Class 12 Sociology Solutions

Unit-I भारत में जनजातीय, ग्रामीण तथा नगरीय समाज

Unit-II भारतीय समाज में असमानताएं

Unit-III भारत में संरचनात्मक तथा सांस्कृतिक परिवर्तन

Unit-IV भारतीय समाज में सामाजिक समस्याएं

Class 12 Sociology Solutions स्रोत आधारित प्रश्न

स्त्रोत आधारित प्रश्न (Source Based Questions) :

प्रश्न 1. निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें
जनजातियाँ भारत के विभिन्न हिस्सों में पूरे देश में विविध समानुपातों में निवास करती हैं। जनजातीय जनसंख्या का उच्चतम अनुपात केन्द्रीय भारत में है। भारत के उत्तरी-पूर्वी हिस्से में भी इनकी संख्या अधिक है। उनमें से कुछ जनजातियां यथा-गोंड, भील, संथाल, ओरायोन्स आदि हैं जो केन्द्रीय भारत में निवास करती हैं। भारत के जनजातीय समुदाय जो जंगलों, पहाड़ियों तथा प्राकृतिक रूप से पृथक क्षेत्रों में रहते हैं उन्हें विभिन्न नामों से जाना जाता है यथा वन्य जाति, वनवासी, पहाड़ी, आदिमजाति, आदिवासी, जनजाति, अनुसूचित जनजाति इत्यादि। इन सब में आदिवासी ज्यादा प्रमुख हैं तथा अनुसूचित जनजाति इन सबका संवैधानिक नाम है।

(i) भारत के किन क्षेत्रों में जनजातियां सबसे अधिक हैं ?
(ii) जनजातियों को किन नामों से पुकारा जाता है ?
(iii) जनजाति किसे कहते हैं ?
उत्तर-(i) वैसे तो मध्य भारत में जनजातीय जनसंख्या काफी अधिक है परन्तु अगर हम जनसंख्या में उनके प्रतिशत की बात करें तो उत्तर-पूर्वी भारत में इनकी जनसंख्या सबसे अधिक है।
(ii) जनजातियों को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है जैसे कि आदिवासी, वनजाति, आदिमजाति, पहाड़ी, वनवासी, जनजाति, अनुसूचित जनजाति इत्यादि।
(iii) एक जनजाति ऐसे लोगों का समूह होता है जो हमारी सभ्यता से दूर किसी जंगल, पहाड़ या घाटी में रहता है, जिसके सदस्य आपस में रक्त संबंधी होते हैं, जो अन्तर्वैवाहिक होता है तथा जिसकी भाषा, धर्म तथा अन्य विशेषताएं अन्य जनजातीय समूहों से अलग होते हैं।

प्रश्न 2. निम्न दिए स्त्रोत को पढ़ें व साथ में दिए प्रश्नों के उत्तर दें
पर्यावरण के असंतुलन के प्रमुख कारणों में से एक जंगलों का काटा जाना है। वृक्षों का काटा जाना इसमें शामिल है। इसके अतिरिक्त कृषि क्षेत्रों का विस्तार व चरागाह भी वन कटाव के प्रमुख कारण हैं। प्रारंभिक दौर में जंगलों तथा प्राकृतिक संसाधनों की सुविधा के कारण जनजातियां अपना जीवन निर्वाह कर रही थीं। अपनी आज आजीविका हेतु वे पूर्णरूपेण जंगलों पर निर्भर थीं। परंतु औद्योगीकरण, नगरीकरण, कृषि, जनसंख्या वृद्धि, व्यापारिक लाभ, ईंधन लकड़ी के संग्रह के कारण जंगलों का कटाव भारी मात्रा में हुआ जिसने प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से जनजातीय आजीविका को प्रभावित किया है। वनों के काटे जाने से मौसम पर भी प्रभाव पड़ा है जो जैव विभिन्नता के क्षरण के रूप में सामने आया है।
(i) वन कटाव का क्या अर्थ है ?
(ii) वन कटाव के क्या कारण हैं ?
(iii) वन कटाव का जनजातियों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-(i) जब अलग-अलग कारणों के कारण वनों में प्राकृतिक रूप से उत्पन्न हुए पेड़ों को काटा जाता है तो इसे वन कटाव कहा जाता है।
(ii) (a) कृषि क्षेत्र तथा चारागाह का क्षेत्र बढ़ाने के लिए वन काटे जाते हैं।
(b) बढ़ती जनसंख्या के लिए घर बनाने तथा बाँध बनाने के लिए जंगलों का सफाया कर दिया जाता है।
(c) ईंधन की लकड़ी तथा फर्नीचर बनाने के लिए लकड़ी की आवश्यकता होती है जिस कारण वन काट दिए जाते हैं।

(iii) (a) इससे जनजातियों के लिए रहने के स्थान की कमी हो जाती है।
(b) वनों से आदिवासी काफी कुछ प्राप्त करते थे जो अब वह नहीं कर सकते हैं।
(c) वनों पर जनजातीय अर्थव्यवस्था निर्भर होती थी परन्तु इनके कटने से वह अर्थव्यवस्था खत्म हो गई।

प्रश्न 3. निम्न दिए स्त्रोत को पढ़ें व साथ में दिए प्रश्नों के उत्तर दें’ग्राम’ शब्द ‘नगर’ का विपरीत शब्द है। ‘ग्रामीण समाज’ पद का अंतर परिवर्तनीय रूप से ‘ग्राम’ शब्द रूप में ही प्रयोग किया जाता है। 2011 की मतगणना के अनुसार 121 करोड़ भारतीयों में 68 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। ग्रामीण समुदाय का अपना लंबा इतिहास है। यह कृषि तथा सहायक व्यवसायों पर निर्भर करने वाला लगभग 5000 लोगों का समूह है जो स्थायी रूप से विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में रहता है तथा सांझे सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक कार्यों में भाग लेते हैं।
(i) ग्राम शब्द का अर्थ बताएं।
(ii) ग्राम की तीन विशेषताएं बताएं।
(iii) ग्राम तथा नगर में तीन अंतर बताएं।
उत्तर-(i) ग्राम एक ऐसे क्षेत्र को कहते हैं जो प्राकृतिक वातावरण के नज़दीक होता है, जिसकी अधिकतर जनसंख्या कृषि आधारित कार्यों में लिप्त होती है तथा जो अपनी कुछ विशेषताओं के कारण नगरीय क्षेत्र से अलग होता है।

(ii) (a) ग्राम के लोगों के बीच प्रत्यक्ष व प्राथमिक संबंध होते हैं।
(b) ग्राम की अधिकतर जनसंख्या कृषि अथवा संबंधित कार्यों में लगी होती है।
(c) ग्राम का आकार छोटा होता है तथा यहां सामाजिक एकरूपता होती है।

(iii) (a) ग्राम का आकार छोटा जबकि नगर का आकार काफी बड़ा होता है।
(b) ग्राम के लोगों के बीच प्रत्यक्ष व प्राथमिक संबंध होते हैं जबकि नगर के लोगों के बीच अप्रत्यक्ष व द्वितीय संबंध होते हैं।
(c) ग्राम की अधिकतर जनसंख्या कृषि अथवा आधारित कार्यों में लगी होती है जबकि नगरों में 75% से अधिक जनसंख्या उद्योगों अथवा गैर-कृषि कार्यों में लगी होती है।

प्रश्न 4. निम्न दिए स्त्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें
ग्रामीण समाज की प्रमुख समस्याओं में से एक ऋणग्रस्तता है। ऐसी चिरकालीन ऋणग्रस्तता का कारण निर्धनता एवं घाटे की अर्थव्यवस्था है। यह समस्या केवल एक व्यक्ति से सम्बद्ध नहीं है बल्कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानांतरित होती है। कृषि उत्पादन के लिए ऋण लेना वास्तव में आवश्यक है क्योंकि कृषि का उत्पादन देश के उत्पादनों में से महत्त्वपूर्ण होता है। फिर भी ग्रामीण लोग गैर उत्पादन उद्देश्यों यथापरिवार की ज़रूरतों को पूरा करने हेतु, सामाजिक समारोहों (विवाह, जन्म तथा मृत्यु से संबंधित) को पूरा करने, मुकद्दमेबाज़ी इत्यादि के लिए भी ऋण (कर्ज) ले लेते हैं इस प्रकार, ऋण पर ली गई धनराशि उत्पादन के बजाय उपभोक्ता पर व्यय हो जाती है। यह स्थिति ग्रामीण लोगों को ऋणग्रस्तता की ओर धकेल देती है। इस प्रकार, इन ऋणों की अदायगी असंभव बन जाती है। वे लोभी साहूकारों तथा दलालों के शोषण के आसान शिकार बन जाते हैं जो स्थिति का लाभ उठाकर बहुत उच्चतर दर से ब्याज वसूलते हैं। परिणामः साहूकार उनकी जो भी पूँजी यथा-घर अथवा भूमि इत्यादि छीन लेते हैं। यह व्यवस्था देश के अधिकांश भागों में प्रचलित है।
(i) ऋणग्रस्तता का क्या अर्थ है ?
(ii) ऋणग्रस्तता के क्या कारण हैं ?
(iii) ऋणग्रस्तता के तीन प्रभाव बताएं।
उत्तर-(i) जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति, साहूकार अथवा बैंक से ऋण ले तथा उसे समय पर वापिस न कर पाए तो इसे ऋणग्रस्तता कहते हैं।

(ii) लोग कई कारणों की वजह से ऋण लेते हैं जैसे कि परिवार की आवश्यकताएं पूर्ण करने के लिए, कानूनी झगड़ों का निपटारा करने के लिए, कृषि करने के लिए, विवाह तथा मृत्यु का खर्चा करने के लिए इत्यादि।

(iii) (a) ऋण के कारण व्यक्ति साहूकारों के शोषण का शिकार बन जाता है। .. (b) व्यक्ति की सम्पूर्ण भूमि पर साहूकार कब्जा कर लेता है तथा वह बेघर हो जाता है।
(c) उसके रहने व जीवन जीने के साधन उससे छीन लिए जाते हैं तथा कई बार ग्रामीण लोग आत्महत्या भी कर लेते हैं।

प्रश्न 5. निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें
नगरवाद नगरीय समाज का वह महत्त्वपूर्ण तत्व है जो उनकी पहचान अथवा व्यक्तित्व को ग्रामीण एवम् जनजाति समाज से अलग करती है। यह एक जीवन शैली का प्रतिनिधित्व करती है। यह नगरीय संस्कृति के प्रसार तथा नगरीय समाज के विकास को प्रकट करती है। यह जटिल श्रम विभाजन, उच्च तकनीकी स्तर, तीव्र गतिशीलता तथा आर्थिक कार्यों की पूर्ति के लिए सदस्यों की अन्तर्निर्भरता तथा सामाजिक सम्बन्धों में बेरूखी के रूप में समाज के संगठन को दर्शाता है। लूइस वर्थ ने नगरवाद की चार विशेषताओं का उल्लेख किया है। अस्थायीपन (अल्पकालता), प्रदर्शन (दिखावापन), गुमनामी, वैयक्तिकता।
(i) नगरीकरण का क्या अर्थ है ?
(ii) नगरीकरण के तीन मापदण्ड बताएं।
(iii) लुइस वर्थ ने नगरवाद की कौन-सी चार विशेषताओं का उल्लेख किया है ?
उत्तर-(i) जब लोग गाँव को छोड़ कर नगरों की तरफ रहने के लिए अथवा कार्य की तलाश में चले जाएं तो इसे नगरीकरण का नाम दिया जाता है।

(ii) नगरीकरण के निम्नलिखित मापदण्ड हैं-
(a) जनसंख्या का 5000 से अधिक होना।
(b) प्रति वर्ग किलोमीटर 400 तक का जनसंख्या घनत्व।
(c) 75% जनसंख्या का गैर कृषि कार्यों में लगे होना।

(iii) (a) अस्थायीपन (अल्पकालता)
(b) प्रदर्शन (दिखावापन)
(c) गुमनामी
(d) वैयक्तिकता।

प्रश्न 6. निम्न दिए स्त्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें
नगरों में जनसंख्या की वृद्धि इतनी तीव्र है कि सभी को आवास सुविधा प्रदान करना असम्भव सा हो गया है। अतः नगर में स्थापित होने के लिए आवास समस्या अथवा आवासहीनता नगरीय समाज की एक अत्यन्त गंभीर समस्या बन चुकी है। नगरों में स्थान की समस्या इतनी अधिक है कि नगरों में अधिकाँश लोग सड़कों, बस स्टैण्ड, रेलवे स्टेशन व टूटे-फूटे सुविधाविहीन घरों में रहने के लिए विवश हैं। यह कहा जा सकता है कि भारत की आधी नगरीय जनसंख्या या तो अस्वच्छ घरों में रहती है अथवा अपनी आय का 20% से अधिक घर के किराए के रूप में देती है। मुम्बई, कलकत्ता, दिल्ली व चेन्नई जैसे महानगरों में आवास की समस्या और भी विकट है।
(i) नगरों की जनसंख्या क्यों बढ़ रही है ?
(ii) नगरों की बढ़ती जनसंख्या के क्या नुकसान हैं ?
(iii) क्या नगरों की जनसंख्या का बढ़ना एक गंभीर समस्या है ?
उत्तर-(i) ग्रामीण लोगों में यह धारणा होती है कि नगरों में अधिक सुविधाएं होती हैं तथा वहां पर पेशों की भरमार होती है व इस कारण लोग नगरों की तरफ भाग रहे हैं। इस कारण नगरों की जनसंख्या में लगातार बढ़ौत्तरी हो रही है।

(ii) (a) नगरों में रहने के स्थान की काफी कमी हो रही है। (b) बहुत से लोग खुले आकाश के नीचे या झुग्गियों में रहने को बाध्य होते हैं। (c) लोगों की आय का 20% से अधिक भाग घर के किराए के रूप में निकल जाता है।

(iii) यह सत्य है कि नगरों की जनसंख्या का बढ़ना एक बहुत ही गंभीर समस्या बन रही है। लोग अधिक सुविधाओं तथा पेशों की तलाश में नगरों में आते हैं परन्तु जब उन्हें यह सब नहीं मिल पाता तो वह हताश हो जाते हैं तथा मानसिक तौर पर परेशान हो जाते हैं। इस कारण नगरों में अपराध भी बढ़ रहे हैं जो स्वयं में एक बड़ी समस्या बन रही है।

प्रश्न 7. निम्न दिए स्त्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें
कार्ल मार्क्स जिन्होंने मजदूरों के हित में समर्थन दिया है। उन्होंने श्रमिकों की वर्ग सम्बन्धी चेतना को महत्त्व दिया है। मार्क्स के अनुसार, वर्ग चेतना का उदय मजदूरों में उनके वर्ग पहचान, वर्ग एकता तथा वर्ग संघर्ष को प्रस्तुत करता है। अतः उन्होंने श्रमिकों को अन्तर्राष्ट्रीय तौर पर यह कह कर इकट्ठे होने के लिए कहा कि “विश्व के मज़दूरो एकत्रित हो जाओ तुम्हारे पास गुलामी की जंजीरों के अलावा खोने के लिए कुछ नहीं है परन्तु एकता द्वारा तुम विश्व को जीत सकते हो।” वर्ग जागरूकता को किसी माध्यम के द्वारा समूह गतिविधि में तबदील किया जा सकता है और राजनैतिक दल इसी प्रकार का एक अंग है। अतः लेनिन ने इसमें यह विस्तार जोड़ा है कि एक दल का विचार मार्क्सवाद में मजदूरों को वर्ग संघर्ष के लिए तैयार करना है। ‘वर्ग’ के संबंध में विभिन्न समाजशास्त्रियों की विभिन्न विचारधाराएं हैं।
(i) कार्ल मार्क्स कौन थे ?
(ii) वर्ग चेतना का क्या अर्थ है ?
(iii) कार्ल मार्क्स के वर्ग संघर्ष के सिद्धांत को संक्षेप में बताएं।
उत्तर-(i) कार्ल मार्क्स एक जर्मन दार्शनिक थे जिन्होंने समाजशास्त्र की प्रगति में काफी योगदान दिया। उनके दिए संकल्पों के कारण ही 1917 में रूसी क्रान्ति हुई तथा मजदूर वर्ग की सरकार स्थापित हुई।

(ii) जब एक वर्ग अपने अस्तित्व, विशेषताओं के प्रति चेतन हो जाए तथा स्वयं को अन्य वर्गों से अलग समझने लग जाए तो इसे वर्ग चेतना कहा जाता है। मार्क्स के अनुसार, वर्ग चेतना वर्ग एकता व वर्ग की पहचान करवाती है।

(iii) मार्क्स के अनुसार, समाज में दो प्रकार के वर्ग होते हैं-पूँजीपति व मज़दूर। इन दोनों के बीच संघर्ष चलता रहता है। पूँजीपति अपने पैसे के कारण मजदूरों का शोषण करता रहता है। वह कम पैसे देकर मजदूरों से अधिक कार्य करवाना चाहता है तथा मज़दूर कम कार्य करके अधिक पैसा लेना चाहता है। इस कारण दोनों वर्गों में संघर्ष चलता रहता है जिसे वर्ग संघर्ष कहा जाता है।

प्रश्न 8. निम्न दिए स्त्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें
ग्रामीण भारत में बड़े ज़मींदार, भूमिहीन ज़मींदार, ऊँचे व मध्यम स्तर के किसान व पूंजीपति किसान मूलतः उच्च व मध्यम वर्ग से सम्बंधित होते हैं जबकि नीचे स्तर के किसान मध्यम किसान व भूमि विहीन किसान निम्न जाति से सम्बन्धित होते हैं। ग्रामीण भारत में धन उधार देने वाले वर्ग, विशेषतः वे जातियाँ हैं जो वैश्य वर्ग से सम्बंधित होती हैं। इस प्रकार, सामान्य रूप से उच्च, मध्यम व निम्न जाति भारत में उच्च, मध्यम व निम्न वर्ग हैं। इस तरह, यह भी सत्य है कि संरक्षात्मक भेदभाव (आरक्षण) के कारण, नए अवसर मिलने के कारण शिक्षाएं व उद्योग के क्षेत्र में गतिशीलता आई है। निम्न जाति के कुछ खण्डों ने मध्यम तथा उच्च जातियों के क्षेत्रों में आना शरू कर दिया है। यद्यपि वर्ग स्थिति को अर्जित होने के कारण बदला जा सकता है लेकिन जाति की स्थिति को प्रदत्त प्रकृति के कारण बदला नहीं जा सकता।
(i) ग्रामीण भारत में कौन से वर्ग होते हैं ?
(ii) किन कारणों ने अलग-अलग समूहों को आगे बढ़ने के मौके दिए ?
(iii) क्या वर्ग में स्थिति को परिवर्तित किया जा सकता है ?
उत्तर-(i) ग्रामीण भारत में बड़े ज़मींदार, उच्च तथा मध्यम वर्ग के किसान, बड़े पूँजीपति किसान, भूमिहीन मज़दूर रहते हैं तथा उन्हें भूमि के अनुसार उच्च श्रेणी, मध्यम श्रेणी तथा निम्न श्रेणी में रखा जा सकता है।
(ii) वैसे तो आजकल समाज में. बहुत सी सुविधाएं मौजूद हैं तथा व्यक्ति स्वयं परिश्रम करके आगे बढ़ सकता है परन्तु कई समूहों को आरक्षण तथा सुरक्षा के नए मौकें प्रदान किए हैं जिसके कारण वह काफी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।
(iii) जी हाँ, वर्ग में स्थिति को परिवर्तित किया जा सकता है। अगर व्यक्ति में योग्यता हो तो वह परिश्रम करके बहुत सा पैसा कमा सकता है अथवा कोई उच्च पद प्राप्त कर सकता है। इससे उसका वर्ग व स्थिति दोनों ही बढ़ जाते हैं।

प्रश्न 9. निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर देंलिंग वर्ग से संबंधित सम्बन्ध पुरुष व स्त्री के उन सम्बन्धों की व्याख्या करता है जिनका आधार वैज्ञानिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक व आर्थिक होता है। लिंग वर्ग में सम्बन्धों में हम लिंग वर्ग अधीनता का परीक्षण करते हैं। स्त्री सशक्तिकरण व स्त्रियों के शोषण की प्रकृति के मुद्दे से संबंधित विभिन्न समाजों में भिन्न-भिन्न रूप पाए जाते हैं। लिंग वर्ग सम्बन्धों में, यह महत्त्वपूर्ण है कि विवाह की संस्था परिवार, शादी से पूर्व, शादी एवम् शादी के बाद के सम्बन्धों, समलैंगिकता का मुद्दे, तीसरे लिंग के मुद्दों व मानवीय सम्बन्धों की प्रकृति आदि की बात करना अति महत्त्वपूर्ण है। प्रायः यह भी स्वीकार किया जाता है कि पुरुष व स्त्री, प्राकृतिक तौर पर शारीरिक भिन्नताओं के कारण भिन्न स्वभाव रखते हैं। परन्तु ये जैविक अथवा शारीरिक भिन्नताएं समाज तथा संस्कृति की संरचना के द्वारा सामाजिक भिन्नताओं में बदल जाती हैं। मानवशास्त्रीय तथा ऐतिहासिक प्रमाणों ने यह सिद्ध कर दिया है कि सांस्कृतिक पुनर्स्थापना ने इन भिन्नताओं को सामाजिक प्रतिक्रिया की महत्त्वपूर्ण भूमिका के परिप्रेक्ष्य में स्थापित तथा पुनर्स्थापित किया है।
(i) लिंग वर्ग संबंध का क्या अर्थ है ?
(ii) लिंग स्थिति तथा लिंग वर्ग में अंतर बताएं।
(iii) लिंग अंतर कैसे सामाजिक अंतरों में बदल जाते हैं ?
उत्तर-(i) लिंग वर्ग संबंध पुरुष व स्त्री के उन संबंधों के बारे में बताता है जिनका आधार सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, आर्थिक व राजनीतिक होता है।
(ii) लिंग स्थिति को जैविक अर्थों में समझा जाता है कि कौन पुरुष है तथा कौन स्त्री है जबकि लिंग वर्ग की भिन्नता का अर्थ उनके व्यवहार से है जो सामाजिक क्रियाओं से बनती है तथा जिसके अनुसार पुरुष व स्त्री अपनी योग्यता के अनुसार अपनी सामाजिक भूमिका को निभाते हैं।
(iii) वैसे तो यह माना जाता है कि पुरुष तथा स्त्री प्राकृतिक तथा शारीरिक अंतरों के कारण अपना स्वभाव अलग रखते हैं परन्तु जैविक व शारीरिक अंतर समाज व संस्कृति की सहायता से सामाजिक अंतरों में बदल जाते हैं। शारीरिक अंतर सांस्कृतिक अंतरों को परस्पर सामाजिक क्रियाओं के रूप में स्थापित करते हैं।

प्रश्न 10. निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें___ 19वीं शती के दरम्यान, अंग्रेजों ने धीरे-धीरे आधुनिक राज्य की नींव रखी। उस समय भूमि का सर्वेक्षण किया गया व लगान निश्चित किया गया। यह युग नई नौकरशाही के उदय का सूचक कहा जा सकता है। उस समय सेना, पुलिस एवम् कानून न्यायालय स्थापित किए गए, जिसने सभी जातियों के लिए नौकरियों के नए राह खोल दिए जहाँ योग्यता के आधार पर भर्ती को आधार बनाया गया। तत्पश्चात्, स्कूल व कालेजों की स्थापना हुई जिसने सभी जातियों के लिए शिक्षा के रास्ते खोल दिए। रेलवे, डाक तथा तार सेवा की, सड़कें व नहरें भी स्थापित की। प्रिंटिग प्रैस, जिसने भारतीय समाज पर गहन प्रभाव डाला यह भी ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा विकसित किए गए। इससे स्पष्ट होता है कि इन परिवर्तनों ने भारत के आधुनिक तथा परम्परागत ज्ञान में परिवर्तनशीलता की नीवं रखी है। ज्ञान अब कुछ विशेष अधिकार सम्पन्न लोगों तक सीमित नहीं था। संचार के सर्वोत्तम साधन, समाचार-पत्रों ने लोगों को अहसास करवाया कि देश के विशाल भू-भाग से उनका दृढ़ सम्बन्ध है इस प्रकार, विश्व के किसी भी भाग में होने वाली घटनाओं ने लोगों पर अच्छा या बुरा प्रभाव डालना आरम्भ कर दिया।
(i) पश्चिमीकरण का संकल्प किसने दिया था ?
(ii) पश्चिमीकरण का क्या अर्थ है ?
(iii) पश्चिमीकरण के क्या कारण थे ?
उत्तर-(i) पश्चिमीकरण का संकल्प प्रसिद्ध भारतीय समाजशास्त्री एम० एन० श्रीनिवास ने दिया था।
(ii) श्रीनिवास के अनुसार, “पश्चिमीकरण उस परिवर्तन का नाम है जिसने अंग्रेजों के भारत पर किये 150 वर्ष के राज्य के समय भारतीयों के सामाजिक जीवन के अलग-अलग स्तरों पर धीरे-धीरे प्रभाव डाला गया जैसे कि विचारधारा, करें कीमतें इत्यादि।”
(iii) अंग्रेजों ने भारतीय समाज में काफ़ी परिवर्तन किए। उन्होंने सेना, पुलिस तथा न्यायालय स्थापित किए जिससे सभी जातियों के लोग वहां पर कार्य करने लग गए। उन्होंने रेल सेवा, डाक तथा तार सेवा, सड़कों, नदियों का निर्माण किया। प्रिंटिंग प्रैस भारत में आई, कारखाने स्थापित किए। लोगों ने अंग्रेजों के जीवन स्तर की नकल करनी शुरू की जिससे पश्चिमीकरण की प्रक्रिया तेज़ी से बढ़ी।

प्रश्न 11. निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें
संदर्भ समूह का अभिप्राय है एक ऐसा समूह जिससे हम अपने समूह की तुलना करते हैं। एक अनुकरणीय समूह होता है, जिसके अनुसार, कोई व्यक्ति अथवा समूह अपनी विचारधारा, व्यवहार, दृष्टिकोण व विश्वास बदलता है। उदाहरणतः राम अपनी कक्षा में निम्न औसत छात्र है। वह अपनी कक्षा के होशियार विद्यार्थियों से प्रभावित हो कर अपने आप में सुधार करना चाहता है। वह उनके व्यवहारों व लक्षणों का अवलोकन करता है तथा उन्हें अपना संदर्भ समूह समझता है। वह समय का पाबंद, अनुशासन को अपनाकर शिक्षा में बेहतर प्रदर्शन करता है। अपने दैनिक जीवन में हम कितने ही संदर्भ समूह पर विश्वास करते हैं हमारे परिवार के सदस्य, मित्र समूह व अभिनेता भी हो सकते हैं।
(i) संदर्भ समूह का संकल्प किसने दिया था ? (ii) संदर्भ समूह का क्या अर्थ है ? (iii) क्या प्रत्येक व्यक्ति का कोई संदर्भ समूह होता है ? यदि हां तो क्यों ? उत्तर-(i) संदर्भ समूह का संकल्प हरबर्ट हाईमैन (Herbert Hymen) ने 1942 में अपनी पुस्तक में दिया था।
(ii) संदर्भ समूह ऐसा समूह होता है जिसमें हम स्वयं की तुलना उससे करते हैं। यह हमारे लिए एक आदर्श समूह होता है जिसमें हम अपनी विचारधारा, व्यवहार तथा विश्वास को उस आदर्श समूह के अनुसार बदलने का प्रयास करते हैं।
(iii) जी हाँ, प्रत्येक व्यक्ति का कोई-न-कोई आदर्श समूह अथवा संदर्भ समूह अवश्य होता है। वास्तव में यह मानवीय प्रकृति है कि हम जीवन में प्रगति करना चाहते हैं तथा हम अपने सामने किसी समूह को रख लेते हैं। वह समूह ही हमारे लिए संदर्भ समूह बन जाता है।

प्रश्न 12. निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें
आधुनिकीकरण का अर्थ आधुनिक जीवन के तरीकों तथा मूल्यों को अपनाना होता है। प्राचीन तौर पर, इस अवधारणा का प्रयोग मुख्यतः अर्थव्यवस्था में हो रहे परिवर्तनों तथा इसके सामाजिक मूल्यों पर पड़ रहे प्रभावों को मापना होता था। परन्तु आज आधुनिकीकरण का क्षेत्र व्यापक हो गया है यह पूरी तरह से कृषि से औद्योगिक अर्थव्यवस्था तक परिवर्तन ले आया है। इसका उन लोगों पर भी प्रभाव पड़ा है जो कि किसी प्रथा में बँधे हैं। इसने आधुनिकीकरण में लोगों को वर्तमान समय व स्थिति के अनुसार बदलने के लिए विवश किया है। परिणामतः आधुनिकीकरण द्वारा लोगों के विचारों, प्राथमिकताओं, मनोरंजनात्मक सुविधाओं में धीरे-धीरे परिवर्तन हुआ है। दूसरे शब्दों, में, वैज्ञानिक और तकनीकी आविष्कारों ने सामाजिक सम्बन्धों में अभूतपूर्व परिवर्तन किए हैं और परम्परागत रूप को नई विचारधारा में आत्मसात् कर दिया है।
(i) आधुनिकीकरण का संकल्प किसने दिया था ? (ii) आधुनिकीकरण का क्या अर्थ है ? (iii) आधुनिकीकरण से क्या परिवर्तन आते हैं ?
उत्तर-
(i) आधुनिकीकरण शब्द का प्रयोग पहली बार डेनियल लर्नर ने दिया था परन्तु इसका व्यापक प्रयोग योगेन्द्र सिंह ने किया था।
(ii) डेनियल लर्नर के अनुसार, यह परिवर्तन की ऐसी प्रक्रिया है जो गैर पश्चिमी देशों में पश्चिमी देशों से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष सम्पर्क के द्वारा आई है तथा इससे लोग प्राचीन प्रथाओं को छोड़ कर नई प्रथाओं व विचारों को अपना लेते हैं।
(iii) (a) आधुनिकीकरण से लोगों के विचारों व व्यवहार के तरीकों में परिवर्तन आए हैं। – (b) लोगों ने नई तकनीक को अपनाना शुरू कर दिया तथा उनके जीवन में काफ़ी तेज़ी आ गई। (c) देश में इससे औद्योगिकरण व नगरीकरण में बढ़ौतरी हुई तथा आधुनिक सुविधाएं आनी शुरू हो गई।

प्रश्न 13. निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें वर्ग आधारित आन्दोलनों में श्रमिक व किसान आन्दोलनों को शामिल किया जाता है, जिनकी मुख्य माँग आर्थिक शोषण से मुक्ति थी। भारत में श्रमिक संघ आन्दोलन, श्रमिक व किसान वर्ग की स्थिति, उनकी मांगों, उनके मालिकों के व्यवहार एवम् सरकार द्वारा इस दिशा में उठाए गए प्रयासों को दर्शाते हैं। सूती मिलों, पटसन मिलों व चाय उद्योग की वृद्धि के साथ भारत में ग़रीब लोगों को इन कारखानों में श्रमिक के तौर पर रोज़गार मिला। कम मजदूरी, लम्बा कार्यकाल, अस्वस्यकारी हालातों एवम् स्वदेशी व विदेशी पूंजीपतियों द्वारा शोषण ने उनकी स्थिति को दयनीय बना दिया। भिन्न-भिन्न समय पर कई ‘फैक्ट्री अधिनियम’ आए। परन्तु इससे कार्यरत श्रमिकों की दशा में कोई सुधार नहीं हो सका। इसके पश्चात, किसानों का भी आर्थिक शोषण हुआ। पंजाब में, बंगाल के किसानों का नील उत्पादन के विरुद्ध आन्दोलन तथा पंजाब का किसान आन्दोलन, इनमें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
(i) वर्ग आधारित आन्दोलन का क्या अर्थ है ?
(ii) भारतीय उद्योगों में वर्ग आधारित आन्दोलन क्यों शुरू हुए थे ?
(iii) वर्ग आधारित आन्दोलन की उदाहरण दें।
उत्तर-(i) जब कोई आन्दोलन किसी विशेष वर्ग की मांगों को सामने रख कर शुरू किया जाए तो उसे वर्ग आधारित आन्दोलन कहा जाता है।
(ii) भारतीय उद्योगों में मजदूरों की स्थिति काफ़ी खराब थी। उन्हें कम पैसा दिया जाता था, कार्य का समय अधिक था, गंदगी भरे हालात थे, देशी तथा विदेशी पूँजीपति उनका शोषण करते थे जिस कारण मजदूरों की स्थिति काफ़ी दयनीय थी। इसलिए भारतीय उद्योगों में मज़दूर आन्दोलन शुरू किए गए थे।
(iii) वैसे तो वर्ग आन्दोलनों में ट्रेड यूनियन संगठनों का आन्दोलन, कृषकों के आन्दोलन शामिल हैं। परन्तु हम पंजाब के कृषक आन्दोलन, मुम्बई की मिलों के मज़दूर आन्दोलन, बंगाल के नील आन्दोलन इत्यादि को मुख्य वर्ग आन्दोलन कह सकते हैं।

प्रश्न 14. निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें
नशीली दवाओं के व्यसन की समस्या आज हमारे समाज में बहुत तीव्रता से बढ़ रही है। युवा पीढ़ी अपनी कमज़ोर विचार शक्ति, कम अकादमिक उपलब्धियों, पारिवारिक पृष्ठभूमि एवम् अपने मित्रों के दबाव के कारण इसका अधिक शिकार है। कई बार वे महसूस करते हैं कि वे इतने बुद्धिमान, शक्तिशाली नियंत्रित हैं कि वे नशे के आदी नहीं हो सकते। परन्तु वे फिर भी इस व्यसन का शिकार हो जाते हैं। अतः नशीली दवाओं के व्यसन की यह आदत किसी को भी अपने जाल में ग्रसित कर सकती है। यह व्यक्ति के स्वास्थ्य को हानि पहँचाने, पारिवारिक संरचना में समस्या पैदा करने व समाज में अपराधों की वृद्धि का कारण बनती है। व्यसनी लोग प्रायः जीवन की अन्य गतिविधियों में अपनी रुचि खो देते हैं। वे अपना दायित्व निभाने के योग्य नहीं रहते व अपने परिवार तथा समाज पर बोझ बन जाते हैं।
(i) नशीली दवाओं के व्यसन का क्या अर्थ है ?
(ii) लोग नशा क्यों करते हैं ?
(iii) नशीली दवाओं के व्यसन का परिणाम क्या होता है ? .
उत्तर-(i) जब कोई व्यक्ति मदिरा, अफीम अथवा किसी अन्य प्रकार के नशे का प्रयोग करने का इतना आदि हो जाए कि उसके बिना रह न सके तो इसे नशीली दवाओं का व्यसन कहा जाता है।
(ii) कई लोग शौक के कारण नशा करते हैं, कई लोग तनाव को दूर करने के लिए नशा करते हैं, कई लोग दुःखों को भुलाने के लिए नशा करते हैं। धीरे-धीरे वह नशे के इतने आदी हो जाते हैं कि इसके बिना नहीं रह सकते तथा नशीली दवाओं के चक्र में फँस जाते हैं।
(iii) (a) नशे के कारण स्वास्थ्य ख़राब हो जाता है तथा व्यक्ति कुछ करने लायक नहीं रहता। (b) नशा करने से व्यक्ति का सम्पूर्ण पैसा खत्म हो जाता है तथा उसकी आर्थिक व्यवस्था भी बुरी हो जाती है। (c) इससे समाज की प्रगति पर भी सीधा प्रभाव पड़ता है तथा प्रगति कम होना शुरू हो जाती है।

प्रश्न 15. निम्न दिए स्त्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें वृद्धावस्था में पाचक प्रक्रियाएँ धीमी पड़ जाती हैं। लोग शारीरिक व मानसिक रूप से कमजोर हो जाते हैं। उनमें विभिन्न प्रकार के रोगों के शिकार होने का भय बढ़ जाता है। व्यक्ति की रोगक्षमता कम हो जाने के कारण वृद्ध लोग अधिकतर असंक्रामक रोगों के शिकार हो जाते हैं। ज्यादातर वृद्ध व्यक्तियों को अच्छी गुणवत्ता वाली तथा संवेदनशील स्वास्थ्य देख रेख न मिलने के कारण उनकी बढ़ रही आयु के कारण उनके स्वास्थ्य स्तर में गिरावट और भी जटिलता से आती है। इसके साथ-साथ स्वास्थ्य सम्बन्धी अच्छी जानकारी व ज्ञान की कमी के साथ-साथ इलाज का अत्यन्त महंगा होने के कारण वृद्धावस्था की संभाल करना विशेषकर उनके लिए जो निर्धन व साधनविहीन वर्ग से सम्बन्धित हैं, की पहुँच से बाहर हो गया है।
(i) वृद्ध व्यक्ति कौन होता है ?
(ii) वृद्ध व्यक्ति कौन-सी तीन समस्याओं का सामना करते हैं ?
(iii) वृद्ध व्यक्तियों की समस्याओं को कैसे दूर किया जा सकता है ?
उत्तर-(i) जो व्यक्ति रिटायर हो चुका हो अथवा 60 वर्ष की आयु से अधिक का हो चुका हो, उसे वृद्ध व्यक्ति कहा जाता है।
(ii) (a) वृद्ध व्यक्ति को कई बीमारियां लग जाती हैं। (b) उसके रिटायर होने के पश्चात् उसकी आय खत्म हो जाती है तथा वह आर्थिक रूप से अपने बच्चों पर निर्भर हो जाता है।
(c) उसके शरीर में बीमारियों से लड़ने का सामर्थ्य भी कम हो जाता है। उसे कम दिखना व सुनना आम हो जाता है।
(iii) (a) सरकारी कानूनों को कठोरता से लागू किया जाना चाहिए ताकि कोई भी वृद्ध व्यक्तियों को तंग न करे।
(b) सरकार को वृद्ध व्यक्तियों को बढ़िया तथा निःशुल्क स्वास्थ्य सुविधाएं देनी चाहिए।
(c) सरकार को वृद्ध व्यक्तियों को अच्छी बुढ़ापा पैंशन देनी चाहिए ताकि वह अपने जीवन के अन्तिम पड़ाव पर बच्चों के ऊपर आर्थिक रूप से निर्भर न रहें।

प्रश्न 16. निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर देंविश्व में एक बिलियन से भी अधिक लोग हैं जो किसी-न-किसी प्रकार की असर्मथता के साथ जीवन व्यतीत कर रहें हैं। हममें से बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके मित्र मण्डली या परिवार में ऐसे व्यक्ति होंगे जिन्हें दैनिक जीवन में इस समस्या के कारण बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। असमर्थ व्यक्तियों की मूलभूत सेवाओं तक सीमित पहुँच होने के कारण, कई सुविधाओं जैसे शिक्षा, रोजगार, पुनर्वास सुविधाओं आदि से वंचित रखा जाता है। इसके अतिरिक्त असमर्थता, सामाजिक कलंक के रूप में उनकी सामान्य सामाजिक व आर्थिक ज़िन्दगी में रुकावटें पैदा करती है।

असमर्थता शब्द का अभिप्राय, एक प्रकार या बहु प्रकार की कुशलता का अभाव है जो मानसिक, शारीरिक तथा संवेदना से संबंधित हो सकती है। इसे प्राथमिक रूप से एक चिकित्सा सम्बन्धी कमी के रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है। अतः असमर्थता शब्द, स्वयं में एक प्रकार की नहीं बल्कि अपने आप में बहु प्रकार की कमियों को समेटे हए है। हालांकि, असमर्थता शब्द, अपने आप में सजातीय श्रेणी नहीं है क्योंकि इसमें विभिन्न प्रकार की शारीरिक विभिन्नताएं, शारीरिक अवरोध (कमियाँ), संवेदनशीलता में त्रुटि तथा मानसिक अथवा शिक्षण सम्बन्धी असमर्थताएँ आती हैं जो कि जन्मजात या फिर जन्म के बाद भी हुई हो सकती हैं।
(i) असमर्थता का क्या अर्थ है ?
(ii) असमर्थ व्यक्तियों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है ?
(iii) असमर्थता के प्रकार बताएं।
उत्तर-(i) जो व्यक्ति किसी शारीरिक अकुशलता के कारण रोज़ाना जीवन जीने के लिए संघर्ष करते हैं उसे असमर्थता कहा जाता है।
(ii) (a) असमर्थता के कारण व्यक्ति ठीक ढंग से शिक्षा नहीं ले पाता।
(b) उसके नौकरी करने के मौके सीमित हो जाते हैं।
(c) वह किसी भी कार्य को उतनी तेजी से नहीं कर सकते जिस तेज़ी से एक समर्थ व्यक्ति कर सकता है।
(iii) असमर्थता कई प्रकार की होती है जैसे कि(a) संचालन की असमर्थता (Locomotor Disability) (b) देखने की असमर्थता (Visual Disability)
(c) सुनने की असमर्थता (Hearing Disability) (d) मानसिक असमर्थता (Mental Disability) (e) बोलने की असमर्थता (Speech Disability)।