं होता। वह इस परिवर्तन का आधार है। क्योंकि ब्रह्म वर्णनातीत है इस लिए उस के लिए “नेति, नेति” (अंत नहीं, अंत नहीं) शब्दों का प्रयोग किया जाता है।
  3. ब्रह्म जगत् का कारण है (Absolute is the Cause of World) उपनिषदों में ब्रह्म को जगत् का मूल कारण बताया गया है। तैतरीय उपनिषद् के अनुसार ब्रह्म वह है जिस से सभी वस्तुओं की उत्पत्ति होती है और जिस के आधार पर वे सभी अस्तित्व में रहती हैं और अंत में जिस के अंदर फिर समा जाती हैं। छांदोग्य उपनिषद में ब्रह्म को ‘तजलॉन’ कहा गया है जिस का अर्थ है जगत् का जन्म ब्रह्म से होता है, उस के सहारे रहता है और अंत में उस में लीन हो जाता है। इस का भाव यह है कि ब्रह्म में से जगत् की अभिव्यक्ति हुई है और इस अभिव्यक्ति का निमित्त और उपादान कारण ब्रह्म ही है।
  4. ब्रह्म प्रकाश का स्रोत है (Absolute is the Source of Lights)-उपनिषदों में ब्रह्म को सारे प्रकाश का स्रोत माना गया है। सूर्य, चाँद, वारे आदि ब्रह्म के प्रकाश के अंश के साथ ही प्रकाश देते हैं। ब्रह्म प्रकाश को भौतिक प्रकाश का रूप नहीं समझना चाहिए क्योंकि भौतिक प्रकाश को आँखें देख सकती हैं परंतु ब्रह्म प्रकाश को केवल योग शक्ति के द्वारा देखा जा सकता है। ब्रह्म का यह अध्यातम प्रकाश संसार की प्रत्येक वस्तु में मौजूद है।
  5. ब्रह्म सत्य है (Absolute is Existence)-उपनिषदों में ब्रह्म को पूर्ण सत्य का रूप माना गया है। दर्शन में सत्य से भाव अस्तित्व से है। ब्रह्म सर्व अस्तित्व का आधार है। इस कारण जहाँ भी अस्तित्व मौजूद है वह ब्रह्म के कारण ही होता है। ब्रह्म अपनी सत्ता के लिए किसी पर भी निर्भर नहीं बल्कि वह संसार के सभी जीवों और तत्त्वों की सत्ता का आधार माना जाता है। परिणामस्वरूप ब्रह्म को सत्य स्वरूप माना जाता है।
  6. ब्रह्म आनंद है (Absolute is Bliss)-उपनिषदों में ब्रह्म को आनंदमयी भी माना गया है। यहाँ यह याद रखने योग्य है कि ब्रह्म का यह आनंद संसार की खुशियों जैसा नहीं होता यह आनंद सागर की भाँति अनंत और अथाह होता है। ब्रह्म के आनंद पर ही संसार के सभी जीवों की उत्पत्ति होती है। इसी कारण ही सारे जीव जीते हैं। प्रत्येक जीवन अपनी सामर्थ्य के अनुसार इस आनंद को महसूस करता है। अंत में सारे जीव इस आनंद में लीन हो जाते हैं। ब्रह्म के इस आनंद का कोई अंत नहीं है क्योंकि वह पूर्ण आनंद स्वरूप है।

आत्मा और ब्रह्म की अभेदता (Identity of Self and the Absolute)
उपनिषदों में ऋषियों ने आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं किया। वे इनको एक ही मूल तत्त्व समझते थे। इस कारण वे उपनिषदों में बहुत बार आत्मा शब्द के स्थान पर ब्रह्म और ब्रह्म शब्द के स्थान पर आत्मा का प्रयोग करते हैं। भेद केवल शब्दों का है परंतु अर्थ अथवा तत्त्व का भेद नहीं है। जगत् का मूल तत्त्व एक ही है। उसको कभी आत्मा और कभी ब्रह्म कहा जाता है। जैसे कोई नदी सागर में मिलकर एक हो जाती है। ठीक उसी तरह आत्मा परमात्मा में मिलकर एक हो जाती है। क्योंकि आत्मा और ब्रह्म का स्वरूप एक ही है इस लिए उनमें भेद नहीं किया जा सकता। संक्षेप में एक बूंद में सागर और सागर में बूंद को देखना ही उपनिषदक दर्शन है।

प्रश्न 4. भगवद्गीता की मुख्य शिक्षाओं का संक्षेप में वर्णन करो। (Give a brief account of the main teachings of Bhagvadgita.)
अथवा
भगवद्गीता का मुख्य संदेश क्या है ? स्पष्ट करें।
(Explain the basic teachings of Bhagvadgita.)
अथवा
कर्मयोग के बारे में विस्तृत चर्चा करो।
(Discuss in detail the Karama Yoga.)
उत्तर-भगवद्गीता महाभारत का एक हिस्सा है। इस को गीता के नाम से अधिक जाना जाता है। इस में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। गीता का उपदेश श्री कृष्ण ने अर्जुन को महाभारत की लड़ाई शुरू होने से पहले दिया था। उपनिषदों में दी गई विचारधारा आम लोगों की समझ से बाहर थी। गीता में दिये गये विचार जनसाधारण पर जादुई प्रभाव डालते हैं। यही कारण है कि गीता आज भी हिंदुओं में हरमन प्यारी है। गीता की मुख्य शिक्षाओं का संक्षेप वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—

  1. परमात्मा (God)-गीता. में परमात्मा को सृष्टि का निर्माता बताया गया है। वह एक है। वह सर्वव्यापक है और हर जीव तथा वस्तु में मौजूद है। परंतु यही सब जीवों का सृजनहार, रक्षक और विनाशक है। परमात्मा ही ज्ञान, सत्य, सुख-दुःख, हिंसा, अहिंसा, निडर, खुशी, गमी, प्रसिद्धि और अनादर आदि का मूल है। गीता के दसवें अध्याय में कहा गया है “मैं सब का आरंभ हूँ। सब की उत्पत्ति मेरे से ही है। यह जानते हुए पूर्ण विश्वास रखने वाले बुद्धिमान व्यक्ति मेरी पूजा करते हैं ।” परमात्मा अमर है। वह जन्म और मृत्यु से रहित है। वह सब से महान् है।
  2. आत्मा (Atma)—गीता के अनुसार शरीर आत्मा नहीं है। जन्म-मृत्यु का संबंध शरीरों के साथ है, आत्मा के साथ नहीं। आत्मा सदैव रहने वाला अविनाशी तत्त्व है। परंतु जल, वायु, अस्त्र-शस्त्र आदि का आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यह न कभी अस्तित्व में आता है और न ही उसका अंत होता है। शरीर के मरने पर भी यह नहीं मरता। जिस तरह मनुष्य अपने पुराने और फटे हुए कपड़े उतार देता है और नये कपड़े पहन लेता है ठीक उसी तरह ही यह आत्मा पुराने शरीरों को छोड़ देती है और नया शरीर धारण कर लेती है।
  3. कर्मयोग (Karamayoga)-कर्मयोग गीता का एक प्रसिद्ध सिद्धांत है। कोई भी जीव एक पल के लिए भी बिना कर्म से नहीं रह सकता। जो व्यक्ति इंद्रियों पर काबू पा कर निष्काम कर्म करते हैं, वो कर्मयोगी हैं और जो व्यक्ति इंद्रियों के अधीन हो कर दिखावे के लिए कर्म करते हैं, वे पाखंडी हैं। योग कर्म (यह वो कर्म है जिस में फल की इच्छा नहीं होती) को छोड़कर शेष सभी कर्म बंधन वाले कहे गये हैं। इसलिए गीता में मनुष्य को कर्मयोग करने की प्रेरणा दी गई है। गीता के अनुसार प्रत्येक कर्म का फल ज़रूर निकलता है, जिसको उसे भोगना पड़ता है और यह नहीं हो सकता कि व्यक्ति कोई कर्म करे और उस के फल से बच जाये। यह एक अटल नियम है। कर्मों के फल जीव को जन्म-जन्मांतर के चक्र में डालते हैं। वह प्रत्येक जन्म में कुछ पिछले फलों को भोग कर दूर करता है और कुछ नये कर्मों के द्वारा फलों को संचित करता है, जो उस को अगले जन्म में ले जाते हैं। कर्मों के परिणामस्वरूप मनुष्य को अनेक पदवियों की प्राप्ति होती है। इनमें से सब से ऊँची पदवी परमपद है जो मनुष्य के जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। केवल कर्मयोग ही मनुष्य को परमपद तक पहुँचा सकते हैं।
  4. भक्तियोग (Bhaktiyoga)-भक्तियोग की गणना गीता के तीन प्रमुख मार्गों में की जाती है। भक्ति कई तरह की होती है।
    • प्राप्ति भक्ति-यह वह भक्ति है जिस में भक्त अपनी शुद्ध भावना के साथ ईश्वर की शरण में आ जाता है और वह सांसारिक पदार्थों से मोह तोड़ लेता है।
    • स्वार्थ भक्ति-ज्यादातर संसार में भक्ति स्वार्थ की भावना से की जाती है। इस का कारण यह है कि संसार के दुःखों से तंग आकर कुछ लोग भक्ति का सहारा लेते हैं ताकि उन्हें दुःखों से छुटकारा मिल सके।
    • ज्ञान भक्ति-ऐसे भक्त अपने ज्ञान की जिज्ञासा को पूरा करने के लिए शास्त्रों का अध्ययन करते हैं और अंत ईश्वर की कृपा से सच्चा ज्ञान प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं।
    • निर्गुण भक्ति-यह वह भक्ति है जिस में भक्त ईश्वर के अस्तित्व को सभी जीवों में व्यापक समझ कर उन जीवों की सेवा करता है।
    • सगुण भक्ति-इस में भक्त शुद्ध मन से अपने ईष्ट देवता की मूर्ति के सामने भक्ति करता है।
    • कीर्तन भक्ति-इस भक्ति में भक्त ईश्वर के नाम का लगातार कीर्तन करता रहता है।
    • श्रवण भक्ति-यह भक्ति उन व्यक्तियों के लिए हैं जो कम पढ़े लिखे होते हैं। इस कारण वे शास्त्रों का अध्ययन नहीं कर सकते। परिणामस्वरूप दूसरों से शास्त्र सुनकर भक्ति के मार्ग पर चल पड़ते हैं। इन सभी भक्ति रूपों को मुक्ति का साधन समझा जाता है।
  5. ज्ञानयोग (Jnanayoga)-भगवद्गीता के अनुसार ज्ञान की अग्नि सारे कर्मों के बंधन को भस्म कर देती है। इसी कारण ज्ञान जैसी पवित्र और कोई वस्तु इस जगत् में नहीं है। यह ज्ञान साधारण पदार्थों के ज्ञान तक सीमित नहीं है। इस का वास्तविक संबंध शुद्ध आत्म ज्ञान से है। इसी को ज्ञान योग कहते हैं। कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग में से ज्ञानयोग को प्रमुखता प्राप्त है क्योंकि आत्म ज्ञान के बिना व्यक्ति न ही सच्चा कर्मयोगी हो सकता है और न ही सच्चा भक्त हो सकता है। मानव जीवन की प्राप्ति के बाद जो जीव अपने आत्म-स्वरूप का ज्ञान प्राप्त नहीं करता वह कर्मों के चक्र से छुटकारा प्राप्त नहीं कर सकता। ज्ञान मुक्ति का एक उत्तम साधन है क्योंकि ज्ञान की अग्नि में कर्म का बीज जल जाता है और जला हुई बीज पुनर्जन्म के पौधे को पैदा नहीं कर सकता।

प्रश्न 5. मानव जाति के कल्याण के कारण भगवद्गीता में दर्शाये गये तीनों मार्गों के बारे आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about the three paths shown in the Bhagvadgita for the benefit of mankind ?)
अथवा
भगवद्गीता के दर्शाए गए तीन योग कौन से हैं ? चर्चा करें।
(Which are the three Yogas mentioned in the Bhagvad Gita ? Discuss.)
अथवा
भगवद्गीता में कितने योग दर्शाए गए हैं ? विस्तार सहित वर्णन करें। (How many Yogas are referred to in the Bhagvadgita ? Discuss in detail.)
उत्तर-भगवद्गीता अथवा गीता हिंदुओं का एक पवित्र धार्मिक ग्रंथ है। इस में मानव के जीवन की प्रत्येक समस्या का हल सरल और स्पष्ट शब्दों में किया गया है। गीता मुक्ति के लिए कोई एक जीवन मार्ग नहीं बताता। इस का कथन है कि अगर मनुष्य के स्वभाव अलग-अलग हैं, तो उसको अलग-अलग मार्गों के द्वारा ही अपने उच्चतम उद्देश्य पर पहुँचाना होगा। ये तीन मार्ग हैं-कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग। मनुष्य अपने स्वभाव और रुचि के अनुसार ही अपने जीवन का मार्ग चुनते हैं।

  1. कर्मयोग (Karamayoga)-कर्मयोग गीता का एक प्रसिद्ध सिद्धांत है। कोई भी जीव एक पल के लिए भी बिना कर्म से नहीं रह सकता। जो व्यक्ति इंद्रियों पर काबू पा कर निष्काम कर्म करते हैं, वो कर्मयोगी हैं और जो व्यक्ति इंद्रियों के अधीन हो कर दिखावे के लिए कर्म करते हैं, वे पाखंडी हैं। योग कर्म (यह वो कर्म है जिस में फल की इच्छा नहीं होती) को छोड़कर शेष सभी कर्म बंधन वाले कहे गये हैं। इसलिए गीता में मनुष्य को कर्मयोग करने की प्रेरणा दी गई है। गीता के अनुसार प्रत्येक कर्म का फल ज़रूर निकलता है, जिसको उसे भोगना पड़ता है और यह नहीं हो सकता कि व्यक्ति कोई कर्म करे और उस के फल से बच जाये। यह एक अटल नियम है। कर्मों के फल जीव को जन्म-जन्मांतर के चक्र में डालते हैं। वह प्रत्येक जन्म में कुछ पिछले फलों को भोग कर दूर करता है और कुछ नये कर्मों के द्वारा फलों को संचित करता है, जो उस को अगले जन्म में ले जाते हैं। कर्मों के परिणामस्वरूप मनुष्य को अनेक पदवियों की प्राप्ति होती है। इनमें से सब से ऊँची पदवी परमपद है जो मनुष्य के जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। केवल कर्मयोग ही मनुष्य को परमपद तक पहुँचा सकते हैं।
  2. भक्तियोग (Bhaktiyoga)-भक्तियोग की गणना गीता के तीन प्रमुख मार्गों में की जाती है। भक्ति कई तरह की होती है।
    • प्राप्ति भक्ति-यह वह भक्ति है जिस में भक्त अपनी शुद्ध भावना के साथ ईश्वर की शरण में आ जाता है और वह सांसारिक पदार्थों से मोह तोड़ लेता है।
    • स्वार्थ भक्ति-ज्यादातर संसार में भक्ति स्वार्थ की भावना से की जाती है। इस का कारण यह है कि संसार के दुःखों से तंग आकर कुछ लोग भक्ति का सहारा लेते हैं ताकि उन्हें दुःखों से छुटकारा मिल सके।
    • ज्ञान भक्ति-ऐसे भक्त अपने ज्ञान की जिज्ञासा को पूरा करने के लिए शास्त्रों का अध्ययन करते हैं और अंत ईश्वर की कृपा से सच्चा ज्ञान प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं।
    • निर्गुण भक्ति-यह वह भक्ति है जिस में भक्त ईश्वर के अस्तित्व को सभी जीवों में व्यापक समझ कर उन जीवों की सेवा करता है।
    • सगुण भक्ति-इस में भक्त शुद्ध मन से अपने ईष्ट देवता की मूर्ति के सामने भक्ति करता है।
    • कीर्तन भक्ति-इस भक्ति में भक्त ईश्वर के नाम का लगातार कीर्तन करता रहता है।
    • श्रवण भक्ति-यह भक्ति उन व्यक्तियों के लिए हैं जो कम पढ़े लिखे होते हैं। इस कारण वे शास्त्रों का अध्ययन नहीं कर सकते। परिणामस्वरूप दूसरों से शास्त्र सुनकर भक्ति के मार्ग पर चल पड़ते हैं। इन सभी भक्ति रूपों को मुक्ति का साधन समझा जाता है।
  3. ज्ञानयोग (Jnanayoga)-भगवद्गीता के अनुसार ज्ञान की अग्नि सारे कर्मों के बंधन को भस्म कर देती है। इसी कारण ज्ञान जैसी पवित्र और कोई वस्तु इस जगत् में नहीं है। यह ज्ञान साधारण पदार्थों के ज्ञान तक सीमित नहीं है। इस का वास्तविक संबंध शुद्ध आत्म ज्ञान से है। इसी को ज्ञान योग कहते हैं। कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग में से ज्ञानयोग को प्रमुखता प्राप्त है क्योंकि आत्म ज्ञान के बिना व्यक्ति न ही सच्चा कर्मयोगी हो सकता है और न ही सच्चा भक्त हो सकता है। मानव जीवन की प्राप्ति के बाद जो जीव अपने आत्म-स्वरूप का ज्ञान प्राप्त नहीं करता वह कर्मों के चक्र से छुटकारा प्राप्त नहीं कर सकता। ज्ञान मुक्ति का एक उत्तम साधन है क्योंकि ज्ञान की अग्नि में कर्म का बीज जल जाता है और जला हुई बीज पुनर्जन्म के पौधे को पैदा नहीं कर सकता।

प्रश्न 6. भगवद्गीता के निष्काम कर्म बारे आप क्या जानते हैं ? (What do you know about Nishkama Karma of Bhagvadgita ?)
उत्तर-कर्मयोग (Karamayoga)-कर्मयोग गीता का एक प्रसिद्ध सिद्धांत है। कोई भी जीव एक पल के लिए भी बिना कर्म से नहीं रह सकता। जो व्यक्ति इंद्रियों पर काबू पा कर निष्काम कर्म करते हैं, वो कर्मयोगी हैं और जो व्यक्ति इंद्रियों के अधीन हो कर दिखावे के लिए कर्म करते हैं, वे पाखंडी हैं। योग कर्म (यह वो कर्म है जिस में फल की इच्छा नहीं होती) को छोड़कर शेष सभी कर्म बंधन वाले कहे गये हैं। इसलिए गीता में मनुष्य को कर्मयोग करने की प्रेरणा दी गई है। गीता के अनुसार प्रत्येक कर्म का फल ज़रूर निकलता है, जिसको उसे भोगना पड़ता है और यह नहीं हो सकता कि व्यक्ति कोई कर्म करे और उस के फल से बच जाये। यह एक अटल नियम है। कर्मों के फल जीव को जन्म-जन्मांतर के चक्र में डालते हैं। वह प्रत्येक जन्म में कुछ पिछले फलों को भोग कर दूर करता है और कुछ नये कर्मों के द्वारा फलों को संचित करता है, जो उस को अगले जन्म में ले जाते हैं। कर्मों के परिणामस्वरूप मनुष्य को अनेक पदवियों की प्राप्ति होती है। इनमें से सब से ऊँची पदवी परमपद है जो मनुष्य के जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। केवल कर्मयोग ही मनुष्य को परमपद तक पहुँचा सकते हैं।

प्रश्न 7. भगवद्गीता में अंकित उपदेश किसने किसे दिया था ? गीता के तीन योगों में से भक्ति योग के बारे में चर्चा करें।
(Who gave the lesson as contained in the Bhagvadgita and to whom ? Of the three Yogas in the Gita, write about the Bhakti Yoga.)
अथवा
भगवद्गीता में दर्शाए तीन योग कौन-से हैं ? भक्ति योग के बारे में चर्चा करें।
(Which are three Yogas mentioned in the Bhagvadgita ? Discuss Bhakti Yoga.)
उत्तर- भगवद्गीता में अंकित उपदेश भगवान कृष्ण ने अर्जुन को दिया था।
भक्तियोग (Bhaktiyoga)-भक्तियोग की गणना गीता के तीन प्रमुख मार्गों में की जाती है। भक्ति कई तरह की होती है।

  1. प्राप्ति भक्ति-यह वह भक्ति है जिस में भक्त अपनी शुद्ध भावना के साथ ईश्वर की शरण में आ जाता है और वह सांसारिक पदार्थों से मोह तोड़ लेता है।
  2. स्वार्थ भक्ति-ज्यादातर संसार में भक्ति स्वार्थ की भावना से की जाती है। इस का कारण यह है कि संसार के दुःखों से तंग आकर कुछ लोग भक्ति का सहारा लेते हैं ताकि उन्हें दुःखों से छुटकारा मिल सके।
  3. ज्ञान भक्ति-ऐसे भक्त अपने ज्ञान की जिज्ञासा को पूरा करने के लिए शास्त्रों का अध्ययन करते हैं और अंत ईश्वर की कृपा से सच्चा ज्ञान प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं।
  4. निर्गुण भक्ति-यह वह भक्ति है जिस में भक्त ईश्वर के अस्तित्व को सभी जीवों में व्यापक समझ कर उन जीवों की सेवा करता है।
  5. सगुण भक्ति-इस में भक्त शुद्ध मन से अपने ईष्ट देवता की मूर्ति के सामने भक्ति करता है।
  6. कीर्तन भक्ति-इस भक्ति में भक्त ईश्वर के नाम का लगातार कीर्तन करता रहता है।
  7. श्रवण भक्ति-यह भक्ति उन व्यक्तियों के लिए हैं जो कम पढ़े लिखे होते हैं। इस कारण वे शास्त्रों का अध्ययन नहीं कर सकते। परिणामस्वरूप दूसरों से शास्त्र सुनकर भक्ति के मार्ग पर चल पड़ते हैं। इन सभी भक्ति रूपों को मुक्ति का साधन समझा जाता है।

प्रश्न 8. धर्म शास्त्रों से आप क्या समझते हैं ? मुख्य धर्म शास्त्रों पर एक नोट लिखें।
(What do you mean by Dharma Shastras ? Write a note on the main Dharma Shastras.)
अथवा
धर्म शास्त्रों में किन विषयों को छुआ गया है ? वर्णन करो।
(Which subjects have been touched in Dharma Shastras ? Explain.)
अथवा
धर्म शास्त्र से क्या भाव है ? किसी एक धर्म शास्त्र का वर्णन करें। (What is Dharma Shastra ? Explain any one of the Dharma Shastra.)
अथवा
धर्म शास्त्रों के महत्त्व का वर्णन करो।
(Explain the importance of Dharma Shastras.)
अथवा
शास्त्र से क्या भाव है ? किसी एक हिंदू शास्त्र की जानकारी दें।
[What is Shastra ? Give brief description of any Hindu scripture (Shastras).]
अथवा
किसी एक धर्म शास्त्र को आधार बनाकर शास्त्र साहित्य के बारे में जानकारी दें।
(Describe the Shastra, literature on the basis of any one Shastra.)
अथवा
हिंदू शास्त्रों बारे जानकारी दें। [Write a brief note on Hindu Scriptures (Shastras).]
अथवा
शास्त्रों के मुख्य लक्षणों के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the main features of Shastras.)
अथवा
शास्त्रों के आध्यात्मिक महत्त्व पर प्रकाश डालें।
(Elucidate the spiritual importance of Shastras.)
अथवा
धर्म शास्त्रों के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe Dharma Shastras.)
उत्तर- धर्म शास्त्र हिंदुओं के प्राचीन ग्रंथ हैं । इनको स्मृति भी कहा जाता है। इन धर्म शास्त्रों में मनु का मानव धर्म शास्त्र अथवा मनु स्मृति सब से अधिक प्रसिद्ध है। इस के अतिरिक्त याज्ञवलक्य, विष्णु और नारद के द्वारा लिखी गई स्मृतियों को भी महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इन धर्म शास्त्रों के रचनाकाल के बारे इतिहासकारों में मतभेद हैं। आम सुझाव यह है कि इनकी रचना पहली सदी ई० पू० से पाँचवीं सदी ई० पू० के मध्य हई। ये धर्म शास्त्र संस्कृत में लिखे गये हैं। इनमें केवल विष्णु स्मृति गद्य रूप में लिखी गई है जबकि बाकी के तीनों धर्म शास्त्र कविता के रूप में लिखे गये हैं। इन धर्म शास्त्रों में प्राचीन कालीन भारत के धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक नियमों के बारे बहुत विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला गया है। परिणामस्वरूप ये धर्म शास्त्र हमारे लिए उस समय के लोगों की दशा जानने के लिए एक बहुमूल्य स्रोत है। प्रमुख धर्मशास्त्रों का संक्षेप वर्णन निम्नलिखित अनुसार है:—

1. मनु स्मृति (Manu Smriti)—मनु स्मृति को मानव धर्म शास्त्र के नाम से भी जाना जाता है। इस की रचना मनु ने की थी। मनु को संसार का पहला कानूनदाता माना जाता है। उसने अपनी रचना में धर्म की उत्पत्ति और उसके स्रोतों के बारे बड़ी महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान की गई है। इस में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्त्तव्य अंकित किये गये हैं। ब्राह्मणों को समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था और शूद्रों को सब से नीच समझा जाता है। इस में मानव जीवन के चार आश्रमों अर्थात् ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वाणप्रस्थ और संन्यास आश्रम के कर्तव्यों और महत्त्व के बारे बहुत लाभदायक जानकारी प्रदान की गई है। इस में मनु ने राजाओं को कौन से नियमों की पालना करनी चाहिए के बारे भी जानकारी दी है। उस अनुसार राजा को प्रशासन प्रबंध चलाने के लिए एक मंत्री परिषद् का गठन करना चाहिए। राजा को स्थानिक प्रबंध में कम से कम हस्तक्षेप करना चाहिए।
मनु का कहना था कि हमें अपने माता-पिता, अध्यापकों और बुजुर्गों के सत्कार का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए। उनके नाराज़ होने पर भी हमें गुस्से में नहीं आना चाहिए। क्योंकि हम उन के ऋण को चुका नहीं सकते। जो व्यक्ति इन का निरादर करता है उस को 100 पन जुर्माना किया जाये। मनु के अनुसार स्त्रियों को वेदों के अध्ययन और सम्पत्ति का अधिकार नहीं देना चाहिए। उनके विचारों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। उनको स्वतंत्रता नहीं दी जानी चाहिए। वह बाल विवाह के पक्ष में था। उसने विधवा विवाह और नियोग प्रथाओं का विरोध किया। मनु के अनुसार लोगों को सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए। उस अनुसार दुराचारी और पापी व्यक्तियों को नर्क में अनेक कष्टों को सहन करना पड़ेगा। वह जुए के घोर विरोधी थे। उनके अनुसार सरकार के द्वारा वस्तुओं की कीमतें निर्धारित की जानी चाहिए। इन विषयों के अतिरिक्त मनु ने अपनी रचना में दान, योग, तप, पुनर्जन्म, मोक्ष के बारे में भी जानकारी प्रदान की है।

2. याज्ञवल्कय स्मृति (Yajnavalkya Smriti)-याज्ञवल्कय स्मृति चाहे मनु स्मृति के मुकाबले संक्षेप है परंतु वह अनेक पक्षों से महत्त्वपूर्ण समझी जाती है। इस में दिया गया वर्णन नियमबद्ध है और भाषा प्रवाहमयी है। इस का रचनाकाल 100 ई० पू० से 300 ई० के मध्य माना जाता है। याज्ञवल्कय की स्मृति तीन अध्यायों में बाँटी गई है। पहले अध्याय में गर्भ धारण करने से लेकर विवाह तक के संस्कार, पत्नी के कर्त्तव्य, चार वर्णों के अधिकार और कर्त्तव्य, यज्ञ, दान के नियमों, श्राद्ध के नियमों और उन्हें करवाने से प्राप्त फल, राजा और उसके मंत्रियों के लिए निर्धारित योग्यतायें, न्याय व्यवस्था और अपराधियों के लिए सज़ायें और कर व्यवस्था आदि का वर्णन है। दूसरे अध्याय में धर्म शास्त्र और अर्थ शास्त्र में अंतर, संपत्ति के स्वामित्व संबंधी, दास, जुए, चोरी, बलात्कार, सीमावाद संबंधी आदि के नियमों की विस्तारपूर्वक जानकारी दी गई है। तीसरे अध्याय में मनुष्य के अंतिम संस्कार, शोक काल, शुद्धि के साधन, आत्मा, मोक्ष मार्ग, पापियों, योगियों, आत्म ज्ञान के साधनों, नरक, प्रायश्चित के उद्देश्य, मदिरापान और जीव हत्या आदि विषयों के बारे प्रकाश डाला गया है।
याज्ञवल्कय की स्मृति और मन की स्मृति के मध्य कुछ बातों पर मतभेद था। मनु ने जहाँ ब्राह्मण को शूद्र की लड़की के साथ विवाह करने की आज्ञा दी है वहाँ याज्ञवल्कय इस के विरोधी थे। मनु ने नियोग की निंदा की है परंतु याज्ञवल्कय इस के पक्ष में थे। मनु का कहना था कि विधवाओं को संपत्ति का अधिकार नहीं होना चाहिए जबकि याज्ञवल्कय इसके पूरी तरह पक्ष में था। मनु जुए के सख्त विरुद्ध थे जबकि याज्ञवल्कय इस को बुरा नहीं समझता था। वह इसको सरकार के नियंत्रण में ला कर माल प्राप्त करने के पक्ष में था। याज्ञवल्कय ने अपनी स्मृति में शारीरिक विज्ञान और चिकित्सा संबंधी बहुत लाभदायक जानकारी प्रदान की है।

3. विष्णु स्मृति (Vishnu Smriti)-इस स्मृति कीचना 100 ई० से 300 ई० के मध्य की गई थी। यह गद्य रूप में लिखी गई थी। इस में कुछ श्लोक मनु और याज्ञवल्कय स्मृतियों में से लिये गये हैं। विष्णु स्मृति में आर्यव्रत का क्षेत्र मनु स्मृति के मुकाबले अधिक विस्तारपूर्वक माना है। इस में लगभग सारा भारत शामिल है। इस से सिद्ध होता है कि विष्णु स्मृति की रचना के समय आर्य सारे भारत में बिखर गये थे। राजा प्रशासन की धुरी होता था। अपने राज्य का विस्तार करना और प्रजा की रक्षा करना उसके प्रमुख कार्य समझे जाते थे। राजा प्रशासन प्रबंध को अच्छे ढंग से चलाने के उद्देश्य से एक मंत्रिपरिषद का गठन करता था। मंत्रियों की नियुक्ति का मुख्य आधार उनकी योग्यता और राज्य के प्रति वफादारी थी। राज्य को कई प्रशासनिक इकाइयों में बाँटा जाता था। प्रशासन की सब से छोटी इकाई को ग्राम (गाँव) कहते थे। प्रजा को निष्पक्ष न्याय देना राजा का एक प्रमुख कर्त्तव्य समझा जाता था। विष्णु स्मृति में अपराधों की किस्मों और उनको मिलने वाली सज़ाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।
मनु स्मृति में कहा गया है कि ब्राह्मणों पर उनकी समाज में सर्वोच्च स्थिति के कारण कर नहीं लगाया जाना चाहिए परंतु विष्णु स्मृति इस के पक्ष में थी। विष्णु स्मृति जुए के विरुद्ध थी और इसको समाज पर एक घोर कलंक समझती थी। यह समाज में प्रचलित वर्ण व्यवस्था और आश्रम प्रथा में विश्वास रखती थी। शूद्र भी संन्यासी होते थे जबकि मनु स्मृति के अनुसार वे संन्यास धारण नहीं कर सकते थे। इस काल में स्त्रियों की दशा पहले से बदत्तर (बुरी) हो गई थी। इस का अंदाज़ा इस बात से लगाया जाता है कि उस समय समाज में सती प्रथा का प्रचलन आरंभ हो गया था। विष्णु स्मृति में लोगों को सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करने पर बहुत ज़ोर दिया गया है। उनको मलेच्छों से न बोलने के लिए भी कहा गया है। विष्णु स्मृति में यव, माषा, स्वर्ण, निषक, किश्णाल आदि सिक्कों का वर्णन भी मिलता है। इस से पता चलता है कि उस समय व्यापार न केवल वस्तु-विनिमय बल्कि सिक्कों से भी किया किया जाता था।

4. नारद स्मृति (Narda Smriti)-इस स्मृति की रचना 100 ई० से 400 ई० के मध्य की गई थी। इस स्मृति में भी कुछ श्लोक मनु स्मृति से लिये गये हैं परंतु इस की अनेक विशेषतायें अपनी हैं। राज्य में होने वाली घटनाओं से संबंधित सूचना देने के लिए राजा की ओर से गुप्तचर नियुक्त किये जाते थे। कुल, श्रेणी और गण जनहित संस्थायें थीं। ये संस्थायें अपने नियम बनाती थीं। राजा उन के आंतरिक मामलों में बहुत कम हस्तक्षेप करता था। नारद स्मृति में राज्य के न्याय प्रबंध का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। राजा को राज्य का सर्वोच्च न्यायाधीश माना जाता था। उसके निर्णय अंतिम होते थे। यदि किसी चोर को न पकड़ा जा सकता तो चोरी हुए सामान का मूल्य राजा को अपने खज़ाने से देना पड़ता है। चोर को शरण देना या चोरी का सामान खरीदने वाले को भी सज़ा का बराबर हकदार माना जाता था। अलग-अलग अपराधों के लिए अलग-अलग सज़ायें निर्धारित की गई हैं। निर्दोष सिद्ध करने के लिए सात प्रकार की परीक्षाओं का वर्णन किया गया है।
नारद जुआखोरी को सरकार के नियंत्रण के नीचे लाने के पक्ष में थे ताकि राज्य को उससे कुछ आय प्राप्त हो सके। वह विधवा को अपने पति की संपत्ति दिये जाने के पक्ष में नहीं था। उसने विधवा विवाह और नियोग प्रथाओं का समर्थन किया। उसने समाज में प्रचलित 15 किस्मों के दासों का वर्णन किया है। इनका मुख्य कार्य उपरोक्त तीन जातियों की सेवा करना था। उनको संपत्ति रखने का अधिकार नहीं था। व्यापार में साझेदारी की प्रथा थी और लाभ तथा हानि सांझेदारों द्वारा लगाई गई पूंजी के हिसाब से बाँटा जाता था। नारद ने दीनार, पन और स्वर्ण नामी सिक्कों का वर्णन किया है। उसने विद्यार्थियों या शिल्पियों की सिखलाई के लिए भी कुछ नियम निर्धारित किये थे। उनको अपने स्वामी की कार्यशाला में जाकर काम सीखना पड़ता था। वे अपने निर्धारित शिक्षाकाल से पहले अपने स्वामी को छोड़ नहीं सकते थे। ऐसा करने वाले शिल्पी को भारी दंड दिया जाता था।
ऊपरलिखित विवरण से स्पष्ट है कि धर्म शास्त्रों में हिंदुओं के विभिन्न कानूनों और रीति-रिवाजों के बारे बहुत विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला गया है। ऐतिहासिक पक्ष से इनकी बहुत महत्ता है। डॉक्टर आर० सी० मजूमदार का यह कहना बिल्कुल ठीक है,
“धर्म शास्त्रों ने जिनको स्मृतियाँ भी कहा जाता है, हिंदुओं के जीवन में पिछले दो हज़ार वर्षों से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यद्यपि वेदों को धर्म का अंतिम स्त्रोत समझा जाता है परंतु व्यवहार में सारे भारत के हिंदू अपने धार्मिक कर्तव्यों और रस्मों के लिए स्मृति ग्रंथों की ओर देखते हैं। उनको हिंदू कानून और सामाजिक रीति-रिवाजों का सब से भरोसेयोग्य स्त्रोत भी समझा जाता है।”3

3. “The Dharma Sastras, also called Smritis, have played a very important part in Hindu life during the last two thousand years. Although the Vedas are regarded as the ultimate sources of Dharma, in practice it is the Smriti works to which the Hindus all over India turn for the real exposition of religious duties and usages. They are also regarded as the only authentic sources of Hindu law and social customs.” Dr. R. C. Majumdar, The History and Culture of the Indian People (Bombay : 1953) Vol. 2, pp. 254-55.

प्रश्न 9. मनु स्मृति से क्या भाव है ? इस में किन विषयों का वर्णन किया गया है ?
(What is ineant by Manu Smriti ? What subjects have been discussed in it ?)
अथवा
मनु स्मृति के बारे में आप क्या जानते हैं ? वर्णन करो।
(What do you know about Manu Smriti ? Explain.)
उत्तर-धर्म शास्त्रों में मनु स्मृति की गणना प्रथम स्थान पर की जाती है। इस को मानव धर्म शास्त्र के नाम से भी जाना जाता है। इस का रचना काल 200 ई० पू० से 200 ई० के मध्य माना जाता है। इस में 27,000 श्लोक हैं और इस के 12 अध्याय हैं। यह संस्कृत में कविता रूप में लिखी गई है। मनु को संसार का पहला कानूनदाता समझा जाता है। अपनी कृति में मनु ने अपने युग में भारत के धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक नियमों के बारे बहुत विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला है। प्रमुख नियमों का संक्षेप वर्णन निम्नलिखित अनुसार है:—

  1. धर्म के चार स्रोत (Four Sources of Dharma)-मनु की भारतीय संस्कृति को सब से बड़ी देन धर्म के चार स्त्रोतों के बारे जानकारी देना है। उस के अनुसार वेद धर्म का पहला स्रोत है। ये विश्व के सारे धर्मों को मूल तत्त्व प्रदान करते हैं। दूसरा स्रोत स्मृति है। स्मृति से भाव है वे बातें जिन को याद शक्ति के सहारे लिखा गया है। स्मृति श्रुति से भिन्न होती है। श्रुति में वे बातें सम्मिलित हैं जिन को सीधा परमात्मा से सुना गया है। स्मृति में धर्म शास्त्र और श्रुति में वेद आते हैं। वह व्यक्ति जो श्रुति और स्मृति में दिये गये कानूनों का पालन करता है, वह इस जीवन में प्रसिद्धि प्राप्त कर लेता है और अगले जीवन में भी अथाह खुशी का भागी बनता है। तीसरा स्रोत मान्यता प्राप्त रीति-रिवाज हैं परंतु ये शिष्टाचार पर आधारित होने चाहिए। चौथा स्रोत वह है जिस को आत्मा माने परंतु वह भी शिष्टाचार पर आधारित होना चाहिए।
  2. प्रशासनिक नियम (Administrative Laws)-मनु स्मृति में राजा का विशेष महत्त्व दर्शाया गया है। वह राज्य का मुखिया होता था। उस को देवता स्वरूप समझा जाता था। उसका मुख्य कर्त्तव्य धर्म और प्रजा की रक्षा करना था। प्रजा के लिए उसकी आज्ञा का पालन करना ज़रूरी था। राजा निरंकुश नहीं होता था। वह प्रशासन को अच्छे ढंग (तरीके) से चलाने के उद्देश्य से 7 अथवा
  3. मंत्रियों की एक मंत्रि-परिषद् का गठन करता था। इसका अध्यक्ष मुख्यमात्य होता था जो आम तौर पर ब्राह्मण होता था। इन मंत्रियों की योग्यतायें और कर्तव्यों के बारे, युद्ध के नियमों के बारे, राजा के द्वारा लगाये जाने वाले प्रजा पर करों के बारे विशेष तौर पर प्रकाश डाला गया है। मनु ब्राह्मणों पर कर लगाये जाने के पक्ष में नहीं था। अपंग व्यक्तियों से भी कर नहीं लिये जाते थे। प्रशासन की सुविधा के लिए राज्य को कई प्रशासनिक इकाइयों में बाँटा जाता था। प्रशासन की सब से छोटी इकाई ग्राम (गाँव) थी जिस का अध्यक्ष ग्रामिणी होता था। स्थानिक प्रशासन में राजा बहुत कम हस्तक्षेप करता था।
  4. न्याय व्यवस्था (Judicial Administration)-मन ने कानून के क्षेत्र में प्रशंसनीय योगदान दिया। वह पहला व्यक्ति था जिसने दीवानी और फौजदारी कानूनों में अंतर स्पष्ट किया। प्रजा को निष्पक्ष न्याय देना वह राजा का पहला कर्त्तव्य समझता था। राजा अपने राज्य में अनेक अदालतें स्थापित करता था। कुल, श्रेणी तथा गणों को भी अपनी अदालतें स्थापित करने का अधिकार प्राप्त था। न्याय से संतुष्ट न होने पर कोई भी फरियादी राजा से फरियाद कर सकता था। मनु ने 18 किस्मों के अपराधों का वर्णन किया है। जैसे ऋण वापस न देना, वचन भंग, विश्वासघात, चोरी, डाका, मानहानि, उत्तराधिकारी संबंधी, पर-स्त्री गमन, वेतन न देना, सीमा संबंधी विवाद आदि। भिन्न-भिन्न अपराधों के लिए भिन्न-भिन्न सज़ायें निर्धारित की गई हैं। मनु ब्राह्मणों को मृत्युदंड देने के पक्ष में नहीं था। अपराधियों से अपराध कबूल करवाने के उद्देश्य से उनको कई बार अग्नि परीक्षा अथवा जल परीक्षा देनी पडती थी। संक्षेप में आधुनिक कानून की कोई ऐसी शाखा नहीं थी जो मनु की दृष्टि से ओझल रह गई हो।
  5. वर्ण व्यवस्था (Varna System)—मनु समाज में प्रचलित वर्ण व्यवस्था के पक्ष में था। उसके अनुसार ब्राह्मण परमात्मा के मुँह से, क्षत्रिय बाजुओं से, वैश्य पेट से और शूद्र पैरों से पैदा हुए। ब्राह्मण को समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। उसके प्रमुख काम वेद पढ़ना और पढ़ाना, दूसरों के लाभ के लिए यज्ञ करना, दान देना और लेना, न्यायाधीश और राजा के प्रमुख सलाहकार का काम करना आदि थे। उनसे यह आशा की जाती थी कि वे सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करें। क्षत्रिय का काम लोगों की रक्षा करना था। इस के अतिरिक्त उनको वेदों का अध्ययन करना, यज्ञ करना और उपहार देने के लिए कहा गया है। वैश्य का मुख्य काम वाणिज्य-व्यापार, खेतीबाड़ी और पशु पालन था। वह भी वेदों का अध्ययन करते थे। शूद्रों का काम ऊपर वाली तीन जातियों की बड़ी नम्रता के साथ सेवा करना था। उनको वेदों का अध्ययन करने की आज्ञा नहीं थी।
  6. चार आश्रम (The Four Ashramas)—मनु ने मनुष्य के जीवन को 100 वर्षों का मान कर उसको 25-25 वर्षों के चार आश्रमों में बाँटा। इनके नाम थे-ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और संयास आश्रम। ये सारे आश्रम ऊपर लिखित तीन जातियों के लिए निर्धारित किये गये थे। पहला आश्रम ब्रह्मचर्य था। इस में बच्चा 5 वर्ष से लेकर 25 वर्षों तक विद्या प्राप्त करता था। गृहस्थ आश्रम 25 से 50 वर्षों तक होता था। इस में मनुष्य विवाह करके संतान उत्पन्न करता था। वह अपने परिवार के पालन-पोषण का पूरा ख्याल रखता था। परिवार में पुत्र का होना ज़रूरी समझा जाता था। वाणप्रस्थ आश्रम 50 से 75 वर्षों तक होता था। इस में मनुष्य अपना घर बाहर छोड़ कर जंगलों में चला जाता था और तपस्वी जीवन व्यतीत करने का यत्न करता था। चौथा और अंतिम आश्रम संयास का था। यह 75 से 100 वर्षों तक चलता था। इस में मनुष्य एक संयासी की भाँति जीवन व्यतीत करता था और मुक्ति प्राप्त करने का यत्न करता था।
  7. स्त्रियों संबंधी विचार (Views about Women)-मनु स्त्रियों को स्वतंत्रता दिये जाने के पक्ष में नहीं था। उसका विचार था कि अविवाहित लड़की का उसके पिता द्वारा, विवाहित लड़की का उसके पति द्वारा और पति की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों द्वारा ख्याल रखा जाना चाहिए। उस का कहना था कि स्त्रियाँ पुरुष को गलत रास्ते पर लगाती हैं। वह स्त्रियों की बातों पर विश्वास किये जाने के पक्ष में नहीं थे। मनु ने बाल विवाह का समर्थन किया। उसका कहना था कि लड़कियों की 8 से 12 वर्ष की आयु तक शादी कर देनी चाहिए। मनु ने विधवा विवाह और नियोग प्रथा का विरोध किया। नियोग प्रथा के अनुसार कोई विधवा पुत्र पैदा करने के लिए अपने किसी देवर से विवाह करवा सकती थी। मनु स्त्रियों को संपत्ति का अधिकार दिये जाने के पक्ष में नहीं था। वह केवल ‘स्त्री धन’ जो दहेज के रूप में अपने साथ लाई थी प्राप्त कर सकती थी। स्त्रियों पर लगाये गये इन प्रतिबंधों के बावजूद मनु ने गृहणी के रूप में स्त्रियों का बड़ा सम्मान किया है। उसका कहना था, “जहाँ स्त्रियों का सत्कार किया जाता है वहाँ परमात्मा निवास करता है जहाँ स्त्रियों का सत्कार नहीं किया जाता वहाँ सारे धार्मिक कार्य बेकार हो जाते हैं।”
  8. कुछ अन्य विचार (Some other Views)—मनु ने लोगों को शुद्ध और पवित्र जीवन व्यतीत करने के लिए कहा। उसका कहना था कि दुराचारी मनुष्य हमेशा दुःखी रहता है। वह झूठ बोलने वालों को महाचोर समझता था। ऐसे पापी सीधा नरक में जाते हैं। उसका कहना था कि हमें अपने माता-पिता, अध्यापक और बुजुर्गों का हमेशा सत्कार करना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसा नहीं करता उसको दंड दिया जाना चाहिए। मनु ने वाणिज्य व्यापार के नियमों संबंधी भी प्रकाश डाला है। ए० ए० मैकडोनल के शब्दों में,
    “किसी और ग्रंथ ने सारे भारत में सदियों तक इतनी प्रसिद्धि और प्रमाण प्राप्त नहीं किये, जितने मानव धर्म शास्त्र ने जिसको मनु स्मृति भी कहा जाता था।”4

4. “No work has enjoyed so great a reputation and authority throughout India for centuries as the Manava Dharmasastra, also called the Manu Smriti.” A. A. Macdonell, Political, Legal and Military History of India, ed. by H.S. Bhatia (New Delhi : 1984) Vol. 1, p. 153.

प्रश्न 10. निम्नलिखित में से किन्हीं दो पर संक्षिप्त नोट लिखें।
(क) पुराण
(ख) उपनिषद्
(ग) शास्त्र।
[Write short notes on any two of the following
(a) Puranas
(b) Upanishads
(c) Shastras.]
उत्तर-पुराणों में लोगों में प्रचलित वैदिक और अवैदिक धार्मिक विश्वास, मिथिहास और कहानियाँ संकलित हैं। मिथिहास वह कथा कहानियाँ होती हैं जिनका कोई प्रमाण नहीं होता परंतु वे लोगों में बहुत प्रचलित होती हैं। प्रत्येक पुराण पाँच भागों में बाँटा होता था। ये भाग हैं-
(1) सर्ग-इसमें संसार की उत्पत्ति बारे वर्णन किया गया था।
(2) प्रतिसर्ग-इसमें संसार के विकास, नष्ट होने और फिर से उत्पत्ति के बारे वर्णन किया गया था।
(3) वंश-इसमें प्रसिद्ध राजाओं और ऋषियों के वंशों का वर्णन किया गया था।
(4) मनवंतर-इसमें संसार के महायुद्धों और प्रत्येक युद्ध की महत्त्वपूर्ण घटना का वर्णन किया गया था।
(5) वंशानचित-इसमें प्रसिद्ध वंशों के राजाओं और ऋषियों के कारनामों का वर्णन किया गया था। यह बात यहाँ याद रखने योग्य है कि हमें मूल पुराण उपलब्ध नहीं हैं। ये पुराण हमें आजकल जिस स्वरूप में उपलब्ध हैं उनमें यह जरूरी नहीं कि उनमें दिया गया वर्णन इस बाँट अनुसार हो। पुराणों का संक्षेप वर्णन निम्नलिखित अनुसार है :—

  1. ब्रह्म पुराण (The Brahman Purana)-इसको आदि पुराण भी कहा जाता है। इस में 14,000 श्लोक हैं। इस के अधिकाँश भाग में भारत के पवित्र तीर्थ स्थानों का वर्णन किया गया है। इस के अतिरिक्त इस में कृष्ण, राम, सूर्य, पूजा, प्रसिद्ध राजवंशों, पृथ्वी, नरक, विभिन्न जातियों, वर्ण, आश्रम व्यवस्था और श्राद्धों आदि का वर्णन दिया गया है।
  2. पद्म पुराण (The Padma Purana)-यह सबसे विशाल पुराण है। इस में लगभग 55,000 श्लोक दिये गये हैं। इस में सृष्टि खंड, भूमि खंड, स्वर्ग खंड और पाताल खंड का वर्णन दिया गया है। इसमें विष्णु कथा और राम कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इन के अतिरिक्त इस पुराण में अनेक तीर्थ स्थानों और व्रतों का भी वर्णन मिलता है। इस में अनेकों मिथिहासिक कथायें भी दर्ज हैं।
  3. विष्णु पुराण (The Vishnu Purana)-इस पुराण में 23,000 श्लोक दिये गये हैं। इसमें यह बताया गया है कि विष्णु ही सर्वोच्च देवता है। उसने ही संसार की रचना की और इसका पालनहार है। इसमें दी गई कथाओं में प्रह्लाद और ध्रुव की कथायें प्रसिद्ध हैं। इस में इस संसार और स्वर्ग के लोगों की अनेकों विचित्र बातों का भी वर्णन है। इस में कई प्रसिद्ध वंशों का भी वर्णन मिलता है। पाँचवें और अंतिम खंड में कृष्ण की अनेक अलौकिक लीलाओं की चर्चा की गई है।
  4. वायु पुराण (The Vayu Purana)-इस पुराण में 11,000 श्लोक हैं । इस में शिव की महिमा के साथ संबंधित अनेक कथाओं का वर्णन किया गया है। इस लिए इस को शिव पुराण भी कहते हैं। इस में अनेक वंशों का वर्णन किया गया है। प्रामाणिक तथ्यों पर आधारित होने के कारण इन की बहुत ऐतिहासिक महत्ता है। इसमें दिया गया भूगौलिक वर्णन भी बड़ा लाभदायक है।
  5. भगवद् पुराण (The Bhagavata Purana)-विष्णु देवता के साथ संबंधित पुराणों में भगवद् पुराण सब से अधिक लोकप्रिय है। इस में कृष्ण के जीवन से संबंधित अनेक कथाओं का वर्णन किया गया है। इसमें महात्मा बुद्ध और साक्ष्य दर्शन के संस्थापक कपिल को विष्णु का अवतार बताया गया है। ऐतिहासिक पक्ष से इस पुराण का कोई विशेष महत्त्व नहीं है।
  6.  नारद पुराण (The Narada Purana)-इस पुराण में 25,000 श्लोक दिये गये हैं। यह विष्ण भक्ति से संबंधित पुराण है। इस में प्राचीन कालीन भारत में प्रचलित विद्या के बारे काफी विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला गया है। इस में वंशों का विवरण नहीं मिलता।
  7. मारकंडेय पुराण (The Markandeya Purana)-इस पुराण में 900 श्लोक दिये गये हैं। इस में वैदिक देवताओं इंद्र, सूर्य और अग्नि आदि का विस्तारपूर्वक वर्णन दिया गया है। इस में कई प्रसिद्ध वंशों का भी वर्णन मिलता है।
  8. अग्नि पुराण (The Agni Purana)-इस पुराण में 15,400 श्लोक दिये गये हैं। एक परंपरा के अनुसार इस पुराण को अग्नि देवता ने आप ऋषि विशिष्ट को सुनाया था। यह शिव धर्म से संबंधित पुराण है। इस में अनेक महत्त्वपूर्ण विषयों जैसे युद्धनीति, यज्ञ विधि, ज्योतिष, भूगोल, राजनीति, कानून, छंद शास्त्र, व्याकरण, चिकित्सा, व्रत, दान, श्राद्ध और विवाह आदि पर भरपूर प्रकाश डाला गया है। निस्संदेह यह पुराण एक विश्वकोष की तरह
  9. भविष्य पुराण (The Bhavishya Purana)—इस पुराण में 14,000 श्लोक दिये गये हैं। इस में ब्रह्म, विष्ण, शिव और सूर्य देवताओं से संबंधित अनेक कथायें दी गई हैं। इस में अनेक प्राचीन राजवंशों और ऋषियों का भी वर्णन मिलता है। इनके अतिरिक्त इस में अनेक कर्मकांडों की भी चर्चा की गई है।
  10. ब्रह्मावैव्रत पुराण (The Brahmavaivarta Purana)—इस पुराण में 18,000 श्लोक दिये गये हैं। इस पुराण में ब्रह्म को इस संसार का रचयिता कहा गया है। इस में कृष्ण के जीवन का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इस में राधा का वर्णन भी आता है। इस में गणेश को कृष्ण का अवतार कहा गया है।
  11. लिंग पुराण (The Linga Purana)-इस पुराण में 11,000 श्लोक दिये गये हैं। यह शिव धर्म से संबंधित पुराण है। इस में शिव अवतारों, व्रतों तथा तीर्थों का वर्णन किया गया है। इस में लिंग की शिव के रूप में उपासना का उपदेश दिया गया है।
  12. वराह पुराण (The Varaha Purana)-इस में 10,700 श्लोक दिये गये हैं। इस में विष्णु की तरह वराह अवतार के रूप में पूजा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इस में शिव, दुर्गा और गणेश से संबंधित वर्णन . भी दिया गया है।
  13. स्कंद पुराण (The Skanda Purana)—यह एक विशाल पुराण था। इस में 51,000 श्लोकों का वर्णन किया गया था। यह पुराण आजकल उपलब्ध नहीं है। इस के बारे में जानकारी अन्य ग्रंथों में दी गई उदाहरणों से प्राप्त होती है। इस पुराण में मुख्य तौर पर शिव की पूजा के बारे बताया गया है। इस के अतिरिक्त इस में भारत के अनेक तीर्थ स्थानों और मंदिरों के बारे बहुत महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान की गई है।
  14. वामन पुराण (The Vamana Purana)इस पुराण में 10,000 श्लोक दिये गये हैं। इस पुराण के अधिकतर भाग में शिव, विष्णु और गणेश आदि देवताओं की पूजा के बारे वर्णन किया गया है। इस में अनेक मिथिहासिक कथाओं का भी वर्णन मिलता है।
  15. कूर्म पुराण (The Kurma Purana)-इस पुराण में 18,000 श्लोक दिये गये हैं। इस में विष्णु के कुर्म अवतार की पूजा का वर्णन है। इस में अनेक मिथिहासिक कथाओं का वर्णन भी मिलता है।
  16. मत्स्य पुराण (The Matsya Purana)-इस पुराण में 14,000 श्लोक दिये गये हैं। यह पुराण मत्स्य (मछली) तथा मनु के मध्य एक वार्तालाप है। जब इस संसार का विनाश हुआ तब इस मछली ने मनु की सुरक्षा की थी। इस में अनेक प्रसिद्ध राजवंशों का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है। इनके अतिरिक्त इस में अनेक मेलों और तीर्थ स्थानों का भी वर्णन है।
  17. गरुढ़ पुराण (The Garuda Purana)-इस पुराण में 18,000 श्लोक दिये गये हैं। इस में विष्णु की पूजा से संबंधित अनेक विधियों का वर्णन है। इस में यज्ञ विद्या, छंद शास्त्र, ज्योतिष, व्याकरण, खगोल विज्ञान, शारीरिक विज्ञान और भूत-प्रेतों के बारे जानकारी दी गई है। इस में अंतिम संस्कार संबंधी, सती संबंधी और पितर श्राद्धों के संबंध में विस्तावपूर्वक जानकारी दी गई है।
  18. ब्रह्माण्ड पुराण (The Brahmanda Purana)—इस पुराण में 12,000 श्लोक दिये गये हैं। इस पुराण को ब्रह्मा ने पढ़ के सुनाया था। इस में अनेक राजवंशों और तीर्थ स्थानों का वर्णन किया गया है।

भारतीय दर्शन प्रणाली का वास्तविक आरंभ उपनिषदों से माना जाता है। उपनिषद् वे ग्रंथ हैं जिनमें दुनिया के सबसे ऊँचे आध्यात्मिक ज्ञान के मोती पिरोये हुए हैं। इन मोतियों की चमक से मनुष्य का आंतरिक अंधेरा दूर हो जाता है और ऐसा प्रकाश होता है जिस के आगे सूर्य का प्रकाश भी कम हो जाता है। यदि उपनिषदों को भारतीय दर्शन का मूल स्रोत कह दिया जाये तो इस में कोई अतिकथनी नहीं होगी। उपनिषद् तीन शब्दों के मेल से बना है। ‘उप’ से भाव है नज़दीक, ‘नि’ से भाव है श्रद्धा और ‘षद्’ से भाव है बैठना। इस तरह उपनिषद् से भाव है श्रद्धा भाव से नज़दीक बैठना। वास्तव में उपनिषद् एक ऐसा ज्ञान है जो एक गुरु अपने पास (समीप) बैठे हुए शिष्य को गुप्त रूप से प्रदान करता है। उपनिषदों को वेदांत भी कहा जाता है क्योंकि इनको वेदों का अंतिम भाग समझा जाता है। वेदांत से भाव अंतिम ज्ञान है। इसका भाव यह है कि उपनिषदों में ऐसा ज्ञान दिया गया है जिस के बाद और अन्य कोई ज्ञान नहीं है। उपनिषदों की रचना अलग-अलग ऋषियों द्वारा 550 ई० पू० से 100 ई०पू० के मध्य की गई। उपनिषदों की कुल संख्या 108 है। इनमें से ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मुंडुक्य, तैतरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, ब्रहदआरण्यक, श्वेताश्वतर नामों के उपनिषदों को सब से महत्त्वपूर्ण माना जाता है। छांदोगय एवं ब्रहदआरण्यक नामक उपनिषदों की रचना सबसे पहले हुई थी। इनकी रचना 550 ई० पू० से 450 ई० पू० के मध्य हुई। उपनिषदों की मुख्य शिक्षाएँ निम्नलिखित हैं—

  1. आत्मा का स्वरूप (Nature of Self)-उपनिषदों में आत्मा शब्द का बहुत अधिक प्रयोग किया गया है क्योंकि इसको संपूर्ण ज्ञान का भंडार समझा जाता है। आत्मा सर्वव्यापक चेतन तत्त्व है। यह तत्त्व ही सारे तत्त्वों का मूल आधार है। यही जीव रूप धारण करके सब के हृदयों में निवास करता है। यही ब्रह्म या परमात्मा है। इसी कारण आत्मा को सभी ज्योतियों की ज्योति माना जाता है। उपनिषदों के अनुसार केवल आत्मा ही एक ऐसी वस्तु है जिस पर कभी संदेह नहीं किया जा सकता। आत्मा एक निश्चित सत्ता है। आत्मा नित भी है। यह परिवर्तनशील नहीं है। यह स्वयं परिवर्तनशील वस्तुओं का आधार है। इसलिए उसका अपना परिवर्तन नहीं हो सकता।
  2. ब्रह्म का स्वरूप (Nature of the Absolute)-‘ब्रह्म’ शब्द संस्कृत भाषा की एक धातु ‘बृह’ से निकला है जिस का अर्थ है उगना और बढ़ना। इससे यह दार्शनिक भाव निकाला जा सकता है कि ब्रह्म वह तत्त्व है जिस से दृष्टिमान जगत् की उत्पत्ति हुई। ब्रह्म को व्यक्ति और प्रकृति की शक्ति का रूप माना जा सकता है। उसकी शक्तियाँ असीमित (असीम) हैं क्योंकि वह स्वयं असीम है। उसको सर्व रूप और ज्योतियों की ज्योति कहा गया है। वह सब गुणों का आधार होते हुए भी निर्गुण माना गया है। वह संपूर्ण ज्ञान का भंडार है। उस के ज्ञान का शब्दों में वर्णन करना असंभव है। निस्संदेह वह सारे संसार का मूल कारण और आधार है।
  3. आत्मा और ब्रह्म की अभेदता (Identity of Self and the Absolute)-उपनिषदों में, ऋषियों ने आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं किया। वे इनको एक ही मूल तत्त्व समझते थे। इस कारण वे उपनिषदों में बहुत बार आत्मा की जगह ब्रह्म और ब्रह्म शब्द की जगह आत्मा का प्रयोग करते हैं। भेद केवल शब्दों का है परंतु अर्थ अथवा तत्त्व का भेद नहीं है। जगत् का मूल तत्त्व एक ही है। उसी को कभी आत्मा और कभी ब्रह्म कहा जाता है। जैसे कोई नदी सागर में मिलकर एक हो जाती है ठीक उसी तरह आत्मा परमात्मा में मिलकर एक हो जाती है। क्योंकि आत्मा और ब्रह्म एक ही है इस लिए उनमें भेद नहीं किया जा सकता। संक्षेप में एक बूंद में सागर और सागर में बूंद को देखना ही उपनिषदक दर्शन है।
  4. सृष्टि की रचना (Creation of the World)-उपनिषदों में सृष्टि की रचना संबंधी अनेक वर्णन मिलते हैं। इन में बताया गया है कि ब्रह्म ने सृष्टि की रचना की। सृष्टि की रचना से पहले ब्रह्म अपने आप में मौजूद था। फिर ब्रह्म ने सोचा कि वह अनेक रूपों में प्रगट हो जाये। परिणामस्वरूप उसने तेज़ पैदा किया। उत्पन्न होने वाले तेज़ ने भी संकल्प किया कि मैं अनेक रूपों वाला हो जाऊँ। फलस्वरूप उसने जल की सृजना की। जल ने अनेक जीव जंतु और अन्न को पैदा किया। इस तरह सृष्टि की रचना आरंभ हुई।
  5. कर्म सिद्धांत में विश्वास (Belief in Karma Theory)–उपनिषद् कर्म सिद्धांत में विश्वास रखते थे। इनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को उस द्वारा किये गये कर्मों का फल ज़रूर भुगतना पड़ता है। जैसे कर्म हमने पिछले जन्म में किये हैं वैसा फल हमें इस जीवन में प्राप्त होगा। इस जन्म में किये गये कर्मों का फल हमें अगले जीवन में प्राप्त होगा। इसलिए हमारे जीवन के सुख अथवा दुःख हमारे किये गये कर्मों पर ही निर्भर करते हैं। इसलिए हमें सदा शुभ कर्मों की ओर ध्यान देना चाहिए और पाप कर्मों से दूर रहना चाहिए। मनुष्य अपने बुरे कर्मों के कारण परमात्मा से बिछड़ा रहता है और वह बार-बार जन्म-मरण के चक्र में आता रहता है।
  6. नैतिक गुण (Moral Virtues)-उपनिषदों में मनुष्यों के नैतिक गुणों पर बहुत ज़ोर दिया गया है। इन गुणों को अपना कर मनुष्य इस भवसागर से पार हो सकता है। ये गुण हैं—
    • सदा सच बोलो
    • सभी जीवों से प्यार करो।
    • दूसरों के दुःखों को अपना दुःख समझें।
    • अहंकार, लालच और बुरी इच्छाओं से कोसों दूर रहो।
    • चोरी और ठगी आदि न करो।
    • धर्म का पालन करो।
    • वेदों के अध्ययन, शिक्षा, देवताओं और पितरों की ओर लापरवाही न दिखाओ।
    • लोक कल्याण की ओर लापरवाही का प्रयोग न करो।
    • अध्यापक का पूरा आदर करो।
  7. माया (Maya) उपनिषदों में पहली बार माया के सिद्धाँत पर अच्छा प्रकाश डाला गया है। इस जगत् और उसके पदार्थों को माया कहा गया है। अज्ञानी पुरुष जगत् के आकर्षक पदार्थों के पीछे दौड़ते हैं। इनको प्राप्त करने के उद्देश्य से वे बुरे से बुरा ढंग अपनाने से भी नहीं डरते। इस माया के कारण उस की बुद्धि पर पर्दा पड़ा रहता है और वह हमेशा जन्म-मरण के चक्रों में फिरता रहता है। ज्ञानी पुरुष माया के रहस्य को समझते हैं नतीजे के तौर पर वह ज़हर रूपी माया से प्यार नहीं करते। ऐसे व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त करते हैं।
  8. मोक्ष (Moksha)-मोक्ष प्राप्ति मनुष्य के जीवन का परम उद्देश्य है। कर्म करने से मनुष्य जन्म-मरण के चक्र में फंस जाता है। शरीर में कैद आत्मा दुःख और सुख की भागी है। जब तक आत्मा शरीर की कैद में है इस को दुःख सुख से छुटकारा नहीं मिल सकता। अविद्या अथवा अज्ञानता ही मनुष्य के बंधन का प्रमुख कारण है। जब यह अज्ञान नष्ट हो जाता है तो मनुष्य को बंधनों से छुटकारा मिल जाता है और वह मोक्ष प्राप्त करता है। मोक्ष मनुष्य के ज्ञान की अंतिम सीढ़ी है जिस पर पहुँच कर मनुष्य सब कुछ जान लेता है और सब कुछ पा लेता है। मोक्ष के आनंद के आगे संसार के सभी आनंद घटिया हैं। उपनिषदों के अनुसार मोक्ष केवल ज्ञान के मार्ग द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर एस० एन० सेन का यह कहना बिल्कुल ठीक है,
    “उपनिषदों में बड़े गहरे दार्शनिक विचार दिये गये हैं और जो बाद में दर्शन के विकास का मूल आधार बने।”2

2. “The Upanishads are rich in deep philosophical content and are the bed-rock on which all the latter philosophical development rests.” Dr. S.N. Sen, Ancient Indian History and Civilization (New Delhi : 1988) p.4.

धर्म शास्त्र हिंदुओं के प्राचीन ग्रंथ हैं । इनको स्मृति भी कहा जाता है। इन धर्म शास्त्रों में मनु का मानव धर्म शास्त्र अथवा मनु स्मृति सब से अधिक प्रसिद्ध है। इस के अतिरिक्त याज्ञवलक्य, विष्णु और नारद के द्वारा लिखी गई स्मृतियों को भी महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इन धर्म शास्त्रों के रचनाकाल के बारे इतिहासकारों में मतभेद हैं। आम सुझाव यह है कि इनकी रचना पहली सदी ई० पू० से पाँचवीं सदी ई० पू० के मध्य हई। ये धर्म शास्त्र संस्कृत में लिखे गये हैं। इनमें केवल विष्णु स्मृति गद्य रूप में लिखी गई है जबकि बाकी के तीनों धर्म शास्त्र कविता के रूप में लिखे गये हैं। इन धर्म शास्त्रों में प्राचीन कालीन भारत के धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक नियमों के बारे बहुत विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला गया है। परिणामस्वरूप ये धर्म शास्त्र हमारे लिए उस समय के लोगों की दशा जानने के लिए एक बहुमूल्य स्रोत है। प्रमुख धर्मशास्त्रों का संक्षेप वर्णन निम्नलिखित अनुसार है:—

1. मनु स्मृति (Manu Smriti)—मनु स्मृति को मानव धर्म शास्त्र के नाम से भी जाना जाता है। इस की रचना मनु ने की थी। मनु को संसार का पहला कानूनदाता माना जाता है। उसने अपनी रचना में धर्म की उत्पत्ति और उसके स्रोतों के बारे बड़ी महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान की गई है। इस में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्त्तव्य अंकित किये गये हैं। ब्राह्मणों को समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था और शूद्रों को सब से नीच समझा जाता है। इस में मानव जीवन के चार आश्रमों अर्थात् ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वाणप्रस्थ और संन्यास आश्रम के कर्तव्यों और महत्त्व के बारे बहुत लाभदायक जानकारी प्रदान की गई है। इस में मनु ने राजाओं को कौन से नियमों की पालना करनी चाहिए के बारे भी जानकारी दी है। उस अनुसार राजा को प्रशासन प्रबंध चलाने के लिए एक मंत्री परिषद् का गठन करना चाहिए। राजा को स्थानिक प्रबंध में कम से कम हस्तक्षेप करना चाहिए।
मनु का कहना था कि हमें अपने माता-पिता, अध्यापकों और बुजुर्गों के सत्कार का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए। उनके नाराज़ होने पर भी हमें गुस्से में नहीं आना चाहिए। क्योंकि हम उन के ऋण को चुका नहीं सकते। जो व्यक्ति इन का निरादर करता है उस को 100 पन जुर्माना किया जाये। मनु के अनुसार स्त्रियों को वेदों के अध्ययन और सम्पत्ति का अधिकार नहीं देना चाहिए। उनके विचारों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। उनको स्वतंत्रता नहीं दी जानी चाहिए। वह बाल विवाह के पक्ष में था। उसने विधवा विवाह और नियोग प्रथाओं का विरोध किया। मनु के अनुसार लोगों को सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए। उस अनुसार दुराचारी और पापी व्यक्तियों को नर्क में अनेक कष्टों को सहन करना पड़ेगा। वह जुए के घोर विरोधी थे। उनके अनुसार सरकार के द्वारा वस्तुओं की कीमतें निर्धारित की जानी चाहिए। इन विषयों के अतिरिक्त मनु ने अपनी रचना में दान, योग, तप, पुनर्जन्म, मोक्ष के बारे में भी जानकारी प्रदान की है।

2. याज्ञवल्कय स्मृति (Yajnavalkya Smriti)-याज्ञवल्कय स्मृति चाहे मनु स्मृति के मुकाबले संक्षेप है परंतु वह अनेक पक्षों से महत्त्वपूर्ण समझी जाती है। इस में दिया गया वर्णन नियमबद्ध है और भाषा प्रवाहमयी है। इस का रचनाकाल 100 ई० पू० से 300 ई० के मध्य माना जाता है। याज्ञवल्कय की स्मृति तीन अध्यायों में बाँटी गई है। पहले अध्याय में गर्भ धारण करने से लेकर विवाह तक के संस्कार, पत्नी के कर्त्तव्य, चार वर्णों के अधिकार और कर्त्तव्य, यज्ञ, दान के नियमों, श्राद्ध के नियमों और उन्हें करवाने से प्राप्त फल, राजा और उसके मंत्रियों के लिए निर्धारित योग्यतायें, न्याय व्यवस्था और अपराधियों के लिए सज़ायें और कर व्यवस्था आदि का वर्णन है। दूसरे अध्याय में धर्म शास्त्र और अर्थ शास्त्र में अंतर, संपत्ति के स्वामित्व संबंधी, दास, जुए, चोरी, बलात्कार, सीमावाद संबंधी आदि के नियमों की विस्तारपूर्वक जानकारी दी गई है। तीसरे अध्याय में मनुष्य के अंतिम संस्कार, शोक काल, शुद्धि के साधन, आत्मा, मोक्ष मार्ग, पापियों, योगियों, आत्म ज्ञान के साधनों, नरक, प्रायश्चित के उद्देश्य, मदिरापान और जीव हत्या आदि विषयों के बारे प्रकाश डाला गया है।
याज्ञवल्कय की स्मृति और मन की स्मृति के मध्य कुछ बातों पर मतभेद था। मनु ने जहाँ ब्राह्मण को शूद्र की लड़की के साथ विवाह करने की आज्ञा दी है वहाँ याज्ञवल्कय इस के विरोधी थे। मनु ने नियोग की निंदा की है परंतु याज्ञवल्कय इस के पक्ष में थे। मनु का कहना था कि विधवाओं को संपत्ति का अधिकार नहीं होना चाहिए जबकि याज्ञवल्कय इसके पूरी तरह पक्ष में था। मनु जुए के सख्त विरुद्ध थे जबकि याज्ञवल्कय इस को बुरा नहीं समझता था। वह इसको सरकार के नियंत्रण में ला कर माल प्राप्त करने के पक्ष में था। याज्ञवल्कय ने अपनी स्मृति में शारीरिक विज्ञान और चिकित्सा संबंधी बहुत लाभदायक जानकारी प्रदान की है।

3. विष्णु स्मृति (Vishnu Smriti)-इस स्मृति कीचना 100 ई० से 300 ई० के मध्य की गई थी। यह गद्य रूप में लिखी गई थी। इस में कुछ श्लोक मनु और याज्ञवल्कय स्मृतियों में से लिये गये हैं। विष्णु स्मृति में आर्यव्रत का क्षेत्र मनु स्मृति के मुकाबले अधिक विस्तारपूर्वक माना है। इस में लगभग सारा भारत शामिल है। इस से सिद्ध होता है कि विष्णु स्मृति की रचना के समय आर्य सारे भारत में बिखर गये थे। राजा प्रशासन की धुरी होता था। अपने राज्य का विस्तार करना और प्रजा की रक्षा करना उसके प्रमुख कार्य समझे जाते थे। राजा प्रशासन प्रबंध को अच्छे ढंग से चलाने के उद्देश्य से एक मंत्रिपरिषद का गठन करता था। मंत्रियों की नियुक्ति का मुख्य आधार उनकी योग्यता और राज्य के प्रति वफादारी थी। राज्य को कई प्रशासनिक इकाइयों में बाँटा जाता था। प्रशासन की सब से छोटी इकाई को ग्राम (गाँव) कहते थे। प्रजा को निष्पक्ष न्याय देना राजा का एक प्रमुख कर्त्तव्य समझा जाता था। विष्णु स्मृति में अपराधों की किस्मों और उनको मिलने वाली सज़ाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।
मनु स्मृति में कहा गया है कि ब्राह्मणों पर उनकी समाज में सर्वोच्च स्थिति के कारण कर नहीं लगाया जाना चाहिए परंतु विष्णु स्मृति इस के पक्ष में थी। विष्णु स्मृति जुए के विरुद्ध थी और इसको समाज पर एक घोर कलंक समझती थी। यह समाज में प्रचलित वर्ण व्यवस्था और आश्रम प्रथा में विश्वास रखती थी। शूद्र भी संन्यासी होते थे जबकि मनु स्मृति के अनुसार वे संन्यास धारण नहीं कर सकते थे। इस काल में स्त्रियों की दशा पहले से बदत्तर (बुरी) हो गई थी। इस का अंदाज़ा इस बात से लगाया जाता है कि उस समय समाज में सती प्रथा का प्रचलन आरंभ हो गया था। विष्णु स्मृति में लोगों को सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करने पर बहुत ज़ोर दिया गया है। उनको मलेच्छों से न बोलने के लिए भी कहा गया है। विष्णु स्मृति में यव, माषा, स्वर्ण, निषक, किश्णाल आदि सिक्कों का वर्णन भी मिलता है। इस से पता चलता है कि उस समय व्यापार न केवल वस्तु-विनिमय बल्कि सिक्कों से भी किया किया जाता था।

4. नारद स्मृति (Narda Smriti)-इस स्मृति की रचना 100 ई० से 400 ई० के मध्य की गई थी। इस स्मृति में भी कुछ श्लोक मनु स्मृति से लिये गये हैं परंतु इस की अनेक विशेषतायें अपनी हैं। राज्य में होने वाली घटनाओं से संबंधित सूचना देने के लिए राजा की ओर से गुप्तचर नियुक्त किये जाते थे। कुल, श्रेणी और गण जनहित संस्थायें थीं। ये संस्थायें अपने नियम बनाती थीं। राजा उन के आंतरिक मामलों में बहुत कम हस्तक्षेप करता था। नारद स्मृति में राज्य के न्याय प्रबंध का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। राजा को राज्य का सर्वोच्च न्यायाधीश माना जाता था। उसके निर्णय अंतिम होते थे। यदि किसी चोर को न पकड़ा जा सकता तो चोरी हुए सामान का मूल्य राजा को अपने खज़ाने से देना पड़ता है। चोर को शरण देना या चोरी का सामान खरीदने वाले को भी सज़ा का बराबर हकदार माना जाता था। अलग-अलग अपराधों के लिए अलग-अलग सज़ायें निर्धारित की गई हैं। निर्दोष सिद्ध करने के लिए सात प्रकार की परीक्षाओं का वर्णन किया गया है।
नारद जुआखोरी को सरकार के नियंत्रण के नीचे लाने के पक्ष में थे ताकि राज्य को उससे कुछ आय प्राप्त हो सके। वह विधवा को अपने पति की संपत्ति दिये जाने के पक्ष में नहीं था। उसने विधवा विवाह और नियोग प्रथाओं का समर्थन किया। उसने समाज में प्रचलित 15 किस्मों के दासों का वर्णन किया है। इनका मुख्य कार्य उपरोक्त तीन जातियों की सेवा करना था। उनको संपत्ति रखने का अधिकार नहीं था। व्यापार में साझेदारी की प्रथा थी और लाभ तथा हानि सांझेदारों द्वारा लगाई गई पूंजी के हिसाब से बाँटा जाता था। नारद ने दीनार, पन और स्वर्ण नामी सिक्कों का वर्णन किया है। उसने विद्यार्थियों या शिल्पियों की सिखलाई के लिए भी कुछ नियम निर्धारित किये थे। उनको अपने स्वामी की कार्यशाला में जाकर काम सीखना पड़ता था। वे अपने निर्धारित शिक्षाकाल से पहले अपने स्वामी को छोड़ नहीं सकते थे। ऐसा करने वाले शिल्पी को भारी दंड दिया जाता था।
ऊपरलिखित विवरण से स्पष्ट है कि धर्म शास्त्रों में हिंदुओं के विभिन्न कानूनों और रीति-रिवाजों के बारे बहुत विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला गया है। ऐतिहासिक पक्ष से इनकी बहुत महत्ता है। डॉक्टर आर० सी० मजूमदार का यह कहना बिल्कुल ठीक है,
“धर्म शास्त्रों ने जिनको स्मृतियाँ भी कहा जाता है, हिंदुओं के जीवन में पिछले दो हज़ार वर्षों से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यद्यपि वेदों को धर्म का अंतिम स्त्रोत समझा जाता है परंतु व्यवहार में सारे भारत के हिंदू अपने धार्मिक कर्तव्यों और रस्मों के लिए स्मृति ग्रंथों की ओर देखते हैं। उनको हिंदू कानून और सामाजिक रीति-रिवाजों का सब से भरोसेयोग्य स्त्रोत भी समझा जाता है।”3

3. “The Dharma Sastras, also called Smritis, have played a very important part in Hindu life during the last two thousand years. Although the Vedas are regarded as the ultimate sources of Dharma, in practice it is the Smriti works to which the Hindus all over India turn for the real exposition of religious duties and usages. They are also regarded as the only authentic sources of Hindu law and social customs.” Dr. R. C. Majumdar, The History and Culture of the Indian People (Bombay : 1953) Vol. 2, pp. 254-55.

SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. पुराण साहित्य के प्रमुख लक्षण संक्षिप्त परंतु भावपूर्ण बयान कीजिए। (Describe the salient features of Purana Literature in brief but meaningful.)
अथवा
पुराणों से क्या अभिप्राय है ? (What is meant by Puranas ?)
उत्तर-पुराण हिंदू धर्म के पुरातन ग्रंथ हैं। पुराण से भाव है प्राचीन। ये संस्कृत भाषा में लिखे गये हैं। समयसमय पर इनमें तबदीलियाँ की जाती रहीं और नये अध्यायों को जोड़ा जाता रहा। इस तरह पुराणों की रचना अनेक लेखकों द्वारा की गई है। पुराणों को “पाँचवां वेद” कहा जाता था और शूद्रों को इनको पढ़ने की आज्ञा दी गई थी। पुराणों की कुल संख्या 18 है। यह पुराण तीन भागों में बाँटे गये हैं। प्रत्येक भाग में 6 पुराण आते हैं और यह शिव, वैष्णव और ब्रह्म पुराण कहलाते हैं।

प्रश्न 2. पुराणों में क्या वर्णन किया गया है ? (What is discussed in the Puranas ?)
उत्तर-पुराणों में लोगों में प्रचलित वैदिक और अवैदिक धार्मिक विश्वास, मिथिहास और कहानियाँ संकलित हैं। प्रत्येक पुराण पाँच भागों में बाँटे गए हैं। ये भाग हैं—

  1. सर्ग-इसमें संसार की उत्पत्ति बारे वर्णन किया गया था।
  2. प्रतिसर्ग-इसमें संसार के विकास, नष्ट होने और फिर से उत्पत्ति के बारे वर्णन किया गया था।
  3. वंश- इसमें प्रसिद्ध राजाओं और ऋषियों के वंशों का वर्णन किया गया था।
  4. मनवंतर-इसमें संसार के महायुद्धों और प्रत्येक युद्ध की महत्त्वपूर्ण घटना का वर्णन किया गया था।
  5. वंशानुचित-इसमें प्रसिद्ध वंशों के राजाओं और ऋषियों के कारनामों का वर्णन किया गया था।

प्रश्न 3. दो प्रसिद्ध पुराणों के बारे में संक्षिप्त परंतु भावपूर्ण जानकारी दें। (Describe in brief but meaningfully the two popular Puranas.)
उत्तर-

  1. ब्रह्म पुराण-इसको आदि पुराण भी कहा जाता है। इस में 14,000 श्लोक हैं। इस के अधिकाँश भाग में भारत के पवित्र तीर्थ स्थानों का वर्णन किया गया है। इस के अतिरिक्त इस में कृष्ण, राम, सूर्य, पूजा, प्रसिद्ध राजवंशों, पृथ्वी, नरक, विभिन्न जातियों, वर्ण आश्रम व्यवस्था और श्राद्धों आदि का वर्णन दिया गया है।
  2. पद्म पुराण-यह सबसे विशाल पुराण है। इसमें लगभग 55,000 श्लोक दिये गये हैं। इस में सृष्टि खंड, स्वर्ग खंड और पाताल खंड का वर्णन दिया गया है। इसमें विष्णु कथा और राम कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इनके अतिरिक्त इस पुराण में अनेक तीर्थ स्थानों और व्रतों का भी वर्णन मिलता है।

प्रश्न 4. पुराण साहित्य के महत्त्व के बारे में जानकारी दीजिए। (Describe the importance of Purana Literature.)
उत्तर-पुराण भारतीय संस्कृति का व्यापक चित्र पेश करते हैं। आज के हिंदू धर्म में जो रीति-रिवाज प्रचलित हैं वह इन पुराणों की ही देन हैं। इन पुराणों में हिंदुओं के धार्मिक विश्वासों, देवी-देवताओं की पूजा विधियों, व्रतों, श्राद्धों, जन्म, विवाह और मृत्यु के समय किये जाने वाले संस्कारों के बारे भरपूर प्रकाश डाला गया है। मूर्ति पूजा तथा अवतारवाद इन पुराणों की ही देन है। इन पुराणों ने भारत में पितर पूजा के रिवाज को अधिक प्रचलित किया। पुराणों में दिये गये प्रसिद्ध राजवंशों का वर्णन ऐतिहासिक पक्ष से काफी लाभदायक सिद्ध हुआ है।

प्रश्न 5. उपनिषदों से क्या अभिप्राय है ? (What do you mean by Upanishads ?)
उत्तर-उपनिषद् वे ग्रंथ हैं जिनमें ज्ञान का वर्णन किया गया है। इनकी कुल गिनती 108 है और इनकी रचना अलग-अलग ऋषियों द्वारा 550 ई० पू० से 100 ई० पू० के मध्य की गई। इन उपनिषदों में से ईश, केन, कठ, छांदोग्य, तैत्तरीय, ऐतरेय, मुंडक और वृहद आरण्यक आदि नाम के उपनिषद् सबसे प्रसिद्ध हैं। इनमें बहुत गहरे आध्यात्मिक विषयों पर प्रकाश डाला गया है। इनमें यह बताने का यत्न किया गया है कि आत्मा क्या है तथा इस का परमात्मा के साथ क्या संबंध है।

प्रश्न 6. उपनिषदों के अनुसार आत्मा और ब्रह्म का स्वरूप क्या है ? . (What is the nature of Self and Absolute according to the Upanishads ?)
उत्तर-

  1. आत्मा का स्वरूप-उपनिषदों में आत्मा शब्द का बहुत अधिक प्रयोग किया गया है क्योंकि इसको संपूर्ण ज्ञान का भंडार समझा जाता है। आत्मा सर्वव्यापक चेतन तत्त्व है। यह तत्त्व ही सारे तत्त्वों का मूल आधार है। यही जीव रूप धारण करके सब के हृदयों में निवास करता है।
  2. ब्रह्म का स्वरूप-‘ब्रह्म’ शब्द संस्कृत भाषा की एक धातु ‘बृह’ से निकला है, जिस का अर्थ है उगना और बढ़ना। इससे यह दार्शनिक भाव निकाला जा सकता है कि ब्रह्म वह तत्त्व है जिस से दृष्टिमान जगत् की उत्पत्ति हुई। ब्रह्म को व्यक्ति और प्रकृति की शक्ति का रूप माना जा सकता है। उसकी शक्तियाँ असीमित (असीम) हैं क्योंकि वह स्वयं असीम है। उसको सर्व रूप और ज्योतियों की ज्योति कहा गया है।

प्रश्न 7. उपनिषदों के अनुसार ‘ब्रह्म’ निराकार है। प्रकाश डालिए। (According to Upanishads ‘Brahma’ is formless. Elucidate.)
अथवा
उपनिषद् के अनुसार ब्रह्म जगत का कारक है। चर्चा कीजिए। (According to Upanishads Brahma is the Creator of Universe. Discuss.)
hods ?
उत्तर-ब्रह्मा को व्यक्ति और प्रकृति की शक्ति का रूप माना जा सकता है। उसकी शक्तियाँ असीमित (असीम) हैं क्योंकि वह स्वयं असीम है। उसको सर्व रूप और ज्योतियों की ज्योति कहा गया है। वह सब गुणों का आधार होते हुए भी निर्गुण माना गया है। वह संपूर्ण ज्ञान का भंडार है। उसके ज्ञान का शब्दों में वर्णन करना असंभव है। निस्संदेह वह सारे संसार का मूल कारण और आधार है।

प्रश्न 8. उपनिषदों के अनुसार मोक्ष से क्या अभिप्राय है ? (What is meant by Moksha according to the Upanishads ?)
उत्तर-उपनिषदों के अनुसार मोक्ष प्राप्ति मनुष्य के जीवन का परम उद्देश्य है। कर्म करने से मनुष्य जन्म-मरण के चक्र में फंस जाता है। शरीर में कैद आत्मा दुःख और सुख की भागी है। जब तक आत्मा शरीर की कैद में है इस को दुःख-सुख से छुटकारा नहीं मिल सकता। अविद्या अथवा अज्ञानता ही मनुष्य के बंधन का प्रमुख कारण है। जब यह अज्ञान नष्ट हो जाता है तो मनुष्य को बंधनों से छुटकारा मिल जाता है और वह मोक्ष प्राप्त करता है।

प्रश्न 9. भगवद्गीता पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on the Bhagvadgita.)
उत्तर-भगवद्गीता हिंदुओं का एक पवित्र धार्मिक ग्रंथ है। यह महाभारत का एक हिस्सा है। इस को गीता के नाम से अधिक जाना जाता है। इस में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। गीता का उपदेश श्री कृष्ण ने अर्जुन को महाभारत की लड़ाई शुरू होने से पहले दिया था। गीता में दिये गये विचार जनसाधारण पर जादुई प्रभाव डालते हैं। यही कारण है कि गीता आज भी हिंदुओं में हरमन प्यारी है। इस में मानव के जीवन की प्रत्येक समस्या का हल सरल और स्पष्ट शब्दों में किया गया है।

प्रश्न 10. कर्मयोग पर एक संक्षिप्त नोट लिखो। (Write a short note on the Karamayoga.)
उत्तर-कर्मयोग गीता का एक प्रसिद्ध सिद्धांत है। कोई भी जीव एक पल के लिए भी बिना कर्म से नहीं रह सकता। जो व्यक्ति इंद्रियों पर काबू पा कर निष्काम कर्म करते हैं, वो कर्मयोगी हैं और जो व्यक्ति इंद्रियों के अधीन हो कर दिखावे के लिए कर्म करते हैं, वे पाखंडी हैं। योग कर्म (यह वो कर्म है जिस में फल की इच्छा नहीं होती) को छोड़कर शेष सभी कर्म बंधन वाले कहे गये हैं। इसलिए गीता में मनुष्य को कर्मयोग करने की प्रेरणा दी गई

प्रश्न 11. ज्ञानयोग से आपका क्या अभिप्राय है ? (What do you meant by Jnanayoga ?)
उत्तर- भगवद्गीता के अनुसार ज्ञान की अग्नि सारे कर्मों के बंधन को भस्म कर देती है। इसी कारण ज्ञान जैसी पवित्र और कोई वस्तु इस जगत् में नहीं है। यह ज्ञान साधारण पदार्थों के ज्ञान तक सीमित नहीं है। इस का वास्तविक संबंध शुद्ध आत्म ज्ञान से है। इसी को ज्ञान योग कहते हैं। ज्ञान मुक्ति का एक उत्तम साधन है क्योंकि ज्ञान की अग्नि में कर्म का बीज जल जाता है और जला हुआ बीज पुनर्जन्म के पौधे को पैदा नहीं कर सकता।

प्रश्न 12. धर्म शास्त्र क्या है ? (What are the Dharma Shastras ?)
उत्तर-धर्म शास्त्र हिंदुओं के प्राचीन ग्रंथ हैं। इन धर्म शास्त्रों में मनु का मानव धर्म शास्त्र अथवा मनु स्मृति सब से अधिक प्रसिद्ध है। इस के अतिरिक्त याज्ञवलक्य, विष्णु और नारद के द्वारा लिखी गई स्मृतियों को भी महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। ये धर्म शास्त्र संस्कृत में लिखे गए हैं। परिणामस्वरूप ये धर्म शास्त्र हमारे लिए उस समय के लोगों की दशा जानने के लिए एक बहुमूल्य स्रोत हैं।

प्रश्न 13. पुराण साहित्य के प्रमुख लक्षण संक्षिप्त परंतु भावपूर्ण बयान कीजिए। (Describe the salient features of Purana Literature in brief but meaningful.)
अथवा
पुराणों से क्या अभिप्राय है ?
(What is meant by Puranas ?)
उत्तर-पुराण हिंदू धर्म के पुरातन ग्रंथ हैं। पुराण से भाव है प्राचीन। ये संस्कृत भाषा में लिखे गये हैं। ये कब लिखे गये इस का कोई पक्का उत्तर अभी तक नहीं मिला है। ये किसी एक शताब्दी की रचना नहीं है। इनका वर्णन अथर्ववेद, उपनिषदों और महाकाव्यों आदि में आता है। समय-समय पर इनमें तबदीलियाँ की जाती रहीं और नये अध्यायों को जोड़ा जाता रहा। गुप्त काल में पुराणों को अंतिम रूप दिया गया। इस तरह पुराणों की रचना अनेक लेखकों द्वारा की गई है। पुराणों को “पाँचवां वेद” कहा जाता था और शूद्रों को इनको पढ़ने की आज्ञा दी गई थी। पुराणों की कुल संख्या 18 है। यह पुराण तीन भागों में बाँटे गये हैं। प्रत्येक भाग में 6 पुराण आते हैं और यह शिव, वैष्णव और ब्रह्म पुराण कहलाते हैं। इनके भाग इस तरह हैं

  1. शिव पुराण—
    • वायु ,
    • लिंग,
    • स्कंद,
    • अग्नि,
    • मत्सय और
    • कूर्म।
  2. वैष्णव पुराण—
    • विष्णु ,
    • भगवद् ,
    • नारद,
    • गरुड़,
    • पद्म और
    • वराह।
  3. ब्रह्म पुराण—
    • ब्रह्म,
    • ब्रह्मांड,
    • ब्रह्मवैव्रत,
    • मारकंडेय,
    • भविष्य और
    • वामन।

प्रश्न 14. पुराणों में क्या वर्णन किया गया है ? (What is discussed in the Puranas ?)
उत्तर-पुराणों में लोगों में प्रचलित वैदिक और अवैदिक धार्मिक विश्वास, मिथिहास और कहानियाँ संकलित हैं। मिथिहास वह कथा कहानियाँ होती हैं जिनका कोई प्रमाण नहीं होता परंतु वे लोगों में बहुत प्रचलित होती हैं। प्रत्येक पुराण पाँच भागों में बाँटा होता था। ये भाग हैं—

  1. सर्ग-इसमें संसार की उत्पत्ति बारे वर्णन किया गया था।
  2. प्रतिसर्ग-इसमें संसार के विकास, नष्ट होने और फिर से उत्पत्ति के बारे वर्णन किया गया था।
  3. वंश-इसमें प्रसिद्ध राजाओं और ऋषियों के वंशों का वर्णन किया गया था।
  4. मनवंतर-इसमें संसार के महायुद्धों और प्रत्येक युद्ध की महत्त्वपूर्ण घटना का वर्णन किया गया था।
  5. वंशानुचित-इसमें प्रसिद्ध वंशों के राजाओं और ऋषियों के कारनामों का वर्णन किया गया था। यह बात यहाँ याद रखने योग्य है कि हमें मूल पुराण उपलब्ध नहीं हैं । ये पुराण हमें आजकल जिस स्वरूप में उपलब्ध हैं । यह आवश्यक नहीं है कि उनका विभाजन इसी प्रकार हो।

प्रश्न 15. किसी पाँच पुराणों का संक्षिप्त वर्णन करो।
(Give a brief account any five Puranas.)
अथवा
चार प्रसिद्ध पुराणों के बारे में संक्षिप्त परंतु भावपूर्ण जानकारी दें। (Describe in brief but meaningfully the four popular Puranas.)
उत्तर-

  1. ब्रह्म पुराण-इसको आदि पुराण भी कहा जाता है। इस में 14,000 श्लोक हैं । इस के अधिकाँश भाग में भारत के पवित्र तीर्थ स्थानों का वर्णन किया गया है। इस के अतिरिक्त इस में कृष्ण, राम, सूर्य, पूजा, प्रसिद्ध राजवंशों, पृथ्वी, नरक, विभिन्न जातियों, वर्ण आश्रम व्यवस्था और श्राद्धों आदि का वर्णन दिया गया है।
  2. पद्म पुराण-यह सबसे विशाल पुराण है। इसमें लगभग 55,000 श्लोक दिये गये हैं। इस में सृष्टि खंड, स्वर्ग खंड और पाताल खंड का वर्णन दिया गया है। इसमें विष्णु कथा और राम कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इनके अतिरिक्त इस पुराण में अनेक तीर्थ स्थानों और व्रतों का भी वर्णन मिलता है।
  3. विष्णु पुराण-इस पुराण में 23,000 श्लोक दिये गये हैं। इसमें यह बताया गया है कि विष्णु ही सर्वोच्च देवता है। उसने ही संसार की रचना की और पालनहार है। इसमें दी गई कथाओं में प्रह्लाद और ध्रुव की कथायें प्रसिद्ध हैं। इस में इस संसार और स्वर्ग के लोगों की अनेकों विचित्र बातों का भी वर्णन है। इस में कई प्रसिद्ध वंशों का भी वर्णन मिलता है।
  4. वायु पुराण-इस पुराण में 11,000 श्लोक हैं। इस में शिव की महिमा के साथ संबंधित अनेक कथाओं का वर्णन किया गया है। इस लिए इस को शिव पुराण भी कहते हैं। इस में अनेक वंशों का वर्णन किया गया है। प्रामाणिक तथ्यों पर आधारित होने के कारण इन की बहुत ऐतिहासिक महत्ता है।
  5. भगवद् पुराण-विष्णु देवता के साथ संबंधित पुराणों में भगवद् पुराण सब से अधिक लोकप्रिय है। इस में कृष्ण के जीवन से संबंधित अनेक कथाओं का वर्णन किया गया है। इसमें महात्मा बुद्ध और साक्ष्य दर्शन के संस्थापक कपिल को विष्णु का अवतार बताया गया है। ऐतिहासिक पक्ष से इस पुराण का कोई विशेष महत्त्व नहीं है।

प्रश्न 16. पुराण साहित्य के महत्त्व के बारे में जानकारी दीजिए। (Describe the importance of Purana Literature.) .
अथवा
पुराण साहित्य की मुख्य विशेषताएँ क्या थी ?
(What are the salient features of Purana Literature ?).
अथवा
हिंदू धर्म में पुराणों का बहुत महत्त्व है ? चर्चा कीजिए।
(Puranas are very important in Hinduism. Discuss.)
अथवा
हिंदू धर्म में पुराणों का आध्यात्मिक महत्त्व संक्षिप्त रूप में दर्शाएं। (Show in brief the spiritual importance of Puranas in Hinduism.)
अथवा
पुराण साहित्य की महानता के बारे में चर्चा कीजिए।
(Discuss the importance of Purana Literature.)
उत्तर-पुराण भारतीय संस्कृति का व्यापक चित्र पेश करते हैं। आज के हिंदू धर्म में जो रीति-रिवाज प्रचलित हैं वह इन पुराणों की ही देन हैं। इन पुराणों में हिंदुओं के धार्मिक विश्वासों, देवी-देवताओं की पूजा विधियों, व्रतों, श्राद्धों, जन्म, विवाह और मृत्यु के समय किये जाने वाले संस्कारों के बारे भरपूर प्रकाश डाला गया है। मूर्ति पूजा तथा अवतारवाद की कल्पना इन पुराणों की ही देन है। इन पुराणों ने भारत में पितर पूजा के रिवाज को अधिक प्रचलित किया। लोगों को दान देने के लिए प्रेरित किया गया। पुराणों में दिये गये प्रसिद्ध राजवंशों का वर्णन ऐतिहासिक पक्ष से काफी लाभदायक सिद्ध हुआ है। इन में तीर्थ स्थानों और मंदिरों के विवरण से हमें उस समय की कला के बारे महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। इन के अतिरिक्त ये पुराण प्राचीन कालीन भारत की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अवस्था के बारे काफी विस्तारपूर्वक प्रकाश डालते हैं। निस्संदेह यदि पुराणों को भारतीय संस्कृति का विश्वकोष कह दिया जाये तो इस में कोई अतिकथनी नहीं होगी।

प्रश्न 17. उपनिषदों से क्या अभिप्राय है ? (What do you mean by Upanishads ?)
अथवा
पाँच उपनिषदों के नाम और उनकी महत्ता के बारे में जानकारी दीजिए। (Describe the name of five Upanishads and their importance.)
अथवा
उपनिषद् साहित्य के बारे में जानकारी दीजिए।
(Give information about Upanishads literature.)
उत्तर-उपनिषद् वे ग्रंथ हैं जिनमें ज्ञान का वर्णन किया गया है। क्योंकि ये वेदों का अंतिम भाग है इसलिए इनको वेदाँत भी कहा जाता है। इनकी कुल गिनती 108 है और इनकी रचना अलग-अलग ऋषियों द्वारा 1000-500 ई० पू० के मध्य की गई। इन उपनिषदों में से ईश, केन, कठ, छांदोग्य, तैत्तरीय, ऐतरेय, मुंडक और वृहद आरण्यक आदि नाम के उपनिषद् सबसे प्रसिद्ध हैं। इनमें बहुत गहरे आध्यात्मिक विषयों पर प्रकाश डाला गया है। इनमें यह बताने का यत्न किया गया है कि आत्मा क्या है तथा इस का परमात्मा के साथ क्या संबंध है। जीवन तथा मृत्यु से संबंधित बहुत से भेदों को सुलझाने का यत्न किया गया है। कर्म, मोक्ष, माया और आवागमन के विषयों पर बहुत अधिक प्रकाश डाला गया है। डॉक्टर एस० आर० गोयल का यह कहना बिल्कुल ठीक है,
“उपनिषद् दर्शन को ठीक ही भारतीय दर्शन का स्रोत कहा जा सकता है।”

प्रश्न 18. उपनिषदों के अनुसार आत्मा और ब्रह्म का स्वरूप क्या है ? (What is the nature of Self and Absolute according to the Upanishads ?)
उत्तर-

  1. आत्मा का स्वरूप-उपनिषदों में आत्मा शब्द का बहुत अधिक प्रयोग किया गया है क्योंकि इसको संपूर्ण ज्ञान का भंडार समझा जाता है। आत्मा सर्वव्यापक चेतन तत्त्व है। यह तत्व ही सारे तत्त्वों का मूल आधार है। यही जीव रूप धारण करके सब के हृदयों में निवास करता है। यही ब्रह्म या परमात्मा है। इसी कारण आत्मा को सभी ज्योतियों की ज्योति माना जाता है। उपनिषदों के अनुसार केवल आत्मा ही एक ऐसी वस्तु है जिस पर कभी संदेह नहीं किया जा सकता। आत्मा एक निश्चित सत्ता है। आत्मा नित भी है। यह परिवर्तनशील नहीं है। यह स्वयं परिवर्तनशील वस्तुओं का आधार है। इसलिए उसका अपना परिवर्तन नहीं हो सकता।
  2. ब्रह्म का स्वरूप-‘ब्रह्म’ शब्द संस्कृत भाषा की एक धातु ‘बृह’ से निकला है, जिस का अर्थ है उगना और बढ़ना। इससे यह दार्शनिक भाव निकाला जा सकता है कि ब्रह्म वह तत्त्व है जिस से दृष्टिमान जगत् की उत्पत्ति हुई। ब्रह्म को व्यक्ति और प्रकृति की शक्ति का रूप माना जा सकता है। उसकी शक्तियाँ असीमित (असीम) हैं क्योंकि वह स्वयं असीम है। उसको सर्व रूप और ज्योतियों की ज्योति कहा गया है। वह सब गुणों का आधार होते हुए भी निर्गुण माना गया है। वह संपूर्ण ज्ञान का भंडार है। उस के ज्ञान का शब्दों में वर्णन करना असंभव है। निसंदेह वह सारे संसार का मूल कारण और आधार है।

प्रश्न 19. उपनिषदों के अनुसार ‘ब्रह्म’ निराकार है। प्रकाश डालिए। (According to Upanishads ‘Brahma’ is formless. Elucidate.)
अथवा
उपनिषद् के अनुसार ब्रह्म जगत का कारक है। चर्चा कीजिए।
(According to Upanishads Brahma is the Creator of Universe. Discuss.)
उत्तर –’ब्रह्म’ शब्द संस्कृत भाषा की एक धातु ‘बृह’ से निकला है जिस का अर्थ उगना और बढ़ना। इससे यह दार्शनिक भाव निकाला जा सकता है कि ब्रह्म वह तत्त्व है जिस से दृष्टिमान जगत् की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा को व्यक्ति और प्रकृति की शक्ति का रूप माना जा सकता है। उसकी शक्तियाँ असीमित (असीम) हैं क्योंकि वह स्वयं असीम है। उसको सर्व रूप और ज्योतियों की ज्योति कहा गया है। वह सब गुणों का आधार होते हुए भी निर्गुण माना गया है। वह संपूर्ण ज्ञान का भंडार है। उसके ज्ञान का शब्दों में वर्णन करना असंभव है। निस्संदेह वह सारे संसार का मूल कारण और आधार है।

प्रश्न 20. पाँच कोषों के सिद्धांत के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the Doctrine of five Layers ?)
उत्तर-आत्मा के स्वरूप को समझने के लिए तैतरीय उपनिषद् में पाँच कोषों का सिद्धांत पेश किया गया है। ये पाँच कोष हैं—

  1. अन्नमयी कोष-यह अचेतन और निर्जीव पदार्थ है। यह भौतिक स्तर पर आता है।
  2. प्राणमयी कोष-यह जीवन स्तर पर आता है। इस में सारी वनस्पति और पशु शामिल है।
  3. मनोमयी कोष-यह चेतना का स्तर है। यह जीवन का उद्देश्य है। जीवन चेतना तक पहुँच कर खुश होता है।
  4. विज्ञानमयी कोष-यह आत्म चेतन का स्तर है। इस में चेतना अपने अंदर तार्किक बुद्धि का विकास करती है।
  5. आनंदमयी कोष-यह आत्मा का वास्तविक स्तर है। इस में अनेकता और भेद की भावना नष्ट हो जाती है। पहले चारों कोष इस आनंद में लीन हो जाते हैं जो उनके विकास की अंतिम मंज़िल है। इस तरह पाँच कोष सिद्धांत यह सिद्ध करता है कि आत्मा शुद्ध चेतन आनंद स्वरूप है।

प्रश्न 21. उपनिषदों के अनुसार मोक्ष से क्या अभिप्राय है ? (What is meant by Moksha according to the Upanishads ?)
उत्तर-उपनिषदों के अनुसार मोक्ष प्राप्ति मनुष्य के जीवन का परम उद्देश्य है। कर्म करने से मनुष्य जन्म-मरण के चक्र में फंस जाता है। शरीर में कैद आत्मा दुःख और सुख की भागी है। जब तक आत्मा शरीर की कैद में है इस को दुःख सुख से छुटकारा नहीं मिल सकता। अविद्या अथवा अज्ञानता ही मनुष्य के बंधन का प्रमुख कारण है। जब यह अज्ञान नष्ट हो जाता है तो मनुष्य को बंधनों से छुटकारा मिल जाता है और वह मोक्ष प्राप्त करता है। मोक्ष मनुष्य के ज्ञान की अंतिम सीढ़ी है जिस पर पहुँच कर मनुष्य सब कुछ जान लेता है और सब कुछ पा लेता है। मोक्ष के आनंद के आगे संसार के सभी आनंद घटिया हैं। उपनिषदों के अनुसार मोक्ष केवल ज्ञान के मार्ग द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।

प्रश्न 22. कर्मयोग पर एक संक्षिप्त नोट लिखो।
(Write a short note on the Karamayoga.)
उत्तर-कर्मयोग गीता का एक प्रसिद्ध सिद्धांत है। कोई भी जीव एक पल के लिए भी बिना कर्म से नहीं रह सकता। जो व्यक्ति इंद्रियों पर काबू पा कर निष्काम कर्म करते हैं, वो कर्मयोगी हैं और जो व्यक्ति इंद्रियों के अधीन हो कर दिखावे के लिए कर्म करते हैं, वे पाखंडी हैं। योग कर्म (यह वो कर्म है जिस में फल की इच्छा नहीं होती) को छोड़कर शेष सभी कर्म बंधन वाले कहे गये हैं। इसलिए गीता में मनुष्य को कर्मयोग करने की प्रेरणा दी गई है। गीता के अनुसार प्रत्येक कर्म का फल ज़रूर निकलता है, जिसको उसे भोगना पड़ता है और यह नहीं हो सकता कि व्यक्ति कोई कर्म करे और उसके फल से बच जाये। यह एक अटल नियम है। कर्मों के फल जीव को जन्म जमांतर के चक्र में डालते हैं। वह प्रत्येक जन्म में कुछ पिछले फलों को भोग कर दूर करता है और कुछ नये कर्मों के द्वारा फलों को संचित करता है, जो उसको अगले जन्म में ले जाते हैं। कर्मों के परिणामस्वरूप मनुष्य को अनेक पदवियों की प्राप्ति होती है। इनमें से सबसे ऊँची पदवी परमपद है जो मनुष्य के जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। केवल कर्मयोग ही मनुष्य को परमपद तक पहुँचा सकते हैं।

प्रश्न 23. भक्तियोग का संक्षिप्त वर्णन करो। (Give a brief account of the Bhaktiyoga.)
उत्तर-भक्तियोग की गणना गीता के तीन प्रमुख मार्गों में की जाती है। भक्ति कई तरह की होती है—

  1. प्राप्ति भक्ति-यह वह भक्ति है जिस में भक्त अपनी शुद्ध भावना के साथ ईश्वर की शरण में आ जाता है और वह सांसारिक पदार्थों से मोह तोड़ लेता है।
  2. स्वार्थ भक्ति- ज्यादातर संसार में भक्ति स्वार्थ की भावना से की जाती है। इस का कारण यह है कि संसार के दुःखों से तंग आकर कुछ लोग भक्ति का सहारा लेते हैं ताकि उन्हें दुःखों से छुटकारा मिल सके।
  3. ज्ञान भक्ति-ऐसे भक्त अपने ज्ञान की जिज्ञासा को पूरा करने के लिए शास्त्रों का अध्ययन करते हैं और अंत ईश्वर की कृपा से सच्चा ज्ञान प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं।
  4. निर्गुण भक्ति- यह वह भक्ति है जिस में भक्त ईश्वर के अस्तित्व को सभी जीवों में व्यापक समझ कर उन जीवों की सेवा करता है।
  5. सगुण भक्ति-इस में भक्त शुद्ध मन से अपने ईष्ट देवता की मूर्ति के सामने भक्ति करता है।
  6. कीर्तन भक्ति-इस भक्ति में भक्त ईश्वर के नाम का लगातार कीर्तन करता रहता है ।
  7. श्रवण भक्ति-यह भक्ति उन व्यक्तियों के लिए है जो कम पढ़े-लिखे होते हैं। इस कारण वे शास्त्रों का अध्ययन नहीं कर सकते। परिणामस्वरूप दूसरों से शास्त्र सुनकर भक्ति के मार्ग पर चल पड़ते हैं। इन सभी भक्ति रूपों को मुक्ति का साधन समझा जाता है।

प्रश्न 24. ज्ञानयोग से आपका क्या अभिप्राय है ? (What do you meant by Jnanayoga ?)
उत्तर- भगवद्गीता के अनुसार ज्ञान की अग्नि सारे कर्मों के बंधन को भस्म कर देती है। इसी कारण ज्ञान जैसी पवित्र और कोई वस्तु इस जगत् में नहीं है। यह ज्ञान साधारण पदार्थों के ज्ञान तक सीमित नहीं है। इस का वास्तविक संबंध शुद्ध आत्म ज्ञान से है। इसी को ज्ञान योग कहते हैं। कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग में से ज्ञानयोग को प्रमुखता प्राप्त है क्योंकि आत्म ज्ञान के बिना व्यक्ति न ही सच्चा कर्मयोगी हो सकता है और न ही सच्चा भक्त हो सकता है। मानव जीवन की प्राप्ति के बाद जो जीव अपने आत्म-स्वरूप का ज्ञान प्राप्त नहीं करता वह कर्मों के चक्र से छुटकारा प्राप्त नहीं कर सकता। ज्ञान मुक्ति का एक उत्तम साधन है क्योंकि ज्ञान की अग्नि में कर्म का बीज जल जाता है और जला हुआ बीज पुनर्जन्म के पौधे को पैदा नहीं कर सकता।

प्रश्न 25. भगवद्गीता पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on the Bhagvadgita.)
उत्तर-भगवद्गीता हिंदुओं का एक पवित्र धार्मिक ग्रंथ है। यह महाभारत का एक हिस्सा है। इस को गीता के नाम से अधिक जाना जाता है। इस में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। गीता का उपदेश श्री कृष्ण ने अर्जुन को महाभारत की लड़ाई शुरू होने से पहले दिया था। उपनिषदों में दी गई विचारधारा आम लोगों की समझ से बाहर थी। गीता में दिये गये विचार जनसाधारण पर जादुई प्रभाव डालते हैं। यही कारण है कि गीता आज भी हिंदुओं में हरमन प्यारी है। इस में मानव के जीवन की प्रत्येक समस्या का हल सरल और स्पष्ट शब्दों में किया गया है। गीता मुक्ति के लिए कोई एक जीवन मार्ग नहीं बताता। इस का कथन है कि अगर मनुष्य के स्वभाव अलग-अलग हैं, तो उसको अलग-अलग मार्गों के द्वारा ही अपने उच्चतम उद्देश्य पर पहुँचना होगा। ये तीन मार्ग हैं-कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग। मनुष्य अपने स्वभाव और रुचि के अनुसार ही अपने जीवन का मार्ग चुनते हैं।

प्रश्न 26. धर्म शास्त्र के प्रमुख लक्षण संक्षिप्त परंतु भावपूर्ण बयान कीजिए। (Describe in brief but meaningful the salient features of Dharma Shastras.)
अथवा
धर्म शास्त्र क्या है?
(What are the Dharma Shastras ?)
अथवा
धर्म शास्त्रों के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe Dharma Shastras.)
अथवा
शास्त्र साहित्य के महत्त्व के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the importance of Shastra Literature.)
अथवा
धर्म शास्त्रों के साहित्यिक महत्त्व के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the literary importance of Dharma Shastras.)
उत्तर-धर्म शास्त्र हिंदुओं के प्राचीन ग्रंथ हैं। इनको स्मृति भी कहा जाता है। इन धर्म शास्त्रों में मनु का मानव धर्म शास्त्र अथवा मनु स्मृति सब से अधिक प्रसिद्ध है। इस के अतिरिक्त याज्ञवलक्य, विष्णु और नारद के द्वारा लिखी गई स्मृतियों को भी महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इन धर्म शास्त्रों के रचना काल के बारे इतिहासकारों में मतभेद हैं। आम सुझाव यह है कि इनकी रचना पहली सदी ई० पू० से पाँचवीं सदी ई० पू० के मध्य हुई। ये धर्म शास्त्र संस्कृत में लिखे गये हैं। इनमें केवल विष्णु स्मृति गद्य रूप में लिखी गई है जबकि बाकी के तीनों धर्म शास्त्र कविता के रूप में लिखे गये हैं। इन धर्म शास्त्रों में प्राचीन कालीन भारत के धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक नियमों के बारे बहुत विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला गया है। परिणामस्वरूप ये धर्म शास्त्र हमारे लिए उस समय के लोगों की दशा जानने के लिए एक बहुमूल्य स्रोत है।

प्रश्न 27. मनु स्मृति पर संक्षिप्त नोट लिखो। (Write a short note on the Manu Smriti.)
अथवा
मनु स्मृति के बारे में जानकारी दें। (Give information about Manu Smriti.)
उत्तर-मनु स्मृति को मानव धर्म शास्त्र के नाम से भी जाना जाता है। इस की रचना मनु ने की थी। मनु को संसार का पहला कानूनदाता माना जाता है। उसने अपनी रचना में धर्म की उत्पत्ति और उसके स्रोतों के बारे बड़ी महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान की है। इस में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्त्तव्य अंकित किये गये हैं। ब्राह्मणों को समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था और शूद्रों को सब से नीच समझा जाता है। इस में मानव जीवन के चार आश्रमों अर्थात् ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वाणप्रस्थ और संन्यास आश्रम के कर्तव्यों और महत्त्व के बारे बहुत लाभदायक जानकारी प्रदान की गई है। इस में मनु ने राजाओं को कौन से नियमों की पालना करनी चाहिए के बारे में जानकारी दी है। उस अनुसार राजा को प्रशासन प्रबंध चलाने के लिए एक मंत्री परिषद् का गठन करना चाहिए। राजा को स्थानिक प्रबंध में कम से कम हस्तक्षेप करना चाहिए। मनु का कहना था कि हमें अपने माता-पिता, अध्यापकों और बुजुर्गों के सत्कार का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए। उनके नाराज़ होने पर भी हमें गुस्से में नहीं आना चाहिए। क्योंकि हम उन के ऋण को चुका नहीं सकते। जो व्यक्ति इन का निरादर करता है उस को 100 पन जुर्माना किया जाये। मनु के अनुसार स्त्रियों को वेदों के अध्ययन और संपत्ति का अधिकार नहीं देना चाहिए।

प्रश्न 28. चार आश्रम से क्या अभिप्राय है ?
(What do you mean by the Four Ashramas ?) .
उत्तर-मनु ने मनुष्य के जीवन को 100 वर्षों का मान कर उसको 25-25 वर्षों के चार आश्रमों में बाँटा। इनके नाम थे-ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और संन्यास आश्रम। ये सारे आश्रम ऊपर लिखित तीन जातियों के लिए निर्धारित किये गये थे। पहला आश्रम ब्रह्मचर्य था। इस में बच्चा 5 वर्ष से लेकर 25 वर्षों तक विद्या प्राप्त करता था। गृहस्थ आश्रम 25 से 50 वर्षों तक होता था। इस में मनुष्य विवाह करके संतान उत्पन्न करता था। वह अपने परिवार के पालन-पोषण का पूरा ख्याल रखता था। परिवार में पुत्र का होना जरूरी समझा जाता था। वाणप्रस्थ आश्रम 50 से 75 वर्षों तक होता था। इस में मनुष्य अपना घर बाहर छोड़ कर जंगलों में चला जाता था और तपस्वी जीवन व्यतीत करने का यत्न करता था। चौथा और अंतिम आश्रम संन्यास का था। यह 75 से 100 वर्षों तक चलता था। इस में मनुष्य एक संन्यासी की भाँति जीवन व्यतीत करता था और मुक्ति प्राप्त करने का यत्न करता था।

प्रश्न 29. मनु स्मृति में स्त्रियों संबंधी क्या विचार दिए गए हैं ? (What views are given about women in Manu Smriti ?)
उत्तर-मनु स्त्रियों को स्वतंत्रता दिये जाने के पक्ष में नहीं था। उसका विचार था कि अविवाहित लड़की का उसके पिता द्वारा, विवाहित लड़की का उसके पति द्वारा और पति की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों द्वारा ख्याल रखा जाना चाहिए। उस का कहना था कि स्त्रियाँ पुरुष को गलत रास्ते पर लगाती हैं। वह स्त्रियों की बातों पर विश्वास किये जाने के पक्ष में नहीं थे। मनु ने बाल विवाह का समर्थन किया। उसका कहना था कि लड़कियों की 8 से 12 वर्ष की आयु तक शादी कर देनी चाहिए। मनु ने विधवा विवाह और नियोग प्रथा का विरोध किया। नियोग प्रथा के अनुसार कोई विधवा पुत्र पैदा करने के लिए अपने किसी देवर से विवाह करवा सकती थी। मनु स्त्रियों को संपत्ति का अधिकार दिये जाने के पक्ष में नहीं था। वह केवल ‘स्त्री धन’ जो दहेज के रूप में अपने साथ लाई थी प्राप्त कर सकती थी। स्त्रियों पर लगाये गये इन प्रतिबंधों के बावजूद मनु ने गृहणी के रूप में स्त्रियों का बड़ा सम्मान किया है। उसका कहना था, “जहाँ स्त्रियों का सत्कार किया जाता है वहाँ परमात्मा निवास करता है जहाँ स्त्रियों का सत्कार नहीं किया जाता वहाँ सारे धार्मिक कार्य बेकार हो जाते हैं।”

प्रश्न 30. याज्ञवल्कय स्मृति से आपका क्या अभिप्राय है ? (What do you know about Yajnavalkya Smriti ?)
उत्तर-याज्ञवल्कय स्मृति चाहे मनु स्मृति के मुकाबले संक्षेप है परंतु वह अनेक पक्षों से महत्त्वपूर्ण समझी जाती है। इस में दिया गया वर्णन नियमबद्ध है और भाषा प्रवाहमयी है। इस का रचनाकाल 100 ई० पू० से 300 ई० के मध्य माना जाता है। याज्ञवल्कय की स्मृति तीन अध्यायों में बाँटी गई है। पहले अध्याय में गर्भ धारण करने से लेकर विवाह तक के संस्कार, पत्नी के कर्त्तव्य, चार वर्णों के अधिकार और कर्त्तव्य, यज्ञ, दान के नियमों ,श्राद्ध के नियमों और उन्हें करवाने से प्राप्त फल, राजा और उसके मंत्रियों के लिए निर्धारित योग्यतायें, न्याय व्यवस्था और अपराधियों के लिए सज़ायें और कर व्यवस्था आदि का वर्णन है। दूसरे अध्याय में धर्म शास्त्र और अर्थ शास्त्र में अंतर, संपत्ति के स्वामित्व संबंधी, दास, जुए, चोरी, बलात्कार, सीमावाद संबंधी आदि के नियमों की विस्तारपूर्वक जानकारी दी गई है। तीसरे अध्याय में मनुष्य के अंतिम संस्कार, शोक काल, शुद्धि के साधन, आत्मा, मोक्ष मार्ग, पापियों, योगियों, आत्म ज्ञान के साधनों, नरक, प्रायश्चित के उद्देश्य, मदिरापान और जीव हत्या आदि विषयों के बारे प्रकाश डाला गया है।

प्रश्न 31. विष्णु स्मृति पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on the Vishnu Smriti.)
उत्तर-इस स्मृति की रचना 100 ई० से 300 ई० के मध्य की गई थी। यह गद्य रूप में लिखी गई थी। इस में कछ श्लोक मनु और याज्ञवल्कय स्मृतियों में से लिये गये हैं। विष्णु स्मृति में आर्यव्रत का क्षेत्र मनु स्मृति के मुकाबले अधिक विस्तारपूर्वक माना है। इस में लगभग सारा भारत शामिल है। इस से सिद्ध होता है कि विष्णु स्मृति की रचना के समय आर्य सारे भारत में बिखर गये थे। राजा प्रशासन की धुरी होता था। अपने राज्य का विस्तार करना और प्रजा की रक्षा करना उसके प्रमुख कार्य समझे जाते थे। राजा प्रशासन प्रबंध को अच्छे ढंग से चलाने के उद्देश्य से एक मंत्रि परिषद का गठन करता था। मंत्रियों की नियुक्ति का मुख्य आधार उनकी योग्यता और राज्य के प्रति वफादारी थी। विष्णु स्मृति जुए के विरुद्ध थी और इसको समाज पर एक घोर कलंक समझती थी। यह समाज में प्रचलित वर्ण व्यवस्था और आश्रम प्रथा में विश्वास रखती थी। इस काल में स्त्रियों की दशा पहले से बदत्तर (बुरी) हो गई। इस का अंदाजा इस बात से लगाया जाता है कि उस समय समाज में सती प्रथा का प्रचलन आरंभ हो गया था। विष्णु स्मृति में लोगों को सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करने पर बहुत ज़ोर दिया गया है।

प्रश्न 32. नारद स्मृति के बारे में आप क्या जानते हो? (What do you know about Narda Smriti ?)
उत्तर- इस स्मृति की रचना 100 ई० से 400 ई० के मध्य की गई थी। इस स्मृति में भी कुछ श्लोक मनु स्मृति से लिये गये हैं परंतु इस की अनेक विशेषतायें अपनी हैं। राज्य में होने वाली घटनाओं से संबंधित सूचना देने के लिए राजा की ओर से गुप्तचर नियुक्त किये जाते थे। कुल, श्रेणी और गण जनहित संस्थायें थीं। ये संस्थायें अपने नियम बनाती थीं। राजा उन के आंतरिक मामलों में बहुत कम हस्तक्षेप करता था। नारद स्मृति में राज्य के न्याय प्रबंध का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। राजा को राज्य का सर्वोच्च न्यायाधीश माना जाता था। उसके निर्णय अंतिम होते थे। यदि किसी चोर को न पकड़ा जा सकता तो चोरी हुए सामान का मूल्य राजा को अपने खज़ाने से देना पड़ता है। चोर को शरण देना या चोरी का सामान खरीदने वाले को भी सज़ा का बराबर हकदार माना जाता था। अलग-अलग अपराधों के लिए अलग-अलग सज़ायें निर्धारित की गई हैं। निर्दोष सिद्ध करने के लिए सात प्रकार की परीक्षाओं का वर्णन किया गया है। नारद जुआखोरी को सरकार के नियंत्रण के नीचे लाने के पक्ष में थे ताकि राज्य को उससे कुछ आय प्राप्त हो सके। वह विधवा को अपने पति की संपत्ति दिये जाने के पक्ष में नहीं था। उसने विधवा विवाह और नियोग प्रथाओं का समर्थन किया। उसने समाज में प्रचलित 15 किस्मों के दासों का वर्णन किया है।

OBJECTIVE TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. पुराण से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-पुराण से अभिप्राय है प्राचीन।

प्रश्न 2. पुराण किस भाषा में लिखे गए हैं ?
उत्तर-संस्कृत।

प्रश्न 3. पाँचवां वेद किसे कहा जाता है ?
उत्तर-पुराणों को।

प्रश्न 4. कुल कितने पुराण हैं ?
अथवा
पुराणों की कुल संख्या बताएँ।
उत्तर-18.

प्रश्न 5. पुराणों को कितने भागों में बाँटा गया है ?
उत्तर-पुराणों को तीन भागों में बाँटा गया है।

प्रश्न 6. पुराणों को कौन-से तीन भागों में बाँटा गया है ?
उत्तर-

  1. शिव पुराण
  2. वैष्णव पुराण
  3. ब्रह्म पुराण।

प्रश्न 7. पुराण कितने माने जाते हैं ? पांच के नाम बताएं।
उत्तर-

  1. पुराण 18 माने जाते हैं।
  2. पांच पुराणों के नाम शिव पुराण, विष्णु पुराण, लिंग पुराण, ब्रह्मण्ड पुराण और पदम पुराण थे।

प्रश्न 8. दो प्रसिद्ध पुराणों के नाम बताएँ।
उत्तर-

  1. शिव पुराण
  2. वैष्णव पुराण।

प्रश्न 9. शिव पुराण में शामिल किसी एक पुराण का नाम लिखो।
उत्तर- लिंग पुराण।

प्रश्न 10. वैष्णव पुराण में शामिल किसी एक पुराण का नाम बताओ।
उत्तर-विष्णु पुराण।।

प्रश्न 11. ब्रह्म पुराण में शामिल एक पुराण का नाम बताओ।
उत्तर- ब्रह्मांड पुराण।

प्रश्न 12. प्रत्येक पुराण को कितने भागों में बाँटा गया है ?
उत्तर- पाँच भागों में।

प्रश्न 13. पुराणों के किस भाग में संसार की उत्पत्ति के बारे में वर्णन किया गया है ?
उत्तर-सर्ग भाग में।

प्रश्न 14. पुराणों के किस भाग को ऐतिहासिक पक्ष से महत्त्वपूर्ण समझा जाता है ?
उत्तर–पाँचवें भाग को।

प्रश्न 15. पुराणों में से कौन-सा पुराण सर्वाधिक प्राचीन है ?
उत्तर-ब्रह्म पुराण।

प्रश्न 16. ब्रह्म पुराण को किस अन्य नाम से जाना जाता है ?
उत्तर-आदि पुराण।।

प्रश्न 17. ब्रह्म पुराण में कितने श्लोक हैं ?
उत्तर-14,000 श्लोक।

प्रश्न 18. अग्नि पुराण और भविष्य पुराण में श्लोकों की गिनती बताओ।
उत्तर-अग्नि पुराण में श्लोकों की संख्या 15,400 तथा भविष्य पुराण में श्लोकों की संख्या 14,000 है।.

प्रश्न 19. कौन-सा पुराण सर्वाधिक विशाल है ?
उत्तर-पदम पुराण।

प्रश्न 20. पदम पुराण में कितने श्लोक दिए गए हैं ?
उत्तर-55,000 श्लोक।

प्रश्न 21. सबसे बड़ा पुराण कौन-सा है और उसमें कितने श्लोक हैं ?
उत्तर- सबसे बड़ा पुराण पदम पुराण तथा उसमें 55,000 श्लोक हैं।

प्रश्न 22. विष्णु पुराण में कितने श्लोक दिए गए हैं ?
उत्तर-23,000 श्लोक।

प्रश्न 23. वायु पुराण को किस अन्य नाम से जाना जाता है ?
उत्तर-शिव पुराण।

प्रश्न 24. भगवद् पुराण का संबंध कौन-से देवता के साथ संबंधित है ?
अथवा
भगवद् पुराण किस देवते से संबंधित है ?
उत्तर- भगवद् पुराण विष्णु देवता के साथ संबंधित है।

प्रश्न 25. नारद पुराण में कितने श्लोक दिए गए हैं ?
उत्तर-25,000 श्लोक।

प्रश्न 26. नारद पुराण किस देवता के साथ संबंधित है ?
उत्तर-विष्णु देवता के साथ।

प्रश्न 27. किस पुराण में सबसे कम श्लोक दिए गए हैं ?
उत्तर-मारकंडेय पुराण।

प्रश्न 28. मारकंडेय पुराण में कुल कितने श्लोक दिए गए हैं ?
उत्तर-900 श्लोक।

प्रश्न 29. मारकंडेय पुराण में वर्णन किए गए किन्हीं दो देवताओं के नाम बताओ।
उत्तर-

  1. इंद्र
  2. अग्नि।

प्रश्न 30. भविष्य पुराण कौन-से देवताओं के साथ संबंधित है ?
उत्तर-

  1. ब्रह्म
  2. विष्णु
  3. शिव
  4. सूर्य।

प्रश्न 31. स्कंद पुराण में कितने श्लोक दिए गए हैं ?
उत्तर-51,000 श्लोक।

प्रश्न 32. स्कंद पुराण किस देवता के साथ संबंधित है ?
उत्तर-शिव देवता के साथ।

प्रश्न 33. मत्स्य पुराण में किनके मध्य वार्तालाप का वर्णन मिलता है ?
उत्तर-मत्स्य (मछली) तथा मनु के मध्य ।

प्रश्न 34. गरुढ़ पुराण किस देवता के साथ संबंधित है ?
उत्तर-विष्णु देवता के साथ।

प्रश्न 35. पुराणों का एक मुख्य विषय बताओ।
उत्तर-संसार की उत्पत्ति।

प्रश्न 36. उपनिषद् से क्या अभिप्राय है ?
अथवा
उपनिषद् की परिभाषा करें।
उत्तर-उपनिषद् से अभिप्राय है श्रद्धा भाव से नज़दीक बैठना।

प्रश्न 37. उपनिषदों को वेदांत क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-क्योंकि इनको वेदों का अंतिम भाग माना जाता है।

प्रश्न 38. उपनिषदों की रचना किस भाषा में की गई है ?
उत्तर-संस्कृत।

प्रश्न 39. उपनिषदों का रचना काल क्या है ?
उत्तर-550 ई० पू० से 100 ई० पू०

प्रश्न 40. उपनिषदों की कुल संख्या क्या है ?
उत्तर-108.

प्रश्न 41. मुख्य उपनिषद कितने हैं ?
उत्तर-मुख्य उपनिषद् 11 हैं।

प्रश्न 42. प्रसिद्ध पाँच उपनिषदों के नाम बताएँ।
अथवा
किन्हीं दो उपनिषदों के नाम लिखो।
उत्तर-

  1. ईश
  2. केन
  3. कठ
  4. प्रश्न
  5. तैतरीय।

प्रश्न 43. दो प्रथम उपनिषदों के नाम बताएँ।
उत्तर-छांदोग्य तथा वृहद आरण्यक।

प्रश्न 44. आरंभ में कितने उपनिषद थे ? इनमें से पाँच के नाम बताओ।
अथवा
आरंभ में उपनिषदों की संख्या कितनी थी ? चार के नाम लिखें।
उत्तर-

  1. आरंभ में उपनिषदों की संख्या 11 थी।
  2. इनमें से पाँच के नाम ईश, केन, कठ, तैतरीय और प्रश्न हैं।

प्रश्न 45. छांदोग्य एवं वृहद आरण्यक नाम के उपनिषदों की रचना कब हुई ?
उत्तर-550 ई० पू० से 450 ई० पू०।

प्रश्न 46. उपनिषदों के कोई दो मुख्य विषय बताएँ।
उत्तर-

  1. आत्मा का स्वरूप
  2. कर्म का सिद्धांत।

प्रश्न 47. उपनिषदों के अनुसार क्या आत्मा परिवर्तनशील है ?
उत्तर-नहीं।

प्रश्न 48. उपनिषदों में वर्णन किये गए दो नैतिक गण बताएँ।
उत्तर-

  1. सदा सच बोलो
  2. सभी जीवों से प्यार करो।

प्रश्न 49. उपनिषदों के अनुसार मनुष्य के जीवन का परम उद्देश्य क्या है ?
उत्तर-मोक्ष प्राप्त करना।

प्रश्न 50. भगवद् गीता किस महाकाव्य का हिस्सा है ?
उत्तर-भगवद् गीता महाभारत का हिस्सा है।

प्रश्न 51. भगवद् गीता की रचना किस भाषा में की गई है ?
उत्तर-संस्कृत भाषा में।

प्रश्न 52. भगवद् गीता में कितने श्लोकों का वर्णन किया गया है ?
उत्तर-700 श्लोकों का।

प्रश्न 53. भगवद् गीता से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-परमात्मा का गीत।

प्रश्न 54. भगवद् गीता में अंकित उपदेश किसने किसे दिया था ?
उत्तर-भगवद् गीता में अंकित उपदेश भगवान कृष्ण ने अर्जुन को दिया था।

प्रश्न 55. भगवद् गीता में कितने योगों का वर्णन है ?
उत्तर- भगवद् गीता में तीन योगों का वर्णन है।

प्रश्न 56. गीता के तीन योग कौन-से हैं ?
उत्तर-गीता के तीन योग हैं-कर्मयोग, भक्तियोग तथा ज्ञानयोग।

प्रश्न 57. गीता का कोई एक उपदेश बताएँ।
उत्तर–प्रत्येक व्यक्ति को कर्मों का फल ज़रूर भोगना पड़ता है।

प्रश्न 58. गीता के अनुसार भक्ति कितनी तरह की होती है ?
उत्तर-गीता के अनुसार भक्ति तीन तरह की होती है।

प्रश्न 59. गीता में दिए भक्तियोग की कोई एक किस्म बताएँ।
उत्तर-ज्ञान भक्ति।

प्रश्न 60. भगवद् गीता का सबसे पहले अंग्रेज़ी में अनुवाद किसने किया ?
उत्तर-एडविन अरनोल्ड ने।

प्रश्न 61. किस विद्वान् ने भगवद गीता पर टीका लिखा ?
उत्तर-रामानुज ने भगवद् गीता पर टीका लिखा।

प्रश्न 62. धर्म शास्त्रों से क्या भाव है ?
अथवा धर्म शास्त्र क्या हैं ?
उत्तर-धर्म शास्त्र हिंदुओं के प्राचीन ग्रंथ हैं।

प्रश्न 63. धर्म शास्त्रों में सबसे महत्त्वपूर्ण व प्रसिद्ध कौन-सा है ?
उत्तर-मनुस्मृति।

प्रश्न 64. धर्म शास्त्र किस भाषा में लिखे गए हैं ?
उत्तर-संस्कृत भाषा में।

प्रश्न 65. कौन-सा धर्म शास्त्र सर्वाधिक प्राचीन है ?
उत्तर-मनु शास्त्र

प्रश्न 66. मानवता का पितामह किसको माना जाता है ?
उत्तर-मानवता का पितामह मनु को माना जाता है।

प्रश्न 67. मनुस्मृति का लेखक कौन था ?
उत्तर-मनु।

प्रश्न 68. मनु स्मृति को किस अन्य नाम से जाना जाता है ?
उत्तर-मानवधर्म शास्त्र।

प्रश्न 69. किस धर्म शास्त्र में चार वर्णों के कर्तव्यों का वर्णन किया जाता है ?
उत्तर-मनु स्मृति में।

प्रश्न 70. मानवता के जीवन को कितने आश्रमों में बाँटा गया है ?
उत्तर-चार आश्रमों में।

प्रश्न 71. शास्त्रों में दर्शाए गए चार आश्रमों के नाम लिखें।
अथवा
मनु स्मृति में कौन-से चार आश्रम बताए गए ?
उत्तर-शास्त्रों में दर्शाए चार आश्रमों के नाम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वाणप्रस्थ और सन्यास हैं।

प्रश्न 72. किसी एक आश्रम का नाम लिखो।
उत्तर-गृहस्थ आश्रम।

प्रश्न 73. क्या मनु स्मृति के अनुसार शूद्रों को वेदों के पढ़े जाने की आज्ञा दी जानी चाहिए ?
उत्तर-नहीं।

प्रश्न 74. मनु स्मृति में धर्म के कितने स्रोत बताए गए हैं ?
उत्तर-चार।

प्रश्न 75. मनु स्मृति के अनुसार धर्म का कोई एक स्रोत बताएँ।
उत्तर-वेद।

प्रश्न 76. कौन-सा धर्म शास्त्र समाज में जुए के विरुद्ध था ?
उत्तर-विष्णु स्मृति।

प्रश्न 77. कौन-सा धर्म शास्त्र विधवा विवाह के पक्ष में था ?
उत्तर-नारद स्मृति।

प्रश्न 78. धर्म शास्त्रों में किन विषयों को छुआ गया है ?
उत्तर-धर्म शास्त्रों में कानूनों तथा समाज में प्रचलित रीति-रिवाजों को छुआ गया है।

नोट-रिक्त स्थानों की पूर्ति करें—

प्रश्न 1. पुराण से भाव ……….. है।
उत्तर-प्राचीन

प्रश्न 2. पुराण ………….. भाषा में लिखे गए थे।
उत्तर-संस्कृत

प्रश्न 3. पुराणों की कुल संख्या ………. है।
उत्तर-18

प्रश्न 4. प्रत्येक पुराण ……….. भागों में विभाजित है।
उत्तर- पाँच

प्रश्न 5. ………… में संसार की उत्पत्ति के बारे में वर्णन किया गया है।
उत्तर-सर्ग

प्रश्न 6. ………… में प्रसिद्ध वंशों के राजाओं और ऋषियों का वर्णन किया गया है।
उत्तर-वंशानचरित

प्रश्न 7. ब्रह्म पुराण को ……….. भी कहा जाता है।
उत्तर-आदि पुराण

प्रश्न 8. सबसे विशाल पुराण का नाम ………. पुराण है।
उत्तर-पद्म

प्रश्न 9. वायु पुराण को ……….. पुराण भी कहते थे।
उत्तर-शिव

प्रश्न 10. गरुड़ पुराण में ………….. श्लोक दिए गए हैं।
उत्तर-18,000

प्रश्न 11. नारद पुराण में ………….. श्लोक दिए गए हैं।
उत्तर-25,000

प्रश्न 12. ……………. पुराण सभी पुराणों में से छोटा है।
उत्तर-मारकंडेय पुराण

प्रश्न 13. उपनिषदों को ……… भी कहा जाता है।
उत्तर-वेदांत

प्रश्न 14. उपनिषदों ने ………. कोषों का सिद्धांत प्रचलित किया।
उत्तर-पाँच

प्रश्न 15. भगवद्गीता …………’का एक भाग है।
उत्तर-महाभारत

प्रश्न 16. भगवद्गीता में ………… श्लोक हैं।
उत्तर-700

प्रश्न 17. गीता का उपदेश ……….. ने दिया।
उत्तर-श्री कृष्ण जी

प्रश्न 18. भगवद्गीता में ……… योगों का वर्णन किया गया है।
उत्तर-तीन

प्रश्न 19. धर्मशास्त्र ……….. भाषा में लिखे गए हैं।
उत्तर-संस्कृत

प्रश्न 20. ……… को मानवता का पितामह कहा जाता है।
उत्तर-मनु

प्रश्न 21. मनुस्मृति को ………… धर्मशास्त्र के नाम से भी जाना जाता है।
उत्तर-मानव

प्रश्न 22. मनुस्मृति के अनुसार स्त्रियों को वेदों के अध्ययन और संपत्ति के अधिकार ……… होना चाहिए।
उत्तर-नहीं

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा ग़लत चुनें—

प्रश्न 1. पुराणों की रचना संस्कृत भाषा में की गई थी।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 2. पुराणों को पाँचवां वेद भी कहा जाता था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 3. पुराणों की कुल संख्या 10 है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 4. ब्रह्म पुराण सबसे विशाल पुराण है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 5. पद्म पुराण में 55,000 श्लोक दिए गए हैं।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 6. वायु पुराण को शिव पुराण भी कहते हैं।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 7. भगवद् पुराण में शिव की महिमा गाई गई है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 8. नारद् पुराण विष्णु भक्ति के साथ संबंधित है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 9. पुराणों में अग्नि पुराण सबसे छोटा पुराण है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 10. भविष्य पुराण में 14,000 श्लोक दिए गए हैं।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 11. संकद पुराण में 51,000 श्लोक दिए गए हैं।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 12. मत्स्य पुराण में एक मछली और मनु के मध्य वार्तालाप का वर्णन किया गया है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 13. उपनिषदों की कुल संख्या 108 है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 14. उपनिषदों की रचना पालि भाषा में की गई है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 15. उपनिषद पाँच कोषों के सिद्धांत में विश्वास रखते थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 16. भगवद्गीता रामायण का ही एक भाग है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 17. भगवद्गीता को 18 अध्यायों में बांटा गया।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 18. गीता का उपदेश श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन को दिया था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 19. भगवद्गीता चार योगों में विश्वास रखता है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 20. हिंदुओं के प्राचीन ग्रंथों को धर्मशास्त्रों के नाम से जाना जाता है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 21. मनुस्मृति की रचना याज्ञवल्कय ने की थी।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 22. मानवता का पितामाह मनु को माना जाता है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 23. नारद स्मृति विधवा विवाह के पक्ष में था।
उत्तर-ठीक

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर चुनें—

प्रश्न 1. पुराणों की कुल संख्या कितनी है ?
(i) 6
(ii) 10
(iii) 15
(iv) 18
उत्तर-(iv)

प्रश्न 2. पुराण किस भाषा में लिखे गए हैं ?
(i) संस्कृत
(ii) हिंदी
(iii) खड़ी बोली
(iv) बृजभाषा।
उत्तर-(i)

प्रश्न 3. पुराणों को कितने भागों में विभाजित किया गया है ?
(i) 3
(ii) 4
(iii) 5
(iv) 6
उत्तर-(i)

प्रश्न 4. निम्नलिखित में से कौन-सा पुराण शिव पुराण नहीं है ?
(i) वायु
(ii) विष्णु
(iii) स्कंद
(iv) लिंग।
उत्तर-(ii)

प्रश्न 5. पुराणों के किस भाग में प्रसिद्ध राजाओं और ऋषियों का वर्णन किया गया है ?
(i) वंश
(ii) वंशानुचरित
(iii) सर्ग
(iv) मनवंत्र।
उत्तर-(i)

प्रश्न 6. निम्नलिखित में से कौन-सा पुराण सबसे प्राचीन है ?
(i) ब्रह्म पुराण
(ii) पद्म पुराण
(iii) विष्णु पुराण
(iv) अग्नि पुराण।
उत्तर-(i)

प्रश्न 7. निम्नलिखित में से कौन-सा पुराण सबसे विशाल है ?
(i) विष्णु पुराण
(ii) स्कंद पुराण
(iii) वामन पुराण
(iv) पद्म पुराण।
उत्तर-(iv)

प्रश्न 8. पद्म पुराण में दिए गए श्लोकों की कुल संख्या कितनी है ?
(i) 15,000
(ii) 23,000
(iii) 51,000
(iv) 55,000.
उत्तर-(iv)

प्रश्न 9. निम्नलिखित में से कौन-सा पुराण सबसे छोटा है ?
(i) वराह पुराण
(ii) वामन पुराण
(iii) पद्म पुराण
(iv) मार्कंडेय पुराण।
उत्तर-(iv)

प्रश्न 10. निम्नलिखित में से किस पुराण में अंतिम संस्कार संबंधी जानकारी दी गई है, ?
(i) नारद पुराण
(ii) वायु पुराण
(iii) गरुड़ पुराण
(iv) भविष्य पुराण।
उत्तर-(iii)

प्रश्न 11. उपनिषदों की कुल संख्या कितनी है ?
(i) 6
(ii) 11
(iii) 18
(iv) 108.
उत्तर-(iv)

प्रश्न 12. निम्नलिखित में से कौन-सा उपनिषद् नहीं है ?
(i) ईश
(ii) केन
(iii) छंद
(iv) स्कंद।
उत्तर-(iv)

प्रश्न 13. भगवद्गीता का उपदेश किसने दिया था ?
(i) श्री कृष्ण जी
(ii) अर्जुन
(iii) श्री रामचंद्र जी
(iv) शिव जी।
उत्तर-(i)

प्रश्न 14. भगवद्गीता निम्नलिखित में से किस ग्रंथ का भाग है ?
(i) रामायण
(ii) महाभारत
(iii) बौद्धचरित
(iv) कथावथु।
उत्तर-(ii)

प्रश्न 15. भगवद्गीता में कितने श्लोक दिए गए हैं ?
(i) 500
(ii) 700
(iii) 800
(iv) 900.
उत्तर-(i)

प्रश्न 16. हिंदुओं के प्राचीन कानूनी ग्रंथों को क्या कहा जाता है ?
(i) वेद
(ii) महाभारत
(iii) रामायण
(iv) धर्मशास्त्र।
उत्तर-(iv)

प्रश्न 17. निम्नलिखित में से किस शास्त्र को मानव धर्म शास्त्र के नाम से जाना जाता है ?
(i) याज्ञवल्कय स्मृति
(ii) मनु स्मृति
(iii) विष्णु स्मृति
(iv) नारद स्मृति।
उत्तर-(ii)

प्रश्न 18. मानवता का पितामह किसे माना जाता है ?
(i) नारद
(ii) विष्णु
(iii) मनु
(iv) याज्ञवल्कय।
उत्तर-(iii)

प्रश्न 19. निम्नलिखित में से कौन-सा पुराण स्त्रियों की स्वतंत्रता के विरुद्ध था ?
(i) मनु स्मृति
(ii) नारद स्मृति
(ii) विष्णु स्मृति
(iv) याज्ञवल्कय स्मृति।
उत्तर-(i)